समझौता: रामेश्वर ने अपने हक से किया समझौता

‘‘क्या करूं, वह मेरी बचपन की सहेली है,’’ अनसुना करते हुए दुर्गा बोली.

‘‘देख दुर्गा, आखिरी बार कह रहा हूं कि अब तू मानमल की लुगाई से कभी नहीं मिलेगी…’’ एक बार फिर समझाते हुए रामेश्वर बोला, ‘‘बोलती है और कभीकभार हलवापूरी भी भिजवा देती है. बड़ा प्रेम दिखाने लगी है आजकल उस से.’’

‘‘अरे, मनुष्य योनि में जन्म लिया है तो प्रेम से रहना चाहिए,’’ दुर्गा एक बार फिर समझाते हुए बोली.

‘‘बड़ी आई प्रेम दिखाने वाली…’’ गुस्से से रामेश्वर बोला, ‘‘वहां उस का प्रेम कहां गया था, जब मानमल ने अपना रास्ता बंद किया? हम ने थाने में रपट लिखवा दी. अदालत में पेशी चल रही है. वह हमारा दुश्मन है, फिर भी उन से प्रेम जताती है.’’

‘‘देखो, वह अदालती दुश्मनी है…’’ समझाते हुए दुर्गा बोली, ‘‘यह क्यों नहीं समझते कि वह पैसे वाला है. हम से ऊंची जात का भी है.’’

‘‘हम से ऊंची जात का हुआ तो क्या हुआ. क्या हम ढोर हैं. देख दुर्गा, कान खोल कर अच्छी तरह सुन ले. अब तू उस दुश्मन की औरत से नहीं बोलेगी और न ही मिलेगी.’’

‘‘झगड़ा तुम्हारा मानमल से है, उस की औरत से तो नहीं है,’’ दुर्गा बोली.

‘‘मानमल और उस की लुगाई क्या अलगअलग हैं?’’ गुस्से से रामेश्वर बोला, ‘‘है तो उस की लुगाई.’’

‘‘झगड़ा झगड़े की जगह होता है. तुम मत बोलो, मैं तो बोलूंगी.’’

‘‘रस्सी जल गई, मगर ऐंठन नहीं गई,’’ रामेश्वर गुस्से से बोला.

‘‘तुम एक बात कान खोल कर सुन लो. तुम्हारा लाड़ला मांगीलाल, जो 12वीं में पढ़ रहा है और मानमल का लड़का भी 12वीं जमात में मांगीलाल के साथ पढ़ रहा है. दोनों में गहरी दोस्ती है. वे साथसाथ स्कूल जाते हैं और आते भी हैं. मुझे तो रोक लोगे, उसे कैसे रोकोगे?’’

‘‘अरे, तुम मांबेटे दोनों मिल कर दुश्मन से कहीं मुकदमे को हरवा न दो,’’ शक जाहिर करते हुए रामेश्वर बोला.

‘‘जैसा तुम सोच रहे हो मांगीलाल के बापू, वैसा नहीं है. हम में मुकदमे संबंधी कोई बात नहीं होती…’’ एक बार फिर दुर्गा बोली, ‘‘हमारे बीच घरेलू बातें

ही होती हैं.’’

‘‘मतलब, तुम उस से मिलनाजुलना बंद नहीं करोगी?’’ रामेश्वर ने पूछा और कहा, ‘‘जैसी तेरी मरजी. अब मैं कुछ भी नहीं कहूंगा.’’

इस के बाद रामेश्वर झल्लाते हुए घर से बाहर निकल गया.

यह कहानी जिस गांव की है उस गांव का नाम है रिंगनोद जो पिंगला नदी के किनारे बसा हुआ है. एक जमाना था जब यह नदी 12 महीने बहती रहती थी. उस जमाने में इस नदी में पुल नहीं बना हुआ था, इसलिए शहर जाने के लिए नदी में से हो कर जाना पड़ता था. मगर आज तो यह नदी गरमी आतेआते सूख जाती है. अब तो इस के ऊपर बड़ा पुल बन गया है, तो गांव शहर से पूरी तरह जुड़ गया है.

इसी गांव के रहने वाला रामेश्वर जाति से अनुसूचित है और मानमल बनिया है. उस की गांव में किराने की दुकान के साथ खेती भी है. वह ज्यादा पैसे वाला है, इसलिए अच्छा दबदबा है. रामेश्वर के पास केवल खेती है.

वह इसी पर ही निर्भर है. बापदादा के जमाने से दोनों के खेत असावती रोड पर पासपास हैं. जावरा से सीतामऊ तक कंक्रीट की रोड बन गई है, जो उन के खेत के पास से ही निकली है. इसी सड़क से लगा हुआ एक रास्ता है, जो दोनों की सुविधा के लिए था. दोनों का अपने खेत पर जाने के लिए यही एक रास्ता था.

रामेश्वर के खेत थोड़े से अंदर थे और मानमल के खेत सड़क से लगे हुए थे. उस रास्ते को ले कर अभी तक दोनों में कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ, मगर जब से पक्का रोड बना है, तब से मानमल के भीतर खोट आ गया. वह अपनी जमीन पर होटल खोलना चाहता था. अगर वह दीवार बना कर निकलने का गलियारा देता, जो होटल के लिए कम जमीन पड़ती इसलिए उस ने अपनी दबंगता के बल पर जहां से रामेश्वर के खेत शुरू होते हैं, वहां रातोंरात दीवार खिंचवा दी.

रामेश्वर ने एतराज किया कि इस जमीन पर उस का भी हक है. बापदादा के जमाने से यह रास्ता बना हुआ है. मगर मानमल बोला था, ‘‘देख रामेश्वर, यह सारी जमीन मेरी है.’’

‘‘तेरी कैसे हो गई भई?’’ रामेश्वर ने पूछा.

‘‘मेरी जमीन सड़क से शुरू होती है और जो सड़क से शुरू हुई वह मेरी हुई न,’’ मानमल ने कहा.

‘‘मगर, मैं अब कहां से निकलूंगा?’’

‘‘यह तुझे सोचना है. अरे, बापदादा ने गलती की तो इस की सजा क्या मैं भुगतूंगा?’’

‘‘देखो मानमलजी, आप बड़े लोग हो. मैं आप से जरा नीचा हूं. इस का यह मतलब नहीं है कि नाजायज कब्जा कर लें.’’

‘‘अरे, आप की जमीन है तो

कागज दिखाओ? मेरी तो यहां दीवार बनेगी.’’

‘‘मैं दीवार नहीं बनने दूंगा,’’ विरोध जताते हुए रामेश्वर बोला.

‘‘कैसे नहीं बनने देगा. जमीन मेरी है. इस पर चाहे मैं कुछ भी करूं, तुम कौन होते हो मुझे रोकने वाले?’’

‘‘मतलब, तुम दीवार बनाओगे और मेरा रास्ता रोकोगे?’’

‘‘पटवारी ने भी इस जमीन का मालिक मुझे बना रखा है.’’

‘‘देखो, मैं आखिरी बार कह रहा हूं, तुम यहां दीवार मत बनाओ.’’

‘‘मैं तो दीवार बनाऊंगा… तुझ से जो हो कर ले.’’

‘‘ठीक है, मैं तुझे कोर्ट तक खींच कर ले जाऊंगा.’’

‘‘ठीक है, ले जा.’’

फिर मानमल के खिलाफ रामेश्वर ने थाने में शिकायत दर्ज कर दी. पुलिस ने चालान बना कर कोर्ट में पेश कर दिया. कोर्ट ने फैसला आने तक जैसे हालात थे, वैसे रहने का आदेश दिया.

पुलिस ने मुकदमा कायम कर दिया. पूरे 5 साल हो गए, पर कोई फैसला न हो पाया. तारीख पर तारीख बढ़ती गई. दोनों परिवारों में पैसा खर्च होता रहा.

रामेश्वर इस मुकदमे से टूट गया. पैसा अलग खर्च हो रहा था और मानमल फैसला जल्दी न मिले, इसलिए पैसे दे कर तारीखें आगे बढ़वाता रहा ताकि रामेश्वर टूट जाए और मुकदमा हार जाए.

मगर रामेश्वर की जोरू दुर्गा मानमल की लुगाई से संबंध बढ़ा रही है. उस के घर भी काफी आनाजाना करती है. कभीकभार मिठाइयां भी खिला रही है, जबकि रामेश्वर और मानमल एकदूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते थे, बल्कि कोर्ट में जब भी तारीख लगती थी और मानमल से उस का सामना होता था, तब मानमल उसे देख कर हंसता था. यह जताने की कोशिश करता था कि मुकदमा लड़ने की हैसियत नहीं है, फिर भी लड़ रहा है.

मुकदमा तो वे ही लड़ सकते हैं, जिन के पास पैसों की ताकत है.10 साल तक अगर और मुकदमा चलेगा तो जमीन बिक जाएगी. मुकदमा लड़ना हंसीखेल नहीं है. मानमल तो चाहता है कि रामेश्वर बरबाद हो जाए.

5 साल के मुकदमे ने रामेश्वर की कमर तोड़ दी. अब भी न जाने कितने साल तक चलेगा. वकील का घर भरना है. वह तो केवल खेती के ऊपर निर्भर है, जबकि मानमल के किराने की दुकान भी अच्छी चल रही है और भी न जाने क्याक्या धंधा कर रहा है. खेती भी उस से ज्यादा है, इसलिए मुकदमे के फैसले से वह निश्चिंत है.

मगर, रामेश्वर जब भी तारीख पर जाता है, तारीख आगे बढ़ जाती है और जब तारीख आगे बढ़ जाती है, तब मानमल मन ही मन हंसता है. उस की हंसी में बहुत ही गहरा तंज छिपा हुआ रहता है.

‘‘चाय पी लो,’’ दुर्गा चाय का कप लिए खड़ी थी. तब रामेश्वर अपनी सोच से बाहर निकला.

‘‘क्या सोच रहे थे?’’ दुर्गा ने पूछा.

‘‘इस मुकदमे के बारे में?’’ हारे हुए जुआरी की तरह रामेश्वर ने जवाब दिया.

‘‘बस सोचते रहना, पहले ही कोई समझौता कर लेते, तब ये दिन देखने को नहीं मिलते,’’ दुर्गा ने कहा.

रामेश्वर नाराज हो कर बोला, ‘‘तुम जले पर नमक छिड़क रही हो? एक तो मैं इस मुकदमे से टूट गया हूं, फिर न जाने कब फैसला होगा. मानमल पैसा दे कर तारीख पर तारीख बढ़ाता जा रहा है और तुझे मजाक सूझ रहा है.’’

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था,’’ दुर्गा ने सफाई दी.

‘‘तब क्या मतलब था तेरा? एक तो दुश्मन की औरत से बोलती हो… कितनी बार कहा है कि तुम उस से संबंध

मत बनाओ, मगर मेरी एक भी नहीं सुनती हो.’’

‘‘देखोजी, उस से संबंध बनाने से मेरा भी लालच है.’’

‘‘क्या लालच है?’’

‘‘जैसे आप टूट रहे हो न, वैसे मानमल भी चाहता है कि कोई बीच का रास्ता निकल जाए.’’

‘‘तुझे कैसे मालूम?’’

‘‘मानमल की जोरू बताती रहती है,’’ दुर्गा बोली.

‘‘समझौता क्यों नहीं कर

लेता है? रास्ता क्यों बंद कर

रहा है?’’

‘‘वह रास्ता देने को

तैयार है.’’

‘‘जब वह देने को तैयार है, तब तारीखें क्यों बढ़वाता है? यह तो वही हुआ कि आप खावे काकड़ी और दूसरे को दे आकड़ी,’’ नाराजगी से रामेश्वर बोला.

‘‘आप कहें तो मैं उस की जोरू से बात कर के देखती हूं,’’ दुर्गा ने रामेश्वर को सलाह दी.

‘‘कोई जरूरत नहीं है उस से बात करने की. अब तो अदालत से ही फैसला होगा…’’ इनकार करते हुए रामेश्वर बोला, ‘‘तू औरत जात ठहरी. मानमल की चाल को तू क्या समझे.’’

‘‘ठीक है तो लड़ो मुकदमा और वकीलों का भरो पेट,’’ दुर्गा ने कहा, फिर उन के बीच सन्नाटा पसर गया.

रामेश्वर इसलिए नाराज है कि दुर्गा अपने दुश्मन की जोरू से पारिवारिक संबंध बनाए हुए है. दुर्गा इसलिए नाराज है कि हर झगड़ा अदालत से नहीं निबटा जा सकता है. थोड़ा तुम झुको, थोड़ा वह झुके. मगर मांगीलाल के पापा तो जरा भी झुकने को तैयार नहीं हैं.

मगर इसी बीच एक घटना घट गई.

मानमल और उस की पत्नी का अचानक उन के घर आना.

मानमल की जोरू बोली, ‘‘दुर्गा, हम इसलिए आए हैं कि हम दोनों जमीन

के जिस टुकड़े के लिए अदालत में

लड़ रहे हैं, उस का फैसला तो न जाने कब होगा.’’

‘‘हां बहन,’’ दुर्गा भी हां में हां मिलाते हुए बोली, ‘‘अदालत में सालों लग जाते हैं फैसला होने में.’’

‘‘भाई रामेश्वर, हम आपस में मिल कर ऐसा समझौता कर लें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे,’’ मानमल समझाते हुए बोला.

‘‘कैसा समझौता? मैं समझा नहीं,’’ रामेश्वर नाराजगी से बोला.

‘‘तुम नाराज मत होना. मैं ने बहुत सोचसमझ कर यह फैसला लिया है कि तुम्हें 5 फुट जमीन का गलियारा देता हूं ताकि तुम्हें अपने खेत में आनेजाने के लिए कोई तकलीफ न पड़े…’’ समझाते हुए मानमल बोला, ‘‘मैं 5 फुट छोड़ कर दीवार बना लेता हूं.’’

‘‘वाह मानमलजी, वाह, खूब फैसला लिया. मुझे इतना बेवकूफ समझ लिया कि बाकी की 10 फुट जमीन खुद रख रहे हो. मुझे आधी जमीन चाहिए,’’ रामेश्वर भी गुस्से से अड़ गया.

‘‘देखो नाराज मत होना. जिस जमीन के लिए तुम अदालत में लड़ रहे हो. अदालत देर से सही मगर फैसला मेरे पक्ष में देगी. मैं ने सारे सुबूत लगा रखे हैं, जबकि मैं अपनी मरजी से तुम्हें गलियारा दे रहा हूं, इसलिए ले लो वरना बाद में पछताना न पड़े.’’

‘‘देखोजी, इतना भी मत सोचो, कोर्ट का फैसला तो न जाने कब आएगा. अगर हमारे खिलाफ आएगा, तब हमें 5 फुट जमीन से भी हाथ धोना पड़ेगा,’’

दुर्गा समझाते हुए बोली.

‘‘हां भाई साहब, मत सोचो, जो हम दे रहे हैं वह कबूल कर लो…’’ मानमल की पत्नी ने प्रस्ताव रखते हुए कहा, ‘‘हम तो आप की भलाई की बात कर रहे हैं ताकि हमारे बीच अदालत का फैसला खत्म हो जाए.’’

‘‘मैं फायदे का सौदा कर रहा हूं रामेश्वर,’’ एक बार फिर समझाते हुए मानमल बोला, ‘‘इस के बावजूद तुम्हें लगे कि कोर्ट के फैसले तक इंतजार करूं, तब भी मुझे कोई एतराज नहीं है,’’ कह कर मानमल ने गेंद रामेश्वर के पाले में फेंक दी.

रामेश्वर के लिए इधर खाई उधर कुआं थी. शायद मानमल को यह एहसास हो गया हो कि 15 फुट जमीन, जिस के लिए सारी लड़ाई है, वह खुद ही हार रहा हो, इसलिए फैसला आए उस के पहले ही यह समझौता कर रहा है. बड़ा चालाक है मानमल. यह इस तरह कभी हार मानने वाला नहीं है.

