अर्पण- भाग 2 : अदिती का अनकहा दर्द

डा. हिमांशु जब भी अदिती से यह कहते, तो कुछ बनने की लालसा अदिती में जोर मारने लगती. उन्होंने अदिती को अपनी लाइब्रेरी में पार्टटाइम नौकरी दे रखी थी. डा हिमांशु जानेमाने नाट्यकार, उपन्यासकार और कहानीकार थे. उन की हिंदी की तमाम पुस्तकें पाठ्यक्रम में लगी हुई थीं. उन का लैक्चर सुनने और मिलने वालों की भीड़ लगी रहती थी. वे यूनिवर्सिटी से घर आते, तो रात 10 बजे तक उन से मिलने वालों की लाइन लगी रहती. नवोदित लेखकों से ले कर नाट्य जगत, साहित्य जगत और फिल्मी दुनिया के लोग भी उन से मिलने आते थे.

अदिती यूनिवर्सिटी में डा. हिमांशु को मात्र अपने प्रोफैसर के रूप में जानती थी. डा. हिमांशु पूरी क्लास को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, यह भी उसे पता था. उसी क्लास में अदिती भी तो थी. अदिती डा. हिमांशु की क्लास कभी नहीं छोड़ती थी.

लंबे, स्मार्ट, सुदृढ़ शरीर वाले डा. हिमांशु की आंखों में एक अजीब सा तेज था. सामान्य रूप से वे हलके रंग की शर्ट और ब्लू डैनिम पहनने वाले डा. हिमांशु पढ़ने के लिए सुनहरे फ्रेम वाला चश्मा पहनते, तो अदिती मुग्ध हो कर उन्हें ताकती ही रह जाती. जब वे अदिती के नोट्स या पेपर्स की तारीफ करते, तो उस दिन अदिती हवा में उड़ने लगती.

फाइनल ईयर में जब डा. हिमांशु की क्लास खत्म होने वाली थी, तो एक दिन प्रोफैसर साहब ने उसे मिलने के लिए डिपार्टमैंट में बुलाया.

अदिती उन के कक्ष में पहुंची, तो उन्होंने कहा, ‘‘अदिती मैं देख रहा हूं कि इधर तुम्हारा ध्यान पढ़ाई में नहीं लग रहा है. तुम अकसर मेरी क्लास से गायब रहती हो. पहले 2 सालों में तुम फर्स्ट क्लास आई हो. यदि तुम्हारा यही हाल रहा, तो इस साल तुम पिछले दोनों सालों की मेहनत पर पानी फेर दोगी.’’

अदिती कोई भी जवाब देने के बजाय रो पड़ी.

डा. हिमांशु अपनी कुरसी से उठ कर अदिती के पास आ कर खड़े हो गए. उन्होंने अपना एक हाथ अदिती के कंधे पर रख दिया. उन के हाथ रखते ही अदिती को लगा, जैसे वह हिमालय के हिमाच्छादित शिखर के सामने खड़ी है. उस के कानों में घंटियों की आवाजें गूंजने लगी थीं.

‘‘तुम्हें किसी से प्रेम हो गया है क्या?’’ प्रोफैसर हिमांशु ने पूछा.

अदिती ने रोतेरोते गरदन हिला कर इनकार कर दिया.

‘‘तो फिर?’’

‘‘सर मैं नौकरी करती हूं. इसलिए पढ़ने के लिए समय कम मिलता है.’’

‘‘क्यों?’’ डा. हिमांशु ने आश्चर्य से कहा, ‘‘शायद तुम्हें शिक्षा के महत्त्व का पता नहीं है. शिक्षा केवल कमाई का साधन ही नहीं है. शिक्षा संस्कार, जीवनशैली और हमारी परंपरा है. कमाने के चक्कर में तुम्हारी पढ़ाई में रुचि खत्म हो गई है. इस तरह मैं ने तमाम विद्यार्थियों की जिंदगी बरबाद होते देखी है.’’

‘‘सर…’’ अदिती ने हिचकी लेते हए कहा, ‘‘मैं पढ़ना चाहती हूं, इसीलिए तो नौकरी करती हूं.’’

डा. हिमांशु ने अदिती के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आई एम सौरी… मुझे पता नहीं था.’’

‘‘इट्स ओके सर.’’

‘‘क्या काम करती हो?’’

‘एक वकील के औफिस में टाइपिस्ट हूं.’’

‘‘मैं नई किताब लिख रहा हूं. मेरी रिसर्च असिस्टैंट के रूप में काम करोगी?’’ डा. हिमांशु ने पूछा तो अदिती ने आंसू पोंछते हुए ‘हां’ में गरदन हिला दी.

उसी दिन से अदिती डा. हिमांशु की रिसर्च असिस्टैंट के रूप में काम करने लगी.  इस बात को आज 2 साल य्हो गए हैं. अदिती ग्रेजुएट हो गयी है. वह फर्स्ट क्लास फर्स्ट आई थी यूनिवर्सिटी में. डा. हिमांशु एक किताब खत्म होते ही अगली पर काम शुरू कर देते. इस तरह अदिती का काम चलता रहा. अदिती ने एमए में एडमीशन ले लिया था.

प्यार का सफल प्रायश्चित्त – भाग 1

ऐसा क्यों होता है जिसे कई बार देखा हो, देख कर भी न देखा हो. आतेजाते नजर पड़ जाती हो लेकिन उसे ले कर कोई विचार, कोईर् खयाल न उठा हो कभी. ऐसा होता वर्षों बीत चुके हों. फिर किसी एक दिन बिना किसी खास बात या घटना के अचानक से उस का ध्यान आने लगता है. मन सोचने लगता है उस के विषय में. वह पहले जैसी अब भी है, कोई विशेषता नहीं. फिर भी उस के खयाल आते चले जाते हैं और वह अच्छी लगने लगती है अकारण ही, हो सकता है पहले उस के मन में कुछ हो या न भी हो, वहम हो मेरा कोरा. अभी भी उस का मन वैसा ही हो जैसा पहले मेरा था. उस को ले कर सबकुछ कोरा.

लेकिन, मु झे यह क्या होने लगा? क्या सोचने लगा मन उस के बारे में? क्यों उस का चेहरा आंखों के सामने  झूलने लगा हर वक्त? यह क्या होने लगा है उसे ले कर, नींद भी उड़ने लगी है. मैं नाम भी नहीं जानता. जानना चाहा भी नहीं कभी. लेकिन आजकल तो हाल ऐसा हो गया है कि बुद्धि भ्रष्ट सी हो गई है. आवारा मन भटकने लगा है उस के लिए. अब तो प्रकृति से मांगने लगा हूं कि मिल जाए वह तो सब मिल गया मु झे. एक  झलक पाने को मन मचलता रहता है. कहने की हिम्मत नहीं पड़ती.

अब सोचता हूं तो बहुतकुछ असमानताएं नजर आती हैं, उस में और मु झ में. उम्र, जाति, धर्म और भी न जाने क्याक्या? लेकिन ये सब क्यों होने लगा, यह सम झ नहीं पा रहा हूं. खुद में एक लाचारी सी है. मन की निरंतर बढ़ती हुईर् चाहत. क्या करूं अपनी इस बेवकूफी का? अपने पर गुस्सा भी आता है दया भी. जितना सोचता हूं कि न सोचूं, उतना ही सोचता जाता हूं और पता भी नहीं चलता कब रात गुजर गई सोचतेसोचते. क्या इसे प्यार कहेंगे?

कितना अजीब है यह सबकुछ. पता चलने पर क्या सोचेंगे लोग. वैसे पता चलने नहीं दूंगा किसी को मरते दम तक. उस से कहने की तो हिम्मत ही नहीं है. मान लो, कह भी दिया तो क्या होगा? कहीं गलत सम झ बैठी. कहीं हल्ला कर दिया इस बात का, मेरा प्रेम तो छिछोरा बन कर रह जाएगा. अब दिखती है तो देखता हूं मैं और चाहता हूं कि देखे वह मु झे. लेकिन सामने पड़ते ही न जाने कौन सी  िझ झक, कौन सी मर्यादा रोक लेती है? देख नहीं पाता, देखना चाहता हूं जीभर के. वह देखती है लेकिन नजर टकराने जैसा. जैसे आमनेसामने से गुजरते हैं. अजनबी या पहचाने चेहरे. बस, इस से ज्यादा कुछ नहीं. छोटा शहर, छोटा सा महल्ला, क्या करूं?

खत भी कैसे लिखूं कि उसे पता हो कि मैं ने लिखा है, लेकिन पता न चले किसी और को. पता चले और तमाशा खड़ा हो तो कह सकूं कि मैं ने नहीं लिखा. फिर पत्र उसी तक पहुंचे तो भी ठीक, घर में किसी के हाथ लगा तो उस की मुश्किल. शक के दायरे में तो आ ही जाऊंगा मैं. वैसे, यदि उस की हां हो तो फिर कोई डर नहीं मु झे. फिर चाहे जमाने को पता लग जाए. बस, उस के दिल में हो कुछ मेरे लिए.

आजकल तो मोबाइल का जमाना है, लेकिन मोबाइल तो पत्रों से भी ज्यादा विस्फोटक हैं. फिर, मु झे नंबर भी पता नहीं. पता लगाने की कोशिश कर सकता हूं. लेकिन मैं ने उस के हाथ में कभी मोबाइल देखा ही नहीं. कोशिश की तो थी उस का नंबर पता लगाने की. किसी भी नंबर से कर सकता था फोन. लेकिन सफल नहीं हुआ. मान लो, किसी दिन सफल हो भी जाऊं तो क्या होगा? क्या कहेगी, क्या सम झेगी वह? मानेगी या मना कर देगी. मु झे ऐसा करना चाहिए या नहीं. बहुत बड़ा सामाजिक, आर्थिक भेद है. क्या करूं मैं? यह सब हो कैसे गया?

क्या यह प्यार है या कुछ और. या मेरी बढ़ती उम्र की कोई अतृप्त लालसा. यही सोच कर हैरान, परेशान हूं कि ऐसा क्यों हो रहा है मेरे साथ. न मेरे सपनों की राजकुमारी से मेल खाती है वह, न कोई विशेषताएं हैं मु झे खींचने लायक उस में. फिर मैं किस  झं झट में अपनेआप फंसता जा रहा हूं. क्या यह मन का भटकना है, क्या कोई बुरा समय शुरू हो गया है मेरा. क्या सच में प्यार हो गया है मु झे. मैं दिनोंदिन पागल और बेचैन हो रहा हूं उस के लिए, मेरे न चाहने पर भी.

मैं क्या करूं, यह कोई फिल्म या कहानी नहीं है. यह जीवन है. एक मध्यवर्गीय महल्ला है जहां ऐसा सोचना भी ठीक नहीं. फिर इसे परिणित करना बहुत मुश्किल है और मान लो कि ऐसा हो भी जाए जैसा चाहता हूं मैं, तब क्या होगा, लड़की का भविष्य, मेरा वर्तमान, कहां जाएंगे भाग कर?

पुलिस, कोर्टकचहरी, मीडियाबाजी सबकुछ होगा. फिर अपने मातापिता के साथ आतीजाती दिखती लड़की से बात करना भी संभव नहीं है. लेकिन अचानक से यह सब क्यों होने लगा मन में. उस का खयाल, उस का चेहरा घूमता रहता है और दिनरात बेकरारी बढ़ती ही जा रही है निरंतर. यह गलत है, मैं जानता हूं, लेकिन यह बेईमान मन सुने, तब न. अब, बस, घुटते रहना है और किसी एक दिन ऐसी गलती भी होनी है मु झ से. जिस का क्या परिणाम होगा, मु झे पता नहीं या पता है, इसलिए हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन मन कर के रहेगा मनमानी और होगा कोई तमाशा.

मैं रोक रहा हूं खुद को लेकिन पता नहीं कब तक? मैं तो यही सोच कर परेशान हूं कि यह सब क्यों हो रहा है मेरे साथ. क्या कहूंगा मैं उस से. मान लो, मौका मिला भी और कहा, ‘तुम से प्यार करता हूं,’ आगे शादी की बात पर क्या कहूंगा? वह नहीं कहेगी तुम तो शादीशुदा हो? 2 बच्चों के बाप? शर्म नहीं आती तुम्हें. बात सही है. मैं हूं शादीशुदा. तो क्या मैं बोर हो चुका हूं अपनी पत्नी से? नहीं, ऐसा नहीं है, मैं चाहता हूं उसे. और बच्चों से कौन बाप बोर होता है? तो क्या मु झे नएपन की तलाश है. क्या मैं ऐयाशी की तरफ बढ़ रहा हूं. नहीं, वह तो कहीं भी कर सकता हूं.

