क्या जिताएंगे मोदी योगी को बनारस में लगाए पत्थर

उत्तर प्रदेश का बनारस शहर साल 2014 के लोकसभा चुनाव में चर्चा में था. तब अपने भाषणों में बनारस लोकसभा सीट से चुनाव लड़े नरेंद्र मोदी ने खुद को कभी गंगा का बेटा बताया तो कभी कहा कि वे बनारस आए नहीं हैं, उन को मां गंगा ने बुलाया है. कभी कहा कि गंगा की सफाई होगी, गंगा में पानी के जहाज चलेंगे वगैरह.

प्रधानमंत्री बनने के बाद 5 साल का समय गुजर रहा है. बनारस और उस के आसपास के शहरों में बदलाव की जो उम्मीद की जा रही थी, वह जरा भी पूरी नहीं हुई है. भाजपा सरकार इस बात को समझ रही है. इस वजह से ‘मोदीयोगी’ दोनों ही बनारस में पत्थरों को टांकने की झड़ी लगा रहे हैं.

2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में बनारस और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके की अहमियत ज्यादा है. उत्तर प्रदेश का यह इलाका बिहार तक असर डालता है. उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों ही प्रदेश 2019 के लोकसभा चुनाव को ले कर अहम हैं.

अगर भाजपा यहां अपना प्रदर्शन दोहरा नहीं पाई तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य उत्तर प्रदेश के इलाकों की हार को पूरा नहीं कर पाएगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ‘कैराना’ लोकसभा सीट पर कोई धार्मिक धुव्रीकरण भाजपा के काम नहीं आया था. ऐसे में बनारस के ये पत्थर भी ‘मोदीयोगी’ को लोकसभा चुनाव में जीत नहीं दिला पाएंगे.

उत्तर प्रदेश में हालात लगातार खराब होते गए हैं. कानून व्यवस्था के साथसाथ हर शहरकसबे में भगवा गमछाधारी ऐंटी रोमियो और गौरक्षा करने वालों की एक भीड़ सी उमड़ पड़ी है. बनारस जैसे शहरों में सैलानी कम हुए हैं. अकेले लड़कालड़की साथ चलने में डरने लगे हैं. जानवरों का कारोबार करने वालों ने गौरक्षकों के डर से कारोबार बंद कर दिया है. पत्थर पूजन इस की अहम वजह है.

‘मोदीयोगी’ द्वारा बनारस में लगाए जाने वाले पत्थर क्या उन्हें चुनाव जिता पाएंगे? इस बारे में किए गए सवाल पर कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं, ‘‘2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी और खुद अपना चुनावी प्रचार करते हुए नरेंद्र मोदी ने जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं हुए. ऐसे में तरक्की के नए पत्थर जड़ने के जरीए एक बार फिर से जनता को वादों के मायाजाल में उलझाने की कोशिश की जा रही है.

‘‘भाजपा को यह समझ नहीं आ रहा है कि पिछले 5 सालों में गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है. जिन वादों पर जनता ने पहले भरोसा कर लिया था, अब उन का हिसाब देने का वक्त आ गया है. पत्थर पूजन के जरीए जनता को भरमाने की कोशिश की जा रही है.’’

पत्थर लगाने का दिखावा

बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30,000 करोड़ रुपए के विकास कामों के मौडल को जनता के बीच रखा. 4 साल में नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में यह 13वां दौरा था. जुलाई महीने की अपनी बनारस यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 33 परियोजनाओं के पत्थर लगाए. बनारस के साथ ही साथ लखनऊ से गाजीपुर तक 341 किलोमीटर लंबे ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ का पत्थर आजमगढ़ में लगाया.

‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ पर सपा यानी समाजवादी पार्टी का अपना दावा है. सपा का कहना है कि यह योजना मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव की थी.

‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ को तरक्की की नई राह बताते हुए योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ‘‘हमारी सरकार पूर्वांचल और बुंदेलखंड में ऐक्सप्रैसवे और इंडस्ट्रियल कौरीडोर बना रही है, जिस से रोजगार, पर्यटन और औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा. ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ अयोध्या, बनारस और गोरखपुर को जोड़ेगा. इस से तरक्की को नई रफ्तार मिलेगी.’’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और सपा नेता अखिलेश यादव ने ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ को अपनी सरकार की योजना बताते हुए कहा, ‘‘भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी की सरकार के कामों का ही शिलान्यास और उद्घाटन कर रही है. समाजवादी पार्टी की सरकार ने ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ के बलियाबिहार बौर्डर तक बढ़ाने की योजना बनाई थी, लेकिन भाजपा की सरकार ने इसे गाजीपुर तक ही सिमटा कर रख दिया है.

