⚲

Story In Hindi: चिट्ठी आई है – सैंट की खुशबू से सराबोर लिफाफा

Story In Hindi: ‘‘मनोज बाबू, आप की बैरंग चिट्ठी है.’’

‘‘हमारी बैरंग चिट्ठी,’’ हम ने चुभती हुई निगाहों से रामकिशोर डाकिए की ओर देखा. उस ने अपनी साइकिल के हैंडल पर टंगे हुए झोले में से पत्रों, मनीआर्डर फार्मों का बंडल निकाला और एक बंद लिफाफा निकाल कर हमारी नाक के सामने कर दिया.

‘‘देख लीजिए, आप का ही नामपता लिखा है,’’ रामकिशोर ने कहा. फिर लिफाफा अपनी नाक के पास ले जा कर जोर से सांस खींची और अपनी दाहिनी आंख दबा कर बोला, ‘‘सैंट की खुशबू आ रही है.’’

हम ने लिफाफा उस के हाथ से ले कर उलटपलट कर देखा. लिफाफे पर भेजने वाले का नामपता नहीं था. हम लिफाफे का एक कोना फाड़ने लगे.

‘‘ऊंहूं, पहले 10 रुपए बैरंग चार्जेज दीजिए और मुझे चलता कीजिए,’’ उस ने लिफाफे पर हाथ रखा.

‘‘देता हूं, देता हूं…पहले तनिक देखने तो दो.’’

‘‘आप लिफाफा मुझे दीजिए. मैं इसे खोल देता हूं. आप इस के खत को देख लें. अगर आप के मतलब का हो तो रख लेना वरना मैं पोस्ट आफिस को ‘लेने से इनकारी है’, लिख कर वापस कर दूंगा.’’

रामकिशोर ने एक पिन की सहायता से धीरेधीरे लिफाफा खोला और फिर खत निकाला.

हम ने खत के पहले पन्ने पर नजर डाली, लिखा था :

‘माई डियर, डियर मनोजजी.’ खत की लिखावट जनाना थी. हमारा दिल तेजी से धड़कने लगा. हम ने जल्दी से खत को तह कर के लिफाफे समेत पैंट की जेब में ठूंस लिया.

‘‘हां हां, मेरा ही है,’’ कहने के साथ ही पर्स से 10 का नोट निकाल कर रामकिशोर की ओर बढ़ाया. फिर घर के दरवाजे की ओर देखा और जल्दी से सड़क पर जाते रिकशे को हाथ दे कर रोका.

‘‘चलो,’’ हम ने रिकशा वाले से चलने को कहा.

पार्क के सुनसान कोने में पड़े एक बैंच पर बैठ कर हम ने खत निकाला. इधरउधर सावधानी से देखा. बैंच के आसपास वाले पेड़ों पर नजर डाली कि कहीं कोई उन पर चढ़ा हुआ न हो. कोई नहीं था. यह तसल्ली होने पर हम ने पत्र खोला और पढ़ने लगे :

‘माई डियर, डियर डियर मनोजजी,

प्यार भरा नमस्कार. मेरा तो जी चाहता है कि डियर डियर से ही सारा पत्र भर दूं, क्योंकि आप हो ही इतने डियर…’

हम खत पढ़ते गए. पूरा खत शहद में डूबा हुआ था. एकएक शब्द मिसरी की डली मालूम होता था. लगता था लिखने वाली ने दिल निकाल कर खत में समेट दिया है. जब से उस ने हमें जौगिंग करते हुए अपनी ही टांगों में उलझ कर गिरते देखा है, उस के दिल में हमारे गिरने, संभलने और गिरने की अदा उतर गई है. उसे सपने में भी हम इसी तरह गिरते- संभलते दिखाई देते हैं.

हमें ऐसी कोई घटना याद नहीं आ रही थी क्योंकि हम जौगिंग करते ही नहीं फिर गिरनासंभलना कैसा? हां, एक बार बीच सड़क पर फेंके गए केले के छिलके पर हमारा पांव जरूर फिसला था. शायद उसे ही इस हसीना ने जौगिंग समझ लिया हो.

ढेर सारी प्यार भरी बातों और न भूलनेभुलाने की कसमों के बाद खत के अंत में उस ने केवल ‘आप के दर्शनों की प्यासी’ ही लिखा था. नामपता उस ने इसलिए नहीं लिखा था कि वह अभी गुमनाम रहना चाहती थी. पहली ही चिट्ठी में ज्यादा खुल जाना उसे खल रहा था.

रामकिशोर डाकिया के इंतजार में अपने घर के बाहर हम बेचैनी से टहल रहे थे. उस के आने से पहले ही हम लंच के बहाने घर आ गए थे. दूर से हमें उस की साइकिल नजर आई. हमारे घर से 12 घर दूर रामकिशोर ने अपनी साइकिल एक बिजली के खंबे के साथ टिकाई और अपने हाथ में खतों का बंडल लिए उस घर की डाक देने को बढ़ा. हम तेजी से उस के पास पहुंचे.

रामकिशोर ने शर्माजी के घर के आगे लगे लेटर बाक्स में डाक डालनी चाही मगर डाक कुछ ज्यादा होने से उस छोटे से लैटर बाक्स में समा नहीं रही थी. उस ने शर्माजी की ‘काल बेल’ बजाई और साथ वाले घर का पत्र डालने चला गया.

‘‘अरे, मनोज बाबू, आप,’’ शर्माजी घर से बाहर आ गए, ‘‘कहिए, क्या काम है जो आप ने घंटी बजाई है.’’

‘‘शर्माजी, घंटी मैं ने नहीं पोस्टमैन ने बजाई है,’’ हम ने जल्दी से बताया, ‘‘मैं तो अपनी डाक पूछने चला आया था.’’

‘‘कोई खास डाक है क्या?’’ शर्माजी अपनी डाक संभालते हुए बोले.

‘‘जी, नहीं. लंच के बाद आफिस जा रहा था. सोचा, कोई डाक हो तो देखता चलूं.’’

‘‘आज आप की कोई डाक नहीं है,’’ रामकिशोर ने बताया और खंभे के साथ लगी साइकिल पर सवार हो कर निकल गया.

हम गरदन झुका कर वापस हुए.

पूरे एक सप्ताह से हमारे नाम कोई बैरंग चिट्ठी नहीं आई थी. इसलिए बेचैनी बढ़ी हुई थी. दफ्तर के काम में भी दिल नहीं लगता था. कुछ न कुछ गलती हो जाती और बड़े साहब की टेढ़ी निगाह के सामने आंखें झुकानी पड़ जाती थीं. उस दिन भी किसी बैरंग चिट्ठी के मिलने की उम्मीद लिए हम रिकशे में बैठ घर को चल दिए.

घर के दरवाजे पर रामकिशोर एक लंबा सा लिफाफा लिए खड़ा था और लीना के ताऊजी उस के साथ बहस में उलझे हुए थे.

लिफाफे को देखते ही हम समझ गए कि आज फिर बैरंग चिट्ठी आई है. हम जल्दी से रिकशा वाले को किराया थमा कर पोस्टमैन की ओर बढ़े.

‘‘मैं किसी और का खत आप को नहीं दे सकता,’’ रामकिशोर कह रहा था.

‘‘अरे, मनोज हमारा बच्चा है और फर्ज कर लो वह 4-6 महीने को शहर से कहीं बाहर गया हो तो क्या तुम सिरे से उस की डाक दोगे ही नहीं? फिर यह कौन सा रजिस्टर्ड पत्र है, बैरंग ही तो है. लाओ, इधर करो जी,’’ ताऊजी हलके गुस्से भरे स्वर में बोले.

‘‘लाओ, पत्र मुझे दो…मैं आ गया हूं,’’ हम ने रामकिशोर से कहा और 10-10 के 2 नोट उस की ओर बढ़ाए.

रामकिशोर ने लिफाफा हमारे हवाले किया.

‘‘क्षमा करना ताऊजी, हमें किसी की डाक किसी और को देने के आदेश नहीं हैं. गाइड में यही बताया गया है.’’

‘‘अरे, जाओ. किस के सामने गाइड की बात करते हो. मैं ने तो स्वयं 5 बार गाइड देखी है,’’ ताऊ ने होंठ सिकोड़े, ‘‘उस का वह गाना… ‘आज फिर मरने की तमन्ना है…’’’

‘‘ताऊजी, मैं फिल्म ‘गाइड’ की बात नहीं…पोस्टल गाइड की बात कर रहा हूं,’’ रामकिशोर ने अपनी साइकिल संभाली.

‘‘मनोज बेटे, जरा यह लिफाफा दिखाना. मेरा एक ड्राफ्ट तुम्हारे पते पर आने वाला है. बैरंग खत रजिस्ट्री से ज्यादा हिफाजत से आता है. इसलिए मैं ने उस ड्राफ्ट को बैरंग डाक से भेजने को बोला था,’’ कह कर ताऊजी ने लिफाफा लेने को हाथ बढ़ाया.

‘‘ताऊजी, आफिस का एक गोपनीयपत्र मेरे घर के पते पर आने वाला था और मैं भेजने वाले आफिस के डिस्पैचर की ‘हैंड राइटिंग’ पहचानता हूं. यह मेरे लिए ही है.’’

‘‘अरे वाह, लिफाफा खोले बगैर कैसे कह सकते हो?’’ ताऊजी ने जरा जोर दे कर कहा.

हम ने थोड़ा पीछे हट कर लिफाफा खोला और पत्र निकाल कर उस का एकएक पन्ना अलग करना चाहा ताकि ताऊजी को तसल्ली हो जाए कि उन का ड्राफ्ट नहीं है.

अचानक खत के पन्नों में से कोई फोटो निकल कर ताऊजी के पैरों के पास जा गिरा. इस से पहले कि हम वह फोटो उठाते ताऊजी ने झुक कर फोटो पर हाथ डाल दिया और हमारा कलेजा हलक में आ फंसा. आंखों तले अंधेरा छा गया. उस हसीना ने अपना जो फोटो इस खत के साथ भेजा था वह अब ताऊजी के कब्जे में था. अब जो तूफान ताऊजी और लीना घर में उठाएंगे, उस का अंदाजा कर के हमारे पांव लड़खड़ा गए. खैर, अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालते हुए हम ताऊजी के साथ ड्राइंग रूम तक आए और सोफे में धंस गए.

लीना पानी का गिलास ले कर ड्राइंग रूम में आई तो गिलास को मुंह से लगाए चोर निगाहों से हम ने ताऊजी की ओर देखा. वह फोटो देख रहे थे और हम उस तूफान को देख रहे थे जो अभी आने वाला था.

‘‘हा हा हा…’’ ताऊजी जोर से हंस रहे थे, ‘‘अरे, देखो बेटी, इस का गोपनीयपत्र,’’ ताऊजी ने फोटो मेज पर रख दिया.

हम ने धड़कते दिल से फोटो पर नजर डाली. वह बड़ेबड़े बालों वाली एक कुतिया का फोटो था. हमारी तो जान में जान आ गई. दिमाग ने तेजी से काम करना शुरू कर दिया. हम ने जल्दी से पत्र के पन्नों को जेब में ठूंसा.

लीना ने फोटो को उलटपलट कर देखा और बोली, ‘‘क्या अब कुत्तेबिल्ली पालने की ठानी है? मैं कहे देती हूं आप के कुत्तेबिल्लियों के लिए एक पैसा घरखर्च में से नहीं दूंगी और न यहां गंदगी फैलाने दूंगी.’’

‘‘आप से पैसे मांग कौन रहा है,’’ हम काफी हद तक संभल गए थे, ‘‘यह फोटो तो अपने बड़े साहब के लिए है. वह कुत्ते को खरीदना चाहते हैं. वह अपने बेटे को जन्मदिन पर सरप्राइज गिफ्ट देना चाहते हैं. इसलिए पत्र व्यवहार हमारे घर के पते पर हो रहा है.’’

‘‘फिर ठीक है,’’ लीना ने लंबी सांस छोड़ी.

उस कुतिया के फोटो को ऊपर की जेब के हवाले कर हम सोफे से उठे और जल्दी से आफिस की राह पकड़ी.

इस घटना के 2 दिन बाद आफिस से घर लौटा तो लीना एक लिफाफा हमारी आंखों के सामने लहरा कर बोली, ‘‘10 रुपए निकालो. आप की यह बैरंग चिट्ठी आई है.’’

लिफाफे पर नजर डालते ही हमें अपनी सांस रुकती हुई महसूस हुई. हमें वह सुंदर लिखावट कोई जहरीली नागिन सी लहराती लग रही थी, सोफे पर हम किसी बुत की तरह बैठे एकटक लीना के हाथ में पकड़े लिफाफे को देख रहे थे.

‘‘अरे, क्या हुआ आप को?’’ लीना ने लिफाफा डाइनिंग टेबल पर डाल दिया और जल्दी से हमारे माथे पर हाथ रखा फिर नब्ज पर हाथ रख कर बोली, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

लीना ने पानी का गिलास भर कर हमारे सामने रखा.

हम ने एक ही सांस में गिलास खाली कर के मेज पर रखा और फिर लिफाफे पर हाथ डालना चाहा.

‘‘ऊंहूं,’’ लीना ने लिफाफा परे खींच लिया, ‘‘पहले 10 का नोट.’’

लीना की आवाज में शोखी और होंठों पर मीठी मुसकान थी. लीना चूहेबिल्ली का खेल खेल रही थी. हम जानते थे अभी आवाज की शोखी किसी शेरनी की दहाड़ में बदल जाएगी. होंठों की मुसकान ज्वालामुखी का रूप धारण कर लेगी.

हम ने डरतेडरते जेब से पर्स निकाल कर टेबल पर डाल दिया. लीना ने पर्स में से 100 का नोट खींच लिया और लिफाफा हमारे सामने डाल दिया.

पहले से खोले गए लिफाफे में से हम ने खत निकालना चाहा, लेकिन लिफाफे में से कुछ न निकला. हम ने लिफाफे में झांक कर देखा और कहा, ‘‘इस में… तो…खत…नहीं है.’’

‘‘हां, मैं ने भी लिफाफा खोल कर देखा था. यह खाली था.’’

‘‘लिफाफा खाली था?’’ हम ने अविश्वास से पूछा.

‘‘हां, बिलकुल खाली था,’’ लीना ने हाथ में पकड़े नोट से खेलते हुए कहा.

‘‘सच कहती हो?’’

‘‘हां. खत शायद इस में डाला ही नहीं गया था.’’

हम ने खाली लिफाफा जेब में डाल लिया और लीना से बोले, ‘‘बड़े साहब को बता दूंगा कि लिफाफे में इस बार खत नहीं निकला.’’

दूसरे दिन हम आफिस में जल्दी जाने का बहाना लगा कर निकले और पोस्ट आफिस पहुंच गए. रामकिशोर एक मेज पर बैठा अपने सामने रखी डाक को क्रम से लगा रहा था और छोटेबड़े बंडल बनाबना कर उन पर रबड़ बैंड कस रहा था. कुछ देर बाद वह बाहर आया और अपनी साइकिल पर डाक का झोला टांगने लगा.

‘‘रामकिशोरजी,’’ हम ने अपने स्वर में शहद घोला.

‘‘अरे, मनोज बाबू, आप,’’ रामकिशोर ने मुड़ कर हमारी ओर देखा, ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’

‘‘रामकिशोरजी, आप ने कल जो बैरंग लिफाफा लीना को दिया था उस में खत नहीं था.’’

‘‘खत तो था,’’ रामकिशोर ने बतलाया.

‘‘मगर लिफाफा तो खाली था. शायद लीना ने खत निकाल लिया है,’’ हम ने मरी आवाज में कहा.

‘‘लीना ने नहीं…वह खत मैं ने निकाल लिया था,’’ रामकिशोर ने अपनी बुशर्ट की जेब में से तह किया हुआ पत्र निकाल हमारे हाथ पर रख दिया, ‘‘जब लीनाजी बैरंग खत के हर्जाने के 10 रुपए लेने अंदर गईं तो मैं ने फुर्ती से लिफाफा खोला, पत्र निकाला और फिर से बंद कर दिया था.’’

‘‘शाबाश, रामकिशोर. तुम ने मुझे बहुत बड़ी मुश्किल से बचा लिया,’’ हम ने कहा. जी चाहता था रामकिशोर को गले लगा लूं.

‘‘यह तो मेरा फर्ज था,’’ रामकिशोर ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मैं आप का शुक्रिया अदा नहीं कर सकता,’’ हम ने जेब से पर्स निकाला.

‘‘यहां नहीं, मनोज बाबू…शुक्रिया शाम को चौक के ‘ब्ल्यू मून’ रेस्तरां मेें अदा करें.’’

उस के बाद तो मेरे बैरंग खतों की वसूली उसी रेस्तरां में होने लगी. वहां न लीना का डर था न उस के ताऊजी का, न किसी और का. जब भी हमारा कोई बैरंग पत्र आता रामकिशोर डाकखाने में हर्जाना भर देता और शाम को बैरंग चार्जेज वसूल कर लेता.

अब पत्रों में प्यार सी मिठास और बढ़ गई थी. मगर अब तक वह हसीना मिलने की जो जगह लिखती वह कभी वहां न मिलती और उस से अगले खत में न आने पर माफी मांगी जाती.

उस दिन आफिस में काम ज्यादा होने के कारण हम देर से रेस्तरां में पहुंचे थे. एक मेज के सामने रामकिशोर दरवाजे की ओर पीठ किए अपने किसी दोस्त के साथ बैठा था. उन दोनों के सामने चाय की प्यालियों के साथ नमकीन की प्लेटें थीं.

हम उन को डिस्टर्ब नहीं करना चाहते थे इसलिए उन के पीछे वाली मेज पर विपरीत दिशा में मुंह कर के बैठ गए.

बैरे से हम ने कोल्ड डिं्रक की बोतल मंगवा ली और हम रामकिशोर के मित्र के जाने का इंतजार करने लगे. उस के दोस्त के सामने हम बैरंग खत नहीं लेना चाहते थे.

‘‘राम, तुम्हारे बकरे का क्या हाल है?’’ रामकिशोर के दोस्त ने उस की पीठ पर हाथ मारा.

‘‘अरे, गोपाल क्या बताऊं… रोजरोज बेचारा छुरी के नीचे आ ही जाता है,’’ और फिर इसी के साथ धीरे से ही ही ही कर के हंस दिया.

‘‘और तुम्हारे इनाम की रकम भी तो बढ़ती जाती होगी,’’ गोपाल ने चम्मच से नमकीन मुंह में डालते हुए कहा.

