जमीनी हकीकत से बहुत दूर हैं हवाई सेवाएं

सरकार को एहसास हो गया है कि देश की सड़कों और रेलों को सुधारना आसान काम नहीं है. आज सड़क बनाओ कल उस के किनारे मकानदुकानें बन जाएंगी और सड़क छोटी पड़ जाएगी. सड़कों को चाहे कैसे भी बना लें, उन में झील जितने बड़े गड्ढे बन ही जाएंगे. रेलों का हाल भी यही है. जितनी मरजी रेलें चला लो गरीब, फटेहाल पोटलियां लिए चले आएंगे. टिकट लें या न लें, पान की पीक जरूर डालेंगे. बदबू और गंदगी का आलम यह है कि अब शायद सूअरों और कुत्तों को भी यह जगह गंदी लगती है.

इसलिए अब सरकार करीब 50 छोटे एअरपोर्टों को ठीक कर रही है ताकि पैसे वाले लोग बिना गरीबों के साथ कंधे से कंधा मिलाए चल सकें और छोटे कसबों और शहरों के बाहर बन रहे आलीशान फ्लैटों में जा कर आराम से रह सकें. विकास के नाम पर देश को कई हिस्सों में बांटा जा रहा है और हवाई यात्रा करने वाले तो खास हैं ही.

औरतों को तो इन छोटे एअरपोर्टों से बहुत आराम रहेगा. मायका या ससुराल यदि ऐसे शहर में हो जहां एअरपोर्ट न हो, तो बड़ी कच्ची होती है. रिश्तेदार आने से कतराते हैं और कई बार बुलाने से भी कतराते हैं. ट्रेन, बस से आने वाली बेटीबहू को लेने गंदे स्टेशन या बस स्टैंड पर घंटों इंतजार करना पड़ता है और बदबू सहनी पड़ती है. हवाईअड्डा चाहे छोटा ही क्यों न हो, होगा तो खास लोगों के लिए ही न. गाड़ी पार्क करने की भी सुविधा है और स्नैक काउंटर भी अच्छा है.

हवाईअड्डों पर चोरीचकारी कम होती है. बस या रेल में अकेले बीवी, बेटी, बहू को भेजना एक आफत रहती है. मोबाइल होते हुए भी हादसे का डर लगा रहता है. फिर समय तो ज्यादा लगता ही है.

यह हो सकता है कि ट्रैफिक न होने के कारण इन छोटे हवाईअड्डों का बहुत लाभ न हो पर यदि जेब में पैसे हों तो छोटा हवाईजहाज किराए पर ले कर जाया जा सकता है. खर्च चाहे सैकड़ों की जगह लाखों में हो, शान तो रहती है. आज शान बघारना काम करने से ज्यादा इंपौर्टैंट है न.

हवाई सेवाएं विकास की निशानी हैं पर जमीनी हकीकत से दूर हैं. हमारे नेता, अफसर, बिजनैसमैन सब को बराबर का अवसर न मिले, इस की कोशिश में लगे रहते हैं और ऊंचनीच जो घरों में रसोई से चालू होती है, रगरग में बस गई है.

‘उसने पीछे से आकर मेरे ब्रेस्ट पकड़ लिये और फिर…’

अनिल कपूर की बेटी और जानी मानी अभिनेत्री सोनम कपूर ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि उनका सेक्सुअल ह्रासमेंट हुआ था. सोनम कपूर ने खुलासा किया कि उनके साथ बचपन में गलत हरकत हुई थी. हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में सोनम ने बताया कि थिएटर में पीछे से आकर एक शख्स ने मेरे ब्रेस्ट पकड़ लिए थे. उन्होंने इस बात का खुलासा राजीव मसंद के शो में किया, जिसमें उनके साथ विद्या बालन, अनुष्का शर्मा, आलिया भट्ट और राधिका आप्टे भी थीं. इंटरव्यू में सोनम ने जिस बेबाकी से अपने साथ हुई घटना को बताया, वो काफी चौंकाने वाला है.

सोनम कपूर ने बेहद खुले अंदाज में कहा कि 13-14 साल की उम्र में मेरे साथ यौन यौन शोषण हुआ था. सोनम ने बताया कि किस तरह से एक थियेटर में उनके ब्रेस्ट को गलत तरीके से पकड़ा गया था. सोनम ने बताया कि जब मैं 13 साल की थी तब मैं अपनी दोस्तों के साथ एक बार फिल्म देखने के लिए थियेटर गयी थी. उसी थियेटर में एक शख्स ने मुझे पीछे से पकड़ लिया. सोनम कपूर ने कहा कि जब मैं छोटी थी, मेरा यौन शोषण किया गया था. बचपन में किसी को भी निशाना बनाना काफी आसान होता है.

सोनम ने बताया कि मैं महज 13-14 साल की थी और मैं अक्षय और रवीना की एक फिल्म देखने के लिए थिएटर गयी थी. सोनम ने आगे बताया कि फिल्म के दौरान हमें समोसे खाने का मन हुआ और हम समोसे लेने बाहर स्टॉल पर आए. जब मैं वापस आ रही थी तभी एक शख्स ने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया. उसके दोनों हाथ मेरे स्तनों पर थे. मैं जैसे पत्थर की हो गई थी मेरी आंखों में आंसू थे.

कोई तो बताए कि ये धर्म डराता क्यों है

दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कालेज की छात्रा गुरमेहर कौर की दिलेरी की तारीफ करनी होगी. उस ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को चुनौती दे कर साबित कर दिया है कि 20 वर्षीय अनजान युवती भी कट्टर, हिंसक, कानून की परवाह न करने वाले शासकों से नहीं डरती जबकि बड़ेबड़े उद्योगपति, ऊंचे ओहदों पर बैठे अफसर, समाचारपत्रों के मालिक, लेखक, विचारक, छोटे दलों के नेता सरकार से डर कर दुबक जाते हैं.

यह दूसरी बात है कि गुरमेहर कौर अंतत: डर सी गई और फेसबुक व सोशल मीडिया पर अपना वीडियो वापस लेते हुए ट्वीट कर जालंधर लौट गई. उसे अपने गृहनगर में तंग नहीं किया जाएगा इस की गारंटी नहीं पर उस के पिता कैप्टन मंदीप सिंह का करगिल युद्ध में शहीद होने का कवच उस के काम आया वरना भगवाई ताकतें उसे जिंदा लाश बना देतीं.

हिंदू धर्म की रक्षा करने का अधिकार संवैधानिक अधिकार है पर यही अधिकार दूसरों का भी है कि वे सच को सच कहें. सच को कुचल कर एक छद्म समाज बना कर हलवापूरी और अपने लिए धन व सुविधाओं को जमा करना न तो राजनीतिक अधिकार है और न ही संवैधानिक अधिकार.

यह वही हिंदू धर्म है, जो औरतों की रक्षा न करने पर उन्हें जिंदा जलने को जौहर कह कर उन्हें मरने को उकसाता रहा है. यह वही धर्म है जिस में कैकेयी को खलनायक बना डाला जबकि दशरथ उस के पुत्रों को राज्य के बाहर भेज कर राम का राज्याभिषेक कराना चाह रहे थे. यह वही धर्म है जिस ने कुंती को मजबूर किया कि उसे पति से नहीं औरों से पुत्र पैदा करने पड़े.

इस तरह की बेईमानियों से हिंदू धर्म भरा पड़ा है. इस हिंदू धर्म को अब देशभक्ति का बुरका पहना कर जेहादीपन अपने लोगों पर ही थोपना और वह भी औरतों पर, धर्म की असलियत की पोल खोलता है. हर धर्म असल में सच से डरता है और गुरमेहर कौर ने यही कहने की कोशिश की है. चूंकि धर्म के ग्राहकों में औरतों की गिनती ज्यादा है, चाहे मलाला हो, वृंदा करात, अरुंधति रौय या गुरमेहर कौर, धर्म के दुकानदार अपनी आमदनी कम होते देख उन के पीछे पड़ जाते हैं.

गुरमेहर कौर ने हिम्मत दिखाई है. चाहे अब वह फिर घर में दुबक जाना चाहती है पर वह जता गई कि राज्य गृहमंत्री तक एक अदना 20 वर्षीय लड़की को कुचलने में किस तरह साजिश का हिस्सा बन सकते हैं. देश की सत्ता आज से ही नहीं, 1947 से ही हिंदू समाज के सुधारों का विरोध करती रही है. गुरमेहर कौर चाहे कुछ दिनों के लिए चर्चा में रहे पर उस ने बता दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी तक जिंदा है जब तक उसे इस्तेमाल करा जाए.

विकृत मानसिकता का आखिर ये कैसा है उदयन

हाल ही में बांकुड़ा की आकांक्षा शर्मा और भोपाल के उदयन दास के नाम सुर्खियों में आए हैं. उदयन ने अपनी प्रेमिका आकांक्षा शर्मा की हत्या से 4 साल पहले अपने मातापिता की भी दरिंदगी से हत्या कर उन्हें बगीचे में दफना दिया था. रोंगटे खड़े कर देने वाले इस हत्याकांड में उदयन दास गिरफ्तारी के बाद रोज नए खुलासे करता रहा. इस मामले ने दरिंदगी, झूठफरेब की हर सीमा को लांघ लिया है. पुलिस उदयन को साइकोपैथ किलर मान कर चल रही है और इस शातिर हत्यारे को उस के वकील पागल करार देने की जुगाड़ में हैं. भोपाल और बंगाल पुलिस की हिरासत में जिरह के दौरान इस हत्याकांड की जितनी बातें सामने आई हैं वे रोंगटे खड़ी कर देने वाली है. हाल के समय में इसे सब से नृशंस किस्म का हत्याकांड माना जा रहा है, संभवतया निर्भया कांड के बाद. बांकुड़ा के थाने में उदयन के खिलाफ आकांक्षा के पिता शिवेंद्र शर्मा ने दिसंबर में आकांक्षा के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी. उस के बाद मामले की एकएक परत खुलने लगी और 3 हत्याकांडों का खुलासा हुआ.

