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Hindi Story : आह्वान – क्या स्मिता दूसरी शादी से खुश थी

Hindi Story : एक भारतीय पुरुष को पत्नी यों अपनी मरजी से छोड़ कर चली जाए, बेहद अपमान व तौहीन की बात थी. मेरे अंदर बैठा भारतीय पति मन ही मन सोच रहा था, ‘पत्नी पति के बिना कितने दिन अकेली रहेगी? आएगी तो यहीं लौट कर.’ कुछ दिन के पश्चात वह लौटी तो सही, परंतु मुझे एक और आघात पहुंचाने के लिए. आते ही उस ने चहक कर बताया, ‘‘मुझे अपना मनचाहा दूसरा व्यक्ति मिल गया है और यहां से अच्छी नौकरी भी. मैं जल्दी ही तलाक की काररवाई पूरी करना चाहती हूं.’’

मैं पुरुष का सारा अहं समेटे उसे आश्चर्य से देखता भर रह गया. मेरा सारा दर्प चूरचूर हो बिखर गया. वह अपनी रहीसही बिखरी चीजें समेट कर चलती बनी और मेरी जिंदगी एक बीहड़ सन्नाटा बन कर रह गई. लगा, भरेपूरे संसार में मैं केवल अकेला हूं. इसी ऐलिस के कारण अपनों से भी पराया हो गया और वह भी यों छोड़ कर चल दी.

अकेले में परिवार के लोगों की याद, उन की कही बातें मन को झकझोरने लगीं. भारत से अमेरिका आने के लिए जिन दिनों मैं अपनी तैयारी में व्यस्त था तो पिताजी, अम्मां व बड़े भैया की जबान पर एक ही बात रहती, ‘देखो, वीरू, वहां जा कर किसी प्रेम के चक्कर में मत फंसना. हम लोगों के घर में अपनी भारतीय लड़की ही निभ पाएगी.’ मैं सुन कर यों मुसकरा देता जैसे उन के कहे की मेरे लिए कोई अहमियत ही न हो.

मां मेरी स्वच्छंद प्रकृति से भलीभांति परिचित थीं. एक दिन उन्होंने पिताजी को एकांत में कुछ सुझाया और उन्हें मां का सुझाव पसंद आ गया. स्मिता व उस के परिवार के कुछ सदस्यों को अपने यहां बुलवा कर चटपट मंगनी की रस्म अदा कर दी गई.

‘कम से कम लड़के पर कुछ तो बंधन रहेगा स्वदेश लौटने का. साल भर बाद ही शादी के लिए बुलवा लेंगे. फिर स्मिता भी साथ चली जाएगी तो वहीं का हो कर भी नहीं रहेगा,’ पिताजी अपने किए पर बहुत प्रसन्न थे. स्मिता के परिवार वाले भी संतुष्ट थे कि उन्हें अमेरिका से लौटा वर अपनी बेटी के लिए मिल जाएगा.

यों स्मिता कम आकर्षक नहीं थी. वह मेरे सामने आई तो मैं उसे एकटक देखता ही रह गया था. बड़ीबड़ी मदभरी आंखें व माथे पर लटकती घुंघराले बालों की घनी सी लट. चेहरे पर इतना भोलापन कि मन को बरबस अपनी ओर खींच ले. मन के किसी कोने में बरबस ही आ कर अपना अधिकार जमा लिया था उस ने.

भारत से जब विदा होने लगा था तो सभी स्वजनों की आंसुओं से भरी आंखों के बीच वह भी सिर झुकाए एक ओर अलग खड़ी थी. बड़े भैया, मिथुन चाचा, रमा दीदी व शीला भाभी सभी मुझे बारबार गले लगा कर अपने हृदय की व्याकुलता प्रकट कर रहे थे. शरम के मारे वह उसी एक कोने में खड़ी रही. मैं ही उस के पास पहुंचा था और धीरे से उस के कान में कहा था, ‘अच्छा, स्मिता, फिर मिलेंगे. जहाज का वक्त हो गया है.’

उस ने एक बार अपनी नजर उठाई और मेरे चरणों में झुक गई थी. पिताजी मुझे बांहों में लपेट कर बुदबुदाए थे, ‘नालायक, देख, तेरे लिए कितनी अच्छी लक्ष्मी जैसी बहू ढूंढ़ी है हम ने. याद रखना, जल्दी ही लौटना है तुझे इस के लिए.’

मैं उन की भुजाओं के बंधन से मुक्ति पा कर जाने लगा तो आंखें पोंछते हुए वह बीचबीच में अटकती जबान से कहे जा रहे थे, ‘तेरे शौक के कारण भेज रहा हूं, वरना तो क्या इतनी दूर भेजता.’

कुछ देर तक जहाज में बैठने के पश्चात अपनी धरती व अपने आकाश को छोड़ते हुए मन कसैला सा रहा. जिन्हें पीछे छोड़ आया था उन की याद से मन दुखी था. स्मिता की याद मन में बारबार यों कौंध जाती जैसे बरसाती बादलों के बीच सहसा बिजली चमक उठती है.

न्यूयार्क हवाई अड्डे पर आज से 3 वर्ष पूर्व उतरा था तो मन सबकुछ भुला कर कितनी नई सुनहरी कल्पनाओं में उड़ानें भरने लगा था. जिस कल्पना-लोक में पहुंचने की तड़प मेरे मन में होश संभालते ही समा गई थी उसी धरती पर उतर कर लगा था यही है मेरी कल्पनाओं की धरती. यथार्थ में कल्पना से भी अधिक सुंदर.

उपस्थित मित्रगणों ने गले में बांहें डाल कर हवाई अड््डे पर मेरा स्वागत किया. प्रमोद से सामना होते ही मुझे लगा कि उस के चरणों में गिर पड़ूं. उसी ने मुझे अमेरिका बुलाने में अपना पूर्ण सहयोग दिया था. अपने दफ्तर में मेरे लिए काम की तलाश भी मेरे पहुंचने से पहले ही कर दी थी.

चिकनी, गुदगुदी कार शीशे जैसी सड़कों पर ऊंचेऊंचे भवनों के बीच से हो कर गुजरती जा रही थी और मैं हैरत से आंखें फाड़फाड़ कर इधरउधर देखता रहा. प्रमोद ने मेरे लिए एक छोटे से निवास का प्रबंध भी पहले से ही कर दिया था. खाना भी उस रात उस ने कहीं से मंगवा रखा था. मुझे अपने कमरे पर छोड़ने के पश्चात वह भी बहुत कम मिल पाया. कभी आमनासामना हो भी जाता तो दूर से ही ‘हैलो’ कह देता. अपनी व्यस्तता भरी जिंदगी में से कुछ क्षण भी वह मेरे लिए चुरा लेने को विवश था शायद.

एकदम भारतीय परिवेश से निकल कर यों लगने लगा जैसे अनेक मित्रों के रहते हुए भी मैं एकदम अकेला व उपेक्षित हूं. काम कर के लौटता तो लगता, मैं उस छोटे से कमरे में कैद हो गया हूं. न घर में कोई बोलने वाला था, न यह पूछने वाला कि मैं भूखा हूं या प्यासा. 6 महीने बीततेबीतते मुझे यह अकेलापन बेहद खलने लगा.

अकेलेपन की उस ऊब को मिटाने के लिए मैं अनजाने ही कब ऐलिस की ललचाई आंखों में उलझता गया और कब मैं साल भर के अंदर ही उस से विवाह करने पर उतारू हो गया, मैं स्वयं भी नहीं जान पाया.

घर वालों को पता चला तो सब के रोषपूर्ण पत्र आने लगे. मां ने लिखवाया था, ‘समझ ले तेरी मां मर गई.’ उसी  पत्र में बड़े भैया ने भी लिख भेजा था, ‘अपना काला मुंह हम सब को दिखाने की जरूरत नहीं. खानदान की इज्जत मिट्टी में मिला दी. क्या जवाब देंगे हम लड़की वालों को?’

मैं भी अंदर ही अंदर सुलग उठा था. उत्तर में लिख भेजा था, ‘शादीब्याह हर व्यक्ति की अपनी मरजी से होना चाहिए न कि खानदान की नाक रखने के लिए. आप लोग भी समझ लें कि वीरू इस दुनिया में नहीं रहा.’

तब से घर वालों ने मेरे द्वारा भेजी जाने वाली आर्थिक सहायता भी स्वीकार करनी बंद कर दी. मन को भारी आघात तो पहुंचा था, क्योंकि भारत से आने का मेरा प्रमुख उद्देश्य घर की दशा सुधारने का ही था, ‘मैं बाहर चला जाऊंगा तो ढेर सारे पैसे भेजा करूंगा, सब की हालत सुधर जाएगी,’ पिताजी को यही कह कर मैं आश्वस्त किया करता था.

ऐलिस से विवाह करने के पश्चात तो घर वालों को कुछ भेजने की संभावना ही नहीं थी. मैं ने भी सब को भुला दिया. बस, ऐलिस के रंग में डूब गया.

लेकिन वह सबकुछ बहुत दिनों तक नहीं चल पाया. बहुत जल्दी ही मैं यह महसूस करने लगा था कि ऐलिस की दुनिया बहुत रंगीन है. उस का रहने का स्तर बहुत ऊंचा है जिस तक पहुंचने की कोशिश में मैं अपनेआप को अयोग्य समझने लगा था.

उस की महत्त्वाकांक्षाएं मेरे भीतर की शांति को नष्ट करती जा रही थीं. शीघ्र ही हमारे संबंधों में ठंडापन आने लगा. फिर भी अपने भारतीय संस्कारों के वशीभूत हो मैं उस के साथ हर समझौते के लिए तैयार रहता.

उधर ऐलिस के लिए जिंदगी की परिभाषा मुझ से सर्वथा भिन्न थी. वह केवल जिंदगी जीना जानती थी, संबंध निभाना नहीं. विवाह यों भी विदेशी धरातल पर जीवन भर का संबंध न हो कर एक समझौता मात्र समझा जाता है. जब चाहा जोड़ लिया और जब मन में आया तोड़ डाला.

ऐलिस भी मुझे बारबार सुनाने लगी थी, ‘जब संबंधों में ही गरमाहट न हो तो हमें अलग हो जाना चाहिए. अब साथसाथ रहना एक पाखंड है.’

तब भी मुझे विश्वास नहीं होता था कि वह अपने कहे को इतनी सहजता से कार्यान्वित कर दिखाएगी. उस के प्रति एक आक्रोश अंदर ही सुलगता और राख हो जाता.

दिन गुजरते गए. अब 6 महीने होने को हैं. उन दिनों के बारे में सोचता हूं तो स्वयं पर ही आश्चर्य होता है. ऐलिस के साथ कैसे मैं इतनी असहाय, दयनीय जिंदगी गुजारने लगा था. हर समय उस की इच्छाओं को पूरा करने व उसी के कार्यक्रमों को निबटाने में लगा रहा. कितना विवश हो कर उस के इशारों पर नाचने लगा था.

मेरी पूरी दिनचर्या उसी के द्वारा नियोजित होती. कभी कुछ नकारना चाहता तो ऐलिस बड़ी शान से कहती, ‘भूल जाओ कि तुम एक भारतीय हो. अब तुम अमेरिका में रह रहे हो. यहां सभी को इतना काम करना पड़ता है, नहीं तो हम इस खटारा गाड़ी की जगह शेवरलेट कैसे खरीदेंगे? अपना खुद का घर कैसे लेंगे?’

उस के द्वारा थोपी गई दिनचर्या पर मुझे कई बार बेहद गुस्सा आ जाता परंतु उस आग में मुझे खुद ही जलना पड़ता. उस के आगे तो केवल मुसकरा कर ‘हां’ कह देनी पड़ती.

सचमुच उस के साथ मैं उन्मुक्त भाव से खिलखिलाया तो कभी नहीं, हां हंसता जरूर था. वह भी जब उस के सामने हंसने की जरूरत पड़ती थी. खुद की हंसी तो कभी नहीं हंसा.

उस से पीछा छूटा तो बेचैन हो कर अपने देश लौटने के लिए छटपटाने लगा हूं. क्या मेरी अपनी भी कोई धरती है? कोई आकाश है जिसे अपना कह कर ही स्वच्छंद विचरण कर सकूं? लगता है, मेरा जीवन अधर में लटका हुआ दिशाहीन विमान है जिस के विचरण के लिए कोई आकाश नहीं है. नीचे उतरने को कोई धरती भी नहीं. स्वदेश में सब पराए हो चुके हैं.

जब मैं भारत से विदा होने लगा था तब अम्मां ने मुझे कलेजे से लगा कर ऐसे लिपटा लिया था जैसे मैं कोई दुधमुंहा बच्चा होऊं. धोती का पल्लू मुंह में ठूंस, जमीन पर बैठ कर सिसकने लगी थीं. यदि अब उन के सामने गया तो क्या वह मुझे उसी तरह अपनी छाती से चिपटा लेंगी? शायद नहीं.

‘समझ ले, तेरी मां मर गई.’ पत्र में उन के लिखवाए गए ये शब्द आंखों के आगे तैरने लगते हैं.

पिताजी, बड़े भैया, चाचा व भाभी सभी तो रुष्ट हैं. और स्मिता? उस की तो शादी भी हो गई होगी. जब उस के घर वालों को पता चला होगा कि मैं ने यहां ऐलिस से विवाह कर लिया है तो उन का दिल मेरे प्रति कितनी नफरत से भर उठा होगा. चट से स्मिता के हाथ पीले कर दिए होंगे. मुझे यहीं इस विदेश में यों निरुद्देश्य ही जीना होगा, जीते जी मरने के समान.

एक दिन डाकिया दीदी की चिट्ठी दे गया. उस ने लिखा था, ‘ऐलिस के चले जाने से पूरे परिवार के लोग प्रसन्न हैं. अब तुम जल्दी लौट आओ. तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे बिना घर की दशा कैसी हो रही है.

‘इन 3 वर्षों में ही अम्मां की आंखों की रोशनी जाती रही है. रोरो कर मोतियाबिंद उतर आया है. चाचाजी को हर समय पेट की शिकायत रहती है. पिताजी चलनेफिरने के अयोग्य होते जा रहे हैं. धीरेंद्र भैया असमय ही बूढ़े हो गए हैं. उन के दोनों लड़के पैसे के अभाव के कारण पढ़नालिखना छोड़ बैठे हैं. यों समझ लो कि तुम्हारे बिना सब की कमर टूट चुकी है.

‘और तो और, मरम्मत के अभाव में हमारा अच्छाखासा घर भी पुराना लगने लगा है. अब सोच लो कि तुम्हारा कर्तव्य क्या बनता है.’

दीदी के हाथ की लिखी पंक्तियों को देखते ही कितनी ही मधुर स्मृतियों में मन हिलोरें खाने लगा. कोई भी शरारत भरा काम होता तो मैं और दीदी इकट्ठे रहते. होली के अवसर पर राह चलते लोगों पर घर की मुंडेर से रंग भरे गुब्बारे फेंकना व रंग खेलती टोलियों पर ऊपर से रंग भरी बालटियां उड़ेल देना हम दोनों को बहुत प्रिय था. दीवाली आती तो पटाखे छोड़ कर राह चलतों को तंग करते.

दीदी के प्यार भरे पत्र व उन से जुड़ी मधुर स्मृतियां मुझे भारत लौटने के लिए विवश करने लगीं. मेरा मन लौटने की तैयारियां करने के लिए लालायित हो उठा.

तभी असमंजस ने मुझे फिर से घेर लिया. वहां यदि स्मिता से सामना हो गया तो मेरी क्या दशा होगी? शहर ही में तो रहती है.

मैं ने मन ही मन छटपटा कर फिर अपना इरादा ठप कर दिया.

कुछ ही दिनों के पश्चात लेटरबाक्स में नीले रंग का सुंदर सा लिफाफा पड़ा दिखाई दिया. एक कोने पर सुंदर अक्षरों में लिखा था, स्मिता…

धड़कते दिल से पत्र खोला तो आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. एकएक शब्द प्यार में पगा कर उस ने लिखा था, ‘जाते समय आप ने मुझे वचन दिया था फिर से मिलने का. मिलन के उन्हीं क्षणों की प्रतीक्षा में दिन काट रही हूं. वर्षों से उन्हीं क्षणों के लिए जी रही हूं. देखती हूं और कितनी प्रतीक्षा करवाओगे. आजीवन भी करवाओगे तो करती रहूंगी क्योंकि हमारातुम्हारा संबंध तो जन्म भर का है.’

नीचे लिखा था, ‘केवल तुम्हारी, स्मिता.’

कितना निश्चल प्रेम है. न कोई शिकायत, न शिकवा. एक आह््वान है  पत्र में, परंतु कितने निस्वार्थ भाव से.

मुझे एकदम लगा, मेरी भी कोई धरती है. कोई खुला आकाश है मेरे लिए भी. वहां सब अपने हैं. मैं उन्हीं अपनों के प्रति अपने कर्तव्य निभाऊंगा. मां की आंखों का आपरेशन, पिताजी की कमजोरी का इलाज, उपचार, भैया व उन के बच्चों के खर्चों का वहन, यह सब मेरा फर्ज है. वर्षों बाद अपना फर्ज निभाऊंगा, अपनी धरती पर विचरूंगा, अपनों के बीच.

और स्मिता, उसी के पत्र के आह्वान ने ही तो मुझे भारत लौटने की प्रेरणा दी है. वही मेरी सच्ची जीवनसंगिनी बन कर रहेगी.

Short Story: सवाल का जवाब

Hindi Story : जफर दफ्तर से थकाहारा जैसेतैसे रेलवे के नियमों को तोड़ कर एक धीमी रफ्तार से चल रही ट्रेन से कूद कर, मन ही मन में कचोटने वाले एक सवाल के साथ, उदासी से मुंह लटकाए हुए रात के साढ़े 8 बजे घर पहुंचा था. बीवी ने खाना बना कर तैयार कर रखा था, इसलिए वह हाथमुंह धोने के लिए वाशबेसिन की ओर बढ़ा तो देखा कि उस की 7 साल की बड़ी बेटी जैना ठीक उस के सामने खड़ी थी. वह हंस रही थी. उस की हंसी ने जफर को अहसास करा दिया था कि जरूर उस के ठीक पीछे कुछ शरारत हो रही है.

जफर ने पीछे मुड़ कर देखने के बजाय अपनी गरदन को हलका सा घुमा कर कनखियों से पीछे की ओर देखना बेहतर समझा कि कहीं उस के पीछे मुड़ कर देखने से शरारत रुक न जाए.

आखिरकार उसे समझ आ गया कि क्या शरारत हो रही है. उस की दूसरी 6 साला बेटी इज्मा ठीक उस से डेढ़ फुट पीछे वैसी ही चाल से जफर के साए की तरह उस के साथ चल रही थी.

बस, फिर क्या था. एक खेल शुरू हो गया. जहांजहां जफर जाता, उस की छोटी बेटी इज्मा उस के पीछे साए की तरह चलती. वह रुकता तो वह भी उसी रफ्तार से रुक जाती. वह मुड़ता तो वह भी उसी रफ्तार से मुड़ जाती. किसी भी दशा में वह जफर से डेढ़ फुट पीछे रहती.

इज्मा को लग रहा था कि जफर उसे नहीं देख रहा है, जबकि वह उस को कभीकभी कनखियों से देख लेता, इस तरह कि उसे पता न चले.