लगता है कि अपनी हार देख कर ही यह फैसला लिया हो. वह कचहरी के चक्कर काटतेकाटते हार गया है. इस ने अपनी जमीन पर होटल बना लिया है. जो चल भी रहा है. इस ने कहा भी है कि इस तरफ दीवार खींच कर पूरा इंतजाम करना चाहता है. तभी तो समझौता करने के लिए आगे आया है. इस में भी इस का लालच है.

उसे चुप देख कर मानमल एक बार फिर बोला, ‘‘अब क्या सोच रहे हो?’’

‘‘ठीक है, मुझे यह समझौता मंजूर है. यह घूंट भी पी लेता हूं,’’ कह कर रामेश्वर ने अपने हथियार डाल दिए.

यह सुन कर मानमल खुशी से खिल उठा. उस ने रामेश्वर को गले से लगा लिया. फिर उन दोनों ने यह भी फैसला लिया कि अगली तारीख पर कोर्ट से मुकदमा वापस ले लेंगे. कोर्ट से दोनों के समझौते के मुताबिक कागज ले लेंगे. इस के बाद वे दोनों चले गए.

चुप्पी तोड़ते हुई दुर्गा बोली, ‘‘अच्छा हुआ जो समझौता कर लिया?’’

‘‘मानमल की गरज थी तो उस ने समझौता किया है?’’ चिढ़ कर रामेश्वर बोला.

‘‘उस की तो पूरी की पूरी जमीन हड़पने की योजना थी. मगर, यह सब मैं ने मानमल की बीवी को समझाया था.

‘‘उस ने ही मानमल को मनाया था. इसी वजह से मैं ने संबंध बनाए थे, आप के लाख मना करने के बाद भी. 5 फुट का गलियारा देने के लिए मैं ने ही मानमल की बीवी के सामने प्रस्ताव रखा था,’’ कह कर दुर्गा ने अपनी बात पूरी कर दी. रामेश्वर कोई जवाब नहीं दे पाया.  द्य

नया द्वार: नये दरवाजे पर खुशियों ने दी दस्तक

एक दिन रास्ते में रेणु भाभी मिल गईं. बड़ी उदास, दुखी लग रही थीं. मैं ने कारण पूछा तो उबल पड़ीं. बोलीं, ‘‘क्या बताऊं तुम्हें? माताजी ने तो हमारी नाक में दम कर रखा है. गांव में पड़ी थीं अच्छीखासी. इन्हें शौक चर्राया मां की सेवा का. ले आए मेरे सिर पर मुसीबत. अब मैं भुगत रही हूं.’’

भाभी की आवाज कुछ ऊंची होती जा रही थी, कुछ क्रोध से, कुछ खीज से. रास्ते में आतेजाते लोग अजीब नजरों से हमें घूरते जा रहे थे. मैं ने धीरे से उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो न, भाभी, पास ही किसी होटल में चाय पी लें. वहीं बातें भी हो जाएंगी.’’

भाभी मान गईं और तब मुझे उन का आधा कारण मालूम हुआ.

रेणु भाभी मेरी रिश्ते की भाभी नहीं हैं, पर उन के पति मनोज भैया और मेरे पति एक ही गांव के रहने वाले हैं. इसी कारण हम ने उन दोनों से भैयाभाभी का रिश्ता जोड़ लिया है.

मनोज भैया की मां मझली चाची के नाम से गांव में काफी मशहूर हैं. बड़ी सरल, खुशमिजाज और परोपकारी औरत हैं. गरीबी में भी हिम्मत से इकलौते बेटे को पढ़ाया. तीनों बेटियों की शादी की.

अब पिछले कुछ वर्षों से चाचा की मृत्यु के बाद, मनोज भैया उन्हें शहर लिवा लाए. कह रहे थे कि वहां मां के अकेली होने के कारण यहां उन्हें चिंता सताती रहती थी. फिर थोड़ेबहुत रुपए भी खर्चे के लिए भेजने पड़ते थे.

‘‘तभी से यह मुसीबत मेरे पल्ले पड़ी है,’’ रेणु भाभी बोलीं, ‘‘इन्हीं का खर्चा चलाने के लिए तो मैं ने भी नौकरी कर ली. कहीं इन्हें बुढ़ापे में खानेपीने, पहनने- ओढ़ने की कमी न हो. पर अब तो उन के पंख निकल आए हैं,’’

‘‘सो कैसे?’’

‘‘तुम ही घर आ कर देख लेना,’’ भाभी चिढ़ कर बोलीं, ‘‘अगर हो सके तो समझा देना उन्हें. घर को कबाड़खाना बनाने पर तुली हुई हैं. दीपक भैया को भी साथ लाएंगी तो वह शायद उन्हें समझा पाएंगे. बड़ी प्यारी लगती हैं न उन्हें मझली चाची?’’

चाय खत्म होते ही रेणु भाभी उठ खड़ी हुईं और बात को ठीक तरह से समझाए बिना ही चली गईं.

मैं ने अपने पति दीपक को रेणु भाभी के वक्तव्य से अवगत तो करा दिया था, लेकिन बच्चों की परीक्षाएं, घर के अनगिनत काम और बीचबीच में टपक पड़ने वाले मेहमानों के कारण हम लोग चाची के घर की दिशा भूल से गए.

तभी एक दिन मेरी मौसेरी बहन सुमन दोपहर को मिलने आई. उस ने एम.ए., बी.एड कर रखा था, पर दोनों बच्चे छोटे होने के कारण नौकरी नहीं कर पा रही थी. हालांकि उस के परिवार को अतिरिक्त आय की आवश्यकता थी. न गांव में अपना खुद का घर था, न यहां किराए का घर ढंग का था. 2 देवर पढ़ रहे थे. उन का खर्चा वही उठाती थी. सास बीमार थी, इसलिए पोतों की देखभाल नहीं कर सकती थी. ससुर गांव की टुकड़ा भर जमीन को संभाल कर जैसेतैसे अपना काम चलाते थे.

फिर भी सुमन की कार्यकुशलता और स्नेह भरे स्वभाव के कारण परिवार खुश रहता था. जब भी मैं उसे देखती, मेरे मन में प्यार उमड़ पड़ता. मैं प्रसन्न हो जाती.

उस दिन भी वह हंसती हुई आई. एक बड़ा सा पैकेट मेरे हाथ में थमा कर बोली, ‘‘लो, भरपेट मिठाई खाओ.’’

‘‘क्या बात है? इस परिवार नियोजन के युग में कहीं अपने बेटों के लिए बहन के आने की संभावना तो नहीं बताने आई?’’ मैं ने मजाक में पूछा.

‘‘धत दीदी, अब तो हाथ जोड़ लिए. रही बहन की बात तो तुम्हारी बेटी मेरे शरद, शिशिर की बहन ही तो है.’’

‘‘पर मिठाई बिना जाने ही खा लूं?’’

‘‘तो सुनो, पिछले 2 महीने से मैं खुद के पांवों पर खड़ी हो गई हूं. यानी कि नौ…क…री…’’ उस ने खुशी से मुझे बांहों में भर लिया. बिना मिठाई खाए ही मेरा मुंह मीठा हो गया. तभी मुझे उस के बच्चों की याद आई, ‘‘और शरद, शिशिर उन्हें कौन संभालता है? तुम कब जाती हो, कब आती हो, कहां काम करती हो?’’

‘‘अरे…दीदी, जरा रुको तो, बताती हूं,’’ उस ने मिठाई का पैकेट खोला, चाय छानी, बिस्कुट ढूंढ़ कर सजाए तब कुरसी पर आसन जमा कर बोली, ‘‘सुनो अब. नौकरी एक पब्लिक स्कूल में लगी है. तनख्वाह अच्छी है. सवेरे 9 बजे से शाम को 4 बजे तक. और बच्चे तुम्हारी मझली चाची के पास छोड़ कर निश्ंिचत हो जाती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जी हां. मझली चाची कई बच्चों को संभालती हैं. बहुत प्यार से देखभाल करती हैं.’’

खापी कर पीछे एक खुशनुमा ताजगी में फंसे हुए प्रश्न मेरे लिए छोड़ कर सुमन चली गई. मझली चाची ऐसा क्यों कर रही थीं? रेणु भाभी क्या इसी कारण से नाराज थीं?

‘‘बात तो ठीक है,’’ शाम को दीपक ने मेरे प्रश्नों के उत्तर में कहा, ‘‘फिर भैयाभाभी दोनों कमाते हैं. मझली चाची के कारण उन्हें समाज की उठती उंगलियां सहनी पड़ती होंगी. हमें चाची को समझाना चाहिए.’’

‘‘दीपक, कभी दोपहर को बिना किसी को बताए पहुंच कर तमाशा देखेंगे और चाची को अकेले में समझाएंगे. शायद औरों के सामने उन्हें कुछ कहना ठीक नहीं होगा,’’ मैं ने सुझाव दिया.

दीपक ने एक दिन दोपहर को छुट्टी ली और तब हम अचानक मनोज भैया के घर पहुंचे.

भैयाभाभी काम पर गए हुए थे. घर में 10 बच्चे थे. मझली चाची एक प्रौढ़ा स्त्री के साथ उन की देखभाल में व्यस्त थीं. कुछ बच्चे सो रहे थे. एक को चाची बोतल से दूध पिला रही थीं. उन की प्रौढ़ा सहायिका दूसरे बच्चे के कपड़े बदल रही थी.

चाची बड़ी खुश नजर आ रही थीं. साफ कपड़े, हंसती आंखें, मुख पर संतोष तथा आत्मविश्वास की झलक. सेहत भी कुछ बेहतर ही लग रही थी.

‘‘चाचीजी, आप ने तो अच्छीखासी बालवाटिका शुरू कर दी,’’ मैं ने नमस्ते कर के कहा.

चाची हंस कर बोलीं, ‘‘अच्छा लगता है, बेटी. स्वार्थ के साथ परमार्थ भी जुटा रही हूं.’’

‘‘पर आप थक जाती होंगी?’’ दीपक ने कहा, ‘‘इतने सारे बच्चे संभालना हंसीखेल तो नहीं.’’

‘‘ठहरो, चाय पी कर फिर तुम्हारी बात का जवाब दूंगी,’’ वह सहायिका को कुछ हिदायतें दे कर रसोईघर में चली गईं, ‘‘यहीं आ जाओ, बेटे,’’ उन्होंने हम दोनों को भी बुला लिया.

‘‘देखो दीपक, अपने पोतेपोती के पीछे भी तो मैं दौड़धूप करती ही थी? तब तो कोई सहायिका भी नहीं थी,’’ चाची ने नाश्ते की चीजें निकालते हुए कहा, ‘‘अब ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की उम्र है न मेरी? इन सभी को पोतेपोतियां बना लिया है मैं ने.’’

फिर मेरी ओर मुड़ कर कहा, ‘‘तुम्हारी सुमन के भी दोनों नटखट यहीं हैं. सोए हुए हैं. दोपहर को सब को घंटा भर सुलाने की कोशिश करते हैं. शाम को 5 बजे मेरा यह दरबार बरखास्त हो जाता है. तब तक मनोज के बच्चे शुचि और राहुल भी आ जाते हैं.’’

‘‘पर चाची, आप…आप को आराम छोड़ कर इस उम्र में ये सब झमेले? क्या जरूरत थी इस की?’’

‘‘तुम से एक बात पूछूं, बेटी? तुम्हारे मांपिताजी तुम्हारे भैयाभाभी के साथ रहते हैं न? खुश हैं वह?’’

मेरी आंखों के सामने भाभी के राज में चुप्पी साधे, मुहताज से बने मेरे वृद्ध मातापिता की सूरतें घूम गईं. न कहीं जाना न आना. कपड़े भी सब की जरूरतें पूरी करने के बाद ही उन के लिए खरीदे जाते. वे दोनों 2 कोनों में बैठे रहते. किसी के रास्ते में अनजाने में कहीं रोड़ा न बन जाएं, इस की फिक्र में सदा घुलते रहते. मेरी आंखें अनायास ही नम हो आईं.

चाची ने धीरे से मेरे बाल सहलाए. ‘‘बेटी, तू दीपक को मेरी बात समझा सकेगी. मैं तेरी आंखों में तेरे मातापिता की लाचारी पढ़ सकती हूं, लेकिन जब तुझ पर किसी वयोवृद्ध का बोझ आ पड़े, तब आंखों की इस नमी को याद रखना.’’

दीपक के चेहरे पर प्रश्न था.

‘‘सुनो बेटे, पति की कमाई या मन पर जितना हक पत्नी का होता है उतना बेटे की कमाई या मन पर मां का नहीं होता. इस कारण से आत्मनिर्भर होना मेरे लिए जरूरी हो गया था. रही काम की बात तो पापड़बडि़यां, अचारमुरब्बे बनाना भी तो काम ही है, जिन्हें करते रहने पर भी करने वालों की कद्र नहीं की जाती. घर में रह कर भी अगर ये काम हम ने कर भी लिए तो कौन सा शेर मार दिया? बहू कमाएगी तो सास को यह सबकुछ तो करना ही पड़ेगा,’’ चाची ने एक गहरी सांस ली.

‘‘कब आते हैं बच्चे?’’ दीपक ने हौले से पूछा.

‘‘9 बजे से शुरू हो जाते हैं. कोई थोड़ी देर से या जल्दी भी आ जाते हैं कभीकभी. मेरी सहायिका पार्वती भी जल्दी आ जाती है. उसे भी मैं कुछ देती हूं. वह खुशी से मेरा हाथ बंटाती है.’’

‘‘और भी बच्चों के आने की गुंजाइश है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘पूछने तो आते हैं लोग, पर मैं मना कर देती हूं. इस से ज्यादा रुपयों की मुझे आवश्यकता नहीं. सेहत भी संभालनी है न?’’

चाय खत्म हो चुकी थी. सोए हुए बच्चों के जागने का समय हो रहा था. इसलिए ‘नमस्ते’ कह कर हम चलना ही चाहते थे कि चाची ने कहा, ‘‘बेटी, दीवाली के बाद मैं एक यात्रा कंपनी के साथ 15 दिन घूमने जाने की बात सोच रही हूं. अगर तुम्हारे मातापिता भी आना चाहें तो…’’

मैं चुप रही. भैयाभाभी इतने रुपए कभी खर्च न करेंगे. मैं खुद तो कमाती नहीं.

चाची को भी मनोज भैया ने कई बहानों से यात्रा के लिए कभी नहीं जाने दिया था. उन की बेटियां भी ससुराल के लोगों को पूछे बिना कोई मदद नहीं कर सकती थीं. अब चाची खुद के भरोसे पर यात्रा करने जा रही थीं.

‘‘सुनीता के मातापिता भी आप के साथ जरूर जाएंगे, चाची,’’ अचानक दीपक ने कहा, ‘‘आप कुछ दिन पहले अपने कार्यक्रम के बारे में बता दीजिएगा.’’

रेणु भाभी और मनोज भैया की नाराजगी का साहस से सामना कर के मझली चाची ने एक नया द्वार खोल लिया था अपने लिए, देखभाल की जरूरत वाले बच्चों के लिए और सुमन जैसी सुशिक्षित, जरूरतमंद माताओं के लिए.

हरेक के लिए इतना साहस, इतना धैर्य, इतनी सहनशीलता संभव तो नहीं. पर अगर यह नहीं तो दूसरा कोई दरवाजा तो खुल ही सकता है न?

जीवन बहुत बड़ा उपहार है हम सब के लिए. उसे बोझ समझ कर उठाना या उठवाना कहां तक उचित है? क्यों न अंतिम सांस तक खुशी से, सम्मान से जीने की और जिलाने की कोशिश की जाए? क्यों न किसी नए द्वार पर धीरे से दस्तक दी जाए? वह द्वार खुल भी तो सकता है.

अलविदा काकुल : रिश्ते की तपिश एकदूसरे के लिए प्यार

पेरिस का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा चार्ल्स डि गाल, चारों तरफ चहलपहल, शोरशराबा, विभिन्न परिधानों में सजीसंवरी युवतियां, तरहतरह के इत्रों से महकता वातावरण…

काकुल पेरिस छोड़ कर हमेशाहमेशा के लिए अपने शहर इसलामाबाद वापस जा रही थी. लेकिन अपने वतन, अपने शहर, अपने घर जाने की कोई खुशी उस के चेहरे पर नहीं थी. चुपचाप, गुमसुम, अपने में सिमटी, मेरे किसी सवाल से बचती हुई सी. पर मैं तो कुछ पूछना ही नहीं चाहता था, शायद माहौल ही इस की इजाजत नहीं दे रहा था. हां, काकुल से थोड़ा ऊंचा उठ कर उसे सांत्वना देना चाहता था. शायद उस का अपराधबोध कुछ कम हो. पर मैं ऐसा कर न पाया. बस, ऐसा लगा कि दोनों तरफ भावनाओं का समंदर अपने आरोह पर है. हम दोनों ही कमजोर बांधों से उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे.

तभी काकुल की फ्लाइट की घोषणा हुई. वह डबडबाई आंखों से धीरे से हाथ दबा कर चली गई. काकुल चली गई.

2 वर्षों पहले हुई जानपहचान की ऐसी परिणति दोनों को ही स्वीकार नहीं थी. हंगरी के लेखक अर्नेस्ट हेंमिग्वे ने लिखा है कि ‘कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जैसे बरसात के दिनों में रुके हुए पानी में कागज की नावें तैराना.’ ये नावें तैरती तो हैं, पर बहुत दूर तक और बहुत देर तक नहीं. शायद हमारा रिश्ता ऐसी ही एक किश्ती जैसा था.

टैक्निकल ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली से फ्रांस आया तो यहीं का हो कर रह गया. दिलोदिमाग में कुछ वक्त यह जद्दोजेहद जरूर रही कि अपनी सरकार ने मुझे उच्चशिक्षा के लिए भेजा था. सो, मेरा फर्ज है कि अपने देश लौटूं और देश को कुछ दूं. लेकिन स्वार्थ का पर्वत ज्यादा बड़ा निकला और देशप्रेम छोटा. लिहाजा, यहीं नौकरी कर ली.

शुरू में बहुत दिक्कतें आईं. अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले फ्रैंच समुदाय में किसी का भी टिकना बहुत कठिन है. बस, एक जिद थी, एक दीवानगी थी कि इसी समुदाय में अपना लोहा मनवाना है. जैसा लोकप्रिय मैं अपनी जनकपुरी में था, वैसा ही कुछ यहां भी होना चाहिए.

पहली बात यह समझ आई कि अंगरेजी से फ्रैंच समुदाय वैसे ही भड़कता है जैसे लाल रंग से सांड़. सो, मैं ने फ्रैंच भाषा पर मेहनत शुरू की. फ्रैंच समुदाय में अपनी भाषा, अपने देश, अपने भोजन व सुंदरता के लिए ऐसी शिद्दत से चाहत है कि आप अंगरेजी में किसी से पता भी पूछेंगे तो जवाब यही मिलेगा, ‘फ्रांस में हो तो फ्रैंच बोलो.’

पेरिस की तेज रफ्तार जिंदगी को किसी लेखक ने केवल 3 शब्दों में कहा है, ‘काम करना, सोना, यात्रा करना.’ यह बात पहले सुनी थी, यकीन यहीं देख कर आया. मैं कुछकुछ इसी जिंदगी के सांचे में ढल रहा था, तभी काकुल मिली.

काकुल से मिलना भी बस ऐसे था जैसे ‘यों ही कोई मिल गया था सरेराह चलतेचलते.’ हुआ ऐसा कि मैं एक रैस्तरां में बैठा कुछ खापी रहा था और धीमे स्वर में गुलाम अली की गजल ‘चुपकेचुपके रातदिन…’ गुनगुना रहा था. कौफी के 3 गिलास खाली हुए और मेरा गुनगुनाना गाने में तबदील हो गया. मेज पर उंगलियां भी तबले की थाप देने लगी थीं. पूरा आलाप ले कर जैसे ही मैं ‘दोपहर… की धूप में…’ तक पहुंचा, अचानक एक लड़की मेरे सामने आ कर झटके से बैठी और पूछा, ‘वू जेत पाकी?’

‘नो, आई एम इंडियन.’

‘आप बहुत अच्छा गाते हैं, पर इस रैस्तरां को अपना बाथरूम तो मत समझिए’.

‘ओह, माफ कीजिएगा,’ मैं बुरी तरह झेंप गया.

काकुल से दोस्ती हो गई, रोज  मिलनेजुलने का सिलसिला शुरू हुआ. वह इसलामाबाद, पाकिस्तान से थी. पिताजी का अपना व्यापार था. जब उन्होंने काकुल की अम्मी को तलाक दिया तो वह नाराज हो कर पेरिस में अपनी आंटी के पास आ गई और तब से यहीं थी. वह एक होटल में रिसैप्शनिस्ट का काम देखती थी.

ज्यादातर सप्ताहांत, मैं काकुल के साथ ही बिताने लगा. वह बहुत से सवाल पूछती, जैसे ‘आप जिंदगी के बारे में क्या सोचते हैं?’

‘हम बचपन में सांपसीढ़ी खेल खेलते थे, मेरे खयाल से जिंदगी भी बिलकुल वैसी है…कहां सीढ़ी है और कहां सांप, यही इस जीवन का रहस्य है और यही रोमांच है,’ मैं ने अपना फलसफा बताया.

‘आप के इस खेल में मैं क्या हूं, सांप या सीढ़ी?’ बड़ी सादगी से काकुल ने पूछा.

‘मैं ने कहा न, यही तो रहस्य है.’

मैं ने लोगों को व्यायाम सिखाना शुरू किया. मेरा काम चल निकला. मुझे यश मिलना शुरू हुआ. मैं ज्यादा व्यस्त होता गया. काकुल से मिलना बस सप्ताहांत पर ही हो पाता था.

कम मिलने की वजह से हम आपस में ज्यादा नजदीक हुए. एक इतवार को स्टीमर पर सैर करते हुए काकुल ने कहा, ‘मैं आप को आई एल कहा करूं?’

‘भई, यह ‘आई एल’ क्या बला है?’ मैं ने अचकचा कर पूछा.

‘आई एल, यानी इमरती लाल, इमरती हमें बहुत पसंद है. बस यों जानिए, हमारी जान है, और आप भी…’ सांझ के आकाश की सारी लालिमा काकुल के कपोलों में समा गई थी.

‘एक बात पूछूं, क्या पापामम्मी को काकुल मंजूर होगी?’ उस ने पूछा.

मैं ने पहली बार गौर किया कि मेरे पापामम्मी को अंकल, आंटी कहना वह कभी का छोड़ चुकी है. मुझे भी नाम से बुलाए उसे शायद अरसा हो गया था.

‘काकुल, अगर बेटे को मंजूर, तो मम्मीपापा को भी मंजूर,’ मैं ने जवाब दिया.

काकुल ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया और अपनी आंखें बंद कर लीं. शायद बंद आंखों से वह एक सजीसंवरी दुलहन और उस का दूल्हा देख रही थी. इस से पहले उस ने कभी मुझ से शादी की इच्छा जाहिर नहीं की थी. बस, ऐसा लगा, जैसे काकुल दबेपांव चुपके से बिना दरवाजा खटखटाए मेरे घर में दाखिल हो गई हो.

मैं ज्यादा व्यस्त होता गया, सुबह नौकरी और शाम को एक ट्रेनिंग क्लास. पर दिन में काकुल से फोन पर बात जरूर होती. अब मैं आने वाले दिनों के बारे में ज्यादा गंभीरता से सोचता कि इस रिश्ते के बारे में मेरे पापामम्मी और उस के पापा, कैसी प्रतिक्रया जाहिर करेंगे. हम एकदूसरे से निभा तो पाएंगे? कहीं यह प्रयोग असफल तो नहीं होगा? ऐसे ढेर सारे सवाल मुझे घेरे रहते.

एक दिन काकुल ने फोन कर के बताया कि उस के अब्बा के दोस्त का बेटा जावेद, कुछ दिनों के लिए पेरिस आया हुआ है. हम कुछ दिनों के लिए आपस में मिल नहीं पाएंगे. इस का उसे बहुत रंज रहेगा, ऐसा उस ने कहा.

धीरेधीरे काकुल ने फोन करना कम कर दिया. कभी मैं फोन करता तो काकुल से बात कम होती, वह जावेदपुराण ज्यादा बांच रही होती. जैसे, जावेद बहुत रईस है, कई देशों में उस का कारोबार फैला हुआ है. अगर जावेद को बैंक से पैसे निकालने हों तो उसे बैंक जाने की कोई जरूरत नहीं. मैनेजर उसे पैसे देने आता है. उस की सैक्रेटरी बहुत खूबसूरत है. उस का इसलामाबाद में खूब रसूख है. वह कई सियासी पार्टियों को चंदा देता है. जावेद का जिस से भी निकाह होगा, उस का समय ही अच्छा होगा.

मुझे बहुत हैरानी हुई काकुल को जावेद के रंग में रंगी देख कर. मैं ने फोन करना बंद कर दिया.

जैसे बर्फ का टुकड़ा धीरेधीरे पिघल कर पानी में तबदील हो जाता है, उसी तरह मेरा और काकुल का रिश्ता भी धीरेधीरे अपनी गरमी खो चुका था. रिश्ते की तपिश एकदूसरे के लिए प्यार, एक घर बसाने का सपना, एकदूसरे को खूब सारी खुशियां देने का अरमान, सब खत्म हो चुका था.

इस अग्निकुंड में अंतिम आहुति तब पड़ी जब काकुल ने फोन पर बताया कि उस के अब्बा उस का और जावेद का निकाह करना चाहते हैं. मैं ने मुबारकबाद दी और रिसीवर रख दिया.

कई महीने गुजर गए. शुरूशुरू में काकुल की बहुत याद आती थी, फिर धीरेधीरे उस के बिना रहने की आदत पड़ गई. एक दिन वह अचानक मेरे अपार्टमैंट में आई. गुमसुम, उदास, कहीं दूर कुछ तलाशती सी आंखें, उलझे हुए बाल, पीली होती हुई रंगत…मैं उसे कहीं और देखता तो शायद पहचान न पाता. उसे बैठाया, फ्रिज से एक कोल्ड ड्रिंक निकाल कर, फिर जावेद और उस के बारे में पूछा.

‘जावेद एक धोखेबाज इंसान था, वह दिवालिया था और उस ने आस्ट्रेलिया में निकाह भी कर रखा था. समय रहते अब्बा को पता चल गया और मैं इस जिल्लत से बच गई,’ काकुल ने जवाब दिया.

‘ओह,’ मैं ने धीमे से सहानुभूतिवश गरदन हिलाई. चंद क्षणों के बाद सहज भाव से पूछा, ‘‘कैसे आना हुआ?’’

‘मैं आज शाम की फ्लाइट से वापस इसलामाबाद जा रही हूं. मुझे विदा करने एअरपोर्ट पर आप आ पाएंगे तो बहुत अच्छा लगेगा.’

‘मैं जरूर आऊंगा.’

शायद वह चाहती थी कि मैं उसे रोक लूं. मेरे दिल के किसी कोने में कहीं वह अब भी मौजूद थी. मैं ने खुद अपनेआप को टटोला, अपनेआप से पूछा तो जवाब पाया कि हम 2 नदी के किनारों की तरह हैं, जिन पर कोई पुल नहीं है. अब कुछ ऐसा बाकी नहीं है जिसे जिंदा रखने की कोशिश की जाए.

अलविदा…काकुल…अलविदा…

गैस की कालाबाजारी: प्यार की अनोखी जोड़ी

उत्तराखंड के काफी खूबरसूरत लैंसडाउन इलाके में बहुत से सैलानी आते हैं. वहां का मौसम है ही इतना खुशनुमा कि शहरी लोगों को अपनी तरफ खींच ही लेता है. इसी के चलते वहां बहुत से छोटेबड़े होटल, ढाबे और रैस्टोरैंट बन गए हैं. अब तो रिजौर्ट भी खूब दिखने लगे हैं.

इसी लैंसडाउन इलाके में बनी एक गैस एजेंसी से जुड़े दर्जनों गांवों में लोग आज भी वहां गैस की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. वजह, काफी समय से चैलूसैंण गांव के अलावा पाली, शीला, सुराड़ी, धुरा, सिलोगी, बाघों, अमलेशा और रिंगालपानी जैसे बहुत से गांवों में घरेलू गैस नहीं पहुंच पा रही थी.

‘‘अरे, यहां जमा हो कर क्या होगा. गैस एजेंसी का मालिक कालाबाजारी का शातिर खिलाड़ी है. वह घरेलू गैस को तिकड़मबाजी से होटल, ढाबे और रैस्टोरैंट वालों को बेच देता है और भारी मुनाफा कमाता है,’’ सिलोगी गांव के पान सिंह ने कहा.

‘‘केंद्र की मोदी सरकार कितना भी दावा कर ले कि ‘न खाएंगे और न खाने देंगे’, पर कालाबाजारी हद पर है और नेताओं की नाक के नीचे सब गोरखधंधा हो रहा है,’’ सुराड़ी के नरेंद्र सिंह ने कहा और गुस्से में सड़क पर ही थूक दिया.

पाली गांव के दर्शन कुमार ने दबी जबान में कहा, ‘‘शहर में पैट्रोमैक्स (छोटे गैस सिलैंडर) में गैस रिफिल का धंधा भी जोरों पर चल रहा है. शहर में गैस की सप्लाई सामान्य हो या फिर कितनी भी किल्लत चल रही हो, लेकिन पैट्रोमैक्स में आसानी से गैस मिल जाती है.

‘‘इन पैट्रोमैक्सों में 100 रुपए किलो गैस बेची जाती है. साफ है कि 450 रुपए का गैस सिलैंडर रिफिल कर के 1,600 रुपए में बिक रहा है. आखिर इन को कहां से सिलैंडर मिल रहे हैं?’’

धुरा गांव के संदीप सिंह ने नया ही बम फोड़ा, ‘‘हरिद्वार की खबर नहीं सुनी क्या तुम लोगों ने… वहां तो उज्ज्वला योजना में ही फर्जीवाड़ा सामने आया है. लोग फर्जी दस्तावेज लगा कर मुफ्त कनैक्शन और सब्सिडी पा रहे हैं. इन में ऐसे लोग

भी शामिल हैं, जिन के पास अपनी कार है. खुद को गरीब दिखा कर हम जैसों के पेट पर लात मारते हैं.’’

‘‘हां, मैं ने भी यह खबर पढ़ी थी. हरिद्वार जिले में डेढ़ लाख ऐसे कनैक्शनों की जांच हो रही है. पुष्पक गैस एजेंसी के मैनेजर राकेश सिंह के मुताबिक, कई उपभोक्ताओं की मौत हो चुकी है, फिर भी कनैक्शन से सप्लाई और सब्सिडी जारी हो

रही है,’’ चैलूसैंण गांव के हिम्मत सिंह ने बताया.

‘‘सरकार धार्मिक जगहों को तो संवार रही है, सड़कें और सुरंगें बनाने के दावे कर रही है, पर पहाड़ की गरीब जनता की सुध नहीं ले रही है. हमारे गांव के गांव खाली हो रहे हैं, पर सरकार चाहती है कि रिजौर्ट में अमीर लोग खूब आते रहें.

‘‘अरे, जब उन की सेवा करने के लिए पहाड़ी लोग ही नहीं बचेंगे, तो वे क्या खाक हमारी वादियों का मजा ले पाएंगे. एक मैगी बनाने वाले को भी सस्ता सिलैंडर चाहिए, लेकिन इस कालाबाजारी ने सब बेड़ा गर्क कर के रख दिया है,’’ पास खड़े मैगी बनाने वाले पवन राजपूत ने अपना दर्द बयां किया.

इन सब लोगों में 23 साल का प्रेम रावत भी शामिल था, जो अमलेशा गांव में रहता था. यह गांव पौड़ीगढ़वाल जिले के जयहरीखाल ब्लौक और लैंसडाउन तहसील में था, जो अमकटाला ग्राम पंचायत के तहत आता था. इस गांव का भौगोलिक क्षेत्रफल 114.41 हैक्टेयर था.

ऐसा बताया जाता है कि अमलेशा गांव की कुल आबादी 151 थी, जिस में 44 परिवार शामिल थे. प्रेम रावत का परिवार भी उन में से एक था. घर कच्चा था और रोजगार की कमी. खेती से मुश्किल से गुजारा होता था और बीए करने के बावजूद प्रेम रावत को उत्तराखंड में ही कहीं अच्छी नौकरी नहीं मिल पा रही थी. वह अपने दोस्तों की तरह दिल्ली के होटलों में बरतन घिस कर अपनी जिंदगी को नरक नहीं बनाना चाहता था.

प्रेम रावत भी घरेलू गैस सिलैंडर पाने की आस में गैस एजेंसी आया था, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात. प्रदेश में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ शुरू होने के बाद घरघर गैस सिलैंडर तो पहुंच गए हैं, लेकिन पर्वतीय इलाकों में अब भी सिलैंडर रिफिल कराने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था या कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. ऊपर से कालाबाजारी कोढ़ पर खाज साबित हो रही थी.

प्रेम रावत को आज भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा था. उसे अपनी मां कटोरी देवी की याद आ गई, जिस की धुएं की वजह से फेफड़े और आंखें कमजोर हो गई थीं. पिता श्याम सिंह रावत की आमदनी से किसी तरह घर का खर्च चलता था. कमाई के आधे से ज्यादा रुपए लकड़ीचूल्हा में खर्च हो जाते थे.

प्रेम अभी गांव की बस का इंतजार कर ही रहा था कि उसे अपने ही गांव की ज्योति नयाल आती दिखी. वह 22 साल की जवान लड़की थी. दुबलीपतली, पर बहुत गोरी और खूबसूरत. प्रेम उस के रूप का दीवाना था.

ज्योति अपने पिता के साथ खेतीबारी में हाथ बंटाती थी और उस ने अपने घर में एक बड़े कमरे में मशरूम की खेती भी कर रखी थी. उस के उगाए मशरूम लोकल होटल में सप्लाई होते थे.

प्रेम और ज्योति बस का इंतजार करने लगे. आज प्रेम सोच रहा था कि वह ज्योति से अपने दिल की बात कह देगा, पर उसे शक था कि क्या ज्योति एक बेरोजगार के प्यार को अपना लेगी?

‘‘बड़े दिनों में नजर आई. कहां रहती हो आजकल? कोई खैरखबर नहीं,’’ प्रेम ने पूछा.

ज्योति ने एक नजर उसे देखा और बोली, ‘‘सारी खैरखबर मैं ही लूं? तुम भी तो फोन कर सकते थे. अभी मैं मशरूम सप्लाई कर के आ रही हूं.

‘‘लैंसडाउन में आज भी गैस कंपनी के आगे लोगों की भीड़ जमा थी. गांव वालों को घरेलू गैस चूल्हे की सप्लाई नहीं हो रही है. बड़ी दिक्कत होने लगी है. तुम तो जानते ही हो कि जंगल से जलावन लकड़ी लाने में औरतों को कितना खतरा रहता है,’’ ज्योति ने कहा.

‘‘पिछले साल के दिसंबर महीने की ही तो खबर है, जब लैंसडाउन वन प्रभाग के दुगड्डा रेंज के तहत टाटरी गांव में भालू के हमले से एक औरत गंभीर रूप से घायल हो गई थी.

‘‘खबर में बताया गया था कि टाटरी गांव की कुसुम देवी जंगल में चारा लेने गई थी कि तभी भालू ने उस पर हमला बोल दिया. वह तो भला हो कि कुसुम देवी ने दरांती से भालू पर जोरदार हमला किया और अपनी जान बचा ली, वरना कुछ भी हो सकता था,’’ प्रेम ने ज्योति के डर को खबर का जामा पहना दिया.

ज्योति का मूड खराब हो गया. बस भी तो नहीं आ रही थी. इतने में उन्हीं के गांव का राम सिंह वहां आ गया, जो एक होटल में कुक था. वह गढ़वाली खाना बनाने में माहिर था.

राम सिंह को देख प्रेम ने कहा, ‘‘इन लोगों के चलते घरेलू गैस की कालाबाजारी होती है. हमारे हिस्से के सिलैंडर ये लोग हड़प लेते हैं.’’

यह सुन कर राम सिंह चिढ़ गया और प्रेम का गरीबान पकड़ लिया और डपट कर बोला, ‘‘इतना ही दर्द हो रहा है तो गैस एजेंसी फूंक दो न. वे लोग ही कालाबाजारी करते हैं. अगर किसी को घरबैठे सिलैंडर मिल जाए, तो कोई पागल ही होगा जो मना करेगा.’’

ज्योति ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘छोड़ इसे. नौकरी के नशे में इतने भी मत उड़ो कि आसापास का कुछ भी न दिखे. अपनी ताकत खाना बनाने के लिए बचा कर रखो. घर पर भी रसोई बनानी होगी.’’

राम सिंह ने प्रेम को तो छोड़ दिया, पर ज्योति को घूरते हुए बोला, ‘‘सब सम?ाता हूं कि तुम दोनों में क्या खिचड़ी पक रही है. पूरे पहाड़ पर गूंज रही तेरी और प्रेम की लवस्टोरी.’’

‘‘तो तेरे पेट में क्यों दर्द हो रहा है? लगता है, आज होटल में देशी दारू नहीं मिली, जो मरोड़ उठ रही है,’’ ज्योति ने खरीखरी सुना दी.

राम सिंह गुस्से में पैर पटकता हुआ चला गया. प्रेम को अंदाजा नहीं था कि राम सिंह इस तरह की बात बोल देगा. वह डर गया. उसे लगा कि ज्योति को बुरा लगा होगा. वह चुप ही रहा.

इतने में बस आ गई. ज्योति बोली, ‘‘चलना है कि नहीं या यहीं बुत बने खड़े रहोगे?’’

प्रेम बस में चढ़ गया. ज्यादा भीड़ नहीं थी. उन्हें सीट मिल गई. दोपहर के 3 बजे थे. वे शाम तक घर पहुंच जाते. ड्राइवर ने गढ़वाली गाना ‘मेरी प्यारी सुशीला’ बजा रखा था.

सीट पर बैठते ही ज्योति ने प्रेम के कंधे पर सिर टिका दिया और अपनी आंखें बंद कर लीं. प्रेम की बांछें खिल गईं. उस ने ज्योति का हाथ पकड़ लिया. ज्योति आंखें बंद किए ही मुसकरा दी. इस के बाद पता ही नहीं चला कि कब उन का गांव आ गया.

ज्योति से विदा ले कर प्रेम अपने घर पहुंचा. मां रसोई में दालभात पका रही थीं. वहां नया भरा गैस चूल्हा देख कर प्रेम हैरत में पड़ गया.

‘‘यह नया चूल्हा कौन लाया?’’ प्रेम ने अपनी मां से पूछा.

‘‘तेरे पिताजी. बस, दलाल को 300 रुपए ऊपर से दिए. बोले कि कब तक लकड़ी के धुएं में अपनी आंखें फोड़ती रहेगी.

‘‘बेटा, अब जल्दी से कोई नौकरी देख कर ब्याह कर ले और मेरे लिए कमेरी बहू ले आ. अब मैं थक चुकी हूं अकेले काम करतेकरते,’’ इतना कह कर मां चूल्हे में फूंकनी से आंच तेज करने लगीं.

प्रेम छत पर चला गया. उसे ज्योति की याद आ गई. उस ने मन ही मन राम सिंह का शुक्रिया अदा किया, जिस ने आज ऐसा सच बोला, जो घरेलू गैस की कालाबाजारी से ज्यादा बड़ा था, पर उतना घिनौना नहीं. इस सच ने तो ज्योति और प्रेम को और नजदीक ला दिया था.

छत से तारों को देखता हुआ प्रेम नई जिंदगी के सपनों में खो गया. पड़ोस के घर पर रेडियो में वही गढ़वाली गाना ‘मेरी प्यारी सुशीला’ बज रहा था.

Holi 2024 – रंग दे चुनरिया: क्या एक हो पाए गौरी-श्याम

वह बड़ा सा मकान किसी दुलहन की तरह सजा हुआ था. ऐसा लग रहा था, जैसे वहां बरात आई है. दूर से देखने पर ऐसा जान पड़ता था, जैसे हजारों तारे आकाश में एकसाथ टिमटिमा रहे हों. छोटेछोटे बल्ब जुगनुओं की तरह चमक रहे थे. लेकिन श्याम की नजर उस लड़की पर थी, जो उस के दिल की गहराइयों में उतरती चली गई थी. वह कोई और नहीं, बल्कि उस की भाभी की बहन गौरी थी. खूबसूरत चेहरा, प्यारी आंखें, नाक में चमकता हीरा और गोरेगोरे हाथों में मेहंदी का रंग उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था. श्याम उसे अपना दिल दे बैठा था. उस ने महसूस किया कि गौरी के बिना उस की जिंदगी अधूरी है.

गौरी कभीकभार तिरछी नजरों से उसे देख लेती. एक बार दोनों की नजरें आपस में मिलीं, तो वह मुसकरा दी. तभी भाभी ने उसे पुकारा, ‘‘श्याम?’’

‘‘जी हां, भाभी…’’ उसे लगा कि भाभी ने उस की चोरी पकड़ ली है. ‘‘क्या बात है, आज तुम उदास क्यों हो? कहीं किसी ने हमारे देवरजी का दिल तो नहीं चुरा लिया?’’

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ वह अपनी घबराहट को छिपाने के लिए रूमाल निकाल कर पसीना पोंछने लगा.

श्याम अपनी भाभी के जन्मदिन पर उन के साथ उन के मायके गया था, लेकिन उसे क्या पता था कि यहां आते ही उसे प्रेम रोग लग जाएगा. गौरी सुंदर थी, इसलिए उस के मन को भा गई और वह उस पर दिलोजान से फिदा हो गया. अपने प्यार का इजहार करने के बारे में वह सोच रहा था कि क्या भाभी उसे अपनी देवरानी बनाने के लिए तैयार होंगी. भाभी अगर तैयार भी हो जाएं, तो क्या भैया होंगे? देर रात तक वह यही सोचता रहा.

अगले दिन श्याम चुपके से गौरी के कमरे में पहुंचा. वहां वह खिड़की खोल कर बाहर का नजारा देख रही थी. वह उस की आंख बंद कर उभारों से हरकत करते हुए बोला, ‘‘कैसा लगा गौरी?’’ गौरी खड़ी होती हुई बोली, ‘‘श्याम, ऐसी हरकतों से मुझे सख्त नफरत है.’’

‘‘ओह गौरी, मैं कोई पराया थोड़े ही हूं.’’

‘‘मैं दीदी और जीजाजी से शिकायत करूंगी.’’ ‘‘गौरी, मुझे साफ कर दो. आइंदा, मैं कभी ऐसी हरकत नहीं करूंगा.’’

‘‘मैं अभी दीदी को बुला कर लाती हूं,’’ कह कर गौरी फीकी मुसकान के साथ वहां से चली गई. श्याम का मोह भंग हुआ. उसे लगा कि गौरी को उस से प्यार नहीं है. वह अब तक उस से एकतरफा प्यार कर रहा था. लेकिन अब क्या होगा? कुछ देर बाद भाभी यहां पहुंच जाएंगी, फिर सारी पोल खुल जाएगी. खैर, बाद में जो होगा देख लेंगे… सोच कर उस ने गौरी के नाम एक खत लिख कर तकिए के नीचे रख दिया और अपने गांव चल दिया.

गौरी आधे घंटे बाद चाय ले कर जब कमरे में पहुंची, तो उस का दिल धकधक करने लगा. एक अनजान ताकत उस के मन को बेचैन कर रही थी कि आखिर श्याम कहां चला गया. लेकिन तभी उस की नजर तकिए के नीचे दबे कागज पर गई. वह उसे उठा कर पढ़ने लगी:

‘प्रिय गौरी, खुश रहो. ‘मैं अपने किए पर बहुत पछताया, लेकिन तुम भी पता नहीं किस पत्थर की बनी हो, जो मेरे लाख माफी मांगने के बावजूद भैया और भाभी से कहने के लिए चली गईं. पता नहीं, क्यों मैं तुम्हारे साथ गलत हरकत कर बैठा? मैं गांव जा रहा हूं. जब भैया वापस आएंगे, तो मेरी खैर नहीं.

‘गौरी, मैं ने अपनी जिंदगी में सिर्फ तुम्हीं को चाहा, लेकिन मुझे मालूम न था कि मेरा प्यार एकतरफा है. काश, यह बात पहले मेरी समझ में आ जाती. ‘अच्छा गौरी, हो सके तो मुझे माफ कर देना. मैं रो कर सब्र कर लूंगा कि अपनी जिंदगी में पहली बार किसी को चाहा था.

‘तुम्हारा श्याम.’ गौरी की आंखों से पछतावे के आंसू बहने लगे. चाय का प्याला जैसे ही उठाया, वैसे ही गिर कर टुकड़ेटुकड़े हो गया. उसे ऐसा लगा कि किसी ने उस के दिल के हजार टुकड़े कर दिए. उस ने कभी सोचा भी न होगा कि श्याम अपने भैया और भाभी की इतनी इज्जत करता है.

तभी उस की दीदी कमरे में आई, ‘‘क्या बात है गौरी, यह प्याला कैसे टूट गया. श्याम कहां है?’’ आते ही दीदी ने सवालों की झड़ी लगा दी. अचानक उस की निगाह गौरी के हाथ में बंद कागज पर चली गई, जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थी. वह खत ले कर पढ़ने लगी.

‘‘तो यह बात है…’’ ‘‘नहीं दीदी, वह तो श्याम,’’ गौरी अपनी बात पूरी नहीं कर सकी.

‘‘अरे, तेरी आवाज में कंपन क्यों पैदा हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है. एक बात बताओ गौरी, क्या तुम भी उस से प्यार करती हो?’’ गौरी ने नजरें झुका लीं, जो इस

बात की गवाह थीं कि उसे भी श्याम से प्यार है. ‘‘लेकिन गौरी, श्याम कहां चला गया?’’

गौरी ने रोते हुए सारी बातें बता दीं. यह सब सुन कर गौरी की बहन खूब हंसी और बोली, ‘‘गौरी, अगर मैं तुम्हें अपनी देवरानी बना लूंगी, तो तुम मेरा हुक्म माना करोगी या नहीं?’’

‘‘दीदी, मैं नहीं जानती थी कि मेरी झूठी धमकी को श्याम इतनी गंभीरता से लेगा. मैं जिंदगीभर तुम्हारी दासी बन कर रहूंगी, लेकिन श्याम के रूप में मुझे मेरी खुशियां लौटा दो. वह मुझे बेवफा समझ रहा होगा.’’ इस के बाद दोनों बहनें काफी देर तक बातें करती रहीं.

श्याम की भाभी जब अपनी ससुराल लौटीं, तो गौरी को भी साथ ले आईं. श्याम घर में नहीं था. जैसे ही उस ने शाम को घर में कदम रखा, तो सामने गौरी को देखा, तो मायूस हो कर बोला, ‘‘गौरी, क्या भाभी और भैया अंदर हैं?’’

‘‘हां, अंदर ही हैं.’’ यह सुन कर जैसे ही श्याम लौटने लगा, तो गौरी ने उस की कलाई पकड़ ली और बोली, ‘‘प्यार करने वाले इतने कायर नहीं हुआ करते श्याम. मैं सच में तुम से प्यार करती हूं.’’

‘‘गौरी मेरा हाथ छोड़ दो, वरना भैया देख लेंगे.’’ ‘‘मैं ने सब सुन लिया है बरखुरदार, तुम दोनों अंदर आ जाओ.’’

आवाज सुन कर दोनों ने नजरें उठा कर देखा, तो सामने श्याम का बड़ा भाई खड़ा था. ‘‘मेरे डरपोक देवरजी, अंदर आ जाइए,’’ अंदर से श्याम की भाभी ने आवाज दी.

इस तरह श्याम और गौरी की शादी धूमधाम से हो गई. इस साल होली का त्योहार दोनों के लिए खुशियां ले कर आया.

होली के दिन गौरी ने श्याम के कपड़ों पर जगहजगह मन भर कर रंग लगाया. ‘‘गौरी, आज तेरी चुनरी की जगह गालों को लाल करूंगा,’’ कह कर श्याम भी गौरी की तरफ बढ़ा.

तब ‘डरपोक पिया, रंग दे चुनरिया’ कह कर गौरी ने शर्म से अपना चेहरा हाथों से ढक लिया.

Holi 2024 – राजकुमार लाओगी न: चेष्टा को राजकुमार मिला या नहीं

‘‘चेष्टा, पापा के लिए चाय बना देना. हो सके तो सैंडविच भी बना देना? मैं जा रही हूं, मुझे योगा के लिए देर हो रही है,’’ कहती हुई योगिताजी स्कूटी स्टार्ट कर चली गईं. उन्होंने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा, न उन्होंने चेष्टा के उत्तर की प्रतीक्षा की.

योगिताजी मध्यम- वर्गीय सांवले रंग की महिला हैं. पति योगेश बैंक में क्लर्क हैं, अच्छीखासी तनख्वाह है. उन का एक बेटा है. उस का नाम युग है. घर में किसी चीज की कमी नहीं है.

जैसा कि  सामान्य परिवारों में होता है घर पर योगिताजी का राज था. योगेशजी उन्हीं के इशारों पर नाचने वाले थे. बेटा युग भी बैंक में अधिकारी हो गया था. बेटी चेष्टा एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका बन गई थी.

कालेज के दिनों में ही युग की दोस्ती अपने साथ पढ़ने वाली उत्तरा से हो गई. उत्तरा साधारण परिवार से थी. उस के पिता बैंक में चपरासी थे, इसलिए जीवन स्तर सामान्य था. उत्तरा की मां छोटेछोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के साथ ही कुछ सिलाई का काम कर के पैसे कमा लेती थीं.

उत्तरा के मातापिता ईमानदार और चरित्रवान थे इसलिए वह भी गुणवती थी. पढ़ने में काफी तेज थी. उत्तरा का व्यक्तित्व आकर्षक था. दुबलीपतली, सांवली उत्तरा सदा हंसती रहती थी. वह गाती भी अच्छा थी. कालेज के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उद्घोषणा का कार्य वही करती थी. उस की बड़ीबड़ी कजरारी आंखों में गजब का आकर्षण था. उस की हंसी में युग ऐसा बंधा कि उस की मां के तमाम विरोध के आगे उस के पैर नहीं डगमगाए और वह उत्तरा के प्यार में मांबाप को भी छोड़ने को तैयार हो गया.

योगिताजी को मजबूरी में युग को शादी की इजाजत देनी पड़ी. कोर्टमैरिज कर चुके युग और उत्तरा के विवाह को समाज की स्वीकृति दिलाने के लिए योगिताजी ने एक भव्य पार्टी का आयोजन किया. समाज को दिखाने के लिए बेटे की जिद के आगे योगिताजी झुक तो गईं लेकिन दिल में बड़ी गांठ थी कि उत्तरा एक चपरासी की बेटी है.

दहेज में मिलने वाली नोटों की भारी गड्डियां और ट्रक भरे सामान के अरमान मन में ही रह गए. अपनी कुंठा के कारण वे उत्तरा को तरहतरह से सतातीं. उस के मातापिता के बारे में उलटासीधा बोलती रहतीं. उत्तरा के हर काम में मीनमेख निकालना उन का नित्य का काम था.

उत्तरा भी बैंक में नौकरी करती थी. सुबह पापा की चायब्रेड, फिर दोबारा मम्मी की चाय, फिर युग और चेष्टा को नाश्ता देने के बाद वह सब का लंच बना कर अलगअलग पैक करती. मम्मी का खाना डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद ही वह घर से बाहर निकलती थी. इस भागदौड़ में उसे अपने मुंह में अन्न का दाना भी डालने को समय न मिलता था.

यद्यपि युग उस से अकसर कहता कि क्यों तुम इतना काम करती हो, लेकिन वह हमेशा हंस कर कहती, ‘‘काम ही कितना है, काम करने से मैं फिट रहती हूं.’’

योगिताजी के अलावा सभी लोग उत्तरा से बहुत खुश थे. योगेशजी तो उत्तरा की तारीफ करते नहीं अघाते. सभी से कहते, ‘‘बहू हो तो उत्तरा जैसी. मेरे बेटे युग ने बहुत अच्छी लड़की चुनी है. हमारे तो भाग्य ही जग गए जो उत्तरा जैसी लड़की हमारे घर आई है.’’

चेष्टा भी अपनी भाभी से घुलमिल गई थी. वह और उत्तरा अकसर खुसरफुसर करती रहती थीं. दोनों एकदूसरे से घंटों बातें करती रहतीं. सुबह उत्तरा को अकेले काम करते देख चेष्टा उस की मदद करने पहुंच जाती. उत्तरा को बहुत अच्छा लगता, ननदभावज दोनों मिल कर सब काम जल्दी निबटा लेतीं. उत्तरा बैंक चली जाती और चेष्टा स्कूल.

योगिताजी बेटी को बहू के साथ हंसहंस कर काम करते देखतीं तो कुढ़ कर रह जातीं…फौरन चेष्टा को आवाज दे कर बुला लेतीं. यही नहीं, बेटी को तरहतरह से भाभी के प्रति भड़कातीं और उलटीसीधी पट्टी पढ़ातीं.

उत्तरा की दृष्टि से कुछ छिपा नहीं था लेकिन वह सोचती थी कि कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाएगा. कभी तो मम्मीजी के मन में मेरे प्रति प्यार का पौधा पनपेगा. वह यथासंभव अच्छी तरह

कार्य करने का प्रयास करती, लेकिन योगिताजी को खुश करना बहुत कठिन था. रोज किसी न किसी बात पर उन का नाराज होना आवश्यक था. कभी सब्जी में मसाला तेज तो कभी रोटी कड़ी, कभी दाल में घी ज्यादा तो कभी चाय ठंडी है, दूसरी ला आदि.

युग इन बातों से अनजान नहीं था. वह मां के हर अत्याचार को नित्य देखता रहता था. पर उत्तरा की जिद थी कि मैं मम्मीजी का प्यार पाने में एक न एक दिन अवश्य सफल हो जाऊंगी. और वे उसे अपना लेंगी.

योगिताजी को घर के कामों से कोई मतलब नहीं रह गया था, क्योंकि उत्तरा ने पूरे काम को संभाल लिया था, इसलिए वह कई सभासंगठनों से जुड़ कर समाजसेवा के नाम पर यहांवहां घूमती रहती थीं.

योगिताजी चेष्टा की शादी को ले कर परेशान रहती थीं, लेकिन उन के ख्वाब बहुत ऊंचे थे. कोई भी लड़का उन्हें अपने स्तर का नहीं लगता था. उन्होंने कई जगह शादी के लिए प्रयास किए लेकिन कहीं चेष्टा का सांवला रंग, कहीं दहेज का मामला…बात नहीं बन पाई.

योगिताजी के ऊंचेऊंचे सपने चेष्टा की शादी में आड़े आ रहे थे. धीरेधीरे चेष्टा के मन में कुंठा जन्म लेने लगी. उत्तरा और युग को हंसते देख कर उसे ईर्ष्या होने लगी थी. चेष्टा अकसर झुंझला उठती. उस के मन में भी अपनी शादी की इच्छा उठती थी. उस को भी सजनेसंवरने की इच्छा होती थी. चेष्टा के तैयार होते ही योगिताजी की आंखें टेढ़ी होने लगतीं. कहतीं, ‘‘शादी के बाद सजना. कुंआरी लड़कियों का सजना- धजना ठीक नहीं.’’

चेष्टा यह सुन कर क्रोध से उबल पड़ती लेकिन कुछ बोल न पाती. योगिताजी के कड़े अनुशासन की जंजीरों में जकड़ी रहती. योगिताजी उस के पलपल का हिसाब रखतीं. पूछतीं, ‘‘स्कूल से आने में देर क्यों हुई? कहां गई थी और किस से मिली थी?’’

योगिताजी के  मन में हर क्षण संशय का कांटा चुभता रहता था. उस कुंठा को जाहिर करते हुए वे उत्तरा को अनापशनाप बकने लग जाती थीं. उन की चीख- चिल्लाहट से घर गुलजार रहता. वे हर क्षण उत्तरा पर यही लांछन लगातीं कि यदि तू अपने साथ दहेज लाती तो में वही दहेज दे कर बेटी के लिए अच्छा सा घरवर ढूंढ़ सकती थी.

योगिताजी के 2 चेहरे थे. घर में उन का व्यक्तित्व अलग था लेकिन समाज में वह अत्यंत मृदुभाषी थीं. सब के सुखदुख में खड़ी होती थीं. यदि कोई बेटीबहू के बारे में पूछता था तो बिलकुल चुप हो जाती थीं. इसलिए उन की पारिवारिक स्थिति के बारे में कोई नहीं जानता था. योगिताजी के बारे में समाज में लोगों की अलगअलग धारणा थी. कोई उन्हें सहृदय तो कोई घाघ कहता.

एक दिन योगिताजी शाम को अपने चिरपरिचित अंदाज में उत्तरा पर नाराज हो रही थीं, उसे चपरासी की बेटी कह कर अपमानित कर रही थीं तभी युग क्रोधित हो उठा, ‘‘चलो उत्तरा, अब मैं यहां एक पल भी नहीं रह सकता.’’

घर में कोहराम मच गया. चेष्टा रोए जा रही थी. योगेशजी बेटे को समझाने का प्रयास कर रहे थे. परंतु युग रोजरोज की चिकचिक से तंग हो चुका था. उस ने किसी की न सुनी. दोचार कपड़े अटैची में डाले और उत्तरा का हाथ पकड़ कर घर से निकल गया.

योगिताजी के तो हाथों के तोते उड़ गए. वे स्तब्ध रह गईं…कुछ कहनेसुनने को बचा ही नहीं था. युग उत्तरा को ले कर जा चुका था. योगेशजी पत्नी की ओर देख कर बोले, ‘‘अच्छा हुआ, उन्हें इस नरक से छुटकारा तो मिला.’’

योगिताजी अनर्गल प्रलाप करती रहीं. सब रोतेधोते सो गए.

सुबह हुई. योगेशजी ने खुद चाय बनाई, बेटी और पत्नी को देने के बाद घर से निकल गए. चेष्टा ने जैसेतैसे अपना लंच बाक्स बंद किया और दौड़तीभागती स्कूल पहुंची.

घर में सन्नाटा पसर गया था. आपस में सभी एकदूसरे से मुंह चुराते. चेष्टा सुबहशाम रसोई में लगी रहती. घर के कामों का मोर्चा उस ने संभाल लिया था, इसलिए योगिताजी की दिनचर्या में कोई खास असर नहीं पड़ा था. वे वैसे भी सामाजिक कार्यों में ज्यादा व्यस्त रहती थीं. घर की परवा ही उन्हें कहां थी.

योगेशजी से जब भी योगिताजी की बातचीत होती चेष्टा की शादी के बारे में बहस हो जाती. उन का मापदंड था कि मेरी एक ही बेटी है, इसलिए दामाद इंजीनियर, डाक्टर या सी.ए. हो. उस का बड़ा सा घर हो. लड़का राजकुमार सा सुंदर हो, परिवार छोटा हो आदि, पर तमाम शर्तें पूरी होती नहीं दिखती थीं.

चेष्टा की उम्र 30 से ऊपर हो चुकी थी. उस का सांवला रंग अब काला पड़ता जा रहा था. तनाव के कारण चेहरे पर अजीब सा रूखापन झलकने लगा था. चिड़चिड़ेपन के कारण उम्र भी ज्यादा दिखने लगी थी.

उत्तरा के जाने के बाद चेष्टा गुमसुम हो गई थी. घर में उस से कोई बात करने वाला नहीं था. कभीकभी टेलीविजन देखती थी लेकिन मन ही मन मां के प्रति क्रोध की आग में झुलसती रहती थी. तभी उस को चैतन्य मिला जिस की स्कूल के पास ही एक किताबकापी की दुकान थी. आतेजाते चेष्टा और उस की आंखें चार होती थीं. चेष्टा के कदम अनायास ही वहां थम से जाते. कभी वहां वह मोबाइल रिचार्ज करवाती तो कभी पेन खरीदती. उस की और चैतन्य की दोस्ती बढ़ने लगी. आंखोंआंखों में प्यार पनपने लगा. वह मन ही मन चैतन्य के लिए सपने बुनने लगी थी. दोनों चुपकेचुपके मिलने लगे. कभीकभी शाम भी साथ ही गुजारते. चेष्टा चैतन्य के प्यार में खो गई. यद्यपि चैतन्य भी चेष्टा को प्यार करता था परंतु उस में इतनी हिम्मत न थी कि वह अपने प्यार का इजहार कर सके.

चेष्टा मां से कुछ बताती इस के पहले ही योगिताजी को चेष्टा और चैतन्य के बीच प्यार होने का समाचार नमकमिर्च के साथ मिल गया. योगिताजी तिलमिला उठीं. अपनी बहू उत्तरा के कारण पहले ही उन की बहुत हेठी हो चुकी थी, अब बेटी भी एक छोटे दुकानदार के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही है. यह सुनते ही वे अपना आपा खो बैठीं और चेष्टा पर लातघूंसों की बौछार कर दी.

क्रोध से तड़प कर चेष्टा बोली, ‘‘आप कुछ भी करो, मैं तो चैतन्य से मिलूंगी और जो मेरा मन होगा वही करूंगी.’’

योगिताजी ने मामला बिगड़ता देख कूटनीति से काम लिया. वे बेटी से प्यार से बोलीं, ‘‘मैं तो तेरे लिए राजकुमार ढूंढ़ रही थी. ठीक है, तुझे वह पसंद है तो मैं उस से मिलूंगी.’’

चेष्टा मां के बदले रुख से पहले तो हैरान हुई फिर मन ही मन अपनी जीत पर खुश हो गई. चेष्टा योगिताजी के छल को नहीं समझ पाई.

अगले दिन योगिताजी चैतन्य के पास गईं और उस को धमकी दी, ‘‘यदि तुम ने मेरी बेटी चेष्टा की ओर दोबारा देखा तो तुम्हारी व तुम्हारे परिवार की जो दशा होगी, उस के बारे में तुम कभी सोच भी नहीं सकते.’’

इस धमकी से सीधासादा चैतन्य डर गया. वह चेष्टा से नजरें चुराने लगा. चेष्टा के बारबार पूछने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया बल्कि यह बोला कि तुम्हारी जैसी लड़कियों का क्या ठिकाना, आज मुझ में रुचि है कल किसी और में होगी.

चेष्टा समझ नहीं पाई कि आखिर चैतन्य को क्या हो गया. वह क्यों बदल गया है. चैतन्य ने तो सीधा उस के चरित्र पर ही लांछन लगाया है. वह टूट गई. घंटों रोती रही. अकेलेपन के कारण विक्षिप्त सी रहने लगी. इस मानसिक आघात से वह उबर नहीं पा रही थी. मन ही मन अकेले प्रलाप करती रहती थी. चैतन्य से सामना न हो, इस कारण स्कूल जाना भी बंद कर दिया.

योगिताजी बेटी की दशा देख कर चिंतित हुईं. उस को समझाती हुई बोलीं कि मैं अपनी बेटी के लिए राजकुमार लाऊंगी. फिर उसे डाक्टर के पास ले गईं. डाक्टर बोला, ‘‘आप की लड़की डिप्रेशन की मरीज है,’’ डाक्टर ने कुछ दवाएं दीं और कहा, ‘‘मैडमजी, इस का खास ध्यान रखें. अकेला न छोड़ें. हो सके तो विवाह कर दें.’’

थोड़े दिनों तक तो योगिताजी बेटी के खानेपीने का ध्यान रखती रहीं. चेष्टा जैसे ही थोड़ी ठीक हुई योगिताजी अपनी दुनिया में मस्त हो गईं. जीवन से निराश चेष्टा मन ही मन घुटती रही. एक दिन उस पर डिप्रेशन का दौरा पड़ा, उस ने अपने कमरे का सब सामान तोड़ डाला. योगिताजी ने कमरे की दशा देखी तो आव देखा न ताव, चेष्टा को पकड़ कर थप्पड़ जड़ती हुई बोलीं, ‘‘क्या हुआ…चैतन्य ने मना किया है तो क्या हुआ, मैं तुम्हारे लिए राजकुमार जैसा वर लाऊंगी.’’यह सुनते ही चेष्टा समझ गई कि यह सब इन्हीं का कियाधरा है. कुंठा, तनाव, क्रोध और प्रतिशोध में जलती हुई चेष्टा में जाने कहां की ताकत आ गई. योगिताजी को तो अनुमान ही न था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है. चेष्टा ने योगिताजी की गरदन पकड़ ली और उसे दबाती हुई बोली, ‘‘अच्छा…आप ने ही चैतन्य को भड़काया है…’’

उसे खुद नहीं पता था कि वह क्या कर रही है. उस के क्रोध ने अनहोनी कर दी. योगिताजी की आंखें आकाश में टंग गईं. चेष्टा विक्षिप्त हो कर चिल्लाती जा रही थी, ‘‘मेरे लिए राजकुमार लाओगी न…’’

Holi 2024: बीमा दावे का सनसनीखेज राज

‘‘सर, मेरे पति 11 लाख रुपए ले कर कार से संतनगर की ओर जा रहे थे. कोई बदमाश उन के पीछे लगा था. मेरे मोबाइल फोन पर उन्होंने मैसेज भेजा था,’’ सरला ने इंस्पैक्टर को अपने मोबाइल फोन पर आए मैसेज को दिखाया.

‘‘हां, मेरे पास भी उन्होंने फोन किया था. हमारे लोग उस लोकेशन की ओर गए हैं. आप घर जाइए. हम कोशिश करेंगे कि वे जल्द से जल्द महफूज घर पहुंच जाएं,’’ इंस्पैक्टर रवि ने जवाब दिया.

‘‘ठीक है,’’ सरला ने कहा और वापस चली गई.

इंस्पैक्टर रवि को सरला का बरताव कुछ अजीब सा लगा. वह कई सालों से पुलिस की नौकरी में है और अब तक उस ने जोकुछ भी देखा था, उस के मुताबिक सरला का बरताव अजीब लगा.

उधर थोड़ी देर बाद पता चला कि कैलाश को उस की कार समेत गुंडों ने जला दिया है और उस के रुपए छीन कर ले गए हैं. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से पता चला है कि कैलाश की मौत जलने और दम घुटने से हुई थी. उस की पत्नी सरला ने उस का दाह संस्कार कर दिया.

इस के बाद सरला का कई बार पुलिस स्टेशन में एफआईआर की कौपी लेने के लिए आना हुआ. इंस्पैक्टर रवि को न जाने क्यों उस की हरकतों से शक होता था.

पुलिस इंस्पैक्टर ने सरला के मोबाइल फोन से होने वाली काल डिटेल को देखा, तो पहले तो कुछ भी शक जैसा नहीं दिखा, पर एक हफ्ते के बाद कैलाश से उस की बात होने की तसदीक हुई. मतलब साफ था कि कैलाश मरा नहीं था. तो फिर कार में किस की लाश थी?

मोबाइल फोन की लोकेशन से पता चल गया कि कैलाश रायपुर में रह रहा था. तुरंत छत्तीसगढ़ पुलिस से बात की गई और कैलाश को धर दबोचा गया.

जब कैलाश से पूछताछ की गई, तो जो बात सामने आई, वह इस तरह थी :

कैलाश ने कार की डिक्की में रखा पैट्रोल का डब्बा निकाल कर डिक्की बंद की और कार पर पैट्रोल उड़ेल दिया, फिर माचिस से उस में आग लगा दी. थोड़ी देर तक वह देखता रहा कि कार ठीक से जल रही है या नहीं.

अंदर एक लाश भी पड़ी थी, जो उस ने एक अस्पताल के मुलाजिम से मिलीभगत कर खरीदी थी. जब उसे भरोसा हो गया कि कार ने ठीक से आग पकड़ ली है, तो वह वहां से धीरे से निकल गया.

इस के बाद कैलाश ने सब से पहले अपनी पत्नी सरला को फोन लगाया, ‘‘सब प्लान के मुताबिक हो गया है. तुम लाश की शिनाख्त कर लेना. कुछ दिनों तक सभी फोन स्विच औफ रखूंगा.’’

‘ठीक है, अब ज्यादा बातें मत करो. पुलिस काल डिटेल्स निकालेगी, तो फंस जाएंगे हम.’

‘‘नहीं फंसेंगे. हम जिन नंबरों से बातें कर रहे हैं, वे जाली पहचान और फोटो से लिए गए सिमकार्ड हैं. मैं भी इस सिमकार्ड को नष्ट कर दूंगा और तुम भी नष्ट कर देना.’’

कैलाश ने मोबाइल से सिमकार्ड निकाल कर उसे तोड़ डाला और वहीं फेंक दिया. फिर अपने मोबाइल फोन से उस ने पुलिस को फोन लगाया, ‘‘हैलो, मैं कैलाश बोल रहा हूं. मेरे पीछे कुछ गुंडे लगे हैं. वे मेरे 11 लाख रुपए छीनने के चक्कर में हैं.

‘‘प्लीज, मुझे बचा लीजिए. अभी मैं अक्षरधाम मंदिर से संतनगर की ओर जा रहा हूं…’’ इस से पहले कि पुलिस कुछ और पूछती, उस ने मोबाइल फोन कट कर दिया.

कैलाश हिसार में एक फैक्टरी का मालिक था और इधर कुछ दिनों से कारोबार ठीक नहीं चल रहा था. कुछ कर्ज भी उस के ऊपर हो गया था.  कोविड-19 के चलते उस की माली हालत और भी खराब हो गई थी. लेनदार अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, पर वह कर्ज चुका पाने की हालत में नहीं था.

जब कारोबार अच्छा चल रहा था, तब कैलाश ने 2 करोड़ रुपए का बीमा लिया था. वह चाहता था कि आगे चल कर किसी वजह से उस की मौत हो जाती है, तो उस के परिवार को कम से कम पैसे की तंगी न हो.

जब कारोबार में नुकसान होने लगा, तो कैलाश को बीमा का प्रीमियम जमा करना भी मुश्किल होने लगा, क्योंकि 2 करोड़ रुपए का प्रीमियम काफी ज्यादा था.

कैलाश दिनरात यही सोचता कि क्या उपाय करे, जिस से वह अपने कारोबार को संभाल सके, पर मानो वह दलदल में फंस गया था. जब कारोबार संभलने का कोई आसार नहीं बचा, तो उस के मन में किसी भी तरह बीमा की रकम पाने की लालसा जगी.

कैलाश हमेशा यही सोचता कि किस तरह बीमा की रकम पाई जा सकती है. उस के मन में यह विचार भी आता कि वह खुदकुशी कर ले, ताकि कम से कम परिवार वालों की माली हालत ठीक हो जाए.

पर उसे शक था कि खुदकुशी के मामले में परिवार वालों को बीमा की रकम मिलेगी या नहीं. यह बात वह किसी से पूछ भी सकता था, पर इस से उस की नीयत पर शक होने का डर था. फिर जिंदगी का मोह भी वह छोड़ नहीं पा रहा था.

आखिरकार कैलाश ने एक योजना तैयार की. उस योजना के मुताबिक उस के बदले कोई और मरेगा और घर वालों को बीमा की रकम मिल जाएगी. वह चुपके से कहीं दूर निकल जाएगा और जब मामला शांत हो जाएगा, तो वह अपने परिवार वालों को भी अपने साथ ले जाएगा.

इस योजना के मुताबिक उस ने एक अस्पताल मुलाजिम से मिल कर कोरोना वायरस के संक्रमण से मरे एक आदमी की लाश ले ली थी. कैलाश ने उस लाश को अपनी कार में रख लिया और शहर से दूर एक बस्ती में कार खड़ी कर दी. फिर उस ने अपने परिवार वालों और पुलिस को फोन कर के बताया कि वह 11 लाख रुपए ले कर कार से कहीं जा रहा है और बदमाश उस का पीछा कर रहे हैं.

पुलिस कैलाश की बताई जगह पर जब तक पहुंची, तब तक कार पूरी तरह जल चुकी थी. कार में एक लाश भी थी, जिसे परिवार वालों ने कैलाश होने की पुष्टि की.

दरअसल, कैलाश ने यह योजना बहुत सोचसमझ कर बनाई थी और परिवार वालों को वह पूरी योजना पहले ही समझा चुका था. पहचान के लिए उस ने अपने हाथ में पहने कड़े को लाश के हाथ में पहना दिया था.

इस के बाद कैलाश रेलवे स्टेशन पहुंचा और रायपुर जाने वाली ट्रेन में सवार हो गया. उस के पास 3 मोबाइल फोन थे और उस ने तीनों को स्विच औफ कर रखा था.

रायपुर पहुंच कर वह एक किराए के कमरे में रहने लगा. उधर उस की पत्नी सरला ने उस का दाह संस्कार करवा दिया, ताकि किसी को कोई शक न हो.

पर जांच करने वाले पुलिस इंस्पैक्टर रवि को उस की हरकतों से शक हो गया था. पति की मौत के बाद पत्नी की जो मानसिक हालत होनी चाहिए, वह उस के बरताव से नहीं दिख रही थी. वह दुखी होने का नाटक तो कर रही थी, पर वह अच्छी कलाकार साबित नहीं हो सकी. साथ ही, वह बीमा की रकम पाने के लिए काफी उतावली भी दिख रही थी. इस तरह कैलाश की योजना नाकाम हो गई.

Holi 2024: प्यार तूने क्या किया

अनिरुद्ध आज फिर से दफ्तर 25 मिनट पहले पहुंच गया था. जब से उस के दफ्तर में नेहल आई है, उसे ऐसा लगता है कि सबकुछ रूमानी हो गया है. नेहल की झील सी आंखें, प्यारभरी मुसकान उसे सबकुछ बेहद पसंद था.

आज नेहल हरे कुरते के साथ पीला दुपट्टा पहन कर आई थी और साथ में था लाल रंग का प्लाजो… जैसे औफिस का माहौल सुरमई हो गया हो. अनिरुद्ध बहुत दिनों से नेहल के करीब जाने की कोशिश कर रहा था, पर उस की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.

नेहल का बेबाक अंदाज अनिरुद्ध को उस के करीब जाने से रोकता था, पर आज वह खुद को रोक नहीं पाया और उस ने नेहल को बोल ही दिया, ‘‘नेहल, आप आज एकदम सुरमई शाम के जैसी लग रही हो…’’

नेहल खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘थैंक यू.’’

धीरेधीरे नेहल के ग्रुप में अनिरुद्ध भी शामिल हो गया था. अनिरुद्ध की आंखों की भाषा नेहल खूब समझती थी, पर अनिरुद्ध का जरूरत से ज्यादा पतला होना नेहल को खलता था.

अनिरुद्ध ने एक दिन बातों ही बातों में नेहल से पूछ लिया, ‘‘नेहल, तुम्हारा कोई बौयफ्रैंड है क्या?’’

नेहल ने कहा, ‘‘नहीं, फिलहाल तो नहीं है, क्योंकि मेरा बौयफ्रैंड माचोमैन होना चाहिए, सिक्स पैक एब्स के साथ… अगर कोई लड़का मुझे देखने की भी जुर्रत करे, तो वह उस की हड्डीपसली एक कर दे…’’

नेहल की बात सुन कर अनिरुद्ध का चेहरा उतर गया था. घर आ कर भी उस के दिमाग में नेहल की बात घूमती रही थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे नेहल के काबिल बने.

तभी अनिरुद्ध को अपने एक करीबी दोस्त मोंटी की याद आई. वह जिम जाने का शौकीन था.

अनिरुद्ध ने मोंटी को फोन कर के अपनी समस्या बताई, तो मोंटी बोला, ‘अरे भाई, तू मेरे पास आ जा. 2 महीने में ही नेहल तेरी बांहों में होगी.’

अनिरुद्ध फोन रखते ही मोंटी के पास पहुंच गया. वह जल्द से जल्द बौडी बनाना चाहता था.

अब अनिरुद्ध सीधे दफ्तर से जिम ही जाता था. वहां पर मोंटी के कहने पर उस ने अपना खुद का पर्सनल ट्रेनर भी रख लिया था. पर्सनल ट्रेनर ने अनिरुद्ध का एक पूरा डाइट प्लान बना कर दिया था. डाइट प्लान में शामिल खाना अनिरुद्ध की जेब पर काफी महंगा पड़ रहा था, पर वह अपने दिल के हाथों मजबूर था.

एक महीना होने को आया था, पर अनिरुद्ध को अपनी बौडी में कोई खास बदलाव नजर नहीं आ रहा था. जब भी वह अपने पर्सनल ट्रेनर से यह बात कहता, तो उस का यही जवाब होता था, ‘‘अरे सर, थोड़ा समय लगता है बौडी बनाने में, लेकिन देख लेना सर, आप को कुछ ही महीनों में बदलाव नजर आने लगेगा.’’

अनिरुद्ध रातदिन बौडी बनाने के बारे में ही बात करता था. नेहल अनिरुद्ध की बात सुन कर मुसकरा देती और बोलती, ‘‘चलो देखते हैं अनिरुद्ध, तुम्हारी बौडी बन पाती है या नहीं?’’

अभी अनिरुद्ध यह सब कर ही रहा था कि उस की जिंदगी में सक्षम नाम का तूफान आ गया था. सक्षम उन की कंपनी में एकाउंट्स डिपार्टमैंट में नयानया आया था. उस का 6 फुट का कद और गठीला बदन हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था.

नेहल एक दिन अपनी सैलरी के किसी इशू को ले कर एकाउंट्स डिपार्टमैंट में गई थी और सक्षम का नंबर ले कर लौटी थी. अब सक्षम भी नेहल के ग्रुप का हिस्सा था. अनिरुद्ध को सक्षम का ग्रुप में शामिल होना नागवार लगता था, पर वह कुछ बोल नहीं पाता था.

अब अनिरुद्ध के सिर पर बौडी बनाने का जुनून सवार हो गया था. एक दिन अनिरुद्ध के पापा ने उसे समझाना भी चाहा था, ‘‘बेटा, अपनी सेहत का ध्यान रखना बहुत अच्छी बात है, पर यह पागलपन ठीक नहीं है.’’

अनिरुद्ध बोला, ‘‘पापा, मुझे इस पतलेपन से छुटकारा चाहिए. मैं नेहल के काबिल बनना चाहता हूं.’’

पापा थोड़ा सोचते हुए बोले, ‘‘बेटा, जिस रिश्ते की बुनियाद ऐसी खोखली  बातों पर टिकी हो, वैसा रिश्ता न ही बने तो अच्छा है.’’

अनिरुद्ध गुस्से में बोला, ‘‘आप नहीं समझोगे पापा. आप को तो खुश होना चाहिए कि आप का बेटा अपनी सेहत के प्रति जागरूक है.’’

पापा बोले, ‘‘हां, पर अगर इस से मन का चैन छिनता है, तो यह घाटे का सौदा है.’’

अनिरुद्ध बिना कुछ जवाब दिए तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गया.

अनिरुद्ध के जुनून को देखते हुए उस के पर्सनल ट्रेनर ने अनिरुद्ध के डाइट प्लान में कुछ अलग तरह की खाने की चीजें शामिल कर दी थीं. कोई पाउडर भी था. पर अब अनिरुद्ध की बौडी में बदलाव आना शुरू हो गया था.

न जाने उस पाउडर में क्या था कि अनिरुद्ध को मनचाहा नतीजा मिल रहा था. आजकल वह बेहद खुश रहता था. पर बौडी बनाने और नेहल के चक्कर में बिना अपने ट्रेनर की सलाह लिए अनिरुद्ध ने उस पाउडर की खुराक दोगुनी कर दी थी. अब नेहल ही नहीं दफ्तर की हर लड़की का हीरो था अनिरुद्ध.

अनिरुद्ध ने नेहल से डेट के लिए पूछा और नेहल ने फौरन हां कर दी थी. अनिरुद्ध बेहद खुश था, क्योंकि आखिर उस की मेहनत रंग लाई और उस के प्यार की जीत हुई थी. अब अनिरुद्ध के दिन सोना और रात चांदी हो गई थी.

14 फरवरी हर प्रेमी जोड़े के लिए खास दिन होता है. अनिरुद्ध ने नेहल से पूछा, ‘‘नेहल, कल क्या मेरे साथ बाहर चलोगी?’’

नेहल ने हंसते हुए कहा, ‘‘अरे, इतना शरमा क्यों रहे हो, जरूर चलेंगे और यह तो वैसे भी हमारा पहला वैलेंटाइन डे है.’’

अनिरुद्ध ने शहर के बाहर एक रिसोर्ट में बुकिंग करा ली थी. वह नेहल को जी भर कर प्यार करना चाहता था.

नेहल और अनिरुद्ध ने पहले लंच किया और फिर दोनों रूम में चले गए. अनिरुद्ध नेहल के करीब आ कर उसे चूमने लगा और नेहल भी बिना किसी विरोध के समर्पण कर रही थी.

15 मिनट बीत गए थे, पर अनिरुद्ध उस से आगे बढ़ ही नहीं पा रहा था. नेहल कुछ देर तक तो कोशिश करती रही और फिर चिढ़ते हुए बोली, ‘‘यार, जब कुछ कर ही नहीं सकते हो, तो फिर इतना टाइम क्यों खराब किया?’’

फिर नेहल मुसकराते हुए बोली, ‘‘जिम में बौडी बन सकती है, पर वह नहीं.’’

अनिरुद्ध शर्म से पानीपानी हो रहा था. उसे तो ऐसी समस्या नहीं थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह क्यों उस के साथ हो रहा था. क्या उस के अंदर कोई कमी आ गई है?

अनिरुद्ध को लग रहा था कि बौडी बनाने में उस ने जो पाउडर की दोगुनी खुराक कर ली थी, क्या यह उसी का नतीजा है?

अनिरुद्ध नेहल को सब बताना चाहता था, पर जिस प्यार के लिए अनिरुद्ध ने इतना कुछ किया, वही प्यार बिना एक पल रुके पतली गली से निकल गया.

अनिरुद्ध सिर पकड़ कर बैठ गया था. बाहर रिसोर्ट में गाना चल रहा था, ‘प्यार तू ने क्या किया…’

गलतफहमी : जिंदगी दो और दो का जोड़ नहीं

हर आदमी के सपने में एक लड़की होती है. कमोबेश खूबसूरत लड़की. वह उस की कल्पना के बीच हमेशा चलतीफिरती है, हंसतीबोलती है. इसी तरह नीना के प्रति सुजीत का लगाव उसे चुंबक की तरह खींच रहा था.

एक दिन सुजीत ने हंस कर सीधेसीधे नीना से कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं.’’

नीना ठहाका मार कर हंसी और बोली, ‘‘तुम बड़े भोले हो. बड़े शहर में प्यार मत करो, लुट जाओेगे. यहां दिल से कोई रिश्ता नहीं चलता, सब पैसे का तमाशा है.’’

‘‘मतलब…?’’ सुजीत चौंका.

‘‘अरे, मिलोजुलो, दोस्ती रखो… हो गया बस,’’ नीना ने दिल के अंदर की पछाड़ खाती लहरों को भुला कर कहा, ‘‘प्यार और शादी के पचड़े के बारे में सोचो भी नहीं.’’

इस तरह एक झटके में नीना ने सुजीत की भावनाओं के खूबसूरत गुलाब की पंखुडि़यों को नोंच कर फुटपाथ पर फेंक दिया था.

नीना इतना संगदिल हो सकती है, इस की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. सुजीत हैरत से उसे कुछ पलों तक ताकता रह गया. लग रहा था कि वह कोई नादान बच्चा है, जिसे वह सीख दे रही हो.

नीना ने फिर कहीं दूर भटकते हुए कहा, ‘‘इस शहर में रहो, पर सपने मत देखो. छोटे लोगों के सपने यों ही जल जाते हैं. जिंदगी में सिर्फ राख और धुआं बचते हैं. प्यार यहां हाशिए पर चला जाता है. वैसे भी ये सब अमीरों के चोंचले हैं…’’

‘‘कितना अजीब सा खयाल है तुम्हारा नीना…’’ सुजीत ने हिम्मत जुटा कर कहा.

‘‘किस का…?’’ नीना चौंकी.

‘‘तुम्हारा और किस का…’’

‘‘यह मेरा खयाल है?’’ नीना थोड़ा बेचैन हुई, ‘‘तुम यही समझे?’’

‘‘तो क्या मेरा है?’’ सुजीत ने सवाल किया.

‘‘ओह,’’ नीना ने दुखी हो कर कहा, ‘‘फिर भी मैं कह सकती हूं कि तुम कितने अच्छे हो… काश, मैं तुम्हें ठीक से समझ पाती.’’

‘‘न ही समझ तो अच्छा,’’ सुजीत ने उस से विदा लेते हुए कहा, ‘‘पर, मैं समझ गया…’’

सुजीत को रास्तेभर तरहतरह के खयाल आते रहे. आखिर में उस ने तय किया कि सपने कितने भी हसीन हों, अगर आप बेदखल हो गए हों, तो उन हसरतों के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए.

सुजीत नीना से कट गया और कटता ही चला गया.

बचपन में सुजीत गांव की एक लड़की से प्यार करता था. वह लड़की भी उसे चाहती थी, पर ऊंची जाति की थी, इसलिए बाद में वह इनकार कर गई, पर उस दिन वह बहुत रोई थी.

लेकिन नीना तो हंस रही थी सुजीत के प्रस्ताव पर, जैसे किसी बच्चे ने किसी औरत का वर्जित प्रदेश छू दिया हो, बेजा सवाल कर दिया हो… सुजीत का मन कसैला हो गया.

उस दिन सुजीत फैक्टरी से देर से निकला, तो जैक्सन रोड की तरफ चला गया. दिल यों भी दुखी था. फैक्टरी में एक हादसा हो गया था. बारबार दिमाग में उस लड़के का घायल चेहरा आ रहा था.

सुजीत एक बार के पास रुक गया. यह पुराना शहर था अपनी यादों में इतिहास को समेटे हुए. यहां लाखों सुजीत जैसे लोग अपनी रोजीरोटी की तलाश में वजूद घिस रहे थे.

सुजीत ने घड़ी देखी. रात के 9 बज रहे थे. अभी वह शराब पीने की जगह खोज ही रहा था कि उस की नजर नीना पर पड़ी, ‘‘तुम यहां…?’’

‘‘मैं इसी बार में काम करती हूं,’’ नीना ने झोंप कर कहा.

‘‘पर, तुम ने तो बताया था…’’ सुजीत ने हैरानी से भर कर कहा, ‘‘तुम किसी औफिस में काम करती हो…’’

‘‘हां, करती थी.’’

‘‘फिर यहां कैसे?’’ सुजीत थोड़ा हैरान हो गया था.

‘‘सब यहीं पूछ लोगे?’’ कह कर नीना दूसरे ग्राहकों की ओर बढ़ गई. नशे से लुढ़कते लोगों के बीच से वह खाली बोतलों और गिलासों को उठा रही थी. सुजीत को यह सब देख कर गहरा अफसोस हुआ.

सुजीत बोतल ले कर वापस आ गया. रास्ते में उस ने फ्राइड चिकन और रोटियां ले ली थीं. कमरे में पहुंच कर वह बेहिसाब पीना चाह रहा था, ताकि सीने पर रखा बोझ हलका हो जाए. पता नहीं वह किस से नाराज हो रहा था, शायद इस रात से.

अभी सुजीत ने बोतल खोली ही थी कि वर्मा आ गया.

‘‘आओ वर्मा यार…’’ सुजीत ने कहा, ‘‘बड़े मौके से आए.’’

‘‘क्या है?’’ वर्मा ने मुसकराते हुए पूछा. वह एक दवा दुकान पर सेल्समैन था. पूरा कंजूस और मजबूर आदमी. अकसर उसे घर से फोन आता था, जिस में पैसे की मांग होती थी.

इस कबूतरखाने में इसी तरह के लोग किराएदार थे, जो दूर कहीं गांवकसबे में अपने परिवार को छोड़ कर अपना सामान उठाए चले आए थे. अलबत्ता, नीचे वाले कमरे में कुछ परिवार वाले लोग भी थे, लेकिन वे भी अच्छी आमदनी वाले नहीं थे, अपनी रीनानीना के साथ किसी तरह रह रहे थे… सस्ती साड़ियों, सूट और परफ्यूम के साथ सैकंडहैंड चीजों के साथ जीने वाले.

‘‘चीयर्स,’’ गिलास टकरा कर सुजीत ने कहा, ‘‘उठाओ यार…’’

वर्मा 2-3 पैग लेने के बाद खुल गया, ‘‘यार, सुजीत तुम्हीं ठीक हो. तुम्हारे घर वाले तुम्हें नोंचते नहीं. मैं तो सोचता हूं कि मेरी जिंदगी इसी तरह घिसटती हुई खत्म हो जाएगी… कि मैं वापस भी नहीं जा सकूंगा गांव… पहले यह सोच कर आया था कि 2-4 साल कमा कर लौट जाऊंगा… मगर, 10 साल होने को हैं, मैं यहीं हूं…’’

‘‘इमोशनल नहीं होने का यार.’’

‘‘नहीं, मैं तो इस बड़े शहर में एक भुनगा हूं.’’

‘‘सुनो यार, मुझे फोन इसलिए नहीं आते हैं कि मेरे घर में लोग नहीं हैं… बल्कि उन्हें पता ही नहीं है कि मैं कहां हूं… इस दुनिया में हूं भी कि नहीं… यह अच्छा है… आज जिस लड़के का एक्सीडैंट हुआ, अगर मेरी तरह होता तो किस्सा खत्म था, पर अब जाने क्या गुजर रही होगी उस के घर वालों पर…’’

‘‘किस लड़के की बात कर रहे हो?’’ वर्मा ने पूछा.

‘‘छोड़ो भी उस बदनसीब को,’’ सुजीत ने अफसोस के साथ कहा, ‘‘तुम्हें दुख होगा. हम लोगों की यहां क्या पहचान है? हम कीटपतंगे हैं, किसी भी वक्त की आग से जल जाएंगे इसी तरह…’’

‘‘अब मैं ने दुख के बारे में सोचना छोड़ दिया, वह तो…’’ वह अपनी बात से पलटा, ‘‘पर, एक बात तुम से बोलूं?’’

‘‘बोलो…’’ सुजीत बोला.

‘‘तुम शादी कर लो.’’

‘‘किस से?’’ सुजीत चौंका.

‘‘अरे, मिल जाएगी…’’ वर्मा ने गिलास उठाते हुए कहा.

‘‘मिली थी…’’ सुजीत ने शराब के सुरूर में कहा.

‘‘फिर क्या हुआ?’’

‘‘खत्म हो गया सब.’’

रात काफी हो गई थी. वर्मा उठ गया. सुजीत ने आखिरी पैग उस के नाम पीया और कहा, ‘‘गुड नाइट.’’

सवेरे सुजीत की नींद देर से खुली, मगर फैक्टरी में समय से पहुंच गया. उसे वहीं पता चला कि रात उस लड़के ने अस्पताल में तकरीबन 3 बजे दम तोड़ दिया. मैनेजर ने एक मुआवजे का चैक दिखा कर हमदर्दी बटोरने के बाद फैक्टरी में चालाकी से छुट्टी कर दी.

सुजीत वापस लौटने ही वाला था कि नीना का फोन आया. चौरंगी बाजार में एक जगह वह इंतजार कर रही थी. सुजीत उदास था, पर चल पड़ा.

‘‘क्या बात है?’’ सुजीत ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ कह कर नीना हंसी.

‘‘बुलाया क्यों?’’

‘‘गुस्से में हो?’’

‘‘किस बात के लिए?’’

‘‘अरे, बोलो भी.’’

‘‘बोलूं?’’

‘‘हां.’’

‘‘झूठ क्यों बोली?’’

‘‘क्या झूठ?’’

‘‘कि औफिस में काम करती हो…’’

‘‘नहीं, सच कहा था कि करती थी.’’

‘‘तो वहीं रहती.’’

‘‘मालिक देह मांग रहा था,’’ नीना ने साफसाफ कहा.

‘‘क्या?’’ सुजीत हैरान रह गया, ‘‘क्या कह रही हो?’’

‘‘सच को झूठ समझ रहे हो?’’

सुजीत ने कहा, ‘‘चलो, मुझे ही गलतफहमी हुई थी. माफ करो.’’

‘‘गलतफहमी में तो तुम अभी भी हो…’’ नीना ने कहा.

‘‘मतलब…?’’ सुजीत इस बार एकदम अकबका गया, ‘‘कैसे?’’

‘‘फिर कभी,’’ नीना ने हंस कर कहा, ‘‘जो दिखता है, वह सच नहीं है यहां… और जो नहीं दिखता है, उसे देखना भी कैसे मुमकिन हो सकता है, वहां क्या कम मुश्किलें हैं…’’

उस दिन नीना के प्रति यह गलतफहमी रह जाती, अगर सुजीत उस के साथ घर नहीं गया होता. सचमुच कभीकभी जिंदगी भी क्या खूब मजाक करती है. नीना 2 बूढ़ों को पालते हुए खुद बूढ़ी हो रही थी.

उस दिन नीना का हाथ अपने हाथ में ले कर सुजीत ने कहा, ‘‘मुझे अब नहीं है, तुम्हें कोई गलतफहमी हो, तो कहो.’’

‘‘मुझे है,’’ नीना बोली.

‘‘तो कहो.’’

नीना ने हंस कर कहा, ‘‘पर, अभी नहीं कहूंगी.’’

उस दिन सुजीत को समझे आया कि जिंदगी दो और दो का जोड़ नहीं, एक मुश्किल सवाल है, जिस का फिलहाल कोई हल उसे नहीं सूझ रहा था.

Holi 2024-बुलडोजर : कैसे पूरे हुए मनोहर के सपने

मनोहर की आंखों में बड़ेबड़े सपने थे, मगर उस की पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी. आटोमोबाइल में आईटीआई पास करने के बाद वह जेसीबी मशीन औपरेटर बन गया था.  दरअसल, मनोहर ने अपने टीचर के एक भाई राम सिंह से जेसीबी मशीन चलाना सीखा था.

वक्त का मारा मनोहर अपने 3 छोटे भाईबहनों और मां की परवरिश की खातिर राम सिंह का सहायक लग गया था. आईटीआई का प्रमाणपत्र उस के पास था. मगर नौकरी कब मिलती, पता नहीं. उन के ठेकेदार ने उस की अच्छी कदकाठी देखी, जेसीबी मशीन चलानेसमझने का हुनर देखा और उसे काम मिलने लगा, जिस से उस के घर की माली हालत सुधरने लगी थी.

भाईबहनों की परवरिश और पढ़ाई से अब मनोहर निश्चिंत था. मां का पार्टटाइम काम छुड़ा कर उस ने चैन की सांस ली थी.

एक दिन अचानक मनोहर को एक दूरदराज के गांव में जाने का मौका मिला. ठेकेदार का आदमी उसे गाड़ी में बिठा कर पहले ही साइट दिखा गया था. सो वह निश्चिंत था. अपनी धीमी मगर मस्त चाल से चलते जेसीबी मशीन को वहां पहुंचतेपहुंचते शाम हो गई.

खेतों के बीच एक जगह पर ईंट का भट्ठा बनाने की तैयारी चल रही थी. मनोहर को वहां मिट्टी की खुदाई करनी थी. उस के पीछे ही एक इंजीनियर के साथ ठेकेदार आया और उसे गड्ढे का नापजोख समझाने लगा.

मनोहर भी खेत में उतर कर कहे मुताबिक मिट्टी काटने लगा. थोड़ी देर बाद ही वे सब वापस चले गए. अब वहां कोई नहीं था. उस ने सोचा कि क्यों न एकाध घंटे काम और कर लिया जाए, सो वह मिट्टी काटने में रम गया.

अचानक मनोहर का ध्यान उस जगह की तरफ गया, जहां की मिट्टी थोड़ी भुरभुरी थी. थोड़ा और खोदने पर उसे एक बोरा दिखाई दिया. उस बोरे में कुछ चीजें थीं. वह मशीन से उतरा और मिट्टी के ढेर से बोरा बाहर निकाला.

उस बोरे में एक साड़ी, चादर और कुछ जेवरात भी थे, जिन की चमक से उस की आंखें चुंधियां गईं. पुराने डिजाइन की एक भारीभरकम सोने की चेन, सोने की ही 4 चूडि़यां और कान के बुंदे थे. साड़ी में लहू के छींटे लगे थे, जो अब कत्थई हो चुके थे.

मनोहर को कुछ समझ नहीं आया कि इस बोरे से मिली चीजों का क्या करे. फिर भी उस ने उन्हें वहीं वापस गाड़ दिया कि ऐसे खतरे की चीजें अपने पास रखने पर वह भी फंस सकता है.

ठेकेदार ने वहीं एक झोंपड़ी बना कर मनोहर के रहने का इंतजाम किया था, सो उसे कहीं जाना तो था नहीं.

अब मनोहर क्या करे? यह एक बड़ा सवाल था. यहां से शहर और पुलिस चौकी भी काफी दूर थे.

अचानक मनोहर ने देखा कि एक लड़की अकेले जा रही थी. मनोहर ने उस लड़की से बात की, ताकि नजदीक के गांव के बारे में कुछ जान सके.

बातोंबातों में उसे पता चला कि वह बीए की छात्रा थी. हाल ही में उस के इम्तिहान खत्म हुए थे. अभी वह किसी काम से शहर से गांव लौट रही थी.

बहुत कुरदने पर उस लड़की ने बताया कि वह पुलिस स्टेशन गई थी, क्योंकि उस की विधवा मां एक हफ्ते से लापता थी. वह निकट के गांव में उस के साथ अकेली रहती थी.

रिश्तेदारों के साथ उन लोगों का जमीन का कुछ झगड़ा था. पहले तो उन लोगों ने गांव में उन की जमीन दबा कर अपना मकान बढ़ा लिया था और अब वे उन के खेत हथियाना चाहते थे.

उस लड़की को पूरा शक था कि उन लोगों ने ही उस की मां को गायब कर दिया है. पुलिस भी उन से मिली हो सकती है, ऐसा भी शक था.

उस लड़की का नाम सीमा था. अपनी पढ़ाई पूरी कर के वह गांव के ही एक स्कूल में टीचर की नौकरी करने लगी थी.

सीमा की डबडबाई आंखें उस की मजबूरी बयान कर रही थीं. मनोहर को बड़ा गुस्सा आया कि कैसेकैसे लोग हैं यहां, जो अपनों का ही शोषण करते हैं.

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं पहले तुम्हें तुम्हारी मां को ढूंढ़ने में मदद करूंगा…’’ मनोहर बोला, ‘‘मुझे कुछ चीजें मिली हैं. क्या तुम उन्हें पहचान सकती हो?’’

मनोहर उस जगह पर गया और बोरे से सावधानी से उन जेवरात समेत कपड़ों को बाहर निकाल लाया.

उन्हें देखते ही सीमा सुबकने लगी, ‘‘अरे, ये तो मेरी मां के कपड़े हैं. और ये जेवरात तो वे हमेशा पहने रहती थीं. पता नहीं, बदमाशों ने उन के साथ क्या सुलूक किया होगा.’’

‘‘अब जो हुआ सो हुआ. अपने मन को कड़ा करो और आगे की सोचो.’’

‘‘आगे का क्या सोचना है. मैं अकेली क्या कर सकती हूं. सारा गांव उन से डरता है, फिर पुलिस भी उन्हीं के साथ है…’’ सीमा बोली, ‘‘मगर, पहले मां का कुछ पता तो चले.’’

‘‘अब पता क्या करना है..’’ मनोहर गुस्से से बोला, ‘‘जरूर उन लोगों ने उन्हें मार दिया होगा. मन करता है कि अभी जा कर उन लोगों के घर पर बुलडोजर चला दूं.’’

‘‘आप यहां के लिए अजनबी हैं. आप को उन के पैसे और पहुंच का अंदाजा नहीं है. वे बड़े खतरनाक लोग हैं,’’ सीमा ने बताया.

‘‘कितने भी खतरनाक हों, मैं उन्हें देख लूंगा,’’ मनोहर गुस्से में भर कर बोला, ‘‘तुम मेरा मोबाइल नंबर लिख लो.’’

सीमा ने मनोहर का मोबाइल नंबर लिखा और फिर उसे अपना नंबर भी दे दिया. इस के बाद सीमा अपने रास्ते चली गई.

अब मनोहर दोपहर खेत में जेसीबी मशीन से मिट्टी काटने में लगा था. मगर इस बार मिट्टी काटने में वह काफी सावधानी बरत रहा था. उसे शक के हिसाब से एक जगह की भुरभुरी मिट्टी के बीच एक बड़ी गठरी दिखी.

एक काले कंबल में एक औरत की लाश लपेट कर वहां गाड़ दी गई थी. बड़ी सावधानी के साथ उस ने वह गठरी निकाली. फिर तुरंत सीमा को फोन किया. वह भागती हुई आई और अपनी मां की लाश को देख कर रो पड़ी.

खेत के किनारे पूरा गांव उमड़ पड़ा था. ऐसे समय में जाहिर है कि लोग तरहतरह की बातें बनाते थे, लेकिन सीमा एकदम शांत थी.

‘‘जाने दो बेटी…’’ सीमा का एक बुजुर्ग पड़ोसी उस से कह रहा था, ‘‘अब जाने वाले को कौन रोकता है. हम तुम्हारी पूरी मदद करेंगे.’’

‘‘यही तो मदद की है आप ने कि मेरी मां को मार डाला…’’ वह उन के मुंह पर थूकते हुए चिल्लाई, ‘‘पहले घर छीना और अब हमारी जमीन छीनना चाहते हैं. आप इनसान नहीं हैवान हैं.’’

‘‘हां, हम हैवान हैं और तू इस गांव के सब से रसूखदार आदमी राम प्रसाद पर थूकती है,’’ वह बुजुर्ग गुस्से में उस की चोटी पकड़ कर चिल्लाया, ‘‘तेरी यह हिम्मत कि तू मुझ पर थूके.’’

वह बुजुर्ग उसे बेतहाशा मार रहा था और चिल्ला रहा था, ‘‘गांव में है किसी की हिम्मत, जो मुझे रोक सके. हां, मैं ने तेरा घर उजाड़ा है और अब तेरी सारी जमीन छीन कर तुझे सड़क की भिखारिन बना दूंगा.’’

सारा गांव तमाशा देख रहा था. अचानक मनोहर को तैश आया और उस ने लपक कर बुजुर्ग को पीछे से दबोचते हुए कहा, ‘‘एक तो दिनदहाड़े गलत काम किया, गरीब बेसहारा को लूटा और उस की हत्या कर दी और अब एक लड़की पर हाथ उठाते हुए शर्म नहीं आती.’’

मनोहर उसे मारते हुए बोला, ‘‘इस गांव में जैसे सभी नामर्द हैं तो क्या हुआ, मैं तेरी सारी हेकड़ी हवा कर दूंगा.’’

अब देखादेखी गांव की भीड़ भी जैसे मनोहर के साथ हो गई.

‘‘अब देखते क्या हो..’’ भीड़ में से एक आवाज आई, ‘‘पुलिस तो आने से रही और हम भी इस के खिलाफ गवाही देंगे कि यह कितना दुष्ट है. मगर, इस ने जो किया है, उस की सजा इसे जरूर मिलनी चाहिए.’’

‘‘मन करता है कि इस के घर पर बुलडोजर चला दूं,’’ वह दांत पीस कर बोला, ‘‘तभी यह सबक सीखेगा.’’

‘‘तो चला दो न. मना कौन करता है?’’ भीड़ में से किसी ने कहा. और देखते ही देखते उस की जेसीबी मशीन राम प्रसाद के घर को मटियामेट कर गई.

समय बीतने के साथ उन दोनों की दोस्ती गाढ़ी हो चुकी थी. सीमा ने उस का घरपरिवार, रहनसहन वगैरह सबकुछ देखसमझ लिया था.

मनोहर को झिझक थी कि एक पढ़ीलिखी लड़की से उस का शादी होना क्या ठीक रहेगा. क्या कहीं यह शादी बेमेल तो नहीं होगी? लोग क्या कहेंगे कि एक कम पढ़ेलिखे लड़के ने एक पढ़ीलिखी लड़की को फंसा लिया?

फिर भी सीमा से मनोहर का मिलनाजुलना चलता रहा. इस बीच एक रुकावट आ गई. सीमा के एक रिश्तेदार शंभु प्रसाद, जो उस के रिश्ते में मामा लगते थे, एक किसान थे और अब उसी के साथ उसी के घर में रहने लगे थे. भले ही उन की माली हालत गिर चुकी थी, मगर पुराने जमींदारों वाली ठसक उन में अभी बाकी थी. उन्हें मनोहर फूटी आंख नहीं सुहाता था.

‘‘यह किस आदमी को चुना है शादी के लिए तुम ने…’’ वे दहाड़े, ‘‘न शक्लसूरत, न ढंग का कामधाम, दिनभर टूटीफूटी सड़कों की मरम्मत करता फिरता है या खंडहरों को गिराता चलता है.’’

‘‘मैं शादी करूंगी तो उसी से,’’ सीमा चीख कर बोली थी, ‘‘जब मेरी मां की हत्या हुई और मेरा घर हथिया लिया गया था, तब आप कहां थे.’’

‘‘आग लगे ऐसी जवानी में,’’ शंभु प्रसाद की पत्नी यानी सीमा की मामी चिल्लाई थीं, ‘‘कोई ढंग का रूपरंग भी तो हो. बेडौल ढोल जैसा बदन है उस का. उस की टेढ़ी नाक देखी है तुम ने. यह लड़की तो मेरी नाक कटाने पर ही तुली है.’’

मनोहर को भी घबराहट होती. नाहक उस के चलते सीमा के घर में बवाल मचता है. लेकिन फिर भी वह उस के सपनों में आती थी.

इन 5 साल में मनोहर को क्या मिला? सिर्फ चंद सूखी रोटी और सब्जी. कभी किसी को खयाल आया कि वह भी कुछ है कि उस के भी कुछ अरमान होंगे. ठीक है कि वह भद्दा है, मगर क्या ऐसे लोग जिंदगी नहीं जीते. इतना कुछ होने के बावजूद उसी के चलते तो उस का परिवार सुखी और संतुष्ट है.

यह सड़क बनाने का काम भी अजीब है. ठेकेदारों का क्या है, बस लोग भर दिए. लगे रहो काम पर. करते रहो खुदाई और भराई का काम.

यह भारीभरकम मशीन चलाना हर किसी के बस की बात थोड़े ही है. चिलचिलाती धूप हो या मूसलाधार बारिश या कड़ाके की ठंड क्यों न हो, इसे चलाना है. पीछे मजदूरों का कारवां चला करता है, जैसे हाथी के साथ पैदल सेना चल रही हो. सभी उसी के समान दुखियारे और बेचारे. जो कहीं काम न पाने के चलते यहां अपने हाड़ जलाने पहुंच जाते हैं.

मनोहर उन का दुख देख कर अपना दुख भूल जाता है. कम से कम उस के सिर पर बुलडोजर की टिन की छत तो है, जिस से वह कड़ी धूप या बारिश से बच जाता है. राह चलते लोग या गाडि़यों पर बैठे सरपट भागते लोगों को क्या समझ आएगा यह सब. उन्हें तो बस हड़बड़ी रहती है काम पर जाने की या घर पहुंचने की.

अचानक एक दिन सड़क हादसे में सीमा के रिश्तेदार शंभु प्रसाद जख्मी हो गए थे. चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था. डाक्टर ने खून चढ़ाने की बात कही थी, मगर खून दे तो कौन.

सीमा की मामी चारों ओर जैसे बिलखती फिरीं. पास में पैसे नहीं थे. आमदनी के नाम पर बस थोड़ी सी जमीन की उपज थी, जिस से परिवार का खर्च बमुश्किल चलता था. तभी तो सीमा को भी टीचर की नौकरी करनी पड़ रही थी. ऐसे मुसीबत के समय में सारे रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने किनारा कर लिया था.

आखिर में इस मुसीबत के समय मनोहर ही सामने आया. हफ्ते भर के अंदर उस ने अपने शरीर के पूरे 5 बोतल खून दे डाले थे. दवाओं के खर्च में भी उस ने पूरी मदद की और उस ने यह सब किसी लालच के चलते नहीं, बल्कि इनसानियत के नाते किया था. हालांकि अब उस का सीमा के घर में आनाजाना उस के मामामामी की अनदेखी के चलते काफी कम हो गया था.

और अब मनोहर ही सीमा के घर में सब से अच्छा दिखने लगा था. अब सब को यही लगता कि सीमा के मामा को उस ने जिंदगी दी है. एक हद तक यह बात सही भी थी.

एक शाम सीमा के मामा उस के घर आए. उस ने उन्हें आदर के साथ बिठाया और आवभगत की. वे उस से बोले, ‘‘आजकल तुम मेरे घर नहीं आते?’’

‘‘बस ऐसे ही,’’ मनोहर संकोच के चलते बोला, ‘‘ज्यादा काम की वजह से…’’

‘‘हां भाई साहब, इसी की वजह से ही हमारा घर संभला है,’’ मनोहर की मां बोलीं, ‘‘अपने भाईबहनों के लालनपालन, पढ़ाईलिखाई की जिम्मेदारी इसी पर है.’’

‘‘मगर, इस की भी तो शादी होनी चाहिए. उम्र काफी हो रही है.’’

‘‘इस लड़के से कौन शादी करेगा? ढंग का कामधाम और रूपरंग भी तो हो.’’

‘‘ढंग का कामधाम कैसे नहीं है इस के पास. अभीअभी तो आप ने कहा था कि पूरे घर की जिम्मेदारी इसी ने संभाली हुई है. फिर लड़के की सूरत नहीं, सीरत देखी जाती है बहनजी,’’ सीमा के मामा बोले, ‘‘मैं इस से अपनी बेटी सीमा की शादी कराना चाहूंगा. उम्मीद है कि आप इनकार नहीं करेंगी.’’

‘‘तो ठीक है अगले लगन में शादी हो जाएगी,’’ मनोहर की मां बोलीं, ‘‘मगर, आप सोच लीजिए कि हम एक साधारण परिवार से हैं. लड़का भी कुछ खास नहीं है.’’

‘‘मैं ने सबकुछ देख और सोच लिया है. इस से बढि़या दामाद मुझे नहीं मिलेगा,’’ वे उठते हुए बोले. अब उन्हें मनोहर काफी खूबसूरत दिख रहा था. वे सोच रहे थे, ‘सचमुच खूबसूरती इनसान में नहीं, नजरिए में होती है.’

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