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Story In Hindi: आज के भूत – नीलम के जीवन में लगा था कैसा दाग

Story In Hindi: नीलम सुबहसवेरे ससुराल छोड़ कर मायके में आ गई थी. उसे अचानक घर में आते देख कर उस के मातापिता परेशान हो उठे.

उन्होंने उस से घर आने की वजह पूछी, तो उस ने जलती आंखों से देख कर कहा, ‘‘आप लोग किसी अच्छे डाक्टर से मेरा इलाज कराएं, तो बेहतर होगा.’’

वे दोनों बौखला कर उस का मुंह देखते रहे.

नीलम बेहद खूबसूरत थी. वह 12वीं जमात की छात्रा थी. डेढ़ महीने के बाद उस ने महसूस किया कि उस के पैर भारी हो गए हैं. फिर 3 महीने के बाद वह अपना पेट छिपाने लगी थी.

एक दिन जब रात में उसे नींद नहीं आ रही थी, तब उस का गुजरा वक्त उस की आंखों के सामने तैरने लगा.

नीलम की शादी हो गई थी. तब उसे एक बीमारी ने दबोच लिया था. उस का इलाज शहर के बड़े डाक्टर से हो रहा था. कई महीने तक उस का इलाज चलता रहा, मगर उसे कोई आराम नहीं मिला था.

एक दिन नीलम के पिता ने उस डाक्टर से नीलम के हालचाल के बारे में पूछा, तो उन्होंने सम?ाया कि नीलम को हिस्टीरिया नाम की बीमारी है. अभी उस का इलाज चलता ही रहेगा. हां, अगर वह अपने पति के साथ रहेगी, तो उस की यह बीमारी अपनेआप ठीक हो जाएगी.

पर उस डाक्टर की बात पिता की समझ में नहीं आई, क्योंकि वह पाखंडों का गुलाम था. उस के सिर पर यह भूत सवार हो गया कि नीलम पर किसी प्रेत का साया है, क्योंकि दौरे के दौरान वह देर तक आंखें फाड़ कर देखती थी.

नीलम अजीबोगरीब हावभाव से अपने हाथपैरों को ऐंठती?ाटकती और दांतों को किटकिटा कर चबाती थी. फिर डाक्टर से उस का इलाज बंद हो गया था.

उस के घर में एक से बढ़ कर एक ओ?ागुनी आए, मगर उसे जरा भी फायदा नहीं हुआ था. उस के पिता ने ओझाई पर पानी की तरह पैसा खर्च किया था.

एक दिन पिता को खबर मिली कि ताड़डीह में एक काफी मशहूर ओझा है. वह नीलम के साथ फौरन वहां जा पहुंचा.

मंदिर में भीड़ लगी थी. वहां पर तथाकथित भूतप्रेत से हैरानपरेशान कुछ औरतें और कुछ जवान लड़कियां थीं.

जब नीलम का नंबर आया, तब तक रात हो गई थी. वहां पर बल्ब की रोशनी थी. बाकी सभी लोग जा चुके थे.

रंगीन फूलों वाली रेशमी साड़ी में नीलम की जवानी साफ झलक रही थी. ओझा उस की रसभरी आंखों में देखता रहा. उस की शरारत पर नीलम ने शरमा कर अपनी नजरें झाका लीं.

वह ओझ मन ही मन मंत्र बुदबुदाने लगा. उस ने कुछ कौडि़यां हवा में उछालीं, चावल चारों दिशाओं में

फेंके और हवा में अपना त्रिशूल लहरा कर गरजा, ‘ऐ दुष्ट प्रेतो, तुम अपने निवास से चलो और इस पर सवार हो जाओ.’

काफी देर तक विचित्र हावभाव से वह ओझ ऊपर की तरफ मुंह कर के इशारेबाजी करता रहा, फिर नीलम ने उस के अनपढ़ पिता को समझाया,

‘3 दिशाओं की 3 खतरनाक प्रेतात्माएं इसे सता रही हैं. मेरी महिमा के डर से वे इस पर प्रकट नहीं हुई हैं.

‘खैर, मैं उन्हें हवन कुंड में जला कर भस्म कर दूंगा,’ कह कर उस ओझा ने हवा में अपना त्रिशूल लहराया और एक बड़ा सा जंतर नीलम के गले में डाल दिया.

इस के बाद उस ने नीलम के अंधविश्वासी पिता से कहा, ‘हवनजाप यहीं पर होगा. क्या तुम्हारे पास 15-20 हजार रुपए हैं?’

पिता ने कहा, ‘जी महाराज.’

उस ओझा ने उसे चेतावनी दी, ‘यह लड़की देवी मां की शरण में रहेगी, तो वे प्रेतात्माएं इसे सता नहीं पाएंगी. तुम 10 दिन बाद यहां रुपए ले कर आओ.’

उस ओझा की बात नीलम के पिता को जंच गई.

अगली सुबह वह नीलम को देवी मां की शरण में छोड़ कर अपने गांव चला गया.

गांव में ओझा का हराभरा परिवार था. नीलम की उस ओझा की बड़ी बेटी काजल से दोस्ती हो गई थी. उस की गोद में एक साल का एक लड़का भी था.

जब रात में नीलम सोने के लिए कमरे में गई, तब ओझा का एक चेला उसे एक गिलास दूध दे कर बोला,

‘यह मां का प्रसाद है. इसे खा कर ही सोना.’

नीलम ने देखा कि दूध मे मेवा भी डाला गया था. बिना कुछ सोचेसमझे ही वह चटखारे लेले कर देवी मां का प्रसाद खा गई. उसे फौरन नींद की झपकियां आने लगीं और वह पलंग पर जा कर गहरी नींद में सो गई थी. फिर रात में उस के साथ क्या हुआ, उसे कुछ भी मालूम नहीं हो पाया था.

सुबह नीलम देर से जागी, तो हैरानपरेशान हो गई कि उस के कपड़े जमीन पर पड़े थे. उस का दिमाग चकरा कर रह गया. उसे एहसास हुआ कि किसी ने उस की इज्जत लूट ली है.

नीलम ने रात की यह घटना काजल को बताई, तो उस का भी दिमाग चकरा कर रह गया.

नीलम बोली, ‘मेरी इज्जत लूटने वाला वह भेडि़या यहां पर आया कैसे?’

यह सुन कर काजल ने कहा, ‘तुम चुप रहोगी, तो मैं उस भेडि़ए को रंगे हाथ पकड़ सकती हूं.’

फिर रात में वही चेला नीलम को एक गिलास दूध दे कर चला गया,

तभी उस के पास काजल आ गई. उस ने वह दूध एक बिल्ली को पीने के लिए दिया, तो वह बिल्ली दूध पी कर फौरन सो गई.

काजल बोली, ‘नीलम, इस में कुछ मिलाया गया है.’

जब घर के सभी लोग सो गए, तब खिड़की के रास्ते से कोई नीलम के कमरे में कूदा.

वह शख्स नीलम के पलंग की ओर बढ़ने लगा कि तभी एक कोने से उस पर टौर्च की तेज रोशनी पड़ी, तो वह बुरी तरह से बौखला उठा.

उस ने देखा कि पलंग पर काजल लेटी हुई थी. वह शख्स खिड़की के रास्ते से वापस भागा.

टौर्च की रोशनी में नीलम और काजल ने देखा कि वहां से भागने वाला ओ?ा था. दोनों की नजरों में उस ओ?ा की पोल खुल गई थी. नीलम अपनी यादों से बाहर निकल आई.

अगले दिन मां चुपके से नीलम को शहर के नर्सिंगहोम में ले गई, जहां एक लेडी डाक्टर ने हमेशा के लिए उसे इस पाप से छुटकारा दिला दिया.

लेकिन आज के उस भूत ने नीलम को जो दाग लगाया था, उसे कौन धो सकता है? Story In Hindi

Best Family Story: रिश्तों की मर्यादा – अपनों ने तोड़े माला के सपने

Best Family Story: ढोलक पर बन्नाबन्नी गाते सब के बीच बैठी माला कोने में 20 वर्षीय भांजी रुचि की फुसफुसाहट सुनते ही तिलमिला उठी. वह तुरंत उठी और दुकान से सटे कमरे में जा कर देखा तो उस की 8 वर्षीय बेटी परी जेठानी के पिता की गोदी में बैठी थी और जिस तरह से कहानी सुनाते उन के हाथ उस मासूम के कोमल अंगों को छू रहे थे, माला की आंखों में खून उतर आया. उस की पिता की उम्र के उस व्यक्ति की नापाक हरकत कतई माफी योग्य नहीं थी. उस का जी चाहा कि बेटी के साथ ऐसा घिनौना खिलवाड़ करने वाले का मुंह नोच ले, पर समझदार माला शादी जैसे मौके पर रंग में भंग नहीं डालना चाहती थी.

वैसे भी मिनी उस की प्रिय भतीजी थी और उसी की शादी अटेंड करने वह इंदौर से इटावा अपने पति और बेटी के साथ आई थी. इसलिए जैसेतैसे अपनेआप को नियंत्रित कर उस ने तेज आवाज में बेटी को आवाज दी, “चलो, परी खेल हो चुका. अब आओ, हाथमुंह धुला कर तुम्हें तैयार कर दूं.”

मां की आवाज सुनते ही परी भाग कर आई और उस के पैरों से लिपट गई. तभी जेठानी के पिता की आंखें माला से जा मिलीं. उस की आंखों में घृणा मिश्रित क्रोध देख वे थोड़ा सकपकाते हुए बोले, “बच्चों ने जिद की तो उन्हें कहानी सुना रहा था.”

‘छि: कैसा बेशर्म इनसान है. रंगेहाथों पकड़े जाने पर भी वह बातें बना रहा है,’ माला उस के दुस्साहस पर हैरान थी. इस तरह अपनों की भीड़ में कोई व्यक्ति वो भी पिता जैसे सम्मानित ओहदे वाला ऐसी नीच हरकत करेगा, उस ने सपने में भी नहीं सोचा था.

रिश्तों की मर्यादा भंग होती देख मन का आक्रोश आंखों के रास्ते उमड़तेघुमड़ते बहने लगा. उफ्फ क्या करूं, क्या कवीश को बताना ठीक रहेगा. लेकिन, अगर उन्हें गुस्सा आ गया तो माहौल बिगड़ते समय न लगेगा. ठीक है, देखती हूं अगर उन्होंने फिर ऐसी हरकत दोहराई तो उन की उम्र और ओहदे का खयाल न रखूंगी… सोचते हुए माला ने जैसे मन ही मन कुछ ठान लिया.

वाशरूम में उस ने परी के हाथमुंह धुलाते समय उसे नाना से दूर रहने को कहा.

“पर क्यों मम्मी, नाना तो हमें प्यार करते हैं, चौकलेट भी देते हैं.”

“पर, उन्हें आप को यहांवहां छूना नहीं चाहिए. ये गलत होता है,” कहते हुए माला ने उसे अच्छेबुरे टच के बारे में समझाया.

“हां मम्मी, उन का छूना तो मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था. मैं उन की गोद में बैठना भी नहीं चाहती थी, लेकिन उन्होंने कहा कि कहानी सुनने के लिए तो सब को बारीबारी से उन की गोद में बैठना होगा.

“पर, अब मैं नाना से चौकलेट भी नहीं लूंगी और कहानी भी नहीं सुनूंगी, फिर आप सुनाओगी न मुझे कोई अच्छी सी कहानी,” नन्ही परी मचल उठी.

“हां, मैं अपनी परी को एक सुंदर सी कहानी सुनाऊंगी, पर रात को सोते समय.

“लेकिन, अब हमेशा ध्यान रखना है कि आप को रुचि दीदी के साथ ही रहना है. ठीक है?”

“ओके…” अपनी छोटीछोटी बांहें उस के गले में डाल परी झूल गई.

12 साल पहले 5 भाईबहनों वाले उस हवेलीनुमा घर में माला सब से छोटी बहू बन कर आई थी. सासससुर थे नहीं, इसलिए अपने से काफी बड़े जेठजेठानी को ही वह सासससुर सा सम्मान देती थी. उस से बड़ी 3 ननदें भी उस पर बहुत स्नेह लुटाया करती थीं.

माला को याद आया, जब वह नीता दीदी के पिता से पहली बार मिलने पर उन के पैर छूने झुकी थी, तो उन्होंने ये कहते हुए उसे पैर नहीं छूने दिया था कि “कहीं बिटियन से पांव छुआए जात हैं. अरे बिटिया तो देवी का अवतार होती हैं. उन के तो पांव पूजे जात हैं…” और आज एक बिटिया के अंदर उन्हें देवी के बजाय उस की देह का दर्शन हो रहा है.
कैसी दोगुली मानसिकता, कैसा पाखंड… माला विचारों के भंवर में गोते लगा ही रही थी कि बाहर से आती भतीजे की आवाज ने उसे चौंका दिया, “चाची क्या कर रही हो, चाचा कब से आवाज दिए जा रहे हैं.”

“आईईई…” परी के कपड़े बदल चुकी माला ने जवाब दिया और परी को दुलारते हुए बाहर भेजा और खुद भी जल्दीजल्दी तैयार होने लगी.

आज लेडीज संगीत था, जिस में उस की और कवीश की भी परफोर्मेंस थी. प्योर जोर्जेट की रेड कलर की बौर्डर वाली साड़ी में माला बेहद खूबसूरत लग रही थी. शादी के लिए बुक किया गया गार्डन घर से 5 मिनट के फासले पर था. वहीं संगीत का प्रोग्राम होना था. काफी बड़े स्टेज की सजावट देखते ही बनती थी. पीच कलर का गाउन पहने मिनी भी बिलकुल गुड़िया सी लग रही थी.
सब से पहले दुलहन की सहेलियों का डांस हुआ, फिर मिनी ने भी उन को ज्वाइन कर लिया.

“मम्मा, मम्मा, मुझे भी डांस करना है.”

काफी देर से परी जिद कर रही थी. फिर तो वह भी कमर पर दोनों हाथ रखे ठुमकठुमक कर सब के बीच खूब नाची. फिर बारी आई माला और कवीश की. पुराने गीतों की पैरोडी पर उन दोनों ने इतना मस्ती भरा डांस किया कि सभी मंत्रमुग्ध हो उन्हें देखते रह गए. फिर तो क्या बच्चे क्या बड़े सभी एकएक कर डांस की मस्ती में डूबते चले गए.
माला भी प्रोग्राम ऐंजौय कर रही थी, पर उस की पैनी नजरें अपनी बच्ची की सुरक्षा के लिए पूरी तरह मुस्तैद थीं. उस की नजर बराबर दीदी के पिताजी पर थी. परी को खाना खिलाने के दौरान उस का ध्यान थोड़ा भटका तो वे गायब थे. “दीदी, क्या बात है, पिताजी नजर नहीं आ रहे?”

“अरे, उन से ज्यादा देर बैठा नहीं जाता. कहने लगे कि तुम बच्चों का प्रोग्राम है, तुम लोग मस्ती करो. मुझ से अब बैठा नहीं जाएगा. सो, खाना खा कर घर निकल गए.”

“दीदी, मेरी तबियत भी कुछ ढीली लग रही है, शायद थकान का असर है. घर जा कर आराम करती हूं. परी को ले जा रही हूं. कवीश पूछे तो बता देना.”

“अरे, पर तू ने तो अभी कुछ खाया भी नहीं है.”

“अभी भूख नहीं है. अगर लगी तो किसी के हाथों घर पर ही मंगवा लूंगी. आप चिंता न करो,” कहते हुए माला ने परी का हाथ पकड़ा और लंबे डग भरती हुई घर की तरफ चल दी. वह बेहद परेशान थी, क्योंकि बात यहां सिर्फ उस की बच्ची के प्रति हुए अन्याय की नहीं थी, बल्कि ये एक अनाचार और व्यभिचार था, जिसे करने वाला बेहद करीबी रिश्ते में बंधा एक धूर्त व्यक्ति था. सभ्य समाज का दुश्मन ऐसा व्यक्ति कभी भी किसी भी निरीह को अपनी कुचेष्टाओं का शिकार बना सकता है. तो क्या मासूमों के दोषी को यों ही छोड़ देना सही है, क्या रिश्ते की आड़ में उस की धृष्टता क्षमा करने योग्य है? ऐसे अनेक प्रश्न उस के मन को मथ रहे थे.

