आतंकवाद के मसले पर सोचे पाकिस्तान

कहा जाता है कि चिट्ठियां आधी मुलाकात होती हैं. लेकिन यह कथन उन चिट्ठियों पर ही लागू होता है, जो इंसानों के आपसी रिश्तों को जोड़ती हैं. लेकिन देशों के रिश्तों में जो चिट्ठियां लिखी जाती हैं या जो संदेश भेजे जाते हैं, वहां इंसानी रिश्तों जैसी गरमी की उम्मीद व्यर्थ है. वहां चिट्ठियां या संदेश अक्सर महज प्रोटोकॉल भर होते हैं, यानी ऐसी औपचारिकता, जिसे निभाया ही जाना था. ऐसी चीजों में बहुत ज्यादा अर्थ खोजा जाए, तो मामला अनर्थ की ओर ही बढ़ता है.

पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें जो संदेश भेजा है, उसका सार इतना ही है. पड़ोसी देश में आए नए प्रधानमंत्री को बधाई संदेश भेजना उनका कूटनीतिक दायित्व था, जिसे उन्होंने बदस्तूर निभाया भी. जाहिर है, ऐसे संदेश में दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की उम्मीद भी व्यक्त होनी ही थी.

प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि ‘भारत उम्मीद कर रहा है कि पाकिस्तान के साथ रचनात्मक और अर्थपूर्ण ढंग से बात आगे बढ़ेगी’. यह संदेश भेजते समय न तो प्रधानमंत्री मोदी और न ही विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को उम्मीद होगी कि इसे वार्ता का प्रस्ताव मान लिया जाएगा. लेकिन हुआ ऐसा ही.

न जाने किसी उत्साह में पाकिस्तान के नव-नियुक्त विदेश मंत्री शाह मुहम्मद कुरैशी ने इसे वार्ता का प्रस्ताव मान लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने मीडिया को भी बताया कि भारतीय प्रधानमंत्री ने वार्ता का प्रस्ताव भेजा है. कुरैशी का यह बयान हैरत में डालने वाला इसलिए भी था कि इमरान खान के लिए सियासत नई चीज हो सकती है, कुरैशी के लिए वह नई चीज नहीं है. और तो और, कुरैशी तीन साल के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री भी रह चुके हैं.

बेशक कुरैशी की मीडिया से बातचीत का विषय यह नहीं था, मंत्री पद संभालने के बाद वह पहली बार पत्रकारों से बात कर रहे थे. इस बातचीत में उन्होंने खासकर भारत और अफगानिस्तान से रिश्ते सुधारने की बात रखी. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के साथ ऐसी निरंतर वार्ता चलनी चाहिए, जिसमें कोई बाधा न आए. और इसी के साथ उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री के वार्ता प्रस्ताव की बात भी जोड़ दी, जिसका नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने तुरंत ही खंडन कर दिया. मंत्रालय ने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री ने तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को औपचारिक बधाई संदेश भेजा था, वार्ता का प्रस्ताव नहीं.

ऐसा अतिउत्साह में हुआ, भूलवश हो गया या फिर जान-बूझकर, किसी भी तरह से भारत-पाकिस्तान की वार्ता का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है. यह सच है कि भारत ने पाकिस्तान के साथ वार्ता से कभी इनकार नहीं किया है. बल्कि हर बार उसने तमाम चीजों को भुलाकर बातचीत के लिए न सिर्फ हामी भरी है, बल्कि उसकी शुरुआत भी की है. लेकिन हर बार कोई बड़ी आतंकवादी वारदात हो जाती है और बातचीत टूट जाती है. इसकी वजह से इधर काफी समय से भारत का रुख यही रहा है कि बातचीत तभी हो सकती है, जब पाकिस्तान आतंकवादियों को समर्थन देना और भारत में उनका निर्यात करना बंद करेगा.

कुरैशी जिस निरंतर और अटूट वार्ता की बात कर रहे हैं, वे इन्हीं स्थितियों में हो सकती है. रिश्ते सुधारने की बात खुद इमरान खान भी कर चुके हैं, अगर वह सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें सबसे पहले आतंकवाद के मसले पर सोचना होगा.

पत्नी की अनोखी शर्त

18 मार्च, 2018 को सुबह के यही कोई 10 बजे थे. चिमियावली गांव के निकट गेहूं के खेत में गांव वालों ने एक महिला व उस के 100 मीटर दूर एक बच्चे की नग्न अवस्था में सिर कटी लाश पड़ी देखीं. यह गांव उत्तर प्रदेश के जिला संभल के थाना कोतवाली के अंतर्गत आता है.

गांव वालों ने यह बात गांव के चौकीदार रामरतन को बताई. चौकीदार रामरतन तुरंत उस खेत में पहुंच गया जहां लाशें पड़ी थीं. 2-2 लाशें देख कर वह भी चौंक गया. उस ने फोन द्वारा इस की सूचना थानाप्रभारी अनिल समानिया को दे दी. 2 लाशों की खबर मिलते ही अनिल समानिया पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए.

उन्होंने दोनों लाशों का निरीक्षण किया तो वहां पड़े खून से लग रहा था कि उन की हत्याएं वहीं पर ही की गई थीं. दोनों के सिर धड़ से गायब थे. साथ में उन के ऊपर कोई कपड़ा भी नहीं था. मृत महिला के एक हाथ की खाल भी कुछ जगह से गायब थी.

इस से यह अनुमान लगाया कि उस महिला के हाथ पर उस का नाम या पहचान की कोई चीज गुदी हुई होगी. महिला की पहचान न हो सके, इसलिए हत्यारे ने हाथ के उतने हिस्से की खाल ही काट दी थी. अपने उच्चाधिकारियों को इस लोमहर्षक मामले की जानकारी देने के बाद थानाप्रभारी आसपास के क्षेत्र में दोनों मृतकों के सिर तलाशने लगे.

इस काम में गांव वाले भी उन का साथ दे रहे थे. काफी खोजबीन के बाद भी उन के सिर नहीं मिल सके. लेकिन वहां पर मृतकों के कपड़े और चप्पलें जरूर मिल गईं, 2 जोड़ी चप्पलों के अलावा वहां छोटे बच्चे की एक जोड़ी चप्पलें और मिली. जब मरने वाले 2 लोग हैं तो यह तीसरी जोड़ी चप्पल किस बच्चे की है, यह बात पुलिस नहीं समझ सकी.

बिना सिर के लाशों की शिनाख्त करना आसान नहीं था. थानाप्रभारी द्वारा सिरविहीन 2 लाशों की सूचना एसपी रविशंकर छवि और एएसपी पंकज कुमार पांडे को दे दी गई. कुछ देर में दोनों पुलिस अधिकारी भी चिमियावली गांव के उस गेहूं के खेत में पहुंच गए, जहां दोनों लाशें पड़ी थीं.

अधिकारियों ने मौका मुआयना करने के बाद गांवों वालों से लाशों की शिनाख्त के लिए बात की उन्हें मृतकों के कपड़े दिखाए. लेकिन कोई भी उन्हें नहीं पहचान सका.

मौके पर फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया गया. घटनास्थल पर मिले सारे सबूतों को पुलिस ने जब्त कर लिया. घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने दोनों लाशों को सुरक्षित रखवाने के लिए जिला चिकित्सालय भेज दिया और चौकीदार रामरतन की तरफ से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

सिर विहीन 2 लाशें मिलने की खबर कुछ ही देर में पूरे शहर में फैल गई. सभी लोग आपस में यही चर्चा कर रहे थे कि पता नहीं शव किस के हैं. न मालूम मृतक कहां के रहने वाले थे. उधर थानाप्रभारी भी इस बात को ले कर परेशान थे कि इन लाशों की शिनाख्त कैसे कराई जाए. शिनाख्त के बाद ही हत्यारों तक पहुंचा जा सकता था.

लिहाजा शिनाख्त के लिए जिले के समस्त थानों में वायरलैस द्वारा इन अज्ञात लाशों के मिलने की सूचना प्रसारित कर यह जानकारी जाननी चाही कि कहीं किसी थाने में एक महिला और बच्चे की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. पर पुलिस की इन कोशिशों से भी कोई सफलता नहीं मिली. आखिर पुलिस ने दोनों शवों का पोस्टमार्टम करा कर  उन का अंतिम संस्कार करा दिया.

8-10 दिन बीत गए लेकिन मृतकों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. थानाप्रभारी के दिमाग में यह बात भी आई कि कहीं दोनों मृतक किसी दूसरे जिले के रहने वाले तो नहीं हैं. इस के बाद एसपी के माध्यम से सिरविहीन 2 लाशों के बरामद करने की सूचना सीमावर्ती जिलों के थानों में भी भेज दी गई.

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इसी बीच पहली अप्रैल, 2018 को थानाप्रभारी को चिमियावली गांव के पास बहने वाली सोन नदी के किनारे एक महिला का सिर पड़े होने की जानकारी मिली तो वह वहां पहुंच गए और सिर को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. वह सिर 18 मार्च को बरामद हुई सिरविहीन महिला की लाश का है या नहीं, इस की पुष्टि डीएनए जांच के बाद ही हो सकती थी.

इस के 8 दिन बाद यानी 8 अप्रैल को पुलिस ने मोहम्मदपुर मालनी गांव के जंगल से एक बच्चे का सिर बरामद कर लिया. उस का मांस जंगली जानवर खा चुके थे. अब इस बात की आशंका प्रबल हो गई कि यह दोनों सिर पूर्व में बरामद की गई दोनों लाशों के ही होंगे.

मुरादाबाद बरेली परिक्षेत्र के एडीजी प्रेमप्रकाश को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने मुरादाबाद रेंज के आईजी विनोद कुमार से बात कर इस मामले को गंभीरता से लेने को कहा.

एडीजी प्रेमप्रकाश बहुत सुलझे हुए अफसर थे. जब वह मुरादाबाद के एसएसपी थे तो उन्होंने चर्चित किडनी कांड को सुलझा कर डा. अमित को सलाखों के पीछे पहुंचाया था. इस के अलावा उन्होंने बावन खेड़ी में एक ही परिवार के 7 लोगों की निर्मम तरीके से की गई हत्या के मामले को सुलझा कर शबनम और उस के प्रेमी को जेल भिजवाया था. एडीजी की इस दोहरे मर्डर पर भी निगाह बनी हुई थी.

एडीजी प्रेमप्रकाश का निर्देश मिलते ही आईजी विनोद कुमार ने संभल के एसपी रविशंकर छवि और एएसपी पंकज कुमार पांडे के साथ मीटिंग कर इस केस को जल्द से जल्द खोलने के लिए कहा. इस के बाद तो थानाप्रभारी अनिल समानिया के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम इस केस को खोलने में जुट गई. उन्होंने मुखबिरों को भी लगा दिया.

14 अप्रैल को चिमियावली गांव के चौकीदार रामरतन ने थानाप्रभारी अनिल समानिया को सटीक सूचना देते हुए कहा कि गांव के हिस्ट्रीशीटर कलुआ के घर 3-4 साल की एक लड़की आई हुई है. वह लड़की बारबार रोरो कर कहती है कि मुझे मेरी मम्मी से मिलवाओ. यह बात मुझे गांव की औरतों ने बताई है. उन औरतों में भी इस बात की चर्चा है कि कलुआ के परिवार में यह लड़की पता नहीं कहां से आ गई.

इतना सुनते ही थानाप्रभारी का माथा ठनका. उन के दिमाग में एक बात घूम गई कि उन दोनों के शवों के पास भी पुलिस को 1 छोटे बच्चे की एक जोड़ी चप्पलें मिली थीं. अनिल समानिया ने बगैर देर किए गांव चिमियावली का रुख किया. वह कलुआ के घर पहुंच गए. उन्हें वहां 4 साल की बच्ची दिखी. बच्ची के बारे में उन्होंने पूछा तो कलुआ ने बताया, ‘‘यह बच्ची मेरी खाला की लड़की है.’’

‘‘यह तुम्हारे पास क्यों है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, यह मेरी लड़की अरमाना के साथ आ गई है. कुछ दिन यहां रह कर अपने घर चली जाएगी.’’

कलुआ पहले बदमाश था. अब वह करीब 80 साल का बुजुर्ग था. उन्होंने सोचा कि शायद यह सच बोल रहा होगा. क्योंकि जवानी में चाहे कितना भी बड़ा अपराधी रहा हो, उम्र की इस ढलान पर आदमी सीधा व सच ही चलता है.

