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प्यार के राही-भाग 2 : हवस भरे रिश्ते

यह कह कर चाची गुस्से में पैर पटकते हुए अपने घर में चली गईं. दूसरे सभी लोग भी अपनेअपने घर चले गए. चाची के इस बरताव पर अब्बाजान और महल्ले वाले भौंचक्के रह गए.

अब्बाजान को सब से ज्यादा अचंभा इस बात पर हो रहा था कि आखिर जशीम राही की बीवी इतनी मामूली सी बात पर इतनी बेइज्जती क्यों कर रही थी? ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.

अब्बा घर में आ कर सब से पहले मेरे कमरे में आए और चारों ओर घूम कर देखा. सभी चीजें अपनी जगह पर थीं. मैं सोने का नाटक कर रही थी. उन्होंने मेरी चादर खींच कर देखा. मुझे सोते देख कर वह बाहर चले गए.

डौली चाची ने मासूम राही नामक फूल को बचपन से सींचा था, इसलिए

वे न चाहती थीं कि कोई दूसरी लड़की आ कर इस फूल से खेले. दरअसल, वे खुद उस से खेलने के इंतजार में कई साल से आस लगाए बैठी थीं. वे मासूम राही पर सिर्फ अपना हक समझने

लगी थीं, इसलिए जब उन्हें पता चला कि मैं मासूम से प्यार करने लगी हूं तो उन्होंने पिटवा कर मासूम को घर में कैद कर लिया.

उन्होंने जब से मासूम पर पाबंदी लगाई थी, तभी से उन के मन में सोई हवस का सैलाब सिर उठा रहा था. चाचा उन के इस नापाक इरादे को भांप गए थे, इसलिए वे एक पल भी मासूम को अपने से अलग नहीं रहने देते थे.

एक दिन चाची ने अपने मन की बात चाचा जशीम राही को बताते हुए कहा, ‘‘मैं कई दिनों से एक बात कहना चाह रही हूं. लेकिन यह सोच कर नहीं कह पा रही हूं कि कहीं आप बुरा न मान जाएं.’’

‘‘मैं भला क्यों बुरा मानूंगा. बोलो, क्या कहना चाहती हो?’’

इस पर वे बोलीं, ‘‘मैं मासूम राही से शादी करना चाहती हूं.’’

जशीम चाचा का मुंह हैरानी से फैल गया. वे गुस्से में उन के गाल पर एक थप्पड़ रसीद करते हुए गरजे, ‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है. तुम्हें शर्म नहीं आती, ऐसी बात करते हुए? मासूम राही तुम्हारे बेटे जैसा है, वह मुझे अब्बा और तुम्हें अम्मी कहता है.

‘‘इतना घिनौना और नापाक इरादा तुम्हारे मन में कैसे चला आया? तुम कम से कम अपनी उम्र का लिहाज तो करतीं. 42 साल की होने जा रही हो और एक 16 साल के लड़के, जिसे बेटे की तरह पाला, उस के साथ शादी करने की बात सोच रही हो. सारे महल्ले और रिश्तेदारी में बेइज्जती कराना चाहती हो. तुम्हारी अक्ल मारी गई है. ऐसी बात किसी और के सामने मत कहना, वरना लोग तुम्हारे नाम से भी नफरत करने लगेंगे.’’

इस पर चाची झल्लाते हुए बोलीं, ‘‘बस कीजिए, भाषण मत दीजिए. मैं ने आप से सलाह जानने के लिए कहा

था, भाषण देने के लिए नहीं. मैं करूंगी वही, जो मैं चाहती हूं. इस में बुराई भी क्या है?

‘‘मासूम जवान हो गया है. उसे शादी करनी ही है. किसी और से नहीं, मुझ से ही कर लेगा तो क्या गलत हो जाएगा? वह बचपन से ही इस घर में है, इसलिए शादी के बाद बिना किसी परेशानी के सारे काम संभाल लेगा. इस से आप को क्या परेशानी है?’’

इस पर चाचा बोले, ‘‘परेशानी यह है कि मैं मासूम राही का बाप हूं. मैं ने उसे सगे बेटे की तरह देखा है. मैं सोच भी नहीं सकता था कि तुम इतनी नीच हरकत पर उतर आओगी. अगर तुम में थोड़ी सी भी इनसानियत है, तो मासूम राही की शादी किसी काबिल लड़की से करा दो.’’

तब चाची सपाट लहजे में बोलीं, ‘‘ये सब बकवास बातें हैं. मैं तो इतना ही जानती हूं कि मासूम राही मेरे लिए खरीदा हुआ एक सामान है. मैं ने उसे 50,000 रुपए में खरीदा है, इसलिए मैं अपनी खरीदी हुई चीज को जब चाहूं, जिस तरह चाहूं इस्तेमाल कर सकती हूं. इस में किसी को दखल देने की जरूरत नहीं है.’’

इस पर चाचा ने चाची का गरीबान पकड़ कर कहा, ‘‘मासूम राही बाजार में बिकने वाली कोई बेजान चीज नहीं है. उस की भी खुशियां हैं, कुछ अरमान हैं. तुम्हें उस की जिंदगी बरबाद करने का कोई हक नहीं है. जरा सोचो, अगर तुम्हारा कोई बेटा होता तो मासूम राही के बराबर होता. क्या तुम उस से भी शादी कर लेतीं?’’

चाची तपाक से बोलीं, ‘‘आप हद से ज्यादा आगे बढ़ रहे हैं.’’

‘‘हांहां, बढ़ूंगा. तुम जो काम करने जा रही हो, उस के घिनौनेपन की कोई हद नहीं है. तुम कान खोल कर सुन

लो. अगर तुम ने मेरे बेटे मासूम से

शादी की बात दोबारा कही तो मैं खुदकुशी कर लूंगा और मेरी मौत की जिम्मेदार तुम होगी,’’ चाचा ने धमकी भरे शब्दों में कहा.

इस के बाद चाची ने फिर कभी चाचा से मासूम राही के बारे में कोई बातचीत नहीं की. लेकिन उन के मन में हवस अपनी जगह बैठी रही. चाचा जानते थे कि उन की वह हवस किसी भी समय अपनी शैतानी हरकत दिखा सकती है. ऐसी हालत में मासूम राही का बचे रहना नामुमकिन था.

प्यार का सफल प्रायश्चित्त – भाग 1

ऐसा क्यों होता है जिसे कई बार देखा हो, देख कर भी न देखा हो. आतेजाते नजर पड़ जाती हो लेकिन उसे ले कर कोई विचार, कोईर् खयाल न उठा हो कभी. ऐसा होता वर्षों बीत चुके हों. फिर किसी एक दिन बिना किसी खास बात या घटना के अचानक से उस का ध्यान आने लगता है. मन सोचने लगता है उस के विषय में. वह पहले जैसी अब भी है, कोई विशेषता नहीं. फिर भी उस के खयाल आते चले जाते हैं और वह अच्छी लगने लगती है अकारण ही, हो सकता है पहले उस के मन में कुछ हो या न भी हो, वहम हो मेरा कोरा. अभी भी उस का मन वैसा ही हो जैसा पहले मेरा था. उस को ले कर सबकुछ कोरा.

लेकिन, मु झे यह क्या होने लगा? क्या सोचने लगा मन उस के बारे में? क्यों उस का चेहरा आंखों के सामने  झूलने लगा हर वक्त? यह क्या होने लगा है उसे ले कर, नींद भी उड़ने लगी है. मैं नाम भी नहीं जानता. जानना चाहा भी नहीं कभी. लेकिन आजकल तो हाल ऐसा हो गया है कि बुद्धि भ्रष्ट सी हो गई है. आवारा मन भटकने लगा है उस के लिए. अब तो प्रकृति से मांगने लगा हूं कि मिल जाए वह तो सब मिल गया मु झे. एक  झलक पाने को मन मचलता रहता है. कहने की हिम्मत नहीं पड़ती.

अब सोचता हूं तो बहुतकुछ असमानताएं नजर आती हैं, उस में और मु झ में. उम्र, जाति, धर्म और भी न जाने क्याक्या? लेकिन ये सब क्यों होने लगा, यह सम झ नहीं पा रहा हूं. खुद में एक लाचारी सी है. मन की निरंतर बढ़ती हुईर् चाहत. क्या करूं अपनी इस बेवकूफी का? अपने पर गुस्सा भी आता है दया भी. जितना सोचता हूं कि न सोचूं, उतना ही सोचता जाता हूं और पता भी नहीं चलता कब रात गुजर गई सोचतेसोचते. क्या इसे प्यार कहेंगे?

कितना अजीब है यह सबकुछ. पता चलने पर क्या सोचेंगे लोग. वैसे पता चलने नहीं दूंगा किसी को मरते दम तक. उस से कहने की तो हिम्मत ही नहीं है. मान लो, कह भी दिया तो क्या होगा? कहीं गलत सम झ बैठी. कहीं हल्ला कर दिया इस बात का, मेरा प्रेम तो छिछोरा बन कर रह जाएगा. अब दिखती है तो देखता हूं मैं और चाहता हूं कि देखे वह मु झे. लेकिन सामने पड़ते ही न जाने कौन सी  िझ झक, कौन सी मर्यादा रोक लेती है? देख नहीं पाता, देखना चाहता हूं जीभर के. वह देखती है लेकिन नजर टकराने जैसा. जैसे आमनेसामने से गुजरते हैं. अजनबी या पहचाने चेहरे. बस, इस से ज्यादा कुछ नहीं. छोटा शहर, छोटा सा महल्ला, क्या करूं?

