इस जहां में कई बार ऐसे भी होता है प्यार

जिंदगी में प्यार के फूल खिले हों और रिश्तों में मिठास तथा विश्वास हो तो हर पल खुदबखुद खूबसूरत हो जाता है. वे लोग खुशनसीब होते हैं, जिन्हें सच्चा प्यार मिलता है. सच्चा प्यार मिलने से ही कैनेडी मैरी का भी हर पल अब खुशियों भरा था. मैरी की गुलाबी आंखों, गुलाब की पंखुडि़यों की मानिंद नाजुक होंठों और आकर्षक गुलाबी चेहरे पर गजब की चमक थी. क्योंकि उसे सारे जहां की खुशियां जो मिल गई थीं. कमरे में बैठी मैरी कल्पनाओं के जरिए खुशियों के महल सजा रही थी. गबरू जवान पृथ्वी उस की जिंदगी की जरूरत बन गया था. पृथ्वी उस के वजूद का वह हिस्सा था, जिसे अब वह कभी खोना नहीं चाहती थी. पृथ्वी कमरे में दाखिल हुआ तो धड़कते दिल से उस के हर कदम की आहट मैरी महसूस कर रही थी. उस के सामने बैठ कर वह कुछ पलों के लिए उसे बेयकीन निगाहों से देखता रहा तो मैरी के होंठों पर थिरकन हुई, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हैं?’’

‘‘सोच रहा हूं कि किस्मत किसी पर इतना मेहरबान कैसे हो सकती है कि तुम जैसी खूबसूरत लड़की मुझे मिल गई.’’ पृथ्वी की इन बातों पर मुसकराते हुए मैरी ने कहा, ‘‘यह तो मैं भी नहीं जानती, लेकिन जिस तरह जिंदा रहने के लिए सांसें जरूरी हैं, अब उसी तरह तुम मेरे लिए हो गए हो. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा हमसफर इतनी दूर आ कर मिलेगा. एक बात और…’’

‘‘क्या?’’ पृथ्वी ने पूछा.

‘‘मैं ने सिर्फ तुम्हारे लिए अपना सब कुछ छोड़ा है. यहां तुम्हारे सिवा मेरा कोई नहीं है. उम्मीद करती हूं, तुम न कभी मेरा विश्वास तोड़ोगे और न साथ छोड़ोगे.’’ मैरी ने पृथ्वी की आंखों में आंखें डाल कर कहा तो उस ने उस के हाथ को अपने हाथ में ले कर विश्वास दिलाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘मैरी, तुम भी मेरी सांसों की जरूरत बन चुकी हो, इसलिए इस तरह की बात सोचना भी मत.’’

इस के बाद पृथ्वी और मैरी खुशियों के सफर पर निकल पड़े. मैरी और पृथ्वी कभी इस तरह एक हो जाएंगे, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था. उन का धर्म, जाति, भाषा और देश सब कुछ अलग था. मैरी सात समंदर पार से पृथ्वी का प्यार पाने के लिए चली आई थी और उसे अपना जीवनसाथी चुन लिया था. उन का जादुई अंदाज में हुआ प्यार एक ऐसी मिसाल बन गया था, जिस की हर तरफ चर्चा थी.

पृथ्वी सिंह हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के सलूणी उपमंडल के गांव तिवारी का रहने वाला था. पृथ्वी की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. वह एक होटल में काम करने के साथ स्कूली बच्चों को जूडोकराटे सिखाता था. इस के अलावा अतिरिक्त कमाई के लिए वह गाइड का भी काम कर लिया करता था.

करीब एक साल पहले की बात है, जब पृथ्वी टूरिस्ट की तलाश में डलहौजी गया था. डलहौजी मनमोहक वादियों और पर्वत शृंखलाओं से घिरा प्रमुख पर्यटकस्थल है. इसे अंगरेजों ने बसाया था. अंगरेज यहां गरमियों की छुट्टियां बिताने आते थे. खूबसूरत डलहौजी में देशविदेश से पर्यटक घूमने आते हैं.

एक दिन पर्यटकों की तलाश में भटक रहे पृथ्वी सिंह की नजर एक पार्क के किनारे बैठी विदेशी युवती पर पड़ी तो वह चौंका, क्योंकि उस के चेहरे पर जमाने भर की उदासी सिमटी हुई थी. इतना ही नहीं, उस के पास ढेर सारा सामान भी था. उसे देख कर पृथ्वी को थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि इतना सामान ले कर कोई पार्क में टहलने नहीं आता. अधिक से अधिक टूरिस्ट अपने पास पर्स या पीठ बैग ही रखते हैं.

पृथ्वी को लगा कि शायद युवती कुछ परेशान है, इसलिए उस के नजदीक जा कर उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हैलो, आई एम गाइड, एनी प्रौब्लम?’’

लड़की ने पलट कर उस की ओर देखा और बड़ी ही उदासी से मरी सी आवाज में बोली, ‘‘यस.’’

‘‘कैन आई हेल्प यू?’’

इस के बाद युवती ने बताया कि वह इसलिए परेशान है, क्योंकि पर्यटकों की भीड़ की वजह से उसे किसी होटल में रहने के लिए कमरा नहीं मिल सका है. काफी प्रयास के बाद भी जब वह कामयाब नहीं हुई तो अपना सामान ले कर पार्क में आ गई. उस की बातें सुन कर पृथ्वी ने हंसते हुए कहा, ‘‘ओके नो प्रौब्लम.’’

उस के इस अंदाज पर युवती की निगाहें उस पर टिक गईं. वह उस के चेहरे को देखती रही. पृथ्वी ने उस से वादा ही नहीं किया कि वह उस की हरसंभव मदद करेगा, बल्कि उसे अपने साथ ले जा कर एक होटल में उस के रहने का इंतजाम भी करवा दिया.

कमरा पा कर मैरी बहुत खुश हुई. उस ने पृथ्वी को पैसे देने चाहे, लेकिन उस ने मना कर दिया. उस के मददगार और हंसमुख स्वभाव ने मैरी पर गहरी छाप छोड़ी.

दोनों के बीच बातचीत हुई तो पता चला कि मैरी अमेरिका के वाशिंगटन की रहने वाली थी. उस ने सुन रखा था कि भारत विभिन्नताओं से परिपूर्ण आकर्षक पर्यटकस्थलों वाला देश है, इसीलिए वह भारत घूमने चली आई थी.

अगले दिन पृथ्वी ने मैरी को कई जगहों पर ले जा कर घुमाया. अपने घर से कोसों दूर मैरी को पृथ्वी में अपनापन लगा. उस ने उस के दिलोदिमाग पर अपनी छाप कुछ इस तरह छोड़ दी, जैसे किसी चित्रकार ने कोरे पेपर पर किसी तसवीर को बनाने के लिए महज एक लकीर खींची हो.

उस दिन चंद पलों के लिए मैरी ने पृथ्वी की निगाहों से निगाहें क्या मिलाईं, उस की आंखों में अपने लिए कुछ अलग सी हसरत महसूस की. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच दोस्ती काफी गहरी हो गई. मैरी हसीन ख्वाबों की दुनिया में जीने लगी. उसी बीच मैरी समझ गई कि खुद उस के दिल की तरह पृथ्वी के दिल में भी कुछ हो रहा है. यह अलग बात थी कि पृथ्वी ने उस पर कुछ जाहिर नहीं किया था. दोनों सिर्फ एकदूसरे की धड़कनें महसूस कर रहे थे.

दोनों का साथ घूमना और खूब बातें करना रोज की बात थी. अब वे आंखों को करार देने का बहाना तलाशने लगे. उन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, इस का पता न मैरी को चला और न ही पृथ्वी को. दोनों के ही दिलों में प्यार के फूल खिल रहे थे, लेकिन अपनी भावनाओं को वे कैद किए रहे. आखिर एक दिन मैरी ने ही प्यार के सफर पर कदम आगे बढ़ाया, ‘‘पृथ्वी, तुम ने कभी किसी से प्यार किया है?’’

मैरी की बात पर पृथ्वी कुछ देर के लिए खामोश रह गया. मैरी उसे देखती रही. उस ने अपना सवाल फिर दोहराया तो पृथ्वी बोला, ‘‘किया है.’’

‘‘कौन है वह खुशनसीब?’’

‘‘सौरी, अभी नहीं बता सकता. मुझे अभी उस के इजहार का इंतजार है. क्या तुम ने किसी से प्यार किया है?’’

‘‘पहले तो नहीं किया, लेकिन अब करती हूं.’’

‘‘किस से, कहां रहता है वह?’’

‘‘वह तुम हो पृथ्वी. मैं तुम्हें बहुत चाहती हूं.’’

पृथ्वी मुसकरा दिया. प्यार पर स्वीकृति की मुहर लगते ही दोनों की झोली में जैसे सारे जहां की खुशियां आ सिमटीं. अब तक पृथ्वी को इस बात का अहसास हो गया था कि मैरी को भारत से काफी लगाव हो गया है.

बातों और मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया तो उन के प्यार का पौधा भी बढ़ा. दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं. दोनों ही एकदूसरे को टूट कर चाहते थे. प्यार में कसमेवादे आम बात हैं. उन के वादे कैसे पूरे होंगे, दोनों ही नहीं जानते थे. भाषा, देश, जाति और धर्म किसी भी मामले में उन के बीच समानता नहीं थी.

मैरी को वापस अपने देश जाना था, लेकिन मन ही मन उस ने पृथ्वी को जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया था, इसलिए शादी के मसले पर वह खुल कर बात कर लेना चाहती थी. उस ने पूछा, ‘‘पृथ्वी, शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?’’

