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Hindi Story : मुरदा – आखिर क्या हुआ उस लाश का

Hindi Story : भीड़ में से कोई चिल्लाया, ‘अरे जल्दी बुलाओ… 108 नंबर डायल करो… यह तो मर जाएगा…’

कुछ लोग वहां इकट्ठा हो गए थे. मैं ने अपनी गाड़ी के ब्रेक लगाए और लोगों से भीड़ की वजह पूछी, तो पता चला कि मामला सड़क हादसे का है.

मैं भी गाड़ी से उतर कर भीड़ में घुस कर देखने लगा. तकरीबन 50-55 साल का एक आदमी बुरी तरह घायल सड़क पर पड़ा तड़प रहा था.

लोग कह रहे थे कि वह कोई गरीब आदमी है, जो कुछ दिनों से इस इलाके में घूम रहा था. कोई कार वाला उसे टक्कर मार कर चला गया.

सब लोग इधरउधर की बातें कर रहे थे, पर जमीन पर पड़े उस आदमी के हक में कुछ भी नहीं हो रहा था. न अभी तक कोई एंबुलैस वहां आई थी, न ही पुलिस.

मैं ने फोन कर के पुलिस को बुलाया. हादसा हुए तकरीबन आधा घंटा बीत चुका था और उस आदमी का शरीर बेदम हुआ जा रहा था.

तभी सायरन बजाती एंबुलैंस वहां आ पहुंची और उसे अस्पताल ले जाने का इंतजाम हो गया.

एंबुलैंस में बैठे मुलाजिम ने किसी एक आदमी को उस घायल आदमी के साथ चलने के लिए कहा, लेकिन साथ जाने के लिए कोई तैयार न हुआ.

मुझे भी एक जरूरी मीटिंग में जाना था. उधर मन जज्बाती हुआ जा रहा था. मैं पसोपेश में था. मीटिंग में नहीं जाता, तो मुझे बहुत नुकसान होने वाला था. पर उस बेचारे आदमी के साथ नहीं जाता, तो बड़ा अफसोस रहता.

मैं ने मीटिंग में जाने का फैसला किया ही था कि पुलिस इंस्पैक्टर, जो मेरी ही दी गई खबर पर वहां पहुंचा था, ने मुझ से अस्पताल और थाने तक चलने की गुजारिश की. मुझ से टाला न गया. मैं ने अपनी गाड़ी वहीं खड़ी की और एंबुलैंस में बैठ गया.

अस्पताल पहुंचतेपहुंचते उस आदमी की मौत हो गई थी.

मरने वाले के हुलिएपहनावे से उस के धर्म का पता लगाना मुश्किल था. बढ़ी हुई दाढ़ी… दुबलापतला शरीर… थकाबुझा चेहरा… बस, यही सब उस की पहचान थी. उस की जेब से भी ऐसा कुछ न मिला, जिस से उस का नामपता मालूम हो पाता. अलबत्ता, 20 रुपए का एक गला हुआ सा नोट जरूर था.

अस्पताल ने तो उस आदमी को लेने से ही मना कर दिया. पुलिस भी अपनी जान छुड़ाना चाहती थी.

इंस्पैक्टर ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब, पंचनामा तो हम कर देते हैं, पर आप भी जानते हैं कि सरकारी इंतजाम में इस का अंतिम संस्कार करना कितना मुश्किल है. क्यों न आप ही अपने हाथों से यह पुण्य का काम लें और इस का अंतिम संस्कार करा दें?’’

‘‘क्यों नहीं… क्यों नहीं,’’ कहते हुए मैं ने हामी भर दी.

मन ही मन मैं ने इस काम पर आने वाले खर्च का ब्योरा भी तैयार कर लिया था. मेरे हिसाब से इस में कुछेक हजार रुपए का ही खर्चा था, जिसे मैं आसानी से उठा सकता था. सो, मैं इस काम के लिए तैयार हो गया.

इस तरह पुलिस और अस्पताल की जिम्मेदारी मैं ने अपने ही हाथों या कहें कि अपने कंधों पर डाल ली थी.

‘‘अब मुझे क्या करना होगा?’’ मैं ने इंस्पैक्टर से पूछा.

इंस्पैक्टर ने कहा कि मैं इस मुरदा शरीर को श्मशान घाट ले जाऊं. उन्होंने मुझे एक फोन नंबर भी दिया, जिस पर मैं ने बात की और यह सोच कर निश्चिंत हो गया कि अब सब जल्दी ही निबट जाएगा.

मेरे कहने पर ड्राइवर बताए हुए पते पर एंबुलैंस ले गया. श्मशान घाट पहुंचते ही मैं उस के संचालक से मिला और उस लाश के अंतिम संस्कार के लिए कहा.

पंचनामे में उस आदमी का कोई परिचय नहीं था, सिर्फ हुलिए का ही जिक्र था. संचालक ने मुझ से जब यह पूछा कि परची किस नाम से काटूं और कहा कि इस के आगे की जिम्मेदारी आप की होगी, तो मैं डर गया.

मैं ने उसे बताया, ‘‘यह मुरदा लावारिस है. मैं तो बस यह पुण्य का काम कर रहा हूं, ताकि इस की आत्मा को शांति मिल सके…’’

इस से आगे मैं कुछ बोलता, इस से पहले ही पीछे से आवाज आई, ‘‘भाई, यह लाश तो किसी मुसलिम की लगती है. इस की दाढ़ी है… इस का हुलिया कहता है कि यह मुसलिम है… इसे आग में जलाया नहीं जा सकता. बिना धर्म की पहचान किए हम यह काम नहीं करेंगे… आप इसे कब्रिस्तान ले जाइए.’’

यह बात सुनते ही वहां मौजूद तकरीबन सभी लोग एकराय हो गए.

समय बीतता जा रहा था. बहुत देर हो चुकी थी, इसलिए मैं ने भी उसे कब्रिस्तान ले जाना ही मुनासिब समझा.

मैं ने उन से कब्रिस्तान का पता पूछा और एंबुलैंस ड्राइवर से उस बेजान शरीर को नजदीक के कब्रिस्तान ले चलने को कहा.

मैं मन ही मन बहुत पछता रहा था. हर किसी ने इस मुसीबत से अपना पीछा छुड़ाया, फिर मैं ही क्यों यह बला मोल ले बैठा. खैर, अब ओखली में सिर दे ही दिया था, तो मूसल तो झेलना ही था.

कब्रिस्तान पहुंचते ही वहां मौजूद शख्स बोला, ‘‘पहले यह बताइए कि यह कौन सी मुसलिम बिरादरी का है? इस का नाम क्या है?’’

मैं सन्न था. यहां भी बिरादरी?

मैं ने उन्हें बताया, ‘‘मैं इन सब चीजों से नावाकिफ हूं और मेरा इस मुरदे से कोई वास्ता नहीं, सिवा इस के कि मैं इसे लावारिस नहीं छोड़ना चाहता.’’

पर इन सब बातों का उस आदमी पर कोई असर नहीं हुआ. मुझ से पीछा छुड़ाने के अंदाज में उस ने कहा, ‘‘भाईजान, मालूम हो कि यहां एक खास बिरादरी ही दफनाई जाती है, इसलिए पहले इस के बारे में मुकम्मल जानकारी हासिल कीजिए.’’

मैं ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘यह मुरदा है और इसे मुसलिम बताया गया है. आप मेरी और इस बेजान की मदद कीजिए. आप को सवाब मिलेगा.’’

पर सवाब की चिंता किसे थी? उस आदमी ने लाश दफनाने से साफ मना कर दिया और इस तरह से एक बार फिर मुझे उस लाश को दूसरे कब्रिस्तान में ले जाने को मजबूर कर दिया गया.

इस बीच मुझे समाज की खेमेबाजी का चेहरा साफसाफ नजर आ गया था.

अब मैं दूसरे कब्रिस्तान पहुंच चुका था. वहां एक बुजुर्ग मिले. उन्हें मैं ने पूरा वाकिआ सुनाया. वे सभी बातें बड़े इतमीनान से सुन रहे थे और बस यही वह चीज थी, जो इस घड़ी मेरी हिम्मत बंधा रही थी, वरना रूह तो मेरी अब भी घबराई हुई थी.

जिस का डर था, वही हुआ. सबकुछ सुन कर आखिर में उन्होंने भी यही कहा, ‘‘मैं मजबूर हूं. अगर आदमी गैरमुसलिम हुआ और मेरे हाथों यह सुपुर्द ए खाक हो गया, तो यह मेरे लिए गुनाह होगा, इसलिए पहले मैं इस का शरीर जांच कर यह पुख्ता तो कर लूं कि यह मुसलिम है भी या नहीं.’’

उन्होंने जांच की और असहज हो कर मेरे पास आए. गहरी सांस छोड़ते हुए वे बोले, ‘‘माफी कीजिएगा जनाब, यह तो मुसलिम नहीं है.’’

उन के इन लफ्जों से मेरा सिर चकराने लगा था. एक तरफ रस्मों की कट्टरता पर गुस्सा आ रहा था, तो दूसरी तरफ अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार कर इस पुण्य कमाने की इच्छा पर मैं खूब पछता रहा था.

कितने आडंबर में जीते हैं हम. एक मरे हुए आदमी के धर्म के प्रति भी इतनी कट्टरता? काश, हम आम जिंदगी में ऐसे आदर्शों का लेशमात्र भी अपना पाते.

मैं थकान और गुस्से से भर चुका था. उस मुरदा शरीर के साथ मैं सीधा पुलिस स्टेशन पहुंचा और अपना गुस्सा उस इंस्पैक्टर के सामने उगल दिया, जिस ने मुझे तकरीबन फुसला कर यह जिम्मेदारी सौंपी थी.

इंस्पैक्टर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला, ‘‘एक ही दिन में थक गए आप? यहां तो यह हर रोज का तमाशा है. आप घर जाइए, इसे हम ही संभालेंगे.’’

मैं हैरान था कि यह खाकी वरदी सब्र और हिम्मत के रेशों से बनी है क्या? मैं माफी मांगते हुए वहां से विदा हुआ.

मैं अगले 2 दिन तक परेशान रहा कि उस लावारिस मुरदे का आखिर क्या हुआ होगा.

यह सोच कर मैं बेचैन होता रहा और तीसरे दिन फिर पुलिस स्टेशन पहुंच गया.

इंस्पैक्टर साहब मुझे देखते ही पहचान गए. शायद वे मेरी हालत और मेरी जरूरत समझ गए थे. उन्होंने अपने सिपाही की तरफ इशारा किया, ‘‘आप इन से जानकारी ले सकते हैं.’’

सिपाही ने बताया कि वह लाश अस्पताल के मुरदाघर में रखवा दी गई थी. उस ने एक कागज भी दिया, जिसे दिखा कर मुझे अस्पताल के मुरदाघर में जाने की इजाजत मिली.

मुरदाघर पहुंचने पर मैं ने देखा कि वहां ऐसी कई लाशें रखी थीं. उन सब के बीच मुझे अपने लाए हुए उस मुरदे को पहचानने में जरा भी समय नहीं लगा.

बदबू से भरे उस धुंधलके में वह मुरदा अभी भी एक मैली सी चादर की ओट में लावारिस ही पड़ा था. सरकारी नियम के हिसाब से उस लाश का उसी दिन दाह संस्कार किया जाना था. मैं तो यह भी पूछने की हिम्मत न कर पाया कि उसे दफनाया जाएगा या जलाया जाएगा.

मैं ठगा सा अपनी गाड़ी की तरफ चला जा रहा था.

Hindi Kahani : बहिष्कार – दीपक के किस बात से शर्मा जी के कान खड़े हो गये

Hindi Kahani : ‘‘महेश… अब उठ भी जाओ… यूनिवर्सिटी नहीं जाना है क्या?’’ दीपक ने पूछा.

‘‘उठ रहा हूं…’’ इतना कह कर महेश फिर से करवट बदल कर सो गया.

दीपक अखबार को एक तरफ फेंकते हुए तेजी से बढ़ा और महेश को तकरीबन झकझोरते हुए चीख पड़ा, ‘‘यार, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है… रातभर क्या करते रहते हो…’’

‘‘ठीक है दीपक भाई, आप नाश्ता तैयार करो, तब तक मैं तैयार होता हूं,’’ महेश अंगड़ाई लेता हुआ बोला और जल्दी से बाथरूम की तरफ लपका.

आधा घंटे के अंदर ही दीपक ने नाश्ता तैयार कर लिया. महेश भी फ्रैश हो कर तैयार था.

‘‘यार दीपू, जल्दी से नाश्ता कर के क्लास के लिए चलो.’’

‘‘हां, मेरी वजह से ही देर हो रही है जैसे,’’ दीपक ने तंज मारा.

दीपक की झल्लाहट देख महेश को हंसी आ गई.

‘‘अच्छा ठीक है… कोई खास खबर,’’ महेश ने दीपक की तरफ सवाल उछाला.

दीपक ने कहा, ‘‘अब नेता लोग दलितों के घरों में जा कर भोजन करने लगे हैं.’’

‘‘क्या बोल रहा है यार… क्या यह सच?है…’’

‘‘जी हां, यह बिलकुल सच है,’’ कह कर दीपक लंबी सांस छोड़ते हुए खामोश हो गया, मानो यादों के झरोखों में जाने लगा हो. कमरे में एक अनजानी सी खामोशी पसर गई.

‘‘नाश्ता जल्दी खत्म करो,’’ कह कर महेश ने शांति भंग की.

अब नेताओं के बीच दलितों के घरों में भोजन करने के लिए रिकौर्ड बनाए जाने लगे हैं. वक्तवक्त की बात है. पहले दलितों के घर भोजन करना तो दूर की बात थी, उन को सुबह देखने से ही सारा दिन मनहूस हो जाता था. लेकिन राजनीति बड़ेबड़ों को घुटनों पर झुका देती है.

‘‘भाई, आप को क्या लगता है? क्या वाकई ऐसा हो रहा है या महज दिखावा है? ये सारे हथकंडे सिर्फ हम लोगों को अपनी तरफ जोड़ने के लिए हो रहे हैं, इन्हें दलितों से कोई हमदर्दी नहीं है. अगर हमदर्दी है तो बस वोट के लिए…’’

दीपक महेश को रोकते हुए बोला, ‘‘यार, हमेशा उलटी बातें ही क्यों सोचते हो? अब वक्त बदल रहा है. समाज अब पहले से ज्यादा पढ़ालिखा हो गया है, इसलिए बड़ेबड़े नेता दलितों के यहां जाते हैं, न कि सिर्फ वोट के लिए, समझे?’’

‘‘मैं तो समझ ही रहा हूं, आप क्यों ऐसे नेताओं का पक्ष ले रहे हैं. चुनाव खत्म तो दलितों के यहां खाने का रिवाज भी खत्म. फिर जब वोट की भूख होगी, खुद ही थाली में प्रकट हो जाएंगे, बुलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

दीपक बात को बीच में काटते हुए बोला, ‘‘सुन महेश, मुझे कल सुबह की ट्रेन से गांव जाना है.’’

‘‘क्यों? अचानक से… कौन सा ऐसा काम पड़ गया, जो कल जाने की बात कर रहा है? घर पर सब ठीक तो हैं न?’’ महेश ने सवाल दागे.

‘‘हां, सब ठीक हैं. बात यह है कि गांव के शर्माजी के यहां तेरहवीं है तो जाना जरूरी है.’’

महेश बोला, ‘‘दीपू, ये वही शर्माजी हैं जो नेतागीरी करते हैं.’’

‘‘सही पकड़े महेश बाबू,’’ मजाकिया अंदाज में दीपू ने हंस कर सिर हिलाया.

अगले दिन दीपक अपने गांव पहुंच गया. उसे देखते ही मां ने गले लगाने के लिए अपने दोनों हाथ बढ़ा दिए.

‘‘मां, पिताजी कहां हैं? वे घर पर दिख नहीं रहे?’’

‘‘अरे, वे तो शर्माजी के यहां काम कराने गए हैं. सुबह के ही निकले हैं. अब तक कोई अतापता नहीं है. क्या पता कुछ खाने को मिला भी है कि नहीं.’’

‘‘अरे अम्मां, क्यों परेशान हो रही हो? पिताजी कोई छोटे बच्चे थोड़ी हैं, जो अभी भूखे होंगे. फिर शर्माजी तो पिताजी को बहुत मानते हैं. अब उन की टैंशन छोड़ो और मेरी फिक्र करो. सुबह से मैं ने कुछ नहीं खाया है.’’

थोड़ी देर बाद मां ने बड़े ही प्यार से दीपक को खाना खिलाया. खाना खा कर थोड़ी देर आराम करने के बाद दीपक भी शर्माजी के यहां पिताजी का हाथ बंटाने के लिए चल पड़ा.

तकरीबन 15 मिनट चलने के बाद गांव के किनारे मैदान में बड़ा सा पंडाल दिख गया, जहां पर तेजी के साथ काम चल रहा था. पास जा कर देखा तो पिताजी मजदूरों को जल्दीजल्दी काम करने का निर्देश दे रहे थे.

तभी पिताजी की नजर दीपक पर पड़ी. दीपक ने जल्दी से पिताजी के पैर छू लिए.

पिताजी ने दीपक से हालचाल पूछा, ‘‘बेटा, पढ़ाई कैसी चल रही है? तुम्हें रहनेखाने की कोई तकलीफ तो नहीं है?’’

दीपक ने कहा, ‘‘बाबूजी, मेरी फिक्र छोडि़ए, यह बताइए कि आप की तबीयत अब कैसी है?’’

‘‘बेटा, मैं बिलकुल ठीक हूं.’’

दीपक ने इधरउधर देख कर पूछा, ‘‘सारा काम हो ही गया है, बस एकडेढ़ घंटे का काम बचा है,’’ इस पर पिता ओमप्रकाश ने हामी भरी. इस के बाद दोनों घर की तरफ चल पड़े.

रात को 8 बजे के बाद दीपक घर आया तो मां ने पूछा, ‘‘दीपू अभी तक कहां था, कब से तेरे बाबूजी इंतजार कर रहे हैं.’’

