कटवा दी जिंदगी की डोर

भारतीय खुफिया एजेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो यानी आईबी के सहायक तकनीकी सूचना अधिकारी चेतन प्रकाश गलाना बीती 14 फरवरी को 2 दिन की छुट्टी पर दिल्ली से अपने घर कोटा जिले की रामगंज मंडी आए थे. दिल्ली में वह अकेले रहते थे. उन के मातापिता रामगंज मंडी में और पत्नी अनीता 2 छोटे बेटों के साथ झालावाड़ में रहती थी.

चेतन आमतौर पर महीने में 1-2 बार छुट्टी पर घर आ जाते थे. जब भी वह घर आते तो रामगंज मंडी में रहने वाले मातापिता से मिलने जरूर जाते थे. उस दिन भी वह रामगंज मंडी में अपने घर वालों से मिल कर शाम 6 बजे की ट्रेन से झालावाड़ के लिए रवाना हुए थे. उन्हें करीब एक घंटे में झालावाड़ पहुंच जाना चाहिए था. जब रात 8 बजे तक चेतन घर नहीं पहुंचे तो उन की पत्नी अनीता ने अपने रिश्तेदारों को फोन कर के चेतन के बारे में बताया.

अनीता के कहने पर झालावाड़ की गायत्री कालोनी में रहने वाले रिश्तेदार मनमोहन मीणा ने चेतन की तलाश शुरू की. इसी खोजबीन में रात करीब साढ़े 8 बजे चेतन झालरापाटन-भवानी मंडी मार्ग पर रेलवे की रलायता पुलिया के पास बेहोश पड़े मिले. मनमोहन मीणा ने अनीता को चेतन के अचेत पड़े होने की सूचना दी. इस के बाद रिश्तेदार बेहोश चेतन को एआरजी अस्पताल ले गए. जांच के बाद डाक्टरों ने चेतन को मृत घोषित कर दिया.

संदिग्ध मौत का मामला होने की वजह से अस्पताल से पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस ने अस्पताल पहुंच कर शव का निरीक्षण किया, लेकिन शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं मिला.

पुलिस ने रलायता पुलिया के पास उस जगह का भी मौका मुआयना किया, जहां चेतन अचेत पड़े मिले थे. लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस से पता चलता कि चेतन की मौत कैसे हुई. रिश्तेदारों की सूचना पर रामगंज मंडी से चेतन के मातापिता और अन्य घर वाले भी झालावाड़ आ गए.

पिता को था बेटे की हत्या का संदेह

चेतन के पिता महादेव मीणा ने झालावाड़ के थाना सदर में बेटे की संदिग्ध मौत का मामला दर्ज करा दिया. पुलिस ने सीआरपीसी की धारा 174 में मामला दर्ज कर जांच शुरू की. पुलिस ने 15 फरवरी को चेतन के शव का मैडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम के बाद चेतन का विसरा जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया.

खुफिया अधिकारी की मौत का मामला होने के कारण पुलिस हर एंगल से जांच कर रही थी. इन में 3 मुख्य बिंदु थे, पहला हार्ट अटैक, दूसरा आत्महत्या और तीसरा हत्या. चेतन के शरीर पर चोट या हाथापाई के कोई निशान नहीं मिले थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी ऐसा कुछ नहीं बताया गया, जिस से मौत का रहस्य खुलता.

अब पुलिस के सामने सवाल यह था कि चेतन जब ट्रेन से झालावाड़ आ रहे थे तो वह रलायता पुलिया कैसे पहुंचे और उन की मौत कैसे हुई? पुलिस कई दिनों तक इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करती रही, लेकिन कोई ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारी नहीं मिली, जिस से चेतन की मौत के कारणों का पता चल पाता.

इस बीच, चेतन के पिता महादेव मीणा ने अदालत में इस्तगासा दायर कर दिया. इस्तगासे में कहा गया कि चेतन की सुनियोजित तरीके से हत्या की गई है. इस पर अदालत ने पुलिस को चेतन की हत्या का मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए. तब तक चेतन की हत्या को 3 महीने हो चुके थे.

अप्रैल के दूसरे सप्ताह में झालावाड़ के सदर थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ आईबी औफिसर चेतन प्रकाश गलाना की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसपी आनंद शर्मा ने चेतन की हत्या के मामले का खुलासा करने के लिए एडीशनल एसपी छगन सिंह राठौड़ के नेतृत्व में सदर थानाप्रभारी संजय मीणा, एएसआई अजीत मोगा, हैडकांस्टेबल मदन गुर्जर, कुंदर राठौड़, महेंद्र सिंह, हेमंत शर्मा और कुछ कांस्टेबलों की टीम गठित की.

पत्नी को किया गिरफ्तार

पुलिस की इस टीम ने चेतन प्रकाश की दिनचर्या के बारे में पता लगाया. इस के बाद उन के दोस्तों, परिचितों और दुश्मनी रखने वालों को चिह्नित कर के उन से पूछताछ की. इंटेलीजेंस ब्यूरो के दिल्ली कार्यालय में चेतन प्रकाश के साथी कर्मचारियों से भी पूछताछ की गई.

पुलिस टीम ने रामगंज मंडी, झालावाड़ रेलवे स्टेशन और रलायता पुलिया के आसपास घटनास्थल का कई बार दौरा कर के तथ्यों का पता लगाने का प्रयास किया. साइबर टीम ने कई जगह के मोबाइल टावरों का रिकौर्ड निकलवाया. साथ ही चेतन के घरपरिवार की पूरी जानकारी प्राप्त कर के घर वालों से भी पूछताछ की गई.

जांचपड़ताल में यह बात सामने आई कि चेतन के अपनी पत्नी अनीता के साथ संबंध अच्छे नहीं थे. इस के बाद पुलिस ने तकनीकी जांच और मुखबिरों की मदद से चेतन की मौत की कडि़यां जोड़नी शुरू कीं. लंबी चली जांचपड़ताल के बाद 25 जून को पुलिस ने आईबी औफिसर चेतन प्रकाश की हत्या के मामले में उन की पत्नी अनीता को गिरफ्तार कर लिया. अनीता से की गई पूछताछ में चेतन की हत्या की पूरी तसवीर सामने आ गई.

जांच में पता चला कि चेतन की हत्या पुलिस कांस्टेबल प्रवीण राठौड़ ने अपने साथियों के साथ मिल कर सुनियोजित तरीके से की थी. चेतन की पत्नी अनीता भी पति की हत्या में शामिल थी. कांस्टेबल प्रवीण के चेतन की पत्नी अनीता से अवैध संबंध थे. इन संबंधों को ले कर चेतन का अपनी पत्नी अनीता से कई बार विवाद भी हुआ था.

चेतन को शक था कि छोटा बेटा उस का नहीं, बल्कि प्रवीण का है. चेतन ने छोटे बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की बात कही थी. इस से अनीता और प्रवीण को अपने अवैध संबंधों का राज खुलने का डर था. इसी वजह से उन्होंने चेतन को रास्ते से हटाने का फैसला किया.

कांस्टेबल प्रवीण राठौड़ ने अपने साथियों के सहयोग से चेतन को मौत के घाट उतारने के लिए 5 प्रयास किए थे. 3 बार की असफलता के बाद चौथी बार चेतन को दिल्ली में उन के घर पर मारने की योजना बनाई गई, लेकिन उस में भी कामयाबी नहीं मिली. अंतत: 5वीं बार वे चेतन को मौत की नींद सुलाने में कामयाब हो गए.

कांस्टेबल प्रवीण राठौड़ पहले झालावाड़ पुलिस की स्पैशल टीम में तैनात था. बाद में वह प्रतिनियुक्ति पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी में चला गया. एसीबी में भी वह झालावाड़ में ही तैनात रहा. पुलिस कांस्टेबल होने के कारण प्रवीण को आपराधिक पैंतरों की अच्छी जानकारी थी कि हत्या के मामले को साधारण मौत में कैसे दर्शाया जाए, वह अच्छी तरह जानता था. इस के लिए उस ने चेतन का अपहरण किया और उसे कैटामाइन इंजेक्शन की हैवी डोज दे कर मौत की नींद सुला दिया.

कैटामाइन इंजेक्शन प्रतिबंधित नशीली दवा है. यह बाजार में खुले तौर पर नहीं मिलती. कैटामाइन इंजेक्शन अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में ही काम आता है. खास बात यह कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी इस इंजेक्शन के बारे में पता नहीं चल पाता.

पुलिस ने व्यापक जांचपड़ताल के बाद चेतन की हत्या के मामले में उस की पत्नी अनीता के साथसाथ अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया. इन आरोपियों से की गई पूछताछ और पुलिस की जांच में चेतन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह है. झालावाड़ में मंगलपुरा रोड पर रहने वाले रमेशचंद का बेटा प्रवीण राठौड़ जब पढ़ता था, तभी से अनीता उसे जानती थी.

बचपन के प्यार ने हिलोरें मारे तो बन गई हत्या की योजना

अनीता भी झालावाड़ में रहती थी. पढ़नेलिखने की उम्र में दोनों एकदूसरे को चाहने लगे थे. सन 2008 में अनीता का चयन अध्यापिका के पद पर हो गया. उसी साल प्रवीण राठौड़ की नौकरी भी राजस्थान पुलिस में लग गई.

सरकारी नौकरी मिल जाने पर प्रवीण का बचपन का प्यार हिलोरें मारने लगा. उस ने अनीता के सामने अपने प्यार का इजहार करते हुए शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन परिस्थितियां ऐसी रहीं कि घर वालों की रजामंदी न मिलने से दोनों की शादी नहीं हो सकी. अनीता से शादी न हो पाने से प्रवीण की हसरत मन में ही रह गई. अपनी अधूरी हसरतों को मन में लिए प्रवीण पुलिस की नौकरी करता रहा और अनीता सरकारी स्कूल में शिक्षिका की.

बाद में जनवरी 2011 में अनीता की शादी चेतन प्रकाश गलाना से हो गई. अनीता सुंदर भी थी और पढ़ीलिखी भी. वह झालावाड़ के पास असनावर गांव के स्कूल में नियुक्त थी. परेशानी यह थी कि चेतन की नियुक्ति दिल्ली में थी और अनीता की घर के पास ही. इसलिए दोनों को अलगअलग रहना पड़ रहा था. उन के बीच झालावाड़ से दिल्ली की लंबी दूरी थी.

चेतन छुट्टी मिलने पर 15-20 दिन बाद 1-2 दिन के लिए घर आते थे, तभी वह अनीता से मिल पाते थे. नईनई शादी और इतने दिनों का अंतराल दोनों को बहुत खलता था. लेकिन दोनों की ही अपनीअपनी नौकरी की मजबूरियां थीं. उन का गृहस्थ जीवन ठीकठाक चल रहा था.

शादी के कुछ महीने बाद ही अनीता के पैर भारी हो गए. चेतन को पता चला तो वह बहुत खुश हुए. सन 2012 में अनीता ने बेटे को जन्म दिया. पहली संतान के रूप में बेटा पा कर चेतन का पूरा परिवार खुश था. बेटे का नाम क्षितिज रखा गया. क्षितिज समय के साथ बड़ा होने लगा.

इस बीच 2011 में ही प्रवीण राठौड़ की भी शादी हो गई. प्रवीण की पत्नी भी पढ़ीलिखी थी. दिसंबर 2014 में प्रवीण की पत्नी का भी सरकारी अध्यापिका के पद पर चयन हो गया. उस की नियुक्ति भी असनावर के उसी स्कूल में हुई, जहां अनीता नियुक्त थी.

प्रवीण कई बार पत्नी को स्कूल छोड़ने या स्कूल से वापस लाने चला जाता था. उसी स्कूल में अनीता भी नियुक्त थी. फलस्वरूप अनीता और प्रवीण की फिर से मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों का असर यह हुआ कि उन का बचपन और जवानी का प्यार फिर से अपने पंख फैलाने लगा. जल्दी ही दोनों एकदूसरे के निकट आ गए.

अनीता को डर था कि उसे प्रवीण के साथ देख कर कहीं उस की पत्नी और दूसरे लोग गलत न सोचने लगें, इसलिए अगस्त 2015 में रक्षाबंधन पर अनीता ने प्रवीण को राखी बांधी और पति चेतन प्रकाश से उस का परिचय धर्मभाई के रूप में कराया.

मिलने के लिए बनाया नया आशियाना

प्रवीण की पत्नी और अनीता के एक ही स्कूल में अध्यापिका के पद पर तैनात होने से चेतन को किसी तरह का कोई संदेह नहीं हुआ. वह पहले की तरह ही अनीता पर भरोसा करते रहे. अपनी नौकरी की वजह से चेतन झालावाड़ में नहीं रह सकते थे. प्रवीण ने चेतन की इस मजबूरी का फायदा उठाया.

अनीता और प्रवीण की मुलाकातें गुल खिलाने लगीं. उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन गए. जनवरी, 2017 के बाद वे लगभग रोजाना ही एकदूसरे से मिलने लगे. उस समय अनीता गायत्री कालोनी, झालावाड़ स्थित अपने मातापिता के घर रह रही थी.

