एक प्रश्न लगातार: भाग 2

‘तुम्हारी थीसिस सबमिट हो जाए तो मैं कुछ दिन के लिए कोलकाता जाना चाहता हूं.’

‘नहीं, मुकेश, अब मैं तुम्हें कहीं जाने नहीं दूंगी.’

‘अरी पगली, परिवार में तुम्हारे शुभागमन की सूचना तो मुझे देनी होगी न.’

‘सच कह रहे हो?’

‘क्यों नहीं कहूंगा?’

‘मुकेश, किस जन्म के पुण्यों का प्रतिफल है तुम्हारा साथ.’

‘तुम भी कुछ दिन के लिए घर हो आओ, ठीक रहेगा.’

परिवार में कमला का स्वागत गर्मजोशी से हुआ. पहले दिन वह दिन भर सोई. मां ने सोचा बेटी थकान उतार रही है. फिर भी उन्हें कुछ ठीक नहीं लग रहा था. अनुभवी आंखें बेटी की स्थिति ताड़ रही थीं. एक सप्ताह बीता, मां ने डाक्टर को दिखाने की बात उठाई तो कमला ने खुद ही खुलासा कर दिया.

‘विवाह से पहले शारीरिक संबंध… बेटी, समाज क्या सोचेगा?’

‘मां, आप चिंता न करें. हम दोनों शीघ्र ही विवाह करने वाले हैं. वैसे मुझे लखनऊ यूनिवर्सिटी में लेक्चररशिप भी मिल गई है. मुकेश भी वहीं प्रोफेसर हैं. मैं आज ही फोन से बात करूंगी.’

‘जरूर करना बेटी. समय पर विवाह हो जाए तो लोकलाज बच जाएगी.’

कमला ने 1 नहीं, 2 नहीं कम से कम 10 बार नंबर डायल किए, पर हर बार रांग नंबर ही सुनना पड़ा. वह बहुत दिनों तक आशा से बंधी रही. समय बीतता जा रहा था. उस की घबराहट बढ़ती जा रही थी. बड़ी बहन रोहिणी भी चिंतित थी. वह उसे अपने साथ पटना ले आई. नर्सिंग होम में भरती करने के दूसरे दिन ही उस ने एक कन्या को जन्म दिया. पर वह कमला की नहीं रोहिणी की बेटी कहलाई. सब ने यही जाना, यही समझा. इस तरह समस्या का निराकरण हो गया था. मन और शरीर से टूटी विवश कमला ड्यूटी पर लौट आई.

निसंतान रोहिणी को विवाह के 15 वर्ष बाद संतान सुख प्राप्त हुआ था. उस का आंगन खुशियों से महक उठा. बहुत प्रसन्न थी वह. कमला की पीड़ा भी वह समझती थी. सबकुछ भूल कर वह विवाह कर ले, अपनी दुनिया नए सिरे से बसा ले, यही चाहती थी वह. सभी ने बहुत प्रयत्न किए पर सफल नहीं हो पाए.

अवकाश समाप्त होने के कई महीनों बाद भी मुकेश नहीं लौटा था. बाद में उस के नेपाल में सेटिल होने की बात कमला ने सुनी थी. उस दिन वह बहुत रोई थी, पछताई थी अपनी भावुकता पर. आवेश में पुरुष मानसिकता को लांछित करती तो स्वयं भी लांछित होती. अत: जीवन को पुस्तकालय ही हंसतीबोलती दुनिया में तिरोहित कर दिया.

कभी अवकाश में दीदी के पास चली जाती, पर केतकी ज्योंज्यों बड़ी हो रही थी उसे मौसी का आना अखरने लगा था. वह देखती, समाज की वर्जनाओं की परवा न कर के जीजाजीजी ने बिटिया को पूरी छूट दे रखी है. आधुनिक पोशाकें डिस्को, ब्यूटीपार्लर, सिनेमा, थियेटर कहीं कोई रोकटोक नहीं थी. इतना सब होने पर भी वे बेटी का मुंह जोहते, कहीं किसी बात से राजकुमारी नाराज तो नहीं.

