Story in hindi
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बाहर की बारिश थम चुकी थी और 2 जिस्मों का तूफान भी. दोनों की झिझक भी खत्म हो गई थी. उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, वे दोनों जम कर मस्ती करते, पर रसीली बहुत चालाक औरत थी. वह गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती थी, जिस के चलते उसे बच्चा नहीं ठहरता था. वह तो बस मंगलू में अपने अकेलेपन और मौजमस्ती का इलाज ढूंढ़ रही थी.
जब कुछ महीने बीत चले और रसीली ने बच्चा ठहरने की खबर नहीं सुनाई तो मंगलू ने उस से कहा, ‘‘सुन रसीली… महीनों से मैं तुम्हारे घर आ रहा हूं और अनेक बार हम ने जिस्मानी संबंध बनाए हैं, पर अभी तक तुझे बच्चा क्यों नहीं ठहरा?’’
‘‘अरे, अब तुम 40 साल के हो गए हो. अब तुम में 25 साल के मर्द वाली रवानी तो रही नहीं, गांव के और गबरू जवान लड़कों को देखो, जमीन में पैर मार दें तो पानी निकल आए. अब तुम अपनी लटकी शक्ल देख लो. लगता है, 60 साल के हो गए हो.
‘‘अरे, जरा बादाम घोटो, जरा बदन बनाओ, लड़का पैदा करना आसान है क्या…?’’
जब रसीली ने कई बार इस तरह मजाक किया तो मंगलू का मन रसीली से पूरी तरह हटता चला गया. उस ने समझ लिया था कि रसीली एक खूंटे से बंधी रहने वाली गाय नहीं है, बल्कि उसे तो अपनी मस्ती के लिए नएनए आशिक चाहिए.
मन में ऐसा खयाल आते ही मंगलू सीधा गांव के बीच बने पीपल देवता के चबूतरे पर पहुंचा और माफी मांगी कि अब वह फिर कभी रसीली की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखेगा.
जब चबूतरे से मंगलू नीचे उतरा तो अपने सामने फौजी को खड़ा देख चौंक गया.
‘‘नमस्ते फौजी साहब.’’
‘‘नमस्ते… अरे भाई, पीपल देवता से क्या मांग रहे हो? तुम्हारे गांव के बाहर एक बहुत बड़े तांत्रिक आ कर ठहरे हुए हैं, जो हाथ देख कर ही किसी का भी आगापीछा सब बता देते हैं और बदले में कुछ लेते भी नहीं. जाओ, उन से जा कर मिल लो. हो सकता है कि तुम्हारा कल्याण भी उन के हाथों हो ही जाए,’’ फौजी ने अपना ज्ञान बांटा.
मंगलू अंदर से टूटा हुआ था और जब इनसान अंदर से टूटा होता है तो धर्म और तांत्रिकों में उस की दिलचस्पी अपनेआप ही बढ़ जाती है.
मंगलू तांत्रिक से जा कर मिला और जब वापस आया तो उस के चेहरे पर खुशी की हलकी सी रेखा साफ देखी जा सकती थी.
शायद उस तांत्रिक ने मंगलू को खुश रहने की कोई तरकीब बता दी थी, तभी तो वह अपनी पत्नी पर भी बातबात में चिल्लाता नहीं था.
पर मंगलू की यह खुशी ज्यादा दिन तक न रह पाई. एक दिन जब वह शाम ढले घर वापस आया तो उस की पत्नी रोरो कर हलकान हुई जाती थी.
‘‘अरे, क्या हुआ? क्यों रोए जा रही हो?’’
‘‘अरे रमिया के पापा, रमिया को तुम्हारे पास खाना देने को भेजा था. अब शाम होने को आई, पर अभी तक वह लौट कर नहीं आई है. सयानी लड़की है. कहीं कोई ऊंचनीच हो गई तो हम जमाने को क्या मुंह दिखाएंगे.’’
‘‘क्या कहा… रमिया घर नहीं लौटी… अभी जा कर देखता हूं,’’ कह कर मंगलू घर से बाहर निकल गया.
कुछ घंटे बाद पसीना पोंछता हुआ मंगलू अपना मुंह लटका कर वापस आ गया और अपनी पत्नी सरोज से बोला, ‘‘रमिया की मां, लगता है कि रमिया हम लोगों को छोड़ कर कहीं चली गई है. मैं सरपंचजी से भी मिला और गांव के बाकी लोगों को भी इकट्ठा किया और हम सब लोगों ने पूरे गांव में रमिया को ढूंढ़ा, पर रमिया नहीं मिली.’’
रमिया के घर छोड़ कर जाने वाली बात उस की मां को हजम नहीं हो रही थी, पर उस के पास इन बातों को मान लेने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था.
‘‘जब से फौजी ने गांव में आ कर कोठी बनवाई है, तभी से गांव में अजीब हादसे हो रहे हैं,’’ काकी बोल रही थी.
‘‘हां, देखने में भी तो फौजी कितना डरावना लगता है,’’ गांव की दूसरी औरत कह उठी.
‘‘पर सवाल यह है कि रमिया को आसमान खा गया या जमीन निगल गई,’’ बन्नो भाभी बोली.
‘‘मंगलू के खेत में जाते समय किनारे पर जो भुतही तलैया पड़ती है न, उस में कई कुंआरे भूत रहते हैं. हो न हो, उन्हीं कुंआरे भूतों ने रमिया का अपहरण कर लिया है और वे अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करते होंगे,’’ सिबली की शक भरी आवाज आई.
‘‘अरे, मैं तो कहती हूं कि मंगलू से रमिया का ब्याह करते बन नहीं रहा था और फिर रमिया का चक्कर भी तो सरजू के साथ चल ही रहा था न. हो न हो, वह सरजू के साथ भाग गई है,’’ दया की अम्मां बोल रही थी.
रमिया की मां अपनी बेटी के गांव से गायब हो जाने से अंदर तक टूट भी गई थी और कहीं न कहीं उसे भी भुतही तलैया के भूतों पर ही शक था.
एक दिन रमिया की मां ने अपनी दूसरी बेटी श्यामा की कमर की करधन में 2 छोटी घंटियां बांध दी थीं, जिन के बजने से छुनछुन की आवाज आती थी.
‘‘कहते हैं कि कमर में लोहा बंधा हो तो भूत पास में नहीं आते और तुझे भी तो स्कूल आनाजाना रहता ही है, इसलिए ये लोहे की घंटियां तेरी हिफाजत के लिए हैं और फिर ये मुझे तेरी मौजूदगी का अहसास भी देती रहेंगी.’’
बदले में श्यामा सिर्फ मुसकरा दी.
अभी रमिया को गायब हुए 6 महीने भी न बीते थे कि जब एक दिन श्यामा स्कूल गई तो फिर लौट कर नहीं आई.
मंगलू की पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. मंगलू भी एक कोने में मुंह छुपाए बैठा था.
गांव के लोग आजा रहे थे और बातें बना रहे थे, हमदर्दी दिखा रहे थे.
श्यामा के इस तरह गायब होने की बात फौजी शमशेर सिंह के कानों तक पहुंची. वह सीधा मंगलू के घर जा पहुंचा.
फौजी शमशेर सिंह ने उस से कुछ बातें पूछीं, जिन का जवाब मंगलू बड़े ही अनमने ढंग से दे रहा था. फौजी हर तरह की मदद का भरोसा दे कर वहां से चला गया.
समय बीत रहा था. एक दिन जब रमिया की मां घर की साफसफाई कर रही थी, तो उसे एक बिस्तर के नीचे वही घंटियां मिलीं, जो उस ने अपनी बेटी श्यामा की कमर में बांधी थीं. वह परेशान हो उठी. पर उस ने यह बात किसी को नहीं बताई, मंगलू को भी नहीं.
लंच के समय स्कूल के गैस्टरूम में बैठा सागर बेसब्री से अपनी दोनों बेटियों का इंतजार कर रहा था. आज वह उन्हें अपनी होने वाली पत्नी श्वेता से मिलवाना चाहता था. कल वह श्वेता से शादी करने वाला था.