 

थानाप्रभारी ने घटनास्थल से जो छोटे बच्चे की चप्पलें बरामद की थीं उन्हें वह अपने साथ लाए थे. वह कार में रखी थीं. एसआई वीरेंद्र सिंह से उन्होंने चप्पलें मंगा कर उस बच्ची को दिखाईं तो वह उन चप्पलों को देख कर खुश हो गई. उस ने कहा, ‘‘यह चप्पलें तो मेरी है.’’ बच्ची फिर बोली, ‘‘मेरी मम्मी कहां हैं.’’

‘‘मम्मी आ गई, बाहर है.’’ अनिल समानिया ने कहा तो वह बच्ची अपनी मां को देखने के लिए बाहर की तरफ भागी. इस के बाद अनिल समानिया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वह कलुआ से बोले, ‘‘मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इस उम्र में भी…’’ इतना सुनते ही कलुआ ने नजरें नीची कर लीं.

वह बोला, ‘‘साहब, मजबूरी ऐसी आ गई थी कि मैं बेबस हो गया था. क्या बताऊं साहब यह सब करतूत मेरे दामाद वाहिद की है. यदि उस ने मेरी बेटी को धोखा न दिया होता तो मुझे इस उम्र में यह सब करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता.’’

उस ने इस दोहरे हत्याकांड का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने बताया मरने वाली महिला का नाम ममता था और दूसरा उस का 10 साल का बेटा करनपाल था. ममता उस के दामाद वाहिद की पहली पत्नी थी. इस बहुचर्चित केस के खुलने पर अनिल समानिया ने राहत की सांस ली और इस की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी.

केस खुलने की सूचना मिलते ही एसपी रविशंकर छवि थाने पहुंच गए. उन के सामने कलुआ से पूछताछ की गई तो पता चला कि ममता और उस के बेटे की हत्या में कलुआ के अलावा उस की पत्नी सूफिया, बेटी अरमाना, दामाद वाहिद और दामाद का भाई गुड्डू शामिल थे.

पुलिस ने दबिश दी तो गुड्डू के अलावा सारे आरोपी गिरफ्त में आ गए. इन सभी से पूछताछ करने के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई वह दिल दहला देने वाली थी.

ममता मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर के गांव लहराबल की मूल निवासी थी. उस के पिता अखबारों के हौकर थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा ममता एकलौती बेटी थी. उन की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. लेकिन उसी दौरान वह हत्या के एक मामले में जेल चले गए. उसी दौरान उन की पत्नी का भी देहांत हो गया. ऐसे में ममता बेसहारा हो गई तब नातेरिश्तेदारों ने उस की देखभाल की.

ममता के पिता जब जमानत पर जेल से बाहर आए तो वह शाहजहांपुर से बेटी के साथ गाजियाबाद आ गए. यह बात करीब 12 साल पहले की है. पिता ने किराए का मकान ले कर मेहनतमजदूरी की. ममता भी जवान हो चुकी थी. इसी दौरान सुनील नाम के एक युवक से ममता की आंखें लड़ गईं.

वक्त के साथ दोनों के प्यार के दरिया में बहुत आगे तक तैर चुके थे. बाद में उन्होंने शादी कर ली. सुनील टैक्सी ड्राइवर था. ममता के पिता इस शादी के खिलाफ थे. पर ममता ने उन की भावनाओं की कद्र नहीं की. सुनील के साथ गृहस्थी बसा कर वह खुश थी. वह 2 बच्चों की मां भी बन गई. जिस में बड़ा बेटा करनपाल था और छोटी बेटी मंजू.

बेटी के फैसले से पिता इतने आहत हुए कि उन का भी देहांत हो गया. ममता के पति सुनील में भी बदलाव आ गया. वह शराब पीने लगा. ममता उसे पीने से मना करती तो वह उस से झगड़ा करता और पिटाई भी कर देता था. अब वह ममता पर शक करने लगा कि उस का किसी के साथ चक्कर चल रहा है.

पति के इस व्यवहार पर ममता भी तनाव में रहने लगी. फिर एक दिन ममता पर ऐसी विपत्ति आन पड़ी, जिस की उस ने कल्पना तक नहीं की थी. जिस सुनील के लिए ममता ने अपने पिता तक को त्याग दिया था, एक दिन वही सुनील ममता और उस के दोनों बच्चों को छोड़ कर कहीं चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया.

ममता बेसहारा हो गई थी. अकेली औरत का वैसे भी लोग जीना मुश्किल कर देते हैं. ममता के पास तो 2 बच्चे भी थे. वह घर का खर्चा कहां से और कैसे चलाती. इस मोड़ पर फंस कर वह कई लोगों द्वारा छली गई. ममता ने भी हालात से समझौता कर लिया था. इसी बीच वह मेरठ में रहने वाले कलुआ नाम के औटो ड्राइवर के संपर्क में आई.

कलुआ के बराबर वाले मकान में वाहिद नाम का युवक रहता था. वाहिद भी आटो चलाता था. वह अविवाहित था इसलिए ममता ने उस के साथ ही गृहस्थी बसाने की सोच ली. वाहिद भी ममता को प्यार करता था. वह उस के साथ निकाह करने को तैयार हो गया.

वाहिद ममता और उस के दोनों बच्चों को ले कर मेरठ से नोएडा आ गया. वहीं पर इसलाम धर्म के रीतिरिवाज से वाहिद ने ममता से निकाह कर लिया. इस से पहले ममता का नाम बदल कर शाहीन रख दिया गया था. बड़े बेटे करनपाल का नाम बदल कर समीर व लड़की मंजू का नाम जैनब रख दिया था.

वाहिद का भाई गुड्डू ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में रहता था, जो वेल्डिंग का काम करता था. वाहिद, ममता और उस के बच्चे को ले कर वहीं पर पहुंच गया. वह सब रहने लगे. वाहिद आटो चलाने गाजियाबाद चला जाता था, जबकि ममता ग्रेटर नोएडा के फ्लैटों में साफसफाई का काम करने निकल जाती थी. दोनों की कमाई से घर ठीकठाक चल रहा था.

वाहिद और ममता की शादी की बात सिर्फ गुड्डू ही जानता था. इस के अलावा वाहिद के घर के किसी भी सदस्य को पता नहीं था कि वाहिद ने 2 बच्चों की मां से शादी कर ली है.

वाहिद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की तहसील बिसौली के गांव भमौरी का रहने वाला था. वाहिद  ने उस का नाम शाहीन जरूर रख दिया था, लेकिन वह उसे ममता के नाम से ही बुलाता था.

एक दिन वाहिद ने ममता उर्फ शाहीन से कहा, ‘‘ममता यहां ग्रेटर नोएडा में महंगाई ज्यादा है. ऐसा करते हैं कि हम लोग उधर ही चलते हैं. वहां गांव में मेरा अपना घर है, जमीनजायदाद भी है, मैं वहीं आटो चला लूंगा.’’

ममता उर्फ शाहीन ने पति वाहिद की बात पर कोई एतराज नहीं किया. इस पर वाहिद ममता और दोनों बच्चों को ले कर बिसौली के नजदीक चंदौसी शहर पहुंच गया. चंदौसी के मोहल्ला वारिश नगर में उस ने एक मकान किराए पर ले लिया. यह करीब 6 महीने पहले की बात है. चूंकि चंदौसी से उस का गांव भी नजदीक ही था, इसलिए वह अकेला अपने मांबाप से मिलने गांव भी जाता रहता था.

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उसी दौरान वाहिद के घर वालों ने संभल जिले के गांव चिमियावली के रहने वाले कलुआ की बेटी अरमाना से उस का रिश्ता तय कर दिया. उस समय वाहिद ने घर वालों को यह तक बताने की हिम्मत नहीं की थी कि उस ने शादी कर रखी है. रिश्ता तय होने के बाद वह कईकई दिन अपने गांव में रुक कर आता.

ममता ने इस बात पर कभी चर्चा तक नहीं की कि वह इतने दिन गांव में क्यों रुकता है. न ही उसे उस की शादी तय होने की कोई भनक लगी. वह तो उस पर अटूट विश्वास करती थी. आननफानन में वाहिद का अरमाना से निकाह भी हो गया. इस के बावजूद ममता अनभिज्ञ बनी रही.

जब वाहिद हफ्ता दो हफ्ता बाद ममता के पास लौटता तो वह कह देता कि वह मुरादाबाद में रह कर आटो चला रहा है, इसलिए वहीं रुक जाता है. वह ममता को खर्च के पैसे देता रहता था.

एक दिन ममता अचानक ही अपने दोनों बच्चों को ले कर वाहिद के गांव भमौरी पहुंच गई. भमौरी गांव चंदौसी के पास ही थी. वहां पर ममता को पता चला कि उस के पति ने उसे धोखे में रख कर संभल की एक लड़की से निकाह कर लिया है.

यह जानकारी मिलते ही ममता आगबबूला हो गई. उस ने गांव में हंगामा करना शुरू कर दिया. उस ने पूरे गांव वालों को बताया कि मैं वाहिद की निकाह की हुई बीवी हूं. ससुराल में पहला हक मेरा बनता है. मुझ से तलाक लिए बगैर उस ने दूसरी शादी कैसे कर ली. इतना ही नहीं ममता ने पुलिस से शिकायत करने की धमकी भी दी.

उस के हंगामे से पूरा गांव जमा हो गया. इस मामले में गलती वाहिद की ही थी पर ममता के थाने जाने के बाद बात बढ़ने की संभावना थी. इसलिए परिवार वालों ने गांव वालों के सहयोग से ममता को समझाना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि वाहिद की दूसरी पत्नी के साथ वह भी रह सकती है. उसे घर में रहने के लिए जगह दे दी जाएगी.

गांवदेहात में जानवरों के बांधने और उन का चारा रखने की जगह को घेर कहते हैं. ममता को अपना और बच्चों का पेट भरना था, इसलिए वह घेर में रहने के लिए तैयार हो गई. वह वहीं रहने लगी पर वाहिद की दूसरी पत्नी अरमाना को ममता का वहां रहना नागवार लगता था. वह ममता को एक पल भी देखना पसंद नहीं करती थी. जिस की वजह से वाहिद और अरमाना में झगड़ा रहने लगा.

रोजाना के झगड़ों से तंग आ कर अरमाना अपने मायके चिमियावली चली गई. वाहिद कई बार अरमाना को लाने के लिए अपनी ससुराल गया लेकिन अरमाना व उस के घर वालों ने साफ मना कर दिया था कि जब तक ममता वहां रहेगी अरमाना यहां से नहीं जाएगी.

वाहिद ने कहा कि ठीक है, वह ममता को चंदौसी में किराए पर लिए कमरे पर पहुंचा देगा. वैसे भी ममता उस से कह भी रही थी कि उसे यहां तबेले में रहना अच्छा नहीं लगता. लेकिन अरमाना इस के लिए भी तैयार नहीं हुई.

उस ने पति वाहिद से साफ कह दिया था कि जब तक ममता और उस के बच्चे जीवित रहेंगे वह ससुराल नहीं जाएगी. उसे उन तीनों के मरने का सबूत भी चाहिए. यानी जिस दिन वह उन के कटे हुए सिर उसे दिखा देगा वह उस के साथ चली चलेगी.

पत्नी की इस जिद पर वाहिद परेशान हो गया. तब उस के ससुर कलुआ और सास सूफिया ने उसे समझाते हुए कहा कि यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है. थोड़े दिमाग से काम लोगे तो बड़ी आसानी से हो जाएगा. तुम किसी तरह ममता और उस के बच्चों को यहां लाओ, बाकी काम हम देख लेंगे.

उस के बाद वाहिद अपने गांव भमौरी लौट आया. वह ममता को ठिकाने लगाने का प्लान बनाने लगा. अपने प्लान में उस ने अपने भाई गुड्डू को भी शामिल कर लिया था. अपनी योजना से उस ने अपने ससुर कलुआ को भी  अवगत करा दिया. वाहिद की सास सूफिया ने इस के लिए बड़े छुरे का इंतजाम कर लिया.

योजना के मुताबिक 17 मार्च, 2018 की शाम वाहिद ममता और उस के बच्चों को ले कर भमौरी से बस द्वारा संभल पहुंच गया. गुड्डू भी उस के साथ था. वाहिद ने ममता को बताया था कि उस के दोस्त के यहां दावत है.

संभल से वह लोग आटो में चिमियावली गांव के लिए बैठे. रास्ते में वाहिद ममता और बच्चों के साथ आटो से उतर गया और कहा कि अब शौर्टकट से पैदल चलते हैं, जल्दी पहुंच जाएंगे. ममता उस की साजिश से अनजान थी. वह गेहूं के खेत के किनारे के संकरे रास्ते से चलने लगा.

