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Friendship Day Special: पंचायती राज – कैसी थी उनकी दोस्ती

उस दिन मुनिया अपने मकान में अकेली थी कि शोभित को अपने पास आया देख कर उस का मन खुशी से झूम उठा. उस ने इज्जत के साथ शोभित को पास बैठाया. पास के मकानों में रहते हुए शोभित और मुनिया में अच्छी दोस्ती हो गई थी. दोनों बचपन से ही एकदूसरे के घर आनेजाने लगे थे. कब उन के बीच प्यार का बीज पनपने लगा, उन्हें पता भी नहीं चला. अगर उन दोनों में मुलाकातें न हो जातीं, तो उन के दिल तड़पने लगते थे.

कुछ देर की खामोशी को तोड़ते हुए शोभित बोला, ‘‘मुनिया, मैं कई दिनों से तुम से अपने मन की बात कहना चाहता था, लेकिन सोचा कि कहीं तुम्हें या तुम्हारे परिवार वालों को बुरा न लगे.’’ ‘‘तो आज कह डालो न. यहां कोई नहीं है. तुम्हारी बात मेरे तक ही रहेगी,’’ कह कर वह हंसी थी.

‘‘मुनिया, तुम मेरे दिल में इस तरह बस गई हो कि तुम्हें एक बार दिन में देख न लूं, तो मुझे चैन नहीं पड़ता. मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. तुम से इतनी मुहब्बत हो गई है कि मैं रातरात भर तुम्हारी याद में सपने देखता रहता हूं.’’ यह सुन कर मुनिया खुशी से पागल हो गई, लेकिन अपनी इच्छा को दबाते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या तुम नहीं जानते हो कि अगर हमारे रिश्ते की भनक तुम्हारे घर वालों को लग गई, तो इस का क्या नतीजा होगा?’’

शोभित बोला, ‘‘मैं तुम से सच्चा प्यार करता हूं. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ मुनिया ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मैं तो तुम्हें बहुत पहले से अपने दिल में बसा चुकी हूं, लेकिन आज तक कह नहीं पाई. मुझे डर लगता है कि समाज शायद हमारी इस चाहत को कभी नहीं समझेगा.’’

‘‘वह सब तुम मुझ पर छोड़ दो,’’ इतना कह कर शोभित ने मुनिया को खींच कर अपनी बांहों में कस लिया और उस के गालों व होंठों को चूमने लगा. मुनिया उस के प्यार में मदहोश होती रही और उसे प्यार करने लगी. हरिराम और विक्रम पाल एक ही गांव में शुरू से पासपास रहते रहे थे. हरिराम का अपना निजी पुश्तैनी पक्का शानदार मकान था, जिस के सामने विक्रम पाल का मकान छोटा सा खपरैलदार बना था, फिर भी फैलाव में वह थोड़ा बड़ा था.

हरिराम ऊंची जाति का था और विक्रम पाल को लोग नीची जाति का मानते जरूर थे, लेकिन उस का गांव वालों के साथ उठनाबैठना बराबर का था. गांव में अंतर्जातीय विवाह की प्रथा नहीं थी, फिर भी गांव के कुछ लड़के व लड़कियां प्रेमजाल में फंस कर गांव छोड़ कर दूर जा बसे थे.

गांव के लड़के मुनिया और शोभित की प्रेम कहानी को चटकारे ले कर फैलाने लगे. एक दिन यह खबर शोभित के पिता हरिराम के कानों में पहुंची. उन्होंने शोभित की पिटाई कर दी. शोभित ने भी कसम खा ली थी कि वह मुनिया को अपना जीवनसाथी बना कर रहेगा, चाहे इस के लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े. वह भूल गया था कि एक ऊंचे खानदान वाले निचले खानदान की लड़की को बहू बनाना कभी पसंद नहीं करेंगे. वह यह भी अच्छी तरह जानता था कि प्यार करने वालों को गांवनिकाला दिया जा चुका था.

इधर हरिराम कुछ लोगों को साथ ले कर मुनिया के पिता विक्रम पाल के दरवाजे पर पहुंच कर गुस्से में दरवाजा पीटने लगा. विक्रम पाल के बाहर आने पर हरिराम चिल्लाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी बेटी ने कैसे इतनी हिम्मत कर ली कि उस ने मेरे बेटे को अपने झूठे प्रेमजाल में फंसा कर सारे गांव में हमारी बेइज्जती का डंका पिटवा दिया.’’

‘‘मैं आप की बात समझा नहीं,’’ विक्रम पाल ने शांत लहजे में पूछा. ‘‘सारे गांव में ढिंढोरा पिट चुका है और तुम्हें खबर नहीं लगी. पूछो अपनी बेटी से कि उस ने क्यों मेरे बेटे पर अपना प्रेमजाल फैलाया? तुम उसे अपने हाथों से नहीं मारोगे, तो वह मार दी जाएगी. पड़ोस में रहने का यह मतलब नहीं है कि तुम लोग हमारे सिर पर चढ़ कर बैठने की कोशिश करो, हमारी बराबरी करने की हिम्मत करोगे.’’

‘‘वे दोनों नादान हैं. गलती कर दी होगी. उम्र का तकाजा है. हमें समझदारी से काम लेना चाहिए, वरना गांव का माहौल बिगड़ जाएगा. उन्हें माफ कर दो. मैं मुनिया को समझा दूंगा,’’ विक्रम पाल ने गुजारिश की. ‘‘तुम अपनी बेटी पर लगाम कसो, वरना,’’ कहते हुए हरिराम अपने लोगों के साथ वापस चला गया.

उस गांव में खाप पंचायत का बोलबाला था, जिस के तालिबानी फरमानों ने बहुत से नौजवान प्रेमी जोड़ों के सपने उजाड़ दिए थे. शोभित और मुनिया को अपने ऊपर होने वाले जुल्म की फिक्र न थी. वे दोनों छिपते हुए अपने किसी दोस्त के यहां मिलते रहे.

एक दिन मुनिया की सहेली ने उसे समझाया, ‘‘तुम जितनी भोली और नासमझ हो, तुम्हारा शोभित वैसा नहीं है. वह पैसे वाला है. तुम्हारा उस से कोई मुकाबला नहीं हो सकता. ‘‘ये बड़े घर के लोग छोटों की इज्जत को खरीदने की चीज समझते हैं, पर घर की बहू नहीं बना सकते. अफसोस इस बात का है कि हम नीची जाति की लड़कियों से वे मनोरंजन तो कर सकते हैं, पर अपने घर में जगह नहीं दे सकते.’’

‘‘अब मैं क्या करूं? न तो उसे छोड़ते बनता है, न ही उस के बगैर मैं जिंदा रह सकूंगी,’’ निराश हो कर मुनिया ने कहा. ‘‘निराश मत हो. शोभित से मिल कर मंदिर में शादी कर लो. उस के बाद जो होगा देखा जाएगा.’’

‘‘इस से तो बात बढ़ेगी.’’ ‘‘तब प्रेम की दुहाई मत दो और शोभित से नाता तोड़ दो. इसी में तुम्हारी भलाई है,’’ सहेली ने कहा.

गांव में छोटी सी बात भी बहुत जल्दी फैल जाती है, फिर मुनिया और शोभित के मिलने की बात कैसे छिप सकती थी. गांव की पंचायत बैठ गई. लोग इकट्ठा होने लगे. कुछ परदानशीं औरतें और शहर से पढ़ कर लौटी लड़कियां भी वहां थीं. ऐसा लग रहा था, जैसे गांव का पूरा समाज वहां जमा हो रहा था.

मुनिया के सिर पर आंचल था. उस की मांग में सिंदूर और माथे पर लाल टीका लगा था. मुनिया और शोभित ने गुपचुप शादी रचा ली थी. पंचायत में हरिराम ने हंगामा करते हुए चीख कर कहा, ‘‘इस नीच लड़की मुनिया ने मेरे बेटे शाभित पर इतना दबाव डाला कि उस ने हमारी इज्जत को दरकिनार करते हुए उस से शादी कर ली. इस पापिन को मौत की सजा दी जाए, ताकि गांव की दूसरी बहूबेटियों की इज्जत बनी रहे.’’

कुछ लोगों ने उस की शिकायत को जायज माना. ‘‘इस में सारा कुसूर हरिराम का है. शुरू से ही शोभित और मुनिया साथ खेलतेखाते रहे और आज उन्हें ऊंचनीच समझाई जा रही है. बाप को अपने बेटे के चालचलन पर काबू करना था. उस समय हरिराम को याद नहीं आया कि उन का बेटा नीचे कुल की लड़की के साथ बैठ कर उस की जूठी रोटी खाता था.

‘‘मैं तो कहता हूं कि शोभित ने मेरी बेटी के साथ फरेब किया है. मौत का भागी तो वह होगा,’’ हरिराम के जवाब में विक्रम पाल ने अपनी सफाई दी. दोनों पक्षों में देर तक बहस चलती रही. बाद में पंचायत ने फैसला सुनाया, ‘मुनिया और उस के परिवार को गांव से निकाल दिया जाए, क्योंकि नीची जाति की लड़की से ऊंचे जाति के लड़के की शादी नहीं हो सकती. दोनों की शादी एक तमाशा है.’

उसी समय शहर से पढ़ कर आई कुछ लड़कियों में से एक चिल्लाने लगी, ‘‘पंचायत को इसी तरह का गलत फैसला सुनाना था, तो हमें शहर पढ़ने क्यों भेजा गया? वहां तो हम सभी को हर जाति, हर तबके की लड़कियों के साथ खानापीना पड़ता था. ऐसे में हम सभी लड़कियों को इस गांव में रहने का कोई हक नहीं. हमें भी गांव से निकाल देना चाहिए. ‘‘गांव के जो लड़के शहर में जा कर नीची जाति की लड़कियों से जिस्मानी संबंध बना कर खुद को पाकसाफ कहते हुए गांव लौटते हैं, उन्हें भी गांव से निकाल देना चाहिए.’’