यही लड़की क्यों पसंद और प्रिय है मु झे. क्या कह सकता हूं? क्या करूं मनचले मन ने जीना हराम कर रखा है. क्यों यह लड़की मेरी जिंदगी में घुसती चली जा रही है, मेरे मनमस्तिष्क में समाती ही जा रही है. ऐसा भी नहीं कि मैं छोड़ दूं उस की खातिर अपना परिवार. फिर किस हक से मैं उसे चाहता हूं पाना. सम झ के बाहर है बात. किस अधिकार से कहूं उस से. क्या वह हां कह सकती है. नहीं, बिलकुल नहीं. अगर कह दिया, तो होगा क्या आगे? शादी और प्रेम के भंवर में फंस जाऊंगा मैं. बदनामी, अपमान अलग. यह कैसी मुसीबत मोल ले ली मैं ने. सब इस मन का कियाधरा है. धिक्कार है ऐसे मन में. मैं अपने को विवश और दुविधा में क्यों पा रहा हूं?

क्या करूं, सोचसोच कर परेशान हूं. ठीक तो यही होगा कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुश रहूं. उन्हीं में मन लगाऊं. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है. अब मेरी हालत ऐसी हो गईर् है कि मैं उस साधारण सी दिखने वाली 25 वर्ष की लड़की को 45 की उम्र में देखे बिना चैन नहीं पा रहा हूं. दिल बच्चों की तरह मचल रहा है. उस के घर से निकलने, छत पर टहलने वापस आने के समय पर मैं ध्यान दे रहा हूं ताकि मैं उसे देख सकूं. देख ही तो सकता हूं और कुछ तो मेरे वश में है नहीं.

मैं घर की छत पर हूं. मेरे घर से लगा हुआ उस का घर है. वह अपनी छत पर है. मैं उस की तरफ देख रहा हूं. बीचबीच में उस की नजर भी मु झ पर पड़ रही है. लेकिन उस की नजर मेरी नजर से जुदा है. उस की नजर पड़ने पर मैं अपनी नजरें हटा नहीं रहा हूं, बल्कि पूरी बेशर्मी से उसे देखे जा रहा हूं. उसे शायद आश्चर्य हो रहा होगा मु झ पर. जिस आदमी ने कभी नहीं देखा उस की तरफ तब भी जब वह अविवाहित था और अब ऐसे देख रहा है.

उस ने नजरें हटा लीं. वह छत से उतर कर नीचे चली गई. थोड़ी देर बाद मैं भी. अब मेरा क्या काम छत पर. उस के कालेज जाने के समय पर मैं भी निकल पड़ता उस के पीछे. वह कालेज चली जाती. मैं सीधा निकल जाता. जब वह कालेज से लौटती तो मैं भी सारे कामधाम छोड़ कर उस के पीछे चल देता. वह अपने घर और मैं मजबूरी में अपने घर. जी तो यही चाहता कि मैं उस के साथ उस के घर चला जाऊं. अपने घर बुलाना, थोड़ा नहीं, बहुत मुश्किल है. काश, शादी के पहले यह सब कोशिश की होती, तो बात बन जाती. इतने पीछेपीछे चलने पर उस का ध्यान मेरी ओर खिंचना स्वाभाविक था. यह कोई एकदो दिन की बात नहीं थी कि वह इसे इत्तफाक मान लेती. अब वह भी मेरी तरफ गौर से देखने लगी. शायद उसे मु झ पर शक हो चला हो तो या उसे महसूस हुआ हो कि मैं उसे चाहने लगा हूं. हो सकता है उसे मु झ में बदनीयती नजर आने लगी हो कह नहीं सकता. मेरी पत्नी को जरूर मेरे इस टाइमबेटाइम घर से आनेजाने पर शक हुआ. तभी तो उस ने टोका. लेकिन मैं ने उसे टाल दिया. छत पर जाता, तो पत्नी भी छत पर आने लगी. मेरे कार्य में व्यवधान पड़ने लगा. लेकिन मैं ऐसा जाहिर कर रहा था मानो मु झे पेट की शिकायत हो, या खुली हवा में सांस लेना, डाक्टर के अनुसार, जरूरी था मेरे लिए.’’

पत्नी ने पूछा भी,‘‘ तुम्हें कुछ हुआ है, कोई बीमारी है, डाक्टर से मिले?’’

मेरा जवाब था, ‘‘हां, खुली हवा में टहलने के लिए, पैदल चलने के लिए कहा डाक्टर ने,’’ अब कैसे बताऊं कि जो दिल में बस चुकी है वह पैदल ही कालेज आतीजाती है. मु झे उम्मीद तब जगी जब वह मेरे घर कुछ काम से आई. आती तो वह पहले भी थी लेकिन उस वक्त मैं ने कभी ध्यान नहीं दिया. पड़ोसी थी, सो, मेरी पत्नी से परिचय था उस का. उस के परिवार का. आनाजाना लगा रहता था. लेकिन अब वह आई तो मु झे लगा कि वह मेरे लिए आई है और आती रहेगी मेरे लिए. वह मु झ से नमस्ते अंकल कहती. पहले कोई फर्क नहीं पड़ता था. लेकिन अब कहती तो दिल पर तीर चलने लगते.

मैं अब पहले से भी ज्यादा सजसंवर कर रहता. एक भी बाल सफेद नहीं दिखने देता था. दाढ़ी रोज बनाता था. अच्छे कपड़े पहनने लगा था. पहनता तो पहले भी था लेकिन अब अपने चेहरे, बाल, कपड़ों का ज्यादा ध्यान रखने लगा था. मेरा इस तरह उस के पीछपीछे आना, उसे एकटक ताकना, शायद उसे आभास हो गया था कि मेरे दिल में उस के लिए कुछ है. कुछ नहीं, बल्कि बहुतकुछ है.

उस में भी मु झे काफी परिवर्तन दिखाई देने लगे थे. उस की वेशभूषा, पहनावा, करीने से संवारे गए बाल. जो पहले कभी नहीं था. वह अब होने लगा था. उस का इतराना, बल खा कर चलना, पीछे मुड़ कर देखना, मुसकराना, नजर मिलते ही गालों पर लाली दौड़ जाना, उस के देखने में मु झे साफ फर्क नजर आने लगा था. यह मेरा भ्रम नहीं था.

उसे आभास हो चुका था कि मैं उस पर दिलोजान से फिदा हूं. लेकिन वह मु झ पर क्यों मेहरबान हो रही थी, मेरी सम झ में नहीं आ रहा था. उम्र का असर था. लग रहा होगा उसे, चाहता है कोई. चाहत कब देखती है उम्रबंधन? ये तो समाज के बनाए रिवाज हैं. जो न मु झे मंजूर हैं और न शायद उसे. आग बराबर लगी हुई थी दोनों तरफ. बहुत दिन इसी सोच में बीत गए कि वह कोई बात करे ताकि आगे की शुरुआत हो सके. लेकिन मैं भूल गया था कि शुरुआत पुरुष को ही करनी होती है.

मु झे उस के हावभाव से सम झ लेना चाहिए था. यदि मैं ने देर की, तो शायद बात हाथ से निकल जाए. वैसे भी, बहुत देर हो चुकी थी. इस से पहले कि और देर हो जाए, मु झे कह देना चाहिए उस से. लेकिन मैं क्या कहूं? कैसे कहूं? मेरे कहने पर यदि उस ने अनुकूल उत्तर न दिया. उलटा कुछ कह दिया, तो फिर कैसे रह पाऊंगा पड़ोसी बन कर? क्या इज्जत रह जाएगी मेरी महल्ले में? लेकिन चाहत है तो कहना होगा. अब बिना कहे काम नहीं चल सकता. मेरी नजर उस से टकराती तो मैं मुसकरा देता. जवाब में वह भी मुसकरा देती. अब बनी बात. लाइन क्लीयर है. अब कह सकता हूं मैं अपने दिल की बात. वह कालेज जा रही थी और मैं उस के पीछे थोड़े अंतर से चल रहा था. उस ने अपनी गति धीमी कर दी. मैं भी अपनी गति से चलता रहा. थोड़ी देर में बगल में था मैं उस की. अब हम साथसाथ चल रहे थे.

पापा के लिए- भाग 1: सौतेली बेटी का त्याग

जिस स्नेह और अपनेपन से मेरी मम्मी ने पापा के पूरे परिवार को अपना लिया था, उस का एक अंश भी अगर पापा उन की बेटी को यानी मुझे दे देते तो… लेकिन नहीं, पापा मुझे कभी अपनी बेटी मान ही नहीं सके. उन के लिए जो कुछ थे, उन की पहली पत्नी के दोनों बच्चे थे अमन और श्रेया. अमन तो तब मेरे ही बराबर था, 7 साल का, जब उस के पापा ने मेरी मम्मी से शादी की थी और श्रेया मात्र 3 बरस की थी.

दादी के बारबार जोर देने पर और छोटे बच्चों का खयाल कर के पापा ने मम्मी से, जो उन्हीं की कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर थीं, शादी तो कर ली. लेकिन मन से वे उन्हें नहीं अपना पाए. मम्मी भी कहां मेरे असली पापा को भुला सकी थीं.

अचानक रोड ऐक्सीडैंट में उन की डैथ हुई थी. उस के बाद अकेले छोटी सी बच्ची यानी मुझे पालना उन के लिए पुरुषों की इस दुनिया में बहुत मुश्किल था. पापा के जाने के बाद 2 साल में ही इस दुनिया ने उन्हें एहसास करा दिया था कि एक अकेली औरत, जिस के सिर पर किसी पुरुष का हाथ नहीं, 21वीं सदी में भी बहुत बेबस और मजबूर है. उस का यों अकेले जीना बहुत मुश्किल है.

ननिहाल और ससुराल में कहीं भी ऐसा कोई नहीं था जिस के सहारे वे अपना जीवन काट सकतीं. इसलिए एक दिन जब औफिस में पापा ने उन्हें प्रपोज किया तो वे मना नहीं कर सकीं. सोचा, कि ज्यादा कुछ नहीं तो इज्जत की एक छत और मुझे पापा का नाम तो मिल जाएगा न. और वैसा हुआ भी.

पापा ने मुझे अपना नाम भी दिया और इतना बड़ा आलीशान घर भी. उन की कंपनी अच्छी चलती थी और समाज में उन का नाम, रुतबा सब कुछ था. नहीं मिली तो मुझे अपने लिए उन के दिल में थोड़ी सी भी जगह.

मेरे अपने पापा कैसे थे, यह तो विस्मृत हो गया था मेरी नन्ही यादों से, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ यह बखूबी समझ आ रहा था कि ये वाले पापा वाकई दुनिया के बैस्ट पापा थे, जो अपने दोनों बच्चों पर जान छिड़कते थे. मम्मी के सब कुछ करने के बावजूद भी उन्हें खुद स्कूल के लिए तैयार करते, उन्हें गाड़ी से स्कूल छोड़ने जाते, शाम को उन्हें घुमाने ले जाते, उन के लिए बढि़याबढि़या चीजें लाते, खिलौने लाते, तरहतरह की डै्रसेज लाते और भी न जाने क्याक्या. मेरे अकेले के लिए अगर मम्मी कभी कुछ ले आतीं, तो बस बहुत जल्दी सौतेलीमां की उपाधि से उन्हें सजा दिया जाता.

उन बच्चों को तो मेरी मम्मी पूरी तरह से मिल गई थीं. वे उन के संग हर जगह जातीं, संग खेलतीं, संग खातीं, मगर शायद उन की हरीभरी दुनिया में मेरे लिए कोई जगह नहीं थी. यहां तक कि अगर मम्मी मेरा कुछ काम कर रही होतीं और इस बीच यदि श्रेया और अमन, यहां तक कि पापा और दादी का भी कोई काम निकल आता, तो मम्मी मुझे छोड़ कर पहले उन का काम करतीं. इस डर से कि कहीं पापा गुस्सा न हो जाएं, कहीं दादी फिर से सौतेलीमां का पुराण न शुरू कर दें.

हमारे समाज में हमेशा सौतेली मां को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है कि वह चाहे अपना कलेजा चीर कर दिखा दे, लेकिन कोई उस की अमूल्य कुरबानी और प्यार को नहीं देखेगा, बस उस पर हमेशा लांछन ही लगाए जाएंगे.

