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Father’s Day Special – विटामिन-पी: संजना ने कैसे किया अस्वस्थ ससुरजी को ठीक

संजनाटेबल पर खाना लगा रही थी. आज विशेष व्यंजन बनाए गए थे, ननदरानी मिथिलेश जो आई थी.

‘‘पापा, ले आओ अपनी कटोरी, खाना लग रहा है,’’ मिथिलेश ने अरुणजी से कहा.

‘‘दीदी, पापा अब कटोरी नहीं, कटोरा खाते हैं. खाने से पहले कटोरा भर कर सलाद और खाने के बाद कटोरा भर फ्रूट्स,’’ संजना मुसकराती हुई बोली.

‘‘अरे, यह चमत्कार कैसे हुआ? पापा की उस कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स, विटामिन, प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम होता था… कहां, कैसे, गायब हो गए?’’ मिथिलेश ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘बेटा यह चमत्कार संजना बिटिया का है,’’ कहते हुए वे पिछले दिनों में खो गए…

नईनवेली संजना ब्याह कर आई, ऐसे घर में जहां कोई स्त्री न थी. सासूमां का देहांत हो चुका था और ननद का ब्याह. घर में पति और ससुरजी, बस 2 ही प्राणी थे. ससुरजी वैसे ही कम बोलते थे और रिटायरमैंट के बाद तो बस अपनी किताबों में ही सिमट कर रह गए थे.

संजना देखती कि वे रोज खाना खाने से पहले दोनों समय एक कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स निकाल लाते. पहले उन्हें खाते फिर अनमने से एकाध रोटी खा कर उठ जाते. रात को भी स्लीपिंग पिल्स खा कर सोते. एक दिन उस ने ससुरजी से पूछ ही लिया, ‘‘पापाजी, आप ये इतने सारे टेबलेट्स क्यों खाते हैं.’’

‘‘बेटा, अब तो जीवन इन पर ही निर्भर है, शरीर में शक्ति और रात की नींद इन के बिना अब संभव नहीं.’’

‘‘उफ पापाजी, आप ने खुद को इन का आदी बना लिया है. कल से आप मेरे हिसाब से चलेंगे. आप को प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्सियम सब मिलेगा और रात को नींद भी जम कर आएगी.’’

अगले दिन सुबह अरुणजी अखबार देख रहे थे तभी संजना ने आ कर कहा, ‘‘चलिए पापाजी, थोड़ी देर गार्डन में घूमते हैं, वहां से आ कर चाय पीएंगे.’’

संजना के कहने पर अरुणजी को उस के साथ जाना पड़ा. वहां संजना ने उन्हें हलकाफुलका व्यायाम भी करवाया और साथ ही लाफ थेरैपी दे कर खूब हंसाया.

‘‘यह लीजिए पापाजी, आप का कैल्सियम, चाय इस के बाद मिलेगी,’’ संजना ने दूध का गिलास उन्हें पकड़ाया.

नाश्ते में स्प्राउट्स दे कर कहा, ‘‘यह लीजिए भरपूर प्रोटींस. खाइए पापाजी.’’

लंच के समय अरुणजी दवाइयां निकालने लगे, तो संजना ने हाथ रोक लिया और कहा, ‘‘पापाजी, यह सलाद खाइए, इस में टमाटर, चुकंदर है, आप का आयरन और कैल्सियम. खाना खाने के बाद फू्रट्स खाइए.’’

अरुणजी उस की प्यार भरी मनुहार को टाल नहीं पाए. रात को भोजन भी उन्होंने संजना के हिसाब से ही किया. रात को संजना उन्हें फिर गार्डन में टहलाने ले गई.

‘‘चलिए पापा, अब सो जाइए.’’

अरुणजी की नजरें अपनी स्लीपिंग पिल्स की शीशी तलाशने लगीं.

‘‘लेटिए पापाजी, मैं आप के सिर की मालिश कर देती हूं,’’ कह कर उस ने अरुणजी को बिस्तर पर लिटा दिया और तेल लगा कर हलकेहलके हाथों सिर का मसाज करने लगी. कुछ ही देर में अरुणजी की नींद लग गई.

‘‘संजना, बेटी कल रात तो बहुत ही अच्छी नींद आई.’’

‘‘हां पापाजी, अब रोज ही आप को ऐसी नींद आएगी. अब आप कोई टैबलेट नहीं खाएंगे.’’

‘‘अब क्यों खाऊंगा. अब तो मुझे रामबाण औषधि मिल गई है,’’ अरुणजी गार्डन जाने के लिए तैयार होते हुए बोले.

‘‘थैंक्यू भाभी,’’ अचानक मिथिलेश की आवाज ने अरुणजी की तंद्रा भंग की.

‘‘हां बेटा, थैंक्स तो कहना ही चाहिए संजना बेटी को. इस ने मेरी सारी टैबलेट्स छुड़वा दीं. अब तो बस मैं एक ही टैबलेट खाता हूं,’’ अरुणजी बोले.

‘‘कौन सी?’’ संजना ने चौंक कर पूछा.

‘‘विटामिन-पी यानी भरपूर प्यार और परवाह.’’

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना

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Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 4

घड़ी ने रात के 2 बजाए. मुझे लगा अब मुझे सो जाना चाहिए. मगर आंखों में नींद कहां. मैं ने अलमारी से पापा की तसवीर निकाली जिस में मैं मम्मीपापा के बीच शिमला के एक पार्क में बैठी थी. मेरे पास पापा की यही एक तसवीर थी. मैं ने उन के चेहरे पर अपनी कांपती उंगलियों को फेरा और फफक कर रो पड़ी, ‘पापा तुम कहां हो…जहां भी हो मेरे पास आ जाओ…देखो, तुम्हारी निकी तुम्हें कितना याद करती है.’

एक दिन सुबह संदीप अखबार पढ़तेपढ़ते कहने लगे, ‘जानती हो आज क्या है?’

‘मैं क्या जानूं…अखबार तो आप पढ़ते हैं,’ मैं ने कहा.

‘आज फादर्स डे है. पापा के लिए कोई अच्छा सा कार्ड खरीद लाना. कल भेज दूंगा.’

‘आप खुशनसीब हैं, जिस के सिर पर मांबाप दोनों का साया है,’ कहतेकहते मैं अपने पापा की यादों में खो गई और मायूस हो गई, ‘पता नहीं मेरे पापा जिंदा हैं भी या नहीं.’

‘हे, ऐसे उदास नहीं होते,’ कहतेकहते संदीप मेरे पास आ गए और मुझे अंक में भर कर बोले, ‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि हम ने उन्हें कहांकहां नहीं ढूंढ़ा. अखबारों में भी उन का विवरण छपवा दिया पर अब तक कुछ पता नहीं चला.’

मैं रोने लगी तो मेरे आंसू पोंछते हुए संदीप बोले थे, ‘‘अरे, एक बात तो मैं तुम को बताना भूल ही गया. जानती हो आज शाम को टेलीविजन पर एक नया प्रोग्राम शुरू हो रहा है ‘अपनों की तलाश में,’ जिसे एक बहुत प्रसिद्ध अभिनेता होस्ट करेगा. मैं ने पापा का सारा विवरण और कुछ फोटो वहां भेज दिए हैं. देखो, शायद कुछ पता चल सके.’?

‘अब उन्हें ढूंढ़ पाना बहुत मुश्किल है…इतने सालों में हमारी फोटो और उन के चेहरे में बहुत अंतर आ गया होगा. मैं जानती हूं. मुझ पर जिंदगी कभी मेहरबान नहीं हो सकती,’ कह कर मैं वहां से चली गई.

मेरी आशाओं के विपरीत 2 दिन बाद ही मेरे मोबाइल पर फोन आया. फोन धर्मशाला के नजदीक तपोवन के एक आश्रम से था. कहने लगे कि हमारे बताए हुए विवरण से मिलताजुलता एक व्यक्ति उन के आश्रम में रहता है. यदि आप मिलना चाहते हैं तो जल्दी आ जाइए. अगर उन्हें पता चल गया कि कोई उन से मिलने आ रहा है तो फौरन ही वहां से चले जाएंगे. न जाने क्यों असुरक्षा की भावना उन के मन में घर कर गई है. मैं यहां का मैनेजर हूं. सोचा तुम्हें सूचित कर दूं, बेटी.

‘अंकल, आप का बहुतबहुत धन्यवाद. बहुत एहसान किया मुझ पर आप ने फोन कर के.’

मैं ने उसी समय संदीप को फोन किया और सारी बात बताई. वह कहने लगे कि शाम को आ कर उन से बात करूंगा फिर वहां जाने का कार्यक्रम बनाएंगे.

‘नहीं संदीप, प्लीज मेरा दिल बैठा जा रहा है. क्या हम अभी नहीं चल सकते? मैं शाम तक इंतजार नहीं कर पाऊंगी.’

संदीप फिर कुछ सोचते हुए बोले, ‘ठीक है, आता हूं. तब तक तुम तैयार रहना.’

कुछ ही देर में हम लोग धर्मशाला के लिए प्रस्थान कर गए. पूरे 6 घंटे का सफर था. गाड़ी मेरे मन की गति के हिसाब से बहुत धीरे चल रही थी. मैं रोती रही और मन ही मन प्रार्थना करती रही कि वही मेरे पापा हों. देर तो बहुत हो गई थी.

हम जब वहां पहुंचे तो एक हालनुमा कमरे में प्रार्थना और भजन चल रहे थे. मैं पीछे जा कर बैठ गई. मैं ने चारों तरफ नजरें दौड़ाईं और उस व्यक्ति को तलाश करने लगी जो मेरे वजूद का निर्माता था, जिस का मैं अंश थी. जिस के कोमल स्पर्श और उदास आंखों की सदा मुझे तलाश रहती थी और जिस को हमेशा मैं ने घुटन भरी जिंदगी जीते देखा था. मैं एकएक? चेहरा देखती रही पर वह चेहरा कहीं नहीं मिला, जो अपना सा हो.

तभी लाठी के सहारे चलता एक व्यक्ति मेरे पास आ कर बैठ गया. मैं ने ध्यान से देखा. वही चेहरा, निस्तेज आंखें, बिखरे हुए बाल, न आकृति बदली न प्रकृति. वजन भी घट गया था. मुझे किसी से पूछने की जरूरत महसूस नहीं हुई. यही थे मेरे पापा. गुजरे कई बरसों की छाप उन के चेहरे पर दिखाई दे रही थी. मैं ने संदीप को इशारा किया. आज पहली बार मेरी आंखों में चमक देख कर उन की आंखों में आंसू आ गए.

भजन समाप्त होते ही हम दोनों ने उन्हें सहारा दे कर उठाया और सामने कुरसी पर बिठा दिया. मैं कैसे बताऊं उस समय मेरे होंठों के शब्द मूक हो गए. मैं ने उन के चेहरे और सूनी आंखों में इस उम्मीद से झांका कि शायद वह मुझे पहचान लें. मैं ने धीरेधीरे उन के हाथ अपने कांपते हाथों में लिए और फफक कर रो पड़ी.

‘पापा, मैं हूं आप की निकी…मुझे पहचानो पापा,’ कहतेकहते मैं ने उन की गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बांहें कस दीं, जैसे बचपन में किया करती थी. प्रार्थना कक्ष के सभी व्यक्ति एकदम संज्ञाशून्य हो कर रह गए. वे सब हमारे पास जमा हो गए.

पापा ने धीरे से सिर उठाया और मुझे देखने लगे. उन की सूनी आंखों में जल भरने लगा और गालों पर बहने लगा. मैं ने अपनी साड़ी के कोने से उन के आंसू पोंछे, ‘पापा, मुझे पहचानो, कुछ तो बोलो. तरस गई हूं आप की जबान से अपना नाम सुनने के लिए…कितनी मुश्किलों से मैं ने आप को ढूंढ़ा है.’