‘‘पंचायत का फैसला अटल है. तुम लोगों की सारी बातें बकवास हैं,’’ एक पंच ने कहा. ‘‘आप लोगों का ऐसा तालिबानी फरमान हम नहीं मानेंगीं. हम बड़े सरकारी अफसरों को इस मामले की जानकारी दे कर इंसाफ मांगेंगीं. आप लोगों का इसी तरह मनमानी आदेश चलता रहा, तो देश को आगे बढ़ाने की तरफ ध्यान देने के बजाय नौजवान पीढ़ी ऐसी खाप पंचायतों के फरमानों में ही उलझ कर दम तोड़ने लगेंगी.

‘‘यही नहीं, दूसरे गांव में भी ऐसी खाप पंचायतें खुद को कानून से ऊपर मान कर गैरकानूनी कदम उठा रही हैं, जिस का हम विरोध करेंगीं,’’ उन लड़कियों में से दूसरी ने उठ कर कहा. उसी समय पुलिस इंस्पैक्टर दलबल के साथ वहां पहुंचे और बोले, ‘‘किसी ने कलक्टर साहब को फोन किया है कि किसी नीची जाति की लड़की के साथ आप की पंचायत नाइंसाफी कर रही है, इसलिए मुखियाजी को चल कर कोर्ट में अपनी सफाई देनी होगी. तब तक के लिए पंचायत का आदेश माना नहीं जाएगा. लड़की को सताया न जाए, वरना हमें कानूनी कार्यवाही करनी पड़ेगी.’’ उसी समय पंचायत खत्म हो गई. शोभित और मुनिया दोबारा अपने दोस्त के मकान की ओर चले गए.

तभी ‘हमारी जीत हुई… हम साथसाथ रहेंगे…’ का शोर हुआ.

Friendhsip Day Special: एक अच्छा दोस्त-सतीश से क्या चाहती थी राधा

सतीश लंबा, गोरा और छरहरे बदन का नौजवान था. जब वह सीनियर क्लर्क बन कर टैलीफोन महकमे में पहुंचा, तो राधा उसे देखती ही रह गई. शायद वह उस के सपनों के राजकुमार सरीखा था.

कुछ देर बाद बड़े बाबू ने पूरे स्टाफ को अपने केबिन में बुला कर सतीश से मिलवाया.

राधा को सतीश से मिलवाते हुए बड़े बाबू ने कहा, ‘‘सतीश, ये हैं हमारी स्टैनो राधा. और राधा ये हैं हमारे औफिस के नए क्लर्क सतीश.’’

राधा ने एक बार फिर सतीश को ऊपर से नीचे तक देखा और मुसकरा दी.

औफिस में सतीश का आना राधा की जिंदगी में भूचाल लाने जैसा था. वह घर जा कर सतीश के सपनों में खो गई. दिन में हुई मुलाकात को भूलना उस के बस में नहीं था.

सतीश और राधा हमउम्र थे. राधा के मन में उधेड़बुन चल रही थी. उसे लग रहा था कि काश, सतीश उस की जिंदगी में 2 साल पहले आया होता.

राधा की शादी 2 साल पहले मोहन के साथ हुई थी. वह एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, मगर मोहन को कंपनी के काम से अकसर बाहर ही रहना पड़ता था. घर में रहते हुए भी वह राधा पर कम ही ध्यान दे पाता था.

यों तो राधा एक अच्छी बीवी थी, पर मोहन का बारबार शहर से बाहर जाना उसे पसंद नहीं था. मोहन का सपाट रवैया उसे अच्छा नहीं लगता था. वह तो एक ऐसे पति का सपना ले कर आई थी, जो उस के इर्दगिर्द चक्कर काटता रहे. लेकिन मोहन हमेशा अपने काम में लगा रहता था.

अगले दिन सतीश समय से पहले औफिस पहुंच गया. वह अपनी सीट पर बैठा कुछ सोच रहा था कि तभी राधा ने अंदर कदम रखा.

सतीश को सामने देख राधा ने उस से पूछा, ‘‘कैसे हैं आप? इस शहर में पहला दिन कैसा रहा?’’

सतीश ने सहज हो कर जवाब दिया, ‘‘मैं ठीक हूं. पहला दिन तो अच्छा ही रहा. आप कैसी हैं?’’

राधा ने चहकते हुए कहा, ‘‘खुद ही देख लो, एकदम ठीक हूं.’’

इस के बाद राधा लगातार सतीश के करीब आने की कोशिश करने लगी. धीरेधीरे सतीश भी खुलने लगा. दोनों औफिस में हंसतेबतियाते रहते थे.

हालांकि औफिस के दूसरे लोग उन की इस बढ़ती दोस्ती से अंदर ही अंदर जलते थे. वे पीठ पीछे जलीकटी बातें भी करने लगे थे.

राधा के जन्मदिन पर सतीश ने उसे एक बढि़या सा तोहफा दिया और कैंटीन में ले जा कर लंच भी कराया.

राधा एक नई कशिश का एहसास कर रही थी. समय पंख लगा कर उड़ता गया. सतीश और राधा की दोस्ती गहराती चली गई.

राधा शादीशुदा है, सतीश यह बात बखूबी जानता था. वह अपनी सीमाओं को भी जानता था. उसे तो एक अजनबी शहर में कोई अपना मिल गया था, जिस के साथ वह अपने सुखदुख की बातें कर सकता था.

सतीश की मां ने कई अच्छे रिश्तों की बात अपने खत में लिखी थी, मगर वह जल्दी शादी करने के मूड में नहीं था. अभी तो उस की नौकरी लगे केवल 8 महीने ही हुए थे. वह राधा के साथ पक्की दोस्ती निभा रहा था, लेकिन राधा इस दोस्ती का कुछ और ही मतलब लगा रही थी.

राधा को लगने लगा था कि सतीश उस से प्यार करने लगा है. वह पहले से ज्यादा खुश रहने लगी थी. वह अपने मेकअप और कपड़ों पर भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी. उस पर सतीश का नशा छाने लगा था. वह मोहन का वजूद भूलती जा रही थी.

सतीश हमेशा राधा की पसंदनापसंद का खयाल रखता था. वह उस की हर बात की तारीफ किए बिना नहीं रहता था. यही तो राधा चाहती थी. उसे अपना सपना सच होता दिखाई दे रहा था.

एक दिन राधा ने सतीश को डिनर पर अपने घर बुलाया. सतीश सही समय पर राधा के घर पहुंच गया.

नीली जींस व सफेद शर्ट में वह बेहद सजीला जवान लग रहा था. उधर राधा भी किसी परी से कम नहीं लग रही थी. उस ने नीले रंग की बनारसी साड़ी बांध रखी थी, जो उस के गोरे व हसीन बदन पर खूब फब रही थी.

सतीश के दरवाजे की घंटी बजाते ही राधा की बांछें खिल उठीं. उस ने मीठी मुसकान बिखेरते हुए दरवाजा खोला और उसे भीतर बुलाया.

ड्राइंगरूम में बैठा सतीश इधरउधर देख रहा था कि तभी राधा चाय ले कर आ गई.

‘‘मैडम, मोहनजी कहां हैं? वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे,’’ सतीश ने पूछा.

राधा खीज कर बोली, ‘‘वे कंपनी के काम से हफ्तेभर के लिए हैदराबाद गए हैं. उन्हें मेरी जरा भी फिक्र नहीं रहती है. मैं अकेली दीवारों से बातें करती रहती हूं. खैर छोड़ो, चाय ठंडी हो रही है.’’

सतीश को लगा कि उस ने राधा की किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. बातोंबातों में चाय कब खत्म हो गई, पता ही नहीं चला.

राधा को लग रहा था कि सतीश ने आ कर कुछ हद तक उस की तनहाई दूर की है. सतीश कितना अच्छा है. बातबात पर हंसतामुसकराता है. उस का कितना खयाल रखता है.

तभी सतीश ने टोकते हुए पूछा, ‘‘राधा, कहां खो गई तुम?’’

‘‘अरे, कहीं नहीं. सोच रही थी कि तुम्हें खाने में क्याक्या पसंद हैं?’’

सतीश ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया, ‘‘बस यही राजमा, पुलाव, रायता, पूरीपरांठे और मूंग का हलवा. बाकी जो आप खिलाएंगी, वही खा लेंगे.’’

‘‘क्या बात है. आज तो मेरी पसंद हम दोनों की पसंद बन गई,’’ राधा ने खुश होते हुए कहा.

राधा सतीश को डाइनिंग टेबल पर ले गई. दोनों आमनेसामने जा बैठे. वहां काफी पकवान रखे थे.

खाते हुए बीचबीच में सतीश कोई चुटकुला सुना देता, तो राधा खुल कर ठहाका लगा देती. माहौल खुशनुमा हो गया था.

‘काश, सब दिन ऐसे ही होते,’ राधा सोच रही थी.

सतीश ने खाने की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘वाह, क्या खाना बनाया?है, मैं तो उंगली चाटता रह गया. तुम इसी तरह खिलाती रही तो मैं जरूर मोटा हो जाऊंगा.’’

‘‘शुक्रिया जनाब, और मेरे बारे में आप का क्या खयाल है?’’ कहते हुए राधा ने सतीश पर सवालिया निगाह डाली.

