अटूट बंधन : अनजानी लड़की और ट्रेन का खूबसूरत सफर

ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार पर थी. जंगल, पेड़पौधे, पहाड़, नदीनाले सभी पीछे की ओर भागते जा रहे थे. मैं 6 साल बाद अपने गांव जा रहा था. मैं अपने खयालों में खोया बीते दिनों के बारे में सोच रहा था कि जब घर से निकला था, तो कुरतेपाजामे में हाथ में गठरी ले कर दिल्ली के लिए रवाना हुआ था.

मन में एक अजीब सा डर था कि इतने बड़े शहर में मैं कैसे रह पाऊंगा, लेकिन कुछ ही दिनों में मैं भी ‘शहरी बाबू’ बन गया और एक कंपनी में नौकरी भी लग गई.

मेरे सामने की सीट पर एक सुंदर लड़की अपने बूढ़े पिता के साथ बैठी थी. वह देखने में बहुत ही साधारण परिवार की लग रही थी. वह ठीक मेरी बिंदु जैसी लग रही थी. उसे देख कर मैं कुछ पलों के लिए अपने अतीत में खो गया. हम दोनों गांव में एकसाथ पढ़े थे. बचपन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, हमें पता भी नहीं चला. हम दोनों स्कूल के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर घंटों बातें किया करते थे.

एक दिन बातें करतेकरते उस ने मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया, ‘अच्छा, बताओ, तुम मुझे एकटक क्यों देख रहे हो? तुम अपने मन की बात क्यों नहीं बोलते? तुम मुझे चाहते हो, यह बात क्या मैं नहीं जानती…’

‘तुम जानती हो बिंदु?’

‘मैं जानती न होती, तो तुम्हारे साथ अकेले में क्यों मिलती… क्या तुम इतना भी नहीं जानते?

‘मुझे प्यार भी करते हो और इतनी पराई भी समझाते हो. तुम्हारे प्यार पर मैं अपनी जान भी कुरबान कर सकती हूं,’ इतना कहते हुए उस ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए.

मेरे बदन में एक अजीब सी मदहोशी छाने लगी. मुझे पहली बार किसी लड़की के जिस्म की गरमी महसूस हुई. मेरा दिल बहुत तेजी से धड़कने लगा.

बिंदु अचानक जमीन पर लेट गई. उस के सीने का उतारचढ़ाव मुझे पागल बना रहा था. उस की आंखों में विनती और होंठों पर मुसकराहट थी.

मुझे बिंदु पहले से ज्यादा हसीन लग रही थी. उस के जिस्म की गरमी से मैं अपने दिल पर काबू नहीं रख सका और मैं ने चुंबनों की झड़ी लगा दी.

उस दिन हम लोग जो फिसले, तो फिसलते ही चले गए. उस के बाद जब भी मौका मिलता, हम दोनों के जवान जिस्म एक हो जाते और तन की प्यास बुझ लेते.

अचानक एक दिन हम लोगों को गांव के कुछ लोगों ने रंगे हाथों पकड़ लिया. इस से बहुत बवाल मच गया, क्योंकि मैं ऊंची जाति और बिंदु नीची जाति से ताल्लुक रखती थी.

कुछ बुजुर्ग लोगों के बीचबचाव करने से मामला शांत हुआ और तय किया गया कि पंचायत में फैसला किया जाएगा.

शाम के समय में हम दोनों को पंचायत के सामने पेश किया गया.

सरपंच ने पूछा, ‘क्या तुम दोनों ने जिस्मानी संबंध बना लिए हैं?’

मैं बोला, ‘मैं बिंदु से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.’

उसी समय मेरे पिता एक थप्पड़ मारते हुए मुझ से बोले, ‘एक तो गलती की, ऊपर से गांव वालों के सामने मेरी इज्जत का जनाजा निकाल रहे हो.’

काफी बहस के बाद हम दोनों को सजा सुनाई गई. मुझे 6 साल के लिए गांव से बाहर रहने का हुक्म सुनाया गया और हमारे घर वालों को बिंदु की शादी का आधा खर्चा उठाने का आदेश हुआ…

तभी ट्रेन प्लेटफार्म पर रुकी. मेरी मंजिल आ गई थी. ट्रेन से उतर कर मैं बस पकड़ कर अपने गांव जा पहुंचा.

उस दिन तो घर वालों और पासपड़ोस से मिलनेजुलने में ही समय बीत गया. मैं रातभर करवटें बदलता रहा और बिंदु के बारे में सोचता रहा.

दूसरे दिन मैं ने अपने दोस्त दीपक से बिंदु के बारे में पूछा.

दीपक ने बताया, ‘‘तुम्हारे जाने के एक महीने बाद ही अजीतपुर में उस की शादी हो गई. शादी के कुछ दिन बाद ही उस के पति का एक्सीडैंट हो गया और उस की मौत हो गई.’’

इतना सुनते ही मुझे लगा कि जैसे आसमान टूट पड़ा हो. दीपक आगे बोला, ‘‘उस के ससुराल वालों ने उसे मनहूस कहते हुए घर से निकाल दिया.

‘‘बिंदु अपने मायके आई और अब वह इसी गांव में अपने भाई के साथ रहती है. उस के पिता यह सदमा बरदाश्त न कर सके और चल बसे. उस की भाभी उसे हमेशा ताने देती है और दिनभर घर का काम करवाती है.’’

मैं बोला, ‘‘मैं बिंदु से कैसे मिल सकता हूं?’’

‘‘बिंदु दोपहर में कपड़े धोने नदी पर जाती है… मिलने का वही समय ठीक रहेगा.’’

मैं ठीक समय पर नदी किनारे पहुंच गया. थोड़ी देर में ही बिंदु आती हुई दिखाई दी. मैं उस के सामने खड़ा हो गया.

मुझे देखते ही वह बोली, ‘‘तुम… यहां?’’

‘‘कैसी हो बिंदु?’’

‘‘ठीक हूं.’’

उस की दशा देख कर मैं अपनेआप को रोक न सका. मैं ने जैसे ही उस

का हाथ पकड़ना चाहा, वह बोली, ‘‘मेरा हाथ मत पकड़ो, मैं अब तुम्हारे लायक नहीं रही. अगर कोई देख लेगा, तो फिर बवाल मच जाएगा.’’

मैं बोला, ‘‘अब कोई भी ताकत हम दोनों को जुदा नहीं कर सकती. मैं तुम से शादी करूंगा.’’

‘‘लेकिन समाज ऐसे रिश्तों को नहीं मानता. क्योंकि मैं एक छोटी जाति की हूं और अब विधवा भी हो चुकी हूं. तुम कोई अच्छी सी लड़की देख कर शादी कर लो,’’ इतना कहते हुए वह रो पड़ी और हाथ छुड़ा कर चली गई.

उस दिन के बाद मैं रोज बिंदु से मिलने लगा. आखिर बात कब तक छिपती?

एक दिन उड़ती हुई यह खबर उस के भाई के कानों तक पहुंच गई. उस ने बिंदु के बाहर आनेजाने पर रोक लगा दी.

मैं उस से मिलने के लिए बेचैन हो गया. एक रात मैं चोरों की तरह उस के घर पहुंचा. बिंदु जमीन पर सोई हुई थी, मैं ने उसे धीरे से जगाया.

मुझे देखते ही उस ने मुंह से आवाज निकालनी चाही, लेकिन मैं ने उसे चुप रहने का इशारा किया, फिर धीरे से पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

बिंदु बोली, ‘‘मेरे भैयाभाभी ने घर से निकलने पर भी रोक लगा दी है. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती. अगर जीना है तो तुम्हारे साथ, नहीं तो मरूंगी भी तुम्हारे साथ.’’