‘‘इस बार जन्मदिन पर मुझे कार चाहिए, पापा,’’ बेटी के साहस पर चकित थी रोहिणी. मन ही मन वह जानती थी कि जिस शक्ति का यह अंश है, संसार को उंगली पर नचाने की ऐसी ही क्षमता उस में भी थी. युवा होती केतकी के व्यवहार में रोहिणी को कमला की झलक दिखाई देती.

ऐसी ही हठी थी वह भी. मनमाना करने को छटपटाती रहती. हठ कर के लखनऊ चली आई. बेटी को त्यागने का निश्चय एक बार कर लिया तो कर ही लिया. पर आंख से ही दूर किया है, मन से कैसे हटा सकती है. अभी इस के एम.बी.बी.एस. पूरा करने में 2 वर्ष बाकी हैं. पर अभी से अच्छे जीवनसाथी की तलाश में जुटी हुई है. कैसे समझाऊं कमला को? कब तक छिपाए रखेंगे हम यह सबकुछ. एक न एक दिन तो वह जान ही जाएगी सब. सहसा केतकी के आगमन से उस के विचारों की शृंखला टूटी.

‘‘ममा, आप मेरे बारे में हर बात की राय मौसी से क्यों लेती हैं? माना वह कालिज में पढ़ाती हैं पर मैं जानती हूं कि वह आप से ज्यादा समझदार नहीं हैं.’’

‘‘मां को फुसलाने का यह बढि़या तरीका है.’’

‘‘नहीं, ममा, मैं सच कहती हूं. वह आप जैसी हो ही नहीं सकतीं. आप के साथ कितना अच्छा लगता है. और मौसी तो आते ही मुझे डिस्पिलिन की रस्सियों से बांधने की चेष्टा करने लगती हैं.’’

‘‘केतकी, कमला मुझे तुम्हारे समान ही प्रिय है. मेरी छोटी बहन है वह.’’

‘‘आप की बहन हैं, ठीक है पर मेरी जिंदगी के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं?’’

‘‘बिटिया सोचसमझ कर बोला कर. मौसी का अर्थ होता है मां सी.’’

‘‘सौरी, ममा, इस बार आप की बहन को मैं भी खुश रखूंगी.’’

वातावरण हलका हो गया था.

जवाब : अनसुलझे सवालों के घेरे में माधुरी

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जवाब : अनसुलझे सवालों के घेरे में माधुरी- भाग 3

‘मम्मा, मेरा नाम सप्तक क्यों है?’

‘बेटा, सप्तक अर्थात सात सुर सा रे गा मा पा धा नी, तुम मेरे जीवनरूपी गीत के सुर हो.’

‘मां, आप गाती क्यों नहीं?’

‘वो बेटा, कभीकभी जीवन में कुछ फैसले मानने पड़ते हैं.’

‘मम्मा, आप कोई भी बात ऐसे ही मान लेती हो. ऐसा होता आया है, इसलिए हम बात क्यों मानें? हमें पहले यह जानना चाहिए की जो हो रहा है वह क्यों हो रहा है.’

‘पापा और दादी मुझे होस्टल भेजना चाहते हैं, पर मैं नहीं चाहता, उन्हें मेरा नाम भी पसंद नहीं है. वह भी बदल देंगे शायद. मम्मा, आप दादी से बात करोगी?’

सुमित ने मुझे इस विषय में कुछ नहीं बताया था. शादी के वचन आज कानों में तेज चिल्ला रहे थे, ‘आप अपने हर निर्णय में मुझे शामिल अवश्य करें.’

परंतु मैं फिर भी जाग नहीं पाई.

‘बेटा, दादी जो कहती हैं…’

‘मैं जानता था आप से नहीं होगा. मैं दादी से बात खुद कर लूंगा.’

फिर मुंह फेर कर सप्तक तो सो गया था, परंतु 13 साल से सोई अपनी मां को जगा दिया था उस ने. मेरा 10 साल का बेटा इतना बड़ा कब हो गया, मैं जान ही न पाई. शादी के जो वचन मेरे कानों में आ कर फुसफुसाते थे, आज वे पूरी तरह से आ कर सामने खड़े हो गए थे.