‘‘अरे, आप तो कयामत हैं, कयामत. कहीं मेरी नजर न लग जाए आप को,’’ सतीश ने मुसकरा कर जवाब दिया.

सतीश की बात सुन कर राधा झूम उठी. उस की आंखों के डोरे लाल होने लगे थे. वह रोमांटिक अंदाज में अपनी कुरसी से उठी और सतीश के पास जा कर स्टाइल से कहने लगी, ‘‘सतीश, आज मौसम कितना हसीन है. बाहर बूंदों की रिमझिम हो रही?है और यहां हमारी बातोें की. चलो, एक कदम और आगे बढ़ाएं. क्यों न प्यारमुहब्बत की बातें करें…’’

इतना कह कर राधा ने अपनी गोरीगोरी बांहें सतीश के गले में डाल दीं. सतीश राधा का इरादा समझ गया. एक बार तो उस के कदम लड़खड़ाए, मगर जल्दी ही उस ने खुद पर काबू पा लिया और राधा को अपने से अलग करता हुआ बोला, ‘‘राधाजी, आप यह क्या कर रही?हैं? क्यों अपनी जिंदगी पर दाग लगाने पर तुली हैं? पलभर की मौजमस्ती आप को तबाह कर देगी.

‘‘अपने जज्बातों पर काबू कीजिए. मैं आप का दोस्त हूं, अंधी राहों पर धकेलने वाला हवस का गुलाम नहीं.

‘‘आप अपनी खुशियां मोहनजी में तलाशिए. आप के इस रूप पर उन्हीं का हक है. उन्हें अपनाने की कोशिश कीजिए,’’ इतना कह कर सतीश तेज कदमों से बाहर निकल गया.

राधा ठगी सी उसे देखती रह गई. उसे अपने किए पर अफसोस हो रहा था. वह सोचने लगी, ‘मैं क्यों इतनी कमजोर हो गई? क्यों सतीश को अपना सबकुछ मान बैठी? क्यों इस कदर उतावली हो गई?

‘अगर सतीश ने मुझे न रोका होता तो आज मैं कहीं की न रहती. बाद में वह मुझे ब्लैकमेल भी कर सकता था. मगर वह ऐसा नहीं है. उस ने मुझे भटकने से रोक लिया. कितना महान है सतीश. मुझे उस की दोस्ती पर नाज है.’

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी

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एक युग: सुषमा और पंकज की लव मैरिज में किसने घोला जहर?- भाग 3

‘‘मैं अपने वादे से कहां मुकरी. मैं ने कब कहा कि वे मुझे पसंद नहीं या मैं ने कभी कोई गलत चुनाव किया था. पर पिताजी की भावनाओं का क्या करूं? उन्हें मेरी ही चिंता रहती है. दिनरात वे मेरे ही बारे में सोचते रहते हैं. वे मेरे लिए बहुत परेशान हैं.’’

‘‘जब उन के विरोध के बावजूद तू ने पंकज का हाथ थामा था तब उन की भावनाओं का खयाल कहां चला गया था? फिर यह भी सोचा है कि तू ही तो उन्हें परेशान कर रही है?’’

‘‘मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूं? मेरा तो दम घुटा जा रहा है. तू ही कुछ बता कि मुझे क्या करना चाहिए? मैं ही सब की परेशानी का कारण हूं.’’

‘‘पहले तो यह समझ ले कि इस सारे झगड़े में गलती की पूरी जिम्मेदारी तेरी ही है,’’ जया ने समझाने के लहजे में कहा.

‘‘हां, मैं यह मानने को तैयार हूं, पर पंकज की भी तो गलती है कि उस ने मुझे क्षमा मांगने का मौका ही नहीं दिया. उस ने मुझे कितना अपमानित किया.’’

‘‘वाह रानीजी, वाह, गलती तुम करो और दूसरा अपने मन का तनिक सा रोष भी न निकाल सके?’’

‘‘तो फिर मैं क्या करूं, बताओ न?’’

‘‘एक बात बता, क्या पंकज में कोई कमी है जो दूसरी शादी कर के तुझे उस से अच्छा पति मिल जाएगा? क्या गारंटी है कि आगे किसी छोटे से झगड़े पर तू फिर तलाक नहीं ले लेगी या जिस व्यक्ति से तेरी दूसरी शादी होगी वह अच्छा ही होगा, इस की भी क्या गारंटी है?’’ जया ने तनिक गुस्से से पूछा.

‘‘दूसरी शादी की बात मत कहो, जया. मैं तो पंकज के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती. शायद उस से अच्छा व्यक्ति इस संसार में दूसरा कोई हो ही नहीं सकता.’’

‘‘फिर किस बात का इंतजार है. क्या तुम समझती हो कि पंकज एक होनहार युवक तुम्हारी प्रतीक्षा में जिंदगी भर अकेला बैठा रहेगा? क्या उस के घर वाले उस के भविष्य के प्रति उदासीन बैठे होंगे? पंकज अपने घर का अकेला होनहार चिराग है.’’

‘‘यह तो मैं ने सोचा ही नहीं था. अब बता कि मैं क्या करूं?’’

‘‘तू तुरंत पंकज से मिल कर अपने मन की दूरियां मिटा ले. उस से क्षमा मांग ले. आखिर गलती की पहल तो तू ने ही की थी.’’

‘‘लेकिन पिताजी?’’

‘‘क्या पिताजीपिताजी की रट लगा रखी है. क्या तू कोई दूध पीती बच्ची है? पिता क्या हमेशा ही तेरी जिंदगी के छोटेछोटे मसले हल करते रहेंगे? उन्हें अपने मुकदमों के फैसले ही करने दे, अपना फैसला तू खुद कर.’’

‘‘अगर पंकज ने मुझे क्षमा न किया तो? मुझ से मिलने से ही इनकार कर दिया तो?’’ सुषमा ने बेचारगी से कहा.

‘‘पंकज जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति ऐसा कभी नहीं कर सकता. तुझे उस ने क्षमा न कर दिया होता तो वह तेरे घर क्या करने आता. क्या तू इतना भी नहीं समझ सकती?’’

‘‘सच जया, तुम ने तो मेरी आंखें ही खोल दी हैं. मेरी तो सारी दुविधा दूर कर दी. मैं अभी पंकज के पास जाऊंगी. इस समय वह संभवत: दफ्तर में ही होगा. मैं अभी उसे फोन मिलाती हूं.’’

बिना तनिक भी देर किए हुए सुषमा जया के साथ तुरंत पास के टैलीफोन बूथ पर बात करने चली गई. उस ने दफ्तर का नंबर मिलाया तो पता चला कि पंकज किसी आवश्यक कार्य से अचानक आज दोपहर के बाद छुट्टी ले कर अपने घर के लिए चला गया है. पूछने पर पता चला कि शायद सगाई की तारीख तय हो रही है.

सुषमा का मन हजार शंकाओं से घिर आया. उस ने समय देखा तो ध्यान आया कि पंकज की गाड़ी छूटने में अभी आधे घंटे का समय बाकी है. अब उसे पंकज के बिछोह का एकएक क्षण एक युग जैसा लग रहा था. उस ने कहा, ‘‘जया, मैं अभी, इसी समय स्टेशन जा रही हूं. तू भी मेरे साथ चली चल.’’

‘‘नहीं जी, अब मैं मियांबीवी के बीच दालभात में मूसलचंद बनने वाली नहीं, कल मिलूंगी तो हाल बताना. वैसे अब तू मुझे ढूंढ़ने वाली नहीं. मैं अपनी औकात समझती हूं,’’ कह कर जया अपने घर की ओर मुसकराती हुई चल पड़ी.

सुषमा का हृदय तेजी से धड़क रहा था. सोचने लगी कि ट्रेन में मैं उन्हें न ढूंढ़ पाई तो, टे्रन छूट गई तो? क्या करूंगी? उन्होंने देख कर मुंह फेर लिया तो क्या होगा? हजार शंकाओं से घिरी सुषमा टे्रन के हर डब्बे के बाहर निगाहें दौड़ा कर पंकज को ढूंढ़ रही थी. तभी टे्रन ने सीटी दे दी. उस की धड़कनें और भी तेज हो उठीं. पांव एकएक मन के भारी हो गए. सोचने लगी, आज तो उसे कैसे भी हो पंकज से मिलना ही है. न मिला तो क्या होगा. उस का तो दम ही निकल जाएगा. वह और भी तेजी से चलती इधरउधर देख रही थी. हर क्षण दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं. तभी उस का पैर स्टेशन पर रखे किसी सामान से टकराया और वह औंधे मुंह गिरने को हो आई.

लेकिन किन्हीं मजबूत बांहों ने उसे गिरने से संभाल लिया और एक चिरपरिचित आवाज उस के कानों में सुनाई दी, ‘‘किसे ढूंढ़ रही हो, सुषमा? बहुत देर से तुम्हें देख रहा हूं,’’ अपने डब्बे की ओर बढ़ते हुए पंकज ने कहा.

‘‘मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं,’’ घबराहट में धड़कते हृदय से सुषमा बस इतना ही बोल सकी.

‘‘अब तो बहुत देर हो चुकी है. मेरी गाड़ी छूट रही है.’’

सुषमा के पैरों के नीचे से तो मानो जमीन ही सरक गई. उस ने फिर कहा, ‘‘मुझे आप से जरूरी बात करनी है.’’

‘‘4 दिन बाद लौटूंगा तब यदि तुम ने मौका दिया तो जरूर बात करूंगा.’’

‘‘इतने दिन तो बहुत होते हैं. क्या मैं आप के साथ चल सकती हूं? मुझे अभी बातें करनी हैं.’’