‘‘अरे मां, अब क्या बताऊं… गोलू के घर की तरफ चला गया था. वहां रमेश, जीतू, राजू भी आ गए तो बातों के आगे वक्त का पता ही नहीं चला.’’

मां बोलीं, ‘‘खैर, कोई बात नहीं. अब जल्दी से शर्माजी के यहां जा कर भोजन कर आ.’’

कुछ ही देर में गोलू के घर पहुंच कर दीपक ने उसे आवाज लगाई.

गोलू जोर से चिल्लाया, ‘‘रुकना भैया, अभी आया. बस, एक मिनट.’’

5 मिनट बाद गोलू हांफता हुआ आया तो दीपक ने कहा, ‘‘क्या यार, मेकअप कर रहा था क्या, जो इतना समय लगा दिया?’’

गोलू सांस छोड़ते हुए बोला, ‘‘दीपू भाई, वह क्या है कि छोटी कटोरी नहीं मिल रही थी. तू तो जानता है कि मुझे रायता कितना पसंद है तो…’’

‘‘पसंद है तो कटोरी का क्या काम है?’’ दीपक ने अचरज से पूछा.

गोलू थोड़ा गंभीर होते हुए बोला, ‘‘दीपक, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हम लोग हमेशा से ही ऊंची जाति वालों के यहां घर से ही अपने बरतन ले कर जाते हैं, तभी खाने को मिलता है.’’

‘‘हां पता है, लेकिन अब ये पुरानी बातें हो गई हैं. अब तो हर पार्टी के बड़ेबड़े नेता भी दलितों के यहां जा कर खाना खाते हैं.’’

गोलू ने बताया, ‘‘ऊंची जाति के लोगों के लिए पूजा और भोजन का इंतजाम बड़े पंडाल में है, ताकि छोटी जाति वालों को पूजापाठ की जगह से दूर बैठा कर खाना खिलाया जा सके, जिस से भगवान और ऊंची जाति वालों का धर्म खराब न हो.

‘‘दलितों को खाना अलग दूर बैठा कर खिलाया ही जाता है, इस पर यह शर्त होती है कि दलित अपने बरतन घरों से लाएं, जिस से उन के जूठे बरतन धोने का पाप ऊंची जाति वालों को न लगे,’’ इतना कहने के बाद गोलू चुप हो गया.

लेकिन दीपक की बांहें फड़कने लगीं, ‘‘आखिर इन लोगों ने हमें समझ क्या रखा है, क्या हम इनसान नहीं हैं.

‘‘सुन गोलू, मैं तो इस बेइज्जती के साथ खाना नहीं खाऊंगा, चाहे जो हो जाए,’’ दीपक की तेज आवाज सुन कर वहां कई लोग जमा होने लगे.

‘‘क्या बात है? क्यों गुस्सा कर रहे हो?’’ एक ने पूछा.

‘‘अरे चाचा, कोई छोटीमोटी बात नहीं है. आखिर हम लोग कब तक ऊंची जातियों के लोगों के जूते को सिर पर रख कर ढोते रहेंगे, क्या हम इनसान नहीं हैं? आखिर कब तक हम उन की जूठन पर जीते रहेंगे?’’

‘‘यह भीड़ यहां पर क्यों इकट्ठा है? यह सब क्या हो रहा है,’’ पिता ओमप्रकाश ने भीड़ को चीरते हुए दीपक से पूछा.

इस से पहले दीपक कुछ बोल पाता, बगल में खड़े चाचाजी बोल पड़े, ‘‘ओम भैया, तुम ने दीपू को कुछ ज्यादा ही पढ़ालिखा दिया है, जो दुनिया उलटने की बात कर रहा है. इसे जरा भी लाज नहीं आई कि जिन के बारे में यह बुराभला कह रहा है, वही हमारे भाग्य विधाता?हैं. अरे, जो कुछ हमारे वेदों और शास्त्रों में लिखा है, वही तो हम लोग कर रहे हैं.’’

‘‘चाचाजी…’’ दीपक चीखा, ‘‘यही तो सब से बड़ी समस्या है, जो आप लोग समझना नहीं चाहते. क्या आप को पता है कि ये ऊंची जाति के लोगों ने खुद ही इस तरह की बातें गढ़ ली हैं. जब कोई बच्चा पैदा होता है तो उस का कोई धर्म या मजहब नहीं होता, वह मां के पेट से कोई मजहब या काम सीख कर नहीं आता.

‘‘सुनिए चाचाजी, जब बच्चे जन्म लेते हैं तो वे सब आजाद होते हैं, लेकिन ये हमारी बदकिस्मती है कि धर्म के ठेकेदार अपने फायदे के लिए लोगों को धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर, भाषा के नाम पर बांट देते हैं.

‘‘क्या आप लोगों को नहीं पता कि मेरे पिताजी ने मुझे पढ़ाया है. अगर वे भी यह सोच लेते कि दलितशूद्रों का पढ़ना मना है, तो क्या मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा होता?

‘‘इसी छुआछूत को मिटाने के लिए कई पढ़ेलिखे जागरूक दलितों ने कितने कष्ट उठाए, अगर वे पढ़ेलिखे नहीं होते तो क्यों उन्हें संविधान बनाने की जिम्मेदारी दी जाती?’’

एक आदमी ने कहा, ‘‘अरे दीपक, तू तो पढ़ालिखा है, मगर हम तो जमाने से यही देखते चले आ रहे हैं कि भोज में बरतन अपने घर से ले कर जाने पड़ते हैं. जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दो?’’

‘‘नहीं दादा, हम से यह न होगा, जिसे खाना खिलाना होगा, वह हमें भी अपने साथ इज्जत से खिलाए, वरना हम किसी के खाने के भूखे नहीं हैं. अब बहुत हो गया जुल्म बरदाश्त करतेकरते. मैं इस तरह से खाना नहीं खाऊंगा.’’

दीपक की बातों से गोलू को जोश आ गया. उस ने भी अपने बरतन फेंक दिए. इस से हुआ यह कि गांव के ज्यादातर दलितों ने इस तरह से खाने का बहिष्कार कर दिया.

‘‘शर्माजी, गजब हो गया,’’ एक आदमी बोला.

‘‘क्या हुआ? क्या बात है? सब ठीक तो है?’’

‘‘कुछ ठीक नहीं है. बस्ती के सारे दलित बिना खाना खाए वापस अपने घरों को जा रहे हैं. लेकिन मुझे यह नहीं पता कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं.’’

शर्माजी ने जल्दी से दौड़ लगा दी. दौड़ते हुए ही वे आवाज लगाने लगे, ‘‘अरे क्या हुआ, क्या कोई बात हो गई है, आप लोग रुकिए तो…’’

भीड़ में सन्नाटा छा गया. अब शर्माजी को कोई क्या जवाब दे.

‘‘देखिए शर्माजी…’’ दीपक बोला, ‘‘हम सब आप लोगों की बड़ी इज्जत करते हैं.’’

‘‘अरे दीपक, यह भी कोई कहने की बात है,’’ शर्माजी ने बीच में ही दीपक को टोका.

‘‘बात यह है कि अब से हम लोग इस तरह आप लोगों के यहां किसी भी तरह का भोजन नहीं किया करेंगे, क्योंकि हमारी भी इज्जत है. हम भी आप की तरह इनसान हैं, तो आप हमारे लिए अलग से क्यों कायदेकानून बना रखे हैं?

‘‘जब वोट लेना होता है तो आप लोग ही दलितों के यहां खाने को ले कर होड़ मचाए रहते हैं. जब चुनाव हो जाता है तो दलित फिर से दलित हो जाता है.’’

शर्माजी को कोई जवाब नहीं सूझा. वे चुपचाप अपना सा मुंह लटकाए वहीं खड़े रहे.

News Story: भगवाधारियों का फर्जी ‘आपरेशन सिंदूर’

News Story: कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव ज्यादा बढ़ गया था. ‘आपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों पर हमला करने के बाद भारत में हर जगह भारतीय सेना की खूब तारीफ हो रही थी.

भारत और पाकिस्तान की सरहद पर तनाव बढ़ा, तो पूरे उत्तर भारत में लोगों को आगाह करने के लिए सरकार की तरफ से भी दिशानिर्देश दिए गए.

अनामिका भी रोज इस तरह की खबरें सुन रही थी. आज शाम को उसे मोती नगर की मार्केट में अपने लिए कुछ छोटे कपड़े खरीदने के लिए जाना था. वहां अनामिका की जानपहचान की एक मंजू आंटी की दुकान थी, जहां सिर्फ औरतों और लड़कियों से जुड़े निजी सामान ही मिलते थे.

अनामिका ने शाम के 5 बजे विजय को फोन किया, ‘‘हाय, अभी क्या कर रहे हो? मुझे मंजू आंटी की दुकान से कुछ सामान लेना है. तुम भी आ जाना. कौफी पी लेंगे.’’

‘यार, मैं आज नहीं आ पाऊंगा,’ विजय ने कहा.

‘‘क्या हुआ? घर पर सब ठीक तो है न?’’ अनामिका ने पूछा.

‘घर पर तो सब ठीक है, पर मेरा दोस्त रहमान आज के हालात से थोड़ा घबराया हुआ सा है. वह यहां किराए पर अकेला रहता है और पिछले 2-3 दिन से महल्ले के कुछ सिरफिरे लोग इसे ‘पाकिस्तान का जासूस’ कह कर चिढ़ा रहे हैं. जबरदस्ती ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने को बोल रहे हैं.

‘कल तो हद ही हो गई. यहीं के एक गुंडे ने उस से कह दिया कि ‘आपरेशन सिंदूर’ शुरू हो गया है, अब तुझ जैसों की मांग भरने का वक्त आ गया है,’ विजय ने बताया.

‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. कोई बात नहीं. तुम रहमान के साथ रहो. मुझे मंजू आंटी के पास ज्यादा समय नहीं लगेगा. कौफी फिर कभी पी लेंगे,’’ अनामिका बोली.

‘मेरा तुम्हारे साथ आने का बड़ा मन था, पर रहमान को मेरी ज्यादा जरूरत है. तुम मार्केट में अपना ध्यान रखना,’ विजय ने इतना कह कर फोन काट दिया.

शाम के साढ़े 6 बजे थे. अनामिका मोती नगर की मार्केट में जा रही थी. आम दिनों की तरह चहलपहल थी. एक दुकान के सामने भीड़ जमा थी. वह किराने की दुकान थी. कोई गुप्ताजी पिछले 30 साल से यह दुकान चला रहे थे. गल्ले पर वही बैठे थे.

दुकान पर जमा वह भीड़ ग्राहकों की नहीं थी, बल्कि 8-10 भगवाधारी नौजवान उन गुप्ताजी से उलझे हुए थे.

एक नौजवान चिल्ला रहा था, ‘‘समझ नहीं आता क्या… जब हम ने बोल दिया है कि ब्लैकआउट हो गया है, तो फिर दुकान खोलने की जिद क्यों कर रहे हो…?’’

‘‘पर मौक ड्रिल तो शाम को 8 बजे शुरू होगी. पहले सायरन बजेगा, फिर सब को 15 मिनट के लिए अपनी दुकान की बिजली बंद करनी है और शटर डाउन कर के दुकान के अंदर तब तक रहना है, जब तक अगला सायरन न बज जाए…’’ गुप्ताजी ने अपनी बात रखी.

‘‘पहलगाम में आतंकियों ने चुनचुन कर हिंदुओं को मार दिया और आप यहां हम से बहस कर रहे हो? इस इलाके का प्रशासन हम ही हैं. हमारी बात मानो और दुकान बंद कर के घर चले जाओ. आज की कमाई हो गई आप की,’’ एक और भगवाधारी ने कहा और दुकान के बाहर रखे कोल्डड्रिंक के क्रेट को पलटने का दिखावा करने लगा, ताकि गुप्ताजी डर जाएं.

इसी बीच 2-3 मुस्टंडे गुप्ताजी की नजर बचा कर चीनी की एक बोरी ही गायब कर गए. उन्होंने बड़ी चालाकी से वह बोरी उठाई और अपनी कार की डिग्गी में छिपा दी. एक लड़के ने तो गुप्ताजी के सामने ही एक जार से कुछ चौकलेट निकाल ली और बाकी सब लोगों में बांट दी.

‘‘चलो, अब अगली दुकान वाले को हड़काते हैं. जब तक सब की हवा टाइट नहीं होगी, हमारा दबदबा कैसे बनेगा. ‘आपरेशन सिंदूर’ के बहाने अपनी दुकान भी तो चमकानी है,’’ उन सब लोगों का नेता दिखने वाले एक नौजवान ने कहा और बाकी सब उस के पीछे हो लिए.

मंजू आंटी की दुकान थोड़ा आगे थी. मंजू आंटी विधवा थीं और उन्होंने अपने पति की दुकान को अब अच्छे से संभाला हुआ था. उन की एक बेटी थी, जो शादी के बाद अपने पति के साथ आस्ट्रेलिया में रह रही थी.

‘‘आंटी, मुझे ब्रा दिखाइए… और हां, गरमी है न तो सूती ही दिखाना, वरना पसीने से दिक्कत होती है,’’ अनामिका ने मंजू आंटी को बताया.

मंजू आंटी को अनामिका का साइज पता था. वे बोलीं, ‘‘कल ही नया माल आया है. बहुत अच्छी क्वालिटी का है. तुझे पसंद आएगा.’’

‘‘आंटी, दीदी की शादी और अंकल के जाने के बाद आप एकदम अकेली पड़ गई हैं. अच्छा है कि आप दुकान संभाल रही हैं, वरना घर बैठे बोर हो जातीं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘यह तो है, पर जब से पहलगाम कांड हुआ है, तब से मन में अजीब सा डर भर गया है. भारत और पाकिस्तान की सरहद पर तनाव बढ़ा हुआ है. रोजाना एकदूसरे पर ड्रोन से हमले की खबरें आ रही हैं… पता नहीं, आगे क्या होगा,’’ मंजू आंटी ने पैकेट से ब्रा निकालते हुए अनामिका से कहा.

‘‘अच्छा आंटी, मुझे कोई बढि़या सा रेजर भी दे दीजिए,’’ अनामिका ने ब्रा की क्वालिटी चैक करते हुए कहा.

आज अनामिका बेहद खूबसूरत लग रही थी और बारबार खुद को आईने में देख रही थी, तभी उसे आईने में दिखा कि कुछ लड़के दुकान में घुस आए हैं. लेडीज सामान की दुकान में लड़कों का क्या काम… अनामिका को उन के इरादे ठीक नहीं लगे.

‘‘ओ आंटी, जल्दी से अपनी दुकान बंद करो और घर जाओ. ब्लैकआउट हो गया है,’’ एक भगवाधारी ने गेट पर डंडा मारते हुए कहा.

‘‘किस के कहने पर यह ब्लैकआउट किया गया है? प्रशासन ने तो मौक ड्रिल का समय रात 8 बजे रखा है,’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘तू कौन है…? बड़ी जबान चला रही है. अपना सामान ले और निकल यहां से. जल्दी घर जा. कहीं कोई अनहोनी हो गई, तो दिक्कत हो जाएगी. घर पर मम्मीपापा इंतजार कर रहे होंगे,’’ एक भगवाधारी ने कहा.

‘‘छोटू, दीदी को उन के घर छोड़ आ. और हां, रास्ते में इन्हें कोई दिक्कत न हो,’’ एक कमउम्र साथी को आवाज लगाते हुए उस भगवाधारी ने अनामिका को ऊपर से नीचे तक देखा.

‘‘यह कैसी जबरदस्ती है. हमें कोई आदेश नहीं मिला है जल्दी दुकान बंद करने का,’’ मंजू आंटी ने कहा.

‘‘वहां भारत की सेना हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान से लोहा ले रही है और यहां आंटीजी को जल्दी दुकान बंद करने में दिक्कत हो रही है. पहलगाम में मारे गए हिंदुओं की विधवाओं के नाम पर सरकार ने ‘आपरेशन सिंदूर’ चलाया है और आंटीजी को ब्रा बेच कर अपना घर पैसों से भरना है,’’ एक भगवाधारी ने कहा.

‘‘तो तुम्हें क्या लगता है कि पहलगाम में मारे गए लोगों का दुख हमें नहीं है. बेटा, मैं अपनी दुकान की हर शादीशुदा ग्राहक को सिंदूर की डब्बी मुफ्त में दे रही हूं,’’ मंजू आंटी भावुक हो कर बोलीं.

यह सुन कर भगवाधारी लीडर ने कहा, ‘‘यह तो बड़ा महान काम किया आप ने. पर ‘आपरेशन सिंदूर’ की तूती हर जगह बोल रही है. भारत ने 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जवाबी ऐक्शन के रूप में 7 मई की सुबह ‘आपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था.

‘‘पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 28 लोगों की मौत हुई थी. वहीं, इस के जवाब में ‘आपरेशन सिंदूर’ के तहत 100 से ज्यादा आतंकियों का खात्मा किया गया.

‘‘कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका ने ‘आपरेशन सिंदूर’ के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस मिशन के दौरान आतंकियों के 9 ठिकानों को कामयाबी के साथ बरबाद किया गया है.

‘‘समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, प्रतिबंधित आतंकी संगठनों जैश ए मोहम्मद, लश्कर ए तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन के हैडक्वार्टरों को निशाना बना कर 9 ठिकानों बहावलपुर के मरकज सुब्हान अल्लाह, मुरिदके के मरकज तैयबा, टेहड़ा कलां के सरजाल, सियालकोट के महमूना जोया, बरनाला के मरकज अहले हदीस, कोटली के मरकज अब्बास और मस्कर रहील शहीद, मुजफ्फराबाद के सवाई नाला कैंप और सैयदना बिलाल कैंप पर हमला कर उन्हें खत्म किया गया.’’

