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एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम -भाग 3

दर्द से उसे यों तड़पता देख कर उस ने दूध मेज पर रखा तथा उस के पास ‘क्या हुआ’ कहती हुई आई. उस के आते ही उस ने हाथपैर ढीले छोड़ दिए तथा सांस रोक कर ऐसे लेट गया मानो जान निकल गई हो. वह बचपन से तालाब में तैरा करता था, अत: 5 मिनट तक सांस रोक कर रखना उस के बाएं हाथ का खेल था.

सुलेखा ने उस के शांत पड़े शरीर को छूआ, थोड़ा झकझोरा, कोई हरकत न पा कर बोली, ‘‘लगता है, यह तो मर गए…अब क्या करूं…किसे बुलाऊं?’’

मनीष को उस की यह चिंता भली लगी. अभी वह अपने नाटक का अंत करने की सोच ही रहा था कि सुलेखा की आवाज आई :

‘‘सुयश, हमारे बीच का कांटा खुद ही दूर हो गया.’’

‘‘क्या, तुम सच कह रही हो?’’

‘‘विश्वास नहीं हो रहा है न, अभीअभी हार्टअटैक से मनीष मर गया. अब हमें विवाह करने से कोई नहीं रोक पाएगा…मम्मी, पापा के कहने से मैं ने मनीष से विवाह तो कर लिया पर फिर भी तुम्हारे प्रति अपना लगाव कम नहीं कर सकी. अब इस घटना के बाद तो उन्हें भी कोई एतराज नहीं होगा.

‘‘देखो, तुम्हें यहां आने की कोई आवश्यकता नहीं है. बेवजह बातें होंगी. मैं नीलेश भाई साहब को इस बात की सूचना देती हूं, वह आ कर सब संभाल लेंगे…आखिर कुछ दिनों का शोक तो मुझे मनाना ही होगा, तबतक तुम्हें सब्र करना होगा,’’ बातों से खुशी झलक रही थी.

‘पहले दूध पी लूं फिर पता नहीं कितने घंटों तक कुछ खाने को न मिले,’ बड़बड़ाते हुए सुलेखा ने दूध का गिलास उठाया और पास पड़ी कुरसी पर बैठ कर पीने लगी.

मनीष सांस रोके यह सब देखता, सुनता और कुढ़ता रहा. दूध पी कर वह उठी और बड़बड़ाते हुए बोली, ‘अब नीलेश को फोन कर ही देना चाहिए…’ उसे फोन मिला ही रही थी कि  मनीष उठ कर बैठ गया.’

‘‘तुम जिंदा हो,’’ उसे बैठा देख कर अचानक सुलेखा के मुंह से निकला.

‘‘तो क्या तुम ने मुझे मरा समझ लिया था…?’’ मनीष बोला, ‘‘डार्लिंग, मेरे शरीर में हलचल नहीं थी पर दिल तो धड़क रहा था. लेकिन खुशी के अतिरेक में तुम्हें नब्ज देखने या धड़कन सुनने का भी ध्यान नहीं रहा. तुम ने ऐसा क्यों किया सुलेखा? जब तुम किसी और से प्यार करती थीं तो मेरे साथ विवाह क्यों किया?’’

‘‘तो क्या तुम ने सब सुन लिया?’’ कहते हुए वह धम्म से बैठ गई.

‘‘हां, तुम्हारी सचाई जानने के लिए मुझे यह नाटक करना पड़ा था. अगर तुम उस के साथ रहना चाहती थीं तो मुझ से एक बार कहा होता, मैं तुम दोनों को मिला देता, पर छिपछिप कर उस से मिलना क्या बेवफाई नहीं है.

‘‘10 महीने मेरे साथ एक ही कमरे में मेरी पत्नी बन कर गुजारने के बावजूद आज अगर तुम मेरी नहीं हो सकीं तो क्या गारंटी है कल तुम उस से भी मुंह नहीं मोड़ लोगी…या सुयश तुम्हें वही मानसम्मान दे पाएगा जो वह अपनी प्रथम विवाहित पत्नी को देता…जिंदगी एक समझौता है, सब को सबकुछ नहीं मिल जाता, कभीकभी हमें अपनों के लिए समझौते करने पड़ते हैं, फिर जब तुम ने अपने मातापिता के लिए समझौता करते हुए मुझ से विवाह किया तो उस पर अडिग क्यों नहीं रह पाईं…अगर उन्हें तुम्हारी इस भटकन का पता चलेगा तो क्या उन का सिर शर्म से नीचा नहीं हो जाएगा?’’

‘‘मुझे माफ कर दो, मनीष. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई,’’ सुलेखा ने उस के कदमों पर गिरते हुए कहा.

‘‘अगर तुम इस संबंध को सच्चे दिल से निभाना चाहती हो तो मैं भी सबकुछ भूल कर आगे बढ़ने को तैयार हूं और अगर नहीं तो तुम स्वतंत्र हो, तलाक के पेपर तैयार करवा लेना, मैं बेहिचक हस्ताक्षर कर दूंगा…पर इस तरह की बेवफाई कभी बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा.’’

उसी समय सुलेखा का मोबाइल खनखना उठा…

‘‘सुयश, आइंदा से तुम मुझे न तो फोन करना और न ही मिलने की कोशिश करना…मेरे वैवाहिक जीवन में दरार डालने की कोशिश, अब मैं बरदाश्त नहीं करूंगी,’’ कहते हुए सुलेखा ने फोन काट दिया तथा रोने लगी.

उस के बाद फिर फोन बजा पर सुलेखा ने नहीं उठाया. रोते हुए बारबार उस के मुंह से एक ही बात निकल रही थी, ‘‘प्लीज मनीष, एक मौका और दे दो…अब मैं कभी कोई गलत कदम नहीं उठाऊंगी.’’

उस की आंखों से निकलते आंसू मनीष के हृदय में हलचल पैदा कर रहे थे पर मनीष की समझ में नहीं आ रहा था कि वह उस की बात पर विश्वास करे या न करे. जो औरत उसे पिछले 10 महीने से बेवकूफ बनाती रही…और तो और जिसे उस की अचानक मौत इतनी खुशी दे गई कि उस ने डाक्टर को बुला कर मृत्यु की पुष्टि कराने के बजाय अपने प्रेमी को मृत्यु की सूचना  ही नहीं दी, अपने भावी जीवन की योजना बनाने से भी नहीं चूकी…उस पर एकाएक भरोसा करे भी तो कैसे करे और जहां तक मौके का प्रश्न है…उसे एक और मौका दे सकता है, आखिर उस ने उस से प्यार किया है, पर क्या वह उस से वफा कर पाएगी या फिर से वह उस पर वही विश्वास कर पाएगा…मन में इतना आक्रोश था कि वह बिना सुलेखा से बातें किए करवट बदल कर सो गया.

दूसरा दिन सामान्य तौर पर प्रारंभ हुआ. सुबह की चाय देने के बाद सुलेखा नाश्ते की तैयारी करने लगी तथा वह पेपर पढ़ने लगा. तभी दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा मनीष ने खोला तो सामने किसी अजनबी को खड़ा देख वह चौंका पर उस से भी अधिक वह आगंतुक चौंका.

वह कुछ कह पाता इस से पहले ही मनीष जैसे सबकुछ समझ गया और सुलेखा को आवाज देते हुए अंदर चला गया, पर कान बाहर ही लगे रहे.

सुलेखा बाहर आई. सुयश को खड़ा देख कर चौंक गई. वह कुछ कह पाता इस से पहले ही तीखे स्वर में सुलेखा बोली, ‘‘जब मैं ने कल तुम से मिलने या फोन करने के लिए मना कर दिया था उस के बाद भी तुम्हारी यहां मेरे घर आने की हिम्मत कैसे हुई. मैं तुम से कोई संबंध नहीं रखना चाहती…आइंदा मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’’

सुयश का उत्तर सुने बिना सुलेखा ने दरवाजा बंद कर दिया और किचन में चली गई. आवाज में कोई कंपन या हिचक नहीं थी.

वह नहाने के लिए बाथरूम गया तो सबकुछ यथास्थान था. तैयार हो कर बाहर आया तो नाश्ता लगाए सुलेखा उस का इंतजार कर रही थी. नाश्ता भी उस का मनपसंद था, आलू के परांठे और मीठा दही.

आफिस जाते समय उस के हाथ में टिफिन पकड़ाते हुए सुलेखा ने सहज स्वर में पूछा, ‘‘आज आप जल्दी आ सकते हैं. रीजेंट में बाबुल लगी है…अच्छी पिक्चर है.’’

‘‘देखूंगा,’’ न चाहते हुए भी मुंह से निकल गया.

गाड़ी स्टार्ट करते हुए मनीष सोच रहा था कि वास्तव में सुलेखा ने स्वयं को बदल लिया है या दिखावा करने की कोशिश कर रही है. सचाई जो भी हो पर वह उसे एक मौका अवश्य देगा.

कर्णफूल : क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना-भाग 3

अलीना बाजी के बेटे की सालगिरह फरवरी में थी. उन्होंने फोन कर के कहा कि वह अपने बेटे अशर की सालगिरह नानी के घर मनाएंगी. मैं और अम्मी बहुत खुश हुए. बडे़ उत्साह से पूरे घर को ब्राइट कलर से पेंट करवाया. कुछ नया फर्नीचर भी लिया. एक हफ्ते बाद अलीना आपी अपने शौहर समर के साथ आ गईं. घर के डेकोरेशन को देख कर वह बहुत खुश हुईं.

सालगिरह के दिन सुबह से ही सब काम शुरू हो गए. दोस्तोंरिश्तेदारों सब को बुलाया. मैं और अम्मी नाश्ते के बाद इंतजाम के बारे में बातें करने लगे. खाना और केक बाहर से आर्डर पर बनवाया था. उसी वक्त अलीना आपी आईं और अम्मी से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, ये लीजिए झूमर संभाल कर रख लीजिए और मुझे वे कर्णफूल दे दीजिए. आज मैं अशर की सालगिरह में पहनूंगी.’’

अम्मी ने मुझ से कहा, ‘‘जाओ मलीहा, वह डिबिया निकाल कर ले आओ.’’ मैं ने डिबिया ला कर अम्मी के हाथ पर रख दी. आपी ने बड़ी बेसब्री से डिबिया उठा कर खोली. लेकिन डिबिया खुलते ही वह चीख पड़ीं, ‘‘अम्मी कर्णफूल तो इस में नहीं है.’’

अम्मी ने झपट कर डिबिया उन के हाथ से ले ली. वाकई डिबिया खाली थी. अम्मी एकदम हैरान सी रह गईं. मेरे तो जैसे हाथोंपैरों की जान ही निकल गई. अलीना आपी की आंखों में आंसू आ गए थे. उन्होंने मुझे शक भरी नजरों से देखा तो मुझे लगा कि काश धरती फट जाए और मैं उस में समा जाऊं.

अलीना आपी गुस्से में जा कर अपने कमरे में लेट गईं. मैं ने और अम्मी ने अलमारी का कोनाकोना छान मारा, पर कहीं भी कर्णफूल नहीं मिले. अजब पहेली थी. मैं ने अपने हाथ से डिबिया अलमारी में रखी थी. उस के बाद कभी निकाली भी नहीं थी. फिर कर्णफूल कहां गए?

एक बार ख्याल आया कि कुछ दिनों पहले चाचाचाची आए थे और चाची दादी के जेवरों की वजह से अम्मी से बहुत जलती थीं. क्योंकि सब कीमती चीजें उन्होंने अम्मी को दी थीं. कहीं उन्होंने ही तो मौका देख कर नहीं निकाल लिए कर्णफूल. मैं ने अम्मी से कहा तो वह कहने लगीं, ‘‘मुझे नहीं लगता कि वह ऐसा कर सकती हैं.’’

फिर मेरा ध्यान घर पेंट करने वालों की तरफ गया. उन लोगों ने 3-4 दिन काम किया था. संभव है, भूल से कभी अलमारी खुली रह गई हो और उन्हें हाथ साफ करने का मौका मिल गया हो. अम्मी कहने लगीं, ‘‘नहीं बेटा, बिना देखे बिना सुबूत किसी पर इलजाम लगाना गलत है. जो चीज जानी थी, चली गई. बेवजह किसी पर इलजाम लगा कर गुनहगार क्यों बनें.’’

सालगिरह का दिन बेरंग हो गया. किसी का दिल दिमाग ठिकाने पर नहीं था. अलीना आपी के पति समर भाई ने सिचुएशन संभाली, प्रोग्राम ठीकठाक हो गया. दूसरे दिन अलीना ने जाने की तैयारी शुरू कर दी. अम्मी ने हर तरह से समझाया, कई तरह की दलीलें दीं, समर भाई ने भी समझाया, पर वह रुकने के लिए तैयार नहीं हुईं. मैं ने उन्हें कसम खा कर यकीन दिलाना चाहा, ‘‘मैं बेकुसूर हूं, कर्णफूल गायब होने के पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है.’’

लेकिन उन्हें किसी बात पर यकीन नहीं आया. उन के चेहरे पर छले जाने के भाव साफ देखे जा सकते थे. शाम को वह चली गईं तो पूरे घर में एक बेमन सी उदासी पसर गईं. मेरे दिल पर अजब सा बोझ था. मैं अलीना आपी से शर्मिंदा भी थी कि अपना वादा निभा न सकी.

पिछले 2 सालों में अलीना आपी सिर्फ 2 बार अम्मी से मिलने आईं, वह भी 2-3 दिनों के लिए. आती तो मुझ से तो बात ही नहीं करती थीं. मैं ने बहन के साथ एक अच्छी दोस्त भी खो दी थी. बारबार सफाई देना फिजूल था. खामोशी ही शायद मेरी बेगुनाही की जुबां बन जाए. यह सोच कर मैं ने चुप्पी साध ली. वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है. शायद ये गम भी हलका पड़ जाए.

मामूली सी आहट पर मैं ने सिर उठा कर देखा, नर्स खड़ी थी. वह कहने लगी, ‘‘पेशेंट आप से मिलना चाहती हैं.’’

मैं अतीत की दुनिया से बाहर आ गई. मुंह धो कर मैं अम्मी के पास आईसीयू में पहुंच गई. अम्मी काफी बेहतर थीं. मुझे देख कर उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आ गईं. वह मुझे समझाने लगीं, ‘‘बेटी, परेशान न हो, इस तरह के उतारचढ़ाव तो जिंदगी में आते ही रहते हैं. उन का हिम्मत से मुकाबला कर के ही हराया जा सकता है.’’