पैदल चलने पर ममता के पेट में दर्द हुआ तो वाहिद ने पहले से अपने साथ लाई नशे की गोलियों में से एक गोली ममता को खिला दी. कुछ देर में जब ममता बेहोशी की हालत में आ गई तो वाहिद ने अपने ससुर कलुआ को आवाज दे कर बुला लिया. कलुआ खेत में छिपा बैठा था.

जब ममता निढाल हो कर जमीन पर गिर गई तो गुड्डू, कलुआ और वाहिद ने मिल कर ममता का गला काट कर धड़ से सिर अलग कर दिया. उस समय उस का 10 वर्षीय बेटा करन वहीं खड़ा था. वह डर की वजह से वहां से भागा तो वाहिद ने उसे पकड़ लिया.

उन लोगों ने उस बच्चे का भी गला काट कर सिर धड़ से अलग कर दिया. ममता के हाथ पर उस का नाम गुदा हुआ था. पहचान मिटाने के लिए वाहिद ने हाथ की वह खाल ही काट कर अलग कर दी जहां नाम लिखा था.

उसी दौरान ममता की 4 वर्षीय बेटी मंजू वाहिद की टांगों से चिपकी खड़ी थी. वह कह रही थी कि पापा चलो भूख लग रही है. पापा मुझे टौफी दिलवाओ. वैसे भी वाहिद रोजाना मंजू के लिए टौफी ले कर आता था. वाहिद सब से ज्यादा प्यार मंजू को ही करता था.

वाहिद जब मंजू को भी मारने चला तो कलुआ ने कहा, नहीं यह नासमझ है. इस को हम लोग पाल लेंगे. इस ने क्या बिगाड़ा है.

वाहिद ने जेब से बड़ी पालिथिन थैली निकाल कर दोनों के सिर उस में रख लिए और अपनी ससुराल चिमियावली आ गया. वहां पर वाहिद ने अपनी सास सूफिया व पत्नी अरमाना को कटे सिर दिखाए. सिर देखने पर उन्हें उन के मरने का यकीन हुआ. इस के बाद वह उन दोनों सिरों को गांव के नजदीक बहने वाली सोत नदी के किनारे रेत में अलगअलग दबा आया.

पुलिस ने वाहिद, कलुआ, अरमाना, सूफिया को गिरफ्तार कर लिया. अभियुक्तों की गिरफ्तारी की सूचना पर एडीजी प्रेमप्रकाश भी बरेली से संभल पहुंच गए.

प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर उन्होंने इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड का खुलासा कर पत्रकारों को जानकारी दी. बाद में पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक गुड्डू की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों आधारित

क्राइम पेट्रोल देख कर घिनौना अपराध

बुधवार 2 मई की रात के लगभग 9 बजे कोटा के पुलिस अधिकारियों की बैठक चल रही थी. मुख्य मुद्दा था मार्बल व्यवसाई परिवार के बेटे विशाल मेवाड़ा के अपहरण और फिरौती का. कोटा में नित नए अपराधों से सकपकाई पुलिस के लिए यह गंभीर चुनौती थी.

दरअसल, वाकया कुछ ऐसा था जो ढाई साल पहले घटित रुद्राक्ष हांडा कांड के अंदेशों को बल दे रहा था, जिस में फिरौती के लिए किए गए अपहरण में बच्चे की हत्या भी कर दी गई थी. पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया ने एक पल अपने अधीनस्थ अफसरों पर सरसरी नजर दौड़ाने के बाद कहना शुरू किया, ‘‘आप के सामने फिर एक नया इम्तिहान है. हमें एकएक कदम बहुत सोचसमझ कर उठाना होगा.’’

बुधवार 2 मई की शाम करीब 7 बजे बोरखेड़ा के थानाप्रभारी महावीर सिंह जिस समय अपने थाने में बैठे थे, तभी लगभग 45-46 साल की रुआंसी औरत कमरे में दाखिल हुई. कुलीन और संपन्न परिवार की लगने वाली उस महिला के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. महावीर सिंह ने उसे सांत्वना देते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आप कौन हैं और इस तरह परेशान और घबराई हुई क्यों हैं?’’

‘‘परेशानी की तो बात यह है थानेदार साहब, मेरा बेटा गायब है, उस का अपहरण कर लिया गया है.’’ महिला ने अपनी बात सिलसिलेवार बतानी शुरू की, ‘‘साहब, मेरा नाम भूलीबाई है. मैं मार्बल कारोबारी बनवारी लाल मेवाड़ा की पत्नी हूं. मेरा 19 साल का बेटा विशाल मेवाड़ा कोटा के योगीराज पौलीटेक्निक कालेज में पढ़ रहा था. वह वहां से गायब हो गया.’’

महावीर सिंह ने उन्हें पानी का गिलास थमाते हुए कहा, ‘‘आप निश्चिंत हो कर पूरी बात बताइए.’’

एक ही बार में पानी का गिलास खाली कर के महिला ने कहना शुरू किया, ‘‘हम खैराबाद कस्बे में रहते हैं. मेरा बेटा विशाल कोटा में रह कर पौलीटेक्निक कालेज में पढ़ रहा था. पति बनवारीलाल कारोबार के सिलसिले में सूरत गए हुए हैं. अपहर्त्ताओं ने मंगलवार पहली मई को मेरे पति को मोबाइल पर फोन कर के 15 लाख की फिरौती मांगी है.’’

पलभर रुकने के बाद भूलीबाई ने कहना शुरू किया, ‘‘पति को मोबाइल पर पहला फोन दोपहर बाद 4 बजे आया, जिस में एक आदमी ने विशाल के अपहरण करने की इत्तिला देते हुए 15 लाख की रकम का इंतजाम करने को कहा और इस के साथ ही फोन काट दिया. करीब 15 मिनट बाद फिर उसी आवाज में धमकी भरा फोन आया कि पुलिस को खबर की तो विशाल को जान से मार दिया जाएगा. इस के साथ ही फोन बंद हो गया.’’

‘‘फिर उस के बाद कोई फोन आया?’’ थानाप्रभारी महावीर सिंह के स्वर में हैरानी का भाव स्पष्ट था.

‘‘रात 11 सवा 11 बजे मेरे पति का फोन आया. उन्होंने बताया कि 11 बज कर 1 मिनट पर उन के पास आए फोन काल में कहा गया था कि रकम कहां ले कर आना है, इस बाबत अगले दिन शाम 4 बजे बताएंगे और इस के साथ ही फोन बंद कर दिया.’’

‘‘आप के पति ने उन्हें क्या जवाब दिया?’’

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‘‘क्या कहते,’’ भूलीबाई ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मेरे पति ने तो बड़ी आजिजी के साथ कहा कि तुम को जो रकम चाहिए, हम देंगे. बस हमारे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.’’

लेकिन अगले ही पल भूलीबाई ने जो कहा, वह चौंकाने वाला था. उन्होंने बताया, ‘‘मेरे पति इस बात को ले कर हैरान थे कि फोन करने वाला जो कोई भी था, हमारे बेटे के मोबाइल से ही फोन कर रहा था.’’ इस के साथ ही भूलीबाई फूटफूट कर रोने लगी.

गहरी सांस लेते हुए महावीर सिंह ने कहा, ‘‘कोई और बात जो आप कहना चाहें.’’

‘‘हां साहब,’’ भूलीबाई ने जैसे याद करते हुए कहा, ‘‘साहब, मुझे फोन करने से पहले मेरे पति ने विशाल के मामा को फोन कर के विशाल के अपहरण की खबर देने के साथ उस के कमरे पर जा कर उसे तलाश करने को कहा था. उस का मामा दिनेश कोटा में ही रहता है. दिनेश ने विशाल के कमरे पर जा कर देखा तो वह वहां नहीं मिला. दिनेश ने मेरे पति को तो यह बात बताई ही, मुझे भी फोन कर के कोटा आने को कहा.’’

बोरखेड़ा थानाप्रभारी ने रिपोर्ट दर्ज करने के साथ ही फौरन इस घटना और घटनाक्रम के बारे में पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया को जानकारी दी. इस के बाद तत्काल पुलिस सक्रिय हो गई. आननफानन में पुलिस अधिकारियों की बुलाई गई बैठक की वजह यही थी.

भोमिया साहब को मालूम था कि इतने संपन्न परिवार के बेटे के अपहरण की बाबत जब लोगों को पता चलेगा तो लोग पुलिस को आड़े हाथों लेने से पीछे नहीं हटेंगे.

अपहरण के इस मामले में किसी बड़े गिरोह का हाथ हो सकता है, यह सोच कर पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया ने क्षेत्राधिकारी नरसीलाल मीणा और राजेश मेश्राम के अलावा सर्किल इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह, महावीर सिंह, आनंद यादव, मुनींद्र सिंह, लोकेंद्र पालीवाल, विजय शंकर शर्मा और एसआई महेश कुमार, एएसआई दिनेश त्यागी, कमल सिंह और प्रताप सिंह के नेतृत्व में 7 टीमों का गठन किया और विशाल के अपहर्त्ताओं का पता लगाने की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार को सौंप दी.

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार के निर्देश पर स्पैशल स्टाफ ने बड़ी संख्या में लोगों से गहनता से पूछताछ की. करीब 100 से अधिक टीवी फुटेज निकाले, लेकिन कोई काम की बात मालूम नहीं हो सकी.

पुलिस को तब हैरानी हुई, जब विशाल के कुछ दोस्तों ने बताया कि उन के पास विशाल का फोन आया था. उस ने हम से 2-3 सौ रुपए की जरूरत बताते हुए पैसों की मांग की थी. लेकिन इस से पहले कि उस से इतनी छोटी रकम मांगने की वजह पूछते, उस का फोन संपर्क टूट गया.

पुलिस ने अंडरवर्ल्ड को भी खंगाला लेकिन लाख सिर पटकने के बावजूद पुलिस ऐसे किसी शातिर गिरोह का पता नहीं लगा सकी, जिस से इस मामले में कोई जानकारी मिल पाती. इस मामले में पुलिस ने फिरौती के लिए कुख्यात गिरोहों का पुलिस रिकौर्ड भी टटोला.

तमाम पुलिस रिकौर्ड जांचने के बाद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार इस नतीजे पर पहुंचे कि विशाल के अपहरण में कम से कम किसी नामी गिरोह का हाथ नहीं है.

पौलीटेक्निक की पढ़ाई करते हुए विशाल बोरखेड़ा के इलाके की आकाश नगर कालोनी में उसी कालेज में पढ़ने वाले मनोज मीणा के साथ किराए के कमरे में रहता था. पुलिस ने मनोज की गतिविधियों को पूरी तरह टटोला, लेकिन कहीं कोई संदिग्ध बात नजर नहीं आई.

जिस समय पुलिस विशाल के रूम पार्टनर मनोज मीणा समेत अन्य दोस्तों से गहनता से पूछताछ कर रही थी, तभी इस बात का पता चला कि विशाल के दोस्ताना रिश्ते विक्रांत उर्फ हिमांशु, प्रदीप और विजेंद्र भाटी उर्फ लकी से कुछ ज्यादा ही गहरे थे.

विशाल के मकान मालिक के मुताबिक इन तीनों लड़कों का विशाल के पास वक्तबेवक्त कुछ ज्यादा ही आनाजाना था. यह सूचना मिलते ही पुलिस ने उन्हें पूछताछ के घेरे में ले लिया, लेकिन हर सवाल पर तीनों पुलिस को छकाते रहे. पुलिस को लगा भी कि कहीं यह उस का भ्रम तो नहीं, फिर भी पुलिस ने अपनी जांच की दिशा नहीं बदली.

अब तक विशाल के पिता बनवारी लाल मेवाड़ा सूरत से कोटा लौट आए थे. उन्होंने पुलिस की जानकारी में इजाफा करते हुए बताया कि उन्हें मंगलवार को दोपहर बाद 4 बजे, फिर सवा 4 बजे तथा बाद में रात को 11 बज कर एक मिनट पर फोन आए थे.

रात को आने वाले फोन काल में अपहर्त्ताओं का कहना था कि फिरौती की रकम ले कर उन्हें दरा के निकट रेलवे क्रौसिंग पर पहुंचना होगा. कब, यह बाद में बताएंगे. अपहर्त्ता का यह भी कहना था कि रकम मिलने के एक घंटे बाद ही विशाल को छोड़ दिया जाएगा.

बनवारी लाल ने यह सब बताते हुए पुलिस से यह शंका भी जाहिर की कि फोन काल जब विशाल के मोबाइल से की जा रही थीं तो क्या उसे सुरक्षित मान लिया जाना चाहिए.