पुलिस का मानना है कि उदयन साइकोपैथ किलर यानी एक विकृत दिमाग का हत्यारा है. हताशा उस के भीतर घर कर गई है. बंगाल पुलिस का मानना है कि संभवतया मातापिता की हत्या के बाद उदयन ट्रौमा का भी शिकार हो गया. इसी कारण वह मानसिक रूप से संतुलित नहीं है. अकेले रहने से भी वह डरता था. गाड़ी चलाते हुए भी अगर उस के साथवाली सीट पर कोई नहीं हो तो एक टेडीबेयर को वह जरूर बिठाता, सीट बैल्ट के साथ. यही नहीं, साकेतनगर फ्लैट में विरला ही वह अकेला रहता. वह अवसाद से घिरा हुआ है. आकांक्षा हत्याकांड की पूरी कहानी है क्या. आइए, जानते हैं.

सोशल मीडिया जी का जंजाल

2007 में यानी 10 साल पहले सोशल नैटवर्किंग साइट और्कुट के जरिए उदयन और आकांक्षा का परिचय हुआ था. तब उदयन ने खुद को दिल्ली आईआईटी का ग्रेजुएट बताया था. दरअसल, वह भोपाल के स्कूल से महज 12वीं पास था. लेकिन आकांक्षा जयपुर में इलैक्ट्रौनिक की स्टूडैंट थी. एक साल बाद 2008 में उन का परिचय दोस्ती में बदला. दोनों की पहली मुलाकात जयपुर में हुई. आकांक्षा उदयन से मिलने अपने तत्कालीन प्रेमी को साथ ले कर आई थी. तब से दोनों एकदूसरे के साथ संपर्क में थे. इस के बाद 2014 में हावड़ा में आकांक्षा और उदयन मिले. हावड़ा में एक लौज में दोनों ने रात बिताई.

जनवरी 2015 में आकांक्षा दिल्ली गई. वहां उस ने एक किराए का फ्लैट लिया. इस फ्लैट में उदयन भी अकसर 3-4 दिनों के लिए आ कर रुकता. आकांक्षा भी उदयन के साथ रहने दिल्ली से देहरादून चली जाती थी. ये तमाम जानकारियां पश्चिम बंगाल पुलिस को उदयन से जिरह के तहत हासिल हुई हैं. लेकिन इन बातों की पुष्टि के लिए आकांक्षा अब जिंदा नहीं है.

लिवइन रिलेशन

बहरहाल, 2016 में आकांक्षा भोपाल में उदयन के साथ लिवइन में रहने लगती है. हालांकि उदयन का दावा है कि लिवइन रिलेशन से पहले भी आकांक्षा उदयन से मिलने भोपाल आया करती थी. पर जून से दोनों लिवइन रिलेशन में थे. उदयन ने बंगाल पुलिस को बताया कि महज 17 दिनों के बाद जुलाई महीने में आकांक्षा के साथ संबंध में गड़बड़ी तब शुरू हुई जब उस ने आकांक्षा के फोन पर उस के पूर्व प्रेमी का टैक्स्ट मैसेज देखा. दोनों के बीच जम कर झगड़ा शुरू हुआ और यह अकसर होने लगा.

जुलाई में ही एक दिन चिकचिक के दौरान उदयन ने आकांक्षा का गला दबा कर उसे मार डाला. इस के बाद मृत आकांक्षा का गला रेत कर उस ने लाश को 5 फुट बाई 3 फुट के एक ट्रंक में भर कर किचन में ही रखा. इस के बाद लाश को कंक्रीट में तबदील करने के इरादे से आकांक्षा की लाश के साथ सीमेंट डाल कर दफनाया था. इस कारण लाश निकालने के लिए पुलिस को 3-3 ड्रिल की मदद लेनी पड़ी. 7-8 घंटे की बड़ी मशक्कत के बाद आकांक्षा के देहावशेष को सीमेंट से अलग किया जा सका.

अब जहां तक उदयन की कमाई का सवाल है तो जिरह में उस ने बताया कि उस के मातापिता का एक फ्लैट था दिल्ली की डिफैंस कालोनी में. इस फ्लैट से 10 हजार रुपए हर महीना किराया मिलता था. इस के अलावा रायपुर में भी एक फ्लैट से हर महीने 7 हजार रुपए और भोपाल में एक फ्लैट से 5 हजार रुपए किराया मिलता था. पिता के 8 लाख रुपए फिक्स्ड डिपौजिट से भी ब्याज मिलता था. साथ में, अपने मृत माता-पिता की पैंशन भी वह उठाता था.

बारबार बदलते बयान

हालांकि जिरह के दौरान वह बारबार अपना बयान बदलता रहा. उस के मातापिता भी लंबे समय से लापता थे. पर उस ने पहले पुलिस को बताया कि उस की मां इंद्राणी रायपुर की ही थीं और पिता हावड़ा के एक बंगाली परिवार से थे. उन की लवमैरिज थी. लेकिन उदयन का जन्म और पालनपोषण रायपुर और भोपाल में ही हुआ.

उदयन ने पुलिस को बताया कि उस की मां इंद्राणी दास अमेरिका में हैं और वहीं से वे उसे पैसे भेजती हैं. जब उस से मां का फोन नंबर मांगा गया तो वह आनाकानी करने लगा. उस ने पुलिस को बताया कि उस के पिता डी के दास बीएचईएल यानी भेल में फोरमैन थे. रिटायर होने के बाद वे एक कारखाना चलाते थे. 2010 में दिल का दौरा पड़ने से उन का देहांत हो गया. जबकि सचाई यह थी कि 2010 में ही उस ने छत्तीसगढ़ के रायपुर के मकान में मातापिता दोनों की हत्या कर दी थी. अगले ही दिन उन की लाश को बगीचे में दफन कर दिया था. इस के बाद फर्जी पावर औफ अटौर्नी के बल पर उस मकान को उस ने बेच भी दिया.

कड़ी जिरह में उदयन ने हत्या की बात को कुबूल किया. इस के बाद उदयन को पुलिस छत्तीसगढ़ के रायपुर ले कर गई. बड़े ही निर्विकार भाव से पुलिस को उदयन ने बगीचे में मातापिता की लाशों के ठिकाने को दिखा दिया, जहां से उदयन के मातापिता के देहावशेष मिले हैं.

झूठ व फरेब का पिटारा

उदयन इंजीनियरिंग कालेज में भरती हुआ था पर फेल हो गया. उस ने घर पर किसी को यह नहीं बताया. पढ़ाई का खर्च लेता रहा. इसी तरह फर्जी इंजीनियरिंग के जब 5 साल बीत गए तो मातापिता ने उस पर नौकरी करने का दबाव बनाना शुरू किया. इस को ले कर लगभग हर रोज मातापिता से उस का झगड़ा होता. ऐसे ही झिकझिक के बीच पहले गला दबा कर मां इंद्राणी दास को मारा. उस समय पिता घर पर नहीं थे. वे मीट लेने बाजार गए हुए थे.

जब कभी डी के दास कहीं बाहर से घर लौटते थे तो बगैर दूध की चाय जरूर पीते थे. उस दिन बाजार से घर लौटते ही उदयन ने बाहर के कमरे में पिता को नींद की दवा मिला कर चाय पीने के लिए दे दी, जिसे पी कर वे अचेत हो गए. तब बेहोशी में ही पिता की गला दबा कर उस ने हत्या की. उस समय घर पर मरम्मती का काम भी चल रहा था. उदयन ने 500 रुपए दे कर राजमिस्त्री से कुदाल वगैरा मंगवाया. उसी रात उस ने बगीचे में गड्ढा खोदा और दोनों लाशों को दफना दिया.

हत्या के बाद एक साल तक मां की पैंशन की रकम वह उठाता रहा. इस के लिए उस ने फर्जी ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ दिखाया था. लेकिन आगे चल कर पैंशनभोगियों के लिए नियम बदल गया और अब पैंशनभोगी को सशरीर हाजिर हो कर पैंशन उठाना अनिवार्य हो गया. जाहिर है तब पैंशन की रकम उठाना मुमकिन नहीं था. तब उस ने होशंगाबाद से मां का फर्जी डैथ सर्टिफिकेट बनवाया.

पुलिस का मानना है कि चूंकि लंबे समय तक उदयन अपने नातेरिश्तेदारों के संपर्क में नहीं था, इसीलिए उस के मातापिता को ले कर किसी को कोई सिरदर्द भी नहीं हुआ. इस बीच, उस ने अपने नाम की पावर औफ अटौर्नी बनवा कर रायपुर वाला मकान बेचा और भोपाल चला आया.

उदयन के झूठ की भी फेहरिस्त बड़ी लंबी है. अपने कुछ परिचितों के बीच उस ने अपना परिचय आईएफएस यानी इंडियन फौरेन सर्विस के अधिकारी के रूप में दे रखा था. उस ने बताया था कि वह वाशिंगटन में बराक ओबामा से मिल चुका है. ट्रंप के साथ भी एक बार डिनर कर चुका है.

पुलिस का कहना है कि जांच में उस के कम से कम 40 फेसबुक प्रोफाइल्स का पता चला है. उदयन वन रिखथोफेन मेहरा, निखिल अरोड़ा मुखर्जी, पुशकिन स्टैसजियुस्का और रायनासोल जैसे प्रोफाइलों का पता चला. वह फेसबुक में नएनए प्रोफाइल बना कर नएनए फ्लैट और नई गाडि़यों की तसवीरें पोस्ट किया करता था. इन फेसबुक अकाउंट में उस ने झूठ का एक साम्राज्य स्थापित कर रखा था. किसी फेसबुक में वह खुद को राष्ट्रसंघ का कर्मचारी बताता तो किसी में अमेरिकी विदेश विभाग का. यहां तक कि न्यूयौर्क विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में डौक्टरेट का भी झूठ उस ने परोसा था. जहां तक शिक्षा का सवाल है तो वह दिल्ली आईआईटी का ग्रेजुएट बताता रहा है. पुलिस का मानना है कि आकांक्षा उस के ऐसे ही किसी झांसे में आ गई थी. इतना ही नहीं, उस के साकेतनगर फ्लैट से कई देशों के झंडे भी पुलिस ने जब्त किए हैं. अकसर वह फोन पर लोगों से विदेश में होने की बात कहता था. और भी बहुतकुछ झूठ व प्रपंच का खुलासा हुआ है.