‘‘भाजपा सरकार ने इस योजना को शुरू करने में देर की जिस से इस की लागत बढ़ जाए. भाजपा समाजवादी पार्टी की सरकार की खड़ी फसल को काटने का काम कर रही है.’’

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डाक्टर महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा, ‘‘अखिलेश यादव ने ऐसी योजनाओं का फर्जी शिलान्यास कर दिया था. इस की डीपीआर तक नहीं बनी थी.’’

बनारस के बहाने…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी बनारस के दौरे पर आते हैं, केवल पत्थर पूजने का काम ही नहीं करते, बल्कि अपनी यात्रा को बड़े कैनवास में ले जाते हैं. वे अपने बनारस दौरे पर कई बार दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी बतौर मेहमान ला चुके हैं.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों बनारस में आए थे. दोनों को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस घुमाया.

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के साथ मोदी ने 382 एकड़ पर फ्रांस की कंपनी की मदद से बने सोलर पावर प्लांट का उद्घाटन किया था.

निशाने पर आजमगढ़

लखनऊ से गाजीपुर तक बनने वाले ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजमगढ़ जिले के मंदूरी गांव हवाईपट्टी में हुए एक कार्यक्रम में किया. यह हवाईपट्टी आजमगढ़ जिले से 14 किलोमीटर दूर थी. दिल्ली के बाटला हाउस ऐनकाउंटर में मारे गए लोगों का गांव संजरपुर आजमगढ़ में ही आता है. हवाईपट्टी से यह केवल 30 किलोमीटर दूर था.

वैसे तो पूर्वांचल में भाजपा का मजबूत जनाधार है,  इस के बावजूद भी आजमगढ़ उस की पकड़ से हमेशा ही दूर रहा है. नरेंद्र मोदी की सभा के बहाने भाजपा ने यहां पर अपना प्रचार किया. पूरे इलाके को सफेद केसरिया रंग से सराबोर कर दिया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस से हैलीकौप्टर द्वारा आजमगढ़ हवाईपट्टी तक आए. बरसात से बचने के लिए वाटरप्रूफ पंडाल का इंतजाम किया गया था. इस में तकरीबन 40,000 लोग बैठ सकते थे. मंच से दूर शिलान्यास की पट्टिका लगाई गई. रिमोट द्वारा मंच से इस का उद्घाटन किया गया था.

आजमगढ़ पूर्वांचल का प्रमुख जिला है. यहां से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. 2014 की मोदी लहर में भी भाजपा यहां पर चुनाव नहीं जीती थी.

भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ की सीट अपनी झोली में डालना जरूरी है. सपा ने कहा है कि मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे. ऐसे में भाजपा के लिए यहां जीत आसान हो जाएगी.

भाजपा ने केवल 2009 के लोकसभा चुनाव में यह सीट जीती थी. तब रमाकांत यादव सांसद बने थे. 1991 की राम लहर और 2014 की मोदी लहर में भी यहां भाजपा चुनाव नहीं जीती.

कबीरदास पर निशाना

मार्च से जुलाई के बीच पिछले 5 महीने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 बार बनारस और एक बार कबीरदास के निर्वाण स्थल मगहर की यात्रा कर चुके हैं.

विचारधारा के लैवल पर देखें तो कबीरदास और राम दोनों अलगअलग विचारधाराओं को आगे बढ़ाते हैं. राम धार्मिक रहे तो कबीरदास धर्म का आडंबर का विरोध करते थे.

अपना जीवन बनारस में बिताने वाले कबीरदास धार्मिक आडंबर का विरोध करने के लिए ही अपने अंतिम समय मगहर चले आए थे.

राम और कबीरदास को एकसाथ ले कर चलना भाजपा की मजबूरी बन गई है.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दलित तबका भाजपा के साथ था. उत्तर प्रदेश और केंद्र में बनी ‘मोदीयोगी’ की सरकार में दलित सम्मान की बातें तो हुईं, पर असल में उस के लिए कुछ हुआ नहीं. भगवा गैंगों ने दलितों को सहारनपुर से ले कर भीमाकोरेगांव तक परेशान किया. अब दलित तबका भाजपा से टूट गया है.