तब मैं ने फैसला किया कि हम लोग गांव से भाग कर दिल्ली में कोर्ट मैरिज कर लेंगे.

एक रात जब गांव के लोग गहरी नींद में सोए हुए थे, हम लोग अपने घर से निकल कर स्टेशन पहुंचे और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार हो गए.

हम दोनों बालिग थे, इसलिए जल्दी ही हम ने शादी कर ली.

गंध मादन : कर्नल साहब क्यों निराश नहीं किया

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मौन: जब दो जवां और अजनबी दिल मिले – भाग 1

सर्द मौसम था, हड्डियों को कंपकंपा देने वाली ठंड. शुक्र था औफिस का काम कल ही निबट गया था. दिल्ली से उस का मसूरी आना सार्थक हो गया था. बौस निश्चित ही उस से खुश हो जाएंगे.

श्रीनिवास खुद को काफी हलका महसूस कर रहा था. मातापिता की वह इकलौती संतान थी. उस के अलावा 2 छोटी बहनें थीं. पिता नौकरी से रिटायर्ड थे. बेटा होने के नाते घर की जिम्मेदारी उसे ही निभानी थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी रहा है. मल्टीनैशनल कंपनी में उसे जौब पढ़ाई खत्म करते ही मिल गई थी. आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक तो वह था ही, बोलने में भी उस का जवाब नहीं था. लोग जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे. कई लड़कियों ने उस से दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन अभी वह इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता था.

श्रीनिवास ने सोचा था मसूरी में उसे 2 दिन लग जाएंगे, लेकिन यहां तो एक दिन में ही काम निबट गया. क्यों न कल मसूरी घूमा जाए. श्रीनिवास मजे से गरम कंबल में सो गया.

अगले दिन वह मसूरी के माल रोड पर खड़ा था. लेकिन पता चला आज वहां टैक्सी व बसों की हड़ताल है.

‘ओफ, इस हड़ताल को भी आज ही होना था,’ श्रीनिवास अभी सोच में पड़ा ही था कि एक टैक्सी वाला उस के पास आ कानों में फुसफुसाया, ‘साहब, कहां जाना है.’

‘अरे भाई, मसूरी घूमना था लेकिन इस हड़ताल को भी आज होना था.’

‘कोई दिक्कत नहीं साहब, अपनी टैक्सी है न. इस हड़ताल के चक्कर में अपनी वाट लग जाती है. सरजी, हम आप को घुमाने ले चलते हैं लेकिन आप को एक मैडम के साथ टैक्सी शेयर करनी होगी. वे भी मसूरी घूमना चाहती हैं. आप को कोई दिक्कत तो नहीं,’ ड्राइवर बोला.

‘कोई चारा भी तो नहीं. चलो, कहां है टैक्सी.’

ड्राइवर ने दूर खड़ी टैक्सी के पास खड़ी लड़की की ओर इशारा किया.

श्रीनिवास ड्राइवर के साथ चल पड़ा.

‘हैलो, मैं श्रीनिवास, दिल्ली से.’

‘हैलो, मैं मनामी, लखनऊ से.’

‘मैडम, आज मसूरी में हम 2 अनजानों को टैक्सी शेयर करना है. आप कंफर्टेबल तो रहेंगी न.’

‘अ…ह थोड़ा अनकंफर्टेबल लग तो रहा है पर इट्स ओके.’

इतने छोटे से परिचय के साथ गाड़ी में बैठते ही ड्राइवर ने बताया, ‘सर, मसूरी से लगभग 30 किलोमीटर दूर टिहरी जाने वाली रोड पर शांत और खूबसूरत जगह धनौल्टी है. आज सुबह से ही वहां बर्फबारी हो रही है. क्या आप लोग वहां जा कर बर्फ का मजा लेना चाहेंगे?’

मैं ने एक प्रश्नवाचक निगाह मनामी पर डाली तो उस की भी निगाह मेरी तरफ ही थी. दोनों की मौन स्वीकृति से ही मैं ने ड्राइवर को धनौल्टी चलने को हां कह दिया.

गूगल से ही थोड़ाबहुत मसूरी और धनौल्टी के बारे में जाना था. आज प्रत्यक्षरूप से देखने का पहली बार मौका मिला है. मन बहुत ही कुतूहल से भरा था. खूबसूरत कटावदार पहाड़ी रास्ते पर हमारी टैक्सी दौड़ रही थी. एकएक पहाड़ की चढ़ाई वाला रास्ता बहुत ही रोमांचकारी लग रहा था.

बगल में बैठी मनामी को ले कर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे. मन हो रहा था कि पूछूं कि यहां किस सिलसिले में आई हो, अकेली क्यों हो. लेकिन किसी अनजान लड़की से एकदम से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

मनामी की गहरी, बड़ीबड़ी आंखें उसे और भी खूबसूरत बना रही थीं. न चाहते हुए भी मेरी नजरें बारबार उस की तरफ उठ जातीं.

मैं और मनामी बीचबीच में थोड़ा बातें करते हुए मसूरी के अनुपम सौंदर्य को निहार रहे थे. हमारी गाड़ी कब एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंच गई, पता ही नहीं चल रहा था. कभीकभी जब गाड़ी को हलका सा ब्रेक लगता और हम लोगों की नजरें खिड़की से नीचे जातीं तो गहरी खाई देख कर दोनों की सांसें थम जातीं. लगता कि जरा सी चूक हुई तो बस काम तमाम हो जाएगा.

जिंदगी में आदमी भले कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न हो पर नीचे देख कर गिरने का जो डर होता है, उस का पहली बार एहसास हो रहा था.

‘अरे भई, ड्राइवर साहब, धीरे… जरा संभल कर,’ मनामी मौन तोड़ते हुए बोली.

‘मैडम, आप परेशान मत होइए. गाड़ी पर पूरा कंट्रोल है मेरा. अच्छा सरजी, यहां थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोकता हूं. यहां से चारों तरफ का काफी सुंदर दृश्य दिखता है.’

बचपन में पढ़ते थे कि मसूरी पहाड़ों की रानी कहलाती है. आज वास्तविकता देखने का मौका मिला.

गाड़ी से बाहर निकलते ही हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास हुआ. चारों तरफ से धुएं जैसे उड़ते हुए कोहरे को देखने से लग रहा था मानो हम बादलों के बीच खड़े हो कर आंखमिचौली खेल रहे होें. दूरबीन से चारों तरफ नजर दौड़ाई तो सोचने लगे कहां थे हम और कहां पहुंच गए.

अभी तक शांत सी रहने वाली मनामी धीरे से बोल उठी, ‘इस ठंड में यदि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा रहता.’

‘चलिए, पास में ही एक चाय का स्टौल दिख रहा है, वहीं चाय पी जाए,’ मैं मनामी से बोला.

हाथ में गरम दस्ताने पहनने के बावजूद चाय के प्याले की थोड़ी सी गरमाहट भी काफी सुकून दे रही थी.

मसूरी के अप्रतिम सौंदर्य को अपनेअपने कैमरों में कैद करते हुए जैसे ही हमारी गाड़ी धनौल्टी के नजदीक पहुंचने लगी वैसे ही हमारी बर्फबारी देखने की आकुलता बढ़ने लगी. चारों तरफ देवदार के ऊंचेऊंचे पेड़ दिखने लगे थे जो बर्फ से आच्छादित थे. पहाड़ों पर ऐसा लगता था जैसे किसी ने सफेद चादर ओढ़ा दी हो. पहाड़ एकदम सफेद लग रहे थे.