अच्छी मम्मी बनने के चक्कर में मम्मी मेरी तरफ से लापरवाह हो जातीं. सब को सब मिल गया था, मगर मेरा तो जो अपना था वह भी मुझ से छिनने लगा था. मम्मी को मुझे प्यार भी छिप कर करना पड़ता और मेरा काम भी. मैं उन की मजबूरी महसूस करने लगी थी,

मगर मैं भी क्या करती. उन के सिवा मेरा और था ही कौन? उन के बिना तो मैं पूरे घर में अपने को बहुत अकेला महसूस करती थी. चारों लोग कहीं तैयार हो कर जा रहे होते और अगर मैं गलती से भी उन के संग जाने का जिक्र भर छेड़ देती तो मम्मी मारे डर के मुझे चुप करा देतीं.

मेरा बालमन तब पापा की तरफ इस उम्मीद से देखता कि शायद वे मुझे खुद ही साथ चलने को कहें, मगर वहां तो स्नेह क्या, गुस्सा क्या, कोई एहसास तक नहीं था मेरे लिए. जैसे मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद उन के लिए हो कर भी नहीं था. वे सब लोग गाड़ी में बैठ कर चले जाते और मैं वहीं दरवाजे पर बैठी रोतेबिसूरते उन के लौटने का इंतजार करती रहती. इतने बड़े घर में अकेले मुझे बहुत डर लगता था. तब सोचती, क्या मम्मी ने इन नए वाले पापा से शादी कर के ठीक किया? पता नहीं उन्होंने क्या पाया, लेकिन जातेजाते बारबार आंसू भरी आंखों से पीछे मुड़मुड़ कर उन का मुझे निहारना मुझ से उन के रीते हाथों की व्यथा कह जाता.

दादी का तो होना न होना बराबर ही था. वे भी मुझ से तब ही बात करती थीं जब उन्हें कोई काम होता था, वरना वे तो शाम को

जल्दी ही खापी कर अपने कमरे में चली जाती थीं. फिर पीछे दुनिया में कुछ भी होता रहे, उन की बला से. मैं आंखों में बस एक ही अरमान ले कर बड़ी होती रही कि एक दिन तो जरूर ही पापा कहेंगे – तू मेरी बेटी है, मेरी सब से प्यारी बेटी…

Father’s Day Special – हमारी अमृता- भाग 1: क्या अमृता को पापा का प्यार मिला?

हमेशा की तरह आज भी बंगले के लान में पार्टी का आयोजन किया गया था. वीना सुबह से व्यस्त थीं. उन के घर की हर पार्टी यादगार होती है. दोनों बेटियां, कविता और वनिता भी तैयार हो कर आ गई थीं. वीना के पति अमरनाथ विशिष्ट मेहमानों को लाने होटल गए थे. मद्धिम रोशनी, लान में लगाई गई खूबसूरत कुरसियां और गरमागरम पकवानों से आती खुशबू, कहीं कुछ भी कम न था.

अमर मेहमानों को ले कर लान में दाखिल हुए. उन के स्वागत के बाद वीना सूप सर्व कर रही थीं कि अंदर से जोरजोर से चीखने की आवाज आने लगी, ‘मम्मी…मम्मी, मुझे बाहर निकालो.’ वीना हाथ का सामान छोड़ कर अंदर भागीं. इधर पार्टी में कानाफूसी होने लगी. कविता और वनिता चकित रह गईं. अमरनाथ के चेहरे पर अजीब हावभाव आजा रहे थे. लोग भी कुतूहल से अंदर की ओर देखने लगे. वीना ने फुरती से अमृता को संभाल लिया और पार्टी फिर शुरू हो गई.

यह अमृता कौन है? अमृता, वीना की तीसरी बेटी है. वह मानसिक रूप से अपंग है, पर यह बात बहुत कम लोग ही जानते हैं. ज्यादातर लोग उन की दोनों बड़ी बेटियों के बारे में ही जानते हैं.

अमृता की अपंगता को ले कर इस परिवार में एक तरह की हीनभावना है. हर कोई अमृता के बारे में चर्चा करने से कतराता है. वीना तो मां है और मां का हृदय संतान के लिए, भले ही वह कैसी भी हो, तड़पता है. किंतु परिवार के अन्य सदस्यों के आगे वह भी मजबूर हो जाती है.

वीना ने तीसरा चांस बेटे के लिए लिया था. कविता और वनिता जैसी सुंदर बच्चियों से घर की बगिया खिली हुई थी. इस बगिया में यदि प्यार से एक बेटे का समावेश हो जाए तो कितना अच्छा रहे, यही पतिपत्नी दोनों की इच्छा थी, पर बेटा नहीं हुआ. उन की आशाओं पर तुषारापात करने के लिए फिर बेटी हुई, वह भी मानसिक रूप से अपंग. शुरू में वह जान ही न पाए कि उन की बेटी में कोई कमी है, पर ज्योंज्यों समय गुजरता गया, उस की एकएक कमी सामने आने लगी.

अमृता अभी 14 साल की है किंतु मस्तिष्क 5-6 साल के बच्चे के समान ही है. घर की व्यवस्था, पति और बच्चे, इन सब के साथ अमृता को संभालना, वीना के लिए अच्छी कसरत हो जाती है. कहने को तो घर में कई नौकरचाकर थे पर अमृता, उसे तो मां चाहिए, मां का पल्लू थामे वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है.

पार्टी समाप्त होने पर अमर ने जूते उतारते हुए वीना से कहा, ‘‘तुम पार्टी के समय अमृता की ठीक से व्यवस्था क्यों नहीं करतीं, चाहो तो मैं आफिस से सर्वेंटस भेज देता हूं. मगर मैं कोई व्यवधान नहीं चाहता.’’

थकी हुई वीना की आंखों में आंसू आ गए. वह धीरे से बोलीं, ‘‘आप के आफिस की फौज अमृता के लिए कुछ नहीं कर सकती, अमृता मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकती.’’

‘‘अमृता…अमृता…’’ अमर ने चिल्ला कर कहा, ‘‘न जाने तुम ने इस विषवेल का नाम अमृता क्यों रखा है. कई बार कहा कि कई मिशनरियां ऐसे बच्चों की अच्छी तरह देखभाल करती हैं. इसे तुम वहां क्यों नहीं छोड़ देतीं.’’

‘‘अमृता इस घर से कहीं नहीं जाएगी,’’ वीना ने सख्ती से कहा, ‘‘यदि वह गई तो मैं भी चली जाऊंगी.’’

कविता और वनिता ने मम्मीपापा की बहस सुनी तो वे चुपचाप अपने कमरे में चली गईं. इस घर में ऐसी बहस अकसर होती है. कविता के हृदय में अमृता के प्रति असीम प्रेम है किंतु वनिता को वह फूटी आंख नहीं भाती क्योंकि मम्मी अमृता के साथ इतनी व्यस्त रहती हैं कि उस का जरा भी ध्यान नहीं रखतीं.

16 साल की वनिता 11वीं की छात्रा है. अमृता के जन्म के बाद उसे मां की ओर से कम ही समय मिलता था इसलिए अभी भी वह स्वयं को अतृप्त महसूस करती है.

18 वर्षीय कविता बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा है. वह बेहद खूबसूरत और भावुक स्वभाव की है. किसी का भी दुख देख कर उस की आंखों में आंसू आ जाते हैं. अमृता को संभालने में वह मां की पूरी मदद करती है.

पति की बहस के बाद वीना अमृता के कमरे में चली गईं. उसे संभालने वाली बाई वहां थी. अमृता खिलौनों से खेल रही थी. कभीकभी उन्हें उठा कर फेंक भी देती. वीना को देख कर वह उन से लिपट गई. आंखों से आंसू और मुंह से लार बहने लगी. वीना ने पहले तो रूमाल से उस का चेहरा पोंछा, फिर बाई को वहां से जाने को कहा. उन्होंने अपने हाथों से अमृता को खाना खिलाया और उसे साथ ले कर सुलाने लगीं.

अमृता के साथ वीना इतनी जुड़ी हुई हैं कि वह अकसर घर के कई जरूरी काम भूल जातीं. उन्हें अमृता जब भी नजर नहीं आती है तो वह घबरा जाती हैं.

अमृता ने किशोरावस्था में प्रवेश कर लिया था. शरीर की वृद्धि बराबर हो रही थी किंतु मस्तिष्क अभी भी छोटे बच्चे की तरह ही था. कई बार वह बिछौना भी गीला कर देती. आंखों में दवा डाल कर वीना को उस की देखभाल करनी पड़ती थी. ज्यादा काम से वह कई बार चिड़चिड़ी भी हो जाती थीं.

परसों ही जब वनिता की सहेलियां आई थीं और वीना किचन में व्यस्त थीं, बाई को चकमा दे कर अमृता वहां आ पहुंची और टेबल पर रखी पेस्ट्री इस तरह खाने लगी कि पूरा मुंह गंदा हो गया. वनिता को ज्यादा शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. वह सहेलियों को ले कर अपने कमरे में चली गई. सहेलियों के बारबार पूछने पर भी वनिता ने नहीं बताया कि ऐसी हरकत करने वाली लड़की और कोई नहीं उस की बहन है.

सहेलियों के जाने के बाद उस ने अमृता को 2 थप्पड़ लगा दिए. अचानक पड़ी इस मार से अमृता का चेहरा लाल हो गया. वह सिर पटकपटक कर रोने लगी. वीना को सारा काम छोड़ कर आना पड़ा. जब उन्हें वनिता के दुर्व्यवहार के बारे में पता चला तब उन्होंने वनिता को खूब लताड़ा. वनिता गुस्से से बिफर पड़ी, ‘‘मम्मी, आप सुन लीजिए, इस घर में मैं रहूंगी या यह आप की लाड़ली रहेगी,’’ और पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई. वीना के हृदय पर क्या वज्रघात हुआ, यह वनिता जान न सकी.

इतना बड़ा घर, नौकरचाकर, सुखसुविधाओं का हर सामान होने पर भी इस घर में मानसिक शांति नहीं है. अमर के अहंकार के आगे वीना को हर बार झुकना पड़ता है. एक अमृता की बात पर ही वह अड़ जाती हैं, बाकी हर बातें वह अमर की मानती हैं.

कभी वीना के मन में विचार आता है कि सभी के बच्चे पूर्णत्व ले कर आते हैं, एक मेरी अमृता ही क्यों अपूर्ण रह गई. पल भर के लिए ऐसे विचार आने पर वह तुरंत उन्हें झटक देतीं और फिर नए उत्साह से अमृता की सेवा में जुट जातीं, पर पति का असहयोग उन्हें पलपल खलता.

ऐसा नहीं था कि अमर के मन में अमृता के प्रति बिलकुल प्रेम न था किंतु जहां सोसायटी के सामने आने की बात आती वह अमृता का परिचय देने से कतराते थे. कल सुबह ही जब अमर चाय पी रहे थे, अमृता छोटी सी गुडि़या ले कर उन के पास आ गई. हर दम चीख कर बोलने वाली अमृता आज धीरे से अस्पष्ट शब्दों में बोली, ‘‘पापा, मेरी गुडि़या के लिए नई फ्राक लाइए न.’’ तब पापा को भी उस पर प्यार उमड़ आया था. उस के गाल थपथपा कर बोले, ‘‘जरूर ला देंगे.’’

शेष चिह्न: भाग 1 – कैसा था निधि का ससुराल

निधि की शादी तय हो गई थी पर उस को ऐसा लग रहा था मानो मरघट पर जाना है…लाश के साथ नहीं, खुद लाश बन कर. उस का और मेरा परिचय एक प्राइवेट स्कूल में हुआ था जिस में मैं अंगरेजी की अध्यापिका थी और वह साइंस की अध्यापिका हो कर आई थी.

उस का अप्रतिम रूप, कमल पंखड़ी सा गुलाबी रंग, पतला छरहरा बदन, सौम्य नाकनक्श थे पर घर की गरीबी के कारण विवाह न हो पा रहा था.

निधि का छोटा सा कच्चा पुश्तैनी मकान था. परिवार में 4 बहनों पर एकमात्र छोटा भाई अविनाश था. बस, सस्ते कपड़ों को ओढ़तेपहनते, गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह खिंच रही थी.