उस की आंखों के आगे जेठानी नीता की तसवीर तैर गई. कितनी अच्छी हैं दीदी, अपने पिता की सचाई जान कर उन्हें कितनी तकलीफ होगी? फिलहाल वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए. जानबूझ कर माला घर के सामने वाले गेट से न जा कर आंगन में बने पीछे वाले दरवाजे से अंदर घुसी. वहां नाइन और कामवाली अगले दिन की पूजा के लिए मंडप के नीचे कुछ तैयारी कर रही थीं. परी को उस ने हाल में ले जा कर चुपचाप बैठने को कहा.

आंगन से लगे लंबे गलियारे को पार करती हुई वह दुकान के पास वाले कमरे तक जा पहुंची, तभी उस के कानों में बच्चों के खिलखिलाने की आवाज पड़ी, “नानाजी, अब हमारी बारी है.”

“सब की बारी आएगी, तनिक धीरज रखो… नाना के हाथों की जादू वाली मालिश,” खरखराती आवाज में भद्दी सी हंसी सुन वह खड़ी न रह सकी. उटका हुआ दरवाजा हाथ से ठेलते ही खुल गया.
अंदर का नजारा देख उसे एक बार फिर अपनी आंखों पर विश्वास न हुआ. आसपड़ोस के बच्चे नाना कहे जाने वाले शख्स को घेरे बैठे थे और अपनी गोदी में 5-6 साल की बच्ची को उलटा लिटाए वो उस की मालिश करने की भावभंगिमा कर रहा था. लपक कर माला ने बच्ची को उस की गोद से लगभग छीना और सभी को प्यार से अपनेअपने घर जाने को कहा.

“तुम बहुत जल्दी आ गई बिटिया,” उस के चेहरे पर अभी भी कुटिल मुसकान तैर रही थी.

“आप को शर्म नहीं आती ये नीच हरकत करते हुए. कहने को आप पितातुल्य हैं, पर आप को पिता कहना उस पवित्र शब्द का अपमान होगा. उम्र में आप की पोतियों से भी छोटी हैं ये बच्चियां. सच बताएं, आप का विवेक मर चुका है क्या, जो इन के साथ इतनी घिनौनी हरकत करते वक्त आप के हाथ नही कांपे,” अत्यंत क्षोभ व गुस्से से वह फट पड़ी.

“तुम क्या कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा. मुझ पर झूठा इलजाम लगाते तुम्हें शर्म आनी चाहिए.”

अचानक ही उस की बोली और सुर बदल चुका था. बेशर्मी की ये पराकाष्ठा देख माला दंग थी.

“सच में आप जैसे इनसान को चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए. जिस तरह की जलील हरकत आप ने की है, कायदे से आप को पुलिस में दे देना चाहिए, परंतु मैं सिर्फ समझाइश दे कर छोड़ रही हूं. वक्त रहते सुधर जाइए, नहीं तो दीदी और दूसरे लोगों को पता चला तो आप कहीं के नहीं रहेंगे,” आवेश में ऊंची होती उस की आवाज आंगन में काम कर रहे लोगों तक जा पहुंची.

“पागल हो क्या, बित्तेभर की छोकरी मुझे सबक सिखाने चली है, जानती नहीं कि कौन हूं मैं? तुझे तो…” तैश में उस ने माला पर अपना हाथ छोड़ दिया. पर उस उठे हाथ को किसी ने हवा में ही रोक लिया.

“खबरदार, जो माला पर हाथ उठाया. और सही कहा आप ने, वो मासूम आप को जानेगी भी कैसे? पर, मैं आप की भलेमानस वाली छवि के पीछे की घिनौनी हकीकत से भलीभांति वाकिफ हूं. आप इस संसार के सब से निकृष्ट व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपनी घृणित वासना की पूर्ति के लिए अपनी बच्ची तक को न छोड़ा. सच में आप को पिता कहते मुझे लज्जा आती है,” गुस्से में नीता का चेहरा तमतमा रहा था.

“ये क्या कह रही हो दीदी, एक बाप अपनी बेटी के साथ ऐसा कैसे…”

“बाप… इस की दरिंदगी देख प्रकृति ने इसे बाप बनने का अवसर ही कहां दिया?

“एक अदद बच्चे की आस में इस की सहृदय पत्नी तमाम कोशिशें कर के हार गई. सब तरफ से निराश हो कर उस की जिद पर मुझे एक अनाथालय से गोद लिया गया था. लेकिन बेटी हो कर भी मैं इस की बेटी कभी न बन सकी.

“एक दिन इसे मेरे साथ गलत हरकत करते देख मां का दिल भारी पीड़ा से भर उठा. उस दिन मुझे अपने सीने से चिपटाए वे देर तक रोती रहीं. 2 दिन बाद ही उन्होंने अपने भाई को बुला कर मुझे उन के हाथों सौंप दिया. उन 2 दिनों में वे साए की तरह मेरे साथ रहीं. और मेरे जाने के महीनेभर बाद ही ये खबर आ गई कि घर के अहाते में बने कुएं में कूद कर उन्होंने आत्महत्या कर ली. शायद इन का ये भयावह रूप उन की बरदाश्त से बाहर हो चुका था…” कहते हुए नीता फफक पड़ी.

“काश, उस वक्त मैं अपनी मां के साथ मजबूती से खड़ी हो पाती और इसे इस के किए का दंड दिला पाती, तो आज मेरी मां जिंदा होती. मैं ने तो सदा ही इस से एक निश्चित दूरी बना रखी थी.

“मिनी की शादी में भी न बुलाती, पर तुम्हारे भैया ने कहा तो उन्हें कैसे मना करती. अपना हर जख्म उन से साझा करना पड़ता. फिर मुझे भी लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर जीवन की काफी ठोकरें खाने के बाद शायद इन्हें कुछ समझ आ गई हो, पर नहीं, कुछ लोगों की फितरत कभी नहीं बदलती. सोचती हूं कि इन्हें न बुलाना ही सही होता. वो तो अच्छा हुआ, तुम्हारी बातों से मुझे कुछ संदेह हुआ और मैं तुम्हारे पीछे चल पड़ी. पर अब क्या करूं? इन की हैवानियत ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, क्या बताऊंगी तुम्हारे भैया को. जी तो कर रहा है कि अपनेआप को ही खत्म कर लूं. मैं नहीं रहूंगी, तो इस घर से इन का रिश्ता भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.”

“गलती से भी ऐसा कभी मत सोचना. भुगतना तो उसे पड़ेगा, जिस ने ये जलील काम किया है. इन्हें इन के गुनाहों की सजा मिल कर रहेगी, ताकि ऐसी घिनौनी हरकत करने से पहले कोई सौ बार सोचे.”

दरवाजे पर नीता के पति खड़े थे.

“तुम यहां…?”

“हां, रुचि ने तुम दोनों को एक के बाद एक जाते देखा तो उस ने आज सुबह की घटना मुझे कह सुनाई और मैं सीधा यहां चला आया. तुम्हारी पूरी बात सुनते ही मैं ने कवीश को पुलिस को फोन करने को कहा है, पुलिस आती ही होगी,” कहते हुए नीता के कंधे को उन्होंने हौले से थपथपाया मानो उस के साथ खड़े रहने का भरोसा दे रहे हों.

“तुम अपने बाप को जेल भिजवाओगी?” इनसानी चोले के पीछे छिपे हैवान की आंखों में गहरा अविश्वास था.

“नहीं, मैं उस अनाचारी को जेल भेजूंगी, जिस ने रिश्तों की सभी मर्यादाओं को लांघ जाने का दुस्साहस किया है,” तल्ख स्वर में जवाब दे कर नीता ने घृणा से मुंह फेर लिया और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चल दी.

“मुझे माफ कर दो दीदी, तुम्हारे आंसुओं की जिम्मेदार हूं मैं. ऐसे मौके पर ये सब नहीं चाहती थी, पर…”

“कैसी बातें करती हो माला, तुम्हारी वजह से आज एक अपराधी अपनी सही जगह पहुंच जाएगा. शुक्रगुजार हूं तुम्हारी, आज तुम्हारे कारण ही मैं इतनी हिम्मत जुटा पाई और एक सही फैसला लिया है,” नीता उस की बात को काटते हुए बोली.

“सच में दीदी, गर्व है मुझे आप पर,” कहते हुए माला नीता के गले लग गई.

पुलिस की गाड़ी का सायरन धीरेधीरे पास हो कर तेज ध्वनि में तबदील हो रहा था. Best Family Story

Best Hindi Story: भरमजाल – रमेश ने कैसे बरबाद की अपनी जिंदगी

Best Hindi Story: आज पार्क जा कर जौगिंग करने में मेरा बिलकुल भी मन नहीं लगा. हालांकि, रमेश को छोड़ कर बाकी सभी दोस्त थे, मगर रमेश से मेरी कुछ ज्यादा ही पटती थी.

25 सालों से हम दोनों एकसाथ इस पार्क में जौगिंग करने आते रहे हैं. कुछ तो वैसे ही रमेश का न होना मुझे एक अधूरेपन का एहसास करा रहा था और कुछ दोस्तों ने जब उस के बारे में उलटीसीधी बात करनी शुरू की, तो मेरा मन और भी परेशान हो गया.

‘‘4 महीने बाद 60वां जन्मदिन होने वाला था रमेश का. उम्र के इस पड़ाव पर ऐसा काम करते हुए उसे जरा भी शर्म नहीं आई. देखने में कितना धार्मिक लगता था और काम देखो कैसा किया. सारा समाज थूथू कर रहा है उस पर,’’ एक दोस्त ने कहा.

दूसरे दोस्त ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे तो भाभीजी पर तरस आ रहा है. अच्छा हुआ दोनों लड़कों ने घर से निकाल दिया ऐसे बाप को…’’

इस से ज्यादा सुनने की ताकत मुझ में नहीं थी.

‘‘कुछ काम है…’’ कह कर मैं वापस घर आ गया और रमेश के बारे में सोचने लगा.

रमेश और मेरी कारोबार के सिलसिले में एकदूसरे से जानपहचान हुई थी. यह जानपहचान कब दोस्ती और फिर गहरी दोस्ती में बदल गई, पता ही नहीं चला.

रमेश बहुत ही साफदिल, अपने काम में ईमानदार और सामाजिक इनसान था. उस के इन्हीं गुणों के चलते हमारी दोस्ती इतनी बढ़ी कि 25 साल तक हम रोजाना एकसाथ जौगिंग करने जाते रहे.

हम दोनों अपनी सारी बातें जौगिंग के दौरान ही कर लेते थे. कई बार तो दूसरे दोस्त हमें लैलामजनू कह कर चिढ़ाते थे.

इतने सालों में रमेश ने अपना कारोबार काफी बढ़ा लिया था. ट्रांसपोर्ट के कारोबार के साथ ही अब उस ने दिल्ली के पौश इलाके में पैट्रोल पंप भी खोल लिया था.

एक तरफ लक्ष्मी उस पर पैसा बरसा रही थी, वहीं दूसरी तरफ उस की सुंदर सुशील पत्नी ने 2 बेटे उस की गोद में दे कर दुनिया का सब से अमीर इनसान बना दिया था.

जिंदगी ने अच्छी रफ्तार पकड़ ली थी, मगर सब से अमीर आदमी सुखी भी हो, ऐसा जरूरी नहीं होता. वह लालच के ऐसे दलदल में धंसता चला जाता है कि जब तक उसे एहसास होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

2 साल पहले बाजार में गिरावट आई, तो सभी के कारोबार ठप हो गए. रमेश किसी भी तरह कारोबार को चलाना चाहता था. उस ने अपने पैट्रोल पंप पर पैट्रोल भरने के लिए लड़कियां रख लीं और वाकई उस के पैट्रोल पंप की कमाई पहले से काफी ज्यादा बढ़ गई.

ग्राहक वहां पैट्रोल लेने के बहाने लड़कियां देखने ज्यादा आने लगे. अब रमेश हर तीसरे महीने पहली लड़की को हटा कर किसी नई और खूबसूरत लड़की को काम पर रखता.

मुझे उस की इस सोच से नफरत हुई. मैं ने उसे समझाने की कोशिश भी की, तो उस ने कहा ‘आल इज फेयर इन बिजनेस’.

मैं अपनी आंखों से देख रहा था कि पैसा कैसे एक सीधेसादे इनसान की अक्ल मार देता है.

ज्यादातर उस के मैनेजर ही इन लड़कियों को काम पर रखते थे. पर वे लड़कियां काम कैसा कर रही हैं, यह देखने के लिए रमेश कभीकभार अपने पैट्रोल पंप पर ही पैट्रोल भरवाने चला जाया करता था.

उन्हीं दिनों एक लड़की रानी, उस के पैट्रोल पंप पर काम करने आई. एक शाम को मैं उसी की गाड़ी में काम के सिलसिले में उस के साथ गया था.

उस दिन रमेश ने पहली बार रानी को देखा था. गठे हुए बदन की लंबीपतली थोड़ी सांवली सी थी वह, उम्र यही होगी कोई 23-24 साल यानी रमेश के बेटे से भी छोटी उम्र की थी.

रमेश ने मैनेजर को बुला कर पूछा, तो उस ने बताया कि यह नई लड़की है रानी, अपना काम भी बखूबी कर रही है. उस के बाद रमेश और मैं वापस आ गए.

3 महीने बाद मैनेजर का रमेश के पास फोन आया कि रानी आप से मिलना चाहती है. वह काम से हटने को तैयार नहीं है. उसे समझाने की बहुत कोशिश की, मगर कहती है कि एक बार मालिक से मिलवा दो, फिर चली जाऊंगी.

रमेश ने कहा, ‘‘उसे मेरे दफ्तर भेज देना.’’

दफ्तर आते ही रानी रमेश के पैरों में गिर गई और लगी जोरजोर से रोने, ‘‘मालिक, मुझे काम से मत निकालो. मेरे घर में कमाने वाली सिर्फ मैं ही हूं. बाप शराबी है. वह पैसे के लिए मुझे बेच देगा. 3 महीने से आधी तनख्वाह उस के हाथ में रख देती थी, तो शांत रहता था. बड़ी मुश्किल से अच्छी नौकरी और अच्छे लोग मिले थे. मैं आप के सब काम कर दिया करूंगी, ओवरटाइम भी करूंगी. उस के पैसे भी चाहे मत देना, पर मुझे काम से मत निकालो.’’

रमेश ने 1-2 बार उस से कहा भी कि उठो, ऐसे पैरों में मत गिरो, मगर वह पैरों को पकड़े रोती रही. आखिरकार रमेश को ही उसे उठाना पड़ा और मानना पड़ा कि वह उसे काम से नहीं निकालेगा.

ऐसा सुनते ही रानी ने रमेश का हाथ चूम लिया. 60 साल के बूढ़े रमेश के अंदर कमसिन रानी के चुंबन से एक सिहरन सी दौड़ गई.

रानी के जाने के बाद भी रमेश उसी के बारे में सोचता रहा. वह खुद को उस की तरफ खिंचता हुआ महसूस कर रहा था. 1-2 बार उस ने अपने इन विचारों को झटका भी कि वह यह क्या सोच रहा है. मगर रानी का गठीला बदन और उस का चुंबन रहरह कर उसे उस से मिलने को बेचैन कर रहे थे.

उस दिन के बाद से रमेश अकसर अपने पैट्रोल पंप पर जाने लगा. पहले वह वहां बैठता नहीं था. अब उस ने वहां बैठना भी शुरू कर दिया था.

रानी के दफ्तर आने वाली बात रमेश ने मुझे बताई थी और जब उस ने अपनी उस सोच के बारे में मुझे बताया, तभी मैं ने उसे समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम रानी से दूर ही रहो. फिसलने की कोई उम्र नहीं होती. कीचड़ में कितना धंस जाओगे, खुद तुम्हें भी पता नहीं चलेगा.’’