मैं ने उन्हें हल्का सा नाश्ता कराया. डाक्टरों ने कहा, ‘‘इन की हालत काफी ठीक है. आज रूम में शिफ्ट कर देंगे. 2-4 दिन में छुट्टी दे दी जाएगी. हां, दवाई और परहेज का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. ऐसी कोई बात न हो, जिस से इन्हें स्ट्रेस पहुंचे.’’

शाम तक अलीना आपी भी आ गईं. मुझ से बस सलामदुआ हुई. वह अम्मी के पास रुकीं. मैं घर आ गई. 3 दिनों बाद अम्मी भी घर आ गई. अब उन की तबीयत अच्छी थी. हम उन्हें खुश रखने की भरसक कोशिश करते रहे. एक हफ्ता तो अम्मी को देखने आने वालों में गुजर गया.

मैं ने औफिस जौइन कर लिया. अम्मी के बहुत इसरार पर आपी कुछ दिन रुकने को राजी हो गईं. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. अब अम्मी हलकेफुलके काम कर लेती थीं. अलीना आपी और उन के बेटे की वजह से घर में अच्छी रौनक थी.उस दिन छुट्टी थी, मैं घर की सफाई में जुट गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘बेटा, गाव तकिए फिर बहुत सख्त हो गए हैं. एक बार खोल कर रुई तोड़ कर भर दो.’’

अन्नामां तकिए उठा लाईं और उन्हें खोलने लगीं. फिर मैं और अन्नामां रुई, तोड़ने लगीं. कुछ सख्त सी चीज हाथ को लगीं तो मैं ने झुक कर नीचे देखा. मेरी सांस जैसे थम गईं. दोनों कर्णफूल रुई के ढेर में पड़े थे. होश जरा ठिकाने आए तो मैं ने कहा, ‘‘देखिए अम्मी ये रहे कर्णफूल.’’

आपी ने कर्णफूल उठा लिए और अम्मी के हाथ पर रख दिए. अम्मी का चेहरा खुशी से चमक उठा. जब दिल को यकीन आ गया कि कर्णफूल मिल गए और खुशी थोड़ी कंट्रोल में आई तो आपी बोलीं, ‘‘ये कर्णफूल यहां कैसे?’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. फिर रुक कर कहने लगीं, ‘‘मुझे याद आया अलीना, उस दिन भी तुम लोग तकिए की रुई तोड़ रहीं थीं. तभी मैं कर्णफूल निकाल कर लाई थी. हम उन्हें देख ही रहे थे, तभी घंटी बजी थी. मैं जल्दी से कर्णफूल डिबिया में रखने गई, पर हड़बड़ी में घबरा कर डिबिया के बजाय रुई में रख दिए और डिबिया तकिए के पीछे रख दी थी.

‘‘कर्णफूल रुई में दब कर छिप गए. कश्मीरी शाल वाले के जाने के बाद डिबिया तो मैं ने अलमारी में रखवा दी, लेकिन कर्णफूल रुई  में दब कर रुई के साथ तकिए में भर गए. मलीहा ने तकिए सिले और कवर चढ़ा कर रख दिए. हम समझते रहे कि कर्णफूल डिबिया में अलमारी में रखे हैं. जब अशर की सालगिरह के दिन अलीना ने तुम से कर्णफूल मांगे तो पता चला कि उस में कर्णफूल है ही नहीं. अलीना तुम ने सारा इलजाम मलीहा पर लगा दिया.’’

अम्मी ने अपनी बात खत्म कर के एक गहरी सांस छोड़ी. अलीना के चेहरे पर फछतावा था. दुख और शर्मिंदगी से उन की आंखें भर आईं. वह दोनों हाथ जोड़ कर मेरे सामने खडी हो गईं. रुंधे गले से कहने लगीं, ‘‘मेरी बहन मुझे माफ कर दो. बिना सोचेसमझे तुम पर दोष लगा दिया. पूरे 2 साल तुम से नाराजगी में बिता दिए. मेरी गुडि़या, मेरी गलती माफ कर दो.’’

मैं तो वैसे भी प्यारमोहब्बत को तरसी हुई थी. जिंदगी के रेगिस्तान में खड़ी हुई थी. मेरे लिए चाहत की एक बूंद अमृत के समान थी. मैं आपी से लिपट कर रो पड़ी. आंसुओं से दिल में फैली नफरत व जलन की गर्द धुल गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘अलीना, मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मलीहा पर शक न करो. वह कभी भी तुम से छीन कर कर्णफूल नहीं लेगी. उस का दिल तुम्हारी चाहत से भरा है. वह कभी तुम से छल नहीं करेगी.’’

आपी बोलीं, ‘‘अम्मी, आप की बात सही है, पर एक मिनट मेरी जगह खुद को रख कर सोचिए, मुझे एंटिक ज्वैलरी का दीवानगी की हद तक शौक है. ये कर्णफूल बेशकीमती एंटिक पीस हैं, मुझे मिलने चाहिए. पर आप ने मलीहा को दे दिए. मुझे लगा कि मेरी इल्तजा सुन कर वह मान गई, फिर उस की नीयत बदल गई. उस की चीज थी, उस ने गायब कर दी, ऐसा सोचना मेरी खुदगर्जी थी, गलती थी. इस की सजा के तौर पर मैं इन कर्णफूल का मोह छोड़ती हूं. इन पर मलीहा का ही हक है.’’

मैं जल्दी से आपी से लिपट कर बोली, ‘‘ये कर्णफूल आप के पहनने से मुझे जो खुशी होगी, वह खुद के पहनने से नहीं होगी. ये आप के हैं, आप ही लेंगी.’’

अम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा जब मलीहा इतनी मिन्नत कर रही है तो मान जाओ, मोहब्बत के रिश्तों के बीच दीवार नहीं आनी चाहिए. रिश्ते फूलों की तरह नाजुक होते हैं, नफरत व शक की धूप उन्हें झुलसा देती है, फिर खुद टूट कर बिखर जाते हैं.’’

मैं ने खुलूसे दिल से आपी के कानों में कर्णफूल पहना दिए. सारा माहौल मोहब्बत की खुशबू से महक उठा.???

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 2

उधर मनीष, नीलेश के प्रति अपने व्यवहार के लिए स्वयं को धिक्कार रहा था. पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई प्रोग्राम बनने से पूर्व ही अधर में लटक गया था पर वह करता भी तो क्या करता. नीलेश की बातें सुन कर उस के दिल में  शक का कीड़ा कुलबुला कर नागफनी की तरह डंक मारते हुए उसे दंशित करने लगा था.

वह जानता था कि उसे महीने में 10-12 दिन घर से बाहर रहना पड़ता है. ऐसे में हो सकता है सुलेखा की किसी के साथ घनिष्ठता हो गई हो. इस में  कुछ बुरा भी नहीं है पर उसे यही विचार परेशान कर रहा था कि सुलेखा ने उस सुयश नामक व्यक्ति से उसे क्यों नहीं मिलवाया, जबकि नीलेश के अनुसार वह उस से मिलती रहती है. और तो और उस ने उस का नीलेश से अपना ममेरा भाई बता कर परिचय भी करवाया…जबकि उस की जानकारी में उस का कोई ममेरा भाई है ही नहीं…उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे पर सिर्फ अनुमान के आधार पर किसी पर दोषारोपण करना उचित भी तो नहीं है.

एक दिन जब सुलेखा बाथरूम में थी तो वह उस का सैलफोन सर्च करने लगा. एक नंबर  उसे संशय में डालने लगा क्योंकि उसे बारबार डायल किया गया था. नाम था सुश…सुश. नीलेश की जानकारी में सुलेखा का कोई दोस्त नहीं है फिर उस से बारबार बातें क्यों किया करती है और अगर उस का कोई दोस्त है तो उस ने उसे बताया क्यों नहीं. मन ही मन मनीष ने सोचा तो उस के अंतर्मन ने कहा कि यह तो कोई बात नहीं कि वह हर बात तुम्हें बताए या अपने हर मित्र से तुम्हें मिलवाए.

पर जीवन में पारदर्शिता होना, सफल वैवाहिक जीवन का मूलमंत्र है. अपने अंदर उठे सवाल का वह खुद जवाब देता है कि वह तुम्हारा हर तरह से तो खयाल रखती है, फिर मन में शंका क्यों?

‘शायद जिसे हम हद से ज्यादा प्यार करते हैं, उसे खो देने का विचार ही मन में असुरक्षा  पैदा कर देता है.’

‘अगर ऐसा है तो पता लगा सकते हो, पर कैसे?’

मन तर्कवितर्क में उलझा हुआ था. अचानक सुश और सुयश में उसे कुछ संबंध नजर आने लगा और उस ने वही नंबर डायल कर दिया.

‘‘बोलो सुलेखा,’’ उधर से किसी पुरुष की आवाज आई.

पुरुष स्वर सुन कर उसे लगा कि कहीं गलत नंबर तो नहीं लग गया अत: आफ कर के पुन: लगाया, पुन: वही आवाज आई…

‘‘बोलो सुलेखा…पहले फोन क्यों काट दिया, कुछ गड़बड़ है क्या?’’

उसे लगा नीलेश ठीक ही कह रहा था. सुलेखा उस से जरूर कुछ छिपा रही है… पर क्यों, कहीं सच में तो उस के पीछे उन दोनों में… अभी वह यह सोच ही रहा था कि सुलेखा नहा कर आ गई. उस के हाथ में अपना मोबाइल देख कर बोली, ‘‘कितनी बार कहा है, मेरा मोबाइल मत छूआ करो.’’

‘‘मेरे मोबाइल से कुछ नंबर डिलीट हो गए थे, उन्हीं को तुम्हारे मोबाइल से अपने में फीड कर रहा था,’’ न जाने कैसे ये शब्द उस की जबान से फिसल गए.

अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वह ऐसा ही करने लगा जैसा उस ने कहा था. इसी बीच उस ने 2 आउटगोइंग काल, जो सुश को करे थे उन्हें भी डिलीट कर दिया, जिस से अगर वह सर्च करे तो उसे पता न चले.

अब संदेह बढ़ गया था पर जब तक सचाई की तह में नहीं पहुंच जाए तब तक वह उस से कुछ भी कह कर संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था. उस की पत्नी का किसी के साथ गलत संबंध है तथा वह उस से चोरीछिपे मिला करती है, यह बात भी वह सह नहीं पा रहा था. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि वह नामर्द तो नहीं, तभी उस की पत्नी को उस के अलावा भी किसी अन्य के साथ की आवश्यकता पड़ने लगी है.

‘तुम इतने दिन बाहर टूर पर रहते हो, अपने एकाकीपन को भरने के लिए सुलेखा किसी के साथ की चाह करने लगे तो इस में क्या बुराई है?’ अंतर्मन ने पुन: प्रश्न किया.

‘बुराई, संबंध बनाने में नहीं बल्कि छिपाने में है, अगर संबंध पाकसाफ है तो छिपाना क्यों और किस लिए?’

‘शायद इसलिए कि तुम ऐसे संबंध को स्वीकार न कर पाओ…सदा संदेह से देखते रहो.’

‘क्या मैं तुम्हें ऐसा लगता हूं…नए जमाने का हूं…स्वस्थ दोस्ती में कोई बुराई नहीं है.’

‘सब कहने की बात है, अगर ऐसा होता तो तुम इतने परेशान न होते… सीधेसीधे उस से पूछ नहीं लेते?’

‘पूछने पर मन का शक सच निकल गया तो सह नहीं पाऊंगा और अगर गलत निकला तो क्या मैं उस की नजरों में गिर नहीं जाऊंगा.’

‘जल्दबाजी क्यों करते हो, शायद समय के साथ कोई रास्ता निकल ही आए.’

‘हां, यही ठीक रहेगा.’

इस सोच ने तर्कवितर्क में डूबे मन को ढाढ़स बंधाया…उन के विवाह को 10 महीने हो चले थे. वह अपने पी.एफ. में उसे नामिनी बनाना चाहता था, उस के लिए सारी औपचारिकता पूरी कर ली थी. बस, सुलेखा के साइन करवाने बाकी थे. एक एल.आई.सी. भी खुलवाने वाला था, पर इस एपीसोड ने उसे बुरी तरह हिला कर रख दिया. अब उस ने सोचसमझ कर कदम उठाने का फैसला कर लिया.

यद्यपि सुलेखा पहले की तरह सहज, सरल थी पर मनीष के मन में पिछली घटनाओं के कारण हलचल मची हुई थी. एक बार सोचा कि किसी प्राइवेट डिटेक्टर को तैनात कर सुलेखा की जासूसी करवाए, जिस से पता चल सके कि वह कहां, कब और किस से मिलती है पर जितना वह इस के बारे में सोचता, बारबार उसे यही लगता कि ऐसा कर के वह अपनी निजी जिंदगी को सार्वजनिक कर देगा…आखिर ऐसी संदेहास्पद जिंदगी कोई कब तक बिता सकता है. अत: पता तो लगाना ही पड़ेगा, पर कैसे, समझ नहीं पा रहा था.

हफ्ते भर में ही ऐसा लगने लगा कि वह न जाने कितने दिनों से बीमार है. सुलेखा पूछती तो कह देता कि काम की अधिकता के कारण तबीयत ढीली हो रही है…वैसे भी सुलेखा का उस की चिंता करना दिखावा लगने लगा था. आखिर, जो स्त्री उस से छिप कर अपने मित्र से मिलती रही है वह भला उस के लिए चिंता क्यों करेगी?

उस दिन मनीष का मन बेहद अशांत था. आफिस से छुट्टी ले ली थी. सुलेखा ने पूछा तो कह दिया, ‘‘तबीयत ठीक नहीं लग रही है, अत: छुट्टी ले ली.’’

सुलेखा ने डाक्टर को दिखाने की बात कही तो वह टाल गया. आखिर बीमारी मन की थी, तन की नहीं, डाक्टर भी भला क्या कर पाएगा. रात का खाना भी नहीं खाया. सुलेखा के पूछने पर कह दिया कि बस, एक गिलास दूध दे दो, खाने का मन नहीं है. सुलेखा दूध लेने चली गई. उस के कदमों की आहट सुन कर उसे न जाने क्या सूझा कि अचानक अपनी छाती को कस कर दबा लिया तथा दर्द से कराहने लगा.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 1

नीलेश शहर के उस प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी नेहा के साथ अपने विवाह की दूसरी सालगिरह मनाने आया था. वह आर्डर देने ही वाला था कि सामने से एक युगल आता दिखा. लड़की पर नजर टिकी तो पाया वह उस के प्रिय दोस्त मनीष की पत्नी सुलेखा है. उस के साथ वाले युवक को उस ने पहले कभी नहीं देखा था.