बड़ी बहन आरती के ग्रेजुएट होते ही एक क्लर्क से बात पक्की कर दी गई तो पिता ने कुछ जी.पी.एफ. से रुपए निकाल कर विवाह की रस्में पूरी कीं. किसी प्रकार आरती घर से विदा हो गई. सब ने चैन की सांस ली. कुछ महीने आराम से निकल गए.

आरती को दान- दहेज के नाम पर साधारण सामान ही दे पाए थे. न टेलीविजन न अन्य सामान, न सोना न चांदी. ससुराल में उस पर जुल्मों के पहाड़ टूटने लगे पर वह सब सहती रही.

फिर एक दिन उस ने अपनी कोख से बेटे के बजाय बेटी जनी तो उस पर जुल्म और बढ़ते ही गए. और एक रात अत्याचारों से घबरा कर वह पड़ोसियों की मदद से रोतीकलपती अपने साथ एक नन्ही सी जान को ले कर पिता की देहरी पर लौट आई. उस का यह हाल देख कर पूरे परिवार की चीत्कार पड़ोस तक जा पहुंची. फिर क्याकुछ नहीं भुगता पूरे घर ने. आरती ने तो कसम खा ली थी कि वह जीवन भर वहां नहीं जाएगी जहां ऐसे नराधम रहते हैं.

इस तरह मय ब्याज के बेटी वापस आ गई. अत्याचारों की गाथा, चोटों के निशान देख कर फिर उसी घर में बहन को भेजने का सब से ज्यादा विरोध निधि ने ही किया. 3-4 वर्ष के भीतर  ही तलाक हो गया तो मातापिता की छाती पर फिर से 4 बेटियों का भार बढ़ गया.

मुसीबत जैसे चारों ओर से काले बादलों की तरह घिर आई थी. उस पर महंगाई की मार ने सब कुछ अस्तव्यस्त कर दिया. जो सब की कमाई के पैसे मिलते वह गरम तवे पर पानी की बूंद से छन्न हो जाते. तीजत्योहार सूखेसूखे बीतते. अच्छा खाना उन्हें तब ही नसीब होता जब पासपड़ोस में शादी- विवाह होते. अच्छे सूटसाड़ी पहनने को उन का मन ललक उठता, पर सब लड़कियां मन मार कर रह जातीं.

निधि तो बेहद क्षुब्ध हो उठती. जहां उस के विवाह की बात होती, उस का रूप देख कर लड़के मुग्ध हो जाते  पर दानदहेज के लोभी उस के गुणशील को अनदेखा कर मुंह मोड़ लेते.

निधि मुझ से कहती, ‘‘सच कहती हूं मीनू, लगता है कहीं से इतना पैसा पा जाऊं कि अपने घर की दशा सुधार दूं. इस के लिए यदि कोई रईस बूढ़ा भी मिलेगा तो मैं शादी के लिए तैयार हो जाऊंगी. बहुत दुख, अभाव झेले हैं मेरे पूरे परिवार ने.’’

‘‘तू पागल हो गई है क्या? अपना पद्मिनी सा रूप देखा है आईने में? मेरे सामने ऐसी बात मत करना वरना दोस्ती छोड़ दूंगी. परिवार के लिए बूढ़े से ब्याह करेगी? क्या तू ने ही पूरे घर का ठेका लिया है? और भी कोई सोचता है ऐसा क्या?’’

मेरी आंखें नम हो गईं तो देखा वह भी अपनी पलकें पोंछ रही थी.

‘‘सच मीनू, तू ने गरीबी की परछाईं नहीं देखी पर हम बचपन से ही इसे भोग रहे हैं. अरे, अपनों के लिए इनसान बड़े से बड़ा त्याग करता है. मैं मर जाऊं तो मेरी आत्मा धन्य हो जाएगी. बीमार अम्मां व बाबूजी कैसे जी पाएंगे अपनी प्यारी बेटियों को दुखी देख कर. पता है, मैं पूरे 28 वर्ष की हो गई हूं, नीतिप्रीति भी विवाह की आयु तक पहुंच गई हैं. मुझे कई लड़के देख चुके हैं. लड़की पसंद, शिक्षा पसंद, नहीं पसंद है तो कम दहेज. यही तो हम सब के साथ होगा. धन के आगे हमारे रूपगुण सब फीके पड़ गए हैं.’’

उस की बातों पर मैं हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘अरे, तू तो किसी घर की राजरानी बनेगी. देख लेना तेरा दूल्हा सिरआंखों पर बैठाएगा तुझे. धनदौलत पर लोटेगी तू्.’’

‘‘रहने दे, ऐसे ऊंचे सपने मत दिखा, जो आगे चल कर मेरी छाती में टीस दें. हां, तुझे अवश्य ऐसा ही वरघर मिलेगा. अकेली बेटी, 2 बड़े भाई, सब ऊंचे पदों पर.’’

‘‘कहां राजा भोज कहां गंगू तेली? बड़े परिवार की समस्या पर ही तो सोचती हूं ऐसा, अपनी कुरबानी देने की.’’

फिर आएदिन मैं यही सुनती थी कि निधि को देखने वाले आए और गए. धन के अभाव में सब मुंह चुरा गए. इतनी तगड़ी मांगें कि घर भर के सिर फिर जाते. यहां तो शादी का खर्च उठाना मुश्किल था. उस पर लाखों की मांग.

एक दिन गरमी की दोपहर में आ कर निधि ने विस्फोट किया, ‘‘मीनू, तुझे याद है एक बार मैं ने तुझ से कहा था कि अगर कोई मालदार धनी बूढ़ा वर ही मिल जाएगा तो मैं उस से शादी करने को तैयार हो जाऊंगी. लगता है वही हो रहा है.’’

मैं ने घबरा कर अपनी छाती थाम ली फिर गुस्से से भर कर बोली, ‘‘तो क्या किसी बूढ़े खूसट का संदेशा आया है और तू तैयार हो गई है?’’ इतना कह कर तब मैं ने उस के दोनों कंधे झकझोर दिए थे.

वह बच्चों सी हंसी हंस दी. फिर पसीना पोंछती हुई बोली, ‘‘तू तो ऐसी घबरा रही है जैसे मेरे बजाय तेरी शादी होने जा रही है. देख, मैं बूढ़े खूसट की फोटो लाई हूं. उस की उम्र 40 के आसपास है और वह दुहेजा है. 4 साल पहले पत्नी मर गई थी.’’

उस ने फोटो मेरे हाथ पर रख दिया. ‘‘अरे वाह, यह तो बूढ़ा नहीं जवान, सुंदर है. तू मजाक कर रही है मुझ से?’’

‘‘नहीं रे, मजाक नहीं कर रही… दुहेजा है.’’

‘‘कहीं दहेज के चक्कर में पहली को मार तो नहीं डाला. क्या चक्कर है?’’ मैं बोली.

‘‘यह मेरी मौसी की ननद का देवर है,’’ निधि ने बताया.

‘‘सेल्स टेक्स कमिश्नर है. तीसरी बार बेटे को जन्म देते समय पत्नी की मौत हो गई थी.’’

‘‘तो क्या 2 संतान और हैं?’’

‘‘हां, 1 बेटी 10 साल की, दूसरी 8 साल की.’’

‘‘तो तुझे सौतेली मां का दर्जा देने आया है?’’

‘‘यह तो है पर पत्नी की मृत्यु के 4 साल बाद बड़ी मुश्किल से दूसरी शादी को तैयार हुआ है. घर पर बूढ़ी मां हैं. एक बड़ी बहन है जो कहीं दूर ब्याही गई है, बढ़ती बच्चियों को कौन संभाले. वह ठहरे नौकरीपेशा वाले. समय खराब है. इस से उन्हें तैयार होना पड़ा.’’

‘‘तो तू जाते ही मां बनने को तैयार हो गई, मदर इंडिया.’’

‘‘हां रे. अम्मांबाबूजी तो तैयार नहीं थे. मौसी प्रस्ताव ले कर आई थीं. मुझ से पूछा तो मैं क्या करती. जन्म भर अम्मांबाबूजी की छाती पर मूंग तो न दलती. दीदी व उन की बेटी बोझ बन कर ही तो रह रही हैं. फिर 2 बहनें और भी शूल सी गड़ती होंगी उन की आंखों में. कब तक बैठाए रहेंगे बेटियों को छाती पर?

‘‘मैं अगर इस रिश्ते को हां कर दूंगी तो सब संभल जाएगा. धन की उन के यहां कमी नहीं है, लखनऊ में अपनी कोठी है. ढेरों आम व कटहल के बगीचे हैं. नौकरचाकर सब हैं.

‘‘मैं सब को ऊपर उठा दूंगी, मीनू,’’ निधि ने जैसे अपने दर्द को पीते हुए कहा, ‘‘मेरे मातापिता की कुछ उम्र बच जाएगी नहीं तो उन के बाद हम सब कहां जाएंगे. बाबूजी 2 वर्ष बाद ही तो रिटायर हो रहे हैं, फिर पेंशन से क्या होगा इतने बड़े परिवार का? बता तो तू?’’

मैं ने निधि को खींच कर छाती से लगा लिया. लगा, एक इतनी खूबसूरत हस्ती जानबूझ कर अपने को परिवार के लिए कुरबान कर रही है. मेरे साथ वह भी फूटफूट कर रो पड़ी.

निधि शाम को आने का मुझ से वचन ले कर वापस लौट गई. फिर शाम को भारी मन लिए मैं उस के घर पहुंची. उस की मौसी आ चुकी थीं और वर के रूप में भूपेंद्र बैठक में आराम कर रहे थे. निधि को अभी देखा नहीं था. मैं मौसी के पास बैठ कर वर के घर की धनदौलत का गुणगान सुनती रही.

‘‘बेटी, तुम निधि की सहेली हो न,’’ मौसी ने पूछा, ‘‘वह खुश तो है इस शादी से, तुम से कुछ बात हुई?’’

‘‘मौसी? यह आप स्वयं निधि से पूछ लो. पास ही तो बैठी है वह.’’

‘‘वह तो कुछ बोलती ही नहीं है, चुप बैठी है.’’

‘‘इसी में उस की भलाई है,’’ मैं जैसे बगावत पर उतर आई थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Father’s Day Special:अपनाअपना क्षितिज- भाग 1: एक बच्चे के लिए तड़पते सत्यव्रत

प्रशांत को देखते ही प्रभावती की जान में जान आ गई. प्रशांत ने भी जैसे ही मां को देखा दौड़ कर उन के गले लग गया, ‘‘मां, यह कैसी हालत हो गई है तुम्हारी.’’

प्रभावती के गले से आवाज ही न निकली. बहुत जोर से हिचकी ले कर वह फूटफूट कर रो पड़ीं. प्रशांत ने उन्हें रोकने की कोई चेष्टा नहीं की. इस रोने में प्रभावती को विशेष आनंद मिल रहा था. बरसों से इकट्ठे दुख का अंबार जैसे किसी ने धो कर बहा दिया हो.

थोड़ी देर बाद धीरे से  प्रशांत स्वयं हटा और उन्हें बैठाते हुए पूछा, ‘‘मां, पिताजी कहां हैं?’’

‘‘अंदर,’’ वह बड़ी कठिनाई  से बोलीं. एक क्षण को मन हुआ कि कह दें, पिताजी हैं ही कहां. पर जीभ को दांतों से दबा कर खुद को बोलने से रोक लिया. सच बात तो यह थी कि वह अपने जिस पिता के बारे में पूछ रहा था वह तो कब के विदा हो चुके थे. अवकाश ग्रहण के 2 माह बाद ही या एक तरह से सुशांत के पैरों पर खड़ा होते ही उन की देह भर रह गई थी और जैसे सबकुछ उड़ गया था.

अपनी आवाज की एक कड़क से, अपनी भौंहों के एक इशारे से पिताजी का जो व्यक्तित्व इस्पात की तरह सब के सामने  बिना आए ही खड़ा हो जाता था, वह पिताजी अब उसे कहां मिलेंगे.

प्रशांत दूसरे कमरे की ओर बढ़ा तो तुरंत प्रभावती के पैरों पर रजनी आ कर झुक गई और साथ ही 7 बरस का नन्हा प्रकाश. उन्होंने पोते को भींच कर छाती से लगा लिया. मेले में बिछुड़ गए परिवार की तरह वह सब से मिल रही थीं. पूरे 7 साल बाद प्रशांत और रजनी से भेंट हो रही थी. वह प्रकाश को तो चलते हुए पहली बार देख रही थीं. उस की डगमग चाल, तुतलाती बोली, कच्ची दूधिया हंसी, यह सब वह देखसुन नहीं सकी थीं. साल दर साल केवल उस के जन्मदिन पर उन के पास प्रकाश का एक सुंदर सा फोटो आ जाता था औैर उन्हें इतने से ही संतोष कर लेना पड़ता था कि अब मेरा प्रकाश ऐसे दिखाई देने लगा है.