आकांक्षा का फरेब जानलेवा

अब बात करते हैं आकांक्षा के फरेब की. आकांक्षा के मातापिता पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा निवासी हैं. एक राष्ट्रीयकृत बैंक में चीफ मैनेजर आकांक्षा के पिता शिवेंद्र शर्मा बताते हैं कि जयपुर से इलैक्ट्रौनिक्स इंजीनियरिंग के बाद जून 2016 को आकांक्षा घर लौटी. यूनिसेफ का नियुक्तिपत्र दिखा कर आकांक्षा ने बताया कि नौकरी के लिए दिल्ली होते हुए अमेरिका जा रही है. लेकिन उस नियुक्तिपत्र में वेतन का कोई जिक्र न था. इस से उन को (बैंक मैनेजर पिता शिवेंद्र शर्मा को) खटका लगा. पूछने पर बेटी ने बताया, ‘अमेरिका जाने के बाद वेतन फिक्स होगा.’

सहज मन से उन्होंने मान लिया. जून में वह रवाना हुई. घर से निकलने के कुछ दिनों के बाद आकांक्षा ने फोन कर के बताया कि वह अमेरिका पहुंच गई हैं. जबकि सच तो यह था कि वह अमेरिका गई ही नहीं थी. हालांकि बीचबीच में व्हाट्सऐप पर ही मातापिता से बातें करती थी और जल्द ही अमेरिकी सिम मिलने पर फोन करने का वादा करती.

कई बातों से शर्मा परिवार की चिंता बढ़ी. मां शशिबाला ने आकांक्षा को मैसेज किया था कि वह अपना एक सैल्फी भेजे और फोन पर बात करे. जवाब आया कि अमेरिकी सिम अभी तक नहीं मिला है, मिलते ही फोन करेगी. लेकिन नवंबर तक दोनों में से कुछ भी नहीं किया आकांक्षा ने. एक बार तो आकांक्षा के भाई ने एक जुगत लगा कर उसे मैसेज किया कि पिता को दिल का दौरा पड़ा है, पैसों की जरूरत है, जल्द भेजो. गौरतलब है कि शिवेंद्र्र के सीने में पेसमेकर लगा हुआ है. जवाब आया कि वह घर आ रही है. यह नवंबर के आखिर में हुआ.

नवंबर 2016 को मैसेज किया कि वह दिल्ली से हावड़ा तक पहुंच चुकी है. लेकिन फिर अचानक घर आए बगैर वह लौट गई. उस ने मैसेज किया कि उसे अमेरिका वापस जाना पड़ रहा है. शर्मा दंपती को व्हाट्सऐप पर ही यह मैसेज मिला. हैरानी तो हुई, पर उस की नौकरी के बारे में सोच कर उन लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इस के बाद आकांक्षा के फोन से व्हाट्सऐप मैसेज आया कि यूनिसेफ में सेवारत उस का दोस्त उदयन घर जा रहा है. 2 दिन वहीं ठहरेगा.

मां शशिबाला शर्मा कहती हैं कि आज यह सब सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि अपनी ही बेटी के हत्यारे उदयन के साथ बांकुड़ा में वे 2 रात गुजार चुकी हैं. उदयन का नाम आकांक्षा से पहले ही शर्मा दंपती सुन चुके थे. उदयन आया और हिंदी, अंगरेजी व बांग्ला भाषा में आराम से बातें करता था. उस ने कहा कि दिल्ली में वह आकांक्षा के मातापिता और भाई आयुष को अमेरिका ले जाने के लिए वीजा का बंदोबस्त करेगा.

दुर्गापूजा के बाद दिल्ली पहुंच कर उसे फोन करने की बात कह कर गया. उस की बातों में आ कर पूजा के बाद शर्मा परिवार दिल्ली गया भी. लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी उदयन ने उन का फोन नहीं उठाया. न ही वह आ कर मिला. तब शर्मा परिवार को थोड़ा शक हुआ. उन्होंने बेटी आकांक्षा को व्हाट्सऐप पर इस की जानकरी भी दी. जवाब में आकांक्षा ने लिखा कि उदयन की हत्या हो गई है. वह उस की मां से मिलने भोपाल जा रही है. शर्मा परिवार हैरान हुआ.

शक के बीज

शक का एक और कारण यह था कि उन की बेटी आकांक्षा के घर से जाने के बाद एकाध बार ही फोन पर बात हुई. लंबे समय से व्हाट्सऐप के जरिए या एसएमएस के जरिए बातें होतीं. फोन पर बात न होने से शक गहराने लगा. उधर आकांक्षा के बैंक अकाउंट से मोटीमोटी रकम निकलती जा रही थी. यह रकम उस के ब्याह के लिए जमा की गई थी. शर्मा दंपती को आशंका होने लगी. फोन पर बात करने की लाख कोशिश करने के बाद भी सफलता नहीं मिली.

5 दिसंबर, 2016 को बांकुड़ा में आकांक्षा के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई. जांच में आकांक्षा के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रैस की गई तो वह भोपाल के साकेतनगर में पाई गई. आकांक्षा के पिता शिवेंद्र और भाई आयुष भोपाल पहुंच गए. पर लाख दरवाजा पिटने पर भी वह नहीं खुला. आकांक्षा के पिता और भाई ने गोविंदपुरा थाने में मौखिक शिकायत की.

इस के बाद गोविंदपुरा पुलिस उस के साकेतनगर ठिकाने पर जब कभी गई, वहां ताला लगा मिला. फिर एक दिन अचानक उदयन थाने पहुंच गया. उस ने बताया कि आकांक्षा से ब्याह का सर्टिफिकेट थाने के पते पर उस ने पोस्ट कर दिया है, 1-2 दिनों में मिल जाएगा. पुलिस के मन से शक दूर करने के लिए आकांक्षा के नाम से एक पत्र पुलिस थाने में भेजा. जिस में कहा गया था कि वह बालिग है और अपनी मरजी से उदयन से ब्याह कर साकेतनगर में रह रही है. इस बयान के बाद पुलिस के मन में शक की कोई गुंजाइश नहीं रही.

अब पश्चिम बंगाल पुलिस का मानना है कि आकांक्षा की हत्या उदयन ने जुलाई में ही कर दी थी. आकांक्षा के मोबाइल पर व्हाट्सऐप और फेसबुक को उदयन खुद ही हैंडिल कर रहा था. उस ने आकांक्षा की फेसबुक से उस के भाई को ब्लौक कर दिया था. व्हाट्सऐप पर बहन से आयुष ने इस बारे में पूछा तो उसे  बताया गया कि अपना फेसबुक प्रोफाइल अकाउंट ही उस ने डिसेबल कर दिया है.

यहां तक कि आकांक्षा का बैंक अकाउंट भी उदयन हैंडिल कर रहा था. शर्मा दंपती का कहना है कि उन की बेटी के 2 अकाउंट थे. एक अकाउंट से एक लाख 20 हजार रुपए तक निकाले गए. यह निकासी आकांक्षा की हत्या के बाद भी हुई. आकांक्षा का एक और अकाउंट था, जिस में लगभग 16 लाख रुपए थे.

आकांक्षा के मामा राजेश सिंह का कहना है कि यह अकाउंट आकांक्षा के ब्याह के लिए था. हो सकता है एक बैंक अकाउंट का पिन नंबर उदयन जान गया हो, इसीलिए आकांक्षा की हत्या हो जाने के बाद भी उस अकाउंट से पैसे निकाले गए. दूसरे अकाउंट का पिन नंबर जानने के लिए उदयन ने दबाव बनाना शुरू किया हो और इस में उसे कामयाबी न मिली हो तो उस ने आकांक्षा की हत्या कर दी हो. राजेश सिंह का यह भी कहना है कि हो सकता है बड़े ही सरल मन से आकांक्षा ने फेसबुक में उदयन को अपने बैंक अकाउंट के बारे में पहले ही बता दिया हो.

उदयन जैसे कई हैं

आकांक्षा प्रकरण से याद आता है कि प्रेम, जनून और हत्या की घटनाएं पहले भी कई अलगअलग रूपों में देखी गई हैं जहां 2 प्रेमी मिलते हैं फिर कुछ ऐसे घटनाक्रम बनते हैं कि जिस में मांबाप समेत अन्य सगेसंबधियों तक की जान पर बात बन आती है.

1835 में फ्रांस में किसान परिवार के पियेरे रिविएरे नामक युवक द्वारा हंसिए से अपनी मां, बहन और छोटे-से भाई की दरिंदगी से हत्या किए जाने का मामला प्रकाश में आया था. अंत में उस ने आत्मसमर्पण कर दिया. अपने हलफनामा में पियेरे ने कहा कि अपने पिता को ‘क्लेश’ से मुक्ति देने के लिए उस ने ये हत्याएं की.

उस समय की इन 3 हत्याओं की घटना ने तत्कालीन समाज को झकझोर कर रख दिया था. यह वारदात लंबे समय तक समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के लिए चर्चा, विश्लेषण व शोध का विषय रही. उस समय मनोविश्लेषकों ने पियेरे को पेरीसाइड नामक मनोविकार से ग्रस्त बताया था. इस के बाद 1973 में फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फुको ने पियेरे के हलफनामा को आधार बना कर एक किताब लिख डाली. इस के बाद 1976 में फुको की किताब पर फ्रांस में एक फिल्म भी बनी. आज उदयन दास का मामला भी मनोविज्ञान के लिए चर्चा का विषय बन गया है.