‘‘मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में कई बेकुसूर लोग मारे गए थे, कइयों की मांग का सिंदूर उजड़ गया था. उस कायराना हमले में विवाहित महिलाओं के सिंदूर को आतंकियों ने उजाड़ दिया था, इसलिए बदले के इस ऐक्शन को ‘आपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया था. इस नाम का मतलब उन बेकुसूर महिलाओं, जिन का सिंदूर उजड़ गया, को इंसाफ दिलाना था,’’ एक और भगवाधारी ने अपनी बात रखी.

‘‘तो क्या जिन कुंआरी लड़कियों ने अपने पिता, भाई या दूसरे पारिवारिक सदस्य को खोया है, उन्हें इंसाफ दिलाने का सरकार का कोई इरादा नहीं था?’’ अनामिका ने चुटकी ली.

‘‘तुम जैसे लोग भी आतंकियों से कम नहीं हो. न सरकार पर यकीन करते हो और न ही हिंदुत्व की बात करने वालों पर. तुम से अच्छी तो ये आंटी हैं, जो मुफ्त में सिंदूर बांट रही हैं,’’ उन लोगों के लीडर ने गुस्से में कहा.

इतने में एक लड़के ने सिंदूर का बक्सा उठा लिया और बोला, ‘‘आंटीजी, आप अपने दिल पर ज्यादा बोझ मत लेना. आप के नाम से हम बांट देंगे औरतों को. आप तो दुकान बंद करो और घर जाओ.’’

‘‘यह क्या गुंडागर्दी है… सिंदूर का बक्सा वापस रखो, वरना अच्छा नहीं होगा,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या कर लेगी?’’ भगवाधरी गैंग का लीडर चिल्लाया.

‘‘वाह, एक तरफ तुम पाकिस्तानी आतंकवाद का रोना रो रहे हो और वहीं दूसरी तरफ यहां कमजोर को सता रहे हो. तुम भी आतंकियों से कम नहीं हो. देश को तुम जैसे लोगों से सावधान रहना चाहिए, जो अपने नकली हिंदुत्व की दुकान चमकाने के लिए यह सब नौटंकी कर रहे हो,’’ अनामिका को अब गुस्सा आ गया था.

‘‘बड़ी जबान चल रही है तेरी,’’ एक लड़के ने अनामिका को हड़काया.

‘‘जबान ही नहीं, मेरे लातघूंसे भी खूब चलते हैं,’’ इतना कह कर अनामिका ने वहां रखी कैंची उठा ली और चिल्लाई, ‘‘निकलो यहां से, वरना एकएक का पेट चीर दूंगी.’’

एक भगवाधारी अनामिका के करीब आया, तो उस ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया और मंजू आंटी के सामने जा कर अड़ गई.

यह सब देख कर वे लोग थोड़ा घबरा गए, क्योंकि उन्होंने पहले ही किराने वाले को लूटा था. वे आंखें दिखाते हुए वहां से चले गए.

‘‘बेटी, तुम बड़ी दिलेर निकली. पर, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. अगर कुछ हो जाता तो मैं अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाती,’’ मंजू आंटी ने कहा.

‘‘मैं इन जैसे टुच्चों से बखूबी निबटना जानती हूं. आप चिंता मत करें. पर अब दुकान बंद कर लो,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘तुम ठीक कहती हो. रुको, हम दोनों साथ चलेंगे. आज पहले मेरे घर चलना. अपने हाथ की चाय पिलाऊंगी,’’ मंजू आंटी ने कहा.

दुकान बंद कर के वे दोनों वहां से चली गईं. घर पर मंजू आंटी ने बढि़या सी चाय बनाई और बोलीं, ‘‘आज का माहौल बड़ा खराब है. हर कोई चौधरी बना फिर रहा है. इस से देश का माहौल काफी बिगड़ता है.’’

‘‘आप ठीक कहती हैं. मेरे बौयफ्रैंड को आज मेरे साथ आना था, पर वह अपने एक दोस्त रहमान के साथ है. जब से देश में यह भारत और पाकिस्तान का माहौल बना है, रहमान काफी डरा हुआ सा है,’’ अनामिका बोली.

‘‘सब ठीक हो जाएगा. हर समाज में अच्छेबुरे लोग होते हैं. तुम यह चाय लो, ठंडी हो रही है,’’ मंजू आंटी बोलीं.

‘‘जी आंटी. पर, मैं जरा विजय को फोन कर लूं,’’ इतना कह कर अनामिका ने विजय को फोन लगाया.

‘‘क्या हो रहा है?’’ अनामिका बोली.

‘कुछ नहीं. तुम्हारी खरीदारी कैसी रही?’

‘‘एकदम बेकार,’’ अनामिका ने उदास हो कर कहा.

‘कल मिलें?’ विजय ने पूछा.

‘‘हां, मुझे तुम से कुछ कहना भी है,’’ अनामिका बोली.

‘कल रात को छत पर आ जाना. पूर्णिमा आने वाली है. चांदनी रात में प्यारभरी बातें करेेंगे. ब्लैकआउट होगा तो और मजा आएगा,’’ विजय बोला.

‘‘ओह, जनाब को इश्कबाजी करनी है,’’ अनामिका का मूड थोड़ा ठीक हुआ.

‘‘हां, बहुत दिन हो गए, अकेले में मिले.’’

‘‘ठीक है. कल रात को मिलते हैं,’’ अनामिका बोली.

Funny Story: कर्ज ले कर घी पीना तरक्की का पैमाना

Funny Story: कर्ज ले कर घी पीना पुरानी कहावत है. आज के आदमी में तो घी पीने का स्टैमिना ही नहीं बचा. गंगाधर को तो उस समय हैरानी हुई, जब उसे पता चला कि दुनिया के अमीर देश अमेरिका के ऊपर तकरीबन 37 लाख करोड़ डौलर का कर्ज है, जो इस की जीडीपी का तकरीबन 122 फीसदी है. वहां की सरकार अब इस के बारे में चिंतित है कि कहीं अमेरिका, जो दुनिया के भविष्य के लिए तरहतरह से चिंतित रहता है, दिवालियापन के चलते इस का भविष्य ही अंधकार से न भर जाए.

भारतीय रुपए में यह तकरीबन 3,250 लाख करोड़ रुपए है. कहां भारत 5 ट्रिलियन डौलर की इकोनौमी बनने के सपने न जाने कब से देख रहा है, जबकि अमेरिका पर कर्ज ही इस के 6 गुना से ज्यादा है. भारत का कर्ज सितंबर, 2024 में 161 लाख करोड़ था यानी अमेरिका से 20 गुना कम, जो हमारी जीडीपी का भी महज 60 फीसदी के आसपास है.

ब्रिटेन और फ्रांस जैसे विकसित देशों का भी कर्ज उन की जीडीपी से ज्यादा है. अब समझ आ रहा है कि हम पिछडे़ के पिछडे़ क्यों बने हुए हैं. अगर कुछ साल पहले ही थोड़ा ज्यादा कर्ज ले कर घी पीने की आदत डाल ली होती, तो पिछडे़पन के शाप से कब का छुटकारा पा गए होते.

पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ही कर्ज पर टिकी है. अब सुपर पावर का मतलब सुपर कर्ज से है और विकासशील मतलब कर्जशील से है. पहले आमदनी, फिर उस के बाद खपत के आधार पर गरीबी की रेखा तय की गई थी, लेकिन अब कर्ज की बुनियाद पर इसे तय करना चाहिए. जिस पर बहुत मामूली सा कर्ज है, वह गरीब. जिस पर बिलकुल भी कर्ज नहीं है, वह दीनहीन या बहुत ज्यादा गरीब और जिस पर ज्यादा कर्ज है, वह अमीर कहलाएगा. जिस पर बहुत ही ज्यादा कर्ज है वह अमीरेआजम.

लगता है कि हमारे नेता अब जा कर इस बात को सम?ा पाए हैं, इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा कर्ज लेने के लिए एक पैर से तैयार रहते हैं. वोटरों को मुफ्त की रेवड़ी बांटने का सब से आसान जरीया कर्ज ले कर बांटना ही है, जिस में कोई भी सरकार बंटी नहीं है, सब एकमत हैं. यहां ‘बंटेंगे तो सत्ता से हटेंगे’ इन का नारा है.

आलोचकों को अब आम बजट के समय अपना मुंह बंद रखना चाहिए. रुपया आता कहां से है और जाता कहां है के पाई चार्ट में कर्ज की देनदारी अभी भी एकचौथाई से ज्यादा नहीं रहती. क्या यह एक सब से बड़ी वजह है हमारे मुद्दत से विकासशील ही बने रहने की?

अगर जम कर कर्ज न लेने के शील को जल्द ही हम ने नहीं उतार फेंका, तो हम साल 2047 क्या साल 2147 तक भी विकसित नहीं बन पाएंगे. सरकार को तो रेवड़ी बांटने की आधा दर्जन और योजनाएं जल्दी ही ले आनी चाहिए. सरकार का आज मतलब ही है, जो कि खुद भी कर्ज ले कर घी पीए व वोटरों को भी पिलाती रहे.

मोटी बात है कि भारत का कर्ज अमेरिका और दूसरे विकसित देशों के लैवल से कोसों दूर है, तो विकसित का टैग भी कोसों दूर रहेगा. तो इसे उस लैवल पर पंहुचाने के लिए सारे जरूरी कदम पहली फुरसत में उठाने चाहिए. पहला कदम यह कि यहां का एकएक आदमी कर्ज में डूबा होना चाहिए. क्रेडिट कार्ड लेना मैंडेटरी कर दिया जाए.

बहुत से कारोबारी घराने अपनी कंपनी को पब्लिक नहीं करना चाहते. यह सब धांधली सरकार को एक कानून बना कर बंद कर देनी चाहिए. मतलब इतना सा है कि जो भी कर्ज का घी नहीं पी रहा है, उस के लिए घी पीना मैंडेटरी कर दिया जाएगा. नसबंदी के समय जैसी कड़ाई कर देनी चाहिए. जो उधार का घी पीना न चाह रहा हो, उसे पकड़ कर उधार का घी मुंह में जबरन डाल दिया जाए.

अगर आप के पास पूंजी रूपी घी है तो भी कर्ज रूपी घी पीना ही होगा. जब कर्ज विकसित देशों के लैवल का पहुंचेगा, तो हमें विकास के उस लैवल तक पहुंचने से कोई रोक नहीं पाएगा.

साल 2023 में चीन तक का कर्ज उस की जीडीपी का 83 फीसदी था. हाथ कंगन को आरसी क्या… देखिए, चीन के सामने हम कहां खडे़ हैं.

हमारी सरकार भले ही रोजगार के मौके बढ़ाने की बात को सालों से आत्मसात नहीं कर पा रही हो, पर इस बात को आत्मसात कर गई है. सरकार को एक नई कर्ज नीति जल्दी ही बना देनी चाहिए, जिस में पैदा होने से ले कर मरने तक बारबार कर्ज लेना मैंडेटरी होगा. इस से बहुत जल्दी बजट में रुपया आता कहां से है, जाता कहां है संबंधी पाई चार्ट के एकचौथाई पर और कब्जा हो जाएगा यानी आधी कमाई कर्ज व ब्याज चुकाने पर.

आदर्श हालात वही होंगे कि एक रुपया कमाओ तो कम से कम एक रुपए का कर्ज तुरंत लो. जितनी आवक हो, वह कर्ज व ब्याज पटाने में चली जाए, बल्कि अमेरिका जैसे और अमीर बनना है, तो 122 फीसदी का बैंचमार्क है. अमेरिका कौन सा अपनी वर्तमान तरक्की से संतुष्ट है. वह तो लगातार तरक्की करते हुए जीडीपी का 200 फीसदी कर्ज ले कर तरक्की की हद पर पहुंच कर ही मानेगा.

एक और बात कि अगर कोई राज्य सरकार उधार का घी पीने के मामले में पिछड़ी है, तो केंद्र सरकार अपनी ओर से ही उस का उधारी का घी ले कर उस को भी अच्छा कर्जदार बना कर तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाने का बीड़ा खुद उठाए. क्षेत्रीय असमानता न बढे़, यह जिम्मेदारी आखिर केंद्र सरकार की ही होती है.

केंद्र सरकार को अगर मां माना जाए तो राज्य सरकारें उस की संतानें हुईं. मां का काम है कि अपने सभी बच्चों को एक ही नजर से देखना. जो उधार का घी न पी कर कमजोर हो रहा है, उसे जबरन घी पिला कर सेहतमंद बनाए रखना.

निजी कर्ज की भी बात की जाए, तो आज जिस ने लाखों रुपए का तरहतरह का कर्ज नहीं ले रखा है या उस के पास क्रेडिट कार्ड नहीं है तो वह पिछडा़ ही माना जाता है. ऐसा आदमी गर्लफ्रैंड पर क्या खर्च कर पाएगा. होनहार नौजवान तो इस के लिए चेन स्नैचिंग तक करते हैं. जो अपनी तनख्वाह का आधा क्रेडिट कार्ड के भुगतान पर न करे, वह प्रगतिशील कैसे हो सकता है.

वैसे, हम तरक्की के रास्ते पर हैं. हमारे यहां अब किसान, नौजवान, कारोबारी कर्ज से परेशान हो कर खुदकुशी कर रहे हैं, जो पिछड़े समाज के लक्षण हैं.

पहले जब देश गरीब था, आप एक भी घटना बताओ, जब किसी किसान ने खुदकुशी की हो. गरीब की पहचान ही है कि उसे कर्ज नहीं मिलता. पर जिसे अरबों रुपए का कर्ज मिलता है, वह ‘राष्ट्र निर्माता’ कहलाता है.

कर्ज का ज्यादा घी पीने वाले की बैंक में आवभगत की जाती है. जिस ने ऐसा घी पिया ही नहीं, उसे खड़ा रखा जाता है या दुत्कार कर भगा दिया जाता है.

सरकार कितनी दयालु है. उस ने ढेरों योजनाएं नौजवानोंअधेड़ों को कर्ज देने के लिए बना रखी हैं. वह चाहती है कि औसत प्रति व्यक्ति घरेलू कर्ज है, वह अभी के तकरीबन 40,000 से बढ़ कर कम से कम एक लाख रुपए हो जाए, तो अपनेआप तरक्की दिखने लगेगी. उधार अब प्रेम की कैंची नहीं, बल्कि विकास की सीढ़ी माना जाता है.

आम आदमी सरकार के उधार पर ही तो मस्त है. लाड़ली बहना फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन सरकार द्वारा दी गई किस्तों के दम पर किस्तों पर उठा रही है.

आम आदमी का सरकार को कम से कम इस बात का कर्जदार होना चाहिए कि वह खुद के साथ ही सब को मोटा कर्जदार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही है.

आत्मनिर्भर भारत भी कर्ज की बुनियाद पर ही बनाया गया है. अरे, उधार ले कर घी पीने से डरते क्यों हो…? आगामी चुनाव में माफी हो जाएगी. यहां ये सुविधा भी तो है कि सैकड़ोंहजारों करोड़ का कर्ज न चुका पाओ, तो रातोंरात दूसरे देश भाग सकते हो. उधार पर जितना ऐश कर सकते हो कर लो, सरकार भी तो कर रही है.

अब जल्दी ही वह समय आने वाला है, जब कहा जाएगा कि यहां का हर आदमी अच्छाखासा कर्ज ले कर अच्छाखासा घी पी रहा है और ईएमआई में गुमशुदा है.

Family Story: अवगुण चित न धरो – कैसा था मयंक का अंतर्मन

Family Story: समुद्र के किनारे बैठ कर वह घंटों आकाश और सागर को निहारता रहता. मन के गलियारे में घुटन की आंधी सरसराती रहती. ऐसा बारबार क्यों होता है. वह चाहता तो नहीं है अपना नियंत्रण खोना पर जाने कौन से पल उस की यादों से बाहर निकल कर चुपके- चुपके मस्तिष्क की संकरी गली में मचलने लगते हैं. कदाचित इसीलिए उस से वह सब हो जाता है जो होना नहीं चाहिए.

सुबह से 5 बार उसे फोन कर चुका है पर फौरन काट देती है. 2 बार गेट तक गया पर गेटकीपर ने कहा कि छोटी मेम साहिबा ने मना किया है गेट खोलने को.

वह हताश हो समुद्र के किनारे चल पड़ा था. अपनी मंगेतर का ऐसा व्यवहार उसे तोड़ रहा था. घर पहुंच कर बड़बड़ाने लगा, ‘क्या समझती है अपनेआप को. जरा सी सुंदर है और बैंक में आफिसर बन गई है तो हवा में उड़ी जा रही है.’

मयंक के कारण ही अब उन का ऊंचे घराने से नाता जुड़ा था. जब विवाह तय हुआ था तब तो साक्षी ऐसी न थी. सीधीसादी सी हंसमुख साक्षी एकाएक इतनी बदल क्यों गई है?

मां ने मयंक की बड़बड़ाहट पर कुछ देर तो चुप्पी साधे रखी फिर उस के सामने चाय का प्याला रख कर कहा, ‘‘तुम हर बात को गलत ढंग से समझते हो.’’

‘‘आप क्या कहना चाह रही हैं,’’ वह झुंझला उठा था.

मम्मी उस के माथे पर प्यार से हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘‘पिछले हफ्ते चिरंजीव के विवाह में तुम्हारे बुलाने पर साक्षी भी आई थी. जब तक वह तुम से चिपकी रही तुम बहुत खुश थे पर जैसे ही उस ने अपने कुछ दूसरे मित्रों से बात करना शुरू किया तुम उस पर फालतू में बिगड़ उठे. वह छोटी बच्ची नहीं है. तुम्हारा यह शक्की स्वभाव उसे दुखी कर गया होगा तभी वह बात नहीं कर रही है.’’

मयंक सोच में पड़ गया. क्या मम्मी ठीक कह रही हैं? क्या सचमुच मैं शक्की स्वभाव का हूं?

दफ्तर से निकल कर साक्षी धीरेधीरे गाड़ी चला रही थी. फरवरी की शाम ठंडी हो चली थी. वह इधरउधर देखने लगी. उस का मन बहुत बेचैन था. शायद मयंक को याद कर रहा था.