इस अनचाहे आकस्मिक खेल की मस्ती में जफर अपने 2 दिन पहले की सारी परेशानी और गम भूल सा गया था. तभी उसे अहसास हुआ कि इस नन्ही परी ने खेलखेल में उसे गम और परेशानियों का हल दे दिया था. इस मस्ती में उसे उस के बहुत बड़े सवाल का जवाब मिल गया था, जिस का जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते वह थक चुका था.

पिछले 2 दिनों से वह हर वक्त दिमाग में सवालिया निशान लगाए घूम रहा था. मगर जवाब कोसों दूर नजर आ रहा था, क्योंकि 2 दिन पहले उस की दोस्त नेहा ने कुछ ऐसा कर दिया था जिस के गम के बोझ में जफर जमीन के नीचे धंसता चला जा रहा था.

हमेशा सच बोलने का दावा करने वाली नेहा ने उस से एक झूठ बोला था. ऐसा झूठ, जिसे वह कतई बरदाश्त नहीं कर सकता था.

आखिर क्यों और किसलिए नेहा ने ऐसा किया?

इस सवाल ने दिमाग की सारी बत्तियों को बुझा कर रख दिया था. इस झूठ से जफर का उस के प्रति विश्वास डगमगा गया था.

वह ठगा सा महसूस कर रहा था. उसे लगने लगा था कि अब वह दोबारा कभी भी नेहा पर भरोसा नहीं कर पाएगा. ऐसा झूठ जिस ने रिश्तों के साथ मन में भी कड़वाहट भर दी थी और जो आसानी से पकड़ा गया था, क्योंकि उस शख्स ने जफर को फोन कर के बता दिया था कि नेहा अभीअभी उस से मिलने आई थी. जब जफर ने पूछा तो नेहा ने इनकार कर दिया था.

नेहा ने झूठ बोला था और उस शख्स ने सचाई बता दी थी. इतनी छोटी सी बात पर झूठ जो किसी मजबूरी की वजह से भी हो सकता था, जफर ने दिल से लगा लिया था. इस झूठ को शक और अविश्वास की कसौटी पर रख कर वह नापतोल करने लगा.

झूठ के पैमाने पर नेहा से अपने रिश्ते को नापने लगा तो सारी कड़वाहट उभर कर सामने आ गई. सारी कमियां याद आने लगीं. अच्छाई भूल गया. अच्छाई में भी बुराई दिखने लगी और यही वजह उस की परेशानी का सबब बन गई. उस के जेहन में एक, बस एक ही सवाल गूंज रहा था कि नेहा ने उस से आखिर क्यों झूठ बोला था?

जफर की नन्ही परी इज्मा ने बड़ी मासूमियत से उसे गम के इस सैलाब से बाहर निकाल लिया था. उसे अपने सवाल का जवाब उस की इन मस्तियों में मिल गया था क्योंकि अब वह समझ गया था कि उस की बेटी थोड़ी मस्ती के लिए उस की साया बन कर, उस की पीठ के पीछे चल कर खेल खेल रही थी, जिस का मकसद खुशी था. अपनी भी और उस की भी. ठीक उसी तरह नेहा भी उस से झूठ बोल कर एक खेल खेल रही थी.

जफर की पीठ पीछे की घटना थी. उस ने शायद उस नन्ही परी की तरह ही आंखमिचौली करने की सोची थी, क्योंकि इस से पहले कितनी ही बार जफर ने उस को परखा था. उस ने कभी झूठ नहीं बोला था. आज शायद उस का मकसद भी उस नन्ही परी की तरह मस्ती करने का था. शायद कुछ समय बाद वह सबकुछ बता देने वाली थी जिस तरह नन्ही परी ने बाद में बता दिया था.

जफर ठहरा जल्दी गुस्सा होने वाला इनसान, उस की एक न सुनी और बारबार फोन करने पर भी उसे सच बताने का मौका ही नहीं दिया था.

वह हैरान थी और डरी हुई भी. उस ने उस से बात तक नहीं की. जब तक बात न हो, गिलेशिकवे और बढ़ जाते हैं. बातचीत से ही रिश्तों की खाइयां कम होती हैं. यहां बातचीत के नाम पर

2 दिनों से सिर्फ ‘हां’ या ‘न’ दो जुमले इस्तेमाल हो रहे थे.

नेहा जफर की नाराजगी को ले कर परेशान थी और वह उस के झूठ को ले कर. नन्ही परी की मस्ती की अहमियत को इस सवाल के जवाब के रूप में समझ कर मेरी दिमाग की सारी घटाएं छंट गई थीं. दिल पर छाया कुहरा अब ऐसे हट गया था, जैसे सूरज की किरणों से कुहरे की धुंध हट जाया करती है.

सबकुछ साफ दिखाई दे रहा था. समझ में आ गया था कि कोई सच्चा इनसान कभीकभी छोटीछोटी बातों के लिए झूठ क्यों बोल देता है. शायद मस्ती के लिए. जो बात वह दिमाग के सारे घोड़े दौड़ा कर भी नहीं सोच पा रहा था, वह इस नन्ही परी इज्मा की शरारत ने समझा दी थी, वह भी कुछ ही पलों में.

जफर का गुस्सा अब पूरी तरह से शांत हो गया था. एकदम शांत. वह समझ गया था कि उसे क्या करना है.

जफर ने खुद ही नेहा को फोन किया. नेहा ने सफाई देने की कोशिश की, मगर जफर ने उसे रोक दिया.

जफर ने अपनी नन्ही परी इज्मा का पूरा किस्सा सुनाया. अब नेहा एकदम शांत थी. उस की नाराजगी और सफाई अब दोनों की ही कोई अहमियत नहीं रह गई थी. फिर उस ने पहले की तरह एक चुटकुला छेड़ दिया था और वे दोनों सबकुछ भूल कर पहले जैसे हो गए थे.

Hindi Story : खरीदारी – अपमान का कड़वा घूंट

Hindi Story : प्रात: के 9 बज रहे थे. नाश्ते आदि से निबट कर बिक्री कर अधिकारी चंद्रमोहन समाचारपत्र पढ़ने में व्यस्त था. निकट रखे विदेशी टेपरिकार्डर पर डिस्को संगीत चल रहा था, जिसे सुन कर उस की गरदन भी झूम रही थी.

तभी उस की पत्नी सुमन ने निकट बैठते हुए कहा, ‘‘आज शाम को समय पर घर आ जाना.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कुछ खरीदारी करने जाना है.’’

‘‘कोशिश करूंगा. वैसे आज 1-2 जगह निरीक्षण पर जाना है.’’

‘‘निरीक्षण को छोड़ो. वह तो रोज ही चलता है. आज कुछ चीजें खरीदनी जरूरी हैं.’’

‘‘मैं ने अभी 3-4 दिन पहले ही तो खरीदारी की थी. पूरे एक हजार रुपए का सामान लिया था,’’ चंद्रमोहन ने कहा.

‘‘तो क्या और किसी चीज की जरूरत नहीं पड़ती?’’ सुमन ने तुनक कर कहा.

‘‘मैं ने ऐसा कब कहा? देखो, सुमन, हमारे घर में किसी चीज की कमी नहीं है. ऐश्वर्य के सभी साधन हैं हमारे यहां, फ्रिज, रंगीन टेलीविजन, वीसीआर, स्कूटर तथा बहुत सी विदेशी चीजें. नकद पैसे की भी कमी नहीं है. दोनों बच्चे भी अंगरेजी स्कूल में पढ़ रहे हैं.’’

‘‘वह तो ठीक है. जब से चंदनगढ़ में बदली हुई है मजा आ गया है,’’ सुमन ने प्रसन्न हृदय से कहा.

‘‘हां, 2 साल में ही सब कुछ हो गया. जब हमलोग यहां आए थे तो हमारे पास कुछ भी नहीं था. बस, 2-3 पुरानी टूटी हुई कुरसियां, दहेज में मिला पुराना रेडियो, बड़ा पलंग तथा दूसरा सामान. यहां के लोग गाय की तरह बड़े सहनशील और डरपोक हैं. चाहे जैसे दुह लो, कभी कुछ नहीं कहते,’’ चंद्रमोहन बोला.

तभी दरवाजे पर लगी घंटी बजी.

सुमन ने दरवाजा खोला. सामने खड़े व्यक्ति ने अभिवादन कर पूछा, ‘‘साहब हैं?’’

‘‘हां, क्या बात है?’’

‘‘उन से मिलना है.’’

‘‘आप का नाम?’’

‘‘मुझे सोमप्रकाश कहते हैं.’’

कुछ क्षण बाद सुमन ने लौट कर कहा, ‘‘आइए, अंदर चले आइए.’’

चंद्रमोहन को बैठक में बैठा देख कर सोमप्रकाश ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और प्लास्टिक के कागज में लिपटा एक डब्बा मेज पर रख दिया.

सुमन दूसरे कमरे में जा चुकी थी.

‘‘कहिए?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘मैं सोम एंड कंपनी का मालिक हूं. अभी हाल ही में आप ने हमारी फर्म का निरीक्षण किया था लेकिन जितने माल की बिक्री नहीं हुई उस से कहीं अधिक की मान ली गई है. अगर आप की कृपादृष्टि न हुई तो मैं व्यर्थ में ही मारा जाऊंगा. आप से यही प्रार्थना करने आया हूं,’’ सोमप्रकाश ने दयनीय स्वर में कहा.

‘‘मैं तुम जैसे व्यापारियों को बहुत अच्छी तरह जानता हूं. जितना माल बेचते हो उस का चौथाई भी कागजात में नहीं दिखाते, और इस तरह दो नंबर का अंधाधुंध पैसा बना कर टैक्स की चोरी कर के सरकार को चूना लगाते हो. तुम लोगों की वजह से ही सरकार को हर साल बजट में घाटा दिखाना पड़ता है,’’ चंद्रमोहन ने बुरा सा मुंह बना कर कहा.

सोमप्रकाश अपमान का कड़वा घूंट पी कर रह गया. आखिर वह कर ही क्या सकता था. उस ने कमरे में दृष्टि डाली. हर ओर संपन्नता की झलक दिखाई दे रही थी. फर्श पर महंगा कालीन बिछा था. वह कहना तो बहुत कुछ चाहता था परंतु गले में मानो कुछ अटक सा गया था. बहुत प्रयत्न कर के स्वर में मिठास घोल कर बोला, ‘‘साहब, मैं आप की कुछ सेवा करना चाहता हूं. ये 2 हजार रुपए रख लीजिए. बच्चों की मिठाई के लिए हैं.’’

‘‘काम तो बहुत मुश्किल है, फिर भी जब तुम आए हो तो मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हारा काम बन जाए.’’

‘‘आप की बहुत कृपा होगी. जब आप निरीक्षण पर आए थे तो मैं वहां नहीं था. मुझे रात ही पता चला तो सुबह होते ही मैं आप के दर्शन करने चला आया,’’ सोमप्रकाश बोला और उठ कर बाहर चला गया.

चंद्रमोहन ने सुमन को बुला कर कहा, ‘‘लो, भई, ये रुपए रख लो, अभी एक असामी दे गया है.’’

सुमन रुपए उठा कर दूसरे कमरे में चली गई.

कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी फिर बज उठी.

चंद्रमोहन ने दरवाजा खोला. सामने एडवोकेट प्रेमलाल को खड़ा देख चेहरे पर मुसकान बिखेर कर बोला, ‘‘अरे, आप. आइए, पधारिए.’’

प्रेमलाल कमरे में आ कर सोफे पर बैठ गया.

‘‘सब से पहले यह बताइए कि क्या लेंगे. ठंडा या गरम?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, मैं अभी नाश्ता कर के आ रहा हूं.’’

‘‘फिर भी, कुछ तो लेना ही होगा,’’ कहते हुए चंद्रमोहन ने सुमन को चाय लाने का संकेत किया.

प्रेमलाल की जरा ज्यादा ही धाक थी. बिक्री कर के वकीलों की संस्था में उस की बात कोई न टालता था. इस बार इस संस्था के अध्यक्ष पद के लिए खड़ा हो रहा था. उस के निर्विरोध चुने जाने की पूरी संभावना थी.

चंद्रमोहन ने पूछा, ‘‘कहिए, कैसे कष्ट किया?’’

कल आप ने विनय एंड संस का निरीक्षण किया था. वहां से कुछ कागजात भी पकड़े गए. उस निरीक्षण की रिपोर्ट बदलवाने और आप ने जो कागजात पकड़े हैं उन्हें वापस लेने आया हूं.

‘‘आप के उन लोगों से कुछ निजी संबंध हैं क्या? उस फर्म में बहुत हेराफेरी होती है. वैसे भी ये व्यापारी टैक्स की बहुत चोरी करते हैं. यों समझिए कि खुली लूट मचाते हैं. यदि ये ईमानदारी…’’

‘‘ईमानदारी…’’ हंस दिया प्रेमलाल, ‘‘यह शब्द सुनने में जितना अच्छा लगता है, व्यवहार में उतना ही कटु है. ऐसा कौन व्यक्ति है जो सचमुच ईमानदारी से काम कर रहा हो? आखिर दुकानदार कैसे ईमानदार रह सकता है, जब सरकार उस पर तरहतरह के टैक्स लगा कर उसे स्वयं इन की चोरी करने के लिए प्रेरित करती है. अब आप अपने को ही लीजिए. आप का गिनाचुना वेतन है, फिर भी आप हर महीने हजारों रुपए खर्च करते हैं. क्या आप कह सकते हैं कि आप स्वयं ईमानदार हैं?’’

चंद्रमोहन खिसियाना सा हो कर रह गया.

‘‘हमाम में हम सब नंगे हैं. जिसे आप ने अभी बेईमानी कहा उस में हम सब का हिस्सा है. जब सरकार ने ही बिना सोचेसमझे व्यापारियों पर इतने टैक्स लाद रखे हैं तो वह बेचारा भी क्या करे?’’

तभी सुमन चाय ले कर आ गई.

चाय की चुसकी ले कर प्रेमलाल ने जेब से एक हजार रुपए निकाल कर मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘भई, यह काम आज शाम तक कर दीजिएगा. देखिए, कुछ इस ढंग से चलिए कि सभी का काम चलता रहे, अगर मुरगी ही न रही तो अंडा कैसे हासिल होगा? और हां, वे कागजात…’’

‘‘दे दूंगा,’’ मना करने का साहस चंद्रमोहन में नहीं था.

‘‘हां, एक बात और. कल मुझे एक दुकानदार ने एक शिकायत की थी.’’

‘‘कैसी शिकायत?’’

‘‘यह कि आप का चपरासी रामदीन दुकानदारों से यह कह कर सामान ले जाता है कि साहब ने मंगवाया है. कल आप ने कुछ सामान मंगवाया था क्या?’’

‘‘नहीं तो…’’

‘‘तो अपने चपरासी पर जरा ध्यान रखिए. कहीं ऐसा न हो कि मजे वह करता  रहे और मुसीबत में आप फंस जाएं.’’

‘‘ठीक है. मैं उस नालायक को ठीक कर दूंगा,’’ चंद्रमोहन ने रोष भरे स्वर में कहा.

शाम को चंद्रमोहन ने गांधी बाजार में एक दुकान के आगे अपना स्कूटर खड़ा किया और फिर सुमन व दोनों बच्चों के साथ उस दुकान की ओर बढ़ा.

काउंटर पर खड़े दुकानदार  ने चंद्रमोहन को देख कर क्षण भर के लिए बुरा सा मुंह बनाया, मानो उसे कोई बहुत कड़वी दवा निगलनी पड़ेगी. वह चंद्रमोहन की आदत से परिचित था. पहले भी

2-3 बार चंद्रमोहन सपरिवार उस की दुकान पर आ चुका था और उसे मजबूरन सैकड़ों का माल बिना दाम लिए चंद्रमोहन को देना पड़ा था.

यद्यपि चंद्रमोहन ने उस सामान के दाम पूछे थे, पर दुकानदार जानता था कि अगर उस ने दाम लेने की हिमाकत की तो चंद्रमोहन उस का बदला उस का बिक्री कर बढ़ा कर लेगा. इसलिए दूसरे ही क्षण उस ने चेहरे पर जबरदस्ती मुसकान बिखरते हुए कहा, ‘‘आइए, साहब…आइए.’’

‘‘सुनाइए, क्या हाल है?’’

‘‘आप की कृपा है, साहब. कहिए क्या लेंगे, ठंडा या गरम?’’ न चाहते हुए भी दुकानदार को पूछना पड़ा.

‘‘कुछ नहीं, रहने दीजिए.’’

‘‘नहीं साहब, ऐसा कैसे हो सकता है? कुछ न कुछ तो लेना ही होगा.’’ दुकानदार ने नौकर को 4 शीतल पेय की बोतलें लाने को कहा.

सुमन बोली, ‘‘मुझे लिपस्टिक और शैंपू दिखाइए.’’

दुकानदार ने कई तरह की लिप-स्टिक दिखाए हैं. सुमन उन में से पसंद करने लगी.

शीतल पेय पी कर लिपस्टिक, शैंपू, सेंट, स्प्रे, टेलकम, ब्रा तथा अन्य सामान बंधवा लिया था.

‘‘कितना बिल हो गया?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

लगभग 300 रुपए का सामान हो गया था. फिर भी दुकानदार मुसकरा कर बोला, ‘‘कैसा बिल, साहब? यह तो आप ही की दुकान है. कोई और सेवा बताएं?’’

‘‘धन्यवाद,’’ कहता हुए चंद्रमोहन अपने परिवार के साथ दुकान से बाहर निकल आया.

कुछ दुकानें छोड़ कर चंद्रमोहन सिलेसिलाए कपड़ों की दुकान पर आ धमका. दुकानदार वहां नहीं था. उस का 15 वर्षीय लड़का दुकान पर खड़ा था, तथा 2 नौकर भी मौजूद थे.

‘‘इस दुकान के मालिक किधर हैं?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘किसी काम से गए हैं,’’ लड़के ने उत्तर दिया.

‘‘कब तक आएंगे?’’

‘‘पता नहीं, शायद अभी आ जाएं.’’

‘‘ठीक है, तुम इन दोनों बच्चों के कपड़े दिखाओ.’’

नौकर बच्चों के सूट दिखाने लगा. 2 सूट पसंद कर बंधवा लिए गए.

‘‘कितना बिल हुआ?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘230 रुपए.’’

‘‘तुम हमें पहचानते नहीं?’’

‘‘जी नहीं,’’ लड़के ने कहा.

‘‘खैर, हम यहां के बिक्री कर अधिकारी हैं. जब दुकान के मालिक आ जाएं तो उन्हें बता देना कि चंद्रमोहन साहब आए थे और ये दोनों सूट पसंद कर गए हैं. वह इन्हें घर पर ले कर आ जाएंगे. क्या समझे?’’

‘‘बहुत अच्छा, कह दूंगा,’’ लड़का बोला.

चंद्रमोहन दुकान से बाहर निकल आया और सुमन से बोला, ‘‘ये दोनों सूट तो घर पहुंच जाएंगे. लड़के का बाप होता तो ये अभी मिल जाते. अच्छा, अब और भी कुछ लेना है?’’

‘‘हां, कुछ क्राकरी भी तो लेनी है.’’

‘‘जरूर. हमें कौन से पैसे देने हैं,’’ कहता हुआ चंद्रमोहन क्राकरी की एक दुकान की तरफ बढ़ा.

देखते ही दुकानदार का माथा ठनका. वह चंद्रमोहन की आदत को अच्छी तरह जानता था. पहले भी कभी चंद्रमोहन, कभी उस की पत्नी और कभी उस का चपरासी बिना पैसे दिए सामान ले गया था. फिर भी दुकानदार को मधुर मुसकान के साथ उस का स्वागत करना पड़ा, ‘‘आइए, साहब, बड़े दिनों बाद दर्शन दिए.’’