खत भी कैसे लिखूं कि उसे पता हो कि मैं ने लिखा है, लेकिन पता न चले किसी और को. पता चले और तमाशा खड़ा हो तो कह सकूं कि मैं ने नहीं लिखा. फिर पत्र उसी तक पहुंचे तो भी ठीक, घर में किसी के हाथ लगा तो उस की मुश्किल. शक के दायरे में तो आ ही जाऊंगा मैं. वैसे, यदि उस की हां हो तो फिर कोई डर नहीं मु झे. फिर चाहे जमाने को पता लग जाए. बस, उस के दिल में हो कुछ मेरे लिए.

आजकल तो मोबाइल का जमाना है, लेकिन मोबाइल तो पत्रों से भी ज्यादा विस्फोटक हैं. फिर, मु झे नंबर भी पता नहीं. पता लगाने की कोशिश कर सकता हूं. लेकिन मैं ने उस के हाथ में कभी मोबाइल देखा ही नहीं. कोशिश की तो थी उस का नंबर पता लगाने की. किसी भी नंबर से कर सकता था फोन. लेकिन सफल नहीं हुआ. मान लो, किसी दिन सफल हो भी जाऊं तो क्या होगा? क्या कहेगी, क्या सम झेगी वह? मानेगी या मना कर देगी. मु झे ऐसा करना चाहिए या नहीं. बहुत बड़ा सामाजिक, आर्थिक भेद है. क्या करूं मैं? यह सब हो कैसे गया?

क्या यह प्यार है या कुछ और. या मेरी बढ़ती उम्र की कोई अतृप्त लालसा. यही सोच कर हैरान, परेशान हूं कि ऐसा क्यों हो रहा है मेरे साथ. न मेरे सपनों की राजकुमारी से मेल खाती है वह, न कोई विशेषताएं हैं मु झे खींचने लायक उस में. फिर मैं किस  झं झट में अपनेआप फंसता जा रहा हूं. क्या यह मन का भटकना है, क्या कोई बुरा समय शुरू हो गया है मेरा. क्या सच में प्यार हो गया है मु झे. मैं दिनोंदिन पागल और बेचैन हो रहा हूं उस के लिए, मेरे न चाहने पर भी.

मैं क्या करूं, यह कोई फिल्म या कहानी नहीं है. यह जीवन है. एक मध्यवर्गीय महल्ला है जहां ऐसा सोचना भी ठीक नहीं. फिर इसे परिणित करना बहुत मुश्किल है और मान लो कि ऐसा हो भी जाए जैसा चाहता हूं मैं, तब क्या होगा, लड़की का भविष्य, मेरा वर्तमान, कहां जाएंगे भाग कर?

पुलिस, कोर्टकचहरी, मीडियाबाजी सबकुछ होगा. फिर अपने मातापिता के साथ आतीजाती दिखती लड़की से बात करना भी संभव नहीं है. लेकिन अचानक से यह सब क्यों होने लगा मन में. उस का खयाल, उस का चेहरा घूमता रहता है और दिनरात बेकरारी बढ़ती ही जा रही है निरंतर. यह गलत है, मैं जानता हूं, लेकिन यह बेईमान मन सुने, तब न. अब, बस, घुटते रहना है और किसी एक दिन ऐसी गलती भी होनी है मु झ से. जिस का क्या परिणाम होगा, मु झे पता नहीं या पता है, इसलिए हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन मन कर के रहेगा मनमानी और होगा कोई तमाशा.

मैं रोक रहा हूं खुद को लेकिन पता नहीं कब तक? मैं तो यही सोच कर परेशान हूं कि यह सब क्यों हो रहा है मेरे साथ. क्या कहूंगा मैं उस से. मान लो, मौका मिला भी और कहा, ‘तुम से प्यार करता हूं,’ आगे शादी की बात पर क्या कहूंगा? वह नहीं कहेगी तुम तो शादीशुदा हो? 2 बच्चों के बाप? शर्म नहीं आती तुम्हें. बात सही है. मैं हूं शादीशुदा. तो क्या मैं बोर हो चुका हूं अपनी पत्नी से? नहीं, ऐसा नहीं है, मैं चाहता हूं उसे. और बच्चों से कौन बाप बोर होता है? तो क्या मु झे नएपन की तलाश है. क्या मैं ऐयाशी की तरफ बढ़ रहा हूं. नहीं, वह तो कहीं भी कर सकता हूं.

यही लड़की क्यों पसंद और प्रिय है मु झे. क्या कह सकता हूं? क्या करूं मनचले मन ने जीना हराम कर रखा है. क्यों यह लड़की मेरी जिंदगी में घुसती चली जा रही है, मेरे मनमस्तिष्क में समाती ही जा रही है. ऐसा भी नहीं कि मैं छोड़ दूं उस की खातिर अपना परिवार. फिर किस हक से मैं उसे चाहता हूं पाना. सम झ के बाहर है बात. किस अधिकार से कहूं उस से. क्या वह हां कह सकती है. नहीं, बिलकुल नहीं. अगर कह दिया, तो होगा क्या आगे? शादी और प्रेम के भंवर में फंस जाऊंगा मैं. बदनामी, अपमान अलग. यह कैसी मुसीबत मोल ले ली मैं ने. सब इस मन का कियाधरा है. धिक्कार है ऐसे मन में. मैं अपने को विवश और दुविधा में क्यों पा रहा हूं?

क्या करूं, सोचसोच कर परेशान हूं. ठीक तो यही होगा कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुश रहूं. उन्हीं में मन लगाऊं. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है. अब मेरी हालत ऐसी हो गईर् है कि मैं उस साधारण सी दिखने वाली 25 वर्ष की लड़की को 45 की उम्र में देखे बिना चैन नहीं पा रहा हूं. दिल बच्चों की तरह मचल रहा है. उस के घर से निकलने, छत पर टहलने वापस आने के समय पर मैं ध्यान दे रहा हूं ताकि मैं उसे देख सकूं. देख ही तो सकता हूं और कुछ तो मेरे वश में है नहीं.

मैं घर की छत पर हूं. मेरे घर से लगा हुआ उस का घर है. वह अपनी छत पर है. मैं उस की तरफ देख रहा हूं. बीचबीच में उस की नजर भी मु झ पर पड़ रही है. लेकिन उस की नजर मेरी नजर से जुदा है. उस की नजर पड़ने पर मैं अपनी नजरें हटा नहीं रहा हूं, बल्कि पूरी बेशर्मी से उसे देखे जा रहा हूं. उसे शायद आश्चर्य हो रहा होगा मु झ पर. जिस आदमी ने कभी नहीं देखा उस की तरफ तब भी जब वह अविवाहित था और अब ऐसे देख रहा है.

उस ने नजरें हटा लीं. वह छत से उतर कर नीचे चली गई. थोड़ी देर बाद मैं भी. अब मेरा क्या काम छत पर. उस के कालेज जाने के समय पर मैं भी निकल पड़ता उस के पीछे. वह कालेज चली जाती. मैं सीधा निकल जाता. जब वह कालेज से लौटती तो मैं भी सारे कामधाम छोड़ कर उस के पीछे चल देता. वह अपने घर और मैं मजबूरी में अपने घर. जी तो यही चाहता कि मैं उस के साथ उस के घर चला जाऊं. अपने घर बुलाना, थोड़ा नहीं, बहुत मुश्किल है. काश, शादी के पहले यह सब कोशिश की होती, तो बात बन जाती. इतने पीछेपीछे चलने पर उस का ध्यान मेरी ओर खिंचना स्वाभाविक था. यह कोई एकदो दिन की बात नहीं थी कि वह इसे इत्तफाक मान लेती. अब वह भी मेरी तरफ गौर से देखने लगी. शायद उसे मु झ पर शक हो चला हो तो या उसे महसूस हुआ हो कि मैं उसे चाहने लगा हूं. हो सकता है उसे मु झ में बदनीयती नजर आने लगी हो कह नहीं सकता. मेरी पत्नी को जरूर मेरे इस टाइमबेटाइम घर से आनेजाने पर शक हुआ. तभी तो उस ने टोका. लेकिन मैं ने उसे टाल दिया. छत पर जाता, तो पत्नी भी छत पर आने लगी. मेरे कार्य में व्यवधान पड़ने लगा. लेकिन मैं ऐसा जाहिर कर रहा था मानो मु झे पेट की शिकायत हो, या खुली हवा में सांस लेना, डाक्टर के अनुसार, जरूरी था मेरे लिए.’’

पत्नी ने पूछा भी,‘‘ तुम्हें कुछ हुआ है, कोई बीमारी है, डाक्टर से मिले?’’

मेरा जवाब था, ‘‘हां, खुली हवा में टहलने के लिए, पैदल चलने के लिए कहा डाक्टर ने,’’ अब कैसे बताऊं कि जो दिल में बस चुकी है वह पैदल ही कालेज आतीजाती है. मु झे उम्मीद तब जगी जब वह मेरे घर कुछ काम से आई. आती तो वह पहले भी थी लेकिन उस वक्त मैं ने कभी ध्यान नहीं दिया. पड़ोसी थी, सो, मेरी पत्नी से परिचय था उस का. उस के परिवार का. आनाजाना लगा रहता था. लेकिन अब वह आई तो मु झे लगा कि वह मेरे लिए आई है और आती रहेगी मेरे लिए. वह मु झ से नमस्ते अंकल कहती. पहले कोई फर्क नहीं पड़ता था. लेकिन अब कहती तो दिल पर तीर चलने लगते.

मैं अब पहले से भी ज्यादा सजसंवर कर रहता. एक भी बाल सफेद नहीं दिखने देता था. दाढ़ी रोज बनाता था. अच्छे कपड़े पहनने लगा था. पहनता तो पहले भी था लेकिन अब अपने चेहरे, बाल, कपड़ों का ज्यादा ध्यान रखने लगा था. मेरा इस तरह उस के पीछपीछे आना, उसे एकटक ताकना, शायद उसे आभास हो गया था कि मेरे दिल में उस के लिए कुछ है. कुछ नहीं, बल्कि बहुतकुछ है.