पापा ने कितने शौक से यह विवाह तय किया था. मयंक पढ़ालिखा नौजवान था. एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर था. कंपनी ने उसे रहने के लिए बड़ा फ्लैट, गाड़ी आदि की सुविधा दे रखी थी. बहुत खुश थी साक्षी. पर घड़ीघड़ी उस का चिड़चिड़ापन, शक्की स्वभाव उस के मन को बहुत उद्वेलित कर रहा था. मयंक के अलगअलग स्वभाव के रंगों में कैसे घुलेमिले वह. लाल बत्ती पर कार रोकी तो इधरउधर देखती आंखें एक जगह जा कर ठहर गईं. ठंडी हवा से सिकुड़ते हुए एक वृद्ध को मयंक अपना कोट उतार कर पहना रहा था.

कुछ देर अपलक साक्षी उधर ही देखती रही. फिर अचानक ही मुसकरा उठी. अब इसे देख कर कौन कहेगा कि यह कितना चिड़चिड़ा और शक्की इनसान है. इस का क्रोध जाने किधर गायब हो गया. वह कार सड़क के किनारे पार्क कर के धीरेधीरे वहां जा पहुंची. मयंक जाने को मुड़ा तो उस ने अपने सामने साक्षी को खड़ा मुसकराता पाया. इस समय साक्षी को उस पर क्रोध नहीं बल्कि मीठा सा प्यार आ रहा था.

मयंक का हाथ पकड़ कर साक्षी बोली, ‘‘मैं ने सोचा फोन पर क्यों मनाना- रूठना, आमनेसामने ही दोनों काम कर डालते हैं.’’

पहले मनाने का कार्य मयंक कर रहा था पर अब साक्षी को देखते ही उस ने रूठने की ओढ़नी ओढ़ ली और बोला, ‘‘अभी से बातबेबात नाराज होने का इतना शौक है तो आगे क्या करोगी?’’

साक्षी मन को शांत रखते हुए बोली, ‘‘चलो, कहां ले जाना चाहते थे. 2 घंटे आप के साथ ही बिताने वाली हूं.’’

मयंक अकड़ कर चलते हुए अपनी कार तक पहुंचा और अंदर बैठ कर दरवाजा खोल साक्षी के आने की प्रतीक्षा करने लगा. साक्षी बगल में बैठते हुए बोली, ‘‘वापसी में आप को मुझे यहीं छोड़ना होगा क्योंकि अपनी गाड़ी मैं ने यहीं पार्क की है. ’’

कार चलाते हुए मयंक ने पूछा, ‘‘साक्षी, क्या तुम्हें लगता है कि मैं अच्छा इनसान नहीं हूं?’’

‘‘ऐसा तो मैं ने कभी नहीं कहा.’’

‘‘पर तुम्हारी बेरुखी से मुझे ऐसा ही लगता है.’’

‘‘देखो मयंक,’’ साक्षी बोली, ‘‘हमें गलतफहमियों से दूर रहना चाहिए.’’

मयंक एक अस्पताल के सामने रुका तो साक्षी अचरज से उस के साथ चल दी. कुछ दूर जा कर पूछ बैठी, ‘‘क्या कोई अस्वस्थ है?’’

मयंक ने धीरे से कहा, ‘‘नहीं,’’ और वह सीधा अस्पताल के इंचार्ज डाक्टर के कमरे में पहुंच गया. उन्होंने देखते ही प्यार से उसे बैठने को कहा. लगा जैसे वह मयंक को भलीभांति पहचानते हैं. मयंक ने एक चेक जेब से निकाल कर डाक्टर के सामने रख दिया.

‘‘आप लोगों की यह सहृदयता हमारे मरीजों के बहुत से दुख दूर करती है,’’ डाक्टर ने मयंक से कहा, ‘‘आप को देख कर कुछ और लोग भी हमारी सहायता को आगे आए हैं. बहुत जल्द हम कैंसर पीडि़तों के लिए एक नया और सुविधाजनक वार्ड आरंभ करने जा रहे हैं.’’

मयंक ने चलने की आज्ञा ली और साक्षी को चलने का संकेत किया. कार में बैठ कर बोला, ‘‘तुम परेशान हो कि मैं यहां क्यों आता हूं.’’

‘‘नहीं. एक नेक कार्य के लिए आते हो यह तुरंत समझ में आ गया,’’ साक्षी मुसकरा दी.

मयंक चुपचाप गाड़ी चलातेचलाते अचानक बोल पड़ा, ‘‘साक्षी, क्या तुम्हें मैं शक्की स्वभाव का लगता हूं?’’

साक्षी चौंक कर सोच में पड़ गई कि यह व्यक्ति एक ही समय में विचारों के कितने गलियारे पार कर लेता है. पर प्रत्यक्ष में बोली, ‘‘क्या मैं ने कभी कहा?’’

‘‘यही तो बुरी बात है. कहती नहीं हो…बस, नाराज हो कर बैठ जाती हो.’’

‘‘ठीक है. अब नाराज होने से पहले तुम्हें बता दिया करूंगी.’’

‘‘मजाक कर रही हो.’’

‘‘नहीं.’’

‘‘मुझे तुम्हारे रूठने से बहुत कष्ट होता है.’’

साक्षी को उस की गाड़ी तक छोड़ कर मयंक बोला, ‘‘क्लब जा रहा हूं, चलोगी?’’

‘‘आज नहीं, फिर कभी,’’ साक्षी बाय कर के चल दी.

विवाह की तारीख तय हो चुकी थी. दोनों तरफ विवाह की तैयारियां जोरशोर से चल रही थीं. एक दिन साक्षी की सास का फोन आया कि नलिनी यानी साक्षी की होने वाली ननद ने अपने घर पर पार्टी रखी है और उसे भी वहां आना है. यह भी कहा कि मयंक उसे लेने आ जाएगा. उस दिन नलिनी के पति विराट की वर्षगांठ थी.

साक्षी खूब जतन से तैयार हुई. ननद की ससुराल जाना था अत: सजधज कर तो जाना ही था. मयंक ने देखा तो खुश हो कर बोला, ‘‘आज तो बिजली गिरा रही हो जानम.’’

पार्टी आरंभ हुई तो साक्षी को नलिनी ने सब से मिलवाया. बहुत से लोग उस की शालीनता और सौंदर्य से प्रभावित थे. विराट के एक मित्र ने उस से कहा, ‘‘बहुत अच्छी बहू ला रहे हो अपने साले की.’’

‘‘मेरा साला भी तो कुछ कम नहीं है,’’ विराट ने हंस कर कहा. मयंक ने दूर से सुना और मुसकरा दिया. मां ने कहा था कि पार्टी में कोई तमाशा न करना और उन की यह नसीहत उसे याद थी. इसलिए भी मयंक की कोशिश थी कि अधिक से अधिक वह साक्षी के निकट रहे.

डांस फ्लोर पर जैसे ही लोग थिरकने लगे तो मयंक ने झट से साक्षी को थाम लिया. साक्षी भी प्रसन्न थी. काफी समय से मयंक उसे खुश रखने के लिए कुछ न कुछ नया करता रहा था. कभी उपहार ला कर, कभी सिनेमा या क्लब ले जा कर. एक दिन साक्षी ने अपनी होने वाली सासू मां से कहा, ‘‘मम्मीजी, मयंक बचपन से ही ऐसे हैं क्या? एकदम मूडी?’’

मम्मी ने सुनते ही एक गहरी सांस भरी थी. कुछ पल अतीत में डूबतेउतराते व्यतीत कर दिए फिर बोलीं, ‘‘यह हमेशा से ऐसा नहीं था.’’

‘‘फिर?’’

‘‘क्या बताऊं साक्षी…सब को अपना मानने व प्यार करने के स्वभाव ने इसे ऐसा बना दिया.’’

साक्षी ने उत्सुकता से सासू मां को देखा…वह धीरेधीरे अतीत में पूरी तरह डूब गईं.

पहले वे लोग इतने बड़े घर व इतनी हाई सोसायटी वाली कालोनी में नहीं रहते थे. मयंक को शानदार घर मिला तो वे यहां आए.

उस कालोनी में हर प्रकार के लोग थे और आपस में सभी का बहुत गहरा प्यार था. मयंक बंगाली बाबू मकरंद राय के यहां बहुत खेलता था. उन का बेटा पवन और बेटी वैदेही पढ़ते भी इस के साथ ही थे. वैदेही कत्थक सीखा करती थी. कभीकभी मयंक भी उस का नृत्य देखता और खुश होता रहता.

उस दिन राय साहब ने वैदेही की वर्षगांठ की एक छोटी सी पार्टी रखी थी. आम घरेलू पार्टी जैसी थी. महल्ले की औरतों ने मिलजुल कर कुछ न कुछ बनाया था और बच्चों ने गुब्बारे टांग दिए थे. इतने में ही वहां खुशी की मधुर बयार फैल गई थी.

राय साहब बंगाली गीत गाने लगे तो माहौल बहुत मोहक हो गया. तभी किसी ने कहा, ‘वैदेही का डांस तो होना ही चाहिए. आज उस की वर्षगांठ है.’

सभी ने हां कही तो वैदेही भी तैयार हो गई. वह तुरंत चूड़ीदार पायजामा और फ्राक पहन कर आ गई. उसे देखते ही उस के चाचा के बच्चे मुंह पर हाथ रख कर हंसने लगे. मयंक बोला, ‘क्यों हंस रहे हो?’

‘कैसी दिख रही है बड़ी दीदी.’

‘इतनी प्यारी तो लग रही है,’ मयंक ने खुश हो कर कहा.

नृत्य आरंभ हुआ तो उस के बालों में गुंथे गजरे से फूल टूट कर बिखरने लगे. वे दोनों बच्चे फिर ताली बजाने लगे.

‘अभी वैदेही दीदी भी गिरेंगी.’

मयंक को उन का मजाक उड़ाना अच्छा नहीं लगा. इसीलिए वह दोनों बच्चों को बराबर चुप रहने को कह रहा था. अचानक वैदेही सचमुच फिसल कर गिर गई और उस के माथे पर चोट लग गई जिस में से खून बहने लगा था.

मयंक को पता नहीं क्या सूझा कि उठ कर उन दोनों बच्चों को पीट दिया.

‘तुम्हारे हंसने से वह गिर गई और उसे चोट लग गई.’

मयंक का यह कोहराम शायद कुछ लोगों को पसंद नहीं आया… खासकर वैदेही को. वह संभल कर उठी और मयंक को चांटा मार दिया. साथ में यह भी बोली, ‘क्यों मारा हमारे भाई को.’

सबकुछ इतनी तीव्रता से हुआ था कि सभी अचंभित से थे. वातावरण को शीघ्र संभालना आवश्यक था. अत: मैं ने ही मयंक से कहा, ‘माफी मांगो.’ मेरे कई बार कहने पर उस ने बुझे मन से माफी मांग ली पर शीघ्र ही वह चुपके से घर चला गया. हम बड़ों ने स्थिति संभाली तो पार्टी पूरी हो गई.

उस छोटी सी घटना ने मयंक को बहुत बदल दिया था पर वैदेही ने मित्रता को रिश्तेदारी के सामने नकार दिया था. शायद तब से ही मयंक का दृष्टिकोण भरोसे को ले कर टूट गया और वह शक्की…

‘‘मैं समझ गई, मम्मीजी,’’ साक्षी के बीच में बोलते ही मम्मी अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गईं.

विराट हमेशा बहुत बड़े पैमाने पर पार्टी देता था. उस दिन भी उस की काकटेल पार्टी जोरशोर से चल रही थी. साक्षी उस दिन पूरी तरह से सतर्क थी कि मयंक का मन किसी भी कारण से न दुखे.

जैसे ही शराब का दौर चला वह पार्टी से हट कर एक कोने में चली गई ताकि कोई उसे मजबूर न करे एक पैग लेने को. मयंक वहीं पहुंच गया और बोला, ‘‘क्या हुआ? यहां क्यों आ गईं?’’

‘‘कुछ नहीं, मयंक, शराब से मुझे घबराहट हो रही है.’’

‘‘ठीक है. कुछ देर आराम कर लो,’’ कह कर वह प्रसन्नचित्त पार्टी में सम्मिलित हो गया.

विराट के आफिस की एक महिला कर्मचारी के साथ वह फ्लोर पर नृत्य करने लगा. उस कर्मचारी का पति शराब का गिलास थाम कर साक्षी की बगल में आ बैठा और बोला, ‘‘आप डांस नहीं करतीं?’’

‘‘मुझे इस का खास शौक नहीं है,’’ साक्षी ने जवाब में कहा.

‘‘मेरी पत्नी तो ऐसी पार्टीज की बहुत शौकीन है. देखिए, कैसे वह मयंकजी के साथ डांस कर रही है.’’

प्रतिउत्तर में साक्षी केवल मुसकरा दी.

‘‘आप ने कुछ लिया नहीं. यह गिलास मैं आप के लिए ही लाया हूं.’’

‘‘अगर यह सब मुझे पसंद होता तो मयंक सब से पहले मेरा गिलास ले आते,’’ साक्षी को कुछ गुस्सा सा आने लगा.

‘‘लेकिन भाभीजी, यह तो काकटेल पार्टी का चलन है. यहां आ कर आप इन चीजों से बच नहीं सकतीं,’’ वह जबरन साक्षी को शराब पिलाने की कोशिश करने लगा.

साक्षी निरंतर बच रही थी. मयंक ने दूर से देख लिया और पलक झपकते ही उस व्यक्ति के गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया.

‘‘अरे, वाह, ऐसा क्या किया मैं ने. अकेली बैठी थीं आप की मंगेतर तो उन्हें कंपनी दे रहा था.’’

‘‘अगर उसे साथ चाहिए होगा तो वह स्वयं मेरे पास आ जाएगी,’’ मयंक क्रोध से बोला.

‘‘वाह साहब, खुद दूसरों की पत्नी के साथ डांस कर रहे हैं. मैं जरा पास में बैठ गया तो आप को इतना बुरा लग गया. कैसे दोगले इनसान हैं आप.’’

‘‘चुप रहिए श्रीमान,’’ अचानक साक्षी उठ कर चिल्ला पड़ी, ‘‘मेरे मयंक को मुसीबतों से मुझे बचाना अच्छी तरह आता है और अपनी पत्नी से मेरी तुलना करने की कोशिश भी मत करिएगा.’’

वह तुरंत हौल से बाहर निकल गई. पार्टी में सन्नाटा छा गया था.

मयंक भी स्तब्ध हो उठा था. धीरेधीरे उसे खोजते हुए बाहर गया तो साक्षी गाड़ी में बैठी उस की प्रतीक्षा कर रही थी. वह चुपचाप उस की बगल में बैठ गया तो साक्षी ने उस के कंधे पर सिर टिका दिया. उस की हिचकी ने अचानक मयंक को बहुत द्रवित कर दिया था. उस का सिर थपकते हुए बोला, ‘‘चलें.’’

साक्षी ने आंसू पोंछ अपनी गरदन हिला दी. कार स्टार्ट करते मयंक ने सोचा, ‘शुक्र है, साक्षी मुझे समझ गई है.’

Family Story: बस इतनी सी बात थी – आखिर कैसे बदल गई मौज

Family Story: ‘‘साहिल,मेरी किट्टी पार्टी 11 बजे की थी… मैं लेट हो गई. जाती हूं, तुम लंच कर लेना. सब तैयार है… ओके बाय जानू्,’’ कह मौज ने साहिल को फ्लाइंग किस किया और फिर तुरंत दरवाजा खोल चली गई.

‘‘एक दिन तो मुझे बड़ी मुश्किल से मिलता है… उस में भी यह कर लो वह कर लो… चैन से सोने भी नहीं देती यह और इस की किट्टी,’’ साहिल ने बड़बड़ाते हुए उठ कर दरवाजा बंद किया और फिर औंधे मुंह बिस्तर पर जा गिरा.

‘‘उफ यह तेज परफ्यूम,’’ उस ने पिलो को अपने चेहरे के नीचे दबा लिया. शादी के पहले जिस परफ्यूम ने उसे दीवाना बना रखा था आज वही सोने में बाधा बन रहा था.

शाम 5 बजे मौज लौटी तो अपनी ही मौज में थी. किट्टी में की गई मस्ती की ढेर सारी बातें वह जल्दीजल्दी साहिल से शेयर करना चाहती थी.

‘‘अरे सुनो न साहिल… तरहतरह के फ्लेवर्ड ड्रिंक पी कर आई हूं वहां से… कितनी रईस हैं राखी… कितनी तरह की डिशेज व स्नैक्स थे वहां… कितने गेम्स खेले हम ने तुम्हें पता है?’’

‘‘अरे यार मुझे कहां से पता होगा… तुम भी कमाल करती हो,’’ साहिल ने चुटकी ली.

‘‘हम सब ने रैंप वाक भी किया… मेरी स्टाइलिंग को बैस्ट प्राइज मिला.’’

‘‘अच्छा… उन के घर में रैंप भी बना हुआ है?’’ वह मुसकराया.

‘‘घर में कहां थी पार्टी… इंटरनैशनल क्लब में थी.’’

‘‘अरे तो इतनी दूर गाड़ी ले कर गई थीं? नईनई तो चलानी सीखी है… कहीं ठोंक आती तो?’’

‘‘माई डियर, अपनी गाड़ी से मैं सिर्फ राखी के घर तक ही गई थी. वहां से सब उन की औडी में गए थे. क्या गाड़ी है. मजा आ गया… काश, हम भी औडी ले सकते तो क्या शान होती हमारी भी… पर तुम्हारी क्व40-50 हजार की सैलरी में कहां संभव है,’’ मौज थोड़ी उदास हो गई.

उधर साहिल थोड़ा आहत. मौज जबतब, जानेअनजाने ऐसी बातों से साहिल का दिल दुखा दिया करती. वह हमेशा पैसों की चकाचौंध से बावली हो जाती है, साहिल यह अच्छी तरह जानने लगा था. कभीकभी वह कह भी देता है, ‘‘तुम्हें शादी करने से पहले अपने पापा से मेरी सैलरी पूछ ली होती तो आज यह अफसोस न करना पड़़ता.’’