‘‘मैरी, तुम ऐसे पूछ रही हो, जैसे अभी मिनटों में शादी की रस्मों को पूरा कर दोगी.’’

‘‘रस्में तो अपने घर वालों से बातें कर के ही निभाऊंगी. मैं चाहती हूं कि तुम भी एक बार अपने घर वालों से बात कर लो.’’

‘‘यू आर सीरियस…क्या तुम सच कह रही हो?’’

‘‘तुम भी तो यही चाहते हो न. मैं तुम से सच्चा प्यार करती हूं.’’

मैरी अपने घर वालों से बातें करती ही रहती थी. उस ने उन से पृथ्वी से दोस्ती और प्यार के बारे में बता भी दिया था. इस बीच वह पृथ्वी के घर जा कर उस के घर वालों से मिल चुकी थी. उस की वीजा अवधि समाप्त हो रही थी. उस का वापस जाने का वक्त आया तो पृथ्वी का दिल बैठने लगा. उस की परेशानी मैरी जानती थी. वह खुद भी वापस नहीं जाना चाहती थी. लेकिन उस की मजबूरी थी.

उस ने वादा किया, ‘‘मैं तुम से दूर नहीं जा रही पृथ्वी. महसूस कर के देखना, मुझे हरदम अपने साथ खड़ा पाओगे. सच्चा प्यार इंसान जिंदगी में सिर्फ एक बार ही करता है और वह मैं ने तुम से किया है. मैं यहां सिर्फ घूमने आई थी. यहां तुम्हारा प्यार मिल गया, यह मेरे लिए खुशी की बात है. मैं अपने मातापिता को मनाऊंगी, तभी हमारी शादी होगी.’’

‘‘अगर वे तैयार न हुए तो..?’’ पृथ्वी ने आशंका प्रकट की.

‘‘तुम्हारी आशंका जायज है डियर, लेकिन हमारे प्यार की डोर इतनी कमजोर भी नहीं है. वे मेरी खुशी के लिए तैयार हो जाएंगे. हमारा धर्म, संस्कार और देश भले ही अलग है, लेकिन मेरे दिल ने सिर्फ तुम्हारी धड़कन को महसूस किया है. मैं ने आत्मा से तुम्हें प्यार किया है. जब से तुम मेरी जिंदगी में आए हो, मैं ने अपनी हर खुशी को तुम से जोड़ कर देखा है. अब तुम्हारे सिवा किसी और के साथ अपनी दुनिया बसाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती.’’

मैरी की बातों में दृढ़ता थी. उस का हर एक शब्द इस बात का सबूत था कि वह जो कह रही है, उसे सच कर दिखाएगी. उस ने आगे कहा, ‘‘मैं अब जब भी वापस आऊंगी, हमेशा के लिए तुम्हारी हो जाऊंगी पृथ्वी. तुम मेरा इंतजार करना.’’

इस के बाद दोबारा आने का वादा कर के मैरी अपने देश चली गई. दोनों के बीच फोन पर बातों का सिलसिला चलता रहा. पृथ्वी को मैरी पर विश्वास तो था, लेकिन वह अपना वादा निभा पाएगी, इस की उम्मीद थोड़ा कम थी. क्योंकि अपने लोगों और देश को छोड़ना कोई आसान नहीं होता.

मैरी का मन बदल भी सकता था. पृथ्वी के दिन कशमकश में बीत रहे थे. एक दिन वह ऐसे ही विचारों में खोया था कि मैरी का फोन आया, ‘‘पृथ्वी, मैं जल्द ही इंडिया आने वाली हूं.’’

‘क्या?’’ पृथ्वी ने हैरानी से पूछा.

‘‘क्यों, इस में हैरान होने की क्या बात है. आप के लिए एक खुशखबरी भी है.’’ मैरी ने चहकते हुए कहा, ‘‘मौम डैड मेरी शादी के लिए तैयार हो गए हैं.’’

इस के बाद मैरी ने उस की बात अपने मातापिता से भी कराई. वे बेटी की खुशी में खुश थे. कई महीने बीत गए. मैरी अपने प्यार को निभाने का पुरजोर वादा करती रही. वह पृथ्वी को जीवनसाथी बनाने का सपना दिल में संजो कर दिसंबर, 2016 के आखिरी सप्ताह में इंडिया आ गई.

मैरी डलहौली पहुंची तो पृथ्वी बहुत खुश हुआ. इस बीच उन के प्यार का रंग और भी गहरा हो चुका था. मैरी ने अपना प्यार दर्शाने के लिए अपनी गरदन के नीचे पृथ्वी के नाम का टैटू भी बनवा लिया था. पृथ्वी के घर वाले भी इस शादी के लिए तैयार थे. अपने बीच की दूरियां दोनों को अब दुश्मन लगने लगी थीं.

2 जनवरी, 2017 को आखिर दोनों ने सलूणी के मजिस्ट्रैट अजय पाराशर के यहां विवाह अधिनियम के तहत कोर्टमैरिज कर ली.

अमेरिका की भौतिकवादी जिंदगी से दूर गांव में जीवन बिता रही मैरी का कहना है कि इंडिया बहुत प्यारा देश है. उस ने सोचसमझ कर ही पृथ्वी से शादी का फैसला लिया है.

वहीं पृथ्वी मैरी को पा कर बहुत खुश है. उस ने सोचा भी नहीं था कि कोई विदेशी लड़की उसे स्वीकार करेगी और अपना देश छोड़ कर उस के पास रहने आ जाएगी. दोनों प्रेमियों की शादी चर्चा का विषय बनी हुई है. वे खुशी से जीवन बिता रहे हैं.

लेटलतीफी के मुरीद आखिर क्यों हैं हम

ऐसा लगता है कि वक्त की कीमत नहीं समझना और आधा घंटा देरी संबंधी भारतीय मानक समय के कुख्यात मुहावरे को हमारे सरकारी कर्मचारियों ने पूरी तरह आत्मसात कर रखा है, वरना इस बारे में सरकार को बारबार अपनी चिंता नहीं प्रकट करनी पड़ती. इस का एक उदाहरण तब देखने को मिला, जब दिल्ली के नवनियुक्त चीफ सैक्रेटरी एम एम कुट्टी ने दिसंबर 2016 के आखिरी हफ्ते में सभी विभागों के सचिवों को निर्देश जारी कर के लेटलतीफ बाबुओंकर्मियों का पता लगाने और आदतन ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ा ऐक्शन लेने को कहा. मोदी सरकार पहले भी दफ्तरों में देर से आने वाले कर्मचारियों से परेशान है और वह सरकारी मंत्रालयों, विभिन्न विभागों और दफ्तरों में कामकाज की लुंजपुंज शैली में लगातार आग्रह के बावजूद, सुधार होता नहीं देख कर लेटलतीफ कर्मचारियों पर नजर रखने व उन पर कार्यवाही करने का संकेत देती रही है. पर लगता है कि सरकारी बाबुओं ने ठान रखा है कि सरकार चाहे जितने डंडे चला ले वे अपनी लेटलतीफी की आदत नहीं बदलेंगे.

उल्लेखनीय है कि डिपार्टमैंट औफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) वर्ष 2015 में जारी एक निर्देश में साफ कह चुका है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए आदतन देर से दफ्तर आना दंडनीय अपराध है और ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा सकती है. इस के लिए सर्विस रूल्स (नौकरी संबंधी नियमावली) का हवाला दिया गया था. जारी आदेश में कहा गया था कि सरकारी कर्मचारियों के लिए समय की पाबंदी सुनिश्चित करने का दायित्व मंत्रालयों, विभागों और कार्यालयों का है, इसलिए उन के अधिकारी विभाग के कर्मचारियों की उपस्थिति का रिकौर्ड रखें.

डीओपीटी ने सभी अधिकारियों से कहा था कि वे उपस्थिति के लिए बायोमैट्रिक सिस्टम को ही आधार मानें और उसी आधार पर कार्यवाही करें. पर लेटलतीफी की आदत से मजबूर सरकारी कर्मचारियों ने बायोमैट्रिक सिस्टम से बचने के कई उपाय कर रखे थे और वे उपस्थिति दर्ज करने के लिए दूसरे तरीकों को अपनाए हुए थे.

यही नहीं, जिन कार्यालयों में उपस्थिति दर्ज करने के आधुनिक तौरतरीके अपना लिए गए हैं, वहां भी उपस्थिति का रिकौर्ड नहीं रखा जाता. इस से कुछ समय बाद यह पता नहीं चलता कि एक निश्चित समयावधि के बीच कौन सा कर्मचारी आदतन समय पर नहीं आता रहा है.

डीओपीटी के निर्देश में यह भी सुझाया गया था कि एक सरकारी कर्मचारी के लिए एक हफ्ते में 40 घंटे (8 घंटे प्रतिदिन) की उपस्थिति अनिवार्य है. ऐसी स्थिति में यदि कोई कर्मचारी महीने में 2 बार 30 मिनट की देरी से आता है, तो उसे समय की पाबंदी में छूट मिल सकती है, लेकिन तीसरी बार इतनी ही देरी पर उस की आधे दिन की छुट्टी काट ली जाएगी. यदि वह आदतन ऐसा करता रहता है, तो वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट (अप्रेजल) में उस के बारे में नकारात्मक टिप्पणी की जा सकती है.