‘‘कैसे हैं आप?’’

‘‘बस, जी रहे हैं, साहब, बहुत मंदा चल रहा है.’’

‘‘हां, मंदीतेजी तो चलती ही रहती है.’’

‘‘कल आप का चपरासी रामदीन आया था, साहब. आप ने कुछ मंगाया था न?’’

‘‘हम ने, क्या ले गया वह?’’

‘‘एक दरजन गिलास.’’

चंद्रमोहन चपरासी की इस हरकत पर परदा डालते हुए बोला, ‘‘अच्छा वे गिलास…वे कुछ बढि़या नहीं निकले. वापस भेज दूंगा. अब कोई बढि़या सा टी सेट और कुछ गिलास दिखाइए.’’

चंद्रमोहन व सुमन टी सेट पसंद करने लगे.

तभी अचानक जैसे कोई भयंकर तूफान सा आ गया. बाजार में भगदड़ मचने लगी. दुकानों के दरवाजे तेजी से बंद होने लगे. 2-3 व्यक्ति चिल्ला रहे थे, ‘‘दुकानें बंद कर दो. जल्दी से चौक में इकट्ठे हो जाओ.’’

दुकानदार ने चिल्लाने वाले एक आदमी को बुला कर पूछा, ‘‘क्या हो गया?’’

‘‘झगड़ा हो गया है.’’

‘‘झगड़ा? किस से?’’

‘‘एक बिक्री कर अधिकारी से.’’

‘‘क्या बात हुई?’’

‘‘बिक्री कर विभाग के छापामार दस्ते का एक अधिकारी गोविंदराम की दुकान पर पहुंचा. 500 सौ रुपए का सामान ले लिया. जब उस ने पैसे मांगे तो वह अधिकारी आंखें दिखा कर बोला, ‘हम को नहीं जानता.’ दुकानदार भी अकड़ गया. बात बढ़ गई. वह अधिकारी उसे बरबाद करने की धमकी दे गया है. इन बिक्री कर वालों ने तो लूट मचा रखी है. माल मुफ्त में दो, नहीं तो बरबाद होने के लिए तैयार रहो. मुफ्त में माल भी खाते हैं और ऊपर से गुर्राते भी हैं.’’

‘‘दुकानें क्यों बंद कर रहे हो?’’ दुकानदार ने पूछा.

उस ने कहा, ‘‘बाजार बंद कर के जिलाधिकारी के पास जाना है. आखिर कब तक इस तरह हम लोगों का शोषण होता रहेगा? एक न एक दिन तो हमें इकट्ठे हो कर इस स्थिति का सामना करना ही होगा.

‘‘इन अफसरों की भी तो जांचपड़ताल होनी चाहिए. ये जब नौकरी पर लगते हैं तब इन के पास क्या होता है? और फिर 2-4 साल के बाद ही इन की हालत कितनी बदल जाती है. अब तुम जल्दी दुकान बंद करो. सब दुकानदार चौक में इकट्ठे हो रहे हैं. अब इन मुफ्तखोर अधिकारियों की सूची दी जाएगी. अखबार वालों को भी इन अधिकारियों के नाम बताए जाएंगे,’’ कहता हुआ वह व्यक्ति चला गया.

चंद्रमोहन को लगा मानो यह जलूस छापामार दस्ते के उस अधिकारी के विरुद्ध नहीं, स्वयं उसी के विरुद्ध जाने वाला है. वह भी तो मुफ्तखोर है. आज नहीं तो कल उस का भी जलूस निकलेगा. समाचारपत्रों में उस के नाम की भी चर्चा होगी. उसे अपमानित हो कर इस नगर से निकलना पड़ेगा. नगर की जनता अब जागरूक हो रही है. उसे अपनी यह आदत बदलनी ही पड़ेगी.

दुकानदार ने उपेक्षित स्वर में पूछा, ‘‘हां, साहब, आप फरमाइए.’’

चंद्रमोहन की हालत पतली हो रही थी. उस ने शुष्क होंठों पर जीभ फेर कर कहा, ‘‘आज नहीं, फिर कभी देख लेंगे. आज तो आप भी जल्दी में हैं.’’

‘‘ठीक है.’’ दुकानदार ने गर्वित मुसकान से चंद्रमोहन की ओर देखा और दुकान बंद करने लगा.

चंद्रमोहन दुकान से बाहर निकल कर चल दिया. उसे ग्लानि हो रही थी कि आज वह बहुत गलत समय खरीदारी करने घर से निकला.

‘बच्चू, बंद कर के जाओगे कहां? किसी और दिन सही. आखिर हमारी ताकत तो बेपनाह है,’ मन ही मन बुदबुदाते हुए उस ने कहा.

Hindi Story : डर – क्या फौज से सुरेश को डर लगता था

Hindi Story : मैं सुबह की सैर पर था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. इस समय कौन हो सकता है, मैं ने खुद से ही प्रश्न किया. देखा, यह तो अमृतसर से कौल आई है.

‘‘हैलो.’’

‘‘हैलो फूफाजी, प्रणाम, मैं सुरेश

बोल रहा हूं?’’

‘‘जीते रहो बेटा. आज कैसे याद किया?’’

‘‘पिछली बार आप आए थे न. आप ने सेना में जाने की प्रेरणा दी थी. कहा था, जिंदगी बन जाएगी. सेना को अपना कैरियर बना लो. तो फूफाजी, मैं ने अपना मन बना लिया है.’’

‘‘वैरी गुड’’

‘‘यूपीएससी ने सेना के लिए इन्वैंट्री कंट्रोल अफसरों की वेकैंसी निकाली है. कौमर्स ग्रैजुएट मांगे हैं, 50 प्रतिशत अंकों वाले भी आवेदन कर सकते हैं.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है.’’

‘‘फूफाजी, पापा तो मान गए हैं पर मम्मी नहीं मानतीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कहती हैं, फौज से डर लगता है. मैं ने उन को समझाया भी कि सिविल में पहले तो कम नंबर वाले अप्लाई ही नहीं कर सकते. अगर किसी के ज्यादा नंबर हैं भी और वह अप्लाई करता भी है तो बड़ीबड़ी डिगरी वाले भी सिलैक्ट नहीं हो पाते. आरक्षण वाले आड़े आते हैं. कम पढ़ेलिखे और अयोग्य होने पर भी सारी सरकारी नौकरियां आरक्षण वाले पा जाते हैं. जो देश की असली क्रीम है, वे विदेशी कंपनियां मोटे पैसों का लालच दे कर कैंपस से ही उठा लेती हैं. बाकियों को आरक्षण मार जाता है.’’

‘‘तुम अपनी मम्मी से मेरी बात करवाओ.’’

थोड़ी देर बाद शकुन लाइन पर आई, ‘‘पैरी पैनाजी.’’

‘‘जीती रहो,’’ वह हमेशा फोन पर मुझे पैरी पैना ही कहती है.

‘‘क्या है शकुन, जाने दो न इसे

फौज में.’’

‘‘मुझे डर लगता है.’’

‘‘किस बात से?’’

‘‘लड़ाई में मारे जाने का.’’

‘‘क्या सिविल में लोग नहीं मरते? कीड़ेमकोड़ों की तरह मर जाते हैं. लड़ाई में तो शहीद होते हैं, तिरंगे में लिपट कर आते हैं. उन को मर जाना कह कर अपमानित मत करो, शकुन. फौज में तो मैं भी था. मैं तो अभी तक जिंदा हूं. 35 वर्ष सेना में नौकरी कर के आया हूं. जिस को मरना होता है, वह मरता है. अभी परसों की बात है, हिमाचल में एक स्कूल बस खाई में गिर गई. 35 बच्चों की मौत हो गई. क्या वे फौज में थे? वे तो स्कूल से घर जा रहे थे. मौत कहीं भी किसी को भी आ सकती है. दूसरे, तुम पढ़ीलिखी हो. तुम्हें पता है, पिछली लड़ाई कब हुई थी?’’

‘‘जी, कारगिल की लड़ाई.’’

‘‘वह 1999 में हुई थी. आज 2018 है. तब से अभी तक कोई लड़ाई नहीं हुई है.’’

‘‘जी, पर जम्मूकश्मीर में हर रोज जो जवान शहीद हो रहे हैं, उन का क्या?’’

‘‘बौर्डर पर तो छिटपुट घटनाएं होती  ही रहती हैं. इस डर से कोईर् फौज में ही नहीं जाएगा. यह सोच गलत है. अगर सेना और सुरक्षाबल न हों तो रातोंरात चीन और पाकिस्तान हमारे देश को खा जाएंगे. हम सब जो आराम से चैन की नींद सोते हैं या सो रहे हैं वह सेना और सुरक्षाबलों की वजह से है, वे दिनरात अपनी ड्यूटी पर डटे रहते हैं.’’

मैं थोड़ी देर के लिए रुका. ‘‘दूसरे, सुरेश इन्वैंट्री कंट्रोल अफसर के रूप में जाएगा. इन्वैंट्री का मतलब है, स्टोर यानी ऐसे अधिकारी जो स्टोर को कंट्रोल करेंगे. वह सेना की किसी सप्लाई कोर में जाएगा. ये विभाग सेना के मजबूत अंग होते हैं, जो लड़ने वाले जवानों के लिए हर तरह का सामान उपलब्ध करवाते हैं. लड़ाई में भी ये पीछे रह कर काम करते हैं. और फिर तुम जानती हो, जन्म के साथ ही हमारी मृत्यु तक का रास्ता तय हो जाता है. जीवन उसी के अनुसार चलता है.

‘‘तो कोई डर नहीं है?

‘‘मौत से सब को डर लगता है, लेकिन इस डर से कोईर् फौज में न जाए यह एकदम गलत है. दूसरे, सुरेश के इतने नंबर नहीं हैं कि  वह हर जगह अप्लाई कर सके. कंपीटिशन इतना है कि अगर किसी को एमबीए मिल रहे हैं तो एमए पास को कोई नहीं पूछेगा. एकएक नंबर के चलते नौकरियां नहीं मिलती हैं. बीकौम 54 प्रतिशत नंबर वाले को तो बिलकुल नहीं. सुरेश अच्छी जगहों के लिए अप्लाई कर ही नहीं सकता. तुम्हें अब तक इस का अनुभव हो गया होगा शकुन, इसलिए उसे जाने दो.’’

‘‘जी, वहां नंबरों का चक्कर तो

नहीं पड़ेगा.’’

‘‘अच्छा एकेडैमिक कैरियर हर जगह देखा जाता है. परंतु सेना के अपने मापदंड हैं. उसी के अनुसार सिलैक्शन किया जाता है. वहां कोईर् आरक्षण का चक्कर नहीं होता. वहां उन को औलराउंडर चाहिए जो आत्मविश्वास से भरा हो, तुरंत निर्णय लेने की क्षमता रखता हो, दिमाग और शरीर से स्वस्थ हो. और हर तरह का काम करने में समर्थ हो. फिर वे उन को अपनी ट्रेनिंग से सेना के अनुसार ढाल लेते हैं. मेरी सुरेश से बात करवाओ. मैं उसे बताऊंगा कि कैसे करना है,’’ मैं ने कहा.

‘‘हां, जी.’’

‘‘दिल्ली के एस एन दासगुप्ता कालेज ने अमृतसर में कोचिंग ब्रांच खोली है जो आईएएस, आईपीएस, सेना में अफसर बनने के लिए इच्छुक नौजवानों को कोचिंग देता है. वह यूपीएससी की अन्य परीक्षाओं की भी तैयारी करवाता है. तुम्हें पता है, आजकल सब औनलाइन होता है. वहां चले जाओ. वे इन्वैंट्री कंट्रोल अफसर के लिए औनलाइन अप्लाई करवा देंगे. वहीं तुम्हें इस की लिखित परीक्षा के लिए कोचिंग लेनी है. अगर लिखित परीक्षा पास कर लेते हो तो वहीं इंटरव्यू की तैयारी की कोचिंग भी लेनी है. वे तुम्हें इस प्रकार तैयारी करवाएंगे कि तुम्हारे 99 प्रतिशत सफल होने के चांस रहेंगे.’’

‘‘पर फूफाजी, मेरे पास उन का पता नहीं है.’’

‘‘यार, आजकल सारी सूचनाएं गूगल पर मिल जाती हैं. गूगल पर सर्च मारो, सब पता चल जाएगा. फिर मुझे बताना कि क्या हुआ.’’

‘‘जी, फूफाजी.’’

कुछ दिनों बाद सुरेश का फोन आया, ‘‘फूफाजी, मुझे पता चल गया था. मैं ने औनलाइन अप्लाई कर दिया है. कोचिंग सैंटर ने अप्लाई और लिखित परीक्षा की तैयारी के लिए 10 हजार रुपए लिए हैं और साथ में यह गारंटी भी दी है कि लिखित परीक्षा वह अवश्य क्लीयर कर ले.’’

‘‘सुरेश, यह उन का व्यापार है. ऐसा वे सब से कहते होंगे जो उन के पास परीक्षा की तैयारी के लिए जाते हैं. यह औल इंडिया बेस की परीक्षा है. इस में सब से अधिक तुम्हारी खुद की मेहनत रंग लाएगी. तुम से अच्छे भी होंगे और खराब भी. बस, रातदिन तुम्हें मेहनत करनी है बिना यह सोचे कि तुम्हारा एकेडैमिक कैरियर कैसा था. यदि तुम ने लिखित परीक्षा पास कर ली तो समझो 50 प्रतिशत मोरचा फतेह कर लिया.’’

‘‘जी, फूफाजी. मैं ईमानदारी से मेहनत करूंगा. लो एक सैकंड पापा से बात करें.’’

‘‘नमस्कार, जीजाजी.’’

‘‘नमस्कार, कैसे हो विपिन?’’

‘‘ठीक हूं, जीजाजी. यह जो सुरेश के लिए सोचा गया है, क्या वह ठीक रहेगा.’’

‘‘बिलकुल ठीक रहेगा. अगर सुरेश सिलैक्ट हो जाता है तो उस की जिंदगी बन जाएगी. वह लैफ्टिनैंट बन कर निकलेगा. क्लास वन गैजेटेड अफसर. सेना की सारी सुविधाएं उसे प्राप्त होगी. उन सुविधाओं के प्रति आम आदमी सोच भी नहीं सकता. ट्रेनिंग के दौरान ही उसे 20 हजार रुपए भत्ता मिलेगा, रहनाखाना फ्री. पासिंगआटट के बाद इस की

55 हजार रुपए से ऊपर सैलरी होगी. वहीं साथ में कई तरह के भत्ते भी मिलेंगे. सारी उम्र न केवल आप को बल्कि पूरे परिवार के रहनेखाने की चिंता नहीं रहेगी, यानी रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता नहीं रहेगी.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, जीजाजी, बस एक ही डर है, बेमौत मारे जाने का.’’

‘‘मैं शकुन को सबकुछ समझा चुका हूं, मानता हूं, यह डर उस समय भी था जब मैं सेना में गया था. सेना की इस सेवा के दौरान मैं ने 2 लड़ाइयां भी लड़ीं. मुझे  कुछ नहीं हुआ. जिस की आई होती है, वही मरता है. मैं आप को अपने जीवन की एक घटना बताना चाहता हूं. 65 की लड़ाई में हम सियालकोट सैक्टर से पाकिस्तान में घुसे थे. सारा स्टोर 2 गाडि़यों में ले कर चल रहे थे. एक गाड़ी में मैं और मेरा ड्राइवर था. दूसरी गाड़ी में एक बंगाली लड़का और उस का ड्राइवर था. पाकिस्तान में हम आसानी से घुसते चले गए. लड़ाई हम से कोई 10 किलोमीटर आगे चल रही थी. हम लोगों को केवल हवाई हमलों का डर था और वही हुआ.

‘‘जैसे ही हम ने पाकिस्तान के चारवा गांव को क्रौस किया, हम पर हवाई हमला हुआ. गाडि़यों से निकल कर जिस को जहां जगह मिली लेट गया. मेरे बराबर में मेरा ड्राइवर और उस के बराबर में वह बंगाली लड़का लेटा था. ऊपर से गन का ब्रस्ट आया और गोलियां ड्राइवर के शरीर से इस प्रकार निकल गईं जैसे कपड़े की सिलाई की गई हो. उस ने चूं भी नहीं की. उसी वह मर गया. हम लोगों पर भी खून और मिट्टी पड़ी थी.

‘‘मैं ने आप को डराने के लिए यह घटना नहीं सुनाई है बल्कि यह बताने के लिए कि जिस की मौत आनी होती है, वही शहीद होता है और यह रिस्क हर जगह रहता है. आप यहां सिविल में भी घर से निकलो तो जिंदगी का कोई भरोसा नहीं होता. फिर भी सब अपनेअपने कामों पर घरों से निकलते हैं. इसलिए उसे जाने दो.’’

‘‘ठीक है जीजाजी, पर सुना है, सेना में वही लोग जाते हैं जो भूखे और गरीब हैं, जिन के पास सेना में जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता.’’

‘‘यह बात सही है विपिन. जिन के घरों में गरीबी है, दालरोटी के लाले पड़े हैं, अकसर वही लोग सेना में जाते हैं और जब तक यह गरीबी रहेगी, दालरोटी के लाले रहेंगे, देश को सैनिकों की कमी नहीं रहेगी.

‘‘किसी नेता या अभिनेता के बच्चे कभी सेना में नहीं जाते हैं. यहां तक कि जम्मूकश्मीर के अलगांववादी नेताओं के बच्चे भी सेना में नहीं जाते. वे भी विदेशों में पढ़ते हैं. यह देश के लिए दुख की बात है. आज की ही खबर है कि 8वीं पास सिपाही चाहिए और उस के लिए दौड़ रहे हैं डाक्टर, इंजीनियर और एमबीए. पर तुम्हें सुरेश को ले कर यह बात नहीं सोचनी है. उस का भविष्य बनने दो. कुछ देर के लिए समझ लो, तुम भी गरीब हो. इस से अधिक और मैं कुछ नहीं कह सकता.’’

‘‘ठीक है, जीजाजी. अब मैं उसे नहीं रोकूंगा.’’

मैं भूल चुका था कि सुरेश किसी परीक्षा की तैयारी कर रहा है. मुझे कुछ देर पहले ही पता चला कि उस ने परीक्षा दे दी है. उस के भी कोई 4 महीने बाद सुरेश का फोन आया कि उस ने इन्वैंट्री कंट्रोल अफसर की लिखित परीक्षा पास कर ली है. इस की  सूचना मुझे ईमेल और डाक द्वारा दी गई है. अब उसे एसएसबी क्लीयर करनी है.

‘‘बधाई हो, सुरेश, एसएसबी के लिए तुम्हें 2-3 महीने मिलेंगे. कोचिंग सैंटर में ऐडमिशन लो और तैयारी में जुट जाओ. उसे पूरा विश्वास है कि तुम एसएसबी भी क्लीयर कर लोगे.’’

‘‘जी, फूफाजी.’’

फिर 3 महीने बाद उस का फोन आया. वह बहुत खुश था. उस की आवाज में खुशी थी. ‘‘मैं ने एसएसबी क्लीयर कर ली है, फूफाजी. 25 में से 4 लड़के सिलैक्ट हुए थे. वहां भी सभी का मैडिकल हुआ था. सभी ने क्लीयर कर लिया था. अब क्या होगा, फूफाजी?’’

‘‘कुछ नहीं. मार्च में शुरू होगा

यह कोर्स.’’

‘‘जी, मार्च के पहले सोमवार से.’’

‘‘ठीक है. देश के सभी एसएसबी केंद्रों से इस कोर्स के लिए चुने गए उम्मीदवारों की लिस्ट सेना मुख्यालय को भेजी जाएगी. वह इसे कंसौलिडेट करेगा. फिर सभी को दिसंबर के पहले हफ्ते तक इस की सूचना ईमेल और डाक द्वारा दी जाएगी. उस सूचना के अनुसार जो प्रमाणपत्र और डौक्युमैंट्स उन को चाहिए होंगे उन की फोटोकौपी अटैस्ट करवा कर जिस पते पर उन्होंने भेजने के लिए लिखा होगा, उस पर भेजनी होगी. ईमेल और डाक द्वारा फिर सारे डौक्युमैंट्स चैक करने के बाद आप का मिलिटरी अस्पताल में डिटेल्ड मैडिकल होगा, इस की सूचना समय रहते आ जाएगी. एक बात बताओ सुरेश, तुम ने अभी दाढ़ीमूंछ रखी हुई है?’’

‘‘जी, फूफाजी.’’

‘‘मैं तुम्हें बता दूं, सेना के लोग, चाहे वे किसी भी विभाग के हों, मूंछें तो पसंद करते हैं परंतु दाढ़ी बिलकुल नहीं. इसलिए मैडिकल के लिए सेना अस्पताल जाओ तो मूंछें ट्रिम करवा कर जाना और दाढ़ी बिलकुल साफ होनी चाहिए. चिकना बन कर जाना. कटिंग करवा कर जाना. छोटेछोटे बाल होने चाहिए. ऊपर से ले कर नीचे तक साफसुथरा. तुम्हारे शरीर के एकएक अंग का निरीक्षण होगा. मेरे कहे अनुसार चलोगे तो मैडिकल में फेल होने के कम चांस रहेंगे. मैडिकल करने वाले डाक्टरों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा. वे समझेंगे, लड़का सच में अफसर बनने लायक है.’’

एक महीने बाद सुरेश का फोन आया. ‘‘फूफाजी, आज मैं मिलिटरी अस्पताल, अमृतसर मैडिकल के लिए जा रहा हूं. आप के कहे अनुसार चिकना बन गया हूं. वहां से आ कर मैं आप को बताऊंगा.’’

रात को उस का फोन आया, ‘‘फूफाजी, सब ठीक हो गया है. एक अलग से मैडिकल प्रमाणपत्र दिया है जो सेना मुख्यालय के अनुसार है. पूरा दिन लग गया. शाम को 6 बजे तक सारा चैकअप पूरा हुआ. फिर कहीं जा कर उन्होंने प्रमाणपत्र दिया. मैं ने सब की फोटोकौपी ले कर फाइल बना ली है. केवल बीकौम के प्रमाणपत्र अटैस्ट होने बाकी हैं. पर फूफाजी, एक दिक्कत आ रही है. सारे प्रमाणपत्र सर्विंग मिलिटरी अफसर से अटैस्ट होने हैं. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि यह कैसे होगा?’’

मैं ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, ‘‘तुम्हारे कालेज में एनसीसी है?’’

‘‘है, फूफाजी.’’

‘‘फिर क्या दिक्कत है. अपने कालेज जाओ. एनसीसी के प्रोफैसर को पकड़ो, साथ लो और एनसीसी मुख्यालय पहुंच जाओ. वहां सारे सेना के सर्विंग अफसर मिल जाएंगे. अपने साथ सारी फाइल ले जाना. तुम्हारा काम एक मिनट में हो जाएगा.’’

‘‘यह सही कहा आप ने, एनसीसी के प्रोफैसर रमाकांतजी मेरे अच्छे जानकार भी हैं.’’

‘‘ठीक है फिर, शुभकामनाएं.’’

सुरेश ने फोन बंद कर दिया. 2 दिन बाद फोन आया, ‘‘फूफाजी, सारे प्रमाणपत्र अटैस्ट हो गए हैं. अब सेना मुख्यालय में डौक्युमैंट्स भेजने हैं.’’

‘‘सारे इंस्ट्रक्शन ध्यान से पढ़ना. जिस प्रकार उन्होंने कहा है या लिखा है, उसी के अनुसार भेजना. कोई डौक्युमैंट छूटना नहीं चाहिए और सब की फोटोकौपी लेना न भूलना. वहां स्पीडपोस्ट या कूरियर से आप डौक्युमैंट्स नहीं भेज सकते हैं. आप को रजिस्टर्ड डाक से ही भेजने होंगे और एक कौपी ईमेल से. आप सेना मुख्यालय के इंस्ट्रक्शन फौलो करना.’’

‘‘जी, फूफाजी.’’

एक महीने बाद सुरेश का फोन आया, ‘‘मुझे ट्रेनिंग के लिए आईएमए देहरादून में 5 मार्च को रिपोर्ट करनी है. लिफाफे में मेरा मूवमैंट और्डर और द्वितीय श्रेणी का रेलवे वारंट है और साथ में सामान की लिस्ट है जो साथ ले कर जाना है.’’

‘‘मुबारक हो. तुम्हारी जिंदगी बन गई. सेना में अफसर बनना गर्व की बात है.’’ थोड़ा रुक कर मैं ने कहा, ‘‘रेलवे वारंट और मूवमैंट और्डर के साथ रेलवे स्टेशन पर एमसीओ, मिलिटरी मूवमैंट कंट्रोल औफिस चले जाना. एक नंबर प्लेटफौर्म पर यह औफिस है, वह मिलिटरी कोटे से तुम्हारे रिजर्वेशन का प्रबंध करेगा. बाकी रही तुम्हारी सामान साथ ले जाने वाली बात, अमृतसर कैंट में मस्कटरी की दुकानें हैं. वहां तुम्हें सारा सामान मिल जाएगा. अगर कुछ रह भी जाता है तो वह आईएमए से मिल जाएगा.’’

‘‘जी, फूफाजी. लेकिन देहरादून पहुंच कर आईएमए तक कैसे पहुंचा जाएगा?’’

‘‘सेना का कोई काम पैंडिंग नहीं होता. उन को पहले ही इस की सूचना होगी. वे सुबह शनिवार से रेलवे स्टेशन पर एमसीओ के बाहर टेबलकुरसी ले कर बैठे होंगे और साथ में लिखा होगा कि इस कोर्स के कैंडिडेट यहां रिपोर्ट करें. और यह सिलसिला रविवार शाम तक चलता रहेगा.

‘‘गाडि़यां बाहर खड़ी रहेंगी जिन में बैठा कर वह सब को आईएमए पहुंचाती रहेगी. वहां सिर्फ तुम्हारा कोर्स ही नहीं चल रहा होगा, सभी के लिए अलगअलग टेबल लगी होंगी. तुम्हें अपने मूवमैंट और्डर लिखे कोर्स नंबर की टेबल पर रिपोर्ट करनी है. फिर उन का काम है कि कैसे करना है. तुम्हें उन के अनुसार करते रहना है.’’

4 मार्च की शाम को सुरेश का फोन आया. ‘‘आज रात मैं ट्रेन से आईएमए देहरादून जा रहा हूं. एमसीओ अमृतसर ने इस का रिजर्वेशन किया था. सुबह 10 बजे तक मैं वहां पहुंच जाऊंगा. शाम को 6 बजे तक वहां रिपोर्ट करनी है. मैं तो वहां 10 बजे ही पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘कोई बात नहीं. वहां आप को सैटल होने का समय मिल जाएगा. जिस में हेयरकट से ले कर वरदी लेने तक और सोमवार को शुरू होने वाली टे्रनिंग की तैयारी में सुविधा रहेगी. ट्रेनिंग काफी सख्त रहेगी.

‘‘आईएमए विश्व का सर्वश्रेष्ठ ट्रेनिंग संस्थान है. अन्य देशों से भी अफसर यहां टे्रनिंग लेने आते हैं. सबकुछ व्यवस्थित ढंग से चलेगा. जब तुम वहां से पासआउट हो कर निकलोगे तो तुम भारतीय सशस्त्र सेना के अफसर होगे.

‘‘प्रथम श्रेणी के अफसर, जैसे आईएएस, आईपीएस अफसर होते हैं. तुम्हें लगेगा कि तुम औरों से बिलकुल अलग हो. तुम्हारे शरीर पर सेना की सुंदर वरदी होगी. दोनों कंधों पर 2-2 चमकते स्टार होंगे. हवाईजहाज या ट्रेन में प्रथम श्रेणी में सफर करोगे. तुम्हारे नाम के साथ लैफ्टिनैंट जुड़ जाएगा. तुम अपना परिचय लैफ्टिनैंट सुरेश कुमार के रूप में दोगे. उस समय जो तुम्हें गर्व महसूस होगा वह अनुभव जीवन का सर्वश्रेष्ठ अनुभव होगा. मेरी शुभकामनाएं हैं तुम्हें.’’

Hindi Story : जब मैं छोटा था

Hindi Story : केशव ने घूर कर अपने बेटे अंगद को देखा. वह सहम गया और सोचने लगा कि उस ने ऐसा क्या कह दिया जो उस के पिता को खल गया. अगर उसे कुछ चाहिए तो वह अपने पिता से नहीं मांगेगा तो और किस से मांगेगा. रानी बेटे की बात समझती है पर वह केवल उस की सिफारिश ही तो कर सकती है. निर्णय तो इस परिवार में केशव ही लेता है.

रानी ने मुसकरा कर केशव को हलकी झिड़की दी, ‘‘अब घूरना बंद करो और मुंह से कुछ बोलो.’’

केशव ने रानी को मुंह सिकोड़ कर देखा और फिर सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘क्या समय आ गया है.’’

‘‘क्यों, क्या तुम ने अपने पिता से कभी कुछ नहीं मांगा?’’ रानी ने हंस कर कहा, ‘‘बेकार में समय को दोष क्यों देते हो?’’

‘‘मांगा?’’ केशव ने तैश खा कर कहा, ‘‘मांगना तो दूर हमारा तो उन के सामने मुंह भी नहीं खुलता था. इतनी इज्जत करते थे उन की.’’

‘‘इज्जत करते थे या डरते थे?’’ रानी ने व्यंग्य से कहा.

केशव ने लापरवाही का नाटक किया, ‘‘एक ही बात है. अब हमारी औलाद हम से डरती कहां है?’’

अवसर का लाभ उठाते हुए अंगद ने शरारत से पूछा, ‘‘पिताजी, क्या आप के समय में आजकल की तरह जन्मदिन मनाया जाता था?’’

केशव ने व्यंग्य से हंस कर कहा, ‘‘जनाब, ऐसी फुजूलखर्ची के बारे में सोचना ही गुनाह था. ये तो आजकल के चोंचले हैं.’’

‘‘फिर भी पिताजी,’’ अंगद ने कहा, ‘‘कभी न कभी तो आप को जन्मदिन पर कुछ तो विशेष मिला होगा.’’

रानी ने हंसते हुए कहा, ‘‘मिला था, एक पाजामा. क्यों, ठीक है न?’’

केशव भी हंसा, ‘‘ठीक है, तुम्हें तो मेरा राज मालूम है.’’

‘‘पाजामा?’’ अंगद ने चकित हो कर पूछा, ‘‘क्या यह भी कोई उपहार है?’’

‘‘बहुत बड़ा उपहार था, बेटे,’’ केशव ने यादों में खोते हुए कहा, ‘‘पिताजी से तो बात करने का सवाल ही नहीं था. जब मैं ने मां से हठ की तो उन्होंने अपने हाथों से नया पाजामा सिल कर दिया था. मैं बहुत खुश था. रानी, तुम भी अंगद को एक पाजामा सिल

कर दो, पर…पर तुम्हें तो सिलना आता ही नहीं.’’

‘‘सारे दरजी मर गए क्या?’’ रानी ने चिढ़ कर कहा.

‘‘पाजामावाजामा नहीं,’’ अंगद ने जोर दे कर कहा, ‘‘अगर कुछ देना है तो मोपेड दीजिए. मेरे सारे दोस्तों के पास है. सब मोपेड पर ही स्कूल आते हैं. बस, एक मैं ही हूं, खटारा साइकिल वाला.’’

के शव ने तनिक नाराजगी से कहा, ‘‘साइकिल की इज्जत करना सीखो. उस ने 20 साल मेरी सेवा की है.’’

‘‘दहेज में जो मिली थी,’’ रानी ने टांग खींची.

‘‘क्या करता,’’ केशव चिढ़ कर बोला, ‘‘अगर स्कूटर मांगता तो तुम्हारे पिताजी को घर बेचना पड़ जाता.’’

‘‘अरे, जाओ भी,’’ रानी ने चोट खाए स्वर में कहा, ‘‘लेने वाले की हैसियत भी देखी जाती है.’’

अंगद ने महसूस किया कि बातों का रुख बदल रहा है इसीलिए बीच में पड़ कर बोला, ‘‘आप लोग तो

फिर लड़ने लगे. मेरे लिए मोपेड लेंगे या नहीं?’’

‘‘बरखुरदार,’’ केशव ने फिर से घूरते हुए कहा, ‘‘जब हम तुम्हारे बराबर थे तो पैदल स्कूल जाते थे. स्कूल भी कोई पास नहीं था. पूरे 3 मील दूर था. उन दिनों घर में बिजली भी नहीं थी इसलिए सड़क के किनारे लैंपपोस्ट के नीचे बैठ कर पढ़ते थे. जेबखर्च के पैसे भी नहीं मिलते थे. दिन भर कुछ नहीं खाते थे. घर आ कर 5 बजे तक रात का खाना निबट जाता था. समझे जनाब? आप मोपेड की बात करते हैं.’’

रानी इस भाषण को कई बार सुनसुन कर उकता चुकी थी इसलिए ताना मार कर बोली, ‘‘तो यह है आप की सफलता का रहस्य. देखो बेटे, ऐसा करोगे तो पिताजी की तरह एक दिन किसी कारखाने के महाप्रबंधक बन जाओगे.’’

अंगद मूर्खों की तरह मांबाप को देख रहा था. उस के मन में विद्रोह की आग सुलग रही थी. बड़ी बहन मानिनी जब भी कुछ मांगती थी तो उसे तुरंत मिल जाता था. एक वही है इस घर में दलित वर्ग का शोषित प्राणी.

नाश्ता समाप्त होने पर केशव कार्यालय जाने की तैयारी में लग गया और नौकरानी के आ जाने से रानी घर की सफाई कराने में व्यस्त हो गई. अंगद कब स्कूल चला गया किसी को पता ही नहीं चला.

कार निकालते समय केशव ने रोज के मुकाबले कुछ फर्क महसूस किया, पर समझ नहीं पाया. बहुत दूर निकल जाने पर उसे ध्यान आया कि आज अंगद की साइकिल अपनी जगह पर ही खड़ी थी. वैसे अकसर साइकिल खराब होने पर अंगद साइकिल घर छोड़ कर बस से चला जाता था.

घर का काम निबट जाने के बाद रानी ने देखा कि अंगद का लंच बाक्स मेज पर ही पड़ा था. वैसे आमतौर पर वह लंच बाक्स ले जाना भूलता नहीं है क्योंकि रानी हमेशा बेटे का मनपसंद खाना ही रखती थी. खैर, कोई बात नहीं, अंगद की जेब में इतने रुपए तो होते ही हैं कि वह कुछ ले कर खा ले.

शाम को रानी को च्ंिता हुई क्योंकि अंगद हमेशा 3 बजे तक घर आ जाता था, पर आज 5 बज रहे थे. केशव के फोन से वह जान चुकी थी कि आज अंगद साइकिल भी नहीं ले गया था, पर बस से भी इतनी देर नहीं लगती. उस वक्त 6 बज रहे थे जब अंगद ने घर में प्रवेश किया. उस का चेहरा लाल हो रहा था और जूते धूलधूसरित हो गए थे. थकान के लक्षण भी स्पष्ट थे.

‘‘इतनी देर कहां लगा दी?’’ रानी ने बस्ता संभालते हुए पूछा.

‘‘बस, हो गई देर, मां,’’ अंगद ने टालते हुए कहा, ‘‘जल्दी से खाना दो. बहुत भूख लगी है.’’

‘‘खाना क्यों नहीं ले गया?’’ रानी ने शिकायत की.

‘‘भूल गया था,’’ अंगद का झूठ पता चल रहा था.

‘‘भूल गया या ले नहीं गया?’’ रानी ने तनिक क्रोध से पूछा.

‘‘कहा न, भूल गया,’’ अंगद चिढ़ कर बोला.

रानी ने अधिक जोर नहीं दिया. बोली, ‘‘जा, जल्दी से कपड़े बदल और हाथमुंह धो कर आ. आलू के परांठे और गाजर का हलवा बना है.’’

अंगद के चेहरे पर झलकती प्रसन्नता से रानी को संतोष हुआ. उसे लगा कि वह वाकई बहुत भूखा है. अंगद के आने से पहले ही उस ने खाना मेज पर लगा दिया था.

अंगद ने भरपेट खाया. कुछ देर तक टीवी देखा और फिर पढ़ाई करने अपने कमरे में चला गया.

8 बजे केशव कार्यालय से आया.

आराम से बैठने के बाद केशव ने रानी से पूछा, ‘‘बच्चे कहां हैं? बहुत शांति है घर में.’’

‘‘मन्नू तो शालू के यहां गई है,’’ रानी ने सामने बैठते हुए कहा, ‘‘कोई पार्टी है. देर से आएगी.’’

‘‘अकेली आएगी क्या?’’ केशव ने चिंता से पूछा.

‘‘नहीं,’’ रानी ने उत्तर दिया, ‘‘शालू का भाई छोड़ने आएगा.’’

‘‘उफ, ये बच्चे,’’ केशव ने अप्रसन्नता से कहा, ‘‘इतनी आजादी भी ठीक नहीं. जब मैं छोटा था तो बहन को तो छोड़ो, मुझे भी देर से आने नहीं दिया जाता था. आगे से ध्यान रखना. वैसे मन्नू कब तक आएगी?’’

‘‘अब क्यों च्ंिता करते हो,’’ रानी ने कहा, पर केशव की मुद्रा देख कर बोली, ‘‘ठीक है, फोन कर के पूछ लूंगी.’’

‘‘और साहबजादे कहां हैं?’’ केशव ने पूछा.

‘‘पढ़ रहा है,’’ रानी ने उत्तर दिया.

‘‘पर मुझे तो कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही,’’ केशव ने पुकारा, ‘‘अंगद…अंगद?’’

‘‘ओ हो, पढ़ने दो न,’’ रानी ने झिड़का, ‘‘कल परीक्षा है उस की.’’

‘‘तो जवाब नहीं देगा क्या?’’ केशव ने क्रोध से पुकारा, ‘‘अंगद?’’

अंगद का उत्तर नहीं आया. केशव अब अधिक सब्र नहीं कर सका. उठ कर अंगद के कमरे की ओर गया और झटके से अंदर घुसा.

‘‘यहां तो है नहीं,’’ केशव ने क्रोध से कहा.

‘‘नहीं है,’’ रानी को विश्वास नहीं हुआ, ‘‘थोड़ी देर पहले ही तो मैं उस के मांगने पर चाय देने गई थी.’’

केशव ने व्यंग्य से कहा, ‘‘हां, चाय का प्याला तो है, पर जनाब नहीं हैं. गया कहां?’’

‘‘मुझ से तो कुछ कह कर नहीं गया,’’ रानी ने च्ंिता से कहा, ‘‘मन्नू के कमरे में देखो.’’

‘‘मन्नू के कमरे में भी होता तो जवाब देता न,’’ केशव ने क्रोध से कहा, ‘‘बहरा तो नहीं है.’’

रानी ने तसल्ली के लिए मन्नू के कमरे में  देखा और बोली, ‘‘पता नहीं कहां गया. शायद अखिल के यहां चला गया होगा. उस के साथ ही पढ़ता है न.’’

‘‘कह कर तो जाना था,’’ केशव भी अब च्ंितित था, ‘‘अखिल का घर कहां है?’’

‘‘वह राममनोहरजी का लड़का है,’’ रानी ने कहा, ‘‘309 नंबर में रहता है.’’

‘‘ओह,’’ केशव ने कहा, ‘‘उन के यहां तो फोन भी नहीं है.’’

‘‘थोड़ी देर देख लो,’’ रानी ने अपनी चिंता छिपाते हुए कहा, ‘‘आ जाएगा.’’

‘‘और मन्नू…’’

केशव का वाक्य समाप्त होेने से पहले ही रानी ने चिढ़ कर कहा, ‘‘अब मन्नू के पीछे पड़ गए. कभी तो चैन से बैठा करो.’’

झिड़की खा कर केशव कुरसी पर बैठ कर पत्रिका पढ़ने का नाटक करने लगा.

‘‘खाना लगाऊं क्या?’’ रानी ने कुछ देर बाद पूछा.

‘‘नहीं,’’ केशव ने कहा, ‘‘बच्चों को आने दो.’’

‘‘मन्नू तो खा कर आएगी,’’ रानी ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘अंगद बाद में खा लेगा. स्कूल से आ कर कुछ ज्यादा ही खा लिया था.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘2 की जगह पूरे 4 परांठे खा लिए,’’ रानी ने मुसकरा कर कहा, ‘‘उसे आलू के परांठे अच्छे लगते हैं न.’’

कुछ और समय बीतने पर केशव उठ खड़ा हुआ, ‘‘मैं राममनोहरजी के घर हो कर आता हूं.’’

उसी समय घंटी बजी और मानिनी ने प्रवेश किया. वह बहुत प्रसन्न थी.

‘‘शालू की पार्टी में बहुत मजा आया,’’ मानिनी ने हंसते हुए पूछा, ‘‘यह अंगद सड़क के किनारे क्यों बैठा है? क्या आप ने सजा दी है?’’

‘‘सड़क के किनारे?’’ केशव और रानी ने एकसाथ पूछा, ‘‘कहां?’’

‘‘साधना स्टोर के सामने,’’ मानिनी ने उत्तर दिया, ‘‘क्या मैं उसे बुला कर ले आऊं?’’

इस से पहले कि रानी कुछ कहती केशव ने गंभीरता से कहा, ‘‘नहीं, रहने दो. शायद पढ़ रहा होगा.’’

‘‘क्या घर में बिजली नहीं है?’’ मानिनी ने पूछा, पर फिर ध्यान आया कि बिजली तो है.

रानी ने खाना लगा दिया. केशव हाथ धो कर बैठने ही वाला था कि अंगद ने आहिस्ताआहिस्ता घर में प्रवेश किया.

केशव ने घूरते हुए पूछा, ‘‘इतनी दूर पढ़ने क्यों गए थे?’’

‘‘क्योंकि पास में कोई लैंपपोस्ट नहीं था,’’ अंगद ने मासूमियत से कहा.

केशव को हंसी भी आई और क्रोध भी. रानी भी हंस कर रह गई.

‘‘चलो, खाने के लिए बैठो,’’ रानी ने कहा.

‘‘स्कूल से आते ही खा तो लिया था,’’ अंगद ने कहा और अपने कमरे में चला गया.

केशव और रानी को अंगद का व्यवहार अब समझ में आ रहा था. लगता था कि नाटक की शुरुआत है.

मानिनी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. उस ने पूछा, ‘‘बात क्या है? आज अंगद के तेवर क्यों बिगड़े हुए हैं?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ रानी हंसी, ‘‘शीत- युद्ध है.’’

‘‘क्यों?’’ मानिनी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मोपेड चाहिए जनाब को,’’ केशव ने कहा, ‘‘हमारे जमाने में…’’

‘‘ओ हो, पिताजी,’’ मानिनी ने चिढ़ कर कहा, ‘‘अब मैं समझ गई. न आप कभी बदलेंगे, न आप का जमाना. ठीक है, मैं चंदा इकट्ठा करती हूं.’’

एक मानिनी ही थी जो केशव से बेझिझक हो कर बात कर सकती थी.

केशव ने उसे घूर कर देखा और फिर उठ कर चला गया.

सुबह की चाय हो चुकी थी. जब नाश्ता लगा तो अंगद जा चुका था.

उस की साइकिल पर धूल जम गई थी और हवा भी निकल गई थी.

शाम को थकामांदा अंगद 6 बजे आया.

‘‘क्यों, बस नहीं मिली क्या?’’ रानी ने क्रोध से पूछा.

‘‘बसें तो आतीजाती रहती हैं.’’

‘‘तो फिर?’’ रानी ने पूछा.

‘‘तो फिर क्या? मुझे भूख लगी है. खाना तो मिलेगा न?’’

रानी को अब क्रोध नहीं आया. जानती थी कि वह भूखा होगा. उस के लिए खीर, पूडि़यां और गोभी की

सब्जी बनाई थी. अंगद ने प्रसन्न हो कर भरपेट खाया और कमरे में चला गया.

केशव जब आया तब अंगद घर में नहीं था. आते वक्त केशव ने लैंपपोस्ट के नीचे निगाह डाली थी. अंगद धुंधली रोशनी में आंखें गड़ाए पढ़ रहा था.

3 दिन तक यह नाटक चलता रहा.

आज अंगद का जन्मदिन था. हर साल इस दिन रौनक छा जाती थी. पार्टी में आने वाले मित्रों की सूची बनती थी. लजीज व्यंजन बनाए जाते थे. मानिनी कुछ दिन पहले ही से उसे छेड़ने लगती थी और इस छेड़छाड़ में लड़ाई भी हो जाती थी. वैसे अंगद को इस बात का बहुत मलाल रहता था कि मानिनी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता है.

नींद खुलते ही अंगद की नजर पास पड़े लिफाफे पर पड़ी. लिफाफे को उठाते ही उस में से एक चाबी गिरी. चाबी से लटका एक छोटा सा कार्ड था. उस पर लिखा था, ‘जन्मदिन पर छोटा सा उपहार.’

अंगद की आंखों में चमक आ गई. यह तो मोपेड की चाबी थी. आधी रात को वह एक चिट्ठी खाने की मेज पर छोड़ कर आया जिस में लिखा था :

पूज्य पिताजी और मां, क्या आप मुझे क्षमा करेंगे? मोपेड के लिए हठ करना मेरी भूल थी. मुझे सिवा आप के आशीर्वाद और प्यार के कुछ नहीं चाहिए.

आप का पुत्र अंगद.

जब अंगद नीचे पहुंचा तो पत्र मां के हाथ में था और वह पढ़ कर सुना रही थीं. केशव और मानिनी हंस रहे थे.

‘‘पिताजी, आप ने भी जल्दी कर दी. बेकार में मोपेड की चपत पड़ी,’’ मानिनी हंस कर कह रही थी.

अंगद सिर झुकाए शर्मिंदा सा खड़ा था.

‘‘तो आप को मोपेड नहीं चाहिए,’’ केशव ने नकली गंभीरता से पूछा.

‘‘नहीं,’’ अंगद ने दृढ़ता से उत्तर दिया.

‘‘क्यों?’’ केशव ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘क्योंकि,’’ अंगद ने गंभीरता से शरारती अंदाज में कहा, ‘‘अब मुझे स्कूटर चाहिए.’’

‘‘क्या?’’ केशव ने मारने के अंदाज में हाथ उठाते हुए पूछा, ‘‘क्या कहा?’’

मानिनी ने बीच में आते हुए कहा, ‘‘पिताजी, छोडि़ए भी. हमारा अंगद अब छोटा नहीं है.’’

‘‘पर जब मैं छोटा था…’’

होहल्ले में केशव अपना वाक्य पूरा न कर सका.

Hindi Story : ईर्ष्या – क्या था उस लिफाफे में

Hindi Story : निशा को डाक्टर ने जब यह बताया कि पेट में ट्यूमर है तथा आपरेशन कराना बेहद जरूरी है वरना वह कैंसर भी बन सकता है तो पति आयुष के साथ वह भी काफी घबरा गई थी. सारी चिंता बच्चों को ले कर थी. वरुण और प्रज्ञा काफी छोटे थे, उस की इस बीमारी का लंबे समय तक चलने वाला इलाज तो उस के पूरे घर को अस्तव्यस्त कर देगा.

सच पूछिए तो जब यह महसूस होता है कि हम अपाहिज होने जा रहे हैं या हमें दूसरों की दया पर जीना है तो मन बहुत ही कुंठित हो उठता है.

परिवार में सास, ननद, देवर, जेठ सभी थे पर एकाकी परिवारों में सब के सामने उस जैसी ही समस्या उपस्थित थी. कौन अपना घरपरिवार छोड़ कर इतने दिनों तक उस के घर को संभालेगा?

अपने आपरेशन से भी अधिक निशा को अपने घरसंसार की चिंता सता रही थी. यह भी अटल सत्य है कि पैर चाहे चिता में रखे हों पर जब तक सांस है तब तक व्यक्ति सांसारिक चिंताओं से मुक्त नहीं हो पाता.

आसपड़ोस के अलावा निशा ने अखबार में भी विज्ञापन देखने शुरू कर दिए तथा ‘आवश्यकता है एक काम वाली की’ नामक विज्ञापन अपना पता देते हुए प्रकाशित भी करवा दिया. विज्ञापन दिए अभी हफ्ता भी नहीं बीता था कि एक 21-22 साल की युवती घर का पता पूछतेपूछते आई. उस ने अपना परिचय देते हुए काम पर रखने की पेशकश की थी और अपने विषय में कुछ इस प्रकार बयां किया था :

‘‘मेरा नाम प्रेमलता है. मैं बी.ए. पास हूं. 3 साल पहले मेरा विवाह हुआ था पर पिछले साल मेरा पति एक दुर्घटना में मारा गया. संतान भी नहीं है. ससुराल वालों ने मुझे मनहूस समझ कर घर से निकाल दिया है. परिवार में अन्य कोई न होने के कारण मुझे भाई के पास रहना पड़ रहा है पर भाभी अब मेरी उपस्थिति सह नहीं पा रही है…वहां तिलतिल कर मरने की अपेक्षा मैं कहीं काम करना चाह रही हूं…1-2 स्कूलों में पढ़ाने के लिए अरजी भी दी है पर बात बनी नहीं, अब जब तक कोई अन्य काम नहीं मिल जाता, यही काम कर के देख लूं सोच कर चली आई हूं… भाई के घर नहीं जाना चाहती…काम के साथ रहने के लिए घर का एक कोना भी दे दें तो मैं चुपचाप पड़ी रहूंगी.’’

उस की साफगोई निशा को बहुत पसंद आई. उस ने कुछ भी नहीं छिपाया था. रुकरुक कर खुद ही सारी बातें कह डाली थीं. निशा को भी जरूरत थी तथा देखने में भी वह साफसुथरी और सलीकेदार लग रही थी. अत: उस की शर्तों पर निशा ने हां कर दी.

निशा को जब महसूस हुआ कि अब इस के हाथों घर सौंप कर आपरेशन करवा सकती हूं तब उस ने आपरेशन की तारीख ले ली.

नियत तिथि पर आपरेशन हुआ और सफल भी रहा. सभी नातेरिश्तेदार आए और सलाहमशवरा दे कर चले गए. प्रेमलता ने सबकुछ इतनी अच्छी तरह से संभाल लिया था कि किसी को उस ने जरा भी शिकायत का मौका नहीं दिया. जातेजाते सब उस की तारीफ ही करते गए. फिर भी कुछ ने यह कह कर नाराजगी जाहिर की कि ऐसे समय में भी तुम ने हमें अपना नहीं समझा बल्कि हम से ज्यादा एक अजनबी पर भरोसा किया.

वैसे भी आदरयुक्त, प्रिय और आत्मीय संबंध तो आपसी व्यवहार पर आधारित रहते हैं पर परिवार में सब से बड़ी होने के नाते किसी को भी खुद के लिए कष्ट उठाते देखना निशा के स्वभाव के विपरीत था अत: अपनी तीमारदारी के लिए किसी को भी बुला कर परेशान करना उसे उचित नहीं लगा था पर वे ऐसी शिकायत करेंगे, उसे आशा नहीं थी. शायद कमियां निकालना ही ऐसे लोगों की आदत रही हो.

ऐसी शिकायत करने वाले यह भूल गए थे कि ऐसी स्थिति आने पर क्या वह सचमुच अपना घर छोड़ कर महीने भर तक उस के घर को संभाल पाते…जबकि डाक्टरों के मुताबिक उसे 6 महीने तक भारी सामान नहीं उठाना था क्योंकि गर्भाशय में संक्रमण के कारण ट्यूमर के साथ गर्भाशय को भी निकालना पड़ गया था. ऐसे वक्त में लोगों की शिकायत सुन कर एकाएक ऐसा लगा कि वास्तव में रिश्तों में दूरी आती जा रही है, लोग करने की अपेक्षा दिखावा ज्यादा करने लगे हैं.

सच, आज की दुनिया में कथनी और करनी में बहुत अंतर आ गया है…कार्य व्यस्तता या दूरी के कारण संबंधों में भी दूरी आई है…इस में कोई संदेह नहीं है…उन के व्यवहार से मन खट्टा हो गया था.

प्रेमलता की उचित देखभाल ने निशा को घर के प्रति निश्ंिचत कर दिया था. वरुण और प्रज्ञा भी उस से हिल गए थे. शाम को उस को पार्क में घुमाने के साथ उन का होमवर्क भी वह पूरा करा दिया करती थी.

जाने क्यों निशा प्रेमलता के प्रति बेहद अपनत्व महसूस करने लगी थी… आयुष के आफिस जाने के बाद वह साए की तरह उस के आगेपीछे घूमती रहती, उस की हर आवश्यकता का खयाल रखती. एक दिन बातोंबातों में प्रेमलता बोली, ‘‘दीदी, आप के पास रह कर लगता ही नहीं है कि मैं आप के यहां नौकरी कर रही हूं. सास और भाई के घर मैं इस से ज्यादा काम करती थी पर फिर भी उन्हें मैं बोझ ही लगती थी…दीदी, वे मेरा दर्द क्यों नहीं समझ पाए, आखिर पति के मरने के बाद मैं जाती तो जाती कहां? सास तो मुझे हर वक्त इस तरह कोसती रहती थी मानो उस के बेटे की मौत का कारण मैं ही हूं. दुख तो इस बात का था कि एक औरत हो कर भी वह औरत के दुख को क्यों नहीं समझ पाई?’’

आंखों में आंसू भर आए थे…रिश्तों में आती संवेदनहीनता ने प्रेमलता को तोड़ कर रख दिया था…यहां आ कर उसे सुकून मिला था, खुशी मिली थी अत: उस की पुरानी चंचलता लौट आई थी. शरीर भी भराभरा हो गया था. निशा भी खुश थी, चलो, जरूरत के समय उसे अच्छी काम वाली के साथसाथ एक सखी भी मिल गई है.

बीचबीच में प्रेमलता का भाई उस की खोजखबर लेने आ जाया करता था. बहन को अपने साथ न रख पाने का उस को बेहद दुख था पर पत्नी के तेज स्वभाव के चलते वह मजबूर था. यहां बहन को सुरक्षित हाथों में पा कर वह निश्चिंत हो चला था. प्रेमलता का पति जो बैंक में नौकर था, उस के फंड पर अपना हक जमाने के लिए ससुराल के लोग उसे घर से बेदखल कर उस पैसे पर अपना हक जमाना चाहते थे. भाई उसे उस का हक दिलाने की कोशिश कर रहा था. भाई का अपनी बहन से लगाव देख कर ऐसा लगता था कि रिश्ते टूट अवश्य रहे हैं पर अभी भी कुछ रिश्तों में कशिश बाकी है वरना वह बहन के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटता.

प्रेमलता को इतनी ही खुशी थी कि भाभी नहीं तो कम से कम उस का अपना भाई तो उस के दुख को समझता है. कोई तो है जिस के कारण वह जीवन की ओर मुड़ पाई है वरना पति की मौत के बाद उस के जीवन में कुछ नहीं बचा था और ऊपर से ससुराल वालों की प्रताड़ना से बेहद टूटी प्रेमलता आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगी थी.

उस का दुख सुन कर मन भर आता था. सच, आज भी हमारा समाज विधवा के दुख को नहीं समझ पाया है, जिस पति के जाने से औरत का साजशृंगार ही छिन गया हो, भला उस की मौत के लिए औरत को दोषी ठहराना मानसिक दिवालिएपन का द्योतक नहीं तो और क्या है? सब से ज्यादा दुख तो उसे तब होता था जब स्त्री को ही स्त्री पर अत्याचार करते देखती.

एक दिन रात में निशा की आंख खुली, बगल में आयुष को न पा कर कमरे से बाहर आई तो प्रेमलता का फुस- फुसाता स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘नहीं साहब, मैं दीदी का विश्वास नहीं तोड़ सकती.’’

सुन कर निशा की सांस रुक गई. समझ गई कि आयुष की क्या मांग होगी.

वितृष्णा से भर उठी थी निशा. मन हुआ, मर्द की बेवफाई पर चीखेचिल्लाए पर मुंह से आवाज नहीं निकल पाई. लगा, चक्कर आ जाएगा. उस ने वहीं बैठना चाहा, तो पास में रखा स्टूल गिर गया. आवाज सुन कर आयुष आ गए. उसे नीचे बैठा देख बोले, ‘‘तुम यहां कैसे? अगर कुछ जरूरत थी तो मुझ से कहा होता.’’

निशब्द उसे बैठा देख कर आयुष को लगा कि शायद निशा पानी पीने उठी होगी और चक्कर आने पर बैठ गई होगी. वह भी ऐसे आदमी से उस समय क्या तर्कवितर्क करती जिस ने उस के सारे वजूद को मिटाते हुए अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए दूसरी औरत से सौदा करना चाहा.

दूसरे दिन आयुष तो सहज थे पर प्रेमलता असहज लगी. बच्चों और आयुष के जाने के बाद वह निशा के पास आ कर बैठ गई. जहां और दिन उस के पास बातों का अंबार रहता था, आज शांत और खामोश थी…न ही आज उस ने टीवी खोलने की फरमाइश की और न ही खाने की.

‘‘क्या बात है, सब ठीक तो है न?’’ उस का हृदय टटोलते हुए निशा ने पूछा.

‘‘दीदी, कल बहुत डर लगा, अगर आप को बुरा न लगे तो कल से मैं वरुण और प्रज्ञा के पास सो जाया करूं,’’ आंखों में आंसू भर कर उस ने पूछा था.

‘‘ठीक है.’’

निशा के यह कहने पर उस के चेहरे पर संतोष झलक आया था. निशा जानती थी कि वह किस से डरी है. आखिर, एक औरत के मन की बातों को दूसरी औरत नहीं समझेगी तो और कौन समझेगा? पर वह सचाई बता कर उस के मन में आयुष के लिए घृणा या अविश्वास पैदा नहीं करना चाहती थी, इसलिए कुछ कहा तो नहीं पर अपने लिए सुरक्षित स्थान अवश्य मांग लिया था.

आयुष के व्यवहार ने यह साबित कर दिया था कि पुरुष के लिए तो हर स्त्री सिर्फ देह ही है, उसे अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए सिर्फ देह ही चाहिए…इस से कोई मतलब नहीं कि वह देह किस की है.

