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नौटंकीबाज पत्नी : क्या सागर कर पाया खुदकुशी

इसलिए सागर को अपने लिए बागबगीचे पसंद करने और मांसमछली पका लेने वाली पत्नी चाहिए थी. वह चाहता था कि उस की पत्नी घर और खेतीबारी संभालते हुए गांव में रह कर उस के मातापिता की सेवा करे, क्योंकि सागर नौकरी में बिजी रहने के चलते ज्यादा दिनों तक गांव में नहीं ठहर सकता था. ऐसे में उसे ऐसी पत्नी चाहिए थी जो उस का घरबार बखूबी संभाल सके.

आखिरकार, सागर को वैसी ही लड़की पत्नी के रूप में मिल गई, जैसी उसे चाहिए थी. नयना थोड़ी मुंहफट थी, लेकिन खूबसूरत थी. उस ने शादी की पहली रात से ही नखरे और नाटक करना शुरू कर दिया. सुहागरात पर सागर से बहस करते हुए वह बोली, ‘‘तुम अपना स्टैमिना बढ़ाओ. जो सुख मुझे चाहिए, वह नहीं मिल पाया.’’

दरअसल, सागर एक आम आदमी की तरह सैक्स में लीन था, लेकिन वह बहुत जल्दी ही थक गया. इस बात पर नयना उस का जम कर मजाक उड़ाने लगी, लेकिन सागर ने उस की किसी बात को दिल पर नहीं लिया. उसे लगा, समय के साथसाथ पत्नी की यह नासमझी दूर हो जाएगी. छुट्टियां खत्म हो चुकी थीं और उसे मुंबई लौटना था.

नयना ने कहा, ‘‘मुझे इस रेगिस्तान में अकेली छोड़ कर क्यों जा रहे हो?’’

सच कहें तो नयना भी यही चाहती थी कि सागर गांव में न रहे, क्योंकि पति की नजर व दबाव में रहना उसे पसंद नहीं था और न ही उस के रहते वह पति के दोस्तों को अपने जाल में फंसा सकती थी. मायके में उसे बेरोकटोक घूमने की आदत थी, जिस वजह से गांव के लड़के उसे ‘मैना’ कह कर बुलाते थे.

मुंबई पहुंचने के बाद सागर जब भी नयना को फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. उसे अकसर कालेज के दोस्तों के फोन आते थे.

लेकिन धीरेधीरे सागर को शक होने लगा कि कहीं नयना अपने बौयफ्रैंड से बात तो नहीं करती है? सागर की मां ने बताया कि नयना घर का कामधंधा छोड़ कर पूरे गांव में आवारा घूमती रहती है.

एक दिन अचानक सागर गांव पहुंच गया. बसस्टैंड पर उतरते ही सागर ने देखा कि नयना मैदान में खड़ी किसी लड़के से बात कर रही थी और कुछ देर बाद उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ कर वह चली गई. देखने में वह लड़का कालेज में पढ़ने वाला किसी रईस घर की औलाद लग रहा था. नैना उस से ऐसे चिपक कर बैठी थी, जैसे उस की प्रेमिका हो.

घर पहुंचने के बाद सागर और नैना में जम कर कहासुनी हुई. नैना ने सीधे शब्दों में कह दिया, ‘‘बौयफ्रैंड बनाया है तो क्या हुआ? मुझे यहां अकेला छोड़ कर तुम वहां मुंबई में रहते हो. मैं कब तक यहां ऐसे ही तड़पती रहूंगी? क्या मेरी कोई ख्वाहिश नहीं है? अगर मैं ने अपनी इच्छा पूरी की तो इस में गलत क्या है? तुम खुद नौर्मल हो क्या?’’

‘‘मैं नौर्मल ही हूं. लेकिन तू हवस की भूखी है. फिर से उस मोटरसाइकिल वाले के साथ अगर गई तो घर से निकाल दूंगा,’’ सागर चिल्लाया.

‘‘तुम क्या मुंबई में बिना औरत के रहते हो? तुम्हारे पास भी तो कोई होगी न? ज्यादा बोलोगे तो सब को बता दूंगी कि तुम मुझे जिस्मानी सुख नहीं दे पाते हो, इसलिए मैं दूसरे के पास जाती हूं.’’

यह सुन कर सागर को जैसे बिजली का करंट लग गया. ‘इस नौटंकीबाज, बदतमीज, पराए मर्दों के साथ घूमने वाली औरत को अगर मैं ने यहां से भगा दिया तो यह मेरी झूठी बदनामी कर देगी… और अगर इसे मां के पास छोड़ता हूं तो यह किस के साथ घूम रही होगी, क्या कर रही होगी, यही सब सोच कर मेरा काम में मन नहीं लगेगा,’ यही सोच कर सागर को नींद नहीं आई. वह रातभर सोचता रहा, ‘क्या एक पल में झूठ बोलने, दूसरे पल में हंसने, जोरजोर से चिल्ला कर लोगों को जमा करने, तमाशा करने और धमकी देने वाली यह औरत मेरे ही पल्ले पड़नी थी?’

बहुत देर तक सोचने के बाद सागर के मन में एक विचार आया और बिना किसी वजह से धमकी देने वाली इस नौटंकीबाज पत्नी नयना को उस ने भी धमकी दी, ‘‘नयना, मैं तुझ से परेशान हो कर एक दिन खुदकुशी कर लूंगा और एक सुसाइड नोट लिख कर जाऊंगा कि तुम ने मुझे धोखा दे कर, डराधमका कर और झूठी बदनामी कर के आत्महत्या करने पर मजबूर किया है. किसी को धोखा देना गुनाह है. पुलिस तुझ से पूछताछ करेगी और तेरा असली चेहरा सब के सामने आएगा. तेरे जैसी बदतमीज के लिए जेल का पिंजरा ही ठीक रहेगा.’’

सागर के लिए यह औरत सिर पर टंगी हुई तलवार की तरह थी और उसे रास्ते पर लाने का यही एकमात्र उपाय था. खुदकुशी करने का सागर का यह विचार काम आ गया. यह सुन कर नयना घबरा गई.

‘‘ऐसा कुछ मत करो, मैं बरबाद हो जाऊंगी,’’ कह कर नयना रोने लगी.

इस के बाद सागर ने नयना को मुंबई ले जाने का फैसला किया. उस ने भी घबरा कर जाने के लिए हां कर दी. उस के दोस्त फोन न करें, इसलिए फोन नंबर भी बदल दिया.

अब वे दोनों मुंबई में साथ रहते हैं. नयना भी अपने बरताव में काफी सुधार ले आई है.

घर लौट जा माधुरी : जवानी की दहलीज

जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही मन सातवें आसमान पर जा पहुंचता है. सारी दुनिया रंगीन और मदभरी लगती है. मन का घोड़ा बेलगाम होने लगता है और मदहोशी में किसी की बात सुनना नहीं चाहता है. कुछ ऐसा ही माधुरी के साथ हो रहा था.

रात के साढ़े 10 बज रहे थे. तृप्ति खाना खा कर पढ़ने के लिए बैठी थी. वह अपने जरूरी नोट रात में 11 बजे के बाद ही तैयार करती थी. रात में गली सुनसान हो जाती थी. कभीकभार तो कुत्तों के भूंकने की आवाज के अलावा कोई शोर नहीं होता था.

तृप्ति के कमरे का एक दरवाजा बनारस की एक संकरी गली में खुलता था. मकान मालकिन ऊपर की मंजिल पर रहती थीं. वे विधवा थीं. उन की एकलौती बेटी अपने पति के साथ इलाहाबाद में रहती थी.

नीचे छात्राओं को देने के लिए 3 छोटेछोटे कमरे बनाए गए थे. 2 कमरों के दरवाजे अंदर के गलियारे में खुलते थे. उन दोनों कमरों में भी छात्राएं रहती थीं.

दरवाजा बाहर की ओर खुलने का एक फायदा यह था कि तृप्ति को किसी वजह से बाहर से आने में देर हो जाती थी तो मकान मालकिन की डांट नहीं सुननी पड़ती थी.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. तृप्ति किसी अनजाने डर से सिहर उठी. उसे लगा, कोई गली का लफंगा

तो नहीं. वैसे, आज तक ऐसा नहीं हुआ था. रात 10 बजे के बाद गली की ओर खुलने वाले दरवाजे को किसी ने नहीं खटखटाया था.

कभीकभार बगल वाली छात्राएं कुछ पूछने के लिए साइड वाला दरवाजा खटखटा देती थीं. उन दोनों से वह सीनियर थी, इसलिए वे भी रात में ऐसा कभीकभार ही करती थीं.

पर जब ‘तृप्ति, दरवाजा खोलो… मैं माधुरी’ की आवाज सुनाई पड़ी, तो तृप्ति ने दरवाजे की दरार से झांक कर देखा. यह माधुरी थी. उस के बगल के गांव की एक सहेली. मैट्रिक तक दोनों साथसाथ पढ़ी थीं. बाद में तृप्ति बनारस आ गई थी. बीए करने के बाद बीएचयू की ला फैकल्टी में एडमिशन लेने के लिए वह एडमिशन टैस्ट की तैयारी कर रही थी.

माधुरी बगल के कसबे में ही एक कालेज से बीए करने के बाद घर बैठी थी. पिता उस की शादी करने के लिए किसी नौकरी करने वाले लड़के की तलाश में थे.

‘‘अरे तुम… इतनी रात गए… कहां से आ रही हो?’’ हैरान होते हुए तृप्ति ने पूछा.

‘‘बताती हूं, पहले अंदर तो आने दे,’’ कुछ बदहवास और चिंतित माधुरी आते ही बैड पर बैठ गई.

‘‘एक गिलास पानी तो ला… बहुत प्यास लगी है,’’ माधुरी ने इतमीनान की सांस लेते हुए कहा. ऐसा लग रहा था मानो वह दौड़ कर आई थी.

तृप्ति ने मटके से पानी निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘गलियां अभी पूरी तरह सुनसान नहीं हुई हैं… वरना अब तक तो इस गली में कुत्ते भी भूंकना बंद कर देते हैं,’’ फिर उस ने माधुरी की ओर एक प्लेट में बेसन का लड्डू बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहले कुछ खा ले, फिर पानी पीना. लगता है, तुम दौड़ कर आ रही हो?’’

माधुरी ने लड्डू खाते हुए कहा, ‘‘इतनी संकरी गली में कमरा लिया है कि तुम्हारे यहां कोई पहुंच भी नहीं सकता. यह तो मैं पिछले महीने ही आई थी इसलिए भूली नहीं, वरना जाने इतनी रात को अब तक कहां भटकती रहती.’’

‘‘पहले मैं गर्ल्स होस्टल में रहना चाहती थी, पर अगलबगल में कोई ढंग का मिल नहीं रहा था, महंगा भी बहुत था. यह बहुत सस्ते में मिल गया. यहां बहुत शांति रहती है, इसलिए इम्तिहान की तैयारी के लिए सही लगा. बस, आ गई. अगर मेरा एडमिशन बीएचयू में हो जाता है, तो आगे से वहीं होस्टल में रहूंगी.

‘‘अच्छा, अब तो बता कैसे आई हो? इतना बड़ा बैग… लगता है, काफी सामान भर रखा है इस में. कहीं जाने का प्लान है क्या?’’ तृप्ति ने पूछा.

‘‘हां, बताती हूं. अब एक कप चाय तो पिला,’’ माधुरी बोली.

‘‘खाना खाया है या बनाऊं… लेकिन, तुम ने खाना कहां से खाया होगा. घर से सीधे आ रही हो या…’’

‘‘खाना तो नहीं खाया है. मौका ही नहीं मिला, लेकिन रास्ते में एक दुकान से ब्रैड ले ली थी. अब इतनी रात को खाने की चिंता छोड़ो. ब्रैडचाय से काम चला लूंगी मैं,’’ माधुरी ने कहा.

चाय और ब्रैड खाने के बाद माधुरी की थकान तो मिट गई थी, पर उस के चेहरे पर अब भी चिंता की लकीरें साफ दिखाई पड़ रही थीं.

माधुरी बोली, ‘‘तृप्ति, तुम्हें याद है, जब हम लोग 9वीं जमात में थे, तब सौरभ नाम का एक लड़का 10वीं जमात में पढ़ता था. वही लंबी नाक वाला, गोरा, सुंदर, जो हमेशा मुसकराता रहता था…’’

‘‘हां, जिस के पीछे कई लड़कियां भागती थीं… और जिस के पिता की गहनों की मार्केट में बड़ी सी दुकान थी,’’ तृप्ति ने याद करते हुए कहा.

‘‘हां, वही.’’

‘‘पर, बात क्या है… तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘वही तो मैं बता रही हूं. वह 2 बार मैट्रिक में फेल हुआ तो उस के पिता ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर दुकान पर बैठा दिया. पिछले साल भैया की शादी थी. मां भाभी के लिए गहनों के लिए और्डर देने जाने लगीं तो साथ में मुझे भी ले लिया.

‘‘मैं गहनों में बहुत काटछांट कर रही थी, इसलिए उस के पिता ने गहने दिखाने के लिए सौरभ को लगा दिया, तभी उस ने मुझ से पूछा था, ‘तुम माधुरी हो न?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘हां, पर तुम

कैसे जानते हो?’

‘‘उस ने बताया, ‘भूल गई क्या… हम दोनों एक ही स्कूल में तो पढ़ते थे.’

‘‘मैं उसे पहचानती तो थी, लेकिन जानबूझ कर अनजान बन रही थी. फिर उस ने मेरी ओर देखा तो शर्म से मेरी आंखें झुक गईं. उस दिन गहनों के और्डर दे कर हम लोग घर चले आए, फिर एक हफ्ते बाद मां के साथ मैं भी गहने लेने दुकान पर गई थी.

‘‘मां ने मुझ से कहा था, ‘दुकानदार का बेटा तुम्हारा परिचित है, तो दाम में कुछ छूट करा देना.’

‘‘मैं ने कहा था, ‘अच्छा मां, मैं उस से बोल दूंगी.’

‘‘पर, दाम उस के पिताजी ने लगाए. उस ने पिता से कहा, तो कुछ कम हो गया… घर आने पर मालूम हुआ कि भाभी के लिए जो सोने की अंगूठी खरीदी गई थी, वह नाप में छोटी थी. मां बोलीं, ‘माधुरी, कल अंगूठी ले जा कर बदलवा देना, मुझे मौका नहीं मिलेगा. कल कुछ लोग आने वाले हैं.’

‘‘मैं दूसरे दिन जब दुकान पर पहुंची तो सौरभ के पिताजी नहीं थे. मुझे देख कर वह मुसकराते हुए बोला, ‘आओ माधुरी, बैठो. आज क्या और्डर करना है?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘कुछ नहीं… बस, यह अंगूठी बदलवानी है. भाभी की उंगली में नहीं आएगी. नाप में बहुत छोटी है.’

‘‘वह बोला था, ‘कोई बात नहीं,

इसे तुम रख लो. भाभी के लिए मैं दूसरी दे देता हूं.’

‘‘मैं ने छेड़ते हुए कहा था, ‘बड़े आए देने वाले… दाम तो कम कर नहीं सकते… मुफ्त में देने चले हो.’

‘‘यह सुन कर उस ने कहा था, ‘कल पिताजी मालिक थे, आज मैं हूं. आज मेरा और्डर चलेगा.’

‘‘सचमुच ही उस ने वही किया, जो कहा. मैं ने बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने अंगूठी वापस नहीं ली. भाभी के नाप की वैसी ही दूसरी अंगूठी भी दे दी.

‘‘मैं जब घर पहुंची तो मेरी उंगली में पहले वाली अंगूठी देख कर मां ने पूछा था, ‘इस को लौटाया नहीं क्या?’

‘‘मैं ने डरतेडरते कहा था, ‘इस को वापस लेने से इनकार कर दिया मां.’

‘‘यह सुन कर मां ने कठोर आवाज में पूछा था, ‘किस ने? उस छोकरे ने या उस के बाप ने?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘उस के पिताजी नहीं थे, आज वही था.’

‘‘मां ने कहा था, ‘अंगूठी निकाल दे. कल मैं लौटा आऊंगी. बेवकूफ लड़की, तुम नहीं जानती, यह सुनार का छोकरा तु?ा पर चारा डाल रहा है. उस की मंशा ठीक नहीं है. अब आगे से उस की दुकान पर मत जाना.’

‘‘मां की बात मु?ो बिलकुल नहीं सुहाई. पिछली बार जब मैं उस की दुकान पर गई थी तब तो दाम कम कराने के लिए उसी से पैरवी करवा रही थीं. अब जब इतना बड़ा उपहार अपनी इच्छा से दिया तो नखरे कर रही हैं.

‘‘सच कहूं तृप्ति, मां के इस बरताव से मेरा सौरभ के प्रति और झुकाव बढ़ गया. उस दिन के बाद से मैं उस की दुकान पर जाने का बहाना ढूंढ़ने लगी.

‘‘एक दिन मौका मिल ही गया. बड़े वाले जीजाजी घर आए थे. मां ने जब भाभी के लिए खरीदे गए गहनों को दिखाया तो वे बोले, ‘सुनार ने वाजिब दाम लगाया है. मुझे भी उपहार में देने के लिए एक अंगूठी की जरूरत है. सलहज की उंगली का नाप आप के पास है ही, इस से थोड़ी अलग डिजाइन की अंगूठी मैं भी उसी दुकान से ले लेता हूं.’

‘‘मां ने कहा था, ‘माधुरी साथ चली जाएगी. दुकानदार का लड़का इस का परिचित है. कुछ छूट भी कर देगा.’

‘‘मां ने अंगूठी लौटाने वाली बात को जानबूझ कर छिपा लिया था. वे नहीं चाहती थीं कि मुझ पर किसी तरह का आरोप लगे. मेरी शादी के लिए बाबूजी किसी नौकरी वाले लड़के की तलाश में थे.

‘‘दूसरे दिन जीजाजी के साथ जब मैं उस की दुकान पर पहुंची तब सौरभ किसी औरत को अंगूठी दिखा रहा था. मुझे देखते ही वह मुसकराया और बैठने के लिए इशारा किया. जब जीजाजी ने अंगूठी दिखाने को कहा तो उस के पिताजी ने उसी की ओर इशारा कर दिया.

‘‘तभी कोई फोन आया और उस के पिताजी बोले, ‘2-3 घंटे के लिए मैं कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूं. ये लोग पुराने ग्राहक हैं, इन का ध्यान रखना.’

‘‘यह सुन कर सौरभ के चेहरे पर मुसकान थिरक गई. वह बोला, ‘जी बाबूजी, मैं सब संभाल लूंगा.’’

‘‘जीजाजी ने एक अंगूठी पसंद की और उस का दाम पूछा. मैं ने कहा, ‘मेरे जीजाजी हैं.’

‘‘मेरा इशारा समझ कर सौरभ ने कहा, ‘फिर तो जो आप दे दें, मुझे मंजूर होगा.’

‘‘जीजाजी ने बहुत कहा, लेकिन वह एक ही रट लगाए रहा, ‘आप जो देंगे, ले लूंगा. आप लोग पुराने ग्राहक हैं. आप लोगों से क्या मोलभाव करना है.’

‘‘जीजाजी धर्मसंकट में थे. उन्होंने अपना डैबिट कार्ड बढ़ाते हुए कहा, ‘अब मैं भी मोलभाव नहीं करूंगा. आप जो दाम भर देंगे, स्वीकार कर लूंगा.’

‘‘खैर, जीजाजी ने जो सोचा था, उस से कम दाम उस ने लगाया. उस ने हम लोगों के लिए मिठाई मंगाई और जब जीजाजी मुंह धोने वाशबेसिन की ओर गए तो वही पुरानी अंगूठी मुझे जबरन थमाते हुए कहा था, ‘अब फिर न लौटाना… नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा.’

‘‘जीजाजी देख न लें, इसलिए मैं ने उस अंगूठी को ले कर छिपा लिया.

‘‘उस दिन के बाद हम दोनों मौका निकाल कर चोरीछिपे एकदूसरे से मिलते रहे. सौरभ से मालूम हुआ कि उस के पिताजी ने पिछले साल उस की शादी एक अमीर लड़की से दहेज के लालच में करा दी थी. लड़की तो सुंदर है, लेकिन गूंगीबहरी है. वह अपने मातापिता की एकलौती बेटी है. मां का देहांत हो चुका है. पिता ने अपनी जायदाद लड़की के नाम कर दी है. शहर में एक तिमंजिला मकान भी उस की नाम से है. उस मकान से हर महीने अच्छा किराया मिलता है. रुपयापैसा उसी के अकाउंट में जमा होता है. पिताजी ने भी गहनों की यह दुकान उस के नाम कर दी है.