आदत से मजबूर

 सरकारी विभागों में काम के वक्त अधिकारियों व कर्मचारियों का नदारद रहना और अपनी कुरसी पर देर से आना खास कर तब अखरता है, जब उस अधिकारी व कर्मचारी के जिम्मे जनता से जुड़े कामकाज हों. ऐसी स्थिति में लोग लंबी लाइन लगा कर कर्मचारी व अधिकारी के दफ्तर और अपनी सीट पर विराजमान होने का लंबा इंतजार करते रहते हैं. ऐसे कर्मचारी को यदि कोई व्यक्ति भूलवश देरी से आने के लिए कोई बात कह दे, तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति का कोई काम हो पाना नामुमकिन ही हो जाता है.

यही नहीं, दफ्तर आ कर भी अपनी सीट से गायब हो जाना भी ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों की आदत में शुमार हो गया है, वे घंटों तक दफ्तर तो क्या, उस के आसपास तक नजर नहीं आते, भले ही लाइन में जनता अपने सौ काम छोड़ कर सिर्फ उन का वहां इंतजार ही क्यों न कर रही हो. इन मुश्किलों का समाधान क्या है?

बायोमैट्रिक सिस्टम का तोड़

 देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में भले ही अटैंडेंस के लिए बायोमैट्रिक सिस्टम की शुरुआत हो चुकी है, पर अन्य हिस्सों में मौजूद ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उपस्थिति दर्ज कराने का पुराना सिस्टम चला आ रहा है, जिस में कर्मचारी औफिस में रखे रजिस्टर में अपने नाम के आगे हस्ताक्षर करते हैं. इस में अकसर समय के उल्लेख का कोई प्रावधान नहीं होता.

यदि समय दर्ज किया जाता है, तो जरूरी नहीं कि वह एकदम सही लिखा जाए और महीने के आखिर में उस उपस्थिति के आधार पर कर्मचारी की छुट्टियों और वेतन का समायोजन किया जाए. इस में भी बाबुओं की मिलीभगत से कोई कर्मचारी दफ्तर आए बिना वर्षों तक अपनी उपस्थिति लगवाता रह सकता है. ऐसे दर्जनों किस्से उजागर हो भी चुके हैं जब कोई कर्मचारी दफ्तर आए बिना वेतन लेता रहता है.

उपस्थिति के सिस्टम के आधुनिकीकरण का तब भी कोई फायदा नहीं, जब तक कि दफ्तर आए कर्मचारी की अनिवार्य मौजूदगी के प्रमाण न जुटाए जाएं. कार्ड पंचिंग के तौरतरीकों के दुरुपयोग की भी सैकड़ों शिकायतें मिल चुकी हैं. ऐसे सिस्टम में भी तब मिलीभगत एक कामयाब नुस्खे के तौर पर आजमाई जाती रही है, जब एकदूसरे के कार्ड से कर्मचारी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे हैं. यही वजह है कि अब सरकार उपस्थिति दर्ज करने के मौजूदा तौरतरीकों को खत्म कर उन की जगह ऐसा बायोमैट्रिक सिस्टम लागू करना चाहती है जो सारे मैन्युअल सिस्टम की जगह ले सके. आधार एनेबल्ड बायोमैट्रिक अटैंडेंस सिस्टम (एईबीएएस) नामक इस प्रणाली में कर्मचारी की उंगलियों व आंखों की पुतलियों की छाप ली जा सकेगी, जिस से उपस्थिति की धांधलियों पर काफी हद तक रोकथाम की उम्मीद है. पर ये सिर्फ यांत्रिक उपाय हैं. ऐसे में इस की भरपूर आशंका आगे भी रहेगी कि कामचोर व बेईमान कर्मचारी इन का कोई न कोई तोड़ निकाल लें.

सवाल कार्य संस्कृति का

नियमों का पालन डंडे के बल पर करवाना पड़े, तो किसी देश और समाज के लिए इस से ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है. आखिर हमारे देश में ऐसी कार्य संस्कृति क्यों नहीं जग पा रही है जिस में वक्त पर दफ्तर आना, सौंपे गए काम और जिम्मेदारी का समर्पण के साथ निर्वाह करना और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना लोग जरूरी समझते हों.

देश में जो नई कौर्पोरेट संस्कृति पनप रही है उस में देर से दफ्तर आने वालों के लिए कोई जगह नहीं होती है. वहां देर से दफ्तर आने वालों के लिए पर्याप्त दंड की व्यवस्था है. इस से कर्मचारी वक्त के पाबंद रहते हैं. अचरज इस बात को ले कर होता है कि सरकारी कर्मचारियों ने इस बदलाव का जरा भी नोटिस नहीं लिया है और इस का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार जब तक उन पर पाबंदियां नहीं लगाएगी, तब तक वे नहीं सुधरेंगे.

इस सिलसिले में एक दावा यह किया जाता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही जिस प्रकार सरकारी कार्यालयों में बायोमैट्रिक अटैंडेंस लागू करवाने की बात कही थी, उस से सरकारी कर्मचारियों में काफी नाराजगी थी. बताते हैं कि इस का बदला उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनावों में लिया और केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को करारा झटका दिया.

ऐसी सूरत में सरकारी कर्मचारियों को सख्त कायदों के बल पर दफ्तरों में उपस्थित रहने को मजबूर करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है. इसलिए ज्यादा जरूरत लोगों को यह समझाने की है कि समय को ले कर उन की काहिली देश और समाज ही नहीं, खुद उन के लिए भी दिक्कतें पैदा करती है. उन्हें ऐसे उदाहरण देने की जरूरत है कि जिन पिद्दी से देशों ने मामूली संसाधनों के बल पर पूरी दुनिया में छा जाने के करिश्में किए हैं, उस में उन की कार्यसंस्कृति का बड़ा भारी योगदान है.

जापान इसी एशिया का एक मुल्क है जहां लोग देर से दफ्तर आने को सिर्फ अपराध नहीं मानते हैं, बल्कि औफिस पहुंचने पर दिए गए काम को नहीं कर पाना भी खुद उन के लिए गुनाह है. जापानी वक्त के किस कदर पाबंद हैं, इस का एक उदाहरण भारत में करीब एक दशक पहले देखने को मिला था. वर्ष 2004 में एक जापानी इंजीनियर मत्सू काजू हिरो अपनी कंपनी के काम से भारत आया था. दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरने के एक घंटे बाद तक जब भारत स्थित कंपनी की इकाई की गाड़ी उसे लेने नहीं पहुंची, तो देरी से खफा मत्सू ने फौरन जापान वापसी की फ्लाइट पकड़ ली थी. हवाईअड्डे पर विलंब का यह नजारा डेढ़ दशक में भी नहीं बदला.

एयरइंडिया की लेटलतीफी

यह किस्सा सरकार के वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू से जुड़ा है. वर्ष 2016 में एक अवसर पर उन्हें एयर इंडिया की जिस फ्लाइट से हैदराबाद में आयोजित एक महत्त्वपूर्ण सरकारी बैठक में जाना था, वह फ्लाइट पायलट के नहीं पहुंचने के कारण समय पर उड़ान ही नहीं भर पाई. घंटों इंतजार के बाद वेंकैया नायडू घर वापस लौट गए और नाराजगी में सोशल मीडिया पर ट्वीट करते हुए एयर इंडिया से यह कहते हुए जवाब मांगा कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में एयर इंडिया इतनी लेटलतीफी आखिर कैसे कर सकती है.

एयर इंडिया ने इस मामले में मंत्रीजी से माफी मांग ली, पर इस सरकारी उपक्रम में विलंब का यह पहला वाकेआ नहीं था. ऐसा तकरीबन हर रोज होता है पर उन उड़ानों में कोई वीआईपी नहीं होने के कारण देरी कोई मुद्दा नहीं बनती.

ध्यान रहे कि छोटेछोटे देशों ने घड़ी की सूइयों के साथ कदमताल कर के ही विकसित होने की राह खोली है. अब तो ऐसे उदाहरण देश में ही कई निजी कंपनियां पेश कर रही हैं. उन्होंने लगभग हर कायदे में सरकारी प्रतिष्ठानों से आगे निकल कर साबित कर दिया है कि कार्यसंस्कृति को बदलने का कितना बड़ा फर्क किसी संस्थान की तरक्की पर पड़ता है. सरकारी और निजी बैंकों के कामकाज में अंतर आज हर व्यक्ति महसूस करता है.

ऐट द इलेवैंथ आवर

सवाल यह है कि डीओपीटी के निर्देश और बायोमैट्रिक सिस्टम सरकारी कर्मचारियों को वक्त का पाबंद बनाते हैं या फिर सरकारी दफ्तरों में ये कायदे और उपाय सिर्फ आधुनिकीकरण का एक पैबंद बन कर रह जाते हैं. असल में बात भारतीय आदतों की है. अंतिम क्षणों यानी ‘ऐट द इलेवैंथ औवर’ पर ही जगने का उपक्रम करने की इस मानसिकता के दर्शन देश में हर जगह होते हैं.

आयकर रिटर्न दाखिल कराना हो, स्कूलकालेज में फीस भरनी हो, बिजली व टैलीफोन के बिल जमा करने हों या कोई अन्य काम निबटाना हो, अमूमन ये सभी काम एक औसत भारतीय अंतिम दिन और आखिरी घंटे तक टालता है. नतीजा है लंबीलंबी, बोझिल कतारें. यही मनोवृत्ति दफ्तरों, विशेषरूप से सरकारी कार्यालयों में बाबुओं के पहुंचने को ले कर भी है और शायद इसलिए भारतीय मानक समय यानी तय समय से आधा घंटा लेट का तंजभरा मुहावरा प्रचलित है.