‘‘उत्तर प्रदेश के 4 उपचुनावों में भाजपा की हार में दलित तबके का भाजपा से छिटकना बड़ी वजह था. अब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का तालमेल होने के बाद भाजपा के सामने मजबूरियां बढ़ जाएंगी. ऐसे में दलितों को वापस पार्टी से जोड़ना जरूरी है.

‘‘इस के लिए भाजपा को कबीरदास की याद आई. भाजपा को साफ लग रहा है कि केवल राम और बनारस का नाम ले कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. दलितों को जोड़ने के लिए कबीरदास का महिमामंडन जरूरी है. कबीरदास को दलितों में गुरु सा भाव दिया जाता है. ऐसे में भाजपा भी कबीर को राम की तरह कब्र से निकाल कर राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है.’’

जिंदगी और मौत

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले में व्यक्ति के अस्तित्व, गरिमा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता, विवेक आदि के उन हिस्सों पर बात करनी पड़ी जो दर्शनशास्त्र का हिस्सा हैं. जो न तो सुन सकता है, न बोल सकता है, न चल सकता है, न लिख सकता है और न ही उस की स्मरणशक्ति काम कर रही है, सुप्रीम कोर्ट ऐसे व्यक्ति के जीवन के प्रश्न पर विचार कर रहा था. ऐसा व्यक्ति केवल डाक्टरों के कारण मशीनों के सहारे जिंदा रखा जा रहा था.

क्या कोई व्यक्ति किसी मृत व्यक्ति की देह के साथ अपमानित व्यवहार कर सकता है? यह अपराध है या नहीं? इस बारे में कानून स्पष्ट है कि मृत व्यक्ति की देह के साथ कू्रुर व्यवहार करना अपराध है. सदियों से आदिवासी कबीले ही नहीं, अच्छेभले राजा भी हारे हुए दुश्मन को मार कर उस की मृतदेह की नुमाइश करते रहे हैं, उस के शरीर का प्रदर्शन करते रहे हैं. सभी समाजों ने इसे क्रूरता की पराकाष्ठा माना है.

इसी तरह की स्थिति उस व्यक्ति की है जो ट्यूबों और मशीनों से बंधा अस्पताल के बैड पर पड़ा है. रिश्तेदार और डाक्टर न तो उसे मृत मान सकते हैं न ही जीवित. एक आशा होती है कि शायद वह जी उठे पर बहुत कम. क्या डाक्टरों को अधिकार है कि वे पैसे मिलने पर उस व्यक्ति को कृत्रिम तौर पर जीवित रख सकते हैं? आमतौर पर जब पैसा न मिलने की आशंका होती है तो डाक्टर कृत्रिम उपाय हटा लेते हैं. पर वह उन की हार होती है और वे सभी रिश्तेदारों की सहमति मांगते हैं जिसे देने में सगेसंबंधी  हिचकिचाते हैं.

जीवन का अधिकार क्या एक व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह पहले से घोषित कर दे कि उसे मैडिकल सुविधाओं से जिंदा न रखा जाए और डाक्टर को निर्देश दे सकता है कि उस के ठीक न हो सकने की हालत में उसे मशीनों से हटा लिया जाए?

एक अच्छे डाक्टर के लिए इस पर निर्णय लेना आसान नहीं है, क्योंकि उसे तो यही प्रशिक्षण दिया गया है कि वह अंतिम समय तक मरीज की बीमारी से लड़ता रहे. यदि डाक्टरों के पास लाए गए हर मरीज के साथ उस का घोषणापत्र भी लाया जाएगा कि उसे जबरदस्ती जिंदा न रखा जाए तो वे अपनी शिक्षा और अपने ध्येय से न्याय नहीं कर पाएंगे. फिर तो वे पशुओं के डाक्टर बन कर रह जाएंगे जो केवल उपयोगी पशुओं को ही जिंदा रखते हैं.

अनुपयोगी मानव को मरने देने की घोषणा का कोई अर्थ कानून की दृष्टि में नहीं होना चाहिए, क्योंकि बच्चे या अन्य रिश्तेदार बीमार वृद्धों को बहका, बहला या धमका कर उन से इस प्रकार की घोषणा करा सकते हैं. अरबपति भी एक समय असहाय हो सकता है जब वह जिंदा रहना चाहता हो पर निकटसंबंधी न चाहें. जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं पर बीमार पड़ने पर शशिकला उन से किसी को मिलने नहीं दे रही थीं. हफ्तों बीमार रहने के बाद उन की मृत्यु हो गई पर मालूम नहीं हो सका कि मृत्यु का कारण क्या था.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि जब केवल मशीनों पर व्यक्ति जीवित रखा जा रहा हो तो मरीज के होशोहवास में दिए गए घोषणापत्र पर डाक्टर विचार कर सकते हैं और मशीनें हटा सकते हैं. यदि कोई घोषणापत्र न हो तो व्यक्ति की गरिमा, आत्मसम्मान और जीवन के अधिकारों का संतुलन करते हुए निर्णय लेने में डाक्टर, कोर्ट के इस फैसले के बाद, स्वतंत्र हैं और तब मशीनें हटाना अपराध न होगा.

