Hindi Kahani: रफू

वि और सुधा की शादीशुदा जिंदगी को 20 साल से ज्यादा का समय बीत चुका था. इन सालों में घर की दीवारों का रंग, शहर का पता, बच्चों की उम्र और समय का पहिया बहुतकुछ बदला, पर एक चीज जो कभी नहीं बदली, वह थी पारिवारिक बैठकों का खत्म होने वाला सिलसिला, जिस में हर बार सुधा की पीड़ा को सुना तो जाता था, पर सम? कभी नहीं गया. आज फिर वही बैठक थी. ड्राइंगरूम में कुरसियां ऐसे सजी थीं, मानो कोई पंचायत बैठने वाली हो. मेज पर रखे चाय के कपों से उठती भाप कमरे की गंभीरता को और ज्यादा गंभीर बना रही थी. दीवार पर टंगी घड़ी की टिकटिक, उस चुप्पी को चीरती हुई, समय के लगातार आगे बढ़ने की गवाही दे रही थी.

सुधा कमरे के एक कोने में बैठी थी. उस की आंखों में अब सवाल नहीं थे, क्योंकि सवाल पूछने की हिम्मत और उम्मीद, दोनों ही समय के साथ कमजोर हो चुकी थीं. बड़े भैया ने धीमी और फैसला करने वाली आवाज में कहा, ‘‘देखो सुधा, अब इन बातों को उखाड़ने से क्या फायदा? अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं. घर परिवार सम?ाते से ही चलते हैं.’’ भाभी ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हर बात को दिल से लगा लोगी, तो जिंदगी मुश्किल हो जाएगी.’’ किसी ने खानदान की इज्जत का हवाला दिया, तो किसी ने सामाजिक मर्यादा का भार सुधा पर डाला. सब के अपनेअपने शब्द और अपनाअपना लहजा था, मतलब एक ही था कि चुप रहो, सहन करो और सबकुछ सामान्य मान लो. रवि, जो इस पूरी बैठक का केंद्र था, एक ओर शांत बैठा रहा. उस के चेहरे पर अपराध का भाव था, ही कोई चिंता. वह ऐसे चुप था, जैसे यह सब उस की जिंदगी का रोजमर्रा का हिस्सा हो.

सुधा ने एक पल के लिए रवि की ओर देखा. कभी यही चेहरा उस की जिंदगी की बुनियाद था. इसी चेहरे में उस ने विश्वास, सुरक्षा और प्यार खोजा था, पर आज वही चेहरा उस के लिए एक अनचाही छवि बन चुका था. सुधा को शादी के सपनों से भरे शुरुआती दिन याद हो आए, जब हर सुबह विश्वास के साथ शुरू होती थी. उस ने अपने वजूद को रवि की जिंदगी में इस आसानी से पिरो दिया था, जैसे कोई धागा कपड़े का हिस्सा बन जाता है, पर अब धीरेधीरे उस धागे पर बहुत ज्यादा खिंचाव आने लगा था. जब सुधा ने पहली बार अपनी पीड़ा जाहिर की थी, तब उसे यकीन था कि उस की आवाज सुनी जाएगी. उसे लगा था कि सच में इतनी ताकत जरूर होती है कि वह इंसाफ को ?ाक?ार दे. परिवार ने उसे सुना भी. उसे हमदर्दी मिली. उस की आंखों के आंसू पोंछे गए पर इंसाफ कभी नहीं मिला. हर बार उसे यही सम?ाया गया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. तुम्हें थोड़ा और सब्र रखना चाहिए.

धीरेधीरे सुधा को सम? आने लगा कि परिवार के पास पीड़ा को स्वीकार करने की सम? तो है, पर उस का हल निकालने की हिम्मत नहीं है. समय बीतता गया और हर बार सुधा के टूटे विश्वास को सम?ाते के धागों से रफू कर दिया गया. वह बाहर से एकदम सही दिखती रही, पर भीतर से उस का वजूद धीरेधीरे कमजोर होता गया. बैठक खत्म हो चुकी थी. लोग एकएक कर के उठने लगे. जातेजाते सब ने हमदर्दी से सुधा के कंधे पर हाथ रखा. रवि बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया. सुधा वहीं बैठी रही. अब वहां गहरा सन्नाटा था. उस की नजर सामने रखी उस पुरानी साड़ी पर पड़ी, जिसे उस ने सालों पहले बड़े जतन से रफू किया था. वह साड़ी सुधा की मां की निशानी थी. एक बार उस का किनारा फट गया था. उस ने सूईधागा ले कर उसे सावधानी से जोड़ दिया था, पर समय के साथ वही जगह बारबार फटती रही.
हर बार उस ने उसे फिर से रफू किया. अब वह हिस्सा इतना कमजोर हो चुका था कि धागे भी उसे संभालने में नाकाम थे.