उस में भी मु झे काफी परिवर्तन दिखाई देने लगे थे. उस की वेशभूषा, पहनावा, करीने से संवारे गए बाल. जो पहले कभी नहीं था. वह अब होने लगा था. उस का इतराना, बल खा कर चलना, पीछे मुड़ कर देखना, मुसकराना, नजर मिलते ही गालों पर लाली दौड़ जाना, उस के देखने में मु झे साफ फर्क नजर आने लगा था. यह मेरा भ्रम नहीं था.

उसे आभास हो चुका था कि मैं उस पर दिलोजान से फिदा हूं. लेकिन वह मु झ पर क्यों मेहरबान हो रही थी, मेरी सम झ में नहीं आ रहा था. उम्र का असर था. लग रहा होगा उसे, चाहता है कोई. चाहत कब देखती है उम्रबंधन? ये तो समाज के बनाए रिवाज हैं. जो न मु झे मंजूर हैं और न शायद उसे. आग बराबर लगी हुई थी दोनों तरफ. बहुत दिन इसी सोच में बीत गए कि वह कोई बात करे ताकि आगे की शुरुआत हो सके. लेकिन मैं भूल गया था कि शुरुआत पुरुष को ही करनी होती है.

मु झे उस के हावभाव से सम झ लेना चाहिए था. यदि मैं ने देर की, तो शायद बात हाथ से निकल जाए. वैसे भी, बहुत देर हो चुकी थी. इस से पहले कि और देर हो जाए, मु झे कह देना चाहिए उस से. लेकिन मैं क्या कहूं? कैसे कहूं? मेरे कहने पर यदि उस ने अनुकूल उत्तर न दिया. उलटा कुछ कह दिया, तो फिर कैसे रह पाऊंगा पड़ोसी बन कर? क्या इज्जत रह जाएगी मेरी महल्ले में? लेकिन चाहत है तो कहना होगा. अब बिना कहे काम नहीं चल सकता. मेरी नजर उस से टकराती तो मैं मुसकरा देता. जवाब में वह भी मुसकरा देती. अब बनी बात. लाइन क्लीयर है. अब कह सकता हूं मैं अपने दिल की बात. वह कालेज जा रही थी और मैं उस के पीछे थोड़े अंतर से चल रहा था. उस ने अपनी गति धीमी कर दी. मैं भी अपनी गति से चलता रहा. थोड़ी देर में बगल में था मैं उस की. अब हम साथसाथ चल रहे थे.

Father’s Day Special: जिंदगी जीने का हक- भाग 1

प्रणव तो प्रिया को पसंद था ही लेकिन उस से भी ज्यादा उसे अपनी ससुराल पसंद आई थी. हालांकि संयुक्त परिवार था पर परिवार के नाम पर एक विधुर ससुर और 2 हमउम्र जेठानियां थीं. बड़ी जेठानी जूही तो उस की ममेरी बहन थी और उसी की शादी में प्रणव के साथ उस की नोकझोक हुई थी. प्रणव ने चलते हुए कहा था, ‘‘2-3 साल सब्र से इंतजार करना.’’

‘‘किस का? आप का?’’

‘‘जी नहीं, जूही भाभी का. घर की बड़ी तो वही हैं, सो वही शादी का प्रस्ताव ले कर आएंगी,’’ प्रणव मुसकराया, ‘‘अगर उन्होंने ठीक समझा तो.’’

‘‘यह बात तो है,’’ प्रिया ने गंभीरता से कहा, ‘‘जूही दीदी, मुझे बहुत प्यार करती हैं और मेरे लिए तो सबकुछ ही ठीक चाहेंगी.’’

प्रणव ने कहना तो चाहा कि प्यार तो वह अब हम से भी बहुत करेंगी और हमारे लिए किसे ठीक समझती हैं यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन चुप रहा. क्या मालूम बचपन से बगैर औरत के घर में रहने की आदत है, भाभी के साथ तालमेल बैठेगा भी या नहीं.

अभिनव के लिए लड़की देखने से पहले ही केशव ने कहा था, ‘‘इतने बरस तक यह मकान एक रैन बसेरा था लेकिन अभिनव की शादी के बाद यह घर बनेगा और इस में हम सब को सलीके से रहना होगा, ढंग के कपड़े पहन कर. मैं भी लुंगीबनियान में नहीं घूमूंगा और अभिनव, प्रभव, प्रणव, तुम सब भी चड्डी के बजाय स्लीपिंग सूट या कुरतेपाजामे खरीदो.’’

‘‘जी, पापा,’’ सब ने कह तो दिया था लेकिन मन ही मन डर भी रहे थे कि पापा का एक भरेपूरे घर का सपना वह पूरा कर सकेंगे कि नहीं.

केशव मात्र 30 वर्ष के थे जब उन की पत्नी क्रमश: 6 से 2 वर्ष की आयु के 3 बेटों को छोड़ कर चल बसी थी. सब के बहुत कहने के बावजूद उन्होंने दूसरी शादी के लिए दृढ़ता से मना कर दिया था.

वह चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. उन्होंने घर में ही आफिस खोल लिया ताकि हरदम बच्चों के साथ रहें और नौकरों पर नजर रख सकें. बच्चों को कभी उन्होंने अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. आवश्यक काम वह उन के सोने के बाद देर रात को निबटाया करते थे. उन की मेहनत और तपस्या रंग लाई. बच्चे भी बड़े सुशील और मेधावी निकले और उन की प्रैक्टिस भी बढ़ती रही. सब से अच्छा यह हुआ कि तीनों बच्चों ने पापा की तरह सीए बनने का फैसला किया. अभिनव के फाइनल परीक्षा पास करते ही केशव ने ‘केशव नारायण एंड संस’ के नाम से शहर के व्यावसायिक क्षेत्र में आफिस खोल लिया. अभिनव के लिए रिश्ते आने लगे थे. केशव की एक ही शर्त थी कि उन्हें नौकरीपेशा नहीं पढ़ीलिखी मगर घर संभालने वाली बहू चाहिए और वह भी संयुक्त परिवार की लड़की, जिसे देवरों और ससुर से घबराहट न हो.

जूही के आते ही मानो घर में बहार आ गई. सभी बहुत खुश और संतुष्ट नजर आते थे लेकिन केशव अब प्रभव की शादी के लिए बहुत जल्दी मचा रहे थे. प्रभव ने कहा भी कि उसे इत्मीनान से परीक्षा दे लेने दें और वैसे भी जल्दी क्या है, घर में भाभी तो आ ही गई हैं.

‘‘तभी तो जल्दी है, जूही सारा दिन घर में अकेली रहती है. लड़की हमें तलाश करनी है और तैयारी भी हमें ही करनी है. तुम इत्मीनान से अपनी परीक्षा की तैयारी करते रहो. शादी परीक्षा के बाद करेंगे. पास तो तुम हो ही जाओगे.’’

अपने पास होने में तो प्रभव को कोई शक था ही नहीं सो वह बगैर हीलहुज्जत किए सपना से शादी के लिए तैयार हो गया. लेकिन हनीमून से लौटते ही यह सुन कर वह सकते में आ गया कि पापा प्रणव की शादी की बात कर रहे हैं.

‘‘अभी इसे फाइनल की पढ़ाई इत्मीनान से करने दीजिए, पापा. शादीब्याह की चर्चा से इस का ध्यान मत बटाइए,’’ प्रभव ने कहा, ‘‘भाभी की कंपनी के लिए सपना आ ही गई है तो इस की शादी की क्या जल्दी है?’’

‘‘यही तो जल्दी है कि अब इस की कोई कंपनी नहीं रही घर में,’’ केशव ने कहा.

‘‘क्या बात कर रहे हैं पापा?’’ प्रभव हंसा, ‘‘जब देखिए तब मैरी के लिटिल लैंब की तरह भाभी से चिपका रहता है और अब तो सपना भी आ गई है बैंड वैगन में शामिल होने को.’’

सपना हंसने लगी.

‘‘लेकिन देवरजी, भाभी के पीछे क्यों लगे रहते हैं यह तो पूछिए उन से.’’

‘‘जूही मुझे बता चुकी है सपना, प्रणव को इस की ममेरी बहन प्रिया पसंद है, सो मैं ने इस से कह दिया है कि अपने ननिहाल जा कर बात करे,’’ कह कर केशव चले गए.

‘‘जब बापबेटा राजी तो तुम क्या करोगे प्रभव पाजी?’’ अभिनव हंसा, ‘‘काम तो इस ने पापा के साथ ही करना है. पहली बार में पास न भी हुआ तो चलेगा लेकिन जूही, तुम्हारे मामाजी तैयार हो जाएंगे अधकचरी पढ़ाई वाले लड़के को लड़की देने को?’’

‘‘आप ने स्वयं तो कहा है कि देवरजी को काम तो पापा के साथ ही करना है सो यही बात मामाजी को समझा देंगे. प्रिया का दिल पढ़ाई में तो लगता नहीं है सो करनी तो उस की शादी ही है इसलिए जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है मामाजी के लिए.’’

