परित्यक्ता : कजरी के साथ क्या हुआ था

बरसती बूंदें कजरी के पैरों से कदमताल कर रही थीं. अभी 6 ही तो बजे थे, पर तेज बारिश और काले बादलों ने वक्त से पहले ही जैसे अंधेरा करने की ठान ली थी. ठीक उस के जीवन की तरह, जिस में उस की खुशियों के उजाले को समय के स्याह बादलों ने हमेशा के लिए ढक लिया था. कजरी सोचती जा रही थी. झमाझम होती बारिश में उस की पुरानी छतरी ने भी आज उस का साथ छोड़ दिया था. बच्चों की चिंता ने उस के पैरों की गति को और बढ़ा दिया. उस का घर आने से पहले ही बाबूलाल किराने वाले की दुकान पड़ती थी, जहां से उसे कुछ किराना भी लेना था.

‘‘क्या चाहिए?’’ बाबूलाल ने कजरी की भीगी देह पर भरपूर नजर डालते हुए कहा.

‘‘2 किलो आटा, आधा लिटर तेल, पाव किलो शक्कर और हां, आधा लिटर दूध भी दे देना,’’ कजरी ने अपने आंचल को ठीक करते हुए कहा. बाबूलाल की ललचाई नजरों में उसे हमेशा ही एक मौन आमंत्रण दिखाई देता था. यह तो उस की मजबूरी थी कि वह यहां से वक्तबेवक्त कभी भी उधारी में सामान ले लिया करती थी, वरना उस की दुकान की ओर कभी वह मुड़ कर भी न देखती.

सोचतेसोचते कजरी घर पहुंच गई. बच्चे ‘‘मां, मां’’ कहते हुए उस से लिपट गए.

‘‘आई बहुत भूख लगी है, ताई ने कुछ खाने को नहीं दिया,’’ छोटे बेटे कमल ने दीदी की शिकायत की.

‘‘क्या करती आई, घर में आटा ही नहीं था,’’ सुमि ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘अच्छा मेरा राजा बेटा, मैं अभी गरमागरम रोटी बना कर अपने लाल को खिलाती हूं, मीठे दूध में मींज के खा लेना,’’ कजरी ने बेटे को पुचकारते हुए कहा.

‘‘आई, मैं भी खाऊंगी,’’ 9 साल की रीना ने मचलते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं मेरी गोलू, तू भी खाना.’’ गोलमटोल बड़ीबड़ी आंखों वाली रीना को सब गोलू ही कह कर बुलाते थे.

‘‘मैं ने टमाटर की मस्त चटनी भी बनाई है, आई,’’ सुमि ने उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा.

जल्दी से आटा गूंध कर उस ने बच्चों को खाना खिलाया. उन को सुलाने के बाद कजरी सुमि के साथ वहीं नीचे जमीन पर लेट गई.

‘‘आई, आज फिर दीनू रीना को चौकलेट खिला रहा था. तब मैं ने रीना के हाथ से छीन कर वापस उस के मुंह पर फेंक दी, तो वह मेरे को देख लेने की धमकी दे कर चला गया. मुझे उस से बहुत डर लगता है, आई,’’ सुमि ने भयभीत स्वर में मां को बताते हुए कहा.

‘‘तुम घबराओ नहीं, सुमि, मैं उस की मां से बात करूंगी,’’ कजरी ने उसे तो समझा दिया, परंतु खुद सोच में पड़ गई.

जब से रमेश उसे छोड़ कर गया है, जीना कितना दूभर हो गया है. कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी इस कदर बोझ बन जाएगी. रमेश के रहते उसे कभी भी बाहर जा कर काम करने की जरूरत नहीं पड़ी. 17 साल की थी जब मांबाप ने रमेश के साथ उस का ब्याह कर दिया था. बहुत खुश थी वह रमेश के साथ. पेशे से पेंटर रमेश इंदौर के राजेंद्रनगर इलाके से कुछ दूर बुद्धनगर के स्लम एरिया में किराए के मकान में रहता था. मकान बहुत अच्छा नहीं, पर रहने लायक जरूर था. दोनों की जिंदगी मजे में कट रही थी.

समय के साथ कजरी 3 प्यारे बच्चों की मां बनी. सब से बड़ी सुमि, उस से छोटी रीना और सब से छोटा कमल. बच्चों के जन्म के बाद कजरी का भरा बदन और भी सुंदर लगने लगा था. शादी के 12 साल बीत जाने पर भी रमेश उसे जीजान से चाहता था. आसपड़ोस के लोग उन दोनों के प्यारभरे रिश्ते से अनजान नहीं थे. कजरी के घर के पास ही एक बढ़ई परिवार रहता था. इस परिवार की इकलौती लड़की माया रमेश को बहुत पसंद करती थी, पर रमेश उस पर कभी ध्यान नहीं देता था.

इधर, बच्चों की देखरेख और घर के कामों में व्यस्त कजरी चाहते हुए भी रमेश को ज्यादा वक्त न दे पाती थी जिस वजह से अकसर दोनों में झड़प हो जाया करती थी. वह रमेश को समझाती थी कि बच्चों के आने के बाद उस का काम बढ़ गया है. पर पुरुषवादी सोच का गुलाम रमेश उस की न को अपना अपमान समझने लगा था. धीरेधीरे उन के बीच में दूरियां बढ़ती चली गईं.

अब काम से लौट कर रमेश सीधे जो बाहर निकलता, तो रात 11-12 बजे ही वापस आता. बच्चों के पालनपोषण में व्यस्त कजरी ने पहले तो इस ओर ध्यान नहीं दिया, और जब ध्यान दिया तब तक बड़ी देर हो चुकी थी.

35 साल का रमेश अब 16 साल की लड़की माया का दीवाना बन चुका था. इस बात का पता लगते ही कजरी ने बहुत बवाल मचाया. रमेश से लड़ीझगड़ी, उस माया के घर जा कर उसे लताड़ा. फिर भी उन दोनों पर कोई असर न होता देख कजरी ने माया के सामने अपना आंचल फैलाते हुए अपने बच्चों के पिता को छोड़ देने के लिए बहुत अनुनयविनय की. पर माया टस से मस न हुई. माया के मातापिता भी उस की इस हरकत के आगे मजबूर थे.

फिर, एक दिन वह दिन भी आया जब काम पर गया रमेश कभी घर नहीं लौटा. इधर, माया भी घर से गायब थी. कजरी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह फूटफूट कर रोई. पर अब हो भी क्या सकता था. भारी मन से उस ने इस सचाई को स्वीकार कर लिया कि अब वह एक परित्यक्ता है, जिसे उस का आदमी हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुका है.

पति द्वारा छोड़ी हुई औरत समाज के पुरुषों की बपौती बन जाती है, कुछ ही दिनों में यह बात उस की समझ में आ चुकी थी. यह वह समाज है, जहां पुरुषों द्वारा की गई गलती की सजा भी औरत को ही भुगतनी पड़ती है. घर के बाहर हर दूसरा आदमी उस के शरीर पर अपनी गिद्ध निगाह जमाए बैठा था. पर बच्चों के भरणपोषण के लिए उस का घर से निकलना बेहद जरूरी हो चुका था. ऐसे में रमेश के दोस्त लखन ने उस की बहुत सहायता की. उस ने अपने मालिक के घर पर कजरी को काम दिला दिया.

जल्द ही कजरी ने भी बेशर्मी की चादर ओढ़ कर जीना सीख लिया. लेकिन, अब भी काम पर जाने के बाद बच्चों की देखरेख की समस्या उस के आगे मुंहबाए खड़ी थी, जिस का जिम्मा उस की 11 साल की बेटी ने ले लिया. अपनी पढ़ाई छोड़ कर वह अपने छोटे भाईबहन को संभालने लगी. पापा के घर छोड़ कर चले जाने से वह अचानक ही अपनी उम्र से कुछ ज्यादा बड़ी हो गई थी. कुछ महीनों में कजरी को ऐसा लगने लगा कि जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी है.

एक दिन वह काम पर से वापस आ रही थी कि रास्ते में लखन मिल गया. बातोंबातों में उस ने कजरी से अपने प्यार का इजहार कर दिया. उस के एहसानों तले दबी कजरी उसे एकदम से इनकार न कर सकी. उस ने उस से सोचने के लिए कुछ समय मांगा. रातभर वह इसी ऊहापोह में रही कि अपने ही पति द्वारा वह एक बार ठगी जा चुकी है. क्या फिर से उसे किसी पर इतना विश्वास करना चाहिए? परंतु बिना मर्द के घर पर लोगों की चीलकौवे सी पड़ती निगाहों से बचने के लिए आखिरकार उसे यही रास्ता सब से उपयुक्त लगा.

उस के घर में ही लखन ने कुछ पासपड़ोसियों के सामने उसे मंगलसूत्र पहना कर उस की मांग में सिंदूर भर दिया. अब लखन उस के साथ ही आ कर रहने लगा. बच्चों ने भी कुछ समय बाद आखिर उसे अपना लिया.

शादी को 8 महीने हो चुके थे. पुराने जख्म भरने लगे थे कि अचानक एक दिन सुबहसुबह एक औरत उस के दरवाजे पर आ कर उसे भलाबुरा कहने लगी. पहले तो कजरी समझ ही न पाई कि यह चक्कर क्या है. बाद में उसे समझ आया, तो उस पर फिर से एक बार आसमान टूट पड़ा.

वह औरत लखन की पत्नी थी जो रात ही अपने गांव से आई थी, और लखन व उस के संबंध की जानकारी मिलते ही वह उस से लड़ने चली आई थी. कजरी ने इस बारे में लखन से कई सवाल किए, पर उस की खामोशी देख कर वह समझ गई कि समय ने फिर से उस के साथ बहुत ही गंदा मजाक किया है. लखन ने सिर्फ अपनी वासनापूर्ति की खातिर ही उस से संबंध जोड़ा था.

लखन जा चुका था, कजरी अंदर ही अंदर टूट कर फिर बिखर चुकी थी. पर इस बार वह पहले की तरह एक कमजोर औरत नहीं थी, जो अपनी बेबसी का रोना ले कर बैठे. सो, दूसरे दिन से ही उस ने सुमि पर भाईबहनों की जिम्मेदारी छोड़ कर काम पर जाना शुरू कर दिया.

इधर, पड़ोस में रहने वाला 22 साल का दीनू उस की छोटी बेटी रीना पर गलत निगाह रखता था. रीना 9 साल की एक अबोध बालिका थी, जिसे अकसर वह चौकलेट वगैरह का लालच दे कर अपने पास बुलाने की कोशिश करता था. एक दिन सुमि ने चौकलेट खाती रीना के शरीर पर उस के रेंगते हाथों को देख कर मां को तुरंत बताया था. कजरी ने भी इस वाकए को हलके रूप में न ले कर दीनू के मांबाप से जा कर तुरंत इस की शिकायत की थी. उस के बाद दीनू ने सब के सामने उस से माफी मांगी थी.

कुछ दिनों शांत बैठ कर दीनू फिर से वही काम दोहरा रहा था. कजरी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करे. कैसे बुरी नीयत व बुरी निगाह रखने वाले लोगों से अपनी बच्चियों को बचाए. खुद उस की देह भी तो उस के लिए बड़ी दुखदाई बन चुकी थी. मर्दों की पैनी निगाहें उस के शरीर पर यों फिसलती थीं मानो कपड़ों के अंदर तक झांक लेना चाहती हों.

पति की छोड़ी औरत शायद हर मर्द की जागीर हो जाती है. जिस पर हर कोईर् हाथ साफ करना चाहता है. कजरी के अंदर की औरत बहुत अकेली व लाचार हो गई थी. क्या बिना आदमी के औरत का कोई वजूद नहीं है? आखिर औरत को इतना कमजोर क्यों बनाया है? उस की बेचैनी आंसू बन कर उस के गालोें पर ढुलकने लगी. रात को न जाने कब उस की आंख लगी.

सुबह उठी तो सिर भारी हो रहा था.

आंखें भी जल रही थीं. देररात तक जागने से ऐसा हुआ है, यह  सोच कर कजरी ने उठने की कोशिश की परंतु शरीर ने साथ न दिया.सुमि ने मां को सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया, तो चौंक पड़ी, ‘‘आई, तुझे तो तेज बुखार है.’’

‘‘हां रे, मुझ से तो उठा भी नहीं जा रहा,’’ कजरी पर बेहोशी छाती जा रही थी. शायद बारिश में भीगने से उसे बुखार ने जकड़ लिया था.

मां की हालत देख कर सुमि घबरा गई. मां को वैसे ही छोड़ कर वह दौड़ कर पड़ोस से विमला काकी को बुला लाई. विमला काकी के पति औटो चलाते थे. जल्दी से कजरी को अपने औटो में बैठा कर वे उसे पास के अस्पताल ले गए.

कजरी की बिगड़ती हालत देख कर डाक्टर ने उसे वहीं ऐडमिट कर ग्लूकोस की बोतल चढ़ाने की सलाह दी. जब तक वह हौस्पिटल में रही, विमला काकी ने उस की पूरी देखभाल की और हौस्पिटल का बिल भी उन्होंने ही भरा.

कजरी घर पर तो आ गई लेकिन कमजोरी के चलते उस से उठतेबैठते नहीं बन रहा था. कुछ पैसे जो उस ने बचा कर रखे थे, वे घर के खानेखर्च में खत्म हो गए. अभी विमला काकी का उधार पूरा बाकी था.

‘‘आई, आज आटा खत्म हो गया है, तेल भी नहीं बचा. खाना कैसे बनाऊं?’’ सुमि ने एक सुबह कुछ झिझकते हुए मां से कहा. काम पर गए उसे एक हफ्ता हो गया था.

‘‘आज कुछ अच्छा लग रहा है. आज जाती हूं काम पर. उधर से आते वक्त सब किराना लेती आऊंगी. तब तक तुम पास वाली दुकान से दूध और ब्रैड ले आना और चाय बना कर उस के साथ टोस्ट खा लेना,’’ अपने पास बचे 50 रुपए का आखिरी नोट सुमि को पकड़ाते हुए वह बोली.

काम पर जा कर उसे बहुत बड़ा झटका लगा. उस की मालकिन ने बगैर बताए इतने दिनों की छुट्टी करने पर उसे काम से हटा कर दूसरी बाई रख ली थी. उस ने लाख मिन्नतें कर उन्हें समझाने की भरपूर कोशिश की कि उस ने जानबूझ कर छुट्टी नहीं मारी. लेकिन उन का कलेजा न पसीजा. उन्होंने उसे दोबारा काम पर रखने से साफ मना कर दिया.

‘‘हमेशा ही चुका देती हूं, भैया. हां, इस बार जरूर कुछ देर हो गई. पर मैं जल्द ही आप के सारे रुपए चुका दूंगी,’’ कजरी ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘माफ करना, मैं ने यहां कोई धर्मखाता नहीं खोल रखा है, जो मुफ्त में ही सब को जलपान कराता जाऊं,’’ बाबूलाल ने उसे दुत्कारते हुए कहा.

‘‘आज मेरा काम छूट गया है, लेकिन मैं विश्वास दिलाती हूं कि जल्द ही कोई काम ढूंढ़ कर आप की पूरी उधारी चुका दूंगी,’’ कह कर कजरी ने बेबसी से अपने हाथ जोड़ दिए.

‘‘काम तो मैं भी तुम्हें दे सकता हूं, अगर तुम चाहो तो. इस से तुम्हारा आज तक का पूरा उधार चुक जाएगा और ऊपर से कुछ कमाई भी हो जाएगी.’’ बाबूलाल की आंखों से टपकती लार देख कर कजरी सहम गई.

जाने कैसे ये भेडि़ए एक औरत की मजबूरी को सूंघ कर अपना दांव गांठते हैं. कजरी ने गहरी सांस छोड़ी और दुकान के बाहर आ गई.

मोड़ तक आतेआते वह कुछ ठिठक कर खड़ी हो गई. घर जा कर बच्चों को क्या खिलाएगी? बच्चों के भूख से कलपते चेहरे उसे साफ दिखाई पड़ रहे थे. मकान का किराया कहां से आएगा? विमला काकी का पूरा उधार अभी बाकी है. उफ, कैसे होगा यह सब? कजरी के दिल और दिमाग में एक जंग सी छिड़ गई थी. दिल कहता था…यह गलत है जबकि दिमाग कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक हो चला था, जो हालफिलहाल की स्थिति से कैसे निबटा जाए, यह सोच रहा था. आखिरकार, एक औरत के सतीत्व पर मां की ममता भारी पड़ गई. कजरी के दुकान में दोबारा प्रवेश करते ही बाबूलाल की आंखों में वासनाजनित चमक आ गई.

कुछ देर बाद ही कजरी दोनों हाथों में सामान लिए घर की तरफ तेजी से बढ़ी चली जा रही थी. सामान्यतया रोज खुला रहने वाला दरवाजा आज भीतर से बंद था. अंदर से आती घुटीघुटी सिसकारी की आवाज ने कजरी को तनिक संशय में डाल दिया. किसी अनिष्ट की आशंका से उस का मन कांप गया. जोरजोर से बच्चों को आवाज लगा कर उस ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया. पर दरवाजा न खुला.

इतने में सुमि और कमल को बाहर से आता देख कजरी चीख पड़ी, ‘‘रीना कहां है सुमि?’’

‘‘अंदर ही होगी, आई. मैं कुछ देर पहले ही ब्रैड और दूध लेने गई थी और यह कमल मेरे पीछे लग लिया. बहुत समझाया, पर माना ही नहीं.’’

तब तक चिल्लाने की आवाज सुन कर आसपड़ोस से कई लोग निकल कर जमा हो गए. तुरंतफुरत ही दरवाजा तोड़ दिया गया. दरवाजा टूटते ही कजरी अंदर घुसी और कमरे के एक कोने में रीना को बेसुध पड़ा देख बदहवास सी हो गई. तभी भीतर से एक साया निकल कर बाहर की तरफ भागा. हां, वह दीनू ही था, जिस ने रीना के अकेले होने का फायदा आज उठा ही लिया था. यह सब इतना अचानक हुआ कि किसी को कुछ समझ ही नहीं आया.

शोरगुल की आवाज से विमला काकी भी आ चुकी थीं. कजरी ने रीना को उठानेहिलाने की बहुत कोशिश की, मगर सब बेकार था. रीना बेजान हो चुकी थी. एक नन्ही कली आज फिर किसी वहशी दरिंदे की बुरी नीयत का शिकार हो चुकी थी. कजरी सामने पड़ी सचाई स्वीकार नहीं कर पा रही थी. अपनी प्यारी गोलू का यह हाल देख कर वह कांप उठी थी. उस की पूरी दुनिया ही जैसे उजड़ गई थी. सुमि लगातार रोए जा रही थी और कमल सहमा हुआ एक तरफ खड़ा हुआ था.

लोगों की आपसी चर्चा चालू थी. कोई पुलिस को बुलाने की बात कर रहा था तो कोई रीना को डाक्टर के पास ले जाने को कह रहा था. कजरी अचानक उठी और पलंग के नीचे से हंसिया निकाल कर बिजली की फुरती से बाहर निकल गई. उधर, दीनू जल्दीजल्दी एक बैग में अपने कुछ कपड़े भर कर घर से निकलने ही वाला था कि कजरी ने उस का रास्ता रोक लिया.

‘‘मुझे माफ कर दो कजरी भाभी, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. पता नहीं मुझे क्या हो गया था. मैं उसे मारना नहीं चाहता था, वह चिल्ला न सके, इसलिए मैं ने उस का मुंह बंद किया. मुझे नहीं…’’ दीनू अपनी सफाई देता रह गया और कजरी ने उस पर हंसिये से प्रहार करना शुरू कर दिया.

‘‘नीच, तू ने मेरी गोलू को क्यों मारा, क्या बिगाड़ा था उस मासूम ने तेरा,’’ कजरी चीखती जा रही थी. तभी पीछे से विमला काकी ने आ कर कुछ लोगों की मदद से उसे रोका.

दीनू घायल हो कर गिर पड़ा था. इलाके की पुलिस ने तुरंत ही दीनू को अस्पताल भेजा. और पूछताछ में लग गई. रीना की मृतदेह एम्बुलेंस में ले जाई जा रही थी. उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम थीं. इतनी देर से मूकदर्शक बनी कजरी ने अचानक अट्टहास करना शुरू कर दिया. भीड़ में से किसी ने कहा, ‘वह पागल हो गई है.’ एक विमला काकी ही ऐसी थीं जिन्हें कजरी में एक परित्यक्त मां की बेबसी और हताशा दिखाई दे रही थी, जो अपना सबकुछ दांव पर लगा कर भी अपनी मासूम बच्ची को नहीं बचा पाई.

दादी : एक परिवार ऐसा भी

किसी ने बड़ी जोर से दरवाजा खटखटाया और पिताजी को पुकारा. हम सब की नींद खुल गई. पिताजी हड़बड़ा कर उठ बैठे. फौरन बत्ती जलाई. घड़ी में सुबह के पौने 4 बजे थे. इस समय कौन होगा? कोई चोर या फिर…?

पिताजी ने दरवाजे के पास जा कर पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘भाई साहब, मैं हूं मंजीत सिंह,’’ बाहर से आवाज आई.

पिताजी को जब पूरी तरह से तसल्ली हो गई, तब उन्होंने दरवाजा खोला.

