जब WWE रिंग में सपना चौधरी संग राखी सावंत ने लगाए ठुमके

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी का एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जो उनके फैंस के चेहरों पर मुस्‍कान ले आएगा. वैसे तो सपना के हर डांस वीडियो को लोग काफी पसंद करते हैं और बेहद दिलचस्पी के साथ देखते हैं. लेकिन इस बार जो वीडियो सामने आया उसमें वे WWE रिंग में डांस करती दिख रही हैं. ये वीडियो उनके एक फैन पेज ने शेयर किया है. इसमें सपना के साथ राखी सावंत भी डांस करती नजर आ रही हैं.

गौरतलब है कि बिग बौस में आने से पहले सपना चौधरी हमेशा ही सलवार-सूट में दिखाई देती थीं. इसी में उनका हर डांस वायरल होता था. पर जबसे वे बिग बौस के घर से बाहर आईं हैं उनका जबरदस्‍त मेकओवर देखने को मिला है. वे अब वेस्‍टर्न ड्रेसेज में खूब दिखती हैं.

बता दें कि सपना चौधरी की काफी बड़ी फैन फौलोइंग है. वे बिग बौस 10 में भी दिखी थीं. वे वीरे दी वेडिंग में ‘हट जा ताऊ’ गाने पर थिरकतीं नजर आई थीं. हाल ही में उन्‍होंने भोजपुरी मेगास्‍टार रवि किशन की फिल्‍म ‘बैरी कंगना 2’ के लिए एक स्‍पेशल आइटम नंबर भी किया था.

उम्र को मात देते 50 + सितारे

खान तिकड़ी अब 50 प्लस हो चुकी है और आज अपने से आधी उम्र की हीरोइनों के साथ फिल्मों में रोमांस फरमा रही है. देखा जाए तो फिल्म अभिनेताओं ने आम लोगों को यह प्रेरणा दी है कि बढ़ती उम्र में भी अपनी बौडी को कैसे फिट रखा जा सकता है. सलमान ने जिस बौडी दिखाऊ परंपरा की शुरुआत की थी उसे 53 पार कर चुके आमिर, 50 के हो चुके अक्षय और 52 के शाहरुख आज तक अच्छे से निभा रहे हैं.

इंडस्ट्री में आज एक भी कलाकार नहीं है जो 20 प्लस हो कर सितारा की श्रेणी में आता हो. शीर्ष सितारा की कुरसी पर 50 प्लस कलाकारों का कब्जा बरकरार है. इन्होंने लोगों को दिखा दिया है कि उम्र चाहे कुछ भी हो, फिट रहने के लिए जज्बा होना चाहिए.

मिस्टर परफैक्ट

आमिर खान बौलीवुड में इकलौते ऐसे अभिनेता हैं जो किरदार के अनुसार खुद को पूरी तरह ढाल लेते हैं. जब पहली बार ‘गजनी’ में आमिर ने सिक्स पैक एब्स दिखाए तो लोगों को यकीन करना मुश्किल हो गया कि यह वही चौकलेटी बौय है जो कुछ सालों पहले सिर्फ रोमांटिक फिल्में करता था. फिल्म ‘दंगल’ में अपना वजन 70 से 98 किलो करने के लिए वे अमेरिका चले गए थे और वहां न्यूट्रीशनिस्ट व जिम ट्रेनर की देखरेख में उन्होंने अपना वजन बढ़ाया और फिल्म पूरी होने के बाद फिर कम किया.

आमिर के डेली रूटीन में ट्रैकिंग, साइक्लिंग, स्विमिंग और टैनिस खेलना शामिल है. वे अपने कैरेक्टर के अनुसार वजन घटाने के लिए रोज अपना शैड्यूल तैयार करते हैं.

खिलाड़ी कुमार की बौक्सिंग

बौलीवुड के खिलाड़ी अक्षय कुमार की फिल्मों में ऐंट्री ही उन के स्टंट और दमदार फिजिक से हुई थी. अक्षय कुमार आज 50 वर्ष के हो गए हैं, फिर भी अपनी दिनचर्या में स्पोर्ट्स को पहले नंबर पर रखते हैं. वे आज भी हफ्ते में 3 दिन बास्केटबौल खेलते हैं और एक बार में 10 मील दौड़ते हैं.

अक्षय कराटे में ब्लैक बैल्ट होल्डर भी हैं, इसलिए किक, बौक्सिंग और कराटे की प्रैक्टिस भी उन की दिनचर्या में शामिल है. बौडी को फिट और स्टेमिना को बनाए रखने के लिए वे वाक और ट्रैक का सहारा लेते हैं. खाने के मामले में भी अक्षय बड़े पक्के हैं. वे घर पर बना हुआ खाना और फल व सब्जियां खाना पसंद करते हैं.

बादशाह खान की बादशाहत

फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में शाहरुख के सिक्स पैक एब्स को कौन भूल सकता है. खुद को फिट रखने के लिए वे कड़ी ट्रेनिंग, वेट लिफ्टिंग और कार्डियोवैस्कुलर ऐक्सरसाइज करते हैं. आज भी वे रोजाना 10 गिलास पानी पीते हैं और 30 मिनट की कार्डियोवैस्कुलर ऐक्सरसाइज फैट बर्न करने के लिए करते हैं.

52 साल की उम्र में भी वे 100 पुश अप्स और 60 पुल अप्स करना कभी नहीं भूलते. अगर समय मिला तो मौर्निंग वाक और साइक्लिंग के साथ वे बेली डांस भी करते हैं.

सलमान के बाईसैप्स

अगर बौलीवुड में बौडी दिखाने का श्रेय किसी को जाता है तो वे सलमान खान हैं जिन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में पहली बार अपनी शर्ट उतार कर बौडी दिखाई थी. उन के पास बेहतरीन बाइसैप्स, ट्राइसैप्स और शानदार एब्स हैं. सलमान अपने एब्स को शेप में रखने के लिए कार्डियोवैस्कुलर ऐक्सरसाइज और वर्कआउट करते हैं. इस के अलावा 10 किलोमीटर तक साइकिल भी चलाते हैं.

आज भी नईनई हीरोइनों के साथ फिल्म बनाने वाले ये अधेड़ हीरो अपनी फिटनैस और स्टारडम से कहीं से भी नहीं लगते कि वे किसी भी मामले में आज के हीरो वरुण धवन और टाइगर श्रौफ से पीछे हैं. सोशल मीडिया पर इन की फैन फौलोइंग और फिल्मों का हिट होना इस बात का प्रमाण है कि अभी भी बौलीवुड की सितारा कुरसी पर इन्हीं 50 प्लस सितारों का कब्जा बरकरार रहेगा.

गुरुओं की दुकानदारी का महिमामंडन

हमारा एक वर्गविशेष प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली को वैकल्पिक प्रणाली के तौर पर प्रस्तुत करता रहता है और उस के प्रति अपनी भावुकतापूर्ण ललक व्यक्त करता है.

गुरुशिष्य प्रणाली के प्रामाणिक दस्तावेज की खोज में ‘गुरुगीता’ नाम की एक पुस्तक पिछले दिनों दिखी. यह इस पुस्तक का 1986 में छपा 5वां संस्करण है. इस से पहले इस का तीसरा संस्करण 1920 में प्रकाशित किया गया था. दूसरा संस्करण 1920 से पूर्व छपा होगा.

यह 221 श्लोकों की पुस्तक है, भारतधर्म महामंडल, वाराणसी से छपी है.

इस में गुरु और शिष्य के संबंधों पर महादेवपार्वती के संवाद के रूप में बहुत विस्तार से प्रकाश डाला गया है.

माहात्म्य में ही कह दिया गया है कि इस किताब की एक प्रति दान करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, इस के पाठ से गरीबी दूर होती है, बड़ेबड़े रोग ठीक हो जाते हैं, संपत्तियां प्राप्त होती हैं, बंध्या नारी के पुत्र पैदा हो जाता है और विधवा होने की आशंका दूर हो जाती है, पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है आदि.

इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयतेऽथवा, लिखित्वा वा प्रदीयेत सर्वकालफलप्रदम्.

205

इस गुरुगीता को जो भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या लिख कर दान करता है, उस की सब प्रकार की कामनाएं पूरी होती हैं.

सर्वपापहरं स्तोत्रं सर्वदारिद्र्यनाशनम्,

अकालमृत्युहरणं सर्वसंकटनाशनम्.

208

यह गुरुगीता सब प्रकार के पापों का नाश करती है, सब प्रकार की गरीबी को दूर करती है, असमय होने वाली मृत्यु का निवारण करती है और सब संकटों को नष्ट करती है.

सर्वशांतिकरं नित्यं वन्ध्यापुत्रफलप्रदम्,

अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परम्.

213

इस के पाठ से सब पाप/दुष्ट ग्रह आदि शांत होते हैं, बांझ औरत को भी पुत्र की प्राप्ति होती है, स्त्रियों के विधवा होने की आशंका दूर होती है और परम सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

आयुरारोग्यमैश्वर्यपुत्रपौत्रादिवर्धकम्,

निष्कामतस्त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात्.

214

निष्काम भाव से इस का थोड़ा सा पाठ करने पर आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि होती है और इस का 3 बार जप करने से मोक्ष प्राप्त हो जाता है.

शुचिदेव सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु,

यस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते.

220

ज्ञानी मनुष्य गुरुगीता का पाठ करने से सदा पवित्र रहते हैं. ऐसे पवित्र मनुष्यों के दर्शन करने से पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है.

गुरु का अर्थ

गुरु शब्द का अर्थ बताते हुए गुरुगीता कहती है कि ‘गु’ शब्द का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ शब्द का अर्थ है उसे रोकने वाला :

गुशब्दस्त्वंधकार: स्याद् रुशब्दस्तन्निरोधक:

अंधकारनिरोधित्वाद् गुरुरित्यभिधीयते.

15

‘गुरु’ शब्द का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ शब्द का अर्थ उस को रोकने वाला. अंधकार को रोकने या दूर करने वाले को ‘गुरु’ कहते हैं.

लगता है गुरुगीता को अपने इस मनगढं़त अर्थ पर स्वयं भी विश्वास नहीं है. इसलिए  उस ने श्लोक 16 में इन्हीं शब्दों को तोड़मरोड़ कर एक नया अर्थ निकाल कर फिर से भरमाने की कोशिश की है :

गकार: सिद्धिद: प्रोक्तो रेफ:

पापस्य दाहक:,

उकार: शंभुरित्युक्तास्त्रियाऽऽत्मा

गुरु: स्मृत:.                       16

‘ग’ 6गकार8 का अर्थ है ‘सिद्धि देने वाला’, ‘र’ 6रकार8 का अर्थ है ‘पापों को दूर करने वाला’ और ‘उ’ 6उकार8 का अर्थ है ‘शिव’  अर्थात गुरु का अर्थ है, सिद्धिदाता शिव पापहर्ता शिव.

एक अन्य श्लोक में कहा है-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुगुरुर्देवो महेश्वर:,

गुरु: साक्षात् पर ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:.

147

अर्थात गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु शिव है. गुरु परंब्रह्म है.

लगता है सदियों से गुरुओं के बारे में लोगों को संशय रहा है और हर ग्रंथ में गुरु महिमा इसीलिए गाई गई है कि यह संशय दूर रहे.

गुरु केवल ब्राह्मण

श्लोक नं. 34 कहता है, ‘गुरु’ केवल ब्राह्मण हो सकता है, यह पद उस के लिए गुरुगीता ने आरक्षित घोषित कर रखा है. शिष्य भी ऐरागैरा नहीं बन सकता. वह भी ‘कुलीन’ होना चाहिए. अर्थात यह सारा ऊंची जातियों का खेल है क्योंकि शूद्र के लिए शिक्षा का कहीं विधान ही नहीं है. शूद्र ‘कुलीन’ कैसे हो सकता है? क्षत्रिय व वैश्य शामिल हों तो भी आश्चर्य होगा. प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणों की शिक्षा के लिए बनाई गई थी.

आज यदि उस गुरुशिष्य प्रणाली को निहित स्वार्थी तत्त्व लागू कर या करवा देते हैं तो हमारी शिक्षा की सब समस्याएं, आरक्षण मांगने वालों के आंदोलन, पढे़लिखे बेरोजगारों का संकट आदि पलक झपकते ही खत्म हो जाएंगे, क्योंकि तब पढ़ ही कुछ प्रतिशत जनसंख्या वाली उच्च जातियों के सदस्य सकेंगे. बाकी जब पढ़ ही नहीं पाएंगे, तब कैसा आरक्षण.

शिष्य का अर्थ

शिष्य के लिए जरूरी है कि वह आस्तिक हो अर्थात उस का दिमाग खुला नहीं, बंद होना चाहिए. वह सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो.

शरीरमर्थं प्राणांश्च गुरुभ्यो य: समर्पयन् ,

गुरुभि: शिष्यते योगं स शिष्य इति कथ्यते.

54

गुरु के लिए शरीर, धन और प्राणों तक को अर्पित कर दे क्योंकि वह गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है, इसलिए ‘शिष्य’ कहलाता है.

पत्नी भी गुरु को अर्पित

गुरुगीता बात यहीं नहीं खत्म करती, बल्कि यह भी कहती है कि शिष्य अपनी पत्नी भी गुरु को अर्पित करे :

आत्मदाराऽऽदिकं सर्वं गुरवे च निवेदयेत्.

55

अपनी पत्नी आदि सबकुछ गुरु को अर्पित करें.

इस के बाद शिष्य को खानेपीने के बारे में गुरुगीता का आदेश है कि वह गुरु के पैरों का धोवन पिए तथा उस का जूठा बचा खाना खाए :

गुरुपादोदकं पेयं गुरोरुच्छिष्टभोजनम्,

57

गुरु के पैरों को जिस पानी से धोया जाए, उसे पिए तथा गुरु का जूठा बचा खाना खाए.

यह मर्ज दवा से बेहतर है

जो लोग आज प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली को लाने के लिए चिल्ला रहे हैं, क्या उन के बच्चे ये सब करने को तैयार होंगे या यह सिर्फ गरीबों, दबे व कुचले लोगों और सदियों से अधिकारवंचितों के बच्चों के लिए ही प्रस्तावित किया जाएगा?

गुरु के पैर दबाने की गुरुगीता में बहुत महिमा गाई गई है :

सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरो: पादसेवनात्,

सर्वतीर्थावगाहस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम्.

169

गुरु के पैर दबाने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं. जितना फल सब तीर्थों में नहाने पर मिलता है, वह सब गुरु के पैर दबाने वालों को मिलता है.

इसी तरह की महिमा गुरु के पैरों का धोवन पीने की भी गाई गई है :

सप्तसागरपर्यंत तीर्थस्नानादिकै: फलम्,

गुरोरंघ्रिपयोबिंदुसहस्रांशेन दुर्लभम्.

161

सात समुद्रों तक जितने तीर्थ हैं, उन में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गुरु के पैरों की धोवन की एक बूंद पीने से उस से हजारगुना ज्यादा फल प्राप्त होता है.

यद्यपि गुरु को शिव, ब्रह्मा आदि कहा गया है और उसे इंसान के रूप में देखने वाले को नरकगामी घोषित किया गया है तथापि यह कटु यथार्थ है कि वास्तव में वह एक इंसान ही रहता है.

इसीलिए गुरुगीता ने शिष्य को आदेश दिया है कि वह यदि गुरु को कोई बुरा काम करता देखे या गुरु कोई बुरा काम उसी (शिष्य) से करे तो शिष्य का कर्तव्य है कि उस की बाबत कभी मुंह न खोले, उस के बारे में अंधा और गूंगा ही नहीं बना रहे, बल्कि बहरा भी बन जाए :

दुष्कृतं न गुरोर्ब्रूयात्,

परिवादं न शृणुयादन्येषामपि कुर्वताम्. 63

गुरु के कुकर्म की बाबत पर मुंह न खोलें. यदि उस के कुकर्म की चर्चा दूसरे लोग करें भी, तो उस चर्चा के प्रति बहरा बन जाएं, उसे अनसुना कर दें.

गुरोर्यत्र परीवादो निंदा वापि प्रवर्तते,

कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गंतव्यं वा ततोऽन्यत:.

70

जहां कोई गुरु के दुष्कर्म की चर्चा करे, उस की निंदा करे, वहां शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने कानों पर हाथ रख ले या वहां से उठ कर किसी और जगह चला जाए.

गुरु दुष्कर्म करते ही होंगे, तभी तो इन श्लोकों में उन्हें दबाने व छिपाने के लिए इतना जोर दिया गया है. इस से बढ़ कर गुरुशिष्य प्रणाली की विडंबना और क्या हो सकती है?

गुरु ही ईश्वर है

गुरुगीता शिष्य से आशा करती है कि उस का आस्तिकवाद गुरु पर ही केंद्रित हो, ईश्वर पर नहीं.

गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्,

गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत्.

66

हमेशा गुरु की मूर्ति का ध्यान करे, सदा गुरु के नाम का जाप करे, सदा गुरु की आज्ञा का पालन करे तथा गुरु के सिवा और किसी का चिंतन न करे.

शिष्य नौकर है

शिष्य सदा गुरु के नौकर (=भृत्य) की तरह ही अपने को समझे-

आज्ञया कुरुते कर्म शिष्यश्च भृत्यवत्.

75

अर्थात गुरु के व्यक्तिगत काम करें, उस के घर के काम करें आदि.

यदि गुरु संतुष्ट है तो शिष्य समझे कि उसे कोटिकोटि जन्मों में किए गए जप, व्रत, तप और कर्मकांड का फल प्राप्त हो गया है.

विष्ठा का कीड़ा

गुरुगीता कहती है कि शिष्य के लिए उचित है कि वह वाणी, मन, शरीर और कर्म के द्वारा गुरु का हित करे, उसे हर तरह से लाभ पहुंचाए. जो शिष्य गुरु का हित नहीं करता, उस के फायदे के लिए यत्न नहीं करता, वह अगले जन्म में टट्टी में कीड़ा बनता है.

इस सारी प्रक्रिया के दौरान पूरी गुरुगीता में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं होता कि गुरु शिष्य को कब और कैसे पढ़ातालिखाता था, और न ही यह स्पष्ट होता है कि शिष्य कभी कुछ पढ़तालिखता था भी या नहीं. इस के बारे में गुरुगीता के 79वें श्लोक में बहुत गोलमोल ढंग से सिर्फ यह लिखा मिलता है कि जैसे कोई मनुष्य खुरपे द्वारा मिट्टी को खोदतेखोदते एक दिन नीचे जल प्राप्त कर लेता है, उसी तरह जो शिष्य गुरुसेवा में लगा रहता है, वह गुरु की सारी विद्या को प्राप्त करने में एक दिन सफल हो जाता है.

पर इस से यह स्पष्ट नहीं होता कि गुरु किस विधि से और क्या पढ़ाता था? शिष्य कैसे सीखता था? उसे लिखना, पढ़ना, गणित आदि गुरु कैसे सिखाता था? कब से कब तक? क्या कोई पाठ्यक्रम भी होता था या नहीं और उसे किस प्रकार व्यवहार में लाया जाता था? शिष्य की योग्यता को सेवा के मीटर से मापने के अतिरिक्त क्या कोई अन्य विधि भी थी? उसे कैसे व्यवहार में लाया जाता था? कौन उस का स्तरीकरण, मानकीकरण और प्रामाणिकीकरण करता था?

गुरुडम का मकड़जाल

गुरुगीता में जिस गुरुशिष्य परंपरा का प्रतिपादन किया गया है और जिस शिक्षाविधि का वर्णन है, वह शिक्षापद्धति के स्थान पर गुरुडम स्थापित करने की ही विधि है.

यदि प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा फिर लागू की जाती है तो शिक्षा का बेड़ा तो गर्क होगा ही.

एकलव्य की त्रासदी

प्राचीनकाल  में भी यही कुछ था. प्राचीनकाल के (महाभारतकालीन) शिष्यों में एकलव्य जैसा वफादार शायद कोई शिष्य नहीं था. उसे गुरु ने शिक्षा देने से इसलिए इनकार कर दिया था कि वह शूद्र था, आदिवासी था. ब्राह्मण गुरु उसे शिक्षा कैसे दे सकता था. शिक्षा के लिए जरूरी था कि शिष्य का पहले उपनयन संस्कार हो. वह संस्कार शूद्र का हो नहीं सकता था. सब धर्मशास्त्रों  ने उस के उपनयन संस्कार का निषेध किया है.

लाचार हो कर एकलव्य जंगल को लौट गया और एक अनगढ़ पत्थर को गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति के रूप में सम्मानित कर के स्वयं ही धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा. जैसा कहा जाता है, अभ्यास से आदमी पूर्ण हो जाता है, अपने निरंतर अभ्यास से एकलव्य भी धनुष चलाने में प्रवीण हो गया.

जब गुरुजी को यह पता चला कि उन की मूर्ति के प्रति सम्मान रखते व अभ्यास करतेकरते एकलव्य धनुष चलाने में इतना पारंगत हो गया है जितना शायद अर्जुन भी नहीं है, तो प्राचीन गुरुपरंपरा के प्रतिनिधि गुरुद्रोण ने उस विद्या के लिए गुरुदक्षिणा मांग ली जो उस ने उस कथित शिष्य को कभी दी ही नहीं थी और गुरुदक्षिणा भी ऐसी मांगी कि जिस से उस शूद्र की खुद अर्जित विद्या भी अनहोई के समान हो जाए. गुरु ने शिष्य का धनुष चलाने के लिए जरूरी अंग, उस का अंगूठा गुरुदक्षिणा के नाम पर कटवा लिया और एकलव्य का सारा अभ्यास पलभर में सदा के लिए मिट्टी में मिला दिया.

अंगूठा कट जाने पर वह अब पहले की तरह धनुष चलाने के योग्य नहीं रह गया था. इसी गुरु द्रोण के नाम पर भारत सरकार ने श्रेष्ठ कोच के लिए ‘गुरु द्रोणाचार्य पुरस्कार’ स्थापित किया हुआ है. जब उत्तम व श्रेष्ठ ‘गुरु’ का यह हाल है, उस का शिष्य के प्रति इस तरह का अमानवीय, भेदभावपूर्ण और  आपत्तिजनक व्यवहार है, तब छुटभैया गुरुओं के चरित्र की कल्पना आसानी से की जा सकती है.

शिष्य की बेटी, गुरु की दक्षिणा

उपनिषदों में एक ऐसे गुरु के दर्शन होते हैं जो अपने भावी शिष्य की सुंदर व युवा बेटी को अग्रिम दक्षिणा के रूप में ग्रहण करता है और उसे ‘ज्ञान’ बाद में देता है. गुरुदक्षिणा भी युवा लड़की के रूप में और वह भी अग्रिम. इस पर भी तुर्रा यह कि वह गुरु शुरू में ही शिष्य को उस समय की सामाजिक गाली देता है, उसे ‘शूद्र’ कह कर उस का संबोधन करता है.

छांदोग्य उपनिषद (अ. 4) में आता है कि जानश्रुति काफी सामान – गौएं, रथ आदि – रैक्व को देने को तैयार है ताकि वह गुरु उसे अपना शिष्य बना ले और उसे ज्ञान दे. फिर भी वह उसे शिष्य बनाने को तैयार नहीं होता. परंतु जब वह अपनी युवा बेटी उसे पत्नी के तौर पर पेश करता है और कहता है- जायायं (मैं यह अपनी बेटी आप के लिए पत्नी के तौर पर लाया हूं), तब गुरु रैक्व कहता है-

शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति.

(अरे शूद्र, इस कन्या के मुख के कारण मैं तुझे ज्ञान देता हूं) अर्थात कन्या का मुख देखते ही ‘गुरुजी’ ज्ञान बघारने को तत्पर हो गए. दूसरे शब्दों में, गुरुजी भावी शिष्य से उस की बेटी दक्षिणा के तौर पर अग्रिम लेते हैं, तब कहीं जा कर ज्ञान देते हैं.

क्या यह गुरुशिष्य संबंध पितापुत्र सा आदर्श संबंध है, जैसा अकसर प्रचार किया जाता है? क्या कोई पिता अपने पुत्र की पत्नी या बेटी इस तरह ग्रहण करता है?

गुरुगीता शिष्य को अपनी पत्नी गुरु को अर्पण करने का आदेश देती है जबकि उपनिषद के मुताबिक, शिष्य अपनी बेटी गुरु की भेंट चढ़ाता है. आखिर, ये सब क्या है?

गुरुपत्नियों से संबंध

गुरुपत्नियां भी यौनशोषण किया करती थीं. हर धर्मशास्त्र में, हर स्मृति में, गुरुपत्नी से संबंध बनाने वाले शिष्य की चर्चा है, कभी उसे गुरुपत्नीगामी कहा गया है तो कहीं गुरुतल्पगामी आदि.

हर स्मृति में ऐसे शिष्य को ही दोषी ठहराया गया है और उसे सख्त से सख्त दंड का भागी बनाया गया है, परंतु कहीं भी उस से गुरु की पत्नी को न दोषी कहा गया है और न उस के लिए किसी दंड का विधान किया गया है.

मनुस्मृति में इस विषय में कई वैकल्पिक विधान किए गए हैं. यदि शिष्य गुरुपत्नी से संबंध बनाए तो उस के लिए विधान है कि उसे लोहे की तपाई हुई शय्या पर लिटाया जाए तथा वह स्त्री की लोहे की बनी व आग में लाल की हुई मूर्ति का उसी तरह आलिंगन करे जैसे उस ने गुरुपत्नी से किया था. उस मूर्ति से तब तक उसे चिपटा कर रखे जब तक कि वह मर न जाए :

गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये.

सूर्मी ज्वलन्ती स्वाश्लिष्येन्मृत्युना

स विशुद्ध्यति.

(मनुमृति, 11/103).

इस तरह के बर्बर दंडविधान केवल शिष्य के लिए हैं, न कि उस के साथ सहयोग करने वाली गुरुपत्नी के लिए. यदि बलपूर्वक शिष्य ने यह करतूत की होती तो मनुस्मृति वैसा लिख सकती थी, जैसा अन्य कई मामलों में उस ने लिखा है. बलात्कार इस तरह के मामलों में वैसे भी एकदम असंभव व अकल्पनीय था. यह सबकुछ आपसी रजामंदी से या लुभाफुसला कर ही किया जाता था. स्पष्ट है, ये सब काम गुरुपत्नी ही कर सकती थी, अल्पायु व अबोध शिष्य नहीं कर सकता था.

यदि यह कहा जाए कि कुछ शिष्य भी गुरुपत्नियों को फुसला कर या बलपूर्वक उन से शारीरिक संबंध बना लेते थे तो यह भी प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा के माथे पर कलंक ही है.

उस की कथित महानता के बावजूद यदि यह सब होता था तो वह परंपरा आज आदर्श कैसे हो सकती है? क्या गुरुओं, संस्कृति, धर्म, शिक्षा आदि के यही संस्कार थे? यदि वे संस्कार इस तरह की गिरावट भी नहीं रोक सके तो कैसी महानता?

विद्या मुक्ति दिलाती है

प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा के पक्षधर कहते हैं कि प्राचीनकाल की विद्या का लक्ष्य बहुत महान था. ‘सा विद्या या विमुक्तये’

अर्थात विद्या वह होती है जो मुक्ति दिलाए. प्राचीनकाल की विद्या का उद्देश्य आजकल की तरह रोजगार के योग्य बनाना नहीं, बल्कि जन्ममरण के बंधन से मुक्त करना था.

जन्ममरण के इन बंधनों से मुक्त होने की उन्हीं की डींगें कुछ सार्थक हो सकती हैं जिन्होंने दुनियावी बंधनों व विदेशी हमलावरों की गुलामी से अपने को कभी मुक्त रहने या होने में रुचि दिखाई हो. जो लोग हजारों सालों तक कभी इस मुट्ठीभर गिरोह के गुलाम बने रहे तो कभी उस गिरोह के, उन की विद्या उन्हें इन सब से मुक्त क्यों नहीं करवा सकी? इहलोक में इस विद्या ने किस को मुक्त करवाया है? जो विद्या इस लोक में गुलामी से मुक्त नहीं करवा सकी, वह कथित परलोक में किसे और कैसे मुक्त करवाएगी? क्या है कोई प्रमाण ग्रंथों में या किसी के पास कि इस विद्या ने ‘इस’ को मुक्त करवाया है, इस ने ‘उस’ को मुक्त करवाया है?

जो विद्या कुषाणों, शकों, हूणों, तुर्कों, मुगलों, पुर्तगालियों, अंगरेजों आदि से हमें मुक्त न रख सकी, वह विद्या कब और किसे तथा कहां व कैसे मुक्त करती थी या करती है?

हमारी विद्या विमुक्ति के लिए नहीं, पराजय के लिए रही, इस से हम विमुक्त नहीं, विजित हुए:

सा विद्या या विजिताय

(हमारी विद्या हमारे हारते रहने का कारण सिद्ध हुई) अर्थात हमारी विद्या है- हारे को हरिनाम.

रोजगार बनाम भीख

जो लोग प्राचीन विद्या को रोजगार के पीछे न दौड़ने वाली बता कर उस की महानता सिद्ध करना चाहते हैं, हमारा उन से कहना है कि यदि प्राचीन भारत की विद्या रोजगार की उपेक्षा न करती तो अपने यहां न शिष्य भीख मांग कर खाता, न गुरु. वह विद्या विमुक्ति क्या दिलाती जो दूसरों के आगे हाथ फैलाना सिखाती थी?

भीख मांगना रोजगार न होने के कारण इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया गया कि मनुस्मृति ने यहां तक कह दिया कि जो ब्रह्मचारी (=विद्यार्थी) निरोग रहते हुए भीख नहीं मांगता वह अवकीर्णिव्रत करे.

अवकीर्णिव्रत में क्या होता है? इस में काने गधे की चरबी से चौरास्ते पर हवन करना होता है.

जैसे शिष्य भीख पर पलता था वैसे ही गुरु. शिष्य भीख मांग कर लाता और माल गुरु के आगे रख देता था तथा बाद में खुद खाता था-

जो पेटपूजा के लिए रोटी नहीं कमा सकता, जो भूख लगने पर हरेक के आगे हाथ फैलाता है, वह विमुक्ति के प्रति कितना गंभीर हो सकता है.

मांग कर खाने वालों, परोपजीवी लोगों को न आत्मसम्मान की चिंता होती है न मानवीय गरिमा की. वे तो मानो परतंत्र, पराधीन और गुलाम बनने के लिए अभिशप्त होते हैं. यही कारण है कि हम सब डींगों के बावजूद हजारों वर्षों तक विजित बने रहे, विमुक्ति तो हम ने बहुत लंबी व निरंतर गुलामी के बाद 1947 में प्राप्त की, वह भी अपनी विद्या के बल पर नहीं, बल्कि आधुनिक जगत में सीखी विद्या के बल पर.

ऐसे में न गुरुशिष्य परंपरा की फिर से स्थापना वांछनीय है, न कथित परलोक में कथिततौर पर विमुक्त करने वाली विद्या ही अपनाने योग्य है, क्योंकि उस से रोजगार की जगह भीख ही पल्ले पड़ती है.

आधुनिक शिक्षा मानवीय समानता पर आधारित है. यह अनेकता में एकता स्थापित करने के उद्देश्य से प्रेरित है.   परंतु प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा वाली विद्या, एकता में अनेकता पैदा करती है तथा संगठन को विघटन में परिणत करती है.

जनेऊ : जातिभेद का नागपाश

प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा में विद्या की शुरुआत उपनयन (जनेऊ) संस्कार से होती है-

उपनीय गुरु: शिष्यं शिक्षयेत्.

(मनुस्मृति, 2/69)

अर्थात, गुरु शिष्य का उपनयन संस्कार कर के उसे शिक्षा दे.

उपनयन संस्कार की शुरुआत ही असमानता, भेदभाव और विघटन से ग्रस्त है, क्योंकि हर बच्चे के उपनयन का समय उस की जाति के अनुसार निर्धारित किया जाता है. ब्राह्मण के बालक का गर्भ से 8वें, क्षत्रिय के बालक का गर्भ से 11वें और वैश्य के बालक का गर्भ से 12वें वर्ष में उपनयन करने का विधान है:

जाति के अनुसार हर बालक के जनेऊ (यज्ञोपवीत) की सामग्री भी एकदूसरे से भिन्न होनी चाहिए.

ब्राह्मण के बालक का जनेऊ कपास से बने सूत का होना चाहिए, क्षत्रिय के बालक का यज्ञोपवीत सन की रस्सी का बना हो तथा वैश्य के बालक का यज्ञोपवीत ऊन (भेड़ के बालों) का बना हो.

कार्पासमुपवीतं स्याद् विप्रस्य,

शणसूत्रमयं राज्ञो, वैश्यस्याविजसौत्रिकम्.

(मनु., 2/44)

यानी जनेऊ की सामग्री भी जन्म पर आधारित जाति के भेदभाव की परिचायक होनी चाहिए ताकि बिना बोले ही वह सामग्री हरेक को ऊंचनीच, भिन्नतावाद और विघटन सिखा व बता दे.

शूद्र के लिए शिक्षा वर्जित

ऊपर हम ने देखा है कि उपनयन संस्कार अर्थात विद्या आरंभ संस्कार केवल 3 जातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के बालकों का होता था. बहुसंख्यक शूद्र जाति के बालकों के उपनयन अर्थात विद्या आरंभ का कहीं कोई विधान उपलब्ध नहीं होता. इस का मतलब स्पष्ट है कि प्राचीन शिक्षा पद्धति और गुरुशिष्य परंपरा के अनुसार शूद्र के लिए विद्या (पढ़नालिखना) वर्जित थी. अछूतों यानी आज के दलितों के लिए तो शिक्षा के पास फटकने की अनुमति भी न थी.

स्वामी दयानंद की अदया

स्वामी दयानंद सरस्वती का कहना है कि मूर्ख को शूद्र कहते हैं. जो पढ़लिख नहीं सकता था, वह शूद्र कहलाता था.

यह सरासर गलतबयानी है. ऐसा नहीं था कि वह पढ़लिख नहीं सकता था, वह अयोग्य था और मूर्ख था, वह शूद्र था, बल्कि वास्तविकता यह थी कि शूद्र को पढ़ने ही नहीं दिया जाता था, उसे अनपढ़ रखा जाता था और जानबूझ कर उसे मूर्ख बनाया जाता था.

जब शूद्र के विद्या आरंभ करने का कोई अवसर ही नहीं है, उस का उपनयन संस्कार ही नहीं है, किसी गुरु के पास उस के जाने का कोई विधान ही नहीं है और उसे पढ़ने दिया ही नहीं जाता, तब स्वामीजी ने उसे किस आधार पर ‘पढ़लिख सकने के अयोग्य’ घोषित कर दिया?

स्पष्ट है कि प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा और शिक्षापद्धति केवल 3 जातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के बालकों को पढ़नेलिखने का अधिकार देती है और उन में भी परस्पर जातिगत भेद को हर कदम पर गहरा करती है.

इस तरह प्राचीन शिक्षापद्धति न केवल जातिगत भेदभाव को हवा देती है, बल्कि बहुसंख्यक शूद्र व दलित जातियों के लिए विद्या को वर्जित भी घोषित करती है.

इतना ही नहीं, यह गुरुशिष्य परंपरा का कहना है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातियों की लड़कियों का उपनयन संस्कार नहीं होना चाहिए, उन को विद्या देने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सवर्ण लड़कियों का विवाह ही उन का विद्या आरंभ संस्कार है, पति की सेवा करना ही गुरुकुल में वास अर्थात विद्याध्ययन है तथा घरबार का कामकाज ही अग्निहोत्र आदि कर्म है.

संक्षेप में, न बहुसंख्यक शूद्रों (स्त्री-पुरुष दोनों) को पढ़ने का अधिकार है, न सवर्ण या असवर्ण लड़कियों को. यह है महान गुरुशिष्य परंपरा और प्राचीन शिक्षा पद्धति.

इस परंपरा के ‘गुरुगीता’ जैसे ग्रंथ ज्ञानियों को नहीं, शोषितों को पैदा करते हैं और गुरुओं के नाम पर शिष्यों की पत्नियां हथियाने  वालों को उकसाते हैं. यदि यह शिक्षा है तो अशिक्षा किसे कहते हैं? यदि यह ज्ञान है तो अज्ञान किसे कहते हैं और यदि इस तरह के लोग गुरु होते हैं तो गुरुकंटाल किन्हें कहते हैं?

मोटा पैसा बना रहे कोचिंग सैंटर

देश में बढ़ती बेरोजगारी ने मातापिता को अपने बच्चों के कैरियर के प्रति सचेत कर दिया है. यही वजह है कि आज हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं.

अपनी जिंदगीभर की खूनपसीने की कमाई से वे अपने बच्चों को अच्छे कोचिंग सैंटरों में दाखिला दिला कर आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करा रहे हैं.

देश में इलाहाबाद, दिल्ली, कोटा जैसे शहरों के अलावा मध्य प्रदेश के भोपाल, जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर और छत्तीसगढ़ के रायपुर, भिलाई जैसे बड़े शहरों में पीएससी, यूपीएससी, बैंक, रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही साथ आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की कोचिंग देने वाले दर्जनों बड़े सैंटर हैं जो छात्रों व बेरोजगारों से मोटी फीस ले कर अपना कारोबार चमका रहे हैं.

इस के अलावा जिला और तहसील लैवल पर भी संविदा शिक्षक और पटवारी परीक्षा की तैयारी के लिए कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग सैंटर खुल गए हैं जो नौजवानों की जेब ढीली कर मोटा पैसा बनाने का काम कर रहे हैं.

बताया जाता है कि कैसे तथाकथित कोचिंग सैंटरों में उन लोगों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है जो खुद कभी किसी परीक्षा में पास नहीं हुए.

सरकारी नौकरी के साथसाथ मैडिकल और इंजीनियरिंग में अच्छी रैंक पाने को बेताब हजारों नौजवान मजबूरन इन कोचिंग सैंटरों में जा कर परीक्षा की तैयारी करने में जुटे हुए हैं.

सपने बिकते हैं कोटा में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से 3 साल पहले शिक्षा नीति में बदलाव लाने की बात कही थी पर 3 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी शिक्षा नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

देश के पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए कैरियर गाइडैंस के लिए सरकारी कोशिशों का नतीजा सिफर ही रहा है. निजी क्षेत्रों ने इस का फायदा उठा कर कोचिंग के नाम पर बड़ेबड़े सैंटर खोल कर अपना धंधा जमा लिया है.

राजस्थान का कोटा शहर सपने बेचने वालों का शहर बन गया है. सौ से ज्यादा कोचिंग सैंटर यहां इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना बेचते हैं.

कोटा में देशभर के तकरीबन एक लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ाई के अलावा बच्चों के रहनेखाने तक का खर्च हर साल 2 लाख रुपए से ज्यादा होता है.

इन कोचिंग सैंटरों से कोटा के रियल ऐस्टेट कारोबार ने भी पंख लगा कर ऊंची उड़ान भरी है. पूरे कोटा में होस्टलों की तादाद भी 500 से कम नहीं है. इस के अलावा बड़ी तादाद में छात्र पेइंग गैस्ट बन कर भी रह रहे हैं.

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मैडिकल और आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा में बने इन कोचिंग सैंटरों का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है. यही वजह है कि देशभर के मातापिता अपने बच्चों को 8वीं क्लास के बाद ही कोटा में कोचिंग के लिए भेजने लगे हैं.

दिल्ली भी कम नहीं

यूपीएससी, पीएससी की तैयारी के लिए इलाहाबाद, मेरठ के अलावा देश की राजधानी नई दिल्ली में भी कई सारे कोचिंग सैंटर हैं, जो होनहार नौजवानों को कलक्टर बनाने का सपना दिखाते हैं.

छोटेछोटे कमरों में चलने वाले इन कोचिंग सैंटरों में भी 2 लाख रुपए की मोटी फीस में 9 महीने के क्रैश कोर्स के जरीए आईएएस परीक्षा की तैयारी कराने का दावा किया जाता है.

दिल्ली में रह कर आईएएस की तैयारी कर रहे मध्य प्रदेश के एक छात्र सिद्धार्थ दुबे कहते हैं कि दिल्ली में 100 वर्गफुट का एक कमरा 8,000 से 10,000 रुपए तक मासिक किराए पर मिलता है. कोचिंग सैंटरों की फीस और महंगा किराया गरीब तबके के होनहार छात्रों के लिए टेढी खीर साबित होता है.

इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ने वाले छात्र यह बात मानते हैं कि अकेले कोचिंग सैंटर के दम पर कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा पास नहीं कर सकता जब तक कि वह खुद मेहनत न करे.

आज कोचिंग सैंटरों में जाना छात्रों की मजबूरी हो गई है, क्योंकि देशभर के कोनेकोने से आए और छात्रों के संपर्क में रहने से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए मनमुताबिक माहौल मिल जाता है.

शासनप्रशासन और कारपोरेट की तिकड़ी मिल कर देश में लागू वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली को जानबूझ कर बदलना नहीं चाहती है. ऐसे में मजबूर हो कर छात्रों को कोचिंग सैंटरों के जाल में उलझना पड़ता है.

पैसे लेकर फर्जीवाड़ा

2 दिसंबर, 2017 को कर्मचारी चयन बोर्ड एसएससी की परीक्षा में मेरठ के डीएवी स्कूल में मोबाइल फोन के साथ पकड़े गए बागपत के रहने वाले सौरभ धामा ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले राज खोले.

उस ने बताया कि मेरठ में एक कोचिंग के संचालक पंकज धामा ने उसे एसएससी की परीक्षा पास कराने के बदले मोटी रकम मांगी थी. सौरभ ने खुद और अपने भाई की नौकरी के लिए अपनी पुश्तैनी 7 बीघा जमीन भी गिरवी रख दी थी, जिस के बाद पंकज ने उसे पेपर के साथ आंसरशीट भी मुहैया करा दी थी.

नकल करते पकड़े गए अभ्यर्थी ने बताया कि मेरठ में कोचिंग सैंटर चलाने वाला पंकज धामा अब तक कई नौजवानों से मोटी रकम ले कर नौकरी लगा चुका है. इस परीक्षा में कई ऐसे अभ्यर्थी भी हैं जो पंकज के संपर्क में थे.

मेरठ की यह घटना बताती है कि कोचिंग सैंटर मोटी रकम ले कर देश की परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ कर के काबिल बेरोजगार नौजवानों का हक भी मारते हैं.

कोटा, दिल्ली, भोपाल और इंदौर के कोचिंग सैंटर तो आईआईटी और मैडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग लेने वाले छात्रों को 10वीं और 12वीं क्लास की परीक्षा में नियमित परीक्षार्थियों के रूप में शामिल कराने का काम भी करते हैं.

बताया जाता है कि ये कोचिंग सैंटर अपने यहां दर्ज बच्चों को उसी शहर के निजी स्कूलों से सांठगांठ कर उन को उन स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं. निजी स्कूल इन छात्रों की हाजिरी लगाते रहते हैं जबकि ये छात्र उन स्कूलों में कभी पढ़ने जाते ही नहीं हैं.

कोचिंग और सरकार

वर्तमान समय में जब नौजवान तबका अपने कैरियर के लिए मोटी रकम खर्च कर कोचिंग सैंटरों में जाने को मजबूर है तो सरकार क्यों इस दिशा में कोशिश नहीं करती? हर स्कूल, कालेज में कैरियर गाइडैंस देने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जाए, क्योंकि उचित मार्गदर्शन की कमी में स्कूल में पढ़ रहे छात्र को हायर सैकेंडरी पास करने के बाद कौनकौन से अवसर उपलब्ध हैं, इस की जानकारी भी नहीं रहती है.

कालेज के उबाऊ सिलेबस से हट कर क्यों न उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराई जाए, जिस से ये नौजवान किसी कोचिंग सैंटर के मकड़जाल में न फंस कर अपने कैरियर को बना सकें? आखिर कब तक सरकारी तंत्र निजी संस्थानों के हाथों की कठपुतली बना रहेगा?

देश में विकासखंड लैवल पर शुरू हुए कौशल विकास केंद्रों में अच्छी तादाद में प्रशिक्षक और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें मजबूत बनाने की कोशिश की जाए तो शायद बेरोजगारों का भविष्य संवर सके.

छोटे होटलों पर गाज

लखनऊ में 6 जुलाई को जिलाधिकारी के निर्देश पर सिटी मजिस्ट्रेट ने चारबाग इलाके में कई ऐसे होटलों को बंद कर दिया जिन्हें सरकारी भाषा में अवैध कहा जाता है. लोगों का व्यापार तो ठप हुआ ही बीसियों लोग जिन का सामान कमरों में था रह गया और बाकी को अपना सामान उठा कर दूसरे होटल ढूंढ़ने पड़े.

इन होटलों से किसी को शिकायत न थी. यहां कोई ऐसा काम नहीं हो रहा था जिस से किसी को परेशानी हो रही हो. सरकारी बहाने थे कि फायर नो ओब्जैक्शन सर्टिफिकेट नहीं लिया गया, जीने संकरे थे, गलियां तंग थीं, ग्राहकों की ऐंट्री अच्छी नहीं थी.

इस तरह के छापे देशभर में पड़ते रहते हैं और सरकार अपनी पीठ थपथपाती रहती है कि उस ने महान काम किया. असल में यह कोरा जनविरोधी काम है और इस के पीछे रिश्वतखोरी को बढ़ावा देने की नीयत है. सरकार ने हर तरह के काम पर बीसियों कानून बना रखे हैं, तरहतरह की इजाजतें लेनी होती हैं. सरकारी दफ्तरों में बैठे बाबू इंजीनियर भी बन जाते हैं, इकोनौमिस्ट भी, फायर फाइटर भी और समाज के ठेकेदार भी. कानून ने प्रमाणपत्र देने के नाम पर अंधेरगर्दी मचा रखी है.

छोटे होटलों की जरूरत बहुत सख्त है. जो लोग खुद 3000 रुपए महीने के कमरे में रहते हैं, वे दूसरे शहर में जाने पर क्या सारी अनुमतियों वाले होटल में जाने लायक पैसे दे सकते हैं? वे घर जैसा वातावरण पा कर खुश हैं. वे 200 रुपए रोज का खर्च दे कर भी कसमसाते हैं.

रही बात आग से बचाव की तो किस घर के पास फायर नो ओब्जैक्शन सर्टिफिकेट है? आग तो कहीं भी लग सकती?है, फिर होटलों पर ही क्यों गाज गिरे? इसलिए कि होटल को बंद करने की, सील करने की धमकी दे कर पैसे वसूले जा सकते हैं.

जिस देश में 10 फुट×10 फुट के कमरे में 6 लोग रहते हैं, वहां होटलों को महंगा करना बेवकूफी है पर जब कानून बनता है, लागू होता है तो सरकारी नेताओं, अफसरों और बाबुओं की समाज की ठेकेदारी करने की चौगुनी नाक पैदा हो जाती है. वे समाज के हितों के ठेकेदार बन जाते हैं. वे होटल के कमरे का किराया 100 रुपए से बढ़वा कर 500 रुपए से 1000 रुपए करवा कर ही चैन से बैठते हैं क्योंकि तभी उन्हें लाख 2 लाख हर साल रिश्वत में मिलेंगे.

अफसोस यह है कि आमतौर पर जनता ही सस्तों को नंबर 2 का यानी कालाबाजारी करने वाले कहने लगती है जबकि एक तरह से वे नए शहर में आए गरीब या साधारण को कम सुविधा वाली छत देते हैं. ऐसे होटल जरूरी हैं और इन्हें अवैध कहना गलत है.

शनि के उपासक दाती महाराज पर शनि की कुदृष्टि

दिल्ली में छतरपुर स्थित शनिधाम मंदिर के संस्थापक मदनलाल मेघवाल उर्फ दाती महाराज उर्फ मदनलाल राजस्थानी एक युवती के यौनशोषण के आरोपों से घिरे

हुए हैं. टीवी चैनलों पर ‘शनि शत्रु नहीं मित्र’ का स्लोगन दे कर पिछले करीब 15 साल से ज्यादा समय से दिल्ली ही नहीं पूरे देश में अपने आभामंडल का प्रभाव फैला कर ख्याति पाने वाले दाती महाराज के खिलाफ एक युवती ने जून के पहले सप्ताह में दिल्ली के फतेहपुर बेरी पुलिस थाने में शिकायत दी. इस शिकायत का मजमून इस प्रकार था—

मदनलाल राजस्थानी ने अपने सहयोगियों श्रद्धा उर्फ नीतू, अशोक, अर्जुन आदि के साथ मिल कर 9 जनवरी, 2016 को दिल्ली स्थित आश्रम श्री शनि तीर्थ असोला फतेहपुर बेरी में मेरे साथ दुष्कर्म किया. यह तब हुआ, जब मुझे श्रद्धा उर्फ नीतू ‘चरण सेवा’ के लिए दाती मदनलाल राजस्थानी के पास ले गई. मैं चीखती रही, लेकिन किसी ने मेरी आवाज नहीं सुनी.

इस के बाद 26 से 28 मार्च, 2016 तक राजस्थान के पाली जिले में सोजत शहर स्थित आश्रम में दाती महाराज ने फिर मुझ से वही सब किया, जो दिल्ली के आश्रम में किया था. इस में अनिल और श्रद्धा ने दाती महाराज का साथ दिया. इन 3 दिनों में अनिल ने भी वही सब किया. चरण सेवा के नाम पर इन लोगों ने मेरे शरीर को जानवरों की तरह रौंदा.

इस घृणित कार्य के दौरान श्रद्धा ने कहा कि इस से तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा, यह भी सेवा ही है. तुम बाबा की हो और बाबा तुम्हारे. तुम कोई नया काम नहीं कर रही हो, सब करते आए हैं. कल हमारी बारी थी, आज तुम्हारी बारी है. कल न जाने किस की बारी होगी, बाबा समंदर है और हम सब उस की मछलियां हैं. इसे कर्ज समझ कर चुका दो.

ये 3 रातें मेरी जिंदगी की सब से भयानक रातें थीं. इन 3 रातों में मेरे साथ न जाने कितनी बार दुष्कर्म किया गया. यह सब करते हुए दाती महाराज ने एक बात कही, ‘‘तुम्हारी सेवा पूरी हुई.’’

इस घटना के बाद मेरी सोचनेसमझने की शक्ति जैसे खत्म हो गई थी. घुटघुट कर जीने से अच्छा है कि एक बार लड़ कर मरूं ताकि इस राक्षस की सच्चाई सब के सामने ला सकूं. न जाने कितनी ही लड़कियां यहां मेरी तरह बेबस और लाचार हैं.

मुझे नहीं पता कि इस शिकायत के बाद मेरा क्या होगा. शायद मैं आप लोगों के बीच न रहूं, पर मेरी पुकार आप सभी के बीच रहेगी. सिर्फ इसी उम्मीद के सहारे ये पत्र लिख रही हूं. शायद मुझे न्याय मिले और दूसरी लड़कियों की जिंदगियां बरबाद होने से बच सके. दाती महाराज को जीने का अधिकार नहीं है.

मेरी एक ही इच्छा है कि इस के कर्मों की सजा फांसी होनी चाहिए. आप से प्रार्थना है कि मेरा नाम, मेरी पहचान और मेरा पता गुप्त रखा जाए. वरना उस के द्वारा दी गई धमकियां ‘न तू रहेगी न तेरा अस्तित्व’ सच हो जाएगी. इन्हीं धमकियों की वजह से आज तक मैं चुप रही.

मुझे और मेरे परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए. अगर मुझे सुरक्षा नहीं दी गई तो यह तय है कि न मैं रहूंगी और न मेरा परिवार. सब खत्म हो जाएगा. दाती महाराज बहुत खतरनाक आदमी है. अब तक इसलिए चुप रही कि मुझे नहीं लगता था कि मेरा कोई साथ देगा लेकिन अब बरदाश्त के बाहर हो गया तो इस बारे में अपने मम्मीपापा को बताया. उन्होंने वचन दिया कि आखिरी सांस तक तुम्हारा साथ देंगे.

दाती महाराज के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा

युवती की इस शिकायत पर दिल्ली के फतेहपुर बेरी पुलिस थाने में 10 जून, 2018 को दाती महाराज उर्फ मदनलाल राजस्थानी और अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस में दुष्कर्म की धारा 376, अप्राकृतिक संबंध की धारा 377, छेड़छाड़ की धारा 354 और धमकी देने की धारा 506 लगाई गई.

पुलिस ने इस मामले में दाती महाराज के अलावा 2 महिलाओं और 2 पुरुषों को नामजद किया. इन में एक महिला श्रद्धा उर्फ नीतू और दूसरी नीमा जोशी शामिल थीं. 2 पुरुष दाती महाराज के भाई हैं.

आमतौर पर टीवी चैनलों पर छाए रहने वाले और दिल्ली के फतेहपुर बेरी स्थित शनिधाम मंदिर के संस्थापक दाती महाराज कौन हैं, यह जानने के लिए हमें राजस्थान से शुरुआत करनी होगी.

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दाती महाराज का असली नाम मदनलाल मेघवाल है. मदनलाल का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिले के आलावास गांव में हुआ था. उस के पिता देवाराम मेघवाल ढोलक बजाने का काम करते थे. मदनलाल के जन्म के कुछ महीने बाद ही उस की मां का निधन हो गया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. इस के बाद गांव के एक आदमी के साथ मदनलाल दिल्ली आ गया था.

दिल्ली में उस ने कई दिनों तक दिहाड़ी मजदूरी की. फिर चाय की दुकानों पर छोटामोटा काम किया. इस के बाद वह टेंट की दुकान पर काम करने लगा. अपना खुद का काम करने के लिए उस ने कैटरिंग का काम सीखा और बर्थडे एवं छोटीमोटी अन्य पार्टियों में कैटरिंग करने लगा.

1996 में मदन की मुलाकात राजस्थान के एक ज्योतिषी से हुई. उस ज्योतिषी से उस ने जन्मपत्री और कुंडली वगैरह देखना सीख ली. इस के बाद मदनलाल ने कैटरिंग का काम छोड़ कर दिल्ली की कैलाश कालोनी में ज्योतिष केंद्र खोल लिया. साथ ही उस ने अपना नाम मदनलाल से बदल कर दाती महाराज कर लिया. उस ने अपना हुलिया और चोला भी बदल लिया था.

मदनलाल ने लोगों की कमजोर नस पकड़ी और अपना ज्योतिष ज्ञान शनि ग्रह के आसपास कें्रदित रखा. ऐसा इसलिए कि धर्मभीरु लोग सब से ज्यादा शनि से ही घबराते हैं. दाती महाराज लोगों की जन्मपत्री देख कर शनि की चाल का खौफ दिखाने लगा. साथ ही शनि के खौफ से बचने के ऐसे उपाय भी बताने लगा, जिस से उसे लाभ हो.

सन 1998 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने थे. इस दौरान एक नेता की जन्मपत्री देख कर दाती ने कह दिया कि वह चुनाव जीत जाएगा. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि वह नेता चुनाव जीत गया. इस खुशी में उस नेता ने फतेहपुर बेरी के अपने पुश्तैनी मंदिर का काम दाती मदनलाल को सौंप दिया.

बस फिर क्या था दाती महाराज के सितारे चमक उठे. वह राजनीतिक और कई तरह की भविष्यवाणी करने लगा. संयोग ऐसा रहा कि उन में से कुछ भविष्यवाणियां सच हो गईं. इस से दाती महाराज चर्चा में रहने लगा और उस की पूछ बढ़ गई.

न्यूज चैनलों के माध्यम से टीवी तक पहुंचे दाती महाराज

इस बीच दाती महाराज ने फतेहपुर बेरी में नेताजी द्वारा दिए गए मंदिर में शनिधाम मंदिर की स्थापना कर दी थी. मंदिर में आश्रम भी बना लिया था. साथ ही पाली के आलावास गांव से अपने 3 सौतेले भाइयों अशोक, अर्जुन और अनिल को भी दिल्ली बुला लिया था. आरोप है कि दाती ने अपने भाइयों व अन्य सहयोगियों के साथ मिल कर शनिधाम मंदिर के आसपास की जमीनों पर कब्जा कर लिया. दाती के सारे कामकाज, दिल्ली व पाली स्थित आश्रम, कालेज व अस्पताल का प्रबंधन तीनों सौतेले भाई देखते थे. वे ही रुपएपैसे का भी हिसाबकिताब रखते थे.

दाती महाराज के सितारे बुलंदी पर पहुंच गए तो उस ने टीवी चैनलों पर ‘शनि शत्रु नहीं मित्र है’ के नाम से कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू करवा दिया. साथ ही दाती ने खुद का यूट्यूब चैनल भी शुरू किया. टीवी कार्यक्रमों के जरिए दाती देश भर में मशहूर हो गया. वह शनि महाराज के नाम से ही पहचाना जाने लगा.

सांवला रंग, माथे पर तिलक, सिर पर लंबे बाल, चेहरे पर संवरी हुई काली दाढ़ी के बीच ठोढ़ी पर सफेद रंग और गले में रुद्राक्ष की माला, यही पहचान बनी दाती महाराज की. दाती महाराज केवल शनि ग्रह को शांत रखने के उपाय बताता था. दरअसल, ग्रहनक्षत्रों में केवल शनि ही ऐसा ग्रह है, जो सब से ज्यादा समय तक मानव जीवन को प्रभावित करता है.

मिली महामंडलेश्वर की उपाधि

कहा जाता है कि शनि के प्रभाव से इंसान रंक से राजा और राजा से रंक बन सकता है. दाती ने शनि ग्रह को भुनाने की कोशिश की और इसी के मद्देनजर अपने संस्थान का नाम शनिधाम रखा, जहां वह केवल शनि ग्रह पर ही चर्चा करता था.

सन 2010 में हरिद्वार में आयोजित महाकुंभ में श्री पंचायती महानिर्वाण अखाड़े की ओर से दाती महाराज को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई. इस के बाद उस ने अपना नाम श्रीश्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज रख लिया. इस से पहले दाती महाराज दिल्ली के छतरपुर इलाके के फतेहपुर बेरी में शनिधाम मंदिर का निर्माण करा चुके थे.

इस मंदिर को उस ने श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम पीठाधीश्वर नाम दिया. मंदिर में 2003 में शनिदेव की प्रतिमा स्थापित की गई. इस मंदिर में बने आश्रम में अस्पताल, गौशाला व अनाथालय भी हैं. बाद में दाती ने पाली के आलावास गांव में भी आश्रम बनवाया. इस के अलावा उन्होंने उज्जैन में भी अपने आश्रम की स्थापना की.

दुष्कर्म के मामले में जिस महिला श्रद्धा को भी आरोपी बनाया गया है, वह दिल्ली और पाली के आश्रम का कामकाज संभालती थी. ट्रस्ट में दाती महाराज के बाद दूसरे नंबर का स्थान श्रद्धा का ही था.

दाती महाराज के तमाम प्रमुख राजनेताओं और नौकरशाहों से संबंध हैं. उन्होंने कई प्रमुख नेताओं के साथ अपनी फोटो के फ्लैक्स आश्रम सहित पूरी दिल्ली में लगवा रखे थे. इन के जरिए वह अपना राजनीतिक रसूख दिखाते थे. फतेहपुर बेरी स्थित आश्रम पर शनि अमावस्या पर होने वाले कार्यक्रम में देश भर से कई प्रमुख नेता और दिग्गज हस्तियां आती थीं. बेटियों का जन्मदिन मनाने, अनाथ बेटियों की शादी करवाने और कंबल बांटने जैसे कामों से दाती महाराज ने सुर्खियां बटोरीं.

डरी हुई थी पीडि़ता

अब बात करते हैं पीडि़ता की. मूलरूप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली यह लड़की आजकल दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहती है. उस के परिवार में मातापिता, 2 बहनें और एक भाई है. दोनों बहनों की शादी हो चुकी है.

करीब 25 साल की पीडि़ता दाती महाराज के उपदेश सुनने नियमित तौर पर उन के आश्रम जाती थी. दाती के एक सहयोगी ने उस की मुलाकात दाती से कराई. इस के बाद 2007 से 2016 तक वह सेवादार के तौर पर दाती के आश्रम में रही. उस ने दाती के आश्रम के सहयोग से अजमेर से एमसीए किया था.

बाद में वह अपने परिवार के साथ रहने लगी थी. लेकिन इस बीच उस का आश्रम में आनाजाना लगा रहा. इसी दौरान फरवरी 2016 में पहली बार दिल्ली के शनि मंदिर में उस से दुष्कर्म किया गया. फिर मार्च 2016 में उसे राजस्थान के पाली ले जा कर दुष्कर्म किया गया.

पीडि़ता का कहना है कि दाती महाराज ने उसे पुलिस में शिकायत नहीं करने के लिए धमकाया था. युवती ने पुलिस को बताया कि डर के मारे वह इतने समय तक चुप रही. परिवार की बदनामी का भी डर था.

पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने पर दाती महाराज ने कहा कि उन्हें बदनाम करने की साजिश के तहत उन के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया गया है. दाती ने दावा किया कि पीडि़ता अपनी 2 अन्य बहनों के साथ आश्रम में रहती थी. वह खुद 2 साल पहले अपनी मरजी से आश्रम छोड़ने से पहले खुद शपथपत्र दे कर गई थी.

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कुछ लोगों ने इस लड़की और उस के पिता को प्रलोभन दिया, जिस से ये लोग मुझ पर आरोप लगाने को तैयार हो गए. दाती का कहना था कि 2015 में अभिषेक नाम का आदमी शनिधाम में आता था.

उस ने सेवादारों से मेलमिलाप बढ़ाया. इस में कई लोग शामिल थे, इन्होंने पैसे का लेनदेन किया. विवाद होने पर अभिषेक ने उन्हें बताया कि उस ने सारा पैसा दाती महाराज को दिया है. दाती ने कहा कि अभिषेक ने उन्हें कोई पैसा नहीं दिया. इस के बाद उन लोगों ने यह साजिश रची.

पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने पर दाती महाराज गायब हो गए. वह बिना किसी को बताए दिल्ली छोड़ कर राजस्थान के पाली स्थित अपने आश्रम में चले गए.

आश्रम में पुलिस की काररवाई

इस के दूसरे दिन 11 जून को पीडि़ता ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल से मुलाकात कर अपनी आपबीती सुनाई. पीडि़ता से मुलाकात के बाद स्वाति ने ट्वीट कर कहा कि पीडि़ता गहरे सदमे में है. साथ ही उस की जान को खतरा भी है. इसलिए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर तत्काल उसे सुरक्षा मुहैया कराने और दाती महाराज को गिरफ्तार करने को कहा गया है. पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में पीडि़ता की मैडिकल जांच कराई.

पुलिस ने 12 जून को पीडि़ता के साकेत कोर्ट में धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराए. इस में पीडि़ता ने बताया कि 9 फरवरी, 2016 को दाती की सेवादार श्रद्धा उसे असोला स्थित शनिधाम आश्रम में चरण सेवा के लिए दाती के पास ले गई. मुझे गुफानुमा अंधेरे कमरे में सफेद रंग के कपड़े पहना कर भेजा गया. वहां दाती ने कहा, ‘मैं तुम्हारा प्रभु हूं. इधरउधर क्यों भटकना. मैं सब वासना खत्म कर दूंगा.’

फिर दाती व उस के सहयोगियों ने मेरे साथ दुष्कर्म किया. मार्च में पाली में यही कहानी दोहराई गई.

दाती महाराज ने 12 जून को विभिन्न समाचार चैनलों को मोबाइल से वीडियो बना कर भेजा और खुद पर लगे आरोपों को खारिज करते हुए पुलिस जांच में शामिल होने की बात कही. उन्होंने कहा कि वह फरार नहीं है.

इसी दिन पाली जिले के आलावास स्थित आश्रम की निदेशिका श्रद्धा ने दावा किया कि बाबा पाली स्थित आश्रम में हैं. फिलहाल पुलिस ने उन से कोई संपर्क नहीं किया है. जांच में पूरा सहयोग किया जाएगा.

मामला हाईप्रोफाइल होने के कारण दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने इस मामले की जांच 12 जून को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी. इसी के साथ पुलिस ने पीडि़ता और उस के परिवार को जान का खतरा देखते हुए सुरक्षा मुहैया करा दी.

दाती ने दावा किया कि वह फरार नहीं है

13 जून को दाती महाराज पाली जिले के आलावास स्थित श्री आश्वासन बालग्राम में दिन भर रहे. इस दौरान वह साधकों और मीडियाकर्मियों से मिलते रहे. मीडिया के समक्ष उन्होंने फिर दोहराया कि वह निर्दोष है. उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है.

दाती महाराज पर यौनशोषण का आरोप लगने के बाद पाली जिले में सोजत रोड पर स्थित आलावास आश्रम में रहने वाली 500 से ज्यादा बच्चियों के घरवाले वहां पहुंचने लगे. ये लोग अपनी बच्चियों की खैरखबर लेने आए थे.

14 जून को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सर्चवारंट ले कर असोला स्थित शनिधाम मंदिर पर छापा मारा. इस दौरान पीडि़ता भी पुलिस दल के साथ मौजूद रही. पुलिस ने पीडि़ता के साथ उस जगह की पहचान की, जहां उस से दुष्कर्म किया गया था. सर्च अभियान के दौरान क्राइम ब्रांच टीम ने मंदिर में सेवादारों सहित अन्य लोगों से पूछताछ की और सबूत जुटाए. पुलिस ने कहा कि बाबा की गिरफ्तारी को ले कर कोई जल्दबाजी नहीं है. पहली कोशिश पर्याप्त सबूत जुटाने की है, ताकि बाद में अदालत में केस कमजोर न पड़े.

दुष्कर्म के आरोपों में फंसने पर दाती के विदेश भागने की आशंका को देखते हुए 14 जून को दिल्ली पुलिस ने दाती का लुकआउट नोटिस जारी कर दिया. साथ ही सभी हवाईअड्डों को दाती के मामले की सूचना दे दी गई. एयरपोर्ट अथौरिटी से कहा गया कि दाती विदेश जाते हैं तो पहले दिल्ली पुलिस को सूचना दी जाए.

इस बीच दाती महाराज ने आलावास आश्रम से ही मीडिया से कहा कि वह 18 जून, 2018 को दिल्ली पुलिस के सामने पेश होंगे. उन्होंने कहा कि उन्हें 18 जून तक का समय दिया जाए ताकि वह गुरुकुल में रहने वाली बच्चियों के लिए आवश्यक व्यवस्था कर सकें. दूसरी ओर, दिल्ली महिला आयोग ने दाती की गिरफ्तारी न होने पर नाराजगी जताते हुए दिल्ली पुलिस को नोटिस दे कर जवाब मांगा.

दिल्ली के असोला स्थित शनिधाम मंदिर में क्राइम ब्रांच का सर्च अभियान 15 जून को भी चला. इस दौरान पुलिस ने कई सबूत जुटाए. मौके से डीवीआर हार्डडिस्क, पैनड्राइव आदि जब्त किए. मंदिर की तलाशी के दौरान क्राइम ब्रांच की टीम के साथ पीडि़ता भी रही, उस ने मंदिर में बने आश्रम के वे 2 कमरे पुलिस को दिखाए, जिन में उस से दुष्कर्म किया गया था.

दिल्ली के आश्रम की तलाशी का काम पूरा होने के बाद 15 जून को ही क्राइम ब्रांच की एक टीम पीडि़ता को साथ ले कर पाली के लिए रवाना हो गई. इसी के साथ दिल्ली पुलिस ने दाती महाराज को नोटिस जारी कर के पूछताछ के लिए 16 जून को दिल्ली तलब किया. हालांकि पुलिस के नोटिस पर दाती ने जांच में शामिल होने के लिए 18 जून तक का समय मांगा.

16 जून को क्राइम ब्रांच की टीम जब पाली जिले के आलावास स्थित उन के आश्रम में पहुंची तो इस से पहले ही वह वहां से फरार हो गए. उन के साथ आश्रम की संचालिका श्रद्धा और अन्य सहयोगी भी भाग गए. दाती ने अपना मोबाइल भी स्विच्ड औफ कर लिया. दूसरी ओर दिल्ली स्थित आश्रम से बाबा के भाई भी भूमिगत हो गए.

एसीपी जसवीर मलिक के नेतृत्व में पहुंची क्राइम ब्रांच टीम ने आलावास आश्रम में 3 घंटे तक जांचपड़ताल की. इस दौरान पीडि़ता भी पुलिस टीम के साथ रही. पीडि़ता ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उन 6 कमरों की तसदीक कराई, जहां उस के साथ यौनाचार हुआ था.

पुलिस टीम ने आश्रम से कई सबूत जुटाए. जांच काररवाई की वीडियोग्राफी भी कराई गई. पुलिस ने आश्रम के सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले और उन की डीवीआर व हार्डडिस्क जब्त कर ली. कई रजिस्टर व दस्तावेज भी जब्त किए गए.

इस दौरान आश्रम के उपमुख्य संचालक सहित करीब 20 सेवादारों से पूछताछ कर उन के बयान लिए गए. पीडि़ता के साथ रही बालिकाओं व युवतियों के भी बयान दर्ज किए गए. सर्च वारंट से ली गई आश्रम की तलाशी के दौरान वहां पुलिस बल तैनात रहा.

पुलिस टीम को आलावास आश्रम में उस समय हैरानी हुई, जब वहां लगभग 100 बालिकाएं ही मिलीं. अधिकांश कमरे खाली मिले, जबकि दाती कई दिनों से दावा कर रहे थे कि इस आश्रम में 700 से अधिक बालिकाएं हैं.

पुलिस को संदेह है कि आश्रम में रहने वाली बालिकाओं को दाती ने जबरन घर या अन्यत्र भेज दिया, क्योंकि दाती को डर था कि क्राइम ब्रांच की टीम बालिकाओं के बयान लेगी और उन से पूछताछ करेगी तो उस की पोल खुल सकती है. दिल्ली पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है क्योंकि आश्रम में दाती की बिना अनुमति कोई आजा नहीं सकता था.

16 जून को क्राइम ब्रांच टीम दिल्ली में दाती महाराज का इंतजार करती रही लेकिन वह नहीं पहुंचे. दाती ने पुलिस से 18 जून तक का समय पहले ही मांग लिया था. दाती के पाली आश्रम में भी नहीं मिलने पर पुलिस ने नोटिस जारी कर उन से 18 जून को पेश होने को कहा.

बाबा पर दुष्कर्म का आरोप लगने के बाद पहली बार 16 जून शनिवार को दिल्ली स्थित शनिधाम मंदिर में दाती महाराज की गैरमौजूदगी में पूजा की गई. सुबह साढ़े 5 बजे होने वाली पूजा आश्रम के सेवादारों ने की. इस से पहले प्रत्येक शनिवार को होने वाली इस पूजा को दाती महाराज ही करते थे. दाती पर आरोपों के कारण इस दौरान उन के सेवादार श्रद्धालुओं पर नजर रखे हुए थे.

16 जून को पाली स्थित आश्रम से फरार हुए दाती और आश्रम संचालिका श्रद्धा 17 जून को भी पुलिस या मीडिया के सामने नहीं आए. पुलिस 17 जून को दिल्ली एवं पाली स्थित आश्रमों पर नजर रखे रही, लेकिन दाती दोनों जगह ही नहीं पहुंचे. पुलिस को उम्मीद थी कि दाती 18 जून को दिल्ली में पुलिस के सामने पेश हो जाएंगे.

इस बीच क्राइम ब्रांच को दाती के खिलाफ ठगी की कई शिकायतें मिलीं. इन में धन दोगुना करने का झांसा दे कर रकम हड़पने की शिकायत भी शामिल रही. क्राइम ब्रांच ने इन शिकायतों को भी जांच के दायरे में ले लिया.

दाती महाराज समेत पांचों आरोपी 18 जून को भी दिल्ली में क्राइम ब्रांच के समक्ष पेश नहीं हुए. दाती की ओर से उन के वकील ने क्राइम ब्रांच में पेश हो कर दाती के स्वास्थ्य कारणों का हवाला दे कर पूछताछ को पेश होने के लिए एक सप्ताह की मोहलत मांगी.

इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने कानूनविदों से सलाह कर दूसरा नोटिस जारी किया और दाती समेत सभी 5 आरोपियों को पेश होने के लिए 20 जून, 2018 तक का समय दे दिया. साथ ही यह भी कह दिया गया कि 20 जून तक हाजिर नहीं हुए तो उन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाएगा.

इस के बाद पुलिस ने जांच काररवाई तेज कर सभी आरोपियों के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. वहीं जयपुर से सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता तथा बाल अधिकार विभाग की एक टीम उपनिदेशक के नेतृत्व में पाली स्थित आश्रम पहुंची और गायब बच्चियों के बारे में जानकारी जुटाई. इस के अलावा आश्रम के पंजीयन का नवीनीकरण कई साल से नहीं होने के मामले की भी जांच की.

इस बीच, योगगुरु स्वामी रामदेव ने 18 जून को कोटा में यह कह कर इस पूरे मामले में उबाल ला दिया कि जिन साधुओं का चरित्र ठीक नहीं है, उन्हें फांसी पर लटका देना चाहिए. केवल भगवा वस्त्र पहनने से साधु नहीं बनते, उन का आचरण व चरित्र भी ठीक होना चाहिए. धर्माचार्यों को भी चाहिए कि वे ऐसे संन्यासियों की गारंटी लें.

दबाव बढ़ने पर हाजिर होना पड़ा क्राइम ब्रांच के सामने

19 जून की दोपहर दाती महाराज दिल्ली में चाणकयपुरी स्थित क्राइम ब्रांच के औफिस में हाजिर हो गए. दरअसल, दाती के अचानक हाजिर होने के पीछे की कहानी यह रही कि दिल्ली की साकेत कोर्ट ने 21 जून तक दिल्ली पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी. इस पर पुलिस ने दाती के वकील के जरिए उन पर तुरंत हाजिर होने का दबाव बनाया.

इस बीच पुलिस को पता चला कि दाती महाराज दिल्ली में ही एक पांचसितारा होटल में ठहरे हुए हैं. पुलिस के भारी दबाव के चलते दाती 3 दिनों तक भूमिगत रहने के बाद 19 जून की दोपहर अपने वकील के साथ क्राइम ब्रांच के औफिस पहुंचे.

क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने दाती से 7 घंटे तक पूछताछ कर करीब डेढ़ सौ सवाल किए. दाती के कुछ जवाबों से पुलिस अधिकारी संतुष्ट नहीं थे. बाद में उन्हें रात 10 बजे छोड़ दिया गया और 22 जून को फिर हाजिर होने के निर्देश दिए.

अब सवाल दाती की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि इस बात का है कि दाती को अपनी बेगुनाही के सबूत खुद देने होंगे. अगर दाती ने गुनाह किया है तो पुलिस गिरफ्तार भी करेगी और अदालत में मुकदमा भी चलेगा. गुनहगारों को कानून सजा देगा. यह तय है कि इस मामले से लोगों का बाबाओं से भरोसा और कम हुआ है.

देखना यह है कि खुद को निर्दोष बताने वाले दाती महाराज पर शनि की कृपा होती है या उन के सिर पर शनि की ढैय्या गिरती है?

हनीट्रैप में शामिल ‘फ्रीडम 251’ कंपनी का मालिक

करीब सवा 2 साल पहले फरवरी, 2016 में मोहित गोयल अचानक सुर्खियों में आ गया था. कारण यह था कि मोहित ने ‘फ्रीडम 251’ नाम से दुनिया का सब से सस्ता स्मार्टफोन बेचने का दावा किया था. इस के लिए उस ने जो कंपनी बनाई थी, उस का नाम था रिंगिंग बेल्स. इस स्मार्टफोन की लौंचिंग भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में की थी.

केवल 251 रुपए में स्मार्ट मोबाइल फोन देने की घोषणा से मोहित गोयल भारत के सब से अमीर उद्योगपति मुकेश अंबानी सहित दुनिया भर के बड़े उद्योगपतियों और मोबाइल फोन तथा दूरसंचार क्षेत्र की कंपनियों की नजर चढ़ गया था. इतने कम दाम में स्मार्ट मोबाइल फोन बेचने की घोषणा से मोहित गोयल और उस की कंपनी रिंगिंग बेल्स भारत के हर घर में उस समय चर्चा का विषय बन गई.

अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन दे कर 17 से 21 फरवरी, 2016 तक फ्रीडम 251 स्मार्टफोन की औनलाइन बुकिंग की घोषणा की गई. इतने सस्ते दामों पर मोबाइल लेने वालों की होड़ में लगातार बुकिंग का इतना दबाव बढ़ा कि कंपनी की वेबसाइट ही क्रश हो गई. उस समय करीब साढ़े 7 करोड़ मोबाइल फोन की बुकिंग औनलाइन हुई.

इस मोबाइल की लौंचिंग के समय कंपनी ने इस के सस्ता होने का गणित बताते हुए भले ही हरेक बुकिंगकर्ता को चरणबद्ध तरीके से फोन डिलीवर करने का वादा किया था, लेकिन कंपनी अपना यह वादा पूरा नहीं कर सकी. इस का सीधा सा कारण था कि दुनिया भर में सब से सस्ते स्मार्ट मोबाइल फोन की कीमत उस समय 2 हजार रुपए से ज्यादा पड़ती थी. ऐसे में मोहित गोयल की रिंगिंग बेल्स कंपनी कब तक और कितना घाटा उठा सकती थी. कंपनी की जमापूंजी भी कोई बहुत ज्यादा नहीं थी.

बाद में मोहित गोयल पर कई तरह के आपराधिक मामले दर्ज हुए, उसे गिरफ्तार भी किया गया. अब उसी मोहित गोयल का एक घिनौना चेहरा सामने आया है. दिल्ली पुलिस ने 10 जून को गैंगरेप की शिकार एक महिला को उस के 2 साथियों सहित हनीट्रैप में गिरफ्तार कर लिया.

इस महिला के साथ पकड़े गए उस के साथियों में रिंगिंग बेल्स कंपनी का एमडी मोहित गोयल भी शामिल था. महिला और उस के दोनों साथी गैंगरेप के मामले में आरोपियों के परिजनों से सौदेबाजी कर 30 लाख रुपए लेते हुए रंगेहाथ पकड़े गए. आरोपियों के घर वाले इस से पहले पीडि़त महिला के कहने पर उस के साथियों को एक करोड़ 10 लाख रुपए दे चुके थे.

होटल में किया गैंगरेप

गैंगरेप की इस कहानी को जाननेसमझने के लिए हमें दिल्ली से करीब 75 किलोमीटर दूर भिवाड़ी से शुरुआत करनी होगी. हरियाणा की सीमा पर स्थित राजस्थान के जिला अलवर की औद्योगिक नगरी भिवाड़ी में इसी 5 मई को पुलिस को बाईपास स्थित एक होटल में एक महिला से सामूहिक दुष्कर्म होने की सूचना मिली.

इस पर एडीशनल एसपी पुष्पेंद्र सिंह सोलंकी, डीएसपी सिद्धांत शर्मा और फूलबाग थानाप्रभारी विक्रांत शर्मा मौके पर पहुंचे. वहां पुलिस को एक युवती नशे की हालत में मिली. पुलिस ने उसी दिन देर शाम महिला को सिविल अस्पताल ले जा कर उस का मैडिकल कराया. पुलिस इस होटल से कुछ लोगों को पकड़ कर फूलबाग थाने ले गई, जहां उन से पूछताछ की गई.

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दूसरे दिन तबीयत सुधरने पर पीडि़त महिला ने पुलिस को बताया कि वह दिल्ली के जनकपुरी इलाके की रहने वाली है और इवेंट मैनेजमेंट का काम करती है. उस ने कुछ समय पहले दिल्ली के पीतमपुरा निवासी राकेश मंगल की पत्नी के जन्मदिन की पार्टी का इवेंट मैनेज किया था. इसी वजह से वह राकेश मंगल के संपर्क में थी.

घटना से कुछ दिन पहले राकेश मंगल ने उसे बताया था कि राजस्थान के अलवर में उन की एक कंपनी है. इस कंपनी में बड़ा इवेंट करना है. इस इवेंट की जिम्मेदारी संभालने के लिए राकेश ने उस महिला को राजी कर लिया.

राकेश मंगल 5 मई को महिला को अलवर स्थित अपनी कंपनी की साइट दिखाने और इवेंट के बारे में बताने के लिए कार में बैठा कर दिल्ली से अलवर के लिए ला रहा था. दिल्ली पार कर के जब गुड़गांव भी निकल गया तो मन टटोलने के लिए राकेश ने उस महिला से चायनाश्ते के बारे में पूछा.

महिला ने सुबह से भूखा होने के कारण चायनाश्ते की सहमति दे दी. इस पर राकेश मंगल ने कहा कि कुछ ही देर में भिवाड़ी आने वाला है. भिवाड़ी में कई अच्छे होटल हैं, वहां रुक कर चाय वगैरह पीएंगे.

राकेश मंगल ने भिवाड़ी में बाईपास स्थित एक होटल में चायनाश्ते के लिए गाड़ी रोक दी. इस होटल में राकेश मंगल के 4 साथी पहले से मौजूद थे. इन में राकेश के एक साथी विकास जिंदल ने होटल में पहले ही 3 कमरे बुक करा रखे थे. महिला को होटल में कमरे बुक होने का पता नहीं था.

महिला ने पुलिस को बताया कि राकेश मंगल और उस के साथियों ने कोल्डड्रिंक में नशीला पदार्थ मिला कर उसे पिला दिया, जिस से वह अचेत हो गई. इस के बाद 5 लोगों ने होटल के कमरे में उस से सामूहिक दुष्कर्म किया.

बाद में होश आने पर पीडि़त महिला ने अपनी सहेली को मोबाइल से मैसेज और लोकेशन भेज कर मदद की गुहार की. पीडि़ता की सहेली ने भिवाड़ी पुलिस से संपर्क कर मामले की जानकारी दी. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंच गई.

गिरफ्तार हुए पांचों आरोपी

भिवाड़ी पुलिस ने महिला के बयान के आधार पर फूलबाग थाने में मामला दर्ज कर लिया. पुलिस ने महिला से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में उसी दिन यानी 6 मई को पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इन में दिल्ली के पीतमपुरा निवासी राकेश मंगल, फ्रैंड्स एनक्लेव नांगलोई के विष्णु बंसल, रामपुरा लौरेंस रोड के विकास जिंदल, रोहिणी निवासी संजय गर्ग और संदीप कौशिक शामिल थे. पुलिस ने पांचों आरोपियों का भी मैडिकल कराया. ये पांचों आरोपी आपस में दोस्त और संपन्न परिवारों से थे.

पुलिस ने पांचों आरोपियों को उसी दिन अलवर ला कर मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया. मजिस्ट्रैट ने उन्हें एक दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया.

रिमांड अवधि पूरी होने पर 7 मई को पुलिस ने पांचों आरोपियों को भिवाड़ी के जुडीशियल मजिस्ट्रैट न्यायालय में पेश किया. मजिस्ट्रैट दीपिका सिंह ने पांचों आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में किशनगढ़बास उपकारागृह भेज दिया. दूसरी ओर पुलिस ने मजिस्ट्रैट के समक्ष पीडि़त महिला के धारा 164 के तहत बयान दर्ज करा दिए.

इस मामले में भिवाड़ी की फूलबाग थाना पुलिस ने आवश्यक जांचपड़ताल के बाद अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस ने चालान में पांचों आरोपियों को गैंगरेप का दोषी माना. यह मामला अब अदालत में विचाराधीन है.

देखा जाए तो इस कहानी को यहां खत्म हो जाना चाहिए था. लेकिन इस हाईप्रोफाइल मामले की कहानी का अभी केवल मध्यांतर ही हुआ है. कहानी का अगला अध्याय अब दिल्ली में शुरू होगा. अभी तक आप के जेहन में यह सवाल तेजी से घूम रहा होगा कि गैंगरेप की इस कहानी में 251 रुपए में मोबाइल देने वाली कंपनी रिंगिंग बेल्स का एमडी मोहित गोयल तो सामने ही नहीं आया? आप को सवाल का जवाब आगे की कहानी में मिलेगा.

आरोपियों से मांगे 10 करोड़

दरअसल, इस मामले में चालान पेश होने के बाद नया मोड़ आ गया. पीडि़त महिला ने गैंगरेप का मामला वापस लेने या इस मामले में सुनवाई के दौरान बयान बदलने के लिए आरोपियों से 10 करोड़ रुपए मांगे थे. बाद में बिचौलियों के माध्यम से ढाई करोड़ में सौदा तय हो गया. इस समझौते के तहत बिचौलियों के माध्यम से पीडि़त महिला को एक करोड़ 10 लाख रुपए दे दिए गए थे. यह रकम बिचौलियों ने ली थी. पीडि़त महिला इस दौरान सामने नहीं आई थी.

बाकी रकम की दूसरी किस्त के रूप में 30 लाख रुपए 10 जून को दिल्ली में नेताजी सुभाष प्लेस इलाके में एक शौपिंग मौल में देने की बात तय हुई. इस बीच गैंगरेप के एक आरोपी के भाई ने नौर्थवेस्ट दिल्ली के नेताजी सुभाष प्लेस पुलिस थाने में इस बात की शिकायत कर दी. इस के साथ ही महिला और बिचौलियों से सौदेबाजी की बातचीत की रिकौर्डिंग, वाट्सऐप मैसेज व सीसीटवी कैमरे की रिकौर्डिंग भी पुलिस को सौंप दी.

इस शिकायत पर नौर्थवेस्ट के डिप्टी पुलिस कमिश्नर असलम खान के निर्देशन में एक टीम गठित कर आरोपियों को रंगेहाथ पकड़ने की योजना बनाई गई. पुलिस की योजना के मुताबिक गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों ने इस मामले में बिचौलिए की भूमिका निभा रहे विकास मित्तल और मोहित गोयल से कहा कि दूसरी किस्त की रकम तब देंगे, जब गैंगरेप का मुकदमा दर्ज कराने वाली महिला हमें लिखित में यह शपथपत्र देगी कि गैंगरेप के लगाए गए आरोप झूठे हैं.

बिचौलियों से उस महिला को शपथपत्र लिखवाने के लिए साथ लाने की बात तय हो जाने पर डीसीपी असलम खान के नेतृत्व में पुलिस ने अपना जाल बिछा दिया. इस के तहत गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों को 30 लाख रुपए से भरा बैग ले कर 10 जून को पहले से निर्धारित शौपिंग मौल में भेज दिया गया. इस मौल के आसपास पहले से पुलिस टीम सादा कपड़ों में तैनात थी.

महिला और उस के 2 साथी हुए गिरफ्तार

कुछ देर बाद एक महिला और 2 युवक उस शौपिंग मौल के औफिस में पहुंचे. उन्होंने गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों से बात की. रेप के आरोपियों ने बैग में से रकम निकाल कर मेज पर रख दी ताकि उन्हें विश्वास हो जाए कि दूसरी किस्त का पूरा पैसा आ गया.

इसी दौरान दिल्ली पुलिस की टीम ने उस शौपिंग मौल के औफिस में छापा मारा. छापे के दौरान मेज पर नोटों की गड्डियों के ढेर पड़े मिले. वहां एक महिला और 2 युवक मौजूद थे.

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पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया. इन में वह महिला भी थी, जिस ने भिवाड़ी के फूलबाग थाने में गैंगरेप का मुकदमा दर्ज कराया था और पकड़े गए 2 युवकों में एक मोहित गोयल और दूसरा उस का रिश्तेदार विकास मित्तल था. इन में मोहित गोयल आजकल गाजियाबाद में और विकास मित्तल दिल्ली में रह रहा था.

दिल्ली पुलिस जब महिला और उस के दोनों साथियों को पकड़ कर ले जा रही थी तो गैंगरेप के आरोपियों के परिवारों की महिलाओं ने उस महिला की जम कर धुनाई कर दी. इन महिलाओं का कहना था कि यह महिला झूठा आरोप लगा कर हमारे परिवार वालों को जेल में बंद करवा चुकी है और झूठे मामले को खत्म करवाने के लिए हम से पैसे ऐंठ रही है.

बाद में थाने ले जा कर की गई पुलिस की पूछताछ में पता चला कि मोहित गोयल और विकास मित्तल गैंगरेप की पीडि़त महिला के सहयोगी थे. ये दोनों युवक महिला की ओर से भिवाड़ी में दर्ज कराए गए गैंगरेप के मामले में आरोपियों के घर वालों से सौदेबाजी की रकम लेने उस के साथ आए थे.

दिल्ली पुलिस उस समय हैरान रह गई, जब पूछताछ में यह बात सामने आई कि मोहित गोयल नाम का जो शख्स गिरफ्तार किया था, वह 251 रुपए में स्मार्ट मोबाइल फोन बेचने का दावा करने वाली कंपनी रिंगिंग बेल्स का मैनेजिंग डायरेक्टर था.

दिल्ली पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि विकास मित्तल ने एक कारोबारी से कर्ज के रूप में करोड़ों रुपए ले रखे थे. वह कारोबारी विकास पर रुपए वापस करने का दबाव बना रहा था. इसे ले कर उस का उस कारोबारी से कई बार विवाद भी हो गया था. इसे ले कर विकास परेशान था.

विकास मित्तल का पश्चिमी दिल्ली के पंजाबीबाग में रेस्तरां बार लाउंज है. इस लाउंज में बतौर इवेंट मैनेजर एक महिला काम करती थी. विकास ने इसी महिला के जरिए उस कारोबारी और उस के अन्य कारोबारी दोस्तों से हनीट्रैप के जरिए पैसा वसूलने की साजिश रची थी.

पूरी प्लानिंग से रची थी साजिश

इस के बाद विकास ने उस इवेंट मैनेजर महिला से बात की और उसे 30-40 लाख रुपए देने का वादा कर के कारोबारियों पर गैंगरेप का आरोप लगाने के लिए राजी कर लिया. विकास ने एडवांस के तौर पर इस महिला को 4 लाख रुपए भी दे दिए. मोटी रकम मिलने के लालच में महिला विकास का साथ देने को तैयार हो गई. विकास ने कारोबारियों से रकम वसूलने के लिए अपने कजन और रिंगिंग बेल्स कंपनी के एमडी मोहित गोयल को तैयार कर लिया.

विकास मित्तल और मोहित गोयल के कहने पर इवेंट मैनेजर महिला ने दिल्ली से 5 लोगों को जमीन खरीदने के लिए भिवाड़ी चलने की बात तय की. तय कार्यक्रम के मुताबिक दिल्ली निवासी राकेश मंगल, विष्णु बंसल, विकास जिंदल, संजय गर्ग और संदीप कौशिक 5 मई को भिवाड़ी पहुंच गए. ये पांचों लोग एकदूसरे को जानने के अलावा इवेंट मैनेजर महिला से भी परिचित थे.

भिवाड़ी पहुंच कर आराम करने के बहाने इन्होंने होटल में कमरे किराए पर ले लिए. होटल में पांचों ने मौजमस्ती की. इस के बाद महिला ने उन पांचों पर गैंगरेप का आरोप लगा कर भिवाड़ी के फूलबाग थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने जांचपड़ताल कर 6 मई को पांचों लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

दिल्ली पुलिस के सामने पूछताछ में जो बातें सामने आईं, उस के मुताबिक पांचों कारोबारियों की गिरफ्तारी होने पर विकास मित्तल और मोहित गोयल ने गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों से संपर्क किया और महिला को कुछ रकम दे कर शिकायत वापस लेने की बात कही.

विकास के कहने पर महिला ने आरोपियों के परिजनों से 10 करोड़ रुपए मांगे. बाद में विकास और मोहित की मध्यस्थता से ढाई करोड़ में सौदा तय हो गया. यह रकम 3 किस्तों में देने की बात तय हुई.

महिला को 4 लाख दिए थे एडवांस में

पहली किस्त के रूप में आरोपियों के घर वालों ने बिचौलियों को एक करोड़ 10 लाख रुपए दे दिए थे. यह रकम देने की कैमरे में रिकौर्डिंग भी की गई. दूसरी किस्त में 10 जून को 30 लाख रुपए देने तय थे, तभी दिल्ली पुलिस ने जाल बिछा कर कथित पीडि़त महिला और उस के सहयोगी मोहित गोयल व विकास मित्तल को रकम लेते रंगेहाथ पकड़ लिया.

महिला ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि उसे विकास मित्तल ने 4 लाख रुपए दे कर योजना में शामिल किया था. उसे यह नहीं पता था कि गैंगरेप के आरोपियों से मोहित गोयल और विकास मित्तल ने कितने रुपए वसूले हैं. उसे 10 जून को शपथपत्र पर दस्तखत करने के लिए बुलाया गया था.

दिल्ली पुलिस ने महिला और उस के दोनों सहयोगियों को 11 जून को रोहिणी कोर्ट में पेश किया, जहां ड्यूटी महानगर दंडाधिकारी सुशील कुमार ने महिला को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. बाकी 2 आरोपियों मोहित गोयल और विकास मित्तल को 2 दिन के पुलिस रिमांड पर सौंप दिया गया. रिमांड अवधि पूरी होने पर इन दोनों को भी जेल भेज दिया गया.

जांच में यह बात भी सामने आई कि दिल्ली का रेस्तरां बार लाउंज संचालक विकास मित्तल खुद को कई आईएएस अफसरों और राजनेताओं का नजदीकी बताता था. अधिकारियों और नेताओं से अपने अच्छे संबंधों के नाम पर वह गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों को धमकाता था.

दिल्ली पुलिस को आशंका है कि विकास मित्तल और मोहित गोयल हाईप्रोफाइल हनीट्रैप रैकेट चलाते हैं. पुलिस को इन के खिलाफ फोन पर धोखाधड़ी की कई शिकायतें मिली हैं. पुलिस ने ऐसे पीडि़तों से लिखित में शिकायत मांगी है. लिखित में शिकायत मिलने पर शिकायतों की जांच की जाएगी.

दूसरी ओर अलवर जिले की भिवाड़ी पुलिस का कहना है कि चूंकि इस मामले में पहले ही चालान पेश हो चुका है, इसलिए दिल्ली में पीडि़ता की गिरफ्तारी और रकम के लेनदेन का इस केस से कोई ताल्लुक नहीं है. अब मामला अदालत में है. आगे जो भी काररवाई होगी, वह अदालत के आदेश पर ही होगी.

रिंगिंग बेल्स कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित गोयल उत्तर प्रदेश के शामली शहर में गढ़ी पुख्ता के रहने वाले राजेश गोयल का बेटा है. शामली में सेंट आरसी कौन्वेंट स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह नोएडा चला आया था.

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नोएडा में उस ने एमिटी यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सितंबर 2015 में मोहित ने रिंगिंग बेल्स कंपनी की स्थापना की. उसी दौरान नोएडा की रहने वाली धारणा से मोहित की शादी हो गई.

सस्ता स्मार्टफोन देने की घोषणा के बाद टूट पड़ा मुसीबतों का पहाड़

भारत में 251 रुपए का सब से सस्ता स्मार्ट मोबाइल फोन बेचने का आइडिया मोहित का ही था. इस आइडिया को मूर्तरूप देने के काम में उस की मदद एस्ट्रोफिजिसिस्ट अशोक चड्ढा ने की. मोहित ने अपनी कंपनी रिंगिंग बेल्स में अशोक चड्ढा को प्रेसीडेंट बनाया और नोएडा में औफिस खोला.

उस समय इन लोगों ने यह कह कर भी प्रचार किया कि इतना सस्ता मोबाइल डिजिटल इंडिया अभियान का हिस्सा है. इस में सरकार भी सहयोग कर रही है. इस मोबाइल को मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया योजना का भी हिस्सा बताया गया.

बाद में मोहित गोयल की लोगों को 251 रुपए में स्मार्टफोन देने की योजना फेल हो गई. इस का सीधा सा कारण यह था कि मोबाइल की लागत बहुत ज्यादा आ रही थी और भरपाई कहीं से नहीं हो रही थी. अरबोंखरबों रुपए का घाटा सहन करने की कंपनी की क्षमता नहीं थी.

बाद में मोहित गोयल पर कई केस दर्ज हो गए. मोहित पर आरोप लगा कि उस ने मोबाइल फोन बेचने के लिए डिस्ट्रीब्यूटर बना दिए और उन से करोड़ों रुपए ले लिए. मोबाइल फोन की योजना फेल हो जाने पर डिस्ट्रीब्यूटर्स को पैसा नहीं लौटाया गया. भाजपा के ही वरिष्ठ नेता कीर्ति सोमैया ने इसे पोंजी स्कैम बताया था. रिंगिंग बेल्स के खिलाफ पुलिस में सैकड़ों शिकायतें पहुंची थीं.

पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले की जांचपड़ताल शुरू की तो कंपनी के प्रमोटर भूमिगत हो गए. इस बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने फरवरी 2017 में मोहित गोयल को गिरफ्तार कर लिया था. बाद में मोहित की जमानत 31 मई, 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट से हुई थी. इस दौरान रिंगिंग बेल्स का नोएडा औफिस बंद हो गया था.

मोहित गोयल महत्त्वाकांक्षी रहा है. इसीलिए उस ने भारत में 251 रुपए के स्मार्ट मोबाइल फोन के नाम पर एक बार तहलका मचा दिया था. अभी तो उस के खिलाफ कई जांचें चल रही हैं. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वह इस तरह के हनीट्रैप के हथकंडे अपनाएगा, यह बात किसी ने सोची भी नहीं थी.

कसौटी पर कमलनाथ

मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले छिंदवाड़ा से कोई 12 किलोमीटर दूर नागपुर रोड पर लगभग 2,000 की आबादी वाला एक गांव है शिकारपुर. गांव के बाहर सड़क पर एक तख्ती पर तीर का निशान लगा है जो बताता है कि यह रास्ता कमलकुंज की तरफ जाता है. इस तख्ती को देखते ही वाहन धीमे हो जाते हैं. बसें हों या कारें उन में मौजूद लोग झांकझांक कर देखने की कोशिश करते हैं कि कमलकुंज की भव्यता, जिस के चर्चे उन्होंने सुने हैं, यहां से दिखती है या नहीं.

लगभग 20 एकड़ रकबे से घिरा कमलकुंज मध्य प्रदेश के नए कांग्रेस अध्यक्ष 71 वर्षीय कमलनाथ का निवास है. कमलकुंज की भव्यता किसी महल से कम नहीं है, इस में आधुनिक सुखसुविधाओं और विलासिता के तमाम साधन मौजूद हैं.

कमलनाथ साल 1980 से छिंदवाड़ा से लगातार सांसद रहे हैं. अपवादस्वरूप एक बार ही वे यहां से हारे हैं. छिंदवाड़ा के वोटर्स की कांग्रेस के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनावों में पूरे मध्यउत्तर भारत में कांग्रेस ने जो इकलौती सीट जीती थी वह छिंदवाड़ा ही थी.

तब कांग्रेस और इंदिरा विरोधी लहर में जीत का परचम कमलनाथ ने नहीं, बल्कि तत्कालीन सांसद गार्गी शंकर मिश्र ने लहराया था. गार्गी शंकर मिश्र अब नहीं रहे लेकिन उन का छोड़ा यह गढ़ और मजबूत हुआ है जिस का श्रेय कमलनाथ को जाता है. 1980 के आम चुनाव में एक सांवला, दुबलापतला नौजवान कांग्रेस आलाकमान यानी इंदिरा और संजय गांधी ने यहां उम्मीदवार बना कर भेजा था, जिस का नाम था कमलनाथ.

तब छिंदवाड़ा के लोग कमलनाथ से इतना ही परिचित थे. 90 का दशक आतेआते हालत यह हो गई थी कि कमलनाथ और छिंदवाड़ा लोकसभा सीट एकदूसरे का पर्याय बन गए थे. यह सिलसिला आज भी कायम है. 2014 के लोकसभा चुनाव की मोदी लहर भी यहां कमल नहीं खिला पाई थी. यहां के लोगों ने एक लाख से भी ज्यादा वोटों से कमलनाथ को विजयी बनाया था.

1980 का चुनाव कांग्रेस के लिए चुनौती था. हालांकि तब इंदिरा लहर थी, लेकिन कांग्रेस अंदर से डर भी रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि लोग आपातकाल की ज्यादतियों को भूले न हों. लेकिन केवल 3 सालों में ही यह साबित हो गया था कि विपक्ष कभी एकजुट नहीं हो सकता और राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी का कोई विकल्प है ही नहीं.

रहस्यमय हैं कमलनाथ

नए नवेले कमलनाथ को छिंदवाड़ा के लोगों ने हाथोंहाथ लिया, जिस की एक वजह इस प्रकार का प्रचार भी था कि राजीव और संजय गांधी के बाद वे इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे हैं. इस इलाके के लोगों की नेहरूगांधी परिवार के प्रति भक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1980 से पहले भी कांग्रेस यहां से कभी हारी नहीं थी. गार्गी शंकर मिश्र 1961 से लगातार छिंदवाड़ा सीट से जीतते रहे थे.

34 साल की उम्र में पहला लोकसभा चुनाव जीते कमलनाथ दरअसल संजय गांधी के खास नजदीकी दोस्तों में से एक थे. वे दून स्कूल में संजय गांधी के सहपाठी थे. स्कूली पढ़ाई के बाद भी यह दोस्ताना टूटा नहीं. कमलनाथ भले ही कोलकाता पढ़ने चले गए पर गांधी परिवार से उन का सतत संपर्क बना रहा था.

आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी में सत्ता पाने के लिए उठापटक हो रही थी तब युवा कमलनाथ इंदिरा गांधी और दूसरे कई विपक्षी नेताओं के बीच संदेशवाहक का काम करते थे. इंदिरा गांधी का भरोसा जीतने का ही इनाम था कि छिंदवाड़ा जैसी कांग्रेसी सीट उन्हें थाल में सजा कर दे दी गई थी.

तब कमलनाथ के बारे में लोग सिर्फ इतना ही जानते थे कि वे बड़े कारोबारी हैं और बंगाली हैं, पर हकीकत में कमलनाथ उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर की पैदाइश हैं. उन के पिता महेंद्रनाथ स्वतंत्रता सेनानी भी थे. साल 1973 में कमलनाथ की शादी अलकानाथ से हुई थी. उन के 2 बेटे नकुल और बकुलनाथ उन का कारोबार संभालते हैं. इस समय नाथ परिवार लगभग 23 कंपनियों का मालिक है.

फिर धीरेधीरे पता चला कि कमलनाथ बंगाली नहीं, बल्कि पंजाबी खत्री जाति के हैं, हालांकि इस से कोई फर्क उन के रसूख और हैसियत पर नहीं पड़ा. लेकिन जैसे ही उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, मीडिया ने उन के बारे में छानबीन करनी शुरू कर दी.

इंटरनैट तक सिमटी इस छानबीन से किसी के हाथ कुछ खास नहीं लगा तो भोपाल में एक पत्रकार ने उन से पूछ लिया कि आप की जाति क्या है. इस संवेदनशील और अप्रत्याशित सवाल पर कमलनाथ घबराए नहीं, बल्कि आदतन होंठों पर उंगली रखते उन्होंने कसा हुआ जवाब दे कर उसे और रहस्यमय कर दिया कि मैं एक हिंदुस्तानी हूं.

यह हालांकि एक मुकम्मल जवाब था पर अभी भी किसी के पास इन जिज्ञासाओं के समाधान का कोई रास्ता नहीं है कि 1980 के पहले कमलनाथ क्या थे और किस जाति के हैं.

दोस्ती बनी सीढ़ी

आपातकाल से पहले कमलनाथ की कंपनी ईएमसी लिमिटेड घाटे में चलने के कारण बंद होने के कगार पर थी. कहा तो यह भी जाता है कि तब कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए कंपनी के पास पैसे भी नहीं थे. ऐसे में कमलनाथ को दून स्कूल के अपने सखा संजय गांधी की याद आई जिन की तूती देशभर में बोल रही थी. तब संजय गांधी की मरजी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिलता था.

संजय गांधी ने दोस्ती निभाई और 1975 से ले कर 1976 के बीच कमलनाथ की कंपनी को करोड़ों के ठेके दिलाए. तब ठेकों की राशि 5 करोड़ रुपये के लगभग थी. जो उस वक्त के लिहाज से भारीभरकम थी. इस एक साल में ईएमसी घाटे से उबर कर फायदे में आ गई और कमलनाथ का समय चमक गया.

हालांकि आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार ने कमलनाथ की कंपनी को ठेके देने के मामलों की जांच के लिए एक आयोग बनाया था लेकिन उस आयोग की एक ही मीटिंग हुई. कमलनाथ ने तब एक सधे कारोबारी की तरह जनता पार्टी की कलह का फायदा उठाया और इंदिरा गांधी और बीजू पटनायक, चौधरी चरण सिंह, भजनलाल, सुरेश राम व सगानलाल जैसे धाकड़ नेताओं के बीच पुल का काम किया.

ऐसे कई दिलचस्प किस्से एक बंगाली पत्रकार बरुण सेनगुप्ता की किताब ‘लास्ट डेज औफ द मोरारजी राज’ में हैं.

1980 में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो लोग सबकुछ भूल गए. संजय गांधी की दुर्घटनावश मौत के बाद भी कमलनाथ गांधी परिवार के खासमखास बने रहे. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के बाद वे सोनिया गांधी के विश्वासपात्र हो गए.

फिलहाल कमलनाथ अकूत दौलत के मालिक हैं. छिंदवाड़ा वाला महल कमलकुंज शायद उन का सब से सस्ता मकान है. दिल्ली स्थित फ्रैंड्स कालोनी के उन के बंगले की कीमत 125 करोड़ रुपए आंकी जाती है. दिल्ली में ही उन के 2 और मकान सुलतानपुर और पंचशील नगर में हैं जिन की कीमत क्रमश: 32 और 14 करोड़ रुपए है.

कमलनाथ इस मुकाम तक यों ही नहीं पहुंच गए हैं, इस के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है, हालांकि कुछ विवाद भी उन के साथ जुड़े हैं. जब वे मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें बड़ी अंतरंगता से दोस्त कहा था. उसी दौरान सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी वायरल हुई थी जिस में बताया गया था कि शिवराज सिंह की मेहरबानी कमलनाथ की कंपनियों पर भी है, इसीलिए करोड़ों के ठेके उन्हें दिए गए हैं.

इस पर कमलनाथ बौखलाए नहीं लेकिन कंपनियों के ठेके और फायदे की बात भूलते उन्होंने शिवराज सिंह चौहान को नालायक दोस्त कह डाला तो शिवराज सिंह इतने घबरा गए कि वे भोपाल के नजदीक सीहोर की आमसभा में भीड़ से पूछते नजर आए कि बताओ, क्या मैं नालायक हूं.

इसलिए लाए गए

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री को नालायक कहने की हिम्मत कोई अगर कर सकता है तो वह शख्स बिलाशक कमलनाथ हैं. यही कांग्रेस चाहती भी थी कि जैसे भी हो, शिवराज सिंह चौहान का आत्मविश्वास लड़खड़ाना चाहिए.

इस साल के आखिर में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन प्रदेश में कांग्रेस के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था जिसे पेश कर वह सत्ताविरोधी वोटों को हथिया सके. कमलनाथ को अध्यक्ष बना कर सोनिया और राहुल गांधी ने एक तीर से कई निशाने एकसाथ साधे हैं जो साबित करते हैं कि इस राज्य के मामले में पहली बार कांग्रेस आलाकमान ने कोई बुद्धिमानीभरा फैसला लिया है.

पहला तीर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लगा है, जिन के नाम से अब तक प्रदेश कांग्रेस चलती थी और हर छोटाबड़ा नेता उन का लिहाज करता था. 1993 से ले कर 2003 तक दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते लोग उन की कार्यशैली से इतने नाराज रहे कि आज भी उन के नाम से बिदकते हैं कि उन से तो भाजपा और शिवराज सिंह चौहान ही अच्छे हैं.

कांग्रेस की दिक्कत यह थी कि अगर वह किसी छोटेमोटे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाती तो उसे दिग्विजय सिंह की सरपरस्ती और इशारे पर ही काम करना पड़ता. ऐसे में मतदाताओं में संदेश यही जाता कि अगर कांग्रेस जीती तो फिर से दिग्विजय सिंह को झेलना पड़ेगा.

सीधेसीधे दिग्विजय सिंह की काट के लिए कमलनाथ को लाया गया है जिन के आने के बाद दिग्विजय सिंह ने टेढ़ामेढ़ा रास्ता छोड़ दिया है और अब कांग्रेस की एकजुटता के लिए ईमानदारी से प्रदेश में घूमते फिर रहे हैं.

कांग्रेस के पास एक बेहतर नाम गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का था, लेकिन इस नाम पर दिग्विजय सिंह तैयार नहीं थे. लिहाजा, बीच का रास्ता कमलनाथ के जरिए निकाला गया, जिन के पद संभालते ही कांग्रेस की अंदरूनी कलह थम गई है.

यह कलह, दरअसल, कांग्रेस को विरासत में मिली है. 80-90 के दशक तक कांग्रेस प्रदेश में 4 खेमों में बंटी थी, अर्जुन सिंह गुट, विद्याचरण शुक्ला गुट, माधवराव सिंधिया गुट और कमलनाथ गुट. होता यह रहा कि यह कलह और गुटबाजी तहसील स्तर तक फैली रहती थी, जिस गुट के नेता को टिकट नहीं मिलता था वह दूसरे गुट यानी अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को हरवाने में अपनी शान समझने लगा था. इस गुटबाजी से राज्य में कांग्रेस इतनी कमजोर होती गई कि आलाकमान ने मान लिया कि इधर कुछ नहीं हो सकता, लिहाजा जो चल रहा है उसे चलने दो.

माधवराव सिंधिया की मौत के बाद उन का खेमा बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संभाल लिया तो अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह को भी पिता के नाम और काम का फायदा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन कर मिला. इस गुट की असली कमान दिग्विजय सिंह के हाथ में ही रही.

कमलनाथ से पहले अध्यक्ष रहे अरुण यादव ने ईमानदारी से काम करने की कोशिश की थी, लेकिन इस गुटबाजी की बीमारी का इलाज वे नहीं ढूंढ़ पाए तो चुनाव सिर पर आते देख कमलनाथ को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई.

फिलहाल प्रदेश में माहौल भाजपा सरकार के खिलाफ है. किसान, युवा, कर्मचारी और मजदूर सभी गुस्से में हैं कि शिवराज सिंह लगातार घोषणाओं का लौलीपौप तो पकड़ा देते हैं पर उस में मिठास नहीं है और इस नीम चढ़े करेले जैसे लौलीपौप को खाने को कोई तैयार नहीं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के काफी करीबी हैं. उन्हें किन शर्तों पर मनाया गया यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन हालफिलहाल मध्य प्रदेश कांग्रेस की फुरती देखने के काबिल है जो सत्ता और शिवराज विरोधी लहर का फायदा उठाने को, मजबूरी में ही सही, एक होती दिख रही है.

कमलनाथ की कदकाठी और हैसियत के लिहाज से मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद काफी छोटा है पर एक समर्पित व वफादार सिपाही की तरह वे मध्य प्रदेश में जमे हुए हैं और शिवराज सिंह चौहान सरकार पर ताबड़तोड़ हमले

कर रहे हैं जिस से घरों में दुबका बैठा कांग्रेसी कार्यकर्ता भी बाहर निकलने लगा है. उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने के बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर लगाए होर्डिंग्स पर लिखा था, ‘ऊपर भोलेनाथ नीचे कमलनाथ.’

कंगाली से जूझती कांग्रेस को कमलनाथ से एक दूसरा बड़ा फायदा फंडिंग का भी है. कमलनाथ की उदारता कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही, न ही वे खजाने के मुहताज हैं.

मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित कांग्रेस कार्यालय के पास चाय की इकलौती गुमटी पर लगातार कार्यकर्ताओं की भीड़ बढ़ रही है. ऐसे ही एक कार्यकर्ता ने बताया कि कमलनाथ उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए पैसा और अपने गुट के लोगों को तो 2-2 करोड़ रुपए देंगे, जिस से उन्हें चुनाव लड़ने में परेशानी न हो.

भले ही यह अफवाह हो लेकिन यह जरूर तय दिख रहा है कि ‘अब की बार 200 पार’ का नारा देने वाली भाजपा का चेहरा मध्य प्रदेश को ले कर उतरा हुआ है. शायद कमलनाथ ने भी इतनी मेहनत 1980 के बाद से ले कर अब तक नहीं की होगी जितनी इन दिनों वे कर रहे हैं.

कमलनाथ के एक समर्थक सीहोर के बलवीर सिंह तोमर का कहना है कि उन की कार्यशैली अनूठी है. कमलनाथ कभी किसी को बेइज्जत करने वाली राजनीति नहीं करते. हां, इतना जरूर है कि जिसे किनारे करना होता है उसे वे नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं.

कमलनाथ जमीनी नेता हैं और इन दिनों वे छिंदवाड़ा का विकास मौडल जनता के सामने पेश कर रहे हैं. हालांकि, हर कोई जानता है कि वाकई उन के सांसद और केंद्र में मंत्री रहते छिंदवाड़ा चमचमाने लगा है और वहां के लोग कमलनाथ के कामकाज से काफी खुश हैं. 9 बार की जीत इस का सुबूत है.

अपनी सहूलियत के लिए कमलनाथ ने 4 उपाध्यक्ष और बना लिए हैं. ये चारों जमीनी नेता बाला बच्चन, रामनिवास रावत, सुरेंद्र सिंह और जीतू पटवारी लंबे समय से किसी जिम्मेदारी का इंतजार कर रहे थे.

तगड़ी है चुनौती

मध्य प्रदेश भाजपा का गढ़ है, जिसे भेद पाना आसान काम नहीं है. भाजपा का कार्यकर्ता हर बूथ पर है जबकि कांग्रेस का हर जगह नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि कमलनाथ के कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने भर से कांग्रेस सत्ता में लौट ही रही है, हुआ इतना भर है कि कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ गई हैं.

समय के बलवान कहे जाने वाले कमलनाथ यह मौका भुना पाएंगे या नहीं, इस में अभी वक्त है. लेकिन भाजपा का तिलिस्म तोड़ने को धनुष उठा चुके कमलनाथ के लिए संतोष की बात यह है कि पार्टी की अंदरूनी कलह फिलहाल थमी है या वाकई उस के कार्यकर्ताओं व नेताओं को यह एहसास होने लगा है कि इस बार चूके तो सत्ता में वापसी फिर कभी नहीं होगी.

बातबात में शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी को कोसने का कमलनाथ का टोटका कारगर साबित हो रहा है तो इस की वजह उन की बेदाग छवि और प्रदेश में बसपा से संभावित गठबंधन होना भी है. इस प्रस्तावित गठबंधन की शर्तें अभी तय नहीं हुई हैं, लेकिन कर्नाटक और हालिया उपचुनाव के नतीजों ने इन दोनों को ही क्या, बल्कि सभी दलों को समझा दिया है कि अगर सत्ता चाहिए तो उस का रास्ता भाजपाविरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने से हो कर ही जाता है.

2019 के आम चुनाव का रास्ता भी मध्य प्रदेश सहित राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव नतीजों से हो कर जाता है. ये नतीजे बताएंगे कि वोटर मोदी और राज्य सरकारों से कितना खुश और कितना नाराज है.

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