‘‘तृप्ति, सौरभ मुझ पर इतना पैसा खर्च करने लगा कि मैं उसी की हो कर रह गई.’’

‘‘यानी तुम ने अपना जिस्म भी उसे सौंप दिया?’’ तृप्ति ने हैरान होते हुए पूछ लिया.

‘‘क्या करती… कई बार हम लोग होटल में मिले. कोई न कोई बहाना बना कर मैं सुबह निकलती और उस के बुक कराए होटल में पहुंच जाती. शुरू में तो काफी हिचकिचाई, पर बाद में उस के आग्रह के आगे झुक गई.’’

‘‘फिर…?’’ तृप्ति ने पूछा.

‘‘फिर क्या… मैं हर वक्त उसी के बारे में सोचने लगी. उस ने मुझे भरोसा दिलाया कि कुछ दिनों बाद वह अपनी पत्नी को तलाक दे देगा और मुझ से शादी कर लेगा.’’

‘‘और तुम्हें विश्वास हो गया?’’

‘‘उस ने शपथ ले कर कहा है. मुझे विश्वास है कि वह धोखा नहीं देगा.’’

‘‘अब बताओ कि तुम यहां कैसे आई हो?’’ तृप्ति ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘एक हफ्ता पहले जीजाजी आए थे. उन्होंने बाबूजी के सामने एक लड़के का प्रस्ताव रखा था. लड़का एक सरकारी दफ्तर में है, लेकिन बचपन से ही उस का एक पैर खराब है, इसलिए लंगड़ा कर चलता है. वह मुझ से बिना दहेज की शादी करने को तैयार है.

‘‘बाबूजी तैयार हो गए. मां ने विरोध किया तो कहने लगे, ‘एक पैर ही तो खराब है. सरकारी नौकरी है. उसे कई रियायतें भी मिलेंगी.

‘‘जब मां भी तैयार हो गईं तो मैं ने मुंह खोला, पर उन्होंने मुझे डांटते हुए कहा, ‘तुम्हें तो नौकरी मिली नहीं, अब मुश्किल से नौकरी वाला एक लड़का मिला है, तो जबान चलाती है.’

‘‘लेकिन, बात यह नहीं थी. किसी ने मां के कान में डाल दिया था कि मेरा सौरभ से मिलनाजुलना है. मां को तो उसी समय शक हो गया था, जब मैं अंगूठी बिना लौटाए आ गई थी.

‘‘इधर सौरभ मेरे लिए कुछ न कुछ हमेशा खरीदता रहता था. अब घर में क्याक्या छिपाती मैं. कोई न कोई बहाना बनाती, पर मां का शक दूर न होता. वे भी चाहती थीं कि किसी तरह जल्द से जल्द मेरी शादी हो जाए, ताकि समाज में उन की नाक न कटे.

‘‘मां का मुझ पर भरोसा नहीं रहा था. उन्होंने मुझे गांव से बाहर जाने की मनाही कर दी. उधर बाबूजी ने जीजाजी के प्रस्ताव पर हामी भर दी.

लड़के ने मेरा फोटो और बायोडाटा देख कर शादी करने का फैसला मुझ पर छोड़ दिया. बिना मुझ से सलाह लिए मांबाबूजी ने अगले महीने मेरी शादी की तारीख भी पक्की कर दी है.

‘‘मांबाबूजी का यह रवैया मुझे नागवार लगा, इसलिए मैं  सौरभ से इस संबंध में बात करना चाहती थी. मैं उस के साथ कहीं भाग जाना चाहती थी.

‘‘बहुत मुश्किल से किसी तरह दवा लाने का बहाना कर के मैं गांव से निकली. फोन पर सौरभ को सारी बातें बताईं. उस ने कहा कि मैं रात में बनारस पहुंच जाऊं. सुबह वहीं से मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ लेंगे. उस ने रिजर्वेशन भी करा लिया है. उस का एक दोस्त वहां रहता है. मुझे दोस्त के पास रख कर वह लौट आएगा, फिर पत्नी को तलाक दे कर मुझ से शादी कर लेगा.’’

‘‘ओह… तो तुम मुंबई जाने की तैयारी कर के आई हो?’’ तृप्ति ने कहा.

‘‘हां.’’

‘‘माधुरी, तुम समदार हो, इसलिए तुम को मैं समझ तो नहीं सकती… और फिर अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक सभी को है, पर हम आपस में इस बारे में बात तो कर ही सकते हैं, जिस से सही दिशा मिल सके और तुम समझ पाओ कि जानेअनजाने में तुम से कोई गलत फैसला तो नहीं हो रहा है.’’

‘‘बोल तृप्ति, समय कम है, मुझे सुबह निकलना भी है. यह तो मुझे भी एहसास हो रहा है कि मैं कुछ गलत कर रही हूं. पर मेरे सामने इस के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं है,’’ माधुरी की चिंता उस के चेहरे से साफ झलक रही थी.

‘‘अच्छा माधुरी, सौरभ के पिता से गहनों की कीमत में छूट कराने के लिए तुम्हें सौरभ से कहना पड़ा था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘सौरभ से तुम्हारी जानपहचान भी नहीं थी. सिर्फ इतना ही कि तुम्हारे साथ सौरभ भी एक ही स्कूल में पढ़ता था.’’

‘‘हां.’’

‘‘सौरभ के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. काफी सारा पैसा उस के बैंक अकाउंट में था, जिसे खर्चने के लिए उसे अपने पिता की इजाजत लेने की जरूरत नहीं थी.’’

‘‘यह भी सही है.’’

‘‘सौरभ की शादी उस की मरजी से नहीं हुई थी. गूंगीबहरी होने के चलते अपनी पत्नी को वह पसंद नहीं करता था. कहीं न कहीं उस के मन में किसी दूसरी सुंदर लड़की की चाह थी.’’

‘‘तुम्हारी बातों में सचाई है. कई बार उस ने ऐसा कहा था. लेकिन तुम जिरह बहुत अच्छा कर लेती हो. देखना, तुम अच्छी वकील बनोगी.’’

‘‘वह खुद जवान और सुंदर है और तुम भी उस की सुंदरता की ओर खिंचने लगी थी.’’

‘‘यह भी सही है.’’

‘‘फिर अब तो तुम मानोगी कि तुम से ज्यादा तुम्हारी शारीरिक सुंदरता उसे अपनी ओर खींच रही थी और पहली ही ?ालक में उस ने तुम में अपनी हवस पूरी की इच्छा की संभावना तलाश ली होगी. और जब तुम ने उस की सोने की महंगी अंगूठी स्वीकार कर ली तब वह पक्का हो गया कि अब तुम उस के जाल में आसानी से फंस सकती हो.

‘‘फिर वही हुआ, अपने पैसे का उस ने भरपूर इस्तेमाल किया और तुम पर बेतहाशा खर्च किया, जिस के नीचे तुम्हारा विवेक भी मर गया. तुम्हारी समझ कुंठित हो गई और तुम ने अपनी जिंदगी का सब से बड़ा धन गंवा दिया, जिसे कुंआरापन कहते हैं.’’

माधुरी के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं.

‘‘बोल तृप्ति बोल, अपने मन की बात खुल कर मेरे सामने रख,’’ माधुरी उत्सुकता से उस की बातें सुन रही थी.

‘‘माधुरी, अब जिस सैक्स सुख के लिए मर्द शादी तक इंतजार करता है, वही उसे उस के पहले ही मिल जाए और उसे यह विश्वास हो जाए कि अपने पैसों से तुम्हारी जैसी लड़कियों को आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, तो वह अपनी पत्नी को तलाक देने और दूसरी से शादी करने का ?ां?ाट क्यों मोल लेगा?

‘‘फिर वह अच्छी तरह जानता है कि उस की पत्नी की बदौलत ही उस के पास इतनी दौलत है और उसे तलाक देते ही उस को इस जायदाद से हाथ धोना पड़ जाएगा. मुकदमे का झंझंट होगा, सो अलग.

‘‘मुझे तो लगता है, तुम किसी बड़ी साजिश की शिकार होने वाली हो. तुम से उस का मन भर गया है. अब वह तुम्हें अपने दोस्त को सौंपना चाहता है.’’

‘‘नहींनहीं…’’ अचानक माधुरी के मुंह से चीख सी निकली.

‘‘पर, इस सब में केवल सौरभ ही कुसूरवार नहीं है, तुम भी हो. तुम ने क्या सोच कर अंगूठी अपने जीजाजी और मां से छिपाई.

‘‘जीजाजी के सामने ही क्यों नहीं कहा कि सौरभ, यह अंगूठी तुम्हें उपहार में दे रहा है. मां को भी क्यों नहीं बताया कि लाख मना करने पर भी सौरभ ने अंगूठी नहीं ली.

‘‘अगर तुम ने ऐसा किया होता तो फिर सौरभ समझ जाता कि उस ने गलत जगह अपनी गोटी डाली है और वह आगे बात न बढ़ाता. जवानी और पैसे के लालच में तुम्हारी मति मारी गई थी. तुम गलत को सही और सही को गलत समझाने लगी थी.

‘‘तुम्हारी मां गहनों में छूट चाहती थीं. हर ग्राहक की चाहत सस्ता खरीदने की होती है, उन की भी थी. लेकिन वे नाजायज कुछ नहीं चाहती थीं. उन्होंने धूप में अपने बाल सफेद नहीं किए हैं. उन को सौरभ की अंगूठी देने के पीछे की मंशा पता चल गई थी, इसीलिए ऐसे लोगों से दूर रहने की सलाह दी थी.

‘‘अब तुम्हारी शादी जिस लड़के से तय हुई है, तुम उस से बात करती. उस के स्वभाव, व्यवहार और चरित्र का पता लगाती. अगर पसंद नहीं आता तो साफ इनकार कर देती. यह एक सही कदम होता. इस के लिए कई लोग तुम्हारी मदद में आगे आ जाते. तुम्हारा आत्मविश्वास बना रहता और मनोबल भी ऊंचा रहता.’’

माधुरी बोली, ‘‘एक गिलास पानी पिला तृप्ति. अब मैं सब समझ गई हूं. कल घर लौट जाऊंगी. मां से बोल दूंगी, आगे की पढ़ाई के लिए सम?ाने मैं तृप्ति के पास आई थी. मां पूछेंगी तो तुम भी यही कह देना.’’

तृप्ति ने कहा, ‘‘कल सुबह मैं चाची को फोन कर के बता दूंगी. सौरभ को अभी तुम बोल दो. अभी वह भी सोया न होगा. बनारस आने की तैयारी में लगा होगा. उस से कहो कि मैं अब गांव लौट रही हूं. मांबाबूजी का दिल दुखाना नहीं चाहती. तुम्हारा घर तोड़ कर किसी की आह नहीं लेना चाहती.

‘‘मुझे पूरा भरोसा है कि सौरभ खुश होगा कि बला उस के सिर से टलेगी.’’

तृप्ति ने सच ही कहा था. सौरभ अभी जाग रहा था और थोड़ी देर पहले ही मुंबई वाले अपने दोस्त से कहा था, ‘यार, अब इस बला को तुम संभालो. वह सुंदर है. खर्च करोगे तो तुम्हारी हो जाएगी. जब मन भर जाएगा तो कुछ दे कर उस के गांव वाली ट्रेन पर बिठा देना. अब मुझे एक दूसरी मिल गई है.’

सौरभ ने एक छोटा सा जवाब दिया था, ‘जैसी तुम्हारी इच्छा. मैं रिजर्वेशन कैंसिल करा देता हूं.’

माधुरी का मन अब हलका था, ‘‘तृप्ति, अब एक काम और कर दे. कल क्यों आज ही घर में फोन कर दे. अभी रात के 12 बजे हैं. मांबाबूजी बहुत चिंतित होंगे. मैं चुपके से यहां आ गई हूं.’’

‘‘अच्छा, बोलती हूं…’’ तृप्ति माधुरी की मां को समझ रही थी, ‘‘चिंता न करें आंटीजी. माधुरी मेरे पास आ गई है. वह आगे पढ़ना चाहती है. आप ने उस को घर से निकलने पर बंदिश लगा दी थी न, इसलिए… हां, उसे बता कर निकलना चाहिए था… अच्छा प्रणाम, माधुरी सो गई है, कल सुबह बात कर लेगी.’’

फोन कट गया. माधुरी को अपने किए पर पछतावा तो था, पर आगे साजिश में फंसने से बच जाने की खुशी भी थी. साथ ही, अपनी सहेली तृप्ति पर गर्व भी था. दोनों सहेलियां बात करतेकरते सो गईं.

अनकही व्यथा: दहेज प्रथा से जूझते आम लोगों की कहानी

कालोनी में सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर सुदर्शन के यहां उन की पुत्री के विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं. सुदर्शन ने 3 वर्ष पहले ही कालोनी में मकान बनवाया था और उस समय की लागत के अनुसार मकान बनवाने में केवल 1 लाख रुपए लगे थे. 4 बडे़ कमरे, बैठक, रसोईघर, हरेक कमरे से जुड़ा गुसलखाना, सामने सुंदर लान जिस में तरहतरह के फूल लगे थे और पीछे एक बड़ा आंगन था. मकान की शान- शौकत देखते ही बनती थी.

उसी सुदर्शन के मकान के सामने आज विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं. पूरी सड़क घेर कर काफी दूर तक कनातें लगाई गई थीं. शहर की सब से नामी फर्म ने सजावट का ठेका लिया था. चांदी और सुनहरे तारों की लडि़यां, रंगबिरंगे बल्ब, सोफे और गद्दीदार कुरसियां, झाड़-फानूस, सभी से वह पूरा क्षेत्र सजा हुआ था. स्वागत द्वार के पास ही परंपरागत शहनाईवादन हो रहा था. उस के लिए भी प्रसिद्ध कलाकार बुलाए गए थे.

जब मकान बना था तब भी पड़ोस में रहने वाले प्रोफेसर बलराज को बड़ा आश्चर्य हुआ था कि इतना रुपया सुदर्शन के पास कहां से आया. उन्हीं को नहीं, अन्य लोगों को भी इस बात पर अचंभा हुआ था, लेकिन यह पूछने का साहस किसी में नहीं था. आज बलराज को सुदर्शन की पुत्री के विवाह पर की गई सजावट और शानशौकत देख कर विस्मय हो रहा था.

बलराज हजार रुपए वेतन पा कर भी कभी मकान बनवाने की कल्पना नहीं कर सके और 15  वर्षं से इस कालोनी में किराए के मकान में रह रहे थे. उन की पत्नी कभीकभी व्यंग्य में कह दिया करती थीं, ‘‘जाइए, देख ली आप की प्रोफेसरी. इस मास्टरी लाइन में रखा ही क्या है? देख लो, सामने वाले नायब तहसीलदार विजय ने कैसी शानदार कोठी बनवा ली है और उधर देखो, थानेदार जयसिंह ने नए ढंग से क्या प्यारा बंगला बनवाया है. अपने बाईं ओर सुदर्शन की कोठी तो देख ही रहे हो, दाईं तरफ वाली विकास अधिकारी रतनचंद्र की कोठी पर भी नजर डाल लो.

‘‘इन्हें क्या तन- ख्वाह मिलती है? सच तो यह है कि शायद तुम से आधे से भी कम तनख्वाह मिलतीहोगी, लेकिन देख लो, क्या ठाट हैं. सभी के बच्चे कानवेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं. फल और मेवों से घर भरे हुए हैं. और एक हम लोग हैं, न ढंग से खा पाते हैं और न पहन पाते हैं. वही कहावत हुई न, नाम बडे़ और दर्शन छोटे.’’

‘‘इन्हें क्या तन- ख्वाह मिलती है? सच तो यह है कि शायद तुम से आधे से भी कम तनख्वाह मिलतीहोगी, लेकिन देख लो, क्या ठाट हैं. सभी के बच्चे कानवेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं. फल और मेवों से घर भरे हुए हैं. और एक हम लोग हैं, न ढंग से खा पाते हैं और न पहन पाते हैं. वही कहावत हुई न, नाम बडे़ और दर्शन छोटे.’’

बलराज पत्नी की बातों पर अकसर झुंझलाया करते थे. किंतु वह जानते थे कि उन की पत्नी की बातों में दम है, गहरी सचाई है. वह आज तक नहीं समझा सके कि इन लोगों के पास इतना पैसा कहां से आ रहा है? कैसे वे इतना बढि़या शानशौकत भरा जीवन बिता रहे हैं? और वह ऐसा क्यों नहीं कर पाते? बलराज जैसे सीधेसादे प्रोफेसर इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर भी नहीं ढूंढ़ पाते थे.

वह एक कालिज में भारतीय इतिहास के प्राध्यापक थे. प्राय: उन का अधिकांश समय गहरे अध्ययन और चिंतनमनन में ही बीतता था. परिवार में पत्नी के अलावा एक बड़ा पुत्र और 2 पुत्रियां थीं. पुत्र केवल बी.ए. तक ही पढ़ सका और एक फर्म में विक्रय प्रतिनिधि हो गया. उन की दोनों लड़कियों ने अवश्य एम.ए., बी.एड. कर लिया था. तीनों बच्चे बहुत सुंदर थे. लड़के का विवाह हो चुका था और एक बच्चा था.

लड़कियों के विवाह की चिंता उन्हें परेशान किए हुए थी. कई वरों को उन्होंने देख लिया था और कई वर और उन के मातापिता उन की पुत्रियों को देख चुके थे किंतु फिर भी कहीं बात तय नहीं हो पाई थी. वह काफी परेशान थे. सोचते थे कि दोनों ही लड़कियां विवाह योग्य हैं. 2-4 दिन के अंतर से दोनों का ही विवाह कर देंगे, लेकिन जब वर मिलेगा तभी तो विवाह होगा. किंतु वर कहां मिले?

उन की नजर सुदर्शन की कोठी की ओर चली गई. इस समय तक पंडाल भर चुका था. बड़ेबडे़ सेठसाहूकार अपनीअपनी कारों में आए थे. आखिर आते क्यों नहीं? सुदर्शन सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर जो था, इसीलिए शहर के व्यापारी वर्ग के सभी गण्यमान्य व्यक्ति वहां उपस्थित थे.

बलराज चौंके. ओह, वे व्यर्थ की बातें क्यों सोच रहे हैं? उन्हें भी अब सुदर्शन के यहां पहुंच जाना चाहिए. घर की महिलाएं पड़ोस में जा चुकी थीं. घर में अब उन के सिवा कोई नहीं था. वह भी जल्दी जाना चाहते थे, किंतु मन में अनजाने ही एक ऐसी अव्यक्त वेदना घर कर गई थी कि हृदय पर उन्हें एक भारी बोझ सा अनुभव हो रहा था. यह शायद अपनी पुत्रियों के विवाह तय न हो पाने के कारण था.

पटाखों और बैंडबाजों की आवाज से उन की विचारधारा टूटी. ओह, बरात आ गई. बलराज तुरंत दरवाजे पर ताला लगा कर पड़ोस में लपके.

बरात अब बिलकुल नजदीक आ चुकी थी और बैंड के शोर में ‘ट्विस्ट’ नाच अपनी चरमसीमा पर था. आगत अतिथिगण उठ कर खडे़ हो गए थे. उन में से कुछ आगे बढ़ कर नाच देखने लगे. वर का सजासजाया घोड़ा अब ‘स्वागतम्’ वाले द्वार के बिलकुल निकट आ गया था. बलराज भी अब आगे बढ़ आए थे.

परिवार की महिलाओं द्वारा अब वर का स्वागत हो रहा था. फूलों का सेहरा उठा कर वर के माथे पर तिलक किया जा रहा था. वर के मुख को देखने की उत्सुकता से बलराज ने भीड़ में सिर ऊपर उठा कर उस के मुख को देखा तो वह बुरी तरह चौंक गए. वर का मुख उन का अत्यंत जानापहचाना था.

बलराज का पूरा शरीर पसीने से भीग गया. यह सब कैसे हुआ? सचमुच यह कैसे हुआ? अशोक यहां कैसे आ गया?