फन्ने खां : अति वाहियात फिल्म

अक्स’, ‘रंग दे बसंती’, ‘दिल्ली 6’, ‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘मिर्जिया’ जैसी फिल्मों के सर्जक राकेश ओमप्रकाश मेहरा बतौर निर्माता एक डैनिश फिल्म ‘‘एवरी बडी इज फैमस’’ का भारतीयकरण कर ‘फन्ने खां’ नामक फिल्म लेकर आए हैं. अब तक अपनी मौलिक कहानियों पर काम करते रहे राकेश ओमप्रकाश मेहरा ‘फन्ने खां’ बनाते समय भूल गए कि ‘नकल के लिए भी अकल’ चाहिए. फिल्म के लेखक व निर्देशक अतुल मांजरेकर ने भी साबित कर दिखाया कि वह कितनी वाहियात और बेसिर पैर की फिल्म निर्देशित कर सकते हैं.

फिल्म ‘‘फन्ने खां’’ की कहानी के केंद्र में गायकी में सुपर स्टार न बन पाने वाले प्रशांत शर्मा (अनिल कपूर) हैं, जो कि अपने दोस्तों के बीच फन्ने खां के नाम से मशहूर हैं. प्रशांत के दो भगवान हैं मोहम्मद रफी और शम्मी कपूर और उसके खास दोस्त अधीर (राज कुमार राव) हैं. एक औक्रेस्टा में गाते हुए प्रशांत शर्मा अपने सपनों को पूरा करने के लिए काफी मेहनत करते हैं. यहां तक कि सुपरस्टार बनने के लिए वह शम्मी कपूर की पूजा तक करते नजर आते हैं. उनकी एकमात्र तमन्ना स्टारडम पाना है.

प्रशांत की पत्नी कविता (दिव्या दत्ता) भी उनके सपने को सच करने की दिशा में उनके साथ रहती है. मगर प्रशांत के सपने पूरे नहीं हो पाते हैं. प्रशांत एक फैक्टरी में नौकरी करते हैं. जब उनकी बेटी का जन्म होता है, तो वह उसका नाम लता रखते हैं और अब वह अपने सपने को अपनी बेटी लता के माध्यम से पूरा होते देखना चाहते हैं. जैसे जैसे लता बड़ी होती है, वह संगीत व नृत्य में अपना कौशल दिखाने लगती है. वह अच्छा गाती है और अच्छा नृत्य भी करती है. मगर शारीरिक रूप से मोटी होने के कारण जब लता (पिहू सैंड) स्टेज पर पहुंचती है, तो लोग उसका मजाक उड़ाते हैं.

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प्रशांत अपनी बेटी को सफल गायिका बनाने के लिए हर तरह के प्रयास करते हैं. इसी दौरान उनकी नौकरी चली जाती है तो वह टैक्सी चलाने लगते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान प्रशांत को अपनी बेटी लता से फटकार भी सुननी पड़ती है. जबकि अब मशहूर पौप गायिका बेबी सिंह (ऐश्वर्या राय बच्चन) के लोग दीवाने बन चुके हैं. पर बेबी सिंह का मैनेजर चाहता है कि रियालिटी शो में बेबी सिंह के साथ कुछ गलत हो जाए. उधर प्रशांत चाहते हैं कि किसी तरह उनकी बेटी लता के गाए गीतों का एक संगीत अलबम बाजार में आ जाए.

जब एक दिन मशहूर पौप गायिका बेबी सिंह, प्रशांत की टैक्सी में यात्रा करती है, तो प्रशांत के दिमाग में आता है कि यदि बेबी सिंह का अपहरण कर लिया जाए तो उसका काम आसान हो सकता है. वह अपने मित्र अधीर की मदद से बेबी सिंह का अपहरण कर लेते हैं. उसके बाद बेबी सिंह के मैनेजर कक्कड़ (गिरीष कुलकर्णी) को फोनकर फिरौती मांगते हैं, मगर फिरौती में रकम नहीं मांगते. उसके बाद कहानी कई उतार चढ़ाव से गुजरती है.