जल्दी ही प्रिया और प्रणव की शादी भी हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि केशव जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए और कुछ लोगों की यह शंका जाहिर करने पर कि बच्चों के तो अपनेअपने घरसंसार बस गए, केशव के लिए अब किस के पास समय होगा और वह अकेले पड़ जाएंगे, अभिनव बोला, ‘‘ऐसा हम कभी होने नहीं देंगे और होने का सवाल भी नहीं उठता क्योंकि रोज सुबह नाश्ता कर के सब इकट्ठे ही आफिस के लिए निकलते हैं और रात को इकट्ठे आ कर खाना खाते हैं, उस के बाद पापा तो टहलने जाते हैं और हम लोग टीवी देखते हैं, कभीकभी पापा भी हमारे साथ बैठ जाते हैं. रविवार को सब देर से सो कर उठते हैं, इकट्ठे नाश्ता करते हैं…’’

प्यार के राही-भाग 1 : हवस भरे रिश्ते

उस दिन गजाला और मासूम राही की शादी बड़ी धूमधाम से हो रही थी. सभी लोग निकाह के वक्त का इंतजार कर रहे थे. मासूम राही दोस्तों के बीच सेहरा बांधे गपें मार रहे थे, तभी मौलवी साहब आए और निकाह की तैयारी होने लगी.

मौलवी साहब बोलते गए और मासूम राही निकाह कबूल करते गए. सारी रस्में खत्म होने के बाद सभी लोग मजे ले कर खाना खाने लगे.

अगली रात गजाला और मासूम राही अपने सुहागरात के कमरे में एकदूसरे के आगोश में खोए हुए थे और गरम तूफान की आग में जल रहे थे. कुछ मिनटों के बाद वह आग ठंडी हुई, तो वे एकदूसरे से अलग हुए.

गजाला की आंखें एकाएक फड़फड़ाने लगीं. वह सोचने लगी, ‘आज अपने प्यार को यह अंजाम देने के लिए हमें क्या नहीं करना पड़ा,’ फिर वह बिस्तर पर बिछे छोटेछोटे फूलों को सरसरी निगाहों से देखने लगी और अपनी प्यारभरी यादों में डूब गई. एकएक सीन उस के दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूमने लगा और उस की आंखों में आंसू उमड़ आए.

मैं पटना में रह रही थी. मेरे पिता शौकत राही की 6 संतानें थीं, 4 बहनें और 2 भाई. मैं सब से बड़ी थी. हमारे अब्बा जान के पास काफी जमीनजायदाद थी. इसी वजह से हम सभी सुखचैन से जिंदगी गुजार रहे थे.

हमारे अब्बाजान के बड़े भाई जशीम चाचा के पास भी जमीनजायदाद थी, लेकिन उन्हें दिमागी चैन नहीं था, क्योंकि उन के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए जशीम चाचा बारबार चाची डौली को किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने के लिए कहा करते थे, लेकिन चाची हर बार टाल जातीं.

जब चाचा ने ज्यादा जिद की, तो चाची बोलीं, ‘‘देखिएजी, आप जिद कर रहे हैं, तो गोद लड़का ही लेंगे.’’

इस पर चाचा कहते, ‘‘नहीं, लड़की ही गोद लेंगे. आज के जमाने में लड़का और लड़की में फर्क ही क्या है?’’

तब चाची झल्ला कर बोलीं, ‘‘मैं समझती हूं कि जो हमारे बुढ़ापे में हमारी लंबीचौड़ी जायदाद को संभाल सके और हम दोनों को भी चैन की दो वक्त की रोटी दे सके, उसे ही गोद लेना चाहिए.’’

चाचा बेहद नरम दिल से बोले, ‘‘तुम्हारी बात तो ठीक है, लेकिन हम ऐसी बेटी गोद लेना चाहते हैं, जो हम दोनों की खिदमत कर सके. हम उस की शादी कर के दूल्हे को घरजमाई बना लेंगे. तब हम दोनों को दोहरा फायदा हो जाएगा. इस तरह हमें बेटाबेटी दोनों मिल जाएंगे.’’

इस पर चाची बोलीं, ‘‘जो करना है सो कीजिए, लेकिन मुझे तो बेटा ही चाहिए.’’

दूसरे दिन चाचा ने अपने नजदीकी दोस्त रमाशंकर को बुलाया और 10,000 रुपए दे कर कहा, ‘‘हम बच्चा गोद लेना चाहते हैं. तुम कोई लड़की ला कर हमें दो. हम तुम्हारे बहुत एहसानमंद रहेंगे. ले आने पर 40,000 रुपए और देंगे.’’

एक हफ्ते बाद रमाशंकर ने तकरीबन 9 साल का एक मासूम सा लड़का ला कर चाचा को देते हुए कहा, ‘‘लीजिए भाई जशीम राही, मैं ने अपना वादा पूरा किया. आप मेरा इनाम हवाले करें.’’

‘‘लेकिन यार, यह तो लड़का है. मैं ने तो किसी लड़की की गोद लेने की बात तुम से कही थी,’’ चाचा ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा.

‘‘यही लो. अब तक तो आप बिना औलाद के जी रहे थे, अब लड़का मिला है तो कह रहे हैं कि लड़की चाहिए. यह बेचारा कुदरत का मारा है. दानेदाने का मुहताज है. घर में इस के रहने से आप का दिल भी लगा रहेगा. इस मासूम को इतनी दूर से आप के पास ले आया हूं.’’

फिर कुछ सोच कर वे आगे बोले, ‘‘इस का नाम राही है. गांव में इस के मांबाप मजदूरी करते थे. इस के 4 भाईबहन हैं. गरीबी के चलते कई बार इस मासूम को भूखे पेट ही सोना पड़ता था. बाप शराबी है. एक दिन वह शराब के पैसे न दे सका तो इस बेचारे को ही शराब की दुकान में गिरवी रख दिया. वहीं से इसे छुड़ा कर लाया हूं.’’

चाचा ने रमाशंकर की मजबूरी समझी. बोले, ‘‘ठीक है, यह लो पैसे. आखिर डौली की ही इच्छा पूरी हुई.’’

मासूम को देख कर चाची बहुत खुश हुईं. उसे गोद में उठा कर वे बेतहाशा चूमने लगीं.

मासूम स्कूल जाने लगा. मैं तब

8 साल की थी. हम दोनों एक ही दर्जे में साथसाथ पढ़ने लगे. हमारे चाचा और हमारे अब्बा के मकान आमनेसामने थे, इसलिए हम दोनों अकसर एकदूसरे से मिलते रहते थे. दोनों साथसाथ खेलते और साथसाथ खाते 10वीं जमात पास कर गए. हम दोनों फुलवारी की तनहाइयों में घंटों बातचीत किया करते थे. बातबात में जब मासूम ने अपनी बीती कहानी मुझे सुनाई तो उस से मेरी हमदर्दी और बढ़ गई. मैं अकसर खानेपीने की चीजें ला कर मासूम को दिया करती. हम दोनों में लगाव बढ़ता गया.

मासूम राही मन लगा कर पढ़ता और चाचा का हाथ बंटाता. उस के बरताव, काम और पढ़ाई से चाचाचाची बहुत खुश थे. वे उसे अपने बेटे की तरह मानते और सारे जहां की खुशियां उस के कदमों में डाल कर उसे प्यार करते.

मासूम राही भी चाचाचाची को अम्मां और अब्बा कह कर पुकारता था. मैं सुबह उठ कर घर के कामों से निबटने के बाद उस के साथ कालेज जाया करती थी. शाम ढलने से पहले हर रोज हम फुलवारी में घूमने जाया करते थे.

वक्त गुजरता गया. हम दोनों ने बचपन की केंचुली उतार कर जवानी की दहलीज पर कदम रखा. दोनों जवां दिलों में एकदूसरे के लिए प्यारमुहब्बत का दरिया बहने लगा.

हम दोनों एकदूसरे के करीब आते गए, लेकिन अब बचपन की तरह खुलेआम नहीं, बल्कि चोरीछिपे एकदूसरे से मिलते रहे. हर प्यार करने वाले की तरह हमारा और मासूम राही का भी चोरीछिपे मिलना ज्यादा दिनों तक समाज से छिपा नहीं रह सका. फौरन ही महल्ले वालों को हमारी मुहब्बत की भनक लग गई. वे दबी जबान से हम दोनों की चर्चा करने लगे.

यह बात चाचा और चाची को पता लगी, तो उन्होंने मासूम को अपने दरबान और नौकरों से बुरी तरह से पिटवाया और बुराभला कहा. इधर मेरी भी हालत बदतर कर दी गई. हमारी अम्मी ने मुझे रस्सी से बांध दिया और डंडे से इतना पीटा कि मेरी पीठ से खून निकलने लगा. कई जख्म भी उभर आए थे.

मैं बेतहाशा चिल्ला रही थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. वे लगातार मेरे सिर पर वार करने लगीं, जिस से मैं बेहोश हो गई.

जब होश आया, तो मैं अस्पताल में थी. सिर, पीठ, हाथ और पैर में पट्टियां बंधी थीं. अब्बाजान पास ही में कुरसी पर बैठे हुए थे.

जब मैं ने आंखें खोलीं, तो वे बोले, ‘‘बेटी, यह सब छोड़ दो, नहीं तो हम से बुरा कोई नहीं होगा. मासूम से तो मैं निबट लूंगा. जिस के बारे में कुछ भी सहीसही मालूम नहीं है, उस के साथ इश्क लड़ाने चली है. अगर आज के बाद तुम घर से निकली, तो तुम्हें मैं जान से मार डालूंगा.’’

जब मैं एक महीने के बाद ठीक हो कर अस्पताल से घर आई, तो मुझे पंख कटे पक्षी की तरह घर में कैद कर दिया गया. मैं मन मसोस कर रह गई.

उधर मासूम राही हमारी याद में तड़प रहा था. उस पर भी चाचा के गुंडे नजर रखे रहते थे. मासूम से नहीं मिल पाने के चलते मैं बेचैन सी रहने लगी. उन्हीं दिनों पता लगा कि मासूम राही पर भी चाचा और चाची ने इतनी सख्त पाबंदी लगा दी थी कि वह चाह कर भी मुझ से नहीं मिल पा रहा था.