‘यह बोल नहीं सकते बेटी, आंखों से भी अब धुंधला नजर आता है. पता नहीं तुम्हें पहचान भी पा रहे हैं या नहीं,’ वहीं पास खड़े एक व्यक्ति ने मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा.

‘क्या?’ मैं एकदम घबरा गई, ‘अपनी बेटी को नहीं पहचान रहे हैं,’ मैं दहाड़ मार कर रो पड़ी.

पापा ने अपना हाथ अचानक धीरेधीरे मेरे सिर पर रखा जैसे कह रहे हों, ‘मैं पहचानता हूं तुम को बेटी…मेरी निकी… बस, पिता होने का फर्ज नहीं निभा पाया हूं. मुझे माफ कर दो बेटी.’

बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपना संतुलन बनाए रखा था. अपार स्नेह देखा मैं ने उन की आंखों में. मैं कस कर उन से लिपट गई और बोली, ‘अब घर चलो पापा. अपने से अलग नहीं होने दूंगी. 15 साल आप के बिना बिताए हैं और अब आप को 15 साल मेरे लिए जीना होगा. मुझ से जैसा बन पड़ेगा मैं करूंगी. चलेंगे न पापा…मेरी खुशी के लिए…अपनी निकी की खुशी के लिए.’

पापा अपनी सूनी आंखों से मुझे एकटक देखते रहे. पापा ने धीरे से सिर हिलाया. संदीप को अपने पास खींच कर बड़ी कातर निगाहों से देखते रहे जैसे धन्यवाद दे रहे हों.

उन्होंने फिर मेरे चेहरे को छुआ. मुझे लगा जैसे मेरा सारा वजूद सिमट कर उन की हथेली में सिमट गया हो. उन की समस्त वेदना आंखों से बह निकली. उन की अतिभावुकता ने मुझे और भी कमजोर बना दिया.

‘आप लाचार नहीं हैं पापा. मैं हूं आप के साथ…आप की माला का ही तो मनका हूं,’ मुझे एकाएक न जाने क्या हुआ कि मैं उन से चिपक गई. आंखें बंद करते ही मुझे एक पुराना भूला बिसरा गीत याद आने लगा :

‘सात समंदर पार से, गुडि़यों के बाजार से, गुडि़या चाहे ना? लाना…पापा जल्दी आ जाना.’

प्यार के राही-भाग 4 : हवस भरे रिश्ते

इधर चाचा के न रहने पर चाची खुश हो गई. वह मासूम पर अपने पालतू गुंडों से कहर ढाने लगीं. फिर भी मासूम ने शादी के लिए ‘हां’ नहीं कहा. उस ने उन के पैर पकड़ कर रोतेरोते कहा, ‘‘मां, मुझ पर रहम कीजिए, मैं तो बचपन से ही आप को अपनी मां की तरह मानता आया हूं. मेरी शादी गजाला से हो गई है. मैं गजाला को अपनी नजरों से गिराना नहीं चाहता.’’

चाची के आसपास के लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि मासूम की जिंदगी बरबाद मत कीजिए, लेकिन चाची ने किसी की बात नहीं सुनी. मासूम के सीने पर बंदूक रख कर निकाह कबूल करवा ही लिया.

निकाह के बाद मासूम ने 2-3 बार खुदकुशी करने की कोशिश की, लेकिन चाची ने हर बार उस की कोशिश को नाकाम कर दिया. उस के बाद अपने भरोसेमंद नौकरों और गुंडों का कड़ा पहरा लगा दिया, ताकि मासूम खुदकुशी न कर सके. चाची ने मासूम को जिंदा लाश बना दिया था.

इस बीच चाची अपने हवस की प्यास मासूम से बुझाती रही. इधर मैं कैद थी, इसलिए अपने दिल का दर्द उसे बता नहीं सकती थी. मेरे पैर पर प्लास्टर

2 दिनों के बाद खुलने वाला था, तभी मासूम राही को किसी तरह पता चला कि मैं अपने घर में कैद हूं.

तब मासूम का खून खौल उठा. उस ने तूफान की तरह हमारे घर की तरफ आना चाहा, लेकिन चाची के भरोसेमंद नौकरों और गुंडों ने रोक लिया. लेकिन उस समय मासूम के सीने में आग

सुलग रही थी. नौकरों और गुंडों से जम कर मुकाबला किया और सभी को जमीन सुंघा दी. उस समय चाची कहीं गई हुई थीं.

मासूम तेजी से मेरे घर में आया. उस समय अम्मी और अब्बा बाजार गए हुए थे. मैं लेटी हुई थी. मासूम को अपने कमरे में देखते ही मैं उस से लिपट कर रोने लगी.

मासूम ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रो मत गजाला. मैं तुम्हें यहां से निकालने आया हूं. चलो, मेरे साथ चलो. आज दुनिया की कोई ताकत मुझे तुम से जुदा नहीं कर सकती. वैसे मैं तुम्हारे प्यार के काबिल नहीं रहा. अब मेरा मर जाना ही अच्छा है.’’

‘‘ऐसा मत कहो, मासूम,’’ मैं ने भरे कलेजे से कहा. ‘‘खैर, छोड़ो. आओ, चलो मेरे साथ,’’ कहते हुए मासूम ने मेरा हाथ थाम लिया.

मैं चलफिर नहीं सकती थी. मेरे पैर में लगा प्लास्टर देख कर मासूम ने पिछली जेब से एक चमकदार चाकू निकाला, जिसे उस ने शायद गुंडों से छीना था. प्लास्टर कट जाने के बाद मैं आजाद हो गई. हम दोनों जैसे कमरे से बाहर निकले, अब्बा और अम्मी को देख कर दंग रह गए.

अब्बा का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ने लगा. वे गुस्से में बोले, ‘‘तुझ बेगैरत की हिम्मत कैसे हुई हमारे घर में आने की? मासूम, तू चला जा, नहीं तो मैं यहां खून की नदियां बहा दूंगा. बदजात, अपनेआप को समझता क्या है?’’

मुझे मासूम की बेइज्जती बरदाश्त नहीं हुई. मैं ने कहा, ‘‘अब्बा, हम दोनों मरेंगे साथसाथ और जिएंगे भी साथसाथ. मैं ने मासूम से शादी कर ली है.’’

‘‘नहीं, इस की जाति और खानदान का पता नहीं. यह इस घर का दामाद नहीं बन सकता. जिसे तुम अपना शौहर होने का दावा कर रही हो, वह अब तुम्हारा चाचा है और चाचा बाप के समान होता है,’’ अब्बा ने गरज कर कहा.

‘‘चलो मासूम, हमें इस महल्ले में नहीं रहना है. हम दोनों कहीं और चलें,’’ मैं ने यह कहा और हम दोनों घर से निकल गए.

जब चाची घर आईं, तो गुंडों और नौकरों के सिर पर कई जगह पट्टी बंधी देख कर वे चौंकीं.

‘‘मासूम गजाला के साथ कहीं भाग गया है,’’ एक नौकर ने कहा.

चाची का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. वे नौकरों और गुंडों पर बहुत बिगड़ीं और थाने में मेरे खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट लिखाई.

हम दोनों जानते थे कि पुलिस हमें जरूर खोजेगी, इसलिए हम लोग जल्द से जल्द पुलिस की पकड़ से दूर निकल जाना चाहते थे. लेकिन हम लोगों के पास एक भी पैसा नहीं था. फिर भी हम दोनों ने हिम्मत की और स्टेशन पहुंच कर बिना टिकट लिए ही दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी में बैठ गए.

हम दोनों दिल्ली पहुंचते ही कान की बालियां बेच कर एक दिन छोटे होटल में रहे. फिर मासूम ने एक कालोनी में 2,000 रुपए किराए पर 2 कमरे ले लिए. हम दोनों बीए तक पढ़ चुके थे.

मासूम रोज नौकरी खोजने जाते, लेकिन निराश हो कर लौट आते. अब पैसे भी खत्म होने पर थे. तभी मासूम को एक कारखाने में बड़े बाबू के

रूप में 15,000 रुपए महीना पर नौकरी मिल गई.

एक दिन पड़ोस की जरीना से जानपहचान हुई, जो डाक्टर थी. वह हम दोनों को अपनी सगी जैसी समझने लगी.

एक दिन उस ने मुझ से पूछा, ‘‘तुम तो बीए पास हो. हमारे क्लिनिक में नर्स की नौकरी कर लो. तनख्वाह 5,000 रुपए दूंगी.’’

मैं ने वह नौकरी करनी शुरू कर दी. अब हम दोनों अपनी जिंदगी मौजमस्ती से गुजारने लगे. बाद में फिर जरीना और उस के शौहर ने मिल कर हम दोनों का निकाह धूमधाम से करा दिया.

प्यार का सफल प्रायश्चित्त – भाग 3

दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड और रात के 11 बजे महल्ले वाले अपनेअपने घरों की रजाइयों में दुबके होंगे. जबकि प्रेम की अगन, हम दोनों को एकदूसरे से मिलने के लिए बेकरारी बढ़ा रही थी. मैं अपने घर की छत पर पहुंचा. धीरे से उस की छत पर पहुंचा पूरी सावधानी से. मन में डर था. कोई देख न ले. प्रेम आदमी में हिम्मत और जोश भर देता है. यह बात तो आज पक्की हो गई थी.

मैं उस के बैडरूम में था उस के साथ. मैं उसे जीभर कर देख रहा था. और वह मु झे. मैं उस से लिपट गया. उस ने विरोध नहीं किया. मैं उसे चूमने लगा. उस ने मेरा साथ दिया. मैं ने उस के कपड़े उतारने की कोशिश की. उस ने कहा, ‘‘यह सब जरूरी है क्या? मन तो मिल चुके हैं,’’ मैं ने अपने हाथ वापस खींच लिए. उसे गोद में उठा कर बिस्तर पर फूल की तरह रखा और उस से लिपट गया. मैं उसे फिर से चूमने लगा. वह भी मु झे चूमने लगी. सर्दी में गरमी का एहसास होने लगा. मैं ने फिर आगे बढ़ना चाहा. उस ने फिर कहा, ‘‘यह सब जरूरी है क्या?’’

‘‘तुम डर रही हो. घबराओ मत. मैं तुम्हारे साथ हूं,’’ मैं ने उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा. और मेरे हाथ फिर से उस के वस्त्र उतारने की ओर बढ़े.

‘‘यह सब तो तुम अपनी पत्नी के साथ कई बार कर चुके होगे. मैं तुम से सैक्स नहीं, केवल प्यार चाहती हूं.’’

‘‘सैक्स भी तो प्यार प्रदर्शित करने का एक माध्यम है. क्या तुम मु झे नहीं चाहती. यदि प्रेम करती हो तो फिर संबंध बनाने से इनकार क्यों?’’ उस के जिस्म पर मेरे होंठ और हाथ हरकत कर रहे थे. उस का शरीर समर्पण मुद्रा में था.

‘‘अगर तुम यही चाहते हो तो यही सही. मैं आप की खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं. आगे कुछ हो तो आप संभाल लेना.’’

मैं शिकारी की मुद्रा में था. इस अनमोल समय को मैं किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहता था. एकदो बार दिमाग ने सम झाने की कोशिश की. लेकिन इस स्थिति में दिमाग की कौन सुनता है. दिमाग खुदबखुद शरीर के बाकी हिस्से के साथ शामिल हो जाता है. वह शरमाती रही. मैं उसे निर्वस्त्र करता रहा. उस ने कहा, ‘‘एक बार फिर सोच लो.’’