पहाड़ों की ढलान पर काफी फिसलन होने लगी थी. बर्फ गिरने की वजह से कुछ भी साफसाफ नहीं दिखाई दे रहा था. कुछ ही देर में ऐसा लगने लगा मानो सारे पहाड़ों को प्रकृति ने सफेद रंग से रंग दिया हो. देवदार के वृक्षों के ऊपर बर्फ जमी पड़ी थी, जो मोतियों की तरह अप्रतिम आभा बिखेर रही थी.

गाड़ी से नीचे उतर कर मैं और मनामी भी गिरती हुई बर्फ का भरपूर आनंद ले रहे थे. आसपास अन्य पर्यटकों को भी बर्फ में खेलतेकूदते देख बड़ा मजा आ रहा था.

‘सर, आज यहां से वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा. आप लोगों को यहीं किसी गैस्टहाउस में रुकना पड़ेगा,’ टैक्सी ड्राइवर ने हमें सलाह दी.

‘चलो, यह भी अच्छा है. यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और अच्छी तरह से एंजौय करेंगे,’ ऐसा सोच कर मैं और मनामी गैस्टहाउस बुक करने चल दिए.

‘सर, गैस्टहाउस में इस वक्त एक ही कमरा खाली है. अचानक बर्फबारी हो जाने से यात्रियों की संख्या बढ़ गई है. आप दोनों को एक ही रूम शेयर करना पड़ेगा,’ ड्राइवर ने कहा.

‘क्या? रूम शेयर?’ दोनों की निगाहें प्रश्नभरी हो कर एकदूसरे पर टिक गईं. कोई और रास्ता न होने से फिर मौन स्वीकृति के साथ अपना सामान गैस्टहाउस के उस रूम में रखने के लिए कह दिया.

खुशियां आई घर : बांटने से खुशियां बढ़ती है

विश्वनाथ ने अपने घर में बगिया लगाई हुई थी. एक आम पर कच्ची कैरियां लदी थीं. गरीब घर के मोहित और राधिका ने कैरियां तोड़ कर खा लीं. यह देख कर विश्वनाथ को अपना बचपन याद आ गया, जब वे किसी को अपने मकान के पेड़ से फल नहीं तोड़ने देते थे. क्या उन्होंने मोहित और राधिका को सजा दी?

विश्वनाथ पटना शहर में बने आलीशान घर में अकेले ही रहते थे. उन के बच्चे विदेश में अपनी ही दुनिया में मस्त थे. विश्वनाथ ने भी अपनेआप को बिजी रखने के लिए घर के पिछले हिस्से में कई तरह के फलदार पेड़ लगा रखे थे.

विश्वनाथ सुबहसुबह रोजाना एक घंटा बगिया में काम करते थे. उन की मेहनत रंग लाई. इस बार आम का पेड़ कैरियों से लद गया था.

झुग्गियों में रहने वाले मोहित और राधिका कालोनी में लोगों की कारों की सफाई करने का काम करते थे.

एक दिन दोपहर में वे दोनों जब विश्वनाथ के घर के पिछवाड़े में लगे आम के पेड़ की छांव में सुस्ताने बैठ गए, तो उन का ध्यान ऊपर गया.

कच्ची कैरियों को देख कर राधिका का मन ललचा उठा, ‘‘मोहित, मेरे लिए एक आम तोड़ दो.’’

‘‘नहीं, किसी से बिना पूछे फल नहीं लेते,’’ मोहित बोला.

‘‘तू तो ऐसे कह रहा है, जैसे पूछने से तुझे तोड़ने देंगे…’’

‘‘इतना ही खाना जरूरी है, तो खरीद कर क्यों नहीं खाती…’’

‘‘मोहित, मैं तुझे धन्ना सेठ नजर आती हूं क्या? इतना कमा लेती तो दुकान से बढि़या कपड़े न खरीद लेती. बालटी उठाउठा कर कमर दोहरी हो जाती है, तब कहीं 10-20 रुपए हाथ आते हैं. उन को भी मां को देना पड़ता है, तब कहीं मेरे घर चूल्हा जलता है.’’

‘‘राधिका, मेरा भी तो यही हाल है, वरना कसम से खरीद कर खिला देता तुझे कच्ची कैरी.’’

‘‘चलचल, तू तो रहने ही दे. तुझ से न हो पाएगा, मैं ही कुछ करती हूं,’’ राधिका ने इधरउधर नजर दौड़ाई. उसे एक लकड़ी दूर पड़ी हुई दिखाई दी. वह उसे उठा कर ले आई और निशाना साध कर लकड़ी फेंकी, पर वह कैरी तक पहुंच ही नहीं पाई.

राधिका गुस्से में मुंह फुला कर वहां से चल दी.

‘‘ओहो, राधिका… कहां चल दी…’’

‘‘जहन्नुम में…’’

‘‘रुको जरा… मैं भी आ रहा हूं…’’

‘‘ओहो, तुम भी… न, तुम मेरे पीछे मत आओ.’’

‘‘यह सड़क तुम्हारी नहीं है…

सभी के लिए बनी है…’’

‘‘ओह… ठीक है…’’

‘‘अब यह फिक्र जताने की नौटंकी मेरे सामने मत करना, वरना कट्टी… राधा रानी, गुस्सा थूक दो. चलो, मैं तुम्हें उसी पेड़ से कैरी तोड़ देता हूं…’’

‘‘सच में देगा… झठ तो नहीं बोल रहा…’’

‘‘चलो, न तोड़ कर दूं तब कहना…’’

राधिका मुड़ कर फिर पेड़ के नीचे पहुंच गई.

मोहित ने डंडा उठा कर कई बार कैरी पर निशाना साधा और जोर से डंडा फेंक कर मारा. झट से 2 कच्चे आम राधिका की झोली में आ गिरे.

राधिका खुशी से नाच उठी और वहीं बैठ कर आम खाने लगी.

‘‘मुझे भी तो दे आम… अकेले ही खा जाएगी क्या…’’

‘‘मरा क्यों जा रहा है… लड़कियां कच्चे आम खाती हैं, लड़के नहीं खाते…’’

‘‘तुझ से किस ने कहा कि लड़के कच्चे आम नहीं खाते…’’

‘‘मेरी मां भाई को खाने से मना करती है…’’

‘‘वैसे, तेरा भी अभी कच्चे आम खाने का समय नहीं आया है…’’

सोलह बरस की राधिका का मुंह शर्म से लाल हो गया, ‘‘चल हट, बेशर्म कहीं का…’’

पास बैठे मोहित ने राधिका के माथे पर हवा से लहराती बालों की लट को आहिस्ता से अपने हाथों से संवार दिया.

राधिका ने मोहित को धीरे से धक्का दिया, ‘‘दूर से बात करो…’’ और दोनों खिलखिला कर हंस दिए.

मोहित और राधिका उठ कर झुग्गियों की तरफ बढ़ गए.

विश्वनाथ कुछ देर पहले बगिया में आए थे और दोनों को बातें करते देख पेड़ की ओट में हो गए. उन की तरफ दोनों की पीठ थी, इसलिए वे उन का चेहरा नहीं देख पाए. वे मुसकराते हुए अंदर चले गए.

अगले दिन विश्वनाथ दोपहर में बारबार खिड़की से झांक कर देख रहे थे कि अब वह लड़का आए और देखें कौन है, लेकिन उस दिन कोई नहीं आया.

अगले दिन विश्वनाथ बगीचे में टहल रहे थे कि तभी आम के पेड़ पर हलचल हुई. वे एक पेड़ की आड़ से देखने लगे. लड़के ने डंडी मारी और कुछ आम जमीन पर गिर पड़े. साथ खड़ी लड़की ने लपक कर वे उठा लिए.

अब अकसर वे दोनों उसी आम के पेड़ के नीचे समय बिताते नजर आते. विश्वनाथ को मोहित में अपना पोता नजर आता था. उन्हें दूर से देख कर ही मन को एक अजीब सी शांति मिलती थी.