ऐसे ही अन्य कुछ मामलों के बारे में जानते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि इस विकृत मानसिकता के पीछे का मनोवैज्ञानिक सच क्या होता है. इन सभी मामलों के केंद्रीय चरित्र की पहचान बदल दी गई है. इन की चरणबद्ध काउंसलिंग चल रही है.

मामला-1 : मां एक प्रख्यात स्कूल में प्रिंसिपल, पिता केंद्रीय शोध संस्थान में वैज्ञानिक. मातापिता की तरह उन का एकमात्र बेटा अभिजीत (बदला हुआ नाम) भी कुछ कम नहीं. वह मेधावी है. पढ़ाई के दौरान ही अमेरिका की एक बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी में नौकरी मिल गई. फिर उस का ब्याह हुआ.

धीरेधीरे अभिजीत एकदम से बदल गया. शुरुआत कुछ इस तरह हुई–एक दिन मां की कोई बात खल गई तो आव देखा न ताव, सीधे हाथ छोड़ दिया. फिर माफी भी मांगी. लेकिन यही बात कुछ दिनों के बाद उस ने फिर दोहराई. एक दिन ऐसा हुआ कि पिता की बात उसे नागवार लगी तो पिता को जोर से धक्का दे दिया. ऐसी हर हरकत के बाद वह गिड़गिड़ा कर माफी मांगने लगता. मातापिता उसे माफ कर देते. लेकिन यह सिलसिला कभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि शुरू हो गया था. घर की इज्जत का खयाल करते हुए मातापिता ने कोई कड़ा कदम नहीं उठाया. सिर्फ बेटे से बोलचाल बंद कर दी.

लोग बताते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी उसे ले डूबी. सभ्यसुसंस्कृत लड़के में धीरेधीरे बदलाव आने लगा, जो महल्ले व पड़ोसियों को भी नजर आने लगा था. बेटे के अनियंत्रित गुस्से का डर मातापिता के मन में बैठ गया. एक दिन किसी पड़ोसी के सुझाव पर पीडि़त मातापिता मनोचिकित्सक से मिलने गए. किसी बहाने बेटे को मनोचिकित्सिक से मिलावाया. हालांकि बेटे को पता नहीं था कि वह किसी मनोचिकित्सक से बात कर रहा है. बहरहाल, मनोचिकित्सक ने लंबी बातचीत की.

मनोचिकित्सक का कहना है कि अभिजीत बाईपोलर अफैक्टिव डिसऔर्डर का मरीज है. उस के स्वभाव में बदलाव के पीछे उस का मेधावी होना ही है. कैसे? स्कूल के दिनों से वह अव्वल रहा है. स्कूली पढ़ाईलिखाई से ले कर कैरियर तक के सफर में नाकामी कभी उस ने देखी नहीं है. अब वह खुद को सब से ऊपर देखने का आदी हो चुका है. अपने आगे मांबाप तक को वह कुछ नहीं समझने लगा. यही कारण है अपने मन के खिलाफ होने वाली बातें उसे नागवार लगती हैं. कामयाबी उस की आदत में शुमार हो गई है. ‘न’ को वह बरदाश्त नहीं कर सकता और उस का गुस्सा बेकाबू हो जाता है.

मामला-2 : कौशिक के पिता एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में हैं. मां हाउसवाइफ हैं. कौशिक एक नामी स्कूल में 9वीं का छात्र है. मातापिता की एकमात्र संतान है. एक दिन बेटे के कमरे में सिरहाने एक बड़ा सा चाकू देख कर मां के होश उड़ गए. 2 दिनों पहले किसी बात पर गुस्सा हो कर कौशिक मां पर चाकू तान चुका है. पर पिता को इस बात की खबर नहीं थी. अब जब बेटे की खबर ली तो पता चला, आजकल कौशिक ड्रग माफिया के चक्कर में पड़ गया है.

बेटे की काउंसलिंग के दौरान कौशिक ने बताया कि ड्रग माफिया के आगे उसे अपने ‘गट्स’ को साबित करना था. इस के लिए वह एक अदद हत्या कर के दिखा देना चाहता था. ऐसी सोच के तह में जाने के लिए मनोचिकित्सक ने मातापिता से भी बात की. पता चला, इस परिवार में मातापिता के बीच संबंध बहुत स्वाभाविक नहीं थे. दोनों के बीच अकसर कहासुनी होती रही है. इस का असर कौशिक पर पड़ता रहा है और उस के आत्मविश्वास में कमी आती गई. पर वह अपनेआप को साबित करना चाहता था.

ऊपर कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया है, उन से साफ है कि आज के युवासमाज में कुछ खास तरह के मनोविकार के लक्षण पैदा हो रहे हैं. कोलकाता के जानेमाने मनोचिकित्सक डा. ए डी महापात्र का कहना है कि जिस पैमाने पर आएदिन ऐसे मामले उन की क्लीनिक में आ रहे हैं, उस से साफ है हमारे समाज में कई उदयन हैं. आज नहीं तो कल, हमारे अड़ोसपड़ोस या हमारे अपने ही घरोंपरिवारों में ऐसा मामला देखने को मिल जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए. हम जो कर सकते हैं वह यह है कि समय रहते सचेत हो जाएं.

किशोरों में मनोविकार के लक्षण

डा. महापात्र कहते हैं कि आधुनिक जीवनशैली कई किस्मों की समस्याएं पैदा कर रही है, खासतौर पर किशोर उम्र के बच्चों में इस का अधिक प्रभाव पड़ रहा है. कभी घर पर मातापिता के बीच अकसर बातबतंगड़ से घर का माहौल खराब होता है तो कभी जबरन आधुनिक जीवनशैली अपनाने की जद्दोजेहद सरल जीवनयापन को प्रभावित करती है. वहीं, इंटरनैट और सोशल मीडिया के जरिए वर्चुअल वर्ल्ड में जरूरत से ज्यादा सक्रियता समस्या पैदा करती है. इन वजहों से किशोरवय बच्चों में बड़ी तेजी से मूड स्विंग होता है.

आएदिन युवा समाज की सनक अखबारों की सुर्खियां बन रही है. इस पीढ़ी में सनक किसी भी चीज को ले कर हो सकती है. स्मार्टफोन और इंटरनैट में व्यस्त रहना, घंटों फेसबुक व ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में लगे रहना, जानेअनजाने लोगों से दोस्ती के नाम पर देररात तक चैटिंग करना, वौयसकौल व वीडियोकौल में लगे रहना, घंटों वीडियो देखना, पार्टी और क्लबों में जीवन का सुख ढूंढ़ना, रईस जीवनशैली अपनाने की ललक, तुरतफुरत पैसे कमाने के लिए अपराध करने से भी नहीं हिचकना जैसी समस्याओं से अभिभावक रूबरू हो रहे हैं.

मातापिता या अभिभावक की रोकटोक इन्हें बरदाश्त नहीं. ऐसी स्थिति में ये आपे से बाहर हो जाते हैं. कभीकभार मनचाही मुराद पाने के लिए वे झूठ, प्रपंच और फरेब का सहारा लेते हैं. उदयन के मामले में पता चला कि वह 40-40 फेसबुक अकाउंट्स झूठ और फरेब के साथ हैंडिल करता था. अब जरा सोचिए इन फेसबुक अकाउंट्स में जो फ्रैंड्स होंगे, क्या उन्होंने कभी सोचा भी होगा कि उन का एक फेसबुक फ्रैंड ऐसा दरिंदा हो सकता है या हत्यारा हो सकता है. अकेले उदयन की बात जाने भी दें तो यह भी तथ्य है कि हर दिन झूठे परिचय के बल पर, अपनी असली उम्र और लिंग छिपा कर हजारों अकाउंट्स खोले जाते हैं.

सर्वे के चौंकाने वाले नतीजे

कुछ समय पहले टाटा कंसलटिंग सर्विस की ओर से हमारे देश के 15 शहरों में 8वीं से ले कर 11वीं तक के लगभग 11 हजार किशोरकिशोरियों के बीच एक सर्वे कराया गया था. सर्वे का नतीजा बताता है कि हमारे देश में हर 3 फेसबुक फ्रैंड्स में से एक अनजान होता है. स्कूल स्टूडैंट्स की फेसबुकों में 40 प्रतिशत ऐसे फ्रैंड्स होते हैं, जिन्हें वे निजी तौर पर कतई नहीं जानते. लेकिन ये ‘वर्चुअल फ्रैंड्स’ ही इन के लिए सबकुछ हैं. टीनएजर के बीच फेसबुक फ्रैंड्स की गिनती में भी होड़ चलती है. जिन के फ्रैंड्स की लिस्ट जितनी लंबी, उस का उतना ही बड़ा रुतबा. यही कारण है देशीविदेशी कोई भी फ्रैंड्स रिक्वैस्ट आई नहीं, कि तुरंत ‘ऐक्सैप्ट’ कर दिया.

सर्वे यह भी बताता है कि देश के ज्यादातर शहरों में टीनएजर की फ्रैंड्स लिस्ट में महज 10 प्रतिशत पारिवारिक सदस्य और दूसरे सगेसंबंधी होते हैं. जब कि 90 प्रतिशत अनजान लोग होते हैं.  जाहिर है बांकुड़ा की आकांक्षा के मामले में भी ऐसा ही हुआ. आकांक्षा ने अनजान उदयन के झूठ को परखे बिना अधिक भरोसा किया. और घरवालों से झूठ बोल कर मनोविकार से ग्रस्त उदयन पर आंखें मूंद कर भरोसा करने का खमियाजा उसे अपनी जान दे कर चुकाना पड़ा.