मंजीत सिंह ने अंदर आते ही कहा, ‘‘माताजी चल बसीं…’’

मां कल रात ही तो पड़ोस वाली दादी की बात कर रही थीं और बता रही थीं कि उन की हालत अच्छी नहीं है, पल दो पल की मेहमान हैं.

हम सब भी अपनेअपने बिस्तर से उठ कर बरामदे में आ गए. पिताजी के पूछने पर मंजीत सिंह को रोना आ गया, ‘‘भाई साहब, रात 12 बजे से ही मां की हालत बहुत खराब थी. पेट में दर्द था. शायद थोड़ी सूजन भी थी.’’

‘‘हां, उन्हें बहुत कष्ट था. चलो, अच्छा ही हुआ इस दर्द से छुटकारा मिल गया,’’ पिताजी बोले.

मां ने उन की बात में जोड़ते हुए कहा, ‘‘कल तो काफी तकलीफ थी, पर लगता नहीं था कि इतनी जल्दी…’’

पिताजी ने मंजीत चाचा को हिम्मत बंधाई. उन से किसी भी चीज की जरूरत के बारे में पूछा और बाहर तक छोड़ने चले गए. मां ने हाथमुंह धोया और मुझ से सफेद दुपट्टा निकालने को कहा.

मैं चाय बनाने रसोई में चली गई और खयालों में खो गई कि मंजीत चाचा की मां, प्रीतम चाची की सास और हरजीत, रानी और अमरजीत की दादी, कहने को तो छोटे बेटे चरणजीत की भी मां, छोटी बहू बलवंत की भी सास और बाबी व टिंकू की भी दादी थीं. लेकिन शायद किसी के मन में कोई शोक न था. किसी के मन में उन के जाने की पीड़ा न थी. आंखों से जो आंसू बह रहे थे, वे तो किसी भी अजनबी, अनजाने, अनचाहे इनसान के लिए निकल सकते हैं.

ये सब सगेसंबंधी तो शायद दादी की मौत का ही इंतजार कर रहे थे. शायद ही क्यों, यह तो पूरी सच बात है. जब से रानी की दादी ठीक से चलनेफिरने लायक नहीं रहीं, तब से ही सब बुढि़या के मरने का इंतजार कर रहे थे.

इस दुनिया में कहने को तो दादी का भरापूरा परिवार था, पर अपना दुखदर्द बांटने वाला, देखभाल करने वाला, हमेशा साथ बने रहने वाला एक ही आदमी था, वे थे दादी के पति. हां, दादाजी. बस, एक वे ही थे, जो दादी का पूरी तरह ध्यान रखते थे. दादी जो कहतीं, वे हाजिर करते.

कई बार मुंह का स्वाद बदलने को दादी खट्टीमिट्ठी गोलियां खा लेतीं, तब बड़े तो क्या बच्चे तक उन्हें चिढ़ाते, ‘अरे बुढि़या को तो देखो, क्या चटोरी हो कर गोलियां खा रही है. क्या जवानी में खानेपीने से मन नहीं भरा, जो बुढ़ापे में गोलियां चूस रही है?’

वे सब सुनती रह जातीं. बहुएं बूढ़े को भी नहीं छोड़ती थीं, ‘बड़ा प्यार हो रहा है, जो मांगती हैं वही ला कर देता है. इस बुढ़ापे में भी शर्म नहीं आती बुढि़या को गोलियां खिलाते हुए.’

जब दादाजी काम करते थे और पैसे ला कर देते थे, तो वे सभी को प्यारे लगते थे. तब तो दादी की भी पूछ थी. लेकिन जब से आंखों की रोशनी कम हो गई थी, काम कम ही मिलता था. धीरेधीरे सब के मन में बदलाव आ गया था. पहले बिना मांगे ही सुबह की चाय मिल जाती थी और अब धूप निकल आने पर भी, दादी के आवाज लगाने पर भी दो घूंट चाय नहीं मिलती थी.

कितनी अजीब बात है यह. क्या आदमी का रिश्ता पैसों तक ही सिमट गया है? क्या आदमी की अपनी कोई कीमत नहीं होती? क्या उस का खुद का कोई वजूद नहीं है या जो वजूद की कीमत है वह बस पैसे की ही है?

अगर यह हाड़मांस का पुतला निकम्मा हो जाता है, तो क्यों सबकुछ उस से दूर चला जाता है? उस के अपने भी क्यों पराए हो जाते हैं? यह बात समझ में नहीं आती.

दादी के साथ भी ऐसा ही हुआ था. नकारा होते ही वे अपने ही बेटों को भार लगने लगी थीं.

जो मकान दादीजी का अपना था, उन्होंने अपनी कमाई से बनवाया था, उस घर में ही अब दादादादी के लिए जगह नहीं थी. वैसे तो वे दोनों बड़े बेटे मंजीत के पास ही रहते थे, लेकिन कभीकभी उन्हें रखने के लिए बड़ी बहू और छोटी बहू में खूब जम कर लड़ाई भी हो जाती थी.

दादी कहलाने को तो घर की मालकिन थीं, लेकिन दो वक्त भी चैन से भरपेट भोजन नहीं मिलता था. एक चपाती, छोटी सी कटोरी में दाल या सब्जी, बस. और मांगने पर चपातियों

की जगह गालियां परोस दी जातीं, ‘कुछ कामधाम है नहीं, बैठीबैठी रोटियां तोड़ती रहती है, बुढि़या मरती भी नहीं. पता नहीं, कब पीछा छूटेगा.’

दादी शायद उन की यह नादानी समझ कर माफ करती रहती थीं. यह सब झेलते हुए भी दादी का मन अपने परिवार में ही बसा हुआ था. बाहर का कोई आ कर घर की किसी चीज को छू तो जाए फिर तो दादी की डांट सुनने ही लायक होती थी. अमरूद के मौसम में जब बच्चे पेड़ पर चढ़ कर अमरूद तोड़ते, तो दादी अपनी बैसाखी बजाबजा कर उन्हें भगाती थीं.

कितना अपनापन था दादी की हर हरकत में. पर, परिवार के सभी सदस्य इस अपनेपन की कोई कीमत नहीं समझते थे. उन्हें तो दादादादी मुसीबत लगते थे. हर समय दुत्कार ही दुत्कार और दुत्कार…

मुझे याद है, जब रानी के दादाजी गांव में अपनी जमीन बेच कर आए थे, तब उन के दिन फिर गए थे. उन की खातिरदारी बढ़ गई थी. समय पर चाय, खाना और प्यार से बोलना. दोनों बहुओं में होड़ लगी थी, दादाजी का मन जीत कर पैसे हड़पने की. लेकिन प्रीतम चाची जीत गई थीं.

मेरी मां ने बताया था कि सारे रुपए रानी के खाते में जमा करा दिए गए थे, यह कह कर कि बूढ़ेबुढि़या के आड़े वक्त में काम आएंगे. रुपए का तमाशा खत्म हुआ कि फिर से उन के वही बुरे दिन लौट आए थे.

मेरी मां उन के घर अफसोस जता कर आई तो कहने लगीं, ‘‘सब ने रोरो कर आंखें सुजा ली हैं. मन में तो उस समय आया कि एकएक से पूछूं, जीतेजी दादी की सेवा न हुई और अब ये आंसू किसलिए…’’

श्मशान ले जाने का समय आया, तो समाज की चिंता ने दोनों परिवारों को आ घेरा. अर्थी पर से पैसे फेंकने के लिए पैसों का इंतजाम किया गया. लोग क्या कहेंगे? 2-2 बेटे हैं, पोते भी हैं, काम अच्छा नहीं किया, तो समाज में नाक कट जाएगी.

वाह रे इनसान, जिंदा आदमी के लिए दो दाने अन्न के भी नहीं, मर गए तो पैसे फेंकते हैं. कितना घिनौना रिवाज है हमारे समाज, हमारे लोगों का. जैसेतैसे अंतिम संस्कार की रस्म पूरी हुई, सब तरफ से पूरी कोशिश की गई थी कि कोई कल को यह न कह दे कि 2-2 बेटों के रहते कुछ कमी रह गई थी.

जिस दादी की सेवा करने के लिए उन के पास जरा सा समय न होता था, मरने के बाद उस के लिए अफसोस जताने आए लोगों के साथ पूरा दिन बैठना पड़ता था.

लोगों ने आज को आधुनिक युग, नाम गलत दे दिया है. यह तो पत्थर युग है, पत्थर के दिल, जिन पर किसी के दर्द, आह का कोई असर नहीं होता.

13वें दिन अंतिम क्रिया की गई. पूरी बिरादरी और जानपहचान के लोगों को खाना खिलाया गया. दादी को भूखा मार दिया, लेकिन बिरादरी में नाक रखने के लिए खाना खिलाया.

क्या खाना था… मटरपनीर, चना, उड़द की दाल और चावल. बच्चों के लिए तो कोई त्योहार ही हो गया था. बड़े भी भूल चुके थे कि किसी की मृत्यु पर यह भोज दिया जा रहा है. किसी को याद तक न रहा था कि दादी ने हमारे बीच में अंतिम सांस छोड़ी थी. उन की आंखें पानी से भरी थीं, जिन में शायद अभी तक दादी नहीं रहीं.

पर दादाजी चुपचाप उस कमरे में चारपाई के साथ लगे बैठे थे, जहां दादी की धुंधली सी तसवीर बसी हुई थी, जिसे वे लोगों की उस भीड़ में खोज रहे थे, जो दादी की अंतिम क्रिया में शामिल हो कर मुंह का स्वाद बढ़ा रहे थे.

दोहराव : क्यों बेचैन था कुसुम का मन

शाम का धुंधलका सूर्य की कम होती लालिमा को अपने अंक में समेटने का प्रयास कर रहा था. घाट की सीढि़यों पर कुछ देर बैठ अस्त हो रहे सूर्य के सौंदर्य को निहार कर कुसुम खड़ी हुईं और अपने घर की ओर चलने लगीं. आज उन के कदम स्वयं गति पकड़ रहे थे…जब फूलती सांसें साथ देने से इनकार करतीं तो वह कुछ पल को संभलतीं मगर व्याकुल मन कदमों में फिर गति भर देता. बात ही कुछ ऐसी थी. कल सुबह की टे्रन से वह अपनी इकलौती बेटी नेहा के घर जा रही थीं. वह भी पूरे 2 साल बाद.

यद्यपि नेहा के विवाह को 2 साल से ऊपर हो चले थे मगर कुसुम को लगता था जैसे कल की बात हो. कुसुम के पति नेहा के जन्म के कुछ सालों के बाद ही चल बसे थे. उन के निधन के बाद कुसुम नन्ही नेहा को गोद में ले कर प्राकृतिक छटा से भरपूर उत्तराखंड के एक छोटे से कसबे में आ गईं. इस जगह ने कुसुम को वह सबकुछ दिया जो वह खो चुकी थीं. मानप्रतिष्ठा, नौकरी, घर और नेहा की परवरिश में हरसंभव सहायता.

कुसुम ने भी इन एहसानों को उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने छोटा सा स्कूल खोला, जो धीरेधीरे कालिज के स्तर तक पहुंच गया. उन्हीं की वजह से कसबे में सर्वशिक्षा अभियान को सफलता मिली.

कुसुम के पड़ोसी घनश्यामजी जब भी नेहा को देखते कुसुम से यही कहते, ‘बहनजी, इस प्यारी सी बच्ची को तो मैं अपने परिवार में ही लाऊंगा,’ और समय आने पर उन्होंने अपनी बात रखते हुए अपने भतीजे अनुज के लिए नेहा का हाथ मांग लिया.

अनुज एक संस्कारी और होनहार लड़का था. वह उत्तर प्रदेश सरकार के बिजली विभाग में इंजीनियर था. कुसुम ने नेहा को विवाह में देने के लिए कुछ रुपए जोड़ कर रखे थे, मगर अनुज ने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि मुझे आप के आशीर्वाद के सिवा और कुछ नहीं चाहिए. मेरी पत्नी को मेरी कमाई से ही गृहस्थी चलानी होगी, अपने मायके से लाई हुई चीजों से नहीं. और उस की इस बात को सुन कर पल भर के लिए कुसुम अतीत में खो गई थीं.

उन के अपने विवाह के समय उन के पति ने भी ऐसा ही कुछ कह कर दहेज लेने से साफ मना कर दिया था. अपने दामाद में अपने दिवंगत पति के आदर्श देख कर कुसुम अभिभूत हो उठी थीं.

नेहा के विवाह के 2 महीने बाद कुसुम को कालिज के किसी काम से दिल्ली जाना था. लौटते हुए वह कुछ समय के लिए मेरठ में बेटीदामाद के घर रुकी थीं. बड़ा आत्मिक सुख मिला था कुसुम को नेहा का सुखी घरसंसार देख कर. हालांकि देखने में उन का घर किसी भी दृष्टि से सरकारी इंजीनियर का घर नहीं लग रहा था, फर्नीचर के नाम पर कुल 4 बेंत की कुरसियां थीं, 1 मेज और पुराना दीवान था. सामने स्टूल पर रखा छोटा ब्लैक एंड वाइट टीवी रखा था जो शायद अनुज के होस्टल के दिनों का साथी था. उन का घर महंगे इलेक्ट्रोनिक उपकरणों और फर्नीचर  से सजाधजा नहीं था मगर उन के प्रेम की जिस भीनीभीनी सुगंध ने उन के घर को महका रखा था उसे कुसुम ने भी महसूस किया था और वह बेटी की तरफ से पूरी तरह संतुष्ट हो खुशीखुशी अपने घर लौट आई थीं. आज वह एक बार फिर अपनी बेटी के घर की उसी सुगंध को महसूस करने जा रही थीं.

स्टेशन पर उतरने के बाद कुसुम की बेचैन आंखें बेटीदामाद को खोज रही थीं कि तभी पीछे से नेहा ने उन की आंखों पर हाथ रखरख कर उन्हें चौंका दिया. अनुज तो नहीं आ पाया था मगर नेहा अपनी मां को लेने ठीक समय पर पहुंच गई थी.

कुसुम ने बेटी को देखा तो वह कुछ बदलीबदली सी नजर आई थी, गाढ़े मेकअप की परत चढ़ा चेहरा, कीमती परिधान, हाथों और गले में रत्नजडि़त आभूषण. इन 2 सालों में तो जैसे उस का पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था. कुसुम सामान उठाने लगीं तो नेहा ने यह कहते रोक दिया,  ‘‘रहने दो, मम्मी, ड्राइवर उठा लेगा.’’

नेहा, मां को लेने सरकारी जीप में आई थी. जीप में बैठ नेहा मां को बताने लगी, ‘‘मम्मी, अनुज आजकल बड़े व्यस्त रहते हैं इसलिए मेरे साथ नहीं आ सके. हां, आप को लेने के लिए इन्होंने सरकारी जीप भेज दी है…हाल ही में इन का प्रमोशन हुआ है, बड़ी अच्छी जगह पोस्टिंग हुई है…उस जगह पर पोस्टिंग पाने के लिए इंजीनियर तरसते रहते हैं मगर इन को मिली…खूब कमाई वाला एरिया है…’’ इस के आगे के शब्द कुसुम नहीं सुन सकीं. नेहा के बदले व्यक्तित्व से वह पहले ही विचलित थीं. उन के मुंह से निकला, ‘कमाई वाला एरिया.’

नेहा की हर एक हरकत…हर एक बात उस की सोच में आए बदलाव का संकेत दे रही थी. उस की आंखों में बसी सादगी और संतुष्टि की जगह कुसुम को पैसे की चमक और अपने स्टेटस का प्रदर्शन करने की चाह नजर आ रही थी.

घर पहुंच कर कुसुम ने पाया कि घर भी नेहा की तरह उन के बढ़े हुए स्टेटस का खुल कर प्रदर्शन कर रहा है. आधुनिक साजसज्जा से युक्त घर में ऐशोआराम की हर एक चीज मौजूद थी.

‘‘लगता है, अनुज ने इन 2 सालों में काफी तरक्की कर ली है,’’ कुसुम ने चारों ओर दृष्टि घुमाते हुए पूछा.

‘‘अनुज ने कहां की है मम्मी, मैं ने जबरन इन के पीछे पड़ कर करवाई है… जब मैं ने देखा कि कभी इन के नीचे काम करने वाले कहां के कहां पहुंच गए और यह वहीं अटके पड़े हैं तो मुझ से रहा न गया…वैसे इन का बस चलता तो अभी तक हम उसी कबूतरखाने में पड़े रहते…’’

कुसुमजी समझ गईं कि उन की बेटी, शहर आ कर काफी सयानी हो गई है और पैसे बनाने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुकी है. इस बात को ले कर वह गहन चिंता में डूब गईं.

‘‘अरे, मम्मी, आप अभी तक यों ही बैठी हैं, जल्दी से हाथमुंह धो कर फे्रश हो जाइए…खाना तैयार है…आप थकी होंगी, सो जल्दी खा कर सो जाइए…कल आराम से बातें करेंगे.’’

‘‘अनुज को आने दे…साथ ही डिनर करेंगे…वैसे बहुत देर हो गई है, कब तक आता है?’’

‘‘उन का तो कुछ भरोसा नहीं है, मम्मी, जब से प्रमोशन हुआ है अकसर देर से ही आते हैं…मैं तो समय पर खाना खा कर सो जाती हूं, क्योंकि ज्यादा देर से सोने से मेरी नींद उचट जाती है. वह जब आते हैं तो उन्हें नौकर खिला देता है.’’

‘‘मैं अनुज के साथ ही खाऊंगी, वैसे भी मुझे अभी भूख नहीं है, तुम चाहो तो खा कर सो जाओ…’’ कुसुम ने जवाब दिया.

थोड़ी ही देर में अनुज घर आया और आते ही कुसुम के चरण स्पर्श कर अभिवादन करते हुए बोला, ‘‘क्षमा करें, मम्मीजी, कुछ जरूरी काम आ गया था सो आप को लेने स्टेशन नहीं पहुंच सका.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटा,’’ कुसुमजी बोलीं, ‘‘मगर यह तुम्हें क्या हो गया है… तुम्हारी तो सूरत ही बदल गई है…माना काम जरूरी है पर अपना ध्यान भी तो रखना चाहिए…’’

सचमुच इस अनुज की सूरत 2 साल पहले वाले अनुज से बिलकुल मेल नहीं खाती थी…निस्तेज आंखें, बुझा चेहरा, झुके कंधे, निष्प्राण सा शरीर…उस का पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था.

‘‘बस, मम्मीजी, क्या कहूं…काम कुछ ज्यादा ही रहता है,’’ इतना कह कर वह नजरें झुकाए अपने कमरे में चला गया और वहां जा कर नेहा को आवाज लगाई, ‘‘नेहा, ये 20 हजार रुपए अलमारी में रख दो, ये घर पर ही रहेेंगे…बैंक में जमा मत कराना.’’

अनुज के कमरे से आ रही पतिपत्नी की धीमी आवाज ने कुसुम पर वज्रपात कर दिया. 20 हजार रुपए, वह भी महीने के आखिर में…कहीं ये रिश्वत की कमाई तो नहीं…नेहा कह भी रही थी कि खूब कमाई वाले एरिया में पोस्टिंग हुई है…तो इस का अर्थ है कि इन दोनों को पैसे की भूख ने इतना अंधा बना दिया है कि इन्होंने अपने संस्कार, नैतिकता और ईमानदारी को ताक पर रख दिया. नहीं…मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी…कुछ भी हो इन्हें सही राह पर लाना ही होगा. मन में यह दृढ़ निश्चय कर वह सोने चली गईं.

आज रविवार था. अनुज घर पर ही था. उस के व्यवहार से कुसुमजी को लग रहा था जैसे वह घरपरिवार की तरफ से उदासीन हो कर अपने में ही खोया…गुमसुम सा…भीतर ही भीतर घुट रहा है…घर की हवा बता रही थी कि उन दोनों का प्यार मात्र औपचारिकताओं पर आ कर सिमट गया है, मगर नेहा इस माहौल में भी बेहद सुखी और संतुष्ट नजर आ रही थी और यही बात कुसुम को बुरी तरह कचोट रही थी.

‘‘मम्मी, आज इन की छुट्टी है. चलो, कहीं बाहर घूम कर आते हैं और आज लंच भी फाइव स्टार होटल में करेंगे,’’ नेहा ने चहकते हुए प्रस्ताव रखा.

‘‘नहीं…आज हम तीनों कहीं नहीं जाएंगे बल्कि घर पर ही रह कर ढेर सारी बात करेंगे…और हां, आज खाना मैं बनाऊंगी,’’ कुसुमजी ने नेहा के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए कहा.

‘‘वाह, मम्मीजी, मजा आ जाएगा, नौकरों के हाथ का खाना खाखा कर तो मेरी भूख ही मर गई,’’ अनुज ने नेहा पर कटाक्ष किया.

‘‘हां…हां, जब घर में नौकरचाकर हैं तो मैं क्यों रसोई का धुआं खाऊं,’’ नेहा ने प्रतिवाद किया.

‘‘तुम्हें मसालेदार छोले और भरवां भिंडी बहुत पसंद हैं न…वही बनाऊंगी,’’ कुसुमजी ने बात संभाली.

‘‘अरे, मम्मीजी, आप को मेरी पसंद अभी तक याद है…नेहा तो शायद भूल ही गई,’’ अनुज के एक और कटाक्ष से नेहा मुंह बनाते हुए वहां से उठ कर चली गई.

‘‘चलो, बाहर लौन में बैठ कर कुछ देर धूप सेंकी जाए. मुझे तुम दोनों से कुछ जरूरी बातें भी करनी हैं,’’ लंच से निबट कर कुसुम ने सुझाव रखा.