गुरुवार 3 मई की सुबह जब पुलिस इसी मुद्दे पर मंथन कर रही थी, तभी एक ग्रामीण की सूचना ने अधिकारियों को स्तब्ध कर दिया. सूचना बोरखेड़ा से करीब 20 किलोमीटर दूर नोताड़ा और मानस गांव के वन क्षेत्र के बीच बहने वाली नदी की कराइयों में एक लाश पड़ी होने की थी.

हजार अंदेशों में घिरी पुलिस के लिए यह सूचना चौंकाने वाली थी. पुलिस टीम तुरंत वहां के लिए रवाना हो गई. पुलिस के साथ विशाल के पिता बनवारीलाल भी थे. चंद्रलोई नदी का यह तटीय क्षेत्र हालांकि कुदरती रूप से मनोहारी था, जहां शहरी कोलाहल से ऊबे लोगों या फिर सैलानियों का आनाजाना था.

क्षेत्राधिकारी राजेश मेश्राम चंद्रलोई नदी की कराइयों के पास जीप रुकवा कर अपनी टीम के साथ नीचे उतर गए. तभी उन की नजर 3-4 फुट ऊंची झाडि़यों की कतार की तरफ चली गई. वहां पर एक युवक औंधा पड़ा नजर आया.

पुलिस के जवानों ने शव को सीधा किया तो बनवारीलाल वहीं पछाड़ खा कर गिर गए. शव विशाल का ही था. उस का चेहरा कुचल दिया गया था. लाश नमक की परत में लिपटी हुई थी. राजेश मेश्राम लाश पड़ी होने की स्थिति देख कर एक पल में ही भांप गए कि हत्या कहीं और की गई थी, लेकिन पुलिस को भटकाने के लिए लाश को यहां ला कर फेंका गया होगा.

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विशाल की हत्या बहुत ही निर्ममतापूर्वक की गई थी. उस की गरदन किसी तेजधार हथियार से रेती गई थी. संघर्ष का कोई चिह्न नहीं था. घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद राजेश मेश्राम ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उसी दिन पोस्टमार्टम के बाद लाश मृतक के पिता को सौंप दी गई.

यह अजीब इत्तफाक था कि अभी शव के पंचनामे की काररवाई हो ही रही थी कि राजेश मेश्राम को एएसपी से सूचना मिली कि पूछताछ में अपराधी टूट गए हैं और उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया है.

अपराध का यह तानाबाना 3 सनकी और खुराफाती लड़कों ने बुना था. आईटीआई डिप्लोमा कर चुका विक्रांत उर्फ हिमांशु बोरखेड़ा का ही रहने वाला था. आईटीआई में डिप्लोमा कर चुका विक्रांत इस हद तक सनकी था कि सनक में वह अपनी कलाइयों में ब्लेड मार कर खुद ही कई जगह अपने हाथों को जख्मी कर चुका था.

बृजेंद्र सिंह भाटी उर्फ लकी कोटा के नजदीकी कस्बे कैथून का रहने वाला था. वह औटोमोबाइल से जुड़ी एक कंपनी में काम करता था और बोरखेड़ा में ही किराए पर कमरा ले कर रह रहा था.

तीसरा साथी प्रदीप उर्फ बिन्नी रोजीरोजगार के लिए गोलगप्पों का ठेला लगाता था. बिन्नी भिंड का बाशिंदा था और कोटा की मन्ना कालोनी में रह रहा था. सनक में तीनों एक से बढ़ कर एक थे. तीनों लगभग 18 से 20 साल की उम्र के थे.

पूछताछ में पता चला कि तीनों की हसरतों के पखेरू आसमानी उड़ान भरते रहे, नतीजतन मौजमस्ती और अय्याशी के शौक के लिए जितना भी कमाते थे, पूरा नहीं पड़ता था. तीनों की इस मंडली में विशाल शामिल हुआ तो बोरखेड़ा में ही रहने वाले विक्रांत उर्फ हिमांशु की बदौलत.

दारूबाजी के महंगे शौक में संपन्न बाप का बेटा विशाल उन के लिए काफी काम का था. विक्रांत, बृजेंद्र और प्रदीप की साझा ख्वाहिश थी तो एक ही कि कोई ऐसा शख्स हाथ चढ़ जाए, जिस से इतना पैसा मिल सके कि मौजममस्ती के लिए तरसना न पड़े.

नशे के सुरूर में एक दिन विशाल का काल ही उस की जुबान पर बैठ गया और वह कह बैठा, ‘‘आज की पार्टी मेरी तरफ से.’’

‘‘किस खुशी में?’’ पूछने पर विशाल ने कह दिया, ‘‘आज ही मेरे पिता को एक बड़े सौदे में भारीभरकम रकम मिली है. इसलिए जश्न होना चाहिए.’’

फिर क्या था, तीनों की आंखों में लालच चमक उठा. पार्टी खत्म होने के बाद तीनों सनकी सिर जोड़ कर बैठे तो बदनीयती जुबान पर आ गई. तीनों की जुबान पर एक ही बात थी, ‘अगर यह बड़ी रकम हमारे हाथ आ जाए तो मजे ही मजे हैं.’ लेकिन सवाल था कि कैसे?

कैसे का आइडिया भी अनायास ही मिल गया. उन के लिए संयोग था और विशाल के लिए दुर्भाग्य कि इत्तफाक से तीनों आपराधिक घटना पर आधारित क्राइम पैट्रोल सीरियल देखते थे. एक कहानी ऐसी ही एक घटना पर आधारित थी, जिस में पैसों की खातिर 3 सिरफिरे अपने दोस्त से ही दगा करते हैं और उस की हत्या कर देते हैं.

फिरौती की घटना पर बुनी गई इस कहानी ने इन तीन तिलंगों को भी दगाबाजी की राह दिखा दी. योजना बनाई गई कि शराब की पार्टी में विशाल को इतनी पिला दी जाए कि वह होश खो बैठे. फिर उसे काबू में कर के उस के पिता से 15 लाख की फिरौती मांगी जाए.

तीनों का मानना था कि एकलौती औलाद के लिए एक दौलतमंद बाप 15 लाख क्या 15 करोड़ भी दे सकता है.

सवाल था कि विशाल बुलाने पर तयशुदा ठिकाने पर आ भी जाए और अपना मोबाइल भी इस्तेमाल न करना पड़े. यह योजना मंगलवार को कामयाब भी हो गई.  इन लोगों ने सुबह 10 बजे बोरखेड़ा पहुंच कर एक सब्जी वाले के मोबाइल से फोन कर के विशाल को बुलाया और वहां से उसे बृजेंद्र के रामराजपुरा स्थित खेत पर ले गए.

सब्जी वाले को यह कह कर विश्वास में लिया कि भैया, हमारे मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई है, इसलिए एक जरूरी फोन कर लेने दो. सब्जी वाला झांसे में आ गया. दोपहर 12 बजे रामराजपुरा पहुंच कर दारू का दौर चला तो विशाल को जम कर दारू पिलाई गई, ताकि वह होश खो बैठे. ऐसा ही हुआ भी.

नशे में बेसुध विशाल के मोबाइल से बृजेंद्र ने पहले विशाल को अपने कब्जे में होने की बात की, फिर 15 लाख की मांग करते हुए धमकी दी कि पुलिस को इत्तला दी तो बेटा जिंदा नहीं बचेगा. असहाय पिता बनवारीलाल ने सहमति जता दी तो उसे पैसे पहुंचाने का निर्धारित स्थान भी बता दिया गया.

एसपी भोमिया साहब ने पूछा, ‘‘जब बाप ने फिरौती की रकम देने का भरोसा दे दिया था तो बेटे को क्यों मारा?’’

एसपी ने आंखें तरेरते हुए हड़काया तो विक्रांत ने उगल दिया, ‘‘हमें डर था कि रकम देने के बाद विशाल हमारा भेद खोलने से नहीं चूकेगा. इसलिए उसे मारना पड़ा.’’

‘‘कैसे और कब?’’ एसपी ने पूछा, ‘‘दरिंदे बन गए तुम लोग? कैसे मारा?’’

‘‘हत्या तो हम ने चाकुओं से कर दी थी. बाद में पहचान मिटाने के लिए उस पर नमक भी लपेट दिया. लेकिन…’’ उस ने बिन्नी और लक्की की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘ये दोनों संतुष्ट नहीं थे, इसलिए लोहे की रौड से उस के चेहरे पर इतने वार किए कि लाश पहचान में न आ सके. साहब, विशाल की हत्या तो हम ने 2 बजे ही कर दी थी.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर…’’ अटकते हुए विक्रांत ने बताया, ‘‘इस के बाद लाश को बोरे में भरा और बाइक पर लाद कर नार्दर्न बाईपास के पास चंद्रलोई नदी की कराइयों में डाल आए और घर आ कर सो गए.’’

‘‘नींद आ गई तुम्हें?’’ एसपी भोमिया उन्हें नफरत भरी नजर से देखते हुए बुरी तरह बरस पड़े, ‘‘तुम ने तो शैतान को भी मात दे दी. लानत है तुम पर.’’

एसपी भोमिया ने मामले का रहस्योद्घाटन करते हुए मीडिया से कहा, ‘‘कैसी विचित्र बात है, ऐसे सीरियल से लोग जागरूक कम होते हैं लेकिन अपराधियों को अपराध के नए तरीके सीखने का मौका मिल जाता है.’’

कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

निकम्मेपन को बढ़ावा देती दान देने की परंपरा

उस दिन नोएडा के सेक्टर 15 से निकलना हुआ. वहां देखा कि एक रिटायर आई.ए.एस. अधिकारी के आलीशान बंगले के बाहर बहुत भीड़ लगी थी. पूछने पर पता चला कि वहां आज ब्रह्मभोज है. उस बंगले के आसपास ब्राह्मण मक्खीमच्छर की तरह भिनभिना रहे थे. भरपेट भोजन करने के बाद मोटी दक्षिणा ले कर व तिलक लगवा कर अपनी राह यह कहते हुए चल दिए कि दाता यजमान को और दे. ब्राह्मणों के चेहरे खिले हुए थे क्योंकि खाते समय थोड़ा माल अपने परिवार के लिए भी रख लिया था.

पितृपक्ष में अमीर हो या गरीब सभी के यहां यह नजारा देखने को मिलता है. जनता के लिए चाहे खुशी का मौका हो या गम का, पंडित को घर बुला कर खिलाना व दक्षिणा देना जरूरी सा है. जन्म से ले कर मृत्यु तक जितने संस्कार हैं उन में ही नहीं बल्कि गृहप्रवेश, भूमिपूजन आदि में भी ये ब्राह्मण जम कर फायदा उठाते हैं. इन सभी मौकों पर ब्राह्मणों को मुंहमांगा दान दिया जाता है.

ब्राह्मणों को दान देने का यह ढकोसला नया नहीं है तो वजह यही कि उन्होंने अपनी कमाई के इस तरीके के महत्त्व को शास्त्रों में भी जरूरी बता दिया है. हिंदू धर्म में व्यर्थ के तपों के विधान के चलते वानप्रस्थ और संन्यास के नाम पर इन पंडितों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई. त्याग, तप, भक्ति के नाम पर लाखों मुफ्तखोर भिखारी, साधु बन गए और बिना हाथपैर हिलाए मौज मारते रहे. इन के लिए हमारे धर्मग्रंथ और शास्त्र भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जिस में दान को ले कर कई तरह की व्यर्थ की उक्तियां प्रचलित की गई हैं. जैसे :

दानेन भूतानि वशीभवन्ति,

दानेन वेराण्यपि यान्ति नाशम्।

परोपि बन्धुत्वमुर्दति दानैर्दानं,

हि सर्वव्यसनानि हंति॥      -अज्ञेय

(अर्थात दान से सभी प्राणी वश में हो जाते हैं, दान से शत्रुता का नाश हो जाता है. दान से पराया भी अपना हो जाता है. अधिक क्या कहें, दान सभी विपत्तियों का नाश कर देता है.)

दान से अगर सभी प्राणी वश में हो जाते हैं तो हमारे ये राजनेता जो धनधान्य से परिपूर्ण हैं और दानपुण्य भी बहुत करते हैं, फिर क्यों ये एकएक वोट के लिए गांवगांव मारेमारे फिरते हैं? अगर दान से पराया भी अपना हो जाता है तो आज इतना हाहाकार क्यों मचा है? भाईभाई की जान का दुश्मन क्यों है?

मनु ने भी ब्राह्मणों का कर्तव्य निश्चित करते हुए कहा है :

अध्यापनध्ययनं यजनं याजनं तथा,

दान प्रतिग्रहं चैव ब्रह्मणामकल्पयत्.