मनीष के सभी मित्रों और रिश्तेदारों से नीलेश परिचित था. पड़ोसी होने के कारण वे बचपन से एकसाथ खेलेकूदे और पढ़े थे. यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें नौकरी भी एक ही शहर में मिली. कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद उन्हें जब भी मौका मिलता वे अपने परिवार के साथ कभी डिनर पर चले जाते तो कभी किसी छुट्टी के दिन पिकनिक पर. उन के कारण उन दोनों की पत्नियां भी अच्छी मित्र बन गई थीं.

मनीष का टूरिंग जाब था. वह अपने काम के सिलसिले में महीने में लगभग 10-12 दिन टूर पर रहा करता था. इस बार भी उसे गए लगभग 10 दिन हो गए थे. यद्यपि उस ने फोन द्वारा शादी की सालगिरह पर उन्हें शुभकामनाएं दे दी थीं किंतु फिर भी आज उसे उस की कमी बेहद खल रही थी. दरअसल, मनीष को ऐसे आयोजनों में भाग लेना न केवल पसंद था बल्कि समय पूर्व ही योजना बना कर वह छोटे अवसरों को भी विशेष बना दिया करता था.

मनीष के न रहने पर नीलेश का मन कोई खास आयोजन करने का नहीं था किंतु जब नेहा ने रात का खाना बाहर खाने का आग्रह किया तो वह मना नहीं कर पाया. कार्यक्रम बनते ही नेहा ने सुलेखा को आमंत्रित किया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है पर उसे इस समय देख कर तो ऐसा नहीं लग रहा है कि उस की तबीयत खराब है. वह उस युवक के साथ खूब खुश नजर आ रही है.

नीलेश को सोच में पड़ा देख नेहा ने पूछा तो उस ने सुलेखा और उस युवक की तरफ इशारा करते हुए अपने मन का संशय उगल दिया.

‘‘तुम पुरुष भी…किसी औरत को किसी मर्द के साथ देखा नहीं कि मन में शक का कीड़ा कुलबुला उठा…होगा कोई उस का रिश्तेदार या सगा संबंधी या फिर कोई मित्र. आखिर इतनेइतने दिन अकेली रहती है, हमेशा घर में बंद हो कर तो रहा नहीं जा सकता, कभी न कभी तो उसे किसी के साथ की, सहयोग की जरूरत पड़ेगी ही,’’ वह प्रतिरोध करते हुए बोली, ‘‘न जाने क्यों मुझे पुरुषों की यही मानसिकता बेहद बुरी लगती है. विवाह हुआ नहीं कि वे स्त्री को अपनी जागीर समझने लगते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम ही तो कह रही थीं कि जब तुम ने डिनर का निमंत्रण दिया था तब सुलेखा ने कह दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है और अब वह इस के साथ यहां…यही बात मन में संदेह पैदा कर रही है…और तुम ने देखा नहीं, वह कैसे उस के हाथ में हाथ डाल कर अंदर आई है तथा उस से हंसहंस कर बातें कर रही है,’’ मन का संदेह चेहरे पर झलक ही आया.

‘‘वह समझदार है, हो सकता है वह दालभात में मूसलचंद न बनना चाहती हो, इसलिए झूठ बोल दिया हो. वैसे भी किसी स्त्री का किसी पुरुष का हाथ पकड़ना या किसी से हंस कर बात करना सदा संदेहास्पद क्यों हो जाता है? फिर भी अगर तुम्हारे मन में संशय है तो चलो उन्हें भी अपने साथ डिनर में शामिल होने का फिर से निमंत्रण दे देते हैं…दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

नेहा ने नीलेश का मूड खराब होने के डर से बीच का मार्ग अपना लेना ही श्रेयस्कर समझा.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा,’’ किसी के अंदरूनी मामले में दखल न देने के अपने सिद्धांत के विपरीत नीलेश, नेहा की बात से सहमत हो गया. दरअसल, वह उस उलझन से मुक्ति पाना चाहता था जो उस के दिल और दिमाग को मथ रही थी. वैसे भी सुलेखा कोई गैर नहीं, उस के अभिन्न मित्र की पत्नी है.

वे दोनों उठ कर उन के पास गए. उन्हें इस तरह अपने सामने पा कर सुलेखा चौंक गई, मानो वह समझ नहीं पा रही हो कि क्या कहे.

‘‘दरअसल सुलेखा, हम लोग यहां डिनर के लिए आए हैं. वैसे मैं ने सुबह तुम से कहा भी था पर उस समय तुम ने कह दिया कि तबीयत ठीक नहीं है पर अब जब तुम यहां आ ही गई हो तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे साथ ही डिनर कर लो. इस से हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ नेहा उसे अपनी ओर आश्चर्य से देखते हुए भी सहजता से बोली.

‘‘पर…’’ सुलेखा ने झिझकते हुए कुछ कहना चाहा.

‘‘पर वर कुछ नहीं, सुलेखाजी, मनीष नहीं है तो क्या हुआ, आप को हमेंकंपनी देनी ही होगी…आप भी चलिए मि…आप शायद सुलेखाजी के मित्र हैं,’’ नीलेश ने उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यह मेरा ममेरा भाई सुयश है,’’ एकाएक सुलेखा बोली.

‘‘वेरी ग्लैड टू मीट यू सुयश, मैं नीलेश, मनीष का लंगोटिया यार, पर भाभी, आप ने कभी इन के बारे में नहीं बताया,’’ कहते हुए नीलेश ने बडे़ गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘यह अभी कुछ दिन पूर्व ही यहां आए हैं,’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ओह, तभी हम अभी तक नहीं मिले हैं, पर कोई बात नहीं, अब तो अकसर ही मुलाकात होती रहेगी,’’ नीलेश ने कहा.

अजीब पसोपेश की स्थिति में सुलेखा साथ आ तो गई पर थोड़ी देर पहले चहकने वाली उस सुलेखा तथा इस सुलेखा में जमीनआसमान का अंतर लग रहा था…जितनी देर भी साथ रही चुप ही रही, बस जो पूछते उस का जवाब दे देती. अंत में नेहा ने कह भी दिया, ‘‘लगता है, तुम को हमारा साथ पसंद नहीं आया.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. दरअसल, तबीयत अभी भी ठीक नहीं लग रही है,’’ झिझकते हुए सुलेखा ने कहा.

बात आईगई हो गई. एक दिन नीलेश शौपिंग मौल के सामने गाड़ी पार्क कर रहा था कि वे दोनों फिर दिखे. उन के हाथ में कुछ पैकेट थे. शायद शौपिंग करने आए थे. आजकल तो मनीष भी यही हैं, फिर वे दोनों अकेले क्यों आए…मन में फिर संदेह उपजा, फिर यह सोच कर उसे दबा दिया कि वह उस का ममेरा भाई है, भला उस के साथ घूमने में क्या बुराई है.

मनीष के घर आने पर एक दिन बातोंबातों में नीलेश ने कहा, ‘‘भई, तुम्हारा ममेरा साला आया है तो क्यों न इस संडे को कहीं पिकनिक का प्रोग्राम बना लें. बहुत दिनों से दोनों परिवार मिल कर कहीं बाहर गए भी नहीं हैं.’’

‘‘ममेरा साला, सुलेखा का तो कोई ममेरा भाई नहीं है,’’ चौंक कर मनीष ने कहा.

‘‘पर सुलेखा भाभी ने तो उस युवक को अपना ममेरा भाई बता कर ही हम से परिचय करवाया था, उसे सुलेखा भाभी के साथ मैं ने अभी पिछले हफ्ते भी शौपिंग मौल से खरीदारी कर के निकलते हुए देखा था. क्या नाम बताया था उन्होंने…हां सुयश,’’ नीलेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए उस का नाम बताते हुए पिछली सारी बातें भी उसे बता दीं.

‘‘हो सकता है, कोई कजिन हो,’’ कहते हुए मनीष ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘हां, हो सकता है पर पिकनिक के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ नीलेश ने फिर पूछा.

‘‘मैं बाद में बताऊंगा…शायद मुझे फिर बाहर जाना पडे़,’’ मनीष ने कहा.

नीलेश भी चुप लगा गया. वैसे नीलेश की पारखी नजरों से यह बात छिप नहीं पाई कि उस की बात सुन कर मनीष परेशान हो गया है. ज्यादा कुछ न कह कर मनीष कुछ काम है, कह कर उस के पास से हट गया. उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्ति किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

पीछा करता डर भाग : पीठ में छुरा भाग – 2

मेज के नीचे दो खाली गिलास रखे थे. भानु ने बारीबारी से दोनों गिलास उठा कर सूंघे और मेज पर रखते हुए गर्दन हिला कर हंसते हुए बोला, ‘‘हूं…उं…! दोनों ने पी है.’’

माथुर की हालत रंगेहाथों पकड़े गए चोर जैसी हो गई. वह बहुत कुछ कहना चाहते थे, विरोध करना चाहते थे, लेकिन चाह कर भी वे न विरोध कर सके, न कुछ कह सके.

भानु ने कुर्सी से उठ कर बेड के नीचे झांका. ह्विस्की की बोतल बेड के नीचे उल्टी पड़ी थी. भानु बोतल उठ कर देखते हुए बोला, ‘‘वाह विंटेज,…अच्छी चीज है. शबाब के साथ शराब भी तो बढि़या होनी चाहिए.’’

शराब की बोतल हाथ में उठाए भानु फिर कुर्सी पर आ बैठा. वह बोतल को एक हाथ में ऊपर उठा कर देखते हुए बोला, ‘‘दोनों ने दोदो पैग पिए हैं. इतनी सर्दी में दो पैग से क्या होता है.’’

बोतल मेज पर रख कर भानु ने मेज के नीचे फिर ताकझांक की. मेज के नीचे 2 प्लेंटे रखी थीं. उस ने दोनों प्लेंटे उठा कर मेज पर रख दीं. एक प्लेट में भुने काजू थे, दूसरी में सलाद. भानु प्लेटों की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘मुझे काजू और सलाद पसंद नहीं हैं. मुझे नानवेज चाहिए. रूमसर्विस को फोन कर के खाली गिलास, सोडा और रोस्ट चिकन लाने को बोलो.’’

नंदन माथुर किंकर्तव्यविमूढ से बैठे थे. उन्हें चुप देख भानु बोला, ‘‘एक काम करो, पहले उसे बाहर बुला लो. ठंड में अकड़ जाएगी. हां उस से बस इतना ही कहना कि मैं तुम्हारा दोस्त हूं.’’

नंदन माथुर जड़वत् बैठे थे. चेहरे पर तनाव. आंखों में विचित्र सा भय. भानु खड़े हो कर उन का कंधा थपथपाते हुए बोला, ‘‘दोस्त, कोई गलत इरादा नहीं है मेरा. जिंदगी जीने का सबका अलगअलग ढंग होता है. यकीन करो, तुम्हारा ये राज इस कमरे से बाहर नहीं जाएगा. चलो उठो, बुला लो उसे.’’

मन मार कर नंदन माथुर उठे और बाथरूम की ओर बढ़ गए. भानु दोनों हाथ पीछे बांधे वहीं खड़ा रहा. नंदन ने बाथरूम का दरवाजा नौक करते हुए धीरे से आवाज दी, ‘‘बाहर आ जाओ.’’

पहले बाथरूम की कुंडी खुलने की आवाज आई, फिर दरवाजा खोल कर एक युवती ने बाहर झांका. नंदन बाथरूम के बाहर ही खड़े थे. वह उसे देखते ही बोले, ‘‘डरो मत, एक दोस्त है. अचानक चला आया.’’

25-25 साल की वह गौरांगी गुलाबी नाइटी में बड़ी खूबसूरत लग रही थी. ठंड के मारे उस का बुरा हाल था. उस के भीगे बालों से अभी तक पानी टपक रहा था, जिस से नाइटी का ऊपरी भाग भीग गया था.

बाथरूम से बाहर निकल कर उस युवती ने पहले एक नजर पास खड़े नंदन पर डाली, फिर भानु की ओर देखा. ठीक उसी समय भानु के पीछे सिमटे हाथ तेजी से आगे आए और क्लिक की आवाज के साथ युवती और नंदन के चेहरे फ्लैश की रोशनी में चमक उठे.

पलभर के लिए नंदन और युवती दोनों ही स्तब्ध रह गए. भानु की चालाकी भांप कर नंदन ने जैसेतैसे अपने आप को संभाला और भानु को देख कर आंखें तरेरते हुए पूछा, ‘‘यह क्या बद्तमीजी है?’’

‘‘इस में बद्तमीजी की क्या बात है?’’ भानु मोबाइल संभाले कुर्सी पर बैठते हुए बोला, ‘‘तुम दोनों इस पोज में प्रेमीप्रेमिका लग रहे थे. मुझे नेचुरल पोज लगा, सो खींच लिया. ऐसे पोज रोजरोज थोड़े ही बनते हैं.’

नंदन और वह युवती अभी तक सहमे खड़े थे, तभी भानु ने उन की ओर देख कर मोबाइल वाला हाथ ऊपर उठाते हुए कहा, ‘‘वंस मोर’’

नंदन और युवती ने अपनेअपने हाथ उठा कर मुंह छिपाने की कोशिश की, लेकिन तब तक भानु कैमरे का शटर दबा चुका था.

भानु मोबाइल जेब में डालते हुए बोला, ‘‘नंदन, तुम तो ऐसे डर रहे हो, जैसे मैं कोई ब्लैकमेलर हूं. डरो मत दोस्त, मेरा कोई भी गलत इरादा नहीं है.’’

‘‘इरादा तो मैं तुम्हारा समझ गया हूं.’’ नंदन ने गुस्से में कहा. भानु संभल कर बैठते हुए बोला, ‘‘समझ गए हो तो और भी अच्छा है. मुझे अपनी बात कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

नंदन तो डरे हुए थे ही, युवती उन से भी ज्यादा डर गई थी. उस ने मुंह फेर कर तौलिया उठाया और ड्रेसिंग टेबल की ओर बढ गई. नंदन भानु के पास आ खड़े हुए और उस से पूछा, ‘‘तुम चाहते क्या हो, भानु?’’