मेरे समझाने के बाद से रमेश ने मुझ से रानी के बारे में बातें करना बंद कर दिया, मगर मैं बरसों पुराना दोस्त था उस का, उस की बदलती हरकतों को बखूबी देख पा रहा था.

अगले 3 महीने का समय भी इसी तरह निकल गया. अब रमेश ने रानी को बुला कर कहा, ‘‘देखो, अब मुझे तुम्हें यहां से हटाना होगा, नहीं तो बाकी की लड़कियां भी यही मांग करेंगी कि हमें भी काम से मत हटाओ.’’

‘‘मगर, मैं कहां जाऊंगी मालिक?’’

‘‘शहर से बाहर निकल कर हमारा एक फार्म हाउस है, वहां उस घर की देखभाल के लिए किसी की जरूरत है. मैं तुम्हें वहां नौकरी दे सकता हूं. चौबीस घंटे वहीं रहना होगा. खानापीना सब हम देंगे और तनख्वाह अलग.’’

रानी ने खुशीखुशी हां भर दी.

अब रानी फार्म हाउस में काम करने लगी. कभीकभी रमेश अपने दोस्तों को वहां ले जाता, तो रानी खाना भी बना देती थी सब के लिए.

रानी हर काम में माहिर थी. फार्म हाउस पूरा चमका दिया था उस ने. रमेश को यह देख कर बहुत अच्छा लगा.

एक बार कहीं बाहर से आते हुए रमेश फार्म हाउस पर चला गया. वहां जा कर पता चला कि चौकीदार छुट्टी पर है. तब रानी ही गेट खोलने आई. चायपानी, नाश्ता सब दे दिया और जाने लगी, तो रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हें यहां कोई दिक्कत तो नहीं है?’’

‘‘जितना चाहा था, उस से भी ज्यादा मिल गया मालिक. आप की वजह से ही मैं आज इज्जत की जिंदगी जी रही हूं, नहीं तो मेरा बाप कब का मुझे बेच देता,’’ कहतेकहते वह रोने लगी.

रमेश ने उस के आंसू पोंछे, तो रानी ने रमेश का हाथ पकड़ लिया, ‘‘सर, आप बहुत ही अच्छे इनसान हैं. आजकल अपने कर्मचारियों के बारे में कौन सोचता है.’’ और फिर से उस का हाथ चूमने लगी और बोली, ‘‘आप तो मेरे लिए सबकुछ हैं.’’

उस चुंबन की सिहरन ने रमेश के हाथों वह काम करवा दिया, जो रानी उस से कराना चाहती थी. उस के बाद से तो रमेश का हर हफ्ते का यही काम हो गया. वह हर हफ्ते काम का बहाना बना कर फार्म हाउस आ जाता.

रानी ने उसे अपनी बातों में इस कदर उलझा लिया था कि अब रमेश को अपने घर और बीवीबच्चों की भी चिंता नहीं थी.

इस बीच रमेश ने मुझ से मिलनाजुलना बंद कर दिया था. फिर अचानक एक दिन भाभी (रमेश की पत्नी) का फोन आया कि रमेश ने दूसरी शादी कर ली है.

यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया. मुझे यह तो अंदाजा था कि कुछ गलत हो रहा है, मगर इस हद तक होगा, यह नहीं सोचा था.

शादी की उम्र तो उस के बेटों की थी, ऐसे में जब उन्हें अपने बाप की करतूत का पता चला, तो उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया.

रमेश ने पार्क आना बंद कर दिया. आता भी किस मुंह से. इतने सालों से कमाई इज्जत पल में मिट्टी में मिल गई. सारा समाज रमेश पर थूथू कर रहा था.

शादी के 6 महीने बाद ही रानी ने एक बच्चे को जन्म दे दिया. रमेश रानी के साथ फार्म हाउस में ही रह रहा था. एक दिन अचानक रात में रमेश मुझ से मिलने आया. वह जानता था कि उस की हरकत से मैं भी बहुत नाराज हूं.

मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बोला, ‘‘मुझे मालूम है कि तुम मेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहते, पर एक बार मेरी बात सुन लो. मैं यही चाहता हूं और कुछ नहीं. तुम्हारी माफी भी नहीं.’’

फिर रमेश ने शुरू से आखिर तक सारी बातें मुझे बताईं. रमेश ने यह भी बताया कि यह बच्चा उस का है ही नहीं. मगर रमेश ने रानी के साथ संबंध बनाए थे, उस का वीडियो रानी के आशिक ने चुपके से बना लिया था. रमेश पर शादी करने का दबाव डाला गया.

‘‘शादी के बाद ही उसे सारी सचाई का पता चल गया था. रानी ने सिर्फ पैसों के लिए उसे फंसाया था. यह उस की और उस के आशिक की सोचीसमझी चाल थी,’’ यह सब कह कर रमेश फूटफूट कर रोने लगा और मेरे घर से चला गया.

मैं तो यह सुन कर सन्न सा बैठा रह गया. अपने दोस्त की जिंदगी अपनी आंखों के सामने बरबाद होते हुए देख रहा था. जिसे रमेश प्यार समझ रहा था, वह केवल एक भरमजाल था. उस ने अपनी इज्जत, परिवार, दोस्तों को तो खोया ही, साथ ही उस प्यार से भी इतना बड़ा धोखा खाया.

काश, वह पहले ही समझ जाता, तो इतने सालों से कमाई हुई उस की इज्जत पर इतना बड़ा कलंक तो नहीं लगता. वह इतना समझता कि 60 साल की उम्र प्यार करने के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए होती है. Best Hindi Story

Hindi Family Story: एक तलाक ऐसा भी – गंगू और मोहिनी का यादगार फैसला

Hindi Family Story: गंगू अपनी पत्नी मोहिनी के साथ पूर्वी दिल्ली की एक कच्ची बस्ती में रहता था. कदकाठी में वह मोहिनी के सामने एकदम बच्चा लगता था, क्योंकि मोहिनी भरेपूरे बदन की औरत थी. उस का कद भी साढ़े 5 फुट था. जब वह गली से गुजरती थी, तो मनचले उस की मटकती कमर और उठे उभारों को देख कर आहें भरने लगते थे.

यह सब देख कर गंगू कुढ़ कर रह जाता था. रहीसही कसर मोहिनी के मोबाइल फोन ने पूरी कर दी थी. गंगू जब भी मोहिनी को फोन से चिपके देखता, तो वह उसे हड़का देता था. एक दिन तो हद हो गई. गंगू जब थकाहरा घर लौटा, तो मोहिनी हंसहंस कर किसी से फोन पर बात कर रही थी. उस की हंसी सुन कर गंगू का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया.

उस ने आव देखा न ताव और एक करारा तमाचा मोहिनी के गाल पर जड़ दिया.  अचानक पड़े तमाचे से मोहिनी बौखला गई और पलट कर उस ने भी गंगू को खींच कर एक तमाचा रसीद कर दिया. अब तो गुस्से के मारे गंगू के नथुने फूलने लगे.

यह देख कर बस्ती के कुछ लोग कहने लगे कि मर्द का अपनी पत्नी से मार खाना खानदान की नाक कटने के बराबर है. वे मानो गंगू के जले पर नमक छिड़क रहे थे. उधर गंगू गुस्से में और भी लालपीला हो रहा था. लिहाजा, मामला और भी बढ़ता चला गया.

इसी तनातनी में उन दोनों के रिश्तेदार दिल्ली आए तो मामला और भी संगीन होता गया और बात धीरेधीरे तलाक पर आ गई. दोनों पक्षों की तरफ से खूब आरोप उछाले गए. गंगू ने मोहिनी को और मोहिनी ने गंगू को बहुत सारी बकवास बातें कहीं. मुकदमा कोर्ट में दर्ज कराया गया. गंगू ने मोहिनी के खिलाफ बदचलनी का, तो मोहिनी ने गंगू के खिलाफ दहेज के नाम पर सताने का आरोप लगाया.

मुकदमा तकरीबन ढाई साल तक चलता रहा. आखिर में 7 साल तक शादीशुदा जिंदगी बिताने और एक बच्ची के मांबाप बनने के बाद आज गंगू और मोहिनी के बीच तलाक हो गया. गंगू और मोहिनी दोनों के हाथ में तलाक की परची थी. वे दोनों चुप थे. चूंकि मुकदमा तकरीबन ढाई साल तक चला था, लिहाजा वे दोनों ढाई साल से अलगअलग रह रहे थे.

गंगू दिल्ली में तो मोहिनी अपने मायके में रह रही थी. दोनों जब सुनवाई पर आते तो एकदूसरे को देख कर जलते, गुस्सा करते और मुंह मोड़ लेते.  तलाक की परची मिलने के बाद दोनों पक्ष के रिश्तेदार और गंगू व मोहिनी कोर्ट के पास के ही एक होटल में ठहरे थे. मोहिनी ने दिल्ली वाले घर में जाने से मना कर दिया था, तो गंगू भी वहीं रुक गया. सब की चाय पीने की इच्छा हुई.

इत्तिफाक से जिस मेज के सामने गंगू बैठा था, उसी मेज के सामने मोहिनी भी आ कर बैठ गई. अब दोनों आमनेसामने बैठे थे. शक्ल से लग रहा था कि उन दोनों के दिल में पछतावा था. दोनों एकदूसरे को काफी देर तक आंखों में आंखें मिला कर देखते रहे.  चाय आई.

दोनों ने कप उठाए, फिर कुछ देर बाद गंगू अपनी आंखों में पछतावे के आंसू ले कर हड़बड़ाती हुई आवाज में मोहिनी से बोला, ‘‘इस बीच जुदाई में मैं तुम्हें बहुत याद करता था.’’

यह सुन कर मोहिनी की भी आंखों में आंसू आ गए और उस ने गंगू के हाथ पर अपना हाथ रख कर धीरे से कहा, ‘‘मैं भी…’’ अब गंगू ने लंबी सांस ली और धीरेधीरे कहने लगा,

‘‘अभी तुम्हें 2 लाख रुपए नकद और 4,000 रुपए भी तो हर महीने देने हैं.

मुझे इस का जल्द ही बंदोबस्त करना पड़ेगा.’’

‘‘अरे… तो दे देना, कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हैं आप…’’ मोहिनी बोली.

मोहिनी की यह बात सुन कर गंगू की आंखों से और ज्यादा आंसू छलक पड़े और उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अब भी बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘और मैं भी…’’ मोहिनी बोली. ‘‘तुम पर बदचलनी का झूठा आरोप लगाने के लिए मुझे माफ कर दो.’’ यह सुन कर मोहिनी बोली,

‘‘माफी मांगने की क्या जरूरत है… मैं ने भी तो आप पर दहेज के नाम पर सताने का झूठा आरोप लगाया था.’’

अब गंगू ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे बिना बिलकुल अकेला हो जाऊंगा.’’

‘‘और मैं भी,’’ मोहिनी बोली. गंगू डरते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हारे  साथ ही अपनी सारी जिंदगी गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘और मैं भी आप के साथ ही रहना चाहती हूं…’’ मोहिनी ने कहा,

‘‘पर…’’ ‘‘पर क्या?’’ गंगू ने पूछा. ‘‘पर, इस तलाक की परची का क्या करोगे?’’ मोहिनी बोली.

‘‘तो इस तलाक की परची को फाड़ कर फेंक देते हैं,’’ गंगू ने कहा.

फिर उन दोनों ने एकदूसरे को देखते हुए अपनीअपनी परची फाड़ कर फेंक दी और ठहाका मार कर हंस पड़े. इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे का हाथ पकड़ लिया और कुरसी से उठ कर गले लग गए. दोनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े. देखते ही देखते गंगू और मोहिनी दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर हंसते हुए होटल से बाहर चले गए. यह नजारा देख कर उस होटल में ठहरे उन के रिश्तेदारों के चेहरों पर मुर्दनी छा गई. Hindi Family Story

Hindi Family Story: पति-पत्नी और वो

Hindi Family Story: मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रही थी. अभी मुझे 2 साल भी नहीं हुए थे. कंपनी का एक बड़ा प्रोजैक्ट पूरा होने की खुशी में शनिवार को फाइव स्टार होटल में एक पार्टी थी. मुझे भी वहां जाना था. मेरे मैनेजर ने मुझे बुला कर खासतौर पर कहा, ‘‘प्रीति, तुम इस प्रोजैक्ट में शुरू से जुड़ी थीं, तुम्हारे काम से मैं बहुत खुश हूं. पार्टी में जरूर आना… वहां और सीनियर लोगों से भी तुम्हें इंट्रोड्यूज कराऊंगा जो तुम्हारे फ्यूचर के लिए अच्छा होगा.’’

‘‘थैंक्यू,’’ मैं ने कहा.

सागर मेरा मैनेजर है. लंबा कद, गोरा, क्लीन शेव्ड, बहुत हैंडसम ऐंड सौफ्ट स्पोकन. उस का व्यक्तित्व हर किसी को उस की ओर देखने को मजबूर करता. सुना है वाइस प्रैसिडैंट का दाहिना हाथ है… वे कंपनी के लिए नए प्रोजैक्ट लाने के लिए कस्टमर्स के पास सागर को ही भेजते. सागर अभी तक इस में सफल रहा था, इसलिए मैनेजमैंट उस से बहुत खुश है.

मैं ने अपनी एक कुलीग से पूछा कि वह भी पार्टी में आ रही है या नहीं तो उस ने कहा, ‘‘अरे वह हैंडसम बुलाए और हम न जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. बड़ा रंगीन और मस्तमौला लड़का है सागर.’’

‘‘वह शादीशुदा नहीं है क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘एचआर वाली मैम तो बोल रही थीं शादीशुदा है, पर बीवी कहीं और जौब करती है. सुना है अकसर यहां किसी न किसी फ्रैशर के साथ उस का कुछ चक्कर रहा है. यों समझ लो मियांबीवी के बीच कोई तीसरी वो. पर बंदे की पर्सनैलिटी में दम है. उस के साथ के लिए औफिस की दर्जनों लड़कियां तरसती हैं. मेरी शादी के पहले मुझ पर भी डोरे डाल रहा था. मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है, सिर्फ सगाई ही हुई है… एक शाम उस के नाम सही.’’

‘‘मतलब तेरा भी चक्कर रहा है सागर के साथ… पगली शादीशुदा हो कर ऐसी बातें करती है. खैर ये सब बातें छोड़ और बता तू आ रही है न पार्टी में?’’

‘‘हंड्रेड परसैंट आ रही हूं?’’

मैं शनिवार रात पार्टी में गई. मैं ने पार्टी के लिए अलग से मेकअप नहीं किया था. बस वही जो नौर्मल करती थी औपिस जाने के लिए. सिंपल नेवी ब्लू कलर के लौंग फ्रौक में जरा देर से पहुंची. देखा कि सागर के आसपास 4-5 लड़कियां पहले से बैठी थीं.

मुझे देख कर वह फौरन मेरे पास आ कर बोला, ‘‘वाऊ प्रीति, यू आर लुकिंग गौर्जियस. कम जौइन अस.’’

पहले सागर ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे वाइस प्रैसिडैंट के पास ले जा कर उन से मिलवाया.

उन्होंने कहा, ‘‘यू आर लुकिंग ग्रेट. सागर तुम्हारी बहुत तारीफ करता है. तुम्हारे रिपोर्ट्स भी ऐक्सीलैंट हैं.’’

मैंने उन्हें थैंक्स कहा. फिर अपनी कुलिग्स की टेबल पर आ गई. सागर भी वहीं आ गया. हाल में हलकी रंगीन रोशनी थी और सौफ्ट म्यूजिक चल रहा था. कुछ स्नैक्स और ड्रिंक्स का दौर चल रहा था.

सागर ने मुझ से भी पूछा, ‘‘तुम क्या लोगी?’’

‘‘मैं… मैं… कोल्डड्रिंक लूंगी.’’

सागर के साथ कुछ अन्य लड़कियां भी हंस पड़ीं.

‘‘ओह, कम औन, कम से कम बीयर तो ले लो. देखो तुम्हारे सभी कुलीग्स कुछ न कुछ ले ही रहे हैं. कह कर उस ने मेरे गिलास में बीयर डाली और फिर मेरे और अन्य लड़कियों के साथ गिलास टकरा कर चीयर्स कहा.