अब सवाल है कि पैसों के लालच में ही उदयन ने आकांक्षा की हत्या की? शर्मा दंपती का कहना है कि हो सकता है इस बीच आकांक्षा को उदयन के मातापिता की हत्या की खबर लग गई हो, इसलिए उदयन ने उस की हत्या कर दी गई हो. असल

बात कुछ भी हो, जिस तरह से उदयन ने 3-3 हत्याओं को अंजाम दिया, उस से यह सबक जरूर लेना चाहिए कि सोशल मीडिया के प्रति सहज होना जरूरी है. यहां हर तरह की सूचनाएं, खासतौर पर निजी सूचनाएं नहीं देनी चाहिए. और, सोशल मीडिया की तमाम सूचनाओं पर आंख मूंद कर भरोसा करने से बचना भी चाहिए.

नरेंद्र मोदी की सरकार है मतलबी सरकार

‘कम्युनिस्टों की बात तो आप करें नहीं. वो कहीं नहीं हैं.’ उन्होंने कहा और हमने मान लिया. हमारा यह मानना चुनावी समर और दलगत आधार पर है. आम जनता को अपने पक्ष में मतों में बदलने से है. हमारी सहमति उन्हें अच्छी लगी. आगे भी उन्होंने जो कहा वह भी मानने लायक बात थी, कि ‘लोगों ने नरेन्द्र मोदी पर विश्वास किया है.’ यह विश्वास इस डोर से बंधी हुई है कि ‘जैसे सबको देखा, वैसे ही एक बार इनको भी देख लेते हैं.’ यह देखने की हवा 2014 से चल रही है.

देश की आम जनता इस बात को नहीं जानती कि ‘सब को देखने और इनको देखने का क्या मतलब है?’ उसके लिये यह मानी हुई बात है, कि देश में लोकतंत्र है और चुनाव से सरकारें बदली जा सकती हैं. उन्हें नहीं पता कि ‘ऐसा नहीं भी हो सकता है.’ उसने इस व्यवस्था को बदलने की बात अब तक सोची ही नहीं. उन्हें इस बात की पक्की जानकारी ही नहीं है, कि ऐसी कोई सरकार भी बनती है, जो जन समस्याओं का समाधान करती है. जो देश की आम जनता से देश को बनाती है.

वो तो यह मान कर चलती है, कि सरकारें ऐसी ही होती हैं, अपने मतलब के लिये काम करती हैं. इसलिये कम मतलबी सरकार भी चलेगी. वैसे भाजपा की मोदी सरकार मतलबी सरकार है, मगर वह अपने मतलब को ‘राष्ट्रवाद’ और ‘आर्थिक विकास’ के परतों के नीचे छुपा कर रखती है. लोकतंत्र की मौजूदा सरकारों के लिये आम जनता सरकार बनाने का जरिया और बाजार के लिये उत्पादन का साधन और उपभोक्ता है. वह दोनों के लिये जरूरी है, इसलिये जिन्दा है. जन समर्थक सरकार की मांग को वैधानिक तरीके से खारिज किया जा चुका है.

यदि नरेन्द्र मोदी के प्रचारित योजनाओं पर आप विश्वास करें तो ‘मेक इन इण्डिया’ कई इण्डिया के अलग-अलग मुकाम से होता हुआ ‘न्यू इण्डिया’ के मुकाम तक पहुंच गया है. सरकार अपने ‘राजनीतिक एकाधिकार’ के लिये बड़ी ईमानदारी और पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ती रही है. अभी ‘मिशन 2017’ के तहत पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में पूर्ण बहुमत और जोड़-तोड़ से चार राज्यों में अपनी सरकार बना चुकी है. उत्तर प्रदेश उसके लिये मिशन 2019 के लोक सभा चुनाव की पृष्टभूमि है, जहां वह उग्र हिन्दूवादी आदित्यनाथ की सरकार बना चुकी है.

अब भाजपा ‘हिन्दू राज्य’ में दलित-अल्पसंख्यकों का खयाल रख कर यह दिखाती है कि भाजपा से डरने की जरूरत नहीं है, या उन्हें ‘सबक’ सिखाती है? देखना है. वैसे देखने लायक कोई बात है नहीं. सरकार की जुबान पर चाहे जितनी मिठास हो, उसका मकसद राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय ताकतों की तानाशाही है. संघ, भाजपा और मोदी का राष्ट्रवाद राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के हितों को साधने का जरिया है.

उनकी देशभक्ति देश को बाजार बनाने से उन्हें नहीं रोकती. देश की प्राकृतिक संपदा को निजी कम्पनियों को सौंपने और उत्पादन के साधन का निजीकरण करने से उन्हें नहीं रोकती. श्रम बाजार में बौद्धिक एवं शारीरिक श्रम सम्पदा को सस्ते में निजी कम्पनियों के लिये उपलब्द्ध कराने से उन्हें नहीं रोकती.

अर्थव्यवस्था के निजीकरण को उन्होंने खुली छूट दे दी है. नोटबंदी के खेल को ‘कैशलेस ट्रांजेक्शन’ की ओर मोड़ कर उन्होंने कारोबार और लेन-देन के बीच निजी कम्पनियों के हितों के लिये जगह बना दिया है. उनकी देशभक्ति उन्हें आर्थिक अपराध करने से नहीं रोकती.

आर्थिक असमानता, सामाजिक असुरक्षा की भावना और धर्म-जाति सम्प्रदायों की दूरियों को बढ़ाने से उन्हें परहेज नहीं है. उनकी देशभक्ति को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समाज का भगवाकरण इस्लामी आतंक और मिशनरियों के उपनिवेशिक साम्राज्यवाद से अलग नहीं.

यह समाज के स्वाभाविक विकास और समाजवाद को रोकना ही नहीं है बल्कि पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियाद को उखाड़ना भी है. इसलिये जिन्हें यह लगता है, कि ‘सबको देखा, इनको भी देख लेते हैं’ उनको इस बात की जानकारी नहीं है, कि इनको देखने का मतलब राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय पूंजी की तानाशाही है.

यह ठीक है, कि ‘कम्युनिस्टों की बातें हम न करें, वो कहीं नहीं हैं’, किंतु दलित और अल्पसंख्यक वर्ग समाज के कामगर वर्ग के ही सदस्य हैं, और यह बात बिल्कुल तय है कि फासिस्ट ताकतें कम्युनिस्टों के खिलाफ हमलावर होती हैं.

मायरा का ये फोटोशूट होश ना उड़ा दे तो कहना

मॉडल मायरा खान जिनका पिछले क्रिसमस के मौके पर एक हॉट और सेक्सी वीडियो सामने आया था. उसी मॉडल मायरा खान ने हाल ही में मुंबई में एनलाइटन इंडिया मैगजीन के कवर पेज के लिए फोटोशूट कराया. जाहिर है कि वह हमेशा कि तरह अपनी चमकीले हीरे और फूलों की गुलाबी रंग की पोशाक में हॉट और खूबसूरत दिख रही हैं. फोटोशूट के दौरान मायरा ने कहा कि मैं समर कलेक्शन से प्यार करती हूं इसलिए मैं एन्लाइटन इंडिया के लिए कवर गर्ल बनने पर बहुत उत्साहित हूं. मैं सनसाइन, वाइब्रेंट कलर, फूलों से प्यार करती हूं. मेरे आउटफिट को ऐश पंजाबी द्वारा डिज़ाइन किया गया है. हम इस मैगजीन के कवर के लिए पुराने लुक में फोटोशूट कर रहे हैं और यह वास्वत में बहुत ही चमकदार लग रहा है, जिसे आप कॉकटेल, रात के खाने के लिए पहन सकते हैं या शायद आप इसे पहनकर डेट पर भी जा सकते हैं.

अपनी निजी स्टाइल के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि मैं स्टाइल में विश्वास करती हूं क्योंकि स्टाइल हमारे भीतर से आता है. आप जो अधिक आरामदायक कपड़े पहनते हैं और यदि आप इसे ठीक ढंग से स्टाइलिस्ट करते हैं तो यह स्वयं ही आपके बारे में काफी कुछ कह देता है. ऐसे ड्रेस आपको बहुत सरल और आरामदायक रखते हैं. यह सब कुछ आप जो पहनने हैं उसके बारे में है, और जितने भी रंग के कपड़े आप पहनते हैं, जितना ही यह वाइब्रेंट दिखता है वह उतना ही आपके व्यक्तित्व के बारे में दिखाता है. हर पोशाक में व्यक्ति का अलग-अलग चरित्र दिखता है.

सितारों की सेक्स लाइफ की कहानी, उन्हीं की जुबानी

बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ की लाइफ में जानने के लिए उनके फैंस हमेशा बेसब्र रहते हैं, लेकिन हमारी तरह उनकी भी पर्सनल लाइफ है जिसे वो सबके सामने जाहिर नहीं करना चाहते. खास तौर पर अपनी सेक्स लाइफ को लेकर सेलिब्रिटीज़ कभी बात नहीं करते. लेकिन हाल ही अक्षय कुमार की वाइफ ट्विंकल खन्ना ने अपनी सेक्स लाइफ के बारे में खुलकर बात की. ट्विंकल की तरह और भी ऐसे सेलिब्रिटीज़ हैं जिन्होंने जाने-अनजाने अपनी सेक्स लाइफ के बारे में कई खुलासे किए हैं.

हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में ट्विंकल खन्ना ने उनके और अक्षय कुमार के सेक्शुअल रिलेशनशिप से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे किए. पिछले 16 सालों से अक्की के साथ मैरिड लाइफ एन्जॉय कर रहीं ट्विंकल ने बताया, “सेक्स हर उम्र में जरूरी होता है. अक्षय की जो चीजें मुझे अट्रैक्ट करती थीं, वह समय के साथ बदल गई हैं.”

हाल ही में एक बच्ची के पिता बने शाहिद कपूर ने अपनी सेक्स लाइफ के बारे में कहा था कि वो एक्टिंग छोड़ सकते हैं लेकिन सेक्स करना नहीं.