‘‘तुम मेरे साथ मेरे घर चलोगी? तुम्हारा सामान कहां है? तुम्हारे पिता…’’

‘‘बस, अब कुछ न कहें, मुझे अपने साथ लेते चलें. आप के साथ मुझे सबकुछ मिल जाएगा.’’

ट्रेन सरकने लगी थी. पंकज ने तेजी से हाथ बढ़ा कर सुषमा को अपने डब्बे में चढ़ा लिया.

सुषमा उस के सीने से लग कर सिसक पड़ी. वह यह भी भूल गई कि सब उसी की ओर देख रहे हैं.

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 3

साल बीतने को आया. मेघा को लगने लगा था कि इस अदृश्य दुश्मन पर अब जीत हासिल हो ही गई है. लेकिन कांटों के झाड़ से लहंगा बचा कर रखने के तमाम प्रयासों के बावजूद भी यह अनहोनी हो ही गई. किसी शायर के कहे अनुसार, यह नाव भी किनारे आ कर ही डूबी.

अब जबकि वैक्सीन के आने की सुगबुगाहट के बीच लोग जरा बेफिक्र हुए ही थे और कोरोना शायद इसी लापरवाही का इंतजार कर रहा था. एक दिन अचानक सोम को हलका बुखार आया और अगले दिन उसे खांसी शुरू हो गई. टैस्ट करवाया तो कोरोना पौजिटिव आया. हालांकि अब मृत्युदर काफी कम थी लेकिन फिर भी खतरा तो था ही. आखिर जिस का डर था, वही हुआ. इंफैक्शन बढ़ने के बाद सोम हौस्पिटल गया तो फिर बौडी के रूप में ही वापस आया.

सबकुछ बहुत ही आकस्मिक रहा. महज 3 साल के वैवाहिक जीवन के बाद ही माला की रंगीन साड़ी सफेद हो गई. मां पर तो मानो वज्रपात ही हुआ था. मेघा को भी लगा जैसे कि जिंदगी ट्रेडमिल पर ही चल रही थी. चले तो खूब लेकिन पहुंचे कहीं भी नहीं.

मन बदलने के लिए मेघा ने माला को कुछ दिनों के लिए मां के पास भेज दिया. इस के बाद भी माला अकसर मां के पास ही रहने लगी. मेघा और मंगल उस के भविष्य के लिए फिर से फिक्रमंद होने लगे.

इधर अचानक कुछ दिनों से माला बुझीबुझी सी लग रही थी. सोम की यादों को कारण मान कर मेघा ने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया. मेघा ने महसूस तो किया कि आजकल माला अपने जीजा मंगल से भी कुछ खिंचीखिंची सी रहती है लेकिन यह भी कोई अधिक गौर करने वाली बात नहीं थी. मन खराब हो, तो कुछ भी अच्छा कहां लगता है.

माला पिछले एक माह से मां के पास ही है. आज लंच के बाद मेघा ने भी मां से मिलने का सोचा और स्कूटर ले कर उधर ही चल दी. तभी खयाल आया कि इस समय तो मां सो रही होंगी.

‘कोई बात नहीं, माला तो है न. यों उस से मन की दो बात किए हुए भी समय बीत गया. बेचारी, अभी कुछ भी तो नहीं देखा जिंदगी में, मन ही मन यह सोच कर व्यथित होती मेघा बढ़ी चली जा रही थी. घर के बाहर खड़ी मंगल की मोटरसाइकिल देख कर मेघा चौंक गई.

दरवाजे प‘इन्हें तो इस समय औफिस में होना चाहिए. यहां किस कारण से हैं,’ सोचती हुई मेघा घर के मुख्य दरवाजे तक आ गई. र लगी डोरबैबेल बजातेबजाते अचानक उस के हाथ रुक गए. अंदर से आते हैरान करने वाले वार्त्तालाप ने उसे रुकने को मजबूर कर दिया. “र्मैं ने कह दिया न, मैं यह सब नहीं करने वाली. आप नहीं मानेंगे तो मजबूरन मुझे दीदी को बताना पड़ेगा,” माला की आवाज थी जो गुस्से में लग रही थी.

“यह भी कर के देख लो. लेकिन सोच लेना, कहीं उसे भी तुम्हारी तरह मायके आ कर रहना न पड़ जाए,” मंगल के बेशर्मीभरे इस स्वर की धमकी ने मेघा के सामने सारी स्थिति खोल कर रख दी. उसे माला के उखड़े मन का कारण समझ में आ गया. वह यकीन नहीं कर पा रही थी कि मंगल इतनी कमीनी हरकत कर सकता है. मेघा बिना आहट के ही वहां से लौट आई.

मंगल घर लौटा तो सबकुछ सामान्य था. नन्हा अपने दाद के पास खेल रहा था. मां टीवी देख रही थी. मेघा रसोई में थी. मेघा ने चाय बना कर सासससुर को थमाई और अपना कप ले कर मंगल के पास आ गई. दोनों साथसाथ पीने लगे.

“मैं कुछ दिनों के लिए मां के पास जा रही हूं,” मेघा ने कहा.

“और यहां कौन देखेगा?” मंगल के स्वर में इनकार सा था.

“सोम के बिना भी तो सब चल रहा है न. कुछ दिन मेरे बिना भी चल जाएगा,” मेघा पति के इनकार को खारिज करते हुए मायके जाने की तैयारी करने लगी. बेटी को यों अचानक आया देख कर मां हैरान तो हुईं लेकिन खुश भी थीं. घर में रौनक हो गई.

“मंगल तुझ से क्या चाह रहा है?” एक दिन एकांत में मेघा ने माला से पूछा. माला बहन का प्रश्न सुन कर अचकचा गई. फिर धीरेधीरे सब विस्तार से बताती गई.

“जीजाजी चाहते हैं कि मैं उन्हें सोम की जगह दे दूं. यदि मैं ने ऐसा नहीं किया तो वे तुम्हें छोड़ देने की धमकी देते हैं.” इस के आगे माला ने जो बताया उसे सुन कर मेघा सफेद हो गई. फिर मन ही मन एक निश्चय कर लिया.

“देख माला, अभी तुम्हारी उम्र कुछ भी नहीं है. स्नातक तो तुम हो ही, किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करो. मन लगा कर करोगी तो तुम्हें विधवा कोटे में नौकरी मिल ही जाएगी. एक बार जिंदगी सही रास्ते पर चल पड़ेगी तो मंजिल मिलने में देर नहीं होगी,” मेघा ने समझाया.

“लेकिन मेरा आधा दिमाग तो जीजाजी ने खराब कर रखा है. हर तीसरे दिन धमक जाते हैं. उन से बचने के लिए ही तो मैं यहां मां के पास रहती हूं. यहां भी चैन से नहीं रहने देते. मेरी जिंदगी को तो आम रास्ता समझ लिया है. कहते हैं कि सोम से पहले भी तो किसी की हो चुकी हो, अब क्या डर है. ऐसे में तैयारी क्या खाक करूंगी,” माला निराश थी.

“तू फिक्र मत कर. तू यहां से दूर जा कर किसी इंस्टिट्यूट में तैयारी कर. मंगल को मैं संभाल लूंगी,” मेघा के सुझाव में दम था.

माला राजी हो गई. माला को दिल्ली के एक बहुत अच्छे इंस्टिट्यूट में बैंकपीओ की तैयारी करने के लिए एडमिशन दिला दिया गया. माला वहीँ होस्टल में रहने चली गई. मंगल को पता चला, तो उस ने बहुत बवाल मचाया.

“इतना बड़ा फैसला अकेले ही कर लिया? पति हूं तुम्हारा. और उस का जीजा भी व जेठ भी. क्या मुझ से पूछना भी जरूरी नहीं लगा तुम्हें?” मंगल ने चिल्लाते हुए कहा. मंगल जाल में फंसने से पहले ही चिड़िया के उड़ने से खिन्न था.

“तुम ने कौन सा जीजा और जेठ की जिम्मेदारी निभाई है. मेरा मुंह न खुले, इसी में तुम्हारी इज्जत है. खुल गया तो पत्नी से भी हाथ धो बैठोगे,” मेघा ने दांत चबा कर पति की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

शब्दों की तल्खी से मंगल जान गया था कि मेघा को सब पता चल गया है. वह उन आंखों का सामना नहीं कर सका और तुरंत मेघा के सामने से हट गया.

मेघा को लग रहा था मानो आज उस ने बहन, मां और परिवार के प्रति अपना एक और कर्तव्य निभाया है.

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 2

इस तरह की बातें बिना पंख ही उड़ती हैं. मेघा की मुंहजोरी की बातें मंगल के घर तक पहुंचीं तो मंगल की मम्मी सतर्क हुई. मंगल को तुरंत लाइनहाजिर किया गया और मेघा के स्वभाव के बारे में पूछताछ की गई. अपनी संतुष्टि के लिए मंगल की मां ने सालभर का समय मांगा ताकि वह मंगल की जीवनसंगिनी बनने के लिए मेघा की उम्मीदवारी को परख सके.

कौन जाने इस बीच मंगल के लिए कोई बेहतर रिश्ता ही मिल जाए. या, हो सकता है कि दोनों के बीच खटास ही आ जाए. मां इसी आस पर सालभर निकाल देना चाहती थी. लेकिन कहते हैं न कि करम तो जहां फूटने को लिखे हैं वहीं फूटते हैं. सालभर बाद भी न तो मंगल को कोई मिली और न ही मेघा को.