मैं ने कहा, ‘आई लव यू’ और मैं आगे बढ़ता रहा. वह धीरेधीरे कराहती रही और मैं आगे बढ़ता रहा. कुछ समय बाद वह मेरा साथ देने लगी. मेरे चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे. उस के चेहरे पर संतुष्टि के साथ डर भी था. मैं ने उसे गोली निकाल कर दी.

‘‘इसे खा लो.’’

‘‘पूरी तैयारी के साथ आए हो,’’ उस ने गोली हाथ में ले ली. फिर वह मु झ से लिपट कर रोने लगी.

‘‘मु झे छोड़ना मत. मैं ने अपना सबकुछ तुम्हें सौंप दिया.’’

मैं ने उसे कभी न छोड़ने का वादा किया. सुबह 4 बजे में वापस लौटा. मेरे मन पर भी कुछ बो झ सा आ गया था. मैं भी सही और गलत पर विचार करने लगा था. और वह तो अब जैसे मु झ पर ही निर्भर हो चुकी थी. मु झे ही अपना सबकुछ मान बैठी थी. उस का बारबार फोन आना. अपना अधिकार जता कर बात करना. भविष्य के बारे में बात करना. बातबात पर रो देना. कभी भी मेरे कालेज चले आना. फिर मिलने की बात करना. इन सब बातों ने मु झे भारी दबाव में ला दिया था.

मैं स्वयं को मानसिक रूप से क्षतिग्रस्त सा पा रहा था. मैं ने उसे सम झाया कि देखो, हम एकदूसरे से प्यार करते हैं. इस तरह तुम्हारी जिद और अधिकार हमारे प्रेमभरे संबंधों के लिए घातक हैं. हम बिना किसी बंधन के ज्यादा सुखी रह सकते हैं. तुम्हें अपने ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए. मेरी बात पर उस ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मैं कहां अधिकार जता रही हूं. प्रेम के बदले प्रेम ही तो मांग रही हूं. पहले आप मिलने के लिए कितने उतावले रहते थे. अब तो बस हां या न में उत्तर देते हो. पहले की तरह सुबह आते भी नहीं हो.’’

‘‘इन दिनों मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है,’’ कहने को तो मैं ने कह दिया. लेकिन सच बात यही थी कि मैं अपने अंदर अब वह जोश वह उत्साह नहीं पा रहा था, चाह कर भी. उस की बारबार की शिकायतों से तंग आने लगा था मैं. तो क्या मु झे उस से जो चाहिए था उस की पूर्ति हो चुकी थी? क्या उस के प्रति मेरी दीवानगी मात्र उस के शरीर को पाने तक सीमित थी? क्या चंद रातों के लिए मैं ने अपना सुकून और एक लड़की का जीवन दांव पर लगा दिया था? क्या मु झे अपनी पत्नी से ऐसा कुछ नहीं मिल रहा था जो मैं ने इस लड़की में तलाशना चाहा? कहीं यह मेरी अधेड़ावस्था के कारण तो नहीं.

प्यार तो उस समय करता था मैं उस से. आज भी करता हूं लेकिन वह बात नहीं रही अब? क्यों नहीं रही वह बात? क्या मैं उस के शरीर का भूखा था मात्र? अब क्यों उस के पीछेपीछे नहीं जाता मैं? क्यों उस से कतराता रहता हूं. इस के लिए कहीं न कहीं वह भी दोषी है. एकदम से पीछे पड़ जाना, बारबार फोन करना, हरदम मिलने की कोशिश करना कहां तक उचित है? लेकिन मु झे उसे सम झाना होगा. उस पर ध्यान भी देना होगा. कमउम्र की लड़की है. न जाने गुस्से या नाराजगी में क्या कर बैठे? वह जबजब मिली, नईपुरानी शिकायतों के साथ मिली. और मैं प्रेम से उसे प्रेम की परिभाषा सम झाता रहा. जिस में त्याग की भावना मुख्य थी. लेकिन सम झाना व्यर्थ ही रहता. वह अधिकार चाहती थी. जो मैं उसे नहीं दे सकता था.

‘‘आप ने ही तो कहा था कि मेरे लिए सबकुछ कर सकते हो.’’

‘‘हां, तो कर तो रहा हूं. तुम से मिलता हूं, बात करता हूं.’’

‘‘मु झे अपना अधिकार चाहिए.’’

‘‘हमारे बीच अधिकार की बात कहां से आ गई?’’

‘‘प्यार है तो अधिकार तो आएगा ही, मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं, अरमान हैं. मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. घर बसाना चाहती हूं.’’

‘‘अब वह शादी की बात कहां से आ गई? तुम क्या चाहती हो? मैं अपने बीवी, बच्चे छोड़ दूं? क्या वे मु झे इतनी आसानी से छोड़ देंगे? समाज, कानून भी कोईर् चीज है.’’

‘‘आप ने जो वादे किए थे उन का क्या?’’

‘‘मैं ने प्यार करने का, निभाने का वादा किया था.’’

‘‘तो ले चलो मु झे कहीं दूर अपने साथ. मत करना शादी. मैं ऐसे ही रहने को तैयार हूं.’’

‘‘उफ यह क्या मुसीबत मोल ले ली मैं ने. कहां ले जाऊं इसे? कहां रखूं? लोगों को पता चलेगा. पत्नी को पता चलेगा तो क्या सोचेगी मेरे बारे में. मैं उस से स्पष्ट नहीं कह सकता था कि मेरा पीछा छोड़ो. वह कुछ भी कर सकती थी. इन दिनों उस के तेवर ठीक नजर नहीं आ रहे थे मु झे. वह मेरा नाम लिख कर आत्महत्या कर सकती थी. वह पुलिस थाने जा कर यौनशोषण का आरोप लगा सकती थी मु झ पर. मु झे ऐसी किसी भी स्थिति से बचने के लिए उसे यह एहसास दिलाना जरूरी था कि मैं जल्द ही उस की इच्छा पूरी करने के लिए कोई कदम उठाने जा रहा हूं. क्या करूं, कैसे पीछा छुड़ाऊं? जिस लड़की के लिए मैं मरा जा रहा था आज उस से पीछा छुड़ाने के विषय में सोच रहा था.’’

मैं भूल गया था कि वह कोई सैक्स का खिलौना नहीं थी कि जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर दिया और रख दिया एक तरफ. वह जीवित हाड़मांस की 25 वर्षीया नौजवान लड़की थी. उस की इच्छाएं, अरमान होना स्वाभाविक था. लेकिन मेरा अपना जीवन था. मैं प्रोफैसर था. विवाहित था. 2 बच्चों का बाप था. यह बात मु झे उस रात उस के घर में जा कर उस से संबंध बनाने से पहले सोचनी चाहिए थी. तो क्या करूं पीछा छुड़ाने के लिए. ले जाऊं कहीं दूर और फेंक दूं मार कर उस की लाश को कहीं. क्या मैं यह कर सकता हूं? क्या यह मु झे करना चाहिए? तो क्या उसे अपनी गैरकानूनी पत्नी बना कर रख लूं. लोग यही तो कहेंगे कि दूसरी औरत रख ली है. हत्यारा बनने से तो बचूंगा. फिर मेरी उम्र और उस की उम्र में 20 वर्ष का अंतर है. जब मु झ से शारीरिक सुखों की पूर्ति नहीं होगी, तो खुद ही चली जाएगी छोड़ कर. सारा प्यार एक तरफ धरा रह जाएगा. नहीं…नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता.

एक दिन उस ने रोते हुए कहा, ‘‘जल्दी कुछ करो, मेरे घर वाले शादी के लिए लड़का तलाश रहे हैं.’’

‘‘यह तो अच्छी बात है. तुम्हारी उम्र का पढ़ालिखा, अच्छी नौकरी वाला जीवनसाथी मिलेगा. जो सिर्फ तुम्हारा होगा.’’

‘‘मैं किसी से शादी नहीं करूंगी. मेरी शादी होगी तो सिर्फ तुम से… वरना सारा जीवन कुंआरी रहूंगी.’’

मैं ने उसे सम झाते हुए कहा, ‘‘तो ठीक है तुम अपने पैरों पर खड़ी हो. यदि शादी की तुम्हारी शर्त है तो मेरी भी एक शर्त है. तुम्हें प्रोफैसर की पत्नी बनना है तो पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना होगा.’’

मैं ने दांव चलाया. दांव चल गया. उस ने जोश में कहा, ‘‘तो ठीक है, मैं आप को अपने पैरों पर खड़ी हो कर दिखाऊंगी. लेकिन प्यार कम नहीं होना चाहिए.’’

उस के आखिरी वाक्य से मैं आहत

सा हुआ. लेकिन मु झे रास्ता मिल गया.

अच्छा रास्ता जो लड़की के भविष्य के लिए उचित था.

‘‘हां, प्यार कम नहीं होगा. वादा रहा. लेकिन तुम्हें किसी बड़ी कंपनी या सरकारी नौकरी में ऊंची पोस्ट पर आना होगा. इस के लिए तुम्हें खूब तैयारी करनी होगी. सबकुछ भूल कर कम से कम 12 घंटे पढ़ना होगा. चाहो तो किसी बड़े शहर में कोचिंग जौइन कर लो. साथ ही, अपनी पढ़ाई भी जारी रखो. मैं इस में तुम्हारी मदद करूंगा.’’

‘‘लेकिन मेरे घर वाले मु झे बाहर भेजने के लिए राजी नहीं होंगे.’’

‘‘तुम पढ़ाई पर ध्यान दो. तुम्हारी लगन और मेहनत देख कर वे खुद तुम्हें भेजेंगे. मैं भी सम झाऊंगा उन्हें.’’

‘‘लेकिन अपना वादा याद रखना.’’

‘‘तुम अपना वादा तो निभाओ.’’

‘‘मैं बीचबीच में मिलती रहूंगी. मिलना होगा आप को. फोन पर बात भी करनी होगी.’’

‘‘मु झे मंजूर है,’’ मैं ने खुशी के साथ कहा.

यदि लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो कर भी मु झ से जुड़ी रहना चाहे तो मु झे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. ऐसा मेरा मानना था. धीरेधीरे उम्र बढ़ेगी. सम झ भी बढ़ेगी. लड़की नौकरी में होगी तो उस का अपना स्टेटस भी होगा. वह अपने बराबर का रिश्ता देखेगी. चार लोगों में उसे भी तो अपने पति से मिलवाना होगा. मु झे नहीं लगता कि वह आज से 5 वर्ष बाद मु झे किसी से अपने पति के रूप में मिलवाना पसंद करेगी.

इस बीच मेरी पत्नी का शक मजबूत हो चुका था. अब वह उसे घर आने की बात पर टाल देती. उस से ठीक से बात नहीं करती. मु झ से भी कई बार उसे ले कर  झगड़ा हो चुका था. मेरे मोबाइल की घंटी बजते ही  झट से पत्नी आ कर मोबाइल उठा कर पूछती. जब उसे यकीन हो जाता कि दूसरी तरफ मेरी प्रेमिका है तो वह उलटीसीधी बातें सुनाती. गालियां देती और मोबाइल पटक देती. कई बार मेरे कालेज भी आ जाती. एकदो बार उस ने बात करते हुए पकड़ भी लिया और उसे और मु झे खूब खरीखोटी सुनाई. मैं ने अपनी पत्नी को कई बार सम झाया कि वह कम उम्र की नादान लड़की है. पढ़ाईलिखाई में मदद मांगने आती है. लेकिन पत्नी का स्पष्ट कहना था कि मु झे बेवकूफ बनाने की जरूरत नहीं है. मैं सब सम झती हूं. घर में मेरे सम्मान की धज्जियां उड़ने लगीं. पत्नी बातबात पर व्यंग्य करने से नहीं चूकती.