इन दिनों सुर्खियों से दूर नरगिस फखरी ने कहा, रिलेशनशिप में सेक्स बहुत जरूरी है, अगर आपको इसकी कमी महसूस हो रही है तो ऐसे रिलेशनशिप को खत्म कर देना चाहिए.

बॉलीवुड के ‘बाजीराव’ यानि रणवीर सिंह का कहना है कि वो अपने पर्स में हमेशा कंडोम रखकर चलते हैं, क्या पता कब जरूरत पड़ जाए.

बॉलीवुड की’ बेगम जान’ यानि विद्या बालन का कहना है कि महिलाओं को भी सेक्स की उतनी ही जरूरत होती है जितनी आदमियों को होती है.

बॉलीवुड से ज्यादा हॉलीवुड में नज़र आने वाली प्रियंका चोपड़ा का कहना है कि उन्हें मर्दों में और सेक्स में कोई इंटरेस्ट नहीं है. अगर अपनी जिंदगी में कभी उन्हें किसी मर्द की जरूरत पड़ेगी तो वो सिर्फ एक बच्चा पैदा करने के लिए होगी.

बॉलीवुड की ‘मस्तानी’ दीपिका पादुकोण का कहना है कि उनके लिए सिर्फ फीजिकल होना सेक्स नहीं है, बल्कि इसमें इमोशन्स जुड़े होने चाहिए.

अर्जुन कपूर का कहना है कि जिंदगी में प्यार भले न हो लेकिन सेक्स होना जरूरी है.

बॉलीवुड के ‘दबंग’ सलमान खान का तो सेक्स से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है. सलमान का कहना है कि वो वर्जिन हैं और उन्होंने अपनी वर्जिनिटी अपनी होने वाली वाइफ के लिए बचा रखी है.

स्वरा भास्कर का कहना है कि सेक्स बहुत नॉर्मल चीज़ हैं बशर्ते इसे हम उसके साथ करें जिससे हम प्यार करते हों.

आलिया भट्ट ने तो अपनी फेवरेट सेक्स पोजिशन के बारे में भी हता दिया. The Classic Missionary उनकी फेवरेट सेक्स पोजिशन है.

सोनम कपूर का कहना है कि वो कैजुअसल सेक्स में भरोसा नहीं करतीं.

मुद्दों से भटके चुनाव, धर्म, जाति और जुमलों के वार

उत्तर प्रदेश के इन विधानसभा चुनावों में अखिलेश राहुल और मोदी शाह की जोड़ी थी, तो मायावती अकेले ही चुनाव मैदान में थीं. तीनों एकदूसरे के खिलाफ लट्ठमार होली सी खेलते नजर आए. किसी ने जनता को यह भरोसा नहीं दिलाया कि जीत के बाद वह क्या करेगा  केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि बाकी राज्यों के चुनावों में भी मुद्दों की जगह जुमले उछालते रहे. यह केवल अपने देश की ही बात नहीं है, दुनिया के दूसरे देशों में होने वाले चुनावों में भी नेता जनता को ऐसे ही लुभाते नजर आते हैं.

अब चुनाव लड़ना एक प्रबंधन कला है, जिस में बड़ीबड़ी कंपनियां शामिल होने लगी हैं. गरीब से गरीब प्रदेश के नेता अब हैलीकौप्टर सेचलते हैं. विकास के मुद्दे हवा में हो गए हैं. यही वजह है कि चुनाव के बाद जीतहार का देश के विकास पर कोई खास असर नहीं पड़ता है.

चुनाव दर चुनाव यही कहानी अब जोर पकड़ती जा रही है. नेताओं के घोषणापत्र देख कर लगता है कि वे कितने अमीर हैं. राजनीतिक दलों का कोई भी उम्मीदवार करोड़पति से कम नहीं होता है. पर जनता वहीं की वहीं रहती है. यही वजह है कि देश का सब से बड़ा प्रदेश होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के लोग रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों में जाने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा के विधानसभा चुनावों से पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावों में वोट मांगने के लिए जाति और धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. अदालत की इस सोच से यह उम्मीद जगी थी कि ये चुनाव जातिधर्म के असर से दूर होंगे. पर ऐसा दिखा नहीं. राजनीतिक दलों की सब से बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश थी, जहां पर जाति और धर्म का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है.

ऊपरी तौर पर हर दल ने जाति और धर्म से खुद को पूरी तरह से दूर बताया, पर जैसेजैसे चुनाव आगे बढ़ा, तो राजनीतिक दलों की पोल खुलने लगी. सभी दलों ने जाति और धर्म के समीकरणों और आंकड़ों को देख कर अपनेअपने उम्मीदवारों को टिकट बांटे. दरअसल, राजनीतिक दलों को यह पता है कि जनता विकास के मुद्दों की बात चाहे जितनी करे, पर वोट देते समय वह जातिधर्म के समीकरण से ऊपर नहीं उठ पाती है.

चुनाव के समय हर दल ने अपने उम्मीदवार की लिस्ट जारी की, तो उस का जाति और धर्म के आधार पर विश्लेषण भी किया गया. इस से साफ जाहिर होता है कि चुनाव में जातिधर्म पूरी तरह से हावी रहे. सभी दलों ने अपने प्रचारतंत्र के बहाने इस बात का खूब प्रचार किया कि उस पार्टी ने किस जाति और धर्म के लोगों को सब से ज्यादा टिकट दिए. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने किसी भी मुसलिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. ऊपरी तौर पर भाजपा ने इस बात का प्रचार नहीं किया. इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा बात भी नहीं की. भाजपा चाहती तो इस मुद्दे को उछाल कर बड़ा भी कर सकती थी.

अदालत के आदेश की मंशा को ध्यान में रखते हुए शायद उस ने यह कदम नहीं उठाया.  वोटरों को बताया गया कि जहां एक तरफ बाकी सभी दल मुसलिम वोटरों का साथ पाने के लिए उन के लोगों को टिकट दे रहे हैं, वहीं भाजपा ने एक भी मुसलिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. यह बात बहुत हद तक लोगों पर असर डालने में कामयाब रही. इस की वजह से केवल अगड़ी जाति के वोटर ही नहीं, बल्कि दलित और पिछड़ी जाति के वोटर भी बिदकने लगे.

भाजपा के साथ-साथ सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा ने मुसलिम वोटरों को ध्यान में रख कर ही पाटी के टिकट बांटे थे. बसपा को यह उम्मीद थी कि सपा की घरेलू लड़ाई के बाद मुसलिम वोट सपा से दूर हो कर बसपा को जाएंगे, क्योंकि परिवार के विवाद में फंसी सपा चुनावी लड़ाई में भाजपा से पिछड़ जाएगी. मुसलिम वोटर हमेशा भाजपा के खिलाफ वोट करेंगे. ऐसे में बसपा ने सब से ज्यादा मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दे दिए.

लेकिन जब कांग्रेससपा का गठबंधन हो गया, तो बसपा का यह गेम पलट गया. अब मुसलिम वोट एकमुश्त बसपा को जाने के बजाय बिखर गए. बसपा के लिए मुसीबत यह हो गई कि दलित वोट हिंदुत्व के झांसे में आने लगे. इस बात का अहसास होते ही बसपा प्रमुख मायावती ने आरक्षण के दांव का इस्तेमाल किया.

दलित जातियां अब केवल आरक्षण के मुद्दे पर भी अगड़ी जातियों के विरोध में जा सकती हैं. बसपा प्रमुख ने भाजपा और संघ को आरक्षण विरोधी बताना शुरू किया. मायावती ने कहा कि भाजपा संघ के दबाव में है. ऐसे में वह धीरेधीरे आरक्षण को खत्म करने की योजना बना रही है.

भाजपा ने बड़ी होशियारी से आरक्षण के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. वह आरक्षण जैसे मुद्दों का जवाब देने की जगह जुमलेबाजी पर उतर आई. सपाकांग्रेस गठबंधन ने भी इस जुमलेबाजी में हिस्सा लिया. ऐसे में पूरा चुनाव ही मुद्दों से भटक गया.

पूरे चुनाव में उत्तर प्रदेश की विकास योजनाओं का कहीं जिक्र नहीं हुआ. राजनीति के अपराधीकरण, राजनीति में पैसों के चलन पर कोई बात नहीं हुई.

सीधेतौर पर जाति और धर्म की चर्चा से खुद को दूर रखते हुए अप्रत्यक्ष रूप से उन बातों का जिक्र किया गया, जो जाति और धर्म को बढ़ावा देती थीं. इस में ‘गधों’, ‘कसाबआतंकी’, ‘ईददीवाली’, ‘कब्रिस्तानश्मशान’ जैसे जुमले खूब उछाले गए. बड़ेबड़े नेताओं के चुनावी भाषण पूरी तरह से जुमलेबाजी से भरे नजर आए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस और बसपा को ‘स्कैम’ बताया. अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की बात का जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री केवल मन की बात करते हैं, काम की बात नहीं करते हैं. चुनावों की शुरुआत में विकास और काम के मुद्दों पर भाषण हुए, पर बाद में ये सब दरकिनार हो गए और बेकार की बातें उछलने लगीं.

इस चुनाव में विरोधी दलों का नामकरण भी अलगअलग तरह से करने का काम हुआ. भाजपा ने सपाकांग्रेस गठबंधन को ‘स्कैम’ करार देते हुए अखिलेशराहुल पर कटाक्ष कर के कहा कि एक से उस के पिता दुखी हैं, तो दूसरे से उस की माता दुखी हैं. बसपा को नया नाम देते हुए भाजपा के नेताओं ने उसे ‘बहिनजी संपत्ति पार्टी’ कहा, तो बसपा ने नरेंद्र मोदी को ‘एंटी दलितमैन’ और भाजपा को ‘भारतीय जुमला पार्टी’ कहा.

अखिलेश यादव ने भाजपा को ‘चालू पार्टी’ का नाम दिया और बसपा को ‘पत्थरों वाली सरकार’ का नाम दिया. मायावती ने अखिलेश यादव को ‘बबुआ’ कहा. भाजपा ने अखिलेश और मुलायम के पितापुत्र विवाद को खूब उछालने का काम किया. सपा को ‘कुनबा पार्टी’ करार दिया.