‘‘हां, यार…दशहरेदीवाली पर बख्शीश देने के बजाय भाषण झाड़ा करता था कि तुम्हें महकमे से पगार मिलती है फिर लोगों से त्योहारों का इनाम क्यों मांगते हो? तुम्हारी शिकायत हो सकती है,’’ रामकिशोर ने पिछली दीवाली पर हमारे कहे शब्दों को दोहराया और हमारे लहजे/उच्चारण की नकल उतारी, ‘‘और अब उस रकम से कई गुना ज्यादा बैरंग चार्जेज डिपार्टमेंट को और चोरीछिपे खतों को पहुंचाने का इनाम मुझे दिया जाता है.’’

‘‘मगर प्यारे, यह कमाल मेरी जनाना हैंड राइटिंग का भी तो है वरना ऐसे प्यार में डूबे खत किसी लड़की से लिखवा सकते थे,’’ गोपाल कह रहा था, ‘‘मगर यार, वह प्रेमी को पत्र लिखने की कला वाली पुस्तक समाप्त होने को है.’’

‘‘कोई बात नहीं, उस का दूसरा भाग बाजार से ले लो,’’ रामकिशोर ने जेब से पर्स निकाला.

हम ने चुपचाप उठ कर काउंटर पर बिल चुकाया और रेस्तरां से बाहर हो गए.

4 दिन बाद रामकिशोर एक मोटा सा बैरंग लिफाफा ले कर घर आया.

‘‘50 रुपए इस बैरंग खत का हर्जाना महकमे को भरना होगा,’’ रामकिशोर ने लिफाफे से अपनी हथेली खुजाई.

‘‘वापस कर दो. लिख दो कि लेने से इनकारी है,’’ हम ने रामकिशोर पर पलट वार किया. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: अलीशेर – एक मुसलमान जो रामलीला में बनता था राम

Best Hindi Kahani: मेला वाली बारी में रामलीला का मेला था. वह जगह बहुत साफसुथरी और हरीभरी थी. चारों तरफ ऊंचेऊंचे पहाड़नुमा भीटे और लंबेलंबे खड़े पेड़ थे. बीच में एक सुंदर तालाब था. एक तरफ रामलीला वाली जगह थी, जहां रामलीला करने वाले लोग राम, लक्ष्मण, सीता और रावण आदि का स्वांग करते थे.

पहले गांव का हिसाब ही अलग था. राम का रोल कोई भी गोराचिट्टा लड़का अदा कर लेता था और सीता का रोल भी कोई कमसिन लड़का, जिसे दाढ़ीमूंछ न आई हो, अदा करता.

इस में हिंदू या मुसलमान होने के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था. जो भी अच्छी तरह रामलीला का पाठ याद कर उस का सही स्वांग कर लेता, उसे वह रोल दे दिया जाता था. लोग इसे सिर्फ नाटक समझते थे और उसे नाटक की तरह करते थे.

हां, राम का रोल हमेशा अलीशेर अदा करते थे. समय के हिसाब से हर रोल आगेपीछे हो जाते थे या बदल दिए जाते थे, लेकिन अलीशेर को हमेशा रामलीला में राम बनाया जाता था, क्योंकि अलीशेर एक खूबसूरत जवान थे और उन्हें राम का पाठ जबानी याद था. जब सिर पर मुकुट लगाए वह स्टेज पर आते तो लोग मोहित हो जाते थे.

एक बार तो ऐसा भी हुआ कि राम और रावण दोनों का पाठ करने वाले मुसलमान ही थे, क्योंकि जिन लोगों को नौकरी मिल गई, वे शहर चले गए और गांव में एक मेहमान की तरह आने लगे.

लेकिन बाद में गांव का माहौल बदलने लगा. मुसलमानों का एक तबका रामलीला में मुसलिम नौजवानों व बच्चों के शामिल होने का विरोध करने लगा. मुल्लों ने फतवा जारी कर के इसे मजहब के खिलाफ बताया. फतवे में रामलीला में भाग लेना तो दूर इसे देखना भी गलत कहा गया.

इस फतवे का लोगों पर बुरा असर पड़ा. रात में रामलीला देखने वालों की संख्या कुछ कम हो गई. फिर भी रामलीला देखने के लिए मुसलमान बच्चे जाते रहे, लेकिन चोरीछिपे, खुलेआम नहीं.

अलीशेर के डीलडौल का गांव में कोई नौजवान नहीं था और उस पर वर्षों का अभ्यास, सारे पाठ जबानी याद. अत: जब भी राम का रोल उन्हें दिया गया, बिना रोकटोक के उन्होंने कर दिया. उन्होंने मुल्लेमौलवियों के फतवे की परवाह नहीं की और न उन्हें मुसलिम बिरादरी से बाहर कर दिए जाने का डर था. वे इसे गांव की इज्जत वाली बात मान कर एक कलाकार की तरह रामलीला में भाग लेते रहे.

वे हफ्ते में केवल जुमा की नमाज पढ़ते थे, वे भी आखिरी कतार में क्योंकि रामलीला के दिनों में वे मुसलमानों के बीच एक अच्छाखासा तमाशा बन जाते थे. कोईकोई तो उन्हें मसजिद में ही छेड़ देता, ‘‘अरे भाई रामचंद्रजी, आप यहां कैसे? रामचंद्रजी मुसलमान तो थे नहीं.’’ कोई दूसरा कहता, ‘‘अब तो इन्हें मंदिर में भी जगह नहीं मिलेगी…’’

वे चुपचाप किसी का जवाब दिए बगैर मसजिद से बाहर निकल जाते. उन्हें रामचंद्रजी का रोल एक खेल सा लगता और यह खेल वे गांव की इज्जत के लिए खेलते थे ताकि सारे इलाके में उन के गांव की धूम मच जाए.

कुछ दिनों के बाद हिंदुओं में एक नई पार्टी उभरी, जिस का नाम था ग्राम युवक संघ. उस ने सब से पहला काम यह किया कि अलीशेर को हमेशा के लिए रामलीला मंडली से बाहर निकाल दिया, क्योंकि वे मुसलमान थे और उन की जगह एक हिंदू को रखा गया.

अलीशेर तो कहीं के भी न रहे. मुसलमानों के बीच तो पहले ही मजाक विरोधी काम करने वाले के रूप में नफरत की निगाह से देखे जाते थे. अब बचे हिंदू, सो उन्होंने भी अलीशेर को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया. अब वे जाते भी तो किधर जाते. जहां जाते लोग उन का मजाक उड़ाते, ‘बेटा न राम के, न रहीम के… किधर जाओगे? बेहतर है, कलमा पढ़ कर दोबारा मुसलमान बन जाओ…’ या इसी तरह कुछ लोग कहते, ‘यार, तुम हिंदू हो जाओ. पहले भी तो तुम्हारे बापदादा हिंदू ही थे,’ अलीशेर इन तमाम बातों का जवाब केवल खामोशी से देते.

अलीशेर खानदानी जमींदार थे, लेकिन उन के चाचा के लड़कों ने चकबंदी में उन की अच्छी जमीन हथिया ली. बदले में उन्हें जो जमीन मिली, वह ऊसर थी. गरीबी की वजह से धीरेधीरे वह जमीन भी बिक गई.

अब उन्हें कोई सहारा नहीं था, इसलिए गांव में लोगों के गायबैल चराने लगे. इस के बदले उन्हें नाश्ता और खाना मिलने लगा. इस के अलावा वे गांव में फेरी भी लगाने लगे. वे कभी अमरूद, कभी कटहल और कभी गुड़ की ‘लकठो’ मिठाई बेचते.

गांव के बच्चों ने उन का नाम रखा था ‘राम मियां.’ बस वे इसी नाम से मशहूर हो गए. गांव के चाहे जिस छोर पर पूछिए, लोग बता देंगे. राम मियां के बाद महल्ले का नाम बताना जरूरी नहीं था.

जब उस दिन रामलीला का मेला लगा तो अलीशेर को बहुत बुरा लगा. कारण कि वह हिंदू लड़का जो राम बना था, लड़कियों जैसी आवाज में रामजी का संवाद बोलने लगा. खैर, अब तो वे बिलकुल इन चीजों से अलग हो चुके थे.

अलीशेर ने रामलीला मेले में तसवीरों की दुकान लगाने का निश्चय किया. कारण कि यदि तसवीर की कीमत 10 रुपए होगी, तो वह मेले में आसानी से 20 रुपए में बिक जाएगी.

बनारस जा कर अलीशेर ने बहुत सारी तसवीरें खरीदीं. राम की तसवीर, कृष्ण की तसवीर, गुरुनानक देव की तसवीर, दरगाह अजमेर शरीफ की तसवीर, मक्कामदीना की तसवीर और कुछ फिल्मी अभिनेताओं की तसवीरें. जब मेला आरंभ हुआ तो उस दुकान पर बच्चों की भीड़ लग गई. एकएक कर के सारी तसवीरें बिक गईं.

अलीशेर को अच्छा फायदा हुआ. बच्चे तो बच्चे होते हैं. उन्हें जो अच्छा लगा खरीद लिया. यदि अलीशेर से यह पूछा जाए कि कौन बच्चा कौन सी तसवीर ले गया, तो वे इस का जवाब नहीं दे सकते थे, क्योंकि भीड़ के आगे उन्हें अपनी तसवीरों को संभाल पाना भी मुश्किल हो गया था.

सूरज डूबने के बाद मेला उठने लगा. अलीशेर को दुकान से अच्छी आमदनी हुई. वह अपनी दुकान बंद कर के ज्यों ही नहर की पगडंडी पर पहुंचे, तो कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया, ‘‘अलीशेर मियां, आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ एक ने कहा.

‘‘तुम ने हमारे बच्चों को मक्कामदीना और अजमेर शरीफ की तसवीरें क्यों दीं? आखिर उन को इस से क्या लेनादेना. वे मुसलमान तो हैं नहीं,’’ दूसरे आदमी ने कहा.

‘‘अलीशेर भाई, आप ऐसे तो न थे. जरूर इस में किसी विदेशी देश का हाथ होगा. आप ही बताइए कि यदि आप के बच्चों को हम देवीदेवता की तसवीर दें, तो आप को कैसा लगेगा?’’ तीसरे ने कहा.

और इस के बाद कुछ लोगों का मुंह उन की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ा, ‘मारोमारो…’ और फिर अलीशेर के ऊपर लाठियों का बरसना तब तक जारी रहा, जब तक वे मर नहीं गए. अलीशेर को अपनी सफाई में कुछ कहने का भी मौका नहीं दिया गया.

पुलिस की जांचपड़ताल के दौरान गांव के लोगों ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. जिस गांव ने 10 साल तक अलीशेर को रामलीला में राम का पाठ करते हुए देखा था, उस दिन उस गांव का एक बच्चा भी उन्हें पहचान न सका. हां, एक पास के गांव का बच्चा, जो उस समय भी उन से खरीदी हुई तसवीर लिए उन्हें घूर रहा था, पुलिस के सामने आया और बोला, ‘‘मैं इन का नाम जानता हूं. इन का नाम है, राम मियां. सारे बच्चे इन्हें इसी नाम से पुकारते हैं.’’

बच्चे की बात सुनते ही पुलिस वाले को क्रोध आया और उस ने बच्चे को एक भद्दी सी गाली दी और कहा, ‘‘राम कब से मियां हो गए?’’

जो मरा उस का नाम एक सच था, जिस बच्चे ने उस का नाम बताया, वह भी एक सच था और पुलिस वाला, जिसे क्रोध आया, वह भी एक सत्य था. सबकुछ सच होते हुए भी एक आदमी की लाश लावारिस पड़ी थी, दूरदूर तक अजीब सी हवा बह रही थी. Best Hindi Kahani

Hindi Kahani: बूंदबूंद से घड़ा भरे – एक किसान की समझदारी

Hindi Kahani: मानस नदी के किनारे एक गांव बसा था राजपुरा. उस में आबाद 30 में से 25 घर छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों के थे. 2 घर दस्तकारों के और 3 खातेपीते किसानों के थे. वे खातेपीते किसान थे, रामसुख, हरदेव और सुखराम.

एक दिन उस गांव में एक नई और अजीब बात हुई. रामसुख शहर से ट्रैक्टर खरीद कर लाया था. नीले रंग का चमचमाता ट्रैक्टर जब गांव में आ कर रुका तो बच्चे खुशी के मारे उस के चारों ओर घेरा बना कर खड़े हो गए.

रामसुख ट्रैक्टर से नीचे उतरा ही था कि खेतों से लौटते हुए हरदेव से उस की मुलाकात हो गई.

रामसुख ने उसे ट्रैक्टर दिखाया और पूछा, ‘‘आप को कैसा लगा दादा?’’

‘‘बहुत अच्छा है, कितने में खरीदा?’’

‘‘तकरीबन साढ़े 6 लाख रुपए में पड़ा है.’’

कीमत सुन कर हैरानी से हरदेव की आंखें फैल गईं.

‘‘ऐसा है दादा कि 2 लाख रुपए तो मैं ने नकद दिए हैं, बाकी बैंक से कर्ज मिल गया है,’’ रामसुख ने बताया.

हरदेव की हैरानी फिर भी कम न हुई. उस की बराबर की हैसियत के रामसुख के पास 2 लाख रुपए नकद कहां से आ गए? उस के पास तो 50,000 रुपए भी जमा नहीं थे.

‘‘2 लाख रुपए क्या साहूकार से लिए हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ने जमा किए हैं.’’

हरदेव को रामसुख की बात पर यकीन तो नहीं हुआ, किंतु उसी वक्त सारी बातें पूछना ठीक न समझ वह चुप हो गया.

रात में हरदेव ठीक से सो नहीं पाया. रामसुख के घर सारी रात मेला सा लगा रहा. गांव में लड्डू बांटे गए. हरदेव सवेरे उठा तो रात में ठीकसे सो न पाने के चलते उस का सिर भारी था. नहाने के लिए वह नदी की ओर जा ही रहा था कि रामसुख मिल गया. वह जुताई के लिए ट्रैक्टर लिए जा रहा था.

‘‘आओ दादा, बैठ कर चलते हैं,’’ रामसुख ने पुकारा. उस ने सहारा दे कर हरदेव को ट्रैक्टर पर बिठा लिया.

ट्रैक्टर खेतों की ओर चल दिया. कल वाला सवाल आज भी हरदेव के दिमाग में घूम रहा था. वह रामसुख से पूछ ही बैठा. ‘‘रामू, एक बात बता. तू ने 2 लाख रुपए जोड़े कैसे?’’

‘‘सीधी सी बात है दादा, बूंदबूंद कर के खाली घड़ा भर जाता है और बूंदबूंद टपकाते रहो तो भरा घड़ा भी खाली हो जाता है.’’

‘‘समझा कर बता. यों पहेलियां न बुझा,’’ हरदेव बोला.

‘‘बात अच्छी न लगे तो बुरा तो न मानोगे. इसी डर से मैं ने अब तक आप को नहीं कहा था.’’

‘‘कह, तेरी बात का बुरा नहीं मानूंगा.’’

‘‘सच तो यह है कि हमारे गलत रीतिरिवाज हमें पनपने नहीं देते. मैं ने अपने को इन से बचा कर रखा और आप इन के शिकार हुए. मैं ने अपने पिता की मौत पर थोड़ा सा पैसा खर्च किया. लोगों की नाराजगी की परवाह नहीं की. भाई व बच्चों की शादी भी साधारण तरीके से कम खर्च में की. न ढेर सारे मेहमान बुलाए और न तरहतरह के पकवानों का भोज दिया.

‘‘झूठी शान और दिखावे के लिए शादियों में ढेर सारे गहने भी मैं ने नहीं चढ़ाए, न ही बैंडबाजे बजवाए. एक ओर मैं ने फालतू खर्च बंद किए, वहीं दूसरी ओर लगातार बचत की. बचत के रुपयों से मुझे ब्याज तो मिला ही, बैंक में मेरी साख भी बनी.

‘‘यही नहीं, खाद, बीज के लिए मुझे बैंक या साहूकार को ब्याज भी नहीं देना पड़ा. 2 लाख रुपए नकद देने के बाद भी अभी कुछ हजार रुपए मेरे बैंक खाते में जमा हैं.

‘‘उधर मेरे बराबर कमाई करने पर भी आप के पास रुपया इसलिए नहीं है कि आप ने अपने पिताजी का लंबाचौड़ा ‘मृत्युभोज’ किया. शादीब्याज खूब शान से किए. इन में दूरदूर के बहुत से मेहमान बुलाए. इस के लिए आप को साहूकार से कर्ज भी लेना पड़ा. फिर आप अपनी फसल वाजिब कीमत पर मंडी में बेचने के बजाय साहूकार को औनेपौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर हुए.

‘‘छोटेछोटे मौकों पर भी आप ने दिल खोल कर खर्च करने में अपनी शान समझी. इन से आप की आमद और खर्च बराबर होते रहे. बचत कुछ हुई नहीं. पैसे से पैसा नहीं बढ़ा.’’

‘‘हमारे देश में गरीबी होने की यह भी एक बड़ी वजह है कि हम दिखावों में अपनी गाढ़ी कमाई खर्च कर देते हैं. इसी कारण हम साहूकारों के हाथों लुटते रहते हैं. अमीर किसानों की देखादेखी गरीब किसानों व खेतिहर मजदूरों को भी अपना पेट काट कर और उधार ले कर ऐसे रीतिरिवाजों को निभाना पड़ता है. इसी वजह से हमारा दिखावा हमें बरबाद कर देता है.’’

‘‘तुम सच कहते हो रामसुख, अब मेरी आंखें खुल गई हैं,’’ हरदेव ने सोचते हुए कहा.

हरदेव की आंखें तो खुलीं, पर खुलीं देर से. अब तक तो वह खेती की कमाई में रामसुख के बराबर था, पर अब वह पीछे रह जाएगा क्योंकि रामसुख ने अब तक की गई बचत के बल पर ट्रैक्टर खरीद लिया था. Hindi Kahani

Hindi News Story: क्रीमी लेयर पर सियासी जंग

Hindi News Story: एक तरफ अयोध्या के राम मंदिर में ध्वजारोहण हो रहा था, दूसरी तरफ दिल्ली और एनसीआर मास्क लगा कर जहरीली हवा से जूझ रहा था. दिसंबर का महीना आने वाला था और यह साल भी अपना वजूद खोने जा रहा था.