(अर्थात वेदों का अध्ययन और अध्यापन, धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकांड, यज्ञ आदि करनाकराना तथा दान और प्रतिग्रह लेना ब्राह्मणों के निर्धारित कार्य हैं.)

ब्राह्मणों ने अपने लाभ के लिए आत्मापरमात्मा, स्वर्गनरक, जन्ममरण के सिद्धांतों के जाल में समाज को फंसा कर उस का खूब शोषण किया और इस काम में उन का साथ राजामहाराजाओं ने दिया जिस के चलते धीरेधीरे ये रीतिरिवाज और फिर परंपराएं बनती चली गईं.

शुरू में ब्राह्मणों ने शोषण का साधन यज्ञों को ही बनाया और पूरे समाज में यह प्रचार कर दिया कि हर गृहस्थ को जन्म से मरण तक सुखदुख के हर मौके पर दान करना जरूरी है. गरीबों के खून- पसीने से जमा की गई दौलत को राजामहाराजा आएदिन यज्ञों के नाम पर लुटाते रहते थे. यही नहीं राजामहाराजाओं द्वारा अपने पुरोहितों को धन, संपत्ति, घोड़े, हाथी, रथ, दासदासियां आदि भी दानस्वरूप दिए जाते थे.

इस तरह के दान के प्रमाण ऋग्वेद में मिलते हैं. जैसे :

‘‘हे अग्ने, अत्यंत दान करने वाले राजसूय यज्ञकर्ता चसयमान के पुत्र अभ्यवर्ती ने हमें दासियों सहित रथ और 20 गाएं दान में दीं.’’

– ऋग्वेद-6-27-8

वृहदारण्यकोपनिषद 6-2-7 में सत्यकेतु ब्राह्मण का पिता अरुणि रचयिता दान में मिले धनदौलत का गौरवगान करते हुए लिखता है :

‘‘मेरे पास सोना, पशुधन, घोड़े, दासदासियां तथा कपड़े हैं.’’

इस तरह की धारणाएं धीरेधीरे लोगों के मन में बैठा दी गईं और फिर ब्राह्मणों को दान देने का यह चलन हर अवसर व त्योहार पर शुरू हो गया, जो समय के साथ हमारे रीतिरिवाजों व परंपराओं में शामिल हो गया. इन रीतिरिवाज और परंपराओं को, जो पहले अपनी खुशी व इच्छा से शुरू की गई थीं, बाद में निभाना समाज के लिए मजबूरी बन गया.

खाने को आप के घर रोटी हो या न हो, आप के बच्चे भले ही भूखे हों, लेकिन पिता के श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मणों को 36 तरह के पकवानों का भोज कराना जरूरी है. इस के लिए आप चोरी करें या फिर डकैती डालें, इस से ब्राह्मणों को कोई फर्क नहीं पड़ता. धर्मभीरु जनता ऐसा इसलिए करती है क्योंकि इन ब्राह्मणों ने आम जनता के मन में यह डर बिठा दिया है कि यदि ब्राह्मण नाराज हो गए तो उन्हें पाप लगेगा और फिर नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा.

देवी भागवत पुराण में यमराज और सावित्री का विस्तृत वार्त्तालाप है, जिस में 86 नरक कुंडों का विवरण देते हुए  यमराज ने सावित्री से कहा था :

‘‘जो मूर्ख मनुष्य घर आए ब्राह्मण को भोजन नहीं कराता वह सप्तकुंड नामक नरक में जाता है और वहां उसे सात जन्मों तक कई तरह के कष्ट भोगने पड़़ते हैं.’’

पाप से बचने और स्वर्ग में स्थान पाने का उपाय भी ब्राह्मणों ने खुद ही सुझा दिया. नरक के दुखों की कल्पना से भयभीत जनता में ब्राह्मणों ने शास्त्रों के जरिए यह प्रचार करा दिया कि अमुक ब्राह्मण को दान करो, पाप से मुक्ति मिल जाएगी और स्वर्ग में स्थान सुरक्षित हो जाएगा. यह प्रचार कर ब्राह्मणों ने अपने लिए दानपुण्य की व्यवस्था कर ली. यही कारण है कि हिंदू समाज इतना भ्रष्ट, पापी और बेईमान हो गया क्योंकि कहीं न कहीं ब्राह्मणों ने लोगों के मन में यह बात भी बिठा दी कि पाप कितना भी बड़ा क्यों न हो, ब्राह्मण को सोनाचांदी और गोदान करने या गंगा में डुबकी लगाने से छुटकारा मिल जाता है.

सवाल यह है कि जब कुछ हजार रुपए की एक गाय ब्राह्मण को दान करने भर से पापों से मुक्ति मिल सकती है तो क्यों न इस का फायदा उठाया जाए. राजाओं ने, अमीर जमींदारों ने ढेरों पाप किए और ब्राह्मणों को सोनाचांदी, गो दान कर पापों से मुक्ति पा ली.

इस के अलावा चंद्रलोक और विष्णुलोक में प्रवेश पाना हो तो पौराणिक ग्रंथों में इस के बहुत ही सरल उपाय बताए गए हैं जैसे, दूध, चांदी, स्वर्ण, वस्त्र, फल और जल ब्राह्मणों को देने वाले पुण्यात्मा पुरुष चंद्रलोक में जाते हैं. पवित्र ब्राह्मण को स्वर्ण, गो और ताम्र दान करने वाले सद्पुरुष सूर्यलोक में जाते हैं. ब्राह्मण को सुंदर स्वच्छ छत्र दान करने वाला व्यक्ति हजारों वर्षों तक वरुण लोक में आनंद करता है.

ऐसी अनेक भ्रम की बातें ब्राह्मणों के द्वारा समाज में फैलाई गई हैं, तो पुराणों और धर्मशास्त्रों में हर जगह ब्राह्मण को दान देने का महत्त्व बताया गया है. यदि आप ने ब्राह्मण के अलावा किसी को दान कर दिया तो उस का कोई फल नहीं मिलेगा. पौराणिक गं्रथों के अनुसार महत्त्व दान का नहीं, ब्राह्मण को देने का है. इस तरह की अनेक बातें पौराणिक ग्रंथों में लिख कर ब्राह्मणों को स्वर्गनरक का ठेकेदार बना दिया गया है.

वैसे तो पंडेपुजारी पूरे साल ही दानदक्षिणा ले कर अपना घर भरते हैं. पर आश्विन मास के 15 दिनों को पितृपक्ष घोषित कर के श्राद्धकर्म के लिए निश्चित कर देने के पीछे भी ब्राह्मणों की सोचीसमझी चाल ही थी कि खरीफ की फसल कट जाने के बाद किसानों के पास दक्षिणा देने की कमी नहीं होगी, यही सोच कर ब्राह्मणों ने श्राद्धप्रथा शुरू की.

मनुस्मृति 3-17 के अनुसार, यजमान को हर रोज पितरों का श्राद्ध करना चाहिए और उन के नाम पर ब्राह्मणों को दूध, फल, कंदमूल आदि देने चाहिए. साल भर इन ब्राह्मणों को चाहे सूखी रोटी भी नसीब न हो लेकिन श्राद्ध के दिनों में ये ठूंसठूंस कर पकवानों का भोग लगाते हैं.

पंडितों के द्वारा सुझाई गई यह श्राद्ध प्रथा भी कैसी अनोखी परंपरा है, जिस पिता के जिंदा रहते किसी को उन की पसंद का खयाल नहीं आता और जब वह नहीं रहते तो एकाएक हम पंचांग तलाशने लगते हैं कि किस तिथि को उन का श्राद्ध पड़ेगा. हर साल पितृपक्ष में उन की मृत्यु की तिथि को उन की पसंद की चीजें बना कर पंडितों को खिलाई जाती हैं. लेकिन जब तक वह जिंदा रहते हैं क्या हम कभी यह सोचते हैं कि उन्हें खाने में क्या पसंद है? उन की तकलीफ क्या है? कल तक जिन कंधों को पकड़ कर हम चले थे आज वे उम्र के साथ झुक गए हैं? उन का शरीर जब थक जाता है तो हम उन्हें अकेला छोड़ देते हैं. उन्होंने जो कुछ हमारे लिए किया वह उन का कर्तव्य था और हम जो उन के लिए करें वह एहसान है और शायद उन के इसी कर्तव्य और एहसान का बोझ उतारने का तरीका इन पंडितों ने समाज को दिखा दिया है, श्राद्ध परंपरा के रूप में.

श्राद्ध की तरह और भी कई परंपराएं हैं जो ब्राह्मणों ने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए प्रचलित कराई हैं और इस तरह अपने लिए आजीवन बिना कुछ किए सुखसुविधा से रहने का मजबूत आधार तैयार किया हुआ है.

इसी तरह का एक त्योहार संक्रांति है. आज के संदर्भ में देखें तो इस त्योहार का केवल एक ही अर्थ है, ब्राह्मणों को दान देना.

इस दिन ब्राह्मणों को तिल, गुड़, गरम वस्त्र, कंबल आदि खानेपीने व पहनने की चीजें दान में देने का विशेष पुण्य बताया गया है. भारत में रहने वाले ज्यादातर हिंदू लोग दानपुण्य करते ही हैं. एक सामान्यतया हिंदू यदि 5 रुपए भी दान में देता है तो समझिए हर साल अरबों रुपए परजीवी ब्राह्मणों की झोली में अनायास ही चले आते हैं.

सावन माह की शुरुआत के साथ ही पंडितों द्वारा आम जनता को अपने जाल में फंसा कर बेवकूफ बनाने का धंधा जोर पकड़ने लगता है. इन दिनों मंदिरों में रुद्राभिषेक का आयोजन शुरू होता हैऔर रुद्राभिषेक के लिए पंडितों का रेट 551 रुपए व 5 प्रकार के कपड़े या 1,100 रुपए हैं.

इसी तरह ग्रहण संस्कार है. आज के पढ़ेलिखे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि ग्रहण होने की वजहें क्या हैं, फिर भी ग्रहण के समय हजारों लोग स्नान और दानपुण्य करते हुए देखे जा सकते हैं. अगर गंगा में स्नान करने से इतना ही लाभ होता है तो नदी की सारी मछलियों और दूसरे जल जीवों को तो स्वर्ग में ही पहुंच जाना चाहिए. लेकिन सच तो यह है कि स्नान करने से फायदा होने के बजाय जल प्रदूषण अवश्य साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है और इसी का नतीजा है कि हर साल लाखों नहीं करोड़ों रुपए इन नदियों को साफ करवाने में सरकार को खर्च करने पड़ रहे हैं.

इन ब्राह्मणों को अपने आज का पता हो या न हो, पर आम जनता का भूत और भविष्य बताने में ये ऐसे माहिर हैं मानो मृत्यु के बाद दूसरे जन्म तक का इन्होंने ठेका ले लिया हो. जब इन के हाथ में इतनी बड़ी शक्ति है तो फिर इस दुनिया में अभी भी इतने गरीब, दुखी, लाचार, निराश लोग क्यों हैं? ये पंडित लोग एक जादू की छड़ी घुमा कर सब को अमीर और सुखी क्यों नहीं बना देते. लेकिन सच यही है कि यह सब इन के बस में नहीं है. अगर होता तो इन्होंने सब से पहले अपना खुद का उद्धार किया होता.

आप मंदिरों में दानपुण्य के नाम पर हजारों रुपए चंदा पंडेपुजारियों को दे सकते हैं तथा यज्ञहवन में अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर सकते हैं और कीर्तनजागरण करवाने के लिए हजारोंलाखों का चंदा इकट्ठा कर सकते हैं लेकिन किसी बीमार या लाचार व्यक्ति के इलाज के नाम पर पैसा खर्च करने वाला दानी ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा.

सच तो यह है कि इनसान की सेवा सब से बड़ी सेवा है और इस से मन को शांति मिलती है. किसी मंदिर में लाखों का दान दे कर भगवान को खुश करने के बजाय किसी गरीब की बेटी की शादी करा दें तो इनसान व समाज दोनों की सेवा का फल मिलेगा. जनता को यह समझना होगा कि अगर किसी को दान देना ही है तो फिर हट्टेकट्टे ब्राह्मण ही क्यों? दान देना ही है तो उन गरीबों, लाचार, अनाथ, लूलेलंगड़ों को दें, जो कुछ करने लायक नहीं हैं. सरकार को यह सोचना चाहिए कि जब वह भीख मांगने पर प्रतिबंध लगा सकती है तो ब्राह्मणों के निकम्मेपन को बढ़ावा देती इस दान की परंपरा पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देती.