पहले तो मैं ने 1-2 घूंट ही लिए. फिर धीरेधीरे आधा गिलास पी लिया. डांस के लिए फास्ट म्यूजिक शुरू हुआ. सागर मुझ से रिक्वैस्ट कर मेरा हाथ पकड़ कर डांसिंग फ्लोर पर ले गया. पहले तो सिर्फ दोनों यों ही आमने-सामने खड़े शेक कर रहे थे, फिर सागर ने मेरी कमर को एक हाथ से पकड़ कर कहा, ‘‘लैट अस डांस प्रीति,’’ और फिर दूसर हाथ मेरे कंधे पर रख कर मुझ से भी मेरा हाथ पकड़ ऐसा ही करने को कहा.

म्यूजिक तो फास्ट था, फिर भी उस ने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मुझे स्लो स्टैप्स ही अच्छे लगते हैं. ज्यादा देर तक सामीप्य बना रहता है, कुछ मीठी बातें करने का मौका भी मिल जाता है और थकावट भी नहीं होती है.’’ मैं सिर्फ मुसकरा कर रह गई. वह मेरे बहुत करीब था. उस की सांसें मैं महसूस कर रही थी और शायद वह भी मेरी सांसें महसूस कर रहा था. उस ने धीरे से कहा, ‘‘अभी तुम्हारी शादी नहीं हुई है न?’’

‘‘नहीं, शादी अभी नहीं हुई है, पर 6 महीने बाद होनी है. समरेश मेरा बौयफ्रैंड ऐंड वुड बी हब्बी फौरन असाइनमैंट पर अमेरिका में है.’’

‘‘वैरी गुड,’’ कह उस ने मेरे कंधे और गाल पर झूलते बालों को अपने हाथ से पीछे हटा दिया, ‘‘अरे यह सुंदर चेहरा छिपाने की चीज नहीं है.’’

फिर उस ने अपनी उंगली से मेरे गालों को छू कर होंठों को छूना चाहा तो मैं ‘नो’ कह कर उस से अलग हो गई. मुझे अपनी सहेली का कहा याद आ गया था. उसके बाद हम दोनों 2 महीने तक औफिस में नौर्मल अपना काम करते रहे.

एक दिन सागर ने कहा, हमें एक प्रोजैक्ट के लिए हौंगकौंग जाना होगा.’’

‘‘हमें मतलब मुझे भी?’’

‘‘औफकोर्स, तुम्हें भी.’’

‘‘नहीं सागर, किसी और को साथ ले लो इस प्रोजैक्ट में.’’

‘‘तुम यह न समझना कि यह मेरा फैसला है… बौस का और्डर है यह. तुम चाहो तो उन से बात कर सकती हो.’’

मैं ने वाइस प्रैसिडैंट से भी रिक्वैस्ट की पर उन्होंने कहा, ‘‘प्रीति, बाकी सभी अपनेअपने प्रोजैक्ट में व्यस्त हैं. 2 और मेरी नजर में थीं, उन से पूछा भी था, पर दोनों अपनी प्रैगनैंसी के चलते दूर नहीं जाना चाहती हैं… मेरे पास तुम्हारे सिवा और कोई औप्शन नहीं है.’’

मैं सागर के साथ हौंगकौंग गई. वहां 1 सप्ताह का प्रोग्राम था. काफी भागदौड़ भरा सप्ताह रहा. मगर 1 सप्ताह में हमारा काम पूरा न हो सका. अपना स्टे और 3 दिन के लिए बढ़ाना पड़ा. हम दोनों थक कर चूर हो गए थे. बीच में 2 दिन वीकैंड में छुट्टी थी.

हौंगकौंग के क्लाइंट ने कहा, ‘‘इसी होटल में स्पा, मसाज की सुविधा है. मसाज करा लें तो थकावट दूर हो जाएगी और अगर ऐंजौय करना है तो कोव्लून चले जाएं.’’

‘‘मैं तो वहां जा चुका हूं. तुम कहो तो चलते हैं. थोड़ा चेंज हो जाएगा,’’ सागर ने कहा.

हम दोनों हौंगकौंग के उत्तर में कोव्लून द्वीप गए. थोड़े सैरसपाटे के बाद सागर बोला, ‘‘तुम होटल के मसाज पार्लर में जा कर फुल बौडी मसाज ले लो. पूरी थकावट दूर हो जाएगी.’’

मै स्पा गई. स्पा मैनेजर ने पूछा, ‘‘आप ने अपौइंटमैंट में थेरैपिस्ट की चौइस नहीं बताई है. अभी पुरुष और महिला दोनों थेरैपिस्ट हैं मेरे पास. अगर डीप प्रैशर मसाज चाहिए तो मेरे खयाल से पुरुष थेरैपिस्ट बेहतर होगा. वैसे आप की मरजी?’’

मैंने महिला थेरैपिस्ट के लिए कहा और अंदर मसाजरूम में चली गई.

बहुत खुशनुमा माहौल था. पहले तो मुझे ग्रीन टी पीने को मिली. कैंडल लाइट की धीमी रोशनी थी, जिस से लैवेंडर की भीनीभीनी खुशबू आ रही थी. लाइट म्यूजिक बज रहा था. थेरैपिस्ट ने मुझे कपड़े खोलने को कहा. फिर मेरे बदन को एक हरे सौफ्ट लिनेन से कवर कर पैरों से मसाज शुरू की. वह बीचबीच में धीरेधीरे मधुर बातें कर रही थी. फिर थेरैपिस्ट ने पूछा, ‘‘आप को सिर्फ मसाज करानी है या कुछ ऐक्स्ट्रा सर्विस विद ऐक्स्ट्रा कौस्ट… पर इस टेबल पर नो सैक्स?’’

‘‘मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे ऐसा कहने की क्या जरूरत थी. मैं ने महसूस किया कि मेरी बगल में भी एक मसाज चैंबर था. दोनों के बीच एक अस्थायी पार्टीशन वाल थी. जैसेजैसे मसाज ऊपर की ओर होती गई मैं बहुत रिलैक्स्ड फील कर रही थी. करीब 90 मिनट तक वह मेरी मसाज करती रही. महिला थेरैपिस्ट होने से मैं भी सहज थी और उसे भी मेरे अंगों को छूने में संकोच नहीं था. उस के हाथों खासकर उंगलियों के स्पर्श में एक जादू था और एक अजीब सा एहसास भी. पर धीरेधीरे उस के नो सैक्स कहने का अर्थ मुझे समझ में आने लगा था. मैं अराउज्ड यानी उत्तेजना फील करने लगी. मुझे लगा. मेरे अंदर कामवासना जाग्रत हो रही है.’’

तभी थेरैपिस्ट ने ‘‘मसाज हो गई,’’ कहा और बीच की अस्थायी पार्टीशन वाल हटा दी. अभी मैं ने पूरी ड्रैस भी नहीं पहनी थी कि देखा दूसरे चैंबर में सागर की भी मसाज पूरी हो चुकी थी. वह भी अभी पूरे कपड़े नहीं पहन पाया था. दूसरी थेरैपिस्ट गर्ल ने मुसकराते हुए कहा ‘‘देखने से आप दोनों का एक ही हाल लगता है, अब आप दोनों चाहें तो ऐंजौय कर सकते हैं.’’

मुझे सुन कर कुछ अजीब लगा, पर बुरा नहीं लगा. हम दोनों पार्लर से निकले. मुझे अभी तक बिना पीए मदहोशी लग रही थी. सागर मेरा हाथ पकड़ कर अपने रूम में ले गया. मैं भी मदहोश सी उस के साथ चल पड़ी. उस ने रूम में घुसते ही लाइट औफ कर दी.

सागर मुझ से सट कर खड़ा था. मेरी कमर में हाथ डाल कर अपनी ओर खींच रहा था और मैं उसे रोकना भी नहीं चाहती थी. वह अपनी उंगली से मेरे होंठों को सहला रहा था. मैं भी उस के सीने से लग गई थी. फिर उस ने मुझे किस किया तो ऐसा लगा सारे बदन में करंट दौड़ गया. उस ने मुझे बैड पर लिटा दिया और कहा, ‘‘जस्ट टू मिनट्स, मैं वाशरूम से अभी आया.’’

सागर ने अपनी पैंट खोल बैड के पास सोफे पर रख दी और टौवेल लपेट वह बाथरूम में गया. मैं ने देखा कि पैंट की बैक पौकेट से उस का पर्स निकल कर गिर पड़ा और खुल गया. मैं ने लाइट औन कर उस का पर्स उठाया. पर्स में एक औरत और एक बच्चे की तसवीर लगी थी.

मैं ने उस फोटो को नजदीक ला कर गौर से देखा. उसे पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं ने मन में सोचा यह तो मेरी नीरू दी हैं. कालेज के दिनों में मैं जब फ्रैशर थी सीनियर लड़के और लड़कियां दोनों मुझे रैगिंग कर परेशान कर रहे थे. मैं रोने लगी थी. तभी नीरू दी ने आ कर उन सभी को डांट लगाई थी और उन्हें सस्पैंड करा देने की वार्निंग दी थी. नीरू दी बीएससी फाइनल में थीं. इस के बाद मेरी पढ़ाई में भी उन्होंने मेरी मदद की थी. तभी से उन के प्रति मेरे दिल में श्रद्धा है. आज एक बार फिर नीरू दी स्वयं तो यहां न थीं, पर उन के फोटो ने मुझे गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया. मेरी मदहोशी अब फुर्र हो चली थी.

सागर बाथरूम से निकल कर बैड पर आया तो मैं उठ खड़ी हुई. उस ने मुझे बैड पर बैठने को कहा, ‘‘लाइट क्यों औन कर दी? अभी तो कुछ ऐंजौय किया ही नहीं.’’

‘‘ये आप की पत्नी और साथ में आप का बेटा है?’’

‘‘हां, तो क्या हुआ? वह दूसरे शहर में नौकरी कर रही है?’’

‘‘नहीं, वे मेरी नीरू दीदी भी हैं… मैं गलती करने से बच गई,’’ इतना बोल कर मैं उस के कमरे से निकल गई.

जहां एक ओर मुझे कुछ आत्मग्लानि हुई तो वहीं दूसरी ओर साफ बच निकलने का सुकून भी था. वरना तो मैं जिंदगीभर नीरू दी से आंख नहीं मिला पाती. हालांकि सागर ने कभी मेरे साथ कोई जबरदस्ती करने की कोशिश नहीं की.

इस के बाद 3 दिन और हौंगकौंग में हम दोनों साथ रहे… बिलकुल प्रोफैशनल की तरह

अपनेअपने काम से मतलब. चौथे दिन मैं और सागर इंडिया लौट आए. मैं ने नीरू दी का पता लगाया और उन्हें फोन किया. मैं बोली, ‘‘मैं प्रीति बोल रही हूं नीरू दी, आप ने मुझे पहचाना? कालेज में आप ने मुझे रैगिंग…’’

‘‘ओ प्रीति तुम? कहां हो आजकल और कैसी हो? कालेज के बाद तो हमारा संपर्क ही टूट गया था.’’

‘‘मैं यहीं सागर की जूनियर हूं. आप यहीं क्यों नहीं जौब कर रही हैं?’’

‘‘मैं भी इस के लिए कोशिश कर रही हूं. उम्मीद है जल्द ही वहां ट्रांसफर हो जाएगा.’’

‘‘हां दी, जल्दी आ जाइए, मेरा भी मन लग जाएगा,’’ और मैं ने फोन बंद कर दिया. हौंगकौंग के उस कमजोर पल की याद फिर आ गई, जिस से मैं बालबाल बच गई थी और वह भी सिर्फ एक तसवीर के चलते वरना अनजाने में ही पति-पत्नी के बीच मैं ‘वो’ बन गई होती. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: बचपना – सुधा की बेचैनी

Best Hindi Kahani: आज फिर वही चिट्ठी मनीआर्डर के साथ देखी, तो सुधा मन ही मन कसमसा कर रह गई. अपने पिया की चिट्ठी देख उसे जरा भी खुशी नहीं हुई. सुधा ने दुखी मन से फार्म पर दस्तखत कर के डाकिए से रुपए ले लिए और अपनी सास के पास चली आई और बोली ‘‘यह लीजिए अम्मां पैसा.’’ ‘‘मुझे क्या करना है. अंदर रख दे जा कर,’’ कहते हुए सासू मां दरवाजे की चौखट से टिक कर खड़ी हो गईं. देखते ही देखते उन के चेहरे की उदासी गहरी होती चली गई.

सुधा उन के दिल का हाल अच्छी तरह समझ रही थी. वह जानती थी कि उस से कहीं ज्यादा दुख अम्मां को है. उस का तो सिर्फ पति ही उस से दूर है, पर अम्मां का तो बेटा दूर होने के साथसाथ उन की प्यारी बहू का पति भी उस से दूर है. यह पहला मौका है, जब सुधा का पति सालभर से घर नहीं आया. इस से पहले 4 नहीं, तो 6 महीने में एक बार तो वह जरूर चला आता था.

इस बार आखिर क्या बात हो गई, जो उस ने इतने दिनों तक खबर नहीं ली? अम्मां के मन में तरहतरह के खयाल आ रहे थे. कभी वे सोचतीं कि किसी लड़की के चक्कर में तो नहीं फंस गया वह? पर उन्हें भरोसा नहीं होता था. हो न हो, पिछली बार की बहू की हरकत पर वह नाराज हो गया होगा. है भी तो नासमझ. अपने सिवा किसी और का लाड़ उस से देखा ही नहीं जाता.

नालायक यह नहीं समझाता, बहू भी तो उस के ही सहारे इस घर में आई है. उस बेचारी का कौन है यहां? सोचतेसोचते उन्हें वह सीन याद आ गया, जब बहू उन के प्यार पर अपना हक जता कर सूरज को चिढ़ा रही थी और वह मुंह फुलाए बैठा था. अगली बार डाकिए की आवाज सुन कर सुधा कमरे में से ही कहने लगी, ‘‘अम्मां, डाकिया आया है.

पैसे और फार्म ले कर अंदर आ जाइए, दस्तखत कर दूंगी.’’ सुधा की बात सुन कर अम्मां चौंक पड़ीं. पहली बार ऐसा हुआ था कि डाकिए की आवाज सुन कर सुधा दौड़ीदौड़ी दरवाजे तक नहीं गई… तो क्या इतनी दुखी हो गई उन की बहू? अम्मां डाकिए के पास गईं. इस बार उस ने चिट्ठी भी नहीं लिखी थी. पैसा बहू की तरफ बढ़ा कर अम्मां रोंआसी आवाज में कहने लगीं, ‘‘ले बहू, पैसा अंदर रख दे जा कर.’’ अम्मां की आवाज कानों में पड़ते ही सुधा बेचैन निगाहों से उन के हाथों को देखने लगी.

वह अम्मां से चिट्ठी मांगने को हुई कि अम्मां कहने लगीं, ‘‘क्या देख रही है? अब की बार चिट्ठी भी नहीं डाली है उस ने.’’ सुधा मन ही मन तिलमिला कर रह गई. अगले ही पल उस ने मर जाने के लिए हिम्मत जुटा ली, पर पिया से मिलने की एक ख्वाहिश ने आज फिर उस के अरमानों पर पानी फेर दिया. अगले महीने भी सिर्फ मनीआर्डर आया, तो सुधा की रहीसही उम्मीद भी टूट गई.

उसे अब न तो चिट्ठी आने का भरोसा रहा और न ही इंतजार. एक दिन अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. पहली बार तो सुधा को लगा, जैसे वह सपना देख रही हो, पर जब दोबारा किसी ने दरवाजा खटखटाया, तो वह दरवाजा खोलने चल दी. दरवाजा खुलते ही जो खुशी मिली, उस ने सुधा को दीवाना बना दिया. वह चुपचाप खड़ी हो कर अपने साजन को ऐसे ताकती रह गई, मानो सपना समझ कर हमेशा के लिए उसे अपनी निगाहों में कैद कर लेना चाहती हो.