इस बीच अनामिका ने एक दिन विजय को फोन किया, ‘‘यार, कल सुबह तुम मेरे साथ बैंक चलना. एक छोटा सा काम है, फिर हम दोनों ट्रेड फेयर देखने चलेंगे. ज्यादा दिन नहीं बचे हैं.’’

‘‘बैंक तो मैं चल लूंगा, पर ट्रेड फेयर जाने के नाम पर मेरी टांगें कांपने लगती हैं. बहुत भीड़ होती है और खर्च होता है, सो अलग,’’ विजय बोला.

‘‘तुम न बड़े बोरिंग इनसान हो. अभी बोल दूं कि किसी होटल में एक रात बिताते हैं, तो तुम्हारी बांछें खिल जाएंगी. पर अगर मुझे कहीं घूमने जाना हो, तो तुम बहाने बनाने लगते हो. यह गलत बात है,’’ अनामिका ने रूठते हुए कहा.

‘‘अच्छा ठीक है, पहले बैंक का काम निबटाएंगे, फिर देखते हैं कि ट्रेड फेयर जाने का समय बचता भी है या नहीं,’’ विजय बोला.

अगले दिन विजय और अनामिका सुबह 10 बजे ही बैंक चले गए थे. बैंक सरकारी था. अनामिका को अपना केवाईसी अपडेट कराना था. चूंकि बैंक की वैबसाइट में दिक्कत थी, तो उन्हें थोड़ा समय लग रहा था.

वैसे, केवाईसी अपडेट के लिए आप को पहचान और पते के प्रमाण के लिए जिन दस्तावेज की जरूरत होती है, उन में पैनकार्ड और आधारकार्ड सब से खास हैं, साथ ही पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, या ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेज की जरूरत हो सकती है.

इस के अलावा, आप को एक हालिया पासपोर्ट साइज की तसवीर और हाल का उपयोगिता बिल (जैसे बिजली या गैस बिल) या बैंक स्टेटमैंट जैसे पते के प्रमाण की भी जरूरत हो सकती है.

बैंक में एक चपरासी और गार्ड के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. वे दोनों कौन्ट्रैक्ट पर वहां लगे थे. चपरासी ऊंची जाति का था, जबकि गार्ड एससी तबके से था.

गार्ड ने चपरासी को कोई काम करने को कहा था, जबकि चपरासी उसे भाव नहीं दे रहा था. मुद्दा बस इतना था कि चपरासी को एक कागज पर मैनेजर के दस्तखत और मुहर लगवानी थी. चूंकि बैंक में भीड़ ज्यादा थी तो गार्ड अपनी सीट नहीं छोड़ सकता था.

इसी बात पर चौकीदार चिढ़ गया था. वह बोला, ‘‘अब इन्हें भी सीट पर ही काम चाहिए. रिजर्वेशन से सब हड़प रहे हैं और अब काम भी हम से ही कराना चाहते हैं. जिस दिन रिजर्वेशन हट गया न, तब देखना.

मुफ्त की मलाई नहीं मिलेगी, तो आटेदाल का भाव पता चल जाएगा.’’

‘‘तो इस में क्या गलत है. तुम लोगों ने सदियों से हमें दबाया है. हमें हमारा हक मिलना चाहिए,’’ गार्ड ने भी ऊंची आवाज में कहा.

‘‘चिंता मत करो. नई सरकार क्रीमी लेयर वाले मामले पर कुछ धमाका करने वाली है. बहुत फायदा उठा लिया तुम लोगों ने रिजर्वेशन का. थोड़े दिनों के बाद सब बराबर हो जाएंगे,’’ चपरासी ने भड़ास निकालते हुए कहा.

‘‘क्यों अफवाह फैला रहे हो. बात का बतंगड़ बनाना तो कोई तुम से सीखे. मैं लंच टाइम में अपना काम करा लूंगा,’’ इतना कह कर वह गार्ड मेन गेट के बाहर जा कर अपनी सीट पर बैठ गया.

तब तक अनामिका का काम हो चुका था. अभी 12 बज रहे थे. वह और विजय ट्रेड फेयर की तरफ चल दिए.

चूंकि 1-2 दिन में मेला खत्म होने वाला था, तो भीड़ ज्यादा थी. वे दोनों अंदर जा कर सब से पहले एक रैस्टोरैंट में गए. उन्हें चाय पीने की तलब थी.

इसी बीच अनामिका बोली, ‘‘उस चपरासी ने कितनी आसानी से कह दिया कि अब देश से रिजर्वेशन खत्म हो जाएगा. उसे क्या पता कि क्रीमी लेयर क्या होता है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्रीमी लेयर बला क्या है?’’ विजय ने अनामिका को कुरेदते हुए पूछा.

यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘मैं ने बीबीसी के एक लेख में पढ़ा था और वहां इसे अच्छे से समझाया गया था कि ‘क्रीमी लेयर’ की सोच इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पेश की गई थी, जिसे मंडल आयोग मामले के रूप में भी जाना जाता है.

‘‘अदालत ने फैसला सुनाया कि ओबीसी में उन्नत वर्गों को आरक्षण के लाभ का दावा नहीं करना चाहिए, लेकिन इस वर्ग के वास्तव में जरूरतमंद लोगों को यह लाभ मिलना चाहिए.

‘‘इस के मुताबिक, 8 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले परिवारों को क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. यह आमदनी सीमा सरकार की ओर से समयसमय पर बदली जाती है. इस के अलावा, ग्रुप ए और ग्रुप बी सेवाओं में ऊंचे पद के अफसरों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में शामिल हैं.

‘‘डाक्टर, इंजीनियर और वकील जैसे अमीर पेशेवरों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. इस के अलावा बड़े पैमाने पर खेतीबारी की जमीन के मालिक परिवारों को भी क्रीमी लेयर में शामिल किया गया है.

‘‘क्रीमी लेयर के सदस्य सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों समेत ओबीसी के लिए आरक्षित लाभों के लिए पात्र नहीं हैं.

‘‘वर्तमान में क्रीमी लेयर की सोच एससी और एसटी पर लागू नहीं होती है. एससी और एसटी के तकरीबन सभी लोगों को आरक्षण का लाभ मिलता है. लेकिन अब कोर्ट की इस ऐतिहासिक सिफारिश के बाद इस में बदलाव की संभावना है.’’

‘‘तो फिर अब इसे क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हें हाल की एक खबर बताती हूं. रिटायरमैंट से ठीक पहले चीफ जस्टिस बीआर गवई ने क्रीमी लेयर नौकरियों के कोटे को ले कर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि यह चिंताजनक है कि एससीएसटी समुदायों में सामाजिक और मालीतौर पर अमीर लोग जाति को हथियार बना कर नौकरियों में आरक्षण का बड़ा हिस्सा हथिया रहे हैं.

‘‘एक बड़े अखबार से बातचीत में चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि केंद्र और राज्यों को एससीएसटी समुदायों को उपवर्गीकृत करने का समय आ गया है, ताकि इन समुदायों में वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े बने हुए हैं, सरकारी नौकरियों में कोटे के लाभ उठा सकें.

‘‘चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बैंच ने राज्यों को एससी समुदायों के भीतर जातियों को सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन व सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व के आधार पर उपवर्गीकृत करने की इजाजत दी, यह पक्का करते हुए कि कोटे का बड़ा हिस्सा सब से पिछड़े लोगों को जाए.

‘‘इस बारे में चीफ जस्टिस ने कहा कि अपने ही समुदाय से आलोचना के बावजूद, वे दृढ़ता से महसूस करते हैं कि एससीएसटी समुदायों में क्रीमी लेयर को इन समुदायों में वंचितों के लिए जगह देनी चाहिए.’’

‘‘इस में गलत क्या है? जब क्रीमी लेयर वालों ने पहले ही आरक्षण का फायदा ले लिया है, तो उन की अगली पीढ़ी को खुद ही इस सब का फायदा नहीं लेना चाहिए, तभी तो गरीब एससीएसटी को आरक्षण का असली हक मिल पाएगा,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मामले की गहराई नहीं समझ रहे हो. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त, 2024 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण बारे में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार इन समुदायों के आरक्षण सीमा के भीतर अलग से वर्गीकरण कर सकती है.

‘‘तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की 7 जजों की बैंच के 6 जस्टिस ने एससीएसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण के पक्ष में फैसला सुनाया, जबकि एक जस्टिस ने इस का विरोध किया.

‘‘फैसला सुनाते समय यह सिफारिश भी की गई कि एससी और एसटी के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए और यह ओबीसी वर्ग पर लागू क्रीमी लेयर के प्रावधान से अलग होना चाहिए.

‘‘इस फैसले को ले कर कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान गया है कि क्या एससी और एसटी के आरक्षण में क्रीमी लेयर देने की जरूरत है?’’

‘‘पर मैं इस फैसले को ऐतिहासिक मानता हूं. तुम इस तरह से यह बात समझो. अगर एक छात्र दिल्ली के किसी बड़े और नामचीन या किसी और बड़े शहर के बढि़या कालेज में पढ़ रहा है और एक छात्र गांवदेहात के किसी साधारण स्कूल या कालेज में पढ़ रहा है, तो इन दोनों छात्रों को एकसमान नहीं माना जा सकता है. अगर एक पीढ़ी आरक्षण का लाभ ले कर आगे बढ़ी है, तो अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए,’’ विजय ने अपना पक्ष रखा.

‘‘ओह, तो यह बात है. पर तुम इस मुद्दे को बड़ा हलके में ले रहे हो. ‘वंचित बहुजन अघाड़ी’ के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने इस फैसले का विरोध किया है. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला एससी के तहत पिछड़ेपन को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानदंडों पर चुप है.

‘‘प्रकाश अंबेडकर ने आगे कहा कि आरक्षण से न केवल एससी, एसटी और ओबीसी को लाभ होता है, बल्कि सामान्य श्रेणियों को भी लाभ होता है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

‘‘और तो और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सुनाए फैसले के बारे में बौम्बे हाईकोर्ट के वकील संघराज रूपवते ने कहा कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने एक बार फिर अदालत की आड़ में वही किया है, जो वे चाहते थे. यह एक ऐसा फैसला है जो हमें जातिविहीन समाज से दूर ले जाता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उपवर्गीकरण की अनुमति देना 6 जस्टिस की एक बड़ी गलती है.

‘‘वैसे भी एससी और ओबीसी के क्रीमी लेयर अलग होते हैं. इस बारे में ‘नैशनल कौन्फेडरेशन औफ दलित और्गनाइजेशन’ के अध्यक्ष अशोक कुमार भारती इस बारे में कहते हैं कि एससीएसटी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, इन्हें समाज से बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया था. इन के खिलाफ अन्याय का भाव अब भी समाज में बरकरार है, जबकि ओबीसी के बारे में ऐसा नहीं है. उन के पास भूमि है, साधन हैं. हालांकि, शिक्षा के मामले में वे भी वंचित हैं.’’

‘‘तो तुम यह मानती हो कि यह सरकार की साजिश है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘एक तरह से कह सकते हैं. जनरल कैटेगरी में जज का बच्चा जज बन सकता है, डाक्टर का बच्चा डाक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बन सकता है, पर वंचितों में क्रीमी लेयर की फांस लगा कर उन्हें ऐसा करने से रोक दो कि आप की एक पीढ़ी ने आरक्षण का फायदा ले लिया है, अब अगली पीढ़ी को अपने दम पर यह मुकाम हासिल करना होगा.

‘‘यहां पर एक सामाजिक पहलू भी है. जिस एससीएसटी और ओबीसी के बच्चे अपने मांबाप की बड़ी सरकारी नौकरी की वजह से अब पढ़ाईलिखाई में बेहतर रिजल्ट दे रहे हैं, यह उन्हें मानसिक रूप से दबाने की भी कोशिश है.

‘‘लेकिन टीना डाबी जैसे होनहार जनरल कैटेगरी को टक्कर दे रहे हैं. वे आईएएस टौपर तो थीं ही, उन्हें कथिततौर पर 12वीं जमात के बोर्ड इम्तिहान में 93 फीसदी अंक मिले थे, जिस में राजनीति विज्ञान और इतिहास दोनों में 100 अंक शामिल हैं. सोशल मीडिया पर उन की मार्कशीट वायरल हुई थी,’’ अनामिका बोली.

‘‘मान ली तुम्हारी बात, पर सोशल मीडिया पर कही बात जरूरी नहीं कि सही हो,’’ विजय ने शक जाहिर किया.

‘‘उत्तर प्रदेश में सर्वोदय विद्यालय, मिर्जापुर की 25 छात्राओं में से 12 ने इस साल देश की सब से मुश्किल मैडिकल प्रवेश परीक्षा यानी नीट पास की थी. ये सभी छात्राएं एससी, एसटी और ओबीसी परिवारों से आती हैं.

‘‘तो हम यह नहीं कह सकते हैं कि इन तबकों के बच्चे होनहार नहीं हैं. वे अब पढ़ाईलिखाई की कीमत समझ रहे हैं. अगर उन्हें सही सीख मिले तो वे खुद को साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं,’’ अनामिका बोले जा रही थी.

‘‘ठीक है, ठीक है, पहले तुम पानी पी लो. मान ली तुम्हारी बात. सरकार को एकदम से कोई कड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी बात रखी है और उस पर बहस की जा सकती है.

‘‘देश में अभी जाति के नाम की समानता बनाने में समय लगेगा. यह कोई ऐसा फैसला नहीं है कि आज लागू हुआ और कल से देश में बदलाव की बयार बहने लगेगी. यहां बात किसी वंचित समुदाय के मालीतौर पर मजबूत होने की नहीं है, बल्कि उन्हें साथ खड़ा रहने की हिम्मत भी देनी होगी.

‘‘जिन बच्चों के मांबाप ने आरक्षण से खुद को ऊंचा उठाया है, उन बच्चों में थोड़ा आत्मविश्वास आया है, पर अभी दूर तक जाना है और सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले हर पहलू पर गौर करना होगा,’’

विजय ने अनामिका की बात को बैलेंस देते हुए कहा.

‘‘यही आज की जरूरत है. राजनीति और जातिवाद दोनों अलगअलग बातें हैं. अगर कोई सरकार ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने की पहल करती है, तो उसे वाकई सब को साथ ले कर चलना होगा, तभी देश में तरक्की दिखाई देगी,’’ अनामिका ने अपनी बात खत्म की.

इस के बाद विजय ने लंच का बिल दिया और वे दोनों उस रैस्टोरैंट से बाहर निकल गए. अभी मेला देखना जो बाकी था. Hindi News Story

Hindi Funny Story: गर्व से कहो हम भ्रष्ट हैं

Hindi Funny Story, लेखक – जे. शर्मा

बस कंडक्टर की रोचक बातों ने मेरा दिल जीत लिया था. मैं जब भी अपना 500 रुपए का कड़क नोट उस की तरफ बढ़ाता, वह बारबार मेरी अनदेखी करते हुए आगे निकल जाता और दूसरी सवारियों की टिकटें काटने लगता.

मेरा माथा ठनका कि आज कुछ न कुछ गलत हो कर रहेगा. यह 500 का नोट कई बार बहुत बड़ी मुसीबत में डाल देता है.

खैर, सब की टिकटें काटने के बाद वह बस कंडक्टर मुसकराता हुआ मेरे पास आ कर बैठते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, मैं ने आप को पहले भी इस रूट पर देखा है. आप फूड सप्लाई महकमे में काम करते हैं न?’’

मैं ने सोचा कि शायद इस गलतफहमी में मैं टिकट लेने से बच जाऊंगा. लिहाजा, मैं ने हामी भर दी.

कंडक्टर ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘बाबूजी, हमारे चाचा के साले का लड़का भी आप के महकमे में है.

संपत दलाल… नाम सुना होगा आप ने… बहुत ऊंची पोस्ट पर है. राजधानी में एक बड़ी सी कोठी है उस की.

‘‘वैसे, एक बात है बाबूजी कि आप के महकमे में पैसा बहुत है. राइस मिल या फ्लोर मिल वालों को जरा सा इशारा कर दो, बोरी भर कर नोट आप के आंगन में फेंक जाएंगे. आप रातभर बैठे गिनते रहो, सुबह हो जाएगी…’’

वह थोड़ी सांस ले कर आगे बोला, ‘‘मेरा तो यही मानना है कि मुझे अगले जनम में फूड सप्लाई की नौकरी मिले, चाहे चपरासी ही क्यों न बनना पड़े…

‘‘और एक बात सुनो… हमारे पड़ोस में मोहनलाल की कोठी है. वह कस्टम महकमे में चपरासी है. क्या शान है उस की. गाड़ी है, घर में एयरकंडीशनर लगा है. वह हर समय मोबाइल फोन पर बातें करता रहता है और उस के घर के लोग काजूकिशमिश ऐसे चबाते हैं, जैसे मूंगफली के दाने चबा रहे हों. यह सब देख कर मेरे मन में लड्डू फूटने लगते हैं…’’

लेकिन कुछ देर बाद वह थोड़े उदास लहजे में बोला, ‘‘और एक हम सरकारी बसों के कंडक्टर हैं कि सारी उम्र रुपए 10 रुपए का टांका लगालगा कर ही बूढ़े हो जाते हैं. पता नहीं, हमारा अच्छा समय कब आएगा.

‘‘मैं ने 2 लाख रुपए की रिश्वत दे कर अपने छोटे बेटे को म्यूनिसिपल के दफ्तर में चपरासी लगवा दिया है, लेकिन वह ससुरा तो मुफ्त में लोगों के काम करवाता फिरता है. मैं उस से कहता हूं कि 2 लाख रुपए जमा करने में मेरी कमर टेढ़ी हो गई है, वे तो वसूल कर के ला.

‘‘मैं ने भी उसे बोल दिया है कि बेटा, जल्दी ही तेरी शादी कर के तुझे अलग कर दूंगा. जब तेरे बच्चे होंगे और खर्च बढ़ेगा, तब तू खुद ही हाथपैर मारेगा. सारे उसूल धरे के धरे रह जाएंगे.

‘‘अच्छा बाबूजी, आप से हुई बातें बहुत मजे की रहीं. रास्ता कट गया. आप वह 500 रुपए का नोट दिखा रहे थे न… लाओ, मैं आप का टिकट बना देता हूं.

‘‘आजकल टिकट चैकर भी बहुत दुखी करते हैं. महीना तो बंधा है, मगर फिर भी उन की नीयत खराब रहती है. सोचते हैं कि पता नहीं कंडक्टर कितनी लूट मचाते हैं.’’

मीठीमीठी बातें करता हुआ वह कंडक्टर 35 रुपए अपनी जेब में रख लेता है और टिकट नहीं बनाता.