अब निशा को खुद ही प्रेमलता से डर लगने लगा था. कहीं आयुष की हवस और प्रेमलता की देह उस का घरसंसार न उजाड़ दे. प्रेमलता कब तक आयुष के आग्रह को ठुकरा पाएगी…उसे अपनी बेबसी पर पहले कभी भी उतना क्रोध नहीं आया जितना आज आ रहा था.

प्रेमलता भी तो कम बेबस नहीं थी. वह चाहती तो कल ही समर्पण कर देती पर उस ने ऐसा नहीं किया और आज उस ने अपनी निर्दोषता साबित करने के लिए अपने लिए सुरक्षित ठिकाने की मांग की.

प्रश्न अनेक थे पर निशा को कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था. दोष दे भी तो किसे, आयुष को या प्रेमलता की देह को. मन में ऊहापोह था. सोच रही थी कि यह तो समस्या का अस्थायी समाधान है, विकट समस्या तो तब पैदा होगी जब आयुष बच्चों के साथ प्रेमलता को सोता देख कर तिलमिलाएंगे या चोरी पकड़ी जाने के डर से कुंठित हो खुद से आंखें चुराने लगेंगे. दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं.

निशा ने सोचा कि आयुष के आने पर प्रेमलता के सोने की व्यवस्था बच्चों के कमरे में रहने की बात कह वह उन के मन की थाह लेने की कोशिश करेगी. पुरुष के कदम थोड़ी देर के लिए भले ही भटक जाएं पर अगर पत्नी थोड़ा समझदारी से काम ले तो यह भटकन दूर हो सकती है. अभी तो उसे पूरी तरह से स्वस्थ होने में महीना भर और लगेगा. उसे अभी भी प्रेमलता की जरूरत है पर कल की घटना ने उसे विचलित कर दिया था.

आयुष आए तो मौका देख कर निशा ने खुद ही प्रेमलता के सोने की व्यवस्था बच्चों के कमरे में करने की बात की तो पहले तो वह चौंके पर फिर सहज स्वर में बोले, ‘‘ठीक ही किया. कल शायद वह डर गई थी. उस के चीखने की आवाज सुन कर मैं उस के पास गया, उसे शांत करवा ही रहा था कि स्टूल गिर जाने की आवाज सुनी. आ कर देखा तो पाया कि तुम चक्कर खा कर गिर पड़ी हो.’’

आयुष के चेहरे पर तनिक भी क्षोभ या ग्लानि नहीं थी. तो क्या प्रेमलता सचमुच डर गई थी या जो उस ने सुना वह गलत था. अगर उस ने जो सुना वह गलत था तो प्रेमलता की चीख उसे क्यों नहीं सुनाई पड़ी. खैर, जो भी हो जिस तरह से आयुष ने सफाई दी थी, उस से हो सकता है कि वह खुद भी शर्मिंदा हों.

प्रेमलता अब यथासंभव आयुष के सामने पड़ने से बचने लगी थी. अब निशा स्वयं आयुष के खानेपीने, नाश्ते का खयाल रखने की कोशिश करती.

अभी महीना भर ही बीता होगा कि प्रेमलता का भाई आया और एक लिफाफा उस को पकड़ाते हुए बोला, ‘‘तू ने जहां नौकरी के लिए आवेदन किया था वहां से इंटरव्यू के लिए काल लेटर आया है. जा कर साक्षात्कार दे आना पर आजकल बिना सिफारिश के कुछ नहीं हो पाता. नौकरी मिल जाए तो अच्छा ही है, कम से कम तुझे किसी का मुंह तो नहीं देखना पड़ेगा.’’

एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका के पद के लिए इंटरव्यू काल थी. निशा ने जब काल लेटर पढ़ा तो याद आया कि इसी ग्रुप के एक स्कूल में उस की मित्र शोभना की भाभी प्रधानाचार्या हैं. निशा ने उन से बात की. नौकरी मिल गई. अगले सत्र से उसे काम करना था. डेढ़ महीना और बाकी था.

प्रेमलता की निशा को ऐसी आदत पड़ गई थी कि अब उस के बिना वह कैसे सबकुछ कर पाएगी, यह सोचसोच कर वह परेशान होने लगी थी. इस अजनबी लड़की ने उस के दुख और परेशानी के क्षणों में साथ दिया है. उस की जगह अगर कोई और होता तो भावावेश में उस का घरसंसार ही बिखेर देता…खासकर तब जब गृहस्वामी विशेष रुचि लेता प्रतीत हो. पर उस ने ऐसा न कर के न केवल अपने अच्छे चरित्र की झलक दिखाई थी बल्कि उस की गृहस्थी को टूटनेबिखरने से बचा लिया था.

स्कूल का सेशन शुरू हो गया था. घर न मिल पाने के कारण प्रेमलता उस के घर से ही आनाजाना कर रही थी. स्कूल जाने से पहले वह नाश्ता और खाना बना कर जाती थी तथा शाम का खाना भी वही आ कर बनाती. लगता ही नहीं था कि वह इस परिवार की सदस्य नहीं है…पर अब प्रेमलता को जाना ही है, सोच कर निशा भी धीरेधीरे घर का काम करने की कोशिश करने लगी थी.

‘‘दीदी, स्कूल के पास ही घर मिल गया है. अगर आप इजाजत दें तो मैं वहां रहने के लिए चली जाऊं,’’ एक दिन प्रेमलता स्कूल से आ कर बोली.

‘‘ठीक है, जैसा तुम उचित समझो. अब तो मैं काफी ठीक हो गई हूं. धीरेधीरे सब करने लगूंगी.’’

वरुण को पता चला तो वह बहुत उदास हो कर बोला, ‘‘आंटी, आप यहीं रह जाओ न. आप गणित पढ़ाती थीं तो बहुत अच्छा लगता था.’’

‘‘दीदी, आप चली जाओगी तो मुझे आलू के परांठे कौन बना कर खिलाएगा… आप जैसे परांठे तो ममा भी नहीं बना पातीं,’’ प्रज्ञा ने आग्रह करते हुए कहा.

‘‘कोई बात नहीं, बेबी, मैं दूर थोड़े ही जा रही हूं, हर इतवार को मैं मिलने आऊंगी, तब आप को आप का मनपसंद आलू का परांठा बना कर खिला दिया करूंगी,’’ प्रेमलता ने प्यार से प्रज्ञा को गोदी में उठाते हुए कहा.

निशा ने भी प्रेमलता को सदा नौकरानी से ज्यादा मित्र समझा था पर वरुण और प्रज्ञा का उस से इतना भावात्मक लगाव उस के अहम को हिला गया. अचानक उसे लगा कि इस लड़की ने कुछ ही दिनों में उस से उस की जगह छीन ली है…वह जगह जो उस ने 10 वर्षों में बनाई थी, इस ने केवल 5 महीनों में ही बना ली. बच्चे भी अब उस के बजाय प्रेमलता से ही अपनी फरमाइशें करते और वह भी हंसतेहंसते उन की हर फरमाइश पूरी करती, चाहे वह खाना हो, पढ़ना हो या बाहर पार्क में उस के साथ जाना.

‘‘क्या प्रेमलता घर छोड़ कर जा रही है?’’ शाम को चाय पीतेपीते आयुष ने पूछा था.

‘‘हां, कोई परेशानी?’’ निशा ने एक तीखी नजर से उन्हें देखा.

‘‘मुझे क्या परेशानी होगी. बस, ऐसे ही पूछ लिया था. कुछ दिन और रुक जाती तो तुम्हें थोड़ा और आराम मिल जाता,’’ निशा की तीखी नजर से अपनी आंखें चुराते हुए आयुष ने जल्दीजल्दी कहा.

पहले तो निशा सोच रही थी कि प्रेमलता से कुछ दिन और रुकने का आग्रह वह करेगी पर आयुष और बच्चों की सोच ने उसे कुंठित कर दिया. अब उसे वह एक पल भी नहीं रोकेगी. कल जाती हो तो आज ही चली जाए. जिस की वजह से उस की अपनी गृहस्थी पराई हो चली है, भला उसे अपने घर में वह क्यों शरण दे?

ईर्ष्यारूपी अजगर ने उसे बुरी तरह जकड़ लिया था. जब वह उस से विदा मांगने आई तब कोई उपहार देना तो दूर उस से इतना भी नहीं कहा गया कि छुट्टी के दिन चली आया करना जबकि बच्चों को रोते देख प्रेमलता खुद ही कह रही थी, ‘‘रोओ मत, मैं कहीं दूर थोड़े ही जा रही हूं, जब मौका मिलेगा तब मिलने आ जाया करूंगी.’’

जहां कुछ समय पहले तक निशा स्वयं आपसी रिश्तों में आती संवेदनहीनता के लिए दूसरों को दोषी ठहरा रही थी, आज वह स्वयं ईर्ष्या के कारण उसी जमात में शामिल हो गई थी. तभी तो उस अजनबी लड़की के अपार प्रेम के बावजूद, उस का प्रतिदान देने में कंजूसी कर गई थी.

Hindi Story : एक समाजसेवा ऐसी भी

Hindi Story : आज मेरा बीएससी के पहले साल के इम्तिहान का नतीजा आया था. सभी छात्र पिछले 2 महीने से इस पल का इंतजार कर रहे थे. जैसा सब को यकीन था कि सुषमा क्लास में अव्वल रहेगी, नतीजा वैसा ही था. सुषमा का नाम पहले नंबर पर था. लेकिन दूसरे नंबर का नाम उतना ही ज्यादा चौंकाने वाला और उम्मीद के उलट था.

यह नाम था जय का. जय ने अपने 3 साथियों के साथ, जो पिछले 2 सालों से पहले साल में ही फेल हो रहे थे, अपनी इमेज इस तरह की बना ली थी कि कालेज की कोई भी लड़की, चाहे वह सीनियर हो या क्लासमेट, उन का नाम सुन कर ही घबरा जाती थीं. कालेज में आने के बावजूद जय और उस के वे साथी कभी भी क्लास अटैंड नहीं करते थे. हां, इतना जरूर था, प्रैक्टिकल की क्लास वे कभी मिस नहीं करते थे.

वैसे, इस बार जय के तीनों साथी भी पास हो गए थे, पर वे सभी ज्यादा नंबर नहीं लाए थे.

जय का इस तरह दूसरा नंबर पाना किसी के भी गले नहीं उतर पा रहा था, जबकि हकीकत यह थी कि जय ने इस के लिए खूब मेहनत की थी.

जय के पिता पास के किसी गांव में रेवैन्यू अफसर थे और वे चाहते थे कि जय को पढ़ाई के लिए बढि़या माहौल मिले जो उस के भविष्य के लिए अच्छा हो. इसी वजह से जय घरपरिवार से अलग रह कर इस छोटे से शहर में पढ़ाई कर रहा था.

जय के घर से आते समय पिता ने उसे कड़े शब्दों में चेतावनी दे रखी थी कि अगर इम्तिहान में अच्छे नंबर नहीं आए तो उसे गांव में रह कर पढ़ाई करनी होगी.

जय ने अपना दैनिक कार्यक्रम इस तरह बनाया हुआ था कि वह रात में 12 बजे से 3 बजे तक एकांत में ईमानदारी से पढ़ाई करता था. यही वजह थी कि वह दिनभर आवारागर्दी करने के बाद इतने अच्छे नंबरों से पास हो गया था.

चूंकि यह बात सभी छात्रों को मालूम नहीं थी, इसी वजह से न सिर्फ क्लासमेट बल्कि टीचिंग स्टाफ भी यही मान रहा था कि या तो जय का कोई रिश्तेदार यूनिवर्सिटी में रसूख वाले पद पर है जिस ने उसे फायदा पहुंचाया है या उस ने जम कर नकल की है. जय भी इन बातों से अनजान नहीं था, पर उस ने कभी इन बातों पर बवाल नहीं किया था.

रिजल्ट अच्छा आया तो जय के ग्रुप की शरारतें भी बढ़ गईं. अब तो किसी भी लड़की पर फब्तियां कसना, घर तक पीछा करना, साइकिल की हवा निकाल देना, गाडि़यों के सीट कवर फाड़ देना जैसे काम उन के खास शगल बन गए थे. किसी साधारण छात्र का मामला होता तो प्रिंसिपल तुरंत अपना फैसला सुना देते, पर यहां जय जैसे एक पोजीशन होल्डर का भी नाम जुड़ा हुआ था, इसलिए वे मामले की तह तक जाना चाहते थे.

प्रिंसिपल साहब ने जय समेत चारों छात्रों को मिलने का फरमान जारी कर दिया. जैसी उम्मीद थी चारों में से कोई भी मिलने नहीं पहुंचा. कड़े शब्दों के साथ दोबारा फरमान जारी हुआ. इस बार न आने की दशा में घर पर सूचना भेजने की बात लिखी गई थी.

जय के बाकी तीनों साथी तो तय समय पर प्रिंसिपल के औफिस पहुंच गए, पर जय फिर भी नहीं पहुंचा. तीनों को भविष्य में शरारत न करने की चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया.

जय के न आने पर प्रिंसिपल साहब ने खुद तफतीश करने का फैसला लिया.

टाइम टेबल के मुताबिक उस समय जय की जंतु विज्ञान की कक्षा चल रही थी. प्रिंसिपल साहब ने देखा कि वह पूरी तल्लीनता से अपने मैटीरियल की पहचान कर के अच्छी ड्राइंग के साथ अपनी कौपी पर उतार रहा था, जबकि ज्यादातर छात्र या तो अपने किसी साथी से या अपने टीचर से पूछ रहे थे.

प्रिंसिपल साहब ने उसे डिस्टर्ब करना मुनासिब नहीं समझा. वे वहीं लैबोरेटरी में बैठ कर कक्षा खत्म होने का इंतजार करने लगे. जब सभी छात्र बाहर जाने लगे तो प्रिंसिपल साहब ने जय को वहीं रोक लिया.

बाहर निकले सभी लोगों में एक ही चर्चा थी कि अब जय को कालेज से बाहर कर दिया जाएगा. लड़कियां खासतौर पर खुश थीं.

‘‘जय, मुझे अपनी प्रैक्टिकल कौपी दिखाओ,’’ प्रिंसिपल साहब कुछ कड़े व गंभीर लहजे में बोले.

‘‘लीजिए सर,’’ जय कौपी बढ़ाते हुए बोला.

चूंकि प्रिंसिपल साहब खुद भी इसी विषय को पढ़ चुके थे, इसलिए उन्हें समझने में जरा भी परेशानी नहीं हुई. उलटे जय की साफसुथरी ड्राइंग और खुद के बनाए नोट्स ने उन को काफी प्रभावित किया. कौपी समय पर चैक भी कराई हुई थी.

यह देख कर प्रिंसिपल साहब खुश भी हो गए, क्योंकि इस तरह के ज्यादातर छात्र साल के आखिर में अपना काम खानापूरी के लिए ही चैक कराते हैं.

‘‘2-2 नोटिस देने के बाद भी तुम मिलने नहीं आए. इस का मतलब समझते हो? तुम अपनेआप को बड़ा तीसमारखां समझते हो? जानते हो, तुम्हारे इस काम के लिए तुम्हें कालेज से निकाला भी जा सकता है,’’ प्रिंसिपल साहब सपाट लहजे में बोले.

‘‘जी, मैं जानता हूं कि मैं ने आप के और्डर को नहीं माना. लेकिन उस के पीछे वजह सिर्फ इतनी थी कि मैं आप को अपनी असलियत का परिचय देना चाहता था,’’ जय नरम लहजे में बोला.

‘‘असलियत? कैसी असलियत?’’ प्रिंसिपल साहब ने हैरानी से जय की तरफ देखते हुए पूछा.

‘‘सर, हर साल जन्मदिन पर पिताजी मुझे कुछ न कुछ उपहार देते आए हैं. पिछले साल मेरा 18वां जन्मदिन था. मैं कालेज में एडमिशन लेने की तैयारी कर रहा था. तब पिताजी ने मुझे समझाया और बताया था कि अब मेरा बचपना खत्म हो चुका है और मुझे गंभीरता से अपने और समाज के बारे में सोचना चाहिए.

‘‘मैं तो हमेशा से ही अच्छा छात्र रहा हूं. इसी वजह से उन्हें मेरे भविष्य की चिंता ज्यादा नहीं थी. पर वे चाहते थे कि मैं समाज के लिए कुछ ठोस काम करूं. ज्यादा नहीं तो कम से कम किसी एक इनसान को तो खुशहाल जिंदगी दे सकूं.

‘‘पिताजी की इस इच्छा को मैं ने व्रत के रूप में लिया और इन 3 साथियों को, जो पिछले 2 सालों से फर्स्ट ईयर में फेल हो रहे थे, को एक मिशन के रूप में लिया. जाहिर है कि परिवार के साथ रह कर मैं अपने मिशन में कामयाब नहीं हो सकता था, इसीलिए घर से दूर कमरा ले कर यहां रहता हूं. एक दिन में मैं इन की आदतें नहीं बदल सकता था, इसीलिए इन्हीं के रंग में रंग कर इन्हें सुधारने की कोशिशें शुरू कर दीं.

‘‘मैं ने कुछ कहावतों को अपने मिशन का आधार बनाया, जैसे अगर नाले की सफाई करनी हो तो गंदगी में उतरना ही पड़ता है या लोहे को लोहा काटता है. नतीजा आप के सामने है.

‘‘सर, जो 3 लोग पिछले 2 सालों से फेल हो रहे थे, इस बार संतोषजनक ढंग से पास हो गए हैं. उन लोगों जैसा बनने के लिए मुझे थ्योरी की क्लासें छोड़नी पड़ती हैं. उन तीनों को यह बात मालूम नहीं है कि मैं इस तरह के किसी मिशन पर हूं.

‘‘जहां तक लड़कियों को छेड़ने या परेशान करने की बात है तो 2 साल पहले तक ये तीनों किसी भी लड़की का दुपट्टा खींच कर भाग जाने, पैन से स्याही छिड़क कर उन के कपड़े खराब करने या धक्कामुक्की करने जैसे काम कर के खुश होते थे, पर अब धीरेधीरे उन लोगों के स्वभाव में बदलाव आ रहा है. अब उन की आदतें कमैंट्स पास करने तक ही सिमट गई हैं और मुझे यकीन है कि कालेज से पास आउट होने पर वे भी दूसरे छात्रों की तरह इज्जत के साथ ही जाएंगे. तीनों की अच्छी नौकरी लग जाने तक मेरा काम पूरा नहीं होगा इसलिए इन तीनों का साथ मैं कतई नहीं छोड़ सकता.’’

प्रिंसिपल साहब और उन के साथ बैठे टीचरों में से किसी को भी इस तरह के जवाब की उम्मीद नहीं थी.

‘‘बहुत अच्छा जय…’’ प्रिंसिपल साहब खड़े हो कर उस का कंधा थपथपाते हुए बोले, ‘‘मुझे अपने रिटायर होने के बाद भी इस बात का गर्व रहेगा कि मैं एक ऐसे कालेज का प्रिंसिपल था जहां तालीम न सिर्फ अच्छा आदमी बनने को कहती थी, बल्कि अच्छे आदमी के जरीए अच्छा इनसान भी बनाती थी.

‘‘मैं तुम्हें और तुम्हारे पूरे ग्रुप को शुभकामनाएं देता हूं. मुझे भविष्य के नतीजे जानने की उत्सुकता रहेगी.’’

साथ बैठे दोनों टीचरों ने भी सहमति और सम्मान में सिर हिलाया.