एक सफल विदेशी फिल्म का भारतीयकरण करते समय लेखक व निर्देशक ने काफी गलतियां की हैं. मूल फिल्म ‘एवरी बडी इज फैमस’’ एक डार्क कौमेडी वाली छोटी फिल्म थी, जबकि ‘फन्ने खां’ मेलोड्रामैटिक और काफी लंबी फिल्म है. फिल्म का क्लायमेक्स सहित बहुत कुछ अविश्वसनीय लगता है. कहानी का ढांचा सही ढंग से बुना ही नहीं गया. एक संवेदनशील व बेहतरीन मुद्दे वाली फिल्म का हश्र ‘थोथा चना बाजे घना’ वाला हो गया.

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कथानक के स्तर पर कहीं कोई गहराई नहीं है. लता का अपने पिता के खिलाफ शिकायत करते रहने की बात समझ में नहीं आती. ऐश्वर्या राय बच्चन अभिनीत बेबी सिंह का किरदार भी ठीक से गढ़ा नहीं गया. मजेदार बात यह है कि इंटरवल से पहले भी फिल्म वाहियात है, मगर इंटरवल के बाद तो यह फिल्म और अधिक वाहियात हो गयी है.

निर्देशक के तौर पर अतुल मांजरेकर अफसल रहे हैं. फिल्म के मूल कथानक से ही वह भटक गए हैं. काश राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह फिल्म अतुल मांजरेकर की बनिस्बत किसी समझदार निर्देशक को सौंपी होती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक भी कलाकार अपने अभिनय से प्रभावित नहीं करता. कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के चलते अनिल कपूर व राज कुमार राव जैसे बेहतरीन कलाकार भी फिल्म को डूबने से नहीं बचा सकते. राज कुमार राव व अनिल कपूर दोस्त हैं, मगर परदे पर इनकी केमिस्ट्री नजर ही नहीं आती. कैमरामैन तिरू की प्रशंसा की जा सकती है.

‘‘फन्ने खां’’ एक संगीत प्रधान फिल्म है. मगर संगीतकार अमित त्रिवेदी बुरी तरह से निराश करते हैं.

दो घंटे नौ मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘फन्ने खां’’ का निर्माण राकेश ओमप्रकाश मेहरा, अनिल कपूर, टीसीरीज, निशांत पिट्टी, वीरेंद्र अरोड़ा ने किया है. फिल्म के निर्देशक अतुल मांजरेकर, पटकथा लेखक अतुल मांजरेकर, हुसेन दलाल, अब्बास दलाल, संवाद लेखक हुसेन दलाल, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन तिरू तथा फिल्म के कलाकार हैं – अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय बच्चन, राज कुमार राव, पिहू सैंड, दिव्या दत्ता, करण सिंह छाबरा, अनैयथा नायर, गिरीष कुलकर्णी, स्वाती सेमवाल व अन्य.

इस टीवी एक्ट्रेस की होगी ‘बिग बौस 12’ में एंट्री

छोटे पर्दे के फेमस शो ‘बिग बौस’ के 12 वें सीजन की तैयारियां शुरू हो गई हैं. पिछले कुछ दिनों से मीडिया में इस शो को लेकर लगातार कुछ ना कुछ अपडेट आ रहे हैं. एक बार फिर इस शो से जुड़ी एक नई खबर सामने आई है. अगर यह खबर पक्की साबित हुई तो ‘बिग बौस 12’ को अपना पहला सेलिब्रिटी कंटेस्टेंट मिल चुका है.

एक खबर के मुताबिक टीवी जगत की फेमस एक्ट्रेस सृष्टि रोडे ‘बिग बौस 12’ में नजर आने वाली हैं. सृष्टि बिग ने बौस के घर में जाने के लिए अपनी हामी भर दी है और शो मेकर्स के साथ कौन्ट्रैक्ट भी साइन कर लिया है. बता दें कि इस बार शो में कंटेस्टेंट जोड़ियों में भेजे जायेंगे, इसलिए शो के मेकर्स सृष्टि के मंगेतर और टीवी एक्टर मनीष नागदेव से भी बातचीत कर रहे है. अगर मनीष से बात फाइनल हो जाती है तो इस शो में सृष्टि के साथ मनीष भी नजर आ सकते हैं.