जब मैं खुद को नहीं रोक सकी, तो उस से रात में मिलने का फैसला किया. मैं आधी रात को मासूम से मिलने के लिए दबे पैर चाचा के घर में घुस गई. मासूम चाचा के कमरे में सोया हुआ था.

जैसे ही मैं उस के कमरे से गुजरी, वैसे ही अचानक आहट पा कर चाची उठीं. उन्होंने ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए चाचा को जगाया और तुरंत बंदूक ला कर देते हुए बोलीं, ‘‘गजाला आई है. आज जान से मार दीजिए.’’

चाचा ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए हमारे पीछे भागे. मैं सिर पर पैर रख कर गली की ओर भागी. चाचा ने मुझ पर

3 गोलियां चलाईं. गहरा अंधेरा होने के चलते उन का निशाना ठीक नहीं बैठा. इस गली से होते हुए मैं अपने कमरे में जा कर लेट गई.

आधी रात को गोलियों की आवाज सुन कर महल्ले में अफरातफरी हो गई. मेरे अब्बाजान और महल्ले वाले दौड़दौड़े चाचा के घर पहुंचे और गोली चलाने की वजह पूछी. चाचा गहरे अंधेरे में मुझे ठीक से पहचान नहीं सके थे. फिर भी उन्हें पूरा यकीन था कि वह गजाला ही थी, इसलिए उन्होंने अब्बाजान को अलग ले जा कर कहा, ‘‘भाई, तुम्हारी इज्जत हमारी इज्जत है. गजाला आई थी.’’

अभी चाचा अब्बाजान को समझा ही रहे थे कि चाची सब के सामने बोल पड़ीं. ‘‘शौकत राही, समझा ले अपनी बेटी को. वह जवानी के जोश में आधी रात को मेरे घर में चोरों की तरह घुस आई. आज तो वह बच कर भाग गई, लेकिन आज के बाद अगर उस ने ऐसी हरकत की तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगी.’’

अब्बाजान ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा, ‘‘आप यह कैसे कह सकती हैं कि वह गजाला ही थी? आप ने इतने अंधेरे में उसे पहचान लिया? हमारी बेटी पर इलजाम मत लगाइए. वह कोई चोरउचक्का होगा.’’

इस पर चाची ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘अगर यकीन नहीं आता तो घर जा कर देखो, वह इस समय घर में मौजूद

नहीं होगी. वह कहीं गली में जा कर छिपी होगी.’’

बुढ़ापे में जो दिल बारंबार खिसका

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Mother’s Day Special: मां की उम्मीद

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Mother’s Day Special- मोहपाश : बच्चों से एक मां का मोहभंग

जब से कुमार साहब ने औफिस से 2 महीने की छुट्टी ले कर नैनीताल जाने का मन बनाया था, तब से ही विभा परेशान थी. उस ने पति को टोका भी था, ‘‘अजी, पूरी जवानी तो हम ने घर में ही काट दी, अब भला बुढ़ापे में कहा घूमने जाएंगे.’’

‘‘अरे भई, यह किस डाक्टर ने कहा है कि जवानी में ही घूमना चाहिए, बुढ़ापे में नहीं,’’ कुमार साहब भी तपाक से बोले.

विभा के गिरते स्वास्थ्य को देख कर कुमार साहब बड़े चिंतित थे. उन्होंने कई डाक्टरों को भी दिखाया था. सभी ने एक ही बात कही थी कि दवा के साथसाथ उन्हें अधिक से अधिक आराम की भी जरूरत है.

काफी सोचविचार के बाद कुमार साहब ने 2 महीने नैनीताल में रहने का प्रोग्राम बनाया था कि इस बहाने कुछ समय के लिए ही सही, शहर के प्रदूषित वातावरण से मुक्ति मिलेगी और घर के झमेलों से दूर रह कर विभा को आराम भी मिलेगा.

कुमार साहब का कोई लंबाचौड़ा परिवार न था. 2 बेटे थे, दोनों ही इंजीनियर. बड़ी कंपनियों में कार्यरत थे. विवाह के बाद दोनों ने अपने अलगअलग आशियाने बना लिए थे. शायद यह घर उन्हें छोटा लगने लगा था. वैसे भी एक गली के पुराने घर में रहना उन के स्तर के अनुकूल न था.

जब से बेटे अलग हुए, तब से ही विभा का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता गया. विभा ने बच्चों को ले कर अनेक सुनहरे सपने बुन रखे थे, पर बच्चों के जीवन में शायद मां का कोईर् स्थान ही न था. विभा इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी. बच्चों के व्यवहार ने विभा के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया था.

महीने में 1-2 बार बच्चे उन से मिलने आते थे और कुछ देर बैठ कर औपचारिक बातें कर के चले जाते थे. इसी तरह समय बीतता गया. बच्चों से मिलनाजुलना अब पहले से भी कम हो गया. इसी बीच वे 1 पोते व 1 पोती के दादादादी भी बन गए.

दोनों बहुएं पढ़ीलिखी थीं. उन्होंने भी अपने लिए नौकरी ढूंढ़ ली. अब पहली बार उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ कि उन्हें मांबाबूजी से अलग घर नहीं बसाना चाहिए था. मां घर में होतीं तो बच्चों को संभाल लेतीं.

बड़ी बहू नंदिता तो एक दिन बेटे गौतम को ले कर सास के पास पहुंच भी गई. बहू, पोते को देख कर विभा निहाल हो गई.

‘अमित नहीं आया?’ उस ने शिकायती लहजे में बहू से पूछा.

‘क्या करूं मांजी, उन्हें तो दिनभर औफिस के काम से ही फुरसत नहीं है. कितने दिन से कह रही थी कि मांबाबूजी से मिलने की बड़ी इच्छा है, औफिस से जल्दी आ जाना, पर आ ही नहीं पाते. आखिर परेशान हो कर मैं अकेली ही गौतम को ले कर आ गई.’

‘बहुत अच्छा किया बहू,’ गदगद स्वर में विभा बोली और गौतम को खिलाने लगीं.

‘मांजी, आप को यह जान कर खुशी होगी कि मैं ने नौकरी कर ली है.’

‘हां बेटी, बात तो खुशी की ही है. भला हर किसी को नौकरी थोड़े ही मिलती है? जो नौकरी लायक होता है, उसे ही नौकरी मिलती है. मेरी बहू इतनी काबिल है, तभी तो उसे नौकरी मिली,’ विभा ने खुश होते हुए कहा.

‘पर मांजी, एक समस्या है, अब गौतम को तो आप को ही संभालना पड़ेगा. मैं चाहती हूं कि आप और बाबूजी हमारे साथ रहें. इस घर को किराए पर दे देंगे.’

‘नहीं बेटी, यह तो संभव नहीं है. इस घर से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं. इस घर में मैं ब्याह कर आई थी. इसी घर में मेरी गोद भरी थी. इस घर के कोनेकोने में मेरे अमित और विजय की किलकारियां गूंजती हैं. इसी घर में तुम और स्मिता आईं और यह घर खुशियों से भर गया. अकेली होने पर यही यादें मेरा सहारा बनती हैं. इस घर को मैं नहीं छोड़ सकती.’

विभा ने साफ मना किया तो नंदिता बोली, ‘ठीक है मांजी, फिर मैं औफिस जाते समय गौतम को यहां छोड़ जाया करूंगी और लौटते समय ले जाया करूंगी.’

‘यह ठीक रहेगा,’ विभा ने अपनी सहमति देते हुए कहा. हालांकि उन का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, पर वह अपने एकाकी जीवन से बहुत ऊब चुकी थी. अब दिन भर गौतम उस के साथ रहेगा. इस कल्पना मात्र से ही वह खुश थी.

जब कुमार साहब को इस बात पता चला कि दिनभर गौतम की देखभाल विभा करेगी तो उन्हें यह अच्छा न लगा. अतएव झुंझला कर बोले, ‘जिम्मेदारी लेने से पहले अपना स्वास्थ्य तो देखा होता. दिनभर एक बच्चे को संभालना कोई आसान काम है?’

‘अपने बच्चे हैं. अपने बच्चों के हम ही काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा?’ विभा ने समझाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘गौतम यहां रहेगा तो क्या मुझे अच्छा नहीं लगेगा? मुझे भी अच्छा लगेगा, पर मुझे दुख तो इस बात का है कि तुम्हारे ये स्वार्थी बच्चे काम पड़ने पर तो अपने बन जाते हैं, पर काम निकलते ही पराए हो जाते हैं,’ कुमार साहब बोले तो विभा ने चुप रहने में ही भलाई समझी.

जैसे ही छोटी बहू स्मिता को पता चला कि गौतम दिनभर मांजी के पास रहा करेगा, वैसे ही उस ने भी अपनी बेटी ऋचा को वहां छोड़ने का निर्णय ले लिया.

2 दिनों बाद से ही गौतम और ऋचा पूरा दिन अपनी दादी के साथ बिताने लगे. विभा का पूरा दिन उन दोनों के छोटेछोटे कामों में कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था. कुछ महीने हंसीखुशी बीत गए, पर जैसेजैसे वे बड़े हो रहे थे, विभा के लिए समस्याएं बढ़ती जा रही थीं. अब बच्चे आपस में लड़तेझगड़ते तो थे ही, पूरे घर को भी अस्तव्यस्त कर देते थे, जिसे फिर से जमाने में विभा को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी.

विभा अपनी परेशानियों को कुमार साहब से छिपाने का लाख प्रयत्न करती, पर उन से कुछ छिपा न रहता था. एक दिन वे औफिस से लौटे तो देखा कि विभा के पैर में पट्टी बंधी थी.