आज तकरीबन 6 साल बाद जय प्रिंसिपल साहब के घर जा रहा था. वैसे, प्रिंसिपल साहब बीचबीच में बुला कर जय से रिपोर्ट लेते रहते थे. पर पिछले 4 सालों से मतलब रिटायरमैंट के बाद से उन का कोई संपर्क नहीं था.

डोरबैल बजाने पर प्रिंसिपल साहब ने ही दरवाजा खोला.

‘‘सर, मैं जय,’’ कहते हुए उस ने झुक कर प्रिंसिपल साहब के पैर छू लिए.

‘‘अरे, तुम्हें परिचय देने की क्या जरूरत है. क्या मैं तुम्हें पहचानता नहीं. और सुनाओ, कैसे आना हुआ? और तुम्हारा मिशन कितना कामयाब हुआ?’’ प्रिंसिपल साहब ने अपनेपन से आशीर्वाद देते हुए पूछा.

‘‘सर, आप के आशीर्वाद से मैं अपने मिशन में पूरी तरह से कामयाब रहा हूं. उन तीनों में से जो शारीरिक गठन में सब से अच्छा था, उसे वन विभाग में सहायक वन विस्तार अधिकारी के पद पर नौकरी मिल गई है. दूसरा शिक्षा विभाग में मिडिल स्कूल में टीचर बन गया है और तीसरे ने प्रधानमंत्री रोजगार योजना में कर्ज ले कर एक छोटी सी फैक्टरी खोल ली है और अब कुछ लोगों को रोजगार भी दे रहा है.

‘‘मैं ने खुद एमएससी अव्वल नंबर से पास की है. राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा व साक्षात्कार पास करने के बाद आज मेरा चयन डिप्टी कलक्टर के रूप में हो गया है, इसीलिए मैं आप का आशीर्वाद लेने आया हूं.’’

जिंदगीभर लैक्चर देने वाले प्रिंसिपल साहब के पास आज शब्दों का अकाल पड़ गया था. वे सिर्फ गर्व के साथ जय के सिर पर हाथ फेर रहे थे.

Hindi Story : चुनाव प्रचार

Hindi Story : पसीने में लथपथ शंकर खेतों में काम कर रहा था कि अचानक उस का 12 साल का बेटा अनबू भागता हुआ आया.

सांस फूलने की वजह से अनबू की आवाज ठीक से नहीं निकल रही थी, फिर भी वह जैसेतैसे बोला, ‘‘बापू, उधर बड़ी सड़क से बहुत सारे शहरी लोग आ रहे हैं. उन के साथ एक जीप में कुछ नेता भी बैठे हैं.’’

शंकर ने पसीना पोंछते हुए कहा, ‘‘फिर से चुनाव आ गए क्या? अभी पिछले साल ही तो ये लोग पूरे गांव में चक्कर काट कर गए थे. इतनी जल्दी सरकार बनी भी और गिर भी गई?’’

अनबू ने कहा, ‘‘बापू, मंदिर के पास बड़ा सा पंडाल भी लगा है. वहां लोग जमा हो रहे हैं. लगता है कि इस बार पहले से भी बड़ा जलसा होने वाला है.’’

‘‘ठीक है, तू जल्दी जा और अपने पांचों भाईबहनों को खबर कर दे और अपनी अम्मां को बोल दे कि रात का खाना न बनाए. पिछली बार भाषण के बाद पूरियां मिली थीं तो रात का खाना बरबाद हो गया था. तुम सब भाषण वाली जगह पर मत रहना, वहीं खड़े रहना जहां पूरियां बन रही हों.’’

अनबू के जाने के बाद शंकर ने सामान समेटा और पिछले चुनाव में मिली विलायती शराब की खुशबू को महसूस करता हुआ घर की ओर तेजी से चल पड़ा. इस बार उस ने तगड़ा हाथ मारने की सोच ली थी, क्योंकि पिछली बार वह थोड़ा पीछे रह गया था.

शाम को पूरी तैयारी कर के शंकर अपने बच्चों के साथ मंदिर के पास जा पहुंचा, लेकिन हलवाइयों के लिए बनवाई गई जगह सूनी पड़ी थी. पान की दुकान की वह अधखुली खिड़की, जिस से पिछली बार मुफ्त में विलायती शराब बंटी थी, इस बार पूरी तरह बंद थी. अपनी उम्मीदों पर यों पानी फिरता देख कर शंकर जलभुन उठा.

‘‘कौन आ गया इस बार मुफ्त का वोट मांगने? इस बार तो उस की जमानत जब्त हो जाएगी. कभीकभार ही तो यह एक मौका आता?है, जब नेताओं की दुम हमारे पैरों के नीचे दबती है. मुफ्त की मलाई खाने के चक्कर में ही तो सरकार इतनी जल्दीजल्दी गिरती है,’’ बड़बड़ाता हुआ शंकर वापस लौट रहा था कि चौपाल पर सरपंच समेत कई गांव वालों को बैठा देख कर ठिठक गया.

बच्चों को घर भेज कर शंकर धीरे से कोने में जा कर बैठ गया. वहां पर पिछले चुनाव प्रचार की ही बातें हो रही थीं.

सरपंच बोला, ‘‘पिछली बार क्या जबरदस्त चुनाव प्रचार हुआ था. 2 दिनों तक गांव में किसी के यहां चूल्हा नहीं जला. प्लास्टिक की थैलियों वाली देशी दारू पीने वालों ने पहली बार मुफ्त में विलायती शराब का स्वाद चखा था.

और तो और रामपुर से भाड़े पर 3 बाईजी बुलवाई गई थीं और 3 रातों तक छुटभैए नेताओं के भाषणों के बाद उन बाइयों का जबरदस्त नाचगाना हुआ था. इलाके के कुत्तेबिल्लियों तक के नसीब चमक गए थे.

‘‘तुम्हें मालूम है गांव वालो, हमारा गांव जिस विधानसभा इलाके में आता है, वह बहुत अहम है. अम्मां का उम्मीदवार यहां से हमेशा हार जाता था, तभी तो पिछली बार अम्मां ने अपना सब से तगड़ा उम्मीदवार यहां से खड़ा किया था.

‘‘अम्मां ने चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. हर जगह खुद जा कर सभाएं की थीं. अपने किए पापों के लिए बारबार माफी मांगी थी. यहां तक कहा था कि घोटालों में आज तक जमा की हुई रकम वे जनता की भलाई के कामों में खर्च करेंगी.

‘‘भाषण देने के लिए उन को चंदर नेताजी के साथ यहां भी आना पड़ा था. अपना गांव पिछड़ा है तो क्या हुआ, उन्हें यहां से हजारों वोट मिले. खुली जीप को छोड़ कर वह पैदल ही गांव की गलियों में घूमी थीं.

‘‘चुनाव में उन्होंने हर घर का दरवाजा खटखटाया था और ‘बहनजी’, ‘भाई साहब’ कह कर वोट मांगे थे.’’

‘‘यह और बात थी कि गांव की दुलारी ने अपनी बेटी पर पड़ी चंदर नेताजी की बुरी नजर फौरन भांप ली थी और उसे घर के अंदर भेज दिया था,’’ सरपंच के एक साथी ने कहा.

‘‘बड़े मैदान में भाषण का कार्यक्रम रखा गया था. बड़ीबड़ी बातें सुन कर हम लोग बेहद खुश हुए थे. यह अलग बात है कि उन में से ज्यादातर बातें हमारी समझ में नहीं आई थीं,’’ एक किसान ने कहा.

‘‘अम्मां ने क्या जोरदार भाषण दिया था. बारबार कहा था कि सरकार अपनी आंखों पर काला चश्मा पहने है, जिस से उसे गरीब जनता के दुखदर्द नहीं दिखते. उन्हें कई झूठे मुकदमों में फंसा दिया गया, ताकि उन की इमेज खराब हो जाए और चुनाव हार जाएं.

‘‘आखिर किया क्या था उन्होंने? अपनी पसंद की 10-12 हजार साडि़यां रखना कोई गुनाह तो नहीं है? कौन से कानून में लिखा है कि औरत अपने पहनने के लिए एक हजार जोड़ी सैंडलें नहीं रख सकती. अब उन का अपना परिवार तो है नहीं, तो फिर वह जमा भी करेंगी तो किस के लिए? सबकुछ जनता का ही तो है,’’ सरपंच ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘अम्मां के दिल को छू लेने वाले भाषण के बाद चंदर नेताजी कैसे शेर की तरह गरजे थे. वे बारबार बोलते थे, ‘विकास लाना है, विकास लाना है.’

‘‘भैया, हमें तो बस इतना ही समझ आया कि शायद वह अपने बेटे विकास को जेल से बाहर लाने की बात कर रहे हैं, जो पिछले साल से चपरासी की बेटी से बलात्कार के इलजाम में जेल में बंद है. मुझे तो पूरी उम्मीद थी कि इस साल वह विकास को ले कर ही आने वाले थे,’’ एक बूढ़े ने कहा.

‘‘भाषण के बीच में ही चंदर नेताजी ने पोपट के 4 साल के बेटे को गोद में उठा लिया था. अब बेचारे नेताजी को क्या मालूम था कि वह बच्चा 4 दिनों से सर्दीजुकाम से परेशान था और इतनी भीड़ में छोटी उंगली ऊंची किए ‘सूसू’ करने की जगह ढूंढ़ रहा था.

‘‘नेताजी के चमचों ने जब उसे जबरदस्ती पकड़ कर उन के हवाले किया था तो वह छूटने के लिए हाथपैर मार रहा था. छूटने के चक्कर में ही उस ने नेताजी की कीमती जैकेट से अपनी नाक भी पोंछ ली थी.

‘‘उधर नेताजी ने गरज कर कहा कि यह है देश का भावी कर्णधार. यही अपनी लगन से सूखी धरती को सींचेगा और अकाल को दूर करेगा. तभी बच्चे ने नेताजी के कपड़ों की सिंचाई कर दी थी,’’ सरपंच के उसी साथी ने कहा.

‘‘बेचारे चंदर नेताजी बाद में अम्मां से बोल रहे थे कि उन्होंने आज तक अपने बच्चों को गोद में पेशाब नहीं करने दिया और आज कुरसी के लिए क्याक्या करना पड़ रहा है,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘लेकिन सरपंच चाचा, पिछली बार अम्मां ने ये जो इतने सारे रुपए चुनाव प्रचार पर खर्च किए, उन के पास

कहां से आए और उन्होंने हम पर क्यों खर्च किए?’’ शंकर ने हैरानी भरे लहजे में पूछा.

‘‘अरे शंकर, तू तो बुद्धू ही रह गया. अब तक तू क्या सोचता है कि चुनाव के प्रचार में नेता अपने घर से पैसा लगाते हैं? ये हम से ही टैक्स के रूप में पैसा ले कर चुनाव का प्रचार करते हैं यानी हमारा ही पैसा हम पर खर्च होता है तो इस में बुरा क्या है?

‘‘तू ने सुना नहीं था क्या, जब अम्मां ने कहा था कि दुनिया में आज तक उन के जैसा ईमानदार कोई दूसरा पैदा नहीं हुआ जो भ्रष्टाचार की सारी कमाई जनता की भलाई में खर्च करने जा रहा हो.

‘‘मंच पर उन की ऐक्टिंग ने साबित कर दिया कि फिल्मों के बाद राजनीति में आना उन के लिए कितना फायदे का सौदा रहा. वैसे, अगर वह फिल्मों में ही रहतीं तो खड़ूस सास के रोल में खूब जमतीं.’’

‘‘लेकिन चाचा, जब चंदर नेताजी चुनाव जीत ही गए थे तो इस बार यह दूसरे नेताजी कहां से आ गए?’’ भीड़ में से किसी नौजवान ने पूछा.

‘‘पता नहीं भैया, अम्मां ने चंदर नेताजी को इस बार दिल्ली क्यों भेज दिया? चंदर नेताजी ने इसे ही चुनाव के प्रचार से राज्यसभा की सीट ले ली और अपना इलाका खाली हो गया.

‘‘चंदर नेताजी के लिए कहा गया कि उन का पूरे देश में इतना असर है कि वे कहीं से भी चुनाव जीत सकते हैं. इस बार पता नहीं कौन सा गोबरगणेश हमारे माथे मढ़ दिया. कहा जाता है कि वे तो सज्जन और ईमानदार हैं,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘अरे बाप रे, इतनी सारी खराबियां एकसाथ. कोई उसे समझाता क्यों नहीं कि सज्जनों की पीढ़ी राजा हरिश्चंद्र के साथ ही खत्म हो गई थी. इस कलयुग में ईमानदार कहना तो गाली देने के जैसा है. यह तो पक्का हारेगा.

‘‘अरे, अगर सज्जन लोग ही चुनाव जीत सकते तो आजादी के बाद गांधीजी ही न लड़ लिए होते चुनाव. अब तो भाई कर्मयोगियों का जमाना है. इस हाथ दे, उस हाथ ले,’’ सरपंच के एक साथी ने कहा.

‘‘लेकिन चाचा, लोग तो कहते हैं कि यह नेता भाषण अच्छा देता है और मौका मिले तो काम करने में भी पीछे नहीं हटता.

‘‘ईमानदारी और सचाई की ऐसी मिसाल है कि गलत काम करने पर किसी को नहीं छोड़ता. इस के परिवार वाले भी इस के साथ बस 3 कमरों के पुश्तैनी मकान में रहते हैं. यह आज तक कोई अच्छा सा घर तक नहीं खरीद पाया,’’ शंकर ने कहा.

‘‘वही तो समझा रहा हूं, मैं तुम सब को. सोचो, जो भला अपने परिवार वालों के काम न आ सका, वह हमारे काम क्या आएगा? जो अपने घर का भला न कर सका, वह देश का भला कैसे करेगा?’’ सरपंच ने माथे पर बल देते हुए कहा.

‘‘यह नेता शरीफ भी है. नेता होने के बावजूद इस के खिलाफ थाने में कोई केस दर्ज नहीं है. कोई हत्या या बलात्कार का इलजाम नहीं है. किसी से ऊंची आवाज में बात तक नहीं करता,’’ सरपंच का साथी बोला.

‘‘ऐसा कैसे चलेगा? हमें तो ऐसे रणबांकुरे चाहिए, जो विधानसभा में हंगामा कर सकें. हमारी बात कहने के लिए घूंसे खाएं, तो लात मारें भी. जरूरत पड़ने पर कुरसी को ढाल और माइक को तलवार बना सकें. इस के अलावा जूतेचप्पल फेंकने में भी उस का निशाना पक्का होना चाहिए. इस पिद्दी के शोरबे की बात वहां सुनेगा कौन?’’ सरपंच ने अपनी बात रखी.

‘‘सही कहते हो भैया, जो आदमी सरकार नहीं गिरा सकता, वह भ्रष्टाचार को कैसे गिराएगा? जो दल नहीं बदल सकता, वह देश की हालत कैसे बदलेगा? नेताओं को जिताने वाला कोई भी गुण इस के अंदर नहीं है.

‘‘अरे, जो पशुओं का चारा नहीं चर सकता, उसे तो उस के साथी ही चर जाएंगे,’’ सरपंच के साथी ने हां में हां मिलाई.

‘‘तो भाइयो, यह तय रहा कि हम लोग इस नेता की सभाओं का ही नहीं, बल्कि हर काम का बौयकौट करेंगे. मुफ्त का वोट लेने की इस की साजिश को बेनकाब कर देंगे, इस के विरोध में जो चश्मे वाले नेताजी का उम्मीदवार खड़ा है, उस ने वादा किया है कि जीतने के बाद दारू की 2 भट्ठियां खुलवा देगा. इस से बड़ा तरक्की का काम और क्या हो सकता है.

‘‘इस के अलावा वह अपनी जाति का भी है. याद रहे, अपनी जाति वाला कभी न कभी तो काम आएगा ही. दूसरों पर भरोसा ठीक नहीं. फिर मिलेंगे सब लोग बूथ पर. सब लोग इस मुफ्त के

नेता के खिलाफ वोट देंगे और अम्मां को भी हम से धोखा करने का सबक सिखा देंगे.

‘‘भाइयो, हमारा मकसद बस इतना ही होना चाहिए कि दूध चाहे किसी का गरम हो रहा हो, ऊपर की मलाई कम से कम हमारे हिस्से में तो आनी चाहिए. अब चलो सब अपनेअपने घर,’’ सरपंच ने बात खत्म करते हुए कहा.

खो गई जीनत : अम्मी और अब्बू में किसी हुई जीत

अम्मी और अब्बू की सिर्फ तसवीर ही देखी थी जीनत ने. उन का प्यार कैसा होता है, इस का उसे कोई अहसास ही नहीं था.

अम्मी और अब्बू के एक सड़क हादसे में मारे जाने के बाद मामी और मामू ही जीनत का सहारा थे.

मामू ने जीनत को पढ़ायालिखाया और इस लायक बनाया कि बड़ी हो कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और मामू का सहारा बने.

मामू की माली हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. एक कमरे के मकान के बाहर मामू ने एक छोटा सा खोखा रख रखा था. वे उस में बिसातखाने का सामान रख कर बेचते थे.

जो औरतें सामान खरीदने आ भी जातीं, वे मामू से इतना मोलभाव करतीं कि किसी चीज पर मिलने वाला मुनाफा कम हो जाता और वैसे भी मामू को बाहर की औरतों से बहुत लगाव महसूस होता था और वे चाहते थे कि औरतें उन के खोखे पर

आ कर मामू से बातें करती ही रहें. उन की इसी कमजोरी का फायदा चालाक औरतें खूब उठाती थीं. वे मामू से खूब रसीली बातें करतीं और सामान सस्ते में खरीद लेतीं.

घर में 5 लोग थे. मामू, मामी, उन के 2 बच्चे और एक जीनत. इन सब का खर्च चलाने की जिम्मेदारी जीनत के कंधों पर ही थी, इसीलिए वह शहर के ही एक स्कूल में कंप्यूटर पढ़ाने का काम करने लगी थी.

जीनत के मामू जितने लापरवाह किस्म के थे, मामी उतनी ही सख्त थीं.

‘‘मैं तो कहती हूं कि घर में अगर लड़की हो तो उस पर एक नजर टेढ़ी ही रखनी चाहिए और घर की अंदरूनी बातों में लड़की जात को ज्यादा शामिल नहीं करना चाहिए,’’ मामी ने पड़ोस में रहने वाली शकीला से कहा और शकीला ने भी हां में हां मिलाई.

‘‘हां… सही कहा आप ने और इसीलिए मैं ने अपनी बेटी सलमा का स्कूल जाना बंद करवा दिया है. अब 8वीं जमात तो पास हो ही गई है, आगे की पढ़ाई के लिए लड़कों वाले स्कूल में भेजना पड़ेगा और हम ने तो सुना है

कि वहां लड़का और लड़की एकसाथ बैठते हैं.’’

मामी की इसी सख्ती का नतीजा था कि जीनत ने अपनेआप को बहुत संभाल रखा था और हमेशा ही डरीसहमी सी रहती थी.

इस सहमेपन के साथ जीतेजीते जीनत 30 साल की हो गई थी और अभी तक कुंआरी थी. ऐसा नहीं था कि उस के लिए शादी के पैगाम नहीं आए, पर भला मामू उस की शादी करा देता तो घर के लिए पैसे कौन लाता.

मामूमामी की सोच यही थी कि जीनत इसी घर में ही रहे और पैसे लाती रहे.

मामू और मामी के दोनों बेटे भी अब जवान हो चले थे. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को भरपूर सम?ाते हुए कुछ पैसे जोड़े, कुछ पैसा बैंक से लोन लिया और अपने अब्बा की बिसातखाने की दुकान को अब एक बढि़या मेकअप  सैंटर में तबदील कर दिया था.