आपको बता दें कि सृष्टि कई फेमस टीवी सीरियल में नजर आ चुकी हैं. ‘ये इश्क़ हाए’ टीवी शो से सृष्टि ने अपने करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद वह ‘छोटी बहू-2’ और ‘पुनर्विवाह’ में नजर आ चुकी हैं. फिलहाल सृष्टि पौपुलर टीवी सीरियल ‘इश्कबाज’ में नजर आ रही हैं, जिसमें वो फैजा का किरदार निभा रही हैं.

मीडिया में आ रही खबरों की माने तो इस बार शो का थीम और कंटेट ऐसा रखा गया है कि ‘बिग बौस 12’ अब तक का सबसे बोल्ड सीजन साबित होगा. एक खबर के मुताबिक इस बार शो के फौर्मेट को ज्यादा बोल्ड और कंट्रोवर्सियल बनाया जायेगा क्योंकि पिछला सीजन ‘बिग बौस 11’ टीआरपी के मामलें में कुछ खास कमाल नहीं कर पाया था. इस बार भी सुपरस्टार सलमान खान शो को होस्ट करेंगे लेकिन इसके साथ यह भी चर्चा है कि कैटरीना सलमान के साथ शो को होस्ट कर सकती हैं.

जीवन सरिता : निंदक नियरे राखिए

अपनी तारीफ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता. इस में संदेह नहीं कि तारीफ का असर सकारात्मक होता है. परंतु किसी व्यक्ति की गलतियों पर भी उस की तारीफ की जाए तो यह संभव नहीं है. बिना गुण के तारीफ अकसर इंसान को गुमराह भी कर सकती है, उस के अंदर झूठा अहं पैदा कर सकती है. इसीलिए, संत कबीर दास ने कहा था –

‘निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय

बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय.’

आलोचक किसी को भी अच्छे नहीं लगते. अपनी बुराई सुन कर कौन खुश होता है? पर अगर गहराई से सोचा जाए तो हमारी बुराई और आलोचना के परिणाम कभीकभी सुधारवादी व सकारात्मक भी हो सकते हैं. सकारात्मक परिणाम

नीमा को खाना बनाना अच्छा नहीं लगता था, इसीलिए उस ने कभी भी तरहतरह के व्यंजन बनाने नहीं सीखे. शादी के बाद पता चला कि उस के पति को तरहतरह के व्यंजन खाने का शौक है. पर उसे तो कुछ आता ही नहीं था, जबकि उस की जेठानी पाककला में निपुण थी. नीमा का पति अपनी भाभी के खाने की तारीफ करते नहीं थकता था. नीमा कुछ भी बनाती तो वह उस में कुछ न कुछ मीनमेख निकालता रहता था. इस बात से नीमा खिन्न रहती थी, तिस पर उस की जेठानी उसे इस बात के लिए खूब ताने मारती रहती. एक दिन तो उस ने यहां तक कह दिया, ‘‘नीमा, तुम्हारे हाथ का बना खाना तो कुत्ते को भी पसंद नहीं आएगा.’’ हालांकि इस बात ने नीमा को अंदर तक आहत कर दिया था और उसे बहुत गुस्सा आ रहा था पर उस ने अपनी जेठानी को कभी कोई जवाब नहीं दिया और मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, अब वह जेठानी से भी अच्छा खाना बनाएगी और सचमुच उस ने यह कर दिखाया. उस ने कुकिंग क्लास जौइन की और आज वह पाककला में इतनी निपुण है कि हर कोई उस के हाथ के बने खाने की तारीफ करता है.

अगर उस की जेठानी उसे ताने न मारती और उस के खाने में मीनमेख न निकाली जाती तो शायद ही वह कभी इतना अच्छा खाना बना पाती. इसीलिए कहते हैं कि हमें अपनी बुराई सुन कर आए गुस्से की एनर्जी का उपयोग खुद को सुधारने में करना चाहिए. खुद को कमतर न आंकें

एक दार्शनिक का कहना है कि कोई आप को नीचा नहीं दिखा सकता, जब तक स्वयं आप की उस के लिए सहमति न हो. इस दुनिया में हमें कदमकदम पर आलोचक या निंदा करने वाले मिलेंगे. कुछ लोगों की तो दूसरों की आलोचना करने की प्रवृत्ति ही होती है. ऐसे लोग किसी को नहीं छोड़ते. दूसरों का मजाक उड़ाने में इन लोगों को बहुत मजा आता है. वैसे देखा जाए तो इस तरह के लोग खुद हीनभावना के शिकार होते हैं लेकिन कुछ चापलूसों की झूठी तारीफें सुन कर ये खुशफहमी और झूठा अहं पाल लेते हैं. अपने इसी झूठे अहं को संतुष्ट करने के लिए ये लोग दूसरों की कमियां गिनाते रहते हैं, खासकर उन लोगों की जो असलियत में उन से हर बात में बेहतर होते हैं.

ऐसे लोग दूसरों को आलोचना कर के उन का आत्मविश्वास तोड़ उन से आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं. अगर ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान न दे कर यदि अपने काम पर ध्यान दिया जाए और खुद की योग्यता पहचान कर आगे बढ़ा जाए तो यह इस तरह के लोगों को हराने का सब से बेहतर तरीका है. हम वह नहीं हैं जो हमें दूसरे लोग बताते हैं, बल्कि हम वह हैं जिसे हम पहचानते हैं- औरों से बेहतर, औरों से श्रेष्ठ, औरों से गुणवान. अपने भीतर छिपे इन गुणों को पहचान कर व्यर्थ की आलोचनाओं पर ध्यान न दे कर चुपचाप अपना कार्य करते रहिए, खुद को और बेहतर बनाने की कोशिश करते रहिए. एक दिन ऐसा आएगा जब आप इतनी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे कि आप पर पत्थर फेंकने वाले लोगों पर वे ही पत्थर वापस आ कर गिरेंगे. आलोचना स्वीकारें

आलोचना को हम स्वीकार नहीं करते, परंतु यह एक आवश्यक चीज है. इस की तुलना हम अपने शरीर में होने वाले दर्द से कर सकते हैं जो किसी अस्वस्थ चीज की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट करता है. यदि किसी व्यक्ति के शरीर के किसी अंग में कैंसर की शुरुआत हो चुकी है और इस रोग के फर्स्ट स्टेज पर ही डाक्टर को पता चल जाए और सिर्फ मरीज को खुश करने के लिए डाक्टर कहे कि आप को कोईर् रोग नहीं, आप बिलकुल स्वस्थ हैं तो उस व्यक्ति का रोग बढ़ कर सारे शरीर में फैल जाएगा और इस की वजह से उस की मौत भी हो सकती है.

इसी तरह यदि हमारे अवगुणों की तरफ कोई हमारा ध्यान आकृष्ट नहीं करेगा तो हमारे अंदर अवगुण बढ़ते जाएंगे और ये हमारे पतन का कारण बन जाएंगे. इसीलिए आलोचना को स्वीकार करना सीखें और उस से आहत न हों, बल्कि दृढ़ निश्चय की ओर बढ़ें कि हमें अपनी कमियां दूर कर बेहतर इंसान बनना है. खुद को कमजोर न होने दें

अकसर देखा गया है कि कुछ लोग आलोचना सहन नहीं कर पाते तथा आहत हो कर अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं और फिर अवसाद के शिकार हो जाते हैं. यह स्थिति कभीकभी व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए भी मजबूर कर देती है. हमारी कमियां बताने वाले कभीकभी हमें विश्वास दिला देते हैं कि हम वो हैं जो उन्होंने हमें बताया है. रमा अपनी सहेलियों में सब से सुंदर थी. पर उस की सहेलियां हमेशा उस में कोई न कोई कमी निकालती रहतीं, जैसे तेरी लंबाई कितनी कम है, तेरे चेहरे पर कितने पिंपल्स हैं आदि. ये सब सुन कर रमा को सच में लगने लगा कि वह सुंदर नहीं है. एक दिन वह घर आ कर खूब रोई. उस की मम्मी ने उसे आईने के सामने ले जा कर खुद को ध्यान से देखने को कहा और उसे बताया कि वह अपनी सहेलियों से बहुत अधिक सुंदर है, इसलिए वे सब उस से जलती हैं.

रमा ने खुद को आईने में देखा तो सच में उसे लगा कि वह सुंदर है, और फिर उस ने अपनी सहेलियों की हर आलोचना को जवाब देना शुरू कर दिया. ऐसे में उस का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया. धीरेधीरे उस की सहेलियों ने उस की आलोचना करनी बंद कर दी. अगर वह कमजोर पड़ जाती तो शायद सारी जिंदगी हीनभावना से ग्रसित रहती. इसलिए किसी भी स्थिति में खुद को कमजोर न पड़ने दें. जिस तरह खाने में हमें मीठी चीजें पसंद होती हैं पर ज्यादा मीठा सेहत

के लिए नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए करेले और नीम जैसी कड़वी चीजें खाने की सलाह दी जाती है ताकि सेहत दुरुस्त रहे, उसी तरह अपनी तारीफ के साथ बुराई भी सुनने की आदत डालनी चाहिए. जीवन में ऐसे लोगों का होना भी जरूरी है जो हमारी कमियां बता कर हमें अपनी असलियत बताएं, ताकि हमारा व्यक्तित्व और निखरे तथा हम बेहतर इंसान बन सकें.