लगभग 3 महीने पहले यही अशोक अपने पिता, भाई, मां तथा बहन के साथ उन की पुत्री रुचि को देखने उन के यहां आया था. उस दिन उन्होंने भी अपने आसपड़ोस के 4 आदमियों को इकट्ठा कर लिया था जिस में पड़ोस के सुदर्शन का परिवार भी सम्मिलित था.

बलराज को वह दिन अच्छी तरह याद था. अशोक अत्यंत सुंदर व सुसंस्कृत नवयुवक था. वह अच्छे पद पर था. एकाध वर्ष में स्टेट बैंक की किसी शाखा का मैनेजर बनने वाला था. उन के एक मित्र ने उस से तथा उस के परिवार से बलराज का परिचय कराया था. लड़का उन्हें बहुत पसंद आया था और उन्होंने अपनी रूपमती पुत्री रुचि का उस से विवाह कर देने का निश्चय कर लिया था.

किंतु निश्चय कर लेना एक बात है और कार्यरूप में परिणत करना दूसरी बात है. उन की हार्दिक इच्छा होने के बावजूद अशोक और रुचि का विवाह तय नहीं हो सका था. इस में सब से बडे़ बाधक अशोक के पिता थे. उन के उस समय कहे गए शब्द अब बलराज के कानों में गूंज रहे थे :

‘प्रोफेसर साहब, यह ठीक है कि आप एक बडे़ कालिज में प्रोफेसर हैं. यह भी सही है कि आप अच्छी तनख्वाह पाते हैं, लेकिन यह बताइए, आप हमें क्या दे सकते हैं? मेरा लड़का एम.ए., बी.काम. है, बैंक में बड़ा अफसर होने जा रहा है. हम ने उस की पढ़ाईलिखाई पर 40-50 हजार से ऊपर खर्च कर दिया है और अफसर बनवा दिया है, इसीलिए न कि हमें यह सब रुपया वापस मिल जाएगा.’

उन्होंने रुक कर फिर कहा, ‘यदि आप हमें 1 लाख रुपए नकद दे सकते हैं और लड़की के जेवर, कपड़ों के अलावा फ्रिज, रंगीन टेलीविजन और स्कूटर दे सकते हैं तो मिलाइए हाथ. बात अभी और इसी समय पक्की समझिए. नहीं तो हमें माफ कीजिए.’

बलराज उस मांग को सुन कर अत्यंत विचलित हो गए थे. वह मात्र एक प्रोफेसर थे जिस के पास वेतन और कुछ परीक्षाओं में परीक्षक होने से प्राप्त धन की ही आमदनी थी. वह दहेज को सदा समाज और देश के लिए अभिशाप समझते रहे, इसीलिए उन्होंने अपनी आदर्शवादिता का निर्वाह करते हुए अपने पुत्र के विवाह में कुछ नहीं लिया था.

उन्हें अपनी पुत्रवधू पसंद आ गई थी और वह प्रसन्नता के साथ उसे अपनी बहू बना कर ले आए थे. वह उस से आज भी पूर्णतया संतुष्ट थे. उन्हें कभी भी उस से या उस के परिवार से शिकायत नहीं हुई थी. वे यही सोचते थे कि जब मैं ने अपने पुत्र के विवाह में कुछ नहीं लिया तो मेरी पुत्रियों के विवाह में भी मुझ से कोई कुछ नहीं मांगेगा.

किंतु आज उन का वह स्वप्न छिन्नभिन्न हो गया, वह पराजित हो गए, उन के सम्मुख ठोस यथार्थ आ चुका था. उन्होंने बड़े निराशा भरे स्वर में अशोक के पिता से कहा था, ‘आप की मांग ऐसी है कि मुझ जैसा अध्यापक कभी पूरी नहीं कर पाएगा, कैलाशजी. एक पिता का सब से बड़ा कर्तव्य यही है कि वह अपनी संतानों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दे कर हर रूप में योग्य व समर्थ बना कर उन का जीवन व्यवस्थित कर दे. वह कर्तव्य मैं ने कर दिया है.

‘मेरी लड़की अत्यंत सुंदर होने के साथसाथ एम.ए., बी.एड. है, गृहकार्य में पूर्णतया दक्ष है. मुझे विश्वास है कि जहां भी जाएगी, वह घर उसे पा कर सुखी होगा. मैं आप को केवल एक ही भरोसा दे सकता हूं कि अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर अच्छे से अच्छा विवाह करूंगा और आप को संतोष देने का प्रयत्न करूंगा, लेकिन किसी भी चीज को देने का वादा नहीं कर सकता.’

और कैलाशजी अपने पुत्र अशोक को ले कर वापस चले गए थे. बलराज की पुत्री का विवाह तय नहीं हो पाया था. उस दिन वह बेहद निराश और मायूस रहे. उन्होंने उस दिन खाना नहीं खाया और किसी से बोले भी नहीं. जीवन में पहली बार उन्हें यथार्थ के ठोस धरातल का एहसास हुआ था. वह जान गए थे कि यह दुनिया अब उन के स्वप्नों की दुनिया नहीं रही है. यह बहुत बदल गई है, सचमुच बेहद बदल गई है.

अब वही लड़का अशोक वर के रूप में सामने खड़ा था और वह भी पड़ोसी सुदर्शन के यहां. क्या सुदर्शन ने अशोक के पिता की पूरी मांगें मान लीं? लेकिन यह कैसे हो सकता है? सुदर्शन के पास इतना रुपया कहां से आया? और उन की लड़की भी तो अत्यंत कुरूप और मात्र इंटर पास है. अशोक को तो सुंदर लड़की चाहिए थी. क्या अशोक ने उसे पसंद कर लिया?

वह अपने कंधे पर किसी के हाथ की थपथपाहट से चौंके. सड़क के उस पार की कोठी के मालिक रामेंद्र बगल में खडे़ थे. उन्होंने पसीने में भीगा अपना चेहरा उन के मुख पर टिका दिया और खोएखोए से देखते रहे.

रामेंद्र उन्हें भीड़ से अलग एक किनारे ले गए और धीरे से बोले, ‘‘मैं जानता हूं कि आप इस लड़के अशोक को देख कर बेहद चौंके हैं और शायद दुखी भी हुए हैं. मैं आप के मन की व्यथा समझ रहा हूं, प्रोफेसर साहब. बात इतनी है कि आजकल वरों की नीलामी हो रही है. जो जितनी अधिक ऊंची बोली लगाएगा वही अपनी पुत्री का विवाह कर पाएगा. सुदर्शन ने आप के यहां इस लड़के को देख लिया और उस के बाप से उसे खरीद लिया.

‘‘उधर देखिए,’’ सामने इशारा करते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘‘इसे देने के लिए नया स्कूटर खड़ा है, फ्रिज, रंगीन टेलीविजन, स्टीरियो और टेपरिकार्डर कोने में रखे हैं. मंडप के नीचे साडि़यों और जेवरात की बहार पर भी नजर डालिए. यही सब तो इस वर के पिता को चाहिए था जो आप दे नहीं सके थे. शायद आप को यह भी पता नहीं कि सुदर्शन ने तिलक की रस्म के समय 51 हजार रुपए दिए थे और शेष अब दिए जाएंगे.’’

बलराज ने भर्राए, अटकते स्वरों में कहा, ‘‘लेकिन सुदर्शन की लड़की… वह तो बहुत बदसूरत है, ज्यादा पढ़ीलिखी भी नहीं है. क्या लड़के ने उसे पसंद कर लिया?’’

रामेंद्र व्यंग्य से मुसकराए. धीरे से बोले, ‘‘लड़के ने ही तो लड़की पसंद कर के शादी की है. लड़के को लड़की नहीं, रुपया चाहिए था. दहेज चाहिए था. वह मिल गया. एक बडे़ होटल में दावत पर इन सभी को बुलाया गया था. वहीं मोलभाव हुआ था और तुरंत वहीं तिलक की रस्म भी कर दी गई थी. तभी तो हम लोगों को पता नहीं चला. वह तो कल मेरी पत्नी को कहीं से यह सबकुछ पता चला, तब मैं जान पाया.’’

बलराज ने खोएखोए स्वर में कहा, ‘‘रामेंद्रजी, इतना सबकुछ देना मेरी सामर्थ्य के बाहर है. अब मैं क्या करूंगा. मेरी लड़कियों का विवाह कैसे होगा?’’

रामेंद्रजी ने सहानुभूतिपूर्वक कहा, ‘‘मैं आप की कठिनाई समझ रहा हूं, प्रोफेसर साहब, लेकिन आज का युग तो मोलभाव का युग है, नीलामी का युग है. आप ने दुकानों में सजी हुई वस्तुओं पर कीमतें टंगी हुई देखी होंगी. बढि़या माल चाहिए, बढि़या दाम देने होंगे. वही हाल आजकल वरों का है. वर का जितना बड़ा पद होगा उसी अनुपात में आप को उस की कीमत नकद एवं सामान के रूप में देनी होगी.’’

रामेंद्रजी ने थोड़ा रुक कर, फिर सांस भर कर धीरे से कहा, ‘‘बोलिए, आप कैसा और कौन सा माल खरीदेंगे? चाहे जैसा माल खरीदिए, शर्त यही है कि कीमत आप को देनी होगी.’’

बलराज हलकी सर्दी में भी पसीने से बुरी तरह भीग चुके थे. वह एकटक असहाय दृष्टि से ठाकुर साहब को देखते रहे और फिर बिना कुछ बोले तेजी से अपने घर की ओर बढ़ गए.

बलराज कब तक निश्चेष्ट पडे़ रहे, यह उन्हें याद नहीं. उन का शरीर निश्चेष्ट अवश्य था, किंतु उन का मस्तिष्क सक्रिय था. वह अनर्गल विचारों में डूबतेउतराते रहे और उन की तंद्रा तब टूटी जब उन की पत्नी ने उन के माथे को सहलाया. फिर उस ने धीरे से पूछा, ‘‘क्या सो गए?’’

उन्होंने धीरे से नेत्र खोल कर एक क्षण अपनी पत्नी को देखा और फिर निर्निमेष उसे देखते ही रहे.

पत्नी ने घबराए स्वर में पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न? आप की आंखें लाल क्यों हैं?’’

बलराज धीरे से उठ कर बैठ गए और हौले स्वर में बोले, ‘‘मैं ठीक हूं, रमा. मुझे कुछ नहीं हुआ है.’’

पलंग के पास पड़ी कुरसी पर पत्नी बैठ गई. कुछ क्षणों तक खामोशी रही, फिर रमा ने धीरे से कहा, ‘‘सुदर्शनजी रात्रिभोज के लिए आप को काफी ढूंढ़ते रहे. शायद वह लड़की के दहेज का सामान भी आप को दिखाना चाहते थे, लेकिन मैं जानती हूं कि आप क्यों चले आए. मैं तो इतना ही कहूंगी कि इस तरह दुखी होने से क्या होगा. हम अपनी विवशताओं की सीमाओं में बंधे हैं. हम अपनेआप को बेच कर भी इतना सब कुछ नहीं दे सकते.

‘‘किंतु मुझे विश्वास है कि चाहे देर से ही सही, वह समय जरूर आएगा जब कोई समझदार नौजवान इन दहेज के बंधनों को तोड़ कर हमारी बेटी को ब्याह ले जाएगा. हां, हमें तब तक प्रतीक्षा करनी होगी.’’

बलराज ने भर्राए स्वर में कहा, ‘‘नहीं, रमा, ऐसा विश्वास व्यर्थ है. सोने और चांदी से चमचमाते इस युग में हम सीमित साधनों वाले इनसान जिंदा नहीं रह सकते. क्या तुम्हें यह विचित्र नहीं लगता कि पड़ोसियों की कम पढ़ीलिखी, बदसूरत लड़कियां एकएक कर ब्याही जा रही हैं, क्योंकि वे अच्छा दहेज दे सकने में समर्थ हैं, इसलिए कि उन के पास रिश्वत, सरकारी माल की हेराफेरी और भ्रष्टाचार से कमाया पैसा है और हम ईमानदार लोग असहाय एवं बेबस हो कर यह सब देख रहे हैं और सह रहे हैं.

‘‘रमा, आज धन और पैसे का बोलबाला है, चांदी के जूते के सामने इनसान ने अपनी शर्महया, इज्जतआबरू, मानअपमान सभी को ताक पर रख दिया है. इनसान सरेबाजार बिक गया है. नीलाम हो गया है.’’

बलराज थोड़ी देर रुके. फिर सांस भर कर बोले, ‘‘मेरे दिल में एक ही बात की कसक है कि एक अध्यापक अपनी सीमित आय के कारण अपनी पुत्री का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वह एक वर की कीमत दे सकने में असमर्थ है. वर पक्ष वाले भी इसीलिए अध्यापकों के पास नहीं आते. तब समाज का यह प्रबुद्ध वर्ग कहां जाए? क्या करे? मैं जानता हूं कि इस प्रश्न का उत्तर मैं या तुम नहीं दे सकते. इस प्रश्न का तो पूरे समाज को ही उत्तर देना होगा.’’

पत्नी की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला, केवल हलकी सिसकियों की आवाज सुनाई देती रही.

पास के कमरे से कुछ और सिसकियों की आवाज सुनाई दे रही थी. ये सिसकियां उन लड़कियों की थीं जो शादी का जोड़ा पहनने की प्रतीक्षा में जाने कब से बैठी हैं और जाने कब तक बैठी रहेंगी. पता नहीं, उन के सपनों का राजकुमार कब घोड़े पर चढ़ कर उन्हें लेने आएगा.

खाउड्या : घूसखोर सिपाही सीतू

सीतू झोंपड़पट्टी वाले थाने में नयानया सिपाही भरती हुआ था. एक दिन थानेदार ने उसे रामू बनिए को बुला लाने के लिए भेजा.

रामू बनिया तो घर पर नहीं मिला, पर उस के मुनीम ने सीतू को 50 रुपए का नोट पकड़ा कर कहा, ‘‘थानेदार से कह देना कि सेठजी आते ही थाने में हाजिर हो जाएंगे.’’

लौट कर सीतू ने 50 रुपए का नोट थानेदार की मेज पर रख दिया और साथ ही मुनीम का पैगाम भी कह सुनाया.

जब वह जाने लगा तो थानेदार ने 50 रुपए का नोट उसे पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे रख लो, यह तुम्हारा इनाम है.’’

बाद में थाने के सिपाहियों ने सीतू का काफी मजाक उड़ाया और बताया कि मुनीम ने 50 रुपए उसे दिए थे, न कि थानेदार को. थानेदार तो 100 रुपए से कम को हाथ तक नहीं लगाता.

सीतू 50 रुपए ले कर खुश हो गया. यह उस की पहली ऊपर की कमाई थी. थानेदार उस की ईमानदारी का कायल हो गया. इस के बाद से थानेदार को जहां से भी पैसा ऐंठना होता, तो वह सीतू को भेज देता या अपने साथ ले जाता.

सीतू जो भी पैसा ऐंठ कर लाता था, उस में से उसे भी हिस्सा मिलता था. धीरेधीरे उस के पास काफी पैसा जमा हो गया. पर मन के किसी कोने में उसे अपनी इस ऊपर की कमाई से एक तरह के जुर्म का अहसास होता, मगर जब वह अपनी तुलना दूसरों से करता तो यह अहसास कहीं गायब हो जाता.

सीतू को एक बात अकसर चुभती थी कि कसबे के लोग बाकी सिपाहियों को तो पूरी इज्जत देते और सलाम करते थे, मगर उसे केवल मजबूरी में ही सलाम करते थे. वह चाहता था कि उसे भी दूसरे सिपाहियों के बराबर समझा जाए, मगर वह इस बारे में कुछ कर नहीं सकता था.

वैसे, अब सीतू काफी सुखी था.

उस के पास सरकारी मकान था. एक साइकिल भी उस ने खरीद ली थी. वह शान से साफसुथरे कपड़ों में रहता था. कम से कम झोंपड़पट्टी के लोग तो उस की कद्र करते ही थे.

सीतू अपने साथी सिपाहियों के मुकाबले खुद को बेहतर समझता था. उस के सभी साथी शादीशुदा थे, मगर वह इस झंझट से अभी तक आजाद था. मांबाप की याद भी उसे ज्यादा नहीं आती थी, क्योंकि उसे उन से ज्यादा लगाव कभी रहा ही नहीं था.

एक दिन सीतू अपनी साइकिल पर सवार हो कर बाजार से गुजर रहा था कि एक जगह भीड़ लगी देख कर वह रुक गया. उस ने देखा कि झोंपड़पट्टी में रहने वाली एक लड़की भीड़ से घिरी खड़ी थी और रोते हुए गालियां बक रही थी. वह कभीकभार भीड़ पर पत्थर भी फेंक रही थी.

भीड़ में शामिल लोग लड़की के पत्थर फेंकने पर इधरउधर भागते हुए उस के बारे में उलटीसीधी बातें कर रहे थे.

सीतू ने देखा कि कुछ लफंगे से दिखाई देने वाले लड़के उस लड़की को घेरने की कोशिश कर रहे थे. सीतू ने पास खड़े झोंपड़पट्टी में रहने वाले एक बूढ़े आदमी से पूछा, ‘‘बाबा, आखिर माजरा क्या है?’’

बूढ़े ने सीतू को पुलिस की वरदी में देख कर पहले तो मुंह बिचकाया, फिर बोला, ‘‘यह लड़की यहां बैठ कर लकड़ी के खिलौने बेच रही थी. जब सब खिलौने बिक गए, तो उस ने पैसे रख लिए और थैले में से रोटी निकाल कर खाने लगी.

‘‘तभी ये 3 बदमाश लड़के यहां आ धमके. एक ने उसे 50 का नोट दिखा कर पूछा कि ‘चलती है क्या मेरे साथ?’ तो लड़की ने उस के मुंह पर थूक दिया.

‘‘बस फिर क्या था, तीनों लड़के उस पर टूट पड़े. लड़की की चीखपुकार सुन कर भीड़ जमा हो गई तो लड़कों ने शोर मचा दिया कि इस लड़की ने चोरी की है. बस, तभी से यह नाटक चल रहा है.’’

इतना बता कर वह बूढ़ा सीतू को इस तरह घूर कर देखने लगा मानो कह रहा हो, ‘है हिम्मत इस लड़की को इंसाफ दिलाने की?’

इतना सुनते ही सीतू साइकिल की घंटी बजाते हुए भीड़ में जा घुसा. उस ने कड़क लहजे में लड़की से पूछा, ‘‘ऐ लड़की, यह सब क्या हो रहा है?’’

‘‘साहब, ये तीनों मुझ से बदतमीजी कर रहे हैं. मैं ने रोका तो जबरदस्ती करने लगे. मैं ने शोर मचाया तो बोले कि मैं चोर हूं, पर मैं ने कोई चोरी नहीं की है,’’ लड़की गुस्से में बोली.

‘‘साहब, यह झूठी है. यह तो पक्की चोर है. इस ने पहले भी कई चोरियां की हैं. जो घड़ी इस के हाथ में बंधी है वह मेरी है,’’ एक लड़के ने कहा.

‘‘इस ने मेरा 50 का नोट चुराया है,’’ दूसरा लड़का बोला.

‘‘ये लड़के झूठ बोलते हैं साहब. मैं ने चोरी नहीं की है,’’ लड़की ने सीतू के आगे हाथ जोड़ कर कहा.

लड़की के मुंह से ‘साहब’ सुन कर सीतू की छाती चौड़ी हो गई. उस ने एक लड़के से पूछा, ‘‘क्या सुबूत है कि यह घड़ी तेरी है?’’

इस से पहले कि वह लड़का कुछ कह पाता, भीड़ में से किसी की आवाज आई, ‘‘इस लड़की के पास क्या सुबूत है कि यह घड़ी इसी की है?’’

यह सुन कर सीतू भड़क उठा. साइकिल स्टैंड पर लगा कर उस ने अपना डंडा निकाल लिया. फिर वह भीड़ की तरफ मुड़ गया और हवा में डंडा लहराते हुए बोला, ‘‘किसे चाहिए सुबूत? इस लड़की के पास यह सुबूत है कि घड़ी इस के कब्जे में है… और किसी को कुछ पूछना है? चलो, भागो यहां से. क्या यहां जादूगर का तमाशा हो रहा है?’’