बाहर आ कर बैठते ही कुसुम की भावमुद्रा बेहद गंभीर हो गई. उन की नजरें शून्य में ऐसे ठहर गईं जैसे अतीत के कुछ खोए हुए लमहे तलाश कर रही हों. कुछ देर खुद को संयत कर उन्होंने बोलना शुरू किया, ‘‘आज मैं तुम दोनों के साथ अपनी कुछ ऐसी बातें शेयर करना चाहती हूं जिन का जानना तुम्हारे लिए बेहद जरूरी है. बात उन दिनों की है जब मैं नेहा के पापा से पहली बार मिली थी. वह भी अनुज की तरह ही सरकारी विभाग में इंजीनियर थे. बेहद ईमानदार और उसूलों के पक्के. वह ऐसे महकमे में थे जहां रिश्वत का लेनदेन एक आम बात थी मगर वह उस कीचड़ में भी कमल की तरह निर्मल थे. हम ने एकदूसरे को पसंद किया और शादी कर ली. उन की जिद के चलते हमारी शादी भी बड़ी सादगी से और बिना किसी दानदहेज के हुई थी. पहले उन की पोस्टिंग उत्तरकाशी में थी.

‘‘साल भर बाद उन का तबादला गाजियाबाद हो गया. वह एक औद्योगिक शहर है, जो ऊपरी कमाई की दृष्टि से बहुत अच्छा था. वहां हमें विभाग की सरकारी कालोनी में घर मिल गया. उन्होंने मुझे शुरू  से ही हिदायत दी थी कि मैं वहां सरकारी कालोनी में रह रहे बाकी इंजीनियरों की बीवियों और उन के रहनसहन की खुद से तुलना न करूं क्योंकि उन का उच्च स्तरीय जीवन उन के काले धन के कारण है, जो हमारे पास कभी नहीं होगा.

‘‘धीरेधीरे मेरा पासपड़ोस में मेलजोल बढ़ने लगा और न चाहते हुए भी मैं उन के ठाटबाट से प्रभावित होने लगी. मेरे मन में भी उन सब की देखादेखी ऐशोआराम से रहने की इच्छा जागने लगी. मुझे लगने लगा कि यह लेनदेन तो जगत व्यवहार का हिस्सा है, जब इस दुनिया में हर कोई पैसे बटोर कर अपना और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर रहा है तो हम ही क्यों पीछे रहें…

‘‘बस, मैं ने अपनी सहेलियों के बहकावे में आ कर उन पर दबाव डालना शुरू कर दिया मगर उन्होंने अपने आदर्शों के साथ समझौता करना नहीं स्वीकारा. मैं उन्हें ताने देती, उन के सहकर्मियों की तरक्की का हवाला देती, यहां तक कि मैं ने उन्हें एक असफल पति भी करार दिया, मगर वह नहीं झुके.

‘‘इन्हीं उलझनों के बीच मैं गर्भवती हुई तो वह तमाम मतभेदों को भूल कर बेहद खुश थे. मैं ने उन से स्पष्ट कह दिया कि मैं इस हीनता भरे दमघोंटू माहौल में किसी बच्चे को जन्म नहीं दूंगी. हमारे घर संतान तभी होगी जब तुम अपने खोखले आदर्शों का चोगा उतार कर बाकी लोगों की तरह ही घर में हमारे और बच्चे के लिए तमाम सुखसुविधाओं को जुटाने का वचन दोगे. मुझे गर्भपात कराने पर उतारू देख तुम्हारे पिता टूट गए और धीरेधीरे धन पानी की तरह बरसने लगा…घर सुखसुविधाओं की चीजों से भरता चला गया.

‘‘मैं ने जो चाहा सो पा लिया, मगर तुम्हारे पिता का प्यार खो दिया. उस समय मेरी आंखों पर माया का ऐसा परदा पड़ा था कि मुझे इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि वह किसी मशीन की भांति काम करते जा रहे थे और मैं अपने ऊंचे स्टेटस के मद में पागल थी.

‘‘फिर तुम्हारा जन्म हुआ, तुम्हारे आने के बाद तुम्हारे भविष्य के लिए धन जमा करने की तृष्णा भी बढ़ गई. सबकुछ मेरी इच्छानुसार ही चल रहा था कि एक दिन अचानक…’’

कुसुमजी की वाणी कुछ पल के लिए थम गई और उन की आंखें नम हो गईं….

‘‘एक दिन क्या हुआ, मम्मी?’’ नेहा ने विस्मित स्वर से पूछा.

‘‘…आफिस से खबर आई कि तुम्हारे पिता को भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते ने धर दबोचा. अखबार में नाम आया…खूब फजीहत हुई और फिर मुकदमे के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया…जेल जाते हुए उन्होंने मुझ को जिस हिकारत की नजर से देखा था वह मैं कभी भूल नहीं सकती…वह चुप थे, मगर उन की चमकती संतुष्ट नजरें जैसे कह रही थीं कि वह मुझे यों असहाय, भयभीत और अपमानित देख कर बेहद खुश थे.

‘‘बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी इच्छा से ही खुद को गिरफ्तार करवाया था और अपना सब कच्चा चिट्ठा अदालत में खोल कर रख दिया था…मुझे दंडित करने का यही तरीका चुना था उन्होंने…जेल में वह कभी मुझ से नहीं मिले और एक दिन पता चला कि वहां उन का देहांत हो गया है…’’

इतना बता कर कुसुमजी फूटफूट कर रो पड़ीं…बरसों से बह रहे पश्चाताप के आंसू अभी भी सूखे नहीं थे…

‘‘मम्मी, इतनी तीक्ष्ण पीड़ा आप ने इतने साल कैसे छिपा कर रखी…मुझे तो कभी आभास भी नहीं होने दिया.’’

‘‘मन में अपार ग्लानि थी. बस, यही साध थी मन में कि बाकी जीवन उन के आदर्शों पर चल कर ही बिताऊं और तुम्हें भी तुम्हारे पिता के संस्कार दूं. मैं अब बूढ़ी हो चली हूं, पता नहीं कितने दिनों की मेहमान हूं…और कुछ तो नहीं है मेरे पास, बस यह आपबीती तुम दोनों को धरोहर के रूप में दे रही हूं…

‘‘वैसे, मैं ने देखा है कि  जो रिश्वत लेते हैं वे शराबीकबाबी हो जाते हैं और रातरात भर गायब रहते हैं. उन पर काम का भरोसा नहीं किया जा सकता है. और उन्हें छोटेमोटे प्रमोशन ही मिल पाते हैं. बेटी, इंजीनियरिंग ऐसा काम नहीं कि दोचार घंटे गए और हो गया. घंटों किताबों में मगजमारी करनी होती है और जिस को रिश्वत मिलती है, वह किताबों में नहीं पार्टियों में समय बिताता है, हो सकता है तुम्हें ये बातें बुरी लग जाएं पर मेरा अनुभव है. तुम्हारे पिता के जाने के बाद मैं यही तो देखती रही कि मैं गलत थी या तुम्हारे पिता,’’ कुसुम ने बात खत्म करते हुए कहा.

‘‘जरूर काम आएंगी मम्मी,… तुम्हारी यह धरोहर अब कभी मेरे कदम लड़खड़ाने नहीं देगी,’’ नेहा अपनी मां से लिपट गई. उस की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे जिन के साथ उस के भीतर छिपी न जाने कितनी तृष्णाएं भी बही जा रही थीं.

दो भूत : उर्मिल ने अम्माजी को दी अनोखी राहत

मेरी निगाह कलैंडर की ओर गई तो मैं एकदम चौंक पड़ी…तो आज 10 तारीख है. उर्मिल से मिले पूरा एक महीना हो गया है. कहां तो हफ्ते में जब तक चार बार एकदूसरे से नहीं मिल लेती थीं, चैन ही नहीं पड़ता था, कहां इस बार पूरा एक महीना बीत गया. घड़ी पर निगाह दौड़ाई तो देखा कि अभी 11 ही बजे हैं और आज तो पति भी दफ्तर से देर से लौटेंगे. सोचा क्यों न आज उर्मिल के यहां ही हो आऊं. अगर वह तैयार हो तो बाजार जा कर कुछ खरीदारी भी कर ली जाए. बाजार उर्मिल के घर से पास ही है. बस, यह सोच कर मैं घर में ताला लगा कर चल पड़ी. उर्मिल के यहां पहुंच कर घंटी बजाई तो दरवाजा उसी ने खोला. मुझे देखते ही वह मेरे गले से लिपट गई और शिकायतभरे लहजे में बोली, ‘‘तुझे इतने दिनों बाद मेरी सुध आई?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तो आखिर चली भी आई पर तू तो जैसे मुझे भूल ही गई.’’

‘‘तुम तो मेरी मजबूरियां जानती ही हो.’’

‘‘अच्छा भई, छोड़ इस किस्से को. अब क्या बाहर ही खड़ा रखेगी?’’

‘‘खड़ा तो रखती, पर खैर, अब आ गई है तो आ बैठ.’’

‘‘अच्छा, क्या पिएगी, चाय या कौफी?’’ उस ने कमरे में पहुंच कर कहा.

‘‘कुछ भी पिला दे. तेरे हाथ की तो दोनों ही चीजें मुझे पसंद हैं.’’

‘‘बहूरानी, कौन आया है?’’ तभी अंदर से आवाज आई.

‘‘उर्मिल, कौन है अंदर? अम्माजी आई हुई हैं क्या? फिर मैं उन के ही पास चल कर बैठती हूं. तू अपनी चाय या कौफी वहीं ले आना.’’

अंदर पहुंच कर मैं ने अम्माजी को प्रणाम किया और पूछा, ‘‘तबीयत कैसी है अब आप की?’’

‘‘बस, तबीयत तो ऐसी ही चलती रहती है, चक्कर आते हैं. भूख नहीं लगती.’’

‘‘डाक्टर क्या कहते हैं?’’

‘‘डाक्टर क्या कहेंगे. कहते हैं आप दवाएं बहुत खाती हैं. आप को कोई बीमारी नहीं है. तुम्हीं देखो अब रमा, दवाओं के बल पर तो चल भी रही हूं, नहीं तो पलंग से ही लग जाती,’’ यह कह कर वे सेब काटने लगीं.

‘‘सेब काटते हुए आप का हाथ कांप रहा है. लाइए, मैं काट दूं.’’

‘‘नहीं, मैं ही काट लूंगी. रोज ही काटती हूं.’’

‘‘क्यों, क्या उर्मिल काट कर नहीं देती?’’

‘‘तभी उर्मिल ट्रे में चाय व कुछ नमकीन ले कर आ गई और बोली, ‘‘यह उर्मिल का नाम क्यों लिया जा रहा था?’’

‘‘उर्मिल, यह क्या बात है? अम्माजी का हाथ कांप रहा है और तुम इन्हें एक सेब भी काट कर नहीं दे सकतीं?’’

‘‘रमा, तू चाय पी चुपचाप. अम्माजी ने एक सेब काट लिया तो क्या हो गया.’’

‘‘हांहां, बहू, मैं ही काट लूंगी. तुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है,’’ तनाव के कारण अम्माजी की सांस फूल गई थी.

मैं उर्मिल को दूसरे कमरे में ले गई और बोली, ‘‘उर्मिल, तुझे क्या हो गया है?’’

‘‘छोड़ भी इस किस्से को? जल्दी चाय खत्म कर, फिर बाजार चलें,’’ उर्मिल हंसती हुई बोली.

मैं ठगी सी उसे देखती रह गई. क्या यह वही उर्मिल है जो 2 वर्ष पूर्व रातदिन सास का खयाल रखती थी, उन का एकएक काम करती थी, एकएक चीज उन को पलंग पर हाथ में थमाती थी. अगर कभी अम्माजी कहतीं भी, ‘अरी बहू, थोड़ा काम मुझे भी करने दिया कर,’ तो हंस कर कहती, ‘नहीं, अम्माजी, मैं किस लिए हूं? आप के तो अब आराम करने के दिन हैं.’

तभी उर्मिल ने मुझे झिंझोड़ दिया, ‘‘अरे, कहां खो गई तू? चल, अब चलें.’’

‘‘हां.’’

‘‘और हां, तू खाना भी यहां खाना. अम्माजी बना लेंगी.’’

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, ‘‘उर्मिल, तुझे हो क्या गया है?’’

‘‘कुछ नहीं, अम्माजी बना लेंगी. इस में बुरा क्या है?’’

‘‘नहीं, उर्मिल, चल दोनों मिल कर सब्जीदाल बना लेते हैं और अम्माजी के लिए रोटियां भी बना कर रख देते हैं. जरा सी देर में खाना बन जाएगा.’’

‘‘सब्जी बन गई है, दालरोटी अम्माजी बना लेंगी, जब उन्हें खानी होगी.’’

‘‘हांहां, मैं बना लूंगी. तुम दोनों जाओ,’’ अम्माजी भी वहीं आ गई थीं.

‘‘पर अम्माजी, आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही है, हाथ भी कांप रहे हैं,’’ मैं किसी भी प्रकार अपने मन को नहीं समझा पा रही थी.

‘‘बेटी, अब पहले का समय तो रहा नहीं जब सासें राज करती थीं. बस, पलंग पर बैठना और हुक्म चलाना. बहुएं आगेपीछे चक्कर लगाती थीं. अब तो इस का काम न करूं तो दोवक्त का खाना भी न मिले,’’ अम्माजी एक लंबी सांस ले कर बोलीं.

‘‘अरे, अब चल भी, रमा. अम्माजी, मैं ने कुकर में दाल डाल दी है. आटा भी तैयार कर के रख दिया है.’’

बाजार जाते समय मेरे विचार फिर अतीत में दौड़ने लगे. बैंक उर्मिल के घर के पास ही था. एक सुबह अम्माजी ने कहा, ‘मैं बैंक जा कर रुपए जमा कर ले आती हूं.’

‘नहीं अम्माजी, आप कहां जाएंगी, मैं चली जाऊंगी,’ उर्मिल ने कहा था.

‘नहीं, तुम कहां जाओगी? अभी तो अस्पताल जा रही हो.’

‘कोई बात नहीं, अस्पताल का काम कर के चली जाऊंगी.’

और फिर उर्मिल ने अम्माजी को नहीं जाने दिया था. पहले वह अस्पताल गई जो दूसरी ओर था और फिर बैंक. भागतीदौड़ती सारा काम कर के लौटी तो उस की सांस फूल आई थी. पर उर्मिल न जाने किस मिट्टी की बनी हुई थी कि कभी खीझ या थकान के चिह्न उस के चेहरे पर आते ही न थे.

उर्मिल की भागदौड़ देख कर एक दिन जीजाजी ने भी कहा था,

‘भई, थोड़ा काम मां को भी कर लेने दिया करो. सारा दिन बैठे रहने से तो उन की तबीयत और खराब होगी और खाली रहने से तबीयत ऊबेगी भी.’

इस पर उर्मिल उन से झगड़ पड़ी थी, ‘आप भी क्या बात करते हैं? अब इन की कोई उम्र है काम करने की? अब तो इन से तभी काम लेना चाहिए जब हमारे लिए मजबूरी हो.’

बेचारे जीजाजी चुप हो गए थे और फिर कभी सासबहू के बीच में नहीं बोले.  मैं इन्हीं विचारों में खोई थी कि उर्मिल ने कहा, ‘‘लो, बाजार आ गया.’’ यह सुन कर मैं विचारों से बाहर आई.

बाजार में हम दोनों ने मिल कर खरीदारी की. सूरज सिर पर चढ़ आया था. पसीने की बूंदें माथे पर झलक आई थीं. दोनों आटो कर के घर पहुंचीं. अम्माजी ने सारा खाना तैयार कर के मेज पर लगा रखा था. 2 थालियां भी लगा रखी थीं. मेरा दिल भर आया.

अम्माजी बोलीं, ‘‘तुम लोग हाथ धो कर खाना खा लो. बहुत देर हो गई है.’’

‘‘अम्माजी, आप?’’  मैं ने कहा.

‘‘मैं ने खा लिया है. तुम लोग खाओ, मैं गरमगरम रोटियां सेंक कर लाती हूं.’’

मैं अम्माजी के स्नेहभरे चेहरे को देखती रही और खाना खाती रही. पता नहीं अम्माजी की गरम रोटियों के कारण या भूख बहुत लग आने के कारण खाना बहुत स्वादिष्ठ लगा. खाना खा कर अम्माजी को स्वादिष्ठ खाने के लिए धन्यवाद दे कर मैं अपने घर लौट आई.

कुछ दिनों बाद एक दिन जब मैं उर्मिल के घर पहुंची तो दरवाजा थोड़ा सा खुला था. मैं धीरे से अंदर घुसी और उर्मिल को आवाज लगाने ही वाली थी कि उस की व अम्माजी की मिलीजुली आवाज सुन कर चौंक पड़ी. मैं वहीं ओट में खड़ी हो कर सुनने लगी.

‘‘सुनो, बहू, तुम्हारी लेडीज क्लब की मीटिंग तो मंगलवार को ही हुआ करती है न? तू बहुत दिनों से उस में गई नहीं.’’

‘‘पर समय ही कहां मिलता है, अम्माजी?’’

‘‘तो ऐसा कर, तू आज हो आ. आज भी मंगलवार ही है न?’’

‘‘हां, अम्माजी, पर मैं न जा सकूंगी. अभी तो काम पड़ा है. खाना भी बनाना है.’’

‘‘उस की चिंता न कर. मुझे बता दे, क्याक्या बनेगा.’’

‘‘अम्माजी, आप सारा खाना कैसे बना पाएंगी? वैसे ही आप की तबीयत ठीक नहीं रहती है.’’

‘‘बहू, तू क्या मुझे हमेशा बुढि़या और बीमार ही बनाए रखेगी?’’

‘‘अम्माजी मैं…मैं…तो…’’

‘‘हां, तू. मुझे इधर कई दिनों से लग रहा है कि कुछ न करना ही मेरी सब से बड़ी बीमारी है, और सारे दिन पड़ेपड़े कुढ़ना मेरा बुढ़ापा. जब मैं कुछ काम में लग जाती हूं तो मुझे लगता है मेरी बीमारी ठीक हो गई है और बुढ़ापा कोसों दूर चला गया है.’’

‘‘अम्माजी, यह आप कह रही हैं?’’ उर्मिल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.

‘‘हां, मैं. इधर कुछ दिनों से तू ने देखा नहीं कि मेरी तबीयत कितनी सुधर गई है. तू चिंता न कर. मैं बिलकुल ठीक हूं. तुझे जहां जाना है जा. आज शाम को सुधीर के साथ किसी पार्टी में भी जाना है न? मेरी वजह से कार्यक्रम स्थगित मत करना. यहां का सब काम मैं देख लूंगी.’’

‘‘ओह अम्माजी,’’  उर्मिल अम्माजी से लिपट गई और रो पड़ी.

‘‘यह क्या, पगली, रोती क्यों है?’’ अम्माजी ने उसे थपथपाते हुए कहा.

‘‘अम्माजी, मेरे कान कब से यह सुनने को तरस रहे थे कि आप बूढ़ी नहीं हैं और काम कर सकती हैं. मैं ने इस बीच आप से जो कठोर व्यवहार किया, उस के लिए क्षमा चाहती हूं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. चल जा, जल्दी उठ. क्लब की मीटिंग का समय हो रहा है.’’

‘‘अम्माजी, अब तो नहीं जाऊंगी आज. हां, आज बाजार हो आती हूं. बच्चों की किताबें और सुधीर के लिए शर्ट लेनी है.’’

‘‘तो बाजार ही हो आ. रमा को भी फोन कर देती तो दोनों मिल कर चली जातीं.’’

‘‘अम्माजी, प्रणाम. आप ने याद किया और रमा हाजिर है.’’

‘‘अरी, तू कब से यहां खड़ी थी?’’

‘‘अभी, बस 2 मिनट पहले आई थी.’’

‘‘तो छिप कर हमारी बातें सुन रही थी, चोर कहीं की.’’

‘‘क्या करती? तुम सासबहू की बातचीत ही इतनी दिलचस्प थी कि अपने को रोकना जरूरी लगा.’’

‘‘तुम दोनों बैठो, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ अम्माजी रसोई की ओर बढ़ गईं.

मैं अपने को रोक न पाई. उर्मिल से पूछ ही बैठी, ‘‘यह सब क्या हो रहा था? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया. यह माफी कैसी मांगी जा रही थी?’’

‘‘रमा, याद है, उस दिन, तू मुझ से बारबार मेरे बदले हुए व्यवहार का कारण पूछ रही थी. बात यह है रमा, अम्माजी के सिर पर दो भूत सवार थे. उन्हें उतारने के लिए मुझे नाटक करना पड़ा.’’

‘‘दो भूत? नाटक? यह सब क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा. पहेलियां न बुझा, साफसाफ बता.’’

‘‘बता तो रही हूं, तू उतावली क्यों है? अम्माजी के सिर पर चढ़ा पहला भूत था उन का यह समझ लेना कि बहू आ गई है, उस का कर्तव्य है कि वह प्राणपण से सास की सेवा और देखभाल करे, और सास होने के नाते उन का अधिकार है दिनभर बैठे रहना और हुक्म चलाना. अम्माजी अच्छीभली चलफिर रही होती थीं तो भी अपने इन विचारों के कारण चायदूध का समय होते ही बिस्तर पर जा लेटतीं ताकि मैं सारी चीजें उन्हें बिस्तर पर ही ले जा कर दूं. उन के जूठे बरतन मैं ही उठा कर रखती थी. मेरे द्वारा बरतन उठाते ही वे फिर उठ बैठती थीं और इधरउधर चहलकदमी करने लगती थीं.’’