दीपिका चिखालिया अब गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ में

अस्सी के दशक के सर्वाधिक लोकप्रिय धार्मिक सीरियल ‘‘रामायण’’ में दीपिका चिखालिया ने सीमा का किरदार निभाया. इस सीरियल में चर्चित होने के बाद वह व्यवसायी हेमंत टोपीवाला के संग व्याह रचाकर अभिनय से दूर हो गयी थीं. लेकिन अब वह पुनः अभिनय में वापसी कर रही हैं. एक तरफ उन्होंने धीरज मिश्रा की हिंदी फिल्म ‘गालिब’ की है, तो दूसरी तरफ वह हिंदी फिल्म ‘चाक एंड डस्टर’ फेम निर्देशक जयंत गिलाटकर की गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ में अभिनय किया है, जो कि मराठी की सर्वाधिक चर्चित फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ का गुजराती रूपांतरण है. 30 अगस्त 2018 को प्रदर्शित हो रही गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ में दीपिका चिखालिया के साथ गुजराती के लोकप्रिय अभिनेता सिद्धार्थ रंदेरिया की जोड़ी है.

गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ करने की चर्चा करते हुए दीपिका चिखालिया कहती हैं- ‘‘जब जयंत गिलाटकर ने मेरे पास इस फिल्म को करने का प्रस्ताव भेजा, उस वक्त तक मैं उनसे परिचित नहीं थी. इसलिए मैंने पहले उनकी हिंदी फिल्म ‘चाक एंड डस्टर’’ देखी. इस फिल्म को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई और मुझे यकीन हो गया कि जयंत बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं. उसके बाद मैंने मराठी फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ देखी. फिल्म ने मुझ पर काफी प्रभाव डाला. फिर क्या था, मैंने जयंत गिलाटकर के साथ गुजराती में ‘नट सम्राट’ करने के लिए हां कर दिया. अब जब यह फिल्म प्रदर्शित होने जा रही है, तो मैं बहुत उत्साहित व खुश हूं.’’

‘‘बंदा नवाज’’ के मुहूर्त पर लगा मुख्यमंत्री सहित कई राजनेताओं का जमावड़ा

कई टीवी सीरियलों व कुछ फिल्मों में अभिनय कर चुके अभिनेता हेरम्ब त्रिपाठी की झोली में इन दिनों खुशियां ही खुशियां आ रही हैं. एक तरफ बतौर हीरो उनकी फिल्म ‘‘खामियाजा’’ प्रदर्शित होने जा रही है, तो वहीं हाल ही में उनकी नई फिल्म ‘‘बंदा नवाज’’ की भव्य शुरुआत हुई.

अर्जुन राज निर्देशित रहस्य रोमांच प्रधान फिल्म ‘‘बंदा नवाज’’ की शूटिंग शुरू होने के पहले दिन महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस, राज्यमंत्री सुधाकर राव देशमुख, कैबिनेट मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, विकास कुंभारे व मिलिंद माने खासतौर पर मौजूद थे.

इस अवसर पर फिल्म के निर्देशक अर्जुन राज ने कहा- ‘‘इसकी कहानी काफी रोचक व दिलचस्प है. फिल्म के नायक हेरम्ब त्रिपाठी तथा दूसरे कलाकार हैं- संदेश गौर, तन्मय त्रिपाठी, रोहित मेहता, जीतराय सिंह, नाफे खान, गौरी शंकर व अन्य.’’

फिल्म में हेरम्ब त्रिपाठी की दोहरी भूमिका है. वह कहते हैं- ‘‘इसमें मेरी दोहरी भूमिका है. पहली बार मैं किसी फिल्म में दोहरी भूमिका कर रहा हूं. यह एक ऐसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म है, जिसमें हीरो और विलेन दोनों एक ही है. यह फिल्म काफी अच्छी बनने वाली है.’’

‘‘हैप्पी क्राउड इंटरटेनमेंट’’ के बैनर तले बन रही फिल्म ‘‘बंदा नवाज’’ के लेखक रंजू साइक्लोनी, कैमरामैन लक्की शाह, नृत्य निर्देशक रिक्की गुप्ता, एक्शन अनिल सिक्कू व संतोष हैं.

लालू, राबड़ी, तेजस्वी के खिलाफ चार्जशीट

आईआरसीटीसी होटल आवंटन धनशोधन मामले में शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पहला आरोपपत्र दाखिल किया. इसमें राजद प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और छोटे बेटे तेजस्वी यादव समेत कईअन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है.

धनशोधन रोकथाम कानून के तहत विशेष अदालत के समक्ष दायर किए गए आरोपपत्र में ईडी ने लालू के परिवार के अलावा राजद नेता पीसी गुप्ता, उनकी पत्नी सरला गुप्ता, लारा प्रोजेक्ट्स नाम की एक कंपनी और 10 अन्य को नामजद किया है.

ईडी का आरोप है कि पुरी और रांची स्थित रेलवे के दो होटलों के अधिकारों के सब-लीज कोचर के स्वामित्व वाली मेसर्स सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड को दिए जाने में लालू और आईआरसीटीसी के अधिकारियों ने अपने पदों का दुरुपयोग किया.

होटल के सब-लीज के बदले पटना के एक प्रमुख स्थान की 358 डिसमिल जमीन फरवरी 2005 में मेसर्स डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (राजद सांसद पी.सी. गुप्ता के परिवार के स्वामित्व वाली) को दे दी गई थी. उस वक्त के सर्किल दरों से काफी कम दर पर यह जमीन कंपनी को दी गई थी.

ईडी ने आरोप-पत्र में कहा है कि काफी महंगी जमीन से लैस वह कंपनी धीरे-धीरे राबड़ी देवी और तेजस्वी को हस्तांतरित कर दी गई. बहुत ही मामूली कीमत पर शेयर खरीद कर ऐसा किया गया.

151 कंपनियों का इस्तेमाल

जमीन हासिल करने के लिए इस्तेमाल की गई धनराशि संदिग्ध स्रोत से आई थी और मेसर्स अभिषेक फाइनेंस कंपनी लिमिटेड नाम की एक एनबीएफसी का इस्तेमाल करके पीसी गुप्ता से जुड़ी 151 कंपनियों से धनशोधन किया गया.

मिट्टी के मोल लिए शेयर

राबड़ी देवी व तेजस्वी ने बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर मेसर्स डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के शेयर खरीदे थे. राबड़ी देवी की ओर से शेयरों की खरीद के लिए इस्तेमाल किए गए धन सवालों के घेरे में हैं.

42 की उम्र में इस अदाकारा ने तोड़ी बोल्डनेस की सारी हदें

बौलीवुड अभिनेत्री अमीषा पटेल भले ही पिछले काफी समय से फिल्मों से दूर हैं लेकिन वह किसी न किसी कौन्ट्रोवर्सी के चलते लाइमलाइट में आ ही जाती हैं. वह अपनी बोल्ड तस्वीरों के चलते लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाती हैं. लोग उनकी ऐसी तस्वीरों को लेकर मजाक बनाते हैं.

हालांकि अमीषा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और वह अपनी हौट एंड सेक्सी फोटोज सोशल मीडिया पर समय समय पर शेयर करती रहती हैं. इस बार भी उन्होंने अपनी एक बेहद बोल्ड तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की है. जो तेजी से इंटरनेट पर वायरल हो रही हैं.

वह अपनी लेटेस्ट हौट तस्वीर की वजह से एक बार फिर ट्रोलर्स के निशाने पर आ गई हैं. उन्होंने ट्विटर पर अपनी एक बोल्ड तस्वीर शेयर कर अपने फौलोअर्स से पूछा कि उनका लेफ्ट प्रोफाइल अच्छा है या राइट. बस फिर क्या था लोगों ने ऐसे ऐसे कमेंट्स कर दिए कि सब ट्विटर पर हैरान हो गए. उनकी इस तस्वीर पर कई लोगों ने उनकी तारीफ को तो कई लोगों ने उनकी उम्र को लेकर ही उन्हें ट्रोल कर दिया.

हद तो तब हो गई जब कुछ यूजर्स ने उन पर काफी भद्दे कमेंट्स कर दिए. हालांकि कई लोगों ने इसका विरोध भी किया है. उनकी इस तस्वीर पर आए कमेंट्स से सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस इतनी तेज हो गई कि अमीषा पटेल की तस्वीर कुछ देर में ही वायरल हो गई. ऐसा पहली बार नहीं है जब अमीषा ट्रोलर्स के निशाने पर आई हों. इससे पहले भी अमीषा अपने हट फोटोशूट और ड्रेसिंग स्टाइल को लेकर लोगों से काफी कुछ सुन चुकी हैं.

अकेले में ही देखें भोजपुरी सिनेमा के ये हौट गाने

भोजपुरी सिनेमा में आज कोई भी गाना आते ही सोशल मीडिया पर छा जाता है. भोजपुरी इंडस्ट्री के कई गाने कभी कभी ऐसे भी होते हैं जो आपको परिवार के साथ देखने पर शर्मिन्दा भी कर सकते हैं. भोजपुरी की यूट्यूब क्वीन आम्रपाली दुबे, अक्षरा सिंह, अंजना सिंह और भोजपुरी स्टार पवन सिंह जैसे कई सुपरस्टार्स के ऐसे बहुत सारे गाने हैं जो आप अकेले में तो देख सकते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं

इंटरनेट के दौर में आज कोई भी गाना, डांस या आपके फेवरेट कवि की कविता, फिल्म का ट्रेलर या पूरी फिल्म ही, इन सबका एक ही ठिकाना है और वो है यूट्यूब. लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि हम आपके लिए वहां मौजूद वो कंटेंट जिसे आप देखना चाहते हैं, इस सीरीज के जरिए लेकर आ रहे हैं. क्योंकि यूट्यूब  की दुनिया इतनी बड़ी है कि अगर आप सुबह इसमें पहुंचे तो तो शाम तक एक चौथाई भी नहीं खंगाल पाएंगे. यहां मौजूद एंटरटेनमेंट का खजाना इतना बड़ा कि इसमें सभी वीडियोज़ को देखने के लिए आपको तकरीबन 70,000 साल लगातार यूट्यूब देखते रहना होगा!!! ऐसे में इस प्लेटफौर्म पर इतना कुछ होता है, जो हमारी नजरों से छूट ही जाता है. लेकिन फ़िक्र मत कीजिए, हम लेकर आए हैं एक ऐसी सीरीज़ जहां आपको यूट्यूब पर मौजूद हर मसाले की पूरी जानकारी मिलेगी.

भोजपुरी फिल्म ‘देवरा भइल दीवाना’ जोकि भोजपुरी सिंगर अल्का और प्रियंका सिंह ने गाया है. इस भोजपुरी गाने को देखने के लिए आपको एक बंद कमरा तलाशना ही पड़ जाएगा क्योंकि भोजपुरी सिनेमा का ये गाना काफी ज्यादा ही हौट है. भोजपुरी जगत में धूम मचाने वाला ये गाना खबर लिखे जाने तक 6 करोड़ 14 लाख से भी ज्यादा बार देखा जा चुका था. आप भी देखिए भोजपुरी सिनेमा का ये हौट गाना…

भोजपुरी एल्बम ‘सत्या’ का गाना ‘राते दिया बुता के’ काफी हौट गाना है. गाने में पवन सिंह और आम्रपाली दुबे ने जबर्दस्त डांस किया है. बता दें इस गाने को इंदु सोनाली के साथ खुद पवन सिंह ने गाया है. पवन सिंह और आम्रपाली दुबे का ये गाना यूट्यूब पर अब तक 11 करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

पवन सिंह और अक्षरा सिंह का गाना ‘दोल्हा पट्टी’ फिल्म धड़कन फिल्म का है. इस हौट गाने को ख़ुद भोजपुरी एक्टर और सिंगर पवन सिंह ने प्रियंका सिंह के साथ गया है. पवन और अक्षरा का ये गाना इतना वायरल हुआ कि अब तक इसे 3 करोड़ से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है.

भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह के साथ मणि भट्टाचार्य का यह हौट गाना काफी वायरल हो रहा है. भोजपुरी फिल्म वांटेड का गाना ‘पलंगिया सोने ना दिया’ यूट्यूब पर अब तक 4 करोड़ से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है.

बता दें मणि भट्टाचार्य जोकि बांग्ला हीरोइन हैं, ने भोजपुरी सिनेमा में खेसारी लाल की फिल्म ‘जिला चंपारण’ से डेब्यू किया था.

6 टुकड़े करने के बाद मांगी 50 लाख की फिरौती

मूलरूप से मुजफ्फरपुर, बिहार के रहने वाले रामनाथ यादव सालों पहले काम की तलाश में दिल्ली आए थे. वह पढ़ेलिखे थे, इसलिए किसी अच्छी कंपनी में नौकरी ढूंढने लगे. जब उन के मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने एक सीए के यहां नौकरी कर ली. नौकरी मिल गई तो वह अपने बीवीबच्चों को भी दिल्ली ले आए और परिवार के साथ पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई रोड पर स्थित अग्रसेन पार्क में रहने लगे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा सचिन यादव था.

21 साल का सचिन कृष्णा मंदिर नजफगढ़ के पास स्थित बालाजी कारपेट की दुकान पर नौकरी करता था. रामनाथ ने सचिन की शादी कर दी थी. करीब 2 महीने पहले ही सचिन के बेटा हुआ था. घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने से सभी खुश थे. लेकिन इसी साल मई के दूसरे सप्ताह में उन के घर में एक ऐसी घटना घटी, जिसे यह परिवार जिंदगी भर नहीं भुला सकेगा.

दरअसल 12 मई, 2018 को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सचिन के मोबाइल पर किसी की काल आई. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद वह किसी के साथ बाइक पर बैठ कर निकल गया. जब 2 घंटे बाद भी सचिन घर नहीं लौटा तो घर वालों ने उस का फोन नंबर मिलाया, पर उस का फोन स्विच्ड औफ मिला.

सचिन वैसे तो कभी भी अपना फोन बंद नहीं करता था, पर फोन बंद आने पर घर वालों ने सोचा कि शायद उस के फोन की बैटरी डाउन हो गई होगी.

उस के एकाध घंटे बाद उन्होंने फिर से सचिन का नंबर मिलाया. इस बार भी उस का फोन बंद ही मिला. घर वालों ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह उधर से ही अपनी ड्यूटी पर चला गया हो. इस बात की पुष्टि करने के लिए रामनाथ यादव ने बालाजी कारपेट की दुकान का फोन मिलाया. वहां बात करने पर पता चला कि वह दुकान पर नहीं पहुंचा है.

यह जानकारी मिलने के बाद घर वालों का परेशान होना लाजिमी था. फिर तो उन्होंने उस के यारदोस्तों और जानपहचान वालों के पास फोन करने शुरू कर दिए.

रामनाथ यादव पूरे दिन इधरउधर बेटे को तलाशते रहे, लेकिन कहीं से भी उस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली. जवान बेटे के गायब होने के बात रामनाथ के परिचितों को पता लगी तो वह भी खोजने में उन की मदद करने लगे.

बीचबीच में घर वाले सचिन का फोन भी मिलाते रहे लेकिन उस का फोन बंद ही मिलता रहा. सचिन की पत्नी, मां और बहनों का तो रोरो कर बुरा हाल था. 12-13 मई की रात को घर के सभी लोगों की नींद गायब थी. सभी की निगाहें दरवाजे पर ही लगी हुई थीं.

कभीकभी तो उन के दिमाग में सचिन को ले कर तरहतरह के विचार आते. सभी लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर सचिन मोटरसाइकिल पर बैठ कर कहां चला गया. सचिन जिस युवक के साथ गया था, उसे कोई नहीं जानता था.

घर वाले सभी संभावित जगहों पर सचिन को ढूंढ चुके थे. इस के बावजूद भी 13 मई की पौ फटने के बाद वह फिर से सचिन की तलाश में जुट गए. चारों ओर से हताश होने के बाद जब उस का कहीं पता नहीं चला तो आखिर वह क्षेत्र के थाना हरिदासनगर पहुंच गए.

रामनाथ ने थानाप्रभारी को सचिन के गायब होने की बात बताई. थानाप्रभारी ने सचिन की गुमशुदगी दर्ज कर ली. उस की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उन्होंने वह सब जरूरी काररवाई की, जो किसी की भी गुमशुदगी दर्ज होने के बाद अमूमन की जाती है. मसलन सभी थानों को गुम हुए व्यक्ति का हुलिया भेजना, पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवाना आदि.

अपने स्तर से पुलिस भी सचिन का पता लगाने में जुट गई. सचिन 21 साल का युवक था, इस बात को देखते हुए इस बात की भी आशंका जताई जा रही थी कि कहीं उस का किसी के साथ कोई अफेयर तो नहीं चल रहा था.

हालांकि वह शादीशुदा था, लेकिन प्यारमोहब्बत के मामले में किसी का कुछ नहीं कहा जा सकता. इसलिए पुलिस उस के दोस्तों से यह जानने में लग गई कि कहीं उस का किसी लड़की के साथ कोई चक्कर तो नहीं था. दोस्तों ने थानाप्रभारी को बताया कि सचिन इस किस्म का नहीं था. और तो और वह किसी से फालतू बात तक नहीं करता था.

सचिन को गायब हुए 3 दिन बीत चुके थे, न तो पुलिस और न ही सचिन के घर वालों को उस के बारे में कोई जानकारी मिल पा रही थी. 15 मई को सचिन की बहन ने फिर सचिन का फोन नंबर मिलाने की कोशिश की तो उस दिन उस का नंबर मिल गया. इस से बहन बहुत खुश हुई. लेकिन फोन उस के भाई के बजाय किसी और ने उठाया. बहन ने जब सचिन के बारे में पूछा तो उस व्यक्ति ने कहा कि सचिन अभी टायलेट में है.

पास में रामनाथ यादव भी थे. बेटी से हो रही बातचीत को सुन कर उन्हें लगा कि सचिन के बारे में शायद जानकारी मिल गई है. इसलिए बेटी से फोन ले कर वह खुद बात करने लगे.

उन्होंने भी उस शख्स से बेटे के बारे में जानकारी हासिल करनी चाही, लेकिन वह शख्स उन्हें इधरउधर की बातें सुनाने लगा. उन्होंने जब पूछा कि वह कौन और कहां से बोल रहे हैं तो वह रामनाथ यादव से उलटीसीधी बातें करने लगा. इतना ही नहीं, वह उन्हें धमकी भी देने लगा. इस के बाद उस ने फोन काट दिया.

