पछतावा: थर्ड डिगरी का दर्द- भाग 1

‘‘सर, मुझे छोड़ दीजिए, मैं आप के पैर पड़ता हूं. मैं अपराधी नहीं, मुसीबत का मारा इनसान हूं…’’

जब इंस्पैक्टर राजन छेत्री ने उसे टौर्चर करते हुए थर्ड डिगरी का इस्तेमाल किया, तब रतन बापबाप बोल उठा. मारे दर्द के उस का रोमरोम कांप उठा. उसे ऐसा लगा, जैसे प्राण शरीर छोड़ कर उड़ जाएगा.

रतन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह पुलिस के हत्थे चढ़ेगा, क्योंकि उसे अपनी काबीलियत और होशियारी पर कुछ ज्यादा ही घमंड था. पर वह जैसे ही ओम सिनेमा के पास पहुंचा, वहां सादे लिबास में तैनात पुलिस वालों ने उसे दबोच लिया. उस की चीते जैसी फुती और कुत्ते जैसी सतर्कता न जाने कहां फुर्र हो गई. उस पर सिलसिलेवार बम धमाके करने का गंभीर आरोप था, जिस में पुलिस उस को सरगर्मी के साथ तलाश कर रही थी.

रतन की गिरफ्तारी के बाद उसे जिला हैडक्वार्टर में लाया गया. जहां आरक्षी निरीक्षक राजन छेत्री उस से कुछ गुप्त चीजें उगलवाने की कोशिश में था.

‘‘बोल, तेरा नाम क्या है?’’

‘‘सर, अभी बताता हूं… सर…, पहले थोड़ा सा पानी पिला दीजिए न… मारे प्यास के मेरा गला सूखा जा रहा है. बिलकुल कांटे की तरह चुभ रहा है…’’ उस ने अपनी जबान को अपने होंठों पर फेरते हुए कहा.

‘‘कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती, तू ऐसे नहीं मानेगा?’’

‘‘सर….सर…सर…, मेहरबानी कर के मुझे थोड़ा सा पानी… प्लीज सर…’’

‘‘अच्छा, ठीक है…,’’ इतना बोल कर इंस्पैक्टर राजन छेत्री ने 2 गरम समोसे और एक गिलास गरम चाय मंगवा कर उसे दिया. साथ ही, जलती निगाहों से उसे घूरते हुए कहा, ‘‘फिलहाल तो यही मिलेगा…, तू समोसे खा कर चाय पी ले, प्यास मिट जाएगी.’’

मरता क्या न करता, भूखप्यास से बेहाल रतन उस के हाथों से समोसे झटक कर जल्दीजल्दी खाने लगा. लेकिन गला सूखा होने की वजह से निगलने में उसे दिक्कत होने लगी तो उस ने गरम चाय सुड़क ली. किसी तरह उस ने समोसा खाया और चाय पी, लेकिन प्यास कम होने की जगह और बढ़ गई.

‘‘सर… सर… थोड़ा सा पानी… चुल्लू में ही दे दीजिए न, नहीं तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा,’’ वह मारे प्यास के तड़पते हुए हाथ जोड़ कर बोला. लेकिन इंस्पैक्टर राजन छेत्री पर उस का कोई असर नहीं दिखा.

‘‘पहले अपना नाम बता?’’

‘‘रतन विश्वास.’’

‘‘तेरे बाप का नाम क्या है?’’

‘‘सपन विश्वास.’’

‘‘सर, नेताजी आए हैं. उन्होंने आप को याद किया है,’’ इसी बीच थाने का एक सिपाही कस्टडी रूम में पहुंचा और आते के साथ ही एक पार्टी के कार्यकर्त्ता के आने की सूचना दी.

नेता का नाम सुनते ही इंस्पैक्टर राजन छेत्री गुस्से से लाल हो गया. कमरे से निकलते हुए उस ने एक बार रतन को घूरा जरूर, जैसे कह रहा हो कि तुम्हें छोड़ेंगे नहीं.

कमरे से इंस्पैक्टर राजन छेत्री के बाहर निकलते ही रतन ने गहरी सांस ली. वह समझ नहीं पा रहा था कि उस की मुखबिरी किस ने पुलिस से की है. उसे गिरफ्तार कराने में किस का हाथ है? कहीं मयंक और उस की प्रेमिका नैना थापा का हाथ तो नहीं. दार्जिलिंग के टाइगर हिल पर पिछले दिनों हुई थी उन से मुलाकात.

नैना टाइगर हिल में उगते सूरज को निहार रही थी. दूरदूर तक फैला हुआ नीला आकाश, उस के नीचे पहाड़ पर खूबसूरत कुदरती नजारे, रंगबिरंगी चिडि़यों का शोर मनभावन लग रहे थे. वह इन सब में खोई हुई थी कि अचानक रतन ने पीछे से आ कर उस की आंखों को अपनी उंगलियों से बंद कर दिया. वह हड़बड़ा कर अपनी आंखों पर से हथेलियों को हटाने की कोशिश करने लगी और बोली, ‘अरे मयंक, यह क्या मजाक है. मेरी आंखों के ऊपर से हटाओ हाथ, टाइगर हिल की वादियों का नजारा जीभर कर देख तो लेने दो.’

‘ऊहूं, पहले बुझो, मैं कौन हूं?’

अचानक पीछे से आई आवाज को नैना ने पहचान लिया. वह मयंक की आवाज नहीं, बल्कि रतन की आवाज थी. मयंक ने उसे बताया था कि रतन अच्छा इनसान नहीं है. उस का साथ आतंकवादियों से है.

रतन की आवाज पहचानते ही वह आगबबूला हो उठी और उस का हाथ अपनी आंखों से जबरन हटा दिया. उस की तरफ मुड़ कर नफरत भरी नजरों से देखते हुए वह बोली थी, ‘तू ने मुझे छुआ क्यों? मेरी आंखें बंद करने वाले तुम होते कौन हो? दफा हो जाओ मेरी नजरों के सामने से…’’

‘अरे नैना, इतनी छोटी सी बात पर इतना बड़ा गुस्सा. ऐसी आंखमिचौनी तो हम कितनी बार खेल चुके हैं. प्लीज नैना, गुस्सा थूक दो. मैं अपने किए की माफी मांगता हूं,’ ‘रतन ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘यह मयंक कौन है, जो तुम्हारे कान भरता रहता है. अनजान लोगों से दूर ही रहो तो अच्छा है. तुम उस के साथ यहां आई हो और वह तुम्हें ही अकेला छोड़ कर अपने दोस्तों के साथ किसी मसले पर बातचीत कर रहा है. मैं उधर से गुजर रहा था तो तुम पर नजर ठहर गई.’

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया

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काले घोड़े की नाल: आखिर क्या था काले घोड़े की नाल का रहस्य ?- भाग 1

मुखियाजी को घोड़े पालने का बहुत शौक था. बताते हैं कि ये शौक उन को विरासत में मिला हुआ था. आज भी मुखियाजी के पास 5 घोड़े थे, जिन की देखभाल का काम उन्होंने चंद्रिका नाम के 35 साला एक शख्स को दे रखा था.

मुखियाजी की उम्र तकरीबन 50-55 उम्र के बीच, फिर भी बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं पता चलता था. रोज सुबहशाम दूध पीते और लंबी सैर को जाते. अपनी जवानी के दिनों में आसपास के इलाकों में खूब दंगल जीते थे मुखियाजी ने.

पीठ पीछे कोई मुखियाजी को कुछ भी कहे, पर उन के सामने सभी नतमस्तक नजर आते थे.

मुखियाजी और उन की पत्नी के जीवन में एक बहुत भारी कमी थी कि दोनों के कोई औलाद नहीं थी. घरेलू नुसखों से कई बार उपचार करने की कोशिश भी की गई, पर कुछ नतीजा नहीं निकला. मुखियाइन की गोद हरी नहीं हो सकी और दोनों हार कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ गए.

मुखियाजी को अपनी वंश बेल सूखने की कतई परवाह नहीं थी. उन्हें तो अपनी जिंदगी में अपनी सभी इंद्रियों से सुख उठाना अच्छी तरह आता था.

मुखियाजी कुल मिला कर 3 भाई थे, मुखियाजी से छोटा वाला संजय और सब से छोटा विनय, दोनों भाई मुखियाजी के प्रभाव में दबे हुए रहते थे. किसी की भी उन के सामने जबान खोलने की हिम्मत नहीं थी.

पिछले कुछ दिनों से मुखियाजी के मन में उन के किसी चमचे ने समाजसेवा का शौक लगा दिया था, तभी तो मुखियाजी हर किसी से यही कहते कि बड़े घर से तो हर कोई रिश्ता जोड़ना चाहता है, पर मैं तो संजय और विनय की शादी किसी गरीब घर की लड़की से ही करूंगा.

हां… पर लड़की खूबसूरत और सुशील होनी चाहिए, समाजसेवा भी होगी और किसी गरीब का भला भी हो जाएगा.

आसपास के गांव में कम पैसे वाले ठाकुर भी रहते थे. उन में से बहुत से लोग मुखियाजी के यहां अपनी लड़कियों का रिश्ता ले कर पहुंचे. मुखियाजी ने लड़कियों के फोटो रखवा लिए और बाद में संपर्क करने को कहा.

कुछ दिन बाद मुखियाजी ने उन सारे फोटो में से 2 खूबसूरत लड़कियों को पसंद किया. हैरानी की बात थी कि मुखियाजी ने जो 2 लड़कियां पसंद की थीं, वो अपेकक्षाकृत भरेपूरे बदन की थीं.

मुखियाजी ने उन दोनों के पिताजी को बुला भेजा और हर किसी से अकेले में बात की, “देखिए, हम अपने भाई संजय के लिए एक लड़की ढूंढ़ रहे हैं… पर हमारी 2 शर्तें हैं…

“पहली शर्त तो यह है कि फोटो देख कर लड़की की बुद्धिमत्ता का परिचय नहीं मिलता, इसलिए हम व्यक्तिगत रूप से लड़की से मिलना चाहेंगे… और दूसरी शर्त क्या होगी कि ये हम आप को रिश्ता तय होने के बाद बताएंगे.”

दूसरी शर्त वाली बात से लड़की का पिता थोड़ा घबराया, तो मुखियाजी ने उस से कहा कि ऐसी कोई शर्त नहीं होगी, जिसे वे पूरा न कर सकें. उन की इस बात पर लड़की के बाप को कोई आपत्ति नहीं हुई.

उन लोगों ने घर जा कर अपनी बेटियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया कि मुखियाजी के सभी सवालों का उत्तर सही से देना और सासससुर की बात मानना एक अच्छी बहू के गुण होते हैं.

मुखियाजी को आखिरकार सीमा नाम की एक लड़की पसंद आ गई.

“देखो सीमा, संजय को हम ने ही पालपोस कर बड़ा किया है, इसलिए हमारी हर बात मानता है वह. यही उम्मीद हम तुम से भी करते हैं… मानोगी न हमारी बात,” सीमा की पीठ पर हाथ घुमाते हुए मुखियाजी ने कहा. सीमा ने सिर्फ हां में सिर हिला दिया.

मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को बुलाया और कहा कि उन की लड़की उन्हें पसंद आ गई है और सब से पास वाले मुहूर्त बमें वे सीमा और संजय की शादी कर दें और फिर मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को अपनी दूसरी शर्त के बारे में बताया, “हमारी दूसरी शर्त ये है कि तुम हमें अपनी लड़की दे रहे हो, इसलिए हमारा भी फर्ज है कि हम तुम्हें अपनी तरफ से कुछ भेंट दें,” ये कह कर मुखियाजी ने 50,00 रुपए मोती सिंह को पकड़ा दिए. मोती सिंह उन की दरियादिली पर खुश हो गया. उस ने मुखियाजी के सामने हाथ जोड़ लिए.

संजय और सीमा की शादी हो गई थी, पर मुखियाजी का सख्त आदेश था कि अभी संजय और सीमा की सुहागरात का उचित समय नहीं है, इसलिए संजय को अलग कमरे में सोना पड़ेगा.

मुखियाजी अपने दोनों भाइयों के गांवों में रहने के सख्त खिलाफ थे. उन का साफ कहना था कि अगर तुम लोग गांव में रुक गए, तो यहां के गंवार लड़कों के साथ तुम लोग भी नहर पर बैठ कर चिलम पीया करोगे और आवारागर्दी करोगे और ये बात मुखियाजी को मंजूर नहीं, इसलिए मेहमानों के जाते ही संजय और विनय को शहर चलता कर दिया गया. बेचारा संजय अभी अपनी पत्नी के साथ सैक्ससुख भी नहीं ले पाया था और उस से अलग हो जाना पड़ा.

सीमा ने संजय से न जाने की फरियाद भी की, पर मुखियाजी का आदेश संजय के लिए पत्थर की लकीर था, इसलिए वह कुछ न बोल सका.

इसी तरह पूरे 6 महीने हो गए थे संजय को गए हुए, सीमा ने एक मर्द के शरीर का सामीप्य अभी तक नहीं जाना था. वह अकसर सोचती कि ऐसी शादी से क्या फायदा कि दिनभर घर का काम करो और रात में बिस्तर पर करवटें बदलो…

बाहर बारिश हो रही थी. सीमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी कि उसे अपने पैरों पर किसी के गरम हाथ की छुअन महसूस हुई. वे हाथ उस की जांघों तक पहुंच गए थे, कोई उस के सीने पर अपने हाथों का दबाव बढ़ा रहा था. सीमा की सांसें गरम हो गई थीं. उस का स्पर्श सीमा को बहुत अच्छा लग रहा था. सीमा को लगा कि उस का पति संजय ही वापस आ गया है. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं और आंनद लेना शुरू कर दिया. उस आदमी ने सीमा के सारे कपड़े हटा दिए और सीमा के स्त्री शरीर में प्रवेश कर गया.

सीमा को आज पहली बार मर्द की मर्दानगी का मजा मिला था. संभोग खत्म होते ही वह व्यक्ति सीमा से अलग हो गया.

सीमा ने उस की तरफ देख कर प्यारमनुहार करना चाहा और अपनी आंखें खोलीं…पर ये क्या, ये तो संजय नहीं था, बल्कि मुखियाजी थे… बिस्तर में पूरी तरह नग्न सीमा भला मुखियाजी का सामना कैसे करती. उस ने तुरंत ही चादर से अपने शरीर को ढकने की असफल कोशिश की और अस्फुट स्वर में बोली, “ये क्या किया मुखियाजी आप ने?”

“एक बात अच्छी तरह समझ ले सीमा… तुझे अब मुझे ही अपना पति समझना होगा, क्योंकि संजय का सारा खर्चा मैं उठाता आया हूं. मेरे सामने वह चूं तक नहीं करेगा. मैं उस के माल का मजा उड़ा सकूं, इसीलिए उस को मैं ने शहर भेज दिया है…

“और वैसे भी हम ने तेरे बाप को हमारी हर बात मानने के लिए पैसे दिए हैं,” नशे में बोल रहे थे मुखियाजी.

ऐसा सुन कर सन्न रह गई थी सीमा, पर मन ही मन उस ने अपनेआप को समझा लिया था, क्योंकि उसे मुखियाजी के रूप में उस के जिस्म को सुख पहुंचाने वाला मर्द जो मिल गया था.

फिर क्या था, मुखियाजी लगभग रोज ही सीमा के कमरे में आ जाते और दोनों सैक्स का जम कर मजा उठाते. मुखियाजी के चेहरे की लालिमा बढ़ गई थी. नई जवान लड़की के जिस्म का रस पी कर जैसे उन की जवानी ही वापस आ गई थी.

कभीकभी जब मुखियाजी अपनी पत्नी के पास ही सो जाते तो सीमा को जैसे सौतिया डाह सताने लगता. उसे अकेले नींद न आती, इसलिए कभी वह चूड़ियां खनकाती, तो कभी अपनी पायलें बजाते हुए मुखियाजी के कमरे के सामने से निकलती. हार कर मुखियाजी को उठ कर आना पड़ता और सीमा के जिस्म की आग को बुझाना पड़ता.

इस दौरान शहर से संजय वापस आया, तो मुखियाजी की त्योरियां चढ़ने लगीं और उन्होंने उसे किसी बहाने यहांवहां दौड़ा दिया, ताकि वह सीमा के साथ न रह पाए. फिर एक दिन उसे पैसावसूली के लिए दूसरे गांव भेज दिया और जब वह वापस आया, तब तक शहर से उस के ठेकेदार का बुलावा आ चुका था. बेचारा संजय अपनी पत्नी के संसर्ग को तरसता रह गया.

कुछ समय बीता तो मुखियाजी अपने छोटे भाई विनय की शादी के बारे में सोचने लगे. उन्होंने शहर से विनय को भी बुलवा लिया था और बहू ढूंढ़ने लगे. जल्दी ही उन्हें मुनासिब बहू मिल भी गई, जिस का पिता गरीब था और पहले की तरह ही उसे पूरे 50,000 रुपए देते हुए मुखियाजी ने लड़की के बाप से कहा कि बस अपनी लड़की से इतना कह दो कि विनय को पढ़ानेलिखाने में हम ने बहुत खर्चा किया है. हम ही उस के मांबाप हैं, इसलिए हमारी बात मान कर रहेगी तो सुखी रहेगी.

कोई शर्त नहीं: ट्रांसफर की मारी शशि बेचारी- भाग 1

पत्नी शशि गुमसुम सी सामान पैक करने में उन की मदद कर रही थी. उस की उदास आंखें भी सरकार की इस पौलिसी के प्रति अपनी नाराजगी की गवाही दे रही थीं.

अभी 2 साल भी पूरे नहीं हुए थे कुलदीप को अपने होम टाउन जयपुर में ट्रांसफर हुए कि फिर से ट्रांसफर और वह भी गुजरात सीमा के पास… एक आदिवासी इलाके में… सिरोही जिले में एक छोटी सी जगह पिंडवाड़ा…

हालांकि राज्य सरकार की तरफ से अपने प्रशासनिक अधिकारियों को सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, मगर परिवार की अपनी जिम्मेदारियां भी होती हैं.

पिंडवाड़ा में सभी चीजें मुहैया होने के बावजूद भी कुलदीप की मजबूरी थी कि वे शशि और बच्चों को अपने साथ नहीं ले जा सकते थे.

बड़ी बेटी रिया ने अभी हाल ही में इंजीनियरिंग कालेज के फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया है और छोटा बेटा राहुल तो इस साल 10वीं जमात में बोर्ड के एग्जाम देगा. ऐसे में उन दोनों को ही बीच सैशन में डिस्टर्ब नहीं किया जा सकता, इसलिए शशि को बच्चों के साथ जयपुर में ही रहना पड़ेगा.

अगर दूरियां नापी जाएं तो जयपुर और पिंडवाड़ा के बीच ज्यादा नहीं है, मगर प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारियां ही इतनी होती हैं कि हर हफ्ते इन दूरियों को तय कर पाना कुलदीप के लिए मुमकिन नहीं था. महीने में सिर्फ 1 या 2 बार ही कुलदीप का जयपुर आना मुमकिन होगा. यह बात पतिपत्नी दोनों ही बिना कहे समझ रहे थे.

कुलदीप की सब से बड़ी समस्या घर के खाने को ले कर थी. खाने के नाम पर उन्होंने कालेज में पढ़ाई के दौरान सिर्फ चावल बनाने ही सीखे थे और बाद में मैगी बनाना भी सीख लिया था. हां, शादी के बाद उन्हें चाय बनाना जरूर आ गया था.

हमेशा तो ट्रांसफर होने पर शशि व बच्चे उन के साथ ही शिफ्ट हो जाते थे, मगर अब बच्चों की पढ़ाई उन की सुविधा से ज्यादा जरूरी हो गई है.

इधर जैसेजैसे उम्र बढ़ रही थी, होटलों और ढाबों के तेज मसालों वाले खाने से कुलदीप को एसिडिटी होने लगी थी. नौकरी वगैरह का तनाव होने के चलते शरीर में ब्लड शुगर का लैवल भी बढ़ने लगा था.

डाक्टरों ने कसरत करने के साथसाथ कम मसाले वाला खाना और हरी पत्तेदार सब्जियों के खाने की सख्त हिदायत दे रखी थी. पत्नी शशि परेशान थी कि उन के खाने का इंतजाम कैसे होगा.

पिंडवाड़ा पहुंचते ही जोरावर सिंह ने गरमागरम चाय के साथ कुलदीप का स्वागत किया.

जोरावर सिंह कुलदीप का सहायक होने के साथसाथ बंगले का चौकीदार और माली सबकुछ था.

जोरावर सिंह बंगले के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में अपनी पत्नी राधा के साथ रहता था. चाय सचमुच बहुत अच्छी बनी थी. पीते ही कुलदीप बोले, ‘‘तुम्हें देख कर तो नहीं लगता कि यह चाय तुम ने ही बनाई है.’’

‘‘सही कहा साहब, यह चाय मैं ने नहीं, बल्कि मेरी जोरू ने बनाई है,’’ जोरावर सिंह अपने पीले दांत निकाल कर हंसा.

कुलदीप ने इस बार ध्यान से देखा उसे. बड़ीबड़ी मूंछें, कानों में सोने की मुरकी, सिर पर पगड़ी और धोतीअंगरखा पहने दुबलापतला जोरावर सिंह कुलदीप के पास जमीन पर उकड़ू बैठा हुआ उसे एकटक देख रहा था.

‘‘यहां खाने का क्या इंतजाम है?’’ कुलदीप ने पूछा.

‘‘आसपास कई गुजराती ढाबे हैं… आप को राजस्थानी खाना भी मिल जाएगा… और विदेशी खाना चाहिए तो फिर शहर में अंदर जाना पड़ेगा…’’ जोरावर सिंह ने अपनी जानकारी के हिसाब से बताया.

‘‘कोई यहां बंगले पर आ कर खाना बनाने वाला या वाली नहीं है क्या?’’ कुलदीप ने पूछा.

‘‘साहब, मैं पूछ कर बताता हूं,’’ कह कर जोरावर सिंह चाय का कप उठाने लगा.

‘कहां राजधानी जयपुर और कहां पिंडवाड़ा…’ सोच कर कुलदीप को अच्छा तो नहीं लगा, मगर उन्होंने देखा कि अरावली की पहाडि़यों की गोद में बसा पिंडवाड़ा एक खूबसूरत और शांत कसबा है.

यह एक हराभरा आदिवासी बहुल इलाका है. उन्हें यहां के लोग भी बहुत सीधेसादे और अपने काम से काम रखने वाले लगे.

कुलदीप का सरकारी बंगला अंदर से काफी बड़ा और शानदार था. वैल फर्निश्ड घर में 2 बैडरूम अटैच बाथरूम समेत, एक ड्राइंगरूम, गैस स्टोव और चिमनी के साथ बड़ी सी किचन. एक लौबी के अलावा छोटा सा स्टोर भी था… लौबी में 4 कुरसी वाली डाइनिंग टेबल भी रखी थी.

चारों तरफ से खुलाखुला बंगला कुलदीप को बेहद पसंद आया. एक बैडरूम में एयरकंडीशनर भी लगा था. कुलदीप ने अपना सूटकेस बैडरूम में रखा और नहाने की तैयारी करने लगे.

औफिस का टाइम हो रहा था. कुलदीप नाश्ते के बारे में सोच रहे थे कि क्या किया जाए. अब तो मैगी बनाने जितना टाइम भी नहीं था. वे पहले ही दिन लेट नहीं होना चाहते थे.

‘वहीं कुछ खा लूंगा,’ सोचते हुए कुलदीप तैयार हो कर बाहर निकले तो डाइनिंग टेबल पर एक डोंगे में ढका हुआ नाश्ता रखा देखा. ढक्कन उठाया तो करीपत्ते से सजे हुए गरमागरम पोहे की खुशबू पूरे घर में फैल गई.

कुलदीप के मुंह में पानी आ गया… उन्होंने तुरंत प्लेट में डाल लिया. खाया तो स्वाद सचमुच लाजवाब था, मगर तारीफ सुनने के लिए आसपास कोई भी नहीं था. जोरावर सिंह भी नहीं…

औफिस में कुलदीप का दिन काफी थकाने वाला था. काम तो वही पुराना था, मगर नया माहौल… नए लोग… सब का परिचय लेतेलेते ही दिन बीत गया.

घर पहुंचते ही पत्नी शशि का फोन आ गया. बिजी होने के चलते दिन में बात ही नहीं कर पाए थे उस से…

यों भी शशि की बातें बहुत लंबी होती हैं, इसलिए फुरसत में ही वे उसे फोन करते हैं. अभी दोनों बातें कर ही रहे थे कि एक चीख की आवाज ने कुलदीप को चौंका दिया.

‘‘बाद में बात करता हूं,’’ कह कर उन्होंने शशि का फोन काटा और आवाज की दिशा में दौड़े.

‘आवाज तो सर्वेंट क्वार्टर में से आ रही है… तो क्या जोरावर सिंह अपनी पत्नी को पीट रहा है?’ कुलदीप कुछ देर खड़े सोचते रहे. धीमी होतीहोती सिसकियां बंद हो गईं तो वे बंगले की तरफ पलट गए.

चपरासी से कह कर रात का खाना पैक करा लिया था. सुबह नाश्ते के लिए ब्रैडजैम भी मंगवा लिया था, मगर सुबह की चाय का इंतजाम नहीं हो सका था.

सुबह उठ कर कुलदीप बंगले के गार्डन में सैर के लिहाज से चक्कर लगा रहे थे, मगर उन की आंखें सर्वेंट क्वार्टर की तरफ ही लगी थीं, तभी उन्हें जोरावर सिंह आता हुआ दिखाई दिया.

बेटे की चाह : भाग 1

गांव में बनी यह कोठी सब गांव वालों में हैरानी का मुद्दा बनी हुई थी, जिस की वजह थी सेना का एक रिटायर्ड फौजी जो इस का मालिक था. उस ने फौज की नौकरी छोड़ कर इस गांव में जमीन खरीद कर अपने रहने के लिए इसे बनवाया था.

फौजी का नाम शमशेर सिंह था. बड़ीबड़ी मूंछें और गोलगोल राज भरी आंखें. सीने पर लटकता हुआ एक सुनहरी मैडल, जिसे सरकार ने उस की सेवा से खुश हो कर उसे इनाम में दिया था. इसे वह बड़ी ही शान के साथ लोगों के बीच दिखाया करता था.

फौजी शमशेर सिंह की कोठी में कई नौकर काम करते थे, जो ज्यादातर कोठी के अंदर ही रहते थे. नौकरनौकरानियों का यह स्टाफ शमशेर सिंह अपने साथ शहर से ही ले कर आया था.

गांव के कुछ लोगों का मानना था कि फौजी शमशेर सिंह गांव की बहूबेटियों पर बुरी नजर रखता है, तभी तो मुंहअंधेरे ही खाकी रंग का कच्छा पहन कर, एक हाथ में कुत्ते की चेन पकड़ कर उसे टहलाने के बहाने से शौच गई और घाट पर नहाती हुई औरतों को अपनी गोल आंखों से घूरने निकल पड़ता है.

पर, कुछ लोग कहते थे कि फौजी का परिवार एक सड़क हादसे में मारा गया था. इसी दुख में उस ने नौकरी छोड़ दी और यहां शांति की तलाश में रहने आ गया है.

मंगलू भी इसी गांव में अपनी पत्नी सरोज और 3 बेटियों के साथ रहता था. उस की बड़ी बेटी रमिया की उम्र

18 साल थी. दूसरी बेटी का नाम श्यामा था और वह अभी 14 साल की थी. तीसरी बेटी मुन्नी अभी 8 साल थी.

बेचारा मंगलू अपनी इन जवान होती बेटियों को देखता और अपनी किस्मत को दोष देता कि काश, उसे एक बेटा हो जाता, तो उस का वंश चल जाता. लड़कियां तो अपनी ससुराल में जाते ही पराई हो जाती हैं. एक लड़का ही तो होता है, जो मांबाप का सहारा होता है और जो चिता को आग लगाए तभी तो बैकुंठ मिल पाता है.

मंगलू की इस भावना को बढ़ाने में गांव के कुछ लोगों का बहुत योगदान था, जिस में सब से आगे थी मंगलू के एक दोस्त की बीवी रसीली.

जैसा रसीली का नाम था, वैसा ही रस से भरा हुआ उस का गदराया बदन, बड़ीबड़ी आंखें और पतली कमर के नीचे तक लटकते हुए बाल.

इस गांव में वह अपने ससुर के साथ रहती थी. उस का ससुर भी दमे का मरीज था और ज्यादातर खटिया पर ही लेटा रहता था.

रसीली का आदमी शहर कमाने गया हुआ था और 2-3 महीने में एक बार ही आ पाता था, इसीलिए रसीली किसी मस्त हिरनी की तरह उछलती फिरती थी.

गांव के जवान तो जवान, बूढ़े भी फिदा थे रसीली की इस जवानी पर, लेकिन रसीली तो फिदा थी 3 लड़कियों के बाप मंगलू पर.

‘‘अरे, जिस छप्पन छुरी के पीछे पूरा जमाना पड़ा है, वह तो सिर्फ तुझे चाहती है और तू है कि मेरा प्यार ही नहीं समझता है रे,’’ रसीली ने खेत की तरफ जाते हुए मंगलू की गरदन में अपनी बांहों का घेरा डालते हुए कहा.

‘‘अरे… अरे… रसीली… यह क्या कर रही हो… कोई देख लेगा… तो क्या सोचेगा,’’ मंगलू घबराते हुए बोला.

‘‘अरे, देख लेने दो… मैं तो यही चाहती हूं कि मेरे और तेरे रिश्ते की बात सब लोगों तक पहुंच जाए,’’ रसीली ने प्यार से मंगलू को निहार कर कहा.

‘‘अरे… नहीं रसीली. यह सब ठीक नहीं. मुझे यह सब करना अच्छा नहीं लगता,’’ मंगलू बोला.

‘‘मैं जानती हूं कि जिंदगी के 40वें साल में भी तू किसी गबरू जवान से कम नहीं है और मैं यह भी जानती हूं कि तेरे अंदर एक बेटे का बाप बनने की बहुत इच्छा है.

‘‘पर बीज चाहे जितना अच्छा हो, अगर जमीन ही बंजर होगी तो उस में फल कहां से आएगा,’’ रसीली कहे जा रही थी.

‘‘अरे, क्या अनापशनाप बके जा रही है…’’

‘‘तो फिर तू ही बता न कि तेरी घरवाली एक लड़का पैदा क्यों नहीं कर पाई, क्योंकि उस में एक बेटे को जनने की ताकत नहीं है. अगर तू लड़के का बाप बनना चाहता है, तो मुझे एक मौका दे, फिर देख मैं तुझे कैसे बनाती हूं एक बेटे का बाप,’’ रसीली ने मंगलू की आंखों में आंखें डालते हुए कहा.

मंगलू वैसे तो औरतखोर नहीं था, पर रसीली जैसी मस्त औरत का न्योता तो शायद ही कोई मर्द अस्वीकार कर सकता और फिर मंगलू के अंदर एक बेटे का बाप बनने की तीव्र इच्छा भी बलवती तो थी ही.

‘‘तू मेरे बेटे की मां बनेगी…पर क्यों? तेरा भी मर्द है न?’’ मंगलू के चेहरे पर कई आशंकाएं एकसाथ घूम रही थीं.

‘‘तुम भी बहुत भोले हो मंगलू… मेरा आदमी तो 2-3 महीने में एक बार ही आता है, वह भी 2-4 दिन के लिए. अब इस जवान शरीर को तो रोज ही मर्द का साथ चाहिए न…’’ रसीली ने थोड़ा शरमाते हुए कहा.

‘‘मतलब, तू चाहती है कि मैं तेरे साथ संबंध बनाऊं और जो बेटा पैदा होगा, उसे मैं ले लूं. पर ऐसा हमारे धर्म में नहीं होता और फिर गांव में पंचायत है, बड़ेबूढ़े हैं, वे सब क्या कहेंगे,’’ मंगलू ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘हूं…’’ रसीली ने बदले में सिर्फ सिर हिलाया.

‘‘पर, मेरे और तेरे मिलन से लड़की भी तो पैदा हो सकती है… फिर?’’

‘‘नहीं, मुझे बेटी नहीं पैदा हो सकती है. शादी से पहले मैं ने एक ज्योतिषी को हाथ दिखाया था और बताया था कि मेरी कोख से सिर्फ लड़के ही पैदा होंगे, लड़कियां नहीं.’’

‘‘अच्छा… तब तो ठीक बात लगती है,’’ मंगलू सोच में डूब गया था.

‘‘अरे, अब ज्यादा सोच मत. जो लड़का मुझे पैदा होगा, वह तेरा ही तो होगा. पर, उसे मैं अपने पास ही रखूंगी. वह तेरी आंखों के सामने ही होगा और फिर तेरे मन में यह भावना भी तो नहीं रहेगी कि तेरे अंदर एक लड़के को जनने की ताकत नहीं है.

‘‘जब भी मैं बुलाऊं, तब मेरे बताए टाइम पर मुझ से मिलने आ जाना,’’ रसीली ने शरारती मुसकान से कहा.

मंगलू रसीली जैसी औरत के न्योते पर मन ही मन खुश हो रहा था और फिर उस के द्वारा पैदा होने वाला एक बेटा उस की मर्दानगी के अहंकार को पोषित भी कर देगा, यह सब सोच कर वह फूला न समाता था.

मंगलू और रसीली अपनी इसी चर्चा में ही मगन थे कि अचानक वहां पर फौजी शमशेर सिंह आ पहुंचा और रसीली के भरे बदन को ताकने लगा.

फौजी को देख मंगलू बिना कुछ बोले अपने रास्ते चला गया और रसीली भी तेज कदमों से अपने घर की ओर भाग गई.

आज खेत से लौटते समय अंधेरा सा होने लगा था. आकाश में काले बादल भी आ गए थे. अचानक से बारिश होने लगी. पास में ही रसीली का घर था. मंगलू ने सोचा कि जब तक बारिश हो रही है, कुछ देर जा कर पनाह ले लूं.

रसीली के ससुर खापी कर सो गए थे. रसीली ने काली साड़ी पहन रखी थी, जिस में से उस का गोरा बदन झलक रहा था और उस पर बारिश की बूंदें रसीली के आकर्षण को और बढ़ा रही थीं.

रसीली को जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई थी और वह मंगलू से जा कर चिपक गई.

मंगलू और रसीली के बीच अब कोई परदा न रहा. रसीली की जवानी में मस्त मंगलू बारबार एक लड़के का बाप बनने की सोच से और उत्साहित हो उठता था, जो रसीली को और भी रोमांचित कर जाता था.

विधायक को जवाब : निशा किस वारदात से डरी हुई थी- भाग 1

निशा दोपहर की वारदात से बहुत ज्यादा डरी हुई थी, पर उस में बहुत हिम्मत बाकी थी. वह उदास सी कच्चे मकान की तीसरी मंजिल पर पलंग पर लेटी हुई थी. उसे हलका बुखार था. माथा दर्द से फटा जा रहा था. कभीकभी तो निशा अपने दोनों हाथों से सिर को इस तरह पकड़ लेती मानो उसे दबा कर निचोड़ देना चाहती हो. उस के बाल इधरउधर बिखर गए थे. वह बहुत बेचैन थी. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. अचानक निशा ने अपने दिल की आवाज सुनी, ‘निशा, तू इस शहरगांव, देश को छोड़ दे,’ और उस ने मरने की ठान ली. उस का चेहरा धीरेधीरे सख्त होने लगा. अचानक वह उठ कर बैठ गई. मगर जैसे ही उस ने उठना चाहा, बगल वाले टूटे पलंग पर लेटे पिता पर उस की नजर पड़ गई.

निशा ने जब गौर से पिता की नंगी पीठ देखी, तो उस के कानों में एमएलए कृपाल सिंह के आदमियों के डंडों की सरसराहट और पिता की चीखें गूंजने लगीं. उसे लगा मानो एमएलए की धमकी भरी तेज आवाज से उस का घर चरमरा कर गिर पड़ेगा. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. वह अपने दोनों हाथों से चेहरा छिपा कर रोने लगी. निशा और राजन एकसाथ कोचिंग क्लासों में मिले थे. निशा के पास कुछ नहीं था, पर उस के हर ऐग्जाम में 98 फीसदी मार्क्स आते थे. राजन ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. राजन पहले मौजमस्ती वाला लड़का था, पर निशा के पढ़ाने पर कोचिंग के मौक टैस्टों में अब वह भी 90 फीसदी मार्क्स लाने लगा था. मार्क्स ही नहीं मिले, दिल भी मिले और बदन भी. अब दोनों को अलग करना मुश्किल था. अचानक निशा के दिल ने फिर आवाज दी, ‘धीरज रखो निशा, सब ठीक हो जाएगा. अगर तुम भाग जाओगी तो पिता का क्या होगा? उस राजन का क्या होगा, जो तुम्हारे प्यार में अपना सबकुछ छोड़ने को तैयार है? तुम्हारे प्यार को ही वह अपनी मंजिल मानता है.

और जब तुम ही नहीं रहोगी तो वह कहां जाएगा? तब शायद वह भी मर जाएगा.’ राजन की बातें निशा के कानों में गूंजने लगीं, ‘नहीं निशा, तुम्हें कुछ नहीं होगा. मुझ पर यकीन करो. मैं इस ऊंचनीच की दीवार को तोड़ कर एक दिन इस सारी बस्ती की क्या सारे शहर के सामने तेरी मांग में सिंदूर भरूंगा. मरने की बात मत करो. अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं खुद को आग लगा दूंगा.’ निशा बड़बड़ाने लगी, ‘‘मुझे कुछ नहीं होगा राजन… मैं तुम्हारे साथ हूं… मैं भी लड़ूंगी इस समाज से भी, पुलिस से भी, मैं भी लड़ूंगी…’’ अचानक निशा ने देखा कि उस के पिता उसी की तरफ आ रहे हैं. वह आंखें बंद कर के सोने का नाटक करने लगी. मगर पिता तो पिता होता है, वे बेटी की हर हरकत को भांप चुके थे. वे उस के टूटे से पलंग पर बैठ गए. उस के गालों पर आंसू देख कर पहले तो सहमे, फिर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘तेरा बाप हूं… तेरी हालत को मैं जानता हूं. मगर मैं ऐसा बाप हूं,

जो तेरी इच्छा को जानते हुए भी तेरे लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं. मैं बेसहारा हूं. ‘‘बेटी, मेढ़क अगर चांद के पास जाना चाहे तो वह फुदकफुदक कर जान दे देगा, फिर भी वह चांद तक नहीं पहुंच पाएगा. हम उसी मेढ़क की तरह हैं. बेटी, भूल जा राजन को. ‘‘मैं मानता हूं कि प्यार करना कोई जुर्म नहीं है. मगर तुम्हारा सब से बड़ा जुर्म यह है कि तुम मेरी बेटी हो… एक हरिजन की बेटी. राजन इस इलाके के एमएलए के बेटे हैं, राजपूत खानदान के एकलौते वारिस हैं. वे ऊंची जाति वाले लोग हम हरिजनों को अपने आंगन में बैठा कर खाना तक नहीं खिलाते… अपना बेटा कहां से देंगे? ‘‘यह दुनिया फूलों की सेज नहीं है बेटी, बहुत कांटे हैं इस में. अपनी जिंदगी बचा लो, भूल जाओ राजन को. पोंछ लो आंसू… पत्थर आंसुओं से कभी नहीं पिघला करते. पत्थरों से सिर टकराने से अपना ही सिर फूटता है बेटी.’’ निशा जो अब तक चुप थी, फफक कर रो पड़ी. उस ने अपने पिता के सीने में अपना चेहरा छिपा लिया. कुछ देर तक बापबेटी एकदूसरे की बांहों में सुबकते रहे. फिर किसी तरह अपनेआप को संभालते हुए पिता बोले, ‘‘बेटी, इतना याद रखो कि हम हरिजन हैं… छोटी जाति के हैं. तुम…’’ बात को बीच में ही काटते हुए निशा बोली, ‘‘मगर बापू, आज जमाना बदल गया है. आप भी जानते हो और राजन भी जानता है कि यह कच्ची बस्ती का मकान हम जल्दी छोड़ देंगे. मुझे जरा इंजीनियरिंग करने दो, मैं लाखों कमाऊंगी. अब कोई हमारे रास्ते को जाति के नाम पर नहीं रोक सकता.

‘‘पर जब मेरे नंबर पता चलते हैं, तो चकरा जाते हैं, इसीलिए राजन इस फर्क को नहीं मानता.’’ ‘‘मैं जानता हूं बेटी, राजन का दिल साफ है. मगर जातपांत और ऊंचनीच की दीवारों को तोड़ना आसान नहीं है. विधायक कृपाल सिंह और वह भी सत्ताकद पार्टी का, किसी भी शर्त पर एक हरिजन की बेटी को अपनी बहू बनाना कबूल नहीं करेगा. यह बात दूसरी है कि वोट मांगने वह घरों में घुसता हो, पर बहू मांगने इस मकान में कभी नहीं आएगा.’’ कुछ देर बाद पिता उठे और अपने पलंग पर जा कर लेट गए. निशा चुपचाप बुत बनी वहीं बैठी रही. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. एक तरफ राजन का प्यार था, तो वहीं दूसरी तरफ जातपांत की दीवार थी. आखिर वह क्या करे? धीरे से निशा भी लेट गई और राजन के बारे में सोचने लगी. राजन तो दिल का राजा था. आज के जमाने में ऊंचनीच और जातपांत को न मानने वाला वह नौजवान सचमुच दिल का बादशाह था. यही वजह थी कि एक हरिजन की बेटी को वह अपना दिल दे बैठा था. उसे उस के कुछ दोस्तों ने कहा था कि नंबरों पर मत जा, औकात देख. निशा को एक दिन की बात याद आ गई, जब राजन उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर शहर से काफी दूर निकल गया था.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी निशा ने राजन को कस कर पकड़ा हुआ था कि कहीं वह गिर न जाए. कभीकभी राजन जब अचानक ब्रेक लगा देता, तो निशा पूरी तरह उस पर झुक जाती. तब शरमाते हुए वह सिर्फ इतना ही कह पाती, ‘ठीक से चलाओ न.’ जब दोनों काफी दूर निकल आए तो निशा से नहीं रहा गया और पूछ बैठी कि वे कहां जा रहे हैं? मगर राजन मुसकरा कर बारबार अनसुनी कर देता. आखिर निशा अचानक जोर से बोली, ‘गाड़ी रोकिए.’ राजन मोटरसाइकिल रोक कर निशा की तरफ मुड़ा और मुसकराते हुए बोला कि वह एक रिजौर्ट में पूरा दिन बिताने ले जा रहा?है. पहले तो वह मना करती रही, मगर राजन की बात को ठुकरा नहीं पाई थी. वह निशा को पहली बार इतने शानदार रिजौर्ट में ले कर आया था. निशा ने छक कर खाया. दोनों ने बाद में एक कमरे में पूरा दिन बिताया. राजन निशा की गोद में सिर रख कर लेट गया. तब निशा प्यार से उस के माथे पर हाथ फेरते हुए बोली थी, ‘थक गए क्या?’ राजन भी निशा की आंखों में झांकते हुए प्यार से बोला था,

‘नहीं निशा, इस समय मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे मुझे दुनियाभर की खुशियां मिल गई हैं.’ निशा कुछ नहीं बोली, तो राजन ने कहा, ‘चुप क्यों हो?’ ‘डरती हूं.’ ‘क्यों?’ हिचकिचाते हुए निशा ने कहा, ‘आप विधायक के बेटे, ऊंची जाति के…’ ‘और तुम एक हरिजन की बेटी… यही कहना चाहती हो न तुम?’ राजन थोड़े गुस्से से बोला था. निशा खामोश ही रही. फिर बड़े प्यार से राजन ने अपने दोनों हाथों से उस का चेहरा सामने करते हुए कहा, ‘मैं तुम से कितनी बार कह चुका हूं कि इस तरह की बातें मत किया करो. मैं जो कुछ भी हूं सिर्फ तुम्हारा हूं और तुम मेरी होने वाली पत्नी हो.

मैं तो इतना ही जानता हूं कि अगर तुम नहीं तो मैं भी नहीं.’ निशा अपने बीते हुए दिनों में खोई हुई थी कि अचानक पीछे की छोटी सी खिड़की से कोई कूदा. वह डर गई. घबराते हुए वह पलंग से उठने लगी. फिर जैसे ही बोलने के लिए उस ने मुंह खोलना चाहा, उस साए ने उस का मुंह बंद कर दिया और धीरे से कहा, ‘‘मैं हूं निशा, राजन, तुम्हारा राजन.’’ निशा राजन की बांहों में समा गई. उस के सीने में अपना चेहरा छिपा कर सुबकने लगी. राजन ने उस के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मुझे सब मालूम हो गया निशा, लेकिन अब सब ठीक हो जाएगा.

Raksha Bandhan : टूटती और जुड़ती डोर- रिश्तों का बंधन

रक्षाबंधन का दिन था, इसलिए आज सांवरी को अपने छोटे भाई राहुल की बहुत याद आ रही थी. उस का चाय का ठेला लगाने का बिलकुल भी मन नहीं था, लेकिन फिर भी वह अपनी यादों को परे रख कर बेमन से अपना ठेला सजा रही थी. चूल्हा, गैस का छोटा सिलैंडर, दूध का भगौना, चायपत्ती व शक्कर का डब्बा, चाय के साथ खाने के लिए समोसा वगैरह… और भी न जाने क्याक्या.

सुबह के 5 बज चुके थे, इसीलिए सांवरी जल्दीजल्दी अपना ठेला तैयार कर रही थी, क्योंकि अगर वह अपना ठेला ले कर जल्दी नहीं पहुंची तो कोई दूसरा उस की जगह पर अपना ठेला खड़ा कर लेगा और फिर उसे ठेला ले कर इधरउधर भटकना पड़ेगा.

दूसरी बड़ी वजह यह भी थी कि सुबहसुबह सांवरी की चाय की बिक्री अच्छी हो जाती थी, क्योंकि सुबहसुबह चौराहे पर काम पर जाने वाले मजदूरों की अच्छीखासी भीड़ रहती थी और

वहीं से लोगों को काम करवाने के लिए मजदूर भी मिल जाते थे. उन में बहुत से ऐसे मजदूर भी थे, जो सांवरी की हर रोज चाय जरूर पीते थे, जिस से उस की कुछ आमदनी भी हो जाती थी.

पहले सांवरी को चाय का ठेला लगाने में बहुत शर्म महसूस होती थी, लेकिन पेट की आग, मां की बीमारी और मजबूरी की जंग के बीच उस की शर्म हमेशा हार जाती थी.

ठेला तैयार होते ही सांवरी मां के पास पहुंची. वे अभी सो रही थीं, इसीलिए उस ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा और वह चुपचाप कमरे से बाहर आ गई.

आज कितने दिनों के बाद मां को गहरी नींद में सोते देख कर सांवरी को बहुत सुकून महसूस हो रहा था. वे बेचारी सो भी कहां पाती हैं, बस दर्द में कराहती रहती हैं.

एक वक्त था, जब सांवरी भी दूसरी लड़कियों की तरह ही अपने बाबूजी, मां और अपने छोटे भाई राहुल के साथ शहर से सटे छोटे से गांव में खुशीखुशी रहती थी. बाबूजी के पास थोड़ीबहुत खेती थी. उसी में खेती कर के बाबूजी घरखर्च के अलावा सांवरी और राहुल की पढ़ाई का खर्च उठाते थे.

बाबूजी हमेशा सांवरी और राहुल को पढ़ालिखा कर बड़ा साहब बनाने की बात कहा करते थे. सांवरी और राहुल भी अपने बाबूजी के इस सपने को पूरा करने के लिए खूब मन लगा कर पढ़ते थे.

सांवरी के घर में कुछ न होते हुए भी सबकुछ था, लेकिन एक दिन घर की सारी खुशियां मातम और बेबसी में बदल गईं. उस दिन भी बाबूजी खेत से काम कर के आए थे और नल पर जा कर हाथमुंह धो रहे थे कि अचानक उन के सीने में तेज दर्द उठा और वे वहीं गिर गए. चीख सुन कर मां उन के पास पहुंच गईं, पर तब तक बाबूजी उन्हें छोड़ कर बहुत दूर चले गए थे.

बाबूजी के जाने के बाद धीरेधीरे सबकुछ बदल गया. घर में मां के पास बचेखुचे रुपए भी कुछ दिनों में ही खर्च हो गए. भूखे मरने की नौबत आ गई.

दिन बदलते ही नातेरिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया. खराब हालत देख कर सांवरी की मां ने खेती की जमीन भी बेच दी. राहुल और उस की पढ़ाई भी छूट गई थी, लेकिन जमीन बेचने के बाद थोड़ेबहुत रुपए हाथ में आते ही सांवरी ने मां से जिद कर के राहुल की पढ़ाई दोबारा शुरू करवा दी और वह भी कुछ कमाने के इरादे से बाजार में चाय का ठेला लगाने लगी, जिस से घर का थोड़ाबहुत खर्च निकल आता था.

तभी सांवरी की बचीखुची खुशियों पर भी पानी फिर गया. उस की मां को लकवा मार गया और वे बिस्तर पर पहुंच गईं. अब राहुल की पढ़ाई और मां के इलाज की सारी जिम्मेदारी सांवरी पर आ गई थी.

फिर समय अपनी रफ्तार पकड़ता चला गया. राहुल आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर चला गया. वह वहीं रह कर पढ़ाई कर रहा था.

सांवरी राहुल को अकसर जमा किए रुपए भेज दिया करती थी. उधर वह भी अब जवानी में कदम रख चुकी थी. उस के जिस्म में भी बदलाव आने शुरू हो गए थे. उस के सीने के उभार, उस का गदराया बदन और नाजुक पतली कमर देख कर जवान तो जवान बूढ़ों का भी का दिल मचल जाता था. अब कुछ लोग राह चलते उस पर छींटाकशी भी करने लगे थे, लेकिन उसे ऐसे लोगों से कोई मतलब नहीं था.

इन सब लोगों के बीच सुबोध भी था, जो सांवरी को अकसर आतेजाते देखा करता था. यही नहीं, वह कभीकभी उस के ठेले पर चाय पीने भी आ जाता था, जिसे देख कर वह डर जाती थी.

उसे पता चला था कि वह गुंडा है. सड़कों पर मारपीट करते और दुकानदारों से पैसा वसूली करते वह खुद उसे देखा करती थी.

हालांकि सुबोध ने कभी सांवरी के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी और न ही वह उस से कभी गलत तरीके से बोला था, लेकिन फिर भी वह एक तरह के डर में घिरी रहती थी कि कब सुबोध उस की इज्जत से खेल डाले और उस की जवानी को तारतार कर दे.

अचानक पड़ोस में मुरगे की बांग सुन कर सांवरी यादों के भंवर से धरातल पर आ गई. तभी उसे अपने ठेले का ध्यान आया और वह बाहर आ गई. बाहर आते ही उस ने अपना ठेला संभाला और उसे ढकेलते हुए चलने लगी.

सांवरी जब चौराहे पर पहुंची, तो अभी वहां इक्कादुक्का लोग ही उसे दिखाई दिए. उस ने ठेले को अपनी तय जगह पर खड़ा कर दिया और स्टूल को ठेले से उतार कर वहीं जमीन पर रख कर उस पर बैठ गई.

‘‘ऐ सांवरी, जरा एक चाय बना दे,’’ तभी सेवकराम सांवरी के ठेले पर आ कर बोला.

सांवरी ने एक नजर सेवकराम को देखा. उस के कपड़ों को देख कर लगा कि वह आज मजदूरी करने नहीं जा रहा था.

सांवरी ने चूल्हा जला कर चाय का भगौना उस पर रख दिया और उस में दूध वगैरह डाल कर चाय बनाने लगी.

‘‘क्या बात है सेवकराम, आज कहां जाने की तैयारी है?’’ सांवरी ने सेवकराम से पूछा.

‘‘कहीं नहीं. दीदी के यहां जा रहा हूं. आज रक्षाबंधन है. इसी बहाने दीदी से भी मिल लूंगा और राखी भी बंधवा लूंगा. वैसे भी पिछले 2 साल से मैं अपनी दीदी से मिल भी नहीं पाया हूं,’’ सेवकराम कुछ खीजते हुए बोला.

यह सुन कर सांवरी कुछ न बोली. चाय बन चुकी थी. उस ने चाय गिलास में डाल कर सेवकराम को दे दी और खुद स्टूल पर बैठ गई.

सेवकराम ने सांवरी को राहुल की याद दिला दी थी और उस का मन राहुल से मिलने को होने लगा था. उस ने गुल्लक से राखी निकाल कर अपने हाथ में पकड़ ली. उसे मालूम था कि आज फिर उस की खरीदी हुई राखी राहुल की सूनी कलाई की शोभा नहीं बढ़ा पाएगी, क्योंकि राहुल शायद उसे कब का भूल चुका था. आज भी राहुल के कड़वे शब्द उस के कानों में गूंज रहे थे.

अचानक एक बार फिर सांवरी यादों के भंवर में उलझ गई. कितनी खुश थी वह उस दिन, जब उसे पता लगा था कि राहुल पूरे 5 साल के बाद घर वापस आ रहा है. राहुल ने ही उसे बताया था कि उस की एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई है, जहां वह मैनेजर है.

यह सुन कर सांवरी को लगा था  कि आज राहुल ने बाबूजी और उस के सपने को सच कर दिया और वह जिंदगी में कामयाबी की पहली सीढ़ी चढ़ गया है.

सांवरी को अब लग रहा था कि उस का छोटा भाई आते ही उस के सारे दुख दूर कर देगा और उस से कहेगा ‘दीदी, अब यह चाय बेचने का काम तुम नहीं करोगी. अब तुम्हारा और मां का खयाल मैं रखूंगा और तुम आराम करोगी.’

राहुल के घर आने की खबर मिलने की खुशी में सांवरी ने अपना चाय का ठेला भी नहीं लगाया. उस के अगले दिन रक्षाबंधन का त्योहार था, इसीलिए सांवरी ने बाजार से एक अच्छी राखी भी खरीद ली थी, जो वह अपने प्यारे भैया की कलाई पर बांधेगी.

दोपहर के तकरीबन एक बजे राहुल घर आ गया. राहुल को देख कर अनायास ही सांवरी उस से लिपट कर रो पड़ी और उस की सूख चुकी आंखों से धारा बह निकली. किसी बड़े साहब से कम नहीं लग रहा था उस का भाई.

आखिर मन हलका होने पर उस ने राहुल से हालचाल पूछा और फिर मां के पास उसे बैठा कर वह चायपानी का इंतजाम करने लगी.

उधर राहुल मां से बातें करने लगा. राहुल के आने पर मां भी अपनी बीमारी को भूल कर उस से बातें करने की कोशिश कर रही थीं. आज उन का चेहरा भी खुशी से दमक रहा था.

लेकिन आज सांवरी को राहुल कुछ बदलाबदला सा लग रहा था. वह काफी देर से राहुल को नोटिस कर रही थी कि वह उस से कटाकटा सा है. सफर की थकान होगी, ऐसा सोच कर उस ने राहुल से कुछ नहीं कहा था.

राहुल फ्रैश होने के बाद कमरे में आराम करने के लिए चला गया. सांवरी ने शाम को राहुल का मनपसंद खाना बनाया, लेकिन उस ने पेट भरा होने का बहाना बना कर उसे छुआ तक नहीं.

राहुल के खाना न खाने पर सांवरी का मन भी कुछ खाने का नहीं हुआ और उस ने खाने को यों ही वापस ढक कर रख दिया था. हां, उस ने मां को थोड़ाबहुत जरूर खिला दिया, जिस से वे दवा खा सकें.

सांवरी राहुल से ढेर सारी बातें करना चाहती थी, लेकिन राहुल उस से बात ही नहीं कर रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर राहुल को क्या हो गया है. लेकिन सुबह होते ही राहुल उस

से कुछ न बोला और अपना बैग पैक करने लगा.

यह देख कर सांवरी चौंक गई. उस ने राहुल से बैग पैक करने की वजह पूछी, तो वह एकदम गुस्से से चीख पड़ा, ‘‘मुझे नहीं रहना तुम्हारे घर में, जहां कोई वेश्या रहती हो. मुझे शर्म आती है तुम्हें अपनी बहन कहने पर. मुझे लगता था कि तुम यहां सही से रहती होगी, लेकिन तुम तो अपने जिस्म को बेचती घूमती हो,’’ राहुल ने चीखते हुए उस से कहा.

‘‘राहुल, यह तुम क्या बक रहे हो…’’ राहुल की बात सुन कर सांवरी का खून खौल उठा था और उस ने एक जोरदार थप्पड़ राहुल को मार दिया, ‘‘मैं यहां कोई ऐसा गलत काम नहीं करती हूं कि तुम्हारा सिर शर्म से झुक जाए.

‘‘हां, मैं मेहनत करती हूं और चाय बेच कर मां का, अपना और तुम्हारा पेट भरती हूं. अपना जिस्म नहीं बेचती मैं…

‘‘और सुनो, मैं तुम्हारी पढ़ाई का खर्च भी चाय बेच कर ही उठाती थी. आज तुम जोकुछ भी हो, इसी की बदौलत हो… समझे तुम,’’ सांवरी गुस्से से राहुल को बोलती जा रही थी, लेकिन यह सब बोलते हुए उस की आंखों से आंसुओं की झड़ी बहने लगी थी.

सांवरी को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उस का छोटा भाई राहुल उस से इस तरह बात करेगा और उस पर इतने भद्दे इलजाम लगाएगा.

सांवरी की इज्जत पर अभी तक किसी तरह की आंच नहीं आई थी, लेकिन आज उस के अपने छोटे भाई

ने ही उस की इज्जत को तारतार कर दिया था.

उधर राहुल सांवरी का थप्पड़ खाने के बाद एक पल भी वहां नहीं रुका और अपना बैग उठा कर घर से बाहर चला गया. सांवरी ने भी राहुल को रोकने की कोशिश नहीं की.

उस के बाद कितना वक्त बीत गया था, लेकिन राहुल ने सांवरी और मां की कोई खोजखबर नहीं ली थी. राहुल ने भाईबहन के बीच की डोर को भी तोड़ दिया था, लेकिन रक्षाबंधन का त्योहार आते ही सांवरी को राहुल की याद कुछ ज्यादा ही आने लगती थी, लेकिन राहुल के कड़वे शब्द उस के सीने में आज भी तीर की तरह चुभते थे.

‘‘सांवरी…’’ तभी किसी की आवाज सुन कर सांवरी चौंक गई. उस ने देखा कि सामने सुबोध खड़ा हुआ था. सांवरी ने आंखों से निकल कर गालों पर लुढ़क आए आंसुओं को पोंछ लिया.

सांवरी सुबोध को देख कर समझ गई कि वह चाय पीने के लिए ही उस के ठेले पर आया हुआ है. उस ने उस से बिना पूछे ही चाय बनने के लिए चूल्हे पर चढ़ा दी.

‘‘सांवरी, मुझे आज चाय नहीं पीनी. मैं किसी और काम से आया हूं तेरे पास,’’ सुबोध सांवरी से बोला.

‘‘फिर क्या काम है मुझ से?’’ सांवरी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘क्या तुम मुझे अपना भाई समझ कर मुझ को राखी बांध दोगी? मेरी कोई बहन नहीं है. मैं जब भी तुम्हें देखता हूं, तो मुझे लगता है कि जैसे मेरी छोटी बहन मेरे सामने आ गई हो,’’ सुबोध ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए सांवरी से कहा.

सुबोध की बात सुन कर सांवरी उसे देखती ही रह गई. उसे सुबोध की बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि जिसे उस ने इतना गलत समझा था, वह उसे किसी तरह की गलत नजरों से नहीं, बल्कि छोटी बहन के रूप में देखता था. एक भाई बहन के बीच की डोर तोड़ कर उस से दूर चला गया था और दूसरा उस डोर को जोड़ने की बात कर रहा था.

सुबोध की बात सुन कर सांवरी की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी थी और उस ने बिना देर किए राखी सुबोध की कलाई पर बांध दी. राखी के कलाई पर बंधते ही सुबोध की आंखों के कोर भी गीले होने लगे थे.

सांवरी सोच रही थी कि जहां कभी रिश्ते की एक डोर हमेशा के लिए टूट गई थी, तो वहीं आज दूसरी डोर जुड़ गई थी.

 

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 3

अनिता चुंबन से रोमांचित हो गई. उस ने प्रतिरोध करने के बजाय बस इतना ही कहा, ‘‘कोई आ गया तो…’’

अनिरुद्ध समझ गया कि अनिता को भी पुराने प्रेम प्रसंग को चलाए रखने में कोई आपत्ति नहीं है. बस, सब कुछ छिपा कर सावधानीपूर्वक करना पड़ेगा.

‘‘सौरी यार, इतने दिनों बाद तुम्हें अकेले पा कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘धीरज रखो, सब हो जाएगा,’’ कह कर अनिता ने अपनी मादक मुसकान बिखेरते हुए हामी भर दी. बदले में अनिरुद्ध भी मुसकरा पड़ा.

अनिता को लग रहा था कि आज उस का पुराना प्रेम उसे वापस मिल गया. पर इस प्रेम प्रसंग को चलाए रखने के लिए यह जरूरी था कि अविनाश की प्रमोशन हो जाए. इसी प्रमोशन के लिए तो अविनाश उसे आज अनिरुद्ध के यहां लाया और उन्हें एकांत में छोड़ कर चला गया. अनिता ने बिना किसी भूमिका के अनिरुद्ध को सब कुछ बता दिया.

‘‘यह प्रमोशन क्या चीज है, तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने एक बार फिर से अनिता का दीर्घ चुंबन ले डाला.

अनिता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और बनावटी नाराजगी दिखाते हुए बोली, ‘‘मैं ने कहा न सब कुछ हो जाएगा. मैं तो शुरू से ही तुम्हारी हूं, थोड़ा धीरज रखो,’’ और अपने पर्स से रूमाल निकाल कर अनिरुद्ध के मुंह पर लगी लिपस्टिक पोंछने लगी. फिर यह कहते हुए अंजलि के कमरे की तरफ मुड़ गई, ‘‘यहां बैठना ठीक नहीं. पता नहीं तुम क्या कर बैठो.’’

अविनाश काफी देर बाद लौटा. आते ही वह फिर आने का वादा कर के अनिता और बेटे के साथ वहां से चल पड़ा. उस से रहा नहीं जा रहा था. वह रास्ते में ही अनिता से पूछ बैठा, ‘‘क्या हुआ, प्रमोशन के लिए कहा कि नहीं ’’

‘‘कहा तो है. कह रहा था कि देखूंगा,’’ अनिता ने पर्याप्त सतर्कता बरतते हुए बताया.

‘‘प्रमोशन हो जाए तो मजा आ जाए,’’ अविनाश अपने सपने में खोया हुआ बोला.

2-3 दिन बाद ही अविनाश को प्रमोशन का और्डर मिल गया, उस की खुशी की कोई सीमा न रही. दफ्तर से लौटते ही उस ने मारे खुशी के अनिता को गोद में उठा लिया और लगा चूमने.

‘‘अरे, क्या हो गया  आज तो बहुत खुश लग रहे हो ’’

‘‘खुशी की बात ही है. जानती हो, आज मेरी प्रमोशन हो गई. पिछले कई सालों से इंतजार कर रहा था मैं. सचमुच, नए मैनेजर साहब बड़े अच्छे आदमी हैं. तुम सोच रही थीं कि पता नहीं सुनेंगे भी कि नहीं, लेकिन उन्होंने मेरी प्रमोशन कर दी. सुनो, छुट्टी के दिन उन के घर चलेंगे, उन्हें धन्यवाद देने,’’ अविनाश खुशी में कहे जा रहा था.

अविनाश को खुश देख कर अनिता की आंखों में भी आंसू छलक आए.

छुट्टी के दिन वे अनिरुद्ध के यहां गए. इस के बाद तो आनेजाने का सिलसिला चल निकला. अनिरुद्ध अविनाश को आर्थिक फायदा दिलाने की गरज से कंपनी के काम से बाहर भी भेजने लगा. अब तो अविनाश हर शाम दफ्तर से आते वक्त अनिरुद्ध के घर हो कर ही आता था. अंजलि को भी मानो मुफ्त का एक नौकर मिल गया था. वह कभी अविनाश को सब्जी लेने भेज देती तो कभी दूध लेने. अविनाश बिजली, पानी, मोबाइल के बिल, पिंकी की फीस आदि भरने का काम भी खुशी से करता.

अनिरुद्ध अगर कंपनी के काम से कहीं बाहर जाता तो वह अविनाश को कह जाता कि मेरे घर का कोई काम हो तो देख लेना. प्रमोद भी पिंकी से घुलमिल गया था, इसलिए वह भी अकसर पिंकी के घर चला जाता और दोनों पिंकी के कमरे में घंटों बातें करते, खेलते.

उधर अनिरुद्ध और अनिता के दिल में प्रेम की पुरानी आग भड़क गई थी. वे अपनी सारी हसरतें पूरी कर लेना चाहते थे, इसलिए वे दोनों अपने में मगन थे. जब भी मौका मिलता अनिता अनिरुद्ध को फोन कर के घर आने के लिए कह देती और दोनों एकदूसरे में खो जाते. कहीं कुछ और भी हो रहा है, यह जानने और समझने की उन्हें मानो फुरसत ही न थी.

उस दिन अनिरुद्ध काम से थक कर रात में लगभग 8 बजे अपने कमरे से बाहर थोड़ी देर के लिए निकला, तो उस ने देखा कि पिंकी के कमरे की लाइट जल रही थी. पिछले कई दिनों की व्यस्तता की वजह से वह अपनी बेटी पिंकी से कायदे से बात तक नहीं कर पाया था. उस के दिल में आया कि पिंकी के कमरे में ही चल कर बातें करते हैं. अभी पिंकी के कमरे से वह कुछ दूरी पर ही था कि उसे कुछ आवाजें सुनाई पड़ीं. उस ने सोचा कि शायद पिंकी की कोई सहेली आई है और वह उस से बातें कर रही है. यों जाना ठीक नहीं , खिड़की से झांक लेता हूं कि कौन है.

उस ने खिड़की से झांक कर देखा तो मानो उसे चक्कर सा आ गया. उस ने देखा कि पिंकी और प्रमोद अर्धनग्न अवस्था में एकदूसरे से लिपटे हुए हैं. प्रमोद पिंकी से कह रहा था, ‘‘तुम्हारे पापा मेरी मम्मी से रोमांस करते हैं. एक दिन मैं ने देखा कि दोनों बैडरूम में एकदूसरे से लिपटे पड़े हैं.’’

‘‘तेरे पापा का भी मेरी मम्मी से ऐसा ही रिश्ता है. एक दिन मैं ने भी उन्हें सामने वाले कमरे में एकदूसरे से लिपटे देखा,’’ पिंकी बोली.

‘‘क्या मजेदार बात है. तेरे पापा मेरी मम्मी से और मेरी मम्मी तेरे पापा से रोमांस कर रही हैं और हम दोनों एकदूसरे से,’’ कह कर प्रमोद हंस पड़ा.

‘‘लेकिन यार, वे लोग तो शादीशुदा हैं. कुछ गड़बड़ हो गई तो भी किसी को पता नहीं चलेगा. पर हम लोगों के बीच कुछ हो गया तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊंगी.’’

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं कंडोम लाया हूं न.’’

‘‘तुम हो बड़े समझदार,’’ कह पिंकी ने खिलखिलाते हुए प्रमोद को भींच लिया.

आगे कुछ सुन पाना अनिरुद्ध के बस में न था. वह किसी तरह हिम्मत बटोर कर अपने कमरे तक आया और बिस्तर पर निढाल पड़ गया. आज वह खुद की निगाहों में ही गिर गया था. वह किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकता था. बेटी तक से नहीं. अगर कुछ कहा और पिंकी ने भी पलट कर जवाब दे दिया तो  वह खुद को ही दोषी मान रहा था कि अपने क्षणिक सुख के लिए उस ने जो कुछ किया, अब उसी राह पर बच्चे भी चल पड़े हैं. उस की हरकतों के कारण बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया. कितना अंधा हो गया था वह. अंजलि को भी क्या कहे वह. इस सब के लिए वह खुद जिम्मेदार है. शुरुआत तो उस ने ही की.

रात को अनिरुद्ध ने खाना भी नहीं खाया. रात भर वह दुख और पश्चात्ताप की आग में जलता रहा और रो कर खुद को हलका करता रहा. सुबह होने से पहले ही उस ने सोचा कि जो हो गया, रोने से कोई फायदा नहीं. फिर अब क्या किया जाए, इस पर वह सोचताविचारता रहा.

थोड़ी देर में ही वह निर्णय पर पहुंच गया और सुबह होते ही उस ने कंपनी के जीएम से फोन पर अपना स्थानांतरण करने का निवेदन किया. जीएम उस के काम से सदैव खुश रहते थे, इसलिए उन्होंने उस के निवेदन को स्वीकार करने में तनिक भी देर न लगाई. उस का स्थानांतरण उसी पल कोलकाता कर दिया.

4 दिन बाद अनिरुद्ध परिवार सहित कोलकाता की ट्रेन पर सवार हो गया. किसी को भी न पता चला कि क्या हुआ. अनिरुद्ध ने सारा राज अपने सीने में दफन कर लिया.

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 2

पर आदमी का सोचा हुआ सब कुछ होता कहां है. 12वीं कक्षा का परीक्षाफल भी नहीं निकला था कि अनिता के पिता का स्थानांतरण वाराणसी हो गया और अनिता और अनिरुद्ध द्वारा बनाया गया सपनों का महल ढह कर चूर हो गया. तब न तो टैलीफोन की इतनी सुविधा थी और न ही आनेजाने के इतने साधन. इसलिए समय बीतने के साथसाथ दोनों को एकदूसरे को भुला भी देना पड़ा.

कहते हैं कि स्त्री अपने पहले प्यार को कभी भुला नहीं पाती. आज इतने दिन बाद अनिरुद्ध को अपने सामने पा कर अनिता के प्यार की आग फिर से भड़क गई. अविनाश जितनी बार अनिरुद्ध को सर कहता अनिता शर्म से मानो गड़ जाती. आज वह अनिरुद्ध के सामने खुद को छोटा महसूस कर रही थी. उस के मन के किसी कोने में यह भी खयाल आया कि अगर उस का पहला प्यार सफल हो गया होता, तो आज वही कंपनी के मैनेजर की पत्नी होती. सभी उस का सम्मान करते और उसे छोटीछोटी चीजों के लिए तरसना न पड़ता. यही सब सोचतेसोचते अनिता की आंख लग गई.

अविनाश का सारा काम विज्ञापन विभाग तक ही सीमित था. विज्ञापन विभाग का प्रमुख उस के सारे काम देखता था. अविनाश को यह उम्मीद थी कि अनिरुद्ध अगले ही दिन उसे बुलाएगा और मौका देख कर वह उस के प्रमोशन की बात कहेगा. अनिता से अपने पुराने परिचय का इतना खयाल तो वह करेगा ही. पर धीरेधीरे 1 सप्ताह बीत गया और अनिरुद्ध का बुलावा नहीं आया तो अविनाश निराश हो गया.

लेकिन एक दिन जब अविनाश को अनिरुद्ध का बुलावा मिला तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा. वह तत्काल इजाजत ले कर अनिरुद्ध के कमरे में पहुंच गया. अनिरुद्ध ने उसे बैठने के लिए इशारा किया और बोला, ‘‘उस दिन काफी भीड़ थी, इसलिए कायदे से बात न हो पाई. ऐसा करो, कल छुट्टी है अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आओ, आराम से बातें करेंगे. एक बात और दफ्तर में किसी को भी पता न चले कि हम लोग परिचित हैं. यह जान कर लोग तुम से अपने कामों की सिफारिश के लिए कहेंगे और मुझे दफ्तर चलाने में दिक्कत आएगी. समझ रहे हो न ’’

‘‘जी सर,’’ अविनाश अभी इतना ही कह पाया था कि चपरासी कुछ फाइलें ले कर अनिरुद्ध के कमरे में आ गया. अविनाश वापस अपनी सीट पर लौट आया पर आज वह बहुत खुश था.

घर लौट कर अविनाश अनिता से बोला, ‘‘आज मैनेजर साहब ने मुझे अपने कमरे में बुलाया था. कह रहे थे कि भीड़ के कारण कायदे से बातें नहीं हो पाईं, कल अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आओ, इतमीनान से बातें करेंगे.’’

अनिरुद्ध से मुलाकात होने के बारे में सोच अनिता खुश तो बहुत हुई पर अपनी खुशी छिपा कर उस ने पूछा, ‘‘अरे, अपनी प्रमोशन की बात की कि नहीं ’’

‘‘कहां की. एक तो फुरसत नहीं मिली फिर कोई आ गया. खुद की प्रमोशन की बात मैं कैसे कह दूं, यह मेरी समझ में नहीं आता. ऐसा है, कल चलेंगे न तो मौका देख कर तुम्हीं कहना. तुम्हारी बात शायद मना न कर पाएं. मैं मौका देख कर थोड़ी देर के लिए कहीं इधरउधर चला जाऊंगा.’’

‘‘मुझ से नहीं हो पाएगा,’’ अनिता ने बहाना बनाया.

‘‘अरे, तुम मेरी पत्नी हो. मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकतीं. सोचो, प्रमोशन मिलते ही वेतन बढ़ जाएगा और अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी. हमारी जिंदगी आरामदेह हो जाएगी. अभी तुम जिन छोटीछोटी चीजों के लिए तरस जाती हो, वे सब एक झटके में आ जाएंगी. मौके का फायदा उठाना चाहिए. ऐसे मौके बारबार नहीं आते. तुम एक बार कह कर तो देखो, मेरी खातिर.’’

‘‘ठीक है, मौका देख कर जरूर कहूंगी,’’ अनिता समझ गई कि अविनाश प्रमोशन के लिए कुछ भी कर सकता है. यह कायदे से मुझ से बात नहीं करता, लेकिन प्रमोशन के लिए मुझ से इतनी गुजारिश कर रहा है.

अगले दिन अविनाश, अनिता अपने 16 वर्षीय बेटे प्रमोद के साथ अनिरुद्ध के घर पहुंचे. अनिरुद्ध का कोठीनुमा घर देख कर अनिता की आंखें चुंधिया गईं. हर कमरे की साजसज्जा देख कर वह आह भर कर रह जाती कि काश मेरा घर भी ऐसा होता… अंजलि ने घर पर सहेलियों की किट्टी पार्टी आयोजित कर रखी थी, इसलिए अनिरुद्ध अपने कमरे में अलगथलग बैठा हुआ था. अंजलि ने अविनाश और अनिता का स्वागत तो किया पर यह कह कर किट्टी पार्टी चल रही है, उन्हें अनिरुद्ध के कमरे में ले जा कर बैठा दिया. हां, जातेजाते उस ने यह जरूर कहा कि जाइएगा नहीं, पार्टी खत्म होते ही मैं आऊंगी.

अविनाश के साथ ही प्रमोद ने भी अनिरुद्ध को नमस्कार किया और अविनाश ने बताया कि यह मेरा बेटा प्रमोद है. बस, यही एक लड़का है.

अनिरुद्ध ने वहीं बैठेबैठे आवाज लगाई, ‘‘पिंकी… पिंकी.’’

थोड़ी ही देर में प्रमोद की समवयस्क एक किशोरी प्रकट हुई और अनिरुद्ध ने उस का परिचय कराते हुए बताया कि यह उन की बेटी है.

फिर कहा, ‘‘पिंकी बेटे, प्रमोद को ले जा कर अपना कमरा दिखाओ, खेलो और कुछ खिलाओपिलाओ,’’ अनिरुद्ध का इतना कहना था कि पिंकी प्रमोद का हाथ पकड़ उसे अपने साथ ले गई. उस का कमरा सब से पीछे था एकदम अलगथलग.

इधर अनिरुद्ध के कमरे में थोड़ी ही देर में नौकर चायनाश्ता ले आया. इधरउधर की औपचारिक बातों के बीच चायनाश्ता शुरू हुआ. अनिता अधिकतर चुप ही रही. वह अविनाश को यह भनक नहीं लगने देना चाहती थी कि उस की कभी अनिरुद्ध के साथ घनिष्ठता थी. वह चुपचाप अनिरुद्ध को देख रही थी कि कितना बदल गया है वह.

इसी बीच अविनाश के मोबाइल की घंटी बजी. वह तो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में था. उस ने अनिरुद्ध से कहा, ‘‘सर, बुरा मत मानिएगा. मैं अभी थोड़ी देर में आ रहा हूं, एक जरूरी काम है.’’

अनिरुद्ध के ‘ठीक है’ कहते ही अविनाश तेजी से बाहर निकल गया. एक पल के लिए अनिता का मन यह सोच कर कसैला हो गया कि आदमी अपने स्वार्थ के आगे इतना अंधा हो जाता है कि अपनी बीवी को दूसरे के पास अकेले में छोड़ जाता है. पर अगले ही पल वह अपने पुराने प्यार में खो गई.

अब कमरे में केवल अनिरुद्ध और अनिता रह गए. थोड़ी देर के लिए तो वहां एकदम शांति व्याप्त हो गई. दोनों में से किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या कहे. वक्त जैसे थम गया था.

बात अनिरुद्ध ने ही शुरू की, ‘‘मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि हम फिर मिलेंगे.’’

‘‘मैं ने भी.’’

अनिरुद्ध खड़ा हो गया था, ‘‘तुम नहीं जानतीं कि मैं ने तुम्हारी याद में कितनी रातें रोरो कर बिताईं. पर क्या करता मजबूर था. पढ़ाई पूरी करने और नौकरी करने के बाद मैं तुम्हारी खोज में एक बार वाराणसी भी गया था. वहां पता लगा तुम्हारी शादी हो गई है. इस के बाद ही मैं ने अपनी शादी के लिए हां की,’’ अनिरुद्ध भावुक हो गया था.

अनिता की आंखों से आंसू झरने लगे थे. उस ने बिना एक शब्द कहे अपने आंसुओं के सहारे कह दिया था कि वह भी उस के लिए कम नहीं रोई है.

अनिरुद्ध ने देखा कि अनिता रो रही है, तो उस ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर उसे सांत्वना दी, ‘‘जो कुछ हुआ उस में तुम्हारा क्या कुसूर है  मैं जानता हूं कि तुम मुझे आज भी इस दुनिया में सब से ज्यादा प्यार करती हो,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने अनिता को गले लगा कर उस के अधरों का एक चुंबन ले लिया.

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 1

उस दिन जब अविनाश अपने दफ्तर से लौटा तो बहुत खुश दिख रहा था. उसे इतना खुश देख कर अनिता को कुछ आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह दफ्तर से लौटे अविनाश को थकाहारा, परेशान और दुखी देखने की आदी हो चुकी थी. अविनाश का इस कदर परेशान होना बिना वजह भी नहीं था. सब से बड़ी वजह तो यही थी कि पिछले 10 सालों से वह इस कंपनी में काम कर रहा था, पर उसे आज तक एक भी प्रमोशन न मिला था. वह कंपनी के मैनेजर को अपने काम से खुश करने की पूरी कोशिश करता, पर उसे आज तक असफलता ही मिली थी.

प्रमोशन न होने के कारण उसे वेतन इतना कम मिलता था कि मुश्किल से घर का खर्च चल पाता था. उस की कंपनी बहुत मशहूर थी और वह अपना काम अच्छी तरह से समझ गया था, इसलिए वह कंपनी छोड़ना भी नहीं चाहता था.

अनिता अविनाश के दुखी और परेशान रहने की वजह जानती थी, पर वह कर ही क्या सकती थी.

उस दिन अविनाश को खुश देख कर उस से रहा नहीं गया. वह चाय का कप अविनाश को पकड़ा कर अपना कप ले कर बगल में बैठ गई और उस से पूछा, ‘‘क्या बात है, आज बहुत खुश लग रहे हो ’’

‘‘बात ही खुश होने की है. तुम सुनोगी तो तुम भी खुश होगी.’’

‘‘अरे, ऐसी क्या बात हो गई है  जल्दी बताओ.’’

‘‘कंपनी का मैनेजर बदल गया. आज नए मैनेजर ने कंपनी का काम संभाल लिया. बड़ा भला आदमी है. उम्र भी ज्यादा नहीं है. मेरी ही उम्र का है. पर इतनी छोटी उम्र में मैनेजर बन जाने के बाद भी घमंड उसे छू तक नहीं गया है. आज उस ने सभी कर्मचारियों की एक मीटिंग ली. उस में सभी विभागों के हैड भी थे. उस ने कहा कि यह कंपनी हम सभी लोगों की है. इसे आगे बढ़ाने में हम सभी का योगदान है. हम सब एक परिवार के सदस्यों की तरह हैं. हमें एकदूसरे की मदद करनी चाहिए. कंपनी के किसी भी सदस्य को कोई परेशानी हो तो वह मेरे पास आए. मैं वादा करता हूं सभी की बातें सुनी जाएंगी और जो सही होगा वह किया जाएगा.

‘‘आखिर में उस ने कहा कि इस इतवार को मेरे घर पर कंपनी के सभी कर्मचारियों की पार्टी है. आप सभी अपनी पत्नियों के साथ आएं ताकि हम सब लोग एकदूसरे को अच्छी तरह से जान और समझ सकें. लगता है अब मेरे दिन भी बदलेंगे. तुम चलोगी न ’’

‘‘तुम ले चलोगे तो क्यों नहीं चलूंगी ’’ कह कर मुसकराते हुए अनिता वापस रसोई में चली गई.

कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 100 से अधिक थी, जिन के रात के खाने का प्रबंध था. मैनेजर ने अपने घर के सामने एक बड़ा सा शामियाना लगवाया था. मैनेजर अपनी पत्नी के साथ शामियाने के दरवाजे पर ही उपस्थित था और आने वाले मेहमानों का स्वागत कर रहा था. मेहमान एकएक कर के आ रहे थे और मैनेजर से अपना परिचय नाम और काम के जिक्र के साथ दे रहे थे.

अविनाश ने भी मैनेजर से हाथ मिलाया और अनिता ने उन की पत्नी को नमस्कार किया. अचानक मैनेजर की निगाह अनिता पर पड़ी तो उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे, अनिता तुम  तुम यहां कैसे ’’

अनिता भी चौंक उठी. उस के मुंह से बोल तक न फूटे.

‘‘पहचाना नहीं  मैं अनिरुद्ध…’’

‘‘पहचान गई, तुम काफी बदल गए हो.’’

‘‘हर आदमी बदल जाता है, पर तुम नहीं बदलीं. आज भी वैसी ही दिख रही हो,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने अपनी पत्नी की तरफ संकेत किया, ‘‘अनिता, यह है अंजलि मेरी पत्नी और तुम्हारे पति कहां हैं ’’

अनिता ने अविनाश को आगे कर के इशारा किया और अंजलि को अभिवादन कर उस से बातें करने लगी.

अब तक सिमटा हुआ अविनाश सामने आ कर बोला, ‘‘सर, मैं हूं अविनाश. आप की कंपनी के ऐड विभाग में सहायक.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने अंजलि से कहा, ‘‘अंजलि, यह है अनिता. बचपन में हम दोनों एक ही सरकारी कालोनी में रहते थे और एक ही स्कूल में एक ही क्लास में पढ़ते थे. इन के पिताजी पापा के बौस थे.’’

‘‘पर आज उलटा है. आप अविनाश के बौस के भी बौस हैं,’’ कह कर अनिता हंस पड़ी.

‘‘नहीं, हम लोग आज से बौस और मातहत के बजाय एक दोस्त के रूप में काम करेंगे. क्यों अविनाश, ठीक है न  खैर, और बातें किसी और दिन करेंगे, आज तो बड़ी भीड़भाड़ है,’’ कहते हुए अनिरुद्ध अन्य मेहमानों की तरफ मुखातिब हुआ, क्योंकि अब तक कई मेहमान आ कर खड़े हो चुके थे.

पार्टी समाप्त होने पर अन्य लोगों की तरह अविनाश और अनिता भी वापस अपने घर लौट आए. अविनाश बहुत खुश था. उस से अपनी खुशी संभाले नहीं संभल रही थी. सोते समय अविनाश ने अनिता से पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि मैनेजर साहब तुम्हारी कालोनी में रहते थे और तुम्हारी क्लास में पढ़ते थे ’’

‘‘इस में झूठ की क्या बात है  जब पिताजी की नियुक्ति जौनपुर में थी तो हमारी कोठी की बगल में ही अनिरुद्ध का क्वार्टर था और अनिरुद्ध मेरी ही क्लास में पढ़ता था. अनिरुद्ध पढ़ने में तेज था, इसलिए वह आज तुम्हारी कंपनी में मैनेजर बन गया और मैं पढ़ने में कमजोर थी, इसलिए तुम्हारी बीवी बन कर रह गई,’’ कह कर अनिता मुसकरा तो पड़ी पर यह मुसकराहट जीवन की दौड़ में पिछड़ जाने की कसक को भुलाने के लिए थी.

अविनाश तो किसी और दुनिया में मशगूल था. उसे इस बात की बड़ी खुशी थी कि मैनेजर साहब उस की पत्नी के पुराने परिचितों में से हैं.

‘‘मैनेजर साहब इतना तो सोचेंगे ही कि मेरा प्रमोशन हो जाए.’’

‘‘पता नहीं, लोग बड़े आदमी बन कर अपना अतीत भूल जाते हैं.’’

‘‘नहीं अनिता, मैनेजर साहब ऐसे आदमी नहीं लगते. देखा नहीं, कितनी आत्मीयता से हम लोगों से वे मिले और यह बताने में भी नहीं चूके कि तुम्हारे पिता उन के पिता के बौस थे.’’

‘‘मुझे नींद आ रही है. वैसे भी कल सुबह उठ कर प्रमोद को तैयार कर के स्कूल भेजना है,’’ कह कर अनिता ने नींद का बहाना बना कर करवट बदल ली. थोड़ी ही देर में अविनाश भी खर्राटे भरने लगा.

नींद अनिता की आंखों से कोसों दूर थी. उस ने कुशल स्त्री की भांति अविनाश को सिर्फ इतना ही बताया था कि वह अनिरुद्ध से परिचित है. वह बड़ी कुशलता से यह छिपा गई कि दोनों एकसाथ पढ़तेपढ़ते एकदूसरे को चाहने लगे थे. 12वीं कक्षा में तो दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया था. पर दोनों जानते थे कि उन दोनों की आर्थिक स्थिति में बहुत अंतर है और दोनों की जाति भी अलग है, इसलिए घर वाले दोनों को विवाह करने की अनुमति कभी नहीं देंगे. दोनों ने यह तय किया था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दोनों नौकरी तलाशेंगे और उस के बाद अपनी मरजी से विवाह कर लेंगे.

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