‘‘सौरीसौरी साहिल मेरा यह मतलब बिलकुल नहीं था. तुम्हें तो मालूम ही है कि मैं हमेशा बिना सोचेसमझे उलटासीधा बोल जाती हूं… आगापीछा कुछ नहीं सोचती हूं… सौरी साहिल माफ कर दो,’’ कह वह आंखों में आंसू भर कान पकड़ कर उठकबैठक लगाने लगी तो साहिल को उस की मासूमियत पर हंसी आ गई. बोला, ‘‘अरे यार रोनाधोना बंद करो. तुम भी कमाल हो… दिलदिमाग से बच्ची ही हो अभी. जाओ अभी सपनों की दुनिया में थोड़ा आराम कर लो… मेरा मैच आने वाला है… शाम को ड्रैगन किंग में डिनर करने चलेंगे.’’

‘‘सच?’’ कह मौज ने आंसू पोंछ साहिल को अपनी बांहों में भर लिया.

साहिल ने मौज को ड्रैगन किंग में डिनर खिला दिया, पर मन ही मन सोचने लगा कि हर तीसरे दिन इसी तरह चलता रहा तो उस के लिए हर महीने घर चलाना मुश्किल हो जाएगा… क्या करूं किसी और तरीके से खुश भी तो नहीं होती… सिर्फ पैसा और कीमती चीजें ही उसे भाती हैं… साल भर भी तो नहीं हुआ शादी हुए… अकाउंट बैलेंस बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा… एक ड्रैस खरीद लेती तो उस से मैचिंग के झुमके, कंगन, सैंडल, जूतियां सभी कुछ चाहिए उसे वरना उस की सब सहेलियां मजाक बनाएंगी… भला ऐसी कैसी सहेलियां जो दोस्त का ही मजाक बनाएं… तो उन से दोस्ती ही क्यों रखनी? कुछ समझ नहीं आता… इन औरतों का क्या दिमाग है… कामधाम कुछ नहीं खाली पतियों के पैसों पर मौजमस्ती. वह कैसे मौज को समझाए कि उन के पति ऊंची नौकरी वाले या फिर बिजनैसमैन हैं… वह कैसे पीछा छुड़वाए मौज का इन गौसिप वाली औरतों से… इसे भी बिगाड़ रही हैं… कुछ तो करना पड़ेगा…

‘‘अरे साहिल क्यों मुंह लटकाए बैठा है. अभी तो साल भर भी नहीं हुआ शादी को… घर आ कभी… मौज को नीलम भी याद कर रही थी,’’ कह कर मुसकराते हुए उस का सीनियर अमन कैंटीन में साहिल की बगल में बैठ गया और फिर पूछा, ‘‘कुछ और्डर किया क्या?’’

‘‘नहीं, बस किसी का फोन था,’’ कह साहिल, समोसों और चाय का और्डर दे दिया.

‘‘और बता मौज कैसी है? कहीं घुमानेफिराने भी ले जाता है या नहीं… छुट्टी ले कहीं घूम क्यों नहीं आता… दूर नहीं जयपुर या आगरा ही हो आ. मैं हफ्ता भर पहले गायब था न तो मैं और नीलम किसी शादी में जयपुर गए थे. वहां फिर 3 दिन रुक कर खूब घूमे… नीलम ने खूब ऐंजौय किया.’’

‘‘हां मैं भी सही सोच रहा हूं कि उस की बोरियत कैसे अपने बजट से दूर की जाए.’’

‘‘अरे यार, क्या बात कर रहा है… सस्तेमहंगे हर तरह के होटल हैं वहां… अबे इतनी कंजूसी भी कैसी… अभी तो तुम 2 ही हो… न बच्चा न उस की पढ़ाई का खर्च…’’

‘‘हां यह तो है पर…’’ तभी वेटर समोसे व चाय रख गया.

‘‘छोड़ परवर यह देख पिक्स पिंक सिटी की… कितनी बढि़या हैं… एक बार दिखा ला मौज को.’’

‘‘अमन यह बताओ, नीलम भाभी क्या इतनी सिंपल ही रहती हैं… ज्यादातर वही जूतेचप्पल, टीशर्ट, ट्राउजर… बाल कभी रबड़बैंड से बंधे तो कभी खुले… न गहरा मेकअप, न तरहतरह की ज्वैलरी…. मौज को तो भाभी से ट्रेनिंग लेनी चाहिए… उस की सोच का स्टैंडर्ड कुछ ज्यादा ही ऊंचा व खर्चीला हो गया है.’’

‘‘मतलब?’’ चाय का सिप लेते हुए अमन ने पूछा.

‘‘मतलब, जाएगी तो गोवा, सिंगापुर, बैंकौक इस से कम नहीं. हर तीसरे दिन नई ड्रैस के साथ सब कुछ मैचिंग चाहिए… उन के साथ जाने कौनकौन से मेकअप से लिपेपुते चेहरे में वह मेरी पत्नी कम शोकेस में सजी गुडि़या अधिक लगने लगी है अपनी कई रईस सहेलियों जैसी… वह सादगी भरी सुंदर सौम्य प्रतिमा जाने कहां खो गई… महीने में 5-6 बार तो उसे ड्रैगन किंग में खाना खाना है. अब आप समझ लो, यह सब से महंगा रैस्टोरैंट है. एक बार के खाने के क्व2-3 हजार से नीचे का तो बिल बनने से रहा… अब बताओ अब भी कंजूस कहोगे?’’

‘‘तो यार इतनी रईस सहेलियां कहां से बना लीं मौज ने?’’

‘‘बात समझो. मौज ने ब्यूटीशियन का कोर्स किया हुआ है. अत: अपना ज्ञान जता कर इतराने का शौक है… बस वे चिपक जाती हैं. इस से फ्री में टिप्स मिल जाते हैं उन्हें. उस पर उसे गाने का भी शौक है. बस अपनी सुरीली आवाज से सब की जान बन चुकी है. उन के हर लेडीज संगीत, पार्टी का उसे आएदिन निमंत्रण मिल जाता है. अब हाई सोसायटी में जाना है तो उन्हीं के स्टैंडर्ड का दिखना भी है. अब तो गाड़ी भी औडी ही पसंद आ रही है… इसी सब में मेरी सारी सैलरी स्वाहा हो रही है.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है… अरे तो तू भी तो पागल ही है,’’ कह अमन हंसने लगा, ‘‘अरे अक्लमंद आदमी पहले मेरी बात सुन… मुझे तो लगता है मौज का स्किल जिस में है इस के लिए उसे खुद को तैयार हो कर रहना ही चाहिए… दूसरा मौज बाहर काम करना चाहती है… तूने काम करने को मना किया है क्या?’’

‘‘नहीं… उसे बस शौक है, ऐसा ही लगता है. फिर 2 व्यक्तियों के लिए अभी क्व40-50 हजार मुझे मिल रहे हैं… काफी नहीं हैं क्या? फिर कल को बेबी होगा तो उस की देखभाल कौन करेगा? मांपापा भी नहीं रहे.’’

‘‘कैसी नासमझों वाली बातें कर रहा है… बेबी होगा तो जानता नहीं उस के सौ खर्चे होंगे. आजकल अकेले की सैलरी कितनी भी बढ़ जाए कम ही रहती है… फिर कुछ सीखा है तो वह दूसरों तक पहुंचे तो भला ही है… खाली बैठने से दिमाग को खुश भी कैसे रखेगा कोई?

‘‘वैसे भी खाली दिमाग शैतान का घर सुना ही है तूने… तू तो सुबह 9 बजे घर से निकल शाम को 6-7 बजे घर पहुंचता है… सारा वक्त तो काम होता नहीं घर का फिर वह क्या करे, यह क्यों नहीं सोचता तू. खाली घर काटने को दौड़ता होगा… किसी से बात तो करना चाहेगी… आफ्टर आल मैन इज सोशल ऐनिमल…’’

‘‘मैं ने उसे मिलने को मना नहीं कर रखा है, पर उन का उलटीसीधी आदतें तो न अपनाए. असर तो न ले. बनावटी लोगों से नहीं सही लोगों से मिले.’’

‘‘अरे उसे शौक है तो उसे चार्ज करने की सलाह दे. जो उस के स्किल से वाकई फायदा उठाना चाहती हैं वे उस के लिए पे करेंगी… इस फील्ड में बहुत पैसा है समझे… नीलम भी कभीकभी कहती है कि काश, उस ने भी टीचिंग सैंटर की जगह ब्यूटीपार्लर खोल लिया होता तो बढि़या रहता.’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘और क्या… अब तो वे दिन दूर नहीं, जब तुम दोनों जल्द ही अपनी औडी में हम दोस्तों के साथ ड्रैगन किंग में दावतें किया करोगे… और गोवा क्या सीधे बैंकौक जाएंगे,’’ कह अमन हंसते हुए उठ खड़ा हुआ.

‘‘मौज, आगे वाला कमरा मां के जाने के बाद से खाली पड़ा है. तुम उस में चाहो तो ब्यूटीपार्लर खोल सकती हो.’’

‘‘सच?’’ मौज खुशी से उछल पड़ी, ‘‘मैं भी कब से तुम से यही कहना चाहती थी, पर डरती थी तुम्हें बुरा लगेगा… आखिर मांबाबूजी की यादें बसी हैं उस में.’’

‘‘अच्छी यादें तो दिल में बसी हैं मौज. वे हमेशा हमारे साथ रहती हैं… छोड़ो ये सब तुम घर पर अपना शौक पूरा कर सकोगी और तुम्हारी इनकम भी होगी. सुंदर दिखने की शौकीन लड़कियां, औरतें चल कर खुद तुम्हारे पास आएंगी… बातें करने को कोई होगा तो खुश भी बहुत रहोगी. और तो और जल्दी आने वाले नन्हे मेहमान का भी ध्यान रख सकोगी… उस के साथ भी रह सकोगी… मुझे भी कोई चिंता नहीं होगी,’’ कह साहिल ने मौज के गाल को चूम लिया.

थोड़ी देर बाद साहिल फिर बोला, ‘‘तुम्हारी आसपास रईस महिलाओं से इतनी दोस्ती हो गई है… अपना शौक पूरा करने के लिए तुम्हें उन के पास नहीं उन्हें ही तुम्हारे पास आना होगा. खूब चलेगा तुम्हारा पार्लर… उन के काम से जाना भी हो तो विजिटिंग चार्ज लिया करना… तुम्हारा दिल भी लगेगा और इनकम भी होगी… यह समझो, थोड़ी मेहनत करोगी तो बस तुम्हारी भी औडी आ सकती है. तुम भी गोवा, बैंकौक घूमने जा सकती हो.’’

‘‘औडी, बैंकौक… सच में साहिल ऐसा होगा?’’ मौज आंखें फाड़े साहिल को देखने लगी.

जवाब में साहिल ने पलकें झपकाईं तो वह बेहोशी का नाटक करते हुए साहिल की बांहों में झूल कर मुसकरा उठी. आज साहिल को सादगी भरी सुंदर, सौम्य मौज दिखाई दे रही थी आठखेलियां करती बच्चों जैसी मासूम.

‘‘बस इतनी सी बात थी… क्यों नहीं यह पहले समझ आया,’’ उस ने अपने माथे पर हाथ मारा.

Family Story: कब जाओगे प्रिय – क्या कविता गलत संगत में पड़ गई थी?

Family Story: अपना बैग पैक करते हुए अजय ने कविता से बहुत ही प्यार से कहा, ‘‘उदास मत हो डार्लिंग, आज सोमवार है, शनिवार को आ ही जाऊंगा. फिर वैसे ही बच्चे तुम्हें कहां चैन लेने देते हैं. तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि मैं कब गया और कब आया.’’ कविता ने शांत, गंभीर आवाज में कहा, ‘‘बच्चे तो स्कूल, कोचिंग में बिजी रहते हैं… तुम्हारे बिना कहां मन लगता है.’’

‘‘सच मैं कितना खुशहाल हूं, जो मुझे तुम्हारे जैसी पत्नी मिली. कौन यकीन करेगा इस बात पर कि शादी के 20 साल बाद भी तुम मुझे इतना प्यार करती हो… आज भी मेरे टूअर पर जाने पर उदास हो जाती हो… आई लव यू,’’ कहतेकहते अजय ने कविता को गले लगा लिया और फिर बैग उठा कर दरवाजे की तरफ बढ़ गया. कविता का उदास चेहरा देख कर फिर प्यार से बोला, ‘‘डौंट बी सैड, हम फोन पर तो टच में रहते ही हैं, बाय, टेक केयर,’’ कह कर अजय चला गया.

कविता दूसरी फ्लोर पर स्थित अपने फ्लैट की बालकनी में जा कर जाते हुए अजय को देखने लगी. नीचे से अजय ने भी टैक्सी में बैठने से पहले सालों से चले आ रहे नियम का पालन करते हुए ऊपर देख कर कविता को हाथ हिलाया और फिर टैक्सी में बैठ गया. कविता ने अंदर आ कर घड़ी देखी. सुबह के 10 बज रहे थे. वह ड्रैसिंगटेबल के शीशे में खुद को देख कर मुसकरा उठी. फिर उस ने रुचि को फोन मिलाया, ‘‘रुचि, क्या कर रही हो?’’

रुचि हंसी, ‘‘गए क्या पति?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘फटाफट अपना काम निबटा, अंजलि से भी बात करती हूं, मूवी देखने चलेंगे, फिर लंच करेंगे.’’

‘‘तेरी मेड काम कर के गई क्या?’’

‘‘हां, मैं ने उसे आज 8 बजे ही बुला लिया था.’’

‘‘वाह, क्या प्लानिंग होती है तेरी.’’

‘‘और क्या भई, करनी पड़ती है.’’

रुचि ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आधे घंटे में मिलते हैं.’’

कविता ने बाकी सहेलियों अंजलि, नीलम और मनीषा से भी बात कर ली. इन सब की आपस में खूब जमती थी. पांचों हमउम्र थीं, सब के बच्चे भी हमउम्र ही थे. सब के बच्चे इतने बड़े तो थे ही कि अब उन्हें हर समय मां की मौजूदगी की जरूरत नहीं थी. कविता और रुचि के पति टूअर पर जाते रहते थे. पहले तो दोनों बहुत उदास और बोर होती थीं पर अब पतियों के टूअर पर जाने का जो समय पहले इन्हें खलता था अब दोनों को उन्हीं दिनों का इंतजार रहता था. कविता ने अपने दोनों बच्चों सौरभ और सौम्या को घर की 1-1 चाबी सुबह ही स्कूल जाते समय दे दी थी. आज का प्रोग्राम तो उस ने कल ही बना लिया था. नियत समय पर पांचों सहेलियां मिलीं. रुचि की कार से सब निकल गईं. फिर मूवी देखी. उस के बाद होटल में लंच करते हुए खूब हंसीमजाक हुआ. मनीषा ने आहें भरते हुए कहा, ‘‘काश, अनिल की भी टूरिंग जौब होती तो सुबहशाम की पतिसेवा से कुछ फुरसत मुझे भी मिलती और मैं भी तुम दोनों की तरह मौज करती.’’

रुचि ने छेड़ा, ‘‘कर तो रही है तू मौज अब भी… अनिल औफिस में ही हैं न इस समय?’’

‘‘हां यार, पर शाम को तो आ जाएंगे न… तुम दोनों की तो पूरी शाम, रात तुम्हारी होगी न.’’

कविता ने कहा, ‘‘हां भई, यह तो है. अब तो शनिवार तक आराम ही आराम.’’ मनीषा ने चिढ़ने की ऐक्टिंग करते हुए कहा, ‘‘बस कर, हमें जलाने की जरूरत नहीं है.’’ नीलम ने भी अपने दिल की बात कही, ‘‘यहां तो बिजनैस है, न घर आने का टाइम है न जाने का, पता ही नहीं होता कब अचानक आ जाएंगे. फोन कर के बताने की आदत नहीं है. न घर की चाबी ले जाते हैं. कहते हैं, तुम तो हो ही घर पर… इतना गुस्सा आता है न कभीकभी कि क्या बताऊं.’’

रुचि ने पूछा, ‘‘तो आज कैसे निकली?’’

‘‘सासूमां को कहानी सुनाई… एक फ्रैंड हौस्पिटल में ऐडमिट है. उस के पास रहना है. हर बार झूठ बोलना पड़ता है. मेरे घर में मेरा सहेलियों के साथ मूवी देखने और लंच पर जाना किसी को हजम नहीं होगा.’’

कविता हंसी, ‘‘जी तो बस हम रहे हैं न.’’

यह सुन तीनों ने पहले तो मुंह बनाया, फिर हंस दीं. बिल हमेशा की तरह सब ने शेयर किया और फिर अपनेअपने घर चली गईं. सौरभ और सौम्या स्कूल से आ कर कोचिंग जा चुके थे. जब आए तो पूछा, ‘‘मम्मी, कहां गई थीं?’’

‘‘बस, थोड़ा काम था घर का,’’ फिर जानबूझ कर पूछा, ‘‘आज डिनर में क्या बनाऊं?’’

बाहर के खाने के शौकीन सौरभ ने पूछा, ‘‘पापा तो शनिवार को आएंगे न?’’

‘‘हां.’’

‘‘आज पिज्जा मंगवा लें?’’ सौरभ की आंखें चमक उठीं.

सौम्या बोली, ‘‘नहीं, मुझे चाइनीज खाना है.’’

कविता ने गंभीर होने की ऐक्टिंग की, ‘‘नहीं बेटा, बाहर का खाना बारबार और्डर करना अच्छी आदत नहीं है.’’

‘‘मम्मी प्लीज… मम्मी प्लीज,’’ दोनों बच्चे कहने लगे, ‘‘पापा को घर का ही खाना पसंद है. आप हमेशा घर पर ही तो बनाती हैं… आज तो कुछ चेंज होने दो.’’