रामनाथ ने फिर से बेटे का नंबर मिलाया, लेकिन इस बार वह स्विच्ड औफ हो गया. वह घबरा गए कि जो शख्स उन से बात कर रहा था वह कौन था. कहीं ऐसा तो नहीं कि सचिन का किसी ने अपहरण कर लिया हो. वह घबराए हुए सीधे थाना हरिदासनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को बात बताई.

थानाप्रभारी ने उसी समय अपने फोन से सचिन का नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने सचिन यादव के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने सचिन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने की काररवाई शुरू कर दी.

15 मई, 2018 को ही रामनाथ यादव के पास उन के बेटे सचिन के फोन से काल आई. अपने फोन स्क्रीन पर बेटे का नंबर देख कर रामनाथ यादव खुश हो गए. उन्होंने जैसे ही काल रिसीव की, तभी दूसरी ओर से किसी ने रौबदार आवाज में कहा, ‘‘तुम घबराओ मत, सचिन हमारे कब्जे में है. यदि तुम उसे सहीसलामत चाहते हो तो 50 लाख रुपए का इंतजाम कर लो, वरना सचिन की लाश कई टुकड़ों में मिलेगी.’’

‘‘देखो जी, मैं आप के आगे हाथ जोड़ कर विनती करता हूं कि मेरे बेटे को कुछ नहीं कहना. आप चाहे मेरा सब कुछ ले लो, मगर मेरे सचिन को मुझे दे दो.’’

‘‘हम भी तो यही कह रहे हैं कि यदि बेटा जिंदा चाहिए तो 50 लाख रुपए हमें दे दो.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

‘‘देखिए साहब, मैं एक मामूली नौकरी वाला आदमी हूं. इतने पैसे तो पूरी उमर काम कर के भी नहीं कमा सकूंगा. मेरी प्राइवेट नौकरी है. इतने पैसे भला मैं कहां से लाऊंगा.’’ रामनाथ गिड़गिड़ाए.

‘‘यदि तुम्हारा बेटा अस्पताल के आईसीयू में भरती हो और डाक्टर इलाज के 50 लाख बता रहा हो तो बताओ उसे ऐसे ही मर जाने दोगे या बचाने की कोशिश करोगे?’’ उस शख्स ने सवाल किया.

‘‘देखिए जी, मैं क्या दुनिया का हर बाप बेटे को बचाने की कोशिश करेगा लेकिन जब डाक्टर द्वारा मांगी गई वह रकम उस के बूते के बाहर की होगी तो वह हाथ खड़े कर देगा. क्योंकि यह उस की मजबूरी होगी.’’ रामनाथ यादव बोले.

‘‘बहरहाल, अब तुम देख लो कि तुम्हें पैसा प्यारा है या बेटा.’’ अपहर्त्ता ने एक तरह से धमकी दी.

‘‘देखिए साहब, मैं गरीब आदमी हूं. इतने पैसे मेरे पास नहीं हैं.’’ रामनाथ यादव ने मजबूरी जताई, ‘‘मैं अपनी हैसियत के अनुसार दे सकता हूं.’’

दोनों तरफ से बात होती रही और अंत में 4 लाख रुपए में बात तय हो गई. अपहर्त्ता ने फिरौती की रकम एशिया की सब से बड़ी आजादपुर सब्जीमंडी में ले कर आने को कहा.

फिरौती मांगने पर यह स्पष्ट हो गया कि सचिन का अपहरण कर लिया गया है और इस समय वह अपहर्त्ताओं के कब्जे में हैं. घर वाले और अन्य लोग सचिन के सहीसलामत होने की कामना करने लगे. अपहर्त्ता से रामनाथ की फोन पर जो बातचीत हुई थी, उस के बारे में उन्होंने पुलिस को भी बता दिया. फिर तो पुलिस भी सक्रिय हो गई.

अब पुलिस ने उस फोन नंबर पर जांच केंद्रित कर दी, जिस नंबर से फिरौती की काल आई थी. उधर अपहर्त्ता की जो 4 लाख रुपए की डील फाइनल हुई थी, पुलिस ने योजना बना कर रामनाथ को पैसे ले कर आजादपुर मंडी भेजा.

पुलिस टीम भी सादा कपड़ों में रामनाथ के इधरउधर रही. लेकिन अपहर्त्ता वहां पैसे लेने नहीं आया और न ही उस ने इस के लिए रामनाथ को फिर से फोन किया. इस से यही लगा कि अपहर्त्ता को पुलिस के मौजूद होने की भनक लग गई थी.

पुलिस की टैक्निकल सर्विलांस टीम ने बताया कि अपहर्त्ता ने उत्तरी दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके से फोन कर के फिरौती मांगी थी. पुलिस मजनूं का टीला इलाके में पहुंच गई. फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस मजनूं के टीला से हरियाणा के पानीपत शहर पहुंची, लेकिन किडनैपर्स वहां भी नहीं मिले. पकड़े जाने के भय से वे बिहार भाग गए.

दिल्ली पुलिस की टीम भी पीछा करते हुए बिहार चली गई और उस ने 20 मई की रात को बिहार में एक जगह दबिश डाल कर भूषण कुमार सिंह उर्फ वरुण को हिरासत में ले लिया. उस से सचिन यादव के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि सचिन तो दिल्ली में ही है.

दिल्ली में वह किस जगह पर है, पूछने पर भूषण ने बताया कि वह अब जीवित नहीं है. बल्कि उन्होंने उस की हत्या कर लाश के टुकड़े गटर में डाल दिए हैं.

यह बात सुन कर पुलिस टीम को धक्का लगा. पुलिस ने भूषण से पूछताछ की तो उस ने बताया कि इस मामले में उस के साथ विक्की कुमार भी शामिल था. करीब 2 घंटे की मशक्कत के बाद पुलिस ने विक्की कुमार को भी बिहार से ही गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों आपस में सालेबहनोई थे.

दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर टीम दिल्ली लौट आई. दिल्ली के कोर्ट में पेश करने के बाद थानाप्रभारी ने दोनों आरोपियों से पूछताछ की तो उन्होंने अपहरण की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली.

भूषण कुमार सिंह और विक्की कुमार दोनों ही बिहार के रहने वाले थे. दोनों काम की तलाश में बिहार से दिल्ली आए थे. ये दोनों उसी शोरूम पर ठेके पर काम करते थे, जहां सचिन नौकरी करता था. पर वहां सचिन की नौकरी लग जाने के बाद शोरूम मालिक ने इन दोनों को काम से हटा दिया था.

इन के वहां से हट जाने के बाद भी सचिन की उन से फोन पर बातचीत होती रहती थी. करीब 2 महीने पहले सचिन के घर बेटा हुआ तो उस ने इस खुशी में कुछ लोगों को घर पर पार्टी दी थी. इस पार्टी में उस ने भूषण और विक्की को भी बुलाया था.

भूषण और विक्की तो सचिन से इस बात की रंजिश रखते थे कि उस के शोरूम पर नौकरी पर लगने के बाद उन दोनों की छुट्टी हो गई थी. इस के लिए वह सचिन को ही दोषी मानते थे. इस बात का सचिन को आभास नहीं हुआ. वह तो उन्हें अपना दोस्त ही समझता था, तभी तो उस ने बेटा पैदा होने पर दोनों को अपने घर पार्टी में बुलाया था.

सचिन का रहनसहन देख कर भूषण और विक्की समझने लगे कि सचिन अमीर बाप का बेटा है. उसी दिन उन्होंने सचिन को सबक सिखाने की ठान ली. उन्होंने सोचा कि यदि किसी तरह सचिन का अपहरण कर लिया जाए तो इस के बदले में मोटी फिरौती मिल सकती है. इस के बाद उन्होंने सचिन का अपहरण करने की योजना बना ली.

योजना बनाने के बाद उन्होंने 12 मई, 2018 को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सचिन को फोन किया और भूषण मोटरसाइकिल ले कर सचिन के घर के पास पहुंच गया. चूंकि सचिन उस की योजना से अनजान था और वह उस पर विश्वास करता था, इसलिए वह उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर चला गया.

मोटरसाइकिल से वह सचिन को दिल्ली के ओल्ड खयाला रोड पर प्रेमनगर स्थित एक कमरे पर ले गया. वह कमरा उस ने 2 दिन पहले ही किराए पर लिया था. भूषण और विक्की ने वहां उसे नशे की गोली मिली कोल्डड्रिंक पीने को दी.

जब सचिन अर्द्धबेहोशी की हालत में हो गया तो उन दोनों ने गला दबा कर उस की हत्या कर दी. हत्या करने के बाद उन्होंने उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ कर के अपने कब्जे में ले लिया और लाश टांड पर छिपा दी.

इस के बाद वे लाश को ठिकाने लगाने के उपाय खोजने लगे. लाश को वे बाहर ले कर नहीं जा सकते थे लिहाजा उन्होंने 21 वर्षीय सचिन की लाश के 6 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को गटर में डाल दिया.

लाश ठिकाने लगा कर वे निश्चिंत हो गए थे. फिर उन्होंने सचिन का फोन प्रयोग करते हुए उस के घर वालों से फिरौती मांगनी शुरू कर दी. जिस में वे सफल नहीं हो सके.

उन्हें शक हो गया कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस कभी भी उन के पास पहुंच सकती है, लिहाजा दोनों बिहार भाग गए पर दिल्ली पुलिस उन्हें वहीं से गिरफ्तार कर लाई.