एक दिन बरामदे में बैठे विश्वनाथ सोचने लगे… आज से 40 साल पहले वे पिताजी के साथ कानपुर में रहते थे. रेलवे के क्वार्टरों में पीछे बगीचा था. घर रेलवे स्टेशन के पीछे ही बना था, तो रेल की पटरियों पर कबाड़ बीनने वाले बच्चे घूमते हुए आते और दोपहर में मौका पा कर फल तोड़ लिया करते.

पिताजी से शिकायत करते तो वे यही कहते, ‘खाने की चीज है, खाने दो… बेचारे खरीद कर तो खा नहीं सकते…’

विश्वनाथ को इस बात पर बहुत गुस्सा आता था. वे भुनभुनाते हुए पढ़ने बैठ जाते, लेकिन उन का ध्यान अमरूद के पेड़ पर ही रहता? और जब भी वे बच्चों को देखते, उन्हें भगा कर ही दम लेते.

एक दिन पिताजी ने विश्वनाथ को टोका, ‘विशू, अमरूद पक कर गिरते जा रहे हैं. तुम भी इतना खाते नहीं हो… बेचारे बच्चों को ही खाने दो…’

लेकिन विश्वनाथ को तो जिद हो गई थी कि इन बच्चों को नहीं खाने देना है. नतीजतन, अमरूद पकपक कर गिरने लगे और सड़ने लगे. पिताजी ने तुड़वा कर पड़ोसियों को देने के लिए कहा, तो विश्वनाथ को वह भी पसंद नहीं आया.

तब पिताजी ने कहा, ‘बेटा, बांटने से खुशियां बढ़ती हैं.’

लेकिन विश्वनाथ को समझ में कुछ नहीं आता था. वे गुस्से से पैर पटकते हुए अंदर चला जाते और फल की टोकरी उठा कर बेमन से सभी पड़ोसियों को बांट आते थे. पर, आज बच्चों को फल तोड़ते देख कर विश्वनाथ को गुस्सा नहीं आया.

पिछले कुछ दिनों तक बच्चे पेड़ के पास दिखाई नहीं दिए. विश्वनाथ का मन बेचैन रहा. इस बीच आम पक गए थे. आज ही माली ने सुबह तोड़ कर रख दिए.

विश्वनाथ ने माली के साथ पड़ोसियों को आम बंटवा दिए और कुछ माली काका को दे दिए. कुछ आम उन बच्चों के लिए भी रखवा लिए.

‘‘माली काका, अगर आप को एक लड़का और लड़की साथ में दिखाई दें, तो उन्हें घर बुला लेना.’’

‘‘जी साहब, नजर आए तो जरूर बुला लेंगे,’’ कह कर माली निराईगुड़ाई करने लगा.

‘‘राधिका, एक भी आम पेड़ पर नहीं है,’’ मोहित ने कहा.

‘‘वह देख माली काका… हमें यहां देख लेंगे तो पकड़े जाएंगे… चल जल्दी…’’ राधिका बोली.

आवाज सुन कर माली ने पीछे मुड़ कर  देखा और बोले, ‘‘यहां आओ…’’

‘‘जी, हम ने कोई आम नहीं तोड़ा है…’’ मोहित ने कहा.

‘‘अरे, तुम दोनों को हमारे साहब बुला रहे हैं… अंदर आ जाओ…’’

‘‘मोहित, मत जाना… दाल में कुछ काला है,’’ राधिक मोहित के कान में फुसफुसाई.

‘‘जो होगा देखा जाएगा… ओखली में सिर दिया है, तो डरना क्या…’’

‘‘मोहित, आज बड़ी कहावतें याद आ रही हैं. अगर मार पड़ी न तो नानी भी याद आ जाएगी.’’

मोहित और राधिका डरते हुए माली काका के पीछेपीछे चल दिए. घर में घुसे तो बैठक में एक बुजुर्ग बैठे थे. उन्होंने एकसाथ ‘दादाजी नमस्ते’ कहा.

विश्वनाथ ने उन दोनों को बैठने का इशारा किया.

राधिका अपने कपड़े समेट कर जमीन पर बैठ गई, जबकि मोहित अभी भी खड़ा हुआ था.

‘‘मोहित… यही नाम है न तुम्हारा?’’

‘‘जी हां, मेरा नाम मोहित है… आप को कैसे पता चला?’’

‘‘आम के पेड़ पर बने दिल में लिखा देखा था तुम दोनों का नाम.’’

राधिका और मोहित शरमा गए.

‘‘शरमाओ मत… बैठ जाओ…’’

मोहित भी राधिका के पास बैठ गया.

‘‘माली काका, इन बच्चों को आम काट कर खाने को दो.’’

‘‘जी मालिक, अभी लाया…’’ माली काका प्लेट में आम काट कर ले आए और बच्चों के सामने प्लेट रख दी.

‘‘बच्चो, आम खाओ…’’

राधिका मोहित की तरफ हैरानी से देखने लगी.

मोहित ने प्लेट से आम का टुकड़ा उठा कर राधिका को दिया. दोनों बैठ कर आम खाने लगे. विश्वनाथ को आज से पहले कभी ऐसे सुकून का अनुभव नहीं हुआ था.

‘‘माली काका, इन बच्चों को घर ले जाने के लिए भी आम दे दो,’’ विश्वनाथ ने कहा.

माली ने आम दे कर बच्चों को विदा कर दिया. जाते हुए बच्चों को देख कर विश्वनाथ हाथ हिलाते रहे और बोले, ‘‘बच्चो, जब भी समय मिले, मुझ से मिलने आते रहना.’’

‘‘राधिका, आज तो बच गए… मार नहीं पड़ी. अभी तक तो यही होता था कि कोई भी हमें चपत लगा देता था.’’

‘‘आज तो कमाल ही हो गया. कितने अच्छे वाले दादाजी हैं. मैं यों ही डर ही रही थी.’’

बच्चों के चले जाने के बाद विश्वनाथ आरामकुरसी पर बैठ कर मुसकरा पड़े.

देखतेदेखते कब 3 बरस बीत गए, पता ही नहीं चला. मोहित और राधिका को कालोनी के सैक्रेटरी से कह कर विश्वनाथ ने कम्यूनिटी हाल की देखरेख की नौकरी दिलवा दी थी. तब से दोनों मन लगा कर काम कर रहे थे.

एक दिन मोहित अपनी शादी का कार्ड देने के लिए आया, ‘‘दादाजी,

मैं राधिका से शादी कर रहा हूं. आप हम दोनों को आशीर्वाद देने जरूर आइएगा. आप की बात सैक्रेटरी साहब नहीं टालते हैं. सैक्रेटरी साहब ने हमारी के शादी के लिए कम्यूनिटी हाल दे दिया है.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा हुआ. सारा इंतजाम कालोनी वालों के सहयोग से हो गया है. मैं तुम दोनों बच्चों को आशीर्वाद देने जरूर आऊंगा.’’

शादी वाले दिन विश्वनाथ जब कम्यूनिटी हाल पहुंचे, तो उन्हें देखते ही राधिका और मोहित स्टेज से उतर कर आए और उन के पैर छुए और उन्हें आदर समेत स्टेज पर ले गए.

दोनों के सिर पर हाथ रखते ही विश्वनाथ की खुशी से आंखें भर आईं. राधिका दुलहन के रूप में बहुत सुंदर लग रही थी.

विश्वनाथ ने नई जिंदगी की शुरुआत के लिए राधिका और मोहित के नाम 50,000 रुपए का चैक उपहार में दिया.

विश्वनाथ घर आते हुए सोच रहे थे, ‘पिताजी, आप ठीक कहते थे… बांटने से खुशियां बढ़ती हैं.’

नीरो अभी जिंदा है

बचपन में एक कहावत सुनी थी कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था, मगर जब इतिहास पढ़ना शुरू किया तो इस कहावत की जड़ तक पहुंचने की कोशिश की. कहावत से आगे एक तानाशाह राजा की कारिस्तानी पता चली.

हुआ यों कि सम्राट नीरो ने एक बहुत बड़ी पार्टी का आयोजन किया था. तेसतीस के बाग में पार्टी रखी गई थी और रोम साम्राज्य के तमाम बड़े लोगों को न्योता दिया गया था. उस समय उस बगीचे में शाम को रोशनी का इंतजाम नहीं हो पाया था.

रोशनी का बंदोबस्त किस तरह किया जाए, इस के लिए सम्राट नीरो चिंता में पड़ गया. देशभर के इज्जतदार लोगों के बीच अपनी इज्जत का सवाल था. रोशनी व चमकदमक हर हाल में जरूरी थी.
सम्राट नीरो को आइडिया आया और जेल प्रहरियों व अनाथाश्रम संचालकों को निर्देश दिया गया कि जितने भी जेलों में व गरीब और लाचार लोग अनाथाश्रम में पड़े हैं, उन सब को बगीचे के चारों तरफ खड़ा कर के उन को आग के हवाले कर दो, ताकि पूरा बगीचा रोशन हो जाए और देशभर के नामचीन लोगों के बीच उस की इज्जत बरकरार रहे.

मेरे मन में सवाल यह नहीं था कि कितने लोगों को फूंका गया था या वे मरने वाले लोग कौन थे? सवाल यह था कि उस पार्टी में शामिल लोग कौन थे, जो अपना ईमान और इनसानियत सबकुछ ठेंगे पर रख कर पार्टी का लुत्फ उठाते रहे थे?

सवाल यह नहीं था कि विभिन्न आरोपों में जेलों में बंद पड़े लोगों को फूंक दिया गया और न न्यायपालिका बोल पाई और न ही आम जनता. सवाल यह भी था कि जब बेबस और बेसहारा लोगों को उस पार्टी के लिए फूंका जा रहा था, तो किसी ने विरोध क्यों नहीं किया?

जब मैं इतिहास के इन छिपे पन्नों की सचाई खोज रहा था, तो मेरे मन में सवाल यह नहीं था कि गड़े मुरदे उखाड़ कर वर्तमान व भविष्य के लिए बदले व नफरत की फसल की बोआई करूं, बल्कि मेरा ध्यान उसी सवाल पर लगा था कि उस पार्टी में वे मेहमान कौन थे?

देश के किसानों और कमेरों के निकलते जनाजे के बीच खुद को लाचार पाया, तो उस को भूल कर आज भाषण सुनने लग गया. मेरी दुविधा या सवाल यह नहीं है कि देश में किसानों की बरबादी कैसे हुई, बल्कि मेरा सवाल यह है कि किसानों की चिताएं जब बगीचे के चारों तरफ खड़ी कर के फूंकी जा रही हैं, तो इन की पार्टी में शामिल मेहमान कौन हैं?

आज पूरे 20 मिनट भाषण सुना, तो मुझे यकीन हो गया कि नीरो मरा नहीं था, वह अभी जिंदा है.
मेरा सवाल यह नहीं है कि नीरो ऐसा क्यों कर रहा है? मेरा सवाल यह नहीं है कि नीरो की पार्टी की इज्जत के लिए कौन लोग जिंदा फूंके जा रहे हैं?

मेरा असली सवाल यह है कि नीरो की पार्टी में शामिल वे मेहमान कौन हैं, जो तानाशाह राजशाही में बगावत  करने वाले जेलों में बंद आरोपी को फूंक रहे हैं, मगर ह्विस्की का मजा उठा रहे हैं?

वे मेहमान कौन हैं, जो भूखप्यास, सर्दीगरमी में दिल्ली बौर्डर पर बैठे किसानों को पार्टी की इज्जत के लिए जिंदा फूंकने की तैयारी कर रहे हैं, मगर उन के ऐशोआराम में कोई रुकावट नहीं पड़ने देना चाहते.
मेरा सवाल यह नहीं है कि नीरो की पार्टी के चलते वैश्विक महामारी कोरोना में देश क्यों फूंका जा रहा है, बल्कि मेरा असली सवाल यह है कि पार्टी का लुत्फ उठाने वाले कौन लोग हैं?

किसान, बीमार, मजदूर के मुद्दों में कुछ बदलाव हो सकता है, मगर उन का दर्द एक ही है कि वे दिल्ली में बैठे नीरो की पार्टी को रोशन करने के लिए जिंदा फूंके जा रहे हैं. अब मैं बताता हूं कि नीरो की पार्टी के मेहमान कौन थे. सम्राट नीरो, उस के मंत्रिमंडल के सदस्य, सरकारी अफसर, जज, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार, पढ़ाने वाले, क्रांतिकारी विचारक और समाज के बुद्धिजीवी लोग.

जो पार्टी में शामिल नहीं थे, वे जलते गरीबों के बुतों के बीच से ह्विस्की की गिलास लेदे रहे थे और जैसे ही एक लाश जल कर गिरती, वैसे ही अंदर से बाहर की तरफ ऐशोआराम की दवा फेंक दी जाती थी. कुसूर भूतकाल के नीरो का नहीं था और न ही वर्तमान के नीरो का है. कुसूर न किसानों और मजदूरों का है और न ही महामारी से पीडि़तों का है.

नीरो की पार्टी में शामिल कौन लोग हैं, बस इतना देखते रहिए. देशभर में तकरीबन 700 हाईटैक दफ्तर बनाए जा चुके हैं और काम जारी है, बाकी जनता आपस में सहयोग कर के देख ले, शायद बचने का और कोई रास्ता निकल आए.

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उपहार

बैजू की साली राधा की शादी बैजू के ताऊ के बेटे सोरन के साथ तय हो गई. बैजू और उस की पत्नी अनोखी नहीं चाहते थे कि यह शादी हो, पर सोरन के बड़े भाई सौदान ने राधा के भाई बिल्लू को बिना ब्याज के कर्ज दे कर यह सब जुगाड़ बना लिया था.

अब ऊपरी खुशी से बैजू और अनोखी इस शादी को कराने में जुट गए. शादी से पहले ही राधा ने जीजा से अपने लिए एक रंगीन टीवी उपहार में मांग लिया.

बैजू ने दरियादिली से मान लिया, पर जब अनोखी ने सुना, तो वह जलभुन गई. घर आते ही वह आंखें तरेर कर बोली, ‘‘अपने घर में कालासफेद टैलीविजन नहीं और तुम साली को रंगीन टीवी देने चले हो.

‘‘चलो, सिर्फ साली को देते तो ठीक था, लेकिन उस की शादी में टीवी देने का मतलब है कि सोरन के घर टीवी आएगा. हम टीवी दे कर भी बिना टीवी वाले रहेंगे और सोरन बिना पैसा दिए ही टीवी देखने का मजा उठाएगा.

‘‘तुम आज ही जा कर राधा से टीवी के लिए मना कर दो, नहीं तो मेरीतुम्हारी नहीं बनेगी.’’

बैजू अनोखी की बात सुन कर सकपका गया. उसे तो खुद टीवी देने वाली बात मंजूर नहीं थी, लेकिन राधा ने रंगीन टीवी उपहार में मांगा, तो वह मना न कर सका.

समाज के लोग कहेंगे कि मर्द हो कर अपनी जबान का पक्का नहीं है. यह भी कहेंगे कि वह औरत की बातों में आ गया. सब उसे जोरू का गुलाम कहेंगे.