मैं ने अपनी पत्नी की आड़ ले कर उसे डराते हुए सम झाया, ‘‘मेरे मोबाइल पर बात मत करना. खासकर जब मैं घर में रहूं. तुम्हारे घर वालों से शिकायत कर दी, तो तुम्हारे घर वाले तुम्हें चरित्रहीन सम झेंगे. तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तुम्हारा विवाह कर देंगे. यदि तुम हम दोनों का भला चाहती हो, सुखी भविष्य देखना चाहती हो तो अपने पैरों पर खड़ी हो कर दिखाओ. इसी दिन के लिए मैं बारबार फोन करने, मिलने के लिए मना करता था. यह दुनिया शुरू से प्यार की दुश्मन रही है. लेकिन तुम ने प्यार को प्यार न सम झ कर अधिकार सम झ लिया.’’

उस ने रोंआसे स्वर में कहा, ‘‘जब तुम्हारी पत्नी ने मु झे भलाबुरा कहा, तब तुम ने क्यों कुछ नहीं कहा. अपने प्यार का अपमान होते देखते रहे.’’

मैं ने गुस्से से कहा, ‘‘यदि मैं कुछ कहता तो वह तुम्हारा तमाशा बना कर रख देती. जो मैं नहीं चाहता था. तुम सम झतीं क्यों नहीं बात?’’

वह सम झ गई. उदास हो कर घर चली गई. मैं ने लड़की के पिता बिहारीलालजी को एक पत्र लिखा और उन के बैंक के पते पर पोस्ट कर दिया. पत्र में बहुत विश्वसनीयता से उन की पुत्री के गैर लड़के से संबंधों की जानकारी लिखी थी. बिहारीलालजी बैंक में अंकाउंटैंट थे. उन के परिवार में इस बेटी के अलावा एक बेटी, एक बेटा और पत्नी थी. मैं जानता था कि भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार में लड़की बाहर चाहे जो करे लेकिन प्रेम के नाम पर यदि मातापिता उसे डांटेंमारें तो वह किसी अपराधी की तरह सिर  झुका कर सब सुनतीसहती रहेगी. यही हुआ भी. उस के मातापिता डांट रहे थे. उन की आवाजें मेरे घर तक आ रही थीं. मेरी पत्नी ने मु झ पर व्यंग्य करते हुए कहा, ‘‘लो, लड़की ने तो तुम जैसे न जाने कितने फंसा रखे हैं.’’

मैं ने पत्नी को जम कर लताड़ते हुए कहा, ‘‘गंवार, बेवकूफ औरत. वह एक सीधीसाधी लड़की है. कम उम्र की है. बचपना है उस में. मैं तो उसे टीचर बन कर पढ़ाता था. तुम ने मु झे भी नहीं बख्शा. इस उम्र में हो जाता है लगाव. मैं उस के पिता से बात कर के उन्हें सम झाऊंगा. दोबारा मेरा नाम उस के साथ जोड़ने की गलती मत करना. वह सिर्फ मेरे लिए एक स्टूडैंट है. और ऐसी न जाने कितनी छात्राएं मु झ से पढ़ाई संबंधी सवाल पूछती हैं. कभीकभी कम उम्र के बच्चों को लगाव हो जाता है. इस का अर्थ यह तो नहीं कि मैं उस का प्रेमी हो गया.’’

पत्नी खामोश हो गई. कभीकभी तेज स्वर में सचाई से  झूठ बोलना सच को छिपा देता है. दूसरे ही दिन मैं बैंक में जा कर बिहारीलालजी से मिला. मु झे देख कर वे आश्चर्य में पड़ गए. मैं ने कहा, ‘‘कुछ बात करनी थी. थोड़ा सा समय लूंगा आप का.’’

‘‘कहिए.’’

‘‘थोड़ा एकांत में.’’

वे बैंक से बाहर आ गए. मैं ने कहा, ‘‘कल आप के घर से तेज आवाजें आ रही थीं.’’ उन के चेहरे पर तनाव आ गया.’’

‘‘मैं पहले ही इस संबंध में आप को बताना चाहता था लेकिन हिम्मत नहीं हुई. अब जब आप को सब पता चल ही चुका है तो मेरी सलाह मानिए. आप की बेटी पढ़ने में होशियार है. किसी लड़के के बहकावे में आ गई है. लड़की सभ्य, संस्कारी, पढ़ने में तेज है. इस तरह की बातों पर शोर करने से मामला बिगड़ता है. कल गुस्से में लड़की ने कोई गलत कदम उठा लिया तो मुश्किल हो जाएगी आप के लिए.’’

‘‘आप ही बताइए, क्या करूं मैं?’’

‘‘मेरी मानिए, लड़की को कुछ समय कोचिंग और कालेज की पढ़ाई के लिए बाहर भेज दीजिए. यदि नौकरी में आ गई तो आप के दोनों बच्चों को भी मार्गदर्शन मिल जाएगा. घर की मदद भी हो जाएगी. यह सारा  झमेला भी खत्म हो जाएगा.’’

‘‘आप जानते हैं उस लड़के को?’’

‘‘नहीं, मैं ने एकदो बार उसे मोटरसाइकिल पर घूमते देखा है आप की लड़की को. आप यह सब छोडि़ए और लड़की के भविष्य व परिवार के सम्मान की खातिर उसे दिल्ली भेज दीजिए. दोतीन साल की बात है. इस बीच कोई अच्छा रिश्ता आ जाए तो बुला कर शादी कर दीजिए.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं,’’ बिहारीलालजी मेरी बात से सहमत थे.

उन्होंने तब तक लड़की का घर से निकलना बंद कर दिया. उस का मोबाइल छीन लिया. जब तक कि वे उसे दिल्ली के एक अच्छे कोचिंग इंस्टिट्यूट में नहीं छोड़ आए. मैं ने राहत की सांस ली. एक प्यारभरी गलती, एक विवाहित पुरुष की प्यार करने की गलती, एक कम उम्र की लड़की से प्यार करने का अपराध और बाद में उस से अपने सुखद भविष्य, शांतिपूर्ण गृहस्थी और लड़की की भलाई के लिए मु झे जो करना था, वह मैं ने किया. इसे गुनाह छिपाने का सकारात्मक तरीका भी कहा जा सकता है.

कालेज के समय पर उस के फोन आते. वह ‘आई लव यू’, ‘आई मिस यू’ के मैसेज करती. मु झे बेइंतहा प्यार करने की बात कहती और साथ ही अपना वादा याद रखने की बात कहती. मैं बदले में यही कहता, ‘कुछ बन कर दिखाओ, प्यार के लिए, पहले.’

वह शायद पढ़ाई में व्यस्त होती गई. अब फोन आते, लेकिन पहले वह पढ़ाई संबंधी मार्गदर्शन लेती, उस के बाद अंत में आई लव यू पर अपनी बात खत्म करती. मैं जानता हूं होस्टल का खुलापन, हमउम्र लड़केलड़कियों की एक कालेज में पढ़ाई के साथ मौजमस्ती. धीरेधीरे उस का मेरी तरफ से ध्यान हटेगा. अपने हमउम्र किसी लड़के पर उस का  झुकाव बढ़ेगा.

उस ने एक दिन फोन कर के बताया कि वह बैंक के साथसाथ पीएससी की तैयारी भी कर रही है. कालेज की पढ़ाई खत्म हो चुकी है. उस ने यह भी बताया कि पिताजी को किसी ने मेरे बारे में उलटासीधा पत्र लिखा था. इसलिए उन्होंने मु झे दिल्ली भेज दिया. जबकि ऐसा नहीं था. उस ने यह भी बताया कि शादी के लिए पिताजी ने एक लड़का पसंद किया है. मु झे बुलाया है. लेकिन मैं ने उन से स्पष्ट कह दिया कि मैं जब तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, वापस नहीं आऊंगी. यदि वे रुपए न भी भेजें, तो कोई पार्टटाइम जौब कर लूंगी. फिर धीरेधीरे फोन अंतराल से आने लगे. कईकई दिनों में. फोन आते भी तो आई लव यू भी कई बार नहीं कहा जाता.

मेरी उम्र 50 वर्ष हो चुकी थी. उसे गए हुए 5 वर्ष बीत चुके थे. मु झे पता चला उस के पिता से कि उस ने पीएचडी कर ली है. नैट निकाल लिया है. वह साथ ही आईपीएस की तैयारी भी कर रही है. मु झे खुशी हुई कि उस ने मु झे फोन लगा कर नहीं बताया. इच्छा हुई कि एक बार उस से मिलूं, इस मिलने में कोई प्रेम नहीं था, वासना नहीं थी. बस, देखना था कि कितना भूल चुकी है वह.

मैं ने 3 माह लगातार साबुन से बाल धोए. न बाल कटवाए, न डाई करवाई. इस से मेरे बालों की पिछली सारी ब्लैक डाई निकल चुकी थी. मेरे सारे बाल सफेद थे. और चेहरे पर सफेद चमचमाती दाढ़ी. आंखों में पावर का चश्मा. मैं इग्नू के काम से दिल्ली आया हुआ था. सोचा, मिलता चलूं और परिवर्तन देखूं. होस्टल का पता उसी के द्वारा मु झे मालूम था. मैं होस्टल के बाहर था. वह गु्रप में लड़कियों के साथ हंसीमजाक कर रही थी. मु झे देख कर वह सकते में आ गई.

मैं उस के पास पहुंचा तो उस ने अपनी साथ की लड़कियों से कहा, ‘‘यह मेरे अंकल हैं,’’ सभी लड़कियों ने मु झे ‘हाय अंकल,’ ‘नमस्ते अंकल’ कहा. उसे लगा मैं कुछ कह न दूं. वह मु झे फौरन होस्टल के गैस्टरूम में ले गई. उस समय वहां कोई नहीं था. वह मु झ पर भड़क कर बोली, ‘‘आप बिना बताए कैसे आ गए? आए थे तो कम से कम हुलिया ठीक कर के आते. इस समय आप अंकल नहीं, दादाजी लग रहे हैं. क्या जरूरत थी आप को यहां आने की?’’

मु झे खुशी हुई उस की बात सुन कर. फिर भी मैं ने कहा, ‘‘तुम से मिलने की इच्छा हुई, तो चला आया.’’

‘‘ऐसे कैसे चले आए? यह गर्ल्स होस्टल है. फिर आशिकी का भूत सवार तो नहीं हो गया ठरकी बुड्ढे. जो हुआ मेरा बचपना था. अगर वह बात किसी को बता कर बदनाम करने की कोशिश की तो जेल भिजवा दूंगी यौनशोषण का केस लगा कर.’’

तभी उस का फोन बजा. वह एक तरफ जा कर बात करने लगी.

‘‘हां, रमेश, कल की पार्टी मेरी तरफ से. उस के बाद पिक्चर का भी प्रोग्राम है. हां, मेरा सलैक्शन हो गया है कालेज में.’’

‘‘यह रमेश कौन है?’’ मैं ने पूछा, हालांकि मु झे पूछने की जरूरत नहीं थी.

‘‘मेरा बौयफ्रैंड है,’’ फिर उस ने मु झे सम झाया, ‘‘प्लीज, पुरानी बातें भूल जाओ. मैं ने गुस्से में जो कहा, उस के लिए माफ करना. यहां मेरा अपना टौप का सर्कल है. यदि किसी को तुम्हारे बारे में पता चलेगा तो मेरा मजाक उड़ाएंगे सब.’’