जून, 2017 में प्रवीण ने अनीता को झालावाड़ के हाउसिंग बोर्ड में 35 लाख रुपए का नया मकान दिलवा दिया. मकान के पैसे अनीता ने दिए. चर्चा है कि प्रवीण ने अनीता को मकान दिलवाने में दलाली के 10 लाख रुपए खुद रख लिए थे.

अनीता हाउसिंग बोर्ड के नए मकान में रहने लगी. प्रवीण इस मकान में बेरोकटोक आनेजाने लगा. वहां उसे रोकने वाला कोई नहीं था. बेटा 5-साढ़े 5 साल का था. चेतन प्रकाश महीने में एकदो बार ही आते थे.

कभीकभार चेतन के मातापिता भी बहू के पास आ जाते थे. वे भी एकदो दिन रुक कर चले जाते थे. प्रवीण ने अनीता से बातें करने के लिए उसे एक मोबाइल और सिम अलग से दिलवा रखी थी, प्रवीण से वह इसी फोन पर बात करती थी. इसी दौरान अनीता गर्भवती हो गई.

अकेली रह रही बहू के घर में प्रवीण का बेरोकटोक आनाजाना चेतन के मातापिता को अच्छा नहीं लगता था. उन्होंने प्रवीण को साफ कह दिया कि वह तभी आया करे, जब चेतन घर में हो. उन्होंने यह बात चेतन को भी बताई. चेतन ने भी अनीता को प्रवीण के घर आनेजाने और उस से रिश्ता रखने के लिए मना कर दिया. इस बात को ले कर चेतन और अनीता के बीच झगड़ा होने लगा.

अक्तूबर 2017 में अनीता ने एक निजी अस्पताल में बेटे को जन्म दिया. इस दौरान प्रवीण भी अस्पताल में मौजूद रहा. चेतन और उस के घर वालों को ज्यादा शक तब हुआ, जब प्रवीण ने नवजात के नैपकिन बदले. इस पर चेतन के घर वालों ने प्रवीण को फिर टोका, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ.

प्रसव के बाद अनीता अपने घर आ गई. लेकिन प्रवीण को ले कर उन के घर में आए दिन लड़ाईझगड़े होने लगे. रोजाना की कलह के कारण अनीता ने 7 नवंबर, 2017 को आत्महत्या करने का प्रयास किया, लेकिन उसे बचा लिया गया.

अनीता के घर में होने वाली कलह को ले कर चेतन प्रवीण की आंखों में खटकने लगे. फलस्वरूप उस ने चेतन को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. प्रवीण की दोस्ती वाहनों की खरीदफरोख्त करने और आरटीओ एजेंट का काम करने वाले शाहरुख से थी. शाहरुख झालावाड़ के तोपखाना मोहल्ले का रहने वाला था.

प्रवीण ने दिसंबर 2017 में शाहरुख को बताया कि उस की रिश्ते की बहन को उस का पति मारतापीटता है. वह दिल्ली में कंप्यूटर पर काम करता है, उस की हत्या करनी है. इस के लिए प्रवीण ने शाहरुख को 3 लाख रुपए की सुपारी दी. प्रवीण ने शाहरुख को चेतन की शक्ल भी दिखा दी. शाहरुख ने चेतन की हत्या की जिम्मेदारी ले कर इस काम के लिए अपने कुछ साथियों को शामिल कर लिया.

4 बार हत्या के प्रयास रहे विफल

प्रवीण और शाहरुख ने चेतन की हत्या के प्रयास शुरू कर दिए. प्रवीण ने अनीता के जरिए पता कर लिया था कि 25 दिसंबर, 2017 को चेतन छुट्टी बिता कर ट्रेन से दिल्ली जाएंगे. यह जान कर हत्यारों ने ट्रेन में चेतन का पीछा किया, लेकिन सर्दी का मौसम होने के कारण चेतन ने मुंह पर मफलर लपेट रखा था, जिस से वे उन्हें पहचान नहीं पाए और दिल्ली जा कर वापस लौट आए.

इस के बाद 4 जनवरी, 2018 को चेतन छुट्टी ले कर झालावाड़ आए तो उन्हें ट्रक से कुचल कर मारने की योजना बनाई गई. इस के लिए बदमाशों ने झालावाड़ा के नला मोहल्ला निवासी ट्रक चालक शाकिर को 20 हजार रुपए दिए थे.

योजना के मुताबिक शाकिर को प्रवीण राठौड़ द्वारा उपलब्ध कराए गए ट्रक से चेतन की स्कूटी को रामगंज मंडी से झालावाड़ आते समय रास्ते में टक्कर मारनी थी, लेकिन उस दिन ट्रक पीछे ही रह गया जबकि स्कूटी आगे निकल गई. यह प्रयास विफल होने पर तय किया गया कि 5 जनवरी को चेतन जब झालावाड़ से स्कूटी से रामगंज मंडी जाएंगे, तब उन्हें ट्रक से टक्कर मार कर कुचल दिया जाएगा.

उस दिन शाकिर ने पीछा कर के झरनिया घाटी के पास ट्रक से स्कूटी को टक्कर मार कर चेतन को कुचलने का प्रयास किया, लेकिन इस हादसे में चेतन गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद बच गए, अलबत्ता उन की स्कूटी जरूर क्षतिग्रस्त हो गई थी.

3 प्रयास विफल होने पर चेतन को दिल्ली में उन के घर में मारने की योजना बनाई गई. इस योजना के तहत झालावाड़ से आए बदमाश दिल्ली की निरंकारी कालोनी गुरु तेगबहादुर नगर स्थित चेतन के मकान पर पहुंच गए, लेकिन वहां पर कैमरे लगे होने के कारण वे वारदात को अंजाम दिए बगैर झालावाड़ वापस लौट आए.

प्रवीण को अनीता से चेतन प्रकाश के आने और जाने की सारी जानकारियां मिलती रहती थीं. अंतिम बार भी प्रवीण को पता चल गया था कि चेतन 14 फरवरी की शाम को ट्रेन से रामगंज मंडी से झालावाड़ आएंगे. उस दिन पुलिस कांस्टेबल प्रवीण राठौड़ ने अपने साथियों शाहरुख, फरहान और एक नाबालिग किशोर के साथ मिल कर योजना बना ली. योजना के अनुसार चेतन का झालावाड़ रेलवे स्टेशन से अपहरण करना था, फिर उन्हें कैटामाइन इंजेक्शन की हैवी डोज दे कर मौत की नींद सुलानी थी.

योजना को ऐसे दिया अंजाम

योजना के तहत नाबालिग किशोर शाहरुख को बाइक से सुकेत छोड़ आया. सुकेत से शाहरुख रामगंज मंडी पहुंचा और ट्रेन से ही चेतन का पीछा करने लगा. ट्रेन के पहुंचने से कुछ समय पहले ही उस ने मोबाइल पर प्रवीण को झालावाड़ पहुंचने के बारे में बता दिया था. इस पर प्रवीण अपनी कार में फरहान और नाबालिग किशोर को साथ ले कर रेलवे स्टेशन पहुंच गया. स्टेशन पर उन्हें शाहरुख मिल गया.

चेतन स्टेशन से पैदल घर जा रहे थे. हाउसिंग बोर्ड के सुनसान रास्ते में चेतन को रोक कर प्रवीण ने अपने तीनों साथियों की मदद से जबरन कार की पीछे वाली सीट पर बैठा लिया. वे लोग चेतन को कार से आकाशवाणी के पीछे की तरफ हल्दीघाटी रोड पर ले गए. वहां प्रवीण और चेतन की अनीता को ले कर नोकझोंक हुई.

प्रवीण ने कहा कि तुम अपनी प्रौपर्टी अनीता के नाम क्यों नहीं करते. उस ने यह भी कहा कि तुम यह क्यों कहते हो कि छोटा बेटा मेरा है. इस पर चेतन ने कहा कि छोटा लड़का तो तुम्हारा ही है. चेतन के यह कहते ही प्रवीण ने अपने साथियों को इशारा किया. उन्होंने चेतन के दोनों हाथ पकड़ लिए.

प्रवीण ने जेब से कैटामाइन के इंजेक्शन निकाले और सिरिंज में हैवी डोज भर कर चेतन की दोनों जांघों में लगा दी. इस के बाद उस ने चेतन की नाक भी दबा दी. इंजेक्शन लगने और नाक दबाए जाने से कुछ ही मिनटों में उन के प्राण निकल गए.

चेतन को मौत की नींद सुलाने के बाद प्रवीण ने उन की जेब से मोबाइल निकाला और पुलिस को गुमराह करने के लिए अनीता को मैसेज किया कि वह औटोरिक्शा से पाटन हो कर घर आ रहे हैं. इस के बाद प्रवीण और उस के साथी चेतन का शव रलायता पुलिया के पास फेंक कर वापस चले गए. रलायता रेलवे पुलिया के पास चेतन के अचेत पड़े मिलने की कहानी आप शुरू में पढ़ चुके हैं.

एडीशनल एसपी छगन सिंह राठौड़ के नेतृत्व में पुलिस ने व्यापक जांचपड़ताल की तो सब से पहले पुलिस शाहरुख तक पहुंची. पुलिस ने उसे 20 जून को गिरफ्तार कर लिया. शाहरुख से पूछताछ में चेतन की हत्या का राज खुल गया. दूसरे ही दिन 21 जून को पुलिस ने उस ट्रक चालक शाकिर को भी गिरफ्तार कर लिया, जिस ने 5 जनवरी को चेतन को ट्रक से कुचलने का प्रयास किया था.

22 जून को पुलिस ने एक निजी अस्पताल के औपरेशन थिएटर इंचार्ज संतोष निर्मल को गिरफ्तार कर लिया. वह पहले अस्थाई रूप से राजकीय हीराकुंवर महिला अस्पताल और एक अन्य निजी अस्पताल में मेल नर्स का काम कर चुका था. उसे औपरेशन प्रक्रिया में काम आने वाली निश्चेतक दवाओं की अच्छी जानकारी थी.

कांस्टेबल प्रवीण के साथ जिम जाने और क्रिकेट खेलने की वजह से दोनों में दोस्ती थी. प्रवीण ने पिछले साल 31 दिसंबर को रेव पार्टी में नशा करने के लिए संतोष निर्मल से कैटामाइन इंजेक्शन मांगा था. संतोष ने दोस्ती के नाम पर उसे अस्पताल के औपरेशन थिएटर के स्टोर से चोरी कर के 500 मिलीग्राम के 2 इंजेक्शन दे दिए थे. ये इंजेक्शन प्रवीण ने संभाल कर रखे और चेतन की हत्या के लिए इन का उपयोग किया. इस इंजेक्शन के सबूत फोरैंसिक जांच में भी नहीं मिलते हैं.

परत दर परत खुलते गए राज

इस के बाद पुलिस ने 24 जून को चेतन की हत्या में शामिल एक नाबालिग किशोर को पकड़ा. उस से वारदात में इस्तेमाल की गई बाइक और मोबाइल बरामद किए गए. यह किशोर शाहरुख की आरटीओ एजेंट की दुकान पर काम करता था. चालाक कांस्टेबल प्रवीण ने वारदात के दिन खुद का मोबाइल साथ नहीं रखा था.

उस ने शाहरुख से बात करने के लिए उस किशोर के मोबाइल का उपयोग किया था. यह किशोर चेतन की हत्या की योजना में 25 दिसंबर से 14 फरवरी तक शामिल रहा. शाहरुख पहले इस किशोर को 50 रुपए रोजाना देता था, लेकिन चेतन की हत्या के बाद उसे डेढ़ सौ रुपए रोजाना देने लगा था. पुलिस ने इस किशोर को मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के बाल सुधार गृह भेज दिया.

चेतन की हत्या में पत्नी अनीता की भूमिका सामने आने पर पुलिस ने 25 जून को उसे भी गिरफ्तार कर लिया. चेतन को दिल्ली से कब किस ट्रेन से आनाजाना है और दिल्ली में उस का पताठिकाना कहां है, प्रवीण को यह जानकारी अनीता ने ही दी थी. झालावाड़ से रामगंज मंडी आनेजाने की जानकारी भी अनीता ने ही प्रवीण को दी थी.

पुलिस ने अनीता के मोबाइल की जांच की तो उस में चेतन और अनीता के तनावपूर्ण दांपत्य जीवन के बारे में कई वाट्सऐप मैसेज मिले. प्रवीण के कहने पर अनीता ने मोबाइल फौरमेट करवा कर पूरा डेटा नष्ट कर दिया था. चेतन की हत्या के बाद प्रवीण ने अनीता को दी हुई सिम भी वापस ले ली थी.

अनीता से पूछताछ में पता चला कि प्रवीण उस के प्यार में इतना डूब गया था कि चेतन से बेइंतहा नफरत करने लगा था. वह नहीं चाहता था कि अनीता किसी और से बात करे या संबंध रखे. उस ने अनीता से कह कर उस के पति के साथ फेसबुक पर पोस्ट किए हुए फोटो भी हटवा दिए थे.

वह अनीता से कहता था कि अगर उस ने उस का साथ नहीं दिया तो वह आत्महत्या कर लेगा. ऐसे में अनीता सहीगलत का फैसला नहीं कर पाती थी और प्रवीण के कहे मुताबिक उस का साथ देती थी.

चेतन की हत्या के बाद भी अनीता व प्रवीण के संबंध पहले जैसे ही बने रहे. प्रवीण उसे कहता रहा कि पोस्टमार्टम और विसरा की जांच में कुछ नहीं आएगा. इस दौरान दोनों ने कुछ कानूनविदों से भी मशविरा किया था.

अनीता ने पुलिस को बताया कि उस के पति चेतन को छोटे बेटे रिवान पर शक था कि वह उस की पैदाइश नहीं है. इस बात पर घर में कई बार लड़ाई हुई. इस पर चेतन व उस के परिजनों ने बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की बात कही थी. इस से अनीता व प्रवीण के अवैध संबंधों का राज खुलने का डर था, इसलिए उन्होंने चेतन को रास्ते से हटाने का फैसला किया.

पुलिस ने 28 जून को झालावाड़ निवासी फरहान को भी गिरफ्तार कर लिया. वह वारदात के बाद से फरार चल रहा था. फरहान भी चेतन की हत्या के मामले में प्रवीण व शाहरुख के साथ था.

बहुत कुछ खोया अनीता और प्रवीण ने

जांच में प्रवीण के अलावा झालावाड़ के 2 अन्य पुलिस कांस्टेबलों पर भी शक की सुई घूमती रही. ये दोनों प्रवीण के करीबी थे और चेतन की हत्या में इन की भूमिका संदिग्ध थी. इस पर एसपी आनंद शर्मा ने दोनों कांस्टेबलों रवि दुबे और आवेश मोहम्मद को 28 जून को निलंबित कर दिया. ये दोनों कांस्टेबल पुलिस की गोपनीय शाखा में कार्यरत थे. प्रवीण भी एसीबी में प्रतिनियुक्ति से पहले इसी शाखा में रहा था, इसलिए दोनों उस के करीबी थे. इन दोनों कांस्टेबलों के खिलाफ जांच की जा रही है.

कथा लिखे जाने तक पुलिस चेतन की हत्या के मुख्य सूत्रधार कांस्टेबल प्रवीण राठौड़ की तलाश में जुटी थी. वह 14 जून को सरकारी काम से अजमेर जाने की बात कह कर फरार हो गया था. हत्या के मामले में आरोपी होने पर एसीबी ने उस की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर दी. एसपी ने एक जुलाई को उसे निलंबित कर दिया था.

पुलिस ने सरकारी अध्यापिका अनीता के दुराचरण की रिपोर्ट शिक्षा विभाग को भेज कर विभागीय काररवाई के लिए भी लिख दिया है. चेतन की हत्या में गिरफ्तार आरोपियों को रिमांड अवधि पूरी होने पर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक सभी आरोपी जेल में थे.

यह अनीता का त्रियाचरित्र ही था कि उस ने अपनी हंसतीखेलती दुनिया अपने ही हाथों से उजाड़ ली. चेतन की मौत से महादेव के बुढ़ापे की लाठी टूट गई. चेतन प्रकाश के 6 साल के बड़े बेटे क्षितिज के सिर से पिता का साया उठ गया. 8 महीने का छोटा बेटा रिवान भी मां के साथ जेल में है.

विद्यार्थियों को अच्छा नागरिक बनने की सीख देने वाली अनीता के हाथ पति के खून से न रंगे होते तो वह जल्दी ही स्कूल की प्रिंसिपल की कुरसी पर बैठी होती, क्योंकि उस की पदोन्नति हो गई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शर्लिन ने ‘रश्के कमर’ पर जमकर लगाए ठुमके

एक्ट्रेस और मौडल शर्लिन चोपड़ा को सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरना आता है. शर्लिन चोपड़ा अपनी बोल्डनेस की वजह से भी पहचानी जाती हैं. शर्लिन चोपड़ा एकमात्र एक्ट्रेस हैं जो प्लेबौय (Playboy) के साथ काम कर चुकी हैं. यही नहीं, ‘कामसूत्र’ फिल्म में उनके बोल्ड रोल ने भी काफी सुर्खियां लूटी थी. शर्लिन चोपड़ा अपनी बोल्डनेस की वजह से चर्चा में रहती हैं. लेकिन हाल ही में उनका एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसे खूब देखा जा रहा है. इस वीडियो में शर्लिन चोपड़ा नेपाल में परफॉर्म करती नजर आ रही हैं, और औडियंस उनके डांस को देखकर क्रेजी हो रहे हैं.

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शर्लिन चोपड़ा ने पिछले दिनों ही नेपाल में परफौर्म किया था. इस परफौर्मेंस शर्लिन चोपड़ा कमाल का डांस कर रही हैं और स्टेज पर तहलका मचा रही हैं. शर्लिन चोपड़ा के इस वीडियो को एक लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. यही नहीं, शर्लिन चोपड़ा का एक बोल्ड फोटोशूट भी काफी वायरल हो रहा है. शर्लिन चोपड़ा हमेशा कुछ अनोखा करने के लिए पहचानी जाती हैं और कुछ दिन पहले उन्होंने खुद को 87 लाख रुपये की कार भी गिफ्ट की थी.

शर्लिन ने अपने करियर की शुरुआत साल 2005 में ‘टाइमपास’  फिल्म से की थी. शर्लिन डायरेक्टर रुपेश पौल की इंग्लिश फिल्म ‘कामसूत्र 3डी’ में लीड रोल निभा चुकी हैं. इस फिल्म की स्क्रीनिंग 66वें कान फिल्म फेस्टिवल में हुई थी. शर्लिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की एकलौती एक्ट्रेस हैं, जिन्होंने प्लेबौय मैगजीन के लिए न्यूड फोटोशूट कराया. शर्लिन ने कई हिंदी और तेलुगु फिल्मों में काम किया, लेकिन सफलता उनके हाथ नहीं लगी.

तो श्रद्धा कपूर के संग बनेगी फिल्म ‘‘चोर निकलके भागा’’ ?

शुक्रवार, 31 अगस्त को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘स्त्री’’ से बतौर स्वतंत्र निर्देशक बौलीवुड में कदम रख रहे निर्देशक अमर कौशिक इस बात को लेकर काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं कि उनकी डिब्बे में बंद हो चुकी फिल्म ‘‘चोर निकलके भागा’’ अब श्रद्धा कपूर के साथ शुरू होगी.

ज्ञातब्य है कि अमर कौशिक बतौर स्वतंत्र फिल्म निर्देशक अपने करियर की शुरुआत फिल्म ‘‘चोर निकल के भागा’’ से करने वाले थे. उस वक्त इस फिल्म में जौन अब्राहम और राज कुमार राव थे. मगर कुछ वजहों से जौन अब्राहम के इस फिल्म से अलग हो जाने के बाद यह फिल्म बंद हो गयी थी. उसके बाद अमर कौशिक को निर्माता दिनेश विजन की हौरर कौमेडी फिल्म ‘‘स्त्री’’ निर्देशित करने का अवसर मिल गया. फिल्म ‘स्त्री’ में अमर कौशिक के निर्देशन में राज कुमार राव, श्रद्धा कपूर और पंकज त्रिपाठी ने अभिनय किया है.

फिल्म ‘‘स्त्री’’ की जिस तरह से चर्चा हो रही है, उससे उत्साहित अमर कौशिक ने दावा किया है कि  उनकी फिल्म ‘चोर निकलके भागा’ हमेशा के लिए बंद नहीं हुई है. यह फिल्म बहुत जल्द शुरू होगी और इस फिल्म में राज कुमार राव जरुर रहेंगे.

पहले इस फिल्म में तमन्ना भाटिया थीं. मगर अमर कौशिक का दावा है कि तमन्ना भाटिया से उन्होंने इस फिल्म को लेकर कोई बात नही की थी. फिल्म की हीरोईन के नाम को वह गुप्त रखना चाहते हैं. जबकि बौलीवुड के सूत्र दावा कर रहे हैं कि अमर कौशिक ने अपनी फिल्म ‘चोर निकलके के भागा’’ में राज कुमार राव के साथ श्रद्धा कपूर को मेन लीड में लेने का फैसला किया है.

बहरहाल, हमारी नजर इस बात रहेगी कि ‘चोर निकल के भागा’ कब शुरू होती है और उसकी होरोईन कौन होती है..

करुणानिधि की मौत के बाद करवटें लेती तमिल राजनीति

तमिलनाडु के 5 बार मुख्यमंत्री रहे मुथुवेल करुणानिधि की 94 वर्ष की आयु में हुई मृत्यु के बाद अब राज्य की राजनीति नई करवटें लेगी. दोनों दिग्गज नेताओं एम करुणानिधि और जे जयललिता की मृत्यु के बाद वहां अगर नेता बचे हैं तो करुणानिधि के परिवार के ही पर मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन, दयानिधि मारन और अन्य बच्चे द्रविड़ मुनेत्र कषगम का रथ साथसाथ खींचेंगे, ऐसा लगता नहीं.

फिलहाल यह परिवार सत्ता से बाहर है और अब इस परिवार को फिर सत्ता मिलती है या लोग साइड में इंतजार कर रहे रजनीकांत और कमल हासन जैसे सितारों को खाली हुए स्थान को भरने का मौका देंगे, कहा नहीं जा सकता.

तमिलनाडु की राजनीति अब केवल हिंदी विरोध या उत्तर भारत विरोध पर नहीं टिकी है. कांग्रेस का वजूद वहां समाप्त सा है और भारतीय जनता पार्टी लाख कोशिशों के बावजूद जम नहीं पा रही.

मूलतया तमिलनाडु का प्रबंध उत्तर भारत के राज्यों से ज्यादा अच्छा है. ई वी रामासामी पेरियार, एन अन्नादुरै और करुणानिधि के धर्मविरोधी होने के बावजूद वहां खासे अंधविश्वास पनपते हैं और धर्म का बोलबाला रहता है. पर वहां के लोग बहुत उत्पादक हैं, साथ ही, बहुत उग्र भी. ऐसे विरोधाभासी माहौल में नए नेता अपनी जगह बना पाएंगे, इस में संदेह है.

करुणानिधि और उन के पुराने मित्र एम जी रामचंद्रन ने अन्नादुरै की विरासत का पूरा लाभ उठाया था और जे जयललिता को एम जी रामचंद्रन की विरासत पूरी की पूरी मिल गई थी. एक तरह से 1967 में कांग्रेस के पलायन के बाद से वहां अब तक एक सोच की राजनीति चल रही थी जो अब समाप्त हो गई है. कई वर्षों से इस सोच में तीखापन नहीं रह गया था, पर फिर भी खंडहरों जैसे किले तो मौजूद हैं ही.

नेताओं का अभाव पार्टियों को समाप्त कर देता है. बड़ी बात नहीं होगी यदि द्रविड़ मुनेत्र कषगम और औल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम अपना अस्तित्व जल्दी ही खो बैठें.

समता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, हिंदू महासभा, रिपब्लिकन पार्टी जैसी पार्टियां वारिसों के न होने कारण ही शून्य में विलीन हो गईं. भारतीय जनता पार्टी एक अपवाद है पर यह जिस सिद्धांत पर जिंदा है वह कब निरर्थक हो जाए, पता नहीं.

करुणानिधि का अभाव किसी को वैसे नहीं खलेगा क्योंकि अरसे से उन्होंने कोई सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन नहीं चला रखा था.

आतंकवादी नहीं हूं मैं (अंतिम भाग)

पूर्व कथा

एक दिन देर रात तक जब रज्जाक घर नहीं लौटा तो रानो को उस की चिंता सताने लगी. परेशान रानो सुलेमान बेकरी में फोन करती है. उसे पता चलता है कि वह सुबह ही किसी अनजान आदमी के साथ बिना बताए कहीं चला गया है. यह सुन कर रानो परेशान हो जाती है और अतीत की गलियों में खो जाती है.

वह एम.ए. की परीक्षा के बाद ननिहाल आई थी. जिस दिन उस ने अपने घर लौटने का प्रोग्राम बनाया था उस से पिछली रात कुछ अज्ञात आतंकवादी आधी रात को ननिहाल में सब को गोलियों से भून देते हैं पर रानो बच जाती है. एक आतंकवादी उसे देख लेता है और उस की जान बख्श देता है.

गांव में दहशत फैलाने के बाद वे नशे में धुत्त हो जाते हैं तो उन में से एक आतंकवादी रानो के पास आता है. वे दोनों वहां से भाग जाते हैं.

बस में बैठी रानो अपने घर वालों को याद कर के रोने लगती है. वह उसे सांत्वना देता है और उस को जम्मू उस के घर छोड़ने जाता है. रानो के मातापिता उसे जलीकटी सुना कर घर से निकाल देते हैं.

अनजान जगह पर बैठे दोनों भविष्य की योजना बनाते हैं. वह रानो को अपने अतीत के बारे में बताता है. रानो को वहीं छोड़ वह अपनी मां के पास दिल्ली जा कर पैसे ले कर आता है.