कविता ने बच्चों पर एहसान जताते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज मंगवा लो पर रोजरोज जिद मत करना.’’ सौम्या बोली, ‘‘हां मम्मी, बस आज और कल, आज इस की पसंद से, कल मेरी पसंद से.’’

‘‘ठीक है, दे दो और्डर,’’ दोनों बच्चे चहकते हुए और्डर देने उठ गए.

कविता मन ही मन हंस रही थी कि उस का कौन सा मूड था खाना बनाने का, अजय को घर का ही खाना पसंद है, बच्चे कई बार कहते हैं पापा का तो टूअर पर चेंज हो जाता है, हमारा क्या… वह खुद बोर हो जाती है रोज खाना बनाबना कर. आज बच्चे अपनी पसंद का खा लेंगे. उस ने हैवी लंच किया था. वह कुछ हलका ही खाएगी. फिर वह सैर पर चली गई. सोचती रही अजय टूअर पर जाते हैं तो सैर काफी समय तक हो जाती है नहीं तो बहुत मुश्किल से 15 मिनट सैर कर के भागती हूं. अजय के औफिस से आने तक काफी काम निबटा कर रखना पड़ता है. शाम की सैर से संतुष्ट हो कर सहेलियों से गप्पें मार कर कविता आराम से लौटी. बच्चों का पिज्जा आ चुका था. उस ने कहा, ‘‘तुम लोग खाओ, मैं आज कौफी और सैंडविच लूंगी.’’

बच्चे पिज्जा का आनंद उठाने लगे. अजय से फोन पर बीचबीच में बातचीत होती रही थी. बच्चों के साथ कुछ समय बिता कर वह घर के काम निबटाने लगी. बच्चे पढ़ने बैठ गए. काम निबटा कर उस ने कपड़े बदले, गाउन पहना, अपने लिए कौफी और सैंडविच बनाए और बैडरूम में आ गई. अजय टूअर पर जाते हैं तो कविता को लगता है उसे कोई काम नहीं है. जो मन हो बनाओ, खाओ, न घर की देखरेख, न आज क्या स्पैशल बना है जैसा रोज का सवाल. गजब की आजादी, अंधेरा कमरा, हाथ में कौफी का मग और जगजीतचित्रा की मखमली आवाज के जादू से गूंजता बैडरूम.अजय को साफसुथरा, चमकता घर पसंद है. उन की नजरों में घर को साफसुथरा देख कर अपने लिए प्रशंसा देखने की चाह में ही वह दिनरात कमरतोड़ मेहनत करती रहती है. कभीकभी मन खिन्न भी हो जाता है  कि बस यही है क्या जीवन?

ऐसा नहीं है कि अजय से उसे कम प्यार है या वह अजय को याद नहीं करती, वह अजय को बहुत प्यार करती है. यह तो वह दिनरात घर के कामों में पिसते हुए अपने लिए कुछ पल निकाल लेती है, तो अपनी दोस्तों के साथ मस्ती भरा, चिंता से दूर, खिलखिलाहटों से भरा यह समय जीवनदायिनी दवा से कम नहीं लगता उसे. अजय के वापस आने पर तनमन से और ज्यादा उस के करीब महसूस करती है वह खुद को. उस ने बहुत सोचसमझ कर खुद को रिलैक्स करने की आदत डाली है. ये पल उसे अपनी कर्मस्थली में लौट कर फिर घरगृहस्थी में जुटने के लिए शक्ति देते हैं. अजय महीने में 7-8 दिन टूअर पर रहते हैं. कई बार जब टूअर रद्द हो जाता है तो ये कुछ पल सिर्फ अपने लिए जीने का मौका ढूंढ़ते हुए उस का दिमाग जब पूछता है, कब जाओगे प्रिय, तो उस का दिल इस शरारत भरे सवाल पर खुद ही मुसकरा उठता है.

Hindi Story: पतझड़ में झांकता वसंत – रूपा के जीवन में कैसे वसंत आया?

Hindi Story: ‘‘हैलो सर, आज औफिस नहीं आ पाऊंगी, तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है,’’ रूपा ने बुझीबुझी सी आवाज में कहा. ‘‘क्या हुआ रूपाजी, क्या तबीयत ज्यादा खराब है?’’ बौस के स्वर में चिंता थी.

‘‘नहींनहीं सर, बस यों ही, शायद बुखार है.’’ ‘‘डाक्टर को दिखाया या नहीं? इस उम्र में लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए, टेक केयर.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं सर,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया. 55 पतझड़ों का डट कर सामना किया है रूपा सिंह ने, अब हिम्मत हारने लगी है. हां, पतझड़ का सामना, वसंत से तो उस का साबका नहीं के बराबर पड़ा है. जब वह 7-8 साल की थी, एक ट्रेन दुर्घटना में उस के मातापिता की मृत्यु हो गई थी. अपनी बढ़ती उम्र और अन्य बच्चों की परवरिश का हवाला दे कर दादादादी ने उस की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया. नानी उसे अपने साथ ले आई और उसे पढ़ायालिखाया. अभी वह 20 साल की भी नहीं हुई थी कि नानी भी चल बसी. मामामामी ने जल्दी ही उस की शादी कर दी.

पति के रूप में सात फेरे लेने वाला शख्स भी स्वार्थी निकला. उस के परिवार वाले लालची थे. रोजरोज कुछ न कुछ सामान या पैसों की फरमाइश करते रहते. वे उस पर यह दबाव भी डालते कि नानी के घर में तुम्हारा भी हिस्सा है, उन से मांगो. मामामामी से जितना हो सका उन्होंने किया, फिर हाथ जोड़ लिए. उन की भी एक सीमा थी. उन्हें अपने बच्चों को भी देखना था. उस के बाद उस की ससुराल वालों का जुल्मोसितम बढ़ता गया. यहां तक कि उन लोगों ने उसे जान से मारने की भी प्लानिंग करनी शुरू कर दी. श्वेता और मयंक अबोध थे. रूपा कांप उठी, बच्चों का क्या होगा. वे उन्हें भी मार देंगे. उन्हें अपने बेटे की ज्यादा दहेज लेने के लिए दोबारा शादी करनी थी. बच्चे राह में रोड़ा बन जाते. एक दिन हिम्मत कर के रूपा दोनों बच्चों को ले कर मामा के यहां भाग आई. ससुराल वालों का स्वार्थ नहीं सधा था. वे एक बार फिर उसे ले जाना चाहते थे, लेकिन उस घर में वह दोबारा लौटना नहीं चाहती थी. मामा और ममेरे भाईबहनों ने उसे सपोर्ट किया और उस का तलाक हो गया.

उसे ससुराल से छुटकारा तो मिल गया लेकिन अब दोनों बच्चों की परवरिश की समस्या मुंहबाए खड़ी थी. बस, रहने का ठिकाना था. उस के लिए यही राहत की बात थी. मामा ने एक कंपनी में उस की नौकरी लगवा दी. उस के जीवन का एक ही मकसद था, श्वेता और मयंक को अच्छे से पढ़ानालिखाना. दोनों बच्चों को वह वैल सैटल करना चाहती थी. वह जीतोड़ मेहनत करती, कुछ मदद ममेरे भाईबहन भी कर देते. उस के मन में एक ही बात बारबार उठती थी कि जैसी जिंदगी उसे गुजारनी पड़ी है, बच्चों पर उस की छाया तक न आए. रूपा ने दोनों बच्चों का दाखिला अच्छे स्कूल में करवा दिया. उन्हें हमेशा यही समझाती रहती कि पढ़लिख कर अच्छा इंसान बनना है. बच्चे होनहार थे. हमेशा कक्षा में अव्वल आते. वक्त सरपट दौड़ता रहा. मयंक ने आईआईटी में दाखिला ले लिया. श्वेता ने फैशन डिजाइनिंग में अपना कैरियर बनाया. श्वेता बैंगलुरु में ही जौब करने लगी थी. उस ने अपने जीवनसाथी के रूप में देवेश को चुना. दोनों ने साथसाथ कोर्स किया और साथसाथ स्टार्टअप भी किया. रूपा और मयंक को भी देवेश काफी पसंद आया. मयंक ने भी अपने पसंद की लड़की से शादी की. रूपा काफी खुश थी कि उस के दोनों बच्चों की गृहस्थी अच्छे से बस गई. उन्हें मनपसंद जीवनसाथी मिले. मयंक पहले हैदराबाद में कार्यरत था. पिछले साल कंपनी ने उसे अमेरिका भेज दिया. वह कहता, ‘मम्मा, यदि मैं यहां सैटल हो गया, तो फिर तुम्हें भी बुला लूंगा.’

रूपा हंस कर कहती, ‘बेटा, मैं वहां आ कर क्या करूंगी भला. तुम लोग लाइफ एंजौय करो. मामामामी की भी उम्र काफी हो गई है. ऐसे में उन्हें छोड़ कर मैं कैसे जाऊंगी.’

मयंक भी इस बात को समझता था लेकिन फिर भी वीडियो चैटिंग में यह बात हमेशा कहता. मामामामी भी रूपा से कहते, ‘अब हमारी उम्र हो गई. जाने कब बुलावा आ जाए. इसलिए तुम मयंक के पास चली जाओ.’ श्वेता और देवेश बीचबीच में आते और बेंगलुरु में सैटल होने के लिए कहते. बच्चों को हमेशा मां की चिंता सताती रहती. उन्होंने बचपन से मां को कांटों पर चलते, चुभते कांटों से लहूलुहान होते और सारा दर्द पीते हुए देखा था. वे चाहते थे कि अब मां को खुशी दें. उन्हें अब काम करने की क्या जरूरत है. लेकिन वह कहती, ‘जब तक यहां हूं, काम करने दो. इसी काम ने हम लोगों को सहारा दिया और हमारा जीवन जीने लायक बनाया है. जब थक जाऊंगी, देखा जाएगा.’

कुछ समय बाद मामामामी की मृत्यु हो गई. रूपा अब निपट अकेली हो गई. इधर कुछ दिनों से बारबार उस की तबीयत भी खराब हो रही थी. इस वजह से वह थोड़ी कमजोर हो गई थी. 6 महीने पहले उस के औफिस में नए बौस आए थे, रूपेश मिश्रा. वे कर्मचारियों से बहुत अच्छे से पेश आते, उन के साथ मिल कर काम करते. उन की उम्र 60 साल के आसपास होगी. कुछ साल पहले एक लंबी बीमारी से उन की पत्नी का साथ छूट गया था. 2 बेटियां थीं, दोनों की शादी हो गई थी. वे अकेलेपन से जूझते हुए खुद को काम में लगाए रहते. कर्मचारियों में अपनापन ढूंढ़ते रहते. वे उदार और खुशदिल थे. कभीकभी रूपा से अपने दिल की बात शेयर करते थे. जब वे अपनी पत्नी की बीमारी का जिक्र करते तब उन की आंखें भर आतीं. वे पत्नी को बेहद प्यार करते थे. वे कहते, ‘हम ने रिटायरमैंट के बाद की जिंदगी की प्लानिंग कर रखी थी, लेकिन वह बीच में ही छोड़ कर चली गई. मेरी बेटियां बहुत केयरफुल हैं, लेकिन इस मोड़ पर तनहा जीवन बहुत सालता है.’

तनहाई का दर्द तो रूपा भी झेल रही थी. उसे भी रूपेश से दिल की बात करना अच्छा लगता था. जल्दी ही दोनों अच्छे दोस्त बन गए. वे दोनों जब अपनी आगे की जिंदगी के बारे में सोचते, तब मन कसैला हो जाता. यह भी कि यदि कभी बीमार पड़ गए तो कोई एक गिलास पानी पिलाने वाला भी न होगा. उस पर आएदिन अकेले बुजुर्गों की मौत की खबर उन में खौफ पैदा करती. जब भी ऐसी खबर पढ़ते या टीवी पर ऐसा कुछ देखते कि मौत के बाद कईकई दिनों तक अकेले इंसान की लाश घर में सड़ती रही, तो उन के रोंगटे खड़े हो जाते. मौत एक सच है. यदि उस की बात छोड़ भी दें तो भी शेष जीवन अकेले बिताना आसान नहीं था. न कोई बात करने वाला, न कोई दुखदर्द बांटने वाला. बंद कमरा और उस की दीवारें. कैसे गुजरेंगे उन के दिन? रात की तनहाई में जब वे सोचते, सन्नाटा राक्षस बन कर उन्हें निगलने लगता. रूपा ने बातोंबातों में मयंक और श्वेता को अपने बौस रूपेश मिश्रा के बारे में बता दिया था. यह भी कि वे एक अच्छे इंसान हैं और सब के सुखदुख में काम आते हैं. वह बच्चों से वैसे भी कुछ नहीं छिपाती थी. बच्चों के साथ शुरू से ही उस का ऐसा तारतम्य है कि वह जितना बताती उस से ज्यादा वे दोनों समझते.

रूपा बिस्तर पर लेटीलेटी जिंदगी के पन्ने पलट रही थी. एकएक दृश्य चलचित्र बन उस की आंखों में उभर आए थे. उस की बीती जिंदगी पर लगाम तब लगी जब कौलबैल बजी. उस ने घड़ी देखी तो शाम के साढ़े 6 बज रहे थे. इस वक्त कौन होगा? वह अनमनी सी बालों का जूड़ा बनाते हुए उठी. की-होल से देखा, सामने रूपेश मिश्रा खड़े थे. उस ने झटपट दरवाजा खोल दिया, ‘‘अरे आप?’’

‘‘आप की तबीयत कैसी है? मुझे फिक्र हो रही थी, इसलिए चला आया’’, रूपेश ने खुशबूदार फूलों का बुके उस की तरफ बढ़ाया. बहुत दिनों बाद कमरा भीनाभीना महक उठा. इस महक ने रूपा को भी सराबोर कर दिया, ‘‘सर, बैठिए न मैं ठीक हूं.’’ उस के होंठों पर प्यारी सी मुसकराहट आ गई.

‘‘आप ने डाक्टर को दिखाया?’’ ‘‘अरे, बस यों ही मामूली बुखार है, ठीक हो जाएगा.’’

‘‘देखिए, ऐसी लापरवाही ठीक नहीं होती. चलिए, मैं साथ चलता हूं,’’ रूपेश मोबाइल निकाल कर डाक्टर का नंबर लगाने लगा. ‘‘नहीं सर, मैं ठीक हूं. यदि बुखार कल तक बिलकुल ठीक नहीं हुआ, तो मैं चैकअप करा लूंगी.’’ उस की समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दे. उसे इस बात का थोड़ा भी अंदाजा नहीं था कि रूपेश घर आ जाएंगे.

‘‘यह सरसर क्या लगा रखा है आप ने, यह औफिस नहीं है,’’ उस ने प्यार से झिड़की दी, ‘‘मैं कुछ नहीं सुनूंगा, डाक्टर को दिखाना ही होगा. बस, आप चलिए.’’ यह कैसा हठ है. रूपा असमंजस में पड़ गई. उसी समय मयंक का वीडियोकौल आया. उसे जैसे एक बहाना मिल गया. उस ने कौल रिसीव कर लिया. मयंक ने भी वही सवाल किया, ‘‘मम्मी, तुम ने डाक्टर को दिखाया? तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि तुम सारा दिन कष्ट सहती रही.’’

‘‘अब तुम मुझे डांटो. तुम लोग तो मेरे पीछे ही पड़ गए. अरे, कुछ नहीं हुआ है मुझे.’’ ‘‘मम्मी, तुम अपने लिए कितनी केयरफुल हो, यह मैं बचपन से जानता हूं. अरे, अंकल आप, नमस्ते,’’ मयंक की नजर वहीं सोफे पर बैठे रूपेश पर पड़ी.

‘‘देखो न बेटे, मैं भी यही कहने आया हूं, पर ये मानती ही नहीं. वैसे तुम ने मुझे कैसे पहचाना?’’ ‘‘मम्मी से आप के बारे में बात होती रहती है. अंकल, आप आ गए हो तो मम्मी को डाक्टर के पास ले कर ही जाना. आप को तो पता ही है कि अगले महीने हम लोग आ रहे हैं, फिर मम्मी की एक नहीं चलेगी.’’

मयंक ने रूपेश से भी काफी देर बात की. ऐसा लगा जैसे वे लोग एकदूसरे को अच्छे से जानते हों. दोनों ने मिल कर रूपा को राजी कर लिया. मयंक ने कहा, ‘‘अब आप लोग जल्दी जाइए. आने के बाद फिर बात करता हूं.’’ साढ़े 8 बजे के करीब वे लोग डाक्टर के यहां से लौटे. रूपेश ने उसे दरवाजे तक छोड़ जाने की इजाजत मांगी, लेकिन रूपा ने उन्हें अंदर बुला लिया. इस भागदौड़ में चाय तक नहीं पी थी किसी ने. वह 2 कप कौफी ले आई. साथ में ब्रैड पीस सेंक लिए थे. अब वीडियोकौल पर श्वेता थी, अपने बिंदास अंदाज में, ‘‘चलो मम्मी, तुम ने किसी की बात तो मानी. मयंक ने मुझे सब बता दिया है. मम्मी और अंकल, हम लोगों ने आप दोनों के लिए कुछ सोचा है…’’

दोनों आश्चर्य में पड़ गए. अब ये दोनों क्या गुल खिला रहे हैं? श्वेता ने बिना लागलपेट के दोनों की शादी का प्रस्ताव रख दिया. उन लोगों की समझ में नहीं आया कि कैसे रिऐक्ट करें, गुस्सा दिखाएं, इग्नोर करें या…दोनों ने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था. लेकिन बात यह भी थी कि दोनों को एकदूसरे की जरूरत और फिक्र थी. श्वेता देर तक मां और दोस्त की भूमिका में रही. आखिर, उस ने कहा कि आप लोगों को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का पूरा हक है. अगर आप दोनों दोस्त हो तो क्या साथसाथ नहीं रह सकते. हमारा समाज इस दोस्ती को बिना शादी के कुबूल नहीं करेगा और इस से ज्यादा की परवा करने की हमें जरूरत भी नहीं. आप की शादी के गवाह हम बनेंगे. रूपेश के मन में हिचक थी, बोले, ‘‘मेरी बेटियों को भी रूपा के बारे में पता है, लेकिन उतना नहीं जितना तुम दोनों भाईबहनों को.’’ ‘‘अंकल, आप फिक्र मत कीजिए. उन लोगों का नंबर मुझे दे दीजिए. मैं बात करूंगी. सब ठीक हो जाएगा. और मम्मी ब्रैड से काम नहीं चलेगा. आप खाना और्डर कर दो. अंकल को खाना खिला कर ही भेजना. और हां, डाक्टर ने जो दवा लिखी है, उसे समय पर लेना और कल सारा चैकअप करवा लेना.’’