‘‘अच्छा, दूसरा भूत कौन सा था?’’

‘‘दूसरा भूत था हरदम बीमार रहने का. उन के दिमाग में घुस गया था कि हर समय उन को कुछ न कुछ हुआ रहता है और कोई उन की परवा नहीं करता. डाक्टर भी जाने कैसे लापरवाह हो गए हैं. न जाने कैसी दवाइयां देते हैं, फायदा ही नहीं करतीं.’’

‘‘भई, इस उम्र में कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है. अम्माजी दुबली भी तो हो गई हैं,’’ मैं कुछ शिकायती लहजे में बोली.

‘‘मैं इस से कब इनकार करती हूं, पर यह तो प्रकृति का नियम है. उम्र के साथसाथ शक्ति भी कम होती जाती है. मुझे ही देख, कालेज के दिनों में जितनी भागदौड़ कर लेती थी उतनी अब नहीं कर सकती, और जितनी अब कर लेती हूं उतनी कुछ समय बाद न कर सकूंगी. पर इस का यह अर्थ तो नहीं कि हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाऊं,’’ उर्मिल ने मुझे समझाते हुए कहा.

‘‘अम्माजी की सब से बड़ी बीमारी है निष्क्रियता. उन के मस्तिष्क में बैठ गया था कि वे हर समय बीमार रहती हैं, कुछ नहीं कर सकतीं. अगर मैं अम्माजी की इस भावना को बना रहने देती तो मैं उन की सब से बड़ी दुश्मन होती. आदमी कामकाज में लगा रहे तो अपने दुखदर्द भूल जाता है और शरीर में रक्त का संचार बढ़ता है, जिस से वह स्वस्थ अनुभव करता है, और फिर व्यस्त रहने से चिड़चिड़ाता भी नहीं रहता.’’

मुझे अचानक हंसी आ गई. ‘‘ले भई, तू ने तो डाक्टरी, फिलौसफी सब झाड़ डाली.’’

‘‘तू चाहे जो कह ले, असली बात तो यही है. अम्माजी को अपने दो भूतों के दायरे से निकालने का एक ही उपाय था कि…’’

‘‘तू उन की अवहेलना करे, उन्हें गुस्सा दिलाए जिस से चिढ़ कर वे काम करें और अपनी शक्ति को पहचानें. यही न?’’  मैं ने वाक्य पूरा कर दिया.

‘‘हां, तू ने ठीक समझा. यद्यपि गुस्सा और उत्तेजना शरीर और हृदय के लिए हानिकारक समझे जाते हैं पर कभीकभी इन का होना भी मनुष्य के रक्तसंचार को गति देने के लिए आवश्यक है. एकदम ठंडे मनुष्य का तो रक्त भी ठंडा हो जाता है. बस, यही सोच कर मैं अम्माजी को जानबूझ कर उत्तेजित करती थी.’’

‘‘कहती तो तू ठीक है.’’

‘‘तू मेरे नानाजी से तो मिली है न?’’

‘‘हां, शादी से पहले मिली थी एक बार.’’

‘‘जानती है, कुछ दिनों में वे 95 वर्ष के हो जाएंगे. आज भी वे कचहरी जाते हैं. जितना कर पाते हैं, काम करते हैं. कई बार रातरातभर अध्ययन भी करते हैं. अब भी दोनों समय घूमने जाते हैं.’’

‘‘इस उम्र में भी?’’  मुझे आश्चर्य हो रहा था.

‘‘हां, उन की व्यस्तता ही आज भी उन्हें चुस्त रखे हुए है. भले ही वे बीमार से रहते हैं, फिर भी उन्होंने उम्र से हार नहीं मानी है.’’

मैं ने आंख भर कर अपनी इस सहेली को देखा जिस की हर टेढ़ी बात में भी कोई न कोई अच्छी बात छिपी रहती है. ‘‘अच्छा एक बात तो बता, क्या जीजाजी को पता था? उन्हें अपनी मां के प्रति तेरा यह रूखा व्यवहार चुभा नहीं?’’

‘‘उन्होंने एकदो बार कहा, पर मैं ने उन्हें यह कह कर चुप करा दिया कि यह सासबहू का मामला है, आप बीच में न ही बोलें तो अच्छा है.’’

मैं चाय पीते समय कभी हर्ष और आत्मसंतोष से दमकते अम्माजी के चेहरे को देख रही थी, कभी उर्मिल को. आज फिर एक बार उस का बदला रूप देख कर पिछले माह की उर्मिल से तालमेल बैठाने का प्रयत्न कर रही थी.

इंग्लिश रोज: क्या सच्चा था विधि के लिए जौन का प्यार

Story in hinवह आज भी वहीं खड़ी है. जैसे वक्त थम गया है. 10 वर्ष कैसे बीत जाते हैं…? वही गांव, वही शहर, वही लोग…यहां तक कि फूल और पत्तियां तक नहीं बदले. ट्यूलिप्स, सफेद डेजी, जरेनियम, लाल और पीले गुलाब सभी उस की तरफ ठीक वैसे ही देखते हैं जैसे उस की निगाह को पहचानते हों. चौश्चर काउंटी के एक छोटे से गांव नैनटविच तक सिमट कर रह गई उस की जिंदगी. अपनी आरामकुरसी पर बैठ वह उन फूलों का पूरा जीवन अपनी आंखों से जी लेती है. वसंत से पतझड़ तक पूरी यात्रा. हर ऋतु के साथ उस के चेहरे के भाव भी बदल जाते हैं, कभी उदासी, कभी मुसकराहट. उदासी अपने प्यार को खोने की, मुसकराहट उस के साथ समय व्यतीत करने की. उसे पूरी तरह से यकीन हो गया था कि सभी के जीवन का लेखाजोखा प्रकृति के हाथ में ही है. समय के साथसाथ वह सब के जीवन की गुत्थियां सुलझाती जाती है. वह संतुष्ट थी. बेशक, प्रकृति ने उसे, क्वान्टिटी औफ लाइफ न दी हो किंतु क्वालिटी औफ लाइफ तो दी ही थी, जिस के हर लमहे का आनंद वह जीवनभर उठा सकेगी.

यह भी तो संयोग की ही बात थी, तलाक के बाद जब वह बुरे वक्त से निकल रही थी, उस की बड़ी बहन ने उसे छुट्टियों में लंदन बुला लिया था. उस की दुखदाई यादों से दूर नए वातावरण में, जहां उस का मन दूसरी ओर चला जाए. 2 महीने बाद लंदन से वापसी के वक्त हवाईजहाज में उस के साथ वाली कुरसी पर बैठे जौन से उस की मुलाकात हुई. बातोंबातों में जौन ने बताया कि रिटायरमैंट के बाद वे भारत घूमने जा रहे हैं. वहां उन का बचपन गुजरा था. उन के पिता ब्रिटिश आर्मी में थे. 10 वर्ष पहले उन की पत्नी का देहांत हो गया. तीनों बच्चे शादीशुदा हैं. अब उन के पास समय ही समय है. भारत से उन का आत्मीय संबंध है. मरने से पहले वे अपना जन्मस्थान देखना चाहते हैं, यह उन की हार्दिक इच्छा है. उन्होंने फिर उस से पूछा, ‘‘और तुम?’’

‘‘मैं भारत में ही रहती हूं. छुट्टियों में लंदन आई थी.’’

‘‘मैं भारत घूमना चाहता हूं. अगर किसी गाइड का प्रबंध हो जाए तो मैं आप का आभारी रहूंगा,’’ जौन ने निवेदन करते कहा.

‘‘भाइयों से पूछ कर फोन कर दूंगी,’’ विधि ने आश्वासन दिया. बातोंबातों में 8 घंटे का सफर न जाने कैसे बीत गया. एकदूसरे से विदा लेते समय दोनों ने टैलीफोन नंबर का आदानप्रदान किया. दूसरे दिन अचानक जौन सीधे विधि के घर पहुंच गए. 6 फुट लंबी देह, कायदे से पहनी गई विदेशी वेशभूषा, काला ब्लेजर और दर्पण से चमकते जूते पहने अंगरेज को देख कर सभी चकित रह गए. विधि ने भाइयों से उस का परिचय करवाते कहा, ‘‘भैया, ये जौन हैं, जिन्हें भारत में घूमने के लिए गाइड चाहिए.’’

‘‘गाइड? गाइड तो कोई है नहीं ध्यान में.’’

‘‘विधि, तुम क्यों नहीं चल पड़ती?’’ जौन ने सुझाव दिया. प्रश्न बहुत कठिन था. विधि सोच में पड़ गई. इतने में विधि का छोटा भाई सन्नी बोला, ‘‘हांहां, दीदी, हर्ज की क्या बात है.’’

‘‘थैंक्यू सन्नी, वंडरफुल आइडिया. विधि से अधिक बुद्धिमान गाइड कहां मिल सकता है,’’ जौन ने कहा. 2 सप्ताह तक दक्षिण भारत के सभी पर्यटन स्थलों को देखने के बाद दोनों दिल्ली पहुंचे. उस के एक सप्ताह बाद जौन की वापसी थी. जाने से पहले तकरीबन रोज मुलाकात हो जाती. किसी कारणवश जौन की विधि से बात न हो पाती तो वह अधीर हो उठता. उस की बहुमुखी प्रतिभा पर जौन मरमिटा था. वह गुणवान, स्वाभिमानी, साहसी और खरा सोना थी. विधि भी जौन के रंगीले, सजीले, जिंदादिल व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई. उस की उम्र के बारे में सोच कर रह जाती. जौन 60 वर्ष पार कर चुका था. विधि ने अभी 35 वर्ष ही पूरे किए थे. लंदन लौटने से 2 दिन पहले, शाम को टहलतेटहलते भरे बाजार में घुटनों के बल बैठ कर जौन ने अपने मन की बात विधि से कह डाली, ‘‘विधि, जब से तुम से मिला हूं, मेरा चैन खो गया है. न जाने तुम में ऐसा कौन सा आकर्षण है कि मैं इस उम्र में भी बरबस तुम्हारी ओर खिंचा आया हूं.’’ इस के बाद जौन ने विधि की ओर अंगूठी बढ़ाते हुए प्रस्ताव रखा, ‘‘विधि, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’

विधि निशब्द और स्तब्ध सी रह गई. यह तो उस ने कभी नहीं सोचा था. कहते हैं न, जो कभी खयालों में हमें छू कर भी नहीं गुजरता, वो, पल में सामने आ खड़ा होता है. कुछ पल ठहर कर विधि ने एक ही सांस में कह डाला, ‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता. हम एकदूसरे के बारे में जानते ही कितना हैं, और तुम जानते भी हो कि तुम क्या कह रहे हो?’’ ‘‘हांहां, भली प्रकार से जानता हूं, क्या कह रहा हूं. तुम बताओ, बात क्या है? मैं तुम्हारे संग जीवन बिताना चाहता हूं.’’ विधि चुप रही.

जौन ने परिस्थिति को भांपते कहा, ‘‘यू टेक योर टाइम, कोई जल्दी नहीं है.’’ 2 दिनों बाद जौन तो चला गया किंतु उस के इस दुर्लभ प्रश्न से विधि दुविधा में थी. मन में उठते तरहतरह के सवालों से जूझती रही, ‘कब तक रहेगी भाईभाभियों की छत्रछाया में? तलाकशुदा की तख्ती के साथ क्या समाज तुझे चैन से जीने देगा? कौन होगा तेरे दुखसुख का साथी? क्या होगा तेरा अस्तित्व? क्या उत्तर देगी जब लोग पूछेंगे इतने बूढ़े से शादी की है? कोई और नहीं मिला क्या?’ इन्हीं उलझनों में समय निकलता गया. समय थोड़े ही ठहर पाया है किसी के लिए. दोनों की कभीकभी फोन पर बात हो जाती थी एक दोस्त की तरह. कालेज में भी खोईखोई रहती. एक दिन उस की सहेली रेणु ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘विधि, जौन के जाने के बाद तू तो गुमसुम ही हो गई. बात क्या है?’’

‘‘जाने से पहले जौन ने मेरे सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था.’’

‘‘पगली…बात तो गंभीर है पर गौर करने वाली है. भारतीय पुरुषों की मनोवृत्ति तो तू जान ही चुकी है. अगर यहां कोई मिला तो उम्रभर उस के एहसानों के नीचे दबी रहेगी. उस के बच्चे भी तुझे स्वीकार नहीं करेंगे.

जौन की आंखों में मैं ने तेरे लिए प्यार देखा है. तुझे चाहता है. उस ने खुद अपना हाथ आगे बढ़ाया है. अपना ले उसे. हटा दे जीवन से यह तलाक की तख्ती. तू कर सकती है. हम सब जानते हैं कि बड़ी हिम्मत से तू ने समाज की छींटाकशी की परवा न करते हुए अपने पंथ से जरा भी विचलित नहीं हुई. समाज में अपना एक स्थान बनाया है. अब नए रिश्ते को जोड़ने से क्यों हिचकिचा रही है. आगे बढ़. खुशियों ने तुझे आमंत्रण दिया है. ठुकरा मत, औरत को भी हक है अपनी जिंदगी बदलने का. बदल दे अपनी जिंदगी की दिशा और दशा,’’ रेणु ने समझाते हुए कहा. ‘‘क्या करूं, अपनी दुविधाओं के क्रौसरोड पर खड़ी हूं. वैसे भी, मैं ने तो ‘न’ कर दी है,’’ विधि ने कहा. ‘‘न कर दी है, तो हां भी की जा सकती है. तेरा भी कुछ समझ में नहीं आता. एक तरफ कहती है, जौन बड़ा अलग सा है. मेरी बेमानी जरूरतों का भी खयाल रखता है. बड़ी ललक से बात करता है. छोटीछोटी शरारतों से दिल को उमंगों से भर देता है. मुझे चहकती देख कर खुशी से बेहाल हो जाता है. मेरे रंगों को पहचानने लगा है. तो फिर झिझक क्यों रही है?’’

‘‘उम्र देखी है? 60 वर्ष पार कर चुका है. सोच कर डर लगता है, क्या वह वैवाहिक सुख दे पाएगा मुझे?’’ ‘‘आजमा कर देख लेती? मजाक कर रही हूं. यह समय पर छोड़ दे. यह सोच कि तेरी आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. तेरा अपना घर होगा जहां तू राज करेगी. ठंडे दिमाग से सोचना…’’ ‘‘डर लगता है कहीं विदेशी चेहरों की भीड़ में खो तो नहीं जाऊंगी. धर्म, सोच, संस्कृति, सभ्यता, कुछ भी तो नहीं है एकजैसा हमारा. फिर इतनी दूर…’’ ‘‘प्रेम उम्र, धर्म, भाषा, रंग और जाति सभी दीवारों को गिराने की शक्ति रखता है. मेरी प्यारी सखी, प्यार में दूरियां भी नजदीकियां हो जाती हैं. अभी ईमेल कर उसे, वरना मैं कर देती हूं.’’

‘‘नहींनहीं, मैं खुद ही कर लूंगी,’’ विधि ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘डियर जौन,di

मैं ने आप के प्रस्ताव पर विचार किया. कोई भी नया रिश्ता जोड़ने से पहले एकदूसरे के बीते जीवन के बारे में जानना बहुत जरूरी है. ऐसी मेरी सोच है. 10 वर्ष पहले मेरा विवाह एक बहुत रईस घर में संपन्न हुआ. मेरी ससुराल का मेरे रहनसहन, सोचविचार और संस्कारों से कोई मेल नहीं था. वहां के तौरतरीकों के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी. वहां मुझे लगा कि मैं चूहेदानी में फंस गई हूं. मेरे पति शराब और ऐयाशी में डूबे रहते थे. शराब पी कर वे बेलगाम घुड़साल के घोड़े की तरह हो जाते थे, जिस का मकसद सवार को चोट पहुंचाना था. ऐसा हर रोज का सिलसिला था. हर रात अलगअलग औरतों से रंगरेलियां मनाते थे.

धीरेधीरे बात यहां तक पहुंच गई कि वे ग्रुपसैक्स की क्रियाओं में भाग लेने लगे. जबरदस्ती मुझ से भी औरों के साथ हमबिस्तर होने की अपेक्षा करने लगे. उन के अनुकूल उन की बात मानते जाओ तो ठीक था वरना कहते, ‘हम मर्द अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे औरतों को अपने हिसाब से रखा जाए.’ ‘‘एक साधारण सी लड़की के लिए कितना कठिन था यह. एक दिन जब मैं ने किसी और के साथ हमबिस्तर होने से इनकार किया तो मुझे घसीट कर सामने बिठा कर सबकुछ देखने को मजबूर कर दिया. उस दिन मैं ने बरदाश्त की सभी सीमाएं लांघ कर उन के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया और सामान उठा कर भाई के घर चली आई. पैसे और मनगढ़ंत कहानियों के बल पर मेरा बेटा उन्होंने अपने पास रख लिया. उस दिन के बाद आज तक मैं अपने बेटे को देख नहीं पाई. अब सबकुछ जानते हुए भी आप तैयार हैं तो आप मेरे बड़े भाईसाहब अजय से बात करें.’’

‘‘आप की विधि’’

विधि का ईमेल पढ़ कर जौन नाचने लगा. तुरंत ही उस ने उत्तर दिया,

‘‘मेरी प्यारी विधि,

बस, इतनी सी बात से परेशान हो. जीवन में हादसे सभी के साथ होते हैं. मैं ने तो तुम से पूछा तक नहीं. तुम ने बता दिया तो मेरे मन में तुम्हारे लिए इज्जत और बढ़ गई. मेरी जान, मैं ने तुम्हें चाहा है. मैं स्त्री और पुरुष की समानता में विश्वास रखता हूं. तुम मेरी जीवनसाथी ही नहीं, पगसाथी भी होगी. जिन खुशियों से तुम वंचित रही हो, मैं उन की भरपाई की पूरी कोशिश करूंगा. मैं अगली फ्लाइट से दिल्ली पहुंच रहा हूं.

‘‘प्यार सहित

‘‘तुम्हारा जौन.’’

वह दिल्ली आ पहुंचा. होटल में विधि के बड़े भाईसाहब को बुला कर ईमेल दिखाते हुए उन से विधि का हाथ मांगा. भाईसाहब ने कहा, ‘‘शाम को तुम घर आ जाना.’’ पूरा परिवार बैठक में उस की प्रतीक्षा कर रहा था. जौन का प्रस्ताव सामने रखा गया. सभी हैरान थे. सन्नी तैश में आ कर बोला, ‘‘इतने बूढ़े से…? दिमाग खराब हो गया है क्या. जाहिर है विधि की उम्र के उस के बच्चे होंगे. अंगरेजों का कोई भरोसा नहीं.’’ बाकी बहनभाई भी सन्नी की बात से सहमत थे.

‘‘तुम ने क्या सोचा?’’ बड़े भाई अजय ने विधि से पूछा.

‘‘मुझे कोई एतराज नहीं,’’ उस ने कहा.

‘‘दीदी, होश में तो हो, क्या सचमुच सठियाए से शादी…?’’ विधि के हां करते ही अजय ने जौन को बुला कर कहा, ‘‘शादी तय करने से पहले हमारी कुछ शर्तें हैं. शादी हिंदू रीतिरिवाजों से होगी. उस के लिए तुम्हें हिंदू बनना होगा. हिंदू नाम रखना होगा. विवाह के बाद विधि को लंदन ले जाना होगा.’’ जौन को सब शर्तें मंजूर थीं. वह उत्तेजना से ‘आई विल, आई विल’ कहता नाचने लगा. पुरुष चहेती स्त्री को पाने का हर संभव प्रयास करता है. उस में साम, दाम, दंड, भेद सभी भाव जायज हैं. अच्छा सा मुहूर्त देख कर उन का विवाह संपन्न हआ. जौन लंदन से इमीग्रेशन के लिए जरूरी कागजात ले कर आया था. विधि का पासपोर्ट तैयार ही हो रहा था कि अचानक जौन के बेटे मार्क का ऐक्सिडैंट होने के कारण, जौन को विधि के बिना ही लंदन जाना पड़ा. जौन तो चला गया. विधि का मन बेईमान होने लगा. उसे घबराहट होने लगी. मन में अनेक प्रश्न उठने लगे. किसी से शिकायत भी तो नहीं कर सकती थी. 6 महीने से ऊपर हो गए. उधर जौन बहुत बेचैन था, चिंतित था. वह बारबार रेणु को ईमेल कर के पूछता. एक दिन हार कर रेणु विधि के घर आ ही पहुंची और उसे बहुत डांटा, ‘‘विधि, क्या मजाक बना रखा है, क्यों उस बेचारे को परेशान कर रही हो? तुम्हें पता भी है कितनी मेल डाल चुका है. कहतेकहते थक गया है कि आप विधि को समझाएं और कहें ‘डर की कोई बात नहीं है. मैं उसे पलकों पर बिठा कर रखूंगा.’ ‘‘अब गुमसुम क्यों बैठी हो. कुछ तो बोलो. यह तुम्हारा ही फैसला था. अब तुम्हीं बताओ, क्या जवाब दूं उसे?’’