दिल्ली में ही दोनों किराए के मकान में रहने लगते हैं. एक दिन वह रानो के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है और दोनों मंदिर में जा कर शादी कर लेते हैं. काम की तलाश में भटकता वह सुलेमान बेकरी पहुंचता है

और अब आगे…

राजा के आग्रह पर सुलेमान ने उसे 2 दिन के लिए रख लिया. राजा ने पहले दिन बेकरी में जो बिस्कुट बनाए उन का स्वाद चख कर सुलेमान के मुंह से निकल पड़ा, ‘वाह, क्या लाजवाब स्वाद है. कहां से सीखा यह सब बनाना बर्खुरदार?’

राजा ने विनम्रता से सिर झुका कर कहा,  ‘आप सब बड़ों के आशीर्वाद का फल है.’

योग्यता व विनम्रता का अपूर्व संगम देख सुलेमान ने तुरंत राजा को 2 हजार रुपए मासिक की नौकरी पर रख लिया और एक अच्छे महल्ले में उस के रहने के लिए घर की व्यवस्था कर दी.

अब राजा व रानो दोनों खुश थे. सुलेमान व उन की बेगम आयशा भी दोनों को बहुत चाहते थे. जीवन की गाड़ी सुख के साथ चलने लगी. औलाद के लिए तरसते सुलेमान दंपती राजा व रानो को अपनी औलाद समझते और उन्हें भरपूर प्यार देते. दोनों ने यह खुशखबरी अपनेअपने मांबाप के पास भेजी, पर कोई जवाब नहीं आया. 1 साल बाद रानो ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया जिस का नाम उन्होंने अरमान रखा. धीरेधीरे अरमान 3 साल का हुआ और पास के नर्सरी स्कूल में जाने लगा. जब वह 5 साल का हुआ तो राजा ने उसे एक अच्छे पब्लिक स्कूल में भरती करवा दिया.

राजा के कारण बेकरी दिनदूनी रात चौगुनी प्रगति कर रही थी. सुलेमान बेकरी के व्यंजन खरीदने दूरदूर से लोग आते. साथ ही बडे़बडे़ होटल व थोक दुकानदार सप्लाई करने के लिए बड़ेबडे़ आर्डर देते.

एक रात सुलेमान की नींद में ही हार्टअटैक से मृत्यु हो गई. शोकाकुल आयशा को राजा व रानो ने संभाल लिया. सुलेमान की अचानक मौत से स्तब्ध राजा को यह जान कर एक और धक्का लगा  कि उन्होंने अपनी वसीयत में बेकरी सहित सारी जायदाद उस के नाम कर दी है.

शोक प्रकट करने आए आयशा के रिश्तेदारों को यह जान कर बहुत बुरा लगा कि सुलेमान ने अपनी पत्नी आयशा को कुछ नहीं दे कर सबकुछ एक अजनबी नौकर के नाम कर दिया है. पर आयशा आश्वस्त थी, उसे राजा पर पूरा भरोसा था.

आयशा के भाई हिमायत की नजर अपनी बहन की संपूर्ण धनसंपत्ति पर थी. बहन को प्यार से फुसला कर हिमायत ने राजा के बारे में सच उगलवा लिया. सब जानते ही हिमायत अपने गांव गया और अपनी पत्नी सलमा व दोनों बच्चों को ले आया. सब मिल कर आयशा की सेवा करते और उस को लुभाने का हर संभव प्रयास करते. बेऔलाद आयशा ने भी अपने भाई के दोनों बच्चों को कलेजे से लगा लिया.

हिमायत व उस के परिवार की उपस्थिति से राजा अचानक अपने को वहां बेगाना समझने लगा. यही नहीं, हिमायत ने बेकरी के हिसाबकिताब का  चार्ज राजा से छीन लिया और उसे धमकाया,  ‘मैं तुम्हारी असलियत जान चुका हूं. तुम आतंकवादी हो. सबकुछ मेरे नाम कर दो और पहले जैसे नौकर बन कर काम करो, वरना…’

‘वरना क्या?’ पूछा राजा ने.

‘मैं कुछ भी कर सकता हूं. अभी पुलिस में कंप्लेंट…’ वाक्य अधूरा छोड़ दिया हिमायत ने.

राजा पुलिस व इतवारी को पूर्ण रूप से भूल चुका था. सिहर उठा दोनों को याद कर के. सच्ची लगन व ईमानदारी से सेवा कर के उस ने बेकरी को बुलंदियों पर पहुंचाया था. हिमायत के आक्रामक रुख से वह तनावग्रस्त रहने लगा. रानो के  कई बार पूछने पर भी उस ने उसे कुछ नहीं बताया क्योंकि वह उसे इन सब पचड़ों से दूर रखना चाहता था.

राजा रात भर घर नहीं लौटा तो चिंतित रानो दिन निकलते ही बेकरी जा पहुंची. वहां तहमद बांधे भारीभरकम शरीर का हिमायत काउंटर पर बैठा था. तड़के रूपसी को सामने देख कर हिमायत की आंखें रानो के पूरे शरीर का जायजा लेने लगीं.

रानो की आवाज सुन कर उस का सम्मोहन भंग हुआ,  ‘‘राजा कहां है?’’

हिमायत के मुख खोलने के पहले ही उस के पीछे बैठी आयशा चौंक पड़ी,  ‘‘कौन, रानो? इतनी सवेरे?’’

‘‘अम्मी, राजा रात घर नहीं लौटा.’’

आयशा ने आगे बढ़ कर रानो को गले लगा लिया और आश्चर्य से बोली,  ‘‘क्या कहा, राजा नहीं आया? कहां गया?’’

आयशा ने हिमायत की तरफ प्रश्नसूचक निगाहों से देखा तो उस ने अनजान बनते हुए कंधे उचका दिए. बेकरी के अन्य कर्मचारी भी अनभिज्ञ थे. सुखदेव को कुछ अटपटा सा लगा था. वह शंकाग्रस्त था. आयशा को उस ने बता दिया.

रानो को डर लगा कि अगर राजा ने कहीं अचानक आ कर उसे बेकरी में देख लिया तो उस की खैर नहीं. वह वापस घर लौट आई. दरवाजे पर ही पेपर वाला दैनिक समाचारपत्र रख गया था. मुखपृष्ठ पर 2 मृत व्यक्तियों की तसवीरें थीं जिस में एक राजा की थी. राजा की तसवीर देखते ही वह गश खा कर जमीन पर गिर पड़ी.

शोर सुन कर रानो को होश आया तो देखा अरमान उसे देख कर रो रहा था तथा आसपड़ोस के लोग राजा की झूठी  ‘असलियत’ को सच मान कर थूथू कर रहे थे. पासपड़ोस की औरतें उसे सहारा देने के बजाय  ‘आतंकवादी की बीवी’ कह कर डर के मारे अपनेअपने घरों में दुबक गई थीं. उसी समय आयशा दौड़ती हुई आई और रानो और अरमान दोनों को अपने अंक में समेट लिया. फिर तमाशबीनों की ओर देख कर दहाड़ी,  ‘‘राजा एक नेक बंदा था. वह आतंकवादी नहीं था. तुम सब हो आतंकवादी, जो एक निरीह बेवा व उस के बच्चे को सता रहे हो.’’

राजा के घर में ताला लगा कर आयशा, रानो व अरमान दोनों को अपने घर ले आई. रानो व अरमान के प्रति आयशा का स्नेहभाव हिमायत को तनिक भी पसंद नहीं था. लेकिन जिस दिन से उस ने रानो को देखा था उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था. परिस्थितियां अनुकूल पा कर हिमायत ने अपनी बहन को इस बात के लिए पटा लिया कि वह रानो को उस से विवाह करने के लिए राजी करेगी.

एक दिन सवेरे आयशा बोली,  ‘‘देख रानो, तेरा दुनिया में कोई नहीं है. तेरे मायके व ससुराल वालों के लिए तू कब की मर चुकी है. मेरी बात मान, फिर से शादी कर के घर बसा ले.’’

रानो को चुपचाप सुनते देख कर उस ने उस का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और  प्यार से उस के माथे को चूमते हुए असली विषय पर आई,  ‘‘ये रूप की आग बड़ी जालिम है, कहीं तुझे जला कर खाक न कर दे. तेरी किस्मत बहुत अच्छी है कि मेरा भाई हिमायत तेरे से निकाह करना चाहता है. इस तरह से तू मेरी आंखों के सामने सदा रहेगी.’’

स्तब्ध रानो के आंसू सूख गए. मुख से आवाज नहीं निकली. स्नेह से हाथ दबा दिया चुपचाप हिमायत की बीवी सलमा का. आंखों से इशारा किया शांत रहने के लिए और निर्णय लिया कि वह वापस जम्मू जाएगी और अरमान को बुजुर्गों की गोदी में डाल कर सहारा मांगेगी. शायद वे पोते को देख कर पसीज जाएं.

हिमायत से खतरा वह बहुत पहले भांप चुकी थी. सलमा को रसोई में अकेले पा कर रानो  ने वहां से बच निकलने की अपनी योजना उसे समझाई और उस से सहयोग मांगा. खुशीखुशी सलमा ने सब की आंख बचा कर रानो व अरमान को शाम के धुंधलके में बिदा कर दिया.

बेकरी में शाम को होने वाली अपार भीड़ को अकेला संभालता, काउंटर पर हिसाबकिताब करता हिमायत जब रात को 12 बजे अपनी बहन के साथ फुरसत पा कर घर के अंदर आया तो उसे भनक तक नहीं थी कि उस का शिकार उस से बहुत दूर जा चुका है.

जम्मू पहुंच कर रानो सब से पहले राजा के अब्बू से मिली. उसे देखते ही वह क्रोध से फट पड़े,  ‘‘तेरे कारण मेरे लड़के ने  ‘इतवारी’ से दुश्मनी मोल ली. उस ने आ कर मेरी बेकरी व व्यापार चौपट कर दिया. किस मुंह से आई है तू यहां?’’

गिड़गिड़ाने लगी रानो,  ‘‘अरमान, आप के बेटे की अमानत है. इसे अपना लीजिए.’’

‘‘नहीं, नहीं, इस से हमारा कोई सरोकार नहीं. बुढ़ापे में हम कोई झंझट पालना नहीं चाहते. यहां से जाओ.’’

वहां से निराश रानो ने अपने मांबाप से विनती की तो उस के पिता बोले,  ‘‘तू हमारे लिए उसी दिन मर गई थी जिस दिन उस आतंकवादी के साथ आई थी.

‘‘तेरे कारण कोई भला आदमी तेरी बहनों से शादी नहीं करना चाहता. तेरे कर्मों की सजा भुगत रहे हैं हम.’’

रानो ने अरमान को बंद दरवाजे के बाहर बैठा दिया और जातेजाते आवाज लगाई, ‘‘मां, अरमान को दरवाजे पर बिठा कर नौकरी की तलाश में जा रही हूं. प्लीज, मां, उस का ध्यान रखना.’’

मन पक्का कर के रानो निकल पड़ी. उसे पूरी आशा थी कि उस की मां, नाती का मुख देख कर अवश्य पसीज जाएंगी. दिन भर वह अपने पुराने परिचितों को तलाशती रही, मिलती रही, नौकरी की तलाश में घूमती रही. थकहार कर जब मां के घर वापस लौटी तो बाहर अरमान को न पा कर कुछ राहत महसूस हुई. खुशी के मारे वह आगे बढ़ कर दरवाजे की घंटी दबाने ही वाली थी कि अपने पीछे से ‘मम्मी’ शब्द सुन कर पलटी तो सन्न रह गई.

अरमान गोरखा चौकीदार की गोद में था. आघात से रानो अपने स्थान पर जड़ हो गई. उसे ऐसा लगा कि किसी ने उसे आकाश से जमीन पर धकेल दिया है.

गोरखा बोला, ‘‘बहनजी, दोपहर में हम इस तरफ से निकले तो देखा बच्चा बाहर अकेला बैठा रो रहा है. हम से सहन नहीं हुआ. हम छोटे लोग हैं बहनजी, अगर तकलीफ न हो तो मेरी कोठरी में रह जाओ, जब तक कोई दूसरा ठिकाना नहीं मिल जाता.’’

कृतज्ञता से अभिभूत रानो बोली,  ‘‘काका, कौन कहता है तुम छोटे हो. तुम्हारे कर्म बहुत ऊंचे हैं.’’

कुछ झिझकता सा बोला गोरखा,  ‘‘यहां एक एन.जी.ओ. है, जरूरतमंद स्त्रियों के लिए. यदि बुरा न मानें तो…’’

‘‘हां, हां, क्यों नहीं,’’ रानो ने हामी भरी.

वहां पहुंच कर रानो सुखद आश्चर्य से झूम उठी. वहीं उस की पुरानी प्रिंसिपल इंचार्ज थीं. रानो को देख कर वह भी खुश हुईं.

वह बोलीं,  ‘‘रानो, तू कहां चली गई थी. तू ने एम.ए. में विश्वविद्यालय टाप किया था. मैं ने खुद कालिज में लैक्चरर के लिए तुझे आफर भेजा था.’’

जवाब में रानो ने अपनी आपबीती उन्हें सुना दी. सुन कर श्रीमती कौल गंभीर हो गईं और बोलीं,  ‘‘रानो, तेरी त्रासदी के लिए जिम्मेदार केवल तेरे मातापिता हैं. हमारे समाज में लड़की की शुचिता पर इतना अधिक जोर डाला जाता है कि मातापिता बेटी के प्रति क्रूर हो जाते हैं.’’

श्रीमती कौल की सहायता से अगले ही दिन एक निजी शिक्षण संस्था में रानो को संस्कृत शिक्षिका की नौकरी मिल गई. उसी स्कूल में अरमान का दाखिला हो गया. पति की मृत्यु के बाद अकेली रह रही श्रीमती कौल ने अपने ही घर में रानो के रहने की व्यवस्था कर दी. इस तरह रानो के जीवन की गाड़ी फिर से पटरी पर चल पड़ी. उस ने फिर कभी मायके व ससुराल का रुख नहीं किया.

अब रानो के जीवन का एक ही मकसद था, अरमान को पढ़ालिखा कर उसे अपने पैरों पर  खड़ा करना. उस के मकसद को पूरा करने  में अरमान पूरा सहयोग दे रहा था. वह पढ़ाई में सदा अव्वल रहता. समय पंख लगा कर उड़ चला.

12वीं में अव्वल आने के बाद अरमान का दिल्ली आई.आई.टी. में चयन हो गया. पलक झपकते 4 वर्ष बीत गए. कैंपस इंटरव्यू में अरमान का एक ग्लोबल कंपनी में चयन हो गया और वह नौकरी करने अमेरिका चला गया.

रानो को घर के बाहर से ही खदेड़ने वाले मातापिता और सासससुर अब उस से मिलने आने लगे और मानमनौअल करते उसे अपनेअपने घर ले जाने के लिए, लेकिन रानो उन्हें देख कर जड़ हो जाती. सच तो यह कि उन्हें देख कर उस के सूखते घाव फिर से हरे हो जाते और रिसने लगते. उसे चुप्पी साधे देख कर वे लौट जाते.

अरमान को गए 3 वर्ष हो रहे थे. ढेरों पैसा बैंक में जमा हो रहा था. पहली बार अरमान मां से मिलने भारत आया तो जम्मू की एक बेहद पौश कालोनी में सुंदर सा बंगला खरीद कर मां को भेंट कर दिया. अब तो दूर के भी रिश्तेदार रानो के इर्दगिर्द मंडराने लगे थे. रानो जानती थी कि जितने चेहरे उस के आसपास मंडरा रहे हैं वे सब स्वार्थी हैं. बेटे के विदेश की कमाई का आकर्षण ही उन्हें खींच कर लाया है.

रानो की मां तो अब हर रोज ही आने लगी थीं. उन्होंने रानो पर दबाव डाला कि कुछ धन खर्च कर के अपने छोटे भाई शलभ को कोई छोटीमोटी दुकान खुलवा दे, क्योंकि उस की पढ़ाईलिखाई में रुचि नहीं है. रानो के पिता रिटायर हो चुके थे. जमापूंजी बेटियों की शादी में चुक गई थी.

रानो की चुप्पी से त्रस्त हो गईं मां. बेटे की आवारागर्दी और पति की बीमारी से वह टूट चुकी थीं. वह रानो से विनती करने लगीं कि शलभ को वह संभाल ले. जब रानो पर कोई असर नहीं हुआ तो उस की मां क्रोध से चीखने लगीं, ‘‘बहुत घमंड हो गया है तुझे पैसे का. बहुत पछताएगी तू, अगर शलभ किसी के गलत हाथों में पड़ गया और गलत रास्ते पर चल पड़ा.’’

मां के इस कथन पर प्रस्तर प्रतिमा बनी रानो चौंक पड़ी, ‘‘क्या कहा, मां? आप को बेटे की बड़ी चिंता है कि कहीं वह गलत हाथों में न पड़ जाए. मुझे 20 वर्ष की आयु में निरपराध घर से निकाला था. मेरी चिंता क्यों नहीं की? मैं भी तो गलत हाथों में पड़ सकती थी. उस छोटी सी उम्र में मुझे आप के सहारे की जरूरत थी. क्या कुसूर था मेरा? यही कि मैं जिंदा क्यों बच गई. अक्षम्य नहीं थी मैं मां…अक्षम्य नहीं थी मैं?’’

बहुत दिन बाद चुप्पी टूटी तो वर्षों से बांधा आंसुओं का बांध ध्वस्त हो गया. रोतेरोते बोली रानो, ‘‘मां, आप के क्रूर व्यवहार ने मुझे रेगिस्तान का कैक्टस बना दिया है, जिस में नफरत के फूल खिलते हैं…संवेदनशून्य बना दिया है आप ने मुझे अपने समान.’’

अपराधभाव से मां सिर झुका कर हकलाईं, ‘‘लोग नहीं मानते कि तू रात भर राजा के साथ रह कर भी…’’

‘‘लोगों की नहीं अपनी कहो. अपनी बेटी पर विश्वास नहीं था आप को? राजा ने मुझे संभाल लिया नहीं तो मेरा क्या हश्र होता?’’

अचानक मां फूटफूट कर रोते हुए बोलीं,  ‘‘मैं तेरी अपराधी हूं. क्षमा कर दे मुझे.’’

मां उसे गले लगाने के लिए आगे बढ़ीं तो रानो दूर हटती हुई क्रंदन कर उठी,  ‘‘जाओ मां, जाओ, राख न कुरेदो. अरमान को आप के दरवाजे पर बिठा कर नौकरी ढूंढ़ने गई थी. हृदय नहीं पसीजा आप का? अभी तक घाव से खून रिसता है याद कर के.’’

निराश मां चली गईं. मां के जाते ही रानो को याद आया कि दोषी उस की मां है, भाई नहीं. यह विचार आते ही वह अपने भाई का जीवन संवारने को उद्यत हो गई. मां के घर पहुंचने के पहले ही उस ने शलभ को फोन कर के अपने पास बुला लिया.

सुखद एहसास हुआ उसे कि जीवन के कड़वे अनुभवों ने उसे पूरी तरह से बंजर नहीं बनाया था. उस में मानवीय संवेदनाएं अभी शेष थीं.

कुछ बदल रहा है (अंतिम भाग)

पूर्व कथा

सुनीता भारत में बसे बेटे मनु से जब भी शादी की बात करतीं तो वह टाल जाता. विदेश में रहते हुए ही सुनीता उस की शादी के लिए कई भारतीय अखबारों और वेबसाइट पर उस की शादी का विज्ञापन देती हैं.

पिछली बार फोन पर बात करते हुए सुनीता मनु को चेतावनी देती हैं कि हमारे दिल्ली आने पर उसे शादी करनी पड़ेगी. पर मनु की ऊलजलूल बातें सुन कर सुनीता और परेशान हो जाती हैं.

10 साल से मनु अकेला भारत में रह रहा था. विदेश मंत्रालय में कार्यरत होने के कारण पति का तबादला होता रहता था, जिस के कारण वह बच्चों को पढ़ाई के लिए भारत भेज देती हैं. अब सुनीता की ख्वाहिश है कि बेटा शादी कर के घर बसा ले.

फोन पर बेटे की बातें सुन कर शर्मा दंपती जल्द ही दिल्ली आ जाता है. मनु उन्हें लेने एअरपोर्ट जाता है. घर की साफसफाई देख कर सुनीता मनु से पूछती हैं तो पति पंकज उस की गर्लफ्रेंड सेंनली के बारे में बताते हैं. सुनीता के पूछने पर मनु कहता है कि दोनों साथ पढ़ते थे. अगले दिन बेटी तुला भी दिल्ली आ जाती है.

सुनीता मनु को सेंनली से मिलाने के लिए कहती हैं. सेंनली जब आती है तो उसे देख कर वह चौंक जाती हैं. उस के टूटीफूटी हिंदी बोलने पर सुनीता और भी चिढ़ जाती हैं. सभी लोगों को सेंनली की मेहमाननवाजी में व्यस्त देख कर सुनीता को जलन होने लगती है.

और अब आगे…

नानी, तुला व पंकज से स्नेह से मिलते हुए सेंनली ने विदा ली. सुनीता को बस, दूर से ही उस ने हाथ जोडे़. मनु उसे टैक्सी स्टैंड तक छोड़ने चला गया.

सेंनली के जाने के बाद सुनीता अपनी जगह से हिलीं. सब से पहले अपने पति पर बिफरीं, ‘‘मुझे तो लड़की बिलकुल पसंद नहीं आई और तुम उस की फोटो पर फोटो खींचने में लगे थे.’’

‘‘अरे भई, अपने आफिस से जल्दी छुट्टी ले कर यह कह कर आया हूं कि लड़के की सगाई करनी है. वहां लोग पूछेंगे तो कुछ फोटो वगैरह तो उन्हें दिखानी ही पड़ेंगी.’’

‘‘और तुला, तेरे लिए भाई की गर्लफें्रड की खबर कोई नई खबर तो नहीं थी, तू शायद बहुत पहले से उसे जानती है.’’

‘‘मम्मी, आप जानने की बात कह रही हैं. मैं तो जब भी बंगलौर, भाई के पास जाती हूं, हम तीनों एकसाथ खूब घूमते हैं, रेस्तरां में जाते हैं, पिक्चर देखते हैं…’’

‘‘हम क्या मर गए थे जो तू ने भी हमें नहीं बताया?’’

‘‘भाई की प्राइवेट लाइफ मैं आप दोनों के साथ क्यों डिस्कस करूं,’’ तुला तुनक कर बोली, ‘‘भाई खुद ही बताए तो ठीक है वरना मैं क्यों…’’

प्राइवेट लाइफ. यह छोटेछोटे बच्चे कब इतने बड़े हो गए कि इन की जिंदगी अपनी निजी जिंदगी बन गई, जिस में मातापिता का हस्तक्षेप भी गवारा नहीं है. सहसा उन के दिमाग में कुछ कौंधा. बेटी से वह बोलीं, ‘‘तुला, अब तू भी बता दे कि कहीं तेरा तो किसी से कोई चक्कर वगैरह नहीं है?’’

‘‘मां, अतुल हिंदू है…और हमारी तरह ब्राह्मण भी,’’ वह ऐसे बोली जैसे समान जाति का होना कुछ कम हतप्रभ होने वाली बात हो.

सुनीता ने खामोश पति की तरफ देखा. क्या कहें वह अपने जवान बच्चों के बारे में.

‘‘यह अतुल…क्या तेरे साथ पढ़ रहा है?’’ पंकज ने बात का सूत्र पकड़ा.

‘‘1 साल मुझ से सीनियर है,’’ तुला शर्माते हुए बोली, फिर झट से उठी, अपना पर्स टटोला व एक फोटो निकाल कर उन की तरफ बढ़ा दिया. सुनीता व पंकज शर्मा दोनों काफी देर तक फोटो को निहारते रहे. लड़का रंगरूप में उन की लड़की से बीस ही था, उन्नीस नहीं.

‘‘पर बेटा, यह तुम पढ़ाई के वक्त लड़कों के चक्कर में…’’ सुनीता बेटी पर झुंझलाईं.

‘‘पढ़ाई भी हो रही है. सेकंड ईयर के अपने बैच में मेरी पोजीशन ऐसे ही तो नहीं आई है.’’

सुनीता की मां बीच में बड़बड़ाईं, ‘‘अब ज्यादा लागलपेट व नखरे मत करो. खुद तो दोनों विदेश में रहते हो और यहां बच्चों को अकेला छोड़ा हुआ है. बच्चे करेंगे ही अपनी मनमानी.’’

‘‘मां, अगर हम यहां दिल्ली में रहते भी तो क्या बच्चे हमारे साथ रहते? एक बंगलौर में रहता है और दूसरा हैदराबाद में. यहां कितने मांबाप के जवान बच्चे उन के साथ रहते हैं?’’

मनु जब सेंनली को छोड़ कर आया तो सुनीता उस से तरहतरह के प्रश्न पूछ कर सेंनली से उस की घनिष्ठता का जायजा लेने लगीं.

‘‘वह बंगलौर में तेरे घर से कितनी दूरी पर रहती है? उस का आफिस तेरे आफिस से कितनी दूर है? कितना तुम परस्पर मिलते हो? कहां मिलते हो? कैसे मिलते हो? एक छत के नीचे कभी अकेले में…’’

‘‘ओहो मम्मी… इस तरीके से मत कुरेदो. अपने बेटे को कुछ सांस तो लेने दो,’’ तुला चिल्लाई.

मां, पति व बेटी ने मिल कर सुनीता को समझाया कि सेंनली चाहे किसी भी प्रदेश की हो और किसी भी धर्म की हो, मनु की पसंद है. उन के बीच की घनिष्ठता पता नहीं किस हद तक है. उन की भलाई इसी में है कि चुपचाप उन के रिश्ते को स्वीकार कर लें और डेनमार्क जाने से पहले कुछ टीका वगैरह कर के अपनी तरफ से उसे होने वाली बहू का दरजा दे दें. बुझे मन से सुनीता मान गईं. विकल्प अधिक नहीं था.

सेंनली को फिर आमंत्रित किया गया. इस बार वह तनछुई साड़ी में     आई थी और माथे पर बिंदी भी लगाए हुए थी.

असमी ब्यूटी सुंदर लग रही थी. उस का चीनी जैसा रंगरूप सुनीता को रहरह कर अखर रहा था.