सूरज घर के अंदर चला आया और सुधा आने वाले दिनों के लिए ढेर सारी खुशियां सहेजने को संभल भी न पाई थी कि अम्मां की चीखों ने उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा दी. अम्मां गुस्सा होते हुए अपने बेटे पर चिल्लाए जा रही थीं, ‘‘क्यों आया है? तेरे बिना हम मर नहीं जाते.’’ ‘‘क्या बात है अम्मां?’’ सुधा को अपने पिया की आवाज सुनाई दी.

‘‘पैसा भेज कर एहसान कर रहा था हम पर? क्या हम पैसों के भूखे हैं?’’ अम्मां की आवाज में गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था. ‘‘क्या बात हो गई?’’ आखिर सूरज गंभीर हो कर पूछ ही बैठा. ‘‘बहू, तेरा पति पूछ रहा है कि बात क्या हो गई. 2 महीने से बराबर खाली पैसा भेजता रहता है, अपनी खैरखबर की छोटी सी एक चिट्ठी भी लिखना इस के लिए सिर का बोझ बन गया और पूछता है कि क्या बात हो गई?’’ सूरज बिगड़ कर कहने लगा, ‘‘नहीं भेजी चिट्ठी तो कौन सी आफत आ गई?

तुम्हारी लाड़ली तो तुम्हारे पास है, फिर मेरी फिक्र करने की क्या जरूरत पड़ी?’’ सुधा अपने पति के ये शब्द सुन कर चौंक गई. शब्द नए नहीं थे, नई थी उन के सहारे उस पर बरस पड़ी नफरत. वह नफरत, जिस के बारे में उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. सुधा अच्छी तरह समझ गई कि यह सब उन अठखेलियों का ही नतीजा है, जिन में वह इन्हें अम्मां के प्यार पर अपना ज्यादा हक जता कर चिढ़ाती रही है, अपने पिया को सताती रही है.

इस में कुसूर सिर्फ सुधा का ही नहीं है, अम्मां का भी तो है, जिन्होंने उसे इतना प्यार किया. जब वे जानती थीं अपने बेटे को, तो क्यों किया उस से इतना प्यार? क्यों उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह इस घर की बेटी नहीं बहू है? अम्मां सुधा का पक्ष ले रही हैं, यह भी गनीमत ही है, वरना वे भी उस का साथ न दें, तो वह क्या कर लेगी.

इस समय तो अम्मां का साथ देना ही बहुत जरूरी है. अम्मां अभी भी अपने बेटे से लड़े जा रही थीं, ‘‘तेरा दिमाग बहुत ज्यादा खराब हो गया है.’’ अम्मां की बात का जवाब सूरज की जबान पर आया ही था कि सुधा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘यह सब अच्छा लगता है क्या आप को? अम्मां के मुंह लगे चले जा रहे हैं. बड़े अच्छे लग रहे हैं न?’’ ‘‘चुप, यह सब तेरा ही कियाधरा है. तुझे तो चैन मिल गया होगा, यह सब देख कर.

न जाने कितने कान भर दिए कि अम्मां आते ही मुझ पर बरस पड़ीं,’’ थोड़ी देर रुक कर सूरज ने खुद पर काबू करना चाहा, फिर कहने लगा, ‘‘यह किसी ने पूछा कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं भेजी? इस की फिक्र किसे है? अम्मां पर तो बस तेरा ही जादू चढ़ा है.’’ ‘‘हां, मेरा जादू चढ़ा तो है, पर मैं क्या करूं? मुझे मार डालो, तब ठीक रहेगा.

मुझ से तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा और मुझे तुम्हारे बिना जीने से.’’ अब जा कर अम्मां का माथा ठनका. आज उन के बच्चों की लड़ाई बच्चों का खेल नहीं थी. आज तो उन के बच्चों के बीच नफरत की बुनियाद पड़ती नजर आ रही थी. बहू का इस तरह बीच में बोल पड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. वे अपनी बहू की सोच पर चौंकी थीं.

वे तो सोच रही थीं कि उन के बेटे की सूरत देख कर बहू सारे गिलेशिकवे भूल गई होगी. अम्मां की आवाज से गुस्सा अचानक काफूर गया. वे सूरज को बच्चे की तरह समझने लगीं, ‘‘इस को पागल कुत्ते ने काटा है, जो तेरी खुशियां छीनेगी? तेरी हर खुशी पर तो तुझ से पहले खुश होने का हक इस का है. फिर क्यों करेगी वह ऐसा, बता? र

ही बात मेरी, तो बता कौन सा ऐसा दिन गुजरा, जब मैं ने तुझे लाड़ नहीं किया?’’ ‘‘आज ही देखो न, यह तो किसी ने पूछा नहीं कि हालचाल कैसा है? इतना कमजोर कैसे हो गया तू? तुम को इस की फिक्र ही कहां है. फिक्र तो इस बात की है कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं?डाली?’’ सूरज बोला.

अम्मां पर मानो आसमान फट पड़ा. आज उन की सारी ममता अपराधी बन कर उन के सामने खड़ी हो गई. आज यह हुआ क्या? उन की समझ में कुछ न आया. अम्मां चुपचाप सूरज का चेहरा निहारने लगीं, कुछ कह ही न सकीं, पर सुधा चुप न रही.

उस ने दौड़ कर अपने सूरज का हाथ पकड़ लिया और पूछने लगी, ‘‘बोलो न, क्या हुआ? तुम बताते क्यों नहीं हो?’’ ‘‘मैं 2 महीने से बीमार था. लोगों से कह कर जैसेतैसे मनीआर्डर तो करा दिया, पर चिट्ठी नहीं भेज सका. बस, यही एक गुनाह हो गया.’’ सुधा की आंखों से निकले आंसू होंठों तक आ गए और मन में पागलपन का फुतूर भर उठा, ‘‘देखो अम्मां, सुना कैसे रहे हैं? इन से तो अच्छा दुश्मन भी होगा, मैं बच्ची नहीं हूं, अच्छी तरह जानती हूं कि भेजना चाहते, तो एक नहीं 10 चिट्ठियां भेज सकते थे.

‘‘नहीं भेजते तो किसी से बीमारी की खबर ही करा देते, पर क्यों करते ऐसा? तुम कितना ही पीछा छुड़ाओ, मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली.’’ अम्मां चौंक कर अपनी बहू की बौखलाहट देखती रह गईं, फिर बोलीं, ‘‘क्या पागल हो गई है बहू?’’ ‘‘पागल ही हो जाऊं अम्मां, तब भी तो ठीक है,’’ कहते हुए बिलख कर रो पड़ी सुधा और फिर कहने लगी, ‘‘पागल हो कर तो इन्हें अपने प्यार का एहसास कराना आसान होगा.

किसी तरह से रो कर, गा कर और नाचनाच कर इन्हें अपने जाल में फंसा ही लूंगी. कम से कम मेरा समझदार होना तो आड़े नहीं आएगा,’’ कहतेकहते सुधा का गला भर आया. सूरज आज अपनी बीवी का नया रूप देख रहा था. अब गिलेशिकवे मिटाने की फुरसत किसे थी? सुधा पति के आने की खुशियां मनाने में जुट गई. अम्मां भी अपना सारा दर्द समेट कर फिर अपने बच्चों से प्यार करने के सपने संजोने लगी थीं. Best Hindi Kahani

Hindi Story: विरासत – आकर्षण को मिला विरासत का तोहफा

Hindi Story: ‘‘दादाजी, आप का पाकिस्तान से फोन है,’’ आश्चर्य भरे स्वर में आकर्षण ने अपने दादा नंद शर्मा से कहा.

‘‘पाकिस्तान से, पर अब तो हमारा वहां कोई नहीं है. फिर अचानक…फोन,’’ नंद शर्मा ने तुरंत फोन पकड़ा.

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘अस्सलामअलैकुम, मैं पाकिस्तान, जडांवाला से जहीर अहमद बोल रहा हूं. मैं ने आप का साक्षात्कार यहां के अखबार में पढ़ा था. मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि मेरे शहर जड़ांवाला के रहने वाले एक नागरिक ने हिंदुस्तान में खूब तरक्की पाई है. मैं ने यह भी पढ़ा है कि आप के मन में अपनी जन्मभूमि को देखने की बड़ी तमन्ना है. मैं आप के लिए कुछ उपहार भेज रहा हूं जो चंद दिनों में आप को मिल जाएगा, शेष बातें मैं ने पत्र में लिख दी हैं जो मेरे उपहार के साथ आप को मिल जाएगा.’’

फोन पर जहीर की बातें सुन कर नंद शर्मा भावुक हो उठे. फिर बोले, ‘‘भाई, आज बरसों बाद मैं ने अपने जन्मस्थान से किसी की आवाज सुनी है. आज आप से बात कर के 55 साल पहले का बीता समय आंखों के आगे घूम रहा है. मैं क्या कहूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है. बस, आप की समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं.’’

इतना कहतेकहते नंद शर्मा की आंखें डबडबा गईं. वह आगे कुछ न कह सके और फोन रख दिया.

14 साल का आकर्षण अपने दादाजी के पास ही खड़ा था. उस ने दादाजी को इतना भावुक होते कभी नहीं देखा था.

कुछ समय तक नंद शर्मा की आंखें नम रहीं. उन्हें ऐसा लगा था मानो वह वहां केवल शरीर से मौजूद थे, उन का मन 55 साल पहले के जड़ांवाला में था.

आकर्षण कुछ देर वहां बैठा और उन के सामान्य होने का इंतजार करता रहा. फिर बोला, ‘‘दादाजी, आप को अपने पुराने घर की याद आ रही है?’’

‘‘हां बेटा, बंटवारे के समय मैं 17 साल का था. आज भी मुझे वह दिन याद है जब जड़ांवाला में कत्लेआम शुरू हुआ और दंगाइयों ने चुनचुन कर हिंदुओं को गाजरमूली की तरह काटा था. हमारे पड़ोसी मुसलमान परिवार ने हमें शरण दी और फिर मौका पा कर एकएक कर के मेरे परिवार के लोगों को सेना के पास पहुंचा दिया था. मेरे परिवार में केवल मैं ही पाकिस्तान में बचा था. मैं भी मौका देख कर निकलने की ताक में था कि किसी ने दंगाइयों को खबर कर दी कि नंद शर्मा को उस के पड़ोसियों ने पनाह दे रखी है.

‘‘खबर पा कर दंगाई पागलों की तरह उस घर की ओर झपटे. इस से पहले कि वे मेरी ओर पहुंच पाते मुझे छत के रास्ते से उन्होंने भगा दिया.

‘‘मैं एक छत से दूसरी छत को फांदता हुआ जैसे ही सड़क पर पहुंचा कि तभी सेना का ट्रक आ गया और सेना को देख कर दंगाई भाग खड़े हुए. फिर उसी ट्रक से सेना ने मुझे अमृतसर के लिए रवाना कर दिया.

‘‘उस वक्त तक मैं यही समझता था कि यह अशांति कुछ समय की है… धीरधीरे सब ठीक हो जाएगा, मैं फिर अपने परिवार के साथ वापस जड़ांवाला जा पाऊंगा पर यह मेरा भ्रम था. पिछले 55 सालों में कभी ऐसा मौका नहीं आया. मेरा शहर, मेरी जन्मभूमि, मेरी विरासत हमेशा के लिए मुझ से छीन ली गई.’’

इतना कह कर नंद शर्मा खामोश हो गए. आकर्षण का मन अभी और भी बहुत कुछ जानने को इच्छुक था पर उस समय दादा को परेशान करना उचित नहीं समझा.

नंद शर्मा हरियाणा के अंबाला शहर में एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे. उन की गिनती वहां के वरिष्ठ पत्रकारों में होती थी. कुछ समय पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री ने एक पत्रकार सम्मेलन में उन्हें सम्मानित किया था. उस सम्मेलन में पाकिस्तान से भी पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल आया हुआ था. उस समारोह में नंद शर्मा ने इस बात का जिक्र किया था कि वह विभाजन के बाद जड़ांवाला से भारत कैसे आए थे और साथ ही वहां से जुड़ी यादों को भी ताजा किया.

समारोह समाप्त होने के बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने उन का साक्षात्कार लिया और पाकिस्तान आ कर अपने अखबार में उसे छाप भी दिया. वह साक्षात्कार जड़ांवाला के वकील जहीर अहमद ने पढ़ा तो उन्हें यह जान कर बहुत दुख हुआ कि कोई व्यक्ति इस कदर अपनी जन्मभूमि को देखने के लिए तड़प रहा है.

जहीर एक नेकदिल इनसान था. उस ने नंद शर्मा के लिए फौरन कुछ करने का फैसला लिया और समाचारपत्र में प्रकाशित नंबर पर उन से संपर्क किया.

नंद शर्मा एक भरेपूरे परिवार के मुखिया थे. उन के 4 बेटे और 1 बेटी थी. सभी विवाहित और बालबच्चों वाले थे. आज के इस भौतिकवादी युग में भी सभी मिलजुल कर एक ही छत के नीचे रहते थे.

आकर्षण ने जब सब को पाकिस्तान से आए फोन के  बारे में बताया तो सब विस्मित रह गए. फिर नंद शर्मा के बड़े बेटे मोहन शर्मा ने पिता के पास जा कर कहा, ‘‘बाबूजी, यदि आप कहें तो हम सब जड़ांवाला जा सकते हैं और अब तो बस सेवा भी शुरू हो चुकी है. इसी बहाने हम भी अपने पुरखों की जमीन को देख आएंगे.’’

‘‘मन तो मेरा भी करता है कि एक बार जड़ांवाला देख आऊं पर देखो कब जाना होता है,’’ इतना कह कर नंद शर्मा खामोश हो गए.

एक दिन नंद शर्मा के नाम एक पार्सल आया. वह पार्सल देखते ही आकर्षण जोर से चिल्लाया, ‘‘दादाजी, आप के लिए पाकिस्तान से पार्सल आया है,’’ और इसी के साथ परिवार के सारे सदस्य उसे देखने के लिए जमा हो गए.

नंद शर्मा आंगन में कुरसी डाल कर बैठ गए. आकर्षण ने उस पैकेट को खोला. उस में 100 से भी अधिक तसवीरें थीं. हर तसवीर के पीछे उर्दू में उस का पूरा विवरण लिखा हुआ था.

नंद शर्मा के चेहरे पर उमड़ते खुशी के भावों को आसानी से पढ़ा जा सकता था. उन्होंने ही नहीं, उन का पूरा परिवार उन तसवीरों को देख कर भावविभोर हो उठा.

एक तसवीर उठाते हुए नंद शर्मा ने कहा, ‘‘यह देखो, हमारा घर, हमारी पुश्तैनी हवेली और यहां अब बैंक आफ पाकिस्तान बन गया है.’’

नंद शर्मा के पोतेपोतियां बहुत हैरान हो उन तसवीरों को देख रहे थे. उन के छोटे पोते मानू और शानू बोले, ‘‘दादाजी, क्या इन में आप का स्कूल भी है?’’

‘‘हां बेटा, अभी दिखाता हूं,’’ कह कर उन्होंने तसवीरों को उलटापलटा तो उन्हें स्कूल की तसवीर नजर आई. अपने स्कूल की तसवीर देख कर उन का चेहरा खिल उठा और वह खुशी से चिल्ला उठे, ‘‘यह देखो बच्चों, मेरा स्कूल और यह रही मेरी कक्षा. यहां मैं टाट पर बैठ कर बच्चों के साथ पढ़ता था.’’

धीरेधीरे जड़ांवाला के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, खेल के मैदान, सिनेमाघर, वहां की गलियां, पड़ोसियों के घर, गोलगप्पे, चाट वालों की दुकान और वहां की छोटी से छोटी जानकारी भी तसवीरों के माध्यम से सामने आने लगी. अंत में एक छोटी सी कपड़े की थैली को खोला गया. उस में कुछ मिट्टी थी और साथ में एक छोटा सा पत्र था. पत्र जहीर अहमद का था जिस में उस ने लिखा था :

‘नमस्ते, आज यह तसवीरें आप के पास पहुंचाते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है. आप भी सोचते होंगे कि मुझे क्या जरूरत पड़ी थी यह सब करने की. भाईजान, मेरे वालिद बंटवारे से पहले पंजाब के बटाला शहर में रहते थे. अपने जीतेजी वह कभी अपने शहर वापस न आ सके. उन के मन में यह आरजू ही रह गई कि वह अपनी जन्मभूमि को एक बार देख सकें. इसलिए जब मैं ने आप के बारे में पढ़ा तो फैसला किया कि आप की खुशी के लिए जो बन पड़ेगा, जरूर करूंगा.