‘‘अच्छा, मैं चलता हूं,’’ मैं पूरी तरह निश्ंिचत हो कर उठा.

‘‘अंकल, आप ने पढ़ाई में मेरी जो मदद की है, उस के लिए धन्यवाद. एक बार गलती हम दोनों से हुई थी. उसे याद करने की जरूरत नहीं. प्लीज, आप जाइए. कोई पूछे तो कहना आप मेरे अंकल हैं. घर के लोगों ने कहा था कि दिल्ली जा रहे हो, तो बेटी के हालचाल पूछते हुए आना.’’

‘‘हां, बिलकुल यही कहूंगा.’’

मैं होस्टल के गैस्टरूम से बाहर निकला. उस का मु झे भूलना, मु झ से चिढ़ना, मु झ से बचना, यही तो चाहता था मैं. जो हो चुका था. मेरी गलती का, अपराध का सफल प्रायश्चित्त हो चुका था. मैं खुश था, मेरे मन का सारा बो झ उतर चुका था. मैं अपनी सफाई, सम झदारी से बच तो निकला था लेकिन दाग फिर भी धुला नहीं था पूरी तरह.

घर पर जब कभी कोई नैतिकता, प्रेम, विश्वास की बात करता तो पत्नी के मुंह से निकल ही जाता, तुम तो रहने ही दो. तुम्हारे मुंह से ये बातें अच्छी नहीं लगतीं. और मैं चुप रह जाता. चुप रहने में ही भलाई सम झता. कहने को अपनी सफाई में बहुतकुछ कह सकता था मैं. लेकिन, मैं खामोश रहता क्योंकि अंदर से मैं जानता था कि कहीं न कहीं से गुनहगार हूं मैं. द्य

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 3

धीरेधीरे उन के संबंध बद से बदतर होते गए. वे एकदूसरे से बात भी नहीं करते थे. मुझे पापा से सहानुभूति थी. पापा को अपने व्यक्तित्व का अपमान बरदाश्त नहीं हुआ और उस दिन के बाद वह तिरस्कार सहतेसहते एकदम अंतर्मुखी हो गए. मम्मी का स्वभाव उन के प्रति और भी ज्यादा अन्यायपूर्ण हो गया. एक अनजान व्यक्ति की तरह वह घर में आते और चले जाते. अपने ही घर में वह उपेक्षित और दयनीय हो कर रह गए थे.

मुझे धीरेधीरे यह समझ में आने लगा कि पापा, मम्मी के तानों से परेशान थे और इन्हीं हालात में वह जीतेमरते रहे. किंतु मम्मी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा. उन का पहले की ही तरह किटी पार्टी, फोन पर घंटों बातें, सजसंवर कर आनाजाना बदस्तूर जारी रहा. किंतु शाम को पापा के आते ही माहौल एकदम गंभीर हो जाता.

एक दिन वही हुआ जिस का मुझे डर था. पापा शाम को दफ्तर से आए. चेहरे से परेशान और थोड़ा गुस्से में थे. पापा ने मुझे अपने कमरे में जाने के लिए कह कर मम्मी से पूछा, ‘तुम बाहर गई थीं क्या…मैं फोन करता रहा था?’

‘इतना परेशान क्यों होते हो. मैं ने तुम्हें पहले भी बताया था कि मैं आजाद विचारों की हूं. मुझे तुम से पूछ कर जाने की जरूरत नहीं है.’

‘तुम मेरी बात का उत्तर दो…’ पापा का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज था. पापा के गरम तेवर देख कर मम्मी बोलीं, ‘एक सहेली के साथ घूमने गई थी.’

‘यही है तुम्हारी सहेली,’ कहते हुए पापा ने एक फोटो निकाल कर दिखाया जिस में वह मनोज अंकल के साथ उन का हाथ पकड़े घूम रही थीं. मम्मी फोटो देखते ही बुरी तरह घबरा गईं पर बात बदलने में वह माहिर थीं.

‘तो तुम आफिस जाने के बाद मेरी जासूसी करते रहते हो.’

‘मुझे कोई शौक नहीं है. वह तो मेरा एक दोस्त वहां घूम रहा था. मुझे चिढ़ाने के लिए उस ने तुम्हारा फोटो खींच लिया…बस, यही दिन रह गया था देखने को…मैं साफसाफ कह देता हूं, मैं यह सब नहीं होने दूंगा.’

‘तो क्या कर लोगे तुम…’

‘मैं क्या कर सकता हूं यह बात तुम छोड़ो पर तुम्हारी इन गतिविधियों और आजाद विचारों का निकी पर क्या प्रभाव पड़ेगा कभी इस पर भी सोचा है. तुम्हें यही सब करना है तो कहीं और जा कर रहो, समझीं.’

‘क्यों, मैं क्यों जाऊं. यहां जो कुछ भी है मेरे घर वालों का दिया हुआ है. जाना है तो तुम जाओगे मैं नहीं. यहां रहना है तो ठीक से रहो.’

और उसी गरमागरमी में पापा ने अपना सूटकेस उठाया और बाहर जाने लगे. मैं पीछेपीछे पापा के पास भागी और धीरे से कहा, ‘पापा.’

वह एक क्षण के लिए रुके. मेरे सिर पर हाथ फेर कर मेरी तरफ देखा. उन की आंखों में आंसू थे. भारी मन और उदास चेहरा लिए वह वहां से चले गए. मैं उन्हें रोकना चाहती थी, पर मम्मी का स्वभाव और आंखें देख कर मैं डर गई. मेरे बचपन की शोखी और नटखटपन भी उस दिन उन के साथ ही चला गया. मैं सारा समय उन के वियोग में तड़पती रही और कर भी क्या सकती थी. मेरे अपने पापा मुझ से दूर चले गए.

एक दिन मैं ने पापा को स्कूल की पार्किंग में इंतजार करते पाया. बस से उतरते ही मैं ने उन्हें देख लिया था. मैं उन से लिपट कर बहुत रोई और पापा से कहा कि मैं उन के बिना नहीं रह सकती. मम्मी को पता नहीं कैसे इस बात का पता चल गया. उस दिन के बाद वह ही स्कूल लेने और छोड़ने जातीं. बातोंबातों में मुझे उन्होंने कई बार जतला दिया कि मेरी सुरक्षा को ले कर वह चिंतित रहती हैं. सच यह था कि वह चाहती ही नहीं थीं कि पापा मुझ से मिलें.

मम्मी ने घर पर ही मुझे ट्यूटर लगवा दिया ताकि वह यह सिद्ध कर सकें कि पापा से बिछुड़ने का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा तो मम्मी ने मुझे होस्टल में डालने का फैसला किया.

इस से पहले कि मैं बोर्डिंग स्कूल में जाती, पता चला कि पापा से मिलवाने मम्मी मुझे कोर्ट ले जा रही हैं. मैं नहीं जानती थी कि वहां क्या होने वाला है, पर इतना अवश्य था कि मैं वहां पापा से मिल सकती हूं. मैं बहुत खुश हुई. मैं ने सोचा इस बार पापा से जरूर मम्मी की जी भर कर शिकायत करूंगी. मुझे क्या पता था कि पापा से यह मेरी आखिरी मुलाकात होगी.

मैं पापा को ठीक से देख भी न पाई कि अलग कर दी गई. मेरा छोटा सा हराभरा संसार उजड़ गया और एक बेनाम सा दर्द कलेजे में बर्फ बन कर जम गया. मम्मी के भीतर की मानवता और नैतिकता शायद दोनों ही मर चुकी थीं. इसीलिए वह कानूनन उन से अलग हो गईं.

धीरेधीरे मैं ने स्वयं को समझा लिया कि पापा अब मुझे कभी नहीं मिलेंगे. उन की यादें समय के साथ धुंधली तो पड़ गईं पर मिटी नहीं. मैं ने महसूस कर लिया कि मैं ने वह वस्तु हमेशा के लिए खो दी है जो मुझे प्राणों से भी ज्यादा प्यारी थी. रहरह कर मन में एक टीस सी उठती थी और मैं उसे भीतर ही भीतर दफन कर लेती.

पढ़ाई समाप्त होने के बाद मैं ने एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर ली. वहीं पर मेरी मुलाकात संदीप से हुई, जो जल्दी ही शादी में तबदील हो गई. संदीप मेरे अंत:स्थल में बैठे दुख को जानते थे. उन्होंने मेरे मन पर पड़े भावों को समझने की कोशिश की तथा आश्वासन भी दिया कि जो कुछ भी उन से बन पड़ेगा, करेंगे.

हम दोनों ने पापा को ढूंढ़ने का बहुत प्रयत्न किया पर उन का कुछ पता न चल सका. मेरे सोचने के सारे रास्ते आगे जा कर बंद हो चुके थे. मैं ने अब सबकुछ समय पर छोड़ दिया था कि शायद ऐसा कोई संयोग हो जाए कि मैं पापा को पुन: इस जन्म में देख सकूं.

पापा के लिए- भाग 3: सौतेली बेटी का त्याग

तभी इतनी देर से विचारों की कशमकश में हिचकोले सी खाती मैं ने, उन की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘‘नहीं मम्मी, हम सब को, पूरे परिवार को आप की बहुत जरूरत है. पापा को किडनी मैं दूंगी और कोई नहीं.’’

मेरी बात सुन कर मम्मी एकदम चीख कर ऐसे बोलीं, मानो बरसों का आक्रोश आज एकसाथ लावा बन कर फूट पड़ा हो, ‘‘दिमाग तो सही है तेरा नेहा. उस आदमी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा रही है, जिस ने तुझे कभी अपना माना ही नहीं, जिस ने कभी दो बोल प्यार के नहीं बोले तुझ से… तू उसे अपने शरीर की इतनी कीमती चीज दे रही है… नहीं, कभी नहीं, यह बेवकूफी मैं तुझे नहीं करने दूंगी मेरी बच्ची, कभी नहीं. अभी तेरे सामने पूरा जीवन पड़ा है. पराए घर की अमानत है तू. अरे, जिन बच्चों पर वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे, वे करें यह सब. अमन का फर्ज बनता है यह सब करने का, तेरा नहीं. तू ही है सिर्फ क्या उन के लिए.’’

‘‘मैं उन के लिए चाहे कुछ न हूं लेकिन मेरे लिए वे बहुत कुछ हैं. मैं ने तो दिल से उन्हें अपना पापा माना है मम्मी. मैं अपने पापा के लिए कुछ भी कर सकती हूं और फिर मम्मी, प्यार का प्रतिकार प्यार ही हो, यह कोई जरूरी तो नहीं.’’

मम्मी मुझे हैरत से देखती रह गई थीं. उन का पूरा चेहरा आंसुओं से भीग गया था. शायद सोच रही थीं – काश, इस बेटी के दिल को भी पढ़ा होता उन्होंने कभी. इस बेटी को भी गले लगाया होता कभी. अपने दोनों बच्चों की तरह कभी इस की भी पढ़ाई, होमवर्क और ऐग्जाम्स की फिक्र की होती. कभी डांटा होता, तो कभी पुचकारा होता इसे भी. कभी झिड़का होता तो कभी समझाया होता इसे भी. मगर उन्होंने तो कभी इसे नजर भर देखा तक नहीं और यह है कि…

और फिर किसी की भी नहीं सुनी मैं ने. पापा ने भले न बनाया हो, मैं ने अपनी एक किडनी दे कर उन्हें अपने शरीर का एक हिस्सा बना ही लिया. दोनों को हौस्पिटल से एक ही दिन डिस्चार्ज किया गया. मैं गाड़ी में कनखियों से बराबर देख रही थी कि पापा बराबर मुझे ही देख रहे थे. उन की आंखों में आंसू थे. कुछ कहना चाह रहे थे, मगर कह नहीं पा रहे थे. ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे उन के दिल के अनकहे शब्द मेरे दिल को स्नेह की तपिश से सहला रहे हों, जिस से बरसों से किया मेरे प्रति उन का अन्याय शीशा बन कर पिघला जा रहा हो.