वह श्वेता की तरफ प्यारभरी नजरों से देखने लगा. उसे श्वेता बहुत ही सुलझी हुई और खूबसूरत लगती थी. श्वेता के लंबे स्ट्रेट बाल, आंखों में शरारत, दूध सा गोरा रंग और चालढाल तथा बातव्यवहार में झलकता आत्मविश्वास. श्वेता के आगे नीरजा उसे बहुत साधारण लगती थी. वह एक घरेलू महिला थी.
नीरजा से सागर की अर्रेंज मैरिज हुई थी. शुरूशुरू में सागर नीरजा से भी प्यार करता था. पर सागर की महत्त्वाकांक्षाएं काफी ऊंची थीं. उस ने अपने कैरियर में तेजी से छलांग मारी. वह आगे बढ़ता गया और नीरजा पीछे छूटती गई.
सागर ने शहर बदला, नौकरी बदली और इस के साथ ही उस की पसंद भी बदल गई. नई कंपनी में उसे श्वेता का साथ मिला. तब उसे समझ आया कि उसे तो एक बला की खूबसूरत लड़की अपना जीवनसाथी बनाने को आतुर है और कहां वह गंवार( उस की नजरों में) नीरजा के साथ बंधा पड़ा है. बस, यहीं से उस का रवैया नीरजा के प्रति बदल गया था और एक साल के अंदर ही उस ने खुद को नीरजा से आजाद कर लिया था. पर वह अपनी दोनों बेटियों के मोह से आजाद नहीं हो सका था. दोनों बेटियों में अभी भी उस की जान बसती थी.
उस ने श्वेता को अपने बारे में सबकुछ बता दिया था और अब दोनों कोर्ट मैरिज कर हमेशा के लिए एकदूसरे के होने वाले थे. पर इस से पहले श्वेता ने ही इच्छा जताई थी कि वह उस की बेटियों से मिलना चाहती है, इसलिए आज दोनों बच्चियों से मिलने उन के स्कूल आए थे. सागर अकसर स्कूल में ही अपनी बेटियों से मिला करता था.
तभी 4 नन्हीनन्ही आंखों ने दरवाजे से अंदर झांका, तो सागर दौड़ कर उन के पास पहुंचा और उन्हें सीने से लगा लिया. 10 साल की मिनी थोड़ी समझदार हो चुकी थी. जब कि 6 साल की गुड़िया अभी नादान थी.
सागर ने उन दोनों को श्वेता से मिलवाते हुए कहा, “देखो बच्चो, आज मैं आप को किन से मिलवाने वाला हूं?”
“ये कौन हैं, इन के बाल कितने सुंदर है?” गुड़िया ने पूछा तो सागर ने गर्व से श्वेता की तरफ देखा और बोला, “बेटी, ये आप की मम्मी हैं. कल से यर आप की नई मम्मी कहलाएंगी. कल ये आप के पापा की पत्नी बन जाएंगी.”
श्वेता ने प्यार से बच्चों की तरफ हाथ बढ़ाया, तो थोड़ा पीछे हटती हुई गुड़िया ने पूछा, “पर पापा, हमारी मम्मी तो हमारे पास ही हैं. फिर नई मम्मी की क्या जरूरत?”
“पर बेटा, ये मम्मी ज्यादा अच्छी हैं. है न?”
“नो, नैवर. पापा, हमें नई मम्मी की कोई जरूरत नहीं. हमारी मम्मी बहुत अच्छी हैं. एंड यू नो पापा…” मिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.
“क्या बेटी, बताओ…”
“यू नो, आई हेट यू. आई हेट यू फौर दिस,” यह कह कर रोती हुई मिनी ने गुड़िया का हाथ थामा और तेजी से कमरे से बाहर निकल गई.
श्वेता ने जल्दी से अपने बढ़े हुए हाथों को पीछे कर लिया. अपमान और क्षोभ से उस का चेहरा लाल हो उठा था. सागर की आंखें भी पलभर में उदास हो गईं. उसे लगा जैसे उस के दिल का एक बड़ा टुकड़ा आज टूट गया है. उस ने श्वेता की तरफ देखा और फिर आ कर निढाल सा कुरसी पर बैठ गया. उस ने सोचा भी नहीं था कि उस की अपनी बेटी उस से नफरत करने लगेगी.
श्वेता ने रूखी आवाज में कहा, “चलो सागर, यहां रुक कर कोई फायदा नहीं. तुम्हारी बेटियां मुझे नहीं अपनाएंगी. लगता है तुम्हारी पत्नी ने पहले से ही उन के मन में मेरे खिलाफ जहर भर दिया है.”
सागर ने कुछ भी नहीं कहा. दोनों चुपचाप वापस चले गए.
इधर, नीरजा ने जब सुना कि उस का सागर दूसरी शादी करने वाला है तो वह और भी टूट गई. उस ने तुरंत अपनी सास कमला देवी को फोन लगाया, “मम्मी, कल आप का बेटा नई बहू ले कर आ रहा है. मुबारक हो, आप की जिंदगी में एक बार फिर बहू का सुख वापस आने वाला है.”
“चुप कर नीरजा, तेरे सिवा मेरी न कोई बहू है और न कभी होगी. मैं शरीर से भले ही यहां हूं पर मेरा दिल अब भी तेरे और तेरी दोनों बच्चियों के पास ही है. तू मेरी बेटी से बढ़ कर है. तेरी जगह कोई नहीं ले सकता, समझी पगली. और जानती है, तू मेरी बेटी कब बनी थी?”
“कब मम्मी?”
“उस रात जब मुझे तेज बुखार था. सागर ने मेरी तरफ देखा भी नहीं. पर तूने रातभर जाग कर मुझे ठंडी पट्टियां लगाई थीं. मेरी सेवा की थी. उसी रात मैं ने तुझे अपनी बेटी मान लिया था.”
“मम्मी, आप की जैसी मां पा कर मैं धन्य हो गई. आज मेरी मां जिंदा होतीं तो वे भी आप का प्यार देख कर…,” कहतेकहते वह रोने लगी तो सास ने टोका, “देख बेटी, मुझे मां कहा है न, फिर रोनेधोने की क्या जरूरत? हमेशा मुसकराती रह मेरी बच्ची. अपने बेटे पर तो मेरा काबू नहीं पर दुनिया की और किसी भी मुसीबत को तेरे पास भी नहीं फटकने दूंगी. जानती है यह बात?”
“जी मम्मी?”
“जब मेरे पति ने मुझे तलाक दिया था तब मेरे पास कोई नहीं था. मैं उन से कोई सवाल भी नहीं कर सकी थी. तेरे गम को मैं समझ सकती हूं. तलाक के बाद औरत मन से बिलकुल अकेली रह जाती है. पर तू जरा भी चिंता न कर. तेरे साथ हमेशा तेरी यह मां रहेगी तेरा मानसिक संबल बन कर.”
सास की बातें सुन रोतेरोते भी नीरजा के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. सास की बातों से उसे बहुत सुकून मिला. आज वह अकेली नहीं, बल्कि सास का सपोर्ट उस के साथ था.
नीरजा के अपने मांबाप पहले ही गुजर चुके थे. एक भाई था जो मुंबई में सैटल था. 3 बहने थीं जिन का घर इसी शहर में था. पर चारों भाईबहनों ने उस से कन्नी काट ली थी. ऐसे में तलाक के बाद उस का और उस की दोनों बच्चियों का संबल उस की सास ही थी और यह उस के लिए बहुत बड़ा सहारा था. जब भी वह परेशान होती या अकेला महसूस करती तो सास से बात कर लेती.
‘‘कौन सी गाड़ी का टिकट कट रहा है साहब?’’ एक सुरीली आवाज ने राजेश का ध्यान खींचा. बगल में एक खूबसूरत लड़की को देख कर वह जैसे सबकुछ भूल चुका.
‘‘मैं आप से ही पूछ रही हूं साहब… कौन सी गाड़ी आ रही है?’’
‘‘जी… जी, ‘महामाया ऐक्सप्रैस’, डोंगरपुर से नागझिरी जाने वाली.’’
‘‘आप कौन सी क्लास का टिकट ले रहे हो? मेरा मतलब, मेरे लिए भी एक टिकट कटा दोगे तो आप की बड़ी मेहरबानी होगी. कहां जा रहे हैं आप?’’
‘‘रौधा सिटी.’’