‘भाईजान, इस पोटली में आप के पुश्तैनी मकान की मिट्टी है जो मेरे खयाल से आप के लिए बहुत कीमती होगी. इस के साथ ही मैं अपने परिवार की ओर से भी आप को पाकिस्तान आने की दावत देता हूं. आप जब चाहें यहां तशरीफ ला सकते हैं. आप अपने बच्चों, पोतेपोतियों के साथ यहां आएं. हम आप की खातिरदारी में कोई कमी नहीं रखेंगे.

‘आप का, जहीर अहमद.’

पत्र पढ़तेपढ़ते नंद शर्मा भावुक हो उठे. उन्होंने फौरन घर की पुश्तैनी मिट्टी को अपने माथे से लगाया और अपने पोते आकर्षण को बुला कर उस मिट्टी से सब के माथे पर तिलक करने को कहा.

‘‘दादाजी, पाकिस्तानी तो बहुत अच्छे हैं,’’ आकर्षण बोला, ‘‘फिर क्यों हम उस देश को नफरत की दृष्टि से देखते हैं. आज जहीर अहमद के कारण ही घरबैठे आप को अपनी विरासत के दर्शन हुए हैं.’’

‘‘ठीक कहते हो बेटा,’’ नंद शर्मा बोले, ‘‘घृणा और नफरत की दीवार तो चंद नेताओं और संकीर्ण विचारधारा वाले तथाकथित लोगों ने बनाई है. आम हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी के दिलों में कोई मैल नहीं है. आज अगर मैं तुम्हारे सामने जिंदा हूं तो अपने उस मुसलिम पड़ोसी परिवार के कारण जिन्होंने समय रहते मुझे व मेरे परिवार को वहां से बाहर निकाला.’’

नंद शर्मा अगले कुछ दिनों तक घर आनेजाने वालों को जड़ांवाला की तसवीरें दिखाते रहे. एक दिन शाम को जब वह पत्रकार सम्मेलन से वापस आए तो ‘हैप्पी बर्थ डे टू दादाजी’ की ध्वनि से वातावरण गूंज उठा. उस दिन उन के जन्मदिन पर बच्चों ने उन्हें पार्टी देने का मन बनाया था.

नंद शर्मा को उन के पोतेपोतियों ने घेर लिया और फिर उन्हें उस कमरे की ओर ले गए जहां केक रखा था. वहां जा कर उन्होंने केक काटा और फिर सब ने खूब मस्ती की. फोटोग्राफर को बुलवा कर तसवीरें भी खिंचवाई गईं. बाद में उन में से एक तसवीर जो पूरे परिवार के साथ थी, वह जड़ांवाला भेज दी गई.

वक्त गुजरता रहा. धीरधीरे पत्राचार और फोन के माध्यम से दोनों परिवारों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. देखते ही देखते 1 साल बीत गया. एक दिन जहीर अहमद का फोन आया, ‘‘भाईजान, ठीक 1 माह बाद मेरे बड़े बेटे की शादी है. आप सपरिवार आमंत्रित हैं. और हां, कोई बहाना बनाने की जरूरत नहीं है. मैं ने सारा इंतजाम कर दिया है. आप के पुरखों की विरासत आप का इंतजार कर रही है.’’

नंद शर्मा तो मानो इसी पल का इंतजार कर रहे थे. उन्होंने तुरंत कहा, ‘‘ऐसा कभी हो सकता है कि मेरे भतीजे की शादी हो और मैं न आऊं. आप इंतजार कीजिए, मैं सपरिवार आ रहा हूं.’’

रात के खाने पर जब सारा परिवार जमा हुआ तो नंद शर्मा ने रहस्योद्घाटन किया, ‘‘ध्यान से सुनो, हम सब लोग अगले माह जड़ांवाला जहीर के बेटे की शादी में जा रहे हैं. अपनीअपनी तैयारियां कर लो.’’

‘‘हुर्रे,’’ सब बच्चे खुशी से नाच उठे.

‘‘सच है, अपनी जमीन, अपनी मिट्टी और अपनी विरासत, इन की खुशबू ही कुछ और है,’’ कह कर नंद शर्मा आंखें बंद कर मानो किसी अलौकिक सुख में खो गए. Hindi Story

Hindi Story: बहू – कैसे बुझी शाहिदा की प्यास

Hindi Story: शाहिदा शेख प्रोफैसर महमूद शौकत की छात्रा रह चुकी थी. 3 साल पहले बीए की डिगरी ले कर वह घर बैठ गई थी. कुछ दिनों पहले न जाने कैसे और कब वह प्रोफैसर से आ मिली, कब दिलोदिमाग पर छाई, कब हवस बन कर रोमरोम में समा गई, उन्हें कुछ नहीं याद. यह भी याद नहीं कि पहले किस ने किस को बेपरदा किया था.

अगर याददाश्त में कुछ महफूज रखा था तो बस शाहिदा शेख की चंचलता, अल्हड़ता और उस का मादक शरीर जो उन की खाली जिंदगी और ढलती उम्र के लिए खास तोहफे की तरह था.

यही हाल शाहिदा शेख का भी था, क्योंकि दोनों ही एकदूसरे के बिना अधूरापन महसूस करते थे.

शाहिदा शेख अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी, इसलिए एक प्रोफैसर का उन के घर आनाजाना किसी इज्जत से कम न था. उन्हें अपनी बेटी पर फख्र भी होता था कि यह इज्जत उन्हें उसी के चलते मिल रही थी. वे समझते थे कि प्रोफैसर उन की बेटी को अपनी बेटी की तरह मानते हैं.

प्रोफैसर महमूद शौकत को दिलफेंक, आशिकमिजाज या हवस का पुजारी कहा जाए, ऐसा कतई न था, बल्कि वे तो ऐसे लोगों में से थे जो हर समय गंभीरता ओढ़े रहते हैं. अलबत्ता, वे सठिया जरूर गए थे यानी उन की उम्र 60वें साल में घुस चुकी थी.

प्रोफैसर महमूद शौकत की पत्नी 10 साल पहले ही इस दुनिया से जा चुकी थीं. पत्नी की इस अचानक जुदाई से प्रोफैसर महमूद शौकत ऐसे बिखरे थे कि उन का सिमटना मुहाल हो गया था. कालेज जाना तो दूर खानेपीने तक की सुध न रहती थी. हां, कुछ होश था तो बस उन्हें अपनी बेटी का, जो जवानी की दहलीज पर थी. अब तो वह भी अपने घरबार की हो गई थी और 2 बच्चों की मां भी बन चुकी थी. बेटा कंप्यूटर इंजीनियर था और एक निजी कंपनी में मुलाजिम था. प्रोफैसर महमूद शौकत समय से पहले रिटायरमैंट ले कर खुद आराम से सुख भोग रहे थे.

इधर लगातार कई दिनों से प्रोफैसर महमूद शौकत शाहिदा शेख का दीदार न कर सके थे. इंतजार जब आंख का कांटा बन गया तो वे सीधे उस के घर जा पहुंचे. पता चला कि वह पिछले 10 दिनों से मलेरिया से पीडि़त थी. खैर, अब कुछ राहत थी लेकिन कमजोरी ऐसी कि उठनाबैठना मुहाल हो गया था.

प्रोफैसर महमूद शौकत जैसे ही शाहिदा शेख के बैडरूम में गए, उन्हें देखते ही शाहिदा की निराश आंखें चमक उठीं और बीमार मुरझाया चेहरा खिल गया.

इस बीच प्रोफैसर महमूद शौकत शाहिदा की नब्ज देखने के लिए उस पर झुके थे कि उस ने झट उन पर गलबहियां डाल दीं और अपने तपतेसुलगते होंठों को उन के होंठों में धंसा दिया.

शाहिदा शेख के ऐसे बरताव से प्रोफैसर महमूद शौकत शर्मिंदा हो उठे और खुद को उस की पकड़ से छुड़ाते हुए बोले, ‘‘प्लीज, मौके की नजाकत को समझो.’’

‘‘समझ रही हूं सर कि मम्मी हमारे बीच दीवार बनी हुई हैं. मैं तो उम्मीद कर रही हूं कि वे थोड़ी देर के लिए ही सही, किसी काम से बाहर चली जाएं और हम एकदूसरे में…’’

शाहिदा की पकड़ से छूट कर प्रोफैसर महमूद शौकत सोफे पर बैठे ही थे कि शाहिदा की मम्मी चायनमकीन लिए कमरे में आ धमकीं.

यह देख प्रोफैसर का जी धक से हो गया और चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वे सोचने लगे कि अगर वे कुछ समय पहले आ जातीं तो…

बहरहाल, चाय की चुसकियों के दौरान उन में बातें होने लगीं. फिर शाहिदा की मम्मी अपने घराने और शाहिदा से संबंधित बातों की गठरी खोल बैठीं. बातों ही बातों में उस के ब्याह की चर्चा छेड़ दी. वे कहने लगीं, ‘‘प्रोफैसर साहब, हम पिछले 3 महीनों से शाहिदा के लिए लड़का खोज रहे हैं, पर अच्छे लड़कों का तो जैसे अकाल पड़ा है. देखिए न कोई मुनासिब लड़का हमारी शाहिदा के लिए.’’

इस से पहले कि प्रोफैसर कुछ कहते, शाहिदा झट से बोल पड़ी, ‘‘सर, अपनी ही कालोनी में देखिएगा, ताकि शादी के बाद भी मैं आप के करीब रहूं.’’

उस रात प्रोफैसर सो नहीं सके थे. शाहिदा का कहा उन के दिमाग में गूंजने लगता और वे चौंक कर उठ बैठते.

इसी उधेड़बुन में वे धीरेधीरे फ्लैशबैक में चले गए.

होटल मेघदूत के आलीशान कमरे में नरम बिस्तर पर शाहिदा शेख बिना कपड़ों के प्रोफैसर महमूद शौकत की बांहों में सिमटी कह रही थी, ‘जी तो चाहता है सर, मैं जवानी की सभी घडि़यां आप की बांहों में बिताऊं. आप ऐसे ही मेरे बदन के तारों को छेड़ते रहें और मैं आप की मर्दानगी से मस्त होती रहूं.’

इतना सुनने के बाद प्रोफैसर ने उस के रेशमी बालों से खेलते हुए पूछा था, ‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि हम जो कर रहे हैं, वह गुनाह है?’

शाहिदा ने न में सिर हिला दिया.

‘क्यों?’

‘क्योंकि, सैक्स कुदरत की देन है. इस को गुनाह कैसे कह सकते हैं. वैसे भी सर, मैं तो मानती हूं कि यह केवल हमारी शारीरिक जरूरत है. आप मर्द हैं और आप को मेरी जवानी चाहिए. मैं औरत हूं और मुझे आप की मर्दानगी की तलब है.’

‘ओह मेरी जान,’ शाहिदा की इस बात पर प्रोफैसर महमूद शौकत चहक उठे थे. साथ ही, उन के होंठ उस के होंठों पर झुकते चले गए.

शाहिदा इस अचानक हल्ले के लिए तैयार न थी, फिर भी उन की छुअन ने उस के शरीर को झनझना दिया था और उस का कोमल शरीर उन की बांहों के घेरे में फड़फड़ाने लगा था.

प्रोफैसर का यह कामुक हल्ला इतना तेज… इतना वहशियाना था कि शाहिदा का पोरपोर उधेड़े दे रहा था. शाहिदा भी अपने शरीर को ऐसे ढीला छोड़ रही थी मानो खुद को हारा हुआ मान लिया हो.

कुछ मिनट तक दोनों ऐसे ही बिस्तर पर उधड़ेउधड़े बिखरेबिखरे से रहे, फिर किसी तरह शाहिदा खुद को अपने में बटोरतेसमेटते फुसफुसाई, ‘सर…’

‘क्या…’

‘इस उम्र में भी आप में नौजवानों से कहीं ज्यादा मर्दानगी का जोश है.’

यह सुन कर प्रोफैसर महमूद शौकत हैरानी से उसे देखने लगे.

‘हां सर, मुझे तो अपने साथी लड़कों से कहीं ज्यादा सुख आप से मिलता है.’

‘लेकिन, तुम यह कैसे कह सकती हो?’ प्रोफैसर की आवाज में बौखलाहट आ गई थी.

‘आजमाया है मैं ने… 1-2 को नहीं, दसियों को.’

‘यानी तुम उन के साथ…’

‘बिलकुल, शायद पहले भी आप से कह चुकी हूं कि मेरे लिए जिंदगी मौत का नजरअंदाज किया हुआ एक पल है, तो क्यों न मैं हर पल को ज्यादा से ज्यादा भोगूं…’

यह सुन कर प्रोफैसर चौंक उठते हैं और फ्लैशबैक से वापस आ जाते हैं. वे फटीफटी आंखों से शून्य में घूरने लगते हैं और धीरेधीरे वह शून्य सिनेमा के परदे में बदल जाता है. उस में 2 धुंधली छाया निकाह कर रही होती हैं. जैसेजैसे दूल्हे के मुंह से ‘कबूल है’ की गिनती बढ़ती है, दुलहन शाहिदा का और दूल्हा प्रोफैसर का रूप धर लेता है.

उसी पल प्रोफैसर की बेटी अपने दोनों बच्चों की उंगली थामे शाहिदा के सामने आ खड़ी होती है और उन का यह सुंदर सपना इस तरह गायब हो जाता है जैसे बिजली गुल होने पर टैलीविजन स्क्रीन से चित्र.

सुबह होते ही प्रोफैसर शौकत बिना सोचेसमझे शाहिदा के घर जा पहुंचे. डोर बैल की आवाज पर शाहिदा की मम्मी ने दरवाजा खोला और अपने सामने प्रोफैसर को देख वे हैरत में डूब गईं, ‘‘प्रोफैसर साहब, आप…’’

प्रोफैसर महमूद शौकत चुपचाप निढाल कदमों से अंदर गए और खुद को सोफे पर गिराते हुए पूछा, ‘‘शेख साहब कहां हैं?’’

‘‘वे तो सो रहे हैं…’’ कहते हुए शाहिदा की मम्मी ने उन की आंखों में झांका, ‘‘अरे, आप की आंखें… लगता है, सारी रात आप जागते रहे हैं.’’

‘‘हां… मैं रातभर शाहिदा के निकाह को ले कर उलझा रहा… आप ने कहा था न कि मैं उस के लिए लड़का देखूं?’’

‘‘तो देखा आप ने?’’ मम्मी जानने के लिए उत्सुक हो गईं, ‘‘कौन है? क्या करता है? मतलब काम… फैमिली बैकग्राउंड क्या है?

‘‘अजी सुनते हो, उठो जल्दी… देखो, प्रोफैसर साहब आए हैं. हमारी शाहिदा के लिए लड़का देख रखा है इन्होंने. कितना ध्यान रखते हैं हमारी शाहिदा का.’’

‘‘महान नहीं, खुदा हैं खुदा,’’ शेख साहब ने आते हुए कहा.

‘‘खुदा तो आप हैं, एक हूर जैसी लड़की के पिता जो हैं. मगर आप दोनों मियांबीवी को एतराज न हो तो मैं शाहिदा को अपने घर… मतलब… मेरे बेटे को तो आप लोग जानते ही हैं, और…’’

‘‘बसबस, इस से बढ़ कर खुशी और क्या हो सकती है हमारे लिए,’’ मिस्टर शेख ने कहा, ‘‘हमारी शाहिदा आप के घर जाएगी तो हमें ऐसा लगेगा जैसे अपने ही घर में है, हमारे साथ.’’

फिर क्या था, आननफानन बड़े ही धूमधाम से शाहिदा प्रोफैसर के बेटे से ब्याह दी गई. वह प्रोफैसर के घर आ कर बहुत खुश थी. बेटा भी शाहिदा जैसी जीवनसाथी पा कर फूला न समाता था. दुलहनिया को ले कर हनीमून मनाने वह महाबलेश्वर चला गया.