7 साल पहले जब वह कुल 9 माह का था, तभी प्रशांत घर छोड़ कर अपने परिवार को ले कर वहां से दूर बंगलौर चला गया था. इस अलगाव  के पीछे मुख्य कारण था प्रशांत और सुशांत की आपसी नासमझी और उन के पिता द्वारा बोया गया विषैला बीज. सुशांत डाक्टर था और प्रशांत कालिज में शिक्षक. बस, यही अंतर दोनों के मध्य उन के पिता के कारण बड़ा होता चला गया और इतना बड़ा कि फिर पाटा न जा सका.

उन के पिता सत्यव्रत शुरू से ही चाहते थे कि दोनों बच्चे डाक्टर बनें. इस के लिए उन्होंने अपनी सीमित आय की कभी परवा नहीं की. उन का बराबर यही प्रयत्न रहा कि उन के बच्चों को कभी किसी चीज का अभाव न खटके.

सत्यव्रत दफ्तर से लौटने के बाद बच्चों की पढ़ाई  पर ध्यान देते. उन का पाठ सुनते, उन्हें समझाते, उन की गलतियां सुधारते, उन्हें स्वयं नाश्ता परोसते, उन के कपड़े बदलते, बत्ती जलाते, मसहरी लगाते पुस्तकें खोल कर रखते. बच्चे पढ़तेपढ़ते सोने लगते तो पंखा चला देते. दूध का गिलास थमाते. कभी अपने हिस्से का दूध भी दोनों के गिलास में उडे़ल देते. सोचते, ‘बहुत पढ़ते हैं दोनों. गिलास भर दूध से इन का क्या होगा.’

भविष्य के दर्पण में उन्हें 2 डाक्टर बेटों का अक्स दिखाई पड़ता और वह दोगुनेचौगुने गर्व से झूम उठते. अपने इस सपने को बुनने में बस, इसी बात का कोई ध्यान नहीं रखा कि असल में उन के बेटे क्या चाहते हैं. उन की रुचि किस बात में है, डाक्टर बनने में या इंजीनियर अथवा कुछ और बनने में.

सत्यव्रत इस मामले में एक तानाशाह की तरह थे. जो सोच लिया वह बच्चों को पूरा करना ही है. वह सदा यही सोच कर चलते थे, पर ऐसा हो कहां सका. बड़े लड़के प्रशांत को डाक्टर बनने में कोई रुचि  नहीं थी. उस का कविताओं, कहानियों, पेंटिंग, साहित्य में खूब मन लगता था. कई बार वह पढ़ाई  के ही मध्य में आड़ीतिरछी लकीरें खींचता पकड़ा जाता था. कभी रेखागणित की आकृतियां बनातेबनाते पन्ने पर कविता लिखने लगता था.

सत्यव्रत की नजर उस पर पड़ जाती तो जैसे आग में घी पड़ जाता. खूब कस कर धुनाई होती उस की. खाना बंद कर दिया जाता. उसे सोने नहीं दिया जाता. यहां तक कि प्यास से उस का कंठ सूखने लगता, पर वह नल में मुंह नहीं लगा सकता था.

वह अकसर कहा करते, ‘साहित्य, पेंटिंग, कविता भी कोई विषय हैं?’

प्रभावती सन्न रह जातीं. हाथ जोड़ कर कहतीं, ‘मेरे बेटे को इतना मत सताओ.  उस की तो तारीफ होनी चाहिए कि वह इतनी बढि़या कहानियां लिखता है. तुम्हें कब अक्ल आएगी पता नहीं.’

‘कविता, कहानी से पेट नहीं भरता,’ वह चीख कर कहते, ‘जानती हो न कि कितने कवि और लेखक भूखों मरते हैं?’

वह इतने से ही बस न करते. कहते, ‘मैं जानता हूं, तुम्हीं प्रशांत का दिमाग बिगाड़ रही हो. पर अच्छी तरह समझ लो इसे कवि या शिक्षक नहीं, डाक्टर बनना है. इस का भोजन अभी तो एक दिन ही बंद हुआ है, कभी हफ्ते भर भी बंद किया जा सकता है.’

डर से प्रभावती के हाथ फूल जाते, क्या कहें बेटे को. हर व्यक्ति एक ही बात को आसानी से नहीं सीख सकता. किसी के लिए हिसाब आसान है तो किसी के लिए इतिहास. प्रकृति ने सब की समझ का पैमाना एक कहां रखा है? पर वह यह भेद अपने पति को न समझा पातीं. उन्हें  तमाशाई  बन कर चुपचाप सबकुछ देखना, सहना पड़ता.

सब से बुरी हालत तो प्रशांत की हो गईर्र्  थी. अपनी और पिता की इच्छाओं के मध्य वह झूलता रहता था. न वह कविता लिखना छोड़ सकता था न पिता की तमन्ना पूरी करने से पीछे हटना चाहता था. दिनरात किताब उस की आंखों के आगे लगी रहती थी. इस चक्कर में आंखों पर मोटे फे्रम का चश्मा चढ़ गया था. चेहरे की चमक खो गई थी. वह किसी से कुछ कहता नहीं था. बस, भीतर ही भीतर छटपटाता रहता था.

इस के विपरीत सुशांत की आंखोंं के आगे बस, एक ही सपना तैरता रहता था, डाक्टर बनने का. उस के लिए उसे न पिता से मदद लेने की जरूरत थी न मां से. प्रशांत को बड़ी तेजी से पीछे छोड़ता हुआ सुशांत अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था.

प्यार के राही-भाग 1 : हवस भरे रिश्ते

उस दिन गजाला और मासूम राही की शादी बड़ी धूमधाम से हो रही थी. सभी लोग निकाह के वक्त का इंतजार कर रहे थे. मासूम राही दोस्तों के बीच सेहरा बांधे गपें मार रहे थे, तभी मौलवी साहब आए और निकाह की तैयारी होने लगी.

मौलवी साहब बोलते गए और मासूम राही निकाह कबूल करते गए. सारी रस्में खत्म होने के बाद सभी लोग मजे ले कर खाना खाने लगे.

अगली रात गजाला और मासूम राही अपने सुहागरात के कमरे में एकदूसरे के आगोश में खोए हुए थे और गरम तूफान की आग में जल रहे थे. कुछ मिनटों के बाद वह आग ठंडी हुई, तो वे एकदूसरे से अलग हुए.

गजाला की आंखें एकाएक फड़फड़ाने लगीं. वह सोचने लगी, ‘आज अपने प्यार को यह अंजाम देने के लिए हमें क्या नहीं करना पड़ा,’ फिर वह बिस्तर पर बिछे छोटेछोटे फूलों को सरसरी निगाहों से देखने लगी और अपनी प्यारभरी यादों में डूब गई. एकएक सीन उस के दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूमने लगा और उस की आंखों में आंसू उमड़ आए.

मैं पटना में रह रही थी. मेरे पिता शौकत राही की 6 संतानें थीं, 4 बहनें और 2 भाई. मैं सब से बड़ी थी. हमारे अब्बा जान के पास काफी जमीनजायदाद थी. इसी वजह से हम सभी सुखचैन से जिंदगी गुजार रहे थे.

हमारे अब्बाजान के बड़े भाई जशीम चाचा के पास भी जमीनजायदाद थी, लेकिन उन्हें दिमागी चैन नहीं था, क्योंकि उन के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए जशीम चाचा बारबार चाची डौली को किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने के लिए कहा करते थे, लेकिन चाची हर बार टाल जातीं.

जब चाचा ने ज्यादा जिद की, तो चाची बोलीं, ‘‘देखिएजी, आप जिद कर रहे हैं, तो गोद लड़का ही लेंगे.’’

इस पर चाचा कहते, ‘‘नहीं, लड़की ही गोद लेंगे. आज के जमाने में लड़का और लड़की में फर्क ही क्या है?’’

तब चाची झल्ला कर बोलीं, ‘‘मैं समझती हूं कि जो हमारे बुढ़ापे में हमारी लंबीचौड़ी जायदाद को संभाल सके और हम दोनों को भी चैन की दो वक्त की रोटी दे सके, उसे ही गोद लेना चाहिए.’’

चाचा बेहद नरम दिल से बोले, ‘‘तुम्हारी बात तो ठीक है, लेकिन हम ऐसी बेटी गोद लेना चाहते हैं, जो हम दोनों की खिदमत कर सके. हम उस की शादी कर के दूल्हे को घरजमाई बना लेंगे. तब हम दोनों को दोहरा फायदा हो जाएगा. इस तरह हमें बेटाबेटी दोनों मिल जाएंगे.’’

इस पर चाची बोलीं, ‘‘जो करना है सो कीजिए, लेकिन मुझे तो बेटा ही चाहिए.’’

दूसरे दिन चाचा ने अपने नजदीकी दोस्त रमाशंकर को बुलाया और 10,000 रुपए दे कर कहा, ‘‘हम बच्चा गोद लेना चाहते हैं. तुम कोई लड़की ला कर हमें दो. हम तुम्हारे बहुत एहसानमंद रहेंगे. ले आने पर 40,000 रुपए और देंगे.’’

एक हफ्ते बाद रमाशंकर ने तकरीबन 9 साल का एक मासूम सा लड़का ला कर चाचा को देते हुए कहा, ‘‘लीजिए भाई जशीम राही, मैं ने अपना वादा पूरा किया. आप मेरा इनाम हवाले करें.’’

‘‘लेकिन यार, यह तो लड़का है. मैं ने तो किसी लड़की की गोद लेने की बात तुम से कही थी,’’ चाचा ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा.

‘‘यही लो. अब तक तो आप बिना औलाद के जी रहे थे, अब लड़का मिला है तो कह रहे हैं कि लड़की चाहिए. यह बेचारा कुदरत का मारा है. दानेदाने का मुहताज है. घर में इस के रहने से आप का दिल भी लगा रहेगा. इस मासूम को इतनी दूर से आप के पास ले आया हूं.’’

फिर कुछ सोच कर वे आगे बोले, ‘‘इस का नाम राही है. गांव में इस के मांबाप मजदूरी करते थे. इस के 4 भाईबहन हैं. गरीबी के चलते कई बार इस मासूम को भूखे पेट ही सोना पड़ता था. बाप शराबी है. एक दिन वह शराब के पैसे न दे सका तो इस बेचारे को ही शराब की दुकान में गिरवी रख दिया. वहीं से इसे छुड़ा कर लाया हूं.’’

चाचा ने रमाशंकर की मजबूरी समझी. बोले, ‘‘ठीक है, यह लो पैसे. आखिर डौली की ही इच्छा पूरी हुई.’’

मासूम को देख कर चाची बहुत खुश हुईं. उसे गोद में उठा कर वे बेतहाशा चूमने लगीं.

मासूम स्कूल जाने लगा. मैं तब

8 साल की थी. हम दोनों एक ही दर्जे में साथसाथ पढ़ने लगे. हमारे चाचा और हमारे अब्बा के मकान आमनेसामने थे, इसलिए हम दोनों अकसर एकदूसरे से मिलते रहते थे. दोनों साथसाथ खेलते और साथसाथ खाते 10वीं जमात पास कर गए. हम दोनों फुलवारी की तनहाइयों में घंटों बातचीत किया करते थे. बातबात में जब मासूम ने अपनी बीती कहानी मुझे सुनाई तो उस से मेरी हमदर्दी और बढ़ गई. मैं अकसर खानेपीने की चीजें ला कर मासूम को दिया करती. हम दोनों में लगाव बढ़ता गया.

मासूम राही मन लगा कर पढ़ता और चाचा का हाथ बंटाता. उस के बरताव, काम और पढ़ाई से चाचाचाची बहुत खुश थे. वे उसे अपने बेटे की तरह मानते और सारे जहां की खुशियां उस के कदमों में डाल कर उसे प्यार करते.

मासूम राही भी चाचाचाची को अम्मां और अब्बा कह कर पुकारता था. मैं सुबह उठ कर घर के कामों से निबटने के बाद उस के साथ कालेज जाया करती थी. शाम ढलने से पहले हर रोज हम फुलवारी में घूमने जाया करते थे.