कितने पुरुष निभाते हैं ये सारे वचन? शायद एक भी नहीं, उन से तो निभाने की उम्मीद तक नहीं की जाती. मेरे अब तक के जीवन में समझौता केवल मैं ने किया है, वचन केवल मैं ने निभाए हैं. सुमित को तो शायद याद भी नहीं कि उन्होंने कोई वचन भी दिया था.

वह इसलिए क्योंकि पुरुष बड़ी चतुराई से इन वचनों को भूल जाता है परंतु स्त्री को ये वचन भूलने ही नहीं दिए जाते. अपने सासससुर की सेवा न करने पर क्या किसी दामाद को कभी कठघरे में खड़ा करता है यह समाज? उस की लाख बुराइयों को भी छिपा लिया जाता है. परंतु एक बहू जब ऐसा करती है तो बिना कारण जाने उसे अनगिनत गलत संबोधनों से नवाजा जाता है. तानेउलाहने सुन कर भी जो चुप रहे उसी स्त्री को अच्छी बहू का मैडल मिलता है. कभीकभी तो वह भी नहीं मिलता.

उस दिन समझ पाई थी मैं, शादी के इन वचनों को बनाया ही इसलिए गया था ताकि स्त्रियों को पुरुषों के ऊपर निर्भर रखा जा सके. यह पूरी प्रथा ही पितृसत्तात्मक सोच के अहं को संतुष्ट करने के लिए बनाई गई थी. स्त्री को अपने सुखों के लिए किसी पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है?

पंडितों ने अपनी तथा पुरुष संप्रभुता को बनाए रखने के लिए ये सारे नियमकानून बनाए थे.

मैं अपने बेटे को पुरुष होने का दंभ भरते हुए नहीं देख सकती थी. मैं उसे इस सोच के साथ बड़ा होता नहीं देख सकती कि हर स्त्री को अपनी रक्षा अथवा अपने फैसले लेने के लिए पुरुष की आवश्यकता होती है. अपने लिए तो फैसला अब मैं खुद लूंगी.

अगले दिन सुबह ही मैं ने सुमित को बता दिया था कि मैं ने नोएडा में रहने का निर्णय लिया है. घर में तूफान आ गया था. सबकुछ बहुत कठिन था, परंतु मेरे ससुर, देवर और छोटी ननद इस बार चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े थे. अगर वे साथ न भी होते तो भी मैं पीछे हटने वाली नहीं थी.

मेरी सास ने मुझे इस के लिए कभी भी माफ नहीं किया था. परंतु पिछले 15 सालों से भी तो वे मुझे अकारण ही सजा दे रही थीं.

जया की शादी के अगले ही दिन हम नोएडा आ गए थे. सुमित का असहयोग आंदोलन यहां आ कर भी जारी था. मांबेटे की जुगलबंदी मुझे परेशान करने के तरीके निकालती रहती थी.

मैं ने कुछ दिनों बाद ही एक स्कूल में संगीत की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी. धीरेधीरे सुमित भी समझने लगे थे कि अब मेरा पीछे लौटना नामुमकिन था.

समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सप्तक जब फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने कनाडा गया, तो उसी दौरान मैं ने अपने संगीत स्कूल की नींव डाली थी.

सप्तक ने जब अलीना से विवाह का निर्णय लिया तब भी सारे परिवार के विरुद्ध खड़े हो कर मैं ने अपने बेटे के सही कदम का साथ दिया था. अलीना एक ईसाई परिवार की लड़की थी परंतु मेरे लिए यह बात कोई माने नहीं रखती थी.

धर्मजाति पर पता नहीं क्यों लोग इतना घमंड करते हैं. आप कहां पैदा होंगे, इस पर आप का क्या अधिकार? इसलिए कोई उच्च और कोई नीच कैसे हो सकता है?

सप्तक ने कोर्टमैरिज करने का निर्णय लिया था. इन झूठे कर्मकांडों और व्यर्थ के आडंबरों से मेरा भरोसा भी उठ चुका था. सुमित को भी सप्तक ने अपनी दलीलों से चुप करा दिया था. शादी के बाद हम ने एक छोटी सी पार्टी दे दी थी.