सुधा ने साड़ी को हाथ में लिया. उस की उंगलियां उस रफू किए गए हिस्से पर ठहर गईं. उसे सम? आया कि वह साड़ी केवल कपड़ा नहीं, उस की अपनी जिंदगी है. बारबार रफू किया गया विश्वास, ऊपर से भले ही जुड़ा हुआ दिखाई दे, पर भीतर से वह अपनी बुनियादी ताकत खो देता है. एक दिन ऐसा आता है, जब मामूली सा खिंचाव भी उसे फिर से तोड़ देता है और फिर वह टूटन आखिरी होती है. उस पल उसे एक गहरा सच सम? में आया. रफू करना केवल टूटन को छिपाता है, उसे खत्म नहीं कर पाता और हर बार रिश्ते को रफू करते हुए हम खुद को कमजोर करते जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रवि यह बात अच्छी तरह जानता था कि समाज अलगावसामाजिक बहिष्कार करने के अलावा हमेशा उस के हक में ही खड़ा रहेगा, क्योंकि इस सिस्टम में शादी के बावजूद दूसरी औरत से गलत संबंधों का बने रहना पीडि़त इनसान की इज्जत से शायद ज्यादा अहम माना जाता है.

सुधा ने साड़ी को सावधानी से तह किया और अलमारी में रख दिया, फिर उस ने सूई और धागे को कुछ पलों तक देखा, मगर इस बार उस ने उन्हें उठाया नहीं, क्योंकि वह जान चुकी थी कि हर दरार को रफू करना जरूरी नहीं होता. कुछ दरारें हमें यह सिखाने के लिए होती हैं कि अब खुद को बचाना है कि केवल संबंधों को ढोते जाना है. सुधा के भीतर एक गहरी चुप्पी थी, पर इस बार वह चुप्पी हार की नहीं, बल्कि एक जागरूकता का अहसास था. शायद पहली बार उस ने खुद को रफू होने से बचा लिया था.                
 

जया विनय तागड़े

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

Hindi Story: हिसाब

Hindi Story: पिता का साया उठते ही मुन्नी का बचपना अचानक बालिग हो गया. परिवार पालने के लिए वह आर्केस्ट्रा में डांसर बनी जहां साहिल ने उस की देह भोगी. भाई भी उसे पसंद नहीं करता था. क्या मुन्नी के बलिदान का हिसाब हुआ?

मुन्नी को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बड़ी हो गई. उस के जीवन में उम्र का बढ़ना किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह आया, बिना पूछे, बिना रुके. मुन्नी घर की बड़ी बेटी थी. छोटे भाई की बड़ी बहन और मां के लिए एक ऐसा सहारा जो बचपन में ही बालिग बना दिया गया. जब मुन्नी 12 साल की थी, तभी पिता का साया उठ गया. प्राइवेट नौकरी थी उन की, कोई पैंशन नहीं, कोई जमीनजायदाद नहीं.

पिता की मौत के बाद सरकार की अनुकंपा पर मां को नौकरी तो मिली, पर इतनी मामूली कि उस से घर का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से हो पाता था. घर में शोक था, पर उस से भी बड़ा बोझ जिम्मेदारी का था. पिता के जाने के कुछ महीनों बाद ही मुन्नी की किताबें धीरेधीरे बंद होने लगीं. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छूट गया. मां ने कहा नहीं था कि पढ़ाई छोड़ दो, पर हालात ने कह दिया था. किसी ने जोर नहीं डाला, किसी ने रोका भी नहीं. समाज में यह तय था कि लड़की की पढ़ाई रुके तो चलेगा, पर लड़कों की नहीं. मुन्नी ने चुपचाप यह नियम स्वीकार कर लिया.

किशोरावस्था मुन्नी के जीवन में आई ही नहीं. जब उस की सहेलियां सपने बुन रही थीं, तब वह सुबह चूल्हा जलाती, भाई को स्कूल भेजती और मां की थकी आंखों में झांक कर समझ जाती कि शिकायत का कोई मतलब नहीं. वह खुद को भूले चली गई. 18 की उम्र, वही उम्र जब लड़कियां खुद को खोजती हैं, सजती संवरती हैं और भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन मुन्नी के लिए यह उम्र एक डर बन कर आई. समाज की बेरहम नजरें, महल्ले की फुसफुसाहट और हर दिन बढ़ता बोझ.