वक्त गुजरता गया. हम दोनों ने बचपन की केंचुली उतार कर जवानी की दहलीज पर कदम रखा. दोनों जवां दिलों में एकदूसरे के लिए प्यारमुहब्बत का दरिया बहने लगा.

हम दोनों एकदूसरे के करीब आते गए, लेकिन अब बचपन की तरह खुलेआम नहीं, बल्कि चोरीछिपे एकदूसरे से मिलते रहे. हर प्यार करने वाले की तरह हमारा और मासूम राही का भी चोरीछिपे मिलना ज्यादा दिनों तक समाज से छिपा नहीं रह सका. फौरन ही महल्ले वालों को हमारी मुहब्बत की भनक लग गई. वे दबी जबान से हम दोनों की चर्चा करने लगे.

यह बात चाचा और चाची को पता लगी, तो उन्होंने मासूम को अपने दरबान और नौकरों से बुरी तरह से पिटवाया और बुराभला कहा. इधर मेरी भी हालत बदतर कर दी गई. हमारी अम्मी ने मुझे रस्सी से बांध दिया और डंडे से इतना पीटा कि मेरी पीठ से खून निकलने लगा. कई जख्म भी उभर आए थे.

मैं बेतहाशा चिल्ला रही थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. वे लगातार मेरे सिर पर वार करने लगीं, जिस से मैं बेहोश हो गई.

जब होश आया, तो मैं अस्पताल में थी. सिर, पीठ, हाथ और पैर में पट्टियां बंधी थीं. अब्बाजान पास ही में कुरसी पर बैठे हुए थे.

जब मैं ने आंखें खोलीं, तो वे बोले, ‘‘बेटी, यह सब छोड़ दो, नहीं तो हम से बुरा कोई नहीं होगा. मासूम से तो मैं निबट लूंगा. जिस के बारे में कुछ भी सहीसही मालूम नहीं है, उस के साथ इश्क लड़ाने चली है. अगर आज के बाद तुम घर से निकली, तो तुम्हें मैं जान से मार डालूंगा.’’

जब मैं एक महीने के बाद ठीक हो कर अस्पताल से घर आई, तो मुझे पंख कटे पक्षी की तरह घर में कैद कर दिया गया. मैं मन मसोस कर रह गई.

उधर मासूम राही हमारी याद में तड़प रहा था. उस पर भी चाचा के गुंडे नजर रखे रहते थे. मासूम से नहीं मिल पाने के चलते मैं बेचैन सी रहने लगी. उन्हीं दिनों पता लगा कि मासूम राही पर भी चाचा और चाची ने इतनी सख्त पाबंदी लगा दी थी कि वह चाह कर भी मुझ से नहीं मिल पा रहा था.

जब मैं खुद को नहीं रोक सकी, तो उस से रात में मिलने का फैसला किया. मैं आधी रात को मासूम से मिलने के लिए दबे पैर चाचा के घर में घुस गई. मासूम चाचा के कमरे में सोया हुआ था.

जैसे ही मैं उस के कमरे से गुजरी, वैसे ही अचानक आहट पा कर चाची उठीं. उन्होंने ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए चाचा को जगाया और तुरंत बंदूक ला कर देते हुए बोलीं, ‘‘गजाला आई है. आज जान से मार दीजिए.’’

चाचा ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए हमारे पीछे भागे. मैं सिर पर पैर रख कर गली की ओर भागी. चाचा ने मुझ पर

3 गोलियां चलाईं. गहरा अंधेरा होने के चलते उन का निशाना ठीक नहीं बैठा. इस गली से होते हुए मैं अपने कमरे में जा कर लेट गई.

आधी रात को गोलियों की आवाज सुन कर महल्ले में अफरातफरी हो गई. मेरे अब्बाजान और महल्ले वाले दौड़दौड़े चाचा के घर पहुंचे और गोली चलाने की वजह पूछी. चाचा गहरे अंधेरे में मुझे ठीक से पहचान नहीं सके थे. फिर भी उन्हें पूरा यकीन था कि वह गजाला ही थी, इसलिए उन्होंने अब्बाजान को अलग ले जा कर कहा, ‘‘भाई, तुम्हारी इज्जत हमारी इज्जत है. गजाला आई थी.’’

अभी चाचा अब्बाजान को समझा ही रहे थे कि चाची सब के सामने बोल पड़ीं. ‘‘शौकत राही, समझा ले अपनी बेटी को. वह जवानी के जोश में आधी रात को मेरे घर में चोरों की तरह घुस आई. आज तो वह बच कर भाग गई, लेकिन आज के बाद अगर उस ने ऐसी हरकत की तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगी.’’

अब्बाजान ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा, ‘‘आप यह कैसे कह सकती हैं कि वह गजाला ही थी? आप ने इतने अंधेरे में उसे पहचान लिया? हमारी बेटी पर इलजाम मत लगाइए. वह कोई चोरउचक्का होगा.’’

इस पर चाची ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘अगर यकीन नहीं आता तो घर जा कर देखो, वह इस समय घर में मौजूद

नहीं होगी. वह कहीं गली में जा कर छिपी होगी.’’

अर्पण- भाग 1 : अदिती का अनकहा दर्द

आदमकद आईने के सामने खड़ी अदिती स्वयं के ही प्रतिबिंब को मुग्धभाव से निहार रही थी. उस ने कान में पहने डायमंड के इयरिंग को उंगली से हिला कर देखा. खिड़की से आ रही धूप इयरिंग से रिफ्लैक्ट हो कर उस के गाल पर पड़ रही थी, जिस से वहां इंद्रधनुष चमक रहा था. अदिती ने आईने में दिखाई देने वाले अपने प्रतिबिंब पर स्नेह से हाथ फेरा. फिर वह अचानक शरमा सी गई. इसी के साथ वह बड़बड़ाई, ‘‘वाऊ, आज तो हिमांशु मुझे जरूर कौंप्लीमैंट देगा.’’

फिर उस के मन में आया कि यदि यह बात मां सुन लेतीं, तो कहती कि हिमांशु कहती है? वह तेरा प्रोफैसर है.

‘‘सो ह्वाट?’’ अदिती ने कंधे उचकाए और आईने में स्वयं को देख कर एक बार फिर मुसकराई. अदिती शायद कुछ देर तक स्वयं को इसी तरह आईने में देखती रहती, लेकिन तभी मां की आवाज उस के कानों में पड़ी, ‘‘अदिती, खाना तैयार है.’’

‘‘आई मम्मी,’’ कह कर अदिती बाल ठीक करते हुए डाइनिंग टेबल की ओर भागी.

अदिती का यह लगभग रोज का कार्यक्रम था. प्रोफैसर साहब के यहां जाने से पहले आईने के सामने वह अपना अधिक से अधिक समय स्वयं को निहारते हुए बिताती थी. शायद आईने को भी ये सब अच्छा लगने लगा था, इसलिए वह भी अदिती को थोड़ी देर बांधे रखना चाहता था. इसीलिए तो वह उस का इतना सुंदर प्रतिबिंब दिखाता था कि अदिती स्वयं पर ही मुग्ध हो कर निहारती रहती.

आईना ही क्यों अदिती को तो जो भी देखता, देखता ही रह जाता. वह थी ही इतनी सुंदर. छरहरी, गोरी काया, बड़ीबड़ी मछली काली आंखें, घने काले लंबे रेशम जैसे बाल. वह हंसती, तो सुंदरता में चार चांद लगाने वाले उस के गालों में गड्ढे पड़ जाते थे.

उस की मम्मी उस से अकसर कहती थीं, ‘‘तू एकदम अपने पापा जैसी लगती है. एकदम उन की कार्बन कौपी.’’

इतना कहतेकहते अदिती की मम्मी की आंखें भर आतीं और वे दीवार पर लटक रही अदिती के पापा की तसवीर को देखने लगतीं. अदिती जब 2 साल की थी, तभी उस के पापा का देहांत हो गया था. अदिती को तो अपने पापा का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था. उस की मम्मी जिस स्कूल में नौकरी करती थीं, उसी स्कूल में अदिती की पढ़ाई हुई थी. अदिती स्कूल की ड्राइंग बुक में जब भी अपने परिवार का चित्र बनाती, उस में नानानानी, मम्मी और स्वयं होती थी. अदिती के लिए उस का इतना ही परिवार था.

अदिती के लिए पापा यानी घर दीवार पर लटकती तसवीर से अधिक कुछ नहीं थे. कभी मम्मी की आंखों से पानी बन कर बहते, तो कभी अलबम के ब्लैक ऐंड ह्वाइट तसवीर में स्वयं की गोद में उठाए खड़ा पुरुष यानी पापा. अदिती की क्लासमेट अकसर अपनेअपने पापा के बारे में बातें करतीं.

टैलीविजन के विज्ञापनों में पापा के बारे में देख कर अदिती शुरूशुरू में कच्ची उम्र में पापा को मिस करती थी, परंतु धीरेधीरे उस ने मान लिया कि उस के घर में 2 स्त्रियां वह और उस की मम्मी रहती हैं और आगे भी वही दोनों रहेंगी.

बिना बाप की छत्रछाया में पलीबढ़ी अदिती कालेज की अपनी पढ़ाई पूरी कर के कब कमाने लगी, उसे पता ही नहीं चला. वह फाइनल ईयर में पढ़ रही थी, तभी वह अपने एक प्रोफैसर हिमांशु के यहां पार्टटाइम नौकरी करने लगी थी.

डा. हिमांशु एक जानेमाने साहित्यकार थे. यूनिवर्सिटी में हैड औफ डिपार्टमैंट. अदिती इकौनोमिक ले कर बीए करना चाहती थी. परंतु हिमांशु का लैक्चर सुनने के बाद उस ने हिंदी को अपना मुख्य विषय चुना था. डा. हिमांशु अदिती में व्यक्तिगत रुचि लेने लगे थे. उसे नईनई पुस्तकें सजैस्ट करते, किसी पत्रिका में कुछ छपा होता, तो पेज नंबर सहित रैफरैंस देते. यूनिवर्सिटी की ओर से प्रमोट कर के 1-2 य्ेमिनारों में भी अदिती को भेजा था. अदिती डा. हिमांशु की हर परीक्षा में प्रथम आने के लिए कटिबद्ध रहती थी. इसीलिए डा. हिमांशु० अदिती से हमेशा कहते थे कि वे उस में बहुत कुछ देख रहे हैं. वह जीवन में जरूर कुछ बनेगी.

Father’s Day Special- मौहूम सा परदा: भाग 1

डा. जाकिर अली लखनऊ से दिल्ली की फ्लाइट में उड़ान भर रहे थे. इस शहर से जुड़ी उन की पुरानी यादें हवाई जहाज की रफ्तार से भी तेजी से उन के दिमाग में घूम रही थीं.

वे 8-10 दिनों बाद गांव से दिल्ली लौटे तो खुद के कमरे की खिड़कियों की पत्थर की नक्काशीदार जालियों पर लोहे के फ्रेम में बारीक तारों की एक और जाली लगी देख कर असमंजस में पड़ गए. उन्हें कुछ समझ में नहीं आया.

उन्होंने बड़े बेटे शाहिद से जानना चाहा, तो वह बोला, ‘‘जी अब्बू, खिड़की की पुरानी जाली के बड़ेबड़े सूराखों से धूल, मच्छर, कीड़े वगैरा आते थे, इसलिए इस कमरे के अंदर की तरफ से यह जाली लगवा दी. कुल 3 हजार रुपए लगे और अब्बू, खिड़की की जाली के पत्थर पर पुराना शानदार नक्काशी का काम तो बाहर से आने वालों को पहले की तरह ही नजर आता है. और…और…इस के बाद कुछ तो नवाबी खानदान की घुट्टी में मिली तहजीब से पिता के प्रति सम्मान और कुछ कोई ठोस वजह वाले शब्द नहीं मिलने से वह हकलाते हुए चुप हो गया.

तभी उस के कमरे से उस की बीबी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘और  लोगों की नजरों पर एक मोहूम सा परदा भी पड़ा रहेगा.’’ इस के बाद उस की बेशरम हंसी की आवाज आई तो डा. जाकिर अली बौखला गए. उन की मौजूदगी में उन की पुत्रवधू का इस तरह गुफ्तगू करना और ठहाका लगा कर हंसना उन के खानदानी आचरण में नहीं था. उन्होंने सवालिया नजरों से शाहिद को देखा तो वह शर्मिंदगी से नजर झुकाए पीछे मुड़ा और अपने कमरे में चला गया.