सालभर बाद दोनों इस सहमति और शर्त के साथ एक बंधन में बंध गए कि मेघा अपने परिवार की जिम्मेदारी पहले की तरह ही उठाती रहेगी और अपनी तनख्वाह भी पूर्ववत उसी परिवार पर खर्च करती रहेगी. लेकिन मनपसंद साथी का नशा किसी भी अन्य नशे से किसी भी प्रकार कम नहीं होता. मेघा भी प्रेम के नशे में आकंठ डूब गई. वह अपनी तनख्वाह बेशक अपनी मां और बहन पर खर्च करती थी लेकिन अब उस के पास उन पर खर्च करने के लिए समय कम पड़ने लगा था. छुट्टी वाले दिन किसी तरह भागती सी मायके जाती और जाते ही वापसी के लिए घड़ी देखने लगती. साल बीततेबीतते नन्हा गोदी में आ गया तो बचेखुचे समय पर उस का कब्जा हो गया.

इधर माला स्कूल खत्म कर के कालेज में आ गई थी. कालेज का खुलापन, घर में पिता के कठोर अनुशासन की कमी और बहन का बिना जरूरत पैसों से पर्स भरते रहना… किशोर लड़की के राह भटकने के लिए इतने कारण काफी होते हैं.

किसी तरह गिरतेपड़ते माला अपना कालेज कर रही थी. एक दिन पता चला कि माला के पांव गलत पगडंडी पर मुड़ गए. मां ने मेघा और मंगल को बुला कर चर्चा की. सब ने ठंडे दिमाग से सोच कर तय किया कि कालेज खत्म होते ही माला की शादी कर दी जाए.

लेकिन कालेज तो 6 महीने में खत्म हो जाएगा और इतनी जल्दी अच्छा लड़का कहां से तलाश किया जाए. दोतीन महीने खोजने के बाद भी बात बनती दिखाई नहीं दी तो मेघा को अपने देवर सोम का खयाल आया. उस ने मंगल के सामने अपनी बात रखी. मंगल उस का प्रस्ताव सुनते ही उखड़ गया.

“दिमाग खराब हो गया क्या तुम्हारा? जिंदा मक्खी निगलने के लिए तुम्हें सोम ही दिखाई दिया,” मंगल ने गुस्से से कहा.

“बच्चों से गलतियां हो जाती हैं. हम बड़े हैं, हमें ही समझदारी दिखानी होगी. तुम ने मुझ से जिम्मेदारी बांटने का वादा नहीं किया था? तुम्हारी अपनी बहन होती तब भी क्या तुम ऐसे ही तेवर दिखाते?” जैसे कई प्रश्नों के साथ मेघा ने पति पर पलटवार किया.

“हां, तो कर रहे हैं न प्रयास. मिल जाएगा कोई न कोई लड़का. इन सब में सोम को सूली पर टांगने की कहां जरूरत है?” मंगल ने प्रतिरोध किया. लेकिन स्त्री के हठ से भला कौन जीत सका है जो आज मंगल जीत पाता. मेघा के प्रयास रंग लाए और मंगल की नापसंदगी तथा खुद माला की लाख नानुकुर के बाद भी माला सोम के साथ विवाह वचनों से बंधी अपनी बड़ी बहन की देवरानी बन गई.

समय में बहुत शक्ति होती है. बड़े से बड़े घाव भी समय के साथ भर जाते हैं. खरोचों के निशान हलके पड़तेपड़ते एक दिन अदृश्य हो जाते हैं. माला के साथ भी यही हुआ. जवानी के उफनते झरने पर सोम के प्रेम का बांध बनते ही वह शांत नदी सी बहने लगी. अब उसे गृहस्थी में रस आने लगा था. मेघा खुश थी कि उस ने बिगड़ती बात को संभाल लिया था. बहन के घर आने से अब बच्चे की देखभाल के लिए उसे हलकान नहीं होना पड़ता. चौकाचूल्हा भी माला देख लेती है.

थके शरीर को बिस्तर मिलते ही व्यक्ति पहले जरा आराम से लेटता है, फिर आंखें बंद कर दिमाग को शांत करता है और आखिरकार सो जाता है. माला के आने के बाद भी यही हुआ. धीरेधीरे घर की सारी जिम्मेदारी माला पर डाल कर मेघा निश्चिंत हो गई. माला भी खुश थी. दोनों बहनें बारीबारी से मां और सासससुर दोनों की देखभाल कर रही थीं. अपने वादे के अनुसार मेघा आज भी अपनी तनख्वाह का तीसरा हिस्सा ही अपने पास रखती है. शेष 2 हिस्से मां और माला को देती है. इस एक हिस्से से माला और सोम का जेबखर्च निकल आता है. बाकी के खर्चे मंगल और ससुरजी देखते ही हैं.

मेघा ने इतनी तरल जिंदगी की तो कल्पना भी नहीं की थी लेकिन हकीकत को भी भला कैसे झुठलाया जा सकता है. शायद जिंदगी अपनी पिछली गलतियों का पश्चात्ताप कर रही थी. इतने कांटों के बाद कुछ फूलों पर भी हक़ तो बनता ही है.

देखते ही देखते दो हजार बीस का साल आ गया. यह बरस तो मनहूसियत के साथ ही अवतरित हुआ था. चारों तरफ कोरोनाकोरोना का ही तांडव मच रहा था. हर कोई डर के साए में जी रहा था. कौन जाने मौत का अगला शिकार कौन हो. एकएक दिन भारी बीत रहा था.

‘आज तो ठीक है, कल पता नहीं क्या हो.’ हर स्वस्थ व्यक्ति यही सोच रहा था. किसी को जरा सी भी छींक या खांसी आने पर लोग उसे संदिग्ध दृष्टि से देखने लगते. कोई अपना मास्क सही करने लगता तो कोई दो फुट दूर सरक लेता. व्यक्ति से व्यक्ति के बीच अविश्वास की खाई बन गई.

मेघा भी अपने परिवार की सुरक्षा के लिए पूरी तरह सतर्क थी और फिलहाल अभी तक इस महामारी की चपेट में आने से सभी बचे हुए थे.

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम -भाग 3

दर्द से उसे यों तड़पता देख कर उस ने दूध मेज पर रखा तथा उस के पास ‘क्या हुआ’ कहती हुई आई. उस के आते ही उस ने हाथपैर ढीले छोड़ दिए तथा सांस रोक कर ऐसे लेट गया मानो जान निकल गई हो. वह बचपन से तालाब में तैरा करता था, अत: 5 मिनट तक सांस रोक कर रखना उस के बाएं हाथ का खेल था.

सुलेखा ने उस के शांत पड़े शरीर को छूआ, थोड़ा झकझोरा, कोई हरकत न पा कर बोली, ‘‘लगता है, यह तो मर गए…अब क्या करूं…किसे बुलाऊं?’’

मनीष को उस की यह चिंता भली लगी. अभी वह अपने नाटक का अंत करने की सोच ही रहा था कि सुलेखा की आवाज आई :

‘‘सुयश, हमारे बीच का कांटा खुद ही दूर हो गया.’’

‘‘क्या, तुम सच कह रही हो?’’

‘‘विश्वास नहीं हो रहा है न, अभीअभी हार्टअटैक से मनीष मर गया. अब हमें विवाह करने से कोई नहीं रोक पाएगा…मम्मी, पापा के कहने से मैं ने मनीष से विवाह तो कर लिया पर फिर भी तुम्हारे प्रति अपना लगाव कम नहीं कर सकी. अब इस घटना के बाद तो उन्हें भी कोई एतराज नहीं होगा.

‘‘देखो, तुम्हें यहां आने की कोई आवश्यकता नहीं है. बेवजह बातें होंगी. मैं नीलेश भाई साहब को इस बात की सूचना देती हूं, वह आ कर सब संभाल लेंगे…आखिर कुछ दिनों का शोक तो मुझे मनाना ही होगा, तबतक तुम्हें सब्र करना होगा,’’ बातों से खुशी झलक रही थी.

‘पहले दूध पी लूं फिर पता नहीं कितने घंटों तक कुछ खाने को न मिले,’ बड़बड़ाते हुए सुलेखा ने दूध का गिलास उठाया और पास पड़ी कुरसी पर बैठ कर पीने लगी.

मनीष सांस रोके यह सब देखता, सुनता और कुढ़ता रहा. दूध पी कर वह उठी और बड़बड़ाते हुए बोली, ‘अब नीलेश को फोन कर ही देना चाहिए…’ उसे फोन मिला ही रही थी कि  मनीष उठ कर बैठ गया.’

‘‘तुम जिंदा हो,’’ उसे बैठा देख कर अचानक सुलेखा के मुंह से निकला.

‘‘तो क्या तुम ने मुझे मरा समझ लिया था…?’’ मनीष बोला, ‘‘डार्लिंग, मेरे शरीर में हलचल नहीं थी पर दिल तो धड़क रहा था. लेकिन खुशी के अतिरेक में तुम्हें नब्ज देखने या धड़कन सुनने का भी ध्यान नहीं रहा. तुम ने ऐसा क्यों किया सुलेखा? जब तुम किसी और से प्यार करती थीं तो मेरे साथ विवाह क्यों किया?’’

‘‘तो क्या तुम ने सब सुन लिया?’’ कहते हुए वह धम्म से बैठ गई.

‘‘हां, तुम्हारी सचाई जानने के लिए मुझे यह नाटक करना पड़ा था. अगर तुम उस के साथ रहना चाहती थीं तो मुझ से एक बार कहा होता, मैं तुम दोनों को मिला देता, पर छिपछिप कर उस से मिलना क्या बेवफाई नहीं है.