बैजू इतना सोच कर अपनी बीवी के सामने गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘अनोखी, मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं. इतने पर भी तू न माने, तो मैं तेरे पैरों में गिर जाऊंगा. इस बार की गलती के लिए मुझे माफ कर दे. आगे से मैं तुझ से पूछे बिना कोई काम न करूंगा.

‘‘मैं ने राधा को टीवी देने की बात कह दी है, अब मैं अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता. तू खुद ही सोच कि क्या मेरी बदनामी में तेरी बदनामी नहीं होगी? लोग मुझे झाठा कहेंगे, तो तुझे भी तो झाठे की बीवी कहेंगे. महल्ले की औरतें ताने मारमार कर तेरा जीना मुहाल कर देंगी. मुझे मजबूर मत कर.’’

अनोखी थोड़ी चालाक भी थी. उसे पता था कि कहने के बाद टीवी न देने से महल्ले में कितनी बदनामी होगी. वह अपने पति से बोली, ‘‘ठीक है, इस बार मैं तुम्हें माफ कर देती हूं, लेकिन आगे से किसी की भी शादी में ऐसी कोई चीज न देना, जो हमारे घर में न हो…

‘‘और तुम यह मत समझाना कि मैं बदनामी से डरती हूं. मैं तो केवल तुम्हारे मनुहार की वजह से यह बात मान गई हूं.’’

राधा और सोरन की शादी हुई. बैजू ने अपने दिल पर पत्थर रख कर रंगीन टीवी का तोहफा शादी में दे दिया.

अनोखी भी टीवी की तरफ देखदेख कर अपना दिल थाम लेती थी. मन होता था कि उस टीवी को उठा कर अपने घर में रख ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती थी.

अनोखी का सपना था कि उस के घर में भी रंगीन टीवी हो. उस टीवी पर आने वाले सासबहू की लड़ाई से लबरेज धारावाहिक धूमधाम से चलें. लेकिन ये सब अरमान सीने में ही दबे रह गए.

राधा सोरन के घर में आ कर रहने लगी. थोड़े ही दिनों में राधा ने सोरन से कह कर जीजा का दिया रंगीन टीवी चलाना शुरू कर दिया. टीवी इतनी तेज आवाज में चलता कि बगल में बने बैजू के घर में बैठी अनोखी के कानों तक सासबहू के भड़कते संवाद गूंजते.

अनोखी का दिल होता कि जा कर टीवी देख ले, लेकिन उस ने कसम खाई थी कि जब तक वह अपने घर में भी रंगीन टीवी न मंगवा लेगी, तब तक राधा के घर टीवी पर कोई प्रोग्राम न देखने जाएगी.

राधा ने एक दिन अपनी सगी बहन अनोखी से कहा भी, ‘‘जीजी, तू मेरे घर पर टीवी देखने क्यों नहीं आती? कहीं तुझे भी महल्ले के लोगों की तरह मुझ से जलन तो नहीं होती?’’

अनोखी इस बात को सुन कर खून का घूंट समझ कर पी गई. उस ने राधा को कोई जवाब न दिया, लेकिन दोचार दिनों में ही आसपड़ोस की औरतों से उसे सुनने को मिला कि राधा सब से कहती है, ‘‘मेरी बड़ी बहन मुझ से दुश्मन की तरह जलती है. क्योंकि मेरे घर में रंगीन टीवी है और उस के घर कालासफेद टीवी भी नहीं है.’’

अनोखी इस बात को भी खून का घूंट समझ कर पी गई. लेकिन एक दिन अनोखी का लड़का रोता हुआ घर आया. जब अनोखी ने उस से रोने की वजह पूछी, तो उस ने बताया, ‘‘मां, मौसी ने मुझे टीवी नहीं देखने दिया.’’

अपने लड़के से यह बात सुन कर अनोखी का अंगअंग जल कर कोयला हो गया. आखिर उस के पति का दिया टीवी उसी का लड़का क्यों नहीं देख सकता? शाम तक अनोखी इसी आग में जलती रही.

जब बैजू घर आया, तो उस ने तुगलकी फरमान सुना दिया, ‘‘तुम अभी जा कर उस टीवी को उठा लाओ. आखिर तुम ने ही तो उस को दिया है. जब हमारा दिया हुआ टीवी हमारा ही लड़का न देख सके, तो क्या फायदा… और वह राधा की बच्ची सारे महल्ले की औरतों से मेरी बदनामी करती फिरती है. तुम अभी जाओ और टीवी ले कर ही घर में कदम रखना.’’

अनोखी की लाल आंखें देख बैजू सकपका गया. अनोखी को जवाब भी देने की उस में हिम्मत न हुई. वैसे, गुस्सा तो बैजू को भी आ रहा था. वह सीधा सोरन के घर पहुंच गया.

राधा टीवी देख रही थी. बैजू को देखते ही वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आओ जीजा, तुम भी टीवी देख लो.’’

बैजू थोड़ा नरम हुआ, लेकिन अनोखी की याद आते ही फिर से गरम हो गया. वह थोड़ी देर राधा को देखता रहा, फिर बोला, ‘‘राधा, यह टीवी तुम्हें वापस करना होगा. मैं ने ही तुम्हें दिया था और मैं ही वापस ले जाऊंगा.’’

बैजू के मुंह से टीवी की वापसी वाली बात सुन कर राधा के रोंगटे खड़े हो गए. वह बोली, ‘‘जीजा, तुम्हें क्या हो गया है? आज तुम ऐसी बातें क्यों करते हो? यह टीवी तो तुम ने मुझे उपहार में दिया था.’’

बैजू कुछ कहता, उस से पहले ही महल्ले की कई औरतें और लड़कियां राधा के घर में आ पहुंचीं. उन्हें रंगीन टीवी पर आने वाला सासबहू का सीरियल देखना था.

शायद बैजू गलत समय पर राधा से टीवी वापस लेने आ पहुंचा था. इतने लोगों को देख बैजू के होश उड़ गए. भला, इतने लोगों के सामने उपहार में दिया हुआ टीवी कैसे वापस ले जाएगा. महल्ले की औरतों को देख कर राधा की हिम्मत बढ़ गई.

एक औरत ने राधा से पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है राधा बहन, इस तरह उदास क्यों खड़ी हो?’’

राधा शिकायती लहजे में उन सब औरतों को सुनाते हुए बोली, ‘‘देखो न बहन, जीजा ने पहले मुझे शादी के समय उपहार में यह टीवी दे दिया, लेकिन अब वापस मांग रहे हैं. भला, यह भी कोई बात हुई.’’

राधा की यह बात सुन कर बैजू सकपका गया. अब वह क्या करे. टीवी वापस लेने में तो काफी बदनामी होने वाली थी. उस ने थोड़ी चालाकी से काम लिया. वह गिरगिट की तरह एकदम रंग बदल गया और जोर से हंसता हुआ बोला, ‘‘अरे राधा, तुम तो बड़ी बुद्धू हो. मैं तो मजाक कर रहा था.

‘‘तुम मेरी सगी और एकलौती साली हो, भला तुम से भी मैं मजाक नहीं कर सकता. तुम बड़ी भोली हो, सोचती भी नहीं कि क्या मैं यह टीवी वापस ले जा सकता हूं… पगली कहीं की.’’

बैजू की इस बात पर राधा दिल पर हाथ रख कर हंसने लगी और बोली, ‘‘जीजा, तुम ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी. फिर तुम बिना साली के भटकते फिरते. जिंदगीभर तुम किसी लड़की से जीजा सुनने को तरसते.’’

इस बात पर सभी औरतों की हंसी छूट पड़ी. सारा माहौल फिर से खुशनुमा हो गया. बैजू को एक पल भी वहां रहना अच्छा नहीं लग रहा था. वह राधा से बोला, ‘‘अच्छा राधा, अब मैं चलता हूं. मैं तो यह देखने आया था कि टीवी सही चल रहा है कि नहीं.’’