मोहूम से परदे का जुमला डा. जाकिर के दिल में नश्तर की तरह चुभ गया था. सो, शाहिद के चले जाने के बाद वे काफी देर गुमसुम खड़े रहे. फिर बोझिल कदमों से धीरेधीरे चल कर अपने कमरे में जा कर आरामकुरसी पर गिर से पडे़. डा. जाकिर अली की आंखों के सामने यह जुमला सिनेमा की रील की तरह चालू हो गया…

डा. जाकिर अली नवाबी खानदान से संबंध रखते थे. महानगर से 50 किलोमीटर दूर गांव में उन की 5 मंजिली पुश्तैनी हवेली, आम के कई बाग और काफी सारी खेती की जमीन थी. उर्दू उन के खून में थी. सो, गांव के मदरसे से शुरू हुई शिक्षा राज्य की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से उर्दू और फारसी में एमए, पीएचडी कर के पूरी हुई. फिर उसी यूनिवर्सिटी में वे उर्दू के लेक्चरर बने और हैड औफ द डिपार्टमैंट के पद से रिटायर हुए.

यह कोई 30-35 साल पहले की बात है जब डा. जाकिर ने यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया. जब भी किसी शायर का कलाम पढ़ाते तो क्लास का माहौल ऐसा उर्दूमय और शायराना बना देते थे कि दूसरी क्लासों के लड़के उन की क्लास में आ कर बैठ जाया करते थे. ऐसे ही एक दिन वे किसी सूफी शायर की कोई कविता पढ़ा रहे थे और उस की तुलना भारतीय विशिष्ट अद्वैत से करने के लिए वे एक संस्कृत का श्लोक उद्धृत करना चाह रहे थे लेकिन नफीस उर्दू जबान पर संस्कृत का श्लोक बारबार फिसल जाता था. तभी उधर से संस्कृत विभाग की लेक्चरर डा. मंजरी निकलीं. डा. मंजरी ने उन्हें नमस्कार किया और बतलाया कि संस्कृत के कठिन शब्दों को 2 टुकड़ों में बांट कर बोलें तो वे बिलकुल सरल हो जाएंगे. डा. जाकिर अली की मुश्किल हल हो गई.

डा. मंजरी डा. जाकिर की हमउम्र थीं. उस दिन से संस्कृत के कठिन शब्दों की गांठ खोलने का जो सिलसिला शुरू हुआ उस के चलते वे न जाने कब एकदूसरे के सामने अपने मन की गांठें खोलने लगे और धीरेधीरे एकदूसरे के मन में इतने गहरे उतर गए कि अब अगर एक दिन भी आपस में नहीं मिलते थे तो दोनों ही बेचैन हो जाते. दूसरे दिन मिलने पर दोनों की आंखें गवाही देती थीं कि रातभर नींद का इंतजार करते दुख गई हैं.

ऐसे ही एक रतजगे के बाद दोनों मिले तो डा. जाकिर ने डा. मंजरी का हाथ अपने हाथ में थाम कर बेताबी से कहा, देखो, मंजरीजी, अब इस तरह गुजारा नहीं होगा. मैं क्या कहना चाह रहा हूं आप समझ रही हैं न.’ मंजरी ने जवाब दिया था, ‘जाकिर साहब, पिताजी तो खुले विचारों के हैं, इसलिए उन्हें तो करीबकरीब मना लिया है मगर मां को मनाने में थोड़ा वक्त लगेगा, थोड़ा इंतजार करिए, सब्र का फल मीठा होता है.’

तब वह जमाना था जब देश की गंगाजमुनी संस्कृति में राजनीति विष सी  बन कर नहीं घुली थी. वोटों की खातिर सत्ता के दलालों ने 2 संस्कृतियों को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का सांप्रदायिक लिबास नहीं पहनाया था. लवजिहाद या घरवापसी के नारे नहीं गूंजे थे. संस्कृत विभाग के प्रोफैसर

डा. रामकिंकर खुद डा. जाकिर के बड़े बन कर उन की तरफ से पैगाम ले कर मंजरी के घर गए थे और पहली बार उन की मां की गालियां खा कर चुपचाप लौट आए. मगर दूसरे दिन ही फिर पहुंच गए. फिर लगातार समझाइश के बाद आखिर उन्होंने खुद डा. जाकिर का बड़ा भाई बन कर  जिम्मेदारी ली कि विवाह के बाद न  तो मंजरी का नाम बदला जाएगा, न धर्म. फिर 2-4 पढ़ेलिखे और समाज के प्रतिष्ठित व प्रगतिवादी लोगों की मध्यस्थता से उन्होंने अपनी मुंहबोली भांजी डा. मंजरी का विवाह डा. जाकिर से करा दिया था.

डा. मंजरी विवाह के बाद भी मंजरी ही रहीं. शादी के 3 सालों बाद जब पहली संतान हुई तो मंजरी ने ही जाकिर अली से कहा, ‘जाकिर साहब, औलाद की पहचान बाप के नाम से होती है, आप बच्चे का नाम अपने खानदानी रिवायत के मुताबिक ही रखें.’ और बच्चे का नाम शाहिद तय हुआ था. इस के 3 सालों बाद जब दूसरा पुत्र हुआ तो उस का नाम साजिद रखा गया.

डा. जाकिर अली की शादी को 10 साल बीत गए थे. सबकुछ बेहद खुशगवार था. तभी उस साल चेचक महामारी बन कर फैली और पता नहीं कैसे डा. मंजरी उस की चपेट में आ गईं. बहुत दवा, कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका.

डा. जाकिर अली की तो दुनिया ही उजड़ गई. वे एकदम टूट गए थे. अब न तो उन्हें पढ़ाने में वह दिलचस्पी रही थी न क्लास लेने में. घरगृहस्थी की परेशानी थी, सो अलग. पता नहीं मंजरी ने पिछले 10 सालों में उन्हें और उन के घर को कैसे संभाला था कि आज उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि उन्हें बनियान कितने नंबर की आती है.

रिश्तेदारी और परिवार में कोई ऐसी महिला थी नहीं, जिसे वे घर ला कर बच्चों की परवरिश व घर की जिम्मेदारी दे कर निश्ंिचत हो जाते. घर जैसेतैसे पुराने बावर्ची और माली की मदद से चलता रहा. एक साल बीत गया तो उन्होंने शाहिद और साजिद को होस्टल में भेजने का निर्णय किया. यह पता चलने पर बूढ़े बावर्ची ने रोते हुए साजिद को कलेजे से लगा कर फरियाद की, ‘नवाब साहब, नमक खाया है इस घर का और आप के पिता ने हमें चाकर नहीं समझा. आज उन्हीं की याद दिला कर आप से कहता हूं कि बच्चों को हमारी नजरों से दूर नहीं करें.’

हार कर उन्होंने एक पढ़ीलिखी आया की जरूरत का इश्तिहार दे दिया. इंटरव्यू के लिए राबिया बानो उन के घर आईं तो डा. जाकिर को लगा कि शायद वे यों ही आई होंगी. राबिया यूनिवर्सिटी में म्यूजिक डिपार्टमैंट में ट्यूटर थीं और गजलों के संगीत की धुन बनाने के लिए उर्दू गजलों में अरबी या फारसी के कुछ कठिन शब्दों का सीधीसादी भाषा में अर्थ समझने के लिए अकसर उन से मिलती रहती थीं. उन के बारे में बताया गया था कि उन के शौहर मेकैनिकल इंजीनियर थे. कंपनी के कौंट्रेक्ट पर दुबई गए थे. वहां किसी विदेशी महिला की मुहब्बत के जाल में फंस गए और उस से निकाह कर के टैलीफोन पर 3 बार तलाक बोल कर राबिया बानो को तलाक दे दिया.

थोड़ी देर इधरउधर की बातें होती रहीं. मगर जब दूसरी महिला उम्मीदवार आने लगी तो राबिया खुद उन से बोलीं, ‘डाक्टर साहब, आप ने 2 बच्चों की परवरिश करने लायक एक पढ़ीलिखी आया की जरूरत का इश्तिहार दिया है न?’

‘जी हां, क्या आप की नजरों में कोई है, या आप किसी की सिफारिश कर रही हैं,’ डा. जाकिर ने अधीरता से पूछा तो राबिया ने बड़ी दृढ़ता से जवाब दिया, ‘न तो मेरी नजर में कोई है, न मैं किसी की सिफारिश कर रही हूं. डाक्टर साहब, मैं खुद हाजिर हुई हूं.’

जवाब सुन कर वे ऐसे चौंके थे जैसे कोई करंट का जोरदार झटका लगा हो. मगर बोले, ‘आप यह क्या कह रही हैं राबियाजी, आप, आप.’ आगे कोई उपयुक्त शब्द नहीं मिलने के कारण वे खुद को बेहद असहज महसूस करते हुए चुप हो गए.

उन की स्थिति को समझते हुए राबिया ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया, ‘डाक्टर साहब, मैं पूरे होशोहवास में आप के सामने यह प्रस्ताव रख रही हूं. पिछले 4 सालों से मैं अकेली इस समाज के भेड़ की खाल ओढ़े भेडि़यों से अपने को महफूज रखने की जंग लड़तेजूझते पस्त हो गई हूं. तलाकशुदा अकेली औरत को हर कोई मिठाई का टुकड़ा समझ कर निगल जाना चाहता है. पहले वर्किंग वुमेन होस्टल में रहती थी. वहां की वार्डन महोदया देखने में तो हमजैसी अकेली औरतों की बड़ी हमदर्द थीं, मगर वास्तव में वे भड़वागीरी करती थीं.

वहां से निकल कर यूनिवर्सिटी के गर्ल्स होस्टल में रहने लगी तो कुछ दिनों बाद ही वहां के वार्डन महोदय को उर्दू सीखने का शौक चर्राया और वे इस बहाने देर रात गए मेरे कमरे में जमने लगे. फिर उर्दू की सस्ती किताबों में बाजारू लेखकों के द्विअर्थी इशारों को समझने के बहाने घटिया हरकतें करने लगे. तो एक दिन मैं ने उन्हें सख्ती से डांट दिया. बस, 2 सप्ताह में ही उन्होंने मुझे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि मेरे रहने पर गर्ल्स स्टूडैंट्स को एतराज है. अब जिस सोसाइटी के फ्लैट में रह रही हूं वहां के सैके्रटरी साहब, वैसे तो छोटी बहन कहते हैं, मगर बातबात में गले लगाने और देररात को, खासतौर पर उन की नर्स पत्नी की नाइट ड्यूटी होने पर, मेरी खैरियत के बहाने मेरे घर का दरवाजा थपथपाने के पीछे छिपे उन के मकसद, उन की नीयत को मैं समझ रही हूं.

‘आप भले ही इसे मेरी बेहयाई कहें या फिलहाल मुझे किसी लालच से प्रेरित समझें, मगर मैं आप के पास यह ख्वाहिश ले कर आई हूं कि मुझे आया नहीं, इन बच्चों की मां बन कर इन की परवरिश करने का मौका दें. मैं वादा करती हूं कि आप की दौलत और जमीनजायदाद से मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा. सिर्फ आप की और इन बच्चों की खिदमत में जिंदगी गुजार दूंगी. बस, आप से सिर्फ यह गुजारिश करूंगी कि अगर मुझ से कभी कोई खता हो जाए तो इसी घर के किसी कोने में नौकरानी बन कर पड़े रहने की इजाजत दे दीजिएगा. उस सूरत में मुझे तलाक की सजा मत दीजिएगा’, कहतेकहते राबिया की आवाज रुंध गई और आंखों से आंसू टपकने लगे.

उन की बात सुन कर डा. जाकिर बेहद उलझन में पड़ गए थे. वे राबिया को पिछले 4 सालों से जानते थे. उन के बारे में कभी कोई इधरउधर की बात नहीं सुनी थी. मगर ऐसा कैसे मुमकिन होगा, सोचते हुए बेहद असमंजस में वे इधरउधर टहलने लगे. तो बूढ़े बावर्ची चाय ले कर पेश हुए और बोले, ‘नवाब साहब, छोटे मुंह बड़ी बात कहने की गुस्ताखी कर रहा हूं. मेरी आप से अपील है कि इन की बातों पर गौर फरमाएं. हमें इन की बातों में सचाई नजर आती है, मालिक.’

बूढ़े बावर्ची की समझाइश में कुछ ऐसा असर था कि एक सप्ताह बाद ही एक साधारण से समारोह में राबिया बानो, बेगम जाकिर अली बन गईं.