एक डाक्टर के यहां सेविका की नौकरी मिली, 5,000 रुपए महीना. यह नौकरी मुन्नी के लिए सम्मान नहीं, मजबूरी थी. सुबह से शाम तक काम, फिर घर लौट कर वही जिम्मेदारियां. शरीर थक जाता, मन उस से पहले. यहीं मुन्नी की मुलाकात साहिल से हुई. साहिल सिक्योरिटी गार्ड था, स्मार्ट, आत्मविश्वासी और बातों में चालाक. उस ने मुन्नी से वैसे बात की, जैसे अब तक किसी ने नहीं की थी. दया, आदेश, बस अपनापन.
मुन्नी के जीवन में पहली बार किसी ने उस से पूछा था, ‘‘तुम थक जाती हो ?’’

यह सवाल मुन्नी को भीतर तक छू गया. धीरेधीरे वह साहिल की बातों पर भरोसा करने लगी. उस ने मुन्नी को समझाया कि उस की मेहनत की सही कीमत नहीं मिल रही. उस ने शहर की एक नामी आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करने का सुझाव दिया, जहां एक रात में 1,000 से 1,200 रुपए मिलते थे. खाना अलग.
‘‘इस से घर की हालत सुधर जाएगी,’’ साहिल ने कहा. मुन्नी ने ज्यादा नहीं सोचा. वह सोच भी कैसे पाती? उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि वह दूसरों के लिए जिए. मां और भाई को बताया गया कि नाइट ड्यूटी है. सच आधा था, झूठ पूरा.

आर्केस्ट्रा कंपनी में मुन्नी की शुरुआतबैक डांसरके रूप में हुई. पहले दिन मंच पर चढ़ते समय उस के पैर कांप रहे थे. तालियों की आवाज अजनबी थी, नजरें और भी ज्यादा. धीरेधीरे उसे तालियों की आदत पड़ गई. फिर कपड़े छोटे हुए, कदम तेज हुए और आत्मसम्मान कहीं पीछे छूटा चला गया. एक साल के भीतर मुन्नी फ्रंट लाइन में थी. आमदनी बढ़ी, पर कीमत भी. पैसा घर जा रहा था, भाइयों की पढ़ाई चल रही थी, इसी ने उसे चुप रखा. साहिल से नजदीकियां बढ़ीं. मुन्नी ने पहली बार भविष्य के सपने देखेशादी, सम्मान, एक सामान्य जीवन. लेकिन हर बार जब वह शादी की बात करती, साहिल टाल देता.

साहिल के लिए मुन्नी कभी सिर्फ एक लड़की नहीं थी, बल्कि वह उस के लिए सुविधा थी, सहारा थी और बिना जवाबदेही का रिश्ता. उसे मुन्नी से वह सब मिला, जिस के लिए किसी भी मर्द को समाज के सामने कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. मुन्नी के बढ़ते पैसों से साहिल की जिंदगी आसान होती गई. कभी मोबाइल रिचार्ज, कभी कपड़े, कभी दोस्तों के साथ शराबछोटीछोटी जरूरतों के नाम पर वह उस का पैसा लेता रहा और मुन्नी देती रही, क्योंकि उसे यह सिखाया गया था कि प्रेम में हिसाब नहीं होता. जिस देह को साहिल सार्वजनिक मंच पर नाचते देखता था, उसी देह को निजी कमरों में वह बिना किसी वचन, बिना किसी भविष्य के भोगता था.

सब से बड़ा फायदा यह था कि साहिल को कुछ भी साबित नहीं करना पड़ता था. शादी का दबाव, जिम्मेदारी का बोझ, समाज का डर, क्योंकि समाज का नियम सीधा है कि अगर रिश्ता टूटेगा, तो सवाल औरत से होंगे. साहिल जानता था कि मुन्नी  के पास जाने को कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है. उस की मजबूरी ही साहिल की ताकत थी. जब तक मुन्नी उस के लिए उपयोगी थी, भावनात्मक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी, तब तक साहिल मुसकराता रहा. और जिस दिन मुन्नी ने सम्मान मांगा, शादी की बात की, भविष्य में बराबरी चाही, उसी दिन साहिल ने समाज का सब से पुराना हथियार उठायाचरित्र.