सब से खास बात तो यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा करार दिया. इस पर उत्तर प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की सदस्य नाहिद लारी खान ने एतराज जताते हुए इसे गोद लेने संबंधी कानून का मजाक  बताया.

उपज की बरबादी, आखिर इस का हल क्या है

इसी 31 जनवरी को झारखंड में रांची के पास बुंडु इलाके के परेशान किसानों ने कई ट्रक टमाटर सड़कों पर फेंक दिए. मंडी में उपज की वाजिब कीमत न मिलने से खफा किसानों ने पहली बार ऐसा नहीं किया था. 1 रुपए प्रति किलोग्राम से भी कम कीमत मिलने पर बीती 7 दिसंबर 2016 को भी किसानों ने अपने टमाटर सड़कों पर फेंक कर हाइवे जाम कर दिया था. झारखंड के चतरा व बुंडु आदि कई जिलों में इस बार टमाटरों की बहुत छीछालेदर हुई. मुनाफा तो दूर, किसानों की लागत भी नहीं निकली. नतीजतन कर्जदार किसान खुद सड़कों पर आ गए.

आजादी के बाद बीते 69 सालों में बहुत से किसान इसीलिए खुदकुशी करने पर मजबूर हुए, लेकिन ऐसा इंतजाम न हो सका, जिस से किसानों को अपनी उपज फेंकने की नौबत न आती. इस से पहले कम कीमत मिलने से नाराज किसानों ने नासिक में अपनी प्याज सड़कों पर फेंक दी थी.

बेशक बदइंतजामी है. कोई सुनने वाला नहीं है, जिस से किसान गुहार कर सकें. ऐसे में किसानों को खुद पर यकीन करना होगा. बेशक कमी सरकार की है, लेकिन जानकारी की कमी किसानों में भी है. मसलन, टमाटर फेंकने की जगह यदि किसान उन की सौस, कैचप, पेस्ट, पल्प, जूस या सूप का पाउडर आदि बना या बनवा कर बेचते तो ज्यादा कीमत मिलती. टमाटर से सौस बनाने की मशीन 35000 रुपए में मैं रिशिंग इंडस्ट्रीज, झोताला, कोलकाता. मोबाइल 08071683325 से मिलती है. अब साबुत टमाटर डब्बाबंद व धूप में सुखा कर भी प्रोसेस किए जाते हैं. टमाटरों के बीजों का तेल निकाला जाता है.

सीजन में फलसब्जियों को सुखाना नया नहीं है. चटनी, अचार, मुरब्बे, बडि़यां व पापड़ वगैरह बनाने का हुनर पुराना है. इसे पहले से ही घरों में औरतें करती रही हैं. पहले नमक, चीनी, धूप व सिरके वगैरह से फलसब्जी को महफूज किया करते थे. अब सोडियम बैंजोइड जैसे कैमिकल प्रिजर्वेटिव के तौर पर डब्बाबंदी करने में काम आते हैं. पहले ये सब घरेलू इस्तेमाल के लिए करते थे, अब व्यावसायिक तौर पर ऐसा बड़े पैमाने पर होने लगा है.

टूटते सपने

 ज्यादातर किसान कर्ज ले कर महंगी खाद, बीज व सिंचाई के खर्च पूरे करते हैं. रातदिन पसीना बहाते हैं. उस के बाद अपनी उपज को मंडी तक ले जाते हैं. वहां पहुंच कर बेचने की नौबत आती है. उस वक्त मिली रकम ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती है. उस से यदि ढुलाई का खर्च भी पूरा न निकले तो किसानों को गुस्सा आना जायज है. ऐसे में दुखी किसान मजबूरन अपना आपा खो बैठते हैं. वे खुद पर काबू नहीं रख पाते. उन्हें कुछ नहीं सूझता.

केंद्र सरकार के खेती मंत्रालय में फसल अनुसंधान की एक अलग इकाई सीफेट के नाम से काम करती है. उस की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े चौकाने वाले हैं. रिपोर्ट के मुताबिक देश में 32 लाख टन टमाटर व प्याज खेतों से बाजार तक पहुंचने से पहले ही बरबाद हो गए. इतना ही नहीं भारत में हर साल 92000 करोड़ रुपए कीमत की 67 लाख टन खाद्य सामग्री खराब हो जाती है. यह रकम ब्रिटेन के कुल उत्पादन से ज्यादा है.

ज्यादातर किसानों को यह शिकायत रहती है कि मंडी में उन्हें उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती. दूसरी ओर आढ़तिए व बिचौलिए किसानों के दम पर मलाई खाते हुए मालामाल रहते हैं. यह मसला किसानों से जुड़ा व बेहद अहम है, लिहाजा इस का कारगर हल जल्द निकाला जाना बेहद जरूरी है.

मंदी की वजह

 किसानों को लूटखसोट व मंदी की मार से बचाने के लिए देश में अब मंडी समितियां हैं. मंडी सुधार और मंडी विकास की स्कीमें चल रही हैं. लेकिन कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. ज्यादातर किसान आज भी आढ़तियों व दलालों के चंगुल में फंसे रहते हैं. मंडी की ज्यादातर समितियों पर दबंगों व नेताओं का कब्जा है. लिहाजा छोटे किसान आज भी बदहाली के शिकार हैं. उन्हें उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती.

ज्यादातर किसान छोटे, कम जोत वाले, कम पढे़ व गरीब हैं. उन्हें तकनीकी जानकारी नहीं होती. वे अपनी कूवत और बाजार के रुख के हिसाब से बोआई से पहले अंदाजा नहीं लगाते. वे मांग व पूर्ति के नियम से भी अनजान होते हैं. सिर्फ दूसरों की देखादेखी करते हैं, लिहाजा मंडियों में एक ही चीज के अंबार लग जाते हैं.

अब किसानों को सूझबूझ से काम लेना होगा. बेहतर है कि अपने कुल रकबे में एक ही फसल बोने की जगह उस के हिस्से करें. उन में ज्यादा मुनाफा देने वाली कई फसलें बोएं, लेकिन ज्यादातर किसान बीते सीजन की कीमतों को देख कर एक ही फसल बो देते हैं और उसी से मोटी कमाई की उम्मीद करते हैं. ऐसे में वे धोखा खाते हैं और फायदे की जगह भारी नुकसान उठाते हैं.

हल मौजूद हैं

 फसल की बोआई से बिक्री तक तौरतरीकों में सुधार व बदलाव की जरूरत है. सरकार के भरोसे रहने से कुछ होने वाला नहीं है. किसानों को अपने मसले खुद सुलझाने होंगे.

यह सीखना जरूरी है कि किस तरह से उपज की कीमत में बढ़ोतरी हो सकती है. उस के लिए कौन से तरीके अपनाए जाएं. दरअसल, अब जमाना फसल बोने व काट कर बेचने तक का नहीं रह गया है. अब उद्योगधंधों की दुनिया में कदम रखना जरूरी है.

ज्यादातर किसानों को फसल पकते ही उसे बेच कर पैसा हासिल करने की जल्दी रहती है, ताकि वे अपनी जरूरतें पूरी कर सकें और तमाम कर्ज अदा कर सकें. ऐसे में मंडी में एक साथ बहुत ज्यादा माल आ जाता है, नतीजतन दाम नीचे गिरने लगते हैं.

किसानों को चाहिए कि वे सारी उपज कच्चे माल के रूप में मंडी ले जा कर न बेचें, बल्कि खुद प्रोसेसिंग करें. इस प्रकार मंडी में ज्यादा माल न आने से कीमतों में गिरावट नहीं आएगी. साथ ही किसान तकनीक सीख कर अपनी उपज को टिकाऊ बनाने की यूनिट गांव में ही लगा सकते हैं. वे उपज की डब्बाबंदी कर के खानेपीने की बहुत सी चीजें बना सकते हैं. इस प्रकार वे अपनी उपज को लंबे अरसे तक महफूज रख सकते हैं.

आज खेती के साथ कुछ नया सहायक कामधंधा करने की जरूरत है. डब्बाबंदी का काम सीखने के लिए किसान अपने नजदीक के बागबानी, फल व खाद्य संरक्षण महकमे, एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी या कृषि विज्ञान केंद्र से जानकारी ले सकते हैं.

किसान फूड प्रोसेसिंग की काफी लंबे अरसे से चल रही किसी नामीगिरामी यूनिट में काम कर के तजरबा हासिल कर सकते हैं. इस के अलावा वे केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, सीएफटीआरआई मैसूर व प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, लुधियाना, पंजाब से भी जानकारी हासिल कर सकते हैं.

पूंजी

 किसान लघु कृषक व्यापार संगठन, सफाक, नई दिल्ली राज्य सरकार के ग्रामोद्योग महकमे, सहकारी बैंक, केंद्र सरकार के खाद्य प्रसंस्करण महकमे व खादी आयोग से तकनीकी सलाह व रियायती दरों पर कर्ज वगैरह की सहूलियतें ले सकते हैं.

खेत से खाने तक का दायरा बहुत बड़ा है. आजकल नईनई चीजें बन कर बिक रही हैं. फिर भी गेहूं से आटा, मैदा, सूजी, दलिया, चावल से बाल आहार, आटा, मुरमुरे, चने से दाल, बेसन, भुने चने, सरसों से तेल, फलसब्जियों से अचार, मुरब्बे, चटनी, जैम, जूस, जैली, दालों से बड़ी, पापड़ आदि तैयार करने की इकाइयां गांवों में ही लगाई जा सकती हैं. इस से रोजगार और आमदनी दोनों बढ़ेंगे.