दोनों अवाक थे. बच्चों को यह क्या हो गया है? उन के दिल में कब से कुछ घुमड़ रहा था, वह आंखों के रास्ते छलक आया. रूपेश ने रूपा का हाथ थाम लिया, ‘‘और कुछ नहीं तो उम्र के इस पड़ाव पर हमें सहारे की जरूरत तो है ही.’’

रूपा ने उस के कंधे पर सिर रख दिया. इतना सुकून शायद जीवन में उसे पहली बार महसूस हुआ. वह सोच रही थी, जब वसंत की उम्र थी, उस ने पतझड़ देखे. अब पतझड़ के मौसम में वसंत आया है…लकदक लकदक.

Romantic Story: होटल ऐवरेस्ट – विजय से काम्या क्यों दूर हो गई?

Romantic Story: चित्रा के साथ शादी के 9 सालों का हिसाब कुछ इस तरह है: शुरू के 4 साल तो यह समझने में लग गए कि अब हमारा रिश्ता लिव इन रिलेशन वाले बौयफ्रैंडगर्लफ्रैंड का नहीं है. 1 साल में यह अनुभव हुआ कि शादी का लड्डू हजम नहीं हुआ और बाकी के 4 साल शादी से बाहर निकलने की कोशिशों में लग गए. कुल मिला कर कहा जाए तो मेरे और चित्रा के रिश्ते में लड़ाईझगड़ा जैसा कुछ नहीं था. बस आगे बढ़ने की एक लालसा थी और उसी लालसा ने हमें फिर से अलगअलग जिंदगी की डोर थामे 2 राही बना कर छोड़ दिया. हमारे तलाक के बाद समझौता यह हुआ कि मुझे अदालत से अनुमति मिल गई कि मैं अपने बेटे शिवम को 3 महीने में 1 बार सप्ताह भर के लिए अपने साथ ले जा सकता हूं. तय प्रोग्राम के मुताबिक चित्रा लंदन में अपनी कौन्फ्रैंस में जाने से पहले शिवम को मेरे घर छोड़ गई.

‘‘मम्मी ने कहा है मुझे आप की देखभाल करनी है,’’ नन्हा शिवम बोला. उस की लंबाई से दोगुनी लंबाई का एक बैग भी उस के साथ में था.

‘‘हम दोनों एकदूसरे का ध्यान रखेंगे,’’ मैं ने शरारती अंदाज में उस की ओर आंख मारते हुए कहा. ऐसा नहीं था कि वह पहले मेरे साथ कहीं अकेला नहीं गया था पर उस समय चित्रा और मैं साथसाथ थे. पर आज मुझ में ज्यादा जिम्मेदारी वाली भावना प्रबल हो रही थी. सिंगल पेरैंटिंग के कई फायदे हैं, लेकिन एकल जिम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता.

मैं ने गोवा में होटल की औनलाइन बुकिंग अपनी सेक्रेटरी से कह कर पहले ही करवा दी थी. होटल में चैकइन करते ही काउंटर पर खड़ी रिसैप्शनिस्ट ने सुइट की चाबियां पकड़ाते हुए दुखी स्वर में कहा, ‘‘सर, अभी आप पूल में नहीं जा पाएंगे. वहां अभी मौडल्स का स्विम सूट में शूट चल रहा है.’’

मन ही मन खुश होते हुए मैं ने नाटकीय असंतोष जताया और पूछा, ‘‘यह शूट कब तक चलेगा?’’

‘‘सर, पूरे वीक चलेगा, लेकिन मौर्निंग में बस 2 घंटे स्विमिंग पूल में जाने की मनाही है.’’

तभी एक मौडल, जिस ने गाउन पहन रखा था मेरी ओर काउंटर पर आई. वह मौडल, जिसे फ्लाइट में मैगजीन के कवर पर देखा हो, साक्षात सामने आ गई तो मुझे आश्चर्य और आनंद की मिलीजुली अनुभूति हुई. कंधे तक लटके बरगंडी रंग के बाल और हलके श्याम वर्ण पर दमकती हुई त्वचा के मिश्रण से वह बहुत सुंदर लग रही थी. उस ने शिवम के सिर पर हाथ फेरा और उसे प्यार से हैलो कहा. शिवम को उस की शोखी बिलकुल भी प्रभावित नहीं कर सकी. ‘काश मैं भी बच्चा होता’ मैं ने मन ही मन सोचा.

‘‘डैडी, मुझे पूल में जाना है,’’ शिवम बोला.

‘‘पूल का पानी बहुत अच्छा है. देखते ही मन करता है कपड़े उतारो और सीधे छलांग लगा दो,’’ मौडल बोली. फिर उस ने काउंटर से अपने रूम की चाबी ली और चल दी. लिफ्ट के पास जा कर उस ने मुझे देख कर एक नौटी स्माइल दी.

थोड़ी देर पूल में व्यतीत करने और डिनर के बाद मैं शिवम के साथ अपने सुइट में आ गया.

अगली सुबह शिवम बहुत जल्दी उठ गया. हम जब पूल में तैर रहे थे तो वह तैरते हुए पूरे शरीर की फिरकी ले कर अजीब सी कलाबाजी दिखा रहा था. मेरी आंखों के सामने कितना रहा है फिर भी मैं नहीं जानता कि वह क्याक्या कर सकता है. मुझे अपने बेटे के अजीब तरह के वाटर स्ट्रोक्स पर नाज हो रहा था. नाश्ते में मैं ने मूसली कौंफ्लैक्स व ब्लैक कौफी ली और उस ने चौकलेट सैंडविच लिया.

10 बजतेबजते सभी मौडल्स पूल एरिया के आसपास मंडराने लगीं. मैं ने वीवीआईपी पास ले कर शूट देखने की परमिशन ले ली. फिर जब तक मौडल्स पूल में नहीं उतरीं, तब तक मैं ने तैराकी के अलगअलग स्ट्रोक्स लगा कर उन्हें इंप्रैस करने की खूब कोशिश की. अपने एब्स और बाई सैप्स का भी बेशर्मी के साथ प्रदर्शन किया.

पूल में सारी अदाएं दिखाने के बाद भी आकर्षण का केंद्र शिवम ही रहा. कभी वह पैडल स्विमिंग करता, कभी जोर से पानी को स्प्लैश करता, तो कभी अपनी ईजाद की गई फिरकी दिखाता. नतीजा यह हुआ कि 4-5 खूबसूरत मौडल्स उसे तब तक हमेशा घेरे रहतीं जब तक वह पूल में रहता. वह तो असीमित ऊर्जा और शैतानी का भंडार था और उस की कार्टून कैरेक्टर्स की रहस्यमयी जानकारी ने तो मौडल्स को रोमांचित कर हैरत में डाल दिया. अगले 2 दिनों में मैं छुट्टी के आलस्य में रम गया और शिवम एक छोटे चुबंक की तरह मौडल्स और अन्य लोगों को आकर्षित करता रहा. मुझे भी अब कोई ऐक्शन दिखाना पड़ेगा, इसी सोच के साथ मैं ने मौडल्स से थोड़ीबहुत बातचीत करना शुरू कर दिया. मुझे पता चला कि वह सांवलीसलोनी मौडल, जो पहली बार रिसैप्शनिस्ट के काउंटर पर मिली थी, शिवम की फ्रैंड बन चुकी है और उस का नाम काम्या है. थोड़ी हिम्मत जुटा मैं ने उसे शाम को कौफी के लिए औफर दिया.

‘‘जरूर,’’ उस ने हंसते हुए कहा और अपने बालों में उंगलियां फेरने लगी.

‘‘मुझे भी यहां एक अच्छी कंपनी की जरूरत है,’’ मैं ने कहा.

हम ने शाम को 8 बजे मैन बार में मिलना तय किया. शादी से आजाद होने के बाद मैं  पहली बार किसी कम उम्र की लड़की से दोस्ती कर रहा था, इसलिए मन में रोमांच और हिचक दोनों ही भावों का मिलाजुला असर था.

‘‘बेटा, एक रात तुम्हें अकेले ही सोना है,’’ मैं ने शिवम को समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने होटल से बेबी सिटर की व्यवस्था भी कर दी. वह तुम्हें पूरी कौमिक्स पढ़ कर सुनाएगी,’’ उस के बारे में मैं ने बताया.

होटल की बेबी सिटर एक 16 साल की लड़की निकली और वह इस जौब से बहुत रोमांचित जान पड़ी, क्योंकि उसे रात में कार्टून्स देखने और कौमिक्स पढ़ने के क्व5 हजार जो मिल रहे थे. इसलिए जितना मैं काम्या से मिलने के लिए लालायित था उस से ज्यादा बेबी सिटर को शिवम के साथ धमाल मचाने की खुशी थी. मैं ने जाते वक्त शिवम की ओर देखा तो उस ने दुखी हो कर कहा, ‘‘बाय डैडी, जल्दी आना.’’

उस मासूम को अकेला छोड़ने में मुझे दुख हो रहा था. अपनी जिम्मेदारी दिखाते हुए मैं ने बेबी सिटर को एक बार फिर से निर्देश दिए और सुइट से बाहर आ गया.

रैस्टोरैंट तक पहुंचतेपहुंचते मुझे साढ़े 8 बज गए. काम्या रैस्टोरैंट में बाहर की ओर निकले लाउंज में एक कुरसी पर बैठी आसमान में निकले चांद को देख रही थी. समुद्र की ओर से आने वाली हवा से उस के बाल धीरेधीरे उड़ रहे थे. शायद अनचाहे ही वह गिलास में बची पैप्सी को लगातार हिला रही थी. वह एक शानदार पोज दे रही थी और मेरा मन किया कि जाते ही मैं उसे बांहों में भर लूं.

मैं आहिस्ता से उस के पास गया और बोला, ‘‘सौरी, आई एम लेट.’’

मेरी आवाज सुन वह चौंक गई और बोली, ‘‘नोनो ईट्स फाइन. मैं तो बस नजारों का मजा ले रही थी. देखो वह समुद्र में क्या फिशिंग बोट है,’’ उस ने उंगली से इशारा करते हुए कहा. बोट हो या हवाईजहाज मेरी बला से, फिर भी मैं ने अनुमान लगाने का नाटक किया. तभी वेटर हमारा और्डर लेने आ गया.

‘‘तुम एक और पैप्सी लोगी?’’ मैं उस के गिलास की ओर देखते हुए बोला.

‘‘वर्जिन मोजितो,’’ उस ने कहा.

मैं ने वेटर को 2 जूस और वर्जिन मोजितो लाने के को कहा.

‘‘शिवम कहां है, सो गया?’’ मेरी ओर देखते हुए काम्या ने पूछा.

‘‘सौरी, उसी वजह से मैं लेट हो गया. उसे अकेले रहना पसंद नहीं है. वैसे वह बिलकुल अकेला भी नहीं है. एक बेबी सिटर है उस के पास. मैं ने पूरी कोशिश की कि वह मुझे कहीं से भी एक गैरजिम्मेदार पिता नहीं समझे.’’

‘‘क्या वह उस के लिए कौमिक्स पढ़ रही है? कहीं वह उसे परेशान तो नहीं कर रही होगी? आप कहें तो हम एक बार जा कर देख सकते हैं.’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने जल्दी से मना किया, ‘‘मेरा मतलब है अब तक वह सो गया होगा? तुम परेशान मत हो.’’ फिर मैं ने बात पलटी, ‘‘और तुम्हारा शूट कैसा रहा है?’’

‘‘लगता है अब उन्हें मनचाही फोटोज मिल गई हैं. आज का दिन बड़ा बोरिंग था, मैं ने पूरी किताब पढ़ ली,’’ काम्या के हाथ में शेक्सपियर का हेमलेट था. एक मौडल के हाथ में कोर लिट्रेचर की किताब देख कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ.

‘‘मैं औनर्स फाइनल इयर की स्टूडैंट भी हूं,’’ उस ने मुसकराते हुए कहा. तभी वेटर हमारी ड्रिंक्स ले आया. वह आगे बोली, ‘‘मैं केवल छुट्टियों में मौडलिंग करती हूं.’’

मैं कुछ कहने के लिए शब्द ढूंढ़ने लगा. फिर बोला, ‘‘मुझे लगा कि तुम एक फुल टाइम मौडल होगी.’’

‘‘मैं खाली समय कुछ न कुछ करती रहती हूं,’’ उस ने एक घूंट जूस गले से नीचे उतारा और कहा, ‘‘कुछ समय मैं ने थिएटर भी किया फिर जरमनी में नर्सरी के बच्चों को पढ़ाया.’’

‘‘तभी तुम्हारी पर्सनैलिटी इतनी लाजवाब है,’’ मैं ने उस की खुशामद करने के अदांज में कहा. उस ने हंसते हुए अपना गिलास खत्म किया और पूछने लगी, ‘‘और आप क्या करते हो, आई मीन वर्क?’’

‘‘मैं बैंकर हूं. बैंकिंग सैक्टर को मुनाफा कमाने के तरीके बताता हूं.’’

‘‘इंटरैस्टिंग,’’ वह थोड़ा मेरी ओर झुकी और बोली, ‘‘मुझे इकोनौमिक्स में बहुत इंटरैस्ट था.’’

मुझे तो अभी उस की बायोलौजी लुभा रही थी. शाम को वह और भी दिलकश लग रही थी. उस के होंठ मेरे होंठों से केवल एक हाथ की दूरी पर थे और उस के परफ्यूम की हलकीहलकी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी.

अचानक उस ने बोला, ‘‘क्या आप को भूख लगी है?’’

मैं ने सी फूड और्डर किया और डिनर के बाद ठंडी रेत पर चलने का प्रस्ताव रखा. हम दोनों ने अपनेअपने सैंडल्स और स्लीपर्स हाथ में ले लिए और मुलायम रेत पर चलने लगे. उस ने एक हाथ से मेरे कंधे का सहारा ले लिया. रेत हलकी गरम थी और समुद्र का ठंडा पानी बीच में हमारे पैरों से टकराता और चला जाता. हम दोनों ऐसे ही चुपचाप चलते रहे और बहुत दूर तक निकल आए. होटल की चमकती रोशनी बहुत मद्धम पड़ गई. सामने एक बड़ी सी चट्टान मानो इशारा कर रही थी कि बस इस से आगे मत जाओ. मैं चाहता था कि ऐसे ही चलता चलूं, रात भर. मैं ने काम्या के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसे चूम लिया. उस ने मेरा हाथ पकड़ा और चट्टान के और पास ले गई. हम ने एकदूसरे को फिर चूमा और काम्या मेरी कमर धीरे से सहलाने लगी. थोड़ी देर बाद वह अचानक रुकी और बोली, ‘‘मुझे शिवम की चिंता हो रही है.’’ मैं उस पर झुका हुआ था, वह मेरे सिर को पीछे धकेलने लगी. मैं ने उस के हाथ को अपने हाथ में लिया और चूमा. वह जवाब में हंसने लगी.

‘‘सौरी’’ काम्या बोली, ‘‘मुझे चूमते वक्त आप का चेहरा बिलकुल शिवम जैसा बन गया था. कुछकुछ वैसा जब वह ध्यान से पानी में फिरकी लेता है.’’

प्यार करते वक्त अपने बेटे के बारे में सोचने से मेरी कामुकता हवा हो गई. मैं दोनों चीजों को एकसाथ नहीं मिला सकता.

‘‘विजय, क्या आप परेशान हैं?’’ वह मेरे कंधे पर अपना सिर रखते हुए बोली, ‘‘मुझे लगा कि हम यहां मजे कर रहे हैं और मासूम शिवम कमरे में अकेला होगा, इसलिए मुझे थोड़ी चिंता हो गई.’’

‘‘हां, पर उस के लिए बेबी सिटर है.’’

‘‘पर आप ने कहा था न कि उसे अकेला रहना पसंद नहीं,’’ काम्या होंठों को काटते हुए बोली, ‘‘क्या हम एक बार उसे देख आएं?’’

‘‘बेबी सिटर उस की देखभाल कर रही होगी और कोई परेशानी हुई तो वह मुझे रिंग कर देगी. मेरा मोबाइल नंबर है उस के पास,’’ कहते हुए मैं ने जेब में हाथ डाला तो पाया कि मोबाइल मेरी जेब में नहीं था. या तो रेत में कहीं गिर गया था या मैं उसे सुइट में भूल आया था.

‘‘चलो, चल कर देखते हैं,’’ काम्या बोली.

वक्त मेरा साथ नहीं दे रहा था. एक तरफ एक खूबसूरत मौडल बांहें पसारे रेत पर लेटी थी और दूसरी ओर मेरा बेटा होटल के सुइट में आराम कर रहा था. उस पर परेशानी यह कि मौडल को मेरे बेटे की चिंता ज्यादा थी. अब तो चलना ही पड़ेगा.

‘‘चलो चलते हैं,’’ कहते हुए मैं उठा. हम दोनों जब होटल पहुंचे तो मैं ने उसे लाउंज में इंतजार करने को कहा और बेटे को देखने कमरे में चला गया. शिवम मस्ती से सो रहा था और बेबी सिटर टैलीविजन को म्यूट कर के कोई मूवी देख रही थी.

‘‘सब ठीकठाक है? मेरा मोबाइल यहां रह गया था, इसलिए मैं आया,’’ मैं ने दरवाजे को खोलते हुए कहा.