‘‘10 महीने मेरे साथ एक ही कमरे में मेरी पत्नी बन कर गुजारने के बावजूद आज अगर तुम मेरी नहीं हो सकीं तो क्या गारंटी है कल तुम उस से भी मुंह नहीं मोड़ लोगी…या सुयश तुम्हें वही मानसम्मान दे पाएगा जो वह अपनी प्रथम विवाहित पत्नी को देता…जिंदगी एक समझौता है, सब को सबकुछ नहीं मिल जाता, कभीकभी हमें अपनों के लिए समझौते करने पड़ते हैं, फिर जब तुम ने अपने मातापिता के लिए समझौता करते हुए मुझ से विवाह किया तो उस पर अडिग क्यों नहीं रह पाईं…अगर उन्हें तुम्हारी इस भटकन का पता चलेगा तो क्या उन का सिर शर्म से नीचा नहीं हो जाएगा?’’

‘‘मुझे माफ कर दो, मनीष. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई,’’ सुलेखा ने उस के कदमों पर गिरते हुए कहा.

‘‘अगर तुम इस संबंध को सच्चे दिल से निभाना चाहती हो तो मैं भी सबकुछ भूल कर आगे बढ़ने को तैयार हूं और अगर नहीं तो तुम स्वतंत्र हो, तलाक के पेपर तैयार करवा लेना, मैं बेहिचक हस्ताक्षर कर दूंगा…पर इस तरह की बेवफाई कभी बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा.’’

उसी समय सुलेखा का मोबाइल खनखना उठा…

‘‘सुयश, आइंदा से तुम मुझे न तो फोन करना और न ही मिलने की कोशिश करना…मेरे वैवाहिक जीवन में दरार डालने की कोशिश, अब मैं बरदाश्त नहीं करूंगी,’’ कहते हुए सुलेखा ने फोन काट दिया तथा रोने लगी.

उस के बाद फिर फोन बजा पर सुलेखा ने नहीं उठाया. रोते हुए बारबार उस के मुंह से एक ही बात निकल रही थी, ‘‘प्लीज मनीष, एक मौका और दे दो…अब मैं कभी कोई गलत कदम नहीं उठाऊंगी.’’

उस की आंखों से निकलते आंसू मनीष के हृदय में हलचल पैदा कर रहे थे पर मनीष की समझ में नहीं आ रहा था कि वह उस की बात पर विश्वास करे या न करे. जो औरत उसे पिछले 10 महीने से बेवकूफ बनाती रही…और तो और जिसे उस की अचानक मौत इतनी खुशी दे गई कि उस ने डाक्टर को बुला कर मृत्यु की पुष्टि कराने के बजाय अपने प्रेमी को मृत्यु की सूचना  ही नहीं दी, अपने भावी जीवन की योजना बनाने से भी नहीं चूकी…उस पर एकाएक भरोसा करे भी तो कैसे करे और जहां तक मौके का प्रश्न है…उसे एक और मौका दे सकता है, आखिर उस ने उस से प्यार किया है, पर क्या वह उस से वफा कर पाएगी या फिर से वह उस पर वही विश्वास कर पाएगा…मन में इतना आक्रोश था कि वह बिना सुलेखा से बातें किए करवट बदल कर सो गया.

दूसरा दिन सामान्य तौर पर प्रारंभ हुआ. सुबह की चाय देने के बाद सुलेखा नाश्ते की तैयारी करने लगी तथा वह पेपर पढ़ने लगा. तभी दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा मनीष ने खोला तो सामने किसी अजनबी को खड़ा देख वह चौंका पर उस से भी अधिक वह आगंतुक चौंका.

वह कुछ कह पाता इस से पहले ही मनीष जैसे सबकुछ समझ गया और सुलेखा को आवाज देते हुए अंदर चला गया, पर कान बाहर ही लगे रहे.

सुलेखा बाहर आई. सुयश को खड़ा देख कर चौंक गई. वह कुछ कह पाता इस से पहले ही तीखे स्वर में सुलेखा बोली, ‘‘जब मैं ने कल तुम से मिलने या फोन करने के लिए मना कर दिया था उस के बाद भी तुम्हारी यहां मेरे घर आने की हिम्मत कैसे हुई. मैं तुम से कोई संबंध नहीं रखना चाहती…आइंदा मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’’

सुयश का उत्तर सुने बिना सुलेखा ने दरवाजा बंद कर दिया और किचन में चली गई. आवाज में कोई कंपन या हिचक नहीं थी.

वह नहाने के लिए बाथरूम गया तो सबकुछ यथास्थान था. तैयार हो कर बाहर आया तो नाश्ता लगाए सुलेखा उस का इंतजार कर रही थी. नाश्ता भी उस का मनपसंद था, आलू के परांठे और मीठा दही.

आफिस जाते समय उस के हाथ में टिफिन पकड़ाते हुए सुलेखा ने सहज स्वर में पूछा, ‘‘आज आप जल्दी आ सकते हैं. रीजेंट में बाबुल लगी है…अच्छी पिक्चर है.’’

‘‘देखूंगा,’’ न चाहते हुए भी मुंह से निकल गया.

गाड़ी स्टार्ट करते हुए मनीष सोच रहा था कि वास्तव में सुलेखा ने स्वयं को बदल लिया है या दिखावा करने की कोशिश कर रही है. सचाई जो भी हो पर वह उसे एक मौका अवश्य देगा.

कर्णफूल : क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना-भाग 3

अलीना बाजी के बेटे की सालगिरह फरवरी में थी. उन्होंने फोन कर के कहा कि वह अपने बेटे अशर की सालगिरह नानी के घर मनाएंगी. मैं और अम्मी बहुत खुश हुए. बडे़ उत्साह से पूरे घर को ब्राइट कलर से पेंट करवाया. कुछ नया फर्नीचर भी लिया. एक हफ्ते बाद अलीना आपी अपने शौहर समर के साथ आ गईं. घर के डेकोरेशन को देख कर वह बहुत खुश हुईं.

सालगिरह के दिन सुबह से ही सब काम शुरू हो गए. दोस्तोंरिश्तेदारों सब को बुलाया. मैं और अम्मी नाश्ते के बाद इंतजाम के बारे में बातें करने लगे. खाना और केक बाहर से आर्डर पर बनवाया था. उसी वक्त अलीना आपी आईं और अम्मी से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, ये लीजिए झूमर संभाल कर रख लीजिए और मुझे वे कर्णफूल दे दीजिए. आज मैं अशर की सालगिरह में पहनूंगी.’’

अम्मी ने मुझ से कहा, ‘‘जाओ मलीहा, वह डिबिया निकाल कर ले आओ.’’ मैं ने डिबिया ला कर अम्मी के हाथ पर रख दी. आपी ने बड़ी बेसब्री से डिबिया उठा कर खोली. लेकिन डिबिया खुलते ही वह चीख पड़ीं, ‘‘अम्मी कर्णफूल तो इस में नहीं है.’’

अम्मी ने झपट कर डिबिया उन के हाथ से ले ली. वाकई डिबिया खाली थी. अम्मी एकदम हैरान सी रह गईं. मेरे तो जैसे हाथोंपैरों की जान ही निकल गई. अलीना आपी की आंखों में आंसू आ गए थे. उन्होंने मुझे शक भरी नजरों से देखा तो मुझे लगा कि काश धरती फट जाए और मैं उस में समा जाऊं.

अलीना आपी गुस्से में जा कर अपने कमरे में लेट गईं. मैं ने और अम्मी ने अलमारी का कोनाकोना छान मारा, पर कहीं भी कर्णफूल नहीं मिले. अजब पहेली थी. मैं ने अपने हाथ से डिबिया अलमारी में रखी थी. उस के बाद कभी निकाली भी नहीं थी. फिर कर्णफूल कहां गए?

एक बार ख्याल आया कि कुछ दिनों पहले चाचाचाची आए थे और चाची दादी के जेवरों की वजह से अम्मी से बहुत जलती थीं. क्योंकि सब कीमती चीजें उन्होंने अम्मी को दी थीं. कहीं उन्होंने ही तो मौका देख कर नहीं निकाल लिए कर्णफूल. मैं ने अम्मी से कहा तो वह कहने लगीं, ‘‘मुझे नहीं लगता कि वह ऐसा कर सकती हैं.’’

फिर मेरा ध्यान घर पेंट करने वालों की तरफ गया. उन लोगों ने 3-4 दिन काम किया था. संभव है, भूल से कभी अलमारी खुली रह गई हो और उन्हें हाथ साफ करने का मौका मिल गया हो. अम्मी कहने लगीं, ‘‘नहीं बेटा, बिना देखे बिना सुबूत किसी पर इलजाम लगाना गलत है. जो चीज जानी थी, चली गई. बेवजह किसी पर इलजाम लगा कर गुनहगार क्यों बनें.’’

सालगिरह का दिन बेरंग हो गया. किसी का दिल दिमाग ठिकाने पर नहीं था. अलीना आपी के पति समर भाई ने सिचुएशन संभाली, प्रोग्राम ठीकठाक हो गया. दूसरे दिन अलीना ने जाने की तैयारी शुरू कर दी. अम्मी ने हर तरह से समझाया, कई तरह की दलीलें दीं, समर भाई ने भी समझाया, पर वह रुकने के लिए तैयार नहीं हुईं. मैं ने उन्हें कसम खा कर यकीन दिलाना चाहा, ‘‘मैं बेकुसूर हूं, कर्णफूल गायब होने के पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है.’’

लेकिन उन्हें किसी बात पर यकीन नहीं आया. उन के चेहरे पर छले जाने के भाव साफ देखे जा सकते थे. शाम को वह चली गईं तो पूरे घर में एक बेमन सी उदासी पसर गईं. मेरे दिल पर अजब सा बोझ था. मैं अलीना आपी से शर्मिंदा भी थी कि अपना वादा निभा न सकी.