पंकज ने अंगरेजी में गंभीरता- पूर्वक सेंनली से बातें कीं. उस के राज्य के बारे में पूछा. उस के परिवार के बारे में पूछा. उस ने बताया कि उस का परिवार मूलत: असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तटों से घिरा तटवर्ती शहर माजूली का है. वहां उन का पुश्तैनी घर अब भी है और उस के दादादादी वहीं रहते हैं. पर उस के मातापिता नौकरी के सिलसिले में गुवाहाटी बस गए थे. 2 साल हुए पिता एक हादसे में गुजर गए. मां एक आफिस में क्लर्क हैं. 2 छोटी बहनें व 1 छोटा भाई अभी पढ़ ही रहे हैं. छोटा भाई मात्र 12 साल का है.

हालांकि सेंनली ने खुल कर कुछ कहा नहीं पर सुनीता व पंकज समझ गए कि सेंनली पर अपने परिवार की थोड़ी जिम्मेदारी है.

पंकज ने सुनीता को इशारा किया तो वह उठी और भीतर के कमरे में आ कर अलमारी से सोने का सैट निकाला जो वह कोपनहेगन से साथ ले कर आई थीं, इस इरादे से कि अगर सब ठीकठाक रहा तो होने वाली बहू को पहना देंगी. पर बहू की शक्ल देख कर उन का मन इस तरह खट्टा हो रखा था कि पूरे सैट के बजाय सिर्फ एक अंगूठी ही उसे पहनाने के लिए निकाली, जैसे एक औपचारिकता अदा करनी हो.

सेंनली को टीका लगाया और अंगूठी उसे पहना दी. सेंनली भी अपनी कुछ तैयारी के साथ आई थी. शायद मनु ने उसे फोन पर पहले ही बता दिया हो. उस ने अपने बैग से असमी सिल्क की हलके हरे रंग की सुंदर सी साड़ी निकाली, साथ में असम चाय के कुछ पैकेट और सुनीता को आदरपूर्वक थमा दिए. पंकज शर्मा ने फिर कुछ तसवीरें खींचीं. कुछ पोज बने. सेंनली को घेर कर सभी की वीडियो फिल्म बनी और सेंनली चली गई.

मगर उन सभी से विदा लेते वक्त सेंनली मुसकराते हुए बोली, ‘‘भाषा कोई भी हो, भाव समझ में आने चाहिए. पर मैं बंगलौर जाते ही कोई हिंदी भाषी स्कूल ज्वाइन करूंगी और हिंदी सीखूंगी. देखना…आप से अगली मुलाकात होने पर मैं फर्राटे से हिंदी में बात करूंगी.’’

सुनीता व पंकज 1 महीने के लिए भारत आए थे. भारत आने के एक नहीं कई मकसद हुआ करते थे, सो सेंनली से ध्यान हटा कर वे अपने रिश्तेदारों से मिले, जरूरी खरीदारी की, अपने शहर के डाक्टरों से अपने शरीर के कुछ परीक्षण करवाए, नए चश्मे बनवाए, बीकानेर वाले के यहां जा कर जायकेदार भारतीय स्नैक्स खाए.

10 दिन मातापिता के साथ रह कर तुला हैदराबाद चली गई थी. बेटीदामाद के जाने के दिन करीब आने पर मां भी अपने बेटे के पास लौट गईं. मनु आखिरी दिन तक उन के साथ बना रहा. उन्हें दिल्ली शहर में इधर से उधर घुमाता रहा.

1 माह का समय पलक झपकते ही बीत गया और फिर एक शाम सुनीता व पंकज कोपनहेगन जा रहे प्लेन पर बैठे हुए थे. मनु उन्हें एअरपोर्ट तक छोड़ने आया था. अगले रोज वह भी बंगलौर वापस लौट रहा था. दोनों में से किसी ने उस से नहीं पूछा कि उस का शादी को ले कर क्या विचार है.

हवाईजहाज ने जब उड़ान भरी और हिंदुस्तान की धरती उस ने छोड़ी तो सुनीता लंबी सांस भरते हुए पति से बोलीं, ‘‘दोनों बच्चों ने अपने साथी खुद ही तलाश कर लिए. हमारी तो उन्हें जरूरत ही नहीं रही.’’

पंकज बोले, ‘‘मनु की गर्लफें्रड को देख कर तो मुझे भी थोड़ा अफसोस हुआ है पर तुला के बौयफें्रड को ले कर सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूं. अरे, लड़की अगले साल पढ़ाई पूरी कर रही है. कहां मैं उस के लिए लड़का खोजता? उस ने खुद ही खोज कर हमारा काम हलका कर दिया.’’

भारत जाने से पहले सुनीता अपने घर की एक चाबी शीतल श्रीनिवासन को दे आई थी ताकि उन के न रहने पर शीतल घर में लगाए पौधों को पानी दे सकें और उन की डाक वगैरह चैक कर सकें. उन के पहुंचने से पहले ही दूध व ब्रेड वगैरह खरीद कर शीतल ने फ्रिज में रख दिए थे.

इस तरह का सहयोग दोनों परिवारों के बीच स्वत: ही कायम हो गया था. वह विदेशी भूमि पर थे. यहां न भाईबहन, न मातापिता, न नजदीकी रिश्तेदार, सिर्फ एक भारतीय ही दूसरे भारतीय की मदद करता है. सुनीता ने घर पहुंचते ही उसे फोन लगाया. वह बड़े मनसूबे बांध कर भारत गई थीं. उस से कह कर गई थीं कि अगर सबकुछ ठीक रहा था तो भारत 2-4 महीने के लिए टिक जाएंगी. बेटे की शादी कर के ही लौटेंगी.

‘‘आप भी पंकजजी के साथ वापस आ गईं?’’ शीतल श्रीनिवासन ने सुनीता की आवाज सुन कर हतप्रभ हो पूछा.

‘‘हां.’’

‘‘बेटे की शादी का क्या हुआ?’’

‘‘बहू को अंगूठी पहना आए हैं.’’

‘‘अरे, बधाई हो. आप इतनी अच्छी खबर इतने दुखी मन से क्यों सुना रही हो?’’

‘‘वह लड़की असम की ईसाई है. चाइनीज जैसी दिखती है.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ शीतल ने कहा, ‘‘दिल मिलने चाहिए. अच्छा, आप का खाना वगैरह…’’

‘‘खाना हम प्लेन में खा चुके हैं.’’

‘‘अच्छा, आप कल दोपहर लंच पर हमारे घर आइए. संडे है, आराम से बैठेंगे, बातें करेंगे.’’

दूसरे दिन भारत से लाए बीकानेर वाले की मिठाई का डब्बा और सेंनली की फोटो व वीडियो फिल्म ले कर वे दोपहर में उन के घर पहुंच गए. शीतल व उस के पति ने बड़ी दिलचस्पी से उन की होने वाली बहू की तसवीरों को निहारा. उन के बेटे की पसंद की दाद दी, ‘‘इस तरह की शादियां हमारे देश में होनी चाहिए. अब नई पीढ़ी के लोग ही ऐसी अंतरजातीय शादियां रचा कर हिंदुस्तान से जातिधर्म के भेदभाव को दूर कर सकेंगे. सदियों से पृथक हुई जातियां एकदूसरे से ऐसे ही जुड़ेंगी, परस्पर एकीकरण करेंगी.’’

35 साल की शीतल मेहरा ने खुद वेनू श्रीनिवासन से प्रेम विवाह किया था. वह पंजाबी थीं और वेनू दक्षिण भारतीय. 5 साल पहले वे शादी कर के मुंबई से कोपनहेगन आए थे. वेनू एक प्रतिष्ठित शिपिंग कंपनी में साफ्टवेयर प्रोफेशनल था. शीतल भी कोपनहेगन बिजनेस स्कूल से 2 साल का कोर्स कर के संयुक्त राष्ट्र की एक शाखा में नौकरी करने लगी थी. उन की 2 साल की प्यारी सी बच्ची भी थी. सुनीता शीतल के लिए बड़ी बहन जैसी और उस की बच्ची के लिए मौसी जैसी थीं.

एक दिन जब सुनीता, शीतल के साथ बैठी थीं, मन के ऊहापोह उस के सामने जाहिर करते हुए बोलीं, ‘‘शीतल, तुम मुझ से काफी छोटी हो. आजकल के जवान बच्चों के नए तौरतरीके मुझ से बेहतर समझती हो. तुला ने भी अपने लिए एक लड़का पसंद कर लिया है और मनु तो उस लड़की से पता नहीं कब से जुड़ा है…कहीं उन के बीच यौन घनिष्ठता…’’

‘‘आप को लगता नहीं कि भारतीय पुराने रीतिरिवाजों को अब थोड़ा बदलना चाहिए. आजकल आप की तरह 17-18 साल में तो लोगों की शादी नहीं होती. समाज में शादी की उम्र बढ़ रही है और लड़केलड़कियां प्यूबर्टी जल्दी हासिल कर रहे हैं. फिर टीवी, फिल्में व इंटरनेट का खुलाव…ऐसे में मातापिता अपने बच्चों से यह उम्मीद लगाएं कि उन के बच्चे 30-35 साल तक बिना सेक्स के रहें… मैं तो समझती हूं कि मातापिता स्वयं ही अपने बच्चों को उचित यौन शिक्षा दे कर उन्हें समझा दें ताकि उन के मन में बेवजह कोई गलत धारणा न पनपे, वे गलत राहों में न पड़ें.’’

‘‘शीतल…तुम्हारा भी वेनू से प्रेम काफी वर्षों तक चला था…उस दौरान कभी तुम दोनों के बीच…’’

एक पल के लिए शीतल ने सुनीता को निहारा. उन के प्रश्न को तौला. फिर बोली, ‘‘वैसे तो यह मेरा निजी मामला है पर आप की मनोस्थिति को समझते हुए बता देती हूं कि हां, हमारे बीच शादी से पहले कई बार सेक्स हुआ था. हमारे घर वाले हमारी शादी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि हम अलगअलग जातियों के थे. शुरू के 2 साल तक तो हम ने अपने पर संयम रखा, फिर एक बार हम अपने किसी फें्रड के घर अकेले में मिले और वहां… फिर न तो कोई झिझक रही और न संयम ही…’’

सुनीता सोचने लगी कि शीतल व वेनू एक आदर्श व समर्पित पतिपत्नी हैं. वे डेनमार्क में बसे एक ऐसे भारतीय युगल हैं जिस पर हर किसी भारतीय को गर्व है.

‘‘सुनीताजी, आप का बेटा मनु एक परिपक्व व पढ़ालिखा लड़का है. आप बेवजह की शंकाएं पाल कर टेंशन मत लीजिए.’’

अगर ऐसे मित्र मिल जाएं जो मन का बोझ हलका कर दें तो चाहिए ही क्या…सुनीता ने अपना मोबाइल उठाया. सीधे भारत बेटे को फोन मिलाया. पहले उस से कुछ इधरउधर की बातें कीं, फिर उस से चुहल करते हुए बोलीं, ‘‘तू अपनी सेंनली से मिल कर अपनी शादी की कोई तारीख तय कर के हमें बता दे. हम पहुंच जाएंगे तेरी शादी में भारत…’’

इस जहां में कई बार ऐसे भी होता है प्यार

जिंदगी में प्यार के फूल खिले हों और रिश्तों में मिठास तथा विश्वास हो तो हर पल खुदबखुद खूबसूरत हो जाता है. वे लोग खुशनसीब होते हैं, जिन्हें सच्चा प्यार मिलता है. सच्चा प्यार मिलने से ही कैनेडी मैरी का भी हर पल अब खुशियों भरा था. मैरी की गुलाबी आंखों, गुलाब की पंखुडि़यों की मानिंद नाजुक होंठों और आकर्षक गुलाबी चेहरे पर गजब की चमक थी. क्योंकि उसे सारे जहां की खुशियां जो मिल गई थीं. कमरे में बैठी मैरी कल्पनाओं के जरिए खुशियों के महल सजा रही थी. गबरू जवान पृथ्वी उस की जिंदगी की जरूरत बन गया था. पृथ्वी उस के वजूद का वह हिस्सा था, जिसे अब वह कभी खोना नहीं चाहती थी. पृथ्वी कमरे में दाखिल हुआ तो धड़कते दिल से उस के हर कदम की आहट मैरी महसूस कर रही थी. उस के सामने बैठ कर वह कुछ पलों के लिए उसे बेयकीन निगाहों से देखता रहा तो मैरी के होंठों पर थिरकन हुई, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हैं?’’

‘‘सोच रहा हूं कि किस्मत किसी पर इतना मेहरबान कैसे हो सकती है कि तुम जैसी खूबसूरत लड़की मुझे मिल गई.’’ पृथ्वी की इन बातों पर मुसकराते हुए मैरी ने कहा, ‘‘यह तो मैं भी नहीं जानती, लेकिन जिस तरह जिंदा रहने के लिए सांसें जरूरी हैं, अब उसी तरह तुम मेरे लिए हो गए हो. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा हमसफर इतनी दूर आ कर मिलेगा. एक बात और…’’

‘‘क्या?’’ पृथ्वी ने पूछा.