सीतू की फटकार सुन कर वहां जमा हुए लोग धीरेधीरे खिसकने लगे.

‘‘देखो साहब, वे तीनों भी भाग रहे हैं,’’ लड़की बोली.

‘‘तुम तीनों यहीं रुको और बाकी सब लोग जाएं,’’ सीतू ने उन लफंगों को रोकते हुए कहा.

जब भीड़ छंट गई, तो सीतू उन लड़कों से बोला, ‘‘चलो, थाने चलो.’’

थाने का नाम सुन कर उन तीनों लड़कों के साथसाथ वह लड़की भी घबरा गई. वह बोली, ‘‘देखो साहब, ये तो बदमाश हैं, मगर मैं थाने नहीं जाना चाहती.’’

‘‘अरी, तुझे कोई खा जाएगा क्या वहां? मैं हूं न तेरे साथ,’’ सीतू उसे दिलासा देते हुए बोला.

‘‘साहब, घड़ी इसी के पास रहने दीजिए. कहां थाने के चक्कर में फंसाते हैं,’’ एक लड़का बोला.

‘‘साला… फिर कहता है कि मैं चोर हूं. चलो साहब, थाने ही चलो,’’ लड़की गुस्से में बोली.

‘‘गाली नहीं देते लड़की,’’ सीतू ने लड़की से कहा और फिर लड़कों से बोला, ‘‘मैं तुम लोगों को तब से देख रहा हूं, जब तुम ने इस लड़की को 50 का नोट दिखाया था.’’

यह सुन कर तीनों लड़कों के चेहरे फीके पड़ गए. सीतू ने लड़की को बूढ़े के पास रुकने को कहा और तीनों लड़कों को ले कर थाने की ओर बढ़ चला. लड़कों ने आपस में कानाफूसी की और एक लड़के ने सौ का नोट सीतू की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अब तो जाने दो साहब. कभीकभी गलती हो जाती है.’’

सीतू ने एक नजर नोट पर डाली और फिर इधरउधर देखा, कुछ लोग उन्हें देख रहे थे.

‘‘रिश्वत देता है. इस जुर्म की दफा और लगेगी,’’ कहते हुए सीतू उन्हें धकेलता हुआ सड़क के मोड़ पर ले गया.

‘‘साहब, इस समय तो हमारे पास इतने ही पैसे हैं,’’ कहते हुए लड़के ने 50 का नोट और बढ़ा दिया.

सीतू ने इधरउधर देखा, वहां उन्हें कोई नहीं देख रहा था. वह बोला, ‘‘ठीक है, अब आगे ऐसी घटिया हरकत मत करना.’’

‘अरे साहब, कसम पैदा करने वाले की, अब ऐसा कभी नहीं करेंगे,’ तीनों ने एकसाथ कहा.

‘‘अच्छा जाओ, मगर दोबारा अगर पकड़ लिया तो सीधा सलाखों के पीछे डाल दूंगा,’’ सीतू ने नोट जेब में रखते हुए कहा.

सीतू कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा, फिर धीरेधीरे साइकिल धकेलता हुआ वहीं जा पहुंचा, जहां बूढ़े के पास लड़की को छोड़ कर गया था. लड़की तो वहां नहीं थी, पर बूढ़ा वहीं बैठा हुआ था. बूढ़ा सीतू को सिर से पैर तक घूर रहा था.

‘‘ऐ बूढ़े, वह लड़की कहां गई?’’ सीतू ने पूछा.

बूढ़े ने सीतू को घूरते हुए कहा, ‘‘पुलिस में भरती हो गए तो क्या यह तमीज भी भूल गए कि बड़ेबूढ़ों से किस तरह बात करते हैं. वह लड़की चली गई, पर इस से तुम्हें क्या मतलब? तुम्हारी जेब तो गरम हो गई न, जाओ ऐश करो.’’

‘‘क्या बकता है? किस की जेब की बात करता है? तुम ने उस लड़की को क्यों जाने दिया?’’ सीतू भड़क उठा.

‘‘इस इलाके में कोई भी तुम पुलिस वालों पर यकीन नहीं करता. ऐसे में वह लड़की क्या करती? सोचा था कि अपनी बिरादरी का एक आदमी पुलिस में आया है तो वह कुछ ठीक करेगा, मगर वाह री पुलिस की नौकरी, बेच दी अपनी ईमानदारी शैतान के हाथों और बन गया खाउड्या… जा खाउड्या अपना काम कर.’’

‘‘क्या बकता है? थाने में बंद कर दूंगा,’’ कहने को तो सीतू कह गया, मगर न जाने क्यों वह बूढ़े से नजरें नहीं मिला पाया.

सीतू इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि रिश्वत लेना जुर्म है, मगर आज तक किसी पुलिस वाले ने उसे यह बात नहीं बताई थी. हां, साथियों ने यह जरूर समझाया था कि रिश्वत लेते समय पूरी तरह से चौकस रहना बहुत ही जरूरी होता है.

कुछ इस तरह : कैसा था जूही का परिवार

एक बजे जूही ने घर में सोए मेहमानों पर नजर डाली. उस की चाची, मामी और ताऊ व ताईजी कुछ दिनों के लिए रुक गए थे. बाकी मेहमान जा चुके थे. ये लोग जूही और उस की मम्मी कावेरी का दुख बांटने के लिए रुक गए थे.

जूही ने अब धीरे से अपनी मम्मी के बैडरूम का दरवाजा खोल कर झांका. नाइट बल्ब जल रहा था. जूही ने मां को कोने में रखी ईजीचेयर पर बैठे देखा तो उस का दिल भर आया. क्या करे, कैसे मां का दिल बहलाए. मां का दुख कैसे कम करे. कुछ तो करना ही पड़ेगा, ऐसे तो मां बीमार पड़ जाएंगी.

उस ने पास जा कर कहा, ‘‘मां, उठो, ऐसे बैठेबैठे तो कमर अकड़ जाएगी.’’ कावेरी के मुंह से एक आह निकल गई. जूही ने जबरदस्ती मां का हाथ पकड़ कर उठाया और बैड पर लिटा दिया. खुद भी उन के बराबर में लेट गई. जूही का मन किया, दुखी मां को बच्चे की तरह खुद से चिपटा ले और उस ने वही किया.

कावेरी से चिपट गई वह. कावेरी ने भी उस के सिर पर प्यार किया और रुंधे स्वर में कहा, ‘‘अब हम कैसे रहेंगे बेटा, यह क्या हो गया?’’ यही तो कावेरी 20 दिनों से रो कर कहे जा रही थी. जूही ने शांत स्वर में कहा, ‘‘रहना ही पड़ेगा, मां. अब ज्यादा मत सोचो. सो जाओ.’’

जूही धीरेधीरे मां का सिर थपकती रही और कावेरी की आंख लग ही गई. कई दिनों का तनाव, थकान तनमन पर असर दिखाने लगा था. जूही की खुद की आंखों में नींद नहीं थी.

26 वर्षीया जूही, कावेरी और पिता शेखर 3 ही लोगों का तो परिवार था. अब उस में से भी 2 ही रह गईं. 20 दिनों पहले शेखर जो रात को सोए, उठे ही नहीं. सोतेसोते कब हार्टफेल हो गया, पता ही नहीं चला. मांबेटी अकेली उन के जाने के बाद सब काम कैसे निबटाए चली आ रही हैं, वे ही जानती हैं.

रिश्तेदारों को इस दुखद घटना की सूचना देने से ले कर, उन के आने पर सब संभालते हुए जूही भी शारीरिक व मानसिक रूप से थक रही है अब. शेखर एक सफल, प्रसिद्ध बिजनैसमैन थे. आर्थिक स्थिति काफी अच्छी थी. मुंबई के पवई इलाके में उन के इस 4 बैडरूम फ्लैट में अब मांबेटी ही रह गई हैं.

एमबीए करने के बाद जूही काफी दिनों से पिता के बिजनैस में हाथ बंटा रही थी. यह वज्रपात अचानक हुआ था, इस की पीड़ा असहनीय थी. शेखर जिंदादिल इंसान थे. जीवन के हर पल को वे भरपूर जीते थे. परिवार के साथ घूमना उन का प्रिय शौक था. साल में एक बार कावेरी और जूही को ले कर कहीं न कहीं घूमने जरूर जाते थे और अब भी अगले महीने स्विट्जरलैंड जाने के टिकट बुक थे, मगर अब?

जूही के मुंह से एक सिसकी निकल गई. पिता की इच्छाएं, उन के जीने के अंदाज, उनकी जिंदादिली, उन का स्नेह याद कर रुलाई का आवेग फूट पड़ा. मां की नींद खराब न हो जाए यह सोच कर वह बालकनी में जा कर वहां रखी चेयर पर बैठ कर देर तक  रोती रही. अचानक सिर पर हाथ महसूस हुआ, तो वह चौंकी. हाथ कावेरी का था. ‘‘मम्मी, आप?’’

‘‘मु?ो लिटा कर खुद यहां आ गई. चलो, आओ, सोते हैं, 3 बज रहे हैं. अब की बार बेटी को दुलारते हुए कावेरी अपने साथ ले गई. 20 दिनों से यही तो चल रहा था. कभी बेटी मां को संभाल रही थी, कभी मां बेटी को.

दोनों ने लेट कर सोने की कोशिश करते हुए आंखें बंद कर लीं. कुछ ही दिनों में बाकी मेहमान भी चले गए. मांबेटी अकेली रह गईं. घर का सूनापन, हर तरफ फैली उदासी, घर के कोनेकोने में बसी शेखर की याद. जीना कठिन था पर जीवन है, तो जीना ही था. कावेरी सुशिक्षित थीं. वे पढ़नेलिखने की शौकीन थीं. कुछ सालों से लेखन के क्षेत्र में काफी सक्रिय थीं. उन की कई रचनाएं प्रकाशित होती रहती थीं. लेखन के क्षेत्र में उन की एक खास पहचान बन चुकी थी. शेखर से उन्हें हमेशा प्रोत्साहन मिला था. अब शेखर के जाने के बाद कलम जो छूटा, उस का सिरा पकड़ में ही नहीं आ रहा था.

जूही ने औफिस जाना शुरू कर दिया था. कई शुभचिंतक उसे औफिस में भरपूर सहयोग कर रहे थे. पर घर पर अकेली उदास मां की चिंता उसे दुखी रखती. जूही ने एक दिन कहा, ‘‘मां, कुछ लिखना शुरू करो न. कुछ लिखोगी, तो ठीक रहेगा, मन भी लगेगा.’’

‘‘नहीं, मैं अब लिख नहीं पाऊंगी. मेरे अंदर तो सब खत्म हो गया है. लिखने का तो कोई विचार आता ही नहीं.’’

जूही मुसकराई, ‘‘कोई बात नहीं, कई राइटर्स कभीकभी नहीं लिख पाते. होता है ऐसा. ठीक है, ब्रेक ले लो.’’ फिर एक दिन जूही ने कहा, ‘‘मां, टिकट बुक हैं, हम दोनों चलें स्विटजरलैंड?’’

कावेरी को ?ाटका लगा. ‘‘अरे नहींनहीं, सोचा भी कैसे तुम ने? तुम्हारे पापा के बिना हम कैसे जाएंगे. घूम लिए जितना घूमना था,’’ कह कर कावेरी सिसक पड़ी. जूही ने मां के गले में बांहें डाल दीं, ‘‘मां, सोचो, पापा का सपना था वहां जाने का, हम वहां जाएंगे तो लगेगा पापा की इच्छा पूरी कर रहे हैं. वे जहां भी हैं, हमें देख रहे हैं. मैं तो यही महसूस करती हूं. आप को नहीं लगता, पापा हमारे साथ ही हैं? मैं तो औफिस में भी उन की उपस्थिति अपने आसपास महसूस करती हूं, दोगुने उत्साह के साथ काम में लग जाती हूं. चलो न मां, हम घूम कर आएंगे.’’

कावेरी ने गंभीरतापूर्वक फिर न कर दिया. पर अगले दोचार दिन जूही के लगातार सकारात्मक सु?ावों और स्नेहभरी जिद के आगे कावेरी ने हां में सिर हिलाते हुए, ‘‘जैसी तुम्हारी मरजी, तुम्हारे लिए यही सही’’ कहा, तो जूही उन से लिपट गई, बोली, ‘‘बस मां, अब सब मेरे ऊपर छोड़ दो.’’

जूही की मौसी गंगा का बेटा अजय पेरिस में अपनी पत्नी रीमा के साथ रहता था. जूही अब लगातार अजय से संपर्क कर सलाह करती रही. जिस ने भी सुना कि दोनों घूमने जा रही हैं, हैरान रह गया. कुछ लोगों ने मुंह बनाया, व्यंग्य किए. पर वहीं, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने खुल कर मांबेटी के इस फैसले की प्रशंसा की. जूही को शाबाशी दी कि वह अपना मनोबल, आत्मविश्वास ऊंचा रखते हुए अपनी मां को कुछ बदलाव के लिए बाहर ले कर जा रही है.

उन लोगों का कहना था कि अच्छा है, दोनों घूम कर आएंगी, इतना बड़ा वज्रपात हुआ है, दोनों कुछ उबर पाएंगी.

इतनी प्रतिभावान मां हिम्मत छोड़ कर ऐसे ही दुख में डूबी रही तो क्या होगा मां का, कैसे मन लगेगा, जूही को इस बात की बड़ी चिंता थी और यह कि जिन किताबों में मां रातदिन डूबी रहती थीं, अब उन की तरफ देख भी नहीं रही थीं. बस, चुपचाप बैठी रहती थीं. इस ट्रिप से मां का मन जरूर बदलेगा. घर में तो हर समय कोई न कोई शोक प्रकट करने आता ही रहता था. वही बातें बारबार सुन कर कैसे इस मनोदशा से निकला जा सकता है. यही सब जूही के दिमाग में चलता रहता था.

शेखर का टिकट तो बहुत भारीमन से जूही कैंसिल करवा चुकी थी. औफिस का काम अपने मित्रों, सहयोगियों पर छोड़ कर जूही और कावेरी ट्रिप पर निकल गईं.

मुंबई से साढ़े 3 घंटे में कतर पहुंच कर वहां 2 घंटे रुकना था. जूही पिता को याद करते हुए उन की बातें करने में न हिचकते हुए कावेरी से उन की खूब बातें करने लगी कि पापा को ट्रैवलिंग का कितना शौक था. हर जगह का स्ट्रीटफूड ट्राई करते थे. हम भी ऐसा ही करेंगे. कावेरी भी धीरेधीरे सब याद करते हुए मुसकराने लगी तो जूही को बहुत खुशी हुई. फ्लाइट चेंज कर के दोनों साढ़े 7 घंटे में जेनेवा पहुंच गए.

जूही ने कहा, ‘‘मां, यहां रुकेंगे. ‘लेक जेनेवा’ पास से देखेंगे. पापा ने बताया था, उन्होंने डिस्कवरी चैनल में देखा था एक बार, लेक से एक तरफ स्विटजरलैंड, एक तरफ फ्रांस दिखता है. वहां ‘लोसान टाउन’ है जहां से ये दोनों दिखते हैं. वहीं ‘लेक जेनेवा’ के सामने किसी होटल में रह लेंगे.’’

‘‘ठीक है, जैसा तुम ने सोचा है, सब जानकारी ले ली है न?’’

‘‘हां, मां, अजय भैया के लगातार संपर्क में हूं.’’ रात होतेहोते बर्फ से ढके पहाड़ों पर लाइट दिखने लगी. जूही ने उत्साहपूर्ण कांपती सी आवाज में कहा, ‘‘मां, वह देखो, वह फ्रांस है.’’ होटल में रूम ले कर सामान रख कर फ्रैश होने के बाद दोनों ने कुछ खाने का और्डर किया, थोड़ा खापी कर दोनों बार निकल आईं.

लेक के आसपास कईर् परिवार बैठ कर एंजौय कर रहे थे. शेखर की याद शिद्दत से आई. कावेरी वहां के माहौल पर नजर डालने लगी. सब कितने शांत, खुश, बच्चे खेल रहे थे. आसपास काफी चर्च थे. चर्च की घंटियों की आवाज कावेरी को बड़ी भली सी लगी.

दोनों अगले दिन लोसान घूमते रहे. कैथेड्रल्स, गार्डंस, म्यूजियम बहुत थे. वहां दोनों 2 दिन रुके. वहीं एक जगह मूवी ‘दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे’ की शूटिंग हुई थी. कावेरी अचानक हंस पड़ी, ‘‘जूही, याद है न, तुम्हारे पापा ने यह मूवी 4 बार देखी थी. टीवी पर तो जब भी आती थी, वे देखने बैठ जाते थे. यही सब तो उन्हें यहां देखना था, आज यह जगह देख कर वे बहुत खुश होते.’’

‘‘वे देख रहे हैं यह जगह हमारे साथ, जो हमेशा दिल में रहते हैं. वे दूर कहां हैं,’’ जूही बोली थी.

कावेरी मुसकरा दी, ‘‘मेरी मां बनती जा रही हो तुम. मेरी मां होती तो वे भी मु?ो यही सम?ातीं. सच ही कहा गया है कि बेटी बड़ी हो जाए तो भूमिकाएं बदल जाती हैं.’’

दोनों वहां से फिर ‘इंटरलेकन’ चली गईं. वहां जा कर तो दोनों का मन खिल उठा. वहां बड़ा सा पहाड़ था. 2 लेक के बीच की जगह को इंटरलेकन कहा जाता है. सुंदर सी लेक. अचानक जूही जोर से हंस पड़ी, ‘‘मां, उधर देखो, कितने सारे हिंदी के साइन बोर्ड.’’

‘‘वाह,’’ कावेरी भी वहां हिंदी के साइनबोर्ड देख कर आश्चर्य से भर उठी. वहां से दोनों 2 घंटे का सफर कर खूबसूरत ‘टौप औफ यूरोप’ देखने गईं जो पूरे साल बर्फ से ढका रहता है. वहां से वापस आ कर आसपास की जगहें देखीं. वहां का कल्चर, खानपान का आनंद उठाती रहीं. वहां उन्हें थोड़ा जरमन कल्चर भी देखने को मिला.

ट्रिप काफी रोमांचक और खूबसूरत लग रहा था. दोनों को कहीं कोई परेशानी नहीं थी. दोनों हर जगह फैले प्राकृतिक सौंदर्य को जीभर कर एंजौय कर रही थीं. पूरी ट्रिप के अंत में उन्हें 2 दिन के लिए अजय के घर भी जाना था. अजय सब बता ही रहा था कि अब कहां और कैसे जाना है.

फिर अजय की सलाह पर दोनों वहां से

इटली में ‘ओरोपा सैंचुरी’ चले गए, जो पहाड़ों में ही है. वहां बहुत ही पुराने चर्च हैं, जहां जीसस के हर रूप को बहुत ही अनोखे ढंग से दिखाया गया है. जीसस का साउथ अफ्रीकन और डार्क जीसस और मदर मैरी का अद्भुत रूप देख कर दोनों दंग रह गईं. इंग्लिश नेस थीं. बहुत सारी धर्मशालाएं थीं. बहुत ही अद्भुत, रोमांचक अनुभव था यह.

फोन का नैटवर्क नहीं था तो हर जगह शांति थी व इतनी सुंदरता कि कावेरी ने अरसे बाद मन को इतना शांत महसूस किया. आसपास सुंदर झलों की आवाज, प्रकृतिप्रदत्त सौंदर्य को आत्मसात करती कावेरी जैसे किसी और ही दुनिया में पहुंच गई थी. अगले दिन एक नन दोनों को ग्रेवयार्ड दिखाने ले गई.

जूही अब तक? इस नन से काफी बातें कर चुकी थी. अपने पिता की मृत्यु के बारे में भी बता चुकी थी. नन काफी स्नेहिल स्वभाव की थी. वहां पहुंच कर नन की शांत, गंभीर आवाज गूंज रही थी, ‘बस, यही सच है. जीवन का सार यही है. यही होना है. एक दिन सब को जाना ही है. बस, यही कोशिश करनी चाहिए कि कुछ ऐसा कर जाएं कि सब के पास हमारी अच्छी यादें ही हों. जितना जीवन है, खुशी से जी लें, पलपल का उपयोग कर लें. दुखों को भूल आगे बढ़ते रहें.’’ नन तो यह कह कर थोड़ा आगे बढ़ गई. कावेरी को पता नहीं क्या हुआ, वह अद्भुत से मिश्रित भावों में भर कर जोरजोर से रो पड़ी.