राधा अपने जीजा के मुंह से इतनी फिक्र भरी बात सुन खुश हो गई और बोली, ‘‘जीजा, तुम आए हो तो शरबत पीए बिना न जाने दूंगी. एक मिनट बैठ जाओ, अभी बना कर लाती हूं.’’

राधा ने खुशीखुशी शरबत बना कर बैजू को पिला दिया. शरबत पीने के बाद बैजू उठ कर अपने घर को चल दिया. उसे पता था

कि अनोखी उस का क्या हाल करेगी. कहेगी कि साली की मुसकान से घायल हो गए. उस की मीठीमीठी बातों में फंस गए. उस ने शरबत पिला कर तुम को पटा लिया. उस के घर में ही जा कर रहो, अब तुम मेरे पति हो ही नहीं.

लेकिन बैजू भी क्या करता. भला उपहार को किस मुंह से वापस ले ले, वह भी इतनी औरतों के सामने. ऊपर से जिस से उपहार वापस लेना था, वह उस की सगी और एकलौती साली थी.

बैजू ने सोच लिया कि वह बीवी का हर जुल्म सह लेगा, लेकिन दिया हुआ उपहार वापस नहीं लेगा.

जिदगी एक बांसुरी है

जोकी हाट का ब्लौक दफ्तर. एक गोरीचिट्टी, तेजतर्रार लड़की ने कुछ दिन पहले वहां जौइन किया था. उसे आमदनी, जाति, घर का प्रमाणपत्र बनाने का काम मिला था. वह अपनी ड्यूटी को मुस्तैदी से पूरा करने में लगी रहती थी. सुबह के 10 बजे से शाम के 4 बजे तक वह सब की अर्जियां लेने में लगी रहती थी.

आज उसे यहां 6 महीने होने को आए हैं. अब उस के चेहरे पर शिकन उभर आई है. होंठों से मुसकान गायब हो चुकी है. ऐसा क्या हो गया है?

अजय भी ठहरा जानामाना पत्रकार. खोजी पत्रकारिता उस का शगल है. अजय ने मामले की तह तक जाने का फैसला किया. पहले नाम और डेरे का पता लगाया.

नाम है सुमनलता मुंजाल और रहती है शिवपुरी कालोनी, अररिया में.

अजय ने फुरती से अपनी खटारा मोटरसाइकिल उठाई और चल पड़ा. पूछतेपूछते वहां पहुंचा. आज रविवार है, तो जरूर वह घर पर ही होगी.

डोर बैल बजाई. वह बाहर निकली. अजय अपना कार्ड दिखा कर बोला, ‘‘मैं एक छोटे से अखबार का प्रतिनिधि हूं मैडमजी. मैं आप से कुछ खास जानने आया हूं.’’

‘फुरसत नहीं है’ कह कर वह अंदर चली गई और अजय टका सा मुंह ले कर लौट आया.

अजय दूसरे उपाय सोचने में लग गया. 15 दिन की मशक्कत के बाद उसे सब पता चल गया. सुमनलता को किसी न किसी बहाने से उस के अफसर तंग करते थे.

अजय ने स्टोरी बना कर छपवा दी. फिर तो वह हंगामा हुआ कि क्या कहने. दोनों की बदली हो गई. अच्छी बात यह हुई कि सुमनलता के होंठों पर पुरानी मुसकान लौट आई.

एक दिन अजय कुछ काम से ब्लौक दफ्तर गया था. उस ने आवाज दे कर बुलाया. अजय चाहता तो अनसुना कर सकता था, पर फुरसत पा कर वह मिला. औपचारिक बातें हुईं. उस ने अजय को घर आने का न्योता दिया और उस का फोन नंबर लिया. बात आईगई हो गई.

3 दिन बाद रविवार था. शाम को अजय को फोन आया. अजनबी नंबर देख कर ‘हैलो’ कहा.

उधर से आवाज आई, ‘सर, मैं मिस मुंजाल बोल रही हूं. आप आए नहीं. मैं सुबह से आप का इंतजार कर रही हूं. अभी आइए प्लीज.’

मिस मुंजाल यानी ‘वह कुंआरी है’ सोच कर अजय तैयार हुआ और चल पड़ा. एक बुके व मिठाई ले ली. डोर बैल बजाते ही उस ने दरवाजा खोला.

साड़ी में वह बड़ी खूबसूरत लग रही थी. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आइए, मैं आप का ही इंतजार कर रही थी.’’

अजय भीतर गया. वहां एक औरत बनीठनी बैठी थी. वह परिचय कराते हुए बोली, ‘‘ये मेरी मम्मी हैं. और मम्मी, ये महाशय पत्रकार हैं. मेरे बारे में इन्होंने ही छापा था.’’

अजय ने उन के पैर छू कर प्रणाम किया. वे उसे आशीर्वाद देते हुए बोलीं, ‘‘सदा आगे बढ़ो बेटा. आओ, बैठो.’’

तभी मिस मुंजाल बोलीं, ‘‘आप ने मुझे अभी तक अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’

वह बोला, ‘‘मुझे अजय मोदी कहते हैं. आप सिर्फ मोदी भी कह सकती हैं.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अंदर गई. पलभर में वह ट्रौली धकेलती हुई आई. उस पर केक सजा हुआ था. देख कर अजय को ताज्जुब हुआ.

उस ने खुलासा किया, ‘‘आज मेरा जन्मदिन है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘मेहमान कहां हैं?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप ही मेहमान हैं मिस्टर अजय मोदी.’’

‘‘ओह,’’ अजय ने इतना ही कहा.

मोमबत्ती बुझ कर उस ने केक काटा. पहला टुकड़ा अजय को खिलाया. अजय ने भी उसे और उस की मम्मी को केक खिलाया. फिर बुके व मिठाई के साथ बधाई दी और कहा, ‘‘मैं बस यही ले कर आया हूं. पहले पता होता, तो तैयारी के साथ आता.’’

उस ने इशारे से मना किया और बोली, ‘‘आज प्रोफैशनल नहीं पर्सनल मूमैंट को जीना है.’’

अजय चुप हो गया. रात के 8 बजे वह लौटा, तो वे दोनों अजनबी से एक गहरे दोस्त बन चुके थे.

2 महीने बाद अजय का प्रमोशन हो गया, तो सोचा कि उस के साथ ही सैलिबे्रट करे. फोन किया. उस ने बधाई दी. उस की आवाज में कंपन और उदासी थी.

अजय ने कहा, ‘‘आप आज शाम को तैयार रहना.’’

शाम में वह तैयार हो कर शिवपुरी पहुंचा. वह सजसंवर कर तैयार थी. दोनों मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पड़े.

अजय ने रास्ते में बताया कि वे दोनों पूर्णिया जा रहे हैं. वह कुछ नहीं बोली. होटल हर्ष में सीट बुक थी. खानेपीने का सामान उस की पसंद से और्डर किया. पनीर के पकौड़े, अदरक की चटनी कौफी…

अजय ने कहा, ‘‘मिस मुंजाल, आज हम लोग स्पैशल मूमैंट्स को जीएंगे.’’

वह गजब की मुसकान के साथ बोली, ‘‘जैसा आप कहें सर.’’

अजय ने प्यार से पूछा, ‘‘मिस मुंजाल, मुझे ‘सर’ कहना जरूरी है?’’

वह भी पलट कर बोली, ‘‘मुझे भी ‘मिस मुंजाल’ कहना जरूरी है?’’

अजय ने कहा, ‘‘ठीक है. आज से केवल अजय कहना या फिर मोदी.’’

वह बोली, ‘‘मुझे भी केवल सुमन या लता कहना.’’