‘‘तुम जैसी लड़कियों से शादी नहीं की जाती,’’ यह कहते समय साहिल यह भूल गया या जानबूझ कर अनदेखा कर गया कितुम जैसी लड़कीउस ने खुद बनाई थी, अपने फायदे के लिए, अपनी सुविधा के लिए. यह एक वाक्य नहीं था. यह समाज का फैसला था, साहिल के मुंह से निकला हुआ. मुन्नी को लगा जैसे किसी ने उस के भीतर सालों से जमा आत्मसम्मान को एक झटके में कुचल दिया हो. उसे याद आया वही साहिल, जिस ने उसे इस रास्ते पर चलने की सलाह दी थी. वही साहिल, जिस ने उस की देह को चाहा, उस के पैसों से सुविधा पाई और उस के त्याग को चुपचाप इस्तेमाल किया.

आज वही साहिल उसेतुम जैसी लड़कीकह रहा था. उस पल मुन्नी को पहली बार साफ दिखा कि समाज और मर्द, दोनों की नैतिकता एकजैसी होती है. जरूरत पड़ने तक चुप्पी और जरूरत खत्म होते ही चरित्र का सवाल. आर्केस्ट्रा में नाचते समय जिन हाथों ने तालियां बजाई, उन्हीं हाथों ने अब उंगलियां उठाईं. दिन में वही लोग उसे गिरी हुई कहते थे और रात में उसी पर नोट उड़ा कर खुद को सभ्य समझते थे. मुन्नी ने महसूस किया कि उस ने कभी कोई गलत चुनाव नहीं किया, उस के सामने बस गलत औप्शन रखे गए थे. उस की सब से बड़ी गलती यह थी कि उस ने भरोसा किया और इस समाज में एक औरत का भरोसा ही उस का सब से बड़ा अपराध होता है.

उस रात मुन्नी देर तक आईने के सामने बैठी रही. उस आईने में उसे नर्तकी दिखी, प्रेमिका बस एक औरत दिखी, जिसे हर किसी ने अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित किया था. मुन्नी को समझ गया कि औरत की देह जब तक जरूरत है, तब तक मौन स्वीकृति है और जैसे ही वह सम्मान मांगती है, उसे उस के अतीत से सजा दी जाती है. मुन्नी इस दुनिया से निकलना चाहती थी. लेकिन पैसों की कमी, भाई की पढ़ाई और घर का खर्च, सब ने उस के पैरों में बेडि़यां डाल रखी थीं. मुन्नी की उम्र 30 के पार पहुंची. काम मिलने लगा कम. भाई बड़ा हो गया था. उसे सबकुछ समझ आने लगा था, पर उस ने भी आंखें बंद कर लीं. सच देखना आसान नहीं होता खासकर जब सच आप के आराम की कीमत पर हो.

मां की मौत के बाद मुन्नी पूरी तरह अकेली रह गई. मुन्नी का भाई सबकुछ जानता था. वह इतना मासूम था कि सच समझ पाता, इतना नासमझ कि हालात से अनजान रहता. भीतर ही भीतर उसे बहन के काम से नफरत थी, ऐसी नफरत जो बोलती नहीं, बस जलाती रहती है. लेकिन वह चुप रहा. इसलिए नहीं कि उसे सच स्वीकार था, बल्कि इसलिए कि वही सच उन के भविष्य की सीढ़ी बन चुका था. मुन्नी की कमाई से भाई की पढ़ाई चली, किताबें आईं, कपड़े बदले, सपने बड़े हुए. वह घर में उस की ओर
देखता कम था, उस के पैसों की ओर ज्यादा. जब पड़ोस में बातें होतीं, सिर झुका लेता. विरोध नहीं, बस बचाव. क्योंकि विरोध की कीमत होती है और उस कीमत को चुकाने की हिम्मत उस में नहीं थी.

भाई ने अपना घर बसा लिया था. जिस के लिए मुन्नी ने सबकुछ दांव पर लगाया था, वही उस से दूरी बनाने लगा. अब उसे उस के पैसों की जरूरत नहीं थी और समाज में एक औरत की कीमत अकसर उस की जरूरत तक ही होती है. वह उस समय चाहता था कि बहन इस दलदल से बाहर आए, लेकिन बिना यह पूछे कि बाहर आने के बाद वह जिएगी कैसे. उस की चुप्पी में नाराजगी भी थी, अपराधबोध भी, पर उस से ज्यादा सुविधा थी. और यह सुविधा नैतिकता की सब से बड़ी कमजोरी बन गई. आज जब मुन्नी अपने घर में सम्मान से बैठी है, तब उस की चुप्पी और भी गहरी हो गई है. अब बोलने से सिर्फ एक ही सवाल उठेगा किजब तुम्हें नफरत थी, तब तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई?’