‘‘मैं बहुत उलझन में हूं. परेशान हूं. खानापीना, उठनाबैठना बिलकुल अलग होगा. फिर उस के बच्चे…? क्या वे स्वीकार करेंगे मुझे…?’’

‘‘विधि, तुम बेकार में भावनाओं के द्वंद्व में डूबतीउतरती रहती हो. यह तो तुम्हें वहीं जा कर पता लगेगा. हम सब जानते हैं, तुम हर स्थिति को आसानी से हैंडल कर सकती हो. ऐसा भी होता है  कभीकभी सबकुछ सही होते हुए भी, लगता है कुछ गलत है. तू बिना कोशिश किए पीछे नहीं मुड़ सकती. चिंता मत कर. अभी जौन को मेल करती हूं कि तुझे आ कर ले जाए.’’ जौन को मेल करते ही एक हफ्ते में वह दिल्ली आ पहुंचा. 2 हफ्ते में विधि को लंदन भी ले गया. लंदन में घर पहुंचते ही जौन ने अंगरेजी रिवाजों के अनुसार विधि को गोद में उठा कर घर की दहलीज पार की. अंदर पहुंचते ही वह हतप्रभ रह गई. अकेले होते हुए भी जौन ने घर बहुत तरतीब और सलीके से रखा था. सुरुचिपूर्ण सजाया था. घर में सभी सुविधाएं थीं, जैसे कपड़े धोने की मशीन, ड्रायर, स्टोव, डिशवाशर और औवन…काटेज के पीछे एक छोटा सा गार्डन था जो जौन का प्राइड ऐंड जौय था. पहली ही रात को जौन ने विधि को एक अनमोल उपहार देते हुए कहा, ‘‘विधि, मैं तुम्हें क्रूर संसार की कोलाहल से दूर, दुनिया के कटाक्षों से हटा कर अपने हृदय में रखने के लिए लाया हूं. तुम से मिलने के बाद तुम्हारी मुसकान और चिरपरिचित अदा ही तो मुझे चुंबक की तरह बारबार खींचती रही है और मरते दम तक खींचती रहेगी. मैं तुम्हें इतना प्यार दूंगा कि तुम अपने अतीत को भूल जाओगी. मैं तुम्हारा तुम्हारे घर में स्वागत करता हूं.’’ इतना कह कर जौन ने उसे सीने से लगा लिया और यह सब सुन कर विधि की आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे.

ऐसे प्रेम का एहसास उसे पहली बार हुआ था. धीरेधीरे वह जान पाई कि जौन केवल गोराचिट्टा, ऊंचे कद का ही नहीं, वह रोमांटिक, सलोना, जिंदादिल, शरारती और मस्त इंसान है जो बातबात में किसी को भी अपना बनाने का हुनर जानता है. उस का हृदय जीवन की आकांक्षाओं से धड़क उठा. जौन ने उसे इतना प्यार दिया कि जल्दी ही उस की सब शंकाएं दूर हो गईं. विधि उसे मन से चाहने लगी थी. दोनों बेहद खुश थे. वीकेंड में जौन के तीनों बच्चों ने खुली बांहों से विधि का स्वागत किया और अपने पिता के विवाह पर एक भव्य पार्टी दी. विधि अपने फैसले पर प्रसन्न थी. अब उस का अपना घर था. अलग परिवार था. असीम प्यार देने वाला पति. जौन ने घर की बागडोर उसी के हाथ में थमा दी थी. उसे प्यार करना सिखाया, उस का आत्मविश्वास जगाया यहां तक कि उसे पोस्टग्रेजुएशन भी करवा दिया. क्योंकि भीतर से वह जानता था कि उस के जाने के बाद विधि अपने समय का सदुपयोग कर सकेगी.

गरमी का मौसम था. चारों ओर सतरंगी फूल लहलहा रहे थे. दोपहर के खाने के बाद दोनों कुरसियां डाल कर गार्डन में धूप सेंकने लगे. बाहर बच्चे खेल रहे थे. बच्चों को देखते विधि की ममता उमड़ने लगी. जौन की पैनी नजरों से यह बात छिपी नहीं. जौन ने पूछ ही लिया, ‘‘विधि, हमारा बच्चा चाहिए…? हो सकता है. मैं ने पता कर लिया है. पूरे 9 महीने डाक्टर की निगरानी में रह कर. मैं तैयार हूं.’’

‘‘नहींनहीं, हमारे हैं तो सही, वो 3, और उन के बच्चे. मैं ने तो जीवन के सभी अनुभवों को भोगा है. मां बन कर भी, अब नानीदादी का सुख भोग रही हूं,’’ विधि ने हंसतेहंसते कहा. ‘‘मैं तो समझा था कि तुम्हें मेरी निशानी चाहिए?’’ जौन ने विधि को छेड़ते हुए कहा, ‘‘ठीक है, अगर बच्चा नहीं तो एक सुझाव देता हूं. बच्चों से कहेंगे मेरे नाम का एक (लाल गुलाब) इंग्लिश रोज और तुम्हारे नाम का (पीला गुलाब) इंडियन समर हमारे गार्डन में साथसाथ लगा दें. फिर हम दोनों सदा एकदूसरे को प्यार से देखते रहेंगे.’’ इतना कह कर जौन ने प्यार से उस के गाल पर चुंबन दे दिया.

विधि भी होंठों पर मुसकान, आंखों में मोती जैसे खुशी के आंसू, और प्यार की पूरी कशिश लिए जौन के आगोश में आ गई. जौन विधि की छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखता. धीरेधीरे विधि के पूरे जीवन को उस ने अपने प्यार के आंचल से ढक लिया. सामाजिक बैठकों में उसे अदब और शिष्टाचार से संबोधित करता. उसे जीजी करते उस की जबान न थकती. कुछ ही वर्षों में जौन ने उसे आधी दुनिया की सैर करा दी थी. अब विधि के जीवन में सुख ही सुख थे. हंसीखुशी 10 साल बीत गए. इधर, कई महीनों से जौन सुस्त था. विधि को भीतर ही भीतर चिंता होने लगी, सोचने लगी, ‘कहां गई इस की चंचलता, चपलता, यह कभी टिक कर न बैठने वाला, यहांवहां चुपचाप क्यों बैठा रहता है? डाक्टर के पास जाने को कहो तो टालते हुए कहता है, ‘‘मेरा शरीर है, मैं जानता हूं क्या करना है.’’ भीतर से वह खुद भी चिंतित था. एक दिन बिना बताए ही वह डाक्टर के पास गया. कई टैस्ट हुए. डाक्टर ने जो बताया, उसे उस का मन मानने को तैयार नहीं था. वह जीना चाहता था. उस ने डाक्टर से कहा, ‘‘वह नहीं चाहता कि उस की यह बीमारी उस के और उस की पत्नी की खुशी में आड़े आए. समय कम है, मैं अब अपनी पत्नी के लिए वह सबकुछ करना चाहता हूं, जो अभी तक नहीं कर पाया. मैं नहीं चाहता मेरे परिवार को मेरी बीमारी का पता चले. समय आने पर मैं खुद ही उन्हें बता दूंगा.’’

अचानक एक दिन जौन वर्ल्ड क्रूज के टिकट विधि के हाथ में थमाते बोला, ‘‘यह लो तुम्हारा शादी की 10वीं वर्षगांठ का तोहफा.’’ उस की जीहुजूरी ही खत्म नहीं होती थी. विधि का जीवन उस ने उत्सव सा बना दिया था. वर्ल्ड क्रूज से लौटने के बाद दोनों ने शादी की 10वीं वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाई. घर की रजिस्ट्री के कागज और एफडीज उस ने विधि के नाम करवा कर उसे तोहफे में दे दिए. उस रात वह बहुत बेचैन था. उसे बारबार उलटी हो रही थी और चक्कर आते रहे. जल्दी से उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे भरती कर लिया गया. जौन की दशा दिनबदिन बिगड़ती गई. डाक्टर ने बताया, ‘‘उस का कैंसर फैल चुका है. कुछ ही समय की बात है.’’

‘‘कैंसर…?’’ कैंसर शब्द सुन कर सभी निशब्द थे. ‘‘तुम्हारे डैड, जाने से पहले, तुम्हारी मां को उम्रभर की खुशियां देना चाहते थे. तुम्हें बताने के लिए मना किया था,’’ डाक्टर ने बताया. बच्चे तो घर चले गए. विधि नाराज सी बैठी रही. जौन ने उस का हाथ पकड़ कर बड़े प्यार से समझाया, ‘‘जो समय मेरे पास रह गया था, मैं उसे बरबाद नहीं करना चाहता था, भोगना चाहता था तुम्हारे साथ. तुम्हारे आने से पहले मैं जीवन बिता रहा था. तुम ने जीना सिखा दिया है. अब मैं जिंदगी से रिश्ता चैन से तोड़ सकता हूं. जाना तो एक दिन सभी को है.’’ एक वर्ष तक इलाज चलता रहा. कैंसर इतना फैल चुका था कि अब कोई कुछ नहीं कर सकता था. अपनी शादी की 11वीं वर्षगांठ से पहले ही जौन चल बसा. अंतिम संस्कार के बाद उस के बेटे ने जौन की इच्छानुसार उस की राख को गार्डन में बिखरा दिया. एक इंग्लिश रोज और एक इंडियन समर (पीला गुलाब) साथसाथ लगा दिए. उन्हें देखते ही विधि को जौन की बात याद आई, ‘कम से कम तुम्हें हर वक्त देखता तो रहूंगा?’ इस सदमे को सहना कठिन था. विधि को लगा मानो किसी ने उस के शरीर के 2 टुकड़े कर दिए हों. एक बार वह फिर अकेली हो गई. एक दिन उस के अंतकरण से आवाज आई, ‘उठ विधि, संभाल खुद को, तेरे पास जौन का प्यार है, स्मृतियां हैं. वह तुझे थोड़े समय में जहानभर की खुशियां दे गया है.’ धीरेधीरे वह संभलने लगी. जौन के बच्चों के सहयोग और प्यार ने उसे फिर खड़ा कर दिया. कालेज में उसे नौकरी भी मिल गई. बाकी समय में वह गार्डन की देखभाल करती. इंग्लिश रोज और इंडियन समर की कटाईछंटाई करने की उस की हिम्मत न पड़ती. उस के लिए माली को बुला लेती. गार्डन जौन की निशानी था. एक दिन भी ऐसा न जाता, विधि अपने गार्डन को न निहारती, पौधों को न सहलाती. अकसर उन से बातें करती. बर्फ पड़े, कोहरा पड़े या फिर कड़कती सर्दी, वह अपने फ्रंट डोर से जौन के लगाए पौधों को निहारती रहती. उदासी में इंग्लिश रोज से शिकवेशिकायतें भी करती, ‘खुद तो अपने लगाए परिवार में लहलहा रहे हो और मैं? नहीं, नहीं, मैं शिकायत नहीं कर रही. मुझे याद है आप ने ही कहा था, ‘यह मेरा परिवार है डार्लिंग. मुझे इन से अलग मत करना.’

उस दिन सोचतेसोचते अंधेरा सा होने लगा. उस ने घड़ी देखी, अभी शाम के 4 ही बजे थे. मरियल सी धूप भी चोरीचोरी दीवारों से खिसकती जा रही थी. वह जानती थी यह गरमी के जाने और पतझड़ के आने का संदेशा था. वह आंखें मूंद कर घास पर बिछे रंगबिरंगों पत्तों की कुरमुराहट का आनंद ले रही थी. अचानक तेज हवा के झरोखे से एक सूखा पत्ता उलटतापलटता उस के आंचल में आ अटका. पलभर को उसे लगा, कोई उसे छू कर कह रहा हो… ‘डार्लिंग, उदास क्यों होती हो, मैं यही हूं तुम्हारे चारों ओर, देखो वहीं हूं, जहां फूल खिलते हैं…क्यों खिलते हैं? यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जरूर जानता हूं, फूल खिलता है, झड़ जाता है. क्यों? यह कोई नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं इंग्लिश रोज जिस के लिए खिलता है उसी के लिए मर जाता है. खिले फूल की सार्थकता और मरे फूल की व्यथा एक को ही अर्पित है.’

उस दिन वह झड़ते फूलों को तब तक निहारती रही जब तक अंधेरे के कारण उसे दिखाई देना न बंद हो गया. हवा के झोंके से उसे लगा, मानो जौन पल्लू पकड़ कर कह रहा हो, ‘आई लव यू माई इंडियन समर.’ ‘‘मी टू, माई इंग्लिश रोज. तुम और तुम्हारा शरारतीपन अभी तक गया नहीं.’’ उस ने मुसकरा कर कहा.

दिल तो बच्चा है जी: वैशाली को मिली ऊषा की सीख

वैशाली को जबतब बेटी और बहू से उम्र के लिए टोंट पड़ते थे. इस कारण वह अपनी पसंद जाहिर ही नहीं कर पाई पर जब ऊषा ने उसे सीख दी तो वह उम्र के सारे बंधनों से आजाद हो गई. क्या थी वह सीख?

दुकानदार एक के बाद एक साडि़यां खोलखोल कर दिखा रहा था पर वैशाली की नजर लाल साड़ी पर अटक गई थी. लाल रंग की जमीन पर सुनहरी जरी से बेलबूटे का काम हो रखा था.

कपड़ा इतना हलका जैसे कुछ पहना ही न हो. तभी छोटी बेटी कायरा बोली, ‘‘अरे भैया, यह क्या डार्क कलर दिखा रहे हो, मम्मी की शादी की गोल्डन जुबली है.

कुछ सोबर और एलिगेंट दिखाएं.’’ बहू माही बोली, ‘‘मम्मी को तो ग्रे, क्रीम शेड बेहद पसंद हैं. ऐसा ही कुछ दिखाएं.’’ वैशाली बोलना चाहती थी कि वह अपने सारे शौक इस वर्षगांठ पर पूरे करना चाहती है.

तब वैशाली और पराग की 50 साल पहले शादी हुई थी तब तो उन के पास न इतने पैसे थे और न ही इतनी सुविधा थी. वैशाली ने शादी में चटक रानी रंग का आर्टिफिशियल सिल्क का लहंगा पहना था. उस लहंगे का रंग और काम उसे बिलकुल नहीं सुहाया था. एक लोकल से पार्लर ने उस का मेकअप किया था जिस कारण उस की ठीकठाक शक्ल भी हास्यपद लग रही थी.

आज जब वैशाली किसी की शादी देखती तो उस के मन के सोए अरमान जाग जाते थे. तब वैशाली 70 वर्ष की नहीं बस 20 वर्ष की तरह ही सोचने लगती थी. दोनों बच्चों की शादी में वैशाली की इतनी भागमभाग रही कि वह ठीक से तैयार भी नहीं हो पाई थी.

10 दिन बाद वैशाली और पराग की गोल्डन जुबली है. दोनों बच्चे अब अच्छे से सैटल हैं और यह बच्चों का ही आइडिया था कि गोल्डन जुबली को धूमधाम से मनाया जाए. यह सुनते ही वैशाली के अंदर दबी इच्छाओं को मानो पंख लग गए हों.

हर बार उस की इच्छाओं के पंख उम्र के तले दबा दिए जाते थे. वैशाली के सामने दुकानदार ने क्रीम, वाइट, ग्रे, पीच रंग की साडि़यों का अंबार लगा दिया था पर वैशाली को तो एक भी साड़ी जंच नहीं रही थी. उस का पूरा मूड चौपट हो गया था.

न जाने क्यों माही और कायरा बरबस उसे उस की उम्र का एहसास दिलाने पर तुली हुई हैं. हां वे हैं 70 वर्ष की पर इस दिल का क्या करें जो फिर से एक 20 वर्ष की दुलहन की तरह सजना चाहता है.

दुकान से बाहर निकलते हुए वैशाली के कानों में बेटी कायरा के शब्द पड़ गए थे, ‘‘मम्मी को तो न जाने क्या चाहिए, अरे इस उम्र में कौन इतना चूजी होता है.’’ मेरी सास भी इस उम्र में बालों की रिबौंडिंग, फैशन कलर और न जाने क्याक्या करवाती रहती हैं. तभी माही की आवाज आई, ‘‘शुड ऐज ग्रेसफुल्ली.’’ दोनों को पता ही नहीं चला कि वैशाली को उन की बातें साफसाफ सुनाई दे रही थीं.

वैशाली का मन खट्टा हो गया था. मतलब अब उन के बच्चों को उन का हेयर कलर करना भी खलता है. बच्चे क्या चाहते हैं कि वे 70 वर्ष की हो गई हैं तो पहननाओढ़ना छोड़ दें. माही और कायरा भी 40 वर्ष से ऊपर की ही हैं पर उन्होंने तो कभी उन के झबलेनुमा कपड़े देख कर व्यंग्य नहीं कसा. वहां से कार पार्लर की तरफ चल पड़ी.

माही बोली, ‘‘मम्मी, आप को क्याक्या सर्विस लेनी हैं, आप बता दो.’’ कायरा बोली, ‘‘भाभी, मम्मी क्या इस उम्र में प्रीब्राइडल पैकेज लेंगी?’’ ‘‘क्यों मम्मी?’’ ‘‘एक फेशियल ले लेंगी और आयब्रो करवा लेंगी.’’ ‘‘मैं खुद ही देख लूंगी, मम्मी को क्या पता?’’ दोनों ननदभाभी ने अपने लिए अच्छाखासा पैकेज लिया मानो एनिवर्सरी उन की ही हो और वैशाली के लिए एक साधारण सा पैक बुक कर दिया था.

जब पार्लर वाली लड़की ने कहा, ‘‘अरे मैम की एनिवर्सरी है, उन के लिए स्पैशल पैक लीजिए. ‘‘अपनी गोल्डन जुबली पर उन्हें एकदम दुलहन की तरह ग्लो करना चाहिए.’’ माही बोली, ‘‘अरे मम्मी को ये सब पसंद नहीं है और इन सब चौचलों से क्या उम्र छिप सकती है?’’

वैशाली मन ही मन सोच रही थी क्या यह बात उन दोनों पर लागू नहीं होती है. जब शाम को वे लोग घर पहुंचे तो पराग बाहर लौन में पौधों को पानी दे रहा था. उन के हाथ में पैकेट्स देख कर बोला, ‘‘लगता है पूरी मार्केट उठा कर ले आए हो.’’

कायरा छूटते ही बोली, ‘‘बस मम्मी के कपड़ों के अलावा. ‘‘न जाने इस उम्र में भी उन्हें क्या चाहिए?’’ रात को जब पराग कमरे में आया तो वैशाली से पूछा, ‘‘तुम्हारे चेहरे पर 12 क्यों बज रहे हैं?’’ ‘‘औरतें तो बहू और बेटी के आने पर खुश होती हैं और तुम बु झ गई हो.’’

वैशाली के सब्र का बांध टूट गया, रोंआसी सी बोली, ‘‘तुम ही बता दो, मु झे इस उम्र में कैसे व्यवहार करना चाहिए. तुम्हारी बेटी और बहू ने तो कोई कमी नहीं छोड़ी थी.’’ पराग को वैशाली के गुस्से का कारण सम झ नहीं आ रहा था. चिढ़ते हुए बोले, ‘‘अरे अब किस बात पर नाराज हो, जितने पैसे तुम ने कहा उतने दिए और चाहिए तो और ले लो पर ये ताने मत दो.’’

‘‘कल कायरा की सास भी आ जाएगी. उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि तुम उन के आने से खुश नहीं हो.’’ वैशाली का मूड और अधिक खराब हो गया था. कायरा की सास उसे फूटी आंख नहीं भाती थी. कायरा की सास ऊषा बेहद दबंग महिला थी.

पति के गुजरने के बाद भी वह खूब सजसंवर कर रहती थी. कायरा के साथसाथ वैशाली को भी ऊषा का इस तरह से सजना, ऊंची आवाज में होहो कर के हंसना, हमेशा पराग के साथ गप्पें लड़ाना बिलकुल पसंद नहीं था. पता नहीं क्यों वे ऐसा बच्चों जैसा व्यवहार करती हैं. अगर बेटी की सास न होती तो वैशाली ऊषा को घर में घुसने भी न देती पर क्या करे, रिश्ते से मजबूर हैं.

अगले दिन सुबह की फ्लाइट से ऊषा आ गई थी. नीली पैंट और लाल रंग की कुरती, लाल रंग की ही लिपस्टिक, केराटिन कराए हुए बाल, सलीके से किए हुए मेकअप के कारण ऊषा अपनी उम्र से 10 साल छोटी लग रही थी. वैशाली उसे देख कर मन ही मन जलभुन गई थी.

कायरा यह उम्र के प्रवचन अपनी सास को क्यों नहीं सुनाती? कौन कहेगा कि यह विधवा हैं. पता नहीं उसे अपने पति के मरने का दुख है भी या नहीं. ऊषा को देखते ही माही बोली, ‘‘आंटी, यू आर लुकिंग सो यंग एंड फ्रैश.’’ ऊषा बोली, ‘‘भई हमारे समधीसमधन की गोल्डन एनिवर्सरी है तो कुछ तो हमारा भी हक बनता है.’’ शाम को ऊषा ने अपने लाए हुए उपहार सब को दिखाए.

फिर एक पैकेट में से दो साडि़यां निकालते हुए बोली, ‘‘वैशाली आप कोई भी एक साड़ी पसंद कर लो, दूसरी साड़ी माही ले लेगी क्योंकि एनीवर्सरी आप की है तो पहला हक भी आप का है.’’ वैशाली ने अनमने ढंग से पैकेट खोला तो एक हरे रंग की और एक लाल रंग की साड़ी थी.

इस से पहले वैशाली कुछ चुनती, कायरा बोली, ‘‘भाभी को यह लाल रंग की साड़ी दे देते हैं. मम्मी कहां इस उम्र में लाल रंग पहनेंगी?’’ ऊषा डपटते हुए बोली, ‘‘क्यों मम्मी इंसान नहीं है या उम्र के साथ लोग जीना छोड़ देते हैं? वैसे यह लाल रंग वैशाली के गोरे रंग पर खूब फबेगा.

बाकी वैशाली तुम्हारी मरजी.’’ वैशाली िझ झकते हुए बोली, ‘‘इस उम्र में कोई यह तो नहीं कहेगा, बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.’’ ऊषा बोली, ‘‘अरे बोलने दो, अब लोग मेरे बारे में न जाने क्याक्या बोलते हैं पर क्या मैं जीना छोड़ दूं. चलो, अब तुम यह बताओ, तुम ने उस रात के लिए क्या ड्रैस ली है?’’

वैशाली बोली, ‘‘अभी कुछ नहीं लिया है.’’ ऊषा हंसते हुए बोली, ‘‘और बहू और बेटी ने सब तैयारी कर ली है. कल सुबह तुम और मैं चलेंगे, माही और कायरा घर देखेंगी.’’ माही बोली, ‘‘पर मम्मी के बिना हम घर कैसे संभालेंगे.’’ ऊषा बोली, ‘‘सम झ लो अब वह सास नहीं, होने वाली दुलहन है. उसे कुछ दिनों के लिए घर की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दो.

‘‘वैसे, अब तुम दोनों के बच्चे भी जवान हो गए हैं, कब तक तुम दोनों बच्ची बनी रहोगी?’’ माही और कायरा ऊषा के इस तंज पर चिढ़ गई थीं पर क्या कर सकती थीं. वैशाली को न जाने क्यों इस बार ऊषा बड़ी अपनी सी लगी थी.

अगले दिन ऊषा और वैशाली ने खूब सारी शौपिंग की. आज वैशाली को कोई उस की उम्र की याद दिलाने वाला नहीं था. वैशाली ने वही लाल साड़ी खरीदी और फिर ऊषा के कहने पर मैचिंग ज्वैलरी भी ली. पार्लर जा कर ऊषा ने अपना और वैशाली का ब्यूटी पैकेज लिया.

फिर दोनों ने बौडी स्पा लिया, बाहर लंच किया और फिर ऊषा के कहने पर वैशाली ने अपने बाल भी कटवा लिए थे. जब शाम को ऊषा और वैशाली पहुंचीं तो वैशाली का बदला रूप देख कर माही और कायरा हक्कीबक्की रह गई थीं पर सामने से कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ी थी पर उन के चेहरे पर दबीदबी हंसी वैशाली से छिपी नहीं रही थी.

वैशाली ऊषा से बोली, ‘‘बच्चे मन ही मन मु झ पर हंस रहे हैं.’’ ऊषा बोली, ‘‘पहले मांबाप के हिसाब से जिंदगी बिताई, फिर पति और अब बच्चों के अनुसार जिंदगी बिताई.’’ वैशाली बोली, ‘‘लेकिन उम्र का भी तो सोचना पड़ता है.

अब बच्चे भी बच्चों वाले हो गए हैं.’’ ऊषा हंसते हुए बोली, ‘‘पर दिल तो बच्चा है जी. क्या आज आप को अच्छा नहीं लगा.’’ वैशाली बोली, ‘‘बहुत अच्छा लगा.’’ रात में पराग बोला, ‘‘वैशाली, तुम आज सच में बहुत अच्छी लग रही हो. कटे हुए बाल बहुत सूट कर रहे हैं तुम पर.’’

अगले दिन फिर से वैशाली और ऊषा शौपिंग के लिए निकल पड़ीं. वैशाली ने कभी भी ऊषा को करीब से नहीं देखा था. अब जितना वह ऊषा को सम झती उतना ही उस के लिए सम्मान बढ़ रहा था. आखिकार वैशाली ने बोल ही दिया, ‘‘ऊषाजी, मैं आप को बहुत गलत सम झती थी.’’ ऊषा बोली, ‘‘जानती हूं सब यह ही सोचते हैं कि एक विधवा हो कर क्यों इतना सजतीसंवरती है. क्यों इस उम्र में भी एक्सपैरिमैंट करती रहती है.

‘‘पर वैशालीजी, क्या दिल कभी उम्र की सुनता है? अगर पति नहीं हैं, मेरे बच्चे बड़े हैं तो क्या मैं जीना छोड़ दूं? मेरा दिल तो हमेशा से ही बच्चा था और रहेगा भी.’’ वैशाली को भी ऊषा के उत्साह की छूत लग गई थी. अब वैशाली ने भी कायरा और माही की दबी मुसकान पर ध्यान देना छोड़ दिया था. आज वैशाली की शादी की गोल्डन एनिवर्सरी थी.

लाल साड़ी, कटे बालों में वह एक अलग ही अवतार में नजर आ रही थी. वैशाली को इतने कंप्लीमैंट्स मिले जितने उसे अपनी शादी पर भी नहीं मिले थे. डिनर के बाद कपल डांस का प्रोग्राम था.

बच्चों के डांस करने के बाद जब वैशाली और पराग डांसफ्लोर पर आए तो उन्होंने भी पुराने गानों पर जीभर कर डांस किया. ऊषा ने भी महफिल को जमाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. अगले दिन सुबह लगभग सभी मेहमान विदा हो गए थे.

अब ऊषाजी ने अपना सामान पैक कर लिया और जब वे विदा होने के लिए चल रही थीं तो वैशाली ने ऊषा को गले लगा कर कहा, ‘‘आप को हमेशा मैं ने गलत ही सम झा था पर इस बार आप से मैं ने बहुतकुछ सीखा है.

अगर हम अपनी उम्र को खुद पर हावी होने देंगे तो सच में समय से पहले ही बूढ़े हो जाएंगे.’’ ऊषा ने हंसते हुए कहा, ‘‘यह बात हमेशा याद रखना कि दिल तो बच्चा है जी. भूल कर भी अपने अंदर के बच्चे को मत मारना, यह ही तो हमारे जिंदा रहने की वजह है.’’

आलू वड़ा : मामी से उलझे दीपक के नैन

‘‘बाबू, तुम इस बार दरभंगा आओगे तो हम तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे,’’ छोटी मामी की यह बात दीपक के दिल को छू गई.

पटना से बीएससी की पढ़ाई पूरी होते ही दीपक की पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक की सकरी ब्रांच में कर दी गई. मातापिता का लाड़ला और 2 बहनों का एकलौता भाई दीपक पढ़ने में तेज था. जब मां ने मामा के घर दरभंगा में रहने की बात की तो वह मान गया.

इधर मामा के घर त्योहार का सा माहौल था. बड़े मामा की 3 बेटियां थीं, मझले मामा की 2 बेटियां जबकि छोटे मामा के कोई औलाद नहीं थी.

18-19 साल की उम्र में दीपक बैंक में क्लर्क बन गया तो मामा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वहीं दूसरी ओर दीपक की छोटी मामी, जिन की शादी को महज 4-5 साल हुए थे, की गोद सूनी थी.

छोटे मामा प्राइवेट नौकरी करते थे. वे सुबह नहाधो कर 8 बजे निकलते और शाम के 6-7 बजे तक लौटते. वे बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे. ऐसी सूरत में जब दीपक की सकरी ब्रांच में नौकरी लगी तो सब खुशी से भर उठे.

‘‘बाबू को तुम्हारे पास भेज रहे हैं. कमरा दिलवा देना,’’ दीपक की मां ने अपने छोटे भाई से गुजारिश की थी.

‘‘कमरे की क्या जरूरत है दीदी, मेरे घर में 2 कमरे हैं. वह यहीं रह लेगा,’’ भाई के इस जवाब में बहन बोलीं, ‘‘ठीक है, इसी बहाने दोनों वक्त घर का बना खाना खा लेगा और तुम्हारी निगरानी में भी रहेगा.’’

दोनों भाईबहनों की बातें सुन कर दीपक खुश हो गया. मां का दिया सामान और जरूरत की चीजें ले कर दोपहर 3 बजे का चला दीपक शाम 8 बजे तक मामा के यहां पहुंच गया.

‘‘यहां से बस, टैक्सी, ट्रेन सारी सुविधाएं हैं. मुश्किल से एक घंटा लगता है. कल सुबह चल कर तुम्हारी जौइनिंग करवा देंगे,’’ छोटे मामा खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘आप का काम…’’ दीपक ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अरे, एक दिन छुट्टी कर लेते हैं. सकरी बाजार देख लेंगे,’’ छोटे मामा दीपक की समस्या का समाधान करते हुए बोल उठे.

2-3 दिन में सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे घर छोड़ता तो दीपक की मामी हलका नाश्ता करा कर उसे टिफिन दे देतीं. वह शाम के 7 बजे तक लौट आता था.

उस दिन रविवार था. दीपक की छुट्टी थी. पर मामा रोज की तरह काम पर गए हुए थे. सुबह का निकला दीपक दोपहर 11 बजे घर लौटा था. मामी खाना बना चुकी थीं और दीपक के आने का इंतजार कर रही थीं.

‘‘आओ लाला, जल्दी खाना खा लो. फेरे बाद में लेना,’’ मामी के कहने में भी मजाक था.

‘‘बस, अभी आया,’’ कहता हुआ दीपक कपड़े बदल कर और हाथपैर धो कर तौलिया तलाशने लगा.

‘‘तुम्हारे सारे गंदे कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए हैं,’’ मामी खाना परोसते हुए बोलीं.

दीपक बैठा ही था कि उस की मामी पर निगाह गई. वह चौंक गया. साड़ी और ब्लाउज में मामी का पूरा जिस्म झांक रहा था, खासकर दोनों उभार.

मामी ने बजाय शरमाने के चोट कर दी, ‘‘क्यों रे, क्या देख रहा है? देखना है तो ठीक से देख न.’’

अब दीपक को अजीब सा महसूस होने लगा. उस ने किसी तरह खाना खाया और बाहर निकल गया. उसे मामी का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन दीपक देर रात घर आया और खाना खा कर सो गया.

अगली सुबह उठा तो मामा उसे बीमार बता रहे थे, ‘‘शायद बुखार है, सुस्त दिख रहा है.’’

‘‘रात बाहर गया था न, थक गया होगा,’’ यह मामी की आवाज थी.

‘आखिर माजरा क्या है? मामी क्यों इस तरह का बरताव कर रही हैं,’ दीपक जितना सोचता उतना उलझ रहा था.

रात खाना खाने के बाद दीपक बिस्तर पर लेटा तो मामी ने आवाज दी. वह उठ कर गया तो चौंक गया. मामी पेटीकोट पहने नहा रही थीं.

‘‘उस दिन चोरीछिपे देख रहा था. अब आ, देख ले,’’ कहते हुए दोनों हाथों से पकड़ उसे अपने सामने कर दिया.

‘‘अरे मामी, क्या कर रही हो आप,’’ कहते हुए दीपक ने बाहर भागना चाहा मगर मामी ने उसे नीचे गिरा दिया.

थोड़ी ही देर में मामीभांजे का रिश्ता तारतार हो गया. दीपक उस दिन पहली बार किसी औरत के पास आया था. वह शर्मिंदा था मगर मामी ने एक झटके में इस संकट को दूर कर दिया, ‘‘देख बाबू, मुझे बच्चा चाहिए और तेरे मामा नहीं दे सकते. तू मुझे दे सकता है.’’

‘‘मगर ऐसा करना गलत होगा,’’ दीपक बोला.

‘‘मुझे खानदान चलाने के लिए औलाद चाहिए, तेरे मामा तो बस रोटीकपड़ा, मकान देते हैं. इस के अलावा भी कुछ चाहिए, वह तुम दोगे,’’ इतना कह कर मामी ने दीपक को बाहर भेज दिया.

उस के बाद से तो जब भी मौका मिलता मामी दीपक से काम चला लेतीं. या यों कहें कि उस का इस्तेमाल करतीं. मामा चुप थे या जानबूझ कर अनजान थे, कहा नहीं जा सकता, मगर हालात ने उन्हें एक बेटी का पिता बना दिया.

इस दौरान दीपक ने अपना तबादला पटना के पास करा लिया. पटना में रहने पर घर से आनाजाना होता था. छोटे मामा के यहां जाने में उसे नफरत सी हो रही थी. दूसरी ओर मामी एकदम सामान्य थीं पहले की तरह हंसमुख और बिंदास.

एक दिन दीपक की मां को मामी ने फोन किया. मामी ने जब दीपक के बारे में पूछा तो मां ने झट से उसे फोन पकड़ा दिया.

‘‘हां मामी प्रणाम. कैसी हो?’’ दीपक ने पूछा तो वे बोलीं, ‘‘मुझे भूल गए क्या लाला?’’

‘‘छोटी ठीक है?’’ दीपक ने पूछा तो मामी बोलीं, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. अब की बार आओगे तो उसे भी देख लेना. अब की बार तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे. तुम्हें खूब पसंद है न.’’

दीपक ने ‘हां’ कहते हुए फोन काट दिया. इधर दीपक की मां जब छोटी मामी का बखान कर रही थीं तो वह मामी को याद कर रहा था जिन्होंने उस का आलू वड़ा की तरह इस्तेमाल किया, और फिर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया.

औरत का यह रूप उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

‘मामी को बच्चा चाहिए था तो गोद ले सकती थीं या सरोगेट… मगर इस तरह…’ इस से आगे वह सोच न सका.

मां चाय ले कर आईं तो वह चाय पीने लगा. मगर उस का ध्यान मामी के घिनौने काम पर था. उसे चाय का स्वाद कसैला लग रहा था.

लक्ष्मण रेखा : सब्र का दूसरा नाम थीं मिसेज राजीव

मेहमानों की भीड़ से घर खचाखच भर गया था. एक तो शहर के प्रसिद्ध डाक्टर, उस पर आखिरी बेटे का ब्याह. दोनों तरफ के मेहमानों की भीड़ लगी हुई थी. इतना बड़ा घर होते हुए भी वह मेहमानों को अपने में समा नहीं पा रहा था. कुछ रिश्ते दूर के होते हुए भी या कुछ लोग बिना रिश्ते के भी बहुत पास के, अपने से लगने लगते हैं और कुछ नजदीकी रिश्ते के लोग भी पराए, बेगाने से लगते हैं, सच ही तो है. रिश्तों में क्या धरा है? महत्त्व तो इस बात का है कि अपने व्यक्तित्व द्वारा कौन किस को कितना आकृष्ट करता है.

तभी तो डाक्टर राजीव के लिए शुभदा उन की कितनी अपनी बन गई थी. क्या लगती है शुभदा उन की? कुछ भी तो नहीं. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी डाक्टर राजीव सहज ही मिलने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. उन की आंखों में न जाने ऐसा कौन सा चुंबकीय आकर्षण है जो देखने वालों की नजरों को बांध सा देता है. अपने समय के लेडीकिलर रहे हैं डाक्टर राजीव. बेहद खुशमिजाज. जो भी युवती उन्हें देखती, वह उन जैसा ही पति पाने की लालसा करने लगती. डाक्टर राजीव दूल्हा बन जब ब्याहने गए थे, तब सभी लोग दुलहन से ईर्ष्या कर उठे थे. क्या मिला है उन्हें ऐसा सजीला गुलाब सा दूल्हा. गुलाब अपने साथ कांटे भी लिए हुए है, यह कुछ सालों बाद पता चला था. अपनी सुगंध बिखेरता गुलाब अनायास कितने ही भौंरों को भी आमंत्रित कर बैठता है. शुभदा भी डाक्टर राजीव के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उन की तरफ खिंची चली आई थी.

बौद्धिक स्तर पर आरंभ हुई उन की मित्रता दिनप्रतिदिन घनिष्ठ होती गई थी और फिर धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के लिए अपरिहार्य बन गए थे. मिसेज राजीव पति के बौद्धिक स्तर पर कहीं भी तो नहीं टिकती थीं. बहुत सीधे, सरल स्वभाव की उषा बौद्धिक स्तर पर पति को न पकड़ पातीं, यों उन का गठा बदन उम्र को झुठलाता गौरवर्ण, उज्ज्वल ललाट पर सिंदूरी गोल बड़ी बिंदी की दीप्ति ने बढ़ती अवस्था की पदचाप को भी अनसुना कर दिया था. गहरी काली आंखें, सीधे पल्ले की साड़ी और गहरे काले केश, वे भारतीयता की प्रतिमूर्ति लगती थीं. बहुत पढ़ीलिखी न होने पर भी आगंतुक सहज ही बातचीत से उन की शिक्षा का परिचय नहीं पा सकता था. समझदार, सुघड़, सलीकेदार और आदर्श गृहिणी. आदर्श पत्नी व आदर्श मां की वे सचमुच साकार मूर्ति थीं. उन से मिलते ही दिल में उन के प्रति अनायास ही आकर्षण, अपनत्व जाग उठता, आश्चर्य होता था यह देख कर कि किस आकर्षण से डाक्टर राजीव शुभदा की तरफ झुके. मांसल, थुलथुला शरीर, उम्र को जबरन पीछे ढकेलता सौंदर्य, रंगेकटे केश, नुची भौंहें, निरंतर सौंदर्य प्रसाधनों का अभ्यस्त चेहरा. असंयम की स्याही से स्याह बना चेहरा सच्चरित्र, संयमी मिसेज राजीव के चेहरे के सम्मुख कहीं भी तो नहीं टिकता था.

एक ही उम्र के माइलस्टोन को थामे खड़ी दोनों महिलाओं के चेहरों में बड़ा अंतर था. कहते हैं सौंदर्य तो देखने वालों की आंखों में होता है. प्रेमिका को अकसर ही गिफ्ट में दिए गए महंगेमहंगे आइटम्स ने भी प्रतिरोध में मिसेज राजीव की जबान नहीं खुलवाई. प्रेमी ने प्रेमिका के भविष्य की पूरी व्यवस्था कर दी थी. प्रेमिका के समर्पण के बदले में प्रेमी ने करोड़ों रुपए की कीमत का एक घर बनवा कर उसे भेंट किया था. शाहजहां की मलिका तो मरने के बाद ही ताजमहल पा सकी थी, पर शुभदा तो उस से आगे रही. प्रेमी ने प्रेमिका को उस के जीतेजी ही ताजमहल भेंट कर दिया था. शहरभर में इस की चर्चा हुई थी. लेकिन डाक्टर राजीव के सधे, कुशल हाथों ने मर्ज को पकड़ने में कभी भूल नहीं की थी. उस पर निर्धनों का मुफ्त इलाज उन्हें प्रतिष्ठा के सिंहासन से कभी नीचे न खींच सका था.

जिंदगी को जीती हुई भी जिंदगी से निर्लिप्त थीं मिसेज राजीव. जरूरत से भी कम बोलने वाली. बरात रवाना हो चुकी थी. यों तो बरात में औरतें भी गई थीं पर वहां भी शुभदा की उपस्थिति स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य भी थी. मिसेज राजीव ने ‘घर अकेला नहीं छोड़ना चाहिए’ कह कर खुद ही शुभदा का मार्ग प्रशस्त कर दिया था. मां मिसेज राजीव की दूर की बहन लगती हैं. बड़े आग्रह से पत्र लिख उन्होंने हमें विवाह में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था. सालों से बिछुड़ी बहन इस बहाने उन से मिलने को उत्सुक हो उठी थी.

बरात के साथ न जा कर मिसेज राजीव ने उस स्थिति की पुनरावृत्ति से बचना चाहा था जिस में पड़ कर उन्हें उस दिन अपनी नियति का परिचय प्राप्त हो गया था. डाक्टर राजीव काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. डाक्टरों के अनुसार उन का एक छोटा सा औपरेशन करना जरूरी था. औपरेशन का नाम सुनते ही लोगों का दिल दहल उठता है.

परिणामस्वरूप ससुराल से भी रिश्तेदार उन्हें देखने आए थे. अस्पताल में शुभदा की उपस्थिति, उस पर उसे बीमार की तीमारदारी करती देख ताईजी के तनबदन में आग लग गई थी. वे चाह कर भी खुद को रोक न सकी थीं. ‘कौन होती हो तुम राजीव को दवा पिलाने वाली? पता नहीं क्याक्या कर के दिनबदिन इसे दीवाना बनाती जा रही है. इस की बीवी अभी मरी नहीं है,’ ताईजी के कर्कश स्वर ने सहसा ही सब का ध्यान आकर्षित कर लिया था.

अपराधिनी सी सिर झुकाए शुभदा प्रेमी के आश्वासन की प्रतीक्षा में दो पल खड़ी रह सूटकेस उठा कर चलने लगी थी कि प्रेमी के आंसुओं ने उस का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था. उषा पूरे दृश्य की साक्षी बन कर पति की आंखों की मौन प्रार्थना पढ़ वहां से हट गई थी. पत्नी के जीवित रहते प्रेमिका की उपस्थिति, सबकुछ कितना साफ खुला हुआ. कैसी नारी है प्रेमिका? दूसरी नारी का घर उजाड़ने को उद्यत. कैसे सब सहती है पत्नी? परनारी का नाम भी पति के मुख से पत्नी को सहन नहीं हो पाता. सौत चाहे मिट्टी की हो या सगी बहन, कौन पत्नी सह सकी है?