‘‘सिर्फ दो पैग ह्विस्की,’’ भानु लड़की की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘तुम्हारे और उस के साथ. क्या नाम है उस का?’’

‘‘भाड़ में गया नाम. मुझे यह बताओ, मैं ने तुम्हारा कुछ बिगाड़ा है क्या?’’

‘‘मैं भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ूंगा. मेरे खयाल से 2 पैग ह्विस्की पिलाने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगडेगा.’’

‘‘बात ह्विस्की की नहीं है. तुम चाहो तो पूरी बोतल ले जाओ.’’

‘‘तो क्या बात है? तुम्हारे चेहरे पर हवाइयां क्यों उड़ रही है?’’

‘‘ये फोटो… क्या है ये सब?’’

‘‘मुझे पोज अच्छा लगा, खींच लिया. तुम्हें अच्छा नहीं लगा, बनवा कर तुम्हें दे दूंगा. इस में डरने की क्या बात है?’’

‘‘फोन से डिलीट कर दो, प्लीज.’’

खुल गई आंखें : रवि के सामने आई कैसी हकीकत- भाग 1

दफ्तर से अपने बड़े सरकारी बंगले पर जाते हुए उस दिन अचानक एक ट्रक ने रवि की कार को जोरदार टक्कर मार दी थी. कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से टूटफूट गया था.

खून से लथपथ रवि कार के अंदर ही फंसा रह गया था. वह काफी समय तक बेहोशी की हालत में कार के अंदर ही रहा, पर उस की जान बचाने वाला कोई भी नहीं था.

हां, उस के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जरूर लग गई थी. सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे, पर किसी में उसे अस्पताल ले जाने या पुलिस को बुलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

भला हो रवि के दफ्तर के चपरासी रामदीन का, जो भीड़ को देख कर उसे चीरता हुआ रवि के पास तक पहुंच गया था. बाद में उसी ने पास के एसटीडी बूथ से 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुला लिया था.

जब तक पुलिस रवि को ले कर पास के नर्सिंगहोम में पहुंची तब तक उस के शरीर से काफी खून बह चुका था. रामदीन काफी समय तक अस्पताल में ही रहा था. उस ने फोन कर के दफ्तर से सुपरिंटैंडैंट राकेश को भी बुला लिया था जो वहीं पास में रहते थे.

रवि के एक रिश्तेदार भी सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए थे. गांव दूर होने व बूढ़े मांबाप की हालत को ध्यान में रखते हुए किसी ने उस के घर सूचना भेजना उचित नहीं समझा था. वैसे भी उस के गांव में संचार का कोई खास साधन नहीं था. इमर्जैंसी में तार भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं होता था.

रवि की पत्नी गुंजा अपने सासससुर व देवर रघु के साथ गांव में ही रहती थी. वह 2 साल पहले ही गौना करा कर अपनी ससुराल आई थी. रवि के साथ उस की शादी बचपन में तभी हो गई थी, जब वे दोनों 10 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाए थे.

गांव में रहने के चलते गुंजा की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद ही छूट गई थी पर रवि 5वीं जमात पास कर के अपने चाचा के पास शहर में ही पढ़ने आ गया था. उस ने अच्छीखासी पढ़ाई कर ली थी. शहर में पढ़ाई करने के चलते उस का मन चंचल हो गया था. वैसे भी वह गुंजा से हर मामले में बेहतर था.

शादी के समय तो रवि को कोई समझ नहीं थी, पर जब गौने के बाद विदा हो कर गुंजा उस के घर आई थी और पहली बार जवान और भरपूर नजरों से उस ने उसे देखा था तभी से उस का मन उस से उचट गया था.

गुंजा कामकाज में भी उतनी माहिर नहीं थी जितनी रवि ने अपनी पत्नी से उम्मीद की थी. यहां तक कि सुहागरात के दिन भी वह गुंजा से दूर ही रहा था.

गुंजा गांव की पलीबढ़ी लड़की थी. शक्लसूरत और पढ़ाईलिखाई में कम होने के बावजूद मांबाप से उसे अच्छे संस्कार मिले थे. उस ने रवि की अनदेखी के बावजूद उस के बूढ़े मांबाप और रवि के छोटे भाई रघु का साथ कभी नहीं छोड़ा.

मांबाप के लाख कहने के बावजूद रवि जब उसे अपने साथ शहर ले जाने को राजी नहीं हुआ तब भी उस ने उस से कोई खास जिद नहीं की, न ही अकेले शहर जाने का उस ने कोई विरोध किया.

शहर में आ कर रवि अपने दफ्तर और रोजमर्रा के कामों में ऐसा बिजी हुआ कि गांव जाना ही भूल गया. उसे अपने मांबाप से भी कुछ खास लगाव नहीं रह गया था क्योंकि वह अपनी बेढंगी शादी के लिए काफी हद तक उन्हीं को कुसूरवार मानता था.

तनख्वाह मिलने पर घर पर पैसा भेजने के अलावा रवि कभीकभार चिट्ठी लिख कर मांबाप व भाई का हालचाल जरूर पूछ लेता था, पर इस से ज्यादा वह अपने घर वालों के लिए कुछ भी नहीं कर पाता था.

3-4 दिन आईसीयू में रहने के बाद अब रवि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया था. दफ्तर के अनेक साथी तन, मन और धन से उस की सेवा में लगे हुए थे. बड़े साहब भी लगातार उस की सेहत पर नजर रखे हुए थे.

नर्सिंगहोम में जहां सीनियर सर्जन डाक्टर अशोक लाल उस के इलाज पर ध्यान दे रहे थे, वहीं वह वहां की सब से काबिल नर्स सुधा चौहान की चौबीसों घंटे की निगरानी में था.

सुधा चौहान जितना नर्सिंगहोम के कामों में माहिर थी, उतना ही सरल उस का स्वभाव भी था. शक्लसूरत से भी वह किसी फिल्मी नर्स से कम नहीं थी. उस की रातदिन की सेवा और बेहतर इलाज के चलते रवि को जल्दी ही होश आ गया था.

उस समय सुधा ही उस के पास थी. उसे बेचैन देख कर सुधा ने सहारा दिया और उस के सिरहाने तकिया रख दिया. अगले ही पल नर्स सुधा ने शीशी से एक चम्मच दवा निकाल कर आहिस्ता से उस के मुंह में डाल दी

रवि कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहता था, पर पूरे चेहरे पर पट्टी बंधी होने के चलते वह कुछ भी कह पाने में नाकाम था. सुधा ने हलकी मुसकान के साथ उसे इशारेइशारे में चुप रहने को कहा.

सुधा की निजी जिंदगी भी बहुत खुशहाल नहीं थी. उस का पति मनीष इस दुनिया में नहीं था. उस की रिया नाम की 5 साल की एक बेटी थी जो उस के साथ ही रहती थी.

Mother’s Day Special- मोहपाश : बच्चों से एक मां का मोहभंग

जब से कुमार साहब ने औफिस से 2 महीने की छुट्टी ले कर नैनीताल जाने का मन बनाया था, तब से ही विभा परेशान थी. उस ने पति को टोका भी था, ‘‘अजी, पूरी जवानी तो हम ने घर में ही काट दी, अब भला बुढ़ापे में कहा घूमने जाएंगे.’’

‘‘अरे भई, यह किस डाक्टर ने कहा है कि जवानी में ही घूमना चाहिए, बुढ़ापे में नहीं,’’ कुमार साहब भी तपाक से बोले.

विभा के गिरते स्वास्थ्य को देख कर कुमार साहब बड़े चिंतित थे. उन्होंने कई डाक्टरों को भी दिखाया था. सभी ने एक ही बात कही थी कि दवा के साथसाथ उन्हें अधिक से अधिक आराम की भी जरूरत है.

काफी सोचविचार के बाद कुमार साहब ने 2 महीने नैनीताल में रहने का प्रोग्राम बनाया था कि इस बहाने कुछ समय के लिए ही सही, शहर के प्रदूषित वातावरण से मुक्ति मिलेगी और घर के झमेलों से दूर रह कर विभा को आराम भी मिलेगा.

कुमार साहब का कोई लंबाचौड़ा परिवार न था. 2 बेटे थे, दोनों ही इंजीनियर. बड़ी कंपनियों में कार्यरत थे. विवाह के बाद दोनों ने अपने अलगअलग आशियाने बना लिए थे. शायद यह घर उन्हें छोटा लगने लगा था. वैसे भी एक गली के पुराने घर में रहना उन के स्तर के अनुकूल न था.

जब से बेटे अलग हुए, तब से ही विभा का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता गया. विभा ने बच्चों को ले कर अनेक सुनहरे सपने बुन रखे थे, पर बच्चों के जीवन में शायद मां का कोईर् स्थान ही न था. विभा इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी. बच्चों के व्यवहार ने विभा के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया था.

महीने में 1-2 बार बच्चे उन से मिलने आते थे और कुछ देर बैठ कर औपचारिक बातें कर के चले जाते थे. इसी तरह समय बीतता गया. बच्चों से मिलनाजुलना अब पहले से भी कम हो गया. इसी बीच वे 1 पोते व 1 पोती के दादादादी भी बन गए.

दोनों बहुएं पढ़ीलिखी थीं. उन्होंने भी अपने लिए नौकरी ढूंढ़ ली. अब पहली बार उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ कि उन्हें मांबाबूजी से अलग घर नहीं बसाना चाहिए था. मां घर में होतीं तो बच्चों को संभाल लेतीं.

बड़ी बहू नंदिता तो एक दिन बेटे गौतम को ले कर सास के पास पहुंच भी गई. बहू, पोते को देख कर विभा निहाल हो गई.

‘अमित नहीं आया?’ उस ने शिकायती लहजे में बहू से पूछा.

‘क्या करूं मांजी, उन्हें तो दिनभर औफिस के काम से ही फुरसत नहीं है. कितने दिन से कह रही थी कि मांबाबूजी से मिलने की बड़ी इच्छा है, औफिस से जल्दी आ जाना, पर आ ही नहीं पाते. आखिर परेशान हो कर मैं अकेली ही गौतम को ले कर आ गई.’

‘बहुत अच्छा किया बहू,’ गदगद स्वर में विभा बोली और गौतम को खिलाने लगीं.

‘मांजी, आप को यह जान कर खुशी होगी कि मैं ने नौकरी कर ली है.’

‘हां बेटी, बात तो खुशी की ही है. भला हर किसी को नौकरी थोड़े ही मिलती है? जो नौकरी लायक होता है, उसे ही नौकरी मिलती है. मेरी बहू इतनी काबिल है, तभी तो उसे नौकरी मिली,’ विभा ने खुश होते हुए कहा.

‘पर मांजी, एक समस्या है, अब गौतम को तो आप को ही संभालना पड़ेगा. मैं चाहती हूं कि आप और बाबूजी हमारे साथ रहें. इस घर को किराए पर दे देंगे.’

‘नहीं बेटी, यह तो संभव नहीं है. इस घर से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं. इस घर में मैं ब्याह कर आई थी. इसी घर में मेरी गोद भरी थी. इस घर के कोनेकोने में मेरे अमित और विजय की किलकारियां गूंजती हैं. इसी घर में तुम और स्मिता आईं और यह घर खुशियों से भर गया. अकेली होने पर यही यादें मेरा सहारा बनती हैं. इस घर को मैं नहीं छोड़ सकती.’

विभा ने साफ मना किया तो नंदिता बोली, ‘ठीक है मांजी, फिर मैं औफिस जाते समय गौतम को यहां छोड़ जाया करूंगी और लौटते समय ले जाया करूंगी.’

‘यह ठीक रहेगा,’ विभा ने अपनी सहमति देते हुए कहा. हालांकि उन का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, पर वह अपने एकाकी जीवन से बहुत ऊब चुकी थी. अब दिन भर गौतम उस के साथ रहेगा. इस कल्पना मात्र से ही वह खुश थी.

जब कुमार साहब को इस बात पता चला कि दिनभर गौतम की देखभाल विभा करेगी तो उन्हें यह अच्छा न लगा. अतएव झुंझला कर बोले, ‘जिम्मेदारी लेने से पहले अपना स्वास्थ्य तो देखा होता. दिनभर एक बच्चे को संभालना कोई आसान काम है?’

‘अपने बच्चे हैं. अपने बच्चों के हम ही काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा?’ विभा ने समझाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘गौतम यहां रहेगा तो क्या मुझे अच्छा नहीं लगेगा? मुझे भी अच्छा लगेगा, पर मुझे दुख तो इस बात का है कि तुम्हारे ये स्वार्थी बच्चे काम पड़ने पर तो अपने बन जाते हैं, पर काम निकलते ही पराए हो जाते हैं,’ कुमार साहब बोले तो विभा ने चुप रहने में ही भलाई समझी.

जैसे ही छोटी बहू स्मिता को पता चला कि गौतम दिनभर मांजी के पास रहा करेगा, वैसे ही उस ने भी अपनी बेटी ऋचा को वहां छोड़ने का निर्णय ले लिया.

2 दिनों बाद से ही गौतम और ऋचा पूरा दिन अपनी दादी के साथ बिताने लगे. विभा का पूरा दिन उन दोनों के छोटेछोटे कामों में कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था. कुछ महीने हंसीखुशी बीत गए, पर जैसेजैसे वे बड़े हो रहे थे, विभा के लिए समस्याएं बढ़ती जा रही थीं. अब बच्चे आपस में लड़तेझगड़ते तो थे ही, पूरे घर को भी अस्तव्यस्त कर देते थे, जिसे फिर से जमाने में विभा को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी.

विभा अपनी परेशानियों को कुमार साहब से छिपाने का लाख प्रयत्न करती, पर उन से कुछ छिपा न रहता था. एक दिन वे औफिस से लौटे तो देखा कि विभा के पैर में पट्टी बंधी थी.

‘क्या हुआ पैर में?’ कुछ परेशान होते हुए उन्होंने पूछा.

‘कुछ नहीं,’ विभा ने बात टालने का प्रयत्न किया, पर तभी पास खेलती ऋचा तुतलाती आवाज में बोली, ‘‘दादाजी, दौतम ने तांच ता दिलाछ तोल दिया. दादीमां तांच उथा लही थी. तबी इनते पैल में तांच लद दया. दादाजी, आप दौतम को दांतिए. वह भोत छलालती है. दादीमां को भोत तंग कलता है,’’ ऋचा गौतम की शिकायत लगाते हुए लाड़ से दादाजी के गले में झूल गई.