बाकी रुपए वापस करते हुए वह कहता है कि आप जहां कहोगे, हम वहीं उतार देंगे.

मैं भी सोचता हूं कि चलो इसी बहाने मेरे ईरिकशा के 20 रुपए बच जाएंगे. Hindi Funny Story

Best Family Story: फर्ज

Best Family Story: उस ने बाइक एक ओर खड़ी की और सामने महाराज के होटल पर जा कर कोने में पड़ी बैंच पर बैठ गया. सुनील ने उस से नमस्ते की, लेकिन वह खामोश ही रहा.

‘‘सब अपने बाप का नौकर ही समझते हैं,’’ थोड़ी देर के बाद वह बड़बड़ाया. अनायास ही उस का स्वर कुछ तेज हो गया था.

‘‘क्या हुआ दीवानजी, क्या किसी से झगड़ा हो गया?’’ सुनील ने उस से पूछा.

‘‘झगड़ा क्या होगा. इस नए थाना प्रभारी की घरवाली तो ऐसा और्डर मारती है, जैसे मैं सिपाही नहीं इस के बाप का नौकर हूं.

‘‘अगर कुछ कहो तो बस… जिसे देखो वही हम जैसे छोटे लोगों पर ही रोब दिखाता है,’’ अंदर घुमड़ रहा गुस्सा अनायास ही उस के शब्दों को गंदा कर रहा था.

‘‘आज काफी गुस्से में लग रहे हैं दीवान चाचा,’’ उस ने देखा कि मुकेश उस की बैंच पर आ कर बैठ गया था वहीं और उस से पूछ रहा था.

मुकेश उसे ‘चाचा’ ही कहता है. मुकेश वैसे तो फलों का ठेला लगाता है, लेकिन असलियत में पहले वह एक चोर था, जो अकसर छोटीमोटी चोरियां किया करता था. उस पर चोरी के 1-2 मुकदमे भी दर्ज थे. लेकिन जब से उस ने मुकेश को समझाया था, तब से मुकेश चोरी का धंधा छोड़ कर फलों का ठेला लगाने लगा था.

मुकेश की एक बहन रजनी उसे ‘बाबूजी’ कहती है. वह अकसर गश्त करतेकरते मुकेश के घर चला जाता. मुकेश की बहन अकसर कह देती कि उन के होने से उन्हें लगता ही नहीं है कि वे लोग अनाथ हैं. उसे भी न जाने क्यों उन दोनों से लगाव सा हो गया था.

वह शहर के बहुत से लोगों को जानता है, जो कोतवाली में खर्चापानी देते रहते हैं. वैसे गैरकानूनी काम करने वाले सभी पुलिस को हफ्ता देते हैं.

उसे भी कई लोगों ने खर्चा देना चाहा, लेकिन उस ने साफतौर पर लेने से मना कर दिया. पहले चोरउचक्के, गिरहकट उस के नाम से कांपते थे, लेकिन इस के बावजूद उस ने कभी वरदी का रोब डाल कर कुछ ऐंठने की कोशिश नहीं की, बल्कि वह ऐसे लोगों को गिरफ्तार करता, लेकिन साहब लोगों की मेहरबानी से वे शाम तक ही बाहर आ जाते.

और तो और उस को जम कर फटकार भी लगाई गई कि उस ने उन को गिरफ्तार ही क्यों किया. तब से उस ने फर्ज को भूल कर ऐसी भूल दोबारा नहीं की. वह जानता था कि सोने का अंडा देने वाली मुरगी को कौन हलाल करना चाहेगा.

तभी सचिन उस के आगे 2 कप चाय और प्लेट में नमकीन रख गया. वह समझ गया कि अंदर आते समय मुकेश ने चाय के लिए बोल दिया होगा.

पहले तो उस का मन नहीं हुआ कि वह चाय पिए. अभी वह एक पैग लगा आया था. नाइट ड्यूटी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी वरना वह अकसर रात में दारू पीता है, लेकिन फिर भी वह बिना कुछ बोले चाय का गिलास उठा कर चाय पीने लगा, जिस से उसे कुछ राहत महसूस हुई.

‘‘क्या हुआ दीवान चाचा, आज काफी गुस्से में लग रहे हैं?’’ मुकेश ने दोबारा उस से पूछा.

‘‘रिटायरमैंट के 2 साल रह गए हैं. सोचता हूं कि सुकून से कट जाएं, लेकिन ये सब… सुबह विवेक साहब की बीवी ने कुछ सामान लाने को कहा था और दारोगा ने एक आदमी को लाने के लिए भेज दिया था, जिस से सामान ला कर देने में कुछ देर हो गई, बस वह बिगड़ पड़ी जैसे मैं सिपाही नहीं, बल्कि उस का घरेलू नौकर हूं,’’ वह बोला.

‘‘आजकल संजय सिपाही तो बहुत लूट रहा है,’’ मुकेश बोला.

‘‘आजकल लूट कौन नहीं रहा है. मैं तो समझता था कि नए लड़केडिपार्टमैंट के मुंह पर लगी कालिख को साफ कर कुछ नया करेंगे, लेकिन ये तो और ज्यादा खाऊ निकले.

‘‘पहले तो कभीकभी कोई फंस जाता था, उसे ही हलाल किया जाता था, लेकिन ये नए लड़के तो शिकार की तलाश में ही घूमते रहते हैं,’’ वह गहरी सांस लेते हुए बोला.

चाय का गिलास खाली हो गया था. उस ने गिलास मेज पर रख दिया. तभी बाहर कुछ शोर सुनाई दिया.

शोर सुन कर उस का ध्यान होटल से बाहर गया. उस ने देखा कि सामने 2 लड़कों में किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था, जो गालीगलौज के बाद हाथापाई पर उतर आये थे, जिस से वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी.

तभी वहां बाइक से सिपाही सुधीर और संजय आ गए. वह सम?ा गया कि किसी ने उन को फोन कर दिया है. बाइक से उतरते ही वे उन दोनों लड़कों को डांटडपट कर बाइक पर बिठा कर चौकी की ओर ले गए.

यह देख कर वह समझ गया कि अब दोनों से अच्छीखासी रकम वसूल कर सुलह करवा दी जाएगी.

‘‘दीवान चाचा, आज तो दोनों की मोटी कमाई हो जाएगी. दोनों पार्टी मोटी हैं,’’ मुसकराते हुए मुकेश ने उस से कहा.

मुकेश की बात सुन कर वह कुछ नहीं बोला.

आज इतने साल ड्यूटी के बीत गए थे, लेकिन उस ने वरदी पर रिश्वत जैसा दाग लगने नहीं दिया था और न ही वह कभी अपने फर्ज से पीछे हटा, जिस का उसे इनाम भी मिला था.

एसपी साहब ने उस की बेहतर कार्यशैली के चलते उसे स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सिपाही से दीवान बना दिया था, जिस से उस को लगा था कि चलो ईमानदारी से ड्यूटी करने का उसे कुछ तो फायदा मिला.

लेकिन यह खुशी भी उस के लिए कुछ दिन की ही थी.

उस दिन वह नाइट ड्यूटी कर के घर लौट रहा था, तभी रास्ते में उस ने अनुज को देखा जो नशीले पदार्थों की तस्करी किया करता था. वह काफी दिनों से उस की रडार पर था.

आज उस ने स्मैक बेचते रंगे हाथ अनुज को गिरफ्तार कर लिया. इस दौरान 2-4 हाथ भी उस ने उसे मार दिए और उसे थाने ले आया. उस ने यह भी नहीं सोचा कि वह साहब का खास आदमी है और फिर विवेक साहब ने उस को मिली पट्टियां उतरवा दीं और वह फिर दीवान से सिपाही बन गया था.

‘‘आराम नहीं है आप की नौकरी में,’’ मुकेश बोला.

‘‘आराम और वह भी इस नौकरी में… सत्तर खसम होते हैं इस नौकरी में, एसपी साहब आए या फिर आईजी डीआईजी सब की बस जेबें गरम होनी चाहिए… कहीं से ला कर दो इन को, पर इन का पेट पहले भरो, फिर कहा जाता है कि ईमानदारी से नौकरी करो, ड्यूटी पर फर्ज निभाओ…

‘‘कर तो रहा हूं ईमानदारी से… आधी तनख्वाह तो साहब लोगों को मुरगाबकरा खिलाने में चली जाती है और आधी से घर चलाओ.

‘‘2 बार सिपाही से दीवान बना, लेकिन इस विवेक सिंह ने वह भी छीन लिया, लेकिन फिर भी दीवान भानु प्रताप ही रहूंगा… देखता हूं कौन रोकेगा मुझे,’’ वह कुछ तेज स्वर में बोला.

‘‘दीवान चाचा, आप ने लगाई हुई है शायद. आप को चढ़ गई है. ऐसा कीजिए कि आप अब घर चले जाइए. मैं भी अपने ठेले पर जाता हूं. कहीं किसी ने आप की वीडियो वगैरह बना ली तो…’’ मुकेश घबरा कर इधरउधर देखते हुए बोला और तुरंत उठ कर होटल से बाहर चला गया.

उसे भी अपनी गलती का एहसास हो गया. वह भी जानता है कि आजकल वैसे भी लोग पुलिस को अपना दुश्मन ही समझते हैं.

पता नहीं कौन मौके का फायदा उठा ले और उस की इस तरह की बेवजह की बातें मोबाइल में रिकौर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दे और वह सफाई देता घूमता रहे.

आज कितने बरस हो गए पुलिस की नौकरी करते हुए, लेकिन आज भी हालात उस के जस के तस हैं. जितनी तनख्वाह मिलती है, उस से वह ढंग से परिवार भी नहीं चल पाता.

2 बेटियां हैं. एक की तो जैसेतैसे कर्ज ले कर शादी कर दी, लेकिन दूसरी कुंआरी घर में बैठी है. अभी तक उस के हाथ पीले नहीं कर पाया.

एक बेटा है वह भी ग्रेजुएशन करने के बाद बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो गया है. लड़की की शादी के बाद उस पर कर्ज भी काफी हो गया है. सभी सम?ाते हैं कि पुलिस में है, तो उस के पास बहुतकुछ होगा, लेकिन लोग यह नहीं समझते कि उस जैसे सिपाही कमाई नहीं कर पाते और हराम का पैसा लेना उस की फितरत में नहीं.

वैसे भी सभी को पता है कि हराम का पैसा जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है. कभीकभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि कुछ खानेपीने की इच्छा होती है, लेकिन मन मारना पड़ जाता है.

‘‘अरे भानु, तुम यहां बैठे हो और मैं तुम्हें कब से ढूंढ़ रहा हूं. तुम्हारा नंबर भी बंद बता रहा है,’’ तभी उस की तंद्रा भंग हुई. उस ने देखा कि सामने दीपक खड़ा हुआ था. वही उस से पूछ रहा था.

‘‘कहीं नहीं, नाइट ड्यूटी है बस इसीलिए चाय पीने चला आया था. शायद मोबाइल चार्ज नहीं किया था, इसीलिए स्विचऔफ हो गया होगा,’’ उस ने दीपक से कहा.

दीपक भी सिपाही की पोस्ट पर था, लेकिन उस का रहनसहन किसी अफसर से कम नहीं था. दीपक अलग से कमाता भी खूब था और साहब लोगों पर खर्च भी करता था, इसलिए साहब लोग उस से खुश भी रहते थे.

दीपक ने कई बार उसे समझाया था कि अलग से कुछ कमा लिया करो. कम से कम तनख्वाह तो बच जाएगी और घरपरिवार तो सही से चला सकोगे.

दीपक ने उसे कमाने के मौके भी दिए. एक बार वह दीपक के साथ चौकी पर बैठा हुआ था, तभी जमीनी विवाद का मामला आ गया.

दीपक ने 25,000 रुपए में मामला सैट कर दिया. उस ने मामले को निबटाने के लिए कहा और खुद एक बड़े मामले को निबटाने चला गया.

उस ने विवाद को बहुत ही सूझबूझ से निबटा दिया, लेकिन वह रुपए लेने की हिम्मत न कर सका. जब यह बात दीपक को पता चली, तो उस ने उसे बहुत सुना दिया था.

वह भी क्या करे, उस का जमीर यह कभी गवारा नहीं कर पाया कि वह किसी से हराम का पैसा ले.

‘‘कहां खो गए जनाब…’’ तभी एक बार फिर दीपक ने उस से कहा.

‘‘बस, ऐसे ही. और बताओ कैसे आना हुआ?’’ यादों के भंवर से वापस आ कर उस ने दीपक से पूछा.

‘‘मैं यह कह रहा था कि भतीजे को पुलिस में भरती क्यों नहीं करवा देते… फार्म वगैरह भरवा दो, भरती निकली है. मैं ने ऊपर साहब लोगों से 2 लाख में बात भी तय कर ली है. बस, यही तुम को बताना था,’’ दीपक ने उसे धीरे से बताया.

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ उस ने दीपक से कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं. ड्यूटी का टाइम है,’’ दीपक बोला और वहां से चला गया. वह भी उठ कर होटल से बाहर आ गया और कमरे की ओर चल दिया. सामने से निकल रहे आटोरिकशा को रोक कर उस में बैठ गया.

उसे पता बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि वह अकसर आटोरिकशा या फिर रिकशा से ही आताजाता है.

पता नहीं क्यों आज उसे एहसास हो रहा था कि अगर उस ने भी और लोगों की तरह रिश्वत ली होती तो वह
अपनी जिंदगी ऐशोआराम से जीता. वह जानता है कि उस ने जिंदगी जी नहीं बल्कि ढोई है.

ग्रेजुएशन पूरी होने के बाद रोहन ने नौकरी के लिए बहुत हाथपैर मारे, इंटरव्यू भी दिए, लेकिन बिना रिश्वत के वह नौकरी न पा सका.

उस की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह लाख 2 लाख का इंतजाम कर सके. छोटीमोटी नौकरी वह करना नहीं चाहता, जिस के चलते रोहन आवारागर्दी करने लगा और उस के नाम पर लोगों से वसूली करने लगा, जिस की वजह भी वह खुद को समझता है.

अब तो उसे घर से मतलब ही नहीं रह गया था. उसे फिक्र थी कि रिटायरमैंट करीब है और उस के बाद मामूली सी पैंशन मिलनी है, तब कैसे गुजारा हो पाएगा.

‘‘साहब, आप का घर आ गया,’’ तभी आटोरिकशा वाले की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर धरातल पर आ गया.

उस ने 10 रुपए निकाल कर आटो रिकशा वाले को दे दिए. वह जानता है कि अगर वह रुपए नहीं देगा तो भी वह रुपए नहीं मांगेगा, लेकिन वह कभी किसी गरीब का हक नहीं मारता.

कमरे पर पहुंच कर उस ने मोबाइल निकाल कर चार्जिंग पर लगा दिया और उस का स्विच औन कर दिया. फिर वह सामने रखी कुरसी पर बैठ गया. उस ने अपनी आंखें बद कर लीं.

तभी किसी ने दरवाजे को खटखटाया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने होमगार्ड विनोद था.

‘‘साहब ने आप को तुंरत बुलाया है. आप का मोबाइल बंद था, इसलिए साहब ने आप को लेने के लिए भेजा है,’’ विनोद ने उस से कहा.

किसी अनहोनी के डर से उस का दिल घबराने लगा. वह सम?ा गया कि मैडम ने ही साहब को बताया होगा.

सुबह उस ने मैडम से गुस्से में आ कर कह दिया था, ‘‘मेमसाहब, आप अपना सामान किसी और से मंगा लिया करें, मैं आप का कोई नौकर नहीं हूं.’’

वह जानता है कि विवेक साहब उसे किसी लफड़े में डाल कर लाइन हाजिर भी करवा सकते हैं. वह पछता रहा था कि बेकार में ही वह ताव खा गया. इतने साल कट गए थे, ये 2 साल भी काट लेता. घर के हालात, कुंआरी बेटी का बोझ और बेरोजगार बेटा सब उसे भयानक सपने की तरह डराने लगे थे. उस का दिल अनायास ही धड़कने लगा था.

वह कोतवाली पहुंचा. सामने ही विवेक साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. उन्हें देख कर उस के माथे पर पसीना आ गया था. वह सोच रहा था कि वह साहब और मेमसाहब से माफी मांग लेगा कि गलती हो गई, ज्यादा होगा तो पैरों पर गिड़गिड़ा कर माफी मांग लेगा. कम से कम नौकरी तो बच जाएगी. अनायास ही वह सोच गया.

आज उसे ऐसा लग रहा था कि वह बेवजह ही दावा करता था कि अपराधी उस से डरते हैं, जबकि आज उस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह गलत का विरोध कर सके.

‘‘जय हिंद सर,’’ उस ने साहब को देख कर एक जोरदार सैल्यूट किया.

‘‘क्यों भानु प्रताप, आजकल यह मुकेश कुछ नहीं दे रहा है?’’ उसे देख कर विवेक साहब बोले.

वह समझ गया कि यह सारा मामला पैसों का है.

‘‘साहब, वह मुकेश अब फलों का ठेला लगा रहा है. उस ने चोरी करनी छोड़ दी है,’’ उस ने बताया.

‘‘यह नौटंकी तो ये सब करते हैं.’’

‘‘नहीं सर, मुकेश ने सचममुच गलत धंधा छोड़ दिया है.’’

‘‘इसीलिए इस को 5 लाख रुपयों की लूट में धर दिया. कल सुबह खुलासा करना है. 2 को पकड़ लिया है, एक फरार है. अब इस को भी उठवाया है.

‘‘एक घंटे में मुठभेड़ भी दिखानी है और तुम भी साथ में रहोगे,’’ विवेक साहब उसे घूरते हुए बोले.

‘‘लेकिन सर…’’ वह बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि आजकल तुम्हारी तुम्हारी मुकेश से कुछ ज्यादा ही छन रही है. क्यों रिटायरमैंट पर अपनी फजीहत कराने पर तुले हुए हो…’’ साहब कुछ तीखे स्वर में बोले.

डकैती और मुठभेड़ का नाम सुन कर वह समझ गया कि मुकेश के साथ नाइंसाफी हो रही है. न वह उस से चोरी छुड़वाता और न वह उस से इतना लगाव रखता, तो शायद आज मुकेश को यह दिन नहीं देखने पड़ते. वह भी क्या करे, ड्यूटी तो करनी ही थी.

‘‘जय हिंद साहब,’’ तभी किसी की आवाज पर वह चौंक गया. सामने सुधीर खड़ा था, जो साहब को ‘नमस्ते’ कह कर बता रहा था.