घर आने के भी कई दिनों बाद एक दिन अचानक वे मेरे कमरे में आए. मुझे तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. आज तक वो मेरे इतने करीब, वे भी अकेले में आए भी तो नहीं थे और आज वे मेरे करीब, बिलकुल मेरे करीब. मेरे बैड पर बैठ गए थे. मैं ने उन की तरफ देखा. वे उदासी भरी, दर्दभरी, आंसुओं भरी आंखों से मुझे देख रहे थे. मैं भी देखती ही रही उन्हें… अपने पापा को. मुझे तो अब तक कि जिंदगी का एक दिन भी या यह कहूं कि एक लमहा भी याद नहीं, जब उन्होंने मुझे देखा भी हो. आंखों ही आंखों में उन्होंने बहुत कुछ कह दिया और बहुत कुछ मैं ने सुन लिया. मुझे लगा कि अगर एक शब्द भी उन्होंने जबानी बोला तो अपने आंसुओं के वेग को न मैं थाम सकूंगी और शायद न वे. भरभरा कर बस गिर ही पड़ूंगी अपने पापा की गोद में, जिस के लिए मैं अतृप्त सी न जाने कब से तरस रही थी. फड़फड़ाए ही थे उन के होंठ कुछ कहने को कि तड़प कर उन के हाथ पर अपना हाथ रख दिया मैं ने. बोली ‘‘न पापा न, कुछ मत कहना. मैं ने कोई बड़ा काम नहीं किया है. बस अपने पापा के लिए अपना छोटा सा फर्ज निभाया है.’’

अंतत: रोक ही नहीं सकी खुद को, रो ही पड़ी फूटफूट कर. पापा भी रो पड़े जोर से. उन्होंने मुझे अपने से लिपटा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… माफ कर दे अपने इस गंदे से पापा को… बेटी है मेरी तू तो, दुनिया की सब से अच्छी बेटी है तू तो.’’

जिन लफ्जों और जिस स्नेह से मैं अब तक अपने ख्वाबों में ही रूबरू होती रही थी, आज हकीकत बन कर मेरे सामने आया था. इन पलों ने सब कुछ दे दिया था मुझे. बरसों के गिलेशिकवे आंसुओं के प्रवाह में बह गए थे. तभी पापा को देख कर मम्मी भी वहीं आ गईं तो उन्होंने मम्मी को भी अपने गले से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों के साथ मैं ने बहुत अन्याय किया है, अतीत की यादों में इतना उलझा रहा कि वर्तमान के इतने खूबसूरत साथ और रिश्ते को नकारता रहा. मुझे माफ कर दो तुम दोनों… मुझे माफ कर दो…’’

बरसों बाद ही सही, यह परिवार आज मेरा भी हो गया था. मम्मी की भी आंखें खुशी से भीग गई थीं.

उस के बाद तो जैसे मेरी जिंदगी ही बदल गई. पापा ने मुझे और अमन दोनों को एकसाथ एम.बी.ए. में ऐडमिशन दिला दिया था. वे चाहते थे कि अब हम दोनों भाईबहन नई सोच और नई तकनीक से उन की कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दें. अमन का तो मुझे पता नहीं, लेकिन मैं अपने पापा के लिए कुछ भी करूंगी…

प्यार के राही-भाग 3 : हवस भरे रिश्ते

वे यह भी जानते थे कि मासूम से मैं प्यार करती हूं, इसलिए उन्होंने एक दिन मौका पा कर मासूम से कहा, ‘‘बेटे, अब तू इस घर में ज्यादा दिनों तक बचा नहीं रह सकता. मैं अधेड़ हूं, अकसर बीमार रहता हूं. न जाने कब मेरे प्राण निकल जाएं. मेरे मरने के बाद तुम बिना माली के गुलशन की तरह हो जाओगे, इसलिए अभी ही तुम किसी मनपसंद लड़की से शादी कर लो. वैसे, गजाला बहुत अच्छी लड़की है. मैं ने उसे बचपन से अपनी गोद में खिलाया है. उस के साथ तुम हमेशा खुश रहोगे.’’

‘‘लेकिन मैं गजाला से मिलूंगा कैसे? अम्मी ने तो मुझ पर इतना सख्त पहरा लगा दिया है कि मैं घर से भी बाहर नहीं निकल पाता,’’ मासूम ने अपना दर्द कहा.

‘‘तुम उस की चिंता मत करो. मैं आज रात तुम दोनों को मिलवा दूंगा, तब तुम दोनों आपस में तय कर लेना.’’

उस रात मौका पा कर चाचा ने मासूम राही से मेरी मुलाकात कराई. मैं ने रोतेरोते मासूम से कहा, ‘‘अब मैं एक पल भी तुम से जुदा नहीं रह सकती. वह घर मेरे लिए कैदखाने के समान हो गया है. मेरी हालत पिंजरे में कैद उस

पंछी की तरह हो गई है, जो किसी

दरिंदे से बचने के लिए सिर्फ पंख फड़फड़ा सकता है, लेकिन उड़ नहीं सकता. अब यही उपाय है कि हम दोनों निकाह कर लें.’’

‘‘तुम फिक्र मत करो, मैं ने तुम से प्यार किया है. मैं तुम्हारा दर्द मिटाने के लिए अपनी जान भी गंवा सकता हूं. मैं भी यह चाहता हूं कि हम दोनों जल्द ही शादी कर लें,’’ मासूम ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

अगले दिन मसजिद में मासूम राही के साथ मैं ने निकाह कर लिया. हम दोनों ने बीवीशौहर के रूप में एकदूसरे को सौंप दिया. उस समय मासूम राही की उम्र 21 साल और मेरी उम्र 20 साल थी. वह रात हम दोनों ने एक फुलवारी में बिताई.

मैं जानती थी कि मेरे घर वाले किसी भी कीमत पर मासूम को अपना दामाद नहीं मानेंगे और चाची डौली जरूर कोई न कोई बवाल खड़ा करेंगी. ऐसी हालत में शादी के बाद इस महल्ले में हम दोनों का रहना खतरे से खाली नहीं था, इसलिए भोर होने से पहले ही हम दोनों महल्ले की सरहद से पार हो गए. हम दोनों पैदल ही शहर की ओर बढ़ने लगे.

सुबह होने पर जब चाची ने मासूम को घर से गायब पाया, तो वे बेहद घबरा गईं. उन के गुस्से का पारा चढ़ने लगा. उन्होंने चाचा को अपने भाइयों से पिटवाने की धमकी दी और कहा कि तुम ने ही मासूम को भगा दिया है.

चाचा ने जबान नहीं खोली. चाची ने अपने गुंडों से महल्ले का चप्पाचप्पा छनवा मारा, लेकिन हम दोनों का कहीं कुछ पता नहीं लग सका.

चाची को शक था कि गजाला मासूम के अलावा किसी और के साथ नहीं जा सकती. उन्हें जब पता लगा कि गजाला भी घर से गायब है, तो उन का शक यकीन में बदल गया. वे गुस्से में हमारे घर आईं और पूछा, ‘‘गजाला कहां है?’’

अब्बाजान भी इस बारे में नहीं जानते थे, इसलिए अपनी इज्जत बचाने के लिए चुप्पी ही साधे रखी.

तब चाची ने उलटा इलजाम लगाया. अब्बाजान ने जानबूझ कर गजाला और मासूम को कहीं भगा दिया है, यह सोच कर चाची ने धमकी देते हुए कहा, ‘‘तुम सबकुछ जानते हुए भी कुछ नहीं बता रहे हो. मैं तुम्हें 12 घंटे का समय दे रही हूं. तब तक मासूम को मेरे हवाले कर दो, वरना मैं तुम लोगों पर मासूम को अगवा करने के इलजाम में थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दूंगी. इस का अंजाम क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह जानते हो.’’

अब्बाजान तो सचमुच में ये सब नहीं जानते थे. वे लड़खड़ाई जबान में बोले, ‘‘एक हफ्ते से गजाला मामू के यहां गई हुई है.’’

तब चाची गुस्से से आगबबूला हो कर बोलीं, ‘‘तुम झूठ मत बोलो. हमें

12 घंटे का इंतजार है. उस के बाद भी अगर तुम ने मासूम का पता नहीं बताया, तो ठीक नहीं होगा.’’

आखिर चाची ने अब्बाजान और हमारे खिलाफ अगवा के इलजाम में रिपोर्ट दर्ज करवा ही दी. पुलिस ने तुरंत अब्बाजान के खिलाफ वारंट जारी कर गिरफ्तार कर लिया.

जब पुलिस ने उन से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया, ‘‘इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता. न ही हम ने मासूम को अगवा किया. शादी की भी कोई बात नहीं है. मैं तो खुद नहीं चाहता कि हमारी बेटी की शादी उस बिन जात से हो.

‘‘2 महीने पहले हमें खबर मिली कि गजाला और मासूम प्यार करते हैं, तो मैं ने और मेरी बेगम ने गजाला को बहुत कड़ी सजा दी, जिस के चलते गजाला को अस्पताल में रहना पड़ा. कल रात गजाला और मासूम कहां चले गए, यह मुझे पता नहीं.’’

पुलिस इंस्पैक्टर ने एक बाप की बेबसी समझी और बात को सच्चा समझ कर अब्बा को छोड़ दिया. उस के बाद पुलिस तुरंत हरकत में आई और आसपास के इलाके में पूरी सरगर्मी के साथ हम दोनों को तलाश करने लगी. चाची भी पुलिस के साथ थीं.

हम दोनों पैदल ही अपना सफर तय कर रहे थे. इसलिए हम लोग पुलिस की पकड़ से बच नहीं सके. पुलिस ने हमें उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब हम दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हो रहे थे.

पुलिस हमें गिरफ्तार कर थाना में ले आई. चाची ने पुलिस को घूस के रूप में भरपूर रुपए दे कर खुश कर दिया. इसलिए पुलिस ने मासूम को चाची के हवाले कर दिया और मुझे कैद रखा.

मासूम से बिछुड़ कर मैं रोतेरोते पागल सी हो गई थी. थोड़ी देर बाद अब्बा को यह मालूम हुआ, तो वे तुरंत भागेभागे थाना में आए और मुझे जमानत पर छुड़ा कर ले गए.

मेरे आने पर अम्मी और अब्बा मुझ पर जुल्मों का कहर ढाने लगे, जैसे मैं उन की औलाद नहीं, बल्कि कोई भेड़बकरी होऊं. अब्बा ने तो मुझे ऐसा थप्पड़ मारा कि मेरे मुंह से खून निकलने लगा.

मेरी देखभाल छोटी बहन अफसाना करने लगी. उधर चाची ने मासूम को मकान के एक कमरे में कैद कर लिया और शादी करने के लिए रातदिन उस पर दबाव डालने लगीं.

चाचा जशीम राही को चाची की इस हरकत का पता लगा,

तो उन को बहुत गहरा सदमा

पहुंचा, जिस से उन की हालत और बिगड़ गई.

चाची 42 साल की थीं ही. वे चाचा से छुटकारा पाना चाहती थीं, क्योंकि वही उन के रास्ते का कांटा थे, इसलिए उन की बेबसी की हालत में भी उन की दवादारू नहीं कराई और उन पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिस के चलते वे कुछ दिनों के बाद चल बसे. तब मासूम पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा.