ऋचा की प्यारीप्यारी तुतलाती बातें सुन कर कुमार साहब मुसकरा दिए,  ‘और तू भी अपनी दादीमां को तंग करती है,’ उन्होंने कहा तो वह तुरंत गरदन हिलाते हुए बोली, ‘नहींनहीं, मैं तभी इन्हें पलेछान नहीं तलती. मैं तो हमेछा इनता ताम ही तरती हूं. बले ही पूछ लो दादीमां छे.’

अभी कुमार साहब और विभा ऋचा की प्यारीप्यारी बातों का आनंद उठा ही रहे थे कि तभी गौतम के चिल्लाने की आवाज आई.

‘अरे, क्या हुआ?’ कहती हुई विभा दूसरे कमरे में भागी. गौतम वहां आंखों में आंसू भरे अपने पैर को पकड़ कर बैठा था.

‘क्या हुआ बेटा?’ विभा ने उसे पुचकारते हुए पूछा.

‘दादीमां, मैं तो स्टूल पर चढ़ कर अलमारी की सफाई कर रहा था, पर पता नहीं स्टूल कैसे खिसक गया और मैं गिर पड़ा,’ गौतम ने सफाई देते हुए कहा.

‘पैर पकड़े क्यों बैठा है? क्या पैर में चोट लग गई?’

‘हां दादीमां, पैर मुड़ गया,’ पैर को और जोर से पकड़ते हुए वह बोला.

विभा ने गौतम को खड़ा कर के चलाने का प्रयास किया, पर दर्द काफी था, वह चल नहीं सका.

‘लगता है गौतम के पैर में मोच आ गई है,’ विभा ने कुमार साहब को बताया तो वे उसे ले कर तुरंत डाक्टर के पास पहुंचे.

मन ही मन वे झुंझला रहे थे कि अब बुढ़ापे में यही काम रह गया हमारा. सचमुच गौतम के पैर में मोच आ गई थी. रात को नंदिता गौतम को लेने के लिए पहुंची तो उस के पैर में मोच आई देख कर वह भी परेशान हो उठी.

कुमार साहब और विभा ने जब नंदिता को गौतम से यह पूछते हुए सुना कि तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई तो वे सन्न रह गए.

‘अभी भी तुम्हारा मोहभंग हुआ या नहीं?’ कुमार साहब ने उदास सी मुसकान बिखेरते हुए पूछा, पर विभा मौन थी मानो उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था. पर बहू का वह वाक्य  ‘तुम्हारी दादीमां क्या कर रही थीं जो तुम्हें चोट लग गई,’ उस के कानों में बारबार गूंज रहा था.

ममता की मारी विभा को बच्चों के मोहपाश ने बुरी तरह जकड़ रखा था. वह उस से निकलने का जितना प्रयास करती, उस की जकड़न उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाती. स्थिति यहां तक पहुंची कि विभा ने बिस्तर ही पकड़ लिया.

पिछले कई दिनों से विभा को बुखार था. कुमार साहब ने अमित को फोन कर दिया, ‘बेटा अमित, तुम्हारी मां की तबीयत काफी खराब है. आज तुम गौतम को यहां मत भेजना, वह संभाल नहीं सकेगी. विजय को भी कह देना कि वह भी ऋचा को न भेजे.’

‘पर बाबूजी, ऐसे कैसे चलेगा? नंदिता की नईनई नौकरी है, उसे तो छुट्टी नहीं मिल सकती. मैं कोशिश करूंगा, यदि मुझे छुट्टी मिल गई तो आज मैं गौतम को रख लूंगा. विजय को भी मैं बता दूंगा.’

अगले दिन अमित और विजय के ड्राइवर आ कर दोनों बच्चों को विभा के पास छोड़ गए, साथ ही कह गए कि उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मजबूर हो कर कुमार साहब ने छुट्टी ली और दोनों बच्चों की देखभाल की. दिनभर उन की शरारतों से वे परेशान हो गए.

शाम के समय जब विभा की तबीयत कुछ संभली, तब कुमार साहब ने उसे फिर समझाया, ‘देख लिया अपने बच्चों को? तुम उन के बच्चे पालने में दिनभर खटती रहती हो और तुम्हारी दोनों में से एक बहू से भी यह न हुआ कि 1 दिन की छुट्टी ले कर तुम्हारी देखभाल कर लेती.’

‘क्या करें, उन की भी कोई मजबूरी होगी,’ कह विभा ने करवट बदल ली.

रात को दोनों बेटे बच्चों को लेने आए. जितनी देर वे वहां बैठे, अपनी सफाईर् पेश करते रहे.

‘मां, नंदिता के औफिस में आज बाहर से कोई पार्टी आई हुई थी, इसलिए उसे छुट्टी नहीं मिली और मुझे भी जरूरी मीटिंग अटैंड करनी थी.’

अमित ने कहा तो विजय भी कैसे चुप रहता. बोला, ‘मां, स्मिता ने भी छुट्टी लेने की बहुत कोशिश की, पर उस के कालेज में आजकल परीक्षाएं चल रही हैं. और मैं तो अभी शाम को ही टूर से लौटा हूं.’

कुमार साहब यह अच्छी तरह समझ गए थे कि यहां रह कर विभा को आराम नहीं मिलेगा. उस के स्वार्थी बेटे और बहुएं उस की ममता का नाजायज फायदा उठाते रहेंगे. इसलिए उन्होंने कुछ समय के लिए घर से बाहर जाने की सोची थी.

विभा सोच रही थी कि यदि वे नैनीताल चले जाएंगे तो गौतम और ऋचा की देखभाल कौन करेगा. उस ने अपने मन की बात कुमार साहब से कही तो वह भड़क उठे,  ‘‘अरे, जिन के अपने शहर में नहीं रहते उन के बच्चे क्या नहीं पलते? तुम्हारे बेटेबहू इतना कमाते हैं, क्या बच्चों के लिए नौकर नहीं रख सकते? क्या इस शहर में शिशुगृहों की कमी है? तुम ने उन के बच्चों की जिम्मेदारी ले रखी है क्या? उन्हें अपनेआप संभालने दो अपने बच्चों को.’’

जब अमित और विजय को मालूम हुआ कि मां और बाबूजी नैनीताल जा रहे हैं तो वे परेशान हो उठे.

‘‘मांजी, 2 महीने बाद मेरे कालेज में छुट्यिं हो जाएंगी. आप तब चली जाना नैनीताल. यदि आप चली गईं तो बच्चों को कौन संभालेगा,’’ स्मिता ने अपनी परेशानी बताते हुए विभा से कहा.

विभा क्या उत्तर देती, वह तो स्वयं परेशान थी. तभी पास बैठे कुमार साहब बोले, ‘‘बेटी, यदि हम नैनीताल नहीं जाएंगे तब भी तुम्हारी सास की तबीयत ऐसी नहीं है कि वह 2-2 बच्चों को संभाल सके. यह भला किस का सहारा बनेगी, इसे तो स्वयं सहारे की जरूरत है.’’

बाबूजी की बात सुन कर सब चुप थे. पहली बार उन्हें एहसास हो रहा था कि  उन्हें मांबाबूजी कि कितनी जरूरत थी. कुमार साहब और विभा नैनीताल के लिए रवाना हो गए. विभा उदास थी. कुमार साहब भी खुश न थे. उन के सामने अपने बच्चों के परेशान चेहरे घूम रहे थे. कुमार साहब को उदास देख कर विभा ने पूछा, ‘‘आप उदास क्यों हैं? आप को खुश होना चाहिए, हम नैनीताल जा रहे हैं.’’

‘‘तुम क्या सोचती हो कि बच्चों को परेशान देख कर मुझे अच्छा लगता है? पर मैं यह नहीं चाहता कि बच्चे हमारे प्यार का गलत फायदा उठाएं. इस के लिए उन्हें सबक देना जरूरी है और इस के लिए कठोर भी होना पड़े तो झिझकना नहीं चाहिए.’’

कुमार साहब की बात सुन कर विभा संतुष्ट थी. उस के चारों ओर घिरे उदासी के बादल छंटने लगे थे. वह समझ गई थी कि इस मोहपाश में जकड़ कर वह मां का कर्तव्य पूरा नहीं कर पाएगी. आज पहली बार उसे अनुभव हुआ कि जिस मोहपाश में वह अब तक घिरी थी, उस की जकड़न स्वत: ही ढीली हो रही है.

Mother’s Day Special: ममता की मूरत

रात का लगभग 8 बजे का समय था. मैं औफिस से आ कर खाना बना रही थी और राकेश अपने लैपटौप पर अभी भी औफिस के ही काम में उलझे हुए थे. तभी फोन की घंटी बजी. किस का फोन है, यह उत्सुकता मुझे किचन से खींच लाई. मैं ने देखा राकेश फोन पर बात करते हुए बहुत परेशान हो उठे हैं.

‘प्लीज, आप उन्हें अस्पताल पहुंचा दीजिए. मैं फौरन निकल रहा हूं, फिर भी मुझे पहुंचने में 2-3  घंटे तो लग ही जाएंगे,’ इतना कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया. इस से पहले कि मैं कुछ पूछती उन्होंने हड़बड़ी में मुझे पूरी बात बताते हुए अपने कुछ कपड़े और जरूरी सामान बैग में रखना शुरू कर दिया.

राकेश की चाचीजी, जो मथुरा में रहती हैं अचानक बहुत बीमार हो गई थीं. उन की हालत को देखते हुए किसी पड़ोसी ने हमें फोन किया था. चाचीजी का हमारे सिवा इस दुनिया में और है ही कौन? उन की अपनी औलाद तो है नहीं और चाचाजी का कुछ वर्ष हुए देहांत हो चुका है.

हमारी शादी में चाचीजी ने ही मेरी सास की सारी रस्में की थीं. राकेश के मातापिता तो बहुत पहले एक कार ऐक्सीडैंट में मारे गए थे. तब राकेश की दीदी गरिमा तो अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश कर रही थीं, लेकिन राकेश स्कूल में पढ़ रहे थे. अपनी दीदी से 8 साल छोटे जो हैं. तब चाचाचाची ने ही दीदी की शादी की थी और राकेश को स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई के लिए होस्टल भेज दिया था. चाचाचाची ने दीदी को और मुझे अपनी औलाद की तरह प्यार दिया है, यह बात इन 2 वर्षों में राकेश मुझे कई बार बता चुके हैं.

पहले पूरा परिवार साथ ही रहता था लेकिन राकेश जब चौथी कक्षा में पढ़ते थे, तभी इन के चाचाजी का तबादला मथुरा हो गया था. इस के बाद तो उन के तबादला कई और शहरों में भी होता रहा लेकिन मथुरा में उन्होंने अपना घर बना लिया था, इसलिए उन के देहांत के बाद चाचीजी मथुरा आ गई थीं. और वे जाती भी कहां?

मेरा चाचीजी से ज्यादा परिचय नहीं था. हमारी शादी के वक्त वे सिर्फ 5-6 दिन हमारे साथ रही थीं. दरअसल, हम दोनों बैंकाक घूमने जाना चाहते, इसलिए वे मथुरा लौट गई थीं. मैं क्याक्या सोचने लग गई थी. राकेश की आवाज से मैं वर्तमान में लौटी. वे कह रहे थे कि देखो जल्दी में मैं कहीं कुछ रखना तो नहीं भूल गया.

बैग पैक हो गया तो राकेश अकेले चाचीजी को कैसे संभालेंगे यह सोच कर मैं ने भी साथ चलने की बात की तो वे बोले कि पहले जा कर स्थिति देख लूं, जरूरत हुई तो तुम्हें भी बुला लूंगा. फिर वे मथुरा के लिए रवाना हो गए.

शादी के बाद यह पहला अवसर था जब मैं रात के समय घर में अकेली थी. अजीब सा डर व बेचैनी मुझे सोने नहीं दे रही थी. रात 2 बजे के लगभग राकेश से मेरी बात हुई. पता लगा चाचीजी बेहोश हैं. कई तरह के टैस्ट हो रहे हैं, अभी कुछ ठीक से कहा नहीं जा सकता. राकेश काफी परेशान लग रहे थे.

अगली सुबह 11 बजे राकेश का फोन आया कि वे चाचीजी के इलाज तथा डाक्टरों के रवैये से संतुष्ट नहीं हैं. वे उन्हें ले कर दिल्ली आ रहे हैं. दिल्ली के एक अस्पताल से बातचीत चल रही है.

शाम होतेहोते वे चाचीजी को ले कर दिल्ली पहुंच गए. नीम बेहोशी की हालत में चाचीजी बहुत ही कमजोर लग रही थीं. रंग भी पीला पड़ा हुआ था. उन के अस्पताल पहुंचने से पहले ही मैं वहां पहुंच गई. डाक्टरों ने तत्परता से इलाज शुरू कर दिया.

5 दिनों बाद चाचीजी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, लेकिन डाक्टरों ने दवा के साथसाथ परहेज और आराम करने की सख्त हिदायत दी थी. हम उन्हें घर ले आए. बीमारी कोई विशेष नहीं थी. बढ़ती उम्र, अकेलापन, चिंता, काम की थकान, उस पर ठीक से समय पर न खाना बीमारी के कारण थे.

हम दोनों के लिए अब और छुट्टियां लेना मुश्किल था. उन के लिए किसी नौकर या नर्स का प्रबंध नहीं हो पा रहा था, इसलिए हम ने घर पर काम करने वाली बाई को ही दिन भर में 2-3 चक्कर लगा कर उन्हें दूध, चाय, नाश्ता आदि देते रहने के लिए कहा और औफिस जाना शुरू कर दिया था. हां, दिन में कई बार हम फोन पर चाचीजी से बात कर लेते थे. उन का हालचाल जान लेते थे. कोई परेशानी तो नहीं? पूछते रहते थे.

राकेश की तो पता नहीं हां, मेरी परेशानियां कुछ बढ़ गई थीं. आज तक जो घर सिर्फ हमारा था वह एकाएक मुझे मेरी ससुराल लगने लगा था. अब उठनेबैठने, पहननेओढ़ने में मैं कुछ बंदिशें महसूस करने लगी थी. हालांकि चाचीजी ने इस बारे कभी कुछ कहा नहीं था, लेकिन उन का घर पर होना ही मेरे लिए काफी था.

लेकिन मैं पूरे उत्साह से यह सब कर रही थी, क्योंकि चाचीजी आशा से कहीं जल्दी स्वास्थ्य लाभ कर रही थीं. 1 सप्ताह बाद ही उन्हें कामवाली की जरूरत नहीं रही. वे अपने छोटेछोटे काम स्वयं ही उठ कर करने लगी थीं. मैं खुश थी कि वे जल्दी ही ठीक हो कर मथुरा लौट जाएंगी. कुछ ही दिनों की तो बात है.

एक दिन राकेश बोले कि अब हम चाचीजी को वापस नहीं जाने देंगे. वे अब हमारे साथ ही रहेंगी. अब इस उम्र में उन का अकेले रहना मुश्किल है. फिर बीमार हो गईं तो? फिर हमारा भी तो उन के प्रति कोई कर्तव्य है. उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है. राकेश ने कुछ गलत तो नहीं कहा था लेकिन मेरा मन बेचैन हो उठा.

मुझे याद है जब मेरे लिए राकेश का रिश्ता आया तो मम्मीपापा ने मेरी राय पूछी थी. राकेश दिखने में कैसे हैं? पढ़ेलिखे कितना हैं? कमाते कितना हैं? यह सब जानने की मुझे जरूरत ही महसूस नहीं हुई थी क्योंकि लगा था कि मम्मीपापा और मामाजी ने देख लिया है तो सब ठीक ही होगा. मेरे लायक ही होगा. मैं तो लड़के के परिवार के बारे में जानना चाहती थी. पूछा तो पता लगा कि घर में सासससुर नहीं हैं. बस एक बड़ी बहन है, जो शादीशुदा है. मेरे लिए इतना ही जानना काफी था क्योंकि मेरे दिमाग में सास की छवि ऐसी थी जिस से बहू हमेशा डरीसहमी रहती है. मेरी सहेली जया, जिस की शादी कुछ ही महीने पहले हुई थी, उस से जब भी बात होती थी वह अपने पति के बारे में कम सास के बारे में बात ज्यादा करती थी. हमेशा परेशान रहती थी.

उस पर मेरी दीदी जबतब मायके आतीं तो कई दिनों तक लौटने का नाम नहीं लेती थीं. हमेशा मां ही उन्हें समझाबुझा कर वापस भेजती थीं. उन्हें भी पति या देवर से नहीं सास से ही ढेरों शिकायतें होती थीं.

लेकिन हमारे यहां तो राकेश की चाचीजी रहने वाली थीं. अपनी सास की तो चलो कोई 2 बात सुन भी ले, चचियासास की बातें, ताने, उलाहने भला कोई क्यों सुने? हालांकि ऐसा सोचना बड़ा ही गलत था, स्वार्थी सोच था, लेकिन मुझे बहुत परेशान करने लगा था.

एक शाम औफिस से घर पहुंची तो देखा चाचीजी ने मशीन लगा कर घर भर के मैले कपड़े इकट्ठा कर धो डाले थे. मैं तो इतवार को ही मशीन लगा कर सप्ताह भर के कपड़े धोती हूं. पिछले दिनों चाचीजी की बीमारी के चक्कर में यह काम रह ही गया था. इतने कपड़े एकसाथ धुले देख कर मैं हैरान रह गई, ‘‘यह क्या चाचीजी, आप ने यह सब क्यों किया? आप को तो अभी आराम करना चाहिए.’’

‘‘दिन भर आराम ही तो करती हूं सीमा, फिर आजकल मशीन में कपड़े धोना भी कोई काम है?’’ कहते हुए चाचीजी हंस दीं.

अब रात के खाने के वक्त गपशप का दौर चलने लगा था. चाचीजी राकेश के बचपन की आदतों, शरारतों के बारे में बतातीं. मुझे मेरी ससुराल के बारे में बहुत सी ऐसी बातें भी बतातीं, जिन्हें बताने वाला कोई नहीं था. राकेश की चिढ़, पसंदनापसंद के बारे में भी मुझे पता लग रहा था. अब मुझे उन्हें चिढ़ाने, छेड़ने में बड़ा मजा आ रहा था. ऐसे में चाचीजी भी हंसते हुए मेरा पूरा साथ देती थीं.

हम शाम को औफिस से लौटते तो चाचीजी बढि़या सा स्वादिष्ठ नाश्ता बना कर हमारा इंतजार कर रही होतीं. अब सुबहशाम मुझे सब्जी कटी हुई मिलती, सलाद तैयार और तरहतरह की चटनियां पिसी मिलतीं. वे अकसर आटा भी गूंध दिया करती थीं. यह सब देख कर यही लगता कि वे दिन भर पल भर को भी बैठती नहीं हैं.

अब घर में कोई हर चीज अपने ठिकाने पर करीने से रखी मिलती, जिन्हें पहले हम अकसर समय की कमी के कारण यहांवहां इस्तेमाल के बाद छोड़ दिया करते थे.

एक छुट्टी के दिन हम चाचीजी को मौल घुमाने ले जा रहे थे. उन्होंने रास्ते में एक जगह गाड़ी रोकने के लिए कहा तो हम हैरान रह गए. फिर भी राकेश ने तुरंत गाड़ी रोकी तो चाचीजी फौरन उतर कर पास के एटीएम की ओर बढ़ गईं. 2 ही मिनटों बाद वे नोट हाथ में ले कर लौटीं.

हमें हैरान देख कर वे बोलीं, ‘‘हैरान मत हो. अपनी हालत को देखते हुए यह कार्ड मैं ने अस्पताल के सामान के साथ रख लिया था. वहां अस्पताल में पैसों की जरूरत तो पड़नी ही थी न? पर मुझे क्या पता था मेरी हालत इतनी बिगड़ जाएगी कि पड़ोसी को फोन कर के तुम्हें बुलाना पड़ेगा.’’

‘‘वह तो ठीक है  चाचीजी, लेकिन अब तो हम हैं. आप को पैसे निकलवाने की क्या जरूरत थी? वैसे क्षमा करना, आप को आए इतने दिन हो गए, खयाल ही नहीं आया मुझे. आप से पूछना चाहिए था आप की जरूरत के बारे में,’’ राकेश ने झेंपते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं बेटा मुझे भला पैसों का क्या करना है? लेकिन पहली बार अपने बेटेबहू के साथ बाजार जा रही हूं तो पैसे पास में होने ही चाहिए. चलोचलो देर हो रही है,’’ चाचीजी ने पूरे उत्साह से कहा.

मौल में पहुंचते ही चाचीजी रेडीमेड कपड़ों के शोरूम में चली गईं. हमें लगा वे बीमारी की हालत में इतनी जल्दी में अस्पताल आईं कि साथ में बहुत सी चीजें नहीं ला पाईं. उन्हें कपड़ों के लिए परेशानी होती होगी, इसलिए वहां गई हैं. लेकिन रेडीमेड शर्ट और जींस के काउंटर पर जा कर वे राकेश से कपड़े खरीदने के लिए कहने लगीं. राकेश ने बहुत मना किया लेकिन वे कब मानने वाली थीं.

राकेश जींस ट्राई कर रहे थे तब मुझ से बोलीं, ‘‘आजकल की सब लड़कियां जींस पहनती हैं. दफ्तर जाने वाली तो कहती हैं कि इस में उन्हें सुविधा रहती है. बहू, तुम नहीं पहनतीं?’’

उन की बात सुन कर मैं हैरान रह गई. पुरानी पीढ़ी की हो कर भी वे ऐसी बात कह रही हैं?

‘‘नहींनहीं चाचीजी मैं भी…’’ कहते हुए मैं रुक गई. लगा कहीं यों ही बातोंबातों में मुझ से कुछ उगलवाना तो नहीं चाह रहीं.

‘‘पहनती हो लेकिन मेरे कारण रोज साड़ी और सूट की बंदिशों में कैद हो गई हो. लेकिन मैं ने तो कभी कुछ कहा ही नहीं,’’ चाचीजी बड़ी मासूमियत से बोलीं.

‘‘बहू, तुम भी अपने लिए एक जींस और एक बढि़या सी टौप खरीद लो. मैं भी तो देखूं मेरी बहू इन कपड़ों में कैसी लगती है,’’ कहते हुए उन्होंने मेरे लिए कपड़े पसंद करने शुरू कर दिए. मैं हैरान सी खड़ी उन्हें देखती रह गई. अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आ रहा था, लेकिन यह सब सच था सपना नहीं.

कपड़े खरीदते ही चाचीजी बोलीं, ‘‘भई, बहुत भूख लग रही है. वैसे भी मेरे ठीक होने की खुशी में एक बढि़या सी दावत होनी ही चाहिए.’’

रेस्टोरैंट में हमारे मना करने पर भी चाचीजी ने बहुत कुछ मंगवा लिया, उस पर आइसक्रीम भी. बाद में राकेश जब वहां पैसे देने लगे तो उन्होंने तुरंत नोट उन के हाथ में पकड़ाते हुए कहा, ‘‘ये लो तुम ही दे दो. क्या फर्क पड़ता है.’’ इस पर हम तो हंस ही रहे थे, बिल लाने वाला वेटर भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया.

घर आ कर राकेश ने कहा कि आप को इतने पैसे खर्च नहीं करने चाहिए थे तो वे बोलीं, ‘‘तुम्हारे चाचाजी के बाद अब मुझे पैंशन मिलती है. मैं अकेली जान अब इस उम्र में अपने पर कितना खर्च करूंगी?’’

वे जब से ठीक हुई हैं अकसर शाम को सैर करने चली जाती हैं. फल, सब्जियां, दूध और मिठाई न जाने क्याक्या ले कर ही लौटती हैं. खाली हाथ कभी नहीं आतीं.

सुबह हम औफिस के लिए तैयार हो रहे थे तो वे पास आ कर बोलीं, ‘‘बेटा राकेश, अब मैं बिलकुल ठीक हूं. अब मेरा वापसी का टिकट करवा दो.’’

सुनते ही हम दोनों अवाक रह गए.

‘‘क्या हुआ चाचीजी, आप को यहां कोई परेशानी है क्या?’’ हम दोनों एकसाथ बोल उठे.

‘‘नहींनहीं बेटा, अपने घर में कैसी परेशानी. फिर भी लौटना तो होगा ही न.

2 महीने हो गए हैं, मैं कब तक तुम लोगों…’’

सुनते ही मैं परेशान हो उठी, ‘‘चाचीजी, आप से इतना तो मना करते हैं फिर भी आप अपनी मरजी से दिन भर काम में लगी रहती हैं.’’

‘‘नहींनहीं सीमा, मैं काम की बात नहीं कर रही. यह भी कोई काम है. बटन दबाया कपड़े धुल गए. बटन दबाया चटनी, मसाला पिस गया. घर की सफाई और बरतन का काम तो कामवाली कर जाती है. दिन भर में काम ही कितना होता है? लेकिन बेटा 2 महीने हो गए हैं, कब तक तुम लोगों पर बोझ बनी रहूंगी?’’

बोझ शब्द सुनते ही मेरी आंखें भर आईं. मैं उन से लिपट गई. ऐसी ममता की मूरत भला बोझ कैसे हो सकती है? कितनी गलत सोच थी मेरी सास के बारे में. मुझे चाचीजी से कोई शिकायत नहीं. कितनी परेशान हो गई थी मैं जब राकेश ने उन के यहीं रहने की बात की थी. लेकिन अब मैं उन के बिना जीने की कल्पना ही नहीं कर सकती थी. उन के प्यार, आशीर्वाद और उन की उपस्थिति के बिना हमारा जीवन, हमारा घरपरिवार कितना अधूरा रह जाएगा. कौन हर शाम घर पर हमारा इंतजार करेगा? कौन भूख न होने पर भी मनुहार कर के हमें खाना खिलाएगा? कौन बिना किसी स्वार्थ के हम पर इतना निश्छल स्नेह लुटाएगा?

हम दोनों ने उन्हें साफ शब्दों में कह दिया कि वे अब कहीं नहीं जाएंगी. अब इस उम्र में हमारे होते हुए वे अकेली नहीं रहेंगी. अब यह उन की मरजी है कि वे अपने मथुरा वाले घर पर ताला लगाना चाहती हैं या उसे किराए पर उठाना चाहती हैं. हमारी जिद और हमारे प्यार के आगे उन की एक नहीं चली.

चाचीजी कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘तुम इतना कहते हो तो तुम्हारे पास ही रह जाऊंगी, लेकिन मेरी एक शर्त है.’’

मैं समझ गई कि चाचीजी क्या कहना चाहती हैं. मैं झट से बोली, ‘‘आप एक बार मथुरा जा कर अपने कुछ कपड़े, कुछ जरूरी सामान लाना चाहती हैं न? इस में शर्त की क्या बात है, अगले ही वीक ऐंड पर हम दोनों आप को मथुरा ले चलेंगे.’’

‘‘वह तो मैं जाऊंगी ही पर मेरी शर्त तो कुछ और ही है.’’

चाचीजी के इतना कहते ही मैं कुछ परेशान हो गई. सोचा, पता नहीं वे क्या शर्त रखेंगी.

तभी राकेश बोल उठे, ‘‘चाचीजी, शर्त क्यों आप तो आदेश दीजिए क्या चाहिए?’’

हमारे परेशान चेहरे को देख कर चाचीजी की हंसी निकल गई. वे हंसते हुए बोलीं, ‘‘हांहां, शर्त नहीं मेरा आदेश ही है कि यदि मुझे यहां रोकना है तो मुझे जल्दी से एक पोता देना होगा. 2 साल हो गए हैं शादी को, कब तक यों ही डोलते रहोगे?’’

सुनते ही हम दोनों शरमा गए. जिस प्यार और अधिकार से चाचीजी ने कहा है तो हमारे सोचने के लिए कुछ बचा ही कहां है. चाचीजी ने हमारे जीवन को नए माने दे दिए हैं. पता नहीं ममता की यह मूरत वर्षों बिना औलाद के कैसे रही होगी? चलो बीमारी के बहाने ही सही, वे हमारे पास अपनी ममता लुटाने तो आ गई हैं.