बाहर आ कर उस ने देखा कि मुकेश के हाथों में हथकड़ी थी और उसे जेल में बंद कर दिया गया था. अंदर 2 लोग और थे जो असलियत में लुटेरे थे.

कुछ ही देर में तीनों को गाड़ी में बिठा दिया गया. साहब आगे गाड़ी में बैठ गए और वह भी 3 सिपाहियों के साथ गाड़ी में बैठ गया.

मुकेश उसे देख रहा था, लेकिन उस की मुकेश से नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

कुछ समय बाद गाड़ी रुकी. उस ने देखा कि वे लोग जंगल के किनारे आ गए थे. विवेक साहब ने मुकेश को गाड़ी से बाहर निकलवाया और एक पिस्टल उसे पकड़ा दी.

मुकेश बुरी तरह से डर कर कांप रहा था. वह डर कर भागा. साहब ने उसे इशारा किया और उस ने मुकेश के पैर पर निशाना साध कर फायर कर दिया.

एक धमाका हुआ और मुकेश वहीं गिर गया और वह भी ‘धम’ से वहीं बैठ गया. Best Family Story

Best Hindi Story: लालच

Best Hindi Story: रामपुर की फिजाओं में सरसों की बसंती महक घुली हुई थी. खेतों का पीला आवरण मानो धरती का सिंगार कर रहा था. गांव की चौपाल पर ठहाकों और बहसों का दौर हमेशा की तरह जारी था.

लेकिन इन सब के बीच पारुल एक अलग ही दुनिया में जी रही थी. रूप ऐसा कि जैसे कुदरत ने फुरसत में तराशा हो. गोरा रंग, अल्हड़ स्वभाव और आंखों में सुनहरे भविष्य की चमक. वह सपने बुनती थी कि एक छोटा सा घर हो, जीवनसाथी का अटूट साथ हो और खुशियों से भरी गृहस्थी हो.

जब पारुल की शादी विनोद से हुई, तब वह बहुत खुश थी. लाल जोड़े में लिपटी, हीरे सी दमकती पारुल उस दिन किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. विनोद का प्यार और उपहारों की बौछार ने पारुल को यह विश्वास दिला दिया कि बस यही असली जिंदगी है.

लेकिन, समय ने करवट ली और सुनहरे सपने कालिख में बदलने लगे. विनोद के बरताव में आया बदलाव धीमे जहर की तरह था. शराब का नशा, देर रात की वापसी, और फिर वह भयावह दौर जहां प्यार की जगह गालियों ने और इज्जत की जगह मारपीट ने ले ली.

पारुल का कोमल मन अब कांच की तरह दरक चुका था. उस की वह कुदरती मुसकान, जो कभी गांव की पहचान थी, अब दहशत में बदल गई थी.

फिर आई वह काली रात, जिस ने सबकुछ बदल दिया. पतिपत्नी के बीच हुआ झगड़ा. सुबह एक सन्नाटे में तबदील हो गया. ड्राइंगरूम के बीचोंबीच विनोद की लाश पड़ी थी. छाती में गोली थी और पास पड़ी पिस्तौल पर पारुल की उंगलियों के निशान थे. उस ने अपना जुर्म कबूल तो किया, लेकिन उस की पथराई आंखों में कैद ‘क्यों’ का जवाब कोई पढ़ नहीं सका.

अदालत, जमानत और गांव वालों की कानाफूसियों के बीच पारुल एक जीतीजागती लाश बन चुकी थी. इसी अंधकार में एक जुगनू की तरह आया करण. वह अदालत जाने वाली उस की कार का ड्राइवर था. सादगी की मूरत करण ने बिना किसी सवाल के पारुल को वह सहारा दिया, जिस की उसे सख्त दरकार थी.

पारुल को लगा कि जिंदगी उसे दूसरा मौका दे रही है. दोनों ने शादी कर ली. लेकिन शायद पारुल की किस्मत में सुख का यह अध्याय भी लिखा ही नहीं था. एक सड़क हादसे में करण की मौत ने उसे फिर उसी अकेलेपन में धकेल दिया.

इस बार पारुल टूटी नहीं, बल्कि पत्थर जैसी कठोर हो गई. उस का दुख अब एक ठंडी आग बन चुका था. करण के बड़े भाई संदीप के साथ उस के संबंध हमदर्दी से शुरू हो कर एक अलग मोड़ पर पहुंच गए थे.

समाज ने थूथू की, लेकिन पारुल को अब समाज की परवाह नहीं रह गई थी. उस के दिमाग में अब केवल एक ही जुनून सवार था… हक. करण के हिस्से की वह 9 बीघा जमीन, जिसे वह अपना हक मानती थी.

सास सुशीला का यह कहना कि ‘जब बेटा ही नहीं रहा, तो बहू का हक कैसा?’ पारुल के भीतर दबे ज्वालामुखी को भड़काने के लिए काफी था. बेइज्जती का यह घूंट उस ने पी तो लिया, लेकिन उस के जेहन में एक खौफनाक साजिश ने जन्म ले लिया.

लालच और बदले की आग में पारुल ने अपनी बहन कविता और उस के प्रेमी अनिकेत को मोहरा बनाया. एक प्लान की हुई डकैती की आड़ में सास सुशीला की हत्या करवा दी गई.

शुरुआत में पुलिस भ्रमित रही, लेकिन अपराध कभी छिपता नहीं. पारुल का अचानक गायब होना ही उस के गले का फंदा बन गया. जब वह पकड़ी गई, तो उस का बयान किसी भी संवेदनशील इनसान को झकझोरने के लिए काफी था, ‘‘जो चीजें मांगने से नहीं मिलतीं, उन्हें छीनना पड़ता है.’’

अदालत का वह सीन रोंगटे खड़े करने वाला था. संदीप, जो अब अपने परिवार और अपनी प्रेमिका दोनों को खो चुका था, सिर झुकाए बैठा था. बूढ़े ससुर हरिराम की आंखों में निराशा थी.

पारुल ने आखिर तक दांवपेंच लड़ाए, खुद को बेकुसूर साबित करने की कोशिश की, पर अनिकेत के साथ हुई उस की एक फोन रिकौर्डिंग ने उस की सारी दलीलों को ढहा दिया. कानून ने भावनाओं को दरकिनार कर सुबूतों पर मुहर लगाई. पारुल को उम्रकैद की सजा मिली.

सालों बाद, काल कोठरी के अंधेरे से पारुल की एक चिट्ठी बाहर आई. संदीप के नाम लिखे उस खत में सिर्फ 4 लाइनें थीं, जिस ने उस की जिंदगी के पूरे सार को निचोड़ कर रख दिया :

‘‘काश, विनोद वाली गोली उस रात मुझे ही लगी होती, तो शायद आज कोई न मरता… न प्यार, न विश्वास और न ही इनसान.’’

संदीप ने वह चिट्ठी दीए की लौ के हवाले कर दी. कागज जल कर राख हो गया और हवा में बिखर गया.

ठीक वैसे ही जैसे पारुल के सपने उस 9 बीघा जमीन की धूल में मिल गए थे.

सूरज ढलते ही बूढ़े हरिराम की उस हवेली में ऐसी मनहूसियत उतर आती है कि कोई परिंदा भी अब पर नहीं मारता. लोग उस ‘शापित’ हवेली के साए से खौफ खाते हैं.

अब यही चर्चा है कि जिस 9 बीघा खेत के लिए पारुल ने हंसताखेलता परिवार को दांव पर लगा दिया था, आज वह बंजर पड़ी है. दौलत तो मिल गई, पर उसे भोगने वाला अब कोई नहीं बचा. वहां अब केवल सन्नाटा है. एक ऐसा सन्नाटा जो चीखचीख कर लालच के अंत की गवाही देता है. Best Hindi Story

Hindi Family Story: मकसद

Hindi Family Story, लेखिका – डा. के. रानी

वन संरक्षक के पद पर काम करते हुए अविनाश को 5 साल हो गए थे. नौकरी के दौरान उन का ज्यादातर समय बहुत अच्छा बीता था. उन की पत्नी रूही ने अपने परिवार की खातिर कभी जौब करने के बारे में सोचा ही नहीं. वे घर पर रह कर बच्चों को पूरा समय देतीं और विभागीय कार्यक्रम के साथ समाजसेवा में बढ़चढ़ कर भाग लेतीं.

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था. अविनाश की दोनों बेटियां नताशा और न्यासा पढ़ने में बहुत अच्छी थीं. नताशा अभी ग्रेजुएशन कर रही थी. पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद न्यासा का रु?ान सिविल सेवा की ओर था. वह उस के लिए तैयारी भी कर रही थी, लेकिन उस की मेहनत कामयाब नहीं हो पा रही थी.

रूही ने बेटियों को बहुत अच्छे संस्कार दिए थे. खुद भी वे संस्कारवान थीं, लेकिन अविनाश का स्वभाव थोड़ा उग्र था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन शांति की कमी थी.

रूही को अविनाश की ऊपरी कमाई से एतराज था. वे दबे स्वर में इस का कई बार विरोध भी कर चुकी थीं, लेकिन अविनाश कुछ सुनने को तैयार नहीं थे.

‘‘घर में ये जितने ठाटबाट हैं न, ये केवल तनख्वाह से नहीं आते. इस के लिए और कुछ भी करना पड़ता है,’’ अविनाश बोले.

‘‘हमारे पास सबकुछ अविनाश. हमें इस की जरूरत क्या है?’’ रूही बोलीं.

‘‘यह तुम नहीं समझोगी. अच्छा होगा कि तुम इस मामले में दखल न दिया करो और चैन की जिंदगी बसर करो. मौज करो और बेटियों को भी कुछ सिखाओ. हर समय घर के अंदर किताबों में घुसी रहती हैं. न कामयाबी हासिल कर पा रही हैं और न ही अपने लिए कोई अच्छा वर,’’ अविनाश गुस्से से बोले.

अविनाश को अपने पद का अभिमान था. अपने से छोटे कर्मचारियों को वे कुछ न समझते थे और सब के सामने कई बार उन की बेइज्जती भी कर देते थे.

औफिस में घुसते ही अविनाश सब से पहले औफिस असिस्टैंट रामदीन पर बरसते… रोज कोई न कोई नया बहाना ले कर. कभी तुम ने औफिस की सफाई ठीक से नहीं की तो कभी सामान ठीक से नहीं रखा. उन के हर काम का समय बंधा हुआ था. वे उसी के हिसाब से दूसरों से भी काम की उम्मीद रखते थे.

रामदीन को यहां काम करते हुए पूरे 30 बरस हो गए थे. 2 साल बाद उन्हें रिटायर होना था. वे बहुत मेहनती थे और दिल लगा कर काम करते थे.

पर अविनाश को तो जैसे औफिस के हर कर्मचारी से शिकायत थी. आज भी औफिस आते ही उन्होंने सब से पहले घंटी बजा कर रामदीन को बुलाया और कहा, ‘‘बड़े बाबू को बुला कर लाओ.’’

रामदीन ने बड़े बाबू को सूचना दी और अपने काम पर लग गए. बड़े बाबू जरा देर में उठ कर बौस के कमरे की ओर बढ़ गए. उन से कुछ पूछने की बजाय उन्होंने फिर घंटी बजाई और बोले, ‘‘क्या तुम ने बड़े बाबू को सही समय पर सूचना नहीं दी थी रामदीन?’’

‘‘दे दी थी साहब,’’ रामदीन ने कहा.

‘‘तो फिर वर इतनी देर से क्यों आए? तुम से अब नौकरी नहीं हो पाती तो काम छोड़ दो. बहुत सारे बेरोजगार हैं, जो यह काम करने के लिए तैयार हैं,’’ अविनाश चिल्लाए.

बात को आगे न बढ़ाते हुए रामदीन बोले, ‘‘गलती हो गई. माफ कर दीजिए.’’

लेकिन अविनाश का गुस्सा अभी उतरा नहीं था. वे इसी बात को ले कर बड़ी देर तक नसीहतें देते रहे.

बड़े बाबू सबकुछ सुन रहे थे, लेकिन उन की हिम्मत कुछ कहने की न हो सकी.

‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया था…’’ बड़े बाबू ने पूछा.

‘‘आप यहां से जाइए. इस समय मेरा मूड ठीक नहीं है,’’ कह कर अविनाश ने बड़े बाबू को वापस भेज दिया.

अविनाश को अपने सामने हर कोई बहुत तुच्छ नजर आता था. बड़ेछोटे के बीच की खाई उन्होंने कभी पाटनी नहीं चाही थी. रामदीन बौस की बात से बहुत आहत थे. सारा दिन वे अनमने ही रहे. घर आ कर भी वे उदास थे. वे सोच रहे थे, ‘अपना बेटा पलाश कुछ बन जाए, फिर आराम करूंगा. बहुत नौकरी कर ली है.’

रूही और अविनाश न्यासा के भविष्य को ले कर चिंतित थे. न्यासा मास्टर्स करने के बाद एक कोचिंग इंस्टिट्यूट से कोचिंग ले रही थी. उम्र बढ़ रही थी और अभी भी वह कंपीटिशन में कामयाबी हासिल नहीं कर सकी थी. अविनाश चाहते थे कि वह शादी कर ले.

अविनाश ने न्यासा को कई बार समझाया, ‘‘न्यासा, कंपीटिशन के साथसाथ और जगह भी ट्राई करती रहो. कभी किस्मत साथ दे जाती है और सबकुछ देखते ही देखते बदल जाता है.’’

‘‘पापा, आप भी कंपीटिशन से यहां पहुंचे हैं. मुझे भी छोटी नौकरी नहीं करनी. आप की तरह बड़ी नौकरी से काम की शुरुआत करनी है.’’

न्यासा की बात सुन कर अविनाश को अच्छा न लगा. वे जानते थे कि उन की बात पर न्यासा हमेशा तीखा जवाब देती है. उसे पापा का बरताव जरा भी अच्छा नहीं लगता था. पढ़ाई तो वह शादी के बाद भी जारी रख सकती थी.

अच्छी पोजीशन वाला लड़का देख कर अगर पहले उस की शादी कर दी जाए, तो ज्यादा ठीक रहता. अभी अविनाश बड़े पद पर थे. न्यासा के लिए रिश्ते भी बहुत आ रहे थे, लेकिन वह सब को मना कर रही थी.

अविनाश बोले, ‘‘रूही, तुम ही न्यासा को सम?ा दो. उस की उम्र बढ़ रही है. उसे कोई लड़का पसंद हो तो बता दे. उस की खुशी की खातिर हम सबकुछ करने को तैयार हैं. शादी भी समय की अच्छी होती है.’’

‘‘यह बात तुम मुझे नहीं न्यासा को कहो. वह पहले कुछ बन कर दिखाना चाहती है. शादी का क्या है, वह तो बाद में भी हो जाएगी,’’ रूही ने अपनी बात कही.

‘‘तुम्हारी इन बातों से उसे बढ़ावा मिल रहा है. आजकल शादी के बाद भी लड़कियां पढ़लिख कर बहुतकुछ बन रही हैं. वह बाद में भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकती है.’’

‘‘तुम उसे ले कर परेशान मत हो. जल्दी ही उसे कामयाबी मिलेगी और उस का घर भी बस जाएगा,’’ रूही ने कहा.

सबकुछ जानते हुए भी रूही ने न्यासा का ही पक्ष लिया. नौकरी पर रहते हुए बेटियों की शादी करने का मजा ही कुछ और था. पदप्रतिष्ठा के साथ अच्छे रिश्तों की कमी नहीं थी. न्यासा ने अपनी ओर से किसी लड़के में कभी उत्सुकता नहीं दिखाई थी. अभी उस का सारा ध्यान पढ़ाई पर था. इसी वजह से वह शादी को तवज्जुह नहीं दे रही थी.

अविनाश की नौकरी का एक साल बाकी रह गया था. इस दौरान अगर न्यासा को कहीं कामयाबी मिल जाती, तो वे तुरंत उस के हाथ पीले कर देते. पर न्यासा को इस बात की चिंता नहीं थी. वह जानती थी कि अच्छे पद पर कामयाबी हासिल करने के बाद उसे जीवनसाथी ढूंढ़ने में कोई परेशानी नहीं होगी. वह अपने लैवल का लड़का देख कर उससे शादी कर सकती है. उस की कई लड़कों से अच्छी दोस्ती थी, लेकिन शादी को ले कर वह अभी सीरियस नहीं थी. दोनों ही अपनी जगह पर सही थे.

पीढ़ी का अंतर साफ दिखाई दे रहा है. इसी वजह से सोच में भी फर्क आया था, लेकिन मम्मीपापा की चिंता अपनी जगह पर वाजिब थी.

न्यासा ने इस बार सिविल सर्विसेज के लिए बहुत तैयारी की थी. उसे उम्मीद थी कि उस का सिलैक्शन हो जाएगा. वह बड़ी बेसब्री से रिजल्ट का इंतजार कर रही थी, लेकिन इस बार भी उसे नाकामी का मुंह देखना पड़ा. रिजल्ट देख कर उसे बहुत तगड़ा झटका लगा था.

अविनाश के लिए भी यह बड़ी परेशानी वाली बात थी. वे बोले, ‘‘रूही, अब बहुत हो गया. कब तक कंपीटिशन के चक्कर में न्यासा अपनी जवानी इस तरह बरबाद करती रहेगी.’’

‘‘यह समय ऐसी बातों का नहीं है. तुम्हें उसे दिलासा देनी चाहिए. ऊपर से तुम उसे ताना मार रहे हो,’’ रूही ने कहा.

‘‘मैं उसे सुना नहीं रहा हूं. तुम्हारे सामने हकीकत बयां कर रहा हूं. कंपीटिशन की तैयारी जिंदगी का मजा लेते हुए भी की जा सकती है. इस बार तो उस ने घर से बाहर निकलना तक छोड़ दिया था. उस की सारी उम्मीद है इसी पर टिकी थी, लेकिन हासिल क्या हुआ?’’

‘‘कोई बात नहीं है. कभीकभी ऐसा हो जाता है. तुम्हें इस समय उसे हिम्मत बंधानी चाहिए,’’ रूही बोलीं.

‘‘अब मेरा भी सब्र टूटा जा रहा है. यह बात तुम नहीं समझोगी,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘तुम बड़ी पोस्ट पर हो. कोई अच्छा सा लड़का देख कर न्यासा की जिंदगी संवार दो,’’ रूही ने अपनी राय दी.