मशीनें

उपज को बरबाद होने से बचाने व उस की भरपूर कीमत पाने के लिए उस की प्रोसेसिंग करना लाजिम है. आलू के चिप्स बनाना और फलों के जूस व सब्जियों की डब्बाबंदी करना फायदेमंद है. इस में तकनीक, ट्रेनिंग, मशीनों व औजारों वगैरह की जरूरत पड़ती है. भारत में अब हर तरह की छोटी-बड़ी मशीनें बनती व मिलती हैं.

यात्रा ही मेरा जीवन है : अमित साध

सीरियल ‘क्यों होता है प्यार’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाले अमित साध ने अब तक चंद सीरियलों के अलावा ‘काई पो चे’, ‘गुड्डु रंगीला’, ‘सुल्तान’ सहित कुछ अन्य फिल्मों में भी अभिनय कर अपनी अलग छाप छोड़ी है. अब वे अपनी नई फिल्म ‘रनिंग शादी डौट काम’ को ले कर काफी उत्साहित हैं. इस फिल्म में उन की जोड़ी फिल्म ‘पिंक’ फेम अदाकारा तापसी पन्नू के संग है. बौलीवुड के अन्य कलाकारों के मुकाबले वे कुछ अलग तरह के कलाकार हैं. उन्हें ऐडवैंचर बहुत पसंद है. वे साइकिल व बाइक पर लंबी यात्राएं करते रहते हैं. 2019 में माउंट एवरेस्ट फतह करने की योजना बना रहे अमित साध ने अपनी अब तक की यात्राओं, अपने ऐडवैंचर, अपनी भविष्य की योजनाओं आदि को ले कर बात की.

बौलीवुड में अकसर खुद के गायब हो जाने की चर्चाओं पर अमित से जब कम काम करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘मैं गायब नहीं होता. मैं ऐडवैंचरस इंसान हूं. हर फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं बाइक पर घूमने निकल जाता हूं. मुझे हिमालय बहुत पसंद है. मैं लद्दाख 6 बार बाइक पर घूमा हूं. मैं ने कारगिल, ग्रास, मेन लद्दाख की 6 बार बाइक से यात्राएं की हैं. अभी मैं मनाली की यात्रा साइकिल से करने वाला हूं, पिंडारी ग्लेशियर चढ़ा हूं. 2019 में माउंट एवरेस्ट चढ़ने की योजना पर काम कर रहा हूं. मुझे ऐडवैंचर बहुत पसंद है इसलिए भी मैं खुश रहता हूं. फिल्मों की शूटिंग कर के मैं कुछ ऐडवैंचर्स करने निकल जाता हूं. लोगों को लगता है कि मैं नाराज हूं, गुस्सैल हूं, मेरे पास काम नहीं है, मैं कहीं गायब हो गया हूं वगैरावगैरा. दरअसल, एक चीज को देखने का नजरिया हर किसी का अलग होता है.’’

अपनी इन ऐडवैंचर्स व बाइक यात्राओं के अनुभव साझा करते हुए वे कहते हैं, ‘‘इन यात्राओं के दौरान मैं जमीन से जुड़े जिन लोगों से मिला, उन्होंने मुझे भी जड़ों से जोड़ कर रखा. इसलिए मेरा एक ब्ल्यूपिं्रट बन चुका है कि मुझे क्या करना है. हकीकत यह है कि फिल्मों में कलाकार को बिगाड़ा जाता है, यहां कोई कलाकार के लिए खाना ले आता है तो कोई पीने का कोई सामान ले आता है. इतनी सुविधाएं कलाकार को मिल जाती हैं कि वह बिगड़ जाता है. पर जब आप आम लोगों के बीच बैठते हैं, तो वे आप को आप की जड़ों से जुड़े रहने पर विवश करते हैं. इसलिए फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं एक आम इंसान बन कर आम लोगों के पास पहुंच जाता हूं. मुझे 14 से 15 हजार फुट ऊंचाई पर, बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ, 8-10 लोगों के साथ जमीन पर बैठ कर कढ़ीचावल खाते हुए मजा आता है. मुझे पहाड़ों में टैंट में सोने में आनंद की अनुभूति होती है. ये सारी चीजें मुझे लोगों के साथसाथ कुदरत से भी जोड़ कर रखती हैं. जिस दिन आप का लगाव, आप का जुड़ाव प्रकृति से खत्म हो जाता है उस दिन आप भले ही दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत बन जाएं पर आप की जिंदगी खत्म हो जाती है.’’

वे आगे भी इसी तरह की यात्राओं की योजना बना चुके हैं. उन के मुताबिक, ‘‘सितंबर माह में मुंबई से एनएच 10 पकड़ कर पंजाब, जम्मूकश्मीर होते हुए 18,500 फुट लेह, खंडूरा पर जाऊंगा. फिर नीचे आते हुए लखीमपुर, खीरी जाऊंगा. वहां से काठमांडू, सिलीगुड़ी और भूटान जाऊंगा. भूटान जाने के लिए हम ने इजाजत मांगी है. वहां से असम होते हुए नगालैंड में मैं अपनी बाइकयात्रा खत्म करूंगा.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘पहाड़ मुझे हमेशा बुलाते रहते हैं. मुझे पहाड़ों पर जा कर बहुत सुकून मिलता है. मैं ने जो यह रूट चुना है, इस में संघर्ष बहुत ज्यादा है. इस रूट पर पहाड़ हैं, टूटेफूटे रास्ते हैं. यह यात्रा मैं 550 सीसी बुलेट पर करूंगा. यदि किसी ने स्पौंसर कर दिया, तो बेहतर होगा. मेरे लिए अब अच्छी बात यह है कि पहले यह सब करने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते थे, अब मुझे यह सब मुफ्त में करने का मौका मिल रहा है.’’

इस तरह के रूट बनाने के पीछे सोच क्या है, इस पर अमित बताते हैं, ‘‘सोच कुछ नहीं. वजह यह है कि मुझे 2 अच्छे लोगों का साथ मिल गया है. ये जमीन से जुड़े लड़के हैं. बहुत विनम्र हैं. इन में से एक है दीपक जो कि साइकिल चैंपियन है. यह पीछे वाले पहिए पर 40 किलोमीटर साइकिल चलाता है. हवा में साइकिल उछाल देता है. दूसरा लड़का है गैरी दत्त. इन दोनों से मेरा मेलमिलाप बहुत ज्यादा है. हम लोग साइकिल के जरिए आपस में बहुत मिलते हैं.

जब हम लोगों ने बैठ कर विचारविमर्श किया कि कहां जाना है, तो किसी ने असम कहा, मैं ने काठमांडू कहा. मैं काठमांडू जाना चाहता था क्योंकि मैं ने काठमांडू में फिल्म ‘यारा’ की शूटिंग की थी. वहां पर भूकंप आ चुका है जो हैरिटेज साइट है, वहां पर हम ने गाना फिल्माया था. मैं ने कहा कि जब हम लोग इस यात्रा पर जा रहे हैं तो काठमांडू के उस हैरिटेज क्षेत्र की भूकंप आने के बाद क्या स्थिति है, देखने जाना चाहूंगा. इस के अलावा इस बार हम लोग इस पूरी यात्रा को फिल्मा भी रहे

हैं. हमारी पूरी टीम जा रही है. 10 कैमरामैंस की टीम है. यह काम बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है.’’

इस यात्रा को फिल्माने की वजह पर वे कहते हैं, ‘‘हम इस यात्रा को फिल्मा कर दुनिया को भी दिखाना चाहते हैं. दुनिया को बताना चाहते हैं कि हमारा देश क्या है. हम लोग रास्ते में गांव में रुकेंगे. वहां के लोगों से बातचीत करेंगे. हमारी योजना यह है कि यदि किसी गांव में 20-22 साल की युवा लड़की मिली और उस ने कहा कि उसे बाइक चलानी आती है पर उसे बाइक चलाने का मौका नहीं मिलता है, तो हम उसे अपनी बाइक देंगे और अपने साथ चलने के लिए कहेंगे. पूरे 40 दिनों की हमारी यह यात्रा है. हम लोगों ने कई योजनाएं बना रखी हैं.’’

अब तक की गई यात्राओं में सब से ज्यादा किन जगहों ने प्रभावित किया? इस सवाल पर अमित बताते हैं, ‘‘हमारा देश तो गांव का देश है. पर मैं ने बेहतरीन गांव पाया मुक्तेश्वर में. नैनीताल से 5 किलोमीटर की दूरी पर मुक्तेश्वर है. वहां बहुत कम लोग जाते हैं क्योंकि नजदीक में कोई एयरपोर्ट नहीं है. साधन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए भी लोग कम जाते हैं. यदि मुक्तेश्वर के आसपास एयरपोर्ट होता, तो दिल्ली वाले जरूर पहुंचते. दिल्ली से मुक्तेश्वर जाने के लिए 12 घंटे चाहिए, इसलिए लोग नहीं जाते. वहां पर एक जगह है, सरगा खेत. मैं ने सरगा खेत में कैपिंग की थी. मुझे वह जगह इतनी पसंद आई थी कि मैं वहां कई माह रुका. मैं ने वहां नौकरी भी की है. उस गांव से मेरा लगाव हो गया. हर वर्ष मौका मिलते ही मैं 4-5 दिनों के लिए उस गांव में जाता रहता हूं.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘जब 2015 में फिल्म ‘सुल्तान’ की शूटिंग दिल्ली में कर रहा था, 4 दिनों की छुट्टी थी, तो मैं सरगा खेत चला गया था. एक जगह और है – पीपला. वहां एक एनजीओ काम कर रहा है – चिराग (सैंट्रल हिमालयन रूरल ग्रुप). उस एनजीओ ने पहाड़ों पर बहुत अच्छा काम किया है. उन के साथ मिल कर हम ने भी कुछ दिन काम किया. वह बहुत शानदार अनुभव रहा. उन सब के जीवन की सरलता मुझे भाती है. बिना किसी कारण मुहब्बत करने की उन की जो क्षमता है, वह मुझे उन तक खींच कर ले जाती है.’’

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