Mother’s Day Special: आनंदी – ममता के डौलर

पलंग पर चारों ओर डौलर बिखरे हुए थे. कमरे के सारे दरवाजे व खिड़कियां बंद थीं, केवल रोशनदान से छन कर आती धूप के टुकड़े यहांवहां छितराए हुए थे. डौलर के लंबेचौड़े घेरे के बीच आनंदी बैठी थीं. उन के हाथ में एक पत्र था. न जाने कितनी बार वे यह पत्र पढ़ चुकी थीं. हर बार उन्हें लगता कि जैसे पढ़ने में कोईर् चूक हो गई है, ऐसा कैसे हो सकता है. उन का बेटा ऐसे कैसे लिख सकता है. जरूर कोई मजबूरी रही होगी उस के सामने वरना उन्हें जीजान से चाहने वाला उन का बेटा ऐसी बातें उन्हें कभी लिख ही नहीं सकता. हो सकता है उस की पत्नी ने उसे इस के लिए मजबूर किया हो.

पर जो भी वजह रही हो, सुधाकर ने जिस तरह से सब बातें लिखी थीं, उस से तो लग रहा था कि बहुत सोचसमझ कर उस ने हर बात रखी है.

कितनी बार वे रो चुकी थीं. आंसू पत्र में भी घुलमिल गए थे. दुख की अगर कोई सीमा होती है तो वे उसे भी पार कर चुकी थीं.

ताउम्र संघर्षों का सामना चुनौती की तरह करने वाली आनंदी इस समय खुद को अकेला महसूस कर रही थीं. बड़ीबड़ी मुश्किलें भी उन्हें तोड़ नहीं सकी थीं, क्योंकि तब उन के पास विश्वास का संबल था पर आज मात्र शब्दों की गहरी स्याही ने उन के विश्वास को चकनाचूर कर दिया था. बहुत हारा हुआ महसूस कर रही थीं. यह उन को मिली दूसरी गहरी चोट थी और वह भी बिना किसी कुसूर के.

हां, उन का एक बहुत बड़ा कुसूर था कि उन्होंने एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था. उन्होंने ख्वाबों के घोंसलों में नन्हेंनन्हें सपने रखे थे और मासूम सी अपनी खुशियों का झूला अपने आंगन में डाला था. उमंगों के बीज परिवारनुमा क्यारी में डाले थे और सरसों के फूलों की पीली चूनर के साथ ही प्यार की इंद्रधनुषी कोमल पत्तियां सजा दी थीं. पर धीरेधीरे उन के सपने, उन की खुशियां, उन की पत्तियां सब बिखरती चली गईं. खुशहाल परिवार की तसवीर सिर्फ उन के मन की दीवार पर ही टंग कर रह गई. अपनी मासूम सी खुशियों का झूला जो बहुत शौक से उन्होंने अपने आंगन में डाला था, उस पर कभी बैठ झूल ही नहीं पाईं वे. हिंडोला हिलता रहता और वे मनमसोस कर रह जातीं.

शादी एक समझौता है, यह बात उन की मां ने उन की शादी होने से बहुत पहले ही समझानी शुरू कर दी थी. पर वे हमेशा सोचती थीं कि समझौता करने का तो मतलब होता है कि चाहे पसंद हो या न हो, चाहे मन माने या न माने, जिंदगी को दूसरे के हिसाब से चलने दो. फिर प्यार, एहसास, एकदूसरे के लिए सम्मान और समपर्ण की भावना कैसे पनपेगी उस बंधन में.

आनंदी को यह सोच कर भी हैरानी होती कि जब शादी एक बंधन है तो उस में कोईर् खुल कर कैसे जी सकता है. एकदूसरे को अगर खुल कर जीने ही नहीं दिया जाएगा या एक साथी, जो हमेशा पति ही होता है, दूसरे पर अपने विचार, अपनी पसंदनापसंद थोपेगा तो वह खुश कैसे रह पाएगा.

मां डांटतीं कि बेकार की बातें मत सोचा कर. इतना मंथन करने से चीजें बिगड़ जाती हैं. मां को उन्होंने हमेशा खुश ही देखा. कभी लगा ही नहीं कि वे किसी तरह का समझौता कर रही हैं. पापामम्मी का रिश्ता उन्हें बहुत सहज लगता था. फिर बड़ी दीदी और उस के बाद मंझली दीदी की शादी हुई तो उन को देख कर कभी नहीं लगा कि वे दुखी हैं. आनंदी को तब यकीन हो गया था कि उन्हें भी ऐसा ही सहज जीवन जीने का मौका मिलेगा. सारे मंथन को विराम दे, वे रंजन के साथ विवाह कर उन के घर में आ गईर् थीं.

शुरुआती दिन घोंसले का निर्माण करने के लिए तिनके एकत्र करने में फुर्र से उड़ गए, खट्टेमीठे दिन, थोड़ीबहुत चुहलबाजी, दैहिक आकर्षण और उड़ती हुई रंगबिरंगी तितलियों से बुने सपनों के साथ. समय बीता तो आनंदी को एहसास होने लगा कि रंजन और वे बिलकुल अलग हैं. रंजन रिश्ते को सचमुच बंधन बनाने में यकीन रखते हैं. खुल कर सांस लेना मुश्किल हो गया उन के लिए.

दरवाजे पर खटखट हुई तो आनंदी सोच और डौलरों के घेरे से हिलीं. अंधेरा था कमरे में. दोपहर कब की शाम की बांहों में समा गई थी. लाइट जलानी ही पड़ी उन्हें.

‘‘मांजी दूध लाया हूं. आप डेयरी पर नहीं आईं तो मैं ही देने चला आया. एकदम ताजा निकाल कर लाया हूं.’’

चुपचाप दूध ले लिया उन्होंने. वरना अन्य दिनों की तरह कहतीं, ‘बहुत पानी मिलाने लगे हो आजकल.’ जब मेरा बेटा आएगा न, तब एकदम खालिस दूध लाना या तब ज्यादा दूध देना पड़ेगा तुझे. मेरे बेटे को दूध अच्छा लगता है. बड़े शौक से पीता है.

कमरे में आईं तो रोशनी आंखों को चुभने लगी. निराशा की परतें उन के चेहरे पर फैली हुई थीं. ऐसा लग रहा था कि मात्र कुछ घंटों में ही वे 2 साल बूढ़ी हो गई हैं. उदास नजरों से उन्होंने एक बार फिर डौलरों को देखा. पलकें नम हो गईं. नहीं देखना चाहतीं वे इन डौलरों को. क्या करेंगी वे इन का. जीरो वाट का बल्ब जलाया उन्होंने. लेकिन धुंधले में भी डौलर चमक रहे थे. उन के भीतर जो पीड़ा की लपटें सुलग रही थीं, उन की रोशनी से खुद को बचाना उन के लिए ज्यादा मुश्किल था.

रंजन के साथ लड़ाई होना आम बात हो गई थी. वे कुछ फैसला लेतीं, उस से पहले ही उन्हें पता चला कि उन के अंदर एक अंकुर फूट गया है. सचमुच समझौता करने लगीं वे उस के बाद. उम्मीद भी थी कि रंजन घर में बच्चा आने के बाद सुधर जाएंगे. ऐयाशियां, दूसरी औरतों से संबंध रखना और शराब पीना शायद छोड़ दें, पर वे गलत थीं.

बच्चा आने के बाद रंजन और उग्र हो गए और बोलने लगे, बहुत कहती थी न कि चली जाएगी. अकेले बच्चे को पालना आसान नहीं. हां, वे जानती थीं इस बात को, इसलिए सहती रहीं रंजन की ज्यादतियों को.

तब मां ने समझाया, तू नौकरी करती है न, चाहे तो अलग हो जा रंजन से. हम सब तेरे साथ हैं. वह नहीं मानी. जिद थी कि समझौता करती रहेंगी. सुधाकर पर रंजन का बुरा असर न पड़े, यह सोच कर दिल पर पत्थर रख कर उसे होस्टल में डाल दिया.

उन की सारी आस, उम्मीद अब सुधाकर पर ही आ कर टिक गई थी. बस, वे चाहती थीं कि सुधाकर खूब पढे़ और रंजन के साए से दूर रहे. वैसे भी रंजन के सुधाकर को ले कर न कोई सपने थे न ही वे उस के कैरियर को ले कर परेशान थे. संभाल लेगा मेरा बिजनैस, बस वे यही कहते रहते. आनंदी नहीं चाहती थीं कि सुधाकर उन का बिजनैस संभाले जो लगभग बुरी हालत में था. उन का औफिस दोस्तों का अड्डा बन चुका था.

वे कभी समझ ही नहीं पाईं रंजन को. कोई अपने परिवार से ज्यादा दोस्तों को महत्त्व कैसे दे सकता है, कोई अपनी पत्नी व बेटे से बढ़ कर शराब को महत्त्व कैसे दे सकता है, कोई परिवार संभालने की कोशिश कैसे नहीं कर सकता. पर रंजन ऐसे ही थे. जिम्मेदारी से दूर भागते थे. कमिटमैंट तो जैसे उन के लिए शब्द बना ही नहीं था.

यह तो शुक्र था कि सुधाकर मेहनती निकला. लगातार आगे बढ़ता गया. रंजन उन दोनों को छोड़ कर किसी और औरत के पास रहने लगे. सुधाकर अकसर दुखी रहने लगा. बिखरे हुए परिवार में सपने दम न तोड़ दें, यह सोच कर आनंदी ने अपनी जमापूंजी की परवा न कर उसे विदेश भेज दिया. वे चाहती थीं कि बेटा विदेश जाए, खूब पैसा और नाम कमाए ताकि उन के जीवन की काली परछाइयों से दूर हो जाए. उसे उन के जीवन की कड़वाहट को न झेलना पड़े. पतिपत्नी के रिश्तों में आई दीवारों व अलगाव के दंश उसे न चुभें.

मां से अलग होना सुधाकर के लिए आसान न था. उस ने देखा था अपनी मां को अपने लिए तिलतिल मरते हुए, उस की खुशियों की खातिर त्याग करते हुए. वह नहीं जाना चाहता था विदेश, पर आनंदी पर जैसे जिद सवार हो गई थी. सब ने समझाया था कि ऐसा मत कर. बेटा विदेश गया तो पराया हो जाएगा. तू अकेली रह जाएगी. पर वे नहीं मानीं.

वे सुधाकर को कामयाब देखना चाहती थीं. वे उसे रंजन की परछाईं से दूर रखना चाहती थीं, मां की ममता तब शायद अंधी हो गईर् थी, इसीलिए देख ही नहीं पाईं कि बेटे को यह बात कचोट गई है.

पिता का प्यार जिसे न मिला हो और जो मां के आंचल में ही सुख तलाशता हो, जिस के मन के तार मां के मन के तारों से ही जुड़े हों, उस बेटे को अपने से दूर करने पर आनंदी खुद कितनी तड़पी थीं, यह वही जानती हैं. पर सुधाकर भी आहत हुआ था.

कितना कहा था उस ने, ‘मां, तुम मेरे बिना कैसे रहोगी. मैं यहीं पढ़ सकता हूं.’ पर वे नहीं मानीं और भेज दिया उसे आस्ट्रेलिया. फिर उसे वहीं जौब भी मिल गई. वह बारबार उन्हें बुलाता रहा कि मां अब तो आ जाओ. और वे कहती रहीं कि बस 2 साल और हैं नौकरी के, रिटायर होते ही आ जाऊंगी. वे जाने से पहले सारे लोन चुकाना चाहती थीं. बेटे पर कोई बोझ डालना तो जैसे आंनदी ने सीखा ही नहीं था. फिर विश्वास भी था कि बेटा तो उन्हीं का है. एक बार सैटल हो जाए तो कह देंगी कि आ कर सब संभाल ले. बुला लेंगी उसे वापस. कामयाबी की सीढि़यां तो चढ़ने ही लगा है वह.

नहीं आ पाया सुधाकर. जौब में उलझा तो खुद की जड़ें पराए देश में जमाने की जद्दोजेहद में लग गया. फिर उस की मुलाकात रोजलीना से हुई और उस से ही शादी भी कर ली. मां को सूचना भेज दी थी. पर इस बार आने का इसरार नहीं किया था. रोजलीना का साथ पा कर उस के बीते दिनों के जख्म भर गए थे. अपने परिवार को सींचने में वह मां के त्याग को याद रखना चाह कर भी नहीं रख पाया.

रोजलीना ने साफ कह दिया था कि वह किसी तरह की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं कर सकती. वैसे भी वह मानती थी कि इंडियन मदर अपने बेटों को ले कर बहुत पजैसिव होती हैं, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि आनंदी वहां उन के साथ आ कर रहें.

सुधाकर मां से यह सब नहीं कह सकता था. मां की तकलीफें अभी भी उसे कभीकभी टीस दे जाती थीं. पर अब उस की एक नई दुनिया बस गई थी और वह नहीं चाहता था कि मांपापा की तरह उस के वैवाहिक जीवन में भी कटुता की काली छाया पसरे.

रोजलीना को वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था. एक सुखद वैवाहिक जीवन की राह न जाने कब से उस के भीतर पलती आईर् थी. बहुत कठिन था उस के लिए मां और पत्नी में से एक को चुनना, पर मां के पास वह वापस लौट नहीं पा रहा था और पत्नी को छोड़ना नहीं चाहता था.

वैसे भी मां का उसे अपने से दूर करने की टीस भी उसे अकसर गहरी पीड़ा से भर जाती थी. पिता के प्यार से वंचित सुधाकर मां से दूर नहीं रहना चाहता था. भले ही मां ने उसे भविष्य संवारने के लिए अपने से उसे दूर किया था, पर फिर भी किया तो, अकसर वह यही सोचता. ऐसे में रोजलीना का पलड़ा भारी होना स्वाभाविक ही था.

आनंदी को लगा जैसे उन का गला सूख रहा है, पर पानी के लिए वे उठीं नहीं. रात गहरा गईर् थी. वे समझ चुकी थीं कि सुधाकर को विदेश भेजने की उन की जिद ने उन के जीवन में भी इस रात की तरह अंधेरा भर दिया है. बेटे की खुशियां चाहना क्या सच में इतना बड़ा कुसूर हो सकता है या नियति की चाल ही ऐसी होती है. शायद अकेलापन ही उन के हिस्से में आना था. वे जान चुकी थीं कि वह जा चुका है कभी न लौटने के लिए. उन्होंने एक बार और पत्र पढ़ा.

लिखा था, ‘‘मां, आई एम सौरी. मैं आप से दूर नहीं जाना चाहता था पर मुझे जाना पड़ा और अब चाह कर भी मैं स्वदेश वापस लौटने में असमर्थ हूं. आप के त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता और इस बात की ग्लानि भी रहेगी कि मैं आप के प्रति कोई फर्ज न निभा सका. शायद पापा से विरासत में मुझे यह अवगुण मिला होगा. जिम्मेदारी नहीं निभा पाया, तभी तो डौलर भेज रहा हूं और आगे भी भेजता रहूंगा. पर मेरे लौटने की उम्मीद मत रखना. अब मैं इस दुनिया में बस गया हूं, यहां से बाहर आ कर फिर भारत में बसना मुमकिन नहीं है. आप भी ऐसा ही चाहती थीं न.’’

आनंदी ने डौलरों पर हाथ फेरा. पूरी ममता जिस बेटे पर लुटा दी थी, उस ने कागज के डौलर भेज उस ममता के कर्ज से मुक्ति पा ली थी.

Mother’s Day Special- मिटते फासले: दो मांओं की दर्दभरी कहानी

मोबाइल फोन ने तो सुरेखा की दुनिया ही बदल दी है. बेटी से बात भी हो जाती है और अमेरिका दर्शन भी घर बैठेबिठाए हो जाता है. अमेरिका में क्या होता है, सुरेखा को पूरी खबर रहती है. मोबाइल के कारण आसपड़ोस में धाक भी जम गई कि अमेरिका की ताजा से ताजा जानकारी सुरेखा के पास होती है.

सर्दी का दिन था. कुहरा छाया हुआ था. खिड़की से बाहर देख कर ही शरीर में सर्दी की एक झुरझुरी सी तैर जाती थी. अभी थोड़ी देर पहले ही शालिनी से बात हुई थी.

शालिनी 2 महीने बाद छुट्टियों में भारत आ रही है. कुरसी खींच कर आंखें मूंद प्रसन्न मुद्रा में सुरेखा शालिनी के बारे में सोच रही थी. कितनी चहक रही थी भारत में आने के नाम से. अपनों से मिलने के लिए, मोबाइल पर मिलना एक अलग बात है. साक्षात अपनों से मिलने की बात ही कुछ और होती है.

विवाह के 5 वर्षों बाद शालिनी परिवार से मिलने भारत आएगी. 5 वर्षों  में काफीकुछ बदल गया है. शालिनी भारत से गई अकेली थी, वापस 2 बच्चों के साथ आ रही है.

परदेस की अपनी मजबूरी होती है. सुखदुख खुद अकेले ही सहना पड़ता है. इतने दिनों में बहुतकुछ बदल गया है. छोटे भाई की शादी हो गई. उस के भी 2 बच्चे हो गए. बड़े भाई का एक बच्चा था, एक और हो गया. नानी गुजर गईं. जिस मकान में रहती थी उस को बेच कर दिल्ली में आशियाना बना लिया. पापा बीमार चल रहे हैं. दुकान अब दोनों भाई चलाते हैं. पापा तो कभीकभार ही दुकान पर जाते हैं.

पंजाब का एक छोटा सा शहर है राजपुरा, जहां शालिनी का जन्म हुआ, पलीबढ़ी. पढ़ाई में मन लगता नहीं था. बस जैसेतैसे 12वीं पास कर पाई. मांबाप को चिंता विवाह की थी. घरेलू कामों में दक्ष थी, इसलिए बिना किसी खास कोशिश के राजपुरा से थोड़ी ही दूर मंडी गोबिंदगढ़ में एक मध्यवर्गीय परिवार के बड़े लड़के महेश के साथ रिश्ता संपन्न हुआ. महेश के पिता सरकारी कर्मचारी थे. महेश एक किराना स्टोर चलाता था.

सुरेखा शालिनी के विवाह से काफी खुश थी कि लड़की आंखों के सामने है. राजपुरा और मंडी की दूरी एक घंटे की थी, जब दिल चाहा मिल लिए. लेकिन यह खुशी मुश्किल से 5 महीने भी नहीं चल सकी. एक दिन सड़क दुर्घटना में महेश की मौत हो गई. शालिनी का सुहाग मिट गया. वह विधवा हो गई. उस पर दुखों का पहाड़ टूट गया.

सास के तानों से तंग और व्यवहार से दुखी बेटी को सुरेखा अपने घर ले आई. आखिर कितने दिन तक ब्याहता पुत्री को घर में रखे, चाहे विधवा ही सही, ब्याहता का स्थान तो ससुराल में है.

एक दिन सुरेखा ने शालिनी से कहा, ‘बेटी, तेरी जगह तो ससुराल में है, आखिर कितने दिन मां के पास रहेगी?’

‘मां, वहां मैं कैसे रहूंगी?’

‘रहना तो पड़ेगा बेटी, दुनिया की रीति ही यही है,’ सुरेखा ने शालिनी को समझाया.

‘मां, आप तो मेरी सास के तानों और व्यवहार से परिचित हैं. मैं वहां रह नहीं सकूंगी,’ शालिनी ने अपनी असमर्थता जाहिर की.

‘दिल पर पत्थर तो रखना ही पड़ेगा, दुनियादारी भी तो कोई चीज है.’

‘मां, दुनियादारी तो यह भी कहती है कि बेटे की मृत्यु के बाद बहू को पूरा हक और सम्मान देना चाहिए. किसी भी ग्रंथ में यह नहीं लिखा कि बेटे की मौत के बाद बहू को घर से धक्के मार कर निकाल दिया जाए,’ कहतेकहते शालिनी की आंखें भर आईं.

फिर भी कुछ रिश्तेदारों के साथ शालिनी ससुराल पहुंची तो सास ने घर के अंदर ही नहीं घुसने दिया. घर के बाहर अकेली सास 10 रिश्तेदारों पर हावी थी.

‘शालिनी घर के अंदर नहीं घुस सकती,’ कड़कती आवाज में सास ने कहा.

‘यह आप की बहू है,’ सुरेखा ने विनती की.

‘बेटा मर गया, बहू भी मर गई,’ सास की आवाज में कठोरता अधिक हो गई. शालिनी के पिता ने महेश के पिता से बात करने की विनती की.

‘जो बात करनी है, मुझ से करो. मेरा फैसला न मानने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता.’

महेश के पिता केवल मूकदर्शक बने रहे. यह देखसुन कर सारे रिश्तेदारों ने शालिनी के मांबाप को समझाया कि लड़की को ससुराल में रखने का मतलब है कि लड़की को मौत के हवाले करना. गर्भवती लड़की को मायके में रखना ही ठीक होगा. थकहार कर शालिनी मायके आ गई. जवान दामाद की मृत्यु के बाद गर्भवती लड़की की दशा ने शालिनी के पिता को समय से पहले ही बूढ़ा कर दिया. शालिनी क्या कहे और क्या करे? वह तो अपने बच्चे के जन्म का इंतजार करने लगी.

समय पर शालिनी ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया. एक खिलौना पा कर शालिनी अपना दुख भूल गई, लेकिन यह सुख केवल कुछ पलों तक ही सीमित रहा. पोते के जन्म की खबर सुन कर शालिनी की सास पोते पर अपना अधिकार जताने पहुंच गई. शालिनी ने अपने बच्चे को सौंपने से मना कर दिया.

‘आप ने तो मुझे महेश की मृत्यु के बाद घर से बाहर कर दिया था, अब मैं अपने बच्चे को अपने से जुदा नहीं करूंगी,’ शालिनी ने दोटूक जवाब दे दिया.

महेश की मां से कोई पहले जीत न सका तो अब भी किसी को कोई आस नहीं रखनी चाहिए थी. शोर मचा कर अधिकार जताया, ‘मेरा पोता है, कोई मुझ से मेरे पोते को जुदा नहीं कर सकता. उस की जगह मेरे घर में है.’

‘जब मेरे गर्भ में आप का पोता पल रहा था, तब आप को अधिकार याद नहीं आया. तब मैं सब से बड़ी दुश्मन थी. बिरादरी के सामने आप ने घर में नहीं घुसने दिया था. अब किस मुंह से हक जता रही हैं. मैं आप की तरह निष्ठुर नहीं हूं कि धक्के मार कर बेइज्जत करूं, लेकिन न तो मैं आप के साथ जाऊंगी और न ही अपने बच्चे को जाने दूंगी,’ शालिनी ने जवाब दिया.

शालिनी की सास भी हार मानने को तैयार नहीं थी. उस ने पुलिस का सहारा लिया. कानूनी रूप से तो बहू और पोते का स्थान मरणोपरांत भी पति के घर में ही है. पुलिस के कहने पर भी शालिनी ने सास के साथ जाने से मना कर दिया. कुछ बड़ेबूढ़ों ने सुझाया कि शालिनी को मायके में ही रहना चाहिए और बच्चे को उस की सास को सौंप दिया जाए.

उन का तर्क यह था कि बच्चे के साथ शालिनी का दूसरा विवाह करना मुश्किल होगा. यदि उस की सास बच्चे को पा कर खुश है तो यह शालिनी के भविष्य के लिए सही है. दूसरे विवाह की सारी अड़चनें अपनेआप दूर हो जाएंगी.

शालिनी बच्चे को छोड़ने को तैयार नहीं थी. फिर बड़ेबूढ़ों के समझाने पर वह बच्चे को अपने से जुदा कर सास को देने को तैयार हो गई. सारी उम्र अकेले बच्चे के साथ बिताना कठिन है. मांबाप भी कब तक साथ रहेंगे, जीवनसाथी तो तलाशना होगा. उस के और बच्चे के भविष्य के लिए बलिदान आवश्यक है.

कलेजे पर एक शिला रख कर शालिनी ने बच्चा सास के सुपुर्द कर दिया. सास को शालिनी से कोई मतलब नहीं था. उसे तो वंश चलाने के लिए वारिस चाहिए था, जो मिल गया.

जहां चाह वहां राह. शालिनी के लिए वर की तलाश शुरू हुई, अमेरिका में रह रहे एक विधुर से रिश्ता पक्का हो गया. परिवार के फैसले को मानते हुए सात फेरे ले कर पति सुशील के साथ नई गृहस्थी निभाने सात समंदर पार चली गई.

समय सभी जख्मों को भर देता है. धीरेधीरे वह अपना अतीत भूल कर वह नई दुनिया में व्यस्त हो गई. अपने अंश की जुदाई की याद आती तो कभी व्यक्त नहीं करती थी. एक बच्चे की जुदाई ने अब 2 बच्चों की मां बना दिया. मां से अकसर फोन पर बातें हो जाती थीं तो ऐसा लगता था कि आसपास बैठ कर बातें कर रही हैं, वैसे तो कोई कमी नहीं खटकती थी. उदासी, मजबूरी, सुख और दुख में अपनों से दूरी जरूर परेशान करती थी.

समय हवा के झोंकों के साथ उड़ जाता है. आज शालिनी अपने पति सुशील और 2 बच्चों के साथ मायके आई तो मांबेटी गले मिल कर आत्मविभोर हो गईं. बच्चों को देख कर सुरेखा ने प्यार से पुचकारते हुए कहा, ‘‘शालिनी, बच्चे तो एकदम गोरेचिट्टे हैं.’’

हंसते हुए शालिनी ने कहा, ‘‘बोलते भी अंगरेजी ज्यादा हैं.’’ एकदम अमेरिकन अंगरेजी बोलते देख हैरानपरेशान हो कर सुरेखा ने पूछा, ‘‘हिंदी नहीं जानते?’’

‘‘समझ सब लेते हैं, पर बोलते नहीं हैं. आप की सब बात समझ लेंगे,’’ शालिनी ने कहा.

सर्दियों के दिन थे. सुरेखा और शालिनी दोपहर में फुरसत के समय धूप सेंकते हुए बातें कर रही थीं. बातोंबातों में शालिनी ने मां से महेश की मां अर्थात अपनी पहली सास और अपने बच्चे के बारे में पूछा तो सुरेखा अचंभे में आ गई. फिर कुछ क्षण रुक कर बोली, ‘‘बेटे, क्या तू अभी भी उस के बारे में सोचती है?’’

‘‘क्या करूं मां, अपनी कोख से जनमे बच्चे की याद कभीकभी आ ही जाती है. इंसान अतीत को कितना ही भुलाने की कोशिश करे, यादें पीछा नहीं छोड़ती हैं.’’

‘‘तू खुद ही सोच, अगर तू बच्चे को पालती तो क्या तेरी शादी सुशील से हो सकती थी? क्या यह सब तुझे मिलता? आज जो तेरे पास है.’’

‘‘वह तो ठीक है मां, फिर भी.’’

कुछ कहने से पहले सुरेखा ने शालिनी को बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘‘जो तेरे मन में है, मन में ही रख. अतीत भूल जा. यदि भूल नहीं सकती तो कभी भी किसी के आगे जबान पर ये बातें मत लाना. लोगों के कान बड़े पतले होते हैं. किसी का सुख कोई देख नहीं सकता है.’’ तभी फोन की घंटी बजी और बातों का सिलसिला रुक गया. सुशील ने बात की. सुशील ने शाम को सिनेमा देख कर बाहर होटल में डिनर का कार्यक्रम तय किया था.

‘‘शालिनी, अपनी सफल गृहस्थी को अपने हाथों में रख. सुशील ने सब जानते हुए तुझे अपनाया था. कोई ऐसी बात जबान पर मत ला जिस से कोई जरा सी भी दरार आए. शाम को सिनेमा देख और पुरानी बातों को भूल जा. जितनी खुश तू आज है, बच्चे को रख कर नहीं होती. भूल जा शालिनी, भूल जा.’’

मां की बात पल्ले बांध कर शाम को शालिनी ने परिवार के साथ सिनेमा देखा. 2 महीने कैसे बीते, सुरेखा को पता ही नहीं चला. आज शालिनी सपरिवार अमेरिका वापस जा रही है. एयरपोर्ट पर बेटी को विदा करते समय सुरेखा की आंखें नम हो गईं. मां को उदास देख कर शालिनी बोली, ‘‘यह क्या, बच्चों जैसी रो रही हो? मोबाइल पर हमेशा हम साथ ही तो रहते हैं? बातें तो होंगी ही तुम से बात न करूं तो मन फिर भी तो नहीं होता. सुरेखा को लगा जैसे फोन रिश्तों के फासलों के बीच एक पुल है. शालिनी का चेहरा उस की छलछलाई आंखों में तैरता रह गया.

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