फिर वह अपने बारे में बताने लगी कि वह हरियाणा के हिसार की है. नौकरी के सिलसिले में बिहार आ गई, पर अब मन नहीं लग रहा है. एलएलएम कर रही है. बहुत जल्द ही वह यहां से चली जाएगी. उसे वकील बनने की इच्छा है.

फिर अजय ने बताया, ‘‘मैं भी बहुत जल्द दिल्ली जौइन कर लूंगा. हैड औफिस बुलाया जा रहा है.’’

फिर उस ने मुझे एक छोटा सा गिफ्ट दिया. बहुत खूबसूरत ‘ब्रेसलेट’ था, जिस पर अंगरेजी का ‘ए’ व ‘एस’ खुदा था.

मैं ने भी एक सोने की पतली चेन दी. उस में एक लौकेट लगा था और एक तरफ ‘ए’ व दूसरी तरफ ‘एस’ खुदा था.

वह बहुत खुश हुई. ब्रेसलेट पहना कर उस ने अजय का हाथ चूम लिया और सहलाने लगी. वह भी थोड़ा जोश में आ गया. उस ने भी उसे चेन पहनाई और गरदन चूम ली. वह सिसकने लगी.

अजय ने वजह पूछी, तो बोली, ‘‘तुम पहले इनसान हो, जिस ने मेरी बिना किसी लालच के मदद की थी.’’

अजय ने कहा, ‘‘एलएलएम करने तक तुम यहीं रहो. कुछ गलत नहीं होगा. मैं हूं न.’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया. रात होतेहोते अजय ने उसे उस के डेरे पर छोड़ दिया. विदा लेने से पहले वे दोनों गले मिले.

अजय दूसरे ही दिन गुपचुप तरीके से बीडीओ साहब से मिला. अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उस की ड्यूटी बदलवा दी.

इस बात को 10 साल गुजर गए. अजय अपने असिस्टैंट के साथ एक मशहूर मर्डर मिस्ट्री की सुनवाई कवर करने पटियाला हाउस कोर्ट गया था. कोर्ट से बाहर निकल कर वह मुड़ा ही था कि कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मिस्टर मोदी, प्लीज रुकिए.’’

अजय ने देखा कि एक लड़की वकील की ड्रैस में हांफती हुई चली आ रही थी. पास आ कर उस ने पूछा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी प्लीज, आर यू मिस्टर अजय मोदी?’’

अजय ने कहा, ‘‘यस. ऐंड यू?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं रीना महिंद्रा. आप प्लीज मेरे साथ चलिए. मेरी सीनियर आप को बुला रही हैं.’’

अजय हैरान सा उस के साथ चल पड़ा. पार्किंग में एक लंबी नीली कार खड़ी थी. उस के अंदर एक औरत वकील की ड्रैस में बैठी थी.

अजय के वहां पहुंचते ही वह बाहर निकली और उस के गले लग गई.

अजय यह देख कर अचकचा गया. वह चहकते हुए बोली, ‘‘कहां खो गए मिस्टर मोदी? पहचाना नहीं क्या मुझे? मैं सुमनलता मुंजाल.’’

अजय बोला, ‘‘कैसी हैं आप?’’

वह बोली, ‘‘गाड़ी में बैठो. सब बताती हूं.’’

अजय ने अपने असिस्टैंट को जाने के लिए कहा और गाड़ी में बैठ गया. उस ने भी रीना को मैट्रो से जाने के लिए कहा और खुद ही गाड़ी ड्राइव करने लगी.

वह लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट में ले आई. अजय को एक गिलास पानी ला कर दिया और खुद फ्रैश होने चली गई.

कुछ देर बाद टेबल पर नाश्ता था, जिसे उस ने खुद बनाया था. फिर वह अपनी जिंदगी की कहानी बताने लगी.

‘‘आप ने तो चुपचाप मेरी ड्यूटी बदलवा दी. कुछ दिन बाद ही मुझे पता चल गया. सभी ताने मारने लगे. मुझ से सभी आप का रिलेशन पूछने लगे, तो मैं ने ‘मंगेतर’ बता दिया.

‘‘काफी समय बीत जाने पर भी जब आप नहीं मिले और न ही फोन लगा, तो मैं परेशान हो गई. पता चला कि आप दिल्ली में हो और अखबार भी बंद हो गया है.

‘‘मैं समझ गई कि आप जद्दोजेहद कर रहे होंगे. इधर मेरी मां को लकवा मार गया. मेरी एलएलएम भी पूरी हो गई थी. उस नौकरी से मैं तंग आ ही चुकी थी.

‘‘मां के इलाज के बहाने मैं दिल्ली चली आई. एक महीने बाद मेरी मां चल बसीं. फिर मेरा संघर्ष भी शुरू हो गया. दिल्ली हाईकोर्ट जौइन कर लिया और धीरेधीरे मैं क्रिमिनल वकील के रूप में मशहूर हो गई.’’

अजय मुसकरा कर रह गया.

उस ने पूछा, ‘‘आप बताओ, कैसी कट रही है?’’

अजय ने बताया, ‘‘दिल्ली आने के कुछ महीनों बाद ही अखबार बंद हो गया. मैं ने हर छोटाबड़ा काम किया. ठेला तक चलाया. अखबार बेचा. फिर एक दिन एक रिपोर्टिंग कर एक अखबार को भेजी और उसी में मुझे काम मिल गया. आज तक उसी में हूं.’’

‘‘बीवी बच्चे कैसे हैं?’’

अजय ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम मुंजाल, जब अपना पेट ही नहीं भर रहा हो, तो फिर वह सब कैसे?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘तब तो ठीक है.’’

अजय बोला, ‘‘सच कहूं, तो तुम्हारी जैसी कोई मिली ही नहीं और न ही मिलेगी. जहां इतनी कट गई है, तो आगे भी कट ही जाएगी.’’

वह बोली, ‘‘अच्छी बात है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘तुम्हारे बालबच्चे कहां और कैसे हैं?’’

वह फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘एक भिखारी दूसरे भिखारी से पूछ रहा है, तुम ने कितना पैसा जमा किया है.’’

फिर वह चेन दिखाते हुए बोली, ‘‘याद है न… ये चेन आप ने ही पहनाई थी. मैं ने तब से ही इसे अपना ‘मंगलसूत्र’ मान लिया है. समझे…’’

‘‘और फिर मैं हरियाणवी हूं. पति के शहीद होने पर भी दूसरी शादी नहीं करते, यहां तो मेरा ‘खसम’ मोरचे पर गया था, शहीद थोड़े ही हुआ था.’’

अजय उस की प्यार वाली बात सुन कर फफकफफक कर रोने लगा. वह उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘कितना झंडू ‘खसम’ हो आप मेरे? मर्द हो कर रोते हो?’’

अजय ‘खसम’ शब्द पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आई एम सौरी माई लव. यू आर ग्रेट ऐंड आई लव यू वैरी मच.’’

वह भी मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, इसलिए पलट कर मेरी खबर तक नहीं ली.’’

इस के बाद अजय को अपनी बांहों में कसते हुए वह बोली, ‘‘मैं इस ‘अनोखे मंगलसूत्र’ को दिखादिखा कर थक चुकी हूं, मोदी डियर. अब सब के सामने मुझे स्वीकार भी कर लो प्लीज.’’

वे दोनों अगले हफ्ते ही एक भव्य समारोह में एकदूसरे के हो गए.

कहा भी गया है कि जिंदगी एक बांसुरी की तरह होती है. अंदर से खोखली, बाहर से छेदों से भरी और कड़ी भी, फिर भी बजाने वाले इसे बजा कर ‘मीठी धुन’ निकाल ही लेते हैं.

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