पिता का आचरण बेटों को अनजान?े ही राह दिखा गया था. मझले बेटे के कदम भी बहकने लगे थे. न जाने किस लड़की के चक्कर में फंस गया था कि चतुर शुभदा ने बिगड़ती बात को बना लिया. न जाने किन जासूसों के बूते उस ने अपने प्रेमी के सम्मान को डूबने से बचा लिया. लड़के की प्रेमिका को दूसरे शहर ‘पैक’ करा के बेटे के पैरों में विवाह की बेडि़यां पहना दीं. सभी ने कल्पना की थी बापबेटे के बीच एक जबरदस्त हंगामा होने की, पर पता नहीं कैसा प्रभुत्व था पिता का कि बेटा विवाह के लिए चुपचाप तैयार हो गया. ‘ईर्ष्या और तनावों की जिंदगी में क्यों घुट रही हो?’ मां ने उषा को कुरेदा था.

एकदम चुप रहने वाली मिसेज राजीव उस दिन परत दर परत प्याज की तरह खुलती चली गई थीं. मां भी बरात के साथ नहीं गई थीं. घर में 2 नौकरों और उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. इतने लंबे अंतराल में इतना कुछ घटित हो गया, मां को कुछ लिखा भी नहीं. मातृविहीन सौतेली मां के अनुशासन में बंधी उषा पतिगृह में भी बंदी बन कर रह गई थी. मां ने उषा की दुखती रग पर हाथ धर दिया था. वर्षों से मन ही मन घुटती मिसेज राजीव ने मां का स्नेहपूर्ण स्पर्श पा कर मन में दबी आग को उगल दिया था. ‘मैं ने यह सब कैसे सहा, कैसे बताऊं? पति पत्नी को मारता है तो शारीरिक चोट ही देता है, जिसे कुछ समय बाद पत्नी भूल भी जाती है पर मन की चोट तो सदैव हरी रहती है. ये घाव नासूर बनते जाते हैं, जो कभी नहीं भरते.

‘पत्नीसुलभ अधिकारों को पाने के लिए विद्रोह तो मैं ने भी करना चाहा था पर निर्ममता से दुत्कार दी गई. जब सभी राहें बंद हों तो कोई क्या कर सकता है? ‘ऊपर से बहुत शांत दिखती हूं न? ज्वालामुखी भी तो ऊपर से शांत दिखता है, लेकिन अपने अंदर वह जाने क्याक्या भरे रहता है. कलह से कुछ बनता नहीं. डरती हूं कि कहीं पति को ही न खो बैठूं. आज वे उसे ब्याह कर मेरी छाती पर ला बिठाएं या खुद ही उस के पास जा कर रहने लगें तो उस स्थिति में मैं क्या कर लूंगी?

‘अब तो उस स्थिति में पहुंच गई हूं जहां मुझे कुछ भी खटकता नहीं. प्रतिदिन बस यही मनाया करती हूं कि मुझे सबकुछ सहने की अपारशक्ति मिले. कुदरत ने जिंदगी में सबकुछ दिया है, यह कांटा भी सही. ‘नारी को जिंदगी में क्या चाहिए? एक घर, पति और बच्चे. मुझे भी यह सभीकुछ मिला है. समय तो उस का खराब है जिसे कुदरत कुछ देती हुई कंजूसी कर गई. न अपना घर, न पति और न ही बच्चे. सिर्फ एक अदद प्रेमी.’

उषा कुछ रुक कर धीमे स्वर में बोली, ‘दीदी, कृष्ण की भी तो प्रेमिका थी राधा. मैं अपने कृष्ण की रुक्मिणी ही बनी रहूं, इसी में संतुष्ट हूं.’ ‘लोग कहते हैं, तलाक ले लो. क्या यह इतना सहज है? पुरुषनिर्मित समाज में सब नियम भी तो पुरुषों की सुविधा के लिए ही होते हैं. पति को सबकुछ मानो, उन्हें सम्मान दो. मायके से स्त्री की डोली उठती है तो पति के घर से अर्थी. हमारे संस्कार तो पति की मृत्यु के साथ ही सती होना सिखाते हैं. गिरते हुए घर को हथौड़े की चोट से गिरा कर उस घर के लोगों को बेघर नहीं कर दिया जाता, बल्कि मरम्मत से उस घर को मजबूत बना उस में रहने वालों को भटकने से बचा लिया जाता है.

‘तनाव और घुटन से 2 ही स्थितियों में छुटकारा पाया जा सकता है या तो उस स्थिति से अपने को अलग करो या उस स्थिति को अपने से काट कर. दोनों ही स्थितियां इतनी सहज नहीं. समाज द्वारा खींची गई लक्ष्मणरेखा को पार कर सकना मेरे वश की बात नहीं.’

मिसेज राजीव के उद्गार उन की समझदारी के परिचायक थे. कौन कहेगा, वे कम पढ़ीलिखी हैं? शिक्षा की पहचान क्या डिगरियां ही हैं?

बरात वापस आ गई थी. घर में एक और नए सदस्य का आगमन हुआ था. बेटे की बहू वास्तव में बड़ी प्यारी लग रही थी. बहू के स्वागत में उषा के दिल की खुशी उमड़ी पड़ रही थी. रस्म के मुताबिक द्वार पर ही बहूबेटे का स्वागत करना होता है. बहू बड़ों के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद पाती है. सभी बड़ों के पैर छू आशीष द्वार से अंदर आने को हुआ कि किसी ने व्यंग्य से चुटकी ली, ‘‘अरे भई, इन के भी तो पैर छुओ. ये भी घर की बड़ी हैं.’’ शुभदा स्वयं हंसती हुई आ खड़ी हुई. आशीष के चेहरे की हर नस गुस्से में तन गई. नया जवान खून कहीं स्थिति को अप्रिय ही न बना दे, बेटे के चेहरे के भाव पढ़ते हुए मिसेज राजीव ने आशीष के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटा, आगे बढ़ कर चरणस्पर्श करो.’’

काम की व्यस्तता व नई बहू के आगमन की खुशी में सभी यह बात भूल गए पर आशीष के दिल में कांटा पड़ गया, मां की रातों की नींद छीनने वाली इस नारी के प्रति उस के दिल में जरा भी स्थान नहीं था. शाम को घर में पार्टी थी. रंगबिरंगी रोशनियों से फूल वाले पौधों और फलदार व सजावटी पेड़ों से आच्छादित लौन और भी आकर्षक लग रहा था. शुभदा डाक्टर राजीव के साथ छाया सी लगी हर काम में सहयोग दे रही थी. आमंत्रित अतिथियों की लिस्ट, पार्टी का मीनू सभीकुछ तो उस के परामर्श से बना था.

शहनाई का मधुर स्वर वातावरण को मोहक बना रहा था. शहर के मान्य व प्रतिष्ठित लोगों से लौन खचाखच भर गया था. नईनेवली बहू संगमरमर की तराशी मूर्ति सी आकर्षक लग रही थी, देखने वालों की नजरें उस के चेहरे से हटने का नाम ही नहीं लेती थीं. एक स्वर से दूल्हादुलहन व पार्टी की प्रशंसा की जा रही थी. साथ ही, दबे स्वरों में हर व्यक्ति शुभदा का भी जिक्र छेड़ बैठता. ‘‘यही हैं न शुभदा, नीली शिफौन की साड़ी में?’’ डाक्टर राजीव के बगल में आ खड़ी हुई शुभदा को देखते ही किसी ने पूछा.

‘‘डाक्टर राजीव ने क्या देखा इन में? मिसेज राजीव को देखो न, इस उम्र में भी कितनी प्यारी लगती हैं.’’ ‘‘तुम ने सुना नहीं, दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज?’’

‘‘शुभदा ने शादी नहीं की?’’ ‘‘शादी की होती तो अपने पति की बगल में खड़ी होती, डाक्टर राजीव के पास क्या कर रही होती?’’ किसी ने चुटकी ली, ‘‘मजे हैं डाक्टर साहब के, घर में पत्नी का और बाहर प्रेमिका का सुख.’’

घर के लोग चर्चा का विषय बनें, अच्छा नहीं लगता. ऐसे ही एक दिन आशीष घर आ कर मां पर बड़ा बिगड़ा था. पिता के कारण ही उस दिन मित्रों ने उस का उपहास किया था. ‘‘मां, तुम तो घर में बैठी रहती हो, बाहर हमें जलील होना पड़ता है. तुम यह सब क्यों सहती हो? क्यों नहीं बगावत कर देतीं? सबकुछ जानते हुए भी लोग पूछते हैं, ‘‘शुभदा तुम्हारी बूआ है? मन करता है सब का मुंह नोच लूं. अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा. तुम यहां नहीं रहोगी.’’

मां निशब्द बैठी मन की पीड़ा, अपनी बेबसी को आंखों की राह बहे जाने दे रही थी. बच्चे दुख पाते हैं तो मां पर उबल पड़ते हैं. वह किस पर उबले? नियति तो उस की जिंदगी में पगपग पर मुंह चिढ़ा रही थी. बेटी साधना डिलीवरी के लिए आई हुई थी. उस के पति ने लेने आने को लिखा तो उस ने घर में शुभदा की उपस्थित को देख, कुछ रुक कर आने को लिख दिया था. ससुराल में मायका चर्चा का विषय बने, यह कोईर् लड़की नहीं चाहती. उसी स्थिति से बचने का वह हर प्रयत्न कर रही थी. पर इतनी लंबी अवधि के विरह से तपता पति अपनी पत्नी को विदा कराने आ ही पहुंचा.

शुभदा का स्थान घर में क्या है, यह उस से छिपा न रह सका. स्थिति को भांप कर ही चतुर विवेक ने विदा होते समय सास और ससुर के साथसाथ शुभदा के भी चरण स्पर्श कर लिए. पत्नी गुस्से से तमतमाती हुई कार में जा बैठी और जब विवेक आया तो एकदम गोली दागती हुई बोली, ‘‘तुम ने उस के पैर क्यों छुए?’’ पति ने हंसते हुए चुटकी ली, ‘‘अरे, वह भी मेरी सास है.’’

साधना रास्तेभर गुमसुम रही. बहुत दिनों बाद सुना था आशीष ने मां को अपने साथ चलने के लिए बहुत मनाया था पर वह किसी भी तरह जाने को राजी नहीं हुई. लक्ष्मणरेखा उन्हें उसी घर से बांधे रही.

आंतरिक साहस के अभाव में ही मिसेज राजीव उसी घर से पति के साथ बंधी हैं. रातभर छटपटाती हैं, कुढ़ती हैं, फिर भी प्रेमिका को सह रही हैं सुबहशाम की दो रोटियों और रात के आश्रय के लिए. वे डरपोक हैं. समाज से डरती हैं, संस्कारों से डरती हैं, इसीलिए उन्होंने जिंदगी से समझौता कर लिया है. सुना था, इतनी असीम सहनशक्ति व धैर्य केवल पृथ्वी के पास ही है पर मेरे सामने तो मिसेज राजीव असीम सहनशीलता का साक्षात प्रमाण है.

कोट का अस्तर : रफीक बाबू को किस घटना ने तोड़ दिया था

सर्दी इस कदर ज्यादा थी कि खून भी जमा दे. दफ्तर पहुंच कर रफीक बाबू की रगों में जैसे खून का दौरा शुरू हुआ.

दफ्तर में लोगों की तादाद में इजाफा होने लगा था और शुरू हुई फाइलों की उठापटक, अफसरान की घंटियां.

रफीक बाबू की दाहिनी ओर निरंजन शर्मा बैठते थे, तो बाईं ओर आमोद प्रकाश. वे दोनों उन पर किसी दुश्मन की तरह काबिज रहते थे. उन के तरकश के तीर रफीक के मन को बींध कर रख देते थे.

दफ्तर में कहने को तो और भी बहुत लोग थे, पर उन दोनों का एक ही टारगेट था, रफीक बाबू.

आज फिर निरंजन शर्मा ने ताना कसा, ‘‘यार रफीक, मेरी राय में तुम्हें एक नया कोट खरीद लेना चाहिए. इस बार की सर्दी कम से कम यह कोट तो नहीं   झेल पाएगा.’’

‘‘आप की मानें तब न. जनाब तो कानों में रुई ठूंसे रखते हैं. पता नहीं, इस कोट की जान कहां बाकी है?’’ आमोद प्रकाश ने चुटकी ली.

‘‘भाई, जान नहीं होती, तो ओढे़ रहते?’’ निरंजन शर्मा ने कहा.

‘‘शर्माजी, सच कहूं तो इन की हालत उस बंदरिया जैसी है, जो मरे बच्चे को जिंदा सम  झ कर अपनी छाती से चिपकाए फिरती है. इसे कहते हैं प्यारमुहब्बत,’’ कहते हुए आमोद प्रकाश ने हलकी सी मुसकान छोड़ी, तो रफीक बाबू जलभुन कर खाक हो गए, लेकिन वे सिर   झुकाए खयालों की दुनिया में मशगूल रहे.

उन्होंने सोचा, ‘यह कमबख्त सर्दी कब खत्म होगी और कब इन बदमाशों का ध्यान इस कोट से हटेगा. आज कोट बनवा लूं, तो पेट काटने वाली बात हो जाएगी.

‘इस तनख्वाह से बेटी के निकाह में लिए कर्ज की किस्त चुकता करूं कि बीवी समेत 3-3 बच्चों के मुंह में निवाला डालूं. जितनी चादर होगी, उतने ही तो पैर पसरेंगे.

‘इन का क्या है. बापदादा का कमाया पोता ही तो बरतेगा. ऊपरी कमाई है, सो अलग. अपने गले में ईमानदारी का तमगा जो लगा है, कोढ़ में खाज की तरह. जब समय आएगा, तब कोट भी बन जाएगा.’

इसी उधेड़बुन में शाम ढलने लगी. ऐसा नहीं है कि रफीक बाबू की हैसियत कोट सिलवाने की न थी, पर कुछ पैसे वे मसजिद में चढ़ा कर आते, तो कुछ खैनीजरदा खाने में खर्च कर देते थे. कमजोरी की वजह से डाक्टर का खर्च भी था. जब कोट बनवाने की बात हो, तो दूसरे खर्च काटने का मन न करता और धर्म व जरदे को वे छोड़ नहीं पा रहे थे.

आज महीने का पहला दिन था. तनख्वाह बैंक में चली गई थी. बेगम ने सुबह ही लंबी फेहरिस्त हाथ में थमा दी थी कि यह ले आना, वह ले आना. अब 1-2 दिन हिसाबकिताब में कटेंगे, बाकी बचे दिनों की गिनती करने में.

इधर दीवार घड़ी 5 बार ठुनकी, तब जा कर रफीक बाबू फ्लैशबैक से लौटे.

रफीक बाबू हड़बड़ा कर उठे और सीधे एटीएम की ओर चल दिए. वहां से नोट निकाले. कड़क नोटों को उंगलियों के बीच मसल कर उन्हें पलभर को गरमी का एहसास हुआ.

रफीक बाबू बाहर निकले थे कि तभी उन का निरंजन शर्मा से सामना हो गया.

रफीक बाबू उन की अनदेखी कर दोबारा एटीएम में घुस गए. लेकिन भला निरंजन शर्मा ऐसा मौका क्यों चूकते. उन्होंने धीरे से जुमला उछाल दिया, ‘‘वाह रे कोट, क्या किस्मत पाई है. सर्दी में भी गरमी का एहसास.’’

रफीक बाबू उन से उल  झना नहीं चाहते थे. बस, खून के घूंट पी कर रह गए. आज जल्दी घर पहुंचना चाहते थे, लेकिन निकलतेनिकलते शाम के 6 बज गए.

बसस्टैंड पर पहुंच कर रफीक बाबू ने सोचा, ‘चलो, एक पैकेट सिगरेट ही खरीद लें.’ उन के हाथ की उंगलियां जेबें टटोल रही थीं, मगर रुपयों से टकराव नहीं हुआ. मारे घबराहट के उन्हें सर्दी के बावजूद पसीना छलक आया.

पान वाला रफीक बाबू की उड़ती रंगत भांप गया. सो, मुसकरा कर दूसरे ग्राहकों को निबटाने लगा.

रफीक बाबू के हाथों के तोते उड़ गए थे और जेब से पगार. हिम्मत कर के वे तेजी से उस एटीएम की ओर लपके, जहां से रुपए निकाले थे.

एटीएम का कोनाकोना देख मारा, पर कहीं कुछ न मिला. थकहार कर वे बैरंग लौट आए. अब किस से कहें और किस से पूछें?

अंधेरे के काले डैने फैलने लगे थे. रफीक बाबू खुद को धकियाते हुए पैदल ही घर तक का सफर तय करने लगे.

उन की हालत यह हो गई कि एक बार वे मोटरसाइकिल से टकरातेटकराते बचे थे, तो दूसरी बार ठेली वाले से बातोंबातों में   झगड़ने से बचे थे.

रफीक बाबू किसी तरह घर पहुंचे. उन्हें देखते ही बेगम नसीरा का चेहरा खिल गया, पर रफीक बाबू के मुर्दनी चेहरे को देख कर वे पलभर में उदास हो गईं.

‘‘इतनी देर कैसे हुई? सब ठीक तो है न?’’ शक और डर के अंबार को दबा कर नसीरा ने पूछा.

रफीक बाबू ने जैसे कुछ सुना ही नहीं और सीधे कुरसी में पसर गए.

‘‘क्या बात है? कुछ कहोगे भी या नहीं?’’ नसीरा घबरा कर बोलीं.

‘‘कुछ नहीं नसीरा. बस, बदकिस्मती   झपट गई. लगता है, यह महीना फाका करने में गुजरेगा,’’ रफीक बाबू अपना सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘आखिर हुआ क्या है? मुझे भी तो कुछ पता चले?’’ नसीरा खीज उठीं.

‘‘आज तनख्वाह में से 15 हजार रुपए निकाले थे… और पूरे रुपए कोट की जेब में डाल कर बाहर निकल आया था. जब मैं बसस्टैंड पर पहुंचा, तो देखा कि रुपए नदारद थे,’’ रफीक बाबू ने उदास हो कर कहा.

‘‘मेरे मालिक, तू भी खूब है. किसी को छप्पर फाड़ कर दे और किसी से दो जून की रोटी भी छीन ले,’’ नसीरा दुपट्टे में मुंह छिपा कर रो पड़ीं.

बच्चे दीनदुनिया से बेखबर सो गए थे. उस रात वे दोनों बगैर खाए ही लेट गए. रात चढ़ आई थी, लेकिन नींद उन की आंखों से कोसों दूर थी.

नसीरा को इस घटना ने तोड़ कर रख दिया था. वे खिड़की से अंदर आ रही रोशनी में खूंटी से लटके कोट को घूरे जा रही थीं, मानो सारा कुसूर उस पुराने कोट का था, जिस का अस्तर कोट से बाहर   झांक रहा था, मानो उन्हें चिढ़ा रहा हो.

नसीरा ने उठ कर खिड़की पर परदा तान दिया, तो भी नींद कहां थी भला?

‘‘कितनी बार कहा था कि एक कोट बनवा लो, मगर कान पर जूं तक न रेंगी. ईद भी चली गई. न जाने कब तक लादे रहेंगे इस कमबख्त कोट को?’’ नसीरा लेटेलेटे बड़बड़ाती रहीं.

रफीक बाबू कुछ नहीं बोले. बस, चुपचाप सुनते रहे.

‘इन्होंने कोट अच्छी तरह देख लिया था न? कहीं रुपए अस्तर में न उल  झे पड़े हों?’ नसीरा सारे घटनाक्रम को नए सिरे से सोच रही थीं कि शायद कोई सुराग हाथ आ जाए, मगर पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं.

रफीक बाबू खामोशी का लबादा ओढ़े लेटे हुए थे. सारी रात आंखों में ही कट गई. सुबह होने को थी. रफीक बाबू उठे नहीं, बिस्तर से चिपके रहे.

नसीरा से रहा नहीं गया, ‘‘आज दफ्तर नहीं जाओगे क्या? कुछ तो हौसला रखो. ऐसे लेटे रहने से कुछ नहीं होने वाला.’’

न चाह कर भी रफीक बाबू को दफ्तर का मुंह देखना पड़ा. देर हो गई थी. साथी मुलाजिम अपनेअपने कामों में मसरूफ थे.

रफीक बाबू के मुर  झाए चेहरे को देख कर सभी को हैरानी हो रही थी. वैसे भी आज सब से देर में पहुंचने वालों में वे ही थे.

निरंजन शर्मा ने पलट कर देखा और बोले, ‘‘आओ मियां, आज देर कैसे कर दी? लगता है कि भाभीजान ने बुरी गत बनाई है. खैर, दफ्तर आ गए हो, तो कम से कम हुलिया तो ठीक करो. घरगृहस्थी में सब चलता रहता है.’’

रफीक बाबू से और बरदाश्त नहीं हुआ. मन में आया कि सीधे निरंजन शर्मा का गरीबान पकड़ लें, लेकिन कुछ नहीं कर पाए. बस, वे चिल्ला कर रह गए, ‘‘शर्मा, जूती का मुंह जब खुल जाता है, तो बहुत आवाज करती है. कभी किसी का दर्द महसूस करोगे या नहीं?’’

‘‘अरे क्या हुआ, क्यों तैश खाते हो? कुछ गड़बड़ है क्या?’’ निरंजन शर्मा ने मौके की नजाकत को सम  झा.