प्रोफैसर चाहते हुए भी उसे रोक न सके और भीतर ही भीतर ऐंठ कर रह गए. खैर, दिन तो जैसेतैसे कट गया, पर रात काटे न कटती थी. वे जैसे ही आंखें मूंदते, उन्हें बेटे और बहू का वजूद आपस में ऐसे लिपटा दिखाई देता मानो दोनों एकदूसरे में समा जाना चाहते हों. ऐसे में उन्हें बेवफा महबूबा और बेटा अपना दुश्मन मालूम होने लगते. रहरह कर उन्हें ऐसा भी महसूस होता कि बेटे की मर्दानगी का जोश शाहिदा की जवानी की दीवानगी से हार रहा है.

बेटे और बहू को हनीमून पर गए 3 दिन बीत चुके थे. इस बीच प्रोफैसर की हालत पतली हो गई थी. घर में होते तो दिमाग पर शाहिदा का मादक यौवन छाया रहता या अपने ही बेटे की दुश्मनी में चुपकेचुपके सुलगते रहते. उन्हें यह तक खयाल न आता कि अब उन के और शाहिदा के बीच रिश्ते की दीवार खड़ी कर दी गई है. बेटे के संग गठबंधन ने उसे प्रेमिका से बहू बना दिया है. बहू यानी बेटी. वे अपनी इस चूक पर बस हाथ मलते थे.

इन्हीं दिनों उन का एक छात्र किसी काम के चलते उन से मिलने आया. इधरउधर की बातों के दौरान उस ने बताया कि बीकौम के बाद वह एक मैन पावर कंसलटैंसी में अकाउंटैंट के तौर पर काम कर रहा है. फिर उस ने प्रोफैसर के पूछने पर उस फर्म के काम करने के तरीके के बारे में बताया.

उस रात उन्हें काफी सुकून व बहके खयालात में ठहराव का अहसास हुआ. ऐसा महसूस होने लगा जैसे उस छात्र की मुलाकात ने उन्हें सांप के काटे का मंत्र सिखा दिया हो.

बेटा और बहू यानी प्रेमिका पूरे 20 दिन बाद हनीमून से लौटे थे. बेटा शाहिदा का साथ पा कर बेहद खुश दिखाई दे रहा था. देखने में तो शाहिदा भी खुश थी, पर उस की आंखों से खुशियों की चमक गायब थी.

प्रोफैसर की नजर ने सबकुछ पलक झपकते ही ताड़ लिया था और वे चिंता की गहराइयों में डूब गए थे.

अगले दिन चायनाश्ते के बाद प्रोफैसर महमूद शौकत ने अपने बेटे को कमरे में बुलाया और दुनियादारी, जमाने की ऊंचनीच का पाठ पढ़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा, अब तक तुम केवल अपनी जिंदगी के जिम्मेदार थे, पर अब एक और जिंदगी तुम से जुड़ चुकी है यानी तुम एक से 2 हो चुके हो. आने वाले दिनों में 3, फिर 4 हो जाओगे.

‘‘जरूरतों और खर्चों में बढ़ोतरी लाजिमी है, जबकि आमदनी वही होगी जो तुम तनख्वाह पाते हो, इसलिए मैं ने तुम्हारे सुनहरे भविष्य के लिए, तुम्हारी मरजी जाने बिना मौजूदा नौकरी से बढि़या और 4 गुना ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरी का जुगाड़ कर दिया है.’’

इस बीच प्रोफैसर महमूद शौकत की नजर के पीछे खड़ी शाहिदा पर जमी थी. उस की आंखों में खुशी की लहरें और होंठों पर कामुक मुसकान रेंग रही थी. उस के इस भाव से खुश होते हुए उन्होंने मेज की दराज से एक लिफाफा निकाला और उसे शहिदा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘शाहिदा, यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए एक छोटा सा तोहफा है.’’

‘‘शुक्रिया,’’ शाहिदा धीरे से बोली.

‘‘अगर अब तुम इस तोहफे को अपने हाथों से मेरे बेटे को दे दो तो यकीनन यह तोहफा बेशकीमती हो जाएगा.’’

वह उन की इच्छा भांप गई और एक अदा से लजाते, इठलाते हुए उस ने लिफाफा शौहर की ओर बढ़ा दिया.

बेटे को शाहिदा की इस अदा पर प्यार उमड़ आया. वह उसे चाहत भरी नजर से देखते हुए लिफाफा थाम कर ‘शुक्रिया डार्लिंग’ बोला.

लिफाफे में मोटे शब्दों में लिखा था, ‘पिता की तरफ से बेटे को अनमोल तोहफा’. उस में जो कागज था, वह

बेटे की दुबई में नौकरी का अपौंइटमैंट लैटर था. साथ में वीजा, पासपोर्ट और हवाईजहाज की टिकट भी थी. यह पढ़ते ही बेटे के हाथ कांपने लगे. Hindi Story

Story In Hindi: मूव औन माई फुट – विक्रम किससे मिलने दिल्ली गया था

Story In Hindi: ‘‘तुमयकीन नहीं करोगी पर कुछ दिनों से मैं तुम्हें बेइंतहा याद कर रहा था,’’ विक्रम बोला.

‘‘अच्छा,’’ मिताली बोली.

‘‘तुम अचानक कैसे आ गईं?’’

‘‘किसी काम से दिल्ली आई थी और इसी तरफ किसी से मिलना भी था. मगर वह काम हुआ नहीं. फिर सोचा इतनी दूर आई हूं तो तुम से ही मिलती चलूं. तुम्हारे औफिस आए जमाने हो चले थे.’’

‘‘औफिस के दरदीवार तुम्हें बहुत मिस करते हैं?’’ विक्रम फिल्मी अंदाज में बोला.

वह बहुत जिंदादिल और प्रोफैशनल होने के साथसाथ बेहद कामयाब इंसान भी था.

‘‘यार प्लीज, तुम अब फिर से यह फ्लर्टिंग न शुरू करो,’’ मिताली हंसती हुई बोली.

‘‘क्या यार, तुम खूबसूरत लड़कियों की यही परेशानी है कि कोई प्यार भी जताए तो तुम्हें फ्लर्टिंग लगती है.’’

‘‘सच कह रहे हो… तुम क्या जानो खूबसूरत होने का दर्द.’’

‘‘उफ, अब तुम अपने ग्रेट फिलौसफर मोड में मत चली जाना,’’ विक्रम दिल पर हाथ रख फिल्मी अंदाज में बोला.

‘‘ओ ड्रामेबाज बस करो… तुम जरा भी नहीं बदले,’’ वह खिलखिलाती हुई बोली.

‘‘मैं तुम सा नहीं जो वक्त के साथ बदल जाऊं.’’

‘‘अरे इतने सालों बाद आई हूं कुछ खानेपीने को तो पूछ नालायक,’’ उस ने बातचीत को हलका ही रहने दिया और विक्रम का ताना इग्नोर कर दिया.

‘‘ओह आई एम सौरी. तुम्हें देख कर सब भूल गया. चाय लोगी न?’’

‘‘तुम्हारा वही पुराना मुंडू है क्या? वह तो बहुत बुरी चाय बनाता है,’’ उस ने हंसते हुए पूछा.

‘‘हां वही है. पर तुम्हारे लिए चाय मैं बना कर लाता हूं.’’

‘‘अरे पागल हो क्या… तुम्हारा स्टाफ क्या सोचेगा. तुम बैठो यहीं.’’

‘‘अरे रुको यार तुम फालतू की दादागीरी मत करो. अभी आया बस 5 मिनट में. औफिस किचन में बना कर छोड़ आऊंगा. सर्व वही करेगा,’’ कह वह बाहर निकल गया.

मिताली भी उठ कर औफिस की खिड़की पर जा खड़ी हुई. कभी इसी

बिल्डिंग में उस का औफिस भी था और वह भी सेम फ्लोर पर. वह और विक्रम 11 बजे की चाय और लंच साथ ही लेते थे. शाम को एक ही वक्त औफिस से निकलते थे. हालांकि अलगअलग कार में अपने घर जाते थे पर पार्किंग में कुछ देर बातें करने के बाद.

पूरी बिल्डिंग से ले कर आसपास के औफिस एरिया तक में सब को यही लगता था कि उन का अफेयर है. पर…

‘‘तुम फिर अपनी फैवरिट जगह खड़ी

हो गई?’’

‘‘बन गई चाय?’’

‘‘और क्या? मैडम आप ने हमारे प्यार की कद्र नहीं की… हम बहुत बढि़या हसबैंड मैटीरियल हैं.’’

‘‘स्वाह,’’ कह मिताली जोर से हंस पड़ी.

‘‘स्वाह… सिरमिट्टी सब करा लो पर अब तो हां कर दो.’’

तभी औफिस बौय चाय रख गया.

‘‘अब किस बात की हां करनी है?’’

‘‘मुझ से शादी की.’’

चाय का कप छूटतेछूटते बचा मिताली के हाथ से. बोली, ‘‘पागल हो क्या?’’

‘‘दीवाना हूं.’’

‘‘मेरा बेटा है 3 साल का… भूल गए हो तो याद दिला दूं.’’

‘‘सब याद है. मुझे कोई प्रौब्लम नहीं. उस के बिना नहीं रहना तुम्हें. साथ ले आओ.’’

‘‘अच्छा, बहुत खूब. क्या औफर है. और तुम्हें यह क्यों लगता है कि मैं इस औफर को ऐक्सैप्ट कर लूंगी?’’

‘‘शादी के बाद आज मिली हो इतने सालों बाद पर साफ दिख रहा है तुम अब भी मुझ से ही प्यार करती हो. तुम्हारी आंखें आज भी पढ़ लेता हूं मैं.’’

‘‘तो?’’

‘‘मतलब तुम मानती हो तुम अब भी मुझ से ही प्यार करती हो.’’

‘‘नहीं. मैं यह मानती हूं कि मैं तुम से भी प्यार करती हूं.’’

‘‘वाह,’’ विक्रम तलख हो उठा.

‘‘प्यार भी 2-4 से एकसाथ किया जा सकता है, यह मुझे मालूम न था.’’

‘‘ये सब क्या है यार… इतने समय बाद आई हूं और तुम यह झगड़ा ले बैठे.’’

विक्रम जैसे नींद से जागा, ‘‘सौरी, मुझे तुम्हें दुखी नहीं करना चाहिए है न? यह राइट तो तुम्हारे पास है.’’

‘‘विक्रम तुम्हें अच्छी तरह पता है मैं आदित्य से प्यार करती हूं. वह बेहद अच्छा और सुलझा हुआ इंसान है. उसे हर्ट करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती. तुम्हारी इन्हीं बातों की वजह से मैं ने तुम्हारा फोन उठाना बंद कर दिया. और अब लग रहा है आ कर भी गलती की.’’

विक्रम बेहद गंभीर हो गया. सीट से उठ कर खिड़की के पास जा खड़ा हुआ. फिर मुड़ कर पास की अलमारी खोली. अलमारी के अंदर ही अच्छाखासा बार बना रखा था.

मिताली बुरी तरह चौंकी, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘क्यों, दिख नहीं रहा? शराब है और क्या.’’

‘‘यह कब से शुरू की?’’

‘‘डेट नोट नहीं की वरना बता देता.’’

‘‘मैं मजाक नहीं कर रही.’’

‘‘मैं भी मजाक नहीं कर रहा.’’

‘‘अच्छा, तो यह नुमाइश मुझे इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए कर रहे हो कि देखो तुम्हारे गम में मेरी क्या हालत है.’’

‘‘तुम हुईं?’’

‘‘नहीं रत्तीभर भी नहीं,’’ मिताली मुंह फेर कर बोली.

‘‘मुझे पता है तुम स्ट्रौंग हैड लड़की हो… यह तुम्हें मेरे करीब नहीं ला सकता, बल्कि तुम इरिटेट हो कर और दूर जरूर हो सकती हो. वैसे इस से दूर और क्या जाओगी,’’ कह तंज भरी हंसी हंसा.

‘‘मैं ने तो सुना था तुम्हारी सगाई हो गई है. मैं तो मुबारकबाद देने आई थी.’’

‘‘वाह, क्या खूब. तो नमक लगाने आई हो या अपना गिल्ट कम करने?’’

‘‘मैं ने सचमुच आ कर गलती की.’’

‘‘मैं तो पहले ही कह रहा हूं तुम और इरिटेट हो जाओगी.’’

‘‘ठीक है तो फिर चलती हूं?’’

‘‘जैसा तुम्हें ठीक लगे.’’

मिताली उठ खड़ी हुई.

विक्रम बेचैन हो उठा. बोला, ‘‘सुनो…’’

‘‘कुछ रह गया कहने को अभी?’’

‘‘मुझे ही क्यों छोड़ा?’’

‘‘तुम ज्यादा मजबूत थे.’’

‘‘तो यह मजबूत होने की सजा थी?’’

‘‘पता नहीं, पर आदित्य बहुत इमोशनल है और उसे बचपन से हार्ट प्रौब्लम भी है और यह मैं पहले ही बता चुकी हूं.’’

‘‘तुम्हें ये सब पहले नहीं याद रहा था?’’

‘‘विक्रम क्यों ह्यूमिलिएट कर रहे हो यार… जाने दो न अब.’’

‘‘नहीं मीता… बता कर जाओ आज.’’

‘‘विक्रम मैं इस शहर में पढ़ने आई थी. फिर अच्छी जौब मिल गई तो और रुक गई.’’

‘‘आदित्य और मैं बचपन के साथी थे. उस का प्यार मुझे हमेशा बचपना या मजाक लगा. सोचा नहीं वह सीरियस होगा इतना. फिर तुम्हारे पास थी यहां इस शहर में बिलकुल अकेली तो तुम से बहुत गहरा लगाव हो गया. पर मैं ने शादी जैसा तो कभी न सोचा था न चाहा. न कभी कोई ऐसी बात ही कही थी तुम से. कोई हद कभी पार नहीं की.’’

‘‘अरे कहना क्या होता है?’’ वह लगभग चीख पड़ा, ‘‘सब को यही लगता था हम प्यार में हैं. सब को दिखता था… तुम ने ही जानबूझ कर सब अनदेखा किया और जब उस आदित्य का रिश्ता आया तो मुझे पलभर में भुला दिया. बस एक कार्ड भेज दिया?’’ सालों का लावा फूट पड़ा था.

मिताली चुप खड़ी रही.

‘‘बोलो कुछ?’’ वह फिर चिल्लाया.

‘‘क्या बोलना है अब. मुझे इतना पता है जब आदित्य ने प्रोपोज किया, तो मैं उसे न कर के हर्ट नहीं कर पाई. मेरे और उस के दोनों परिवार भी वहीं थे. पापा को क्या बोलूं कुछ समझ न आया और सब से बड़ी बात आदित्य मुझे ले कर ऐसे आश्वस्त था जैसे मैं बरसों से उसी की हूं. उसे 15 सालों से जानती थी और तुम्हें बस सालभर से. श्योर भी नहीं थी तुम्हें ले कर. तुम्हारे लिए मुझे लगता था तुम खुशमिजाज मजबूत लड़के हो, जल्दी मूव औन कर जाओगे.’’

‘‘मूव औन,’’ विक्रम बहुत ही हैरानी से चीखा, ‘‘मूव औन माई फुट. ब्लडी हैल… साला जिंदगीभर यह सालेगा. इस से तो लड़कियों की तरह दहाड़ें मार कर तुम्हारे आगे रो लिया होता. कम से कम तुम छोड़ के तो न जातीं.’’

‘‘ओ हैलो… कहां खोए हो?’’

विक्रम सोच के समंदर से बाहर आया. मिताली तो कब की जा चुकी थी और वह खुद ही सवालजवाब कर रहा था.

‘‘तुम गई नहीं?’’

‘‘पर्स छूट गया था उसे लेने आई हूं.’’

‘‘बस पर्स?’’

‘‘हां बस पर्स,’’ वह ठहरे लहजे में बोली, ‘‘बाय, अपना खयाल रखना,’’ कह कर बाहर निकल गई.