जब सारी उम्र मैं ने सप्तक को सही का साथ देना सिखाया, फिर आज जब वह अलीना का साथ दे रहा है तो मुझे बुरा क्यों लगा? हर प्रश्न का सही प्रतिवचन दिया था उस ने. मैं भी जानती थी कि अलीना और सप्तक  सही हैं.

क्या अपने बेटे को मुझे अलीना के साथ बांटना असहनीय लग रहा है? क्या मुझे उस का अलीना को सही और मुझे गलत कहना तकलीफ दे रहा है?

नहीं, शायद अपनी कल्पना को यथार्थरूप में देख कर मैं अभिभूत हो गई हूं. सप्तक मेरी कल्पना का ही तो मूर्तरूप है.

‘‘मम्मा, अंदर आ सकता हूं.’’

सप्तक की आवाज मुझे वर्तमान में खींच लाई थी.

‘‘हां बेटा, आ जाओ, अंदर आ जाओ.’’

‘‘आप मुझ से नाराज हैं न मां?’’

‘‘क्यों, क्या तुम ने कुछ गलत किया है?’’

‘‘नहीं, पर वो आज…’’

‘‘जो सत्य है वह अप्रिय हो सकता है परंतु वह गलत नहीं हो सकता. यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो उस के गलत को भी सही कहने के लिए बाध्य नहीं हैं. इसलिए मैं तुम से नाराज नहीं हूं बल्कि आज मुझे तुम पर गर्व हो रहा है.

‘‘मैं जैसे पुरुष की कल्पना किया करती थी, तुम ने उसे साकार कर के मेरे सामने खड़ा कर दिया है. मेरा बेटा एक ऐसा पुरुष है जो अपने पुरुष होने को मैडल की तरह नहीं पहनता.

‘‘जिस प्रकार वह सिर झुका कर अपनी मां का आदर करता है उसी प्रकार अपनी मां द्वारा लिए गए गलत निर्णय का विरोध भी करता है.’’

‘‘यह सब क्या कह रही हो तुम, मधु? क्या तुम्हें सप्तक की बात बिलकुल बुरी नहीं लगी?’’

‘‘सुमित, इस में बुरा लगने जैसा क्या है? मेरा बेटा किसी भी प्रश्न का प्रतिवचन देने से न स्वयं डरता है और न अपनी साथी, अपनी पत्नी को रोकता है.’’

‘‘हां, सही कह रही हो,’’ इतना कह कर सुमित चुप हो गए थे.

‘‘तो इस का मतलब है मैं ट्रेकिंग पर जा रही हूं,’’ अलीना भी मेरे कमरे में आ गई थी.

‘‘ट्रेकिंग पर बाद में जाना है, अभी तुम दोनों सोने जाओ. मुझे भी नींद आ रही है.’’

‘‘मम्मापापा, चलिए पहले आइसक्रीम पार्टी करते हैं,’’ सप्तक ने हंसते हुए कहा, ‘‘चलो, सब चलते हैं.’’

‘‘मैं फ्रिज से आइसक्रीम निकालती हूं, सप्तक तुम कोई अच्छी सी मूवी लगा लो,’’ यह कह कर अलीना चली गई.

हम सब भी उस के पीछे कमरे से निकल ही रहे थे कि अचानक सुमित मेरी तरफ मुड़ कर बोले, ‘‘वैसे तुम लिख क्या रही थी, मधु?’’

‘‘कुछ नहीं, एक समाज की कल्पना कर रही थी.’’

‘‘कैसे समाज की, मम्मा?’’

‘मैं तो बस, एक ऐसे समाज की कल्पना करती हूं जहां-

‘‘पुत्रजन्म पर अभिमान न हो

‘‘पुत्री का कहीं दान न हो

‘‘मानवता के धर्म का हो नमन

‘‘सत्यकथन पर न लगे ग्रहण

‘‘रिश्ते निभें बिना लिए वचन

‘‘हर प्रश्न को मिले प्रतिवचन.’’

बैग पर लटका राजू : लौकडाउन ने जड़े पैरों में ताले- भाग 3

सरिता ने राजू को गोदी में उठा लिया था और उस के पति ने बैग ले रखा था. सेठ जी के पास मोहन और सरिता के पति दोनों ही गए थे. सेठ जी ने सौ-सौ रुपया दे कर चलता कर दिया था.