प्यार का सफल प्रायश्चित्त – भाग 2

‘नमस्ते,’ इस बार उस ने अंकल नहीं कहा. या कहा हो, मैं ने सुना नहीं. यदि मैं न सुनना चाहूं तो कौन सुना सकता है. लेकिन उस ने कहा नहीं शायद.

‘नमस्ते,’ मैं ने कहा, मेरे दिल की धड़कनें तेज होने लगीं.’’

‘‘कहां?’’ मैं ने पूछा यह जानते हुए भी कि वह कालेज जा रही है.

‘‘कालेज,’’ उस ने धीरे से मुसकराते हुए कहा.

‘‘और आप?’’

मैं हड़बड़ा गया. कोई उत्तर देते नहीं बना. क्या कहूं कि तुम से मिलने, तुम से बात करने के लिए तुम्हारे पीछे आता हूं. लेकिन कह न सका.

‘‘बस, यों ही टहलने.’’

‘‘रोज, इसी समय.’’

उस की इस बात पर मु झे लगा कि वह निश्चिततौर पर सम झ चुकी है मेरे टहलने का मकसद. मैं धीरे से मुसकराया. ‘‘हां, तुम्हें क्या लगा?’’ उफ यह क्या बेवकूफाना प्रश्न कर दिया मैं ने.

‘‘नहीं, मु झे लगा.’’ और वह चुप हो गई.

‘‘तुम्हें क्या लगा?’’ मैं ने बात को पटरी पर लाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘कुछ नहीं’’ कह कर वह चुप रही.

‘‘कौन सी क्लास में पढ़ती हो?’’ बात आगे बढ़ाने के लिए कुछ तो पूछना ही था.

‘‘एमए प्रीवियस.’’

‘‘किस विषय से?’’

‘‘समाजशास्त्र से.’’

‘‘बढि़या सब्जैक्ट है.’’

दोनों तरफ थोड़ी देर के लिए फिर शांति छा गई. मैं सोच रहा था, क्या बात करूं. कालेज निकट आ रहा है. यही समय है अपनी बात कहने का. पहली बार इतना अच्छा मौका मिला है.

‘‘पढ़ाई मैं कोई दिक्कत हो तो बताना,’’ मैं ने कहा.

‘‘नहीं, सरल विषय है. दिक्कत नहीं होती.’’

‘‘यदि हो तो?’’

‘‘जी, जरूर बताऊंगी.’’

‘‘मैं ने इसलिए कहा, क्योंकि इसी विषय में मैं ने भी पीएचडी की हुई है.’’

‘‘मैं जानती हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘आप प्रोफैसर हैं समाजशास्त्र के?’’

‘‘जी’’ मैं ने गर्व से कहा.

‘‘मैं पूछूंगी आप से यदि कोई दिक्कत आई तो.’’

‘‘क्या ऐसे बात नहीं कर सकती. बिना दिक्कत के?’’

‘‘क्यों नहीं, आखिर हम पड़ोसी हैं,’’ उस ने कहा.

मु झे अच्छा लगा. मैं ने पूछा, ‘‘आप मोबाइल रखती हैं?’’

‘‘जी.’’

‘‘कभी देखा नहीं आप को मोबाइल के साथ?’’

‘‘मैं जरूरत के समय ही मोबाइल चलाती हूं.’’

‘‘सोशल मीडिया, मेरा मतलब फेसबुक आदि पर नहीं हैं आप?’’

‘‘नही, ये सब समय की बरबादी है. घर के लोगों को भी पंसद नहीं.’’

‘‘आप का नंबर मिल सकता है,’’ मैं ने हिम्मत कर के पूछ लिया.

‘‘क्यों नहीं,’’ कहते हुए उस ने अपना नंबर दिया जिसे मैं ने अपने मोबाइल पर सेव कर लिया.

‘‘मु झे तो आप का नाम भी नहीं पता?’’ मैं ने पूछा. मैं पूरी तरह सामने आ चुका था खुल कर. बड़ी मुश्किल से मौका मिला था. मैं इस मौके को बेकार नहीं जाने देना चाहता था.

‘‘रवीना,’’ उस ने हलके से मुसकराते हुए कहा. उस का कालेज आ चुका था. उस ने आगे कहा, ‘‘चलती हूं.’’ और वह कालेज में दाखिल हो गई, मैं सीधा निकल गया.

आगे जाने का कोई मकसद नहीं था. मकसद पूरा हो चुका था. मैं वापस घर की ओर चल दिया. मु झे तैयार हो कर कालेज भी जाना था. लेकिन कालेज के लंच में जब रवीना का कालेज छूटता था, मैं फिर तेजी से उस के कालेज की ओर बढ़ चला. मेरा और उस का कालेज एक किलोमीटर के अंतर पर था. फर्क इतना था या बहुत था कि वह अपने कालेज में छात्रा थी और मैं अपने कालेज में प्रोफैसर.

सुबह के समय सड़क खाली होती है, लेकिन लंच के समय यानी दोपहर 2 बजे भीड़भाड़ होती है. वह कालेज से निकल चुकी थी. मैं ने अपने कदम तेजी से उस की तरफ बढ़ाए. मैं उस तक पहुंचता, तभी वह किसी लड़के की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ कर पलभर में नजरों से ओ झल हो गई. मेरा खून खौल उठा. मैं क्या सम झता था उसे, क्या निकली वह? पढ़ाई करने जाती है या ऐयाशी करने. बेवफा कहीं की. और मैं क्या हूं, शादीशुदा होते हुए भी आशिकी कर रहा हूं. बेवफा तो मैं हूं अपनी बीवी का.

लेकिन नहीं, मु झे सारे दोष उस में ही नजर आ रहे थे. उसे यह सब शोभा नहीं देता. लड़कियों को अपनी इज्जत, अपने सम्मान के साथ रहना चाहिए. मांबाप की दी हुई आजादी का गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए. मैं उसे कोस रहा था. फिर मैं ने स्वयं को सम झाते हुए कहा, होगा कोई रिश्तेदार, परिचित. कल पूछ लूंगा. लेकिन मेरा इस तरह पूछना क्या ठीक रहेगा? उसे बुरा भी लग सकता है. जो भी हो, पूछ कर रहूंगा मैं. तभी चैन मिलेगा मु झे. दूसरे दिन नियत समय पर वह घर से कालेज के लिए निकली और मैं भी. उस ने फिर अपनी चाल धीमी कर दी. मैं उस की बगल में पहुंच गया.

‘‘कल लौटते वक्त नहीं दिखीं आप?’’ मैं ने बात को दूसरी तरफ से पूछा.

‘‘हां, कल भैया के दोस्त मिल गए थे. वे घर ही जा रहे थे. उन्होंने बिठा लिया,’’ अब जा कर मेरे कलेजे को ठंडक मिली. फिर भी मैं ने पूछा, ‘‘भैया के दोस्त या’’ वह मेरी बात का आशय सम झ गई.

‘‘क्या, आप भी अंकल…’’

‘‘मेरे सीने पर जैसे किसी ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया हो. ‘अंकल’ शब्द दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगा.’’

‘‘क्या मैं बूढ़ा नजर आता हूं?’’ मैं ने कहा.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर अंकल क्यों कहती हो?’’

‘‘तो क्या कहूं, भाईसाहब?’’

‘‘फिर तो अंकल ही ठीक है,’’ हम दोनों हंस पड़े. यदि कहने के लिए संबोधन के लिए ही कुछ कहना है तो अंकल ही ठीक है. बड़े शहरों की तरह यहां सर, या सरनेम के आगे जी लगा कर बुलाने का चलन तो है नहीं.

‘‘मैं तुम्हें फोन कर सकता हूं?’’

‘‘हां, क्यों नहीं? आप घर भी आ सकते हैं. मु झे भी बुला सकते हैं. मैं तो अकसर आती रहती हूं,’’ उस ने सहजभाव से कहा. लेकिन मु झे उस में अपना अधिकार दिखाई पड़ा. मेरे हौसले बढ़ चुके थे.

‘‘एक बात कहूं?’’

‘‘कहिए.’’

‘‘तुम बहुत सुंदर हो.’’

‘‘सच?’’

‘‘हां.’’

‘‘आज तक किसी ने कहा नहीं मु झ से. मु झे भी लगा कि मैं सुंदर तो नहीं, हां, बुरी भी नहीं. ठीकठाक हूं.’’

‘‘लेकिन मैं कहता हूं कि तुम बहुत सुंदर हो.’’

‘‘आप को लगती हूं?’’

उस ने प्रश्न किया या मेरे मन की गहराई में चल रहे रहस्य को पकड़ा. जो भी हो. उस ने कहा इस तरह जैसे वह अच्छी तरह जान चुकी थी कि मैं उसे पसंद करता हूं. तभी तो उस ने कहा, आप को लगती हूं.

‘‘लगती नहीं, तुम हो.’’

मैं ने कहा. वह चुप रही. लेकिन हौले से मुसकराती रही. उस के गालों पर लालिमा थी.

मैं ने मौका देख कर अपने मन की बात स्पष्ट रूप से कहनी चाही.

‘‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगी?’’

‘‘नहीं, आप कहिए.’’

‘‘मैं…मैं…मैं… आप से…’’

‘‘पहले तो आप मु झे आप कहना बंद करिए. आप प्रोफैसर हैं, मैं स्टूडैंट हूं,’’ उस ने यह कहा, तो मु झे लगा जैसे कह रही हो कि आप में और मु झ में बहुत अंतर है. ‘‘मैं आप का सम्मान करती हूं और आप…’’

मैं चुप रहा. उस ने कहा, ‘‘कहिए, आप कुछ कहने वाले थे.’’

‘‘मैं कहना तो बहुतकुछ चाहता हूं लेकिन हिम्मत नहीं कर पा रहा हूं.’’

‘‘मैं जानती हूं. आप क्या कहना चाहते हैं. लेकिन कहना तो पड़ेगा आप को,’’ उस

ने मेरी तरफ तिरछी नजर से मुसकराते

हुए कहा.

‘‘पहले तुम वादा करो कि यह बात हमारेतुम्हारे बीच में रहेगी. बात पसंद आए या न आए,’’ मैं हर तरफ से निश्ंिचत होना चाहता था. सुरक्षित भी कह सकते हैं. पहले तो लगा कि कहूं यदि तुम जानती हो तो कहने की क्या आवश्यकता है. लेकिन जाननेभर से क्या होता है?

‘‘मैं वादा करती हूं.’’

‘‘हम कहीं मिल सकते हैं. रास्ते चलते कहना ठीक न होगा.’’

‘‘लेकिन कहां?’’

‘‘थोड़ी दूर पर एक कौफी शौप है.’’

‘‘वहां किसी ने देख लिया तो क्या उत्तर देंगे. छोटा सा शहर है.’’

‘‘तुम मेरे कालेज आ सकती हो. कालेज के पार्क में बात करते हैं. वहां कोई कुछ नहीं कहेगा. यही सम झेंगे कि पढ़ाई के विषय में कोई बात हो रही होगी.’’

‘‘कब आना होगा?’’

‘‘12 बजे.’’

‘‘कालेज बंक करना पड़ेगा.’’

‘‘प्लीज, एक बार, मेरे लिए,’’ शायद उस ने मेरी दयनीय हालत देख कर हां कर दिया था. दोपहर के 12 बजे. कालेज का शानदार पार्क. दिसंबर की गुनगुनी धूप. कालेज के छात्रछात्राएं अपने सखासहेलियों के साथ कैंटीन में, पार्क में बैठे हुए थे. कुछ पढ़ाई पर, कुछ सिनेमा, क्रिकेट पर बातें कर रहे थे. मैं बेचैनी से उस का इंतजार कर रहा था. वह आई. मैं उस की तरफ बढ़ा. मेरी धड़कनें भी बढ़ीं.