‘क्या हुआ पैर में?’ कुछ परेशान होते हुए उन्होंने पूछा.

‘कुछ नहीं,’ विभा ने बात टालने का प्रयत्न किया, पर तभी पास खेलती ऋचा तुतलाती आवाज में बोली, ‘‘दादाजी, दौतम ने तांच ता दिलाछ तोल दिया. दादीमां तांच उथा लही थी. तबी इनते पैल में तांच लद दया. दादाजी, आप दौतम को दांतिए. वह भोत छलालती है. दादीमां को भोत तंग कलता है,’’ ऋचा गौतम की शिकायत लगाते हुए लाड़ से दादाजी के गले में झूल गई.

ऋचा की प्यारीप्यारी तुतलाती बातें सुन कर कुमार साहब मुसकरा दिए,  ‘और तू भी अपनी दादीमां को तंग करती है,’ उन्होंने कहा तो वह तुरंत गरदन हिलाते हुए बोली, ‘नहींनहीं, मैं तभी इन्हें पलेछान नहीं तलती. मैं तो हमेछा इनता ताम ही तरती हूं. बले ही पूछ लो दादीमां छे.’

अभी कुमार साहब और विभा ऋचा की प्यारीप्यारी बातों का आनंद उठा ही रहे थे कि तभी गौतम के चिल्लाने की आवाज आई.

‘अरे, क्या हुआ?’ कहती हुई विभा दूसरे कमरे में भागी. गौतम वहां आंखों में आंसू भरे अपने पैर को पकड़ कर बैठा था.

‘क्या हुआ बेटा?’ विभा ने उसे पुचकारते हुए पूछा.

‘दादीमां, मैं तो स्टूल पर चढ़ कर अलमारी की सफाई कर रहा था, पर पता नहीं स्टूल कैसे खिसक गया और मैं गिर पड़ा,’ गौतम ने सफाई देते हुए कहा.

‘पैर पकड़े क्यों बैठा है? क्या पैर में चोट लग गई?’

‘हां दादीमां, पैर मुड़ गया,’ पैर को और जोर से पकड़ते हुए वह बोला.

विभा ने गौतम को खड़ा कर के चलाने का प्रयास किया, पर दर्द काफी था, वह चल नहीं सका.

‘लगता है गौतम के पैर में मोच आ गई है,’ विभा ने कुमार साहब को बताया तो वे उसे ले कर तुरंत डाक्टर के पास पहुंचे.

मन ही मन वे झुंझला रहे थे कि अब बुढ़ापे में यही काम रह गया हमारा. सचमुच गौतम के पैर में मोच आ गई थी. रात को नंदिता गौतम को लेने के लिए पहुंची तो उस के पैर में मोच आई देख कर वह भी परेशान हो उठी.

कुमार साहब और विभा ने जब नंदिता को गौतम से यह पूछते हुए सुना कि तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई तो वे सन्न रह गए.

‘अभी भी तुम्हारा मोहभंग हुआ या नहीं?’ कुमार साहब ने उदास सी मुसकान बिखेरते हुए पूछा, पर विभा मौन थी मानो उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था. पर बहू का वह वाक्य  ‘तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई,’ उस के कानों में बारबार गूंज रहा था.

ममता की मारी विभा को बच्चों के मोहपाश ने बुरी तरह जकड़ रखा था. वह उस से निकलने का जितना प्रयास करती, उस की जकड़न उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाती. स्थिति यहां तक पहुंची कि विभा ने बिस्तर ही पकड़ लिया.

पिछले कई दिनों से विभा को बुखार था. कुमार साहब ने अमित को फोन कर दिया, ‘बेटा अमित, तुम्हारी मां की तबीयत काफी खराब है. आज तुम गौतम को यहां मत भेजना, वह संभाल नहीं सकेगी. विजय को भी कह देना कि वह भी ऋचा को न भेजे.’

‘पर बाबूजी, ऐसे कैसे चलेगा? नंदिता की नईनई नौकरी है, उसे तो छुट्टी नहीं मिल सकती. मैं कोशिश करूंगा, यदि मुझे छुट्टी मिल गई तो आज मैं गौतम को रख लूंगा. विजय को भी मैं बता दूंगा.’

अगले दिन अमित और विजय के ड्राइवर आ कर दोनों बच्चों को विभा के पास छोड़ गए, साथ ही कह गए कि उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मजबूर हो कर कुमार साहब ने छुट्टी ली और दोनों बच्चों की देखभाल की. दिनभर उन की शरारतों से वे परेशान हो गए.

शाम के समय जब विभा की तबीयत कुछ संभली, तब कुमार साहब ने उसे फिर समझाया, ‘देख लिया अपने बच्चों को? तुम उन के बच्चे पालने में दिनभर खटती रहती हो और तुम्हारी दोनों में से एक बहू से भी यह न हुआ कि 1 दिन की छुट्टी ले कर तुम्हारी देखभाल कर लेती.’

‘क्या करें, उन की भी कोई मजबूरी होगी,’ कह विभा ने करवट बदल ली.

रात को दोनों बेटे बच्चों को लेने आए. जितनी देर वे वहां बैठे, अपनी सफाईर् पेश करते रहे.

‘मां, नंदिता के औफिस में आज बाहर से कोई पार्टी आई हुई थी, इसलिए उसे छुट्टी नहीं मिली और मुझे भी जरूरी मीटिंग अटैंड करनी थी.’

अमित ने कहा तो विजय भी कैसे चुप रहता. बोला, ‘मां, स्मिता ने भी छुट्टी लेने की बहुत कोशिश की, पर उस के कालेज में आजकल परीक्षाएं चल रही हैं. और मैं तो अभी शाम को ही टूर से लौटा हूं.’

कुमार साहब यह अच्छी तरह समझ गए थे कि यहां रह कर विभा को आराम नहीं मिलेगा. उस के स्वार्थी बेटे और बहुएं उस की ममता का नाजायज फायदा उठाते रहेंगे. इसलिए उन्होंने कुछ समय के लिए घर से बाहर जाने की सोची थी.

विभा सोच रही थी कि यदि वे नैनीताल चले जाएंगे तो गौतम और ऋचा की देखभाल कौन करेगा. उस ने अपने मन की बात कुमार साहब से कही तो वह भड़क उठे,  ‘‘अरे, जिन के अपने शहर में नहीं रहते उन के बच्चे क्या नहीं पलते? तुम्हारे बेटेबहू इतना कमाते हैं, क्या बच्चों के लिए नौकर नहीं रख सकते? क्या इस शहर में शिशुगृहों की कमी है? तुम ने उन के बच्चों की जिम्मेदारी ले रखी है क्या? उन्हें अपनेआप संभालने दो अपने बच्चों को.’’

जब अमित और विजय को मालूम हुआ कि मां और बाबूजी नैनीताल जा रहे हैं तो वे परेशान हो उठे.

‘‘मांजी, 2 महीने बाद मेरे कालेज में छुट्यिं हो जाएंगी. आप तब चली जाना नैनीताल. यदि आप चली गईं तो बच्चों को कौन संभालेगा,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी बताते हुए विभा से कहा.

विभा क्या उत्तर देती, वह तो स्वयं परेशान थी. तभी पास बैठे कुमार साहब बोले, ‘‘बेटी, यदि हम नैनीताल नहीं जाएंगे तब भी तुम्हारी सास की तबीयत ऐसी नहीं है कि वह 2-2 बच्चों को संभाल सके. यह भला किस का सहारा बनेगी, इसे तो स्वयं सहारे की जरूरत है.’’

बाबूजी की बात सुन कर सब चुप थे. पहली बार उन्हें एहसास हो रहा था कि  उन्हें मांबाबूजी कि कितनी जरूरत थी. कुमार साहब और विभा नैनीताल के लिए रवाना हो गए. विभा उदास थी. कुमार साहब भी खुश न थे. उन के सामने अपने बच्चों के परेशान चेहरे घूम रहे थे. कुमार साहब को उदास देख कर विभा ने पूछा, ‘‘आप उदास क्यों हैं? आप को खुश होना चाहिए, हम नैनीताल जा रहे हैं.’’

‘‘तुम क्या सोचती हो कि बच्चों को परेशान देख कर मुझे अच्छा लगता है? पर मैं यह नहीं चाहता कि बच्चे हमारे प्यार का गलत फायदा उठाएं. इस के लिए उन्हें सबक देना जरूरी है और इस के लिए कठोर भी होना पड़े तो झिझकना नहीं चाहिए.’’

कुमार साहब की बात सुन कर विभा संतुष्ट थी. उस के चारों ओर घिरे उदासी के बादल छंटने लगे थे. वह समझ गई थी कि इस मोहपाश में जकड़ कर वह मां का कर्तव्य पूरा नहीं कर पाएगी. आज पहली बार उसे अनुभव हुआ कि जिस मोहपाश में वह अब तक घिरी थी, उस की जकड़न स्वत: ही ढीली हो रही है.

Mother’s Day Special: ममता की मूरत

रात का लगभग 8 बजे का समय था. मैं औफिस से आ कर खाना बना रही थी और राकेश अपने लैपटौप पर अभी भी औफिस के ही काम में उलझे हुए थे. तभी फोन की घंटी बजी. किस का फोन है, यह उत्सुकता मुझे किचन से खींच लाई. मैं ने देखा राकेश फोन पर बात करते हुए बहुत परेशान हो उठे हैं.

‘प्लीज, आप उन्हें अस्पताल पहुंचा दीजिए. मैं फौरन निकल रहा हूं, फिर भी मुझे पहुंचने में 2-3  घंटे तो लग ही जाएंगे,’ इतना कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया. इस से पहले कि मैं कुछ पूछती उन्होंने हड़बड़ी में मुझे पूरी बात बताते हुए अपने कुछ कपड़े और जरूरी सामान बैग में रखना शुरू कर दिया.