बेबी सिटर ने स्टडी टेबल पर रखा मोबाइल मुझे पकड़ाया तो मैं जल्दी से लिफ्ट की ओर लपका. लाउंज में बैठी काम्या फिर आसमान में देख रही थी. वह बहुत सुंदर लग रही थी पर थोड़ी थकी हुई जान पड़ी. उस ने कहा कि वह थकी है और सोने जाना चाहती थी.

यह सुन कर मेरा मुंह लटक गया, ‘‘मुझे आज रात का अफसोस है,’’ मैं ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं तो बस चाहता था कि…’’ मैं कहने के लिए शब्द ढूंढ़ने लगा.‘‘मुझ से प्यार करना?’’ वह मेरी आंखों में देखते हुए बोली.

‘‘नहीं, वह…’’ मैं हकलाने लगा.

‘‘शेक्सपियर का हेमलेट डिस्कस करना?’’ वह हंसते हुए बोली. ठंडी हवाओं की मस्ती अब शोर लग रही थी. ‘‘मुश्किल होता है जब बेटा साथ हो तो प्यार करना और आप एक अच्छे पिता हो,’’ वह बोली.

‘‘नहींनहीं मैं नहीं हूं,’’ मैं ने उखड़ते हुए स्वर में कहा.

‘‘आज जो हुआ उस के लिए आप परेशान न हों. आप जिस तरह से शिवम के साथ पूल में खेल रहे थे और उस के साथ जो हंसीमजाक करते हो वह हर पिता अपने बच्चे से नहीं कर पाता. आप वैसे पिता नहीं हो कि बेटे के लिए महंगे गिफ्ट ले लिए और बात खत्म. आप दोनों में एक स्पैशल बौंडिंग है,’’ काम्या बोली.

‘‘मैं आज रात तुम्हारे साथ बिताना चाहता था.’’

‘‘मुझे भी आप की कंपनी अच्छी लग रही थी पर मैं पितापुत्र के बीच नहीं आना चाहती.’’

‘‘पर तुम…’’ मैं ने कुछ कहने की कोशिश की पर काम्या ने मेरे होंठों पर उंगली रख दी और बोली, ‘‘कल मैं जा रही हूं, पर लंच तक यहीं हूं.’’

‘‘मैं और शिवम तुम से कल मिलने आएंगे,’’ मैं ने कहा.

‘‘आप लकी हैं कि शिवम जैसा बेटा आप को मिला,’’ काम्या बोली.

जवाब में मैं ने केवल अपना सिर हिलाया और फिर अपने सुइट में लौट आया.

Family Story: मैं चुप ही रहूंगा – आपसी कलह में पिसता गया सुधीर का परिवार

Family Story: ‘‘मां, कल रश्मि का बर्थडे है. उसे रात को 12 बजे केक काटने का बहुत शौक है, इसलिए आज आप को थोड़ा ऐडजस्ट करना पड़ेगा. मैं औफिस से आता हुआ केक ले आऊंगा, आप उसे फ्रिज में छिपा देना. आज शायद आप को सोने में थोड़ी देर हो जाए. उसे रात को सरप्राइज देंगे,’’ पवन की आवाज में जो उत्साह था, वह एक पल में ही खत्म हो गया जब माया ने कहा, ‘‘यह 12 बजे केक काटने का नाटक मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. दिन में भी तो बर्थडे मना सकते हो. यह सब नहीं चलेगा. बेवजह मेरी नींद खराब होगी.’’

वहीं बैठे हुए सुधीर ने कहा, ‘‘माया, बहू का पहला बर्थडे है हमारे साथ, बच्चों को अच्छी तरह से जन्मदिन मनाने दो. एक दिन थोड़ी देर से सोएंगे, तो क्या हो जाएगा.’’ माया दहाड़ी, ‘‘तुम तो चुप ही रहो. खुद तो सो जाओगे, मेरी नींद डिस्टर्ब होती है. नहीं, यह सब शुरू ही मत करो वरना हर साल यह ड्रामा होगा.’’ पवन को बहुत बुरा लगा. वह बोला, ‘‘ठीक है मां, फिर मैं शाम को ही रश्मि को बाहर ले जाता हूं. बाहर ही डिनर कर के वहीं केक भी काट लेंगे. आप सो जाना अपने टाइम पर.’’

माया को झटका लगा, बोली, ‘‘साल भी नहीं हुआ शादी हुए, इतने गुलाम बन गए हो.’’ पवन को गुस्सा आ गया, ‘‘आप क्या समझेंगी पतिपत्नी की आपसी समझ को?’’

माया चिल्लाई, ‘‘क्यों नहीं समझूंगी, मैं क्या पत्नी नहीं हूं तुम्हारे पिता की, इतने सालों से मैं क्या झक मार रही हूं?’’

‘‘आप कैसी पत्नी हैं, आप अच्छी तरह जानती होंगी?’’

माया के गुस्से का ठिकाना नहीं था. पर बेटा कहीं हाथ से न निकल जाए, इस बात का ध्यान गुस्से में भी था. स्वर को संयत करते हुए बोली, ‘‘ठीक है, जैसी मरजी हो, कर लो, हम ने कभी घर में न यह सब नाटक किया, न देखा, इसलिए हमारे लिए थोड़ा नया ही है यह सब. खैर, ले आना केक.’’ सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे. रश्मि औफिस के लिए जल्दी निकलती थी. वह जा चुकी थी. सुधीर ने कहा, ‘‘पवन, रश्मि की पसंद का ‘ब्लू बेरी चीज’ केक लाओगे न? उसे यही फ्लेवर पसंद है.’’ पवन मुसकरा दिया, ‘‘वाह पापा, आप को याद है?’’

‘‘हां, मेरे बर्थडे पर वह यही लाई थी, तभी उस ने बताया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’

माया को बहू की तारीफ सुन कर गुस्सा आ गया, ‘‘तुम चुप नहीं रह सकते. चुपचाप नाश्ता करो. तुम से किसी ने उस की तारीफ का सर्टिफिकेट मांगा है क्या.’’ कर्कशा, मुंहफट पत्नी को देखते हुए सुधीर ने दुख से कहा, ‘‘चुप ही तो हूं सालों से.’’

‘‘पापा, अब मैं चलता हूं, बाय,’’ कह कर पवन भी औफिस के लिए निकल गया. सुधीर सब से बाद में निकलते थे. उन का औफिस घर के पास ही था. वे चुपचाप अपना बैग ले कर निकल रहे थे. माया का बड़बड़ाना उन के कानों में पड़ ही रहा था, ‘सालभर नहीं हुआ है घर में आए हुए, पता नहीं यह लड़की क्या जादू जानती है, पति को पहले दिन से ही गुलाम बना कर रखा है.’

सुधीर चले गए, सामान इधर से उधर रखती हुई माया गुस्से में तपी घूम रही थी. इकलौता बेटा है पवन, उस से उलझना भी नहीं चाहती. कहीं बहू को ले कर अलग हो गया तो क्या करेगी. बेटे को भी दूर नहीं होने देना है, बहू को भी दबा कर रखना है. क्या करे, यह लड़की तो हाथ ही नहीं आती. सुबह ही निकल जाती है, शाम को लगभग सुधीर के साथ ही आती है. पवन भी तभी आ जाता है. घर में काम के लिए कोई क्लेश न हो, यह सोच कर बहूरानी ने पहले दिन से कुक रख ली है. दलील दी थी, ‘मां, औफिस के काम के चक्कर में किचन में आप का हाथ ज्यादा नहीं बंटा पाऊंगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि आप पर ही सब काम रहे. यह लता अच्छी कुक है. दोनों टाइम जो खाना बनवाना हो, इस से बनवा लेना. आप को भी आराम मिलेगा.’ सुधीर और पवन ने भी इस बात का समर्थन किया था. माया जब अकेली पड़ गई तो तीनों के सामने क्या कहती. बात माननी पड़ी. सफाईबरतन का काम राधा कर ही जाती थी. अब बचा क्या जिसे ले कर रश्मि की क्लास ले. मौका ही नहीं देती. मांमां करती घर में घुसती है, सुबह मांमां करती निकल जाती है.

आज सुधीर भी औफिस में माया के बारे में ही सोच रहे थे. इतने सुशिक्षित, सभ्य इंसान हो कर भी कैसी कर्कशा, क्लेशप्रिया पत्नी मिली है उन्हें. नारी के हृदय की कोमलता तो उसे छू कर भी नहीं गुजरी कभी. यह उन के पिता ने कैसी लड़की उन के पल्ले बांध दी जिस के साथ निभातेनिभाते वे थक गए हैं. वह तो अब उन के घर में रश्मि बहू बन कर ताजी हवा के झोंके की तरह आई है, तो घर, घर लगने लगा है. कितनी अच्छी बच्ची है. कितनी पढ़ीलिखी, कितनी शालीन पर माया के स्वभाव के कारण किसी दिन बेटेबहू दूर न हो जाएं, यह बात उन के मन को अकसर उदास कर देती थी.

शाम को रश्मि औफिस से आई. पवन को आज आने में थोड़ा टाइम था. उसे रश्मि के बर्थडे के लिए केक और गिफ्ट लेना था. रश्मि ने पूछा, ‘‘पापा, डिनर लगा दूं?’’

‘‘पवन को आने दो.’’

‘‘उन्हें थोड़ी देर होगी, कहा है सब लोग खाना खा लेना.’’

सुधीर ने कहा, ‘‘ठीक है, फिर लगा दो.’’ रश्मि डिनर लगाने लगी, माया वहीं बैठी टैलीविजन देख रही थी. रश्मि ने खाना लगाते हुए कहा, ‘‘मां, आप ने फिर कोफ्ते बनवाए हैं? अभी तो बने थे.’’

‘‘हां, मुझे बहुत पसंद हैं, लता अच्छे बनाती है.’’

‘‘पर मां, पापा ने तो कल दाल और करेले बनवाने के लिए कहा था.’’

‘‘मेरा मन नहीं था वह सब खाने का.’’

‘‘ठीक है मां, पर कल जरा पापा की पसंद का खाना बनवा लेना.’’

सुधीर ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, जो बना है ठीक है.’’

माया ने फटकार लगाई, ‘‘तुम चुप रहो. ज्यादा शरीफ बन कर दिखाने की जरूरत नहीं है.’’ सुधीर के चेहरे का रंग अपमान से काला पड़ गया. वे पत्नी का मुंह देखते रह गए. क्या यह औरत कभी नहीं सुधरेगी. वह उन की शराफत, शालीनता का सारी उम्र फायदा उठाती रही है. अब बेटेबहू के सामने भी क्या उन का अपमान करती रहेगी? क्या वही अच्छा रहता कि इस की बदतमीजी पर एक थप्पड़ शुरू में ही लगा देता? क्या ऐसी औरतें तभी ठीक रहती हैं. क्या उन का अपने क्रोध पर संयम रखना ही उन की कमजोरी बन गया है? घर में, बेटे के जीवन में सुखशांति के लिए हमेशा चुप रहना ही क्या उन की नियति है? रश्मि ने सुधीर का उदास चेहरा देखा तो सब समझ गई. उसे बहुत दुख हुआ. वह बहुत ही समझदार लड़की थी. कई बार उस ने पवन से अकेले में मजाक भी किया था, ‘पुरानी ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्में ज्यादा तो नहीं देखीं पर जितनी भी देखी और सुनी हैं, मां को देख कर ललिता पवार याद आ जाती है.’ पवन ने घूरने के बाद फिर स्वीकारा था, ‘हां, रश्मि, पापा जितने शांत हैं, मां उतना ही गुस्से वाली. बेचारे पापा, मैं ने उन्हें ही हमेशा सामंजस्य बिठाते देखा है.’

रश्मि ने खूब उत्साह से 12 बजे केक काटा. पवन उस के लिए एक सुंदर साड़ी भी लाया था. सुधीर ने भी एक लिफाफा रश्मि को देते हुए सिर पर प्यारभरा हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, हमारी तरफ से अपनी पसंद का कुछ ले लेना कल.’’ इस पर माया चौंकी, पर बोली कुछ नहीं. रश्मि बहुत खुश हुई. पवन ने कहा, ‘‘मां, कल हम दोनों ने छुट्टी ली है. कल सब मूवी देखने चलेंगे.’’ सुधीर को फिल्मों का बहुत शौक था, उत्साह से पूछा, ‘‘हांहां, बिलकुल, कौनसी?’’

रश्मि ने कहा, ‘‘जो आप कहें, पापा.’’

माया ने कहा, ‘‘मेरा मन नहीं है, मुझे नहीं जाना.’’

सुधीर ने कहा, ‘‘चलो न माया, बच्चों के साथ तो कभी गए ही नहीं अब तक.’’

‘‘नहीं, मेरा मूड नहीं है.’’

पवन ने कहा, ‘‘मां, मूवी देखेंगे, डिनर करेंगे, कल खूब एंजौय करेंगे सब.’’

रश्मि तो बहुत ही उत्साहित थी, बोली, ‘‘हां मां, बर्थडे है मेरा, खूब मजा आएगा, चलिए न.’’

‘‘नहीं, अब मुझे नींद आ रही है. पहले ही इतनी देर हो गई सोने में,’’ कह कर माया बैडरूम में चली गई तो सुधीर भी एक ठंडी सांस ले कर ‘गुडनाइट’ कह कर सोने चले गए. रश्मि ने बैडरूम में पवन से कहा, ‘‘पवन, बुरा मत मानना, मुझे मां की कई बातें पसंद नहीं हैं.’’

‘‘हां, रश्मि, मां शुरू से ही ऐसी हैं. मुझे भी बहुत दुख होता है.’’

‘‘पर मैं मां का यह व्यवहार ज्यादा सहन नहीं करूंगी, अभी बता देती हूं.’’ पवन चुप ही रहा, वह तो बचपन से ही मां का जिद्दी, गुस्सैल स्वभाव देखता आ रहा था. सुबह जब रश्मि सो कर उठी तो देखा सुधीर ड्राइंगरूम में रखे दीवान पर सो रहे थे. आहट से उठे तो रश्मि ने पूछा, ‘‘पापा, आप यहां क्यों सोए?’’

‘‘सोने में माया को देर हो गई तो वह मेरे करवट बदलने से डिस्टर्ब हो रही थी, उसे परेशानी हो रही थी.’’

‘‘पर इस गद्दे पर सोने से आप को गरदन में दर्द होता है न.’’

‘‘हां, पर ठीक है, कोई बात नहीं.’’

‘‘कोई बात कैसे नहीं पापा, आप को तकलीफ होगी तो यह क्या अच्छी बात है?’’ सुधीर बिना कुछ बोले फ्रैश होने चले गए. सुधीर की इच्छा देखते हुए भी माया मूवी देखने नहीं गई. सुधीर ने ही पवन और रश्मि को भेजते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, हम तुम्हें डिनर पर जौइन करेंगे, बता देना, कहां आना है.’’ डिनर पर माया आराम से तैयार हो कर गई. चारों ने अच्छे मूड में डिनर किया और लौट आए. आज रश्मि मन ही मन बहुत सारी बातें सोच चुकी थी. घर आते ही सुधीर का मोबाइल बजा. बात करने के बाद उन्होंने बताया, ‘‘माया, अगले महीने मुग्धा आ रही है, संजीव भी साथ आएगा.’’

माया गुर्राई, ‘‘क्यों?’’

‘‘अरे, उस के भाई का घर है, एक ही तो बहन है मेरी, उस का रश्मि से मिलने का मन है.’’

रश्मि खुश हुई, ‘‘वाह, बूआजी आ रही हैं. मजा आएगा. विवाह के समय भी वे मुझे बहुत अच्छी लगी थीं.’’

‘‘हां, बहुत खुशमिजाज है मेरी बहन.’’

‘‘तुम तो चुप ही रहो,’’ माया चिढ़ गई, ‘‘क्या मजा आएगा. गरमी में किसी के आने पर कितनी परेशानी होती है, तुम्हें क्या पता.’’ रश्मि आज चुप नहीं रह पाई, बोली, ‘‘मां, पापा ही हमेशा क्यों चुप रहें. उन की बहन है, अपनी बहन के आने पर वे खुश क्यों न हों?’’

माया ने रश्मि को डांट दिया, ‘‘मुझ से बहस करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हो रही है?’’

‘‘मां, बहस कहां कर रही हूं. जब से आई हूं यही तो देख रही हूं कि पापा कुछ बोल ही नहीं सकते.’’

माया के गुस्से की सीमा नहीं थी, ‘‘पवन, देख रहा है? इस की इतनी हिम्मत?’’

रश्मि ने बहुत मधुर स्वर में कहा, ‘‘मां, मुझे अच्छा नहीं लगता आप पापा को बोलने ही नहीं देतीं. मैं ने अपने घर में अपने मम्मीपापा का एकदूसरे के लिए बहुत ही प्यार और आदरभरा रिश्ता देखा है और वैसे ही पवन के साथ रहने की इच्छा है. यहां मुझे और कोई कमी नहीं है, बस, आप का पापा के साथ जो रवैया है, वह खटकता है. पापा का स्वभाव कितना अच्छा है.’’ पवन ने रश्मि के कंधे पर हाथ रख कर उसे शांत रहने का इशारा किया तो माया ने तेज आवाज में कहा, ‘‘सुन रहा है इस की बातें?’’

‘‘मां, रश्मि ठीक ही तो कह रही है. मैं और पापा सालों से आप का जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव सहते आ रहे हैं पर अपने घर का अच्छा माहौल देख कर आने वाली लड़की को तो आप का स्वभाव अजीब ही लगेगा.’’ माया को तो आज झटके पर झटके लग रहे थे. उस ने सुधीर से कहा, ‘‘मेरी शक्ल क्या देख रहे हो, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?’’ सुधीर का चेहरा तो बच्चों की बातें सुन कर अलग ही खुशी से चमक रहा था. हंसते हुए बोले, ‘‘भई, मैं तो आज भी चुप ही रहूंगा.’’ पवन और रश्मि ने भी खुल कर उन की उन्मुक्त हंसी में उन का साथ दिया तो माया का चेहरा देखने लायक था.

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