‘‘आइए,’’ मैं ने कहा. और हम पार्क की तरफ चल दिए.

‘‘कहिए, क्या कहना है?’’

‘‘देखो, तुम ने वादा किया है. बात हम दोनों के मध्य रहेगी.’’

‘‘मैं वादे की पक्की हूं.’’

‘‘मेरी बात पर बहुत से लेकिन, किंतुपरंतु हो सकते हैं जो स्वाभाविक हैं. लेकिन, मन के हाथों मजबूर हूं. बात यह है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. करने लगा हूं. पता नहीं कैसे?’’

मैं ने कह दिया. हलका हो गया मन. फिर उस की तरफ देखने लगा. न जाने क्या उत्तर मिले. मैं डरा हुआ था.

‘‘मैं तो आप से बहुत पहले से प्यार करती थी जब आप मेरे पड़ोस में रहने आए थे. लेकिन आप ने कभी मेरी ओर ध्यान ही नहीं दिया. जिस दिन आप की शादी हुई थी, बहुत रोई थी मैं. फिर मन को सम झा लिया था किसी तरह. मैं आप से आज भी प्यार करती हूं लेकिन…’’

‘‘मैं जानता हूं कि मैं विवाहित हूं, 2 बच्चे हैं मेरे. लेकिन तुम साथ दो तो…’’

‘‘मैं आप के साथ हूं. आप के प्यार में. कोई लड़की जब किसी से सच्चा प्यार करती है तो किसी भी हद तक जा सकती है. मैं किसी बंधन में नहीं हूं. आप सोच लीजिए.’’

‘‘थैंक यू, मु झे कुछ नहीं सोचना. जो होगा, देखा जाएगा,’’ मैं ने कह तो दिया लेकिन कहते समय पत्नी और बच्चों का चेहरा सामने घूम गया. इस के बाद हमारी अकसर मुलाकातें होने लगीं. मोबाइल पर तो बातें होती ही रहतीं. सावधानी हम दोनों ही बरत रहे थे. कभी वह कुछ पूछने के बहाने, पढ़ाई के बहाने, घर भी आ जाती. हम सिनेमा, पार्क, रैस्तरां जहांजहां भी मिल सकते थे. मिलते रहे. वह कालेज से गायब रहती और मैं भी. एक दिन मैं ने उस से मोबाइल पर कहा, ‘‘बेकरारी बढ़ती जा रही है तुम्हें पाने की. तुम्हें छूने की. प्लीज कुछ करो.’’

‘‘मेरा भी यही हाल है, मैं कोशिश करती हूं.’’

फिर एक दिन ऐसा हुआ हमारी खुशनसीबी से कि उस

के परिवार के लोगों को एक शादी में जाना था 2 दिनों के लिए और उसी समय मेरी पत्नी को उस के मायके से बुलावा आ

गया. दिसंबर के अंतिम सप्ताह में वैसे भी स्कूल, कालेज बंद

रहते हैं. वह अपने घर में अकेली थी. मैं अपने घर में. बीच में एक दीवार थी. रात को मैं उस के घर या वह मेरे घर आए तो शायद ही कोई देखे. फिर भी सावधानी से हम ने तय किया कि मैं उस की छत पर पहुंच कर छत की सीढि़यों से नीचे जाऊंगा. दोनों छतें सटी हुई थीं.

 

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 2

मम्मी स्वभाव से ही गरम एवं तीखी थीं. दोनों की बातें होतीं तो मम्मी का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज हो जाता और पापा का धीमा होतेहोते शांत हो जाता. फिर दोनों अलगअलग कमरों में चले जाते. सुबह तैयार हो कर मैं पापा के साथ बस स्टाप तक जाना चाहती थी पर मम्मी मुझे घसीटते हुए ले जातीं. मैं पापा को याचना भरी नजरों से देखती तो वह धीमे से हाथ हिला पाते, जबरन ओढ़ी हुई मुसकान के साथ.

मैं जब भी स्कूल से आती मम्मी अपनी सहेलियों के साथ ताश और किटी पार्टी में व्यस्त होतीं और कभी व्यस्त न होतीं तो टेलीफोन पर बात करने में लगी रहतीं. एक बार मैं होमवर्क करते हुए कुछ पूछने के लिए मम्मी के कमरे में चली गई थी तो मुझे देखते ही वह बरस पड़ीं और दरवाजे पर दस्तक दे कर आने की हिदायत दे डाली. अपने ही घर में मैं पराई हो कर रह गई थी.

एक दिन स्कूल से आई तो देखा मम्मी किसी अंकल से ड्राइंगरूम में बैठी हंसहंस कर बातें कर रही थीं. मेरे आते ही वे दोनों खामोश हो गए. मुझे बहुत अटपटा सा लगा. मैं अपने कमरे में जाने लगी तो मम्मी ने जोर से कहा, ‘निकी, कहां जा रही हो. हैलो कहो अंकल को. चाचाजी हैं तुम्हारे.’

मैं ने धीरे से हैलो कहा और अपने कमरे में चली गई. मैं ने उन को इस से पहले कभी नहीं देखा था. थोड़ी देर में मम्मी ने मुझे बुलाया.

‘निकी, जल्दी से फे्रश हो कर आओ. अंकल खाने पर इंतजार कर रहे हैं.’

मैं टेबल पर आ गई. मुझे देखते ही मम्मी बोलीं, ‘निकी, कपड़े कौन बदलेगा?’

‘ममा, आया किचन से नहीं आई फिर मुझे पता नहीं कौन से…’

‘तुम कपड़े खुद नहीं बदल सकतीं क्या. अब तुम बड़ी हो गई हो. अपना काम खुद करना सीखो,’ मेरी समझ में नहीं आया कि एक दिन में मैं बड़ी कैसे हो गई हूं.

‘चलो, अब खाना खा लो.’

मम्मी अंकल की प्लेट में जबरदस्ती खाना डाल कर खाने का आग्रह करतीं और मुसकरा कर बातें भी कर रही थीं. मैं उन दोनों को भेद भरी नजरों से देखती रही तो मम्मी ने मेरी तरफ कठोर निगाहों से देखा. मैं समझ चुकी थी कि मुझे अपना खाना खुद ही परोसना पड़ेगा. मैं ने अपनी प्लेट में खाना डाला और अपने कमरे में जाने लगी. हमारे घर पर जब भी कोई आता था मुझे अपने कमरे में भेज दिया जाता था. मैं टीवी देखतेदेखते खाना खाती रहती थी.

‘वहां नहीं बेटा, अंकल वहां आराम करेंगे.’

‘मम्मी, प्लीज. बस एक कार्टून…’ मैं ने याचना भरी नजर से उन्हें देखा.

‘कहा न, नहीं,’ मम्मी ने डांटते हुए कहा, जो मुझे अच्छा नहीं लगा.

खाने के बाद अंकल उस कमरे में चले गए तथा मैं और मम्मी दूसरे कमरे में. जब मैं सो कर उठी, मम्मी अंकल के पास चाय ले जा रही थीं. अंकल का इस तरह पापा के कमरे में सोना मुझे अच्छा नहीं लगा. जाने से पहले अंकल ने मुझे ढेर सारी मेरी मनपसंद चाकलेट दीं. मेरी पसंद की चाकलेट का अंकल को कैसे पता चला, यह एक भेद था.

वक्त बीतता गया. अंकल का हमारे घर आनाजाना अनवरत जारी रहा. जिस दिन भी अंकल हमारे घर आते मम्मी उन के ज्यादा करीब हो जातीं और मुझ से दूर. मैं अब तक इस बात को जान चुकी थी कि मम्मी और अंकल को मेरा उन के आसपास रहना अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन पापा आफिस से जल्दी आ गए. मैं टीवी पर कार्टून देख रही थी. पापा को आफिस के काम से टूर पर जाना था. वह दवा बनाने वाली कंपनी में सेल्स मैनेजर थे. आते ही उन्होंने पूछा, ‘मम्मी कहां हैं.’

‘बाहर गई हैं, अंकल के साथ… थोड़ी देर में आ जाएंगी.’

‘कौन अंकल, तुम्हारे मामाजी?’ उत्सुकतावश उन्होंने पूछा.

‘मामाजी नहीं, चाचाजी…’

‘चाचाजी? राहुल आया है क्या?’ पापा ने बाथरूम में फे्रश होते हुए पूछा.

‘नहीं. राहुल चाचाजी नहीं कोई और अंकल हैं…मैं नाम नहीं जानती पर कभी- कभी आते रहते हैं,’ मैं ने भोलेपन से कहा.

‘अच्छा,’ कह कर पापा चुप हो गए और अपने कमरे में जा कर तैयारी करने लगे. मैं पापा के पास पानी ले कर आ गई. जिस दिन पापा मेरे सामने जाते मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं उन के आसपास घूमती रहती थी.

‘पापा, कहां जा रहे हो,’ मैं उदास हो गई, ‘कब तक आओगे?’

‘कोलकाता जा रहा हूं मेरी गुडि़या. लगभग 10 दिन तो लग ही जाएंगे.’

‘मेरे लिए क्या लाओगे?’ मैं ने पापा के गले में पीछे से बांहें डालते हुए पूछा.

‘क्या चाहिए मेरी निकी को?’ पापा ने पैकिंग छोड़ कर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा. मैं क्या कहती. फिर उदास हो कर कहा, ‘आप जल्दी आ जाना पापा… रोज फोन करना.’

‘हां, बेटा. मैं रोज फोन करूंगा, तुम उदास नहीं होना,’ कहतेकहते मुझे गोदी में उठा कर वह ड्राइंगरूम में आ गए.

तब तक मम्मी भी आ चुकी थीं. आते ही उन्होंने पूछा, ‘कब आए?’

‘तुम कहां गई थीं?’ पापा ने सीधे सवाल पूछा.

‘क्यों, तुम से पूछे बिना कहीं नहीं जा सकती क्या?’ मम्मी ने तल्ख लहजे में कहा.

‘तुम्हारे साथ और कौन था? निकिता बता रही थी कि कोई चाचाजी आए हैं?’

‘हां, मनोज आया था,’ फिर मेरी तरफ देखती हुई बोलीं, ‘तुम जाओ यहां से,’ कह कर मेरी बांह पकड़ कर कमरे से निकाल दिया जैसे चाचाजी के बारे में बता कर मैं ने उन का कोई भेद खोल दिया हो.

‘कौन मनोज, मैं तो इस को नहीं जानता.’

‘तुम जानोगे भी तो कैसे. घर पर रहो तो तुम्हें पता चले.’

‘कमाल है,’ पापा तुनक कर बोले, ‘मैं ही अपने भाई को नहीं पहचानूंगा…यह मनोज पहले भी यहां आता था क्या? तुम ने तो कभी बताया नहीं.’

‘तुम मेरे सभी दोस्तों और घर वालों को जानते हो क्या?’

‘तुम्हारे घर वाले गुडि़या के चाचाजी कैसे हो गए. शायद चाचाजी कहने से तुम्हारे संबंधों पर आंच नहीं आएगी. निकिता अब बड़ी हो रही है, लोग पूछेंगे तो बात दबी रहेगी…क्यों?’

और तब तक उन के बेडरूम का दरवाजा बंद हो गया. उस दिन अंदर क्याक्या बातें होती रहीं, यह तो पता नहीं पर पापा कोलकाता नहीं गए.

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