पति न हो तोंदवाला

आज की अव्यवस्थित जीवनशैली की वजह से अधिकतर लोग कम उम्र में ही मोटापे के शिकार हो जाते हैं. जिस का पता उन्हें बाद में लगता है. मोटापा कैरियर से ले कर दैनिक जीवन पर हावी हो जाता है. अगर शुरू में ही इस को काबू कर लिया जाए तो इसे बढ़ने से रोका जा सकता है.

यह केवल आप की फिटनैस को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि आप के रहनसहन, कामकाज के ढंग और फिगर को प्रभावित करने के साथसाथ कई बीमारियों को आमंत्रित भी करता है.

इस बारे में मुंबई के ग्लोबल हौस्पिटल की बैरियाट्रिक सर्जन डा. अपर्णा गोविल भास्कर कहती हैं कि मोटापे के कई कारण होते हैं, कुछ लोगों में बचपन से मोटापे की प्रवृत्ति होती है, तो किसी में यह वंशानुगत होता है.

क्यों बढ़ता है मोटापा

–    पहले खानेकमाने के लिए लोगों को अधिक मेहनत करनी पड़ती थी. ऐसे में जो फैट शरीर में रहता था, उस का उपयोग होता था. लेकिन आज लोगों को खाना कम शारीरिक परिश्रम से मिलता है, इसलिए जमा फैट का इस्तेमाल नहीं होता और उस की लेयर बढ़ती जाती है.

–    हर काम आज मशीन से होता है, शारीरिक मेहनत कम हो गई है. भूख लगने पर खाना आसानी से आसपास या मोबाइल से और्डर कर मंगा लिया जाता है.

–    जंक फूड का क्रेज ज्यादा बढ़ गया है.

–    किसीकिसी का वजन ही 80 किलोग्राम का होता है, जो जैनिटिकली होता है, उस का वजन या फैट कम होना मुश्किल होता है.

नियंत्रित करने के तरीके

–    मोटापे पर नियंत्रण का सब से आसान तरीका हैल्थी डाइट लेना है.

–    फिजिकल ऐक्टिविटी को बढ़ाना है.

–    8 से 10 किलोग्राम वजन डाइट और लाइफस्टाइल बदल कर कम किया जा सकता है. इस के लिए किसी डाइटीशियन से मिलें.

–    अगर बौडी मास इंडैक्स 35 से ऊपर हो और डाइट व जीवनशैली के बदलने पर भी वजन कम नहीं हो रहा हो या बारबार घटबढ़ रहा हो, तो बैरियाट्रिक सर्जरी करानी पड़ती है. यह सर्जरी दूरबीन से की जाती है, जिस में 2 घंटे का समय लगता है.

नौन सर्जिकल थेरैपी

मोटापा कम करने के लिए कुछ नौन सर्जिकल थेरैपी भी हैं, जो काफी हद तक आप के मोटापे को कम कर सकती हैं.

–    बैलेंस्ड डाइट के साथसाथ यू लाइपो मशीन का प्रयोग किया जाता है, जो फैट सेल्स को ब्रेक करती है और धीरेधीरे पेट या शरीर की चरबी को कम करती है.

–    क्रायो थेरैपी उन लोगों के लिए अधिक उपयोगी है जिन्हें मोटापे के साथसाथ घुटने या स्पाइन का दर्द हो, जिस की वजह से वे अधिक व्यायाम नहीं  कर सकते, बिना व्यायाम यह वजन को कम कर सकती है.

–    इस के अलावा इलैक्ट्रिक मसल्स स्टीमुलेटर एक मशीन है, जो मसल्स को स्टीमुलेट करती है जिस से मैटाबोलिक रेट बढ़ता है और फैट कम होता है. इस का कोई साइड इफैक्ट नहीं होता.

मेहनत करें, पसीना बहाएं, व्यायाम करें, घी, तेल, मसाले, मक्खन, चीनी, चावल व मैदा से परहेज करें. नहीं तो तोंद बढ़ती रहेगी और मित्रों या औफिस में यों ही आप मजाक के पात्र बनते रहेंगे. दांपत्य जीवन में भी इस का असर पड़ता है. सैक्सलाइफ में मोटापा सब से बड़ी रुकावट है. इसलिए हमेशा फिट व हिट रहें.

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