पिछले 2 सालों में अलीना आपी सिर्फ 2 बार अम्मी से मिलने आईं, वह भी 2-3 दिनों के लिए. आती तो मुझ से तो बात ही नहीं करती थीं. मैं ने बहन के साथ एक अच्छी दोस्त भी खो दी थी. बारबार सफाई देना फिजूल था. खामोशी ही शायद मेरी बेगुनाही की जुबां बन जाए. यह सोच कर मैं ने चुप्पी साध ली. वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है. शायद ये गम भी हलका पड़ जाए.

मामूली सी आहट पर मैं ने सिर उठा कर देखा, नर्स खड़ी थी. वह कहने लगी, ‘‘पेशेंट आप से मिलना चाहती हैं.’’

मैं अतीत की दुनिया से बाहर आ गई. मुंह धो कर मैं अम्मी के पास आईसीयू में पहुंच गई. अम्मी काफी बेहतर थीं. मुझे देख कर उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आ गईं. वह मुझे समझाने लगीं, ‘‘बेटी, परेशान न हो, इस तरह के उतारचढ़ाव तो जिंदगी में आते ही रहते हैं. उन का हिम्मत से मुकाबला कर के ही हराया जा सकता है.’’

मैं ने उन्हें हल्का सा नाश्ता कराया. डाक्टरों ने कहा, ‘‘इन की हालत काफी ठीक है. आज रूम में शिफ्ट कर देंगे. 2-4 दिन में छुट्टी दे दी जाएगी. हां, दवाई और परहेज का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. ऐसी कोई बात न हो, जिस से इन्हें स्ट्रेस पहुंचे.’’

शाम तक अलीना आपी भी आ गईं. मुझ से बस सलामदुआ हुई. वह अम्मी के पास रुकीं. मैं घर आ गई. 3 दिनों बाद अम्मी भी घर आ गई. अब उन की तबीयत अच्छी थी. हम उन्हें खुश रखने की भरसक कोशिश करते रहे. एक हफ्ता तो अम्मी को देखने आने वालों में गुजर गया.

मैं ने औफिस जौइन कर लिया. अम्मी के बहुत इसरार पर आपी कुछ दिन रुकने को राजी हो गईं. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. अब अम्मी हलकेफुलके काम कर लेती थीं. अलीना आपी और उन के बेटे की वजह से घर में अच्छी रौनक थी.उस दिन छुट्टी थी, मैं घर की सफाई में जुट गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘बेटा, गाव तकिए फिर बहुत सख्त हो गए हैं. एक बार खोल कर रुई तोड़ कर भर दो.’’

अन्नामां तकिए उठा लाईं और उन्हें खोलने लगीं. फिर मैं और अन्नामां रुई, तोड़ने लगीं. कुछ सख्त सी चीज हाथ को लगीं तो मैं ने झुक कर नीचे देखा. मेरी सांस जैसे थम गईं. दोनों कर्णफूल रुई के ढेर में पड़े थे. होश जरा ठिकाने आए तो मैं ने कहा, ‘‘देखिए अम्मी ये रहे कर्णफूल.’’

आपी ने कर्णफूल उठा लिए और अम्मी के हाथ पर रख दिए. अम्मी का चेहरा खुशी से चमक उठा. जब दिल को यकीन आ गया कि कर्णफूल मिल गए और खुशी थोड़ी कंट्रोल में आई तो आपी बोलीं, ‘‘ये कर्णफूल यहां कैसे?’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. फिर रुक कर कहने लगीं, ‘‘मुझे याद आया अलीना, उस दिन भी तुम लोग तकिए की रुई तोड़ रहीं थीं. तभी मैं कर्णफूल निकाल कर लाई थी. हम उन्हें देख ही रहे थे, तभी घंटी बजी थी. मैं जल्दी से कर्णफूल डिबिया में रखने गई, पर हड़बड़ी में घबरा कर डिबिया के बजाय रुई में रख दिए और डिबिया तकिए के पीछे रख दी थी.

‘‘कर्णफूल रुई में दब कर छिप गए. कश्मीरी शाल वाले के जाने के बाद डिबिया तो मैं ने अलमारी में रखवा दी, लेकिन कर्णफूल रुई  में दब कर रुई के साथ तकिए में भर गए. मलीहा ने तकिए सिले और कवर चढ़ा कर रख दिए. हम समझते रहे कि कर्णफूल डिबिया में अलमारी में रखे हैं. जब अशर की सालगिरह के दिन अलीना ने तुम से कर्णफूल मांगे तो पता चला कि उस में कर्णफूल है ही नहीं. अलीना तुम ने सारा इलजाम मलीहा पर लगा दिया.’’

अम्मी ने अपनी बात खत्म कर के एक गहरी सांस छोड़ी. अलीना के चेहरे पर फछतावा था. दुख और शर्मिंदगी से उन की आंखें भर आईं. वह दोनों हाथ जोड़ कर मेरे सामने खडी हो गईं. रुंधे गले से कहने लगीं, ‘‘मेरी बहन मुझे माफ कर दो. बिना सोचेसमझे तुम पर दोष लगा दिया. पूरे 2 साल तुम से नाराजगी में बिता दिए. मेरी गुडि़या, मेरी गलती माफ कर दो.’’

मैं तो वैसे भी प्यारमोहब्बत को तरसी हुई थी. जिंदगी के रेगिस्तान में खड़ी हुई थी. मेरे लिए चाहत की एक बूंद अमृत के समान थी. मैं आपी से लिपट कर रो पड़ी. आंसुओं से दिल में फैली नफरत व जलन की गर्द धुल गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘अलीना, मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मलीहा पर शक न करो. वह कभी भी तुम से छीन कर कर्णफूल नहीं लेगी. उस का दिल तुम्हारी चाहत से भरा है. वह कभी तुम से छल नहीं करेगी.’’

आपी बोलीं, ‘‘अम्मी, आप की बात सही है, पर एक मिनट मेरी जगह खुद को रख कर सोचिए, मुझे एंटिक ज्वैलरी का दीवानगी की हद तक शौक है. ये कर्णफूल बेशकीमती एंटिक पीस हैं, मुझे मिलने चाहिए. पर आप ने मलीहा को दे दिए. मुझे लगा कि मेरी इल्तजा सुन कर वह मान गई, फिर उस की नीयत बदल गई. उस की चीज थी, उस ने गायब कर दी, ऐसा सोचना मेरी खुदगर्जी थी, गलती थी. इस की सजा के तौर पर मैं इन कर्णफूल का मोह छोड़ती हूं. इन पर मलीहा का ही हक है.’’

मैं जल्दी से आपी से लिपट कर बोली, ‘‘ये कर्णफूल आप के पहनने से मुझे जो खुशी होगी, वह खुद के पहनने से नहीं होगी. ये आप के हैं, आप ही लेंगी.’’

अम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा जब मलीहा इतनी मिन्नत कर रही है तो मान जाओ, मोहब्बत के रिश्तों के बीच दीवार नहीं आनी चाहिए. रिश्ते फूलों की तरह नाजुक होते हैं, नफरत व शक की धूप उन्हें झुलसा देती है, फिर खुद टूट कर बिखर जाते हैं.’’

मैं ने खुलूसे दिल से आपी के कानों में कर्णफूल पहना दिए. सारा माहौल मोहब्बत की खुशबू से महक उठा.???

गुप्त रोग: रूबी और अजय के नजायज संबंधों का कैसे हुआ पर्दाफाश – भाग 3

”हां, और आप भी समय पर दवाएं खाते रहिएगा. ज्यादा तलाभुना भी मत खाइएगा,” रूबी ने परेशानी के भाव चेहरे पर लाते हुए कहा.

रणबीर के आ जाने से कई दिनों तक रूबी और अजय सिंह मिल नहीं पा रहे थे. अब आज रणबीर के जाने के बाद उन्हें जी भर कर जिस्म का सुख उठाने का मौका मिलने वाला था.

रूबी के फोन करते ही अजय सिंह उस के घर आ गया और दोनों ही पूरी तरह सैक्स सुख लेने लगे. इन पूरे 2 दिनों में अजय सिंह रूबी के घर में ही रहा.

2 दिन के बाद रणबीर का फोन आया कि वह शहर में आ चुका है और घर पहुंचने वाला है. अजय सिंह यह जान कर वहां से निकल लिया.

रणबीर मुसकराते हुए घर आया. रूबी ने उस के गले लगते हुए कहा कि वह उस के लिए चाय बना कर लाती है.

चाय पीते समय रणबीर ने उसे बताया कि कल शाम को उसे गुजरात जाना है. रूबी ने सामने से तो हैरानी दिखाई, पर मन ही मन वह रणबीर के जाने की बात सुन कर बहुत खुश हो रही थी.

अगले दिन रणबीर गुजरात के लिए निकल गया.

रणबीर के जाने के करीब एक हफ्ते बाद उसे एक चिट्ठी मिली, जिसे पढ़ कर रूबी बुरी तरह चौंक गई :

‘मैं तुम्हारे और तुम्हारे उस ‘फ्रैंड’ के संबंधों के बारे में सबकुछ जान चुका हूं. मैं ने तुम्हें बहुत प्यार किया, पर तुम से बेवफाई ही मिली. अब मेरे पास तुम्हें तलाक देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है.

‘2 दिन के लिए बाहर जाने का बहाना कर के मैं ने तुम्हारे बैडरूम में कैमरा लगा कर तुम्हारी हकीकत जान ली है. मेरे पास गैरमर्द के साथ तुम्हारी सैक्स वीडियो भी है, जिस को मैं ने सोशल मीडिया में वायरल कर दिया है. जल्द ही तुम पूरे शहर में फेमस हो जाओगी और अब तुम अपने प्रेमी के पास चली जाना, क्योंकि मैं ने यह मकान भी बेच दिया है.’