सरिता ने सौ रुपयों में राजू के लिए जूतेमोजे और कुछ बिस्कुट के पैकेट ले लिया था. वे लोग ज्यादा दूर नहीं चल पाए थे, बीच में ही पुलिस ने उन्हें रोक लिया था. बहुत सारे लोग तो पुलिस वालों को चकमा दे कर आगे निकल गए पर सरिता और उस के पति के साथ तकरीबन 50 मजदूर नहीं निकल पाए. पुलिस उन्हें अपनी गाड़ी में बिठा कर एक स्कूल में ले गई थी, ‘अभी तुम लोगों को यहीं रुकना है, तुम्हारी जांच होगी, फिर आगे जाने दिया जाएगा.

कोई कुछ नहीं बोला. स्कूल में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था बनाई गई थी और पुरुषों के लिए अलग. सरिता अपने सीने से राजू को चिपकाए दूर दरी पर सो रही थी.

‘चल, तू मेरे साथ मेरे औफिस में सोना…’

रात के करीब 2 बजे होंगे, सरिता की झपकी लगी ही थी कि उस पुलिस वाले ने उसे झिंझोड़ कर उठा दिया था. सरिता घबरा गई, ‘क्यों? मैं यहीं ठीक हूं.’

‘चलती है कि मैं ही तुझे उठाऊं.’

सरिता की नाक में शराब की बदबू दौड़ गई.

पुलिस वाले ने उसे जबरन उठाने का प्रयास किया. सरिता ने पूरी ताकत लगा कर उसे गिरा दिया. उस ने जोरजोर से चिल्लाना शुरू कर दिया था.

‘चुप हो जा, नहीं तो तेरी ऐसी दुर्गति कर दूंगा कि तू कहीं की नहीं रहेगी,’ पुलिस वाला बौखला गया था.

सरिता को अपनेआप को बचाना था, इस कारण वह जोरजोर से चिल्ला रही थी. उस की आवाज सुन कर कुछ लोग जाग गए थे. पुलिस वाला तो

लोगों को जागते देख भाग चुका था पर सरिता अभी भी डर के मारे कांप रही थी.

आखिरकार, सभी लोगों की जांच की गई और सभी को आगे जाने की अनुमति दे दी गई. केवल सरिता के पति को रोक लिया, ‘इस में बीमारी के लक्षण हैं,

इसे अभी नहीं जाने दिया जाएगा.’ कुटिल मुसकान थी उस कर्मचारी के चेहरे पर जिसे सरिता ने तो समझ लिया पर और कोई नहीं समझ पाया.

‘कितने दिन रहना पड़ेगा?’

‘कम से कम 14 दिन तक. हो सकता है कि इस के बाद भी रहना पड़े.’

दोनों चुप थे.

‘यदि तुम कल रात में बात मान लेतीं तो यह स्थिति नहीं आती.’

सरिता चुप ही बनी रही. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या उत्तर दे.

‘अभी भी बात मान लो, तो घंटेभर में छोड़ देंगे.’

‘नासपीटे, तू मुझे समझता क्या है? तेरी शिकायत करती हूं, फिर समझ में आएगा,’ सरिता बिफर पड़ी.

‘कर दो शिकायत, जिस से करोगी, पहले वह भी तुम्हें…’ और हंस पड़ा वह. उस के साथ ही और पुलिस वाले भी हंसे थे. सरिता बेबस थी. उस के साथ रुके सारे लोग जा चुके थे. मोहन भी जा चुका था. उस ने पति की ओर देखा और उसे वैसे ही छोड़ कर एक हाथ में बैग और गोद में राजू को ले कर अकेले ही चल पड़ी थी.

सरिता के कदम अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे. वह कभी राजू को गोदी से उतार देती तो कभी गोद में ले लेती. कहीं छांव मिलती, तो रुक जाती.

उस ने राजू के माथे को सहलाया, ‘‘अब चलें, रात होने वाली है. यह सुनसान जगह है.”