नन ने वापस आ कर कावेरी का कंधा थपथपाया और फिर आगे बढ़ गई. जूही भी मां की स्थिति देख सिसक पड़ी. पर जीभर कर रो लेने के बाद कावेरी ने अचानक खुद को बहुत मजबूत महसूस किया. खुद को संभाला, अपने और जूही के आंसू पोंछे. जूही को गले लगा कर प्यार किया और मुसकरा दी.

जूही अब हैरान हुई, ‘‘क्या हुआ, मां, आप ठीक तो हैं न?’’

‘‘हां, अब बिलकुल ठीक हूं, चलें?’’ दोनों आगे चल दीं.

जूही ने मां की ऐसी शांत मुद्रा बहुत दिनों बाद देखी थी, कहा, ‘‘मां, बहुत थक गई, आज जल्दी सोऊंगी मैं.’’

‘‘तुम सोना, मुझे कुछ काम है.’’

‘‘क्या  काम, मां?’’ जूही फिर हैरान हुई.

‘‘आज ही रात को नई कहानी में इस ट्रिप का अनुभव लिखना है न.’’

‘‘ओह, सच मां?’’ जूही ने मां के गाल चूम लिए.

एकदूसरे का हाथ पकड़ शांत मन से दोनों ने कुछ इस तरह से आगे कदम बढ़ा दिए थे कि नन भी पीछे मुड़ कर उन्हें देख मुसकरा दी थी.

बरबादी : एक थप्पड़ की चुकाई भारी कीमत

जब गीदड़ की मौत आती है, तो वह शहर की ओर भागता है और जब किसान की बरबादी आती है, तो वह अपने खेत बेचता है.

कर्णपुर के चौधरी राजपाल सिंह और महिपाल सिंह दोनों सगे भाई 40 बीघा जमीन के खुशहाल काश्तकार थे. खेतीबारी की सब सुखसुविधाएं उन के पास थीं और जमीन भी उन की ऐसी कि सोना उगले.

बड़ा भाई राजपाल जितना सीधा, सरल और मेहनती था, छोटा भाई महिपाल उतना ही मक्कार और कामचोर था.

राजपाल को तो खेती करने के अलावा किसी और बात की कोई सुध ही नहीं थी. वह निपट अनपढ़ था. उसे तो हिसाबकिताब से दूरदूर तक का कोई मतलब ही नहीं था. ऐसा लगता था कि वह मिट्टी का बना है और उसे खेती में ही मरखप जाना है.

राजपाल का दैनिक खर्चा बस इतना सा था कि उसे दिनभर के लिए बीड़ी का एक बंडल चाहिए होता था. उसे तो बस यह चिंता रहती थी कि उस के खेतों में बढ़िया फसल कैसे हो. इस को ले कर उस की दूसरे किसानों से प्रतियोगिता चलती रहती थी.

छोटा भाई महिपाल 10वीं जमात तक पढ़ गया था. वह खेती की तरफ नजर भी नहीं धरता था. पिताजी के गुजर जाने के बाद लिखतपढ़त और हिसाबकिताब के सारे काम उस के हिस्से में आ गए थे. सुबह से ही तैयार हो कर वह किसी न किसी बहाने शहर चांदपुर की ओर निकल जाता, थिएटर में सिनेमा देखता, खातापीता, मौज उड़ाता और देर शाम घर लौटता. घर लौट कर ऐसा जाहिर करता कि शहर में न जाने कितने पहाड़ तोड़ कर आया है.

सब जानते थे कि राजपाल तो महिपाल का गुलाम है. चौधरी खानदान की पूरी जायदाद का असली वारिस तो महिपाल ही है. 40 बीघा जमीन के मालिक होने की मुहर महिपाल पर ही लगी हुई थी, इसलिए उस के लिए शादी के रिश्ते खूब आ रहे थे.

जाट समाज के चौधरी किसी की जोत की जमीन को ही उस की अमीरी की निशानी मानते हैं. महिपाल की शादी भी एक बड़े चौधरी की बेटी के संग धूमधाम से हो गई. बड़े भाई राजपाल को इस शादी से रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ा. उस की शादी तो पहले ही ‘खेतीबारी’ से हो गई थी.

वैसे भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों में पांडवों के समय से यह प्रथा चली आ रही थी कि हर जाट परिवार में एक भाई कुंआरा जरूर रहता था. इस की वजह जोत की जमीन को बंटने से बचाना होती थी. ज्यादातर यह भाई छोटा होता था, जो अपने किसी एक बड़े भाई और भाभी के साथ रहने लगता था. उस के मरने के बाद उस जमीन पर उसी बड़े भाई का हक मान लिया जाता था.

लेकिन यहां मामला कुछ उलटा हो गया था. यहां बड़ा भाई कुंआरा था, जो अपने छोटे भाई की पत्नी के साथ नहीं रह सकता था. छोटे भाई की पत्नी के आ जाने पर राजपाल का हवेली के अंदर आनाजाना भी तकरीबन बंद हो गया था. वह बाहर वाली बैठक में ही रहने लगा था.

एक दिन महिपाल का अपने पड़ोसी सतेंद्र से झगड़ा हो गया. बात बढ़ने पर महिपाल ने सतेंद्र के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. अब तो दोनों परिवार लट्ठ ले कर आमनेसामने आ गए, लेकिन सतेंद्र के पिता राजेंद्र सिंह एक अनुभवी और शातिर इनसान थे. उन्होंने हाथ जोड़ कर और माफी मांग कर झगड़ा खत्म कराया.

सतेंद्र को अपने पिता की यह बात बहुत अखरी. उसे तो थप्पड़ का बदला लेना था, इसलिए वह अपने पिता पर ही लालपीला होने लगा, ‘‘बाबूजी, आप को दुशमनों से माफी मांगने की क्या जरूरत थी. मैं तो अकेला ही दोनों भाइयों के सिर फोड़ देता.’’

‘‘सतेंद्र, तू सिर तो फोड़ देता, फिर जेल कौन जाता? पुलिस के डंडे कौन खाता? मुकदमा कौन लड़ता? रोज कचहरी के चक्कर कौन लगाता? वकीलों की भारी फीस कौन भरता? ये ही रास्ते तो बरबादी की ओर ले जाते हैं. इस में किसानों के खूड़ (जमीन) तक बिक जाते हैं.’’

‘‘लेकिन पिताजी, आप ने तो उन से माफी मांग कर हमारी नाक ही कटवा दी.’’

‘‘बेटा, होश में आओ. ठंडे दिमाग से काम लो. तेरे लगे थप्पड़ का बदला मैं महिपाल की बरबादी से लूंगा. बस, तू अब देखता जा. उसे नंगाभूखा कर के न छोड़ा तो कहना.’’

राजेंद्र सिंह को पता था कि महिपाल कुछ करताधरता तो है नहीं, बस अपने बड़े भाई राजपाल की मेहनत पर ऐश करता है. अगर राजपाल की शादी करा दी जाए और दोनों भाइयों का बंटवारा हो जाए, तो महिपाल खुद घुटनों पर आ जाएगा.

इस के लिए राजेंद्र सिंह ने राजपाल से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कीं और उस के साथ उठनाबैठना शुरू किया, फिर उसे अपने विश्वास में लिया और शादी करने के लिए तैयार किया.

राजेंद्र सिंह की रिश्तेदारी में एक लड़की थी, जिस के अनपढ़ और सांवली होने के चलते शादी होने में दिक्कत आ रही थी. राजेंद्र सिंह ने दोनों तरफ से ऐसा टांका भिड़ाया कि बात बन गई.

कुछ नानुकर के बाद छोटे भाई महिपाल को भी इस शादी के लिए ‘हां’ करनी पड़ी. आखिर वह अपने ही बड़े भाई की शादी का विरोध कब तक और कैसे करता?

राजपाल की शादी होते ही सबकुछ 2 हिस्सों में बंट गया, हवेली से ले कर खेती की जमीन तक. शादी के बाद राजपाल और महिपाल में तनातनी भी रहने लगी. गांव में ऐसा कौन सा बंटवारा हुआ है, जिस में दोनों पक्ष संतुष्ट हो जाएं. राजेंद्र सिंह यही तो चाहते थे.

बंटवारे के बाद महिपाल को परेशान देख सतेंद्र ने अपने पिता से कहा, ‘‘बाबूजी, आप ने तो कमाल ही कर दिया. आप तो लोमड़ी से भी ज्यादा होशियार निकले.’’

राजेंद्र सिंह ने कुटिलता से मुसकरा कर कहा, ‘‘बेटा, अभी तू देखता जा. उस महिपाल को एक थप्पड़ की कीमत कितनी भारी चुकानी पड़ेगी.’’

महिपाल को खेतीबारी का काम तो आता नहीं था, वह तो अपने बड़े भाई राजपाल की मेहनत पर मौज उड़ाता आ रहा था. खुद खेती करना उस के बूते की बात नहीं थी. अपने हिस्से की 20 बीघा जमीन उस ने बंटाई पर दे दी. पहले वह 40 बीघा जमीन की कमाई खा रहा था, अब 20 बीघा जमीन का भी केवल बंटाई का आधा हिस्सा मिल रहा था. उस की आमदनी बंटवारे के बाद केवल एकचौथाई रह गई थी.

महिपाल को पहले से ही शहर की लत लगी हुई थी. उस ने सोचा कि जोड़े हुए पैसे से क्यों न चांदपुर शहर में दुकान खोल ली जाए. दुकान पर बस बैठना ही तो होता है, करनाधरना कुछ खास नहीं. उस ने शहर के बाहरी इलाके में एक दुकान किराए पर ले ली और उस में परचून की दुकान खोल ली. दुकान बढि़या चल निकली, तो महिपाल अपने परिवार को भी शहर में ले आया.

दुकान और मकान का किराया अच्छाखासा था. उस ने सोचा कि गांव में तो अब रहना नहीं, फिर क्यों न गांव की हवेली का अपना हिस्सा बेच दिया जाए. उस ने वह हिस्सा राजपाल को ही बेच दिया.

परिवार के शहर में आने के बाद तो महिपाल के पैर दुकान पर टिकते न थे. पुरानी आदतें उस की गई नहीं थीं. पत्नी और बच्चों के साथ महिपाल कभी फिल्म देखने, कभी शहर घूमने और कभी किसी नई जगह की ओर निकल जाता. वह हरिद्वार में एक बाबा का शिष्य भी बन गया था. बाबा के कहने पर उस ने बाबा के आश्रम के बनने में 2 लाख रुपए भी दिए थे.

कुछ दिनों के बाद महिपाल की दुकान के बराबर में एक बनिए ने भी अपनी परचून की दुकान खोल ली. बनिया कारोबार करने में माहिर था. वह दुकान पर जम कर बैठता था. उस ने महिपाल के जमेजमाए ग्राहक तोड़ने शुरू कर दिए. उस ने ग्राहकों के लिए ‘होम डिलीवरी’ भी शुरू कर दी.

महिपाल को कारोबार के ये दांवपेंच नहीं आते थे. वह अपनी चौधराहट के अहम में ‘होम डिलीवरी’ जैसे काम नहीं कर सकता था. बनिए की दुकान के सामने धीरेधीरे महिपाल की दुकान बैठने लगी.

कम आमदनी होने पर महिपाल ने परचून की दुकान ही बंद कर दी. अपनी दुकान का परचून का सामान भी उसी बनिए को बेच दिया. उस का संबंध चूंकि गांव से था, इसलिए उस ने सोचा कि उस के लिए कृषि यंत्रों और हार्डवेयर की दुकान खोलना ठीक रहेगा, लेकिन इस के लिए बड़ी रकम की जरूरत थी, तो उस ने अपनी 5 बीघा जमीन भी बेच दी.

दुकान तो ठीक थी, लेकिन बड़ी समस्या यह थी कि किसान सामान उधार मांगते थे और गन्ने की फसल आने पर उधार चुकाने की बात करते थे. मजबूर हो कर महिपाल को उधार देना पड़ा, लेकिन गन्ने की फसल आने पर भी किसान उधार चुकाने में आनाकानी करते थे. कई तो दुकान की तरफ आना ही छोड़ देते थे और फोन भी नहीं उठाते थे. उधारी ने महिपाल की दुकान का भट्ठा बैठाना शुरू कर दिया.

ऐसे समय में ही एक दिन राजेंद्र सिंह उस की दुकान पर आए. महिपाल तो पुरानी बातों को पहले ही भुला चुका था. एकदूसरे का हालचाल जानने के बाद दोनों में बातें होने लगीं.

‘‘चाचा, लगता है कि कारोबार करना अपने बस की बात नहीं है.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ महिपाल?’’

तब महिपाल ने अपनी सारी दास्तान राजेंद्र सिंह को बता दी. वे उस की परेशानी की बात सुन कर मन ही मन बड़े खुश हुए, लेकिन बाहर से ऐसा दिखावा किया जैसे बड़े दुखी हों.

तभी राजेंद्र सिंह को अपने बेटे सतेंद्र के गाल पर लगे थप्पड़ की याद आई. तब उन्होंने महिपाल की बरबादी के ताबूत में आखिरी कील ठोंकते हुए कहा, ‘‘महिपाल, तेरी गलती यह है कि तू दो नावों पर सवार है. गांव में भी अभी तेरी जमीन है और शहर में भी तू पैर जमाने की कोशिश कर रहा है.’’

‘‘फिर क्या करूं चाचा?’’

‘‘मैं तो कहता हूं महिपाल कि तू यह दुकान का चक्कर छोड़ और एक डेरी खोल ले. हम गांव वाले दुकान के बजाय यह काम आसानी से संभाल सकते हैं. हमें गायभैंस पालना भी आता है और दूध का काम तो हम आसानी से कर ही लेते हैं.’’

‘‘लेकिन चाचा, शहर में डेरी खोलने के लिए तो बहुत ज्यादा जमीन चाहिए.’’

‘‘देख महिपाल, कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना पड़ता ही है. ऐसा कर गांव की जमीन बेच कर शहर में जमीन खरीद ले और फिर डेरी खोल कर मालामाल हो जा. वहीं पर अपनी शानदार कोठी भी बना लेना. किराए के मकान में कब तक रहता रहेगा… अपना मकान होगा, अपनी डेरी होगी, नौकरचाकर होंगे, तो शहर में भी तेरा रुतबा गांव जैसा ही हो जाएगा.’’

‘‘चाचा, आप कह तो बिलकुल सही रहे हो. किराए का मकान और दुकान बड़े महंगे पड़ते हैं. अपनी जगह का कम से कम किराया तो नहीं देना पड़ता. मैं आप की सलाह पर जरूर विचार करूंगा.’’

‘‘विचार करना छोड़ बेटा, अमल कर, अमल,’’ यह कह कर राजेंद्र सिंह मुसकराते हुए और यह सोचते हुए चल दिए, ‘महिपाल, गांव से तो तू उजड़ेगा ही और शहर में भी तू बस नहीं पाएगा. अब तुझे पूरी तरह बरबाद होने से कोई नहीं रोक सकता.’

लेकिन महिपाल को तो राजेंद्र सिंह की बात जम गई. वह तो सुनहरे सपनों में खो गया. उस ने दुकान में रखे कृषि यंत्र और हार्डवेयर का सामान सस्ते दामों पर एक बनिए को बेच दिया. अब वह अपनी बची हुई 15 बीघा जमीन भी बेचने की जुगाड़ में लग गया.

राजपाल और उस के दूसरे हमदर्दों ने उसे खेती की जमीन न बेचने की सलाह दी, लेकिन महिपाल पर तो राजेंद्र सिंह की बातों का ऐसा रंग चढ़ा था कि उस पर लाख कोशिश करने पर भी कोई और रंग चढ़ नहीं सकता था. 15 बीघा जमीन में से 10 बीघा जमीन तो खुद राजेंद्र सिंह ने खरीदी और 5 बीघा जमीन राजपाल ने.

जमीन बेचने से महिपाल के हाथ में एक बड़ी रकम आई. लेकिन इस के बदले जब वह शहर में डेरी के लिए जमीन खरीदने निकला, तो वहां की जमीन की कीमत सुन कर उस के होश फाख्ता हो गए. लेकिन बढ़े कदम अब पीछे नहीं खींचे जा सकते थे. गांव की बीघे की जमीन यहां गज में बदल गई.

जमीन खरीदने और मकान बनाने में ही महिपाल की दोतिहाई रकम खर्च हो गई. कुछ रकम उस ने अपने खर्चे और मौजमस्ती में उड़ा दी. तब वह डेरी के लिए बड़ी मुश्किल से 3 भैंस और 2 गाय खरीद पाया.

लेकिन महिपाल को अंदाजा नहीं था कि डेरी खोलना टेढ़ी खीर है. उसे चारा लाने और गायभैंस की देखभाल के लिए 24 घंटे का एक महंगा नौकर भी रखना पड़ा. वह और उस की पत्नी भी दिनरात डेरी के ही काम में लगे रहते. दूध के काम से उन्हें सवेरे जल्दी उठना पड़ता और रात को भी सोने में देर हो जाती. चारे की महंगाई सिर चढ़ कर बोल रही थी. चारे के अलावा भी डेरी के अनेक खर्चे थे, जिन का महिपाल को तनिक भी एहसास नहीं था.

डेरी का काम कर के महिपाल 2-3 साल में ही हांफ गया. दूध से गायभैंस भागती तो दूसरी खरीदनी उस के लिए भारी पड़ जाती. उधर बच्चे बड़े हो गए थे. बड़ी बेटी शीला के लिए एक अच्छा लड़का मिला, तो महिपाल ने अपनी मूंछ ऊंची रखने के लिए डेरी वाली जमीन बेच कर उस की शादी में खूब दहेज दिया और बरातियों की शानदार आवभगत की.

अब महिपाल के पास केवल मकान बचा था. दोनों बेटे नकुल और विकुल ध्यान न देने की वजह से बिगड़ गए थे. नकुल ने किसी तरह बीए कर लिया था. उस की नौकरी लगवाने के चक्कर में महिपाल दलालों के चंगुल में फंस गया. वे नकुल की नौकरी लगवाने के लिए 15 लाख रुपए मांग रहे थे. मरता क्या न करता, महिपाल ने मकान बेच कर दलालों को पैसे थमा दिए.

दलालों ने दिल्ली में किराए पर एक औफिस खोल रखा था. नकुल को उन्होंने 1-2 महीने अफसर बना कर उस औफिस में बैठाया और अच्छीखासी तनख्वाह दी, फिर उसे वहां से भगा दिया.

किराए के मकान में महिपाल बिना किसी आमदनी के कितने दिन रहता. थकहार कर और मूंछें नीची कर के उस ने एक ठेकेदार के यहां मुनीम की नौकरी शुरू कर दी.

नकुल बेरोजगार हो कर आवारा किस्म के लड़कों की संगत में उठनेबैठने लगा और नशे का शिकार हो गया. छोटा बेटा विकुल किसी लड़की के चक्कर में पड़ गया था. अपनी प्रेमिका को महंगा गिफ्ट देने के लिए वह मोबाइल चोरी करने लगा और एक दिन पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया.

महिपाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि गांव की जमीन बेच कर उस की ऐसी बरबादी होगी. दोनों ही बेटे नालायक निकल जाएंगे. उसे लगने लगा कि वह दिल का मरीज बनता जा रहा है.

एक दिन महिपाल दिल के डाक्टर के पास पहुंचा, तो डाक्टर ने जांच करने के बाद बताया, ‘‘महिपालजी, आप तो दिल के मरीज हो चुके हैं. आप को जल्दी ही दिल का आपरेशन करवाना होगा.’’

महिपाल पर घर चलाने लायक पैसा था नहीं, वह दिल का आपरेशन क्या कराता. उस ने यह बात अपने परिवार से भी छिपा कर रखी. एक दिन घर में कुरसी पर बैठेबैठे ही उस की गरदन पीछे को लुढ़क गई. उस की पत्नी और बेटों के पास अब उस के अंतिम संस्कार करने के लिए भी पैसे नहीं थे.

उस के क्रियाकर्म के लिए राजपाल और कुछ गांव वाले ट्रैक्टरट्रौली में बैठ कर आए. उन्होंने मिलजुल कर उस के अंतिम संस्कार का इंतजाम किया. इस काम में राजेंद्र सिंह ने भी हाथ बंटाया.

महिपाल की अर्थी उठाने वालों में सब से आगे राजेंद्र सिंह और उन का बेटा सतेंद्र था. दोनों महिपाल की अर्थी उठाए हुए एकदूसरे की ओर देख कर मुसकरा रहे थे. महिपाल की बरबादी के काफिले को राजेंद्र सिंह ने आखिरी मुकाम पर पहुंचा दिया था. इस का एहसास किसी को भी नहीं था कि एक थप्पड़ की कीमत इतनी बड़ी और भारी हो सकती है.

पुराना कोट : संतोख ने क्यों बेची अमानत

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. चौकचौराहों पर लोग अलाव जला कर आग ताप रहे थे. रविवार का दिन था और विरेश के औफिस की छुट्टी थी. वह घर पर बैठा चाय पी रहा था कि उस की पत्नी शैली ने उस से कहा, ‘‘आज शौपिंग करने चलते हैं. आप के लिए एक कोट खरीद दूंगी. कितनी सर्दी पड़ रही है.’’

‘‘लेकिन, मेरे पास कोट तो है ही. मुझे इस की जरूरत नहीं है,’’ विरेश ने कहा.

‘‘अरे, वही पुराना ब्लैक कोट. उसे 3-4 सालों से पहन रहे हैं आप. इस बार ब्राउन रंग का कोट आप के लिए पसंद कर दूंगी. आप पर खूब जंचेगा,’’ पत्नी शैली ने मुसकरा कर कहा. विरेश ने आखिर पत्नी की बात मान ली.

शाम को शैली शौपिंग के लिए तैयार हो गई थी. शैली की खूबसूरती का क्या कहना, मेकअप ने उस का रूप और निखार दिया था. उस ने इतनी कंपकंपाती ठंड में भी हलकाफुलका सलवारकमीज ही पहना था. अलबत्ता, होंठों पर हलकी चौकलेटी लिपस्टिक लगाई थी, जिसे देख कर विरेश का दिल प्यार करने के लिए मचल उठा था.

‘‘किस पर बिजली गिराने का इरादा है?’’ विरेश ने चुटकी ली.

‘‘इस सर्दी में मेरे हुस्न की थोड़ी गरमी जरूरी है, नहीं तो आप को ठंड लग सकती है,’’ शैली ने मनमोहक अंदाज में हंस कर कहा.

विरेश ने उसे भरपूर नजर से निहारते हुए कहा, ‘‘लड़कियों और औरतों को क्या ठंड नहीं लगती है? चाहे कितनी भी सर्दी क्यों न पड़ रही हो, वे कम कपड़ों में ही घर से बाहर शौपिंग करने चली जाती हैं. उन पर ठंड का कोई असर नहीं होता है क्या?’’

‘‘अगर हम ठंड की परवाह करेंगी, तो अपना फैशन और हुस्न की नुमाइश कैसे करेंगी…’’ शैली ने विरेश को प्यार से समझाया.

विरेश और शैली प्यारभरी बातें करते हुए एक बड़े शोरूम में आ गए थे. शैली ने विरेश के लिए एक ब्राउन कलर का कोट पसंद कर दिया था, जिसे पहन कर विरेश वाकई स्मार्ट दिख रहा था.

बाजार में शैली ने अपनी पसंद की पापड़ी चाट खाई. वे दोनों 1-2 घंटे के बाद घर लौट आए थे.

रात के 11 बज रहे थे. दिन से ज्यादा रात में ठंड पड़ रही थी. अपने कमरे में विरेश और शैली रजाई के अंदर दुबक गए थे. अब दोनों एकदूसरे से लिपट कर सर्दी से थोड़ी राहत महसूस कर रहे थे. 2 जवां जिस्म प्यार करने के लिए तड़प उठे थे. जिस्म की आग धीमेधीमे सुलगने लगी थी. विरेश शैली के उभारों को सहलाने लगा.

शैली ने विरेश के होंठों को चूम कर कहा, ‘‘आप शाम से ही रोमांटिक मूड में आ गए थे.’’

‘‘हां, क्यों नहीं. तुम खूबसूरत और सैक्सी जो लग रही थीं. इस ठंडी रात में प्यार करने के लिए मेरा दिल मचल उठा है,’’ विरेश शैली के ऊपर आते हुए बोला.

शैली ने विरेश को जोर से जकड़ लिया. रात में दोनों ने जीभर कर मजे लिए. जब जिस्म की प्यास बुझ गई, तब वे दोनों गहरी नींद में सो गए.

सुबह की कुनकुनी धूप खिली हुई थी. धूप में कुरसी पर बैठा विरेश अखबार पढ़ रहा था. अखबार में खबर छपी थी, ‘ठंड ने कहर बरपाया. 2 लोगों की मौत. शीतलहर का प्रकोप जारी.’

खबर पढ़ कर विरेश सहम गया. तभी रसोईघर से शैली ने किसी काम से विरेश को अपने पास बुलाया, ‘‘मेरा एक काम कर दो.’’

‘‘क्यों नहीं. पर पहले वह नेक काम तो बताओ?’’ विरेश ने कहा.

‘‘वह पुराना ब्लैक कोट किसी गरीब को दे दीजिए. किसी जरूरतमंद का ठिठुरती ठंड से बचाव हो जाएगा. अपनी अलमारी में नए कोट की जगह भी बन जाएगी.’’

विरेश ने कुछ सोचते हुए शैली से कहा, ‘‘संतोख को वह कोट दे देते हैं. वही मजदूर जो ईंटबालू ढोने से ले कर साफसफाई का हमारा काम कर देता है.’’

‘‘ठीक मजदूर है, उसी को वह पुराना कोट दे दीजिएगा,’’ शैली ने अपनी रजामंदी जताई.

दूसरे दिन विरेश वह पुराना कोट ले कर संतोख की झोंपड़ी की तरफ चला गया.

कालोनी में छोटेबड़े मकानों के बीच जो थोड़ी सी जगह बची थी, वहां कुछ मजदूर, मिस्त्री, रिकशे वाले अपनी झोंपड़ी बना कर रहते थे. संतोख भी यहीं रह कर शहर में मजदूरी करता था.

विरेश को संतोख अपनी झोंपड़ी के पास मिल गया था.

‘‘कहिए साहब, कुछ काम है क्या?’’ संतोख हैरानी से विरेश को देखते हुए बोला.

‘‘कोई काम तो अभी नहीं है. बस, यह कोट तुम्हें देने चला आया,’’ विरेश ने कहा.

‘‘अरे साहब, मेरे लिए इतना अच्छा कोट. पूरे जाड़े इसी कोट को पहनूंगा,’’ कहते हुए संतोख ने वह कोट ले लिया.

‘‘संतोख, इस कोट को संभाल कर रखना,’’ कह कर विरेश चला गया.

विरेश घर पर आ गया था. शैली ने पूछा, ‘‘क्या संतोख मिल गया था?’’

‘‘हां, मिल गया था. उसे कोट दे कर आ रहा हूं,’’ विरेश ने कहा.

‘‘हम लोग के हाथों एक बढि़या काम तो हो गया. संतोख जैसे जरूरतमंद को वह कोट जाड़े में बहुत काम आ जाएगा,’’ कह कर शैली घरेलू काम में लग गई.

संतोख सुबह में मजदूरी करने जा रहा था. वह विरेश का दिया हुआ कोट पहने हुए था. उसे रास्ते में मुकेश मिल गया. मुकेश बिजली मिस्त्री था. उस की नजर संतोख के कोट पर पड़ी. उसे संतोख का कोट पसंद आ गया.

मुकेश मन ही मन सोचने लगा कि इस कोट को संतोख से किसी तरह ले लूं, तो इस कंपकंपाती ठंड में बड़ी राहत हो जाएगी.

यह सोच कर मुकेश ने संतोख से कहा, ‘‘संतोख, यह कोट बेचोगे. मैं इसे खरीदना चाहता हूं.’’

संतोख पलभर के लिए सोच में पड़ गया. लेकिन रुपए मिलने के लालच ने उस का ईमान डिगा दिया,’’ मुकेश, तुम इस कोट के कितने रुपए दोगे?’’

‘‘700 रुपए दे दूंगा,’’ मुकेश ने ललचाई नजरों से कोट की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘700 रुपए तो नहीं, 800 रुपए में यह कोट दे दूंगा. अगर मंजूर है, तो बोलो?’’ संतोख ने कहा.

‘‘700 रुपए ही दूंगा, लेकिन 100 रुपए की शाम को शराब की पार्टी कर दूंगा,’’ मुकेश ने कहा.

‘‘ठीक है, यह लो कोट. चलो, अब फटाफट रुपए निकालो.’’

मुकेश ने 700 रुपए जेब से निकाल कर संतोख को दे दिए. संतोख ने कोट उतार कर उसे दे दिया. मुकेश खुशी से कोट ले कर चला गया.

कोट खरीद कर मुकेश ने जाड़े से बचाव का एक रास्ता पा लिया था, वहीं संतोख ने चंद रुपए की खातिर जाड़े में ठंड लगने का खतरा मोल ले लिया था.

शाम हो गई थी. मुकेश संतोख के साथ शराब के ठेके पर पहुंच गया.

उस ने अपने पैसे से शराब की बोतल खरीदी और संतोख के साथ शराब पीने बैठ गया.

एक गिलास के बाद दूसरा गिलास. इस तरह दोनों ने पूरी शराब की बोतल खाली कर डाली. जब संतोख पर नशा हावी हो गया, तब वह बैठने लगा, ‘‘शराब में बहुत गरमी होती है. जाड़े में शराब पीने से देह गरम हो जाती है. इस के पीने से सर्दी बिलकुल नहीं लगती है.’’

मुकेश ने कहा, ‘‘संतोख, तुम ठीक कहते हो. शराब पीने से मजा तो आता ही है, ठंड भी भाग जाती है. शराब पी लो तो ठंड में भी भलेचंगे रहोगे. देह में गरमी और फुरती बनी रहेगी.’’

दोनों नशे में लड़खड़ाते हुए अपने घर चले गए. 2 दिन बाद जब संतोख मजदूरी कर के घर लौटा, तब उस के बदन व सिर में तेज दर्द हो रहा था. उस की बीवी लाजो ने उस का बदन छू कर देखा, ‘‘अरे, आप का बदन तो बहुत गरम लग रहा है. आप को बुखार हो गया है.’’

‘‘मुझे बहुत ठंड लग रही है. जल्दी से मुझे कंबल ओढ़ा दो,’’ संतोख ने मरियल आवाज में कहा. लाजो ने उसे कंबल ओढ़ा दिया.

संतोख ने बुखार में तपते हुए किसी तरह रात बिताई. दूसरे दिन वह डाक्टर के पास गया.

डाक्टर ने संतोख का चैकअप किया, ‘‘तुम को ठंड लग गई है. कुछ दवाएं लिख देता हूं.’’

डाक्टर ने दवाएं परचे पर लिख दीं. डाक्टर ने संतोख से पूछा, ‘‘क्या तुम ने 1-2 दिन पहले शराब पी थी?’’

‘‘हां, डाक्टर साहब,’’ संतोख ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘देखो, उसी शराब ने तुम को बीमार कर दिया. अब कभी शराब मत पीना,’’ कह कर डाक्टर ने इशारे से उसे जाने को कहा. संतोख डाक्टर के चैंबर से बाहर आ गया.

संतोख के जाते ही डाक्टर ने अपने पास बैठे जूनियर डाक्टर को बुलाया, ‘‘शराब गरम होती है. जब कोई शराब पीता है, तो एकाएक उस के बदन में गरमी आ जाती है. लेकिन बाहर तो सर्दी पड़ रही है. सर्दी के असर से ठंड लगने का डर बढ़ जाता है. संतोख के साथ भी यही हुआ?है.’’

‘‘लेकिन, ये लोग मानते कहां हैं. शराब पीना नहीं छोड़ते हैं,’’ जूनियर डाक्टर ने कहा.

4-5 दिन बीत जाने के बाद भी संतोख का मर्ज ठीक होने के बजाय बढ़ता ही गया. महंगी दवाएं खरीदने से घर का खर्च चलाना मुश्किल होने लगा. चारपाई पर पड़े हुए बीमार संतोख ने लाजो से कहा, ‘‘कुछ रुपए विरेश

बाबू से मांग कर ले आओ. उन को बोलना कि ठीक हो जाने पर रुपए वापस कर दूंगा.’’ लाजो बिना देर किए विरेश से रुपए मांगने चली गई.

‘‘विरेश बाबू, संतोख बीमार है. घर का खर्च चलाने के लिए पैसे नहीं है. 500 रुपए मिल जाते तो… बाद में पैसे वापस कर दूंगी,’’ लाजो ने कहा.

‘‘संतोख को हुआ क्या है?’’ विरेश ने कहा.

‘‘उसे ठंड लग गई है,’’ लाजो ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘मैं अभी आता हूं. तुम घर जाओ. रुपए संतोख के हाथ में ही दूंगा और उस से तबीयत का हाल भी पूछ लूंगा,’’ विरेश ने कहा.

विरेश थोड़ी ही देर में संतोख को देखने उस की झोंपड़ी में चला गया, ‘‘कैसी तबीयत है अब? कुछ सुधार लग रहा है?’’ विरेश ने संतोख से पूछा.

‘‘कुछ सुधार नहीं है, साहब. तबीयत बिगड़ती ही जा रही?है,’’ संतोख ने कहा.

‘‘जो कोट दिया था, उसे पहना कि नहीं?’’ विरेश ने पूछा.

संतोख ने कोई जवाब नहीं दिया. वह खामोश ही रहा. तभी उस की बीवी लाजो ने कहा, ‘‘क्या कहूं साहब, संतोख उस कोट को बेच कर दारू पी गया.’’

यह सुन कर विरेश को बहुत बुरा लगा. उस के दिल पर चोट लगी थी.

‘‘ऐसा क्यों किया संतोख. मैं ने कोट इस कड़कड़ाती ठंड में तुम्हें पहनने के लिए दिया था,’’ विरेश ने उदास हो कर कहा.

संतोख कुछ नहीं बोला. उस की आंखों में आंसू छलक आए. विरेश ने उस के हाथ में 5 सौ रुपए रखे और झोंपड़ी से बाहर निकल गया.

घर आ कर विरेश ने शैली को बताया, ‘‘संतोख ने तो वह कोट पहना तक नहीं. उसे ठंड लग गई है. उस कोट को बेच कर वह शराब पी गया.’’

यह सुनते ही शैली संतोख को भलाबुरा कहने लगी, ‘‘ये छोटे लोग होते ही ऐसे हैं. इन को किसी की भलाई नहीं चाहिए. चंद रुपए के लिए हमारा दिया हुआ कोट बेच दिया. वह भी ठेके पर जा कर शराब पीने के लिए. अब बीमार पड़ा है. मरने दीजिए उसे.’’

विरेश खामोश हो कर शैली की बात सुनता रहा. वह कुछ न बोला. शैली अपना गुस्सा संतोख पर उतार चुकी थी.

4-5 दिन बीते थे. विरेश और शैली मार्केट से घर लौट रहे थे. संतोख की झोंपड़ी के पास लोगों की भीड़ लगी हुई थी. झोंपड़ी से संतोख की बीवी लाजो के रोने की आवाजें आ रही थीं. विरेश और शैली किसी अनहोनी के डर से ठिठक कर रुक गए.

विरेश ने वहां खड़े एक शख्स से पूछा, ‘‘क्या बात है? संतोख ठीक तो है न?’’

‘‘संतोख तो मर गया. उस की बीवी लाजो बहुत रो रही है साहब,’’ उस आदमी ने बताया. विरेश और शैली यह सुन कर सन्न रह गए.

सुहानी गुड़िया: सलोनी से अरविंद को क्यों मांगनी पड़ी माफी

आज मेरा जी चाह रहा है कि उस का माथा चूम कर मैं उसे गले से लगा लूं और उस पर सारा प्यार लुटा दूं, जो मैं ने अपने आंचल में समेट कर जमा कर रखा था. चकनाचूर कर दूं उस शीशे की दीवार को जो मेरे और उस के बीच थी. आज मैं उसे जी भर कर प्यार करना चाहती हूं.

मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी. भूख से मेरी आंतें कुलबुला रही थीं. मैं लेटेलेटे भुनभुना रही थी, ‘‘यह मरी रेनू भी ना जाने कब आएगी. सुबह के 10 बजने को हैं, पर महारानी का अतापता ही नहीं. यह लौकडाउन ना होता तो ना जाने कब का इसे भगा देती और दूसरी रख लेती. जब इसे काम की जरूरत थी तो कैसे गिड़गिड़ा मेरे पास आई थी और अब नखरे देखो मैडम के.’’

अरविंद सुबहसुबह मुझे चाय के साथ ब्रेड या बिसकुट दे कर दवा खिलाते और खुद दूध कौर्नफ्लैक्स खा कर अस्पताल चले जाते हैं. डाक्टरों की छुट्टियां कैंसिल हैं, इसलिए ज्यादा मरीज ना होने पर भी उन्हें अस्पताल जाना ही पड़ता है.

मैं डेढ़ महीने से टाइफाइड के कारण बिस्तर पर पड़ी हूं. घर का सारा काम रेनू ही देखती है. मैं इतनी कमजोर हो गई हूं कि उठ कर अपने काम करने की भी हिम्मत नहीं होती. पड़ेपड़े न जाने कैसेकैसे खयाल मन में आ रहे थे, तभी सुहानी की मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘मां आप जाग रही हैं क्या? मैं आप के लिए चाय बना लाऊं.’’

मैं ने कहा, ‘‘नहीं, चाय और दवा तो तेरे बड़े पापा दे गए हैं, पर बहुत जोर की भूख लगी है. रेनू भी ना जाने कब आएगी. कितना भी डांट लो, इस पर कोई असर नहीं होता.’’

सुहानी बोली, ‘‘मां, आप उस पर चिल्लाना मत, आप की तबीयत और ज्यादा खराब हो जाएगी.’’

उस ने टीवी औन कर के लाइट म्यूजिक चला दिया. मैं गाने सुन कर अपना ध्यान बंटाने की कोशिश करने लगी.

थोड़ी ही देर में सुहानी एक प्लेट में पोहा और चाय ले कर मेरे पास खड़ी थी. मैं हैरानी से उसे देख कर बोली, ‘‘अरे, यह क्या किया तुम ने, अभी रेनू आ कर बनाती ना.’’

सुहानी ने बड़े धीमे से कहा, ‘‘मां, आप को भूख लगी थी, इसीलिए सोचा कि मैं ही कुछ बना देती हूं.’’

मेरा पेट सच में ही भूख के कारण पीठ से चिपका जा रहा था, इसलिए मैं प्लेट उस के हाथ से ले कर चुपचाप पोहा खाने लगी. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘मां, पोहा ठीक से बना है ना?’’

नमक थोड़ा कम था, पर मैं मुसकरा कर बोली, ‘‘हां, बहुत अच्छा बना है, तुम ने यह कब बनाना सीखा.’’

यह सुन कर उस की आंखों में जो संतोष और खुशी की चमक मुझे दिखी, वह मेरे मन को छू गई.

जब से मैं बीमार पड़ी हूं, मेरे पति और बच्चों से भी ज्यादा मेरा ध्यान सुहानी रखती है. मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह समझ जाती है कि मुझे क्या चाहिए.

मुझे याद आने लगा वह दिन, जब मेरे देवरदेवरानी अपनी नन्ही सी बिटिया के साथ शौपिंग कर के लौट रहे थे. सामने से आती एक तेज रफ्तार कार ने उन की कार में टक्कर मार दी. वे दोनों बुरी तरह घायल हो गए.

देवर ने तो अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही दम तोड़ दिया था और देवरानी एक हफ्ते तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझने के बाद भगवान को प्यारी हो गई.

अस्पताल में जब अर्धचैतन्य अवस्था में देवरानी ने नन्ही सलोनी का हाथ अरविंद के हाथों में थमाते हुए कातर निगाहों से देखा तो वह फफकफफक कर रो पड़े. उन की मृत्यु के बाद लखनऊ में उन के घर, औफिस, फंड, ग्रेच्युटी वगैरह के तमाम झमेलों का निबटारा करने के लिए लगभग 2 महीने तक अरविंद को लखनऊ में काफी भागदौड़ करनी पड़ी. सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सलोनी की कस्टडी का प्रश्न उठा.