राकेश की चाचीजी, जो मथुरा में रहती हैं अचानक बहुत बीमार हो गई थीं. उन की हालत को देखते हुए किसी पड़ोसी ने हमें फोन किया था. चाचीजी का हमारे सिवा इस दुनिया में और है ही कौन? उन की अपनी औलाद तो है नहीं और चाचाजी का कुछ वर्ष हुए देहांत हो चुका है.

हमारी शादी में चाचीजी ने ही मेरी सास की सारी रस्में की थीं. राकेश के मातापिता तो बहुत पहले एक कार ऐक्सीडैंट में मारे गए थे. तब राकेश की दीदी गरिमा तो अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश कर रही थीं, लेकिन राकेश स्कूल में पढ़ रहे थे. अपनी दीदी से 8 साल छोटे जो हैं. तब चाचाचाची ने ही दीदी की शादी की थी और राकेश को स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई के लिए होस्टल भेज दिया था. चाचाचाची ने दीदी को और मुझे अपनी औलाद की तरह प्यार दिया है, यह बात इन 2 वर्षों में राकेश मुझे कई बार बता चुके हैं.

पहले पूरा परिवार साथ ही रहता था लेकिन राकेश जब चौथी कक्षा में पढ़ते थे, तभी इन के चाचाजी का तबादला मथुरा हो गया था. इस के बाद तो उन के तबादला कई और शहरों में भी होता रहा लेकिन मथुरा में उन्होंने अपना घर बना लिया था, इसलिए उन के देहांत के बाद चाचीजी मथुरा आ गई थीं. और वे जाती भी कहां?

मेरा चाचीजी से ज्यादा परिचय नहीं था. हमारी शादी के वक्त वे सिर्फ 5-6 दिन हमारे साथ रही थीं. दरअसल, हम दोनों बैंकाक घूमने जाना चाहते, इसलिए वे मथुरा लौट गई थीं. मैं क्याक्या सोचने लग गई थी. राकेश की आवाज से मैं वर्तमान में लौटी. वे कह रहे थे कि देखो जल्दी में मैं कहीं कुछ रखना तो नहीं भूल गया.

बैग पैक हो गया तो राकेश अकेले चाचीजी को कैसे संभालेंगे यह सोच कर मैं ने भी साथ चलने की बात की तो वे बोले कि पहले जा कर स्थिति देख लूं, जरूरत हुई तो तुम्हें भी बुला लूंगा. फिर वे मथुरा के लिए रवाना हो गए.

शादी के बाद यह पहला अवसर था जब मैं रात के समय घर में अकेली थी. अजीब सा डर व बेचैनी मुझे सोने नहीं दे रही थी. रात 2 बजे के लगभग राकेश से मेरी बात हुई. पता लगा चाचीजी बेहोश हैं. कई तरह के टैस्ट हो रहे हैं, अभी कुछ ठीक से कहा नहीं जा सकता. राकेश काफी परेशान लग रहे थे.

अगली सुबह 11 बजे राकेश का फोन आया कि वे चाचीजी के इलाज तथा डाक्टरों के रवैये से संतुष्ट नहीं हैं. वे उन्हें ले कर दिल्ली आ रहे हैं. दिल्ली के एक अस्पताल से बातचीत चल रही है.

शाम होतेहोते वे चाचीजी को ले कर दिल्ली पहुंच गए. नीम बेहोशी की हालत में चाचीजी बहुत ही कमजोर लग रही थीं. रंग भी पीला पड़ा हुआ था. उन के अस्पताल पहुंचने से पहले ही मैं वहां पहुंच गई. डाक्टरों ने तत्परता से इलाज शुरू कर दिया.

5 दिनों बाद चाचीजी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, लेकिन डाक्टरों ने दवा के साथसाथ परहेज और आराम करने की सख्त हिदायत दी थी. हम उन्हें घर ले आए. बीमारी कोई विशेष नहीं थी. बढ़ती उम्र, अकेलापन, चिंता, काम की थकान, उस पर ठीक से समय पर न खाना बीमारी के कारण थे.

हम दोनों के लिए अब और छुट्टियां लेना मुश्किल था. उन के लिए किसी नौकर या नर्स का प्रबंध नहीं हो पा रहा था, इसलिए हम ने घर पर काम करने वाली बाई को ही दिन भर में 2-3 चक्कर लगा कर उन्हें दूध, चाय, नाश्ता आदि देते रहने के लिए कहा और औफिस जाना शुरू कर दिया था. हां, दिन में कई बार हम फोन पर चाचीजी से बात कर लेते थे. उन का हालचाल जान लेते थे. कोई परेशानी तो नहीं? पूछते रहते थे.

राकेश की तो पता नहीं हां, मेरी परेशानियां कुछ बढ़ गई थीं. आज तक जो घर सिर्फ हमारा था वह एकाएक मुझे मेरी ससुराल लगने लगा था. अब उठनेबैठने, पहननेओढ़ने में मैं कुछ बंदिशें महसूस करने लगी थी. हालांकि चाचीजी ने इस बारे कभी कुछ कहा नहीं था, लेकिन उन का घर पर होना ही मेरे लिए काफी था.

लेकिन मैं पूरे उत्साह से यह सब कर रही थी, क्योंकि चाचीजी आशा से कहीं जल्दी स्वास्थ्य लाभ कर रही थीं. 1 सप्ताह बाद ही उन्हें कामवाली की जरूरत नहीं रही. वे अपने छोटेछोटे काम स्वयं ही उठ कर करने लगी थीं. मैं खुश थी कि वे जल्दी ही ठीक हो कर मथुरा लौट जाएंगी. कुछ ही दिनों की तो बात है.

एक दिन राकेश बोले कि अब हम चाचीजी को वापस नहीं जाने देंगे. वे अब हमारे साथ ही रहेंगी. अब इस उम्र में उन का अकेले रहना मुश्किल है. फिर बीमार हो गईं तो? फिर हमारा भी तो उन के प्रति कोई कर्तव्य है. उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है. राकेश ने कुछ गलत तो नहीं कहा था लेकिन मेरा मन बेचैन हो उठा.

मुझे याद है जब मेरे लिए राकेश का रिश्ता आया तो मम्मीपापा ने मेरी राय पूछी थी. राकेश दिखने में कैसे हैं? पढ़ेलिखे कितना हैं? कमाते कितना हैं? यह सब जानने की मुझे जरूरत ही महसूस नहीं हुई थी क्योंकि लगा था कि मम्मीपापा और मामाजी ने देख लिया है तो सब ठीक ही होगा. मेरे लायक ही होगा. मैं तो लड़के के परिवार के बारे में जानना चाहती थी. पूछा तो पता लगा कि घर में सासससुर नहीं हैं. बस एक बड़ी बहन है, जो शादीशुदा है. मेरे लिए इतना ही जानना काफी था क्योंकि मेरे दिमाग में सास की छवि ऐसी थी जिस से बहू हमेशा डरीसहमी रहती है. मेरी सहेली जया, जिस की शादी कुछ ही महीने पहले हुई थी, उस से जब भी बात होती थी वह अपने पति के बारे में कम सास के बारे में बात ज्यादा करती थी. हमेशा परेशान रहती थी.

उस पर मेरी दीदी जबतब मायके आतीं तो कई दिनों तक लौटने का नाम नहीं लेती थीं. हमेशा मां ही उन्हें समझाबुझा कर वापस भेजती थीं. उन्हें भी पति या देवर से नहीं सास से ही ढेरों शिकायतें होती थीं.

लेकिन हमारे यहां तो राकेश की चाचीजी रहने वाली थीं. अपनी सास की तो चलो कोई 2 बात सुन भी ले, चचियासास की बातें, ताने, उलाहने भला कोई क्यों सुने? हालांकि ऐसा सोचना बड़ा ही गलत था, स्वार्थी सोच था, लेकिन मुझे बहुत परेशान करने लगा था.

एक शाम औफिस से घर पहुंची तो देखा चाचीजी ने मशीन लगा कर घर भर के मैले कपड़े इकट्ठा कर धो डाले थे. मैं तो इतवार को ही मशीन लगा कर सप्ताह भर के कपड़े धोती हूं. पिछले दिनों चाचीजी की बीमारी के चक्कर में यह काम रह ही गया था. इतने कपड़े एकसाथ धुले देख कर मैं हैरान रह गई, ‘‘यह क्या चाचीजी, आप ने यह सब क्यों किया? आप को तो अभी आराम करना चाहिए.’’

‘‘दिन भर आराम ही तो करती हूं सीमा, फिर आजकल मशीन में कपड़े धोना भी कोई काम है?’’ कहते हुए चाचीजी हंस दीं.

अब रात के खाने के वक्त गपशप का दौर चलने लगा था. चाचीजी राकेश के बचपन की आदतों, शरारतों के बारे में बतातीं. मुझे मेरी ससुराल के बारे में बहुत सी ऐसी बातें भी बतातीं, जिन्हें बताने वाला कोई नहीं था. राकेश की चिढ़, पसंदनापसंद के बारे में भी मुझे पता लग रहा था. अब मुझे उन्हें चिढ़ाने, छेड़ने में बड़ा मजा आ रहा था. ऐसे में चाचीजी भी हंसते हुए मेरा पूरा साथ देती थीं.

हम शाम को औफिस से लौटते तो चाचीजी बढि़या सा स्वादिष्ठ नाश्ता बना कर हमारा इंतजार कर रही होतीं. अब सुबहशाम मुझे सब्जी कटी हुई मिलती, सलाद तैयार और तरहतरह की चटनियां पिसी मिलतीं. वे अकसर आटा भी गूंध दिया करती थीं. यह सब देख कर यही लगता कि वे दिन भर पल भर को भी बैठती नहीं हैं.