दोनों अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर खयाला रोड, प्रेमनगर के गटर से भारी मशक्कत के बाद सचिन के शरीर के सभी टुकड़े बरामद कर लिए, जिन्हें पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए राव तुलाराम अस्पताल भेज दिया.

अभियुक्त भूषण कुमार सिंह उर्फ वरुण और विक्की कुमार को गिरफ्तार कर पुलिस ने न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस अब यह जांच कर रही है कि इस मामले में इन दोनों के अलावा कहीं कोई तीसरा तो शामिल नहीं था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बाप का इश्क बेटी को ले डूबा

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के रहने वाले भालचंद्र सरोज अपने परिवार के साथ महानगर मुंबई के तालुका वसई के उपनगर नालासोपारा की साईं अपर्णा बिल्डिंग में लगभग 30 सालों से रह रहे थे. अपनी रोजीरोटी के लिए उन्होंने उसी बिल्डिंग के परिसर में किराने की दुकान खोल ली थी. परिवार में उन की पत्नी के अलावा एक बेटा संतोष सरोज था, जिस की शादी उन्होंने मालती नाम की लड़की से कर दी थी. संतोष की एक बेटी थी अंजलि. भालचंद्र सरोज का एक छोटा सा परिवार था, उन का जीवन हंसीखुशी के साथ व्यतीत हो रहा था. संतोष 10वीं जमात से आगे नहीं पढ़ सका था, इसलिए भालचंद्र ने उसे एक आटोरिक्शा खरीदवा दिया था. किराने की दुकान और आटो से जो कमाई होती थी, उस से उन की घरगृहस्थी आराम से चल रही थी.

अंजलि अपने मातापिता के अलावा दादादादी की भी लाडली थी. संतोष भले ही खुद नहीं पढ़लिख सका था, लेकिन बेटी को उच्चशिक्षा दिलाना चाहता था. इसीलिए उस ने अंजलि का दाखिला जानेमाने लोकमान्य तिलक इंगलिश स्कूल में करवा दिया था. परिवार में सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिस का दुख यह परिवार जिंदगी भर नहीं भुला सकेगा.

बात 24 मार्च, 2018 की है. संतोष सरोज की 5 वर्षीय बेटी अंजलि हमेशा की तरह उस शाम 7 बजे बच्चों के साथ खेलने के लिए बिल्डिंग से नीचे आई तो फिर वह वापस नहीं लौटी. वह बच्चों के साथ कुछ देर तक तो अपने दादा भालचंद्र सरोज की दुकान के सामने खेलती रही. फिर वहां से खेलतेखेलते कहां गायब हो गई, किसी को पता नहीं चला.

जब वह 8 बजे तक वापस घर नहीं आई तो उस की मां मालती को उस की चिंता हुई. जिन बच्चों के साथ वह खेलने गई थी, मालती ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की. उसी दौरान संतोष घर लौटा तो मालती ने बेटी के गुम हो जाने की बात पति को बताते हुए उस का पता लगाने के लिए कहा.

संतोष बिल्डिंग से उतरने के बाद अंजलि को इधरउधर ढूंढने लगा. वहीं पर उस के पिता की दुकान थी. वह पिता की दुकान पर पहुंचा और उन से अंजलि के बारे में पूछा. पोती के गायब होने की बात भालचंद्र को थोड़ी अजीब लगी. उन्होंने बताया कि कुछ देर पहले तक तो वह यहीं पर बच्चों के साथ खेल रही थी. इतनी देर में कहां चली गई.

उन्हें भी पोती की चिंता होने लगी. वह भी दुकान बंद कर के बेटे के साथ उसे ढूंढने के लिए निकल गए. संभावित जगहों पर तलाशने के बाद भी जब वह नहीं मिली तो उन की चिंता और बढ़ गई.

अंजलि के गायब होने की बात जब पड़ोस के लोगों को पता चली तो वे भी उसे खोजने लगे. वहां आसपास खुले गटर और नालों को देखने के बाद भी अंजलि का कहीं पता नहीं चला. बेटी की चिंता में मां मालती की घबराहट बढ़ती जा रही थी. चैत्र नवरात्रि होने की वजह से लोग यह भी आशंका व्यक्त कर रहे थे कि कहीं उसे तंत्रमंत्र की क्रियाएं करने वालों ने तो गायब नहीं कर दिया.

सभी लोग अंजलि की खोजबीन कर के थक गए तो उन्होंने पुलिस की मदद लेने का फैसला किया. लिहाजा वे रात करीब 11 बजे तुलीज पुलिस थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी किशोर खैरनार से मिल कर उन लोगों ने उन्हें सारी बातें बताईं और अंजलि की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. अंजलि का सारा विवरण दे कर उन्होंने उस का पता लगाने का अनुरोध किया. थानाप्रभारी ने अंजलि का पता लगाने का आश्वासन दे कर उन्हें घर भेज दिया.

थाने से घर लौटे सरोज परिवार का मन अशांत था. उन का दिल अपनी मासूम बच्ची को देखने के लिए तड़प रहा था. वह रात उन के लिए किसी कालरात्रि से कम नहीं थी. सुबह होते ही संतोष सरोज का परिवार फिर से अंजलि की खोज में निकल गया. उन्होंने उस की गुमशुदगी के पैंफ्लेट छपवा कर रेलवे स्टेशनों के अलावा बसस्टैंड और सार्वजनिक जगहों पर लगवा दिए.

उधर थानाप्रभारी किशोर खैरनार ने अंजलि की गुमशुदगी की जांच सहायक पीआई के.डी. कोल्हे को सौंप दी. के.डी. कोल्हे ने जब मामले पर गहराई से विचार किया, तो उन्हें लगा कि या तो बच्ची का फिरौती के लिए अपहरण किया गया है या फिर उसे किसी दुश्मनी या तंत्रमंत्र क्रिया के लिए उठा लिया गया है.

उन्होंने सरोज परिवार से भी कह दिया कि यदि किसी का फिरौती मांगने के संबंध में फोन आए तो वह उस से प्यार से बात करें और इस की जानकारी पुलिस को जरूर दे दें.

जांच के लिए पीआई के.डी. कोल्हे ने पुलिस की 6 टीमें तैयार कीं, जिस में उन्होंने एपीआई राकेश खासरकर, नितिन विचारे, शिवाजी पाटिल, एसआई भरत सांलुके, हैडकांस्टेबल सुरेश शिंदे, कांस्टेबल भास्कर कोठारी, महेश चह्वाण आदि को शामिल किया. सभी टीमें अलगअलग तरीके से मामले की जांच में जुट गईं.

पुलिस ने अंजलि के फोटो सहित गुमशुदगी का संदेश अनेक वाट्सऐप गु्रप में भेजा और उसे अन्य लोगों को भी भेजने का अनुरोध किया. पीआई के.डी. कोल्हे दूसरे दिन अपनी जांच की कोई और रूपरेखा तैयार करते, इस के पहले ही उन्हें स्तब्ध कर देने वाली एक खबर मिली.

खबर गुजरात के नवसारी रेलवे पुलिस की तरफ से आई थी. रेलवे पुलिस ने मुंबई पुलिस को बताया कि जिस बच्ची की उन्हें तलाश है, वह बच्ची मृत अवस्था में नवसारी रेलवे स्टेशन के बाथरूम में पड़ी मिली है. किसी ने गला काट कर उस की हत्या की है.

सूचना मिलते ही पुलिस की एक टीम अंजलि के परिवार वालों को ले कर तुरंत नवसारी रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हो गई. नवसारी रेलवे पुलिस ने जब संतोष सरोज और उस के परिवार वालों को बच्ची की लाश दिखाई तो वे सभी दहाड़ मार कर रोने लगे, क्योंकि वह लाश अंजलि की ही थी.

जरूरी काररवाई पूरी कर के मुंबई पुलिस बच्ची के शव को अपने कब्जे में ले कर मुंबई लौट आई और उसे पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. इधर जब अंजलि की हत्या की बात उस बिल्डिंग और आसपड़ोस के रहने वालों को पता लगी तो लोगों में आक्रोश फूट पड़ा.

देखते ही देखते पुलिस स्टेशन के सामने हजारों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगी. भीड़ तब तक शांत नहीं हुई, जब तक एसएसपी राजतिलक रोशन, एसपी मंजुनाथ शिंगे और एएसपी जयंत वंजवले ने पुलिस थाने आ कर 24 घंटे के अंदर हत्यारे को गिरफ्तार करने का आश्वासन नहीं दिया.

मामले को तूल पकड़ते देख पुलिस के बड़े अधिकारियों की आंखों से नींद गायब हो गई थी. उन्होंने जांच टीम को शीघ्र से शीघ्र अंजलि के हत्यारों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिए. पुलिस टीम ने अंजलि के परिवार और आसपास के लोगों से गहराई से पूछताछ करने के अलावा इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली. लोकमान्य तिलक स्कूल के एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में अंजलि एक महिला के साथ नालासोपारा स्टेशन की तरफ जाते हुए दिखाई दी.

वह महिला कौन थी और कहां से आई थी, यह जानने के लिए पुलिस टीम ने उस का स्केच बनवा कर जब मामले की जांच की तो पता चला कि वह महिला कई बार अंजलि के स्कूल और उस के घर साईं अपर्णा बिल्डिंग के आसपास संदिग्ध अवस्था में दिखाई दी थी. जिस दिन अंजलि गायब हुई थी, उस दिन भी वह बिल्डिंग परिसर में आई थी.