जीनत भी मेहनत से स्कूल में अपनी ड्यूटी पूरी करती और घर आ कर मामी के साथ रसोईघर में मदद करती.

जीनत ने अपनी जवान होती भावनाओं को अच्छी तरह से काबू कर रखा था, पर फिर भी जवानी में किसी की तरफ ?ाकाव होना बड़ा ही लाजिमी होता है और जीनत भी कोई अलग नहीं थी.

‘‘अरे जीनत मैडम… मैं ने एक शायरी लिखी है… जरा इस पर गौर तो फरमाइएगा,’’ जीनत के साथ ही स्कूल में पढ़ाने वाले एक साथी टीचर आफताब ने कहा.

‘‘अजी, आप की शायरी का क्या सुनना… वह तो हमेशा की तरह अच्छी ही होती हैं… हां, अगर आप फिर भी अपनी और तारीफ सुनना चाहते हैं तो सुना सकते हैं.’’

‘‘किसी आशिक के कलेजे को जलाया होगा, तब जा कर खुदा ने सूरज को बनाया होगा.’’

‘‘अरे वाह… क्या बात है… बहुत ही उम्दा… लगता है, सूरज से कुछ ज्यादा ही प्यार है आप को और तभी तो आप ने तखल्लुस भी सूरज ही रखा है.’’

‘‘जी, बिलकुल सही कहा आप ने, इसीलिए मेरा नाम तो आफताब भले ही है, पर मैं चाहता हूं कि अब लोग मुझे सूरज के नाम से ही पुकारें,’’ आफताब ने कहा.

‘‘हां जी… ऐसी बात है तो मैं

आप को सूरज के नाम से ही बुलाऊंगी,’’ जीनत ने कहा.

2 जवां दिलों के बीच प्यार को पनपने के लिए कुछ खास की जरूरत नहीं होती, बस थोड़ा सा अपनापन का पानी, खूबसूरती की खाद और प्यार के फल आने लगते हैं.

आफताब एक सीधासादा लड़का था, जो जिंदगी से जूझ रहा था, फिर भी हमेशा मुसकराता रहता और अपनी जिंदगी के गम को शायरी में कह कर उड़ा दिया करता था. पर माली हालत की बात करें तो आफताब जीनत से तो बेहतर ही था.

इस बार नए साल पर आफताब ने जीनत को एक मोबाइल फोन गिफ्ट कर दिया. जीनत ने बहुत नानुकर की, पर आफताब ने ऐसी दलील दी कि उसे चुप हो जाना पड़ा.

‘‘देखिए मैडम, यह मैं आप को इसलिए गिफ्ट कर रहा हूं, ताकि मैं आप को ह्वाट्सएप पर अपने शेर भेज सकूं और आप उस की अच्छाइयां और कमियां मुझे बताएं, जिस से मुझे और बेहतर शायर बनने में मदद मिल सकेगी. क्या अब भी आप यह मोबाइल नहीं लेंगी?’’

‘‘ठीक है, ठीक है… ले लेती हूं… पर जब मैं अपने घर पर रहूंगी, तब आप फोन नहीं करेंगे… हां, मैसेज में बात जरूर कर सकते हैं.’’

‘‘ठीक है जीनतजी.’’

जीनत और आफताब को एकदूसरे का साथ अच्छा लग रहा था और दोनों ही अपनी आगे की जिंदगी एकदूसरे के साथ गुजरने की बात सोच रहे थे, पर हमेशा ही इनसान का सोचा हुआ कहां होता है?

इतनी जिंदगी गुजरने के बाद एक बात तो जीनत मन ही मन जान चुकी थी कि मामू और मामी उस की शादी जानबूझ कर नहीं करना चाहते और वे लोग यही चाहते हैं कि जीनत उन के लिए बस ऐसे ही पैसे कमाती रहे और वे लोग आराम से मजे करते रहें, इसलिए जीनत इस बाबत मामी से खुद ही बात करने की सोचने लगी.

एक रात को आफताब ने कुछ शायरियां लिख कर जीनत के मोबाइल पर भेजीं और पूछा कि कोई सुधार की गुंजाइश हो तो बताए.

जीनत ने सारी शायरियां पढ़ीं और उन का जवाब भी आफताब को लिख दिया और सो गई. सुबह उठी तो स्कूल के लिए देर हो रही थी, इसलिए जल्दी में जीनत मोबाइल अपने बिस्तर पर ही भूल गई.

‘‘चलो फिर मैं आज तुम्हें घर तक छोड़ देता हूं,’’ अपनी बाइक की तरफ इशारा करता हुआ आफताब बोला.

जीनत पहले तो हिचकिचाई, क्योंकि गली के नुक्कड़ पर ही तो मामू की दुकान है. बहुत मुमकिन है कि घर के लोग आफताब के साथ उसे देख लें.

‘देख लें तो देख लें, मैं कोई चोरी तो नहीं कर रही. और फिर आज तो मुझे वैसे भी आफताब के बारे में बात करनी ही है,’ ऐसा सोच कर जीनत ने बाइक पर जाने के लिए हां कर दी और आफताब के साथ बैठ कर चल दी.

जीनत कुछ देर बाद घर के सामने पहुंचने वाली थी. उस ने आफताब को उसे वहीं उतार देने को कहा और वह घर तक पैदल ही चली गई.

घर में अंदर का नजारा ही अलग था. मामू, उन का बेटा असलम और मामी एकसाथ बैठे हुए थे. वे जीनत को घूर रहे थे.

‘‘अरे जीनत बेटी… बहुत थक गई होगी,’’ मामू ने कहा.

‘‘हां… मामू… स्कूल में काम ही इतना होता है, थोड़ीबहुत थकान आना तो लाजिमी ही है,’’ जीनत ने कहा.

जीनत का इतना कहना ही था कि मामी बिफर उठीं, ‘‘हां… हां थकान तो आएगी ही, जब देर रात तक किसी दूसरे लड़के से चक्कर चलाया जाएगा.’’

जीनत को तुरंत ही याद आया कि आज वह अपना मोबाइल घर में ही भूल गई थी और इसीलिए मामी ऐसा बोल रही हैं.

‘‘वह मामी, मैं आप से बात करने ही वाली थी… आज,’’ जीनत हकला गई.

‘‘अरे, तू क्या बात करेगी… तू तो चक्कर चला रही है. और वह भी किसी गैरधर्म के लड़के के साथ…’’

‘‘अरे नहीं मामी… वह तो आफताब…’’

‘‘बता कौन है यह सूरज… जो तुझे से अपनी मुहब्बत का इजहार शेरोशायरी से कर रहा है? और जिस का जवाब भी तू खूब वाहवाह कर के दे रही है…

‘‘अरे, मैं कह रही हूं कि हमारी जात में कोई लड़के नहीं रह गए थे, क्या जो तू किसी हिंदू लड़के से…’’

‘‘नहीं मामी… वह सूरज नहीं, आफताब है और हमारे ही धर्म का है… मैं खुद ही आज आप से अपनी शादी के बारे में बात करने वाली थी,’’ जीनत बोलती चली गई.

‘‘अरे, तू दोचार शब्द पढ़ क्या गई है, मुझे ही शब्दों के मतलब समझाने लगी है… और तू समझ क्या रही है, तू किसी भी जात वाले से शादी करने को कहेगी और हम कर देंगे. तुझे ऐसे ही हमारे लिए पैसे कमाने होंगे. भूल जा कि तेरी कभी शादी भी होगी,’’ मामी का पारा चढ़ चुका था.

‘‘शादी तो मैं सूरज से ही करूंगी… और आप सब को बताना चाहूंगी कि मैं सूरज के बच्चे की मां बनने वाली हूं…’’ जीनत ने यह बात सिर्फ इसलिए कह दी थी कि ऐसा सुन कर मामू और मामी का पारा कम हो जाएगा, पर इस बात ने आग में घी डालने का काम किया था.

‘‘आप लोग नहीं मानोगे, तो जबरदस्ती ही सही… देखती हूं कि मुझे कौन रोकता है,’’ जीनत भी अड़ गई थी.

‘‘मैं रोकूंगी तु?ो… नमकहराम… हमारी नाक कटवाती है… महल्ले में हमारा जीना मुश्किल करना चाहती है,’’ मामी चिल्ला रही थीं.

जीनत ने सोचा कि जब बात इतनी बढ़ ही चुकी है, तो आफताब को भी फोन कर के यहीं बुला लेती हूं और इस गरज से उस ने मामी के हाथ से अपना मोबाइल छीन कर आफताब को फोन कर दिया.

‘‘हां… तुम मेरे घर आ जाओ… सब लोग घर पर ही हैं… आमनेसामने बैठ कर बात हो जाएगी.’’

आफताब अभी ज्यादा दूर नहीं गया था, वह तुरंत ही लौट पड़ा.

मामू ने जीनत के विद्रोही सुर देखे तो मामी को शांत कराने लगे.

‘‘ठीक है जीनत… तुम्हारे फैसले को हमारी भी हां है… जैसा तुम चाहो वैसा करो,’’ मामू ने कहा.

पर असलम को काटो तो खून नहीं, उसे यह बात कतई मंजूर नहीं हो पा रही थी कि किसी लड़के को घर बुला कर जीनत खुद ही अपनी शादी की बात करे.

कुछ देर बाद ही आफताब वहां आ गया. अभी उस ने दरवाजे के अंदर पहला कदम रखा ही था कि असलम उसे देख कर भड़क गया.

असलम ने तुरंत ही आफताब का कौलर पकड़ लिए और उस को जमीन पर गिरा कर लातघूंसे चलाने लगा.

आफताब को अचानक इस हमले की उम्म्मीद नहीं थी, इसलिए वह असलम का विरोध नहीं कर सका. अब तो मौका देख कर जीनत के मामू ने भी आफताब को मारना शुरू कर दिया. वे दोनों आफताब को मारते हुए बाहर ले आए, जीनत आफताब को बचाने दौड़ी, तो मामी ने उसे पकड़ लिया.

बाहर महल्ले के लोग जमा होने लगे थे.

‘‘दिनदहाड़े चोरी करने घुसता है. आज तुझे नहीं छोड़ेंगे,’’ असलम चीख रहा था.

एक चोर को पिटता देख कर जमा हुई भीड़ की हथेलियों में भी खुजली होने लगी थी. बिना जाने कि सच क्या है, भीड़ ने भी बेतहाशा आफताब को मारना शुरू कर दिया.

जीनत ने बड़ी कोशिशों से अपनेआप को मामी की गिरफ्त से आजाद किया और आफताब को बचाने दौड़ी.

भीड़ अब भी आफताब को मारे जा रही थी… जीनत आफताब तक पहुंच ही नहीं पा रही थी… वह लगातार चीख रही थी, ‘‘मत मारो इसे… यह चोर नहीं है…’’ पर भीड़ तो खुद ही वकील होती है और खुद ही जज…

इतने में जीनत पिटते हुए आफताब को बचाने की गरज से उस से जा चिपकी, पर गुस्साई भीड़ को वह दिखाई तक न दी और भीड़ लाठीडंडे बरसाती रही. कुछ ही देर बाद जीनत और आफताब के सिर से खून की धारा निकल पड़ी थी और उन दोनों की लाशें एकदूसरे से लिपटी हुई पड़ी थीं. भीड़ ने अपनी ताकत दिखाते हुए इंसाफ कर दिया था.

अब मैं नहीं आऊंगी पापा : पापा की सताई एक बेटी

मैं अपने जीवन में जुड़े नए अध्याय की समीक्षा कर रही थी, जिसे प्रत्यक्ष रूप देने के लिए मैं दिल्ली से मुंबई की यात्रा कर रही थी और इस नए अध्याय के बारे में सोच कर अत्यधिक रोमांचित हो रही थी. दूसरी ओर जीवन की दुखद यादें मेरे दिमाग में तांडव करने लगी थीं.

उफ, मुझे अपने पिता का अहंकारी रौद्र रूप याद आने लगा, स्त्री के किसी भी रूप के लिए उन के मन में सम्मान नहीं था. मुझे पढ़ायालिखाया, लेकिन अपने दिमाग का इस्तेमाल कभी नहीं करने दिया. पढ़ाई के अलावा किसी भी ऐक्टिविटी में मुझे हिस्सा लेने की सख्त मनाही थी. घड़ी की सुई की तरह कालेज से घर और घर से कालेज जाने की ही इजाजत थी.

नीरस जीवन के चलते मेरा मन कई बार कहता कि क्या पैदा करने से बच्चे अपने मातापिता की संपत्ति बन जाते हैं कि जैसे चाहा वैसा उन के साथ व्यवहार करने का उन्हें अधिकार मिल जाता है? लेकिन उन के सामने बोलने की कभी हिम्मत नहीं हुई.

मां भी पति की परंपरा का पालन करते हुए सहमत न होते हुए भी उन की हां में हां मिलाती थीं. ग्रेजुएशन करते ही उन्होंने मेरे विवाह के लिए लड़का ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद ही मेरा विवाह विवेक से हो पाया. मेरी इच्छा या अनिच्छा का तो सवाल ही नहीं उठता था. गाय की तरह एक खूंटे से खोल कर मुझे दूसरे खूंटे से बांध दिया गया.

मेरे सासससुर आधुनिक विचारधारा के तथा समझदार थे. विवेक उन का इकलौता बेटा था. वह अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी तो था ही, पढ़ालिखा, कमाता भी अच्छा था और मिलनसार स्वभाव

का था. इकलौती बहू होने के चलते सासससुर ने मुझे भरपूर प्यार दिया. बहुत जल्दी मैं सब से घुलमिल गई. मेरे मायके में पापा की तानाशाही के कारण दमघोंटू माहौल के उलट यहां हरेक के हक का आदर किया जाता था, जिस से पहली बार मुझे पहचान मिली, तो मुझे अपनेआप पर गर्व होने लगा था.

विवाह के बाद कई बार पापा का, पगफेरे की रस्म के लिए, मेरे ससुर के पास मुझे बुलाने के लिए फोन आया. लेकिन मेरे अंदर मायके जाने की कोई उत्सुकता न देख कर उन्होंने कोई न कोई बहाना बना कर उन को टाल दिया. उन के इस तरह के व्यवहार से पापा के अहं को बहुत ठेस पहुंची. सहसा एक दिन वे खुद ही मुझे लेने पहुंच गए और मेरे ससुर से नाराजगी जताते हुए बोले, ‘मैं ने बेटी का विवाह किया है, उस को बेचा नहीं है, क्या मुझे अपनी बेटी को बुलाने का हक नहीं है?’

‘अरे, नहीं समधी साहब, अभी शादी हुई है, दोनों बच्चे आपस में एकदूसरे को समझ लें, यह भी तो जरूरी है. अब हमारा जमाना तो है नहीं…’

‘परंपराओं के मामले में मैं अभी भी पुराने खयालों का हूं,’ पापा ने उन की बात बीच में ही काट कर बोला तो सभी के चेहरे उतर गए.

मुझे पापा के कारण की तह तक गए बिना इस तरह बोलना बिलकुल अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं मूकदर्शक बनी रहने के लिए मजबूर थी. उन के साथ मायके आने के बाद भी उन से मैं कुछ नहीं कह पाई, लेकिन जितने दिन मैं वहां रही, उन के साथ नाराजगी के कारण मेरा उन से अनबोला ही रहा.

परंपरानुसार विवेक मुझे दिल्ली लेने आए, तो पापा ने उन से उन की कमाई और उन के परिवार के बारे में कई सवालजवाब किए. विवेक को अपने परिवार के मामले में पापा का दखल देना बिलकुल नहीं सुहाया. इस से उन के अहं को बहुत चोट पहुंची. पापा से तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मुझे सबकुछ बता दिया. मुझे पापा पर बहुत गुस्सा आया कि वे बात करते समय यह भी नहीं सोचते कि कब, किस से, क्या कहना है.

मैं ने जब पापा से इस बारे में चर्चा की तो वे मुझ पर ही बरस पड़े कि ऐसा उन्होंने कुछ नहीं कहा, जिस से विवेक को बुरा लगे. बात बहुत छोटी सी थी, लेकिन इस घटना के बाद दोनों परिवारों के अहं टकराने लगे. उस के बाद, पापा एक बार मुझे मेरी ससुराल से लेने आए, तो विवेक ने उन से बात नहीं की. पापा को बहुत अपमान महसूस हुआ. जब ससुराल लौटने का वक्त आया तो विवेक ने फोन पर मुझ से कहा कि या तो मैं अकेली आ जाऊं वरना पापा ही छोड़ने आएं.

पापा ने साफ मना कर दिया कि वे छोड़ने नहीं जाएंगे. मैं ने हालत की नजाकत को देखते हुए, बात को तूल न देने के लिए पापा से बहुत कहा कि समय बहुत बदल गया है, मैं पढ़ीलिखी हूं, मुझे छोड़ने या लेने आने की किसी को जरूरत ही क्या है? मुझे अकेले जाने दें. मां ने भी उन्हें समझाया कि उन का इस तरह अपनी बात पर अड़ना रिश्ते के लिए नुकसानदेह होगा. लेकिन वे टस से मस नहीं हुए. मेरे ज्यादा जिद करने पर वे अपनी इज्जत की दुहाई देते हुए बोले, ‘तुम्हें मेरे मानसम्मान की बिलकुल चिंता नहीं है.’

मैं अपने पति को भी जानती थी कि जो वे सोच लेते हैं, कर के छोड़ते हैं. न विवेक लेने आए, न मैं गई. कई बार फोन से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बात नहीं की.

पापा के अहंकार के कारण मेरा जीवन त्रिशंकु बन कर रह गया. इन हालात को न सह सकने के कारण मां अवसाद में चली गईं और अचानक एक दिन उन की हृदयाघात से मृत्यु हो गई. इस दुखद घटना के बारे में भी पापा ने मेरी ससुराल वालों को सूचित नहीं किया तो मेरा मन उन के लिए वितृष्णा से भर उठा. इन सारी परिस्थितियों के जिम्मेदार मेरे पापा ही तो थे.

मां की मृत्यु की खबर सुन कर आए हुए सभी मेहमानों के वापस जाते ही मैं ने गुस्से के साथ पापा से कहा, ‘क्यों हो गई तसल्ली, अभी मन नहीं भरा हो तो मेरा भी गला घोंट दीजिए. आप तो बहुत आदर्श की बातें करते हैं न, तो आप को पता होना चाहिए कि हमारी परंपरानुसार दामाद को और उस के परिजनों को बहुत आदर दिया जाता है और बेटी का कन्यादान करने के बाद उस के मातापिता से ज्यादा उस के पति और ससुराल वालों का हक रहता है. जिस घर में बेटी की डोली जाती है, उसी घर से अर्थी भी उठती है. आप ने अपने ईगो के कारण बेटी का ससुराल से रिश्ता तुड़वा कर कौन सा आदर्श निभाया है. मेरी सोच से तो परे की बात है, लेकिन मैं अब इन बंधनों से मुक्त हो कर दिखाऊंगी. मेरा विवाह हो चुका है, इसलिए मेरी ससुराल ही अब मेरा घर है. मैं जा रही हूं अपने पति के पास. अब आप रहिए अपने अहंकार के साथ इस घर में अकेले. अब मैं यहां कभी नहीं आऊंगी, पापा.’

इतना कह कर, पापा की प्रतिक्रिया देखे बिना ही, मैं घर से निकल आई और मेरे कदम बढ़ चले उस ओर जहां मेरा ठौर था और वही थी मेरी आखिरी मंजिल.

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