‘‘कोशिश करूंगा. इस ने तो आज तक कभी किसी लड़के का जिक्र तक नहीं किया. घर से बाहर निकले तब तो अपने लिए कोई जीवनसाथी ढूंढ़ेगी. पढ़ाई के पीछे उस ने अपने सारे सपने एक तरफ रख दिए. बस, एक ही धुन ले कर चल रही है,’’ अविनाश बोले तो रूही चुप हो गईं.

एक पिता होने के चलते अविनाश की चिंता वाजिब थी, लेकिन क्या करें? रूही न्यासा को ऐसे हालात में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकती थीं. न्यासा का भी एक सपना है. अगर वह कुछ बनना चाहती है तो मम्मीपापा का फर्ज बनता है कि उसे हर तरीके से सपोर्ट करें.

थके मन से अविनाश औफिस पहुंचे थे, लेकिन वहां पर खुशी का माहौल देख कर वे चौंक गए. उन से कुछ पूछते न बना. सब रामदीन को बधाई दे रहे थे. उन की खुशी देखते ही बनती थी. उन्हें समझ नहीं आया कि ऐसी क्या बात हो गई है, जो औफिस असिस्टैंट रामदीन औफिस का हीरो बना हुआ है. उन्होंने घंटी बजाई. रामदीन तुरंत हाजिर हो गए.

‘‘बड़े बाबू को बुलाओ,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘जी साहब,’’ कह कर रामदीन तुरंत कमरे से बाहर निकल गए. थोड़ी देर में बड़े बाबू अविनाश के सामने हाजिर थे.

तभी रामदीन मिठाई ले कर आ गए.

‘‘यह किस खुशी में है?’’ अविनाश ने पूछा.

‘‘सर, रामदीन का बेटा सिविल सर्विस में बहुत अच्छी पोजीशन ले कर कामयाब हो गया,’’ बड़े बाबू ने खुश हो कर कहा.

यह सुनते ही अविनाश का मुंह खुला का खुला रह गया. वे कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि एक औफिस असिस्टैंट का बेटा इतनी ऊंची जगह तक पहुंच सकता है.

उन्होंने मिठाई का एक टुकड़ा तोड़ा और ‘बधाई हो रामदीन’ कह कर अपनी बात खत्म कर दी. इस से आगे उन्होंने रामदीन से कुछ नहीं पूछा.

बड़े बाबू को काम समझा कर अविनाश ने उन्हें भी कमरे से विदा कर दिया था.

यह खबर अविनाश के लिए किसी धमाके से कम नहीं थी. आज तक उन्होंने रामदीन के बारे में कुछ भी जानना नहीं चाहा था. इस समय उन की दिलचस्पी रामदीन के बारे में जानने की थी, लेकिन कोई बताने वाला नहीं था. उन्हें समझ नहीं आ रहा था आखिर पूछें तो किस से?

अविनाश ने तुरंत आज का अखबार मंगवाया और उसे पलट कर देखने लगे. एक पेज पर रामदीन की परिवार के साथ तसवीर छपी थी. वे उसे ध्यान से देखने लगे. ‘कार्यालय सहायक का बेटा बनेगा डीएम’ हैडिंग देख कर वे एकसाथ सारी खबर पढ़ गए. तब जा कर उन्हें पता चला की रामदीन के परिवार में एक
बेटा और एक बेटी है. दोनों ही पढ़ने में होशियार हैं. उस के बेटे को दूसरी बार में यह कामयाबी हासिल हुई थी. हालांकि, वह रिजर्व्ड कैटेगरी का था लेकिन उस ने मैरिट में यह जगह अनरिजर्व्ड सूची में बनाई थी.

अविनाश का आज काम में मन नहीं लग रहा था. रहरह कर उन के सामने कभी रामदीन का तो कभी न्यासा का चेहरा घूम रहा था. उन्हें सम?ा नहीं आ रहा था कहां कमी रह गई जो छोटे पद पर काम करने वाले रिजर्व्ड कैटेगरी के रामदीन का बेटा पलाश इतनी बड़ी कामयाबी हासिल कर गया और सुविधाओं में पलीबढ़ी न्यासा चूक गई.

आज अविनाश औफिस से जल्दी घर चले आए थे. घर पर भी मायूसी छाई हुई थी. रूही चाय पीते हुए उन के सामने बैठी हुई थीं.

अविनाश बोले, ‘‘यही हाल रहा तो न्यासा डिप्रैशन में चली जाएगी. तुम उसे सम?ा कर शादी के लिए राजी कर लो. इस से उस की जिंदगी में खुशी लौट आएगी.’’

‘‘यह काम तुम भी तो कर सकते हो,’’ रूही बोलीं.

‘‘वह मेरी बात नहीं सुनती. हो सकता है तुम्हारी बात मान जाए. तुम्हें वह बहुत मानती है,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘कोशिश कर के देखती हूं. मैं भी उस की खुशी चाहती हूं. कामयाबी हासिल करने के लिए हम ने उसे साधन दिए बाकी काम तो उसे ही करना है,’’ रूही बोलीं.

‘‘वह पढ़ने में अच्छी है और उसे ले कर गंभीर भी है. फिर भी पता नहीं क्यों यह नौबत आ गई,’’ अविनाश बोले.

‘‘मैं उसे शादी के लिए मना भी लूं, लेकिन उस के लिए कोई काबिल लड़का भी तो चाहिए,’’ रूही ने कहा.

‘‘जहां तक वह खुद नहीं पहुंच सकी उस पोजीशन पर उस का जीवनसाथी होगा, तो शायद वह अपनी इस कसक को भूल जाए,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘तुम्हारे लिंक बहुत अच्छे हैं. कोशिश करोगे तो कोई अच्छा लड़का भी मिल जाएगा. अब हमें इस काम में देरी नहीं करनी चाहिए,’’ रूही बोलीं तो अविनाश चुप हो गए.

रात को डाइनिंग टेबल पर अविनाश की न्यासा से मुलाकात हो गई. वह अनमने मन से खाना खा रही थी. रूही उस की हालत को समझ रही थी. इस समय अविनाश कुछ कह कर उसे और दुखी कर सकते थे. रूही ने इशारे से उन्हें चुप रहने का संकेत किया.

अगले दिन औफिस में रामदीन का दमकता चेहरा देख कर अविनाश उन के सामने अपने को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे. कल तक जिस आदमी की हैसियत उन के सामने कुछ नहीं थी, आज वह औफिस में सब का हीरो बना हुआ था.

कुछ देर बाद रामदीन अविनाश के सामने हाजिर हो गए. अपनी आवाज में मिठास घोलते हुए अविनाश बोले, ‘‘रामदीन, मैं तुम्हारी बेटे की कामयाबी पर बहुत खुश हूं. मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं उसे अपने घर डिनर पर बुलाऊं. साथ बैठ कर खाना खाएंगे तो ढेर सारी बातें ही हो जाएंगी.’’

‘‘अभी तो वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में बिजी है साहब. मैं पूछ कर बताता हूं,’’ रामदीन हाथ जोड़ कर बोले, तो अविनाश के चेहरे पर तनाव दिखाई देने लगा.

रामदीन की इस हरकत पर उन्हें बड़ा गुस्सा आ रहा था. हिम्मत तो देखो अपने बौस को डिनर के लिए टाल रहा था.

रामदीन ने अभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया. घर आ कर वे अपनी पत्नी रूपमती से बोले, ‘‘साहब ने हम सब को डिनर पर बुलाया है बेटे की खुशी के लिए.’’

‘‘यह इज्जत तुम्हें नहीं, बल्कि बेटे की उस कामयाबी को मिल रही है, जो उस ने अपनी मेहनत से हासिल की है. इस बारे में उस से बात कर लेना. वही आपको ठीक से समझ सकेगा,’’ रूपमती बोली.

अविनाश भी दिनभर बेटी के भविष्य को ले कर मंथन कर रहे थे. उन्हें लगा कि न्यासा न सही रामदीन का बेटा आज उस पोजीशन पर पहुंच गया था, जिसे वह हासिल करना चाहती थी. अगर वह उसे शादी के लिए मना लें तो उस की जिंदगी संवर जाएगी.

तसवीर में देखने पर पलाश लंबाचौड़ा और खूबसूरत जवान लग रहा था. रामदीन के मुकाबले उस की पर्सनैलिटी बहुत अच्छी थी.

घर आ कर अविनाश ने यह बात रूही से कह दी, ‘‘जानती हो मेरा मेरे औफिस असिस्टैंट रामदीन का बेटा सिविल सर्विसेज में अच्छी पोजीशन लाया है.’’

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है,’’ रूही ने कहा.

‘‘मैं ने उसे घर पर डिनर का न्योता दिया है,’’ अविनाश बोले.

‘‘तुम यह आयोजन किसी होटल में भी कर सकते हो. अगर तुम्हें उस के बेटे की कामयाबी की इतनी खुशी हुई है तो,’’ रूही तमक कर बोलीं.

‘‘बात समझा करो. होटल और घर के माहौल में फर्क होता है. मैं चाहता हूं कि न्यासा उस से एक बार मिल ले,’’ अविनाश ने अपने मन की बात कही.

‘‘कहां तुम और कहां रामदीन? हमारे स्टेटस में कुछ तो मेल होना चाहिए.’’

‘‘ये सब बाद की बातें हैं रूही. एक बार न्यासा उसे पसंद कर ले, बस उस के बाद समझ लड़का हमारा हुआ. कौन सा हमें रामदीन को बारबार घर पर बुलाना है?’’ अविनाश बोले.

उन्होंने रूही से उस की जाति भी छिपा दी थी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह न्यासा का रिश्ता सिविल सर्विस पास करने वाले लड़के से हो जाए. इतने बड़े सरकारी अफसर की जाति कहां पूछी जाती है.
‘‘कब आ रहे हैं वे डिनर के लिए?’’ रूही ने पूछा.

‘‘अभी वह लड़का पलाश अपने दोस्तों के साथ जश्न मनाने में लगा हुआ है. तुम तो ऐसे लोगों को जानती ही हो. कई दिन तक उन के पैर धरती पर नहीं पड़ेंगे,’’ अविनाश बोले.

अविनाश को पूरी उम्मीद थी कि उन के कहने पर न्यासा रामदीन के बेटे पलाश से मिलने को तैयार हो जाएगी.

एक हफ्ता बीत गया था. रामदीन ने कोई जवाब नहीं दिया था. अविनाश का सब्र चूकने लगा था. वे बोले, ‘‘रामदीन, तुम ने घर पर बात की थी डिनर के लिए?’’

‘‘जी, कहा तो था, लेकिन बेटे को यह सब अच्छा नहीं लग रहा. कह रहा था कि सोच कर बताता हूं,’’ रामदीन बोले.

अविनाश को उस से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. कोई और समय होता तो वे उसे उस की औकात दिखा देते, लेकिन इस समय उन्होंने चुप रहना ही ठीक सम?ा. तेवर दिखा कर बात बिगड़ भी सकती थी.

पलाश को यह समझते देर नहीं लगी थी कि क्यों अचानक अविनाश सर का उस के पापा के प्रति इतना अच्छा बरताव हो गया था.

रामदीन के बारबार कहने पर वह बोला, ‘‘पापा, उन के घर डिनर करने से पहले मैं एक बार कल ही उन से औफिस में मिल लेता हूं. अगर मुझे ठीक लगेगा तो मैं उन के घर आप सब के साथ डिनर पर चला जाऊंगा, लेकिन यह बात उन्हें पहले मत बताइएगा.’’

इस दौरान पलाश ने अविनाश के बारे में सारी जानकारी जुटा ली थी. उन का चरित्र और मकसद सब उस की समझ में आ गया था. अगर वे इतने ही बड़े दिल के होते तो उन के घर आ कर भी बधाई दे सकते थे. रामदीन इन सब बातों से अनजान थे.

अगले दिन पलाश अपने पापा के साथ ही औफिस के लिए चल पड़ा. उसे अपने बीच देख कर औफिस के बाकी लोग बहुत खुश थे. ज्यादातर तो उस के घर जा कर पहले ही बधाई दे आए थे.

‘‘आज कैसे आना हुआ पलाश?’’ बड़े बाबू ने पूछा.

‘‘पापा की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी. उन्हें छोड़ने चला आया,’’ बात बदल कर पलाश बोला.

यह बात अविनाश तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने खुद ही तुरंत पलाश को अपने केबिन में बुला लिया.

हैंडसम पलाश को अविनाश अपलक देखते ही रह गए. पलाश ने आगे बढ़ कर उन के पैर छुए तो उन्होंने उसे ढेर सारे आशीर्वाद के साथ गले लगा लिया और बोले, ‘‘तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम्हारी इस कामयाबी पर मुझे कितनी खुशी हुई है.’’

‘‘यह मेरा सौभाग्य है सर.’’

‘‘कुछ दिन में तुम्हें ट्रेनिंग पर जाना होगा?’’

‘‘जी सर, अभी लैटर नहीं आया.’’

‘‘सिविल सर्विस का ठप्पा लगना अपनेआप में बहुत बड़ी बात होती है बेटा. लाखों अभ्यर्थियों में से लगभग हजार स्टूडैंट का ही सपना हर साल पूरा होता है.’’

‘‘आप इतने सीनियर औफिसर हैं. आप को इन सब बातों की पूरी जानकारी है. मेरा अनुभव आप के सामने कुछ भी नहीं है.’’

‘‘समय के साथ सबकुछ सीख जाओगे. मुझे पूरी उम्मीद है तुम एक बहुत काबिल अफसर बनोगे.’’

‘‘मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा सर.’’

‘‘मुझे सर मत कहो, अंकल कह सकते हो. मैं तुम्हारे पापा की ही उम्र का हूं और अगले साल रिटायर होने वाला हूं. मैं चाहता हूं तुम एक दिन मेरे परिवार के साथ डिनर करो, जिस से हमारा आपसी मेलजोल बढ़ सके.’’

‘‘अंकल, मेरे पापा आप के सामने बैठ कर खाना खाने की जुर्रत नहीं कर सकते. मैं नहीं चाहता कि वे हीनभावना से ग्रस्त हो जाएं.’’

‘‘तुम्हारी सोच बहुत अच्छी है. अगर रामदीन नहीं आ सकते तो तुम ही आ जाओ मेरे घर डिनर पर.’’

‘‘यह नहीं हो सकता. आप का और मेरा संबंध पापा की वजह से है. मैं उन्हें दरकिनार कर शौर्टकट नहीं अपना सकता. एक साल बाद जब आप रिटायर हो जाएंगे, तब आप के और पापा के बीच में औफिस का यह रिश्ता खत्म हो जाएगा. तब मैं खुशीखुशी आप के घर डिनर के लिए आ जाऊंगा. मुझे उम्मीद है आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे.’’

‘‘मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा जब तुम अपनी ओर से हमारे घर आने के लिए उत्सुकता दिखाओगे.’’
‘‘इस के लिए थोड़ा सब्र करना होगा. तब तक मेरी ट्रेनिंग भी खत्म हो जाएगी और मुझे अच्छी पोस्टिंग भी मिल जाएगी. इस दौरान मुझे अपने साथ के प्रशिक्षुओं से मिलनेजुलने का अवसर मिलेगा. मैं ने सोच लिया है कि मैं उन में से किसी को अपना जीवनसाथी चुन लूंगा. हम साथ ही आप के घर डिनर पर आएंगे अंकल. बस, मुझे थोड़ा समय दे दीजिए,’’ पलाश बड़ी बेबाकी से मुसकरा कर बोला.

अविनाश को पलाश से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. वे बोले, ‘‘तुम अपने जैसी पोजीशन वाली जीवनसाथी चुनने में उत्सुक हो?’’

‘‘जी अंकल, इस से विचारों का लैवल बराबर रहता है. वह भी अपने काम में बिजी रहेगी और मैं भी,’’

एक झटके में पलाश की बातों ने अविनाश की सारी उम्मीद पर पानी फेर दिया था.

कुछ देर और इधरउधर की बात कर पलाश वापस घर चला गया था. रामदीन के कुछ कहने से पहले ही पलाश बोला, ‘‘आप निश्चिंत रहें पापा. अब इस बात को वे कभी नहीं उठाएंगे.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘कुछ नहीं. मैं चाहता हूं पापा कि अब आप यह नौकरी छोड़ दें.’’

‘‘मैं ने सालों ईमानदारी से काम किया है और तुम्हारी कामयाबी में उस का भी बड़ा हाथ है. अब समय बचा ही कितना है? मैं अपना कार्यकाल पूरा कर इज्जत के साथ रिटायर होना चाहता हूं,’’ रामदीन बोले.

‘‘जैसी आप की मरजी,’’ कह कर पलाश ने बात खत्म कर दी.

अगले दिन सुबह पलाश ने रामदीन को कुछ समझाया और सावधान के रहने की चेतावनी भी दी. अविनाश का बरताव रामदीन के साथ वैसा नहीं रह गया था, जैसा वे कुछ दिनों से दिखाने की कोशिश कर रहे थे.

पलाश की बातों ने अविनाश को बहुत आहत किया था. उन्होंने सोच लिया था कि वे बापबेटे को अच्छा खासा सबक सिखा कर रहेंगे. जरा सी कामयाबी मिलते ही इन के पर निकल आए हैं.

हफ्तेभर बाद एक दिन अविनाश ने बड़े बाबू से एक फाइल मंगाई और बोले, ‘‘तुम जानते हो यह फाइल कितनी जरूरी है. कल इस पर फैसला होना है. तुम ने इसे पढ़ लिया न?’’

‘‘जी सर, पढ़ लिया.’’

‘‘इसे यहीं रख दो. मैं फिर पढ़ूंगा.’’

बड़े बाबू फाइल छोड़ कर चले गए. सारा दिन सामान्य बीता. अगली सुबह जब रामदीन औफिस पहुंचे तो वहां पुलिस खड़ी थी.

‘‘क्या हुआ?’’ रामदीन ने घबरा कर पूछा.

‘‘औफिस से एक जरूरी फाइल चोरी हो गई है. सर का शक तुम पर है. तुम्हीं उस कमरे में आतेजाते हो, बाकी तो कोई नहीं जाता,’’ औफिस का एक मुलाजिम रूपेश बोला.

‘‘मेरा फाइल से क्या लेनादेना?’’ रामदीन बोले.

‘‘यह तो साहब ही जानें. उन्होंने ही पुलिस बुलाई है. तुम से पूछताछ होगी.’’

पुलिस के नाम से रामदीन डर गए. उन्होंने तुरंत पलाश को फोन कर सारी बात बता दी.