चिट्ठी पढ़ कर रूबी सकते में आ गई थी. बदहवास हालत में वह अस्पताल जा कर अजय सिंह से मिलने पहुंची, पर वहां जा कर उसे पता चला कि उन दोनों का फूहड़ वीडियो सोशल मीडिया के द्वारा शहर में वायरल हो चुका है और बदनामी के डर से डाक्टर साहब ने उसे नौकरी से निकाल दिया है.

परेशान रूबी ने अजय सिंह को फोन लगाया.

‘तू ने मेरी ही सैक्स की वीडियो बना डाली और पूरे शहर में बदनामी करवा दी है, और इस के चलते मुझे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ गया है,’ अजय सिंह चीख रहा था.

‘बीवीबच्चों को भी मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया है और इन सब की जिम्मेदार सिर्फ तुम हो, पर, इतनी जिल्लत के साथ मेरा जी पाना बहुत मुश्किल है, इसलिए मैं यह दुनिया ही छोड़ कर जा रहा हूं,’ यह कह कर फोन कट गया था.

आतेजाते लोग रूबी को रोते हुए देख रहे थे. नौजवान लड़के और पान की दुकानों पर खड़े आदमी कभी मोबाइल की स्क्रीन पर देखते तो कभी रूबी के चेहरे की तरफ.

रूबी को उस की बेवफाई की सजा मिल गई थी.

 

15 अगस्त स्पेशल: फौजी के फोल्डर से एक सैनिक की कहानी – भाग 3

‘पर उस ने ऐसा कैसे किया. मैं ने सिर्फ और सिर्फ इसी समारोह के लिए कैमरा लिया था और उस ने सब बेकार कर दिया. अब दोबारा यह समय तो नहीं आएगा. मैं ने सोचा था जब आप लोग मेरे कंधे पर स्टार लगाओगे तो उस फोटो को मैं फ्रेम करवा कर ड्राइंगरूम में सजाऊंगा, मगर इस की गलती से सब बेकार हो गया.’

‘क्या बेकार हुआ बता. जा, तू अभी अपनी वरदी पहन. महिमा, तू पापा को बुला कर ला. हम अभी तेरे कंधे पर स्टार लगाते हुए तेरे साथ फोटो खिंचवा लेते हैं. अभी हम जिंदा ही हैं, मरे नहीं, कि दोबारा फोटो न खींच सकें.’

कितना सही कहा था मां ने. जब तक जीवन है, उम्मीद नहीं मरती. मगर जो चले गए इस जीवन से, उन के मातापिता की उम्मीदों का क्या? वे क्या उम्मीद रखें और किस से रखें? आजकल हर कोई अपनी बयानबाजी में जुट कर रोज ही अखबारों व टैलीविजन पर सुर्खियां बटोरने में लगा है. कोई कहता है किस ने इन्हें फौज जौइन करने को कहा था? तो कोई कुछ और.

किसी को आर्मी जौइन करने को कह कर तो देखो, तब पता चल जाएगा. किसी दूसरे के कहने से तो कोई जा भी नहीं सकता. हम अपने देशप्रेम के जज्बे के चलते मरमिटने के लिए ही वरदी पहनते हैं. भले ही हमारे परिवार की सहमति हो या न हो. वे हमें भेजना नहीं चाहते हों, मगर हमारी जिद से उन्हें झुकना भी पड़ता है और शहीद हो जाने का दर्द भी उन्हें ही झेलना होता है. और ये रातदिन बकवास करने वालों का क्या जाता है. अपनी राजनीति चमकाते रहने के अलावा सीखा ही क्या है? क्या वे मोहित की बहन के न सूखने वाले आंसुओं को समेट उन के भाई या बेटे की जिम्मेदारी निभाने जाएंगे? जब ऐसा कुछ भी कर नहीं सकते तो उन के घावों को कुरेदते क्यों हैं?

एक फोटो पर अचानक नजर पड़ते ही राघव अतीत की यादों से बाहर आ गया. उस की उंगलियां आगे बढ़ने से रूक गईं. महिमा के केक काटने की फोेटो थी. अरे, इसी महीने तो महिमा का जन्मदिन पड़ता है. ओह, वह तो सब भूल ही गया था. यहां नैटवर्क भी बहुत कमजोर है. कभी फोन लगता है, कभी नहीं. चलो, अभी मिला कर देखता हूं, मिल गया तो ऐडवांस में ही बधाईर् दे दूंगा.

फोन एक बार में ही मिल गया. तो राघव का मुंह खिल गया, मानो कोई गड़ा हुआ खजाना हाथ लग गया हो.

‘‘हैलो मां, प्रणाम, कैसी हैं आप?’’

‘‘खुश रहो बेटा,’’ आज कितनो दिनों के बाद आवाज सुनने को मिल रही है.’’

‘‘मां, जल्दी से महिमा को फोन दो… हैप्पी बर्थडे टू यू, हैप्पी बर्थ टू डिअर सिस, हैप्पी बर्थडे टू महिमा, हैप्पी…’’

‘‘बस, कर भाई. आज मेरा जन्मदिन नहीं है और तुम्हें उसी दिन ही फोन करना होगा. मैं आज की कौल को नहीं मानती.’’

‘‘अरे, मेरी बात तो सुनो…’’ फोन कट गया. राघव ने फिर कई बार फोन लगाने की कोशिश की मगर फोन नहीं लगा.

राघव फिर अतीत में खो गया. मेरी आवाज तो मेरे घर वालों ने सुन ही ली. फोन की समस्या के चलते घर वाले मेरा फोन हमेशा लाउडस्पीकर पर लगा कर ही बातचीत करते हैं पर क्या मोहित की बहन उस की आवाज कभी सुन पाएगी? और सोमेश की मां, क्या वे अपने इकलौते बेटे की आवाज सुनने का इंतजार अपनी बेबसी के आंसुओं में डूब कर न करती होंगी?

क्या करूं? कभी सोचता हूं मैं ही कुछ बात कर लूं उन के परिवारों से. मगर फिर सोचता हूं, कहीं उन के घाव मेरी आवाज सुन कर हरे न हो जाएं. इस से अच्छा छुट्टियों में उन के घर ही हो कर आऊंगा. मगर अभी तो सारी छुट्टियां ही कैंसिल हो गई हैं. ओह, छुट्टियों से याद आया कि कल हवलदार लोकेश सिंह का जन्मदिन था और वह कैसे अपने घर वालों को फोन पर मना रहा था.

‘अरे मां, मेरी तरफ से सब को आज ही पार्टी दे दो जन्मदिन की. जब छुट्टियों में घर आऊंगा तो फिर एक बढि़या पार्टी करूंगा. मेरे बच्चों को भी स्कूल के लिए टौफियां, चौकलेट दिला देना. और हां मां, छुटकी जब ससुराल से घर आए तो इस बार उसे एक अंगूठी दिलवा देना. मैं रुपए भेज रहा हूं. हर बार यही कहती है फोन पर कि, भतीजेभतीजी दोनों हो गए पर मुझे क्या मिला. और मां, बापू को शहर ले जा कर जांच करवा देना. बिन्नी कह रही हैं कि बापू की खांसी 2 महीने से बराबर बनी हुई है…’ न जाने कितनी बकबक करे जा रहा था आखिर में एक साथी ने बोल ही दिया, ‘अरे, बस कर. सारी कथा आज ही बांच लेगा क्या?’ एक सम्मिलित ठहाके के साथ सब अपने गमों को छिपा ले गए.

अचानक उसे याद आई कि आज नाइट शिफ्ट है और ड्यूटी का समय हो गया था. वह अतीत के पन्नों से बाहर निकल आया. रात के समय बौर्डर की सभी चौकियों की जानकारी लेना, सब की उपस्थिति देखना जैसे कई कार्य उस की ड्यूटी में शामिल हैं. आज राघव आधा घंटा पहले ही तैयार हो गया था, इसलिए लैपटौप खोल कर बैठा था. उस ने दीवारघड़ी पर नजर डाली और सोचा, बाहर गाड़ी आ गई होगी. उस ने लैपटौप को शटडाउन कर दिया और टेबल पर रखी कैप उठा कर पहन ली. तभी एक तेज धमाके ने पूरी इमारत को हिला कर रख दिया.

धमाका इतना तेज था कि टेबल पर रखा सामान नीचे बिखर गया. राघव तेजी से अपनी पिस्तौल को उठा बाहर को दौड़ पड़ा. बाहर का नजारा बड़ा हृदयविदारक था. उस की गाड़ी धमाके के साथ जल रही थी. ड्राइवर और सहायक धमाके के कारण गाड़ी से उछल कर दूर गिरे पड़े थे. चारों तरफ से सैनिकों ने अपनी पोजीशन संभाल ली. कुछ सैनिक दौड़ कर घायलों को गाड़ी में डाल कर सेना के स्वास्थ्य केंद्र को चले गए. 3 घंटे की अफरातफरी के बाद यह निष्कर्ष निकला कि धमाका पड़ोसी देश की सेना द्वारा किए गए मोर्टार हमले से हुआ है. जिस में

2 सैनिक शहीद हो गए. राघव फिर सोच में डूब गया, कल यही लोकेश अपने घर वालों की आंखों में कईर् सपने दिखा रहा था आज उन्हीं आंखों को सूना कर गया. आज लोकेश शांत हो गया है, कल इस से कहा भी था, ‘अरे, बस कर, सारी कथा आज ही बांच लेगा क्या.’ लेकिन, अब उस की कथा कौन पूरी करेगा?

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