स्वर्ग और नरक : एक पाखंड

स्वर्ग और नरक हिंदू धर्म की बहुत पुरानी अवधारणा है. हिंदू धर्म शास्त्रों में कुछ इस तरह का काल्पनिक चित्रण किया गया है कि हर हिंदू स्वर्ग पहुंचने के बारे में सोचता है, वह भी जीतेजी नहीं मरने के बाद. धर्म के कथित ठेकेदार, पंडित, पुजारी इस बात का समर्थन करते आए हैं कि पंडित तो सीधे स्वर्ग में ही जा कर विराजते हैं और बेचारे दलित नरक में जा कर पकौड़ा बनाते हैं. आइए, इस स्वर्ग व नरक की यात्रा करें और खुद देखें कि सचाई क्या है.

मैं घोर नरक में जाना चाहता हूं तो यह जरूरी है कि इस के लिए मुझे कोई जघन्य पाप करना होगा. क्योंकि शास्त्रों के अनुसार जितना बड़ा पाप उसी के अनुसार नरक में स्थान मिलता है. मान लीजिए कि मैं ने किसी की हत्या कर दी. क्या यह अपराध नरक जाने के लिए पर्याप्त है? शायद नहीं, तो मान लीजिए कि मैं ने किसी का बलात्कार कर दिया. अभी भी मेरा अपराध अगर पर्याप्त न हो तो मैं किसी मंदिर में जा कर किसी देवता की मूर्ति को लात मार कर उस का अपमान कर आया. अब यह तो पंडितों के अनुसार घोर पाप हुआ न. अब तो मेरा नरक में जाना तय है.

फर्ज कीजिए कि आज मैं मर गया. आप मेरा क्या करेंगे? यही न कि जलाएंगे.

अब चिता सज गई है. मेरा मृत शरीर चिता पर पड़ा है और बेटे द्वारा चिता में आग लगा दी गई है.

यहां सवाल उठता है कि क्या जलेगा? सब से पहले मेरी चमड़ी फिर मांस व खून और उस के बाद हड््डियां बिखर जाएंगी. आप उन हड््डियों को भी नदी में प्रवाहित कर देंगे.

अब बची है सिर्फ  आत्मा. शास्त्रों के अनुसार यम के दूत आए और मेरी आत्मा को रस्सी के फंदे में बांध कर नरक की तरफ चल दिए. नरक में आग जल रही है और कड़ाहे चढ़े हुए हैं. कड़ाहों में पड़ा तेल खौल रहा है. जिस में मेरी आत्मा को तल कर पकौड़ा बनाया जाएगा और माननीय यमराज उस से नाश्ता करेंगे. संभव यह भी है कि मेरी आत्मा को सीधे आग में जलाया जाए, लेकिन कृष्ण तो कहते हैं कि आत्मा को न तो दुख होता है न सुख. आत्मा को न तो काटा जा सकता है और न ही जलाया जा सकता है. यह तो अजरअमर है. इसीलिए इस आत्मा को कोई दुख या सुख होता ही नहीं है.

हां, दुख या सुख की अनुभूति जिस शरीर को होती है वह तो पहले ही जल चुका है. अब आत्मा को चाहे कड़ाही में तलिए या आग में जलाइए, उसे क्या फर्क पड़ता है.

मैं तो सोचता हूं कि बेचारे यमराज और उन के दूत नाहक ही अपना समय बरबाद कर रहे हैं, मेरी आत्मा तो जघन्य पाप करने के बाद भी चैन से बैठी है. आत्मा तो बेचारी हंस भी नहीं सकती, क्योंकि हंसने के लिए भी शरीर चाहिए. शरीर तो पहले ही मिट गया. चुपचाप बैठ कर यमराज और उस के दूतों की बेवकूफी देखने के अलावा यह आत्मा और क्या कर सकती है.

नरक की छोडि़ए, स्वर्ग की बात करते हैं. स्वर्ग में आनंद ही आनंद है, लेकिन यह आनंद महसूस कौन करेगा? आनंद महसूस करने वाला शरीर तो जमीन पर छूट गया. अब आत्मा बेचारी क्या आनंद महसूस करे. ऊपर से मुसीबत यह कि उर्वशी और मेनका मेरी आत्मा के सामने नृत्य कर रही हैं.

उर्वशी और मेनका ने पूरे कपड़े पहन रखे हैं या टेलीविजन धारावाहिकों की तरह आधे कपड़े पहन रखे हैं, इस का तो कोई मतलब ही नहीं रह गया. न भी पहने हों तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता. बेचारी आत्मा क्या कर लेगी. यही उर्वशी और मेनका अगर पृथ्वी पर नाचतीं तो आनंद ही कुछ और होता.

क्या आप को नहीं लगता कि स्वर्ग और नरक की कल्पना किसी बेवकूफ ने की होगी, और अगर शास्त्रों में इस का वर्णन है तो वह शास्त्र भी किसी बेवकूफ ने ही लिखे होंगे.

हिंदुओं के स्वर्ग और नरक की तरह मुसलमानों के यहां जन्नत की व्यवस्था है, बल्कि उन की जन्नत तो हिंदुओं के स्वर्गनरक से एक कदम आगे है. वहां हूरें (अप्सराएं) हैं और साथ ही दूध और शहद की नदियां भी बह रही हैं. जितना चाहो, छक कर पिओ लेकिन पिए कौन? जिस शरीर को पीना है वह तो बेचारा नीचे कब्र में दफन है और कीड़ेमकोड़ों के साथ कबड्डी खेल रहा है.

आत्मा बेचारी तो दूध पीने से रही और जब जन्नत में बैठ कर अप्सराओं का नाच ही देखना है, वह भी कम कपड़ों में तो पृथ्वी पर ही देख लेने में क्या बुराई है. पृथ्वी पर तो कुछ उपयोग भी हो जाता, और कुछ नहीं तो नयनों को ही कुछ सुकून मिल जाता. लेकिन नहीं साहब, पृथ्वी पर आप यह सब करें तो पाप और स्वर्ग या जन्नत में यह सब करने की खुली छूट.

वाह रे मेरे स्वर्ग और नरक. वाह रे मेरे पापपुण्य. वाह रे मेरे जन्नतदोजख. उस पर हमारे पंडित और मौलवी स्वर्गनरक और जन्नतदोजख का जबरदस्त समर्थन करते हैं और धार्मिक पुस्तकों की दुहाई देते रहते हैं. इतने बेवकूफ लोग पंडित कैसे बन गए?

सचाई कुछ और है. पंडित या मौलवी बेवकूफ बिलकुल नहीं हैं. वे बहुत शातिर दिमाग हैं. स्वर्गनरक या जन्नतदोजख की सारी अवधारणा शोषण के लिए बनाई गई है. लोगों को इन काल्पनिक जगहों का भय दिखाते रहो, पैसे ऐंठते रहो और अपनी दुकानदारी कायम रखो. हजारों सालों से वे यही कर रहे हैं और हजारों सालों तक उन्हें यही करना है.

स्वर्ग हो या नरक, जन्नत हो या दोजख, ये तो उन के धंधे के मूल आधार हैं. यह आप को देखना है कि आप स्वर्गनरक के नाम पर इस्तेमाल होते हैं या नहीं, आप बेवकूफ बनते हैं या अक्लमंद. अगर बेवकूफ हैं और वही बने रहना चाहते हैं तो पंडितों व मौलवियों के शोषण जाल से कभी भी बाहर न आ पाएंगे.

‘सुई धागा’ में अनुष्का के रोने का उड़ रहा मजाक

हाल ही में रिलीज हुआ अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘सुई धागा’ का ट्रेलर दर्शकों को खूब पसंद आ रहा है. फिल्म में अनुष्का शर्मा और वरुण धवन लीड रोल में होंगे. ‘सुई धागा’ के ट्रेलर में एक सीन है जहां पर अनुष्का शर्मा रोती हुई दिखती हैं. एक्ट्रेस का ये भावुक सीन अब सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहा है.

इंटरनेट यूजर्स ने अनुष्का शर्मा के रोने वाले सीन को लेकर अपनी क्रिएटिविटी का इस्तेमाल कर कई सारे मीम्स बनाए हैं. जो कि अब सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग टौपिक बन चुका है. ये मीम्स काफी मजेदार और फनी हैं.

यूजर्स ने अनुष्का के रोने को जिंदगी की कई घटनाक्रमों से जोड़ा है. देखें मीम्स…

वरुण धवन और अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘सुई धागा’ कहानी है ममता और मौजी की, जो जिंदगी की ठोकर लगने के बाद खुद ही अपने सपनों को बुनते हैं. कड़ी मेहनत से नामुमकिन से लगने वाले सपनों को पूरा करते हैं. फिल्म का निर्देशन शरत कटारिया ने किया है. फिल्म में वरुण और अनुष्का पति-पत्नी बने हैं. मनीष शर्मा ने इस फिल्म को प्रोड्यूस किया है. फिल्म के ज्यादातर हिस्से की शूटिंग मध्य प्रदेश में हुई है. फिल्म इसी साल 28 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है.

‘करीम मेाहम्मद’ कई सवालों के जवाब तलाशती है : पवन कुमार शर्मा

कठुआ बलात्कार कांड के बाद लोगों का ध्यान कश्मीर की घुमंतु जनजाति बकरवाल की तरफ गया. मगर इस जनजाति पर फिल्मकार पवन कुमार शर्मा ने एक फिल्म ‘ ‘करीम मोहम्मद’’ का निर्माण किया है, जो कि कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहो में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद 24 अगस्त को सिनेमाघरों में पहुंचने वाली है. पवन कुमार शर्मा की फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ का कठुआ कांड से कोई संबंध नही है, मगर उनकी फिल्म बकरवाल जनजाति के लोगों के जीवन पर रोशनी डालने के साथ ही इस बात को चित्रित करती है कि किस तरह इस समुदाय के लोग उंची पहाड़ियों पर आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखते हुए भारतीय फौज की मदद करता है. यानी कि बकरवाल एक देशभक्त जनजाति है.

प्रस्तुत है पवन कुमार शर्मा से हुई लंबी बातचीत के अंश…

आपकी पृष्ठभूमि क्या है?

मैं हिमाचल में मंडी से हूं. पहाड़ों पर ही पला बढ़ा हूं. 20-22 साल तक वहां के लोगों ने ट्रेन नहीं देखी थी. पर वहां थिएटर हैं. थिएटर ही हमें यहां तक लेकर आया. 1985 में एनएसडी की तरफ से मंडी में एक एक्टिंग वर्कशाप आयोजित हुआ था, जिसमें मैं व रोहिताश्व गौड़ सहित कई लोग जुड़े थे. वहीं से हम सभी ने अपने अपने रास्ते चुने. जब मैंने वहां से दिल्ली आने का निर्णय लिया, तो मेरी मां ने बहुत रोना धोना मचाया. हमें कोई भी चीज आसानी से नहीं मिली है. हमारे अंदर काफी जुझारू पन है. हमने काफी लड़ाई लड़ी. लड़ते लड़ते या यूं कहे कि संघर्ष करते करते यहां तक पहुंचे हैं. अभी भी हम समझौता वादी काम नहीं कर रहे हैं. लड़ाई जारी है. मेरे लिए फिल्म निर्माण पूजा है. मेरी नयी फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ एक हवन है, जिसमें सभी कलाकारों व तकनीशियनों ने अपनी अपनी आहुती दी है.

काफी लंबे समय के बाद आपने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा. इसकी कोई खास वजह?

देखिए, मुंबई नगरी में हर कोई फिल्म अभिनेता बनने के लिए आता है. मैंने भी 1986 से 1989 तक एनएसडी से अभिनय की ट्रेनिंग ली थी. मेरे साथ संजय मिश्रा भी थे. मैंने अभिनय में स्पेशलाइजेशन किया हुआ है. कुछ अवार्ड भी मिले थे. हम तो सोच रहे थे कि हमें अभिनेता बनना है, पर नियति और फिल्म इंडस्ट्री क्या चाहती है, हमें पता नहीं होता है. यह इंडस्ट्री आपको मेकअपमैन या स्पाट ब्वाय या प्रोडक्शन वाला या अभिनेता या निर्देशक बनाती है. फिल्म इंडस्ट्री में आपकी इच्छाएं नहीं चलती. इच्छाएं उन्ही की चलती हैं, जिन्हें संघर्ष करने के लिए बीस वर्षो तक घर से पैसा आ रहा हो. हां! कभी किसी का तुक्का भी लग जाता है. अन्यथा बौलीवुड में अभिनेता बनना आसान नही है. यहां लोग अभिनेता बनने आते हैं और बन कुछ और जाते हैं. ऐसा ही मेरा भी मसला है. मैं भी यहां अभिनेता बनने ही आया था. इसके अलावा आपकी अपनी शिक्षा पारिवारिक पृष्ठभूमि किस तरह के जानर में आपको काम करने की इजाजत देती है, वह भी मायने रखता है. हर इंसान हर काम नही कर सकता. जैसा कि मैं प्राईवेट चैनल के लिए सास बहू जैसा सीरियल नहीं बना पाया. इसलिए मैंने अपने मनपसंद का काम करने का एक रास्ता खोजा. मैंने पंकज कपूर के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम किया. इसके अलावा मैंने हमेशा यही कोशिश की कि मैं जो भी काम करूं, वह बक्से में बंद ना रहे. लोगों के सामने आए.