पुलिस अभी रामदीन से पूछताछ कर ही रही थी की पलाश आ गया. उस ने अपना परिचय दिया, तो पुलिस वालों ने भी उसे सलाम ठोंक दिया.

‘‘पापा से पूछने से पहले मैं आप को कुछ दिखाना चाहता हूं,’’ पलाश बोला.

पलाश ने अपना लैपटौप खोला और कल की रिकौर्डिंग उन्हें दिखा दी. बड़े बाबू भी बड़े ध्यान से यह सब देख रहे थे. लैपटौप पर सामने दिखाई दे रहा था कि अविनाश ने वह फाइल आलमारी से निकाल कर अपने ब्रीफकेस में रखी और कमरे से बाहर चले गए. अविनाश को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उन की यह कोशिश नाकाम हो जाएगी.

‘‘थैंक यू मिस्टर पलाश,’’ पुलिस इंस्पैक्टर बोला.

‘‘हो सकता है गलती से फाइल घर चली गई हो. मुझे ध्यान नहीं रहा,’’ अविनाश अपनी खीज मिटाते हुए बोले.

‘‘लेकिन आप को यह रिकौर्डिंग कहां मिली?’’

‘‘यह बात मुझ से अच्छी तरह आप जानते होंगे इंस्पैक्टर,’’ कह कर पलाश हंस दिया.

रामदीन को संतोष था कि बेटे की वजह से आज उन की इज्जत रह गई थी. अब उन्हें समझ आ गया कि उस दिन क्यों पलाश ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए कहा था? उन्हें अविनाश का मकसद पहले ही दिखाई देने लगा था, तभी वे रोज उन्हें औफिस आते हुए एक डिबिया थमा देते थे.

रामदीन के सामने आज एक बार फिर अविनाश को मुंह की खानी पड़ी. उन का चरित्र सब के सामने उजागर हो गया था.

Story In Hindi: रास्ते का कांटा

Story In Hindi: विकास पांडेय यानी भैयाजी सत्ताधारी पार्टी का नेता था, इसलिए वह अकसर सफेद रंग का कुरतापाजामा ही पहनता था. वह लंबी कदकाठी और मजबूत शरीर का मालिक था. उस का रंग गोरा था और उस पर काला चश्मा बहुत फबता था.

35 साल का विकास पांडेय अपने लुक्स पर बहुत ध्यान देता था. उस के पास तमाम तरह के परफ्यूम्स का अच्छाखासा कलैक्शन था.

लखनऊ शहर से 400 किलोमीटर दूर नगलानगर नामक कसबे में विकास पांडेय की नेतागीरी खूब फलफूल रही थी और उस का वहां के लोगों पर अच्छाखासा रोबदाब भी था.

विकास पांडेय अपनी निजी जिंदगी में थोड़ा सा परेशान था, क्योंकि उस की शादी को 5 साल हो गए थे, पर उस की पत्नी रीमा उसे औलाद का सुख नहीं दे पाई थी और हर मर्द की तरह विकास पांडेय अपनी पत्नी को ही इस के लिए जिम्मेदार मानता था और अकसर रीमा को खरीखोटी सुनाता रहता था. कई बार तो उस ने रीमा के साथ मारपीट भी की थी.

‘‘तुम मेरी राह का वह कांटा बन चुकी हो जो सिर्फ चुभने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता,’’ विकास पांडेय रीमा को तमाम बुरे से बुरे ताने देता था. वैसे, विकास पांडेय ने रीमा को कई डाक्टरों को भी दिखाया था. डाक्टरों ने तमाम चैकअप और टैस्ट भी किए थे, पर रीमा की सभी रिपोर्ट्स नौर्मल निकली थीं. डाक्टरों ने कुछ हार्मोन बढ़ाने वाली दवाएं दीं और औलाद के लिए कोशिश करते रहने को कहा.

विकास पांडेय का एक 28 साल का कुंआरा भाई राहुल भी था, जिसे वह दिखावटी प्यार करता था.

सभी सफेदपोश नेताओं की तरह विकास पांडेय के साथ बहुत सारे चाटुकार लोग थे, जो किसी भी सभा से पहले मंच पर उस की जम कर तारीफ करते और अपने नेता के आने से पहले उस के लिए एक माहौल सा तैयार कर देते थे.

विकास पांडेय के इन चाटुकारों में फागुन नाम की एक कवयित्री भी थी, जिस की उम्र महज 25 साल थी. फागुन का शानदार फिगर और आवाज बहुत मनमोहक थी.

जब वह मंच पर अपनी मधुर आवाज में कविता पढ़ती, तो लोग वाहवाह कर उठते थे और जब वह विकास पांडेय की शान में कसीदे पढ़ती, तो भी लोग तालियां पीटने पर मजबूर हो जाते थे.

इन तालियों के बीच फागुन अपना भविष्य तलाश रही थी.उस के मन में यह विचार था कि विकास पांडेय अपनी नेतागीरी का इस्तेमाल कर के उसे कविता के बड़े मंचों तक पहुंचा देगा, पर विकास के मन में तो फागुन के लिए कुछ और ही योजना थी.

विकास पांडेय खूबसूरती का पारखी था और वह फागुन के रूप का रस चख लेना चाहता था. इस बात का इशारा उस ने फागुन को कई बार बातबात में किया भी था.

‘‘अब इस दुनिया में आगे बढ़ने के लिए हर किसी को कुछ न कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है फागुनजी,’’ एक दिन कुटिलता भरे अंदाज में विकास पांडेय ने कहा, तो फागुन हर एक शब्द का मतलब समझ गई थी.

वैसे भी विकास पांडेय दोनों हाथों से फागुन पर पैसा लुटाता था. वह उसे उस की जरूरत का हर सामान दिलाता था. फाइवस्टार होटलों में खाना खिलाने ले जाता था और हफ्ते के आखिर में अपने फार्महाउस पर भी फागुन को साथ में ले जाता था. फागुन भी विकास पांडेय की ऐशोआराम भरी जिंदगी और रुतबा देख कर दंग रह जाती थी.

फागुन विकास पांडेय के प्रति मन से तो समर्पण कर ही चुकी थी, पर उस दिन जब बारिश हो रही थी और विकास पांडेय और फागुन दोनों फार्महाउस पर थे, तब फागुन ने तन से भी समर्पण कर दिया और उस मस्त शाम में उन दोनों के बीच जिस्मानी संबंध बन गए थे.

उन दोनों के बीच की शर्म की दीवार गिर गई थी. उस दिन के बाद तो जब भी उन दोनों को मौका मिलता, तब वे जवानी का जीभर कर मजा लूटते थे.

फागुन के घर में उस के मांबाप नहीं थे, सिर्फ एक 20 साल का छोटा भाई था, जो फागुन से ज्यादा सवालजवाब नहीं करता था.

उस दिन जब फागुन और विकास पांडेय लखनऊ के ऐतिहासिक बेगम हजरत महल पार्क में होने वाली रैली के लिए जा रहे थे, तो फागुन ने अपने उभारों के तीखेपन को विकास के शरीर से टकराते हुए कहा, ‘‘अब तो लोग हमारे संबंध पर सवाल उठाने लगे हैं. मैं ज्यादा दिन आप के साथ नहीं रह सकती. मुझे अपना कोई दूसरा रास्ता अपनाना होगा और आप से दूर जाना होगा,’’ फागुन के स्वर में निराशा भरी हुई थी.

विकास पांडेय ने फागुन के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा, ‘‘तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. मुझे क्या करना है, यह मैं ने अच्छी तरह सोच लिया है.’’

इस के बाद विकास पांडेय ने फागुन को अपना पूरा प्लान बताया कि वह फागुन की शादी अपने छोटे भाई राहुल के साथ करा देगा, जिस से फागुन हमेशा के लिए विकास के पास रहेगी और वे दोनों जीभर कर बिना डरे मजे भी कर सकेंगे और दुनिया वाले उन के रिश्ते पर आवाज भी नहीं उठा पाएंगे.

फागुन यह प्लान सुन कर बिना मुसकराए न रह सकी.

‘‘पर फिर तो आप का छोटा भाई मेरे साथ रोज ही सुहागरात मनाएगा,’’

फागुन ने एक भद्दा सा इशारा करते हुए मजाकिया लहजे में कहा, तो विकास ने फागुन को निश्चिंत रहने को कहा और यह ताकीद की कि फागुन इस बात का ध्यान रखे कि राहुल किसी भी सूरत में उस के शरीर को हाथ भी न लगा पाए.

फागुन ने कुछ सोचते हुए अपनी सहमति दे दी.

विकास पांडेय ने राहुल से फागुन से शादी करने की बात कही और फागुन की तारीफ की, तो वह अपने बड़े भाई की बात नहीं टाल सका और शादी के लिए हां कर दी.

हालांकि, रीमा को यह सब बहुत अजीब सा लग रहा था, पर भला उस की सुनने वाला ही कौन था.

नगलानगर नामक कसबे में एक विशाल समारोह हुआ, जिस में फागुन और राहुल की शादी हो गई. कई बड़े नेताओं ने इस में शिरकत की. मीडिया में भी यह शादी चर्चा की बात बनी हुई थी.

फागुन अपने घर से विदा हो कर विकास पांडेय के घर चली आई थी और फागुन के भाई को होस्टल में जाना पड़ा था.

आज राहुल और फागुन की सुहागरात थी, पर राहुल अपनी पत्नी के शरीर को न छू सके, इस के लिए विकास पांडेय ने पूरा जुगाड़ कर लिया था. उस ने एक कमरे में कबाब और महंगी शराब की 2-3 बोतलें मंगवाईं और राहुल को अपने सामने बिठा कर उसे इतनी शराब पिलाई कि वह नशे में चूर हो कर वहीं सो गया.

सुहाग की सेज पर फागुन बैठी हुई थी. आधी रात में सफेद कुरतेपाजामे में विकास पांडेय कमरे में दाखिल हुआ और दुलहन बनी फागुन को अपनी बांहों में कस लिया.

फागुन ने भी जीभर कर विकास का साथ दिया. वैसे, फागुन तो राहुल की दुलहन बन कर आई थी, मगर उस ने सुहागरात विकास के साथ ही मनाई.

अगली सुबह जब राहुल का नशा उतरा, तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह अपनी नईनवेली दुलहन से उस के पास जा कर सुहागरात पर न आ पाने के चलते माफी मांगने लगा.

‘‘अरे, आप ऐसे क्यों कह रहे हैं… बड़े आयोजनों और शादीब्याह में तो यह सब होता ही है,’’ मधुर स्वर में फागुन ने कहा, तो राहुल अपराधबोध से मुक्त हो गया और दूसरे कामों में लग गया.

पर अगली रात को जब राहुल ने फागुन के जिस्म को छूना चाहा, तो फागुन ने तबीयत न ठीक होने का बहाना बना दिया. राहुल अपना सा मुंह ले कर रह गया, पर कुछ कह न सका विकास पांडेय ने अब अगले दिन से ही फागुन को अपने साथ राजनीतिक सभाओं में और दूसरी जगहों पर घूमनेफिरने के लिए ले जाना शुरू कर दिया था.

चूंकि राहुल यह जानता था कि फागुन उस के भाई विकास के साथ मंच पर कविता पाठ करने के लिए जाती है और भैया के राजनीतिक कामों में भी उन की मदद करती है, इसलिए वह कुछ विरोध भी नहीं कर सका.

राहुल ने तो अपने मन को समझा लिया था, पर रीमा को यह बात लगातार खटक रही थी कि उस के पति विकास ने उस के साथ काम करने वाली एक साधारण लड़की के साथ राहुल की शादी क्यों करा दी, जबकि राहुल के लिए तो अच्छे घरों के रिश्ते आ रहे थे?

घर में भी विकास और फागुन के बीच काफीकुछ ऐसा था, जिस में कोई सीमा और मर्यादा नहीं थी. मसलन, अपने जेठ विकास के सामने फागुन सिर पर पल्ला नहीं करती थी और उसे विकास के पास बैठने में भी कोई गुरेज नहीं था.

कई दिन तक फागुन और विकास के चालचलन को देखने के बाद रीमा को यकीन हो गया था कि उन दोनों के बीच कुछ गलत संबंध जरूर है और रीमा ने उस शाम को जब यह बात राहुल से शेयर की, तो वह भी बोला, ‘‘मेरे एक दोस्त ने भी मुझ से फागुन और भैया को ले कर कुछ कहा है और जरूर भैया और फागुन के बीच गड़बड़ है, तभी तो शादी के 2 महीने बाद भी फागुन ने मुझे अपने शरीर को हाथ तक नहीं लगाने दिया है.’’

राहुल का दुख उस की आंखों से उमड़ रहा था. उस का मन अब यहां रहने का नहीं हो रहा था और यह बात भी उस ने रीमा से बता दी थी.

दुखी राहुल और रीमा दोनों प्लान बनाने लगे कि अब आगे क्या किया जाए? काफी सोचविचार कर के वे एक नतीजे पर पहुंच गए थे.

शाम को जब फागुन और विकास वापस आए, तो राहुल ने अपने भैया को खुशीखुशी बताया कि अगले महीने की 15 तारीख को वह फागुन को ले कर पड़ोसी देश नेपाल के काठमांडू शहर जा रहा है, जहां पर वह एक प्लास्टिक फैक्टरी लगाएगा. उस ने यह भी बताया कि बाकी के शेयर होल्डरों से भी बात कर ली गई है और वे सब भी पैसा लगाने को तैयार हैं.

राहुल की बात सुन कर फागुन और विकास सन्न रह गए. अब वे दोनों रंगरेलियां कैसे मना पाएंगे? फागुन ने हैरतभरी नजरों से विकास की ओर देखा तो विकास ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया, मानो कुछ हुआ ही न हो.

राहुल ने फागुन को भी अपने साथ काठमांडू चलने को कहा. फागुन ने थोड़ी नानुकर की, तो बदले में राहुल नाराज हो गया, ‘‘बिना अपने पति के यहां पर तुम क्या करोगी भला? माना कि विकास भैया के साथ जाना और उन के कामों में हाथ बंटाना तुम्हारी जिम्मेदारी है और तुम्हारे काम का भी हिस्सा है, पर आखिर कब तक तुम उन के साए में रहोगी… तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा.’’

राहुल के सख्त स्वर के आगे शांत हो गई थी फागुन, पर उस ने यह बात एक मैसेज के द्वारा विकास से बता दी.

अगली सुबह जब राहुल अपनी बाइक से पास के शहर में किसी काम से जा रहा था तो उस की बाइक का एक्सीडैंट करवा दिया गया. इस हादसे में उस की जान तो बच गई, पर वह पूरी तरह से अपाहिज हो कर बिस्तर पर पड़ गया था. राहुल की कमर से ले कर निचले हिस्से में कोई भी हलचल नहीं थी. उस के मुंह से साफ आवाज भी नहीं निकल रही थी.

विकास और फागुन अब बहुत खुश थे, क्योंकि अब तो उन्हें रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

‘‘तुम घबराओ मत… इस बार तो एक्सीडैंट ही करवाया है, अगली बार सीधा गोली चलवा दूंगा. वैसे, अब उस की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ विकास ने फागुन की पीठ सहलाते हुए कहा.

यह बात कहते हुए वह भूल गया कि रीमा ने चुपके से उन दोनों के बीच होने वाली बातों को न केवल सुन लिया है, बल्कि अपने मोबाइल में उन का यह वीडियो कैद भी कर लिया है.

रीमा इस वीडियो को ले कर सीधा पुलिस के पास जा सकती थी और विकास को अपने छोटे भाई की हत्या करवाने की साजिश के आरोप में गिरफ्तार करवा सकती थी, पर उस ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह जानती थी कि विकास एक रसूखदार नेता है और राजनीतिक गलियारे में उस की अच्छी पहुंच है, इसलिए इतना सुबूत नाकाफी होगा.

लिहाजा, रीमा ने शांत रहने का फैसला किया और विकास और फागुन की हरकतों को छिप कर देखती रही.

रात में जब रीमा की आंख लग जाती तब विकास धीरे से उठता और फागुन के पास उस के कमरे में चला जाता, जहां पर दोनों जवानी के मजे लेते, जबकि रीमा अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रहती.

एक रात को जब उस से नहीं रहा गया तब रीमा ने अपनेआप से सवाल पूछा कि आखिर तेरा पति तुझे छोड़ कर दूसरी औरत के पास क्यों जाता है? आखिर तू भी तो खूबसूरत है और तेरे पास भी वह सब है जो उस के पास है? जवाब रीमा के अंदर से ही आया कि एक मर्द के अंदर दस जगह मुंह मारने की आदत होती है और उसी आदत को तेरा पति भी जी रहा है.

जिस तरह से मूल से ज्यादा प्यारा सूद होता है उसी तरह से लुच्चे लोगों के लिए घरवाली से ज्यादा आकर्षण दूसरी बाहर वाली में होता है, बाहर वाली यानी फागुन में विकास को ज्यादा मजा नजर आ रहा है.

राहुल को बिस्तर से लगे हुए 5 महीने हो गए थे और उस की तबीयत में कोई सुधार नहीं नजर आ रहा था. खुद रीमा अपने देवर का ध्यान रखती थी, पर फिलहाल तो राहुल लाचारी ओढ़े हुए बिस्तर पर ही पड़ा रहता था.

उस रात बहुत तेज बारिश हो रही थी. राहुल दवा खा कर नींद के आगोश में था, जबकि फागुन और विकास एकदूसरे से तकरीबन चिपके हुए बैठे थे और दोनों में बातें हो रही थीं.

‘‘अब आप को मेरा और ज्यादा खयाल रखना चाहिए, क्योंकि मैं आपके बच्चे की मां बनने वाली हूं,’’ फागुन ने कहा तो विकास पांडेय की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने फागुन को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा.

‘‘हमारी तरफ से भी बधाई स्वीकार करो तुम दोनों,’’ रीमा ताली बजाते हुए कमरे में आ रही थी. उसे देख कर वे दोनों बुरी तरह चौंक गए थे.

उन की चोरी पकड़ी गई थी. वे दोनों एकदूसरे से दूर छिटक गए थे, पर रीमा ने मुसकराते हुए फागुन के सिर पर हाथ फेरा और कमरे से बाहर चली गई.

विकास अवाक रह गया था कि अपने पति को अपनी देवरानी के साथ इस हालत में देख कर रीमा ने कोई चीखपुकार क्यों नहीं मचाई, बल्कि सिर्फ मुसकरा कर चली गई… ऐसा क्यों? यह बात उसे बुरी तरह से परेशान कर रही थी.

