Story in Hindi
Story in Hindi
family story in hindi
लेकिन अमृता को तो यह बात पहले से ही पता थी. छोटी भाभी को ऐसा ही तो होता था जब रुद्र पैदा होने वाला था. तब उन्हें भी तो कुछ खाने का मन नहीं होता था. तबीयत खराब रहती थी, उलटी होने का सा एहसास रहता था. अब ठीक अमृता को भी वैसा ही लग रहा है. इस का मतलब वह पेट से थी. अपने भीतर वह एक हलचल सी महसूस करने लगी थी.
अपने अजन्मे बच्चे के बारे में जान कर अतुल्य तो खुशी से बावला हो गया और कहने लगा कि वह जल्द ही वहां आ रहा है और हाथ जोड़ कर वह उस के भाइयों से उस का हाथ मांगेगा, जिसे उन्हें देना ही पड़ेगा.
अमृता अपने आने वाले बच्चे के बारे में सोच कर ही खुश हुए जा रही थी, लेकिन उस ने कितने बड़े तूफान को न्योता दिया था, उसे नहीं पता था.
रुक्मिणी के पूछने पर अमृता ने सब सचसच बता दिया और कहने लगी, ‘‘मैं और अतुल्य एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी भी करना चाहते हैं.’’
यह सुन कर रुक्मिणी ने अपना माथा पीट लिया और बोली, ‘‘यह क्या अनर्थ कर डाला. पता भी है, अगर घर में किसी को यह बात पता चल गई तो क्या होगा? काट डालेंगे तुम दोनों को. अच्छा, वह लड़का… मेरा मतलब है, अतुल्य यहां कब आ रहा है?’’
‘‘वह आज रात आने वाला है और मैं उस से मिलने उसी पुरानी फैक्टरी में जाने वाली हूं. इस काम में आप को मेरी मदद करनी पड़ेगी.’’
‘‘वह सब तो ठीक है, पर मैं तुम्हारे भैया को क्या कहूंगी? देखो अमृता, मु झे बहुत डर लग रहा है. लग रहा है, जैसे कोई बहुत बड़ा तूफान आने वाला है.’’
‘‘ऐसा कुछ नहीं है. भैया को अभी कुछ बताने की जरूरत ही क्या है?’’
‘‘पर, कभी तो बताना ही पड़ेगा न,’’ रुक्मिणी बोली. लेकिन उन दोनों को नहीं पता था कि बाहर खड़ा रघुवीर उन की सारी बातें सुन चुका था. उस का खून ऐसे खौल रहा था, जैसे सब जला कर राख कर देगा.
रघुवीर को अचानक अपने सामने खड़ा देख कर रुक्मिणी और अमृता का तो जैसे खून ही सूख गया. अमृता अभी कुछ बोलती ही कि वह उस के बालों को पकड़ कर घसीटता हुआ बाहर आंगन में ले गया. तब तक घर के बाकी लोग भी वहां पहुंच चुके थे. सच जानने के बाद सब की आंखें गुस्से से लाल हो गई थीं.
‘‘गलती हो गई, जो इसे शहर पढ़ने भेजा. कहा था मैं ने इस की शादी करवा देते हैं, पर नहीं. कलक्टर जो बनाना था बेटी को. लेकिन सिर्फ इस लड़की की वजह से मेरे परिवार की नाक कटे, यह मैं सहन नहीं कर सकता पिताजी, इसलिए जितनी जल्दी हो इस की शादी करवानी होगी,’’ गरजते हुए रघुवीर ने जोर से दरवाजे पर अपना हाथ पीटा था.
रुक्मिणी दौड़ कर रघुवीर के पास गई, तो उस ने उसे जोर से धक्का दे दिया. भाई का यह रूप देख कर अमृता कुछ पल के लिए अंदर तक कांप उठी थी.
मगर अमृता में भी वही गरम खून था. वह कहने लगी, ‘‘मैं हरगिज किसी और से ब्याह नहीं करूंगी. शादी तो मैं अपने अतुल्य से ही करूंगी.’’
अमृता का यह कहना ही था कि घर के दूसरे लोगों ने उस पर लातघूंसों की ऐसी बारिश कर दी कि वह बेदम हो कर जमीन में लोट गई. वह तो रुक्मिणी बीच में आ गई, नहीं तो आज उस की जान ले ली जाती.
अमृता के दोनों भाई आज इस किस्से को खत्म कर देना चाहते थे. दोनों भाइयों को धारदार चाकू ले कर भागते देख अमृता उन के पीछे भागी, मगर घर के लोगों ने उसे कमरे में बंद कर दिया. और तो और गांव की दाई को बुलवा कर उस का बच्चा भी गिरवा दिया.
मोटी रकम ले कर दाई भी यह वादा कर के चली गई कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगी. वे लोग नहीं चाहते थे कि गांव के लोगों को इस बात की भनक भी लगे. अगर ऐसा हुआ, तो पूरे गांव में उन की थूथू हो जाएगी…
‘‘मैं अपना कुछ भी नहीं बचा पाई इंस्पैक्टर साहब… न अपने प्यार को और न उस की निशानी को ही…’’ बोल कर अमृता अपना पेट पकड़ते हुए बिलख पड़ी.
अमृता की दर्दनाक कहानी सुन कर इंस्पैक्टर माधव के साथ वहां खड़े बाकी लोगों की रूह भी कांप उठी थी कि कोई इनसान इतना जालिम कैसे हो सकता है कि अपनी ही बहनबेटी की खुशियां नोच डाले… मगर यह सब सच था.
‘‘लेकिन, तुम यहां तक कैसे पहुंची? तुम्हें तो कमरे में बंद कर पहरा बिठा दिया गया था?’’ इंस्पैक्टर माधव के पूछने पर अमृता बताने लगी कि जब उसे पता चला कि दोनों भाइयों ने अतुल्य को खत्म कर दिया, तो वह चीख उठी थी. लगा जैसे अब सबकुछ खत्म हो गया, तो उस के जीने का मतलब क्या रह गया? वह मर जाना चाहती थी. वह पंखे से झूलने ही जा रही थी कि रुक्मिणी वहां पहुंच गई.
‘‘यह क्या कर रही हो तुम… मरने जा रही हो?’’ उस के हाथों से दुपट्टा छीनते हुए रुक्मिणी चीखी थी.
‘‘तो और क्या करूं मैं भाभी… किस के लिए जीऊं? कौन है अब मेरा? नहीं, मु झे मर जाने दो,’’ भाभी के हाथ से दुपट्टा छीनते हुए अमृता बोली.
‘‘मर जा, ले अभी मर जा. चल, मैं तेरी मदद करती हूं मरने में. और आजाद घूमने दे इन हत्यारों को, ताकि ये फिर किसी मासूम की बलि चढ़ा सकें. क्या तू नहीं चाहती कि इन हत्यारों को सजा मिले? क्या अतुल्य और अपने अजन्मे बच्चे को इंसाफ नहीं दिलाएगी तू?
‘‘तू सोच रही होगी कि मैं अपने ही पति के बारे में कैसी बातें कर रही हूं, लेकिन रघुवीर जैसा इनसान न तो किसी का पति बनने के लायक है और न ही भाई…’’
भाभी का ऐसा रूप देख कर एक पल के लिए तो अमृता सिहर उठी, लेकिन फिर रुक्मिणी कहने लगी, ‘‘जब किसी का प्यार छिन जाता है, तो उसे कितना दर्द होता है, यह मैं भुगत चुकी हूं.
‘‘मैं भी किसी से प्यार करती थी. हम दोनों शादी करने वाले थे. परिवार भी राजी था. मगर ऐयाश रघुवीर की नजर जाने कब और कैसे मु झ पर पड़ गई. वह हर हाल में मु झे अपना बना लेना चाहता था. उस ने मेरे मांबाप को धमकी दी कि अगर उस की शादी रुक्मिणी से नहीं हुई, तो वह किसी को नहीं छोड़ेगा.
‘‘अपनी जान की सलामती के डर से मेरे मातापिता ने मेरी शादी रघुवीर से करवा तो दी, लेकिन बाद में जब उन्हें पता चला कि रघुवीर नामर्द है, तो उन्होंने अपना माथा पीट लिया था कि उन की बेटी की जिंदगी बरबाद हो गई.’’
अपने भाई की सचाई सुन कर अमृता के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी.
‘‘तुम तो मर कर आजाद हो जाओगी. मगर सोचो उन बेचारे बूढ़े मांबाप के बारे में, जिन का एकलौता बेटा चला गया. अमृता, मैं तुम्हारा साथ दूंगी इस में…’’
अमृता के घर वालों को जब पता चला कि वह उन की कैद से भाग गई है, तो पुलिस के डर से वे लोग भी घर छोड़ कर भाग गए. लेकिन कहां यह रुक्मिणी को भी नहीं पता था, क्योंकि अब वह अपने पिता के घर चली गई थी.
इंस्पैक्टर माधव को पता था कि अब उस के भाई अमृता को छोड़ेंगे नहीं, इसलिए उन्होंने उसे महिला संरक्षणगृह में रखवा दिया और गुनाहगारों की खोज में लग गए.
पर कोई कामयाबी नहीं मिली, तो अमृता ने बताया कि अगर एक पकड़ा जाए, तो अपनेआप सब मिल जाएंगे. और वह जानती है कि उस का भाई रघुवीर कहां हो सकता है. पास के एक गांव में ही एक औरत रहती है लालबाई, उस के घर भाई का डेरा होता है.
और ऐसा ही हुआ. रघुवीर के पकड़ में आते ही बाकी सब लोग भी धीरेधीरे पुलिस की गिरफ्त में आ गए.
जब कोर्ट में उन से पूछा गया कि क्यों उन्होंने अतुल्य की हत्या की? उस पर रघुवीर ने आंखें लाल कर के कहा, ‘‘एक गांव में लड़कालड़की बहनभाई होते हैं, जिन में शादी नहीं हो सकती. और वैसे भी वह निचली जाति का लड़का था. कहीं से भी उन की बराबरी का नहीं था. ऐसे लोगों की हत्या कर देना बिलकुल ठीक है.’’
कोर्ट में अमृता ने उन सब के खिलाफ गवाही दी और कहा कि इन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाए. क्योंकि इन्होंने सिर्फ उन के प्यार की हत्या नहीं की, बल्कि उस के बच्चे के खून से भी अपने हाथ रंगे हैं.
उस दाई ने भी कोर्ट में आ कर उन के खिलाफ गवाही दी. नतीजतन, अमृता के दोनों भाइयों को उम्रभर कैद की सजा सुनाई गई. और बाकी सभी लोगों को भी सजा हुई.
अमृता के पास जीने का कोई मकसद नहीं रह गया था. वह एक पुल से नदी में छलांग लगाने ही वाली थी कि पीछे से इंस्पैक्टर माधव ने उस का हाथ खींच लिया और कहने लगे, ‘‘क्या तुम नहीं चाहती कि औनर किलिंग के नाम पर दुनिया में जो अपराध हो रहे हैं, उन्हें रोका जाना चाहिए?’’
‘‘पर, मैं जब खुद के प्यार को नहीं बचा पाई, तो और लोगों की क्या मदद कर पाऊंगी? और कौन देगा मेरा साथ इंस्पैक्टर साहब?’’
‘‘मैं दूंगा,’’ कह कर इंस्पैक्टर माधव ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, तो अमृता ने उन का हाथ थाम लिया.
‘‘और तुम मु झे सिर्फ माधव बुला सकती हो, क्योंकि आज से हम दोनों दोस्त बन गए हैं.’’
अमृता माधव के कंधे पर सिर रख कर जी भर कर रोई और माधव ने भी उसे रोने दिया, ताकि उस के मन का सारा दुख आंसुओं के रास्ते बह जाए. उन दोनों ने एकसाथ प्रण लिया कि वे इस सामाजिक बुराई के खिलाफ मिल कर लड़ेंगे.
बाहर सड़क किनारे, बिजली के खंभे के नीचे पड़े, पेड़ के एक तने पर ही बैठ कर गोपाल की बाकी की पढ़ाई शुरू हो गई थी और तब तक चलती रही जब तक अगले दिन के इम्तिहान की तैयारी पूरी नहीं हो गई.
कुछ दिन बाद जब इंटरमीडिएट इम्तिहान का नतीजा निकला तो गोपाल को खुद भी विश्वास नहीं हुआ कि उस ने पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में पहला नंबर हासिल किया था.
रिजल्ट देख कर बड़े भैया भी खुश हुए और बोले, ‘‘तुम्हारे नंबर अच्छे आए हैं, अब तुम्हे कहीं न कहीं क्लर्क की नौकरी तो मिल ही जाएगी. चलो, मैं कल ही कहीं बात करता हूं.’’
गोपाल ने तुरंत कहा, ‘‘नहींनहीं, मुझे नौकरी नहीं करनी है, बल्कि मुझे आगे पढ़ाई करनी है और मां के सपने को पूरा करना है. वे चाहती हैं कि मैं खूब पढ़ाई कर के एक बड़ा अफसर बनूं.’’
बड़े भैया ने कुछ अनमने से हो कर कहा था, ‘‘अब मैं तुम्हारा खर्चा और नहीं उठा सकता हूं. समय आ गया है कि अब तुम खुद कुछ कमाना शुरू करो.’’
यह सुन कर गोपाल को अच्छा नहीं लगा था, पर इतने अच्छे नंबर और बोर्ड में पहला नंबर आने से उस का आत्मविश्वास बढ़ गया था, ‘‘पर भैया, मैं ने बोर्ड में टौप किया है. मुझे लगता है कोई न कोई कालेज तो
मेरी फीस माफ कर ही देगा. आप मुझे बस 50 रुपए दे दीजिए.’’
‘‘अच्छा ठीक है. जब मुझे ट्यूशन के पैसे मिलेंगे, मैं तुम्हे दे दूंगा,’’ भाई की यह बात सुन कर गोपाल का दिल बल्लियों उछलने लगा था.
अगले महीने की पहली तारीख को बड़े भैया ने गोपाल के हाथ में 50 रुपए रख दिए और उस ने उसी रात कानपुर की ट्रेन पकड़ ली थी. उस ने कानपुर के डीएवी कालेज के प्रिंसिपल कालका प्रसाद भटनागर के बारे में बहुत अच्छी बातें सुनी थीं. बस अपनी जिंदगी बनाने के लिए वह कानपुर चला आया था.
गरमी की छुट्टियां चालू हो गई थीं, पर प्रिंसिपल साहब अपने दफ्तर में बैठे थे. उस की हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की मार्कशीट देखी तो बोले, ‘‘तुम्हे कहीं जाने की जरूरत नहीं है. तुम्हारा एडमिशन बस यहां हो गया है. तुम्हारी फीस माफ और होस्टल का खर्चा भी. हमारे कालेज को तुम्हारे जैसे बच्चों की जरूरत है. मुझे पूरा यकीन है कि तुम हमारे कालेज का नाम रोशन करोगे.’’
प्रिंसिपल साहब के कमरे से निकला तो गोपाल का दिल खुशी से फूला न समा रहा था. अपना टिन का बक्सा उठाए वह होस्टल पहुंच गया और अपने 4 साल उस ने इसी कमरे में बिताए थे. बीए के इम्तिहान में फर्स्ट डिवीजन आई तो उस की एमए की फीस भी माफ हो गई थी और आज एम ए का रिजल्ट भी आने वाला था.
‘अरे ओ भैया. यहां बैठ कर क्या दिन में ही सपने देख रहे हो.. चलोचलो, जल्दी चलो. प्रिंसिपल साहब अपने दफ्तर में आप को बुलाए हैं,’’ दफ्तर का चपरासी गोपाल को बुलाने आया था.
गोपाल तत्काल उठा और भाग कर कमरे में जा कर कमीज पहन कर आ गया. उस का दिल तेजी से धड़क रहा था कि प्रिंसिपल साहब ने उसे क्यों बुलाया है? शायद रिजल्ट आ गया होगा. अगर रिजल्ट अच्छा न हुआ तोड़ अगर फर्स्ट डिवीजन न आई तो क्या होगा? क्या उसे होस्टल खाली करना पड़ेगा? इम्तिहान देते हुए तबीयत इतनी खराब थी…
दफ्तर के पास पहुंच कर गोपाल ने देखा कि उस का सब से बड़ा प्रतिद्वंद्वी विद्या चरण भी वहां पहुंचा हुआ था. उसे भी दफ्तर में बुलाया गया था. दोनों की आंखें मिलीं तो लगा कि वे एकदूसरे को नापने की कोशिश कर रहे थे.
चपरासी ने दोनों को अंदर आने का इशारा किया.
प्रिंसिपल साहब बहुत गंभीर स्वभाव के इनसान थे. उन्होंने अपना चश्मा एडजस्ट किया और दोनों को देखा.
उन के स्वभाव के उलट आज उन के चेहरे पर मंद मुसकराहट थी, ‘‘तुम लोगों का रिजल्ट आ गया है. तुम ने हमारे कालेज का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है. मैं ने सोचा कि तुम्हे खुद ही बता दूं…’’
ऐसा कहते हुए प्रिंसिपल अपनी कुरसी से उठ कर आगे आए और विद्या चरण से हाथ मिलाते हुए बोले,
‘‘मुबारक हो विद्या, तुमने कालेज में टौप किया है.’’
विद्या चरण का चेहरा खुशी से चमक उठा और वह तुरंत प्रिंसिपल साहब के पैर छूने को झुक गया. साथ ही वह तिरछी नजर से उसे भी देख रहा था मानो कह रहा हो, ‘ले बेटा, बड़ा चौड़ा हो रहा था कि फर्स्ट तो मैं ही आऊंगा. पता लग गई अपनी औकात.’
गोपाल का फर्स्ट आने का सपना चकनाचूर हो गया था, पर आंखें झुकाए वह वहां खड़ा रहा था. किसी तरह आंसू छिपाने की कोशिश कर रहा था.
उस का प्रतिद्वंद्वी आखिरकार उस से जीत गया था.
गोपाल वहां खड़ा हुआ अपने पैर के अंगूठे को देखे जा रहा था और उस ने ध्यान भी नहीं दिया कि कब प्रिंसिपल साहब उस के पास आकर खड़े हो गए और उसे अपने गले लगा लिया, ‘‘और तुम तो मेरे चमत्कारी बच्चे हो. तुम ने हम सब की छाती चौड़ी कर दी है. तुम ने यूनिवर्सिटी में टौप किया है. पहली बार हमारे कालेज से किसी लड़के ने यूनिवर्सिटी में टौप किया है. जल्दी ही अपना गोल्ड मैडल लेने के लिए तैयार हो जाओ.’’
यह सुन कर गोपाल सकते में आ गया. उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. आंखों में आए दुख के आंसू अब खुशी के आंसुओं में बदल गए थे.
प्रिंसिपल साहब ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘हमारे कालेज में एक लैक्चरर की जगह खाली है. मैं चाहता हूं कि तुम यहां जौइन कर लो. मुझे पता है कि तुम प्रशासनिक सेवाओं में जाना चाहते हो पर तुम्हारी उम्र अभी कम है. अगले साल तक यहीं पढ़ाओ और अपनी तैयारी भी करो.
कालेज का भी फायदा और तुम्हारा भी. क्या खयाल है?’’
‘‘जैसी आप की आज्ञा सर,’’ कहते हुए गोपाल ने हाथ जोड़ कर सिर झुका दिया और उस के हाथ प्रिंसिपल साहब के पैरों की ओर बढ़ गए.
प्रिंसिपल साहब के दफ्तर से जब गोपाल बाहर निकला, उस की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी. कड़ी मेहनत, दृढ निश्चय और कुछ कर दिखाने की इच्छा और उन सब के पीछे थी उस की मां की उम्मीदें जिन की ताकत ने आज उसे एक कामयाब जिंदगी की चौखट पर ला कर खड़ा कर दिया था.