यानी कि आपने स्वतंत्र रूप से निर्माण व निर्देशन किया है?

जी हां! बतौर निर्माता निर्देशक दूरदर्शन के लिए 30 से 40 सीरियल बनाए. जिसमें मेरा सबसे ज्यादा चर्चित सीरियल रहा मुल्कराज आनंद की कहानी पर बना ‘एक सूरमा की मौत’. इसके अलावा ‘विलेजेस हियर एंड देयर’ की. जिसमें मैंने दिखाया था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गांवों में हालात कैसे हैं और पाक सीमा से सटे भारतीय क्षेत्र के गांवों की हालत कैसी है. पाकिस्तानी लगातार कश्मीर का राग अलापता है, पर वह हमें बताए कि आजादी के इतने साल बाद वह पाक आधिकृत कश्मीर के गांव के लिए क्या कर पाए? हमारे यहां अकनूर हो या कोई दूसरा गांव, वहां पर सड़के बनी हैं. सारी सुविधाए हैं. पर उधर झांक कर देखो बहुत बुरी हालत है. जब आप उसे नही संभाल पा रहें हैं, तो कश्मीर को क्या संभालेंगे. कश्मीर की एक बहुत बड़ी संत रही हैं लाल डेद. जिस तरह से कबीर ने दोहे लिखे हैं, उसी तरह से वह भी लिखा करती थीं. उन पर मैंने सीरीज बनायी. ‘अफगान रूल इन कश्मीर’ पर एक सीरीज बनायी. किसी को यह बात पता नही है कि कश्मीर पर कभी अफगान ने शासन किया था. ‘मुगल रूल इन कश्मीर’ पर भी एक सीरीज की थी. जब डिजीटल आया, तो मैंने सोचा कि डिजीटल में ऐसे काम करना ठीक नही होगा. इसलिए मैंने सबसे पहले पोस्ट प्रोडक्शन का सेटअप बनाते हुए संकलन स्टूडियो शुरू किया. डिजीटल विद्या को सीखा. समझ में आया कि कैसे हम कम पैसे और कम साधन के साथ एक अच्छी फिल्म बना सकते हैं. मैं जोड़तोड़ वाली फिल्म बनाने में यकीन भी नहीं करता. मेरा मानना है कि अभिनेता व निर्देशक जितनी साधना करता है, उसका काम उतना ही निखर कर आता है. एक फिल्म तो एक माह में बन जाती है, पर उसमें चालीस साल की साधना भी होती है. हम यह भूल जाते हैं. हर निर्देशक अपनी पहली फिल्म में अपनी जिंदगी का सारा निचोड़ डाल देता है. उसके बाद की फिल्मों में फिर से बहक जाता है. मैंने अनुभव से सीखा है कि अभाव में जो काम बेहतर हो सकता है, वह सुविधाएं आने के बाद नहीं हो सकता. क्योंकि अभाव के बीच सपनों को पूरा करने का इंसान का जो जुनून होता है, वह कमाल का होता है.

आप भी एनएसडी से हैं. लेकिन पहले देखा गया था कि एनएसडी से आने वाले कलाकार मैथड एक्टिंग सीख कर आ रहे थे और फिल्मों में असफल हो रहे थे?

हर कलाकार को समझना होगा कि फिल्म और थिएटर मिले हुए भी हैं, तो वहीं दोनों एक दूसरे से अलग भी हैं. दिमागी सोच व प्रशिक्षण के स्तर पर दोनों एक हैं, पर दोनों का ग्रामर अलग है. जैसे कि हिंदी में भी कई तरह की बोलियां हैं. इसी तरह से थिएटर व फिल्म दोनों की भाषाएं अलग हैं. इस बात को हर कलाकार को समझना पड़ेगा. थिएटर में जब आप संवाद अदायगी करते हैं, तब सामने बैठे अंतिम इंसान तक आपकी आवाज जानी चाहिए. पर सिनेमा में यही लाउड एक्टिंग हो जाती है. एनएसडी की ट्रेनिंग आपको एक अभिनेता के तौर पर तैयार करती है. पर फिल्मों से जुड़ने के लिए आपको फिल्म विधा को भी समझना पड़ेगा. फिल्म निर्माण की अपनी अलग कार्यशैली है. फिल्म के ग्रामर को समझने के लिए आपको कैमरे के लेंस, कैमरा एंगल, राइट लेफ्ट वगैरह सब कुछ समझना पड़ेगा. एनएसडी से आने वाले जिन कलाकारों ने फिल्म के ग्रामर को सीखा, वह सफल हो गए. कलाकार हो या निर्देशक दोनों के लिए फिल्म हो या थिएटर दोनों के अंतर को समझना जरूरी है.

आपने अब तक जो काम किया है, वह ज्यादातर कश्मीर केंद्रित रहा है. इसकी कोई खास वजह?

इसकी वजह है पहाड़. हिमाचल और कश्मीर में लोकेशन को देखते हुए कोई फर्क नही है. हिमाचल प्रदेश के अंदरूनी हिस्से में जाएं, तो वह कुछ ज्यादा ही खूबसूरत है. हम जहां पले बढ़े होते हैं, वह कहीं न कहीं हमारे दिलों दिमाग में छाया रहता है. मेरा पहाड़ीपन का अपना एक जानर है. इसके अलावा हमारी फिल्मों में बजट ज्यादा नहीं होता. यदि हम मुंबई में अपनी फिल्म की शूटिंग करते हैं, तो हमें लोकेशन के किराए के रूप मे लंबी रकम देनी पड़ती है. पर हिमाचल प्रदेश में हमें वही लोकेशन मुफ्त में मिल जाता है. जबकि हिमाचल प्रदेश में ‘यशराज फिल्मस’ वालों को लोकेशन के पैसे देने पड़ेंगे. तो लोकेशन की कीमत कम हो जाने के कारण हमारे लिए हिमाचल प्रदेश या कश्मीर में जाकर काम करना आसान हो जाता है. वहां अपने लोग हैं. तो वह हमें मदद करते हैं. इसके अलावा हम जहां से आए हैं, वहां के लिए कुछ करने का हमारा एक कर्ज होता है, जिसे हम चुकाते हैं. हम अपनी फिल्मों में वहां की लोकेशन ही नहीं, वहां के पेड़, पौधे, ट्रैक्टर व कलाकारों को भी हिस्सा बनाते हैं. इसके साथ ही हम हिमाचल व कश्मीर की नई पीढ़ी के लिए राह भी दिखाना चाहते हैं कि वह वहां रहकर भी काम कर सकते हैं. इसलिए मेरी फिल्म व टीवी सीरीज में पहाड़ मुख्य मुद्दा होता है.

फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ क्या है?

यह कश्मीर में बकरवाल जाति की रोड ट्रिप वाली फिल्म है. जिसमें एक बच्चे के नजरिए से आतंकवाद, जिंदगी, शिक्षा, जमीर सहित कई सवालो के जवाब तलाशने की कोशिश की गयी है. हमारी फिल्म बताती है कि किस तरह कुछ लोग चुनौती लेकर जिंदगी को छोड़कर जमीर की सुनते हैं. लोगों को पता ही नहीं है कि कश्मीर के लोग अपने जमीर के लिए क्या क्या करते है. किस तरह का त्याग करते हैं. फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ कई सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश है.

आपने अपनी फिल्म की कहानी के लिए बकरवाल जनजाति को ही क्यों चुना?

अब जब आसीफा कांड आया, तो बकरवाल जाति का जिक्र आया. जबकि मैं राजस्थान के गुर्जरों पर डाक्यूमेंटरी बनाते समय इन बकरवाल जाति के संपर्क में आया था. यह राजस्थान के गुर्जर ही हैं जो कि कश्मीर में जाकर बसे हैं. गुर्जरों को सब जानते हैं, पर बकरवाल को कोई नहीं जानता. जबकि बकर वालों की जिंदगी बहुत कठिन है. इनकी सारी शिक्षा यात्रा करते हुए ही होती है. करीम का पिता पढ़ा नहीं है, मगर उसके पास हर सवाल का जवाब है. न्यूटन का सिद्धांत प्रकृति से आ सकता है, तो पिता के पास सवाल के जवाब क्यों नही हो सकते?

हमारी फिल्म में जब बेटा अपने पिता से पूछता है कि बापू आप तो मदरसे गए नहीं, तो आपको यह ज्ञान कहां से आया? तो पिता कहता है कि कायनात /प्रकृति ही सिखाती है. प्रकृति की शिक्षा सशक्त होती है. जब भेड़ की टांग टूट जाती है, तो पिता को पता है कि उसका इलाज कैसे करना है.

आपकी फिल्म करीम मोहम्मद में कश्मीर की समस्या है.आपने कैसे कश्मीर को नजदीक से समझा?

देखिए, कश्मीर का जो मूल मुददा है, उसे हम जरूरत से ज्यादा जटिल बनाते जा रहे हैं. हम लोग एक तबके को बहुत अलग नजरिए से देखने लगे हैं. मैं खुद कश्मीर में काफी समय रहा हूं. मैंने पाया कि पूरा कश्मीर ऐसा नहीं है. कश्मीर का एक छोटा सा इलाका दहशतगर्दों व पत्थरबाजों से जुड़ा हुआ है. पर इसके लिए हमने पूरे कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बना दिया, यह गलत है. हम पूरे मुस्लिम तबके को दोषी ठहराएं, यह भी गलत है. मेरी राय में आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता. इसलिए आतंकवाद के नाम पर किसी समुदाय को बदनाम नहीं करना चाहिए. आतंकवाद का ना तो धर्म होता है, ना चेहरा और न जगह होती है. समस्या आसाम में भी है. सीरिया में भी है. लंदन, चीन, अमरीका सहित हर जगह समस्याएं हैं. तो हम सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर का राग अलापते रहेंगे, तो हम कश्मीर के जो अच्छे लोग हैं, जिन्हें हमने कभी देखा नहीं, उनकी भी हम तौहीन कर रहे हैं. ऐसी ही एक कम्यूनिटी बकरवाल है, जिसका दर्द हमने नहीं देखा, जो कि हिंदुस्तान के अंदर सेना की मदद करते रहते हैं. वह ऐसी उंचाई पर जाते हैं, जहां हमारे देश के सैनिक भी नहीं जाते हैं. बकरवाल जाति के यह लोग बाकायदा देश के सैनिकों को जानकारी देकर मदद करते रहते हैं. यह सरहद पर जवान की तरह खड़े रहते हैं, जबकि इनकी भेड़ बकरी व खाना छीन लिया जाता है. इनकी बहू बेटियों का अपमान किया जाता है. इस समुदाय को आगे लाना भी हमारा फर्ज व मकसद बनता है. हम चाहते हैं कि कश्मीर समस्या को लेकर एक सार्थक बहस शुरू हो. इससे पहले भी मैने कश्मीर को लेकर जो काम किया, वह कम महत्वपूर्ण नहीं है.वहां की संत लाल डेद को लोग जानते ही नहीं हैं. वहां के ज्यादातर जहीन लोगों की अच्छाई को सामने लाना जरुरी है. वह हमारे हिंदुस्तान का हिस्सा है.

मेरी फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ में कहीं कोई गोली बारूद नहीं है. पूरी फिल्म बच्चे के नजरिए से आगे बढ़ती है और कश्मीर का जो दूसरा पहलू है, उसे पूरा विश्व देख सकेगा. हम कश्मीर का राग अलापते हुए सिर्फ प्रोपोगेंडा कर रहे हैं. जबकि वहां पर बहुत अच्छा काम हो रहा है. वहां थिएटर हो रहा है, फिल्में बन रही है. कई अच्छे नाटक हो रहे हैं. थिएटर जगत में भवन बशीर काफी अच्छा काम कर रहे हैं, पर हम उनके बारे में बात क्यों नही करते. उन्हें भी आतंकवाद का सामना करना पड़ा. मेरा मकसद कश्मीर के सकारात्मक पक्ष के बारे में बात करना है.