विकास अगले दिन रीमा से नजरें नहीं मिला पा रहा था, जबकि रीमा के चेहरे पर ऐसी चमक थी जो आज से पहले विकास ने कभी नहीं देखी थी. वह मुसकराए जा रही थी, गीत गुनगुनाए जा रही थी और हर बात पर इठला भी रही थी.

‘‘मुझे माफ कर दो रीमा,’’ विकास ने कहा तो रीमा अनजान सी बन गई

‘‘पर किस बात के लिए?’’ रीमा ने बनावटी ढंग से कहा.

‘‘यही कि फागुन मेरे बच्चे की मां बनने वाली है,’’ विकास ने हकलाते हुए कहा तो रीमा खिलखिला कर हंस पड़ी.

विकास के चेहरे पर कई सवालिया निशान थे. वह जल्दी से रीमा की हंसी की वजह जान लेना चाहता था.
रीमा ने जो बताया वह सुन कर विकास पांडेय की सारी नेतागीरी धरी की धरी रह गई. रीमा ने उसे बताया कि जब फागुन के पति का शरीर पूरी तरह से लकवाग्रस्त है और वह इतने महीनों से बिस्तर पर हिलडुल भी नहीं सकता, तो उस की पत्नी फागुन भला मां कैसे बन सकती है? और जब यह बात और लोगों को पता चलेगी, तब भला वे सब क्या कहेंगे?

यह सुन कर विकास सन्न रह गया था. यह बात तो उस ने सपने में भी नहीं सोची थी. यह तो भला हो रीमा जैसी अच्छी पत्नी का जो यह बात उस ने इतने आराम से उसे बता दी, नहीं तो बहुत जगहंसाई हो जाती और विपक्षी पार्टी को भी मौका मिल जाता. विकास के मन में एकसाथ कई विचार चल रहे थे.

अगले दिन विकास पांडेय फागुन को अपने साथ ले कर अपने फार्महाउस पर गया.

‘‘आज हम अपने फार्महाउस पर अपने आने वाले बच्चे का सैलिब्रेशन करेंगे,’’ विकास पांडेय ने यह कह कर फागुन को साथ चलने के लिए राजी कर लिया था.

फार्महाउस पर थोड़ाबहुत चायनाश्ता करने के बाद विकास फागुन पर बरस पड़ा कि उस ने एक अनचाहे बच्चे को बीच में क्यों आने दिया?

‘‘तुम ने गर्भनिरोधक गोलियां क्यों नहीं खाईं? अब जबकि राहुल बिस्तर पर है और हिलडुल भी नहीं सकता, ऐसे में तुम मां कैसे बन सकती हो? कभी सोचा है तुम ने,’’ विकास चीख रहा था और अब सकते में आने की बारी फागुन की थी. उस का भी ध्यान तो इस तरफ नहीं गया था. अब भला क्या होगा? अब तो इतना ज्यादा समय हो गया है कि वह चाह कर भी बच्चे को गिरा नही सकती.

फागुन ने अपने चेहरे से तनाव हटाते हुए विकास से कहा, ‘‘पर यह सब तुम्हें मेरे जिस्म को रगड़ने से पहले सोच लेना चाहिए था. अब मैं अपने बच्चे को क्यों हटाऊं?’’ सख्त लहजा था फागुन का, पर विकास यह सुन कर झुंझला गया और बाहर निकल गया.

फागुन ने महसूस किया कि विकास की गाड़ी स्टार्ट हो चुकी है और वह उसे फार्महाउस में छोड़ कर कहीं जा रहा है. फागुन ने बाहर की ओर जाना चाहा, पर दरवाजा बाहर से बंद था.

उस ने विकास के मोबाइल पर फोन मिलाया, पर विकास ने उस का फोन रिसीव नहीं किया.

इतने दिनों से फागुन विकास के साथ रह रही थी और उस की हर चाल को वह अच्छी तरह समझती थी, इसलिए फागुन यह जान चुकी थी कि हो न हो अब विकास पांडेय से उसे अपनी जान का खतरा है.

विकास पांडेय अपने घर नगलानगर पहुंच चुका था और रीमा को गले लगाते हुए वह बोला, ‘‘अब तुम मेरी हो और हमें कोई अलग नहीं कर सकता. मैं ने हमारे बीच के सारे कांटे दूर कर दिए हैं.’’

विकास की आवाज में चहक थी, पर उस की इस बात पर रीमा एक बार फिर से मुसकरा उठी, ‘‘पर अब भला क्या फायदा? इन सब बातों के लिए बहुत देर हो गई है,’’ और यह कहते हुए रीमा ने दीवार पर लगी टीवी स्क्रीन की ओर नजरें घुमा दीं, जहां पर एक लोकल न्यूज चैनल पर फागुन की लाइव तसवीरें चल रही थीं.

रीमा जोरजोर से नेता विकास पांडेय पर आरोप पर आरोप लगाए जा रही थी, ‘‘विकास पांडेय, जो रिश्ते में मेरा जेठ है, ने हमेशा से मुझ पर गलत नजर रखी और मेरा फायदा उठाने के लिए अपने छोटे भाई से मेरी शादी करा दी.

‘‘वह मुझे आगे बढ़ाने के नाम पर मेरा यौन शोषण करता रहा और आज जब मैं उस के बच्चे की मां बनने वाली हूं, तब उस ने मुझे यहां ला कर बंद कर दिया है, ताकि वह मेरा और मेरे आने वाले बच्चे का मर्डर करा सके…’’

फागुन ने सारी बातें मीडिया में कह दी थीं और अब चारों तरफ विकास पांडेय की थूथू होने लगी थी, उस का सारा रसूख धड़ाम हो चुका था.

मीडिया को तो रीमा पहले ही फार्महाउस भेज चुकी थी और अब पुलिस को भी रीमा ने ही फोन कर के बुलाया और विकास पांडेय को गिरफ्तार करने पुलिस आ चुकी थी.

विकास पांडेय लगातार इनकार करता जा रहा था, ‘‘फागुन झूठ बोल रही है. यह बच्चा मेरा नहीं है.’’

‘‘घबराइए नहीं, आजकल हर चीज मैडिकल जांच से पता चल जाती है. अगर आप बेकुसूर होंगे, तो डीएनए टैस्ट आप को बेकुसूर साबित करने में मदद करेगा,’’ इंस्पैक्टर ने विकास से कहा, पर विकास पांडेय जानता था कि वह झूठा है और अब पुलिस के शिकंजे से नहीं बच सकता है.

रीमा एक ओर चुपचाप खड़ी थी. उस ने अपने पति और देवरानी दोनों से धोखा तो खाया, पर वह सही समय पर सचेत हो गई थी. उसे अपनी राह का कांटा समझने वाला उस का पति विकास आज जेल में था.
रीमा ने एक कांटे की मदद से दूसरा कांटा निकाल दिया था.

Hindi Family Story: जिन तावीज और बाबा – किशन की उलझन

Hindi Family Story: किशन अपने पड़ोसी अली के साथ कोचिंग सैंटर में पढ़ने जाता था. उस दिन अली को देर हो गई, तो वह अकेला ही घर से निकल पड़ा.

सुनसान सड़क के फुटपाथ पर बैठे एक बाबा ने उसे आवाज दी, ‘‘ऐ बालक, तुझे पढ़ालिखा कहलाने का बहुत शौक है. पास आ और फकीर की दुआएं लेता जा. कामयाबी तेरे कदम चूमेगी.’’

किशन डरतेडरते बाबा के करीब आ कर चुपचाप खड़ा हो गया.

‘‘किस जमात में पढ़ता है?’’ बाबा ने पूछा.

‘‘जी, कालेज में…’’ किशन ने बताया.

‘‘बहुत खूब. जरा अपना दायां हाथ दे. देखता हूं, क्या बताती हैं तेरी किस्मत की रेखाएं,’’ कहते हुए बाबा ने किशन का दायां हाथ पकड़ लिया और उस की हथेली की आड़ीतिरछी लकीरें पढ़ने लगा, ‘‘अरे, तुझे तो पढ़नेलिखने का बहुत शौक है. इसी के साथ तू निहायत ही शरीफ और दयालु भी है.’’

तारीफ सुन कर किशन मन ही मन खुश हो उठा. इधर बाबा कह रहा था, ‘‘लेकिन तेरी किस्मत की रेखाएं यह भी बताती हैं कि तुझेअपनेपराए की समझ नहीं है. घर के कुछ लोग तुझे बातबात पर झिड़क दिया करते हैं और तेरी सचाई पर उन्हें यकीन नहीं होता.’’

किशन सोचने लगा, ‘बाबा ठीक कह रहे हैं. परिवार के कुछ लोग मुझे कमजोर छात्र होने के ताने देते रहते हैं, जबकि ऐसी बात नहीं है. मैं मन लगा कर पढ़ाई करता हूं.’

बाबा आगे बताने लगा, ‘‘तू जोकुछ भी सोचता है, वह पूरा नहीं होता, बल्कि उस का उलटा ही होता है.’’

यह बात भी किशन को दुरुस्त लगी. एक बार उस ने यह सोचा था कि वह गुल्लक में खूब पैसे जमा करेगा, ताकि बुरे समय में वह पैसा मम्मीपापा के काम आ सके, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अभी किशन कुछ ही पैसे जमा कर पाया था कि एक दिन मोटे चूहे ने टेबल पर रखे उस की गुल्लक को जमीन पर गिरा कर उस के नेक इरादे पर पानी फेर दिया था.

इसी तरह पिछले साल उसे पूरा यकीन था कि सालाना इम्तिहान में वह अच्छे नंबर लाएगा, लेकिन जब नतीजा सामने आया, तो उसे बेहद मायूसी हुई.

बाबा ने किशन के मन की फिर एक बात बताई, ‘भविष्य में तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा. तुझे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक है न?’’

‘‘जी बहुत…’’ किशन चहक कर बोला.

‘‘तभी तो तेरी किस्मत की रेखाएं दावा कर रही हैं कि आगे जा कर तू भारतीय क्रिकेट टीम का बेहतरीन खिलाड़ी बनेगा. दुनिया की सैर करेगा, खूब दौलत बटोरेगा और तेरा नाम शोहरत की बुलंदी पर होगा,’’ इस तरह बाबा ने अपनी भविष्यवाणी से किशन को अच्छी तरह से संतुष्ट और खुश कर दिया, फिर थैले से एक तावीज निकाल कर उस की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘यह तावीज अपने गले में अभी डाल ले बालक. यह तुझे फायदा ही फायदा पहुंचाएगा.’’

‘‘तू जोकुछ भी सोचेगा, इस तावीज में छिपा जिन उसे पूरा कर देगा. यकीन नहीं हो रहा, तो यह देख…’’ इन शब्दों के साथ बाबा उस तावीज को मुट्ठी में भींच कर बुदबुदाने लगा, ‘‘ऐ तावीज के गुलाम जिन, मुझे 2 हजार रुपए का एक नोट अभी चाहिए,’’ फिर बाबा ने मुट्ठी खोल दी, तो हथेली पर उस तावीज के अलावा 2 हजार रुपए का एक नोट भी नजर आया, जिसे देख कर किशन के अचरज का ठिकाना नहीं रहा. वह बोला, ‘‘बड़ा असरदार है यह तावीज…’’

‘‘हां, बिलकुल. मेरे तावीज की तुलना फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ के बटुक महाराज से बिलकुल मत करना बालक. फिल्मी फार्मूलों का इनसानी जिंदगी की सचाई से दूरदूर का रिश्ता नहीं होता है.’’

‘‘बाबा, इस तावीज की कीमत क्या है?’’ किशन ने पूछा.

‘‘महज 5 सौ रुपए बेटा,’’ बाबा ने कहा.

तावीज की इतनी महंगी कीमत सुन कर किशन गहरी सोच में डूब गया, फिर बोला, ‘‘बाबा, 5 सौ रुपए तो मेरे पास जरूर हैं, लेकिन यह रकम पापा ने कोचिंग सैंटर की फीस जमा करने के लिए दी है. पर कोई बात नहीं, आप से तावीज खरीद लेने के बाद मैं इस के चमत्कार से ऐसे कितने ही 5 सौ रुपए के नोट हासिल

कर लूंगा,’’ यह कह कर किशन ने 5 सौ रुपए का नोट निकालने के लिए जेब में हाथ डाला ही था कि तभी अली पीछे से आ धमका और बोला, ‘‘किशन, यह तुम क्या कर रहे हो?’’

‘‘तावीज खरीद रहा हूं अली. बाबा कह रहे हैं कि इस में एक जिन कैद है, जो तावीज खरीदने वाले की सभी मुरादें पूरी करता है,’’ किशन बोला.

‘‘क्या बकवास कर रहे हो. ऐसी दकियानूसी बात पर बिलकुल भरोसा मत करो. क्या हम लोग ?ाठे अंधविश्वास की जकड़न में फंसे रहने के लिए पढ़ाईलिखाई करते हैं या इस से छुटकारा पा कर ज्ञान, विज्ञान और तरक्की को बढ़ावा देने के लिए पढ़ाईलिखाई करते हैं?’’ अली ने किशन से सवाल किया.

तभी बाबा गुर्रा उठा, ‘‘ऐ बालक, खबरदार जो ज्ञानविज्ञान की दुहाई दे कर जिन, तावीज और बाबा के चमत्कार को झठा कहा. जबान संभाल कर बात कर.’’

‘‘चलो, मैं कुछ देर के लिए मान लेता हूं कि तुम्हारा तावीज चमत्कारी है, लेकिन इस का कोई ठोस सुबूत तो होना चाहिए,’’ अली बोला.

बाबा के बजाय किशन बोला, ‘‘अली, मेरा यकीन करो. यह तावीज वाकई चमत्कारी है. बाबा ने अभी थोड़ी देर पहले इस में समाए जिन को आदेश दे कर उस से 2 हजार रुपए का एक नोट मंगवाया था.’’

अली बोला, ‘‘अरे नादान, तेरी समझ में नहीं आएगा. यह सब इस पाखंडी बाबा के हाथ की सफाई है. तुम रोजाना घर से निकलते हो ट्यूशन पढ़ कर

ज्ञानी बनने के लिए, लेकिन यह क्या… आज तो तुम एक सड़कछाप बाबा से अंधविश्वास और नासम?ा का पाठ पढ़ने लगे हो.’’

अली के तेवर देख कर बाबा को यकीन हो गया था कि वह उस की चालबाजी का परदाफाश कर के ही दम लेगा, इसलिए उस ने अली को अपने चमत्कार से भस्म कर देने की धमकी दे कर शांत करना चाहा, लेकिन अली डरने के बजाय बाबा से उलझ पड़ा, ‘‘अगर तुम वाकई चमत्कारी बाबा हो, तो

मुझे अभी भस्म कर के दिखाओ, वरना तुम्हारी खैर नहीं.’’

अली की ललकार से बौखला कर बाबा उलटासीधा बड़बड़ाने लगा.

‘‘क्या बाबा, तुम कब से बड़बड़ा रहे हो, फिर भी मुझे अब तक भस्म न कर सके? अरे, सीधी सी बात है कि तुम्हारी तरह तुम्हारा जंतरमंतर भी झठा है.’’

अली की बातों से खिसिया कर बाबा अपना त्रिशूल हवा में लहराने लगा.

इस पर अली डरे हुए किशन को खींच कर दूर हट गया और जोरजोर से चिल्लाने लगा, ताकि सड़क पर चल रहे मुसाफिर उस की आवाज सुन सकें, ‘‘यह बाबा त्रिशूल का इस्तेमाल हथियार की तरह कर रहा है…’’

अली की आवाज इतनी तेज थी कि सादा वरदी में सड़क से गुजर रहे 2 कांस्टेबल वहां आ गए और मामले को समझाते ही उन्होंने बाबा को धर दबोचा, फिर उसे थाने ले गए.

‘‘आखिर तुम इतने नासमझ क्यों हो किशन?’’ भीड़ छंटने के बाद अली ने किशन पर नाराजगी जताई, तो वह बोला, ‘‘मैं हैरान हूं कि बाबा अगर गलत इनसान थे, तो फिर उन्होंने मेरे हाथ की लकीरें पढ़ कर मेरे मन की सच्ची बातें कैसे बता दीं?’’

अली बोला, ‘‘बाबा ने यह भविष्यवाणी की होगी कि तुम पढ़नेलिखने में तेज हो, तुम बहुत अच्छे बालक हो, लेकिन लोग तुम्हें समझाने की कोशिश नहीं करते, तुम जोकुछ सोचते हो, उस का बिलकुल उलटा होता है.’’

‘‘कमाल है, मेरे और बाबा के बीच की बातें तुम्हें कैसे मालूम हुईं अली?’’ पूछते हुए किशन अली को हैरान नजरों से देखने लगा.

अली बोला, ‘‘यह कमाल नहीं, बल्कि आम बात है. बाबा जैसे पाखंडी लोग अपने शिकारी का शिकार करने के लिए इसी तरह की बातों का सहारा लिया करते हैं.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ अली, बाबा ने मुझ से कहा था कि मुझे क्रिकेट का खेल बेहद पसंद है. एक दिन मैं भारतीय क्रिकेट टीम का बेहतरीन खिलाड़ी बनूंगा और ऐसा मेरा दिल भी कहता है. लेकिन मेरे दिल की यह बात भी बाबा को कैसे मालूम हो गई?’’

‘‘दरअसल, भारत में क्रिकेट एक मशहूर खेल है. इसे बच्चे, बूढ़े, जवान सभी पसंद करते हैं. तभी तो उस पाखंडी ने तुम्हें यह सपना दिखाया कि एक दिन तुम भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी बनोगे.’’

किशन अली की बातें गौर से सुनतेसुनते बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ दोस्त, क्या मैं वाकई कभी बड़ा आदमी नहीं बन सकूंगा?’’

‘‘क्यों नहीं बन सकते हो. बड़ा आदमी कोई भी बन सकता है, लेकिन सपने देख कर नहीं, बल्कि सच्ची मेहनत, लगन और ज्ञानविज्ञान के सहारे. आइंदा से तुम ऐसे धोखेबाज लोगों से बिलकुल खबरदार रहना.

‘‘किशन, तुम खुद सोचो कि अगर बाबा का तावीज चमत्कारी होता, तो फिर वह फुटपाथ पर बैठा क्यों नजर आता? तावीज के चमत्कार से पहले तो वह खुद ही बड़ा आदमी बन जाता.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो अली,’’ किशन ने अपनी नादानी पर शर्मिंदा होने के अलावा यह मन ही मन तय किया कि अब वह कभी किसी के झांसे में नहीं आएगा. Hindi Family Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें