भूलना मत: नम्रता की जिंदगी में क्या था उस फोन कौल का राज?

नम्रता ने फोन की घंटी सुन कर करवट बदल ली. कंबल ऊपर तक खींच कर कान बंद कर लिए. सोचा कोई और उठ कर फोन उठा लेगा पर सभी सोते रहे और फोन की घंटी बज कर बंद हो गई.

‘चलो अच्छा हुआ, मुसीबत टली. पता नहीं मुंहअंधेरे फोन करने का शौक किसे चर्राया,’ नम्रता ने स्वयं से ही कहा.

पर फोन फिर से बजने लगा तो नम्रता झुंझला गई, ‘‘लगता है घर में मेरे अलावा यह घंटी किसी को सुनाई ही नहीं देती,’’ उस ने उठने का उपक्रम किया पर उस के पहले ही अपने पिता शैलेंद्र बाबू की पदचाप सुन कर वह दोबारा सो गई. पिता ने फोन उठा लिया.

‘‘क्या? क्या कह रहे हो कार्तिक? मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं होता. पूरे देश में प्रथम स्थान? नहींनहीं, तुम ने कुछ गलत देखा होगा. क्या नैट पर समाचार है?’’

‘‘अब तो आप को मिठाई खिलानी ही पड़ेगी.’’

‘‘हां, है.’’

‘‘मिठाई?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, घर आओ तो, मिठाई क्या शानदार दावत मिलेगी तुम्हें,’’ शैलेंद्र बाबू फोन रखते ही उछल पड़े. थोड़ी देर पहले की मीठी नींद से उठने की खुमारी और बौखलाहट एक क्षण में उड़नछू हो गई.

‘‘सुचित्रा, नम्रता, अनिमेष, कहां हो तुम तीनों? देखो कितनी खुशी की बात है,’’ वे पूरी शक्ति लगा कर चीखे.

‘‘क्या है? क्यों सारा घर सिर पर उठा रखा है?’’ सुचित्रा पति की चीखपुकार सुन कर उठ आईं.

‘‘बात ही ऐसी है. सुनोगी तो उछल पड़ोगी.’’

‘‘अब कह भी डालो, भला कब तक पहेलियां बुझाते रहोगे.’’

‘‘तो सुनो, हमारी बेटी नम्रता भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रथम आई है.’’

‘‘क्या? मुझे तो विश्वास नहीं होता. किसी ने अवश्य तुम्हें मूर्ख बनाने का प्रयत्न किया है. किस का फोन था? अवश्य ही किसी ने मजाक किया होगा.’’

‘‘कार्तिक का फोन था और मैं उस की बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर सकता हूं.’’

मातापिता की बातचीत सुन कर नम्रता और अनिमेष भी उठ कर आ गए.

‘‘मां ठीक कहती हैं, पापा. क्या पता किसी ने शरारत की हो. परीक्षा में सफल होना तो संभव है पर सर्वप्रथम आना…मैं जब तक अपनी आंखों से न देख लूं, विश्वास नहीं कर सकती,’’ नम्रता ने अपना मत प्रकट किया.

पर जब तक नम्रता कुछ और कहती अनिमेष कंप्यूटर पर ताजा समाचार देखने लगा जहां नम्रता के भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रथम आने का समाचार प्रमुखता से दिखाया जा रहा था. कुछ ही देर में समाचारपत्र भी आ गया और फोन पर बधाई देने वालों का तांता सा लग गया.

शैलेंद्र बाबू तो फोन पर बधाई स्वीकार करने और सब को विस्तार से नम्रता के आईएएस में प्रथम आने के बारे में बताते हुए इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें नाश्ता तक करने का समय नहीं मिला.

दिनभर घर आनेजाने वालों से भरा रहा. नम्रता जहां स्थानीय समाचारपत्रों के प्रतिनिधियों व टीवी चैनलों को साक्षात्कार देने में व्यस्त थी, वहीं अनिमेष और सुचित्रा मेहमानों की खातिरदारी में.

शैलेंद्र बाबू के तो पांव खुशी के कारण जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. नम्रता ने एक ही झटके में पूरे परिवार को साधारण से असाधारण बना दिया था.

रात गहराने लगी तो अनेक परिचित विदा लेने लगे. पर दूर से आए संबंधियों के ठहरने, खानेपीने का प्रबंध तो करना ही था. सुचित्रा के तो हाथपैर फूल गए थे. तीन बुलाए तेरह आए तो सुना था उन्होंने पर यहां तो बिना बुलाए ही सब ने धावा बोल दिया था.

वे अनिमेष को बारबार बाजार भेज कर आवश्यकता की वस्तुएं मंगा रही थीं और स्वयं दिनभर रसोई में जुटी रहीं.

अतिथियों को खिलापिला व सुला कर जब पूरा परिवार साथ बैठा तो सभी को अपनी कहने और दूसरों की सुनने का अवसर मिला.

‘‘मुझ से नहीं होता इतने लोगों के खानेपीने का प्रबंध. कल ही एक रसोइए का प्रबंध करो,’’ सब से पहले सुचित्रा ने अपना दुखड़ा कह सुनाया.

‘‘क्यों नहीं, कल ही से रख लेते हैं. कुछ दिनों तक आनेजाने वालों का सिलसिला चलेगा ही,’’ शैलेंद्र बाबू ने कहा.

‘‘मां, घर में जो भी सामान मंगवाना हो उस की सूची बना लो. कल एकसाथ ला कर रख दूंगा. आज पूरे दिन आप ने मुझे एक टांग पर खड़ा रखा है,’’ अनिमेष बोला.

‘‘तुम लोगों को एक दिन थोड़ा सा काम करना पड़ जाए तो रोनापीटना शुरू कर देते हो. पर जो सब से महत्त्वपूर्ण बातें हैं उन की ओर तुम्हारा ध्यान ही नहीं जाता,’’ शैलेंद्र बाबू गंभीर स्वर में बोले.

‘‘ऐसी कौन सी महत्त्वपूर्ण बात है जिस की ओर हमारा ध्यान नहीं गया?’’ सुचित्रा ने मुंह बिचकाया.

‘‘कार्तिक…आज सुबह सब से पहले कार्तिक ने ही मुझे नम्रता की इस अभूतपूर्व सफलता की सूचना दी थी. पर मैं पूरे दिन प्रतीक्षा करता रहा और वह नहीं आया.’’

‘‘प्रतीक्षा केवल आप ही नहीं करते रहे, पापा, मैं ने तो उसे फोन भी किया था. जितना प्रयत्न और परिश्रम मैं ने किया उतना ही उस ने भी किया. उसे तो जैसे धुन सवार थी कि मुझे इस प्रतियोगिता में सफल करवा कर ही मानेगा. मेरी सफलता का श्रेय काफी हद तक कार्तिक को ही जाता है.’’

‘‘सब कहने की बात है. ऐसा ही है तो स्वयं क्यों नहीं दे दी आईएएस की प्रवेश परीक्षा?’’

‘‘क्योंकि वह चाहता ही नहीं, मां. उसे पढ़नेपढ़ाने में इतनी रुचि है कि वह व्याख्याता की नौकरी छोड़ना तो दूर, अर्थशास्त्र में पीएचडी करने की योजना बना रहा है.’’

‘‘तो अब मेरी बात ध्यान से सुनो. अब तक तो तुम दोनों की मित्रता ठीक थी पर अब तुम दोनों का मिलनाजुलना मुझे पसंद नहीं है. बड़ी अफसर बन जाओगी तुम. अपनी बराबरी का वर ढूंढ़ो तो मुझे खुशी होगी. भूल गईं, सुधीर और उस के परिवार ने हमारे साथ कैसा व्यवहार किया था?’’ सुचित्रा बोलीं.

‘‘तो आप चाहती हैं कि मैं भी कार्तिक के साथ वही करूं जो सुधीर ने मेरे साथ किया था.’’

‘‘हां, तुम लोगों ने अपनी व्यस्तता में देखा नहीं, कार्तिक आया था, मैं ने ही उसे समझा दिया कि अब नम्रता उस से कहीं आगे निकल गई है तो किसी से बिना मिले मुंह छिपा कर चला गया,’’ सुचित्रा बोलीं.

‘‘क्या? आप ने मुझे बताया तक नहीं? कार्तिक जैसे मित्र बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. हम दोनों तो जीवनसाथी बनने का निर्णय ले चुके हैं,’’ यह बोलते हुए नम्रता रो पड़ी.

‘‘मैं तुम से पूरी तरह सहमत हूं, बेटी. कार्तिक हीरा है, हीरा. उसे हाथ से मत जाने देना,’’ शैलेंद्रजी ने नम्रता को ढाढ़स बंधाया.

एकांत मिलते ही नम्रता ने कार्तिक का नंबर मिलाया. पर बहुत पहले की एक फोन कौल उस के मानसपटल पर हथौड़े की चोट करने लगी थी.

उस दिन भी फोन उस के पिता ने ही उठाया था.

‘नमस्ते शैलेंद्र बाबू. कहिए, विवाह की सब तैयारियां हो गईं?’ फोन पर धीर शाह का स्वर सुन कर शैलेंद्र बाबू चौंक गए थे.

‘सब आप की कृपा है. हम सब तो कल की तैयारी में ही व्यस्त हैं.’

इधरउधर की औपचारिक बातों के बाद धीर बाबू काम की बात पर आ गए.

‘ऐसा है शैलेंद्र बाबू, मैं ने तो लाख समझाया पर रमा, मेरी पत्नी तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं. बस, एक ही जिद पर अड़ी है. उसे तो तिलक में 10 लाख नकद चाहिए. वह अपने मन की सारी साध पूरी करेगी.’’

‘क्या कह रहे हैं आप, धीर बाबू? तिलक में तो लेनेदेने की बात तय नहीं हुई थी. अब एक दिन में 10 लाख का प्रबंध कहां से करूंगा मैं?’ शैलेंद्र बाबू का सिर चकराने लगा. आवाज भर्रा गई.

‘क्या कहूं, मैं तो आदर्शवादी व्यक्ति हूं. दहेज को समाज का अभिशाप मानता हूं. पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है. रमा ने तो जिद ही पकड़ ली है. वैसे गलती उस की भी नहीं है. आप के यहां संबंध होने के बाद भी लोग दरवाजे पर कतार बांधे खड़े हैं.’

सोचने व समझ पाने के लिए शैलेंद्र ने कहा, ‘मेरे विचार से ऐसे गंभीर विचारविमर्श फोन पर करना ठीक नहीं रहेगा. मैं अपनी पत्नी सुचित्रा के साथ आप के घर आ रहा हूं. वहीं मिलबैठ कर सब मसले सुलझा लेंगे.’

नम्रता ने शैलेंद्र बाबू और धीर शाह के बीच होने वाली बातचीत को सुन लिया था और किसी अशुभ की आशंका से वह कांप उठी थी.

शैलेंद्र बाबू और सुचित्रा जब धीर बाबू के घर गए तो उन्होंने 10 लाख की मांग को दोहराया, जिस से शैलेंद्र बाबू निराश हो गए.

जब नम्रता से सुधीर का संबंध हुआ था तब सुधीर डिगरी कालेज में साधारण सा व्याख्याता था पर अब वह भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर बन गया था. इसी कारण वर का भाव भी बढ़ गया. अफसर बनते ही सुधीर का दुनिया के प्रति नजरिया भी बदल गया.

शैलेंद्र और सुचित्रा उठ खड़े हुए. घर आ कर बात साफ कर दी गई.

‘यह विवाह नहीं होगा. लगता है और कोई मोटा आसामी मिल गया है धीर बाबू को,’ शैलेंद्र बाबू ने सुचित्रा से कहा.

सुधीर और नम्रता ने कालेज की पढ़ाई साथ पूरी की थी. दोनों के प्रेम के किस्से हर आम और खास व्यक्ति की जबान पर थे. एमफिल करते ही जब दोनों को अपने ही कालेज में व्याख्याता के पद प्राप्त हो गए तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. उन के प्यार की दास्तान सुन कर दोनों ही पक्षों के मातापिता ने उन के विवाह की स्वीकृति दे दी थी.

नम्रता से विवाह तय होते ही जब सुधीर का आईएएस में चयन हो गया तो सुचित्रा और शैलेंद्र बाबू भी खुशी से झूम उठे. वे मित्रों, संबंधियों और परिचितों को यह बताते नहीं थकते थे कि उन की बेटी नम्रता का संबंध एक आईएएस अफसर से हुआ है.

नम्रता स्वयं भी कुछ ऐसा ही सोचने लगी थी. वह जब भी सुधीर से मिलती तो गर्व महसूस करती थी. पर आज सबकुछ बदला हुआ नजर आ रहा था.

सुधीर और उस का प्रेमप्रसंग तो पिछले 5 वर्षों से चल रहा था. सुधीर तो दहेज के सख्त खिलाफ था. फिर आज अचानक इतनी बड़ी मांग? वह छटपटा कर रह गई.

उस ने तुरंत सुधीर को फोन मिलाया. उसे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि सुधीर और उस का परिवार तिलक से ठीक पहले ऐसी मांग रख देंगे. वह सुधीर से बात कर के सब साफसाफ पूछ लेना चाहती थी. उन दोनों के प्यार के बीच में यह पैसा कहां से आ गया था.

‘हैलो, सुधीर, मैं नम्रता बोल रही हूं.’

‘हां, कहो नम्रता, कैसी हो? कल की सब तैयारी हो गई क्या?’

‘यही तो मैं तुम से पूछ रही हूं. यह एक दिन पहले क्या 10 लाख की रट लगा रखी है? मेरे पापा कहां से लाएंगे इतना पैसा?’

‘शांत, नम्रता शांत. इतने सारे प्रश्न पूछोगी तो मैं उन के उत्तर कैसे दे सकूंगा.’

‘बनो मत, तुम्हें सब पता है. तुम्हारी स्वीकृति के बिना वे ऐसी मांग कभी नहीं करते,’ नम्रता क्रोधित स्वर में बोली.

‘तो तुम भी सुन लो, क्या गलत कर रहे हैं मेरे मातापिता? लोग करोड़ों देने को तैयार हैं. कहां मिलेगा तुम्हें और तुम्हारे पिता को आईएएस वर? तुम लोग इस छोटी सी मांग को सुनते ही बौखला गए,’ सुधीर का बदला सुर सुनते ही स्तब्ध रह गई नम्रता. हाथपैर कांप रहे थे. वह वहीं कुरसी पर बैठ कर देर तक रोती रही.

अनिमेष सो रहा था. वह किसी प्रकार लड़खड़ाती हुई अपने कक्ष में गई और कुंडी चढ़ा ली.

शैलेंद्र और सुचित्रा घर पहुंचे तो देर तक घंटी बजाने और द्वार पीटने के बाद जब अनिमेष ने द्वार खोला तो शैलेंद्र बाबू उस पर ही बरस पड़े.

‘यहां जान पर बनी है और तुम लोग घोड़े बेच कर सो रहे हो.’

‘बहुत थक गया था. मैं ने सोचा था कि नम्रता दीदी द्वार खोल देंगी. वैसे भी उन की नींद जल्दी टूट जाती है,’ अनिमेष उनींदे स्वर में बोला.

‘नम्रता? हां, कहां है नम्रता?’ शैलेंद्र बाबू ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘अपने कमरे में सो रही हैं,’ अनिमेष बोला और फिर सो गया.

पर शैलेंद्र और सुचित्रा को कुछ असामान्य सा लग रहा था. मातापिता की चिंता से अवगत थी नम्रता. ऐसे में उसे नींद आ गई, यह सोच कर ही घबरा गए थे दोनों.

सुचित्रा ने तो नम्रता के कक्ष का द्वार ही पीट डाला. पर कोई उत्तर न पा कर वे रो पड़ीं. अब तो अनिमेष की नींद भी उड़ चुकी थी. शैलेंद्र बाबू और अनिमेष ने मिल कर द्वार ही तोड़ डाला.

उन का भय निर्मूल नहीं था. अंदर खून से लथपथ नम्रता बेसुध पड़ी थी. उस ने अपनी कलाई की नस काट ली थी.

अब अगले दिन के तिलक की बात दिमाग से निकल गई थी. वर पक्ष की मांग और उन के द्वारा किए गए अपमान की बात भुला कर वे नम्रता को ले कर अस्पताल की ओर भागे थे.

समाचार सुनते ही नम्रता के मित्र और सहकर्मी आ पहुंचे थे. सुचित्रा और अनिमेष का रोरो कर बुरा हाल था. शैलेंद्र बाबू अस्पताल में प्रस्तर मूर्ति की भांति शून्य में ताकते बैठे थे. कार्तिक ने न केवल उन्हें सांत्वना दी थी बल्कि भागदौड़ कर के सुचित्रा की देखभाल भी की थी.

कार्तिक रातभर नम्रता के होश में आने की प्रतीक्षा करता रहा था पर नम्रता तो होश में आते ही बिफर उठी थी.

‘कौन लाया मुझे यहां? मर क्यों नहीं जाने दिया मुझे? मैं जीना नहीं चाहती,’ वह प्रलाप करने लगी थी.

‘चुप करो, यह बकवास करने का समय नहीं है. तुम ऐसा कायरतापूर्ण कार्य करोगी, मैं सोच भी नहीं सकता था.’

‘मैं अपने मातापिता को और दुख देना नहीं चाहती.’

‘तुम ने उन्हें कितना दुख दिया है, देखना चाहोगी. तुम्हारी मां रोरो कर दीवार से अपना सिर टकरा रही थीं. बड़ी कठिनाई से अनिमेष उन्हें घर ले गया है. तुम्हारे पिता तुम्हारे कक्ष के बाहर बैंच पर बेहोश पड़े हैं.’

‘ऐसी परिस्थिति में मैं और कर भी क्या सकती थी?’

‘तुम पहली युवती नहीं हो जिस का विवाह टूटा है, कारण कोई भी रहा हो. दुख का पहाड़ तो पूरे परिवार पर टूटा था पर तुम बड़ी स्वार्थी निकलीं. केवल अपने दुख का सोचा तुम ने. तुम्हें तो उन्हें ढाढ़स बंधाना चाहिए था.’

नम्रता चुप रह गई. कार्तिक उस का अच्छा मित्र था. उस ने और कार्तिक ने एकसाथ कालेज में व्याख्याता के रूप में प्रवेश किया था. पर सुधीर के कालेज में आते ही नम्रता उस के लटकोंझटकों पर रीझ गई थी.

नम्रता स्वस्थ हो कर घर आ गई थी पर कार्तिक के सहारे ही वह सामान्य हो सकी थी. ‘स्वयं को पहचानो नम्रता,’ वह बारबार कहता. उस के प्रोत्साहित करने पर ही नम्रता ने आईएएस की तैयारी प्रारंभ की थी. उस की तैयारी में कार्तिक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. पर आज न जाने उस पर क्या बीती होगी.

‘‘हैलो कार्तिक,’’ फोन मिलते ही नम्रता ने कार्तिक का स्वर पहचान लिया था.

‘‘कहो नम्रता, कैसी हो?’’

‘‘मैं कैसी हूं अब पूछ रहे हो तुम? सुबह से कहां थे?’’

‘‘मैं तो तुम से मिलने आया था पर तुम बहुत व्यस्त थीं.’’

‘‘और तुम बिना मिले चले गए? यह भी भूल गए कि तुम ने तो सुखदुख में साथ निभाने का वादा किया है.’’

‘‘आज के संसार में इन वादों का क्या मूल्य है?’’

‘‘मेरे लिए ये वादे अनमोल हैं, कार्तिक. हम कल ही मिल रहे हैं. बहुत सी बातें करनी हैं, बहुत से फैसले करने हैं. ठीक है न?’’ नम्रता ने व्यग्रता से पूछा था.

‘‘ठीक है, नम्रता. तुम भी मेरे लिए अनमोल हो. यह कभी मत भूलना.’’

कार्तिक ने अपने एक वाक्य में अपना हृदय ही उड़ेल दिया था. नम्रता की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे थे. तृप्ति व खुशी के आंसू.

हिकमत- क्या गरीब परिवार की माया ने दिया शादी के लिए दहेज?

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हवस : कौन कर रहा था बेवफाई

लोकनायक जयप्रकाश नारायण सैंट्रल जेल, हजारीबाग में बंद विवेक सोच रहा था कि अपनी जिम्मेदारी से भागना ठीक नहीं था. शादी करने के बाद ही उसे अपनी प्रेमिका रश्मि के साथ सैक्स संबंध बनाना चाहिए था. उसे समोसे में सल्फर की गोलियां मिला कर नहीं देनी चाहिए थी, जिस के खाने से उस की जान चली गई.

बड़ेबड़े शातिर अपराधी को जेल की आबोहवा नागवार गुजरती है. विवेक ने तो अपनी छोटी सी जिंदगी में पहली बार गुनाह किया था, लेकिन सोचसमझ कर.

उसे फांसी की सजा भी हो सकती है. पर अब वह सोच रहा था कि प्यार तो सिर्फ देने का नाम है. प्यार में लेने की सोचना तो प्यार को कारोबार बना देता है और उस ने यही तो किया.

दरअसल, दिल्ली में पढ़ने के दौरान विवेक अपने दोस्तों के साथ गंदी फिल्में देख कर जल्दी ही जवान हो गया था. हालांकि उस की उम्र अभी महज 18 साल थी.

विवेक को इतनी समझ तो थी कि अगर दिल्ली में गलत तरीके से सैक्सुअल जिंदगी शुरू की, तो वह एड्स जैसी खतरनाक बीमारी का शिकार हो जाएगा.

विवेक छुट्टियों में झारखंड के हजारीबाग जिले में रह रही अपनी प्रेमिका रश्मि से मिलने आता रहता था. अब वह जब भी रश्मि से मिलता, तब उस की आंखों के सामने ब्लू फिल्मों का नजारा घूम जाता, जो उसे बेकाबू कर देता था.

धीरेधीरे उस ने हिम्मत जुटाना शुरू किया और रश्मि को दिमागी तौर पर सैक्स करने के लिए समझ ने बुझने लगा, ‘आजकल तो लिव इन रिलेशनशिप का जमाना है. लड़का और लड़की बिना शादी किए आराम से एकसाथ रहते हैं. इतना ही नहीं, अगर इस संबंध से कोई बच्चा हो भी जाता है, तो उसे पिता की जायदाद में से हिस्सा भी मिल जाता है.’

भोलीभाली रश्मि ने कभी यह नहीं पूछा था कि इस संबंध में बच्चा हो जाने के बाद लड़की की हैसियत क्या होती है? क्या उसे भी पति की जायदाद में कोई हिस्सा मिलता है? अगर पति उसे छोड़ कर दूसरी लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप बनाता है, तो…

रश्मि अकसर उसे समझाती, ‘देखो, हम लोगों को उस परंपरा को नहीं छोड़ना चाहिए, जो हमारे बड़ेबुजुर्ग मानते आ रहे हैं. हम लोगों और समाज के लिए शादी के बाद ही जिस्मानी संबंध बनाना बेहतर है, इसलिए जब तक शादी न हो जाए, तब तक सब्र रखना होगा.’

जोश में आ कर विवेक झट से तैयार हो गया और बोला, ‘ठीक है, हम जल्दी ही शादी कर लेंगे. अब तो खुश हो तुम?’

इतना कहते हुए उस ने रश्मि को धीरेधीरे अपनी बांहों में ले लिया.

रश्मि ने शादी के वादे पर भरोसा कर के कुछ नहीं कहा और दोनों ने जिस्मानी संबंध बना लिए.

रश्मि उस रात अपने कमरे में बैठी सोच रही थी कि आज जो हुआ, क्या वह सही था? फिर वह आगे सोचने लगी कि जिस्मानी संबंध बनाने से विवेक और ज्यादा संजीदगी से हमारे रिश्ते के बारे में सोचेगा और हम लोग जल्दी ही एक हो जाएंगे.

उधर विवेक यह सोच रहा था कि आसानी से संबंध बनाने के लिए एक लड़की तो मिल गई, जिस से कोई खतरा भी नहीं. न ही समाज के लोगों से और न ही एड्स जैसी बीमारी से.

विवेक अब खुश था और रश्मि को किसी से न कहने की सख्त हिदायत दे कर वह दिल्ली चला जाता और फिर जब लौट कर आता, तो रश्मि के साथ वही पुराना देहसुख का खेल खेलता.

इस बार जब विवेक आया, तो वह रश्मि को एक सुनसान जगह पर ले गया और अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के बाद विवेक ने पूछा, ‘रश्मि, आज मजा नहीं आया खेल में. क्यों जिंदा लाश बनी रही तुम पूरे खेल के दौरान?’

रश्मि को डर लग रहा था कि कहीं वह बिनब्याहे पेट से न हो जाए. उस ने मन ही मन तय किया कि अब आगे वह ऐसा नहीं करेगी.

जब दूसरे दिन विवेक फिर रश्मि को देहसुख का खेल खेलने का न्योता देने आया, तो उस ने दोटूक कहा, ‘विवेक, जब तक हम लोग शादी नहीं कर लेते, तब तक हम यह खेल नहीं खेलेंगे.’

विवेक ने रश्मि को समझते हुए कहा, ‘ठीक है, हम लोग जल्द ही शादी कर लेंगे.’

दूसरे दिन उस ने रश्मि को फिर मिलने के लिए बुलाया, पर वह नहीं गई. विवेक का पागलपन हद तक बढ़ गया था. वह रश्मि को ढूंढ़ रहा था.

रश्मि उस शाम को विवेक को मिलने गई, तो वह उसे देखते ही फट पड़ा. उस ने सड़क पर ही उसे गोद में उठा लिया और भागने लगा, मानो किसी सुनसान जगह पर जल्दी से पहुंच जाना चाहता हो.

रश्मि को अंदाजा हो गया था कि अब क्या होने वाला है. वह समझ रही थी कि अगर खिलाफत नहीं करेगी, तो विवेक उसे अपनी हवस का शिकार बना लेगा. उस ने अपनेआप को उस की गोद से झटक दिया और दोनों एकदूसरे पर गिर पड़े.

विवेक ने मौका देख कर अपने होंठों को रश्मि के होंठों पर रख दिया. रश्मि उसे झटकते हुए अलग हो गई और बोली, ‘बस, अब और नहीं.’

हवस में अंधा विवेक यह सुन कर तिलमिला गया था. लड़की सामने है, पर वह कुछ नहीं कर सकता है.

उस ने तुरंत रश्मि को बहलाने के अंदाज में कहा, ‘ऐसा करो, तुम मेरे साथ दिल्ली चलो. वहां हम दोनों शादी कर लेंगे.’

यह सुन कर मासूम रश्मि खुश हो गई और दूसरे दिन अपने मातापिता को बिना बताए वह शहर से दूर रेलवे स्टेशन पर विवेक की बताई गई जगह पर पहुंच गई.

वहां विवेक उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. दिल्ली ले जाने के लिए नहीं, बल्कि उसे दूसरी दुनिया में पहुंचाने के लिए.

रेलवे स्टेशन पर विवेक ने रश्मि को जहर मिला समोसा खिला दिया. इस तरह सैक्स संबंध से रश्मि का मना करना विवेक के मन में हवस के उस सैलाब को जन्म दे गया, जो उसे बहा कर आज जेल की कालकोठरी में ले आया.

डायन : दूर हुआ गेंदा की जिंदगी का अंधेरा

केशव हाल ही में तबादला हो कर बस्तर से जगदलपुर के पास सुकुमा गांव में रेंजर पद पर आए थे. जगदलपुर के भीतरी इलाके नक्सलवादियों के गढ़ हैं, इसलिए केशव अपनी पत्नी करुणा और दोनों बच्चों को यहां नहीं लाना चाह रहे थे.

एक दिन केशव की नजर एक मजदूरिन पर पड़ी, जो जंगल में सूखी लकडि़यां बीन कर एक जगह रखती जा रही थी.

वह मजदूरिन लंबा सा घूंघट निकाले खामोशी से अपना काम कर रही थी. उस ने बड़ेबड़े फूलों वाली गुलाबी रंग की ऊंची सी साड़ी पहन रखी थी. वह गोरे रंग की थी. उस ने हाथों में मोटा सा कड़ा पहन रखा था व पैरों में बहुत ही पुरानी हो चुकी चप्पल पहन रखी थी.

उस मजदूरिन को देख कर केशव उस की उम्र का अंदाजा नहीं लगा पा रहे थे, फिर भी अपनी आवाज को नम्र बनाते हुए बोले, ‘‘सुनो बाई, क्या तुम मेरे घर का काम करोगी? मैं अभी यहां नयानया ही हूं.’’

केशव के मुंह से अचानक घर के काम की बात सुन कर पहले तो मजदूरिन घबराई, लेकिन फिर उस ने हामी भर दी.

इस बीच केशव ने देखा, उस मजदूरिन ने अपना घूंघट और नीचे खींच लिया. केशव ने वहां पास ही खड़े जंगल महकमे के एक मुलाजिम को आदेश दिया, ‘‘तोताराम, तुम इस बाई को मेरे घर ले जाओ.’’ तोताराम केशव की बात सुन कर एक अजीब सी हंसी हंसा और सिर झुका कर बोला, ‘‘जी साहब.’’

केशव उस की इस हंसी का मतलब समझ नहीं सके. तोताराम ने तुरंत मजदूरिन की तरफ मुड़ कर कहा, ‘‘चल गेंदा, तुझे साहब का घर दिखा दूं.’’

केशव ने उस मजदूरिन के लंबे घूंघट पर ध्यान दिए बिना ही उस से पूछा, ‘‘तुम हमारे घर के सभी काम कर लोगी न, जैसे कपड़े धोना, बरतन मांजना, घर की साफसफाई वगैरह? मैं यहां अकेला ही रहता हूं.’’

इस पर गेंदा ने धीरे से जवाब दिया, ‘‘जी साहब, आप जो भी काम कहेंगे, मैं कर दूंगी.’’

जब से गेंदा आई थी, केशव को बड़ा आराम हो गया था. लेकिन 8-10 दिन बाद ही केशव ने महसूस किया कि गेंदा के आने के बाद से जंगल महकमे के मुलाजिम और पास के क्वार्टर में रहने वाले लोग उन्हें देख कर हंसी उड़ाने वाले अंदाज में मुसकराते थे.

एक दिन दफ्तर से आ कर चाय पीते हुए केशव गेंदा से बोले, ‘‘तुम मेरे सामने क्यों घूंघट निकाले रहती हो? मेरे सामने तो मुंह खोल कर रहो.’’

यह सुन कर गेंदा कुछ समय तक तो हैरान सी खड़ी रही और अपने पैर के अंगूठे से जमीन खुरचती रही, फिर गेंदा ने घूंघट उलट दिया.

गेंदा का चेहरा देखते ही केशव की चीख निकल गई, क्योंकि गेंदा का चेहरा एक तरफ से बुरी तरह जला हुआ था, जिस के चलते वह बड़ी डरावनी लग रही थी.

गेंदा फफक कर रो पड़ी और रोतेरोते बोली, ‘‘साहब, मैं इसलिए अपना चेहरा छिपा कर रखती हूं, ताकि मुझे देख कर कोई डरे नहीं.’’

केशव ने गेंदा के चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा, ‘‘यह तुझे क्या हो गया है? तू कैसे इतनी बुरी तरह जल गई? तेरा रूपरंग देख कर तो लगता है, तू कभी बड़ी खूबसूरत रही होगी?’’

प्रेम के दो शब्द सुन कर गेंदा फिर से रो पड़ी और वापस घूंघट खींच कर उस ने अपना चेहरा छिपा लिया और भरे गले से बोली, ‘‘साहब, मैं ने सोचा था कि घूंघट निकाल कर आप का काम कर दिया करूंगी. मुझ गरीब को भी भरपेट भोजन मिल जाएगा, पर कल से नहीं आऊंगी. आप दूसरी महरी रख लेना.’’

इतना कह कर वह जाने लगी, तो केशव ने उसे रोक कर कहा, ‘‘गेंदा, मैं जानना चाहता हूं कि तुम्हारे साथ क्या हुआ और तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं? मुझे पूरी बात सचसच बताओ.’’

‘‘साहब, मैं आप से कुछ नहीं छिपाऊंगी. मैं ने बचपन से ही बहुत दुख सहे हैं. जब मैं 8 साल की थी, तभी मेरे पिता की मौत हो गई थी. थोड़े दिन बाद मेरी मां ने दूसरी शादी कर ली.

‘‘मेरे सौतेले पिता बहुत ही गंदे थे. वे छोटीछोटी बात पर मुझे मारते थे. मेरी मां मुझे बचाने आती, तो पिता उसे भी पीट देते.

‘‘सौतेले पिता मेरी मां को तो रखना चाहते थे, पर मुझे नहीं. इसलिए मेरी मां ने मेरी शादी करने की सोची.

‘‘मैं बहुत ही खूबसूरत और गोरी थी, इसलिए जैसे ही मैं 10 साल की हुई, मां ने मेरी शादी कर दी और मुझे  ससुराल भेज दिया.

‘‘मेरा पति मुझ से उम्र में 10 साल बड़ा था, ऊपर से दुनिया के सारे ऐब उस में थे. मैं जब 13 साल की थी, तभी मुझे एक बेटी हुई.

‘‘बेटी होने से मेरा पति बहुत चिढ़ गया और मुझे दूसरे मर्दों के साथ सोने के लिए मजबूर करने लगा, ताकि उस की नशे की जरूरत को मैं पूरा कर सकूं. पर इस गलत काम के लिए मैं तैयार नहीं थी. इसलिए मारपीट कर के मुझे डराताधमकाता, लेकिन मैं इस के लिए तैयार नहीं हुई.

‘‘इस बीच 14 साल की उम्र में मुझे दूसरी बेटी हो गई. अब तो उस के जुल्म मुझ पर बहुत बढ़ गए, इस से घबरा कर मैं अपनी दोनों बेटियों के साथ मायके चली आई. वहां भी मुझे चैन नहीं मिला, क्योंकि सौतेले पिता मुझे देखते ही गुस्से में अपना आपा खो बैठे, जिस पर मां ने उन्हें समझाया.’’

गेंदा बात करतेकरते बीच में अपने आंसू भी पोंछती जाती थी. तभी केशव को उस की आपबीती सुनतेसुनते कुछ सुध आई, तो उस ने उठ कर गेंदा को एक गिलास पानी पीने को दिया और उस के सिर पर हाथ फेरा.

उस के बाद गेंदा ने आगे बताया, ‘‘मैं जब मायके पहुंची, तो 5-7 दिन में ही मेरा पति मुझे लेने आ गया और मां को भरोसा दिलाया कि अब मुझे अच्छे से रखेगा. मां भी क्या करतीं. मुझे मेरे पति के साथ वापस भेज दिया.

‘‘कुछ दिन तक तो वह ठीक रहा, फिर वही जिद करने लगा, पराए मर्दों के साथ सोने के लिए. मैं मार खाती रही, पर गलत काम नहीं किया.

‘‘मैं जब 16 साल की थी, तब तीसरी बार मां बनी. इस बार बेटा हुआ था. मेरे 3-3 छोटे बच्चे, ऊपर से मेरा कमजोर शरीर, लेकिन उसे मुझ पर जरा भी तरस नहीं आया, इसलिए मैं बहुत बीमार हो गई.

‘‘मेरी बीमारी से चिढ़ कर मेरा पति मुझे मेरे मायके छोड़ आया. जब मैं मायके आई, तो इस बार सौतेले पिता का बरताव बड़ा अच्छा था, पर मैं क्या जानती थी कि इस अच्छे बरताव के पीछे उन का कितना काला मन है.

‘‘मेरे सौतेले पिता ने 40 हजार रुपए में मुझे बेच दिया था और वह आदमी पैसे ले कर आने वाला था. यह बात मुझे गांव की एक चाची ने बताई. मेरे पास ज्यादा समय नहीं था.

‘‘फिर भी मैं गांव की पुलिस चौकी पर गई और वहां जा कर थानेदार साहब को अपनी बीमारी के बारे में बताया और उन से विनती की कि मेरी बेटियों को कहीं अनाथ आश्रम में रखवा दें.

‘‘वहां के थानेदार भले आदमी थे. उन्हें मेरी हालत दिख रही थी, इसलिए उन्होंने मुझे भरोसा दिया कि तुम इस फार्म पर दस्तखत कर दो, मैं तुम्हारी दोनों बेटियां वहां रखवा दूंगा. जब तुम्हें उन से मिलना हो, वहां जा सकती हो.

‘‘अपनी दोनों बेटियां उन्हें सौंप कर मैं भाग कर अपने पति के पास आ गई. मुझे देख कर मेरा पति बोला, ‘‘आ गई मायके से. वहां तेरे आगे किसी ने दो रोटी नहीं डाली.

‘‘बेटियों के बारे में न उस ने पूछा और न मैं ने बताया. मैं बहुत बीमार थी, इसलिए बेटे को संभाल नहीं पा रही थी. वह बेचारा भी ढंग से देखभाल नहीं होने के चलते इस दुनिया से चला गया.

‘‘मैं अकेली रह गई थी. मैं ने मन में सोचा कि ऐसे पति के साथ रहने से अच्छा है कि कहीं दूसरे गांव में चली जाऊं और मजदूरी कर के अपना पेट पालूं. मेरे पति को पता नहीं कैसे मेरे घर छोड़ने की बात पता चल गई और उस ने चूल्हे पर रखी गरम चाय गुस्से में मेरे चेहरे पर फेंक दी और मुझे एक ठोकर मारता हुआ बोला, ‘अब निकल जा मेरे घर से. तेरा चेहरा ऐसा बिगाड़ दिया है मैं ने कि कोई तेरी तरफ देखेगा भी नहीं.’

‘‘गरम चाय से मैं बुरी तरह जल गई थी. उस ने मुझे घसीटते हुए धक्का मार कर बाहर कर दिया. मैं दर्द से बेहाल  सरकारी अस्पताल में गई. वहां मेरी बुरी हालत देख डाक्टर ने भरती कर लिया.

‘‘जब मैं ठीक हुई, तो पति का गांव छोड़ कर इस गांव में रहने लगी, पर यहां भी मुझे चैन नहीं है. गांव के लफंगे  कहते हैं कि हमें तेरे चेहरे से क्या मतलब, तू अपना घूंघट तो निकाल कर रखती है.

‘‘जब मैं ने सख्ती से दुत्कार दिया, तो वे मुझे डायन कह कर बदनाम कर रहे हैं. गांव में किसी के भी यहां मौत होने पर मुझे ही इस का जिम्मेदार माना जाता है.’’

केशव ने बड़े ही अपनेपन से कहा, ‘‘गेंदा, तुम कहीं नहीं जाओगी. तुम यहीं मेरे पास रहोगी.’’

केशव के ये शब्द सुन कर गेंदा रोती हुई केशव के पैरों से लिपट कर बोली, ‘‘साहब, आप बहुत अच्छे हैं. मुझे बचा लो. इस गांव के लोग मुझे डायन कहते हैं. हो सकता है कि गांव के किसी ऊंची पहुंच वाले के यहां जवान मौत हो जाए, तो ये मुझे मार ही डालेंगे.’’

केशव ने कहा, ‘‘गेंदा, तुम डरो मत. तुम्हें कुछ नहीं होगा.’’

धीरेधीरे गेंदा को केशव के घर में काम करतेकरते एक साल बीत गया, और सबकुछ ठीकठाक सा चल रहा था. शायद तूफान से पहले की शांति जो केशव समझ नहीं पाए.

एक दिन गेंदा काम पर नहीं आई, तो केशव ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. सोचा, बीमार होगी या बेटियों से मिलने चली गई होगी.

शाम के तकरीबन 4 बजे के करीब तोताराम दौड़ता हुआ आया. वह बहुत डरा हुआ था. उस ने केशव से कहा, ‘‘साहब, जल्दी चलो. गांव के लोग गेंदा को डायन कह कर धमका रहे हैं और उसे जिंदा जलाने जा रहे हैं. क्योंकि गांव के सरपंच का जवान बेटा मर गया है.

‘‘मरा तो वह शराब पी कर है साहब, पर लांछन गेंदा पर लगा रहे हैं कि यह डायन सरपंच के जवान बेटे को खा गई.’’

यह सुन कर केशव हैरान रह गए. उन्होंने सब से पहले पुलिस को फोन किया और तुरंत घटना वाली जगह पर पहुंचने की गुजारिश की और खुद भी वहां चल दिए. वहां का दिल दहला देने वाला सीन देख कर केशव गुस्से से कांपने लगे. तब तक पुलिस भी वहां आ गई थी.

गांव के आदमीऔरत चीखचीख कर गेंदा को डायन कह रहे थे और उसे जिंदा जलाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पुलिस को देख कर सभी ठिठक गए. तब तक केशव ने दौड़ कर गेंदा को अपनी तरफ खींचा, जो अपनी जान बचाने के लिए डरीसहमी इधरउधर दौड़ रही थी.

केशव ने चिल्ला कर औरतों से कहा, ‘‘तुम औरतों को शर्म आनी चाहिए कि इस बेकुसूर औरत को जिंदा जलाया जा रहा है. अगर तुम्हारी बेटी को कोई डायन कहे और उसे जिंदा जलाए, तो तुम्हें कैसा लगेगा? सरपंच का बेटा छोटी उम्र ले कर आया था, तो यह क्या करे?

‘‘गेंदा ने गांव के आदमियों की गलत बात नहीं मानी, तो उसे डायन कह कर बदनाम कर दिया. यह औरत हिम्मत के साथ इस समाज से अकेले लड़ रही है और अपनी इज्जत बचाए हुए है.

‘‘खबरदार, जो किसी ने इसे हाथ भी लगाया. आज से यह मेरी बहन है और मेरे साथ ही रहेगी. मैं जहां जाऊंगा, यह मेरे साथ ही रहेगी,’’ कह कर केशव उसे अपने साथ ले आए.

वैसे, उस दिन सुकुमा में शाम होने को थी, पर गेंदा की जिंदगी में छाया अंधेरा केशव की हिम्मत से दूर हो गया था.

परवरिश : सोचने पर क्यों विवश हुई सुजाता

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अपनी मंजिल: क्या था सुदीपा का फैसला

“मां, मैं आप से बारबार कह चुकी हूं कि अभी शादी नहीं करूंगी. मुझे अभी आगे पढ़ाई करनी है,” सुदीपा ने मां के समीप जा कर बड़े प्यार से कहा.

“सुदीपा बेटा, क्या खराबी है लड़के में? इंजीनियर है, ऊंचे खानदान और रसूख वाला है. तेरे पापा के मित्र का लड़का है और अच्छी आमदनी है उस की. शुक्र मनाओ कि जिस शानदार और आरामदायक जिंदगी जीने के लिए अधिकतर लड़कियां केवल सपने देखती आई हैं, वे सारी खुशियां तुम्हें बिना मांगे ही मिल रहा है. 2 हजार गज में बनी शानदार कोठी है उन की…

“दसियों नौकरचाकर वहां एक आवाज पर हाथ बांधे खडे रहते हैं. इतने योग्य और गुणवान लड़के का रिश्ता खुद चल कर तुम्हारे पास आया है. सारे सुख व ऐश्वर्य हैं उस घर में. और क्या चाहिए तुम्हें…” मां ने नाराजगी जाहिर करते हुए सुदीपा के गाल पर हलकी सी चपत लगाई .

मां के गले से लिपटती सुदीपा बोली,”मेरी प्यारी मां, मुझे आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई करनी है अभी. मुझे अभी योग्य शिक्षिका बनना है, जिस से कि अपने भीतर समाए ज्ञान को अन्य को बांट सकूं,” सुदीपा मां को मनाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही थी, क्योंकि मां के इनकार करने पर ही यह रिश्ता टल सकता था.

“सुदीपा, तुम एक बार उस लड़के से मिल कर देख तो लो,” सुदीपा को विचार में डूबा देख कर मां ने उस पर आखिरी बात छोड़ते हुए कहा.

एमए की हुई सुदीपा गोरीचिट्टी, लंबी, छरहरी काया वाली आकर्षक युवती थी. संगीत विशारद में विशेष योगदान हेतु गोल्ड मैडलिस्ट थी. उस के पड़ोसी, परिचित, नातेरिश्तेदार आदि सभी सुदीपा के सुंदर व्यक्तित्व एवं हंसमुख व्यवहार की प्रशंसा किए
बिना नहीं रहते थे. जैसे अधिकतर लोग रूपसौंदर्य और सुगढ़ता को देख कर अनायास ही कह उठते हैं कि कुदरत ने इसे बहुत फुरसत में गढ़ा होगा, ऐसे ही रूपवती सुदीपा जब गजगामिनी चाल की मंथर गति से चलती थी तब अनेक चाहने वाले उसे पाने की तमन्ना रखते थे.

मन ही मन उसे चाहने वाले आहें भरते थे और सुदीपा से मिलने के बहाने ढूंढ़ा करते थे. वह तो अपनेआप में खुश रहने वाली मस्त लड़की थी. सुदीपा की कमर तक लहराते बाल बिजलियां गिराती थीं. पतलीपतली और लंबी उंगलियां जब सितार पर राग छेड़तीं तो उसे देखनेसुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते.

मां का कहना मान कर एक दिन सुदीपा समीर नाम के उस लड़के से मिली. वह लड़का उसे सुंदर लगा. रूपरंग, व्यक्तित्व के अनुसार वह सुदर्शन नवयुवक था. 2-4 मुलाकातों के बाद सुदीपा को समीर पसंद आ गया था. संयोग से तभी सुदीपा को कालेज में अध्यापिका की नौकरी भी मिल गई थी.

सुदीपा के मम्मीपापा सगाई कर के ही उसे नौकरी पर जाने देने की जिद कर रहे थे. इसलिए मम्मीपापा का दिल रखने के लिए उस ने सगाई की हामी भर दी. नौकरी पर जाने से पहले ही दोनों की धूमधाम से सगाई हो गई थी.

कोमल कुआंरे मन में सुंदर जीवन के अनेक रंगीन सपने सजाए सुदीपा कालेज में पहुंच गई. वह दिल्ली शहर की एक सोसायटी फ्लैट में किराए पर रहने लगी. सगाई हो जाने के कारण समीर काम के सिलसिले में जब दिल्ली आता तो सुदीपा से मिलने चला आता था. दोनों तरफ से रिश्ते की डोर मजबूत हो जाए, एकदूसरे को अच्छी तरह से जानसमझ लें,
इस के लिए वे किसी रेस्तरां में कौफी पीने या कभी डिनर करने चले जाते थे. कभीकभी कोई अच्छी और नई मूवी साथ देखने के लिए मौल भी चले जाते थे.

ऐसे ही उन के बीच प्यार भरी मेलमुलाकातों का सिलसिला जारी था. अब सुदीपा और समीर के बीच घनिष्ठता भरे संबंध पनपने लगे थे. मगर इधर कुछ दिनों से सुदीपा ने एहसास किया था कि समीर में शिष्टाचार और विनम्रता जैसे संस्कारी गुण बहुत कम थे. उस ने कई बार समीर को फोन पर अपनी बात मनवाने के लिए सामने वाले को दबंग टाइप से हड़काते हुए भी सुना था.सुदीपा के साथ होने पर भी लापरवाह सा समीर फोन पर अकसर गालीगलौच कर दिया करता था. सुदीपा आधुनिक और खुले विचारों को दिल में जगह देने वाली संस्कारी और मृदुभाषी लडकी थी.

एक दिन सुदीपा कुछ खरीदारी कर के सोसायटी में प्रवेश कर रही थी. उस के दोनों हाथों में सामान था कि तभी अचानक हाई हील सैंडिल के कारण उस का संतुलन बिगड़ गया और वह डगमगा कर नीचे गिर पड़ी.तभी अचानक एक हाथ ने सहारा दे कर उसे उठाया,”अरे, आप को तो काफी चोटें लगी हैं. मैं आप का सामान समेट देता हूं…” अपने सामने गोरेचिट्टे, लंबे कद के सुंदर नाकनक्श वाले लड़के की आवाज सुन कर वह अचकचा गई.

उस की कुहनियां छिल गई थीं. पैर में मोच आ गई थी. उस लड़के ने अपने कंधे पर उस का हाथ पकड़ कर सहारा दिया,”आइए, मैं आप को कमरे तक छोड़ देता हूं,” वह चुपचाप लगंडाते हुए उस के साथ चल पड़ी.

टेबल पर सामान रख कर लड़के ने कहा,”मैं फस्ट ऐड बौक्स ला कर पट्टी बांध देता हूं,” अब वह लड़का ड्रैसिंग कर रहा था.

वह अब तक स्वयं को काफी संभाल चुकी थी. अकेले कमरे में अनजान लड़के के हाथ में अपना हाथ देख कर सुदीपा के मन को भारतीय संस्कार और परंपराएं घेरने लगीं. लेकिन वह लड़का बड़ी सहजता से उस के हाथ पर दवा लगा कर पट्टी बांध रहा था. उस लड़के के स्पर्श से सुदीपा असहज और रोमांचित हो रही थी,”अब तुम आराम करो मैं चाय बना लाता हूं,” थोड़ी देर में वह ट्रै में चाय और बिस्कुट ले आया.

वे दोनों कुछ देर एकदूसरे के परिवार के बारे में बात करते रहे. चलते समय उस ने एक गहरी नजर डाली और अपना फ्लैट नंबर बता कर बोला,”कोई भी जरूरत हो तो मुझे बता देना. संकोच मत करना…”

जब तक उस के पैर की मोच ठीक नहीं हो गई तब तक वह रोज उस के लिए कभी चाय बना कर लाता, तो कभी सैंडविच ले आता. बाहर से एकसाथ खाना भी और्डर कर देता फिर दोनों साथ ही खाना खाते.

सुदीपा के के मन में प्रेम का पहला एहसास फूटा था. एक अनजान कोमल स्पर्श दिल में तरंगित हो कर रमने लगा था. वह अपने घरसमाज की वर्जनाएं जानती थी. संस्कारित परंपराओं के बंधन में बंधने के बाद भी रूमानियत से भीगा एहसास बंजर मरूस्थल में हरा होने लगा था. समीर का साथ पा कर उस ने कभी ऐसा स्पर्श, स्नेह व अपनेपन का एहसास नहीं जाना था.

सुदीपा के मन की भीतरी परतों में शेखर के प्रति रोमांस का बीज पनपने लगा. शेखर बहुत अपनेपन से उस की देखभाल कर रहा था. उस का साथ मिलने के कारण उसे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई थी .
अब वह ठीक हो कर कालेज जाने लगी थी.

रात के 8 बज रहे थे. गुलाबी रंग की कैप्री के साथ मैंचिग टौप में लंबी खुली केशराशि के बीच सुदीपा ऐसी लग रही थी जैसे श्यामल घटाओं के बीच दूधिया चांद खिला हो. उस ने मैंचिग ईयर टौप्स के साथ गले में छोटे मोतियों की माला पहनी थी. आज वह बहुत खुश थी. उस का गुलाब की तरह खिला खिला रूप सौंदर्य चित्ताकर्षक था. खुद को आईने में देख कर वह स्वयं ही लजा गई. वह रसोईघर में जा रही थी कि अचानक से बेल बजी. दरवाजा खोल कर देखा तो सामने समीर खडा था,”अरे, समीर तुम?” अकस्मात समीर को सामने देख कर वह अचकचा गई.

“हां मेरी जान, तुम्हारा समीर…” कहतेकहते समीर ने उसे बांहों में उठा कर 3-4 गोल चक्कर से घुमा दिया.

“आज तो तुम बेहद खूबसूरत और रूप की रानी लग रही हो. किस पर बिजली गिराओगी,” समीर ने रोमांटिक अंदाज में कहते हुए खींच कर उसे अपने सीने से लगाना चाहा.

तेज शराब के भभके से सुदीपा का तनमन जलने लगा. वह चिहुंक कर दूर जा खडी हुई. समीर ने आगे बढ़ कर उस की कलाई पकड़ ली. उस ने हाथ छुड़ा कर दूर जाने का प्रयत्न किया, लेकिन समीर की पकड़ से छूट नहीं सकी. समीर जोरजबरदस्ती करने लगा. यों अचानक ऐसे किसी हालात का सामना करना पड़ेगा, उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था.सुदीपा का दिलदिमाग सुन्न हो गया. समीर की बांहों में कसमसा कर दरवाजा खोलते हुए बोली,”समीर, अभी तुम होश में नहीं हो, जाओ.अभी होटल चले जाओ और कल आना.”

“क्यों, कल क्यों मेरी जान, जो होना है आज ही होने दो न. अब तो हम दोनों की शादी भी होने वाली है. इसलिए तुम तो मेरी हो.”

शादी होने वाली है, हुई तो नहीं है न.
फिलहाल, मैं तुम से कोई बात नहीं करना चाहती. प्लीज, तुम यहां से चले जाओ,” सुदीपा ने संयत स्वर में उसे समझाने की कोशिश की.

मगर अपनी मनमरजी पर उतारू समीर ने उस की एक नहीं सुनी. पुरुषत्व के दर्प में चूर, शराब के नशे में मदहोश, समीर के भीतर का जानवर जनूनी हो गया. अपने मंसूबे पूरे न होते देख अब समीर बदतमीजी पर उतर आया. उस के हाथ में सुदीपा का टौप आ गया. जबरदस्ती खींचते हुए टौप चर्रचर्र… कर फटता चला गया.

“यू ब्लडीफूल, तेरी इतनी हिम्मत. तू मुझे मना करती है… अरे, तेरे जैसी पचासों लड़कियां मेरे आगेपीछे घूमती हैं. तू समझती क्या है अपनेआप को…मैं जिस चीज पर हाथ रख देता हूं, वह मेरी हो जाती है…” नशे में समीर की लड़खड़ाती जबान से अंगार बरसने लगे.

जैसे ही वह सुदीपा को पकड़ने के लिए बढ़ा नशे की झोंक में लहराते हुए पीछे को गिर पड़ा. अपनी अस्मिता पर प्रहार होता देख सुदीपा रणचंडी बन गई. उस में न जाने कहां से इतनी शक्ति आ गई कि त्वरित ताकत से मेज पर रखा चाकू हाथ में ले कर डगमगाते समीर को पूरी शक्ति से बाहर धकेल दिया और बिजली की फुरती से दरवाजा बंद कर लिया. समीर बहुत देर तक दरवाजे पर आवाजें देता रहा, लेकिन उस के कान जैसे बहरे हो चुके थे. वह दरवाजे से लगी फूटफूट कर रोने लगी.

वह स्वयं को संयत कर उठी और कटे पेड़ की भांति पलंग पर गिर पड़ी. बिस्तर पर लेटी तो लगा जैसे समीर की ओछी सोच में लिपटे हाथ लंबे हो कर उस की ओर बढ़ रहे हैं. उस ने घबरा कर आंखे बंद कीं तो समीर की लाल घूरती आंखें देख सूखे पत्तों सी कांपने लगी.

सूरज चढ़ आया था. पूरी रात आंखों में कट गई. वह उस दिन को कोस रही थी जब समीर के साथ उस की सगाई हुई थी. लगाव रूमानियत से भीगे मीठे एहसास का प्रेममयी भाव सोच कर शेखर का चेहरा उस की आंखों के समक्ष तैर उठा. उसे इन दोनों की जेहनी सोचसमझ में जमीनआसमान का फर्क नजर आ रहा था.

मोबाइल की घंटी बजने पर न चाहते हुए भी देखा तो मां का फोन था,”मां खुशी से चहकते हुए बता रही थीं,”बेटा, सुबह तुम्हारे पापा के पास समीर के पापा का फोन आया था. वह इसी महीने शादी करने के लिए जोर डाल रहे हैं. कहते हैं कि अगले माह समीर विदेश जा रहा है. वह जल्दी ही तुम दोनों को विवाह बंधन में बांधना चाहते हैं.”

“नहींनहीं… मां, मैं समीर से शादी नहीं करूंगी. मैं उस की शक्ल भी देखना नहीं चाहती. आप मुझे समीर के साथ विवाह की सूली पर मत टांगना. मैं जी नहीं सकूंगी,” कहतेकहते उस की रुलाई फूट पड़ी.

“क्या बात है बेटा? तुम बहुत परेशान लग रही हो,” मां के स्वर में चिंता झलकने लगी.

“हां मां, यहां बहुत कुछ घटा है,” और
उस ने मां को रात की सारी घटना बता दी,”मां, पत्नी का दिल जीतने के लिए पति के मन में भावनात्मक लगाव होता है. पर समीर केवल वासना का लिजलिजा कीडा़ निकला.उसे बस मेरा जिस्म चाहिए था, जिसे वह जबरदस्ती हासिल कर के अपनी मर्दानगी की मुहर लगाना चाहता था. उसे मेरी खुशियों से कोई सरोकार नहीं है…

“मेरी अपनी मंजिल समीर कभी नहीं हो सकता,” कह कर वह बच्चों की तरह बिलखने लगी.

सारी सचाई जान कर मां की आंखों से समीर के गुणी और लायक वर होने का परदा हट चुका था,”अच्छा सुदीपा… बेटा… तू रोना बंद कर और बिलकुल चिंता मत कर. अच्छा ही हुआ कि हमें उस की औकात शादी से पहले पता चल गई,”मां ने बेटी को धीरज बंधाया,” मैं और पापा आज तुम्हारे पास आ रहे हैं. मैं हूं न… तुम्हारी मां अब सब संभाल लेगी…”

सुदीपा ने इत्मीनान की सांस ले कर फोन रख दिया.

ऊपर तक जाएगी : कैसे हुआ ललन का काम

.‘‘बाबूजी, मुझ से खेती न होगी. थोड़े से खेत में पूरा परिवार लगा रहे, फिर भी मुश्किल से सब का पेट भरे.

‘‘मैं यह काम नहीं करूंगा. मैं तो हरि काका के साथ मछली पकड़ूंगा,’’ कहता हुआ ललन मछली रखने की टोकरी सिर पर रख कर घर से बाहर निकल गया.

ललन के बाबा बड़बड़ाए, ‘नालायक, कभी नदी में डूब कर मर न जाए.’

‘पहाडि़यों से उतरती नदी की धारा. नदी के किनारे देवदार के पेड़, कलकल करती नदियों का मधुर संगीत… कितना अच्छा नजारा है यह,’ ललन बड़बड़ाया, ‘अभी एक धमाका होगा और ढेर सारी मछलियां मेरी टोकरी में भर जाएंगी. एक घंटे में सारी मछलियां मंडी में बेच कर घर पहुंच जाऊंगा और मोबाइल फोन पर फिल्में देखूंगा… मगर यह ओमप्रकाश कहां मर गया…’

तभी ललन ने ओमप्रकाश को ढलान पर चढ़ते देखा तो वह खुश हो गया.

ललन ने जल्दी से थैले में से कांच की एक बोतल निकाली और उस में कुछ बारूद जैसी चीज भरी. दोनों नदी के किनारे पहुंच कर एक बड़े से पत्थर पर बैठ गए और पानी में चारा डाल कर मछलियों के आने का इंतजार करने लगे.

दरअसल, दोनों बोतल बम बना कर जहां ढेर सारी मछलियां इकट्ठा होतीं, वहीं पानी में फेंक देते, जिस से तेज धमाका हो जाता और मछलियां घायल हो कर किनारे पर आ जातीं. दोनों झटपट उन्हें इकट्ठा कर मंडी में बेच देते, जिस से तुरंत अच्छी आमदनी हो जाती.

‘‘जब मछलियां इकट्ठा हो जाएंगी, तो मैं इशारा कर दूंगा… तू बम फेंक देना,’’ ओमप्रकाश बोला.

हरि काका इसे कुदरत के खिलाफ मानते थे. उन्हें जाल फैला कर मछली पकड़ना पसंद था, इसीलिए ललन उन के साथ मछली पकड़ने नहीं जाता था. उसे ओमप्रकाश का तरीका पसंद था.

अभी भी इक्कादुक्का मछलियां ही चारा खाने पहुंची थीं. शायद बम वाले तरीके को मछलियों ने भांप लिया था.

नदी के किनारे एक बड़ा सा पत्थर था, जिस का एक हिस्सा पानी में डूबा हुआ था. ओमप्रकाश मछलियों के न आने से निराश हो कर पत्थर पर लेट गया और आसमान की ओर देखने लगा.

ललन थोड़ी दूरी पर दूसरे पत्थर पर खड़ा था एक बोतल बम हाथ में लिए. वह ओमप्रकाश के इशारे का इंतजार कर रहा था.

तभी ओमप्रकाश को सामने की पहाड़ी की तरफ से आता एक बाज दिखा, जिस के पंजों में कुछ दबा था.

‘‘अरे, बाज के पंजों में तो सांप है,’’ ज्यों ही बाज ओमप्रकाश के ऊपर पहुंचा, उस ने पहचान लिया. वह  चिल्लाया, ‘‘ललन, बाज के पंजों में सांप…’’

ललन ने तुरंत ऊपर निगाह उठाई तो देखा कि वह सांप बाज के पंजों से छूट कर नीचे गिर रहा था. जब तक वह कुछ समझ पाता, सांप ओमप्रकाश पर गिर गया और उसे डस लिया.

डर के मारे ललन की चीख निकल गई. वह संभलता, इस से पहले बोतल बम उस के हाथ से छूट कर गिर पड़ा.

तभी जोर का धमाका हुआ. ललन को उस धमाके से एक तेज झटका लगा और ललन का बायां हाथ उस के शरीर से टूट कर दूर जा गिरा.

जब होश आया तो ललन ने खुद को अस्पताल के बिस्तर पर पाया. बोतल बम ने उस का हाथ छीन लिया था.

ललन ने ओमप्रकाश के बारे में पूछा. पता चला कि वह सांप के डसने से मर चुका था.

ललन के घाव भरने में महीनाभर लग गया. लेकिन अपना एक हाथ और अपने दोस्त ओमप्रकाश को खोने का दुख उसे बहुत सताता था.

‘मैं कुदरत के खिलाफ काम कर रहा था, उसी की सजा है यह. हरि काका ठीक कहते थे. मैं जिंदा बच गया. मुझे गलतियां सुधारने का मौका मिल गया. लेकिन बेचारा ओमप्रकाश…’ एक सुबह ललन यह सब सोच रहा था कि उस के बाबा उस से बोले, ‘‘ललन, घर में खाने को नहीं है. तुम्हारे इलाज में सब पैसा खर्च हो गया. अब कुछ कामधंधे की सोचो, नहीं तो एक दिन हम सब भूख से मर जाएंगे.’’

बाबा की बात से ललन को ध्यान आया कि कोई कामधंधा शुरू किया जाए, लेकिन एक हाथ से वह क्या कर सकता था?

एक दिन गांव के मुखिया से ललन को मालूम हुआ कि सरकार विकलांग लोगों को कामधंधा शुरू करने के लिए आसानी से कम ब्याज पर लोन देती है. उस ने विकलांगता का प्रमाणपत्र बनवा कर लोन के लिए अर्जी दे दी.

एक दिन बैंक से ललन को बुलावा आया. वह खुश हो गया कि उसे आज लोन मिल जाएगा और वह 2 भैंसें खरीद कर दूध बेचने का धंधा शुरू कर देगा.

‘‘लोन का 10 फीसदी मुझे पहले देना होगा तभी लोन मिलेगा,’’ बैंक मुलाजिम ने उस के कान में कहा.

‘‘यह क्या अंधेरगर्दी है, तुम लोगों को तनख्वाह नहीं मिलती क्या…’’ ललन को गुस्सा आ गया.

‘‘यहां का यही कायदा है,’’ बैंक मुलाजिम ललन को समझाने लगा, ‘‘भैया, गुस्सा क्यों करते हो? मैं कोई अकेला थोड़े ही न यह पैसा लूंगा. सब का हिस्सा बंटा होता है.’’

मायूस ललन घर की ओर लौट पड़ा.

अगले दिन ललन ने कुछ पैसों का जुगाड़ किया और कलक्टर के दफ्तर पहुंच गया.

‘‘मुझे साहब से जरूरी बात करनी है,’’ ललन ने संतरी से कहा.

संतरी ने बारी आने पर ललन को साहब के कमरे में भेज दिया.

‘‘कहो, क्या बात है?’’ कलक्टर साहब ने ललन की ओर देख कर पूछा.

ललन ने तुरंत अपने गमछे में बंधे रुपयों को निकाल कर टेबल पर रख दिया और बोला, ‘‘साहब, मैं गरीब हूं. आप अपना यह हिस्सा रख लीजिए और मेरा लोन पास कर दीजिए.’’

‘‘किस ने कहा कि मैं काम कराने के बदले पैसे लेता हूं?’’ कलक्टर ने पूछा.

ललन ने बैंक मुलाजिम की बात बताते हुए कहा, ‘‘साहब, उस ने कहा था कि पैसा ऊपर तक जाएगा. इसीलिए मैं आप का हिस्सा देने आ गया.’’

‘‘ठीक है, तुम ये पैसे उठा लो और घर जाओ. तुम्हें लोन मिल जाएगा,’’ कलक्टर ने कहा.

‘‘अच्छा साहब,’’ कह कर ललन  कमरे से बाहर निकल गया.

तीसरे दिन एक सूटबूट वाला आदमी ललन को खोजता हुआ उस के घर आया. ललन को रुपयों का पैकेट पकड़ाते हुए बोला, ‘‘ऊपर से आदेश है, लोन के रुपए सीधे तुम्हारे घर पहुंचाने का, इसीलिए मैं आया हूं. ये पैसे लो.

‘‘और हां, बैंक का कोई भी काम हो तो मुझ से मिलना. मैं बैंक मैनेजर हूं. मैं ही तुम्हारा काम कर दूंगा.’’

वह बैंक मुलाजिम, जिस ने ललन से घूस मांगी थी, अब जेल में था. ललन कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ऊपर के लोगों ने बिना रुपए लिए उस का काम कैसे कर दिया?

किसना : जिस्म बेचकर बना दी बेटी की जिंदगी

झारखंड का एक बड़ा आदिवासी इलाका है अमानीपुर. जिले के नए कलक्टर ने ऐसे सभी मुलाजिमों की लिस्ट बनाई, जो आदिवासी लड़कियां रखे हुए थे. उन सब को मजबूर कर दिया गया कि वे उन से शादी करें और फिर एक बड़े शादी समारोह में उन सब का सामूहिक विवाह करा दिया गया. दरअसल, आदिवासी बहुल इलाकों के इन छोटेछोटे गांवों में यह रिवाज था कि वहां पर कोई भी सरकारी मुलाजिम जाता, तो किसी भी आदिवासी घर से एक लड़की उस की सेवा में लगा दी जाती. वह उस के घर के सारे काम करती और बदले में उसे खानाकपड़ा मिल जाता. बहुत से लोग तो उन में अपनी बेटी या बहन देखते, मगर उन्हीं में से कुछ अपने परिवार से दूर होने के चलते उन लड़कियों का हर तरह से शोषण भी करते थे.

वे आदिवासी लड़कियां मन और तन से उन की सेवा के लिए तैयार रहती थीं, क्योंकि वहां पर ज्यादातर कुंआरे ही रहते थे, जो इन्हें मौजमस्ती का सामान समझते और वापस आ कर शादी कर नई जिंदगी शुरू कर लेते. मगर शायद आधुनिक सोच को उन पर रहम आ गया था, तभी कलक्टर को वहां भेज दिया था. उन सब की जिंदगी मानो संवर गई थी.

मगर यह सब इतना आसान नहीं था. मुखिया और कलक्टर का दबदबा होने के चलते कुछ लोग मान गए, पर कुछ लोग इस के विरोध में भी थे. आखिरकार कुछ लोग शादी के बंधन में बंध गए और लड़कियां दासी जीवन से मुक्त हो कर पत्नी का जीवन जीने लगीं.

मगर 3 साल बाद जब कलक्टर का ट्रांसफर हो गया, तब शुरू हुआ उन लड़कियों की बदहाली का सिलसिला. उन सारे मुलाजिमों ने उन्हें फिर से छोड़ दिया और  शहर जा कर अपनी जाति की लड़कियों से शादी कर ली और वापस उसी गांव में आ कर शान से रहने लगे.

तथाकथित रूप से छोड़ी गई लड़कियों को उन के समाज में भी जगह नहीं मिली और लोगों ने उन्हें अपनाने से मना कर दिया. ऐसी छोड़ी गई लड़कियों से एक महल्ला ही बस गया, जिस का नाम था ‘किस बिन पारा’ यानी आवारा औरतों का महल्ला.

उसी महल्ले में एक ऐसी भी लड़की थी, जिस का नाम था किसना और उस से शादी करने वाला शहरी बाबू कोई मजबूर मुलाजिम न था. उस ने किसना से प्रेम विवाह किया था और उस की 3 साल की एक बेटी भी थी. पर समय के साथ वह भी उस से ऊब गया, तो वहां से ट्रांसफर करा कर चला गया. किसना को हमेशा लगता था कि उस की बेटी को आगे चल कर ऐसा काम न करना पड़े. वह कोशिश करती कि उसे इस माहौल से दूर रखा जाए.

लिहाजा, उस को किसना ने दूसरी जगह भेज दिया और खुद वहीं रुक गई, क्योंकि वहां रुकना उस की मजबूरी थी. आखिर बेटी को पढ़ाने के लिए पैसा जो चाहिए था. बदलाव बस इतना ही था कि पहले वह इन लोगों से कपड़ा और खाना लेती थी, पर अब पैसा लेने लगी थी. उस में से भी आधा पैसा उस गांव की मुखियाइन ले लेती थी. उस दिन मुखियाइन किसना को नई जगह ले जा रही थी, खूब सजा कर. वह मुखियाइन को काकी बोलती थी. वे दोनों बड़े से बंगले में दाखिल हुईं. ऐशोआराम से भरे उस घर को किसना आंखें फाड़ कर देखे जा रही थी.

तभी किसना ने देखा कि एक तगड़ा 50 साला आदमी वहां बैठा था, जिसे सब सरकार कहते थे. उस आदमी के सामने सभी सिर झुका कर नमस्ते कर रहे थे.

उस आदमी ने किसना को ऊपर से नीचे तक घूरा और फिर रूमाल से मोंगरे का गजरा निकाल कर उस के गले में डाल दिया. वह चुपचाप खड़ी थी.

सरकार ने उस की आंखों में एक अजीब सा भाव देखा, फिर मुखियाइन को देख कर ‘हां’ में गरदन हिला दी.

तभी एक बूढ़ा आदमी अंदर से आया और किसना से बोला, ‘‘चलो, हम तुम्हारा कमरा दिखा दें.’’

किसना चुपचाप उस के पीछे चल दी. बाहर बड़ा सा बगीचा था, जिस के बीचोंबीच हवेली थी और किनारे पर छोटे, पर नए कमरे बने थे.

वह बूढ़ा नौकर किसना को उन्हीं बने कमरों में से एक में ले गया और बोला, ‘‘यहां तुम आराम से रहो. सरकार बहुत ही भले आदमी हैं. तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है…’’

किसना ने अपनी पोटली वहीं बिछे पलंग पर रख दी और कमरे का मुआयना करने लगी.

दूसरे दिन सरकार खुद ही उसे बुलाने कमरे तक आए और सारा काम समझाने लगे. रात के 10 बजे से सुबह के 6 बजे तक उन की सेवा में रहना था.

किसना ने भी जमाने भर की ठोकरें खाई थीं. वह तुरंत समझ गई कि यह बूढ़ा क्या चाहता है. उसे भी ऐसी सारी बातों की आदत हो गई थी.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘हम अपना काम बहुत अच्छी तरह से जानते हैं सरकार, आप को शिकायत का मौका नहीं देंगे.’’

कुछ ही दिनों में किसना सरकार के रंग में रंग गई. उन के लिए खाना बनाती, कपड़े धोती, घर की साफसफाई करती और उन्हें कभी देर हो जाती, तो उन का इंतजार भी करती. सरकार भी उस पर बुरी तरह फिदा थे. वे दोनों हाथों से उस पर पैसा लुटाते.

एक रात सरकार उसे प्यार कर रहे थे, पर किसना उदास थी. उन्होंने उदासी की वजह पूछी और मदद करने की बात कही.

‘‘नहीं सरकार, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ किसना बोली.

‘‘देख, अगर तू बताएगी नहीं, तो मैं मदद कैसे करूंगा,’’ सरकार उसे प्यार से गले लगा कर बोले.

किसना को उन की बांहें किसी फांसी के फंदे से कम न लगीं. एक बार तो जी में आया कि धक्का दे कर बाहर चली जाए, पर वह वहां से हमेशा के लिए जाना  चाहती थी. उसे अच्छी तरह मालूम था कि यह बूढ़ा उस पर जान छिड़कता है. सो, उस ने अपना आखिरी दांव खेला, ‘‘सरकार, मेरी बेटी बहुत बीमार है. इलाज के लिए काफी पैसों की जरूरत है. मैं पैसा कहां से लाऊं? आज फिर मेरी मां का फोन आया है.’’

‘‘कितने पैसे चाहिए?’’

‘‘नहीं सरकार, मुझे आप से पैसे नहीं चाहिए… मुखियाइन मुझे मार देगी. मैं पैसे नहीं ले सकती.’’

सरकार ने उस का चेहरा अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मुखियाइन को कौन बताएगा? मैं तो नहीं बताऊंगा.’’

‘‘एक लाख रुपए चाहिए.’’

‘‘एक… लाख…’’ बड़ी तेज आवाज में सरकार बोले और उसे दूर झटक दिया. किसना घबरा कर रोने लगी.

‘‘अरे… तुम चुप हो जाओ,’’ और सरकार ने अलमारी से एक लाख रुपए निकाल कर उस के हाथ पर रख दिए, फिर उस की कीमत वसूलने में लग गए.

बेचारी किसना उस सारी रात क्याक्या सोचती रही और पूरी रात खुली आंखों में काट दी.

शाम को जब सरकार ने किसना को बुलाने भेजा था, तो वह कमरे पर नहीं मिली. चिडि़या पिंजरे से उड़ चुकी थी. आखिरी बार उसे माली काका ने देखा था. सरकार ने भी अपने तरीके से ढूंढ़ने की कोशिश की, पर वह नहीं मिली.

उधर किसना पैसा ले कर कुछ दिनों तक अपनी सहेली पारो के घर रही और कुछ समय बाद अपने गांव चली गई.

किसना की सहेली पारो बोली, ‘‘किसना, अब तू वापस मत आना. काश, मैं भी इसी तरह हिम्मत दिखा पाती. खैर छोड़ो…’’

किसना ने अपना चेहरा घूंघट से ढका और बस में बैठते ही भविष्य के उजियारे सपनों में खो गई. इन सपनों में खोए 12 घंटों का सफर उसे पता ही नहीं चला. बस कंडक्टर ने उसे हिला कर जगाया, ‘‘ऐ… नीचे उतर, तेरा गांव आ गया है.’’

किसना आंखें मलते हुए नीचे उतरी. उस ने अलसाई आंखों से इधरउधर देखा. आसमान में सूरज उग रहा था. ऐसा लगा कि जिंदगी में पहली बार सूरज देखा हो.

आज 30 बसंत पार कर चुकी किसना को ऐसा लगा कि जैसे जिंदगी में ऐसी सुबह पहली बार देखी हो, जहां न मुखियाइन, न दलाल, न सरकार… वह उगते हुए सूरज की तरफ दोनों हाथ फैलाए एकटक आसमान की तरफ निहारे जा रही थी. आतेजाते लोग उसे हैरत से देख रहे थे, तभी अचानक वह सकुचा गई और अपना सामान समेट कर मुसकराते हुए आगे बढ़ गई.

किसना को घर के लिए आटोरिकशा पकड़ना था. तभी सोचा कि मां और बेटी रोशनी के लिए कुछ ले ले, दोनों खुश हो जाएंगी. उस ने वहां पर ही एक मिठाई की दुकान में गरमागरम कचौड़ी खाई और मिठाई भी ली.

किसना पल्लू से 5 सौ का नोट निकाल कर बोली, ‘‘भैया, अपने पैसे काट लो.’’

दुकानदार भड़क गया, ‘‘बहनजी, मजाक मत करिए. इस नोट का मैं क्या करूंगा. मुझे 2 सौ रुपए दो.’’

‘‘क्यों भैया, इस में क्या बुराई है.’’

‘‘तुम को पता नहीं है कि 2 दिन पहले ही 5 सौ और एक हजार के नोट चलना बंद हो गए हैं.’’

किसना ने दुकानदार को बहुत समझाया, पर जब वह न माना तो आखिर में अपने पल्लू से सारे पैसे निकाल कर उसे फुटकर पैसे दिए और आगे बढ़ गई.

अभी किसना ढंग से खुशियां भी न मना पाई थी कि जिंदगी में फिर स्याह अंधेरा फैलने लगा. अब क्या करेगी? उस के पास तो 5 सौ और एक हजार के ही नोट थे, क्योंकि इन्हें मुखियाइन से छिपा कर रखना जो आसान था.

रास्ते में बैंक के आगे लगी भीड़ में जा कर पूछा तो पता लगा कि लोग नोट बदल रहे हैं. किसना को तो यह डूबते को तिनके का सहारा की तरह लगा. किसी तरह पैदल चल कर ही वह अपने घर पहुंची.

बेटी रोशनी किसना को देखते ही लिपट गई और बोली, ‘‘मां, अब तुम यहां से कभी वापस मत जाना.’’

किसना उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘अब तेरी मां कहीं नहीं जाएगी.’’

बेटी के सो जाने के बाद किसना ने अपनी मां को सारा हाल बताया. उस की मां ने पूछा, ‘‘अब आगे क्या करोगी?’’

किसना ने कहा, ‘‘यहीं सिलाईकढ़ाई की दुकान खोल लूंगी.’’

दूसरे दिन ही किसना अपने पैसे ले कर बैंक पहुंची, मगर मंजिल इतनी आसान न थी. सुबह से शाम हो गई, पर उस का नंबर नहीं आया और बैंक बंद हो गया.

ऐसा 3-4 दिनों तक होता रहा और काफी जद्दोजेहद के बाद उस का नंबर आया, तो बैंक वालों ने उस से पहचानपत्र मांगा. वह चुपचाप खड़ी हो गई.

बैंक के अफसर ने पूछा कि पैसा कहां से कमाया? वह समझाती रही कि यह उस की बचत का पैसा है.

‘‘तुम्हारे पास एक लाख रुपए हैं. तुम्हें अपनी आमदनी का जरीया बताना होगा.’’

बेचारी किसना रोते हुए बैंक से बाहर आ गई.

किसना हर रोज बैंक के बाहर बैठ जाती कि शायद कोई मदद मिल जाए, मगर सब उसे देखते हुए निकल जाते.

तभी एक दिन उसे एक नौजवान आता दिखाई पड़ा. जैसेजैसे वह किसना के नजदीक आया, किसना के चेहरे पर चमक बढ़ती चली गई. उस के जेहन में वे यादें गुलाब के फूल पर पड़ी ओस की बूंदों की तरह ताजा हो गईं. कैसे यह बाबू उस का प्यार पाने के लिए क्याक्या जतन करता था? जब वह सुबहसुबह उस के गैस्ट हाउस की सफाई करने जाती थी, तो बाबू अकसर नजरें बचा कर उसे देखता था.

वह बाबू किसना को अकसर घुमाने ले जाता और घंटों बाग में बैठ कर वादेकसमें निभाता. वह चाहता कि अब हम दोनों तन से भी एक हो जाएं. किसना अब उसे एक सच्चा प्रेमी समझने लगी और उस की कही हर बात पर भरोसा भी करती थी, मगर किसना बिना शादी के कोई बंधन तोड़ने को तैयार न थी, तो उस ने उस से शादी कर ली, मगर यह शादी उस ने उस का तन पाने के लिए की थी.

किसना का नशा उस की रगरग में समाया था. उस ने सोचा कि अगर यह ऐसे मानती है तो यही सही, आखिर शादी करने में बुराई क्या है, बस माला ही तो पहनानी है. उस ने आदिवासी रीतिरिवाज से कलक्टर और मुखिया के सामने किसना से शादी कर ली, लेकिन उधर लड़के की मां ने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था.

एक दिन बिना बताए किसना का बाबू कहीं चला गया. इस तरह वे दोनों यहां मिलेंगे, किसना ने सोचा न था.

जब वह किसना के बिलकुल नजदीक आया, तो किसना चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे बाबू… आप यहां?’’

वह नौजवान छिटक कर दूर चला गया और बोला, ‘‘क्या बोल रही हो? कौन हो तुम?’’

‘‘मैं तुम्हारी किसना हूं? क्या तुम अब मुझे पहचानते भी नहीं हो? मुझे तुम्हारा घर नहीं चाहिए. बस, एक छोटी सी मदद…’’

‘‘अरे, तुम मेरे गले क्यों पड़ रही हो?’’ वह नौजवान यह कहते हुए आगे बढ़ गया और बैंक के अंदर चला गया.

अब तो किसना रोज ही उस से दया की भीख मांगती और कहती कि बाबू, पैसे बदलवा दो, पर वह उसे पहचानने से मना करता रहा.

ऐसा कहतेकहते कई दिन बीत गए, मगर बाबू टस से मस न हुआ.

आखिरकार किसना ने ठान लिया कि अब जैसे भी हो, उसे पहचानना ही होगा. उस ने वापस आ कर सारा घर उलटपलट कर रख दिया और उसे अपनी पहचान का सुबूत मिल गया.

सुबह उठ कर किसना तैयार हुई और मन ही मन सोचा कि रो कर नहीं अधिकार से मांगूंगी और बेटी को भी साथ ले कर बैंक गई. उस के तेवर देख कर बाबू थोड़ा सहम गया.

उसे किनारे बुला कर किसना बोली, ‘‘यह रहा कलक्टर साहब द्वारा कराई गई हमारी शादी का फोटो. अब तो याद आ ही गया होगा?’’

‘‘हां… किसना… आखिर तुम चाहती क्या हो और क्यों मेरा बसाबसाया घर उजाड़ना चाहती हो?’’

किसना आंखों में आंसू लिए बोली, ‘‘जिस का घर तुम खुद उजाड़ कर चले आए थे, वह क्या किसी का घर उजाड़ेगी, रमेश बाबू… वह लड़की जो खेल रही है, उसे देखो.’’

रमेश पास खेल रही लड़की को देखने लगा. उस में उसे अपना ही चेहरा नजर आ रहा था. उसे लगा कि उसे गले लगा ले, मगर अपने जज्बातों को काबू कर के बोला, ‘‘हां…’’

किसना तकरीबन घूरते हुए बोली, ‘‘यह तुम्हारी ही बेटी है, जिसे तुम छोड़ आए थे.’’

रमेश के चेहरे के भाव को देखे बिना ही बोली, ‘‘देखो रमेश बाबू, मुझे तुम

में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं एक नई जिंदगी जीना चाहती हूं. अगर इन पैसों का कुछ न हुआ, तो लौट कर फिर वहीं नरक में जाना पड़ेगा.

‘‘मैं अपनी बेटी को उस नरक से दूर रखना चाहती हूं, नहीं तो उसे भी कुछ सालों में वही कुछ करना पड़ेगा, जो उस की मां करती रही है. अपनी बेटी की खातिर ही रुपया बदलवा दो, नहीं तो लोग इसे वेश्या की बेटी कहेंगे.

‘‘अगर तुम्हारे अंदर जरा सी भी गैरत है, तो तुम बिना सवाल किए पैसा बदलवा लाओ, मैं यहीं तुम्हारा इंतजार कर रही हूं.’’

रमेश ने उस से पैसों का बैग ले लिया और खेलती हुई बेटी को देखते हुए बैंक के अंदर चला गया और कुछ घंटे बाद वापस आ कर रमेश ने नोट बदल कर किसना को दे दिए और कुछ खिलौने अपने बेटी को देते हुए गले लगा लिया.

तभी किसना ने आ कर उसे रमेश के हाथों से छीन लिया और बेटी का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर बोली, ‘‘रमेश बाबू… चाहत की अलगनी पर धोखे के कपड़े नहीं सुखाए जाते…’’ और बेटी के साथ सड़क की भीड़ में अपने सपनों को संजोते हुए खो गई.

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अधूरे प्यार की टीस: क्यों हुई पतिपत्नी में तकरार

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