अब घर में कोई हर चीज अपने ठिकाने पर करीने से रखी मिलती, जिन्हें पहले हम अकसर समय की कमी के कारण यहांवहां इस्तेमाल के बाद छोड़ दिया करते थे.

एक छुट्टी के दिन हम चाचीजी को मौल घुमाने ले जा रहे थे. उन्होंने रास्ते में एक जगह गाड़ी रोकने के लिए कहा तो हम हैरान रह गए. फिर भी राकेश ने तुरंत गाड़ी रोकी तो चाचीजी फौरन उतर कर पास के एटीएम की ओर बढ़ गईं. 2 ही मिनटों बाद वे नोट हाथ में ले कर लौटीं.

हमें हैरान देख कर वे बोलीं, ‘‘हैरान मत हो. अपनी हालत को देखते हुए यह कार्ड मैं ने अस्पताल के सामान के साथ रख लिया था. वहां अस्पताल में पैसों की जरूरत तो पड़नी ही थी न? पर मुझे क्या पता था मेरी हालत इतनी बिगड़ जाएगी कि पड़ोसी को फोन कर के तुम्हें बुलाना पड़ेगा.’’

‘‘वह तो ठीक है  चाचीजी, लेकिन अब तो हम हैं. आप को पैसे निकलवाने की क्या जरूरत थी? वैसे क्षमा करना, आप को आए इतने दिन हो गए, खयाल ही नहीं आया मुझे. आप से पूछना चाहिए था आप की जरूरत के बारे में,’’ राकेश ने झेंपते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं बेटा मुझे भला पैसों का क्या करना है? लेकिन पहली बार अपने बेटेबहू के साथ बाजार जा रही हूं तो पैसे पास में होने ही चाहिए. चलोचलो देर हो रही है,’’ चाचीजी ने पूरे उत्साह से कहा.

मौल में पहुंचते ही चाचीजी रेडीमेड कपड़ों के शोरूम में चली गईं. हमें लगा वे बीमारी की हालत में इतनी जल्दी में अस्पताल आईं कि साथ में बहुत सी चीजें नहीं ला पाईं. उन्हें कपड़ों के लिए परेशानी होती होगी, इसलिए वहां गई हैं. लेकिन रेडीमेड शर्ट और जींस के काउंटर पर जा कर वे राकेश से कपड़े खरीदने के लिए कहने लगीं. राकेश ने बहुत मना किया लेकिन वे कब मानने वाली थीं.

राकेश जींस ट्राई कर रहे थे तब मुझ से बोलीं, ‘‘आजकल की सब लड़कियां जींस पहनती हैं. दफ्तर जाने वाली तो कहती हैं कि इस में उन्हें सुविधा रहती है. बहू, तुम नहीं पहनतीं?’’

उन की बात सुन कर मैं हैरान रह गई. पुरानी पीढ़ी की हो कर भी वे ऐसी बात कह रही हैं?

‘‘नहींनहीं चाचीजी मैं भी…’’ कहते हुए मैं रुक गई. लगा कहीं यों ही बातोंबातों में मुझ से कुछ उगलवाना तो नहीं चाह रहीं.

‘‘पहनती हो लेकिन मेरे कारण रोज साड़ी और सूट की बंदिशों में कैद हो गई हो. लेकिन मैं ने तो कभी कुछ कहा ही नहीं,’’ चाचीजी बड़ी मासूमियत से बोलीं.

‘‘बहू, तुम भी अपने लिए एक जींस और एक बढि़या सी टौप खरीद लो. मैं भी तो देखूं मेरी बहू इन कपड़ों में कैसी लगती है,’’ कहते हुए उन्होंने मेरे लिए कपड़े पसंद करने शुरू कर दिए. मैं हैरान सी खड़ी उन्हें देखती रह गई. अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आ रहा था, लेकिन यह सब सच था सपना नहीं.

कपड़े खरीदते ही चाचीजी बोलीं, ‘‘भई, बहुत भूख लग रही है. वैसे भी मेरे ठीक होने की खुशी में एक बढि़या सी दावत होनी ही चाहिए.’’

रेस्टोरैंट में हमारे मना करने पर भी चाचीजी ने बहुत कुछ मंगवा लिया, उस पर आइसक्रीम भी. बाद में राकेश जब वहां पैसे देने लगे तो उन्होंने तुरंत नोट उन के हाथ में पकड़ाते हुए कहा, ‘‘ये लो तुम ही दे दो. क्या फर्क पड़ता है.’’ इस पर हम तो हंस ही रहे थे, बिल लाने वाला वेटर भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया.

घर आ कर राकेश ने कहा कि आप को इतने पैसे खर्च नहीं करने चाहिए थे तो वे बोलीं, ‘‘तुम्हारे चाचाजी के बाद अब मुझे पैंशन मिलती है. मैं अकेली जान अब इस उम्र में अपने पर कितना खर्च करूंगी?’’

वे जब से ठीक हुई हैं अकसर शाम को सैर करने चली जाती हैं. फल, सब्जियां, दूध और मिठाई न जाने क्याक्या ले कर ही लौटती हैं. खाली हाथ कभी नहीं आतीं.

सुबह हम औफिस के लिए तैयार हो रहे थे तो वे पास आ कर बोलीं, ‘‘बेटा राकेश, अब मैं बिलकुल ठीक हूं. अब मेरा वापसी का टिकट करवा दो.’’

सुनते ही हम दोनों अवाक रह गए.

‘‘क्या हुआ चाचीजी, आप को यहां कोई परेशानी है क्या?’’ हम दोनों एकसाथ बोल उठे.

‘‘नहींनहीं बेटा, अपने घर में कैसी परेशानी. फिर भी लौटना तो होगा ही न.

2 महीने हो गए हैं, मैं कब तक तुम लोगों…’’

सुनते ही मैं परेशान हो उठी, ‘‘चाचीजी, आप से इतना तो मना करते हैं फिर भी आप अपनी मरजी से दिन भर काम में लगी रहती हैं.’’

‘‘नहींनहीं सीमा, मैं काम की बात नहीं कर रही. यह भी कोई काम है. बटन दबाया कपड़े धुल गए. बटन दबाया चटनी, मसाला पिस गया. घर की सफाई और बरतन का काम तो कामवाली कर जाती है. दिन भर में काम ही कितना होता है? लेकिन बेटा 2 महीने हो गए हैं, कब तक तुम लोगों पर बोझ बनी रहूंगी?’’

बोझ शब्द सुनते ही मेरी आंखें भर आईं. मैं उन से लिपट गई. ऐसी ममता की मूरत भला बोझ कैसे हो सकती है? कितनी गलत सोच थी मेरी सास के बारे में. मुझे चाचीजी से कोई शिकायत नहीं. कितनी परेशान हो गई थी मैं जब राकेश ने उन के यहीं रहने की बात की थी. लेकिन अब मैं उन के बिना जीने की कल्पना ही नहीं कर सकती थी. उन के प्यार, आशीर्वाद और उन की उपस्थिति के बिना हमारा जीवन, हमारा घरपरिवार कितना अधूरा रह जाएगा. कौन हर शाम घर पर हमारा इंतजार करेगा? कौन भूख न होने पर भी मनुहार कर के हमें खाना खिलाएगा? कौन बिना किसी स्वार्थ के हम पर इतना निश्छल स्नेह लुटाएगा?

हम दोनों ने उन्हें साफ शब्दों में कह दिया कि वे अब कहीं नहीं जाएंगी. अब इस उम्र में हमारे होते हुए वे अकेली नहीं रहेंगी. अब यह उन की मरजी है कि वे अपने मथुरा वाले घर पर ताला लगाना चाहती हैं या उसे किराए पर उठाना चाहती हैं. हमारी जिद और हमारे प्यार के आगे उन की एक नहीं चली.

चाचीजी कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘तुम इतना कहते हो तो तुम्हारे पास ही रह जाऊंगी, लेकिन मेरी एक शर्त है.’’

मैं समझ गई कि चाचीजी क्या कहना चाहती हैं. मैं झट से बोली, ‘‘आप एक बार मथुरा जा कर अपने कुछ कपड़े, कुछ जरूरी सामान लाना चाहती हैं न? इस में शर्त की क्या बात है, अगले ही वीक ऐंड पर हम दोनों आप को मथुरा ले चलेंगे.’’

‘‘वह तो मैं जाऊंगी ही पर मेरी शर्त तो कुछ और ही है.’’

चाचीजी के इतना कहते ही मैं कुछ परेशान हो गई. सोचा, पता नहीं वे क्या शर्त रखेंगी.

तभी राकेश बोल उठे, ‘‘चाचीजी, शर्त क्यों आप तो आदेश दीजिए क्या चाहिए?’’

हमारे परेशान चेहरे को देख कर चाचीजी की हंसी निकल गई. वे हंसते हुए बोलीं, ‘‘हांहां, शर्त नहीं मेरा आदेश ही है कि यदि मुझे यहां रोकना है तो मुझे जल्दी से एक पोता देना होगा. 2 साल हो गए हैं शादी को, कब तक यों ही डोलते रहोगे?’’

सुनते ही हम दोनों शरमा गए. जिस प्यार और अधिकार से चाचीजी ने कहा है तो हमारे सोचने के लिए कुछ बचा ही कहां है. चाचीजी ने हमारे जीवन को नए माने दे दिए हैं. पता नहीं ममता की यह मूरत वर्षों बिना औलाद के कैसे रही होगी? चलो बीमारी के बहाने ही सही, वे हमारे पास अपनी ममता लुटाने तो आ गई हैं.

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