छोटी फिल्मों को थिएटर नही मिल पाते हैं. इसका तोड़ क्या हो सकता है?

वर्तमान समय की यह सबसे बड़ी लड़ाई है, जिसे हम सभी फिल्मकार व हमारी एसोसिएशन लड़ रही हैं. मैं एक फिल्म फेस्टिवल में गया था, वहां मुझे एक 72 साल का विदेशी पत्रकार एलेक्स मिली, तो उसने कहा भारतीय सिनेमा में नक्ली काम ही नजर आता है. उसने कहा भारतीय सिनेमा में भारत तो कहीं नजर ही नहीं आता. तो जब हमें अपने ही सिनेमा में अपने ही देश को दिखाने में समय लग रहा है, तो क्या होगा? जब सत्यजीत रे ने अपनी फिल्मों में भारत को दिखाया, तो उनकी फिल्में आस्कर अवार्ड तक पहुंची. पूरे विश्व में लोग सत्यजीत रे को जानते हैं. पर हम सभी तो हालीवुड की नकल करने में लगे हुए हैं.जिस दिन हम भारतीय सिनेमा में भारतीय सभ्यता संस्कृति के साथ भारतीय कहानियों को दिखाएंगें,फिल्मों में भारतीय समस्या को लेकर चलेंगें, हमारा सिनेमा उपर जाएगा. मैं तो इसी तरह के सिनेमा में विश्वास करता हूं. मेरी फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ भी उसी तरह की है. इसके लिए जरूरी है कि देश में अच्छे अच्छे फिल्म फेस्टिवल हों. हमारे यहां नकली फिल्म फेस्टिवल बहुत चल रहे हैं. सरकार को चाहिए कि ऐसे फिल्म फेस्टिवलों पर रोक लगाए. ऐसे फिल्म फेस्टिवलों पर रोक लगनी चाहिए, जो सिर्फ पैसा कमाने के लिए चल रहे हैं. जब अच्छे फिल्म फेस्टिवल होंगे, तो सिनेमा अच्छा बनेगा.पर सिनेमा बनना रूकना नही चाहिए. यदि 100 घटिया फिल्में बन रही हैं, तो 10 अच्छी फिल्में भी बननी चाहिए. यदि इसी तरह से ‘आखों देखी’, ‘मुक्तिभवन’, ‘कड़वी हवा’, ‘करीम मोहम्मद’ जैसी फिल्में बनती रहीं, तो वह दिन दूर नही, जब यही मेन सिनेमा होगा. हमारा नाच गाना वाला फूहड़ सिनेमा पैरलल सिनेमा बनकर रह जाएगा. सिनेमा एक ऐसा प्रोफेशन है, जहां सिर्फ पैसे के लिए काम नही किया जाता. फिल्मकार की समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है, उसे भी उसे निभाना चाहिए. एक दिन वह आएगा, जब सिनेमाघर वाले छोटी छोटी फिल्मों को बुलाकर लोगों को दिखाएंगे. हमारी फिल्म को थिएटर मिल रहे हैं. देखना यह है कि दर्शक कितने पहुंचते हैं. जरुरत है कि दर्शक भी 100 या 200 रूपयों की आहुति नेक काम में डाले. दर्शक ही सिनेमा घर के मालिकों को अच्छी फिल्म दिखाने के लिए दबाव डाल सकते हैं.

बुराई में अच्छाई : हम बोलेंगे तो बोलोगे कि…

आवश्यकता आविष्कार की जननी है. बचपन में मास्टर साहब ने यह सूत्रवाक्य रटाया था मगर इस का अर्थ अब समझ में आया है. दरअसल, लोकतंत्र में बाबू, अफसर, नेता सभी आम जनता की सेवा कर मेवा खा रहे हैं. लेकिन बेचारे फौजी अफसर क्या करें? उन की तो तैनाती ही ऐसी जगह होती है जहां न तो ‘आम रास्ता’ होता है न ‘आम जनता’ होती है. ऐसे में बेचारे कैसे करें किसी की सेवा और कैसे खाएं मेवा? मगर भला हो उस वैज्ञानिक का जिस ने ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ नामक फार्मूला बनाया था. फौजियों के बीवीबच्चे भी खुशहाल जिंदगी जी सकें, इस के लिए जांबाजों ने मलाई जीमने के नएनए फार्मूले ईजाद कर डाले. ऐसेऐसे जो ‘न तो भूतो और न भविष्यति’ की श्रेणी में आएं.

एक बहादुर अफसर ने तो अपने ही जवानों को टमाटर का लाल कैचअप लगा कर लिटा दिया और फोटो खींचखींच कर अकेले दम दुश्मनों से मुठभेड़ का तमगा जीत लिया. वह तो बुरा हो उन विभीषणों का जिन्होंने चुगली कर दी वरना अब तक वीरता के सारे पुरस्कार अगले की जेब में होते. कुछ लोगों को इस मामले में बुराई नजर आती है. मगर मुझे तो इस में ढेरों अच्छाइयां नजर आती हैं (जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी वाला मामला). भारतीय जवानों की वीरता, अनुशासन, वफादारी और फरमांबरदारी के किस्से तो पुराने जमाने से मशहूर हैं. वे अपने अफसरों के हुक्म पर हंसतेहंसते प्राण निछावर कर देते हैं. कभी उफ नहीं करते. अब अफसर ने कहा, प्राण निछावर करने की जरूरत नहीं, बस, लाल कैचअप लगा कर मुरदा बन जाओ. बेचारों ने उफ तक नहीं की और झट से मुरदा बन फोटो खिंचवा ली. है किसी और सेना में अनुशासन की इतनी बड़ी मिसाल?

बालू से तेल निकालने के किस्से तो आप ने बहुत सुने होंगे लेकिन चाइना बौर्डर पर टाइमपास कर रहे कुछ अफसरों ने पानी से तेल निकाल ईमानदारी के सीने पर नए झंडे गाड़ दिए हैं. अगलों ने फौजी टैंकों के लिए पैट्रोल पहुंचाने वाले टैंकरों में शुद्ध जल सप्लाई कर दिया. बाकायदा हर चैकपोस्ट पर टैंकरों की ऐंट्री हुई ताकि कागजपत्तर पर हिसाब पक्का रहे. उस के बाद गश्त लगाते लड़ाकू टैंक कितने किलोमीटर चले, उन का प्रति लिटर ऐवरेज क्या है और वे कितना पैट्रोल पी गए, यह या तो ऊपर वाला जानता है या जुगाड़खोर अफसर. कुछ लालची ड्राइवरों के चलते हिसाबकिताब गड़बड़ा गया वरना सबकुछ रफादफा रहता और चारों ओर शांति छाई रहती.

कुछ लोगों को इस में भी बुराई नजर आती है. लेकिन, मुझे तो इस में भी ढेरों अच्छाइयां नजर आती हैं. ऊपर वाला न करे लेकिन अगर कभी दुश्मन की सेना आप के चैकपोस्ट पर कब्जा कर ले और वहां आप के डीजलपैट्रोल से भरे टैंकर खड़े हों तो क्या होगा? आप का ही तेल भर कर वह आप के सीने पर चढ़ी चली आएगी. लेकिन अगर टैंकरों में पानी भरा हो तो बल्लेबल्ले हो जाएगी. गलतफहमी में दुश्मन मुफ्त का तेल समझ उन टैंकरों से पानी अपने टैंकों में भर लेंगे और थोड़ी दूर चलने के बाद उन के टैंक टें बोल जाएंगे. है न बिलकुल आसान तरीका दुश्मन को चित करने का.

ये सब तो हुई पुरानी बातें. हाल ही में प्रतिभाशाली फौजियों ने जन कल्याण का ऐसा फार्मूला ईजाद किया कि दांतों तले उंगलियां दबाई जाएं या उंगलियों से दांत दाबे जाएं, तय करना मुश्किल है. किसी भले आदमी ने कानून बना दिया कि कश्मीर में गोलाबारूद, विस्फोटक का पता बताने वालों को 30 से 50 हजार रुपए का इनाम दिया जाएगा. बस, लग गई लौटरी हाथ. अगलों ने खाली डब्बों में काले रंग की बालू भर दी और तारवार जोड़ कर सुरक्षित स्थानों पर रखवा दिया. उस के बाद? अरे भैया, उस के बाद क्या पूछते हो? जानते नहीं कि इतनी बड़ी फौज का इतना बड़ा नैटवर्क चलाने के लिए मुखबिरों की टीम बनानी बहुत जरूरी है और उस से भी ज्यादा जरूरी है मुखबिरों को खुश रखना. बेचारे जान जोखिम में डाल कर फौज के लिए सूचनाएं लाते हैं. अब नियमानुसार तो नियम से ज्यादा रकम मुखबिरों को दी नहीं जा सकती और उतने में मुखबिर काम करने को राजी नहीं होते. इसीलिए अगलों ने अपने मुखबिरों से ही उन नकली विस्फोटकों के छिपे होने की सूचना दिलवा दी और फटाक से छापा मार उसे बरामद करवा दिया. बस, 30 से 50 हजार रुपए तक का इनाम पक्का. अब भैया, मुखबिर कोई बेईमान तो होते नहीं जो सारा माल खुद हड़प जाएं. सुना है बेचारे आधा इनाम पूरी ईमानदारी से हुक्मरानों को सौंप देते हैं ताकि उन के भी परिवार पलते रहें वरना खाली तनख्वाह में आजकल होता क्या है.

कुछ लोगों को इस में भी बुराई नजर आती है. (पता नहीं इस देश के लोग इतनी संकीर्ण मानसिकता वाले क्यों हैं?) मगर मुझे तो इस में अच्छाइयों का महासागर नजर आता है. कुछ अच्छाइयां गिनवा देता हूं. पहली बात ऐसी घटनाओं से मुखबिरों और उन के खास अफसरों के दिन बहुरे, ऊपर वाला करे ऐसे ही सब के दिन बहुरें.

दूसरी बात यह है कि इस से पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आ गया. वह कैसे? अरे भैया, इतना  भी नहीं समझे? देखो, एक जमाने से पूरी दुनिया आरोप लगा रही है कि इंडिया में जो बमवम दग रहे हैं उस के पीछे पाकिस्तान का हाथ है, जबकि वहां के बेचारे निर्दोष हुक्मरान एक जमाने से दुहाई दे रहे हैं कि भारत में चल रहे आतंकवाद में उन का कोई हाथ नहीं है. अब इस घटना से यह साफ हो गया है कि बमवम हमारे ही फौजी रखवा रहे हैं. इस से पाकिस्तान का चेहरा बेदाग साबित हो गया. दुनिया वालों को उस पर तोहमत लगाना छोड़ देना चाहिए.

अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि आईएसआई वालों ने बिना अपने मासूम हुक्मरानों की जानकारी के दोचार बम अपने एजेंटों से रखवा दिए होंगे तो उन में भी आपस में सिरफुटौव्वल हो जाएगी. वह कैसे? अरे भैया, आप तो कुछ भी नहीं समझते. सीधी सी बात है, भारतीय सेना जब दनादन विस्फोटक बरामद करेगी तो आईएसआई वाले अपने एजेंटों को हड़काएंगे कि तुम लोग एक भी काम ढंग से नहीं करते. ऐसी जगह बम लगाया जो बरामद हो गया. इस के अलावा हम ने बारूद दिया था 2 बम लगाने का और तुम लोगों ने आधाआधा लगा दिया 2 जगह. तभी एक भी ढंग से नहीं फटा. बेचारे एजेंट अपनी सफाई देते रहें लेकिन उन की सुनेगा कोई नहीं. ताव खा कर वे आपस में लड़ मरेंगे. आखिर वे भी महान तालिबानी गुरुओं के महान चेले हैं. कोई ऐरेगैरे नहीं. बताइए, अगर ऐसा हुआ तो मजा आ जाएगा या नहीं? खामखां दुश्मन आपस में लड़ मरेंगे और अपनी पौबारह हो जाएगी. इसी को कहते हैं कि हींग लगे न फिटकरी और रंग निकले चोखा.

तो भैया, देखा आप ने, फौजी जो भी करते हैं देशहित में करते हैं. देशहित में कई बार उन को अपनी असली योजना गुप्त रखनी पड़ती है. इसलिए उन के कामों को ऊपरी नजर से मत देखिए. गहराई में जा कर देखेंगे तो आप को भी उन की हर हरकत में अच्छाई नजर आएगी. जैसे, मुझे नजर आ रही है. इसलिए, अब जरा जोर से बोलिए, जयहिंद.

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