देवरानी का मायका रायबरेली में 3 भाइयों और मातापिता का सम्मिलित परिवार और व्यवसाय था. वे चाहते थे कि सलोनी की कस्टडी उन्हें दे दी जाए. उन के बड़े भैया बोले, ‘‘सलोनी हमारी बहन की एकमात्र निशानी है, हम उसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं.’’

इस पर अरविंद ने कहा कि सलोनी मेरे भाई की भी एकमात्र निशानी है. वहीं अरविंद के पिताजी बोले, ‘‘सलोनी कहीं नहीं जाएगी. मेरे बेटे अनिल की बिटिया हमारे घर में ही रहेगी.”

इस पर देवरानी का छोटा भाई बिगड़ कर बोला, ‘‘मैं अपनी भांजी का हक किसी को नहीं मारने दूंगा. आप लोग मेरे बहनबहनोई की सारी संपत्ति पर कब्जा करना चाहते हैं, इसीलिए सलोनी को अपने पास रखना चाहते हैं.’’

इस विषय पर अरविंद और मांबाबूजी की उन से बहुत बहस हुई. अरविंद और बाबूजी जानते थे कि उन लोगों की नजर मेरे देवर के लखनऊ वाले मकान और रुपयोंपैसों पर थी. सलोनी के नानानानी बहुत बुजुर्ग थे, वे उस की देखभाल करने में सक्षम नहीं थे. अंत में अरविंद ने सब को बैठा कर निर्णय लिया कि अम्मांबाबूजी बहुत बुजुर्ग हैं और गांव में सलोनी की पढ़ाईलिखाई का उचित इंतजाम नहीं हो सकता, इसलिए सलोनी मेरे साथ रहेगी. अनिल का लखनऊ वाला मकान सलोनी के नाम पर कर दिया जाएगा और उसे किराए पर उठा दिया जाएगा. उस का जो भी किराया आएगा, उसे सलोनी के अकाउंट में जमा कर दिया जाएगा.

अनिल के औफिस से मिला फंड वगैरह का रुपया भी सलोनी के नाम से फिक्स कर दिया जाएगा, जो उस की पढ़ाईलिखाई और शादीब्याह में खर्च होगा.

अरविंद के इस फैसले से मैं सहम गई. उस समय तो कुछ न कह पाई, पर अपने 2 छोटे बच्चों के साथ एक और बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए मैं बिलकुल तैयार नहीं थी. अभी तक जिस सहानुभूति के साथ मैं उस की देखभाल कर रही थी, वह विलुप्त होने लगी.

मैं ने डरतेडरते अरविंद से कहा, ‘‘सुनिए, मुझे लगता है कि आप को सलोनी को उस के नानानानी को दे देना चाहिए. नानानानी और मामा के बच्चों के साथ वह ज्यादा खुश रहेगी.’’

अरविंद शायद मेरी मंशा भांप गए और मेरे कंधे पर सिर रख कर रो पड़े. कातर नजरों से मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘रंजू, अनिल मेरा एकलौता भाई था. वह मुझे इस तरह छोड़ जाएगा, यह सपने में भी नहीं सोचा था. सलोनी मेरे पास रहेगी तो मुझे लगेगा मानो मेरा भाई मेरे पास है.’’

मैं ने उन्हें जीवन में पहली बार इतना मायूस और लाचार देखा था. वह बच्चों की तरह बिलखते हुए बोले, ‘‘रंजू, मेरे मातापिता और सलोनी को अब तुम्हें ही संभालना है.’’

उन को इतना व्यथित देख मैं ने चुपचाप नियति को स्वीकार कर लिया. बाबूजी इस गम को सह न पाए. हार्ट पेशेंट तो थे ही, महीनेभर बाद दिल का दौरा पड़ने से परलोक सिधार गए.

बाबूजी के जाने के बाद तो अम्मां मानो अपनी सुधबुध ही खो बैठीं, न खाने का होश रहता, न नहानेधोने का. हर समय पूजापाठ में व्यस्त रहने वाली अम्मां अब आरती का दीया भी ना जलाती थीं. वे कहतीं, ‘‘बहू, अब कौनो भगवान पर भरोसा नाही रही गओ है, का फायदा ई पूजापाठ का जब इहै दिन दिखबे का रहै.’’

उन्हें कुछ भी समझाने का कोई फायदा नहीं था. वे अंदर ही अंदर घुलती जा रही थीं. एक बरस बाद वे भी इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं.

अरविंद अपने काम में बहुत व्यस्त रहने लगे. सामान्य होने में उन्हें दोतीन वर्ष का समय लग गया.

नन्ही सलोनी मुझे मेरे घर में सदैव अवांछित सदस्य की तरह लगती थी. उस के सामने न जाने क्यों मैं अपने बच्चों को खुल कर न तो दुलरा ही पाती और न ही खुल कर गले लगा पाती थी. मैं अपने बच्चों के साथसाथ उसे भी तैयार कर के स्कूल भेजती और उस की सारी जरूरतों का ध्यान रखती, पर कभी गले से लगा कर दुलार ना कर पाती.

समय कब हथेलियों से सरक कर चुपकेचुपके पंख लगा कर उड़ जाता है, इस का हमें एहसास ही नहीं होता. कब तीनों बच्चे बड़े हो गए और कब मैं सलोनी की बड़ी मां से सिर्फ मां हो गई, मुझे पता ही ना चला. मैं उसे कुछ भी नहीं कहती थी, पर सुमित और स्मिता को जो भी इंस्ट्रक्शंस देती, वह उन्हें चुपचाप फौलो करती. उन दोनों को तो मुझे होमवर्क करने, दूध पीने और खाने के लिए टोकना पड़ता था, पर सलोनी अपना सारा काम समय से करती थी.

मुझे पेंटिंग्स बनाने का बड़ा शौक था. घर की जिम्मेदारियों की वजह से मैं अपने इस शौक को आगे तो नहीं बढ़ा पाई, पर बच्चों के प्रोजैक्ट में और जबतब साड़ियों, कुरतों और कपड़ों के बैग वगैरह पर अपना हुनर आजमाया करती थी.

जब भी मैं कुछ इस तरह का काम करती, तो सुहानी भी अपनी ड्राइंग बुक और कलर्स के साथ मेरे पास आ कर बैठ जाती और अपनी कल्पनाओं को रंग देने का प्रयास करती. यदि कहीं कुछ समझ में ना आता, तो बड़ी मासूमियत से पूछती, ‘‘बड़ी मां, इस में यह वाला रंग करूं अथवा ये वाला ज्यादा अच्छा लगेगा.’’ उस की कला में दिनोंदिन निखार आता गया. विद्यालय की ओर से उसे सभी प्रतियोगिताओं के लिए भेजा जाने लगा और हर प्रतियोगिता में उसे कोई ना कोई पुरस्कार अवश्य मिलता. पढ़ाई में भी अव्वल सलोनी अपने सभी शिक्षकशिक्षिकाओं की लाड़ली थी.

जब कभी सुमित, स्मिता और सुहानी तीनों आपस में झगड़ा करते, तो सुहानी समझदारी दिखाते हुए उन से समझौता कर लेती. मैं बच्चों के खेल और लड़ाई के बीच में कोई दखलअंदाजी नहीं करती थी.

डेढ़ महीने पहले जब डाक्टर ने मेरी रिपोर्ट देख कर बताया कि मुझे टाइफाइड है तो सभी चिंतित हो गए. सुमित, स्मिता और अरविंद हर समय मेरे पास ही रहते और मेरा बहुत ध्यान रखते थे, पर धीरेधीरे सब अपनी दिनचर्या में बिजी हो गए.

अभी परसों की ही बात है, मैं स्मिता को आवाज लगा रही थी, ‘‘स्मिता, मेरी बोतल में पानी खत्म हो गया है, थोड़ा पानी कुनकुना कर के बोतल में भर कर रख दो.”

इस पर वह खीझ कर बोली, ‘‘ओफ्फो मम्मा, आप थोड़ा वेट नहीं कर सकतीं. कितनी अच्छी मूवी आ रही है, आप तो बस रट लगा कर रह जाती हैं.’’

इस पर सुहानी ने उठ कर चुपचाप मेरे लिए पानी गरम कर दिया. मेरी खिसियाई सी शक्ल देख कर वह बोली, ‘‘मां क्या आप का सिरदर्द हो रहा है, लाइए मैं दबा देती हूं.”

मैं ने मना कर दिया. सुमित बीचबीच में आ कर मुझ से पूछ जाता है, ‘‘मां, आप ने दवा ली, कुछ खाया कि नहीं वगैरह.”

स्मिता भी अपने तरीके से मेरा ध्यान रखती है और अरविंद भी, किंतु सलोनी उस के तो जैसे ध्यान में ही मैं रहती हूं.

आज मुझे आत्मग्लानि महसूस हो रही है. 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली सलोनी कितनी समझदार है. मैं सदैव अपने घर में उसे अवांछित सदस्य ही मानती थी, कभी मन से उसे बेटी न मान पाई. लेकिन वह मासूम मेरी थोड़ी सी देखभाल के बदले में मुझे अपना सबकुछ मान बैठी. कितने गहरे मन के तार उस ने मुझ से जोड़ लिए थे.

मुझे याद आ रहा है उस का वह अबोध चेहरा, जब सुमित और स्मिता स्कूल से आ कर मेरे गले से झूल जाते और वह दूर खड़ी मुझे टुकुरटुकुर निहारती तो मैं बस उस के सिर पर हाथ फेर कर सब को बैग रख कर हाथमुंह धोने की हिदायत दे देती थी.

उस ने मेरी थोड़ी सी सहानुभूति को ही शायद मेरा प्यार मान लिया था. अपनी मां की तो उसे ज्यादा याद नहीं, पर मुझे ही मानो मां मान कर चुपचाप अपना सारा प्यार उड़ेल देना चाह रही है.

आज मेरा जी चाह रहा है कि मैं उसे अपने गले से लगा कर फूटफूट कर रोऊं और अपने मन का सारा मैल और परायापन अपने आंसुओं से धो डालूं. मैं उसे अपने सीने से लगा कर ढेर सारा प्यार करना चाह रही हूं. मैं उस से कहना चाहती हूं, ‘‘मैं तेरी बड़ी मां नहीं सिर्फ मां हूं. मेरी एक नहीं दोदो बेटियां हैं. अपने और सलोनी के बीच जो कांच की दीवार मैं ने खड़ी कर रखी थी, वह आज भरभरा कर टूट गई है. सलोनी मेरी गुड़िया मुझे माफ कर दो.‘‘

बेशरम: गिरधारीलाल शर्मा के बेटों के साथ क्या हु्आ?

पारिवारिक विघटन के इस दौर में जब भी किसी पारिवारिक समस्या का निदान करना होता तो लोग गिरधारीलाल को बुला लाते. न जाने वह किस प्रकार समझाते थे कि लोग उन की बात सुन कर भीतर से इतने प्रभावित हो जाते कि बिगड़ती हुई बात बन जाती.

गिरधारीलाल का सदा से यही कहना रहा था कि जोड़ने में वर्षों लगते हैं और तोड़ने में एक क्षण भी नहीं लगता. संबंध बड़े नाजुक होते हैं. यदि एक बार संबंधों की डोर टूट जाए तो उन्हें जोड़ने में गांठ तो पड़ ही जाती है, उम्र भर की गांठ…..

गिरधारीलाल ने सनातनधर्मी परिवार में जन्म लिया था पर जब उन की विदुषी मां  ने पंडितों के ढकोसले देखे, छुआछूत और धर्म के नाम पर बहुओं पर अत्याचार देखा तो न जाने कैसे वह अपनी एक सहेली के साथ आर्यसमाज पहुंच गईं. वहां पर विद्वानों के व्याख्यान से उन के विकसित मस्तिष्क का और भी विकास हुआ. अब उन्हें जातपांत और ढकोसले से ग्लानि सी महसूस होने लगी और उन्होंने अपनी बहुओं को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने की कला सिखाई. इसी कारण उन का परिवार एक वैदिक परिवार के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था.

आर्ची को अच्छी तरह से याद है कि जब बूआजी को बेटा हुआ था और  उसे ले कर अपने पिता के घर आई थीं तब पता लगातेलगाते हिजड़े भी घर पर आ गए थे. आंगन में आ कर उन्होंने दादाजी के नाम की गुहार लगानी शुरू की और गानेनाचने लगे थे. दादीमां ने उन्हें उन की मांग से भी अधिक दे कर घर से आदर सहित विदा किया था. उन का कहना था कि इन्हें क्यों दुत्कारा जाता है? ये भी तो हाड़मांस के ही बने हुए हैं. इन्हें भी कुदरत ने ही बनाया है, फिर इन का अपमान क्यों?

दादी की यह बात आर्ची के मस्तिष्क में इस प्रकार घर कर गई थी कि जब भी कहीं हिजड़ों को देखती, उस के मन में उन के प्रति सहानुभूति उमड़ आती. वह कभी उन्हें धिक्कार की दृष्टि से नहीं देख पाई. ससुराल में शुरू में तो उसे कुछेक तीखी नजरों का सामना करना पड़ा पर धीरेधीरे सबकुछ सरल, सहज होता गया.

मेरठ में पल कर बड़ी होने वाली आर्ची मुंबई पहुंच गई थी. एकदम भिन्न, खुला वातावरण, तेज रफ्तार की जिंदगी. शादी हो कर दिल्ली गई तब भी उसे माहौल इतना अलग नहीं लगा था जितना मुंबई आने पर. साल में घर के 2 चक्कर लग जाते थे. विवाह के 5 वर्ष बीत जाने पर भी मायके जाने का नाम सुन कर उस के पंख लग जाते.

बहुत खुश थी आर्ची. फटाफट पैकिंग किए जा रही थी. मायके जाना उस के पैरों में बिजलियां भर देता था. आखिर इतनी दूर जो आ गई थी. अपने शहर में होती थी तो सारे त्योहारों में कैसी चटकमटक करती घूमती रहती थी. दादा कहते, ‘अरी आर्ची, जिस दिन तू इस घर से जाएगी घर सूना हो जाएगा.’ ‘क्यों, मैं कहां और क्यों जाऊंगी, दादू? मैं तो यहीं रहूंगी, अपने घर में, आप के पास.’

दादी लाड़ से उसे अपने अंक में भर लेतीं, ‘अरी बिटिया, लड़की का

तो जन्म ही होता है पराए घर जाने के लिए. देख, मैं भी अपने घर से आई हूं, तेरी मम्मी भी अपने घर से आई हैं, तेरी बूआ यहां से गई हैं, अब तेरी बारी आएगी.’

13 वर्षीय आर्ची की समझ में

यह नहीं आ पाता कि जब दादी और मां अपने घर से आई हैं तब यह उन का घर कैसे हो गया. और बूआ अपने घर से गई हैं तो उन का वह घर कैसे हो गया. और अब वह अपने घर से जाएगी…

क्या उधेड़बुन है… आर्ची अपना घर, उन का घर सोचतीसोचती फिर से रस्सी कूदने लगती या फिर किसी सहेली की आवाज से बाहर भाग जाती या कोई भाई आवाज लगा देता, ‘आर्ची, देख तो तेरे लिए क्या लाया हूं.’

इस तरह आर्ची फिर व्यस्त हो जाती. एक भरेपूरे परिवार में रहते हुए आर्ची को कितना लाड़प्यार मिला था वह कभी उसे तोल ही नहीं सकती. उस का मन उस प्यार से भीतर तक भीगा हुआ था. वैसे भी प्यार कहीं तोला जा सकता है क्या? अपने 3 सगे भाई, चाचा के 4 बेटे और सब से छोटी आर्ची.

‘‘क्या बात है भई, बड़ी फास्ट पैकिंग हो रही है,’’ किशोर ने कहा.

‘‘कितना काम पड़ा है. आप भी तो जरा हाथ लगाइए,’’ आर्ची ने पति से कहा.

‘‘भई, मायके आप जा रही हैं और मेहनत हम से करवाएंगी,’’ किशोर आर्ची की खिंचाई करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते थे.

‘‘हद करते हैं आप भी. आप भी तो जा रहे हैं अपने मायके…’’

‘‘भई, हम तो काम से जा रहे हैं, फिर 2 दिन में लौट भी आएंगे. लंबी छुट्टियां तो आप को मिलती हैं, हमें कहां?’’

किशोर को कंपनी की किसी मीटिंग के सिलसिले में दिल्ली जाना था सो तय कर लिया गया था कि दिल्ली तक आर्ची भी फ्लाइट से चली जाएगी. दिल्ली में किशोर उसे और बच्चों को टे्रन में बैठा देंगे. मेरठ में कोईर् आ कर उसे उतार लेगा. एक सप्ताह अपने मायके मेरठ रह कर आर्ची 2-3 दिन के लिए ससुराल में दिल्ली आ जाएगी जबकि किशोर को 2 दिन बाद ही वापस आना था. बच्चे छोटे थे अत: इतनी लंबी यात्रा बच्चों के साथ अकेले करना जरा कठिन ही था.

किशोर को दिल्ली एअरपोर्ट पर कंपनी की गाड़ी लेने के लिए आ गई, सो उस ने आर्ची और बच्चों को स्टेशन ले जा कर मेरठ जाने वाली गाड़ी में बिठा दिया और फोन कर दिया कि आर्ची इतने बजे मेरठ पहुंचेगी. फोन पर डांट भी खानी पड़ी उसे. अरे, भाई, पहले से फोन कर देते तो दिल्ली ही न आ जाता कोई लेने. आजकल के बच्चे भी…दामाद को इस से अधिक कहा भी क्या जा सकताथा.

किशोर ने आर्ची को प्रथम दरजे में बैठाया था और इस बात से संतुष्ट हो गए थे कि उस डब्बे में एक संभ्रांत वृद्धा भी बैठी थी. आर्ची को कुछ हिदायतें दे कर किशोर गाड़ी छूटने पर अपने गंतव्य की ओर निकल गए.

अब आर्ची की अपनी यात्रा प्रारंभहुई थी, जुगनू 2 वर्ष के करीब था और बिटिया एनी अभी केवल 7 माह की थी. डब्बे में बैठी संभ्रांत महिला उसे घूरे जा रही थी.

‘‘कहां जा रही हो बिटिया?’’ वृद्धा ने पूछा.

‘‘जी, मेरठ?’’

‘‘ये तुम्हारे बच्चे हैं?’’

‘‘जी हां,’’ आर्ची को कुछ अजीब सा लगा.

‘‘आप कहां जा रही हैं?’’ उस ने माला फेरती उस महिला से पूछा.

‘‘मेरठ,’’ उस ने छोटा सा उत्तर दिया फिर उसे मानो बेचैनी सी हुई. बोली, ‘‘वे तुम्हारे घर वाले थे?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘रहती कहां हो…मेरठ?’’

‘‘जी नहीं, मुंबई…’’

‘‘तो मेरठ?’’

‘‘मायका है मेरा.’’

‘‘किस जगह?’’

‘‘नंदन में…’’ नंदन मेरठ की एक पौश व बड़ी कालोनी है.

‘‘अरे, वहीं तो हम भी रहते हैं. हम गोल मार्किट के पास रहते हैं, और तुम?’’

‘‘जी, गोल मार्किट से थोड़ा आगे चल कर दाहिनी ओर ‘साकेत’ बंगला है, वहीं.’’

‘‘वह तो गिरधारीलालजी का है,’’ फिर कुछ रुक कर वह वृद्धा बोली, ‘‘तुम उन की पोती तो नहीं हो?’’

‘‘जी हां, मैं उन की पोती ही हूं.’’

‘‘बेटी, तुम तो घर की निकलीं, अरे, मेरे तो उस परिवार से बड़े अच्छे संबंध हैं. कोई लेने आएगा?’’

‘‘जी हां, घर से कोई भी आ जाएगा, भैया, कोई से भी.’’

वृद्धा निश्ंिचत हो माला फेरने लगीं.

‘‘तुम्हारी दादी ने मुझे आर्यसमाज का सदस्य बनवा दिया था. पहले ‘हरे राम’ कहती थी अब ‘हरिओम’ कहने लगी हूं,’’ वह हंसी.

आर्ची मुसकरा कर चुप हो गई.

वृद्धा माला फेरती रही.