रफीक बाबू ने एक लंबी आह छोड़ी और वे बु  झी सी आवाज में बोले, ‘‘मेरे 15 हजार… न जाने कहां गिर गए.’’

‘‘बस, इतनी सी बात और इतनी सारी गालियां. ये लो, पूरे 15 हजार रुपए. मगर एक बार मुसकरा तो दो,’’ कहते हुए निरंजन शर्मा ने रुपए मेज पर रख दिए.

रफीक बाबू की आंखें खुली की खुली रह गईं. उन की जान में जान लौट आई, ‘‘लेकिन तुम्हें… ये रुपए तुम्हें कहां मिले?’’

‘‘इसे गनीमत कहो कि ऐनवक्त पर मैं भी एटीएम पहुंच गया. ठीक तुम्हारे बाद. जब तुम ने रुपए कोट के हवाले किए थे, तभी पूरी गड्डी खिसक कर फर्श पर आ गिरी थी.

‘‘उस समय मैं ने सोचा कि तुम्हें लौटा दूं, फिर खयाल आया कि तुम्हें थोड़ा एहसास करा ही दूं.’’

निरंजन शर्मा ने उन के कंधे पर हाथ रख कर धीमे से कहा, ‘‘कहीं अस्तर तो फटा नहीं है बरखुरदार?’’

रफीक बाबू बुरी तरह   झेंप गए. रुपए मिलने की खुशी में शुक्रिया भी न कह सके. बस, होंठ कांप कर रह गए.

निरंजन शर्मा और आमोद प्रकाश मुसकरा रहे थे. इस बार रफीक बाबू को उन का मुसकराना नहीं अखरा. उन्होंने मन ही मन फैसला कर डाला कि चाहे इस महीने कर्जा न दे पाएं तो चलेगा, लेकिन हर हाल में कोट बनवाएंगे.

अब रफीक बाबू का मन शांत था. वे अपनी कुरसी की ओर बढ़े. उन के ठीक सामने की कुरसी पर एक बड़ा सा पैकेट रखा था. कुछ देर तक वे पैकेट को हैरानी से देखते रह गए.

‘‘क्या देख रहे हो मियां… आप के लिए ही है… नए साल का तोहफा.’’

रफीक बाबू ने पैकेट हाथों में लिया, जिस पर लिखा था, ‘प्रिय रफीक बाबू, अपने दुश्मनों की ओर से यह तोहफा कबूल फरमाएं. इसे पहनें और पुराने कोट को अलविदा कहें. बस, बदले में इन दुश्मनों को मसजिद और जरदे पर पैसा न खर्च करने का वादा करना है.’

रफीक बाबू के होंठों पर पहली बार एक लंबी मुसकान फैल गई. उन्होंने फौरन उन दोनों को ऐसी   झप्पी मारी कि साथी मुलाजिम औरतें पहले तो मुंह खोले देखती रहीं, फिर उन्होंने शरमा कर अपना मुंह दूसरी तरफ कर लिया.

रमेश चंद्र छबीला : अकाश और सीमा के प्यार कंप्यूटर का रोल

…उसी चौराहे पर हो टल से बाहर निकल कर आकाश ने एक टैक्सी की और ड्राइवर से बांद्रा चलने को कहा. थोड़ी ही देर में वह टैक्सी मुंबई की सड़कों पर दौड़ने लगी.

आकाश सीट पर आराम से बैठ गया. उस की आंखों के सामने बारबार फिल्म मशहूर हीरोइन सीमा का हंसतामुसकराता चेहरा आ रहा था. पिछले कुछ महीनों में उस ने सीमा के मोबाइल फोन पर अनेक मैसेज भेजे थे, पर जब किसी का भी जवाब नहीं मिला तो उस ने रजिस्टर्ड डाक से चिट्ठी भेजी. पर लगता है कि सीमा ने जवाब न देने की कसम खा ली है. कहीं ऐसा तो नहीं कि सीमा ने उसे भुला दिया हो या जानबू?ा कर भुलाना चाहती हो?

लेकिन आकाश तो सीमा को भुला नहीं पा रहा है. आज 2 साल बाद सीमा से मिलने वह मुंबई आया है.

आकाश कुछ भूलीबिसरी यादों के जाल में उलझता चला गया. तकरीबन 7 साल पहले जब वह बीए में पढ़ रहा था तब सीमा भी उस की क्लास में ही पढ़ती थी. वह बहुत खूबसूरत थी. लड़के उस से बात करना चाहते थे, पर वह किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती थी.

उन दिनों कालेज में एक नाटक खेला गया था जिस में आकाश हीरो था और हीरोइन सीमा थी. नाटक खूब पसंद गया था. इस के बाद उन दोनों की दोस्ती बढ़ती चली गई थी.

बीए करने के बाद आकाश दिल्ली आ गया था और अपना कैरियर बनाने के लिए उस ने आगे की पढ़ाई शुरू कर दी थी. 3 साल का कोर्स करने के बाद उस ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी थी.

आकाश को गुड़गांव की एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी मिल गई थी. उस ने एक फ्लैट भी किराए पर ले लिया था.

कुछ महीने बाद एक दिन आकाश ने अपने औफिस में सीमा को देखा तो चौंक उठा था. सीमा भी उसे देख कर बहुत खुश हुई थी.

सीमा ने बताया था कि वह भी इसी कंपनी में नौकरी करती है. कंपनी ने उस का ट्रांसफर लखनऊ से यहां कर दिया है.

आकाश ने सीमा के रहने की समस्या का हल निकालते हुए बताया था कि उस के पास

2 कमरों का फ्लैट है और वह अकेला रहता है. जब तक कहीं कमरे का इंतजाम न हो जाए, तब तक सीमा उस के साथ रह सकती है. इस के बाद वे दोनों एक ही फ्लैट में रहने लगे थे.

एक दिन सीमा को डेंगू बुखार हो गया तो आकाश उसे डाक्टर के पास

ले गया था. दिन में सीमा की देखभाल के लिए एक नर्स का भी इंतजाम कर दिया था, लेकिन शाम को जब नर्स चली जाती तो वह खुद सीमा की देखभाल करता था.

सीमा की मां को जब उस की बीमारी का पता चला तो वे भी वहां आ गई थीं. उन्होंने उन दोनों के इकट्ठे रहने पर एतराज जताया था, पर सीमा ने

जब आकाश की तारीफ करते हुए उस के अच्छे बरताव और आदत के बारे में बताया तो वे चुप रह गईं.

मां की तो इच्छा थी कि आकाश व सीमा की शादी हो जाए, पर सीमा यह कह कर टाल गई थी कि वह अभी कुछ साल शादी नहीं करना चाहती है.

एक दिन दिल्ली में फिल्म बनाने वाली एक कंपनी ने नई हीरोइन के लिए टैस्ट लिया था. हजारों लड़कियों ने उस में भाग लिया था. 2 लड़कियां चुनी गईं जिन में सीमा पहले नंबर पर थी.

सीमा का पहली फिल्म में काम करने का कौंट्रैक्ट साइन हुआ था. इस फिल्म के लिए उसे 50 लाख रुपए मिलने वाले थे.

सीमा नौकरी से इस्तीफा दे कर अपनी मां के साथ मुंबई चली गई थी.

आकाश अकेला रह गया था. अकेले उस का मन नहीं लगता था. वह फोन पर सीमा से बात कर लेता था.

सीमा की पहली फिल्म ‘अनजान साजन’ की शूटिंग शुरू हो गई थी. आकाश भी फिल्म की शूटिंग देखने मुंबई चला गया था.

फिल्म रिलीज हुई. आकाश ने भी देखी थी. दर्शकों ने फिल्म को पसंद किया था. पत्रपत्रिकाओं में फिल्म की तारीफ लिखी गई थी.

एक दिन सीमा ने आकाश को फोन पर कहा था कि उस के पास 3-4 फिल्मों के औफर आ चुके हैं. यहां आ कर बहुत अच्छा लग रहा है. अब वह भी एक मशहूर हीरोइन बन जाएगी.

2 सालों में ही सीमा की 3 फिल्में रिलीज हो गई थीं. तीनों फिल्में खूब चली थीं.

आकाश सीमा को फोन करता तो उधर घंटी जाती रहती, पर कोई जवाब न मिलता था. वह सोचता कि हो सकता है सीमा शूटिंग में बिजी हो, सो रही हो या किसी मीटिंग में हो. उस ने फोन पर मैसेज भेजने शुरू कर दिए. कोई जवाब नहीं मिला, तो उस ने चिट्ठी भी लिख कर भेजी, पर उस का भी कोई जवाब नहीं आया.

क्या फिल्म नगरी की चकाचौंध में सीमा अपना पुराना समय भूल रही है? क्या फिल्मों की कामयाबी से सीमा का दिमाग खराब हो रहा है? सीमा कितनी बदल चुकी है… यही सब देखने तो आकाश यहां आया है.

‘‘गाड़ी कहां रोकनी है साहब?’’ ड्राइवर ने पूछा.

आकाश चौंक उठा. यादों के जाल से बाहर निकल कर उस ने पता बताया.

टैक्सी रुकी. ड्राइवर को पैसे दे कर आकाश एक बड़े से मकान के सामने जा पहुंचा और डोर बैल बजाई.

एक अधेड़ औरत ने दरवाजा खोल कर पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘सीमा मैडम से.’’

‘‘वे अभी नहीं मिल सकतीं. मीटिंग में बिजी हैं.’’

आकाश ने जेब से विजिटिंग कार्ड निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘यह अपनी मैडम को दे देना और जैसा वे कहें मु?ो बता देना.’’

विजिटिंग कार्ड ले कर वह औरत चली गई. कुछ ही देर बाद वह लौट कर आई और बोली, ‘‘आइए.’’

आकाश कमरे में पहुंचा. सीमा के सामने सोफे पर 2 आदमी बैठे थे. मेज पर शराब, बीयर, सोडा, बर्फ, नमकीन वगैरह सामान रखा था.

आकाश को देखते ही सीमा ने मुसकरा कर स्वागत करते हुए कहा, ‘‘आइए, आइए, वैलकम.’’

आकाश के चेहरे पर भी मुसकान फैल गई.

सीमा ने परिचय कराया, ‘‘आप से मिलिए, आप हैं मिस्टर सूरज कुमार. मेरी नई फिल्म के डायरैक्टर और आप हैं सेठ गोपी चंद्र… प्रोड्यूसर.’

‘‘मैं आकाश.’’

‘‘ये मेरे फ्रैंड हैं. गुड़गांव में रहते हैं,’’ सीमा उन दोनों से बोली.

शराब पीने का दौर शुरू हो गया.

‘‘मेरी फिल्में कैसी लगीं आकाश?’’

‘‘बहुत अच्छी लगीं. औफिस के सभी लोगों ने देखीं,’’ कहता हुआ आकाश शिकायत भरे लहजे में बोला, ‘‘सीमा, तुम ने मेरे फोन ही उठाने बंद कर दिए हैं. मैं तो तुम से 2 बातें करना चाहता था.’’

‘‘क्या करूं आकाश, यहां आ कर पता चला कि फिल्म कलाकारों की लाइफ कितनी बिजी होती है. न दिन का पता चलता है और न रात का. जब नींद आती है तो सपने में भी लाइट, कैमरा और ऐक्शन सुनाई देता है.’’

‘‘मैं ने तुम्हें मोबाइल पर मैसेज भेजे. मैं ने कई चिट्ठियां भी लिखीं, पर कोई जवाब नहीं मिला.’’

‘‘वे पत्र नहीं, प्रेमपत्र थे. भागदौड़ भरी इस जिंदगी में अब मेरे पास इतना समय कहां जो किसी प्रेमपत्र का जवाब दूं. फोन पर मैसेज पढ़ना और जवाब देना मुझे टाइम बरबाद करना लगता है.’’

आकाश चुप रहा. वह सीमा की आंखों में कुछ खोज रहा था.

सीमा ने आकाश की ओर देखते हुए कहा, ‘‘आकाश, मेरे पास रोजाना अनेक मैसेज आते हैं, फोन आते हैं. प्रेमपत्र आते हैं. इस समय मेरे प्रेमियों की संख्या न जाने कितनी है. कोई मैसेज भेजता है कि तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊंगा. कोई मेरे प्यार में पागल हो चुका है. किसी को दिनरात मेरे ही सपने आते हैं. कोई मेरे साथ एक रात बिताने के लाखों रुपए

देने को तैयार है. अब तुम ही बताओ आकाश कि मैं किसकिस को अपना प्रेमी बनाऊं?’’

‘‘क्या तुम ने मुझे भी इन दूसरे लोगों की तरह समझ लिया है? मुझ में और उन में बहुत फर्क है.’’

‘‘देखो आकाश, अभी मैं अपना कैरियर बनाने में बिजी हूं. प्रेम और शादी जैसी फालतू चीजों के बारे में सोचने का भी समय मेरे पास नहीं है.’’

‘‘मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी सीमा.’’

‘‘तुम ने क्या सोचा था कि तुम्हारे आते ही मैं तुम से लिपट कर कहूंगी कि कहां रह गए थे? इतने दिन बाद आए हो. मुंबई में अकेली बोर हो गई हूं. मुझ से शादी कर लो प्लीज. अब यह अकेलापन सहा नहीं जाता,’’ सीमा ने ताने भरे शब्दों में कहा और खिलखिला कर हंस दी.

यह सुन कर डायरैक्टर व प्रोड्यूसर भी हंसने लगे.

सीमा के ये ताने आकाश सहन नहीं कर पाया. वह उठा और कमरे से बाहर निकल आया.

आकाश गुड़गांव वापस आ गया. उस का ख्वाब टूट गया कि सीमा अब भी उस से प्रेम करती है. वह समझ चुका था कि सीमा के पास खूबसूरती, जवानी, पैसा सबकुछ है. इन सब के साथ उस में घमंड भी आ चुका है.

अब आकाश ने सीमा को फोन करने बंद कर दिए, पर सीमा उस के दिल व दिमाग से नहीं निकल पा रही थी. रात की तनहाई में जब वह बिस्तर पर सोने की कोशिश करता तो सीमा की यादें उस की आंखों के सामने आने लगतीं.

एक साल बाद आकाश ने अखबार में एक खबर पढ़ी तो बुरी तरह चौंक उठा. खबर थी कि हीरोइन सीमा की शादी एक अंगरेज से. पिछले दिनों फिल्म हीरोइन सीमा एक फिल्म ‘लंदन का छोरा’ की शूटिंग के लिए लंदन गई थीं. वहां एक अमीर नौजवान जौन पीटर से मुलाकात हुई. अब वे उस से शादी करने वाली हैं.

खबर पढ़ते ही आकाश ने अखबार एक तरफ फेंक दिया. दिल में गुस्से का ज्वालामुखी धधक उठा. नसों में खून का बहना तेज हो गया.

मुंबई में सीमा की शादी जौन पीटर से हो गई. शादी के बाद हनीमून के लिए शिमला जाने की जानकारी आकाश को अखबार से मिल गई.

आकाश भी शिमला जा पहुंचा. उस ने पता कर लिया कि सीमा और उस का अंगरेज पति किस होटल में ठहरे हैं. उस ने उसी होटल में एक कमरा ले लिया.

आकाश सीमा से अकेले में कुछ कहना चाहता था. अगले दिन जौन पीटर अकेला होटल से बाहर निकला तो आकाश कमरे में घुस गया.

आकाश को देखते ही सीमा बुरी तरह चौंक उठी. उस के मुंह से निकला, ‘‘आकाश तुम… यहां कब आए?’’

‘‘मैं तुम्हें शादी की मुबारकबाद देने आया हूं मिसेज सीमा जौन पीटर. यह काम मैं फोन पर भी कर सकता था, पर मैं ने फोन नहीं किया, क्योंकि तुम ने न फोन सुनना था और न मैसेज पढ़ना था.’’

‘‘क्या कहना चाहते हो?’’ सीमा ने उस की ओर देख कर पूछा.

‘‘हमारे देश में विदेशी चीजों का कितना मोह है. यहां प्रेमी भी विदेशी चाहिए और पति भी. खैर, तुम ने जो भी किया है, सोचसमझ कर ही किया होगा.’’

‘‘यही शिकायत करने आए हो?’’

‘‘मैं यह कहने आया हूं सीमा कि जिस देश में तुम जा रही हो, उन की और हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति में जमीनआसमान का फर्क है. वहां शादीब्याह को एक खेल समझ जाता है. वहां एक बांह में पत्नी और दूसरी बांह में प्रेमिका होती है. वहां जराजरा सी बात पर तलाक हो जाता है.’’

‘‘आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?’’

‘‘मैं केवल एक बात जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हें अपने देश में कोई

भी लड़का पति बनाने के लायक नहीं लगा?’’

‘‘मेरी निजी जिंदगी के बारे में

पूछने वाले तुम कौन हो? क्या लगते हो मेरे?’’

‘‘तुम्हारी एक फिल्म आई थी ‘ओल्ड लवर’, बस मुझे भी वही समझ लो,’’ आकाश ने कहा और कमरे से बाहर निकल आया. सीमा उसे देखती रह गई.

कुछ दिनों के बाद सीमा अपने पति जौन पीटर के साथ लंदन चली गई.

2 साल बाद… लंदन के हवाईअड्डे पर इंडियन एयरलाइंस का हवाईजहाज उतरा. अनेक मुसाफिरों के साथ आकाश भी हवाईजहाज से बाहर निकला.

आकाश ने एक अफसर से कुछ बात की और एक औफिस में घुस गया.

आकाश ने कंप्यूटर पर काम करती हुई सीमा को देखा तो उस के दिल की धड़कनें तेज होने लगीं और आंखों की चमक बढ़ गई.

आकाश ने धीरे से पुकारा, ‘‘हैलो सीमा.’’

सीमा ने आकाश को देखा तो चौंक उठी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि आकाश उस के सामने खड़ा है.

‘‘तुम सपना नहीं देख रही हो सीमा. मैं आकाश ही हूं,’’ सामने की सीट पर बैठते हुए आकाश ने कहा.

सीमा कुछ समझ नहीं पा रही थी

कि कहां से बात शुरू करे? आकाश अचानक लंदन क्यों आया है? उस का पता आकाश को किस ने दिया है?

‘‘कैसे आए हो? यहां घूमनेफिरने या किसी काम से आना हुआ है?’’ सीमा ने पूछा.

सीमा की आंखों के सामने वह मंजर आ गया जब उस ने मुंबई में आकाश का मजाक उड़ाया था. शिमला में भलाबुरा कहा था. इतना होने पर भी आकाश उस से मिल रहा है. आखिर क्यों? क्या आकाश को उस के बारे में सब पता चल गया है?

‘‘मैं किसी काम से नहीं बस तुम से मिलने के लिए ही आया हूं सीमा. मुझे अखबारों से पता चल गया था कि कुछ दिनों के बाद ही तुम्हारी और जौन पीटर की अनबन हो गई. तुम ने उस का घर छोड़ कर यहां हवाईअड्डे पर नौकरी कर ली.’’

‘‘आकाश, तुम ने ठीक कहा था कि हम दोनों देशों की संस्कृति में जमीनआसमान का फर्क है. मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि पीटर का रूप इतना घिनौना होगा. वह इनसान नहीं हवस का एक पुजारी है. मैं ने बहुत सहन किया, पर जब सहन नहीं हुआ तो मैं ने उस का घर छोड़ दिया और यहां हवाईअड्डे पर नौकरी कर ली. कुछ महीने पहले हमारा तलाक हो चुका है.’’

आकाश चुपचाप सीमा की ओर देखता रहा.

सीमा ने कहा, ‘‘अपने बारे में बताओ आकाश. यहां लंदन में अकेले ही आए हो या परिवार के साथ?’’

‘‘सीमा, मैं आज भी परिवार के नाम पर अकेला ही हूं. तुम ने तो शादी कर ली थी और मैं ने शादी न करने का पक्का इरादा कर लिया था. बस, यों समझ लो कि मैं आज भी उसी चौराहे पर खड़ा हूं जहां तुम ने मुझे छोड़ा था. अच्छा, एक बात बताओ सीमा…’’

‘‘पूछो?’’

‘‘क्या तुम्हें कभी अपने देश भारत की याद नहीं आती?’’

‘‘बहुत याद आती है. लेकिन अब सोचती हूं किस मुंह से जाऊं. अब वहां कौन है मेरा? मां को पिछले साल हार्ट अटैक हो गया था और वे बच न पाईं. अब तो पछतावे के अलावा मैं कर ही क्या सकती हूं.

‘‘पता नहीं क्या हो गया था मुझे जो मैं एक विदेशी पर यकीन करते हुए सबकुछ छोड़ कर यहां चली आई,’’ कहतेकहते सीमा की आंखें भर आईं.

‘‘सीमा, वहां तुम्हारा सबकुछ है. तुम्हारे अपने सभी वहां हैं. इस देश की भीड़ में मैं तुम्हें नहीं खोने दूंगा. अब मैं तुम्हें अपने से दूर नहीं होने दूंगा. अब तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी. अगर तुम फिल्मों में काम करना चाहोगी तो मुझे एतराज नहीं होगा.’’

सीमा की आंखें डबडबा गई. वह रो देना चाहती थी. इतना सब होने के बाद भी आकाश उसे अपनाने के लिए यहां आया है, इतनी दूर. उसे लगा मानो वह अकेली किसी अंधेरी गुफा में भटक रही थी और अचानक आकाश ने उस का हाथ पकड़ कर सही रास्ता दिखा दिया.

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