‘‘मैं ने सिर्फ तुम्हारे लिए अपना सब कुछ छोड़ा है. यहां तुम्हारे सिवा मेरा कोई नहीं है. उम्मीद करती हूं, तुम न कभी मेरा विश्वास तोड़ोगे और न साथ छोड़ोगे.’’ मैरी ने पृथ्वी की आंखों में आंखें डाल कर कहा तो उस ने उस के हाथ को अपने हाथ में ले कर विश्वास दिलाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘मैरी, तुम भी मेरी सांसों की जरूरत बन चुकी हो, इसलिए इस तरह की बात सोचना भी मत.’’

इस के बाद पृथ्वी और मैरी खुशियों के सफर पर निकल पड़े. मैरी और पृथ्वी कभी इस तरह एक हो जाएंगे, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था. उन का धर्म, जाति, भाषा और देश सब कुछ अलग था. मैरी सात समंदर पार से पृथ्वी का प्यार पाने के लिए चली आई थी और उसे अपना जीवनसाथी चुन लिया था. उन का जादुई अंदाज में हुआ प्यार एक ऐसी मिसाल बन गया था, जिस की हर तरफ चर्चा थी.

पृथ्वी सिंह हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के सलूणी उपमंडल के गांव तिवारी का रहने वाला था. पृथ्वी की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. वह एक होटल में काम करने के साथ स्कूली बच्चों को जूडोकराटे सिखाता था. इस के अलावा अतिरिक्त कमाई के लिए वह गाइड का भी काम कर लिया करता था.

करीब एक साल पहले की बात है, जब पृथ्वी टूरिस्ट की तलाश में डलहौजी गया था. डलहौजी मनमोहक वादियों और पर्वत शृंखलाओं से घिरा प्रमुख पर्यटकस्थल है. इसे अंगरेजों ने बसाया था. अंगरेज यहां गरमियों की छुट्टियां बिताने आते थे. खूबसूरत डलहौजी में देशविदेश से पर्यटक घूमने आते हैं.

एक दिन पर्यटकों की तलाश में भटक रहे पृथ्वी सिंह की नजर एक पार्क के किनारे बैठी विदेशी युवती पर पड़ी तो वह चौंका, क्योंकि उस के चेहरे पर जमाने भर की उदासी सिमटी हुई थी. इतना ही नहीं, उस के पास ढेर सारा सामान भी था. उसे देख कर पृथ्वी को थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि इतना सामान ले कर कोई पार्क में टहलने नहीं आता. अधिक से अधिक टूरिस्ट अपने पास पर्स या पीठ बैग ही रखते हैं.

पृथ्वी को लगा कि शायद युवती कुछ परेशान है, इसलिए उस के नजदीक जा कर उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हैलो, आई एम गाइड, एनी प्रौब्लम?’’

लड़की ने पलट कर उस की ओर देखा और बड़ी ही उदासी से मरी सी आवाज में बोली, ‘‘यस.’’

‘‘कैन आई हेल्प यू?’’

इस के बाद युवती ने बताया कि वह इसलिए परेशान है, क्योंकि पर्यटकों की भीड़ की वजह से उसे किसी होटल में रहने के लिए कमरा नहीं मिल सका है. काफी प्रयास के बाद भी जब वह कामयाब नहीं हुई तो अपना सामान ले कर पार्क में आ गई. उस की बातें सुन कर पृथ्वी ने हंसते हुए कहा, ‘‘ओके नो प्रौब्लम.’’

उस के इस अंदाज पर युवती की निगाहें उस पर टिक गईं. वह उस के चेहरे को देखती रही. पृथ्वी ने उस से वादा ही नहीं किया कि वह उस की हरसंभव मदद करेगा, बल्कि उसे अपने साथ ले जा कर एक होटल में उस के रहने का इंतजाम भी करवा दिया.

कमरा पा कर मैरी बहुत खुश हुई. उस ने पृथ्वी को पैसे देने चाहे, लेकिन उस ने मना कर दिया. उस के मददगार और हंसमुख स्वभाव ने मैरी पर गहरी छाप छोड़ी.

दोनों के बीच बातचीत हुई तो पता चला कि मैरी अमेरिका के वाशिंगटन की रहने वाली थी. उस ने सुन रखा था कि भारत विभिन्नताओं से परिपूर्ण आकर्षक पर्यटकस्थलों वाला देश है, इसीलिए वह भारत घूमने चली आई थी.

अगले दिन पृथ्वी ने मैरी को कई जगहों पर ले जा कर घुमाया. अपने घर से कोसों दूर मैरी को पृथ्वी में अपनापन लगा. उस ने उस के दिलोदिमाग पर अपनी छाप कुछ इस तरह छोड़ दी, जैसे किसी चित्रकार ने कोरे पेपर पर किसी तसवीर को बनाने के लिए महज एक लकीर खींची हो.

उस दिन चंद पलों के लिए मैरी ने पृथ्वी की निगाहों से निगाहें क्या मिलाईं, उस की आंखों में अपने लिए कुछ अलग सी हसरत महसूस की. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच दोस्ती काफी गहरी हो गई. मैरी हसीन ख्वाबों की दुनिया में जीने लगी. उसी बीच मैरी समझ गई कि खुद उस के दिल की तरह पृथ्वी के दिल में भी कुछ हो रहा है. यह अलग बात थी कि पृथ्वी ने उस पर कुछ जाहिर नहीं किया था. दोनों सिर्फ एकदूसरे की धड़कनें महसूस कर रहे थे.

दोनों का साथ घूमना और खूब बातें करना रोज की बात थी. अब वे आंखों को करार देने का बहाना तलाशने लगे. उन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, इस का पता न मैरी को चला और न ही पृथ्वी को. दोनों के ही दिलों में प्यार के फूल खिल रहे थे, लेकिन अपनी भावनाओं को वे कैद किए रहे. आखिर एक दिन मैरी ने ही प्यार के सफर पर कदम आगे बढ़ाया, ‘‘पृथ्वी, तुम ने कभी किसी से प्यार किया है?’’

मैरी की बात पर पृथ्वी कुछ देर के लिए खामोश रह गया. मैरी उसे देखती रही. उस ने अपना सवाल फिर दोहराया तो पृथ्वी बोला, ‘‘किया है.’’

‘‘कौन है वह खुशनसीब?’’

‘‘सौरी, अभी नहीं बता सकता. मुझे अभी उस के इजहार का इंतजार है. क्या तुम ने किसी से प्यार किया है?’’

‘‘पहले तो नहीं किया, लेकिन अब करती हूं.’’

‘‘किस से, कहां रहता है वह?’’

‘‘वह तुम हो पृथ्वी. मैं तुम्हें बहुत चाहती हूं.’’

पृथ्वी मुसकरा दिया. प्यार पर स्वीकृति की मुहर लगते ही दोनों की झोली में जैसे सारे जहां की खुशियां आ सिमटीं. अब तक पृथ्वी को इस बात का अहसास हो गया था कि मैरी को भारत से काफी लगाव हो गया है.

बातों और मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया तो उन के प्यार का पौधा भी बढ़ा. दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं. दोनों ही एकदूसरे को टूट कर चाहते थे. प्यार में कसमेवादे आम बात हैं. उन के वादे कैसे पूरे होंगे, दोनों ही नहीं जानते थे. भाषा, देश, जाति और धर्म किसी भी मामले में उन के बीच समानता नहीं थी.

मैरी को वापस अपने देश जाना था, लेकिन मन ही मन उस ने पृथ्वी को जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया था, इसलिए शादी के मसले पर वह खुल कर बात कर लेना चाहती थी. उस ने पूछा, ‘‘पृथ्वी, शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?’’

‘‘मैरी, तुम ऐसे पूछ रही हो, जैसे अभी मिनटों में शादी की रस्मों को पूरा कर दोगी.’’

‘‘रस्में तो अपने घर वालों से बातें कर के ही निभाऊंगी. मैं चाहती हूं कि तुम भी एक बार अपने घर वालों से बात कर लो.’’

‘‘यू आर सीरियस…क्या तुम सच कह रही हो?’’

‘‘तुम भी तो यही चाहते हो न. मैं तुम से सच्चा प्यार करती हूं.’’

मैरी अपने घर वालों से बातें करती ही रहती थी. उस ने उन से पृथ्वी से दोस्ती और प्यार के बारे में बता भी दिया था. इस बीच वह पृथ्वी के घर जा कर उस के घर वालों से मिल चुकी थी. उस की वीजा अवधि समाप्त हो रही थी. उस का वापस जाने का वक्त आया तो पृथ्वी का दिल बैठने लगा. उस की परेशानी मैरी जानती थी. वह खुद भी वापस नहीं जाना चाहती थी. लेकिन उस की मजबूरी थी.

उस ने वादा किया, ‘‘मैं तुम से दूर नहीं जा रही पृथ्वी. महसूस कर के देखना, मुझे हरदम अपने साथ खड़ा पाओगे. सच्चा प्यार इंसान जिंदगी में सिर्फ एक बार ही करता है और वह मैं ने तुम से किया है. मैं यहां सिर्फ घूमने आई थी. यहां तुम्हारा प्यार मिल गया, यह मेरे लिए खुशी की बात है. मैं अपने मातापिता को मनाऊंगी, तभी हमारी शादी होगी.’’

‘‘अगर वे तैयार न हुए तो..?’’ पृथ्वी ने आशंका प्रकट की.

‘‘तुम्हारी आशंका जायज है डियर, लेकिन हमारे प्यार की डोर इतनी कमजोर भी नहीं है. वे मेरी खुशी के लिए तैयार हो जाएंगे. हमारा धर्म, संस्कार और देश भले ही अलग है, लेकिन मेरे दिल ने सिर्फ तुम्हारी धड़कन को महसूस किया है. मैं ने आत्मा से तुम्हें प्यार किया है. जब से तुम मेरी जिंदगी में आए हो, मैं ने अपनी हर खुशी को तुम से जोड़ कर देखा है. अब तुम्हारे सिवा किसी और के साथ अपनी दुनिया बसाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती.’’

मैरी की बातों में दृढ़ता थी. उस का हर एक शब्द इस बात का सबूत था कि वह जो कह रही है, उसे सच कर दिखाएगी. उस ने आगे कहा, ‘‘मैं अब जब भी वापस आऊंगी, हमेशा के लिए तुम्हारी हो जाऊंगी पृथ्वी. तुम मेरा इंतजार करना.’’

इस के बाद दोबारा आने का वादा कर के मैरी अपने देश चली गई. दोनों के बीच फोन पर बातों का सिलसिला चलता रहा. पृथ्वी को मैरी पर विश्वास तो था, लेकिन वह अपना वादा निभा पाएगी, इस की उम्मीद थोड़ा कम थी. क्योंकि अपने लोगों और देश को छोड़ना कोई आसान नहीं होता.

मैरी का मन बदल भी सकता था. पृथ्वी के दिन कशमकश में बीत रहे थे. एक दिन वह ऐसे ही विचारों में खोया था कि मैरी का फोन आया, ‘‘पृथ्वी, मैं जल्द ही इंडिया आने वाली हूं.’’

‘क्या?’’ पृथ्वी ने हैरानी से पूछा.

‘‘क्यों, इस में हैरान होने की क्या बात है. आप के लिए एक खुशखबरी भी है.’’ मैरी ने चहकते हुए कहा, ‘‘मौम डैड मेरी शादी के लिए तैयार हो गए हैं.’’

इस के बाद मैरी ने उस की बात अपने मातापिता से भी कराई. वे बेटी की खुशी में खुश थे. कई महीने बीत गए. मैरी अपने प्यार को निभाने का पुरजोर वादा करती रही. वह पृथ्वी को जीवनसाथी बनाने का सपना दिल में संजो कर दिसंबर, 2016 के आखिरी सप्ताह में इंडिया आ गई.

मैरी डलहौली पहुंची तो पृथ्वी बहुत खुश हुआ. इस बीच उन के प्यार का रंग और भी गहरा हो चुका था. मैरी ने अपना प्यार दर्शाने के लिए अपनी गरदन के नीचे पृथ्वी के नाम का टैटू भी बनवा लिया था. पृथ्वी के घर वाले भी इस शादी के लिए तैयार थे. अपने बीच की दूरियां दोनों को अब दुश्मन लगने लगी थीं.

2 जनवरी, 2017 को आखिर दोनों ने सलूणी के मजिस्ट्रैट अजय पाराशर के यहां विवाह अधिनियम के तहत कोर्टमैरिज कर ली.

अमेरिका की भौतिकवादी जिंदगी से दूर गांव में जीवन बिता रही मैरी का कहना है कि इंडिया बहुत प्यारा देश है. उस ने सोचसमझ कर ही पृथ्वी से शादी का फैसला लिया है.

वहीं पृथ्वी मैरी को पा कर बहुत खुश है. उस ने सोचा भी नहीं था कि कोई विदेशी लड़की उसे स्वीकार करेगी और अपना देश छोड़ कर उस के पास रहने आ जाएगी. दोनों प्रेमियों की शादी चर्चा का विषय बनी हुई है. वे खुशी से जीवन बिता रहे हैं.