गाड़ी की रफ्तार कुछ कम हुई. मुरादनगर आया था. गाड़ी ने पटरी बदली. खटरपटर की आवाज में आर्ची को किसी के दरवाजा पीटने की आवाज आई. उस ने एनी को देखा वह गहरी नींद में सो रही थी. जुगनू भी हाथ में खिलौना लिए नींद के झटके खा रहा था. आर्ची ने उसे भी बर्थ पर लिटा दिया और अपने कूपे से गलियारे में पहुंच कर मुख्यद्वार पर पहुंच गई.

कोई बाहर लटका हुआ था. अंदर से दरवाजा बंद होने के कारण वह दस्तक दे रहा था. आर्ची ने इधरउधर देखा, उसे कोई दिखाई नहीं दिया. सब अपनेअपने कूपों में बंद थे. आर्ची ने आगे बढ़ कर दरवाजा खोल दिया और वह मनुष्य बदहवास सा अंदर आ गया. वृद्धा वहीं से चिल्लाई, ‘‘अरे, क्या कर रही हो? क्यों घुसाए ले रही हो इस मरे बेशरम को, हिजड़ा है.’’

‘‘मांजी, मुझे दूसरे स्टेशन तक ही जाना है, मैं तो गाड़ी धीमी होते ही उतर जाऊंगा, देखो, यहीं दरवाजे के पास बैठ रहा हूं…’’ और वह भीतर से दरवाजा बंद कर वहीं गैलरी में उकड़ूूं बैठ गया.

आर्ची अपने कूपे में आ गई. वृद्धा का मुंह फूल गया था. उस ने आर्ची की ओर से मुंह घुमा कर दूसरी ओर कर लिया और जोरजोर से अपने हाथ की माला घुमाने लगी.

आर्ची को बहुत दुख हुआ. बेचारा गाड़ी से लटक कर गिर जाता तो? कुछ पल बाद ही आर्ची को बाथरूम जाने की जरूरत महसूस हुई. दोनों बच्चे खूब गहरी नींद सो रहे थे.

‘‘मांजी, प्लीज, जरा इन्हें देखेंगी. मैं अभी 2 मिनट में आई,’’ कह कर आर्ची  बाथरूम की ओर गई. उस का कूपा दरवाजे के पास था, अत: गैलरी से निकलते ही थोड़ा मुड़ कर बाथरूम था. जैसे ही आर्ची ने बाथरूम में प्रवेश किया गाड़ी फिर से खटरपटर कर पटरियां बदलने लगी. उसे लगा बच्चे कहीं गिर न पड़ें. जब तक बाथरूम से वह बाहर भागी तब तक गाड़ी स्थिर हो चुकी थी. सीट पर से गिरती हुई एनी को उस ‘बेशरम’ व्यक्ति ने संभाल लिया था.

वृद्धा क्रोधपूर्ण मुद्रा में खूब तेज रफ्तार से माला पर उंगलियां फेर रही थी. जुगनू बेखबर सो रहा था. उस बेशरम व्यक्ति का झुका हुआ एक हाथ जुगनू को संभालने की मुद्रा में उस के पेट पर रखा हुआ था. यह देख कर आर्ची भीतर से भीग उठी. यदि उस ने बच्चे संभाले न होते तो उन्हें गहरी चोट लग सकती थी.

‘‘थैंक्यू…’’ आर्ची ने कहा और एनी को अपनी गोद में ले लिया.

उस बेशरम की आंखों से चमक जैसे अचानक कहीं खो गई. हिचकिचाते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा स्टेशन आ रहा है. बस, 2 मिनट आप की बेटी को गोद में ले लूं?’’

आर्ची ने बिना कुछ कहे एनी को उस की गोद में थमा दिया. वृद्धा के मुंह से ‘हरिओम’ शब्द जोरजोर से बाहर निकलने लगा.

बारबार गोद बदले जाने के कारण एनी कुनमुन करने लगी थी. उस हिजड़े ने एनी को अपने सीने से लगा कर आंखें मूंद लीं तो 2 बूंद आंसू उस की आंखों की कोरों पर चिपक गए. आर्ची ने देखा कैसी तृप्ति फैल गई थी उस के चेहरे पर. एनी को उस की गोदी में देते हुए उस ने कहा, ‘‘यहां गाड़ी धीमी होगी, बस, आप जरा एक मिनट दरवाजा बंद मत करना…’’ और धीमी होती हुईर् गाड़ी से वह नीचे कूद गया. आर्ची ने खुले हुए दरवाजे से देखा, वह भाग कर सामने के टी स्टाल पर गया. वहां से बिस्कुट का एक पैकेट उठाया, भागतेभागते बोला, ‘‘पैसा देता हूं अभी…’’ और पैकेट दरवाजे के पास हाथ लंबा कर आर्ची की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘बहन, इसे अपने बच्चों को जरूर खिलाना.’’

गाड़ी रफ्तार पकड़ रही थी. आर्ची कुछ आगे बढ़ी, उस ने पैकेट पकड़ना चाहा पर गोद में एनी के होने के कारण वह और आगे बढ़ने में झिझक गई और पैकेट हाथ में आतेआते गाड़ी के नीचे जा गिरा. आर्ची का मन धक्क से हो गया. बेबसी से उस ने नजर उठा कर देखा वह ‘बेशरम’ व्यक्ति हाथ हिलाता हुआ अपनी आंखों के आंसू पोंछ रहा था.

कलियुगी मां: जब प्रेमी संग भागी 2 बच्चों की मां

शहनवाज जैसे ही हैडक्वार्टर से घर पहुंचा, तभी उस के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. उस ने मोबाइल फोन उठा कर देखा कि कोतवाली से इंस्पैक्टर अशोक शुक्ला का फोन था. उस ने काल रिसीव कर लिया, ‘‘हैलो…’’‘शहनवाज, आप अभी कोतवाली आ जाइए. आप ने जिस औरत की अपने प्रेमी के साथ घर से भागने की अर्जी दिलाई थी, वह अपने प्रेमी के साथ कोतवाली पहुंच गई है.

आप भी शिकायत करने वाले को ले कर कोतवाली पहुंचे जाइए,’ उधर से इंस्पैक्टर अशोक शुक्ला बोले और फोन कट गया.यह सुन कर शहनवाज का मूड औफ हो गया. सुबह से तो वह दौड़ ही रहा था. आज डीएम साहब ने मीटिंग की थी, इसलिए सभी पत्रकारों को हैडक्वार्टर बुलाया गया था और वहां से आ कर उस ने दो घूंट पानी तक नहीं पीया था कि उसे अब फिर कोतवाली जाना था.कुछ सोचते हुए शहनवाज ने मोबाइल फोन से काल कर यासीन को कोतवाली पहुंचने के लिए कहा और दोबारा बाइक निकाली, फिर कोतवाली की ओर चल दिया.शहनवाज 29 साल का नौजवान था.

दिखने में वह भले ही साधारण कदकाठी का था, पर उस की लेखनी और बोल में काफी दम था. उसे पत्रकारिता की गहरी समझ थी और अपने काम के प्रति वह बहुत जागरूक था.जब शहनवाज कोतवाली पहुंचा, तो उस ने देखा कि महिला सिपाही कोमल के साथ एक औरत खड़ी थी और सामने ही बैंच पर एक नौजवान बैठा था. उन को देख कर वह इतना समझ गया कि शायद यही यासीन की बीवी परवीन है और साथ में उस का प्रेमी है.यासीन के केस को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं.

दरअसल, एक हफ्ते पहले ही शहनवाज शहर से सटे कसबे खीरी में गया हुआ था. उस के न्यूज चैनल ने उस इलाके में हो रहे विकास के कामों की एक स्टोरी उस से मांगी थी, जिस की कवरेज के लिए वह अपने साथी नवाज के साथ आया हुआ था. उसे कवरेज करते देख कर कई लोग वहीं जमा हो गए थे.‘‘आप पत्रकार अंकल हैं?’’ तभी भीड़ में से किसी की आवाज सुन कर शहनवाज का ध्यान उस ओर गया. उस ने देखा कि सामने तकरीबन 6-7 साल का एक बच्चा खड़ा था.

‘‘आप ने बताया नहीं कि आप पत्रकार अंकल हैं?’’ शहनवाज कुछ बोलता, इस से पहले ही उस बच्चे ने दोबारा पूछ लिया.‘‘हां, बेटा…’’ शहनवाज ने कहा.

‘‘अंकल, आप मेरी अम्मी को वापस बुला दीजिए.

मुझे उन के बिना अच्छा नहीं लगता. वे हम सब से नाराज हो कर पता नहीं कहां चली गई हैं. पापा ने पुलिस अंकल से उन को ढूंढ़ने के लिए कहा था, लेकिन वे भी मेरी अम्मी को ढूंढ़ कर नहीं लाए,’’ वह बच्चा रोता हुआ उस से बोला.बच्चे की अपनी अम्मी के लिए मुहब्बत और उस की मासूमियत देख कर पता नहीं क्यों शहनवाज का बच्चे पर प्यार उमड़ आया और उस ने उसे अपनी गोद में उठा लिया.

‘‘अच्छा, आप के पापा कहां हैं?’’ शहनवाज ने बड़े प्यार से उस बच्चे से पूछा.‘‘वे उधर हैं,’’ बच्चा एक ओर इशारा करते हुए बोला.शहनवाज ने देखा कि कुछ ही दूरी पर एक झोंपड़ीनुमा घर था, जिस के दरवाजे पर एक मजदूर सा दिखने वाला आदमी खड़ा हुआ था.

उस की गोद में एक बच्चा भी था, जो शायद 4-5 साल का होगा.शहनवाज ने उस बच्चे को गोद से उतार दिया और उसे झोंपड़ी की ओर चलने के लिए इशारा किया. वह बच्चा चलने ही वाला था कि तभी वह आदमी, जिस की गोद में बच्चा था, तेज चल कर उन के पास आने लगा.‘‘माफ करना भाईजान, मेरे बेटे ने आप को तंग किया. मेरा नाम यासीन है और यह मेरा बेटा जुनैद है.

मैं इसे कितना समझा रहा हूं कि तेरी अम्मी जल्दी लौट आएगी, लेकिन इसे समझ नहीं आ रहा है. दिनरात ये दोनों भाई ‘अम्मीअम्मी’ की रट लगाए रहते हैं.

‘‘जब से जुनैद की बूआ ने बोला है कि कोई पत्रकार ही अब हमारी मदद कर सकता है, तभी से ये बच्चे मुझ से बोल रहे हैं कि पत्रकार अंकल के पास चलो, वे हमारी अम्मी को ढूंढ़ने में मदद करेंगे,’’ यासीन शहनवाज के पास आ कर बोला.‘‘ओह, पर आखिर आप की पत्नी इन छोटेछोटे बच्चों को छोड़ कर कहां चली गई हैं?’’ शहनवाज ने यासीन से हैरत से पूछा.

‘‘वह 5 दिन पहले अपने प्रेमी के साथ घर से भाग गई थी. जानकारी मिली है कि वह यहां से लखनऊ चली गई है और वहां अपने प्रेमी के साथ ही रह रही है,’’ यासीन ने धीरे से बताया.यह सुन कर शहनवाज ने उन दोनों मासूम बच्चों की ओर देखा. मां के बगैर उन दोनों के चेहरे उतरे हुए थे. वह सोच में पड़ गया कि कोई मां इतनी कठोर कैसे हो सकती है?

‘‘क्या आप ने अपनी पत्नी को ढूंढ़ने के लिए कोतवाली में कोई अर्जी दी है?’’ शहनवाज ने यासीन से पूछा.‘‘जी…’’ यासीन बोला.शहनवाज ने कुछ सोच कर यासीन से पूरी जानकारी ली और उस के बाद उस ने कोतवाली फोन मिला दिया.

उस ने इंस्पैक्टर अशोक शुक्ला को अर्जी के बारे में जानकारी देते हुए जल्द ही यासीन की पत्नी को ढूंढ़ने के लिए कहा और दोबारा अपनी कवरेज करने लगा था. उस ने यासीन का मोबाइल फोन नंबर ले लिया था, ताकि उस से दोबारा बात हो सके.‘‘शहनवाजजी, साहब आप को औफिस में बुला रहे हैं,’’ तभी किसी की आवाज सुन कर शहनवाज चौंक गया. सामने कांस्टेबल राधेश्याम खड़ा था.शहनवाज कोतवाली में चला गया. यासीन भी अपने बच्चों को ले कर कोतवाली पहुंच चुका था.

दोनों बच्चों ने जब अपनी अम्मी को देखा, तो वे भाग कर उस से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगे.‘‘अम्मी, तुम हमें छोड़ कर कहां चली गई थीं… हम अब शैतानी नहीं करेंगे… हम से कोई गलती हो गई है, तो हमें माफ कर दें और आगे से हमें कहीं छोड़ कर मत जाना,’’ जुनैद ने रोते हुए कहा.बच्चों का अपनी मां के प्रति प्यार देख कर कोतवाली का पूरा माहौल बदल गया था.

वहां मौजूद यासीन, इंस्पैक्टर अशोक शुक्ला समेत सभी की आंखें नम हो गई थीं.अचानक शहनवाज को अपनी अम्मी की याद आ गई, जो उस की नाममात्र परेशानी से परेशान हो उठती थीं. उसे अच्छी तरह से याद है, जब वह छोटा था, तो एक बार उसे दिमागी बुखार हो गया था. तब अम्मी कितना परेशान हो गई थीं और रातदिन रोरो कर बस उस की देखभाल करती थीं. और तो और उस के बीमार होने पर उन्होंने खानापीना छोड़ दिया था.फिर भी शहनवाज अपनी मां के बगैर इतनी दूर अपनी बीवी सना के साथ लखीमपुर में रह रहा था.

वह अब्बू के साथ एक छोटी सी तकरार पर सना के साथ सबकुछ छोड़ कर चला आया था. वह सोच रहा था कि कैसे रह रही होंगी उस की अम्मी उस से दूर?‘‘नहीं, तुम मेरे बच्चे नहीं हो. छोड़ो मुझे, दूर हटो और जाओ अपने बाप के पास. मुझे नहीं रहना तुम लोगों के साथ,’’ इतनी तेज आवाज सुन कर शहनवाज यादों का दामन छोड़ एक बार फिर आज में आ गया.

वह आवाज यासीन की बीवी परवीन की थी, जो अपने दोनों बच्चों को झिड़क कर खुद से अलग कर रही थी, लेकिन बच्चे थे कि अपनी अम्मी से चिपके ही जा रहे थे. शायद वे सोच रहे थे कि एक बार उन की अम्मी उन्हें गोद में उठा कर प्यार कर लें.यह सब देख कर शहनवाज को बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा था. कैसी मां है यह, जो अपने बच्चों से इस तरह से बरताव कर रही है.

‘‘आखिर तुम क्यों नहीं रहना चाहती हो अपने शौहर और बच्चों के साथ? अगर कोई परेशानी है या फिर तुम्हारा शौहर तुम्हें मारतापीटता है, तो मुझे बताओ,’’ इंस्पैक्टर अशोक शुक्ला ने यासीन की बीवी से पूछा.‘‘नहीं, मुझे इन से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मुझे नहीं रहना है यासीन और उस के बच्चों के साथ. मैं वसीम से प्यार करती हूं और मुझे उसी के साथ में रहना है,’’ परवीन कुछ दूरी पर खड़े नौजवान की ओर इशारा करते हुए बोली.‘‘लेकिन, तुम्हारे छोटेछोटे बच्चे हैं. क्या रह पाओगी इन के बगैर? ये बच्चे भी तुम से कितना प्यार करते हैं और मैं भी तुम से बहुत प्यार करता हूं, यह तुम जानती हो, लेकिन फिर भी तुम क्यों नहीं समझ रही हो…’’

परवीन की बात सुन कर यासीन ने उसे समझाने की कोशिश की.‘‘कुछ भी हो, मैं तुम्हारे साथ इस तरह की जिंदगी नहीं गुजार सकती,’’ परवीन ने दोटूक जवाब यासीन को दिया, तो यासीन दोबारा कुछ न बोला.सभी ने परवीन को बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने किसी की बात नहीं मानी. उस ने तो जैसे ठान ही लिया था कि वह अपने प्रेमी वसीम के साथ ही रहेगी.

यह देख कर शहनवाज को बड़ा गुस्सा आ रहा था. उस का मन कर रहा था कि अभी जोरदार तमाचा ऐसी कमबख्त मां के गाल पर मार दे, जो इन मासूम चेहरों को देख कर भी उस की ममता नहीं जाग रही थी.जब परवीन अपने प्रेमी के साथ जाने लगी, तो दोनों बच्चे एक बार फिर फूटफूट कर रोने लगे. उन बच्चों का रोना किसी से देखा नहीं जा रहा था.‘‘पापा, अम्मी को रोक लो. हम कभी अम्मी को परेशान नहीं करेंगे,’’ मासूम जुनैद गुहार लगा रहा था.तभी अचानक महिला सिपाही कोमल ने बिना कुछ सोचेसमझे उन दोनों बच्चों को अपनी छाती से लगा लिया और उन्हें चुप कराने लगी.

कुछ ही देर में बच्चे चुप हो गए, पर वे एकटक अपनी अम्मी को देख रहे थे, जो किसी अनजान के साथ उन्हें छोड़ दूर जा रही थी.तभी कुछ सोच कर शहनवाज उन दोनों बच्चों के पास पहुंच गया और उन्हें प्यार से समझाया, ‘‘वे तुम्हारी अम्मी नहीं हैं. सच तो यह है कि तुम्हारी अम्मी अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’इतना सुनना था कि वे दोनों बच्चे अचानक एक बार फिर अपनी अम्मी के पास जा पहुंचे.‘‘हमें माफ कर दें. हम ने आप को बिना वजह परेशान किया.

हमें नहीं मालूम था कि हमारी अम्मी अब इस दुनिया में नहीं हैं,’’ जुनैद ने इतना कहा और फिर दोनों बच्चे वापस आ गए.तभी शहनवाज ने देखा कि जुनैद की बात सुन कर परवीन की आंखें भी गीली होने लगी थीं. पर वह कुछ कहती, तभी उस का प्रेमी वसीम गाड़ी ले कर आ गया और उसे गाड़ी में बैठा कर चल दिया. दोनों बच्चे और यासीन गाड़ी को जाते हुए देखते रहे.

शहनवाज ने यासीन से भी घर जाने के लिए कहा और खुद भी अपनी बाइक उठा कर कोतवाली से बाहर आ गया. यह सब देख कर उस का सिर भारी होने लगा था और वह कय्यूम चाचा की दुकान पर चाय पीने के लिए चला गया, जो कोतवाली से कुछ दूर रेलवे स्टेशन के करीब थी.कय्यूम चाचा की दुकान से कुछ ही दूरी पर भीड़ जमा थी. शहनवाज ने पूछा, ‘‘चाचा, यह भीड़ कैसी?’’

‘‘वहां कोई पागल औरत है, जिस ने कल रात में ही एक बच्ची को जन्म दिया है. उस की गर्भनाल भी अभी नहीं कटी है. मांबच्चे में कहीं जहर न फैल जाए, इस के लिए डाक्टर की टीम गर्भनाल काटने की कोशिश कर रही है,’’ कय्यूम चाचा ने बताया.कुछ सोच कर शहनवाज भी भीड़ को चीरता हुआ वहां जा पहुंचा. उस ने देखा कि सामने एक औरत थी, जिस के फटेपुराने कपड़े पहने, बाल उलझेउलझे और शरीर से भी वह बहुत कमजोर लग रही थी.

वह चंद घंटे पहले जनमी नवजात बच्ची को सीने से चिपकाए हुए थी.एक लेडी डाक्टर बच्ची को उस से लेने की कोशिश कर रही थी, जिस से कि गर्भनाल काटी जा सके, लेकिन वह औरत बच्ची को छोड़ ही नहीं रही थी. शायद उसे लग रहा था कि वे लोग उस की बच्ची उस से छीन लेंगे.अपनी बच्ची के लिए उस पागल मां की ममता देख कर सभी हैरान हो रहे थे. तभी शहनवाज का ध्यान उस कलियुगी मां पर गया, जो अपने 2 मासूम बच्चों को रोता हुआ छोड़ कर अपने प्रेमी के साथ दूर चली गई थी, बहुत दूर. उस का चेहरा ध्यान में आते ही शहनवाज का मन कसैला हो गया.

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