‘‘तब तो और भी अच्छी बात है. मुझे भी रौधा सिटी ही जाना है,’’ कह कर उस लड़की ने अपने बैग से नोटों की गड्डी निकाल कर 100-100 के 2 नोट राजेश के हाथ में थमा दिए.
‘‘माफ करना… मैं कब से टिकट लेने की कोशिश कर रही हूं, पर भीड़ इतनी ज्यादा है…’’ रुपए की गड्डी बैग में रखते हुए वह लड़की बोली.
‘‘कोई बात नहीं. आप आराम से सामने वाली बैंच पर बैठ जाइए.’’
जब ट्रेन आई तो राजेश अपने डब्बे में चादर बिछा कर एक सीट पर बैठ गया. वह जैसे उस लड़की के विचारों में खो गया. काश, वह लड़की उसी के पास आ कर बैठती…
‘‘अरे, आप…’’ थोड़ी ही देर बाद वह लड़की उसी डब्बे में आ कर राजेश से बोली.
‘‘आप को एतराज न हो, तो आप की बिछाई चादर पर…’’
‘‘जी बैठिए. जब हम और आप एक ही शहर जा रहे हैं, तो एतराज कैसा?’’ राजेश बोला.
वह लड़की राजेश की बिछाई चादर पर बैठ गई. थोड़ी देर बाद वह अपने हैंडबैग की चेन खोलने लगी. कभी इस पौकेट की चेन तो कभी दूसरे पौकेट की चेन खोलती और बंद करती. वह बारबार बैग टटोल रही थी. वह बहुत परेशान लग रही थी.
राजेश से रहा न गया, तो पूछ ही लिया, ‘‘क्या हो गया? लगता है कि कुछ…’’
‘‘मेरे रुपए का बंडल…’’ उस लड़की ने बैग टटोलते हुए कहा.
‘‘कितने रुपए थे?’’ राजेश ने पूछा.
‘‘2,000 रुपए थे,’’ मामूली सी बात समझ कर लड़की ने लापरवाही से कहा.
‘‘लगता है, किसी ने हाथ साफ कर दिया. आप के साथ और कोई नहीं है क्या?’’ राजेश ने पूछा.
‘‘छोड़ो, शहर तो पहुंच जाऊंगी. कोई नहीं है तो आप तो हो ही? मुझे घर तक छोड़ देना. घर पर आप को टैक्सी का किराया वापस कर दूंगी.’’
‘‘कोई बात नहीं.’’
तेज रफ्तार से ट्रेन चली जा रही थी. वह लड़की राजेश से सट कर बैठ गई. लड़की की छुअन पा कर राजेश को जैसे बिजली का झटका लगा. उस के बदन की खुशबू सेवह मदहोश हो रहा था.
‘‘आप रौधा सिटी के कौन से महल्ले में रहती हैं?’’
‘‘पटेल चौक में… और आप?’’ जवाब देने के बाद लड़की ने पूछा, ‘‘किसी सरकारी नौकरी में?’’
‘‘जी, मैं स्वास्थ्य विभाग में ट्यूटर हूं.’’
इसी बीच ट्रेन रुकी. वह लड़की राजेश से टकराई.
रात का दूसरा पहर और सड़क के किनारे अंधेरे में बैठा वह अपनी यादों में खोया था. यादें सड़क से गुजरने वाले वाहनों की रोशनी की तरह ही तो थीं, जो थोड़ी देर के लिए अंधेरी दुनिया को रोशन कर जाती थीं, लेकिन आज क्षणभंगुर रोशनी का भी आखिरी दिन था. आज लाली की शादी जो हो रही थी, उसी चारदीवारी के अंदर जिस के सहारे वह बैठा था. वह अपने 12 साल पुराने अतीत में चला गया.
रेल के डब्बे के पायदान पर बैठा वह बहुत खुश था. उम्र करीब 14 साल रही होगी. उस दिन बड़ी तन्मयता के साथ वह अपनी कमाई गिन रहा था.
2…4…10…15… वाह, आज पूरे 15 रुपए की कमाई हुई है. अब देखता हूं उस लाली की बच्ची को…कैसे मुझ से ज्यादा पैसे लाती है. हर बार मुझ से ज्यादा पैसे ला कर खुद को बहुत होशियार समझती है. आज आने दो उसे…आज तो वह मुझ से जीत ही नहीं सकती. 15 रुपए तो उस ने एकसाथ देखे भी नहीं होंगे. जो टे्रन की रफ्तार के साथ भाग रहे थे.
‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम…’ भजन के स्वर कान में पड़ते ही वह अपने खयालों से बाहर आ गया. यह लाली की आवाज ही थी, जैसे दूर किसी मंदिर में घंटी बज रही हो.
उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो लाली खड़ी थी. उम्र करीब 12 वर्ष, आंखों में चमक मगर रोशनी नहीं, दाएं हाथ में 2 संगमरमर के छोटेछोटे टुकड़े जो साज का काम करते थे, सिर के बाल पीछे की ओर गुंथे हुए.
‘लाली, मैं यहां हूं. तू इधर आ. कब से तेरा इंतजार कर रहा हूं. स्टेशन आने वाला है. आज कितने पैसे हुए?’
‘रोशन, तू यहां है,’ लाली बोली और अपने दोनों हाथों को आगे की ओर उठा कर आवाज आने की दिशा की ओर मुड़ गई. इन 12 सालों में लाली ने हाथों से ही आंखों का काम लिया था. रोशन ने उसे अपने साथ पायदान पर बिठा लिया.
‘रोशन, जरा मेरे पैसे गिन दे.’
‘अभी तू इन्हें अपने पास रख. स्टेशन आने वाला है. उतरने के बाद पार्क में बैठ कर इन पैसों को गिनेंगे.’
स्टेशन आते ही दोनों टे्रन से उतर कर पार्क की ओर चल दिए.
पार्क की बेंच पर बैठते ही लाली ने अपने सभी पैसे रोशन को पकड़ा दिए.
रोशन के चेहरे पर विजयी मुसकान आ गई, आज तो उस की जीत होनी ही थी. उस ने पैसे लिए और गिनने लगा.
‘2…4…10…12…15…20…22, ओह, आज फिर हार गया और अब फिर से इस के ताने सुनने होंगे.’ रोशन ने मन ही मन सोचा और चिढ़ कर सारे पैसे लाली के हाथ में पटक दिए.
‘बता न कितने हैं?’
‘मैं क्यों बताऊं, तू खुद क्यों नहीं गिनती, मैं क्या तेरा नौकर हूं.’
‘समझ गई,’ लाली हंसते हुए बोली.
‘तू क्या समझ गई.’
‘आज फिर मेरे पैसे तुझ से ज्यादा हैं, तू मुझ से जल रहा है.’
‘अरे, जले मेरी जूती,’ रोशन ने बौखलाते हुए कहा.
‘तेरे पास तो जूते भी नहीं हैं जलाने को, देख खाली पैर बैठा है,’ लाली यह कह कर हंसने लगी. लाली की इस बात ने जैसे आग में घी डाल दिया. रोशन गुस्से में बोला, ‘अरे, तू अंधी है तभी तुझ पर तरस खा कर लोग पैसे दे देते हैं, वरना तेरे गाने को सुन कर तो जिंदा आदमी भी मर जाए और मरे आदमी का भूत भाग जाए.’
यह सुन कर लाली जड़ हो गई और उस की आंखों से आंसू निकल पड़े. लाली के आंसुओं ने रोशन के गुस्से को धो डाला. वह पछताने लगा मगर माफी मांगे तो कैसे?
‘लाली, माफ कर दे मुझे, मैं तो पागल हूं. किसी पागल की बात का बुरा नहीं मानते.’
लाली ने दूसरी तरफ मुंह मोड़ लिया.
‘अरे, लाली, मैं ने तुझ से अच्छा गाने वाला आज तक नहीं सुना. मैं सच बोल रहा हूं. तुझ से अच्छा कोई गा ही नहीं सकता.’
वह सच बोल रहा था. काश, लाली उस की आंखों में देख पाती तो जरूर विश्वास कर लेती. लाली के चेहरे पर अविश्वास की झलक साफ पढ़ी जा सकती थी.
‘लाली, मैं सच कह रहा हूं…बाबा की कसम. देख तुझे पता है मैं बाबा की झूठी कसम नहीं खाता. अब तू चुप हो जा.’
लाली के चेहरे पर अब मुसकान लौटने लगी थी.
‘अब मैं कभी तुझे अंधी नहीं बोलूंगा, तुझे आंखों की जरूरत ही नहीं है, ये रोशन तेरी आंखों की रोशनी है,’ अब लाली के चेहरे पर मुसकान लौट आई थी.
कमरे में खाट पर जर्जर काया लेटी हुई थी. टूटी हुई छत से झांकते हुए धूप के टुकड़ों ने कमरे में कुछ रोशनी कर रखी थी.
माखन खाट पर लेटा रोशन के आने का इंतजार कर रहा था. ‘आज इतनी देर हो गई रोशन आया नहीं है.’
माखन की उम्र करीब 65 वर्ष होगी. खाट पर लेटे हुए वह अपने अंतिम दिनों को गिन रहा था. लोगों की घृणा भरी नजरें और अपने शरीर को गलता देख माखन में जीने की चाह खत्म हो गई थी पर मौत भी शायद उस के साथ आंखमिचौली का खेल खेल रही थी.
दिल की इच्छा थी कि रोशन पढ़लिख कर साहब बने. उस ने वादा भी किया था रोशन से कि जिस दिन वह मैट्रिक पास कर लेगा उस दिन वह उसे अपने रिकशे में साहब की तरह बिठा कर पूरा शहर घुमाएगा. लेकिन गरीब का सपना पूरा कहां होता है.
4 साल पहले कोढ़ ने उसे रिकशा चलाने लायक भी नहीं छोड़ा और वह बोझ बन गया रोशन पर. रोशन को स्कूल छोड़ना पड़ा. गरीब की जिंदगी में बचपन नहीं होता, गरीबी और जिम्मेदारी ने रोशन को उम्र से पहले ही बड़ा कर दिया. कलम की जगह झाड़ू ने ले ली, स्कूल की जगह रेलगाड़ी ने और शिक्षक की प्यार भरी डांटफटकार की जगह लोगों के कटु वचनों और गाली ने ले ली.
‘अरे, तू आ गया रोशन. कहां था अब तक और यह तेरे हाथ में क्या है?’
‘बाबा, यह लो अपनी दवाई, तुम्हें जलेबी पसंद है न. लो, खाओ और यह भी लो,’ यह कहते हुए उस ने देसी शराब की बोतल माखन की ओर बढ़ा दी.
‘अरे, बेटा, इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी.’
रोशन के चेहरे पर मुसकान आ गई. उस ने बाबा की आंखों की चमक को पढ़ लिया था. उसे पता था कि बाबा को रोज शराब की तलब होती है, लेकिन पैसों की तंगी के कारण कई महीने बाद बाबा के लिए वह बोतल ला पाया था.
रोशन हर दिन की तरह उस दिन भी टे्रन के पायदान पर लाली के साथ बैठा था.
‘वह देख लाली, इंद्रधनुष, कितना खूबसूरत है,’ टे्रन के पायदान पर बैठे रोशन ने इंद्रधनुष की ओर इशारा करते हुए कहा.
‘इंद्रधनुष कैसा होता है, कहां रहता है?’
‘अरे, तुझे इतना भी नहीं पता. इंद्रधनुष 7 रंगों से बना होता है. उस में लाल रंग सब से सुंदर होता है और पता है यह आसमान में लटका रहता है.’
स्कूल में सीखे हुए इंद्रधनुष के सारे तथ्य उस ने लाली को बता दिए लेकिन उसे खुद इन बातों में भरोसा नहीं था. जैसे इंद्रधनुष के 7 रंग.
उस ने 5 रंग बैगनी, नीला, हरा, पीला और लाल से ज्यादा रंग कभी इंद्रधनुष में नहीं देखे थे. और भी मास्टरजी की कई बातों पर उसे भरोसा नहीं होता था जैसे धरती गोल है, सूरज हमारी धरती से बड़ा है…इन सारी बातों पर कोई पागल ही भरोसा करेगा.
लेकिन दूसरे बच्चों पर अपनी धौंस जमाने के लिए ये बातें वह अकसर बोला करता था.
अपनी आंखों के सामने अंधेरा छाता देख माखन समझ गया अब उस का अंतिम समय आ गया है. रोशन को अंतिम बार देखने के लिए उस ने अपनी सांसें रोक रखी थीं, उस ने अपनी आंखें दरवाजे पर टिका रखी थीं. लेकिन जितनी सांसें उस के जीवन की थीं शायद सारी खत्म हो चुकी थीं. आत्मा ने शरीर का साथ छोड़ दिया था. बस, बचा रह गया था उस का ठंडा शरीर और इंतजार करती दरवाजे की ओर देखती आंखें.
बाबा को गुजरे 1 साल हो गया था. रोशन ने ट्रेन की सफाई के साथसाथ घर भी छोड़ दिया था. जब भी वह घर जाता उसे लगता बाबा का भूत सामने खड़ा है और बारबार उसे बारूद के कारखाने में काम करने से मना कर रहा है. टे्रन का काम रोशन को कभी पसंद नहीं था लेकिन बाबा के दबाव में वह कारखाने में काम नहीं कर पाया था. बाबा ने उस से वादा भी किया था कि उन के मरने के बाद रोशन बारूद के कारखाने में काम नहीं करेगा, लेकिन वह उस वादे को निभा नहीं पाया.
लाली को भी घर से निकलना पड़ा. उस के चाचा से अंधी लड़की का बोझ संभाला नहीं गया और अनाथ लड़की को अनाथ आश्रम में शरण लेनी पड़ी. शायद अच्छा ही हुआ था उस के साथ. आश्रम की पढ़ाई में उस का मन नहीं लगता था. पूरे दिन उसे बस, संगीत की कक्षा का इंतजार रहता और उस के बाद वह इंतजार करती रोशन का. रोज शाम को आधे घंटे के लिए बाहर वालों से मिलने की इजाजत होती थी. पर समय तो मुट्ठी में रखी रेत की तरह होता है, जितनी जोर से मुट्ठी बंद करो रेत उतनी ही जल्दी फिसल जाती है.
आज बेसब्री से लाली रोशन का इंतजार कर रही थी. जैसे ही रोशन के आने की आहट हुई उस की आंखों के बांध को तोड़ आंसू छलक पड़े.
‘‘सर, मुझे छोड़ दीजिए, मैं आप के पैर पड़ता हूं. मैं अपराधी नहीं, मुसीबत का मारा इनसान हूं…’’
जब इंस्पैक्टर राजन छेत्री ने उसे टौर्चर करते हुए थर्ड डिगरी का इस्तेमाल किया, तब रतन बापबाप बोल उठा. मारे दर्द के उस का रोमरोम कांप उठा. उसे ऐसा लगा, जैसे प्राण शरीर छोड़ कर उड़ जाएगा.
रतन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह पुलिस के हत्थे चढ़ेगा, क्योंकि उसे अपनी काबीलियत और होशियारी पर कुछ ज्यादा ही घमंड था. पर वह जैसे ही ओम सिनेमा के पास पहुंचा, वहां सादे लिबास में तैनात पुलिस वालों ने उसे दबोच लिया. उस की चीते जैसी फुती और कुत्ते जैसी सतर्कता न जाने कहां फुर्र हो गई. उस पर सिलसिलेवार बम धमाके करने का गंभीर आरोप था, जिस में पुलिस उस को सरगर्मी के साथ तलाश कर रही थी.
रतन की गिरफ्तारी के बाद उसे जिला हैडक्वार्टर में लाया गया. जहां आरक्षी निरीक्षक राजन छेत्री उस से कुछ गुप्त चीजें उगलवाने की कोशिश में था.
‘‘बोल, तेरा नाम क्या है?’’
‘‘सर, अभी बताता हूं… सर…, पहले थोड़ा सा पानी पिला दीजिए न… मारे प्यास के मेरा गला सूखा जा रहा है. बिलकुल कांटे की तरह चुभ रहा है…’’ उस ने अपनी जबान को अपने होंठों पर फेरते हुए कहा.
‘‘कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती, तू ऐसे नहीं मानेगा?’’
‘‘सर….सर…सर…, मेहरबानी कर के मुझे थोड़ा सा पानी… प्लीज सर…’’
‘‘अच्छा, ठीक है…,’’ इतना बोल कर इंस्पैक्टर राजन छेत्री ने 2 गरम समोसे और एक गिलास गरम चाय मंगवा कर उसे दिया. साथ ही, जलती निगाहों से उसे घूरते हुए कहा, ‘‘फिलहाल तो यही मिलेगा…, तू समोसे खा कर चाय पी ले, प्यास मिट जाएगी.’’
मरता क्या न करता, भूखप्यास से बेहाल रतन उस के हाथों से समोसे झटक कर जल्दीजल्दी खाने लगा. लेकिन गला सूखा होने की वजह से निगलने में उसे दिक्कत होने लगी तो उस ने गरम चाय सुड़क ली. किसी तरह उस ने समोसा खाया और चाय पी, लेकिन प्यास कम होने की जगह और बढ़ गई.
‘‘सर… सर… थोड़ा सा पानी… चुल्लू में ही दे दीजिए न, नहीं तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा,’’ वह मारे प्यास के तड़पते हुए हाथ जोड़ कर बोला. लेकिन इंस्पैक्टर राजन छेत्री पर उस का कोई असर नहीं दिखा.
‘‘पहले अपना नाम बता?’’
‘‘रतन विश्वास.’’
‘‘तेरे बाप का नाम क्या है?’’
‘‘सपन विश्वास.’’
‘‘सर, नेताजी आए हैं. उन्होंने आप को याद किया है,’’ इसी बीच थाने का एक सिपाही कस्टडी रूम में पहुंचा और आते के साथ ही एक पार्टी के कार्यकर्त्ता के आने की सूचना दी.
नेता का नाम सुनते ही इंस्पैक्टर राजन छेत्री गुस्से से लाल हो गया. कमरे से निकलते हुए उस ने एक बार रतन को घूरा जरूर, जैसे कह रहा हो कि तुम्हें छोड़ेंगे नहीं.
कमरे से इंस्पैक्टर राजन छेत्री के बाहर निकलते ही रतन ने गहरी सांस ली. वह समझ नहीं पा रहा था कि उस की मुखबिरी किस ने पुलिस से की है. उसे गिरफ्तार कराने में किस का हाथ है? कहीं मयंक और उस की प्रेमिका नैना थापा का हाथ तो नहीं. दार्जिलिंग के टाइगर हिल पर पिछले दिनों हुई थी उन से मुलाकात.
नैना टाइगर हिल में उगते सूरज को निहार रही थी. दूरदूर तक फैला हुआ नीला आकाश, उस के नीचे पहाड़ पर खूबसूरत कुदरती नजारे, रंगबिरंगी चिडि़यों का शोर मनभावन लग रहे थे. वह इन सब में खोई हुई थी कि अचानक रतन ने पीछे से आ कर उस की आंखों को अपनी उंगलियों से बंद कर दिया. वह हड़बड़ा कर अपनी आंखों पर से हथेलियों को हटाने की कोशिश करने लगी और बोली, ‘अरे मयंक, यह क्या मजाक है. मेरी आंखों के ऊपर से हटाओ हाथ, टाइगर हिल की वादियों का नजारा जीभर कर देख तो लेने दो.’
‘ऊहूं, पहले बुझो, मैं कौन हूं?’
अचानक पीछे से आई आवाज को नैना ने पहचान लिया. वह मयंक की आवाज नहीं, बल्कि रतन की आवाज थी. मयंक ने उसे बताया था कि रतन अच्छा इनसान नहीं है. उस का साथ आतंकवादियों से है.
रतन की आवाज पहचानते ही वह आगबबूला हो उठी और उस का हाथ अपनी आंखों से जबरन हटा दिया. उस की तरफ मुड़ कर नफरत भरी नजरों से देखते हुए वह बोली थी, ‘तू ने मुझे छुआ क्यों? मेरी आंखें बंद करने वाले तुम होते कौन हो? दफा हो जाओ मेरी नजरों के सामने से…’’
‘अरे नैना, इतनी छोटी सी बात पर इतना बड़ा गुस्सा. ऐसी आंखमिचौनी तो हम कितनी बार खेल चुके हैं. प्लीज नैना, गुस्सा थूक दो. मैं अपने किए की माफी मांगता हूं,’ ‘रतन ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘यह मयंक कौन है, जो तुम्हारे कान भरता रहता है. अनजान लोगों से दूर ही रहो तो अच्छा है. तुम उस के साथ यहां आई हो और वह तुम्हें ही अकेला छोड़ कर अपने दोस्तों के साथ किसी मसले पर बातचीत कर रहा है. मैं उधर से गुजर रहा था तो तुम पर नजर ठहर गई.’
Story in Hindi
मुखियाजी को घोड़े पालने का बहुत शौक था. बताते हैं कि ये शौक उन को विरासत में मिला हुआ था. आज भी मुखियाजी के पास 5 घोड़े थे, जिन की देखभाल का काम उन्होंने चंद्रिका नाम के 35 साला एक शख्स को दे रखा था.
मुखियाजी की उम्र तकरीबन 50-55 उम्र के बीच, फिर भी बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं पता चलता था. रोज सुबहशाम दूध पीते और लंबी सैर को जाते. अपनी जवानी के दिनों में आसपास के इलाकों में खूब दंगल जीते थे मुखियाजी ने.
पीठ पीछे कोई मुखियाजी को कुछ भी कहे, पर उन के सामने सभी नतमस्तक नजर आते थे.
मुखियाजी और उन की पत्नी के जीवन में एक बहुत भारी कमी थी कि दोनों के कोई औलाद नहीं थी. घरेलू नुसखों से कई बार उपचार करने की कोशिश भी की गई, पर कुछ नतीजा नहीं निकला. मुखियाइन की गोद हरी नहीं हो सकी और दोनों हार कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ गए.
मुखियाजी को अपनी वंश बेल सूखने की कतई परवाह नहीं थी. उन्हें तो अपनी जिंदगी में अपनी सभी इंद्रियों से सुख उठाना अच्छी तरह आता था.
मुखियाजी कुल मिला कर 3 भाई थे, मुखियाजी से छोटा वाला संजय और सब से छोटा विनय, दोनों भाई मुखियाजी के प्रभाव में दबे हुए रहते थे. किसी की भी उन के सामने जबान खोलने की हिम्मत नहीं थी.
पिछले कुछ दिनों से मुखियाजी के मन में उन के किसी चमचे ने समाजसेवा का शौक लगा दिया था, तभी तो मुखियाजी हर किसी से यही कहते कि बड़े घर से तो हर कोई रिश्ता जोड़ना चाहता है, पर मैं तो संजय और विनय की शादी किसी गरीब घर की लड़की से ही करूंगा.
हां… पर लड़की खूबसूरत और सुशील होनी चाहिए, समाजसेवा भी होगी और किसी गरीब का भला भी हो जाएगा.
आसपास के गांव में कम पैसे वाले ठाकुर भी रहते थे. उन में से बहुत से लोग मुखियाजी के यहां अपनी लड़कियों का रिश्ता ले कर पहुंचे. मुखियाजी ने लड़कियों के फोटो रखवा लिए और बाद में संपर्क करने को कहा.
कुछ दिन बाद मुखियाजी ने उन सारे फोटो में से 2 खूबसूरत लड़कियों को पसंद किया. हैरानी की बात थी कि मुखियाजी ने जो 2 लड़कियां पसंद की थीं, वो अपेकक्षाकृत भरेपूरे बदन की थीं.
मुखियाजी ने उन दोनों के पिताजी को बुला भेजा और हर किसी से अकेले में बात की, “देखिए, हम अपने भाई संजय के लिए एक लड़की ढूंढ़ रहे हैं… पर हमारी 2 शर्तें हैं…
“पहली शर्त तो यह है कि फोटो देख कर लड़की की बुद्धिमत्ता का परिचय नहीं मिलता, इसलिए हम व्यक्तिगत रूप से लड़की से मिलना चाहेंगे… और दूसरी शर्त क्या होगी कि ये हम आप को रिश्ता तय होने के बाद बताएंगे.”
दूसरी शर्त वाली बात से लड़की का पिता थोड़ा घबराया, तो मुखियाजी ने उस से कहा कि ऐसी कोई शर्त नहीं होगी, जिसे वे पूरा न कर सकें. उन की इस बात पर लड़की के बाप को कोई आपत्ति नहीं हुई.
उन लोगों ने घर जा कर अपनी बेटियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया कि मुखियाजी के सभी सवालों का उत्तर सही से देना और सासससुर की बात मानना एक अच्छी बहू के गुण होते हैं.
मुखियाजी को आखिरकार सीमा नाम की एक लड़की पसंद आ गई.
“देखो सीमा, संजय को हम ने ही पालपोस कर बड़ा किया है, इसलिए हमारी हर बात मानता है वह. यही उम्मीद हम तुम से भी करते हैं… मानोगी न हमारी बात,” सीमा की पीठ पर हाथ घुमाते हुए मुखियाजी ने कहा. सीमा ने सिर्फ हां में सिर हिला दिया.
मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को बुलाया और कहा कि उन की लड़की उन्हें पसंद आ गई है और सब से पास वाले मुहूर्त बमें वे सीमा और संजय की शादी कर दें और फिर मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को अपनी दूसरी शर्त के बारे में बताया, “हमारी दूसरी शर्त ये है कि तुम हमें अपनी लड़की दे रहे हो, इसलिए हमारा भी फर्ज है कि हम तुम्हें अपनी तरफ से कुछ भेंट दें,” ये कह कर मुखियाजी ने 50,00 रुपए मोती सिंह को पकड़ा दिए. मोती सिंह उन की दरियादिली पर खुश हो गया. उस ने मुखियाजी के सामने हाथ जोड़ लिए.
संजय और सीमा की शादी हो गई थी, पर मुखियाजी का सख्त आदेश था कि अभी संजय और सीमा की सुहागरात का उचित समय नहीं है, इसलिए संजय को अलग कमरे में सोना पड़ेगा.
मुखियाजी अपने दोनों भाइयों के गांवों में रहने के सख्त खिलाफ थे. उन का साफ कहना था कि अगर तुम लोग गांव में रुक गए, तो यहां के गंवार लड़कों के साथ तुम लोग भी नहर पर बैठ कर चिलम पीया करोगे और आवारागर्दी करोगे और ये बात मुखियाजी को मंजूर नहीं, इसलिए मेहमानों के जाते ही संजय और विनय को शहर चलता कर दिया गया. बेचारा संजय अभी अपनी पत्नी के साथ सैक्ससुख भी नहीं ले पाया था और उस से अलग हो जाना पड़ा.
सीमा ने संजय से न जाने की फरियाद भी की, पर मुखियाजी का आदेश संजय के लिए पत्थर की लकीर था, इसलिए वह कुछ न बोल सका.
इसी तरह पूरे 6 महीने हो गए थे संजय को गए हुए, सीमा ने एक मर्द के शरीर का सामीप्य अभी तक नहीं जाना था. वह अकसर सोचती कि ऐसी शादी से क्या फायदा कि दिनभर घर का काम करो और रात में बिस्तर पर करवटें बदलो…
बाहर बारिश हो रही थी. सीमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी कि उसे अपने पैरों पर किसी के गरम हाथ की छुअन महसूस हुई. वे हाथ उस की जांघों तक पहुंच गए थे, कोई उस के सीने पर अपने हाथों का दबाव बढ़ा रहा था. सीमा की सांसें गरम हो गई थीं. उस का स्पर्श सीमा को बहुत अच्छा लग रहा था. सीमा को लगा कि उस का पति संजय ही वापस आ गया है. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं और आंनद लेना शुरू कर दिया. उस आदमी ने सीमा के सारे कपड़े हटा दिए और सीमा के स्त्री शरीर में प्रवेश कर गया.
सीमा को आज पहली बार मर्द की मर्दानगी का मजा मिला था. संभोग खत्म होते ही वह व्यक्ति सीमा से अलग हो गया.
सीमा ने उस की तरफ देख कर प्यारमनुहार करना चाहा और अपनी आंखें खोलीं…पर ये क्या, ये तो संजय नहीं था, बल्कि मुखियाजी थे… बिस्तर में पूरी तरह नग्न सीमा भला मुखियाजी का सामना कैसे करती. उस ने तुरंत ही चादर से अपने शरीर को ढकने की असफल कोशिश की और अस्फुट स्वर में बोली, “ये क्या किया मुखियाजी आप ने?”
“एक बात अच्छी तरह समझ ले सीमा… तुझे अब मुझे ही अपना पति समझना होगा, क्योंकि संजय का सारा खर्चा मैं उठाता आया हूं. मेरे सामने वह चूं तक नहीं करेगा. मैं उस के माल का मजा उड़ा सकूं, इसीलिए उस को मैं ने शहर भेज दिया है…
“और वैसे भी हम ने तेरे बाप को हमारी हर बात मानने के लिए पैसे दिए हैं,” नशे में बोल रहे थे मुखियाजी.
ऐसा सुन कर सन्न रह गई थी सीमा, पर मन ही मन उस ने अपनेआप को समझा लिया था, क्योंकि उसे मुखियाजी के रूप में उस के जिस्म को सुख पहुंचाने वाला मर्द जो मिल गया था.
फिर क्या था, मुखियाजी लगभग रोज ही सीमा के कमरे में आ जाते और दोनों सैक्स का जम कर मजा उठाते. मुखियाजी के चेहरे की लालिमा बढ़ गई थी. नई जवान लड़की के जिस्म का रस पी कर जैसे उन की जवानी ही वापस आ गई थी.
कभीकभी जब मुखियाजी अपनी पत्नी के पास ही सो जाते तो सीमा को जैसे सौतिया डाह सताने लगता. उसे अकेले नींद न आती, इसलिए कभी वह चूड़ियां खनकाती, तो कभी अपनी पायलें बजाते हुए मुखियाजी के कमरे के सामने से निकलती. हार कर मुखियाजी को उठ कर आना पड़ता और सीमा के जिस्म की आग को बुझाना पड़ता.
इस दौरान शहर से संजय वापस आया, तो मुखियाजी की त्योरियां चढ़ने लगीं और उन्होंने उसे किसी बहाने यहांवहां दौड़ा दिया, ताकि वह सीमा के साथ न रह पाए. फिर एक दिन उसे पैसावसूली के लिए दूसरे गांव भेज दिया और जब वह वापस आया, तब तक शहर से उस के ठेकेदार का बुलावा आ चुका था. बेचारा संजय अपनी पत्नी के संसर्ग को तरसता रह गया.
कुछ समय बीता तो मुखियाजी अपने छोटे भाई विनय की शादी के बारे में सोचने लगे. उन्होंने शहर से विनय को भी बुलवा लिया था और बहू ढूंढ़ने लगे. जल्दी ही उन्हें मुनासिब बहू मिल भी गई, जिस का पिता गरीब था और पहले की तरह ही उसे पूरे 50,000 रुपए देते हुए मुखियाजी ने लड़की के बाप से कहा कि बस अपनी लड़की से इतना कह दो कि विनय को पढ़ानेलिखाने में हम ने बहुत खर्चा किया है. हम ही उस के मांबाप हैं, इसलिए हमारी बात मान कर रहेगी तो सुखी रहेगी.
पत्नी शशि गुमसुम सी सामान पैक करने में उन की मदद कर रही थी. उस की उदास आंखें भी सरकार की इस पौलिसी के प्रति अपनी नाराजगी की गवाही दे रही थीं.
अभी 2 साल भी पूरे नहीं हुए थे कुलदीप को अपने होम टाउन जयपुर में ट्रांसफर हुए कि फिर से ट्रांसफर और वह भी गुजरात सीमा के पास… एक आदिवासी इलाके में… सिरोही जिले में एक छोटी सी जगह पिंडवाड़ा…
हालांकि राज्य सरकार की तरफ से अपने प्रशासनिक अधिकारियों को सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, मगर परिवार की अपनी जिम्मेदारियां भी होती हैं.
पिंडवाड़ा में सभी चीजें मुहैया होने के बावजूद भी कुलदीप की मजबूरी थी कि वे शशि और बच्चों को अपने साथ नहीं ले जा सकते थे.
बड़ी बेटी रिया ने अभी हाल ही में इंजीनियरिंग कालेज के फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया है और छोटा बेटा राहुल तो इस साल 10वीं जमात में बोर्ड के एग्जाम देगा. ऐसे में उन दोनों को ही बीच सैशन में डिस्टर्ब नहीं किया जा सकता, इसलिए शशि को बच्चों के साथ जयपुर में ही रहना पड़ेगा.
अगर दूरियां नापी जाएं तो जयपुर और पिंडवाड़ा के बीच ज्यादा नहीं है, मगर प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारियां ही इतनी होती हैं कि हर हफ्ते इन दूरियों को तय कर पाना कुलदीप के लिए मुमकिन नहीं था. महीने में सिर्फ 1 या 2 बार ही कुलदीप का जयपुर आना मुमकिन होगा. यह बात पतिपत्नी दोनों ही बिना कहे समझ रहे थे.
कुलदीप की सब से बड़ी समस्या घर के खाने को ले कर थी. खाने के नाम पर उन्होंने कालेज में पढ़ाई के दौरान सिर्फ चावल बनाने ही सीखे थे और बाद में मैगी बनाना भी सीख लिया था. हां, शादी के बाद उन्हें चाय बनाना जरूर आ गया था.
हमेशा तो ट्रांसफर होने पर शशि व बच्चे उन के साथ ही शिफ्ट हो जाते थे, मगर अब बच्चों की पढ़ाई उन की सुविधा से ज्यादा जरूरी हो गई है.
इधर जैसेजैसे उम्र बढ़ रही थी, होटलों और ढाबों के तेज मसालों वाले खाने से कुलदीप को एसिडिटी होने लगी थी. नौकरी वगैरह का तनाव होने के चलते शरीर में ब्लड शुगर का लैवल भी बढ़ने लगा था.
डाक्टरों ने कसरत करने के साथसाथ कम मसाले वाला खाना और हरी पत्तेदार सब्जियों के खाने की सख्त हिदायत दे रखी थी. पत्नी शशि परेशान थी कि उन के खाने का इंतजाम कैसे होगा.
पिंडवाड़ा पहुंचते ही जोरावर सिंह ने गरमागरम चाय के साथ कुलदीप का स्वागत किया.
जोरावर सिंह कुलदीप का सहायक होने के साथसाथ बंगले का चौकीदार और माली सबकुछ था.
जोरावर सिंह बंगले के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में अपनी पत्नी राधा के साथ रहता था. चाय सचमुच बहुत अच्छी बनी थी. पीते ही कुलदीप बोले, ‘‘तुम्हें देख कर तो नहीं लगता कि यह चाय तुम ने ही बनाई है.’’
‘‘सही कहा साहब, यह चाय मैं ने नहीं, बल्कि मेरी जोरू ने बनाई है,’’ जोरावर सिंह अपने पीले दांत निकाल कर हंसा.
कुलदीप ने इस बार ध्यान से देखा उसे. बड़ीबड़ी मूंछें, कानों में सोने की मुरकी, सिर पर पगड़ी और धोतीअंगरखा पहने दुबलापतला जोरावर सिंह कुलदीप के पास जमीन पर उकड़ू बैठा हुआ उसे एकटक देख रहा था.
‘‘यहां खाने का क्या इंतजाम है?’’ कुलदीप ने पूछा.
‘‘आसपास कई गुजराती ढाबे हैं… आप को राजस्थानी खाना भी मिल जाएगा… और विदेशी खाना चाहिए तो फिर शहर में अंदर जाना पड़ेगा…’’ जोरावर सिंह ने अपनी जानकारी के हिसाब से बताया.
‘‘कोई यहां बंगले पर आ कर खाना बनाने वाला या वाली नहीं है क्या?’’ कुलदीप ने पूछा.
‘‘साहब, मैं पूछ कर बताता हूं,’’ कह कर जोरावर सिंह चाय का कप उठाने लगा.
‘कहां राजधानी जयपुर और कहां पिंडवाड़ा…’ सोच कर कुलदीप को अच्छा तो नहीं लगा, मगर उन्होंने देखा कि अरावली की पहाडि़यों की गोद में बसा पिंडवाड़ा एक खूबसूरत और शांत कसबा है.
यह एक हराभरा आदिवासी बहुल इलाका है. उन्हें यहां के लोग भी बहुत सीधेसादे और अपने काम से काम रखने वाले लगे.
कुलदीप का सरकारी बंगला अंदर से काफी बड़ा और शानदार था. वैल फर्निश्ड घर में 2 बैडरूम अटैच बाथरूम समेत, एक ड्राइंगरूम, गैस स्टोव और चिमनी के साथ बड़ी सी किचन. एक लौबी के अलावा छोटा सा स्टोर भी था… लौबी में 4 कुरसी वाली डाइनिंग टेबल भी रखी थी.
चारों तरफ से खुलाखुला बंगला कुलदीप को बेहद पसंद आया. एक बैडरूम में एयरकंडीशनर भी लगा था. कुलदीप ने अपना सूटकेस बैडरूम में रखा और नहाने की तैयारी करने लगे.
औफिस का टाइम हो रहा था. कुलदीप नाश्ते के बारे में सोच रहे थे कि क्या किया जाए. अब तो मैगी बनाने जितना टाइम भी नहीं था. वे पहले ही दिन लेट नहीं होना चाहते थे.
‘वहीं कुछ खा लूंगा,’ सोचते हुए कुलदीप तैयार हो कर बाहर निकले तो डाइनिंग टेबल पर एक डोंगे में ढका हुआ नाश्ता रखा देखा. ढक्कन उठाया तो करीपत्ते से सजे हुए गरमागरम पोहे की खुशबू पूरे घर में फैल गई.
कुलदीप के मुंह में पानी आ गया… उन्होंने तुरंत प्लेट में डाल लिया. खाया तो स्वाद सचमुच लाजवाब था, मगर तारीफ सुनने के लिए आसपास कोई भी नहीं था. जोरावर सिंह भी नहीं…
औफिस में कुलदीप का दिन काफी थकाने वाला था. काम तो वही पुराना था, मगर नया माहौल… नए लोग… सब का परिचय लेतेलेते ही दिन बीत गया.
घर पहुंचते ही पत्नी शशि का फोन आ गया. बिजी होने के चलते दिन में बात ही नहीं कर पाए थे उस से…
यों भी शशि की बातें बहुत लंबी होती हैं, इसलिए फुरसत में ही वे उसे फोन करते हैं. अभी दोनों बातें कर ही रहे थे कि एक चीख की आवाज ने कुलदीप को चौंका दिया.
‘‘बाद में बात करता हूं,’’ कह कर उन्होंने शशि का फोन काटा और आवाज की दिशा में दौड़े.
‘आवाज तो सर्वेंट क्वार्टर में से आ रही है… तो क्या जोरावर सिंह अपनी पत्नी को पीट रहा है?’ कुलदीप कुछ देर खड़े सोचते रहे. धीमी होतीहोती सिसकियां बंद हो गईं तो वे बंगले की तरफ पलट गए.
चपरासी से कह कर रात का खाना पैक करा लिया था. सुबह नाश्ते के लिए ब्रैडजैम भी मंगवा लिया था, मगर सुबह की चाय का इंतजाम नहीं हो सका था.
सुबह उठ कर कुलदीप बंगले के गार्डन में सैर के लिहाज से चक्कर लगा रहे थे, मगर उन की आंखें सर्वेंट क्वार्टर की तरफ ही लगी थीं, तभी उन्हें जोरावर सिंह आता हुआ दिखाई दिया.
गांव में बनी यह कोठी सब गांव वालों में हैरानी का मुद्दा बनी हुई थी, जिस की वजह थी सेना का एक रिटायर्ड फौजी जो इस का मालिक था. उस ने फौज की नौकरी छोड़ कर इस गांव में जमीन खरीद कर अपने रहने के लिए इसे बनवाया था.
फौजी का नाम शमशेर सिंह था. बड़ीबड़ी मूंछें और गोलगोल राज भरी आंखें. सीने पर लटकता हुआ एक सुनहरी मैडल, जिसे सरकार ने उस की सेवा से खुश हो कर उसे इनाम में दिया था. इसे वह बड़ी ही शान के साथ लोगों के बीच दिखाया करता था.
फौजी शमशेर सिंह की कोठी में कई नौकर काम करते थे, जो ज्यादातर कोठी के अंदर ही रहते थे. नौकरनौकरानियों का यह स्टाफ शमशेर सिंह अपने साथ शहर से ही ले कर आया था.
गांव के कुछ लोगों का मानना था कि फौजी शमशेर सिंह गांव की बहूबेटियों पर बुरी नजर रखता है, तभी तो मुंहअंधेरे ही खाकी रंग का कच्छा पहन कर, एक हाथ में कुत्ते की चेन पकड़ कर उसे टहलाने के बहाने से शौच गई और घाट पर नहाती हुई औरतों को अपनी गोल आंखों से घूरने निकल पड़ता है.
पर, कुछ लोग कहते थे कि फौजी का परिवार एक सड़क हादसे में मारा गया था. इसी दुख में उस ने नौकरी छोड़ दी और यहां शांति की तलाश में रहने आ गया है.
मंगलू भी इसी गांव में अपनी पत्नी सरोज और 3 बेटियों के साथ रहता था. उस की बड़ी बेटी रमिया की उम्र
18 साल थी. दूसरी बेटी का नाम श्यामा था और वह अभी 14 साल की थी. तीसरी बेटी मुन्नी अभी 8 साल थी.
बेचारा मंगलू अपनी इन जवान होती बेटियों को देखता और अपनी किस्मत को दोष देता कि काश, उसे एक बेटा हो जाता, तो उस का वंश चल जाता. लड़कियां तो अपनी ससुराल में जाते ही पराई हो जाती हैं. एक लड़का ही तो होता है, जो मांबाप का सहारा होता है और जो चिता को आग लगाए तभी तो बैकुंठ मिल पाता है.
मंगलू की इस भावना को बढ़ाने में गांव के कुछ लोगों का बहुत योगदान था, जिस में सब से आगे थी मंगलू के एक दोस्त की बीवी रसीली.
जैसा रसीली का नाम था, वैसा ही रस से भरा हुआ उस का गदराया बदन, बड़ीबड़ी आंखें और पतली कमर के नीचे तक लटकते हुए बाल.
इस गांव में वह अपने ससुर के साथ रहती थी. उस का ससुर भी दमे का मरीज था और ज्यादातर खटिया पर ही लेटा रहता था.
रसीली का आदमी शहर कमाने गया हुआ था और 2-3 महीने में एक बार ही आ पाता था, इसीलिए रसीली किसी मस्त हिरनी की तरह उछलती फिरती थी.
गांव के जवान तो जवान, बूढ़े भी फिदा थे रसीली की इस जवानी पर, लेकिन रसीली तो फिदा थी 3 लड़कियों के बाप मंगलू पर.
‘‘अरे, जिस छप्पन छुरी के पीछे पूरा जमाना पड़ा है, वह तो सिर्फ तुझे चाहती है और तू है कि मेरा प्यार ही नहीं समझता है रे,’’ रसीली ने खेत की तरफ जाते हुए मंगलू की गरदन में अपनी बांहों का घेरा डालते हुए कहा.
‘‘अरे… अरे… रसीली… यह क्या कर रही हो… कोई देख लेगा… तो क्या सोचेगा,’’ मंगलू घबराते हुए बोला.
‘‘अरे, देख लेने दो… मैं तो यही चाहती हूं कि मेरे और तेरे रिश्ते की बात सब लोगों तक पहुंच जाए,’’ रसीली ने प्यार से मंगलू को निहार कर कहा.
‘‘अरे… नहीं रसीली. यह सब ठीक नहीं. मुझे यह सब करना अच्छा नहीं लगता,’’ मंगलू बोला.
‘‘मैं जानती हूं कि जिंदगी के 40वें साल में भी तू किसी गबरू जवान से कम नहीं है और मैं यह भी जानती हूं कि तेरे अंदर एक बेटे का बाप बनने की बहुत इच्छा है.
‘‘पर बीज चाहे जितना अच्छा हो, अगर जमीन ही बंजर होगी तो उस में फल कहां से आएगा,’’ रसीली कहे जा रही थी.
‘‘अरे, क्या अनापशनाप बके जा रही है…’’
‘‘तो फिर तू ही बता न कि तेरी घरवाली एक लड़का पैदा क्यों नहीं कर पाई, क्योंकि उस में एक बेटे को जनने की ताकत नहीं है. अगर तू लड़के का बाप बनना चाहता है, तो मुझे एक मौका दे, फिर देख मैं तुझे कैसे बनाती हूं एक बेटे का बाप,’’ रसीली ने मंगलू की आंखों में आंखें डालते हुए कहा.
मंगलू वैसे तो औरतखोर नहीं था, पर रसीली जैसी मस्त औरत का न्योता तो शायद ही कोई मर्द अस्वीकार कर सकता और फिर मंगलू के अंदर एक बेटे का बाप बनने की तीव्र इच्छा भी बलवती तो थी ही.
‘‘तू मेरे बेटे की मां बनेगी…पर क्यों? तेरा भी मर्द है न?’’ मंगलू के चेहरे पर कई आशंकाएं एकसाथ घूम रही थीं.
‘‘तुम भी बहुत भोले हो मंगलू… मेरा आदमी तो 2-3 महीने में एक बार ही आता है, वह भी 2-4 दिन के लिए. अब इस जवान शरीर को तो रोज ही मर्द का साथ चाहिए न…’’ रसीली ने थोड़ा शरमाते हुए कहा.
‘‘मतलब, तू चाहती है कि मैं तेरे साथ संबंध बनाऊं और जो बेटा पैदा होगा, उसे मैं ले लूं. पर ऐसा हमारे धर्म में नहीं होता और फिर गांव में पंचायत है, बड़ेबूढ़े हैं, वे सब क्या कहेंगे,’’ मंगलू ने सकुचाते हुए कहा.
‘‘हूं…’’ रसीली ने बदले में सिर्फ सिर हिलाया.
‘‘पर, मेरे और तेरे मिलन से लड़की भी तो पैदा हो सकती है… फिर?’’
‘‘नहीं, मुझे बेटी नहीं पैदा हो सकती है. शादी से पहले मैं ने एक ज्योतिषी को हाथ दिखाया था और बताया था कि मेरी कोख से सिर्फ लड़के ही पैदा होंगे, लड़कियां नहीं.’’
‘‘अच्छा… तब तो ठीक बात लगती है,’’ मंगलू सोच में डूब गया था.
‘‘अरे, अब ज्यादा सोच मत. जो लड़का मुझे पैदा होगा, वह तेरा ही तो होगा. पर, उसे मैं अपने पास ही रखूंगी. वह तेरी आंखों के सामने ही होगा और फिर तेरे मन में यह भावना भी तो नहीं रहेगी कि तेरे अंदर एक लड़के को जनने की ताकत नहीं है.
‘‘जब भी मैं बुलाऊं, तब मेरे बताए टाइम पर मुझ से मिलने आ जाना,’’ रसीली ने शरारती मुसकान से कहा.
मंगलू रसीली जैसी औरत के न्योते पर मन ही मन खुश हो रहा था और फिर उस के द्वारा पैदा होने वाला एक बेटा उस की मर्दानगी के अहंकार को पोषित भी कर देगा, यह सब सोच कर वह फूला न समाता था.
मंगलू और रसीली अपनी इसी चर्चा में ही मगन थे कि अचानक वहां पर फौजी शमशेर सिंह आ पहुंचा और रसीली के भरे बदन को ताकने लगा.
फौजी को देख मंगलू बिना कुछ बोले अपने रास्ते चला गया और रसीली भी तेज कदमों से अपने घर की ओर भाग गई.
आज खेत से लौटते समय अंधेरा सा होने लगा था. आकाश में काले बादल भी आ गए थे. अचानक से बारिश होने लगी. पास में ही रसीली का घर था. मंगलू ने सोचा कि जब तक बारिश हो रही है, कुछ देर जा कर पनाह ले लूं.
रसीली के ससुर खापी कर सो गए थे. रसीली ने काली साड़ी पहन रखी थी, जिस में से उस का गोरा बदन झलक रहा था और उस पर बारिश की बूंदें रसीली के आकर्षण को और बढ़ा रही थीं.
रसीली को जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई थी और वह मंगलू से जा कर चिपक गई.
मंगलू और रसीली के बीच अब कोई परदा न रहा. रसीली की जवानी में मस्त मंगलू बारबार एक लड़के का बाप बनने की सोच से और उत्साहित हो उठता था, जो रसीली को और भी रोमांचित कर जाता था.