लिफ्ट बंद होने के साथ ही उस की आंखें छलक उठीं, ‘‘छूट तो बहुत कुछ गया यहां विक्रम. पर सबकुछ समेटने जितनी मेरी मुट्ठी नहीं. कुछ समेटने के लिए कुछ छोड़ना बेहद जरूरी है.’’

‘‘सर, आप मैडम को बहुत प्यार करते थे न?’’ टेबल से चाय के कप उठाते हुए उस के मुंडू ने पूछा. आखिर वही था जो तब से अब तक नहीं बदला था.

‘‘प्यार तो नहीं पता रे, पर साला आज तक यह बरदाश्त न हुआ कि मुझ पर इतनी लड़कियां मरती थीं… फिर यह ऐसे कैसे छोड़ गई मुझे…’’ कह उस ने गहरी सांस ली. Story In Hindi

Hindi Story : बुड्ढा कहीं का

Hindi Story : फब्तियां कसते लड़के इस प्रतीक्षा में थे कि उन का भी नंबर लग जाए. सास की उम्र वाली औरतें अपने को बिना कारण व्यस्त दिखाने में लगी थीं. बिना पूछे हर अवसर पर अपनी राय देते रहना भी तो एक अच्छा काम माना जाता है. ‘‘चलोचलो, गानाबजाना करो. ढोलक कहां है? और हारमोनियम कल वापस भी तो करना है,’’ सास का ताज पहने चंद्रमुखी ने शोर से ऊपर अपनी आवाज को उठा कर सब को निमंत्रण दिया. स्वर में उत्साह था.

‘‘हांहां, चलो. भाभी से गाना गवाएंगे और उन का नाच भी देखेंगे,’’ चेतना ने शरारत से भाभी का कंधा पकड़ा.

शिप्रा लजा कर अपने अंदर सिमट गई.

तुरंत ही लड़कियों व कुछ दूसरी औरतों ने शिप्रा के चारों ओर घेरा डाल दिया. बड़ी उम्र की महिलाओं ने पीछे सोफे या कुरसियों पर बैठना पसंद किया. युवकों को इस मजलिस से बाहर हो जाने का आदेश मिला पर वे किसी न किसी तरह घुसपैठ कर रहे थे.

शादी के इस शरारती माहौल में यह सब जायज था. अब रह गए घर के कुछ बुड्ढे जिन्हें बाहर पंडाल में बैठने को कहा गया. दरअसल, हर घर में वृद्धों को व्यर्थ सामान का सम्मान मिलता है. वे मनोरंजन का साधन तो होते हैं लेकिन मनोरंजन में शामिल नहीं किए जाते.

गानाबजाना शुरू हो गया. कुछ लड़कियों को नाचने के लिए ललकारा गया. हंसीमजाक के फव्वारे छूटने लगे. छोटीछोटी बातों पर हंसी छूट रही थी. सब को बहुत मजा आ रहा था.

पंडाल में केवल 4 वृद्ध बैठे थे. आपस में अपनीअपनी जवानी के दिनों का बखान कर रहे थे. जब अपनी पत्नियों का जिक्र करते तो खुसरपुसर कर के बोलते थे. हां, बातें करते समय भी उन का एक कान, अंदर क्या चल रहा है, कौन गा रहा है या कौन नाच रहा होगा, सुनने को चौकस रहता.

‘‘क्या जीजाजी,’’ रंजन प्रसाद ने मुंह के दांत ठीक बिठाते हुए कहा, ‘‘आप का घर है. रौनक आप के कारण है लेकिन आप को सड़े आम की तरह बाहर

फेंक दिया गया है. चलिए, अंदर हमला करते हैं.’’

‘‘साले साहब, यह सब तुम्हारी बहन की वजह से है. तुम तो उसे मेरी शादी से भी पहले से जानते हो. वैसे तुम क्यों नहीं पहल करते? दरवाजा खुला है,’’ शीतला सहाय ने साले को चुनौती दी.

‘‘2-4 बातें सुनवानी हैं क्या? अपनी बहन से तो निबट लूंगा लेकिन अपनी पत्नी से कैसे पार पाऊंगा? मुंह नोच लेती है,’’ रंजन प्रसाद ने मुंह लटका कर कहा.

‘‘यार, हम दोनों एक ही किश्ती पर सवार हैं,’’ शीतला सहाय ने मुसकरा कर कहा, ‘‘याद है तुम्हारी शादी में तो मुजरा भी हुआ था. बंदोबस्त क्यों नहीं करते?’’

‘‘क्यों जले पर नमक छिड़कते हो, जीजाजी,’’ रंजन प्रसाद ने आह भर कर फिर से दांत ठीक किए और कहा, ‘‘मैं जा रहा हूं सोने. पता नहीं आप ने कचौडि़यों में क्या भरवाया था. अभी तक पेट नहीं संभला है.’’

‘‘अपनी बहन चंद्रमुखी से क्यों नहीं पूछते?’’ शीतला सहाय ने प्रहार किया, ‘‘हलवाई तो उस की पसंद का मायके से आया है.’’

रंजन प्रसाद खीसें निपोर कर चल दिए. शीतला सहाय ने देखा, बाकी के दोनों वृद्ध मुंह खोल कर खर्राटे भर रहे थे. उन्हें सोता देख कर एक गहरी सांस ली और सोचने लगे अब क्या करूं? मन नहीं माना तो खुले दरवाजे से अंदर झांकने लगे.

पड़ोस की लड़की महिमा फिल्मी गानों पर नाचने के लिए मशहूर थी. जहां भी जाती थी महफिल में जान आ जाती थी. महिमा के साथ एक और लड़की करिश्मा भी नाच रही थी. बहुत अच्छा लग रहा था. पास ही एक खाली कुरसी पर शीतला सहाय बैठ गए.

‘‘यहां क्या कर रहे हो?’’ चंद्रमुखी ने झाड़ लगाई, ‘‘कुछ मानमर्यादा का भी ध्यान है? बहू क्या सोचेगी?’’

शीतला सहाय ने झिड़क कर पूछा, ‘‘तो जाऊं कहां? क्या अपने घर में भी आराम से नहीं बैठ सकता? क्या बेकार की बात करती हो.’’ रंजन प्रसाद की पत्नी कलावती ने चुटकी ले कर कहा, ‘‘जीजाजी, बाहर घूम आइए. यहां तो हम औरतों का राज है.’’

कुछ औरतों को हंसी आ गई.

मुंह लटका कर शीतला सहाय ने कहा, ‘‘क्या करूं, साले साहब की तरह प्रशिक्षित नहीं हूं न. ठीक है, जाता हूं.’’

लगता है कहीं घूम कर आना ही होगा? शीतला सहाय अभी सोच ही रहे थे कि उन को अचानक अपने पुराने मित्र काशीराम का ध्यान आया. शादी का निमंत्रण उसे भेजा था लेकिन किसी कारणवश नहीं आया था. कोरियर से 50 रुपए का चेक भेज दिया था. शिकायत तो करनी थी सो यह समय ठीक ही था.

शीतला सहाय ने आटोरिकशा में बैठना छोड़ दिया था क्योंकि दिल्ली की सड़कों पर आटो बहुत उछलता है. हर झटके पर लगता है कि शरीर के किसी अंग की एक हड्डी और टूट गई. मजबूरन बस की सवारी करनी पड़ती थी. बस स्टाप पर खड़े हो कर 561 नंबर की बस की प्रतीक्षा करने लगे जो काशीराम के घर के पास ही रुकती थी.

बस आई तो पूरी भरी हुई थी. बड़ी मुश्किल से अंदर घुसे. आगेपीछे से धक्के लग रहे थे. अपने को संभालने के लिए उन्होंने एक सीट को पकड़ लिया. दुर्भाग्य से उस सीट पर एक अधेड़ महिला बैठी हुई थी. उस के सिर पर कटोरीनुमा एक ऊंचा जूड़ा था. बस के हिलने पर शीतला सहाय का हाथ उस के जूड़े से लग जाता था. बहुत कोशिश कर रहे थे कि ऐसा न हो, लेकिन ऐसा न चाहते हुए भी हो रहा था.

अंत में झल्ला कर उस महिला ने कहा, ‘‘भाई साहब, जरा ठीक से खड़े रहिए न.’’

‘‘ठीक तो खड़ा हूं,’’ शीतला सहाय बड़बड़ाए.

‘‘क्या ठीक खड़े हैं. बारबार हाथ मार रहे हैं. उम्र का लिहाज कीजिए. शरम नहीं आती आप को,’’ महिला ने एक सांस में कह डाला.

‘‘क्या हो गया?’’ आगेपीछे बैठे   लोगों की उत्सुकता जागी.

‘‘कुछ नहीं. इन से ठीक से खड़े होने को कह रही हूं,’’ महिला ने रौब से कहा.

मर्दों को हंसी आ गई.

महिला के पास बैठी युवती ने कहा, ‘‘जाने दीजिए आंटी, क्यों मुंह लगती हैं. सारे मर्द एक से होते हैं.’’

महिला मुंह बना कर चुप हो गई.

अगले स्टाप पर बहुत से लोग उतर गए. खाली सीटों पर खड़े हुए यात्री झपट्टा मार कर बैठ गए. शीतला सहाय को कोई अवसर नहीं मिला. मन ही मन सोच रहे थे, उन के बुढ़ापे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. कहां गई भारतीय शिष्टता, संस्कृति और संस्कार? लाचार और विवश खड़े रहे. टांगें जवाब दे रही थीं.

यह स्टाप शायद किसी कालिज के पास का था. धड़धड़ा कर 10-15 लड़कियां अंदर घुस आईं. उन के हंसने और किलकारी मारने से लग रहा था कि 100-200 चिडि़यां एकसाथ चहचहा रही हों. शीतला सहाय लड़कियों के बीच घिर गए.

बस एक झटके के साथ चल पड़ी. खड़े लोगों में कोई आगे गिरा तो कोई पीछे लेकिन अधिकतर संभल गए. रोज की आदत थी. शीतला सहाय ने गिरने से बचने के लिए आगे कुछ भी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो एक लड़की का कंधा हाथ में आ गया.

‘‘अंकल, ये क्या कर रहे हैं?’’ लड़की ने तीखे स्वर में कहा.

‘‘माफ करना, बेटी, मैं गिर गया था,’’ शीतला सहाय ने खेद प्रकट किया.

‘‘आप जैसे बूढ़े लोगों को मैं अच्छी तरह पहचानती हूं,’’ लड़की ने क्रोध से कहा, ‘‘मुंह से बेटीबेटी कहते हैं पर मन में कुछ और होता है. रोज आप जैसे लोगों से पाला पड़ता है. मेहरबानी कर के दूर खड़े रहिए.’’

‘‘क्या हुआ, जुगनी? क्यों झगड़ रही है?’’ दूसरी लड़की ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, अंकलजी धक्का दे रहे थे. मैं जरा इन्हें सबक सिखा रही थी,’’ जुगनी ने ढिठाई से कहा.

‘‘लगता है अंकलजी के घर में बेटियां नहीं हैं,’’ तीसरी लड़की ने अपना योगदान दिया.

पीछे से एक और लड़की ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘बुड्ढा बड़ा रंगीन मिजाज का लगता है.’’ इस पर सारी लड़कियां फुल- झडि़यों की तरह खिलखिला कर हंस दीं.

शीतला सहाय शरम से पानीपानी हो गए. उन्होंने मन ही मन प्रण किया कि अब कभी बस में नहीं बैठेंगे.

शीतला सहाय की असहाय स्थिति को देखते हुए एक वृद्ध महिला ने कहा, ‘‘भाई साहब, आप यहां बैठ जाइए. मैं अगले स्टाप पर उतर जाऊंगी.’’

‘‘अंकलजी को आंटीजी मिल गईं,’’ किसी लड़की ने धीरे से हंसते हुए कहा.

एक और हंसी का फव्वारा.

‘‘नहींनहीं, आप बैठी रहिए. मैं भी उतरने ही वाला हूं,’’ शीतला सहाय ने झूठ कहा.

लड़कियों ने शरारत से खखारा.

वृद्घा ने क्रोध से लड़कियों को देखा और कहा, ‘‘क्या तुम्हारे मांबाप ने यही शिक्षा दी है कि बड़ों का अनादर करो? शरम करो.’’

अचानक बस में शांति छा गई.

अगले स्टाप पर वृद्धा उतर गईं और शीतला सहाय ने बैठ कर गहरी सांस ली. बस अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रही थी. बस धीरेधीरे खाली होती जा रही थी.

जैसे ही बस रुकी किसी ने शीतला सहाय के कंधे को छुआ और कहा, ‘‘सौरी, अंकल.’’

शीतला सहाय ने नजर उठा कर देखा तो वही लड़की थी जो उन से झगड़ रही थी.

क्षीण मुसकान से कहा, ‘‘कोई बात नहीं, बेटी.’’

लड़की जल्दी से उतर कर चली गई. उस ने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा. धीरेधीरे चलते हुए शीतला सहाय जब काशीराम के घर तक पहुंचे तो अपने दोस्त को बाहर टहलते हुए पाया.

अपने पुराने अंदाज से हंसी का ठहाका लगाते हुए दोनों गले मिले.

‘‘क्या बात है, उर्मिला ने घर से बाहर निकाल दिया?’’ शीतला सहाय ने छेड़ते हुए पूछा.

‘‘यही समझो, यार. प्रमिला ससुराल से आई है, सो उर्मिला ने कीर्तन मंडली बुला ली. अंदर औरतों का कीर्तन चल रहा है और मुझे अंदर बैठने की आज्ञा नहीं,’’ काशीराम ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘अपने ही घर में अब्दुल्ला बेगाना.’’

‘‘हाहाहा,’’ शीतला सहाय ने ठठा कर हंसते हुए कहा, ‘‘तो यह बात है.’’

‘‘यह तो नहीं पूछूंगा कि क्यों आए हो लेकिन फिर भी शंका समाधान तो करना ही पड़ेगा,’’ काशीराम ने शीतला सहाय के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा.

‘‘यार, मेरी हालत भी कुछ तुम्हारे जैसी ही है. सब लोग नाचगा रहे हैं. मस्ती कर रहे हैं. मेरा भी मन किया कि जवानों के साथ बैठ कर तबीयत बहला लूं, लेकिन उन की दुनिया में बुड्ढों के लिए कोई जगह नहीं है,’’ शीतला सहाय ने ठंडी सास छोड़ी, ‘‘बस, घर से बाहर कर दिया.’’

शीतला सहाय ने अपने मित्र को बस में उन के साथ जो कुछ हुआ नहीं बताया क्योंकि उन्हें बुढ़ापे पर तरस आ रहा था. थोड़ी देर गप्पें मार कर उन्होंने घर का रास्ता नापा. मन हलका हो गया. बस यहीं से चलती थी सो बैठने की जगह मिल गई और वह अब की बार बिना हादसे के घर पहुंच गए.

उन्हें देखते ही बहुत लोगों ने घेर लिया मानो एक बिछुड़ा हुआ आदमी बहुत दिनों बाद मिला था.

‘‘बाबा को देखो. कितने खुश हैं. जरूर काशी अंकल से मिल कर आए होंगे,’’ निक्की ने छेड़ा.

‘‘यहां से जाते समय कितने बुड्ढे लग रहे थे. अब देखो एकदम जवान लग रहे हैं.’’

रोशन ने पूछा, ‘‘ये काशी अंकल आप को कौन सी घुट्टी पिलाते हैं?’’

शीतला सहाय हंस दिए, ‘‘कम से कम एक आदमी तो है जो बुड्ढे का बुढ़ापा भुला देता है. तुम लोग तो हमेशा मुझ से दूर रहने की कोशिश करते हो और हमेशा मेरी उम्र मुझे याद दिलाते रहते हो.’’

‘‘ठीक तो है, आदमी की उम्र उतनी ही होती है जितनी कि वह महसूस करता है. चलो, गरमगरम कचौडि़यां और ठंडी रसमलाई आप का इंतजार कर रही है,’’ रंजन प्रसाद ने कहा और शीतला सहाय का हाथ पकड़ लिया.

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