राजू का मन बिलकुल भी नहीं हो रहा था, पर अपनी मां की परेशानी को भी वह समझ रहा था, इसलिए अलसाए हुए उठ खड़ा हुआ.

‘‘अच्छा देखो, तुम इस बैग पर बैठ जाओ, इस में चके लगे हैं न. मैं दोनों हाथों से खींचती रहूंगी,” सरिता राजू के मनोभावों और उस की थकान को समझ रही थी. उस के पास और कोई उपाय नहीं था.

राजू ट्रौलीबैग के पहियों पर चढ़ गया और अपना सिर बैग के ऊपर रख लिया. सरिता के लिए अब बैग को खींचना आसान नहीं था. वह अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे खींच रही थी. राजू की आंखें तो बैग में लटके-लटके ही लग गई थीं, पर सरिता के पैर अब जवाब देने लगे थे.

मजदूरों के यों पैदल अपने घर लौटने का मजमा दिनप्रतिदिन बढ़ता जा रहा था. इस मजमे में राजू और सरिता भी शामिल थीं. बैग में सो रहे राजू की तसवीरें कैमरे में कैद हो रही थीं. जो भी सरिता और राजू को इस हालत में देखता, उस का मन विषाद से भर जाता.

‘‘कहां जाना है?” एक ट्रक वाले को शायद उस पर दया आ गई थी.

‘‘मढ़ई गांव.”

‘‘आओ, बैठ जाओ, गांव से थोड़ी दूर उतार दूंगा.”

अपने गांव तक सरिता को पैदल ही जाना पड़ा. राजू को गोद से उतार कर वह अपन बूढ़ी सास के गले लग कर रोती रही थी बहुत देर तक.

सरिता का पति 15 दिनों बाद लौट पाया. उसे तो जबरन मरीज बता कर रखा गया था. आते ही वह फूटफूट कर रोने लगा. सरिता का सारा गुस्सा उस पर उतारा गया था.

‘‘दिनभर काम कराते थे और 2 सूखी रोटी खाने को दे देते थे,” पति की आंखों में आंसू थे.

‘‘तो तुम ने शिकायत क्यों नहीं की,”  सरिता पति की दारुण कथा सुन कर द्रवित हो रही थी.

‘‘सुनाई थी. उस दिन कोई बड़े नेता आए थे. उन के सामने मैं बिफरबिफर कर रो पड़ा था और सारी बातें चीखचीख कर बोल दी थीं. पर वे केवल हंसते रहे थे. उन्होंने एक शब्द भी किसी से कुछ नहीं बोला. साले झूठे…” और उस ने जोर से अपने आंगन में थूक दिया, “बताएं सरिता, वे कह रहे थे कि सरकार ने गरीबों के लिए बहुत सारे पैसे दिए हैं और राशन भी दिया है. तुम को मिला कुछ?” प्रश्नवाचक निगाहों से उस ने सरिता की ओर देखा.

‘‘कछु नई मिलो. राशन वालो कहत है कि वाके पास राशन आओ ही नहीं है तो वो कहां से देगा और बैंक जाओ तो वे अंदर घुसवे के पहिले ही बता देते हैं कि कोई पैसा नहीं आया. नेता लोग तो केवल गपें मारत हैं,” सरिता के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आए थे.

‘‘जा सरकार तो केवल गपें मारवे के काजे ही आई है. अब आने दो, कोई भी नेता को वोट मांगवे, उन से पूछ ले हैं कि तब वे कहां थे जब वह अपने छोटे से बेटे के साथ पैदल चल कर गांव आ रही थी. पूरे पांव में ऐसे छाले पड़ गए थे कि अभी तक ठीक नहीं हुए और राजू भी बेचारा भूखाप्यासा मारामारा ही पैदल चला न,” सरिता के पति ने दुखीमन से कहा.

दुखों की मारी सरिता ने अपने पैरों को सहलाया. पैरों में अभी दर्द होता था.

गांव में थाली बजने और शंख बजने की आवाज गूंज रही थी. सरिता ने आसमान की ओर देखा और जोर से जमीन पर थूका. ‘‘सालो, अब सब तो बरबाद कर दिया है…’ वह बड़बड़ाती हुई मकान के अंदर जा चुकी थी.

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