पुलिस जांच का चक्र तेजी से घूम रहा था. उस महिला का स्केच पूरे शहर में चिपकवाने के अलावा जनपद के सभी पुलिस थानों को भी भेज दिया गया. इस के अलावा स्केच अंजलि के पिता संतोष सरोज को भी दिखाया गया.

स्केच देखते ही संतोष ने अपना सिर पीट लिया. उस ने कहा कि यह तो उस की प्रेमिका है. पुलिस ने संतोष को सीसीटीवी कैमरे में अंजलि के साथ जाने वाली उस महिला की फुटेज दिखाई तो संतोष ने कहा कि यह उस की प्रेमिका अनीता वाघेला है और यह नालासोपारा (पूर्व) के नगीनदास पाड़ा इलाके में रहती है.

बिना देर किए पुलिस टीम अनीता के घर पहुंच गई. वह घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे हिरासत में ले कर थाने लौट आई. पुलिस ने जब उस से अंजलि की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने आसानी से अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अनीता से पूछताछ के बाद अंजलि की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्यार में चोट खाई नागिन के प्रतिशोध वाली निकली—

22 साल की अनीता का रंग हालांकि बहुत साफ नहीं था, लेकिन कुदरत ने उसे कुछ इस तरह गढ़ा था कि जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. सांवले सौंदर्य की मालकिन अनीता के जिस्म की कसावट और फिगर देख मनचले गहरी सांसें लेते हुए फिकरे कसते थे. इस के अलावा अनीता खुले विचारों वाली महत्त्वाकांक्षी युवती थी.

आमतौर पर अनीता जैसी महत्त्वाकांक्षी युवतियां जो सपने देखती हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर या कोई भी जोखिम उठा कर पूरा करने की कोशिश करती हैं.

यह अलग बात है कि इस के लिए उन्हें जो कीमत चुकानी पड़ती है, वह कभीकभी भारी पड़ जाती है. तब उन के पास हाथ मलने और अपनी नादानियों पर पछताने के सिवा कुछ नहीं रह जाता. यही हाल अनीता का हुआ था. वह आंख मूंद कर संतोष सरोज पर भरोसा कर के प्यार करने की भूल कर बैठी थी.

मूलरूप से गुजरात की रहने वाली अनीता वाघेला अपने मातापिता और भाईबहनों के साथ नालासोपारा (पूर्व) के नगीनदास पाड़ा इलाके में रहती थी. वह अपने और परिवार के लिए कैटरिंग का काम किया करती थी. उस की और संतोष सरोज की मुलाकात करीब 7 साल पहले नगीनदास पाड़ा के आटो स्टैंड पर हुई थी.

उस दिन वह अपने काम पर जाने के लिए काफी लेट हो रही थी. तब वह अपनी मंजिल तक संतोष के आटोरिक्शा से पहुंची थी. अनीता आटो से उतर कर चली तो गई लेकिन उस की शोख चंचल निगाहें, मुसकराता चेहरा संतोष के दिमाग में ही घूमता रह गया. उस की पहली ही झलक में संतोष अपना होशोहवास खो बैठा था, यह जानते हुए भी कि वह एक शादीशुदा और एक बच्ची का बाप है.

लेकिन वह यह सब भूल कर अनीता का सामीप्य पाना चाहता था. इस के लिए वह अकसर नगीनदास पाड़ा के आटो स्टैंड पर अनीता के आने का इंतजार करता था. वह दिख जाती तो वह मुसकराते हुए उस से अपने आटो में चलने की बात कहता. अनीता को तो किसी न किसी आटो से जाना ही था, लिहाजा वह संतोष के आग्रह पर उस के ही आटो में बैठ जाती.

2-4 बार संतोष के आटो से आनेजाने के बाद अनीता और संतोष के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया. स्वयं को अविवाहित बता कर उस ने अनीता को अपने प्रभाव में ले लिया. बातों और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया तो दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. जब भी अनीता को संतोष के साथ कहीं घूमने के लिए जाना होता तो वह संतोष को बेझिझक फोन कर बुला लेती. इस तरह दोनों में गहरी दोस्ती हो गई.

दोस्ती का दायरा बढ़ा तो अनीता के मन में संतोष के प्रति प्यार का अंकुर फूट पड़ा. वह सरोज को अपने मनमंदिर में बैठा कर गृहस्थ जीवन के सुंदर सपने देखने लगी. जिस का संतोष ने भरपूर फायदा उठाया.

उस ने अनीता को शादी का लालच दे कर उस का अपनी पत्नी की तरह इस्तेमाल किया. 7 सालों में अनीता 2 बार गर्भवती भी हुई. लेकिन संतोष ने अपनी कोई न कोई मजबूरी बता कर उस का गर्भपात करवा दिया था.

7 सालों का समय कुछ कम नहीं होता. संतोष और अनीता के संबंधों की सारी जानकारी उस के परिवार वालों को हो चुकी थी. वे लोग अब उस पर शादी करने का दबाव बनाने लगे थे. अनीता भी अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहती थी.

वह भी अपने और संतोष के प्यार को रिश्ते का नाम देने के लिए दबाव बनाए हुए थी. वह उस से शादी कर के अपना एक घर बनाना चाहती थी. इस से संतोष की परेशानी बढ़ गई थी.

संतोष शादीशुदा और एक बच्ची का बाप था. वह अनीता की वजह से अपने परिवार की शांति भंग नहीं करना चाहता था. लेकिन जब पानी संतोष के गले तक आ गया तो मजबूरन उसे अनीता के सामने अपना मुंह खोलना पड़ा. अनीता को एक अच्छे माहौल में ले जा कर उस ने अपने शादीशुदा होने की बात बता दी.

उस ने कहा कि उस की शादी गांव और जाति के रस्मोरिवाज से बचपन में ही हो गई थी और अब वह एक बच्ची का पिता भी है.

ऐसे में अगर वह दूसरी शादी करेगा तो उस की ब्याहता का क्या होगा. उस ने साफ कह दिया कि अब वह दूसरी शादी नहीं कर सकता. लेकिन वह चाहे तो उस के साथ जीवन भर रह सकती है. उसे किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने देगा.

यह जान कर अनीता सन्न रह गई. उसे लगा कि उस के ऊपर कोई पहाड़ गिर पड़ा. उसे लगा कि मानो उस का अस्तित्व ही खत्म हो गया. कुछ समय के लिए तो वह एक मूर्ति जैसी बन गई, लेकिन जब होश आया तो वह पागल सी हो गई थी. उस दिन अनीता और संतोष के बीच काफी कहासुनी और लड़ाईझगड़ा हुआ था.

संतोष की इस बात से अनीता काफी आहत हुई थी. उस के दिल में संतोष के प्रति नफरत हो गई. जाहिर सी बात है कोई भी लड़की तलाकशुदा या विधवा हो कर रह सकती है, लेकिन रखैल बन कर रहना पसंद नहीं करेगी.

काफी सोचनेविचारने के बाद अनीता ने यह तय किया कि बच्चे और प्यार का गम क्या होता है, अब वह संतोष को समझाएगी. जिस तरह से उस ने उस के 2-2 बच्चों का खून किया था, उस का बदला वह उसी तरह से चुकाएगी. तब उसे यह एहसास होगा कि बच्चा चाहे गर्भ में हो या गर्भ से बाहर, उसे खोने में कितना दर्द होता है.

अनीता ने संतोष की बेटी अंजलि के प्रति एक खतरनाक योजना बना कर उस के घर और स्कूल का पता लगा लिया और उस की अच्छी तरह रेकी की. पहले उस की योजना अंजलि को स्कूल से उठाने की थी, लेकिन स्कूल की चाकचौबंद सुरक्षा और अकसर मां के साथ होने के कारण उस का प्लान सफल नहीं हो सका.

इस के बाद उस ने संतोष के घर के पास से ही अंजलि को उठा लिया था. अंजलि को उठाने के पहले वह उस जगह पर आ कर बैठ जाती थी, जहां अंजलि बच्चों के साथ खेला करती थी.

मौका देख कर वह अंजलि को अपने पास बुला कर टौफी और चौकलेट दिया करती थी. 2-4 दिनों में जब अंजलि उस के काफी करीब आ गई तो वह उसे अपनी मीठीमीठी बातों में बहला कर अपने साथ ले कर चली गई.

अंजलि को पहले वह लोकमान्य तिलक स्कूल तक पैदल ले कर आई. फिर आटोरिक्शा से नालासोपारा रेलवे स्टेशन ले गई. वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने अपने पास चाकू रख लिया था.

नालासोपारा स्टेशन से बोरीवली स्टेशन और फिर वहां से एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ कर वह गुजरात के नवसारी रेलवे स्टेशन पहुंची. वहां मौका देख कर वह अंजलि को बाथरूम में ले गई और उस 5 वर्षीय बच्ची का गला काट कर हत्या कर दी.

अपने इंतकाम का बदला लेने के बाद अनीता सुबह की गाड़ी से अपने घर लौट आई थी. वह निश्चिंत थी कि पुलिस उस के पास तक नहीं पहुंच सकेगी. लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई.

अनीता वाघेला से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 362 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे तलोजा जेल भेज दिया गया.

अंजलि सरोज की हत्या की कहानी जब लोगों के सामने आई तो उस के परिवार वालों को तो क्या पूरे इलाके के लोगों को एक धक्का सा लगा. एक मासूम बच्ची अपने पिता के इश्क की भेंट चढ़ गई थी.

कथा लिखे जाने तक अनीता वाघेला जेल में बंद थी. आगे की जांच पीआई के.डी. कोल्हे कर रहे थे.

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