लेटलतीफी के मुरीद आखिर क्यों हैं हम

ऐसा लगता है कि वक्त की कीमत नहीं समझना और आधा घंटा देरी संबंधी भारतीय मानक समय के कुख्यात मुहावरे को हमारे सरकारी कर्मचारियों ने पूरी तरह आत्मसात कर रखा है, वरना इस बारे में सरकार को बारबार अपनी चिंता नहीं प्रकट करनी पड़ती. इस का एक उदाहरण तब देखने को मिला, जब दिल्ली के नवनियुक्त चीफ सैक्रेटरी एम एम कुट्टी ने दिसंबर 2016 के आखिरी हफ्ते में सभी विभागों के सचिवों को निर्देश जारी कर के लेटलतीफ बाबुओंकर्मियों का पता लगाने और आदतन ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ा ऐक्शन लेने को कहा. मोदी सरकार पहले भी दफ्तरों में देर से आने वाले कर्मचारियों से परेशान है और वह सरकारी मंत्रालयों, विभिन्न विभागों और दफ्तरों में कामकाज की लुंजपुंज शैली में लगातार आग्रह के बावजूद, सुधार होता नहीं देख कर लेटलतीफ कर्मचारियों पर नजर रखने व उन पर कार्यवाही करने का संकेत देती रही है. पर लगता है कि सरकारी बाबुओं ने ठान रखा है कि सरकार चाहे जितने डंडे चला ले वे अपनी लेटलतीफी की आदत नहीं बदलेंगे.

उल्लेखनीय है कि डिपार्टमैंट औफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) वर्ष 2015 में जारी एक निर्देश में साफ कह चुका है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए आदतन देर से दफ्तर आना दंडनीय अपराध है और ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा सकती है. इस के लिए सर्विस रूल्स (नौकरी संबंधी नियमावली) का हवाला दिया गया था. जारी आदेश में कहा गया था कि सरकारी कर्मचारियों के लिए समय की पाबंदी सुनिश्चित करने का दायित्व मंत्रालयों, विभागों और कार्यालयों का है, इसलिए उन के अधिकारी विभाग के कर्मचारियों की उपस्थिति का रिकौर्ड रखें.

डीओपीटी ने सभी अधिकारियों से कहा था कि वे उपस्थिति के लिए बायोमैट्रिक सिस्टम को ही आधार मानें और उसी आधार पर कार्यवाही करें. पर लेटलतीफी की आदत से मजबूर सरकारी कर्मचारियों ने बायोमैट्रिक सिस्टम से बचने के कई उपाय कर रखे थे और वे उपस्थिति दर्ज करने के लिए दूसरे तरीकों को अपनाए हुए थे.

यही नहीं, जिन कार्यालयों में उपस्थिति दर्ज करने के आधुनिक तौरतरीके अपना लिए गए हैं, वहां भी उपस्थिति का रिकौर्ड नहीं रखा जाता. इस से कुछ समय बाद यह पता नहीं चलता कि एक निश्चित समयावधि के बीच कौन सा कर्मचारी आदतन समय पर नहीं आता रहा है.

डीओपीटी के निर्देश में यह भी सुझाया गया था कि एक सरकारी कर्मचारी के लिए एक हफ्ते में 40 घंटे (8 घंटे प्रतिदिन) की उपस्थिति अनिवार्य है. ऐसी स्थिति में यदि कोई कर्मचारी महीने में 2 बार 30 मिनट की देरी से आता है, तो उसे समय की पाबंदी में छूट मिल सकती है, लेकिन तीसरी बार इतनी ही देरी पर उस की आधे दिन की छुट्टी काट ली जाएगी. यदि वह आदतन ऐसा करता रहता है, तो वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट (अप्रेजल) में उस के बारे में नकारात्मक टिप्पणी की जा सकती है.

आदत से मजबूर

 सरकारी विभागों में काम के वक्त अधिकारियों व कर्मचारियों का नदारद रहना और अपनी कुरसी पर देर से आना खास कर तब अखरता है, जब उस अधिकारी व कर्मचारी के जिम्मे जनता से जुड़े कामकाज हों. ऐसी स्थिति में लोग लंबी लाइन लगा कर कर्मचारी व अधिकारी के दफ्तर और अपनी सीट पर विराजमान होने का लंबा इंतजार करते रहते हैं. ऐसे कर्मचारी को यदि कोई व्यक्ति भूलवश देरी से आने के लिए कोई बात कह दे, तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति का कोई काम हो पाना नामुमकिन ही हो जाता है.

यही नहीं, दफ्तर आ कर भी अपनी सीट से गायब हो जाना भी ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों की आदत में शुमार हो गया है, वे घंटों तक दफ्तर तो क्या, उस के आसपास तक नजर नहीं आते, भले ही लाइन में जनता अपने सौ काम छोड़ कर सिर्फ उन का वहां इंतजार ही क्यों न कर रही हो. इन मुश्किलों का समाधान क्या है?

बायोमैट्रिक सिस्टम का तोड़

 देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में भले ही अटैंडेंस के लिए बायोमैट्रिक सिस्टम की शुरुआत हो चुकी है, पर अन्य हिस्सों में मौजूद ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उपस्थिति दर्ज कराने का पुराना सिस्टम चला आ रहा है, जिस में कर्मचारी औफिस में रखे रजिस्टर में अपने नाम के आगे हस्ताक्षर करते हैं. इस में अकसर समय के उल्लेख का कोई प्रावधान नहीं होता.

यदि समय दर्ज किया जाता है, तो जरूरी नहीं कि वह एकदम सही लिखा जाए और महीने के आखिर में उस उपस्थिति के आधार पर कर्मचारी की छुट्टियों और वेतन का समायोजन किया जाए. इस में भी बाबुओं की मिलीभगत से कोई कर्मचारी दफ्तर आए बिना वर्षों तक अपनी उपस्थिति लगवाता रह सकता है. ऐसे दर्जनों किस्से उजागर हो भी चुके हैं जब कोई कर्मचारी दफ्तर आए बिना वेतन लेता रहता है.

उपस्थिति के सिस्टम के आधुनिकीकरण का तब भी कोई फायदा नहीं, जब तक कि दफ्तर आए कर्मचारी की अनिवार्य मौजूदगी के प्रमाण न जुटाए जाएं. कार्ड पंचिंग के तौरतरीकों के दुरुपयोग की भी सैकड़ों शिकायतें मिल चुकी हैं. ऐसे सिस्टम में भी तब मिलीभगत एक कामयाब नुस्खे के तौर पर आजमाई जाती रही है, जब एकदूसरे के कार्ड से कर्मचारी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे हैं. यही वजह है कि अब सरकार उपस्थिति दर्ज करने के मौजूदा तौरतरीकों को खत्म कर उन की जगह ऐसा बायोमैट्रिक सिस्टम लागू करना चाहती है जो सारे मैन्युअल सिस्टम की जगह ले सके. आधार एनेबल्ड बायोमैट्रिक अटैंडेंस सिस्टम (एईबीएएस) नामक इस प्रणाली में कर्मचारी की उंगलियों व आंखों की पुतलियों की छाप ली जा सकेगी, जिस से उपस्थिति की धांधलियों पर काफी हद तक रोकथाम की उम्मीद है. पर ये सिर्फ यांत्रिक उपाय हैं. ऐसे में इस की भरपूर आशंका आगे भी रहेगी कि कामचोर व बेईमान कर्मचारी इन का कोई न कोई तोड़ निकाल लें.

सवाल कार्य संस्कृति का

नियमों का पालन डंडे के बल पर करवाना पड़े, तो किसी देश और समाज के लिए इस से ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है. आखिर हमारे देश में ऐसी कार्य संस्कृति क्यों नहीं जग पा रही है जिस में वक्त पर दफ्तर आना, सौंपे गए काम और जिम्मेदारी का समर्पण के साथ निर्वाह करना और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना लोग जरूरी समझते हों.

देश में जो नई कौर्पोरेट संस्कृति पनप रही है उस में देर से दफ्तर आने वालों के लिए कोई जगह नहीं होती है. वहां देर से दफ्तर आने वालों के लिए पर्याप्त दंड की व्यवस्था है. इस से कर्मचारी वक्त के पाबंद रहते हैं. अचरज इस बात को ले कर होता है कि सरकारी कर्मचारियों ने इस बदलाव का जरा भी नोटिस नहीं लिया है और इस का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार जब तक उन पर पाबंदियां नहीं लगाएगी, तब तक वे नहीं सुधरेंगे.

इस सिलसिले में एक दावा यह किया जाता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही जिस प्रकार सरकारी कार्यालयों में बायोमैट्रिक अटैंडेंस लागू करवाने की बात कही थी, उस से सरकारी कर्मचारियों में काफी नाराजगी थी. बताते हैं कि इस का बदला उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनावों में लिया और केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को करारा झटका दिया.

ऐसी सूरत में सरकारी कर्मचारियों को सख्त कायदों के बल पर दफ्तरों में उपस्थित रहने को मजबूर करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है. इसलिए ज्यादा जरूरत लोगों को यह समझाने की है कि समय को ले कर उन की काहिली देश और समाज ही नहीं, खुद उन के लिए भी दिक्कतें पैदा करती है. उन्हें ऐसे उदाहरण देने की जरूरत है कि जिन पिद्दी से देशों ने मामूली संसाधनों के बल पर पूरी दुनिया में छा जाने के करिश्में किए हैं, उस में उन की कार्यसंस्कृति का बड़ा भारी योगदान है.

जापान इसी एशिया का एक मुल्क है जहां लोग देर से दफ्तर आने को सिर्फ अपराध नहीं मानते हैं, बल्कि औफिस पहुंचने पर दिए गए काम को नहीं कर पाना भी खुद उन के लिए गुनाह है. जापानी वक्त के किस कदर पाबंद हैं, इस का एक उदाहरण भारत में करीब एक दशक पहले देखने को मिला था. वर्ष 2004 में एक जापानी इंजीनियर मत्सू काजू हिरो अपनी कंपनी के काम से भारत आया था. दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरने के एक घंटे बाद तक जब भारत स्थित कंपनी की इकाई की गाड़ी उसे लेने नहीं पहुंची, तो देरी से खफा मत्सू ने फौरन जापान वापसी की फ्लाइट पकड़ ली थी. हवाईअड्डे पर विलंब का यह नजारा डेढ़ दशक में भी नहीं बदला.

एयरइंडिया की लेटलतीफी

यह किस्सा सरकार के वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू से जुड़ा है. वर्ष 2016 में एक अवसर पर उन्हें एयर इंडिया की जिस फ्लाइट से हैदराबाद में आयोजित एक महत्त्वपूर्ण सरकारी बैठक में जाना था, वह फ्लाइट पायलट के नहीं पहुंचने के कारण समय पर उड़ान ही नहीं भर पाई. घंटों इंतजार के बाद वेंकैया नायडू घर वापस लौट गए और नाराजगी में सोशल मीडिया पर ट्वीट करते हुए एयर इंडिया से यह कहते हुए जवाब मांगा कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में एयर इंडिया इतनी लेटलतीफी आखिर कैसे कर सकती है.

एयर इंडिया ने इस मामले में मंत्रीजी से माफी मांग ली, पर इस सरकारी उपक्रम में विलंब का यह पहला वाकेआ नहीं था. ऐसा तकरीबन हर रोज होता है पर उन उड़ानों में कोई वीआईपी नहीं होने के कारण देरी कोई मुद्दा नहीं बनती.

ध्यान रहे कि छोटेछोटे देशों ने घड़ी की सूइयों के साथ कदमताल कर के ही विकसित होने की राह खोली है. अब तो ऐसे उदाहरण देश में ही कई निजी कंपनियां पेश कर रही हैं. उन्होंने लगभग हर कायदे में सरकारी प्रतिष्ठानों से आगे निकल कर साबित कर दिया है कि कार्यसंस्कृति को बदलने का कितना बड़ा फर्क किसी संस्थान की तरक्की पर पड़ता है. सरकारी और निजी बैंकों के कामकाज में अंतर आज हर व्यक्ति महसूस करता है.

ऐट द इलेवैंथ आवर

सवाल यह है कि डीओपीटी के निर्देश और बायोमैट्रिक सिस्टम सरकारी कर्मचारियों को वक्त का पाबंद बनाते हैं या फिर सरकारी दफ्तरों में ये कायदे और उपाय सिर्फ आधुनिकीकरण का एक पैबंद बन कर रह जाते हैं. असल में बात भारतीय आदतों की है. अंतिम क्षणों यानी ‘ऐट द इलेवैंथ औवर’ पर ही जगने का उपक्रम करने की इस मानसिकता के दर्शन देश में हर जगह होते हैं.

आयकर रिटर्न दाखिल कराना हो, स्कूलकालेज में फीस भरनी हो, बिजली व टैलीफोन के बिल जमा करने हों या कोई अन्य काम निबटाना हो, अमूमन ये सभी काम एक औसत भारतीय अंतिम दिन और आखिरी घंटे तक टालता है. नतीजा है लंबीलंबी, बोझिल कतारें. यही मनोवृत्ति दफ्तरों, विशेषरूप से सरकारी कार्यालयों में बाबुओं के पहुंचने को ले कर भी है और शायद इसलिए भारतीय मानक समय यानी तय समय से आधा घंटा लेट का तंजभरा मुहावरा प्रचलित है.

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