इस के 2 सप्ताह बाद ही जब राबिया ने यूनिवर्सिटी की सेवा से अपना त्यागपत्र देने की घोषणा की तो डा. जाकिर ने ही कहा था, ‘राबिया, अभी तुम ट्यूटर हो, जल्द ही तुम्हारा प्रमोशन होने वाला है. और जहां तक मैं समझता हूं, तुम्हें संगीत से लगाव महज प्रोफैशनल नहीं है, वरना किसी गजल को बिलकुल अक्षरश: सही समझ कर उस की धुन तैयार हो, यह जनून प्रोफैशनल में नहीं, डिवोशनल में ही हो सकता है जो संगीत को एक इबादत का दरजा देता हो. तुम्हें यूनिवर्सिटी की नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए.’

उन की लंबी तकरीर सुन कर राबिया बेगम ने सिर्फ इतना कहा था, ‘जनाब, बच्चों की सही परवरिश और घरगृहस्थी की देखभाल भी एक इबादत है. संगीत की इबादत के लिए यूनिवर्सिटी की नौकरी की नहीं, रियाज की जरूरत होती है. मैं वक्त निकाल कर रियाज करती रहूंगी’ और उन्होंने इस्तीफा भेज दिया था.

बीते दिन फिर से लौटने लगे. राबिया की प्यारभरी देखभाल से बच्चे बेहद खुश रहते. डा. जाकिर बारबार राबिया बेगम से संगीत का रियाज जारी रखने की अपील करते. राबिया बेगम को इतने बड़े घर की देखभाल और बच्चों की परवरिश से बहुत कम समय मिलता था. फिर भी जब भी समय मिलता, वे रियाज करतीं. उन की आवाज में वह कशिश थी कि जब वे कोई गजल गाती थीं तो किसी खास भावुक पंक्ति की रवानगी पर वे इस कद्र भावुक हो जाती थीं कि शब्द आंसू बन कर उन की आंखों से बहने लगते थे और जाकिर साहब खुद की शायराना भावुकता से उन के आंसुओं को गजल के खयाल मान कर अपने होंठों से चूम लेते थे.

ऐसे ही 20-22 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला. जाकिर साहब रिटायर हो गए. बच्चे अच्छे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई पूरी कर के अच्छी नौकरियों में लग गए. जाकिर साहब अब पूरी तरह किताबों में डूबे रहते. शाम को वे राबिया बेगम से कोई गजल सुनाने के बहाने रियाज के लिए प्रेरित करते थे. उस दिन राबिया बेगम फैज साहब की गजल के अशआर लय में गा रही थीं.

‘गरचे मिल बैठे जो हम तुम, वो मुलाकात के बाद,अपना एहसासे जियां जानिए कितना होगा. हम सुखन होंगे जो हम तुम तो हर इक बात के बीच, अनकही बात का मोहूम सा परदा होगा.’ अशआर के आखिरी मिसरे को गाते हुए राबिया इतनी भावुक हो गईं कि शब्द उन की आंखों से बहने लगे तो हमेशा की तरह जाकिर अली अपनी कुरसी से उठे और उन्होंने राबिया बेगम का चेहरा अपने हाथों में थाम कर उन के आसुओं को होंठों में समा लिया.

संयोग से उसी समय शाहिद की बेगम खरीदारी कर के लौटी थी. कई सारे बैग्स के बोझ को हाथों में बदलने के लिए वह उन के कमरे की इस आदमकद खिड़की के बाहर रुकी थी. तभी उस ने इस भावनात्मक दृश्य को देखा और अपने पति से शिकायत लगाई, ‘इस उम्र में यह आशनाई-तौबातौबा. अगर कोई बाहर का आदमी देख लेता तो, आप इन आदमकद खिड़कियों पर परदा लगवाने के लिए तो कहिए.’

दरअसल बात यह थी कि इस हवेलीनुमा मकान के आखिरी कोने पर बने इस आदमकद खिड़कियों वाले कमरे पर शाहिद की बीवी की मुद्दत से नजर थी. कमरे के बाहर फलदार पेड़ों की कतार, और फूलों की क्यारियां थीं. शरद की मादक चांदनी रातों में और वसंत के मौसम में कमरे से बाहर निकले बिना इस खिड़की के सामने बैठ कर ही फूलों व आमों के बौर की खुशबू के साथ उस शायराना माहौल को महसूस किया जा सकता था. शाहिद की बीवी की तालीम बीए तक थी. शायरी और उर्दू की तहजीब तो उसे नहीं थी, हां, उस का मिजाज आशिकाना जरूर था. वह पहले भी कई मौकों पर यह इच्छा जाहिर कर चुकी थी कि अब्बू और अम्मी अगर गांव में जा कर रहें तो बेहतर होगा. वरना आधी से ज्यादा हवेली में अम्मी ने जो लड़कियों के लिए स्कूल खुलवा दिया है, स्कूल वाले धीरेधीरे पूरी हवेली पर ही काबिज जो जाएंगे. जमीनजायदाद की फसल वगैरा भी अभी कारिंदों की ईमानदारी पर ही मिल रही है. तब जमीनजायदाद की भी बेहतर देखभाल हो सकेगी.

इस के अलावा, वह, एक बार डा. जाकिर द्वारा आम के बागों का ठेका उस के एक रिश्तेदार को देने से इनकार कर देने की वजह राबिया बेगम को मानती थी, इसलिए उन से मन ही मन बेहद नाराज थी. सो, वह किसी भी तरह उन्हें इस घर से अलग कर देना चाहती थी.

इस वाकए के 2 दिनों बाद जाकिर अली अपने कमरे में बैठे किसी पत्रिका के लिए एक शायर के बारे में लेख लिख रहे थे कि राबिया बेगम उन के पास आ कर बोलीं, ‘‘आप को जनाब रामकिंकर साहब याद हैं न? अरे वही रामकिंकर साहब, जो संस्कृत के प्रोफैसर थे और बाद में किसी फैलोशिप के तहत लंदन चले गए थे. फिर वहीं बस गए.’’

‘‘अरे, आप ऐसे कैसे कह रही हैं, हम ऐसे एहसानफरामोश तो नहीं कि रामकिंकर साहब को भूल जाएं. हां, बताइए क्या हुआ रामकिंकर साहब को?’’ जाकिर अली ने कलम रोक कर उत्सुकता से पूछा.

‘‘अरे, उन्हें कुछ नहीं हुआ, कुछ दिनों पहले उन का फोन आया था. हमें लंदन आने का न्योता दिया है. कह रहे थे कि उन की ही एक संस्था भारतीय शास्त्रीय संगीत का कोई बड़ा कार्यक्रम करवा रही है, सो शास्त्रीय संगीत संबंधित कुछ साजों की संगत देने वालों की उन्हें काफी जरूरत है. वे तो कह रहे थे कि अब भी मेरे इल्म और हमारे फन की वहां बेहतर कदर हो सकेगी. क्या कहते हैं आप?’’ राबिया बेगम ने उन से मानो कुछ आश्वासन पाने की मुद्रा में प्रश्न किया.

एक से बढ़कर एक- भाग 1: दामाद सुदेश ने कैसे बदली ससुरजी की सोच

दरवाजेकी बैल बजाने के बजाय दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर और आने वाली की पुकार सुन कर मैं सम झ गया कि कौन आया है. मैं ने कहा, ‘‘अरे भई जरा ठहरो… मैं आ रहा हूं,’’ बैठेबैठे ही मैं ने आने वाले से कहा.

यह सुन कर मेरी पत्नी बोली, ‘‘लगता है भाई साहब आए हैं,’’ कहते हुए उस ने ही दरवाजा खोल दिया.

‘‘आइए भाई साहब, बहुत दिनों बाद आज हमारी याद आई है.’’

‘‘भाभीजी, मैं आज एक खास काम से आप के पास आया हूं. लेकिन पहले चाय पिलाइए.’’

नंदा से चाय की फरमाइश की है तो मैं सम झ गया कि आज जरूर उस का कोई काम है. मैं ने अपने सामने रखे सारे कागजात उठा कर रख दिए, क्योंकि उस के आने की मु झे भी बड़ी खुशी हुई थी.

‘‘हां. बोलो क्या काम है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘देखो राजाभाई, मैं चित्रा की शादी पक्की करने जा रहा हूं. लड़का अच्छा है और घरबार भी ठीकठाक है… मु झे रुपयों की कोई कमी नहीं है. मेरी सिर्फ 2 बेटियां हैं. मेरा सबकुछ उन्हीं का तो है. मैं उन्हें बहुत कुछ दूंगा. सच है कि नहीं? फिर भी लड़के की ज्यादा जानकारी तो मालूम करनी ही पड़ेगी और वही काम ले कर मैं तुम्हारे पास आया हूं.’’

दादाजी की बेटी चित्रा सचमुच बहुत सुंदर और भली लड़की थी. अमीरी में पल कर भी बहुत सीधीसादी थी. हम दोनों को हमेशा यही सवाल सताता कि चित्रा की मां बड़े घर की बेटी. मायके से खूब धनदौलत ले कर आई थी और हमेशा अपना बड़प्पन जताने वाली. उस की पढ़ाईलिखाई ज्यादा नहीं हुई थी और उसे न कोई शौक था, न किसी कला का ज्ञान. वह अपनी अमीरी के सपनों में खोने वाली और इसीलिए उस की मेरी पत्नी से जमी नहीं.

‘‘देख, राजाभाई, मेरे पास दौलत की कोई कमी नहीं है और मेरी बेटी भी अच्छी है. तो हमें अच्छा दामाद तो मिलना ही चाहिए.’’

‘‘हां भई हां. तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो. तुम्हारा देखा हुआ लड़का जरूर अच्छा ही होगा.’’

मैं उस के शब्द सुन कर चौंक पड़ा. बार रे बाप. क्या मैं फिर से ऐसे ही फंसूंगा? मेरे मन में विचार आया.

‘‘राजाभाई, लड़का तुम्हारी जानकारी में है. तुम्हारी चचेरी साली का बेटा, जो सदाशिव पेठ में रहता है.’’

इस पर मैं ने और नंदा ने एकदूसरे की तरफ देखा. हाल ही में हम ने एक शादी तय करने में योगदान दिया था. अब इस दोस्त से क्या कहूं? मैं वैसे ही उठ खड़ा हुआ और सुदेश का खत अलमारी से निकाल कर उसे दे दिया.

‘‘दादाजी, तुम्हारी चित्रा की शादी तय हो रही है, यह सुन कर हम दोनों को बहुत खुशी हो रही है. चित्रा बड़ी गुणी लड़की है. अत: उसे अच्छी ससुराल मिलनी चाहिए यही हमारी भी तमन्ना है. लेकिन अब पहले जैसी परिस्थितियां नहीं रही है. आजकल हर घर में 1-2 बच्चे… अपनी बच्चियों को मांबाप खूब धनदौलत देते हैं. तुम्हारे जैसे धनवान सिर्फ देते ही नहीं, बल्कि उस का बोलबोला भी करते हैं.

‘‘बारबार कह कर दिखाते हैं कि हम ने बेटी को इतना दिया, उतना दिया. यह बात किसी को पसंद आती है तो किसी को नहीं और लगता है कि उस का अपमान किया जा रहा है. इस पर वे क्या करते हैं, वह अब तुम्हीं इस खत में पढ़ लो. मैं क्या कहना चाहता हूं वह तुम सम झ जाओगे-

‘‘माननीय काकाजी को नमस्कार. मैं यह पत्र जानबू झ कर लिख रहा हूं, क्योंकि आज या कल कुछ बातें आप को मालूम होंगी, तो उस के कारण आप को पहले ही ज्ञात कराना चाहूंगा. पिछले कुछ दिनों से मैं बहुत परेशान हूं. फिर आप कहेंगे कि पहले क्यों नहीं बताया. जो कुछ घटित हुआ है उस समस्या का हल मु झे ही निकालना था.

‘‘हो सकता है मेरा निकाला हुआ हल आप को पसंद न आए. आप को कोई दोष न दे, यही मेरी इच्छा है. आप ने हमारी शादी तय करने में बड़ा योगदान दिया है. वैसे शादियां तय कराना आप का सामाजिक कार्य है. लेकिन कभीकभी ऐसा भी हो सकता है यह बतलाने के लिए ही यह पत्र लिख रहा हूं.

‘‘शादी के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ उस के मायके जाया करता था. लेकिन हर बार किसी न किसी कारण वहां से नाराज हो कर ही लौटता था.

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