मुन्नी उसी एक कमरे में रह गई, खामोश, अकेली, थकी हुई. आज वह समझ रही है कि औरत का जीवन अकसर कर्तव्य औरचरित्रके बीच पिसता है. अगर वह परिवार के लिए जिए, तो त्याग की देवी. अगर अपने लिए कुछ चाहे, तो चरित्र पर सवाल. नाचने वाली औरत को हर मर्द भोगता है, चाहे वह प्रेमी के रूप में हो, भाई के रूप में या समाज के रूप में. आज मुन्नी किसी मंच पर नहीं नाचती. अब उस के जीवन में तालियां नहीं हैं, सिर्फ सन्नाटा है. वह उसी एक कमरे में रहती है, जहां दीवारों पर अब भी बीते सालों की आवाजें टकरा कर लौट आती हैं. कभी मां की थकी सांसें, कभी भाई की पढ़ाई की चिंता, कभी साहिल की मीठी और फिर कड़वी बातें.

मुन्नी अब किसी से शिकायत नहीं करती. शायद इसलिए नहीं कि दर्द कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि वह समझ चुकी है कि इस समाज में औरत की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं, जब तक वह मनोरंजन बने.
मुन्नी अपनेआप से पूछती है कि क्या उस का त्याग कभी किसी खाते में दर्ज हुआ? क्या उस की जवानी, उस का श्रम, उस का मौन किसी रजिस्टर में लिखा गया? या फिर औरत का बलिदान हमेशा स्वाभाविक मान कर भुला दिया जाता है? मुन्नी को याद आता है कि जब वह कमाती थी, तब सब चुप थे. जब उस ने सवाल किया, तब सब ने चरित्र देखा. समाज ने उस से कभी यह नहीं पूछा कि उस ने क्या खोया, बस यह गिना कि उस ने क्यागलतकिया.

मुन्नी को इस बात का दुख नहीं है कि उस ने सब के लिए जिया, दुख इस बात का है कि किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वह भी इनसान थी. आज उस का भाई अपने बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाता हैं. उन्हें नाचती औरतें बुरी लगती हैं. मुन्नी यह सोच कर मुसकरा देती है कि शायद उस के जीवन का बलिदान अगली पीढ़ी के लिए उदाहरण बन गया, लेकिन उस के लिए कभी इंसाफ नहीं बन सका. मुन्नी अब यह नहीं पूछती, ‘‘मेरे लिए कौन जिएगा?’’ अब मुन्नी एक और सवाल पूछती है, ‘‘कब तक औरत का बलिदान बिना हिसाब के चलता रहेगा?’’ शायद अब यही  सवाल मुन्नी की नई शुरुआत बने और उसे कुछ सुकून दे.     

पाकिस्तानी हौकी खिलाडि़यों ने आस्ट्रेलिया में धोए बरतन पाकिस्तान की नैशनल हौकी टीम के कप्तान इमाद बट ने आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद लाहौर हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि आस्ट्रेलिया में नैशनल टीम के खिलाडि़यों से रसोई, बरतन, कपड़े और बाथरूम साफ करवाए जाते थे. वे अपना खाना खुद पकाते थे और सड़कों पर रहते थे

बरतन धोने और सफाई करने के बाद खिलाड़ी मैच में कैसा प्रदर्शन करेंगे? कप्तान इमाद बट ने पाकिस्तान हौकी फैडरेशन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वे मौजूदा टीम मैनेजमैंट के साथ आगे नहीं बढ़ सकते. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में खेल रही पाकिस्तानी हौकी टीम के खिलाडि़यों की तसवीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे, जिन में उन्हें अपना खाना पकाते और बरतन साफ करते हुए देखा जा रहा था. कई तसवीरों में वे बैग के साथ सड़क किनारे बैठे हुए भी नजर रहे थे.

मुनीष भाटिया

 

Hindi Kahani: लुट गई जोगी तेरे प्यार में

Hindi Kahani: जमीला और शर्मिला पक्की सहेलियां थीं. उन की दोस्ती को देख कर घरपरिवार वाले और पड़ोसी उन्हें दो जिस्म एक जान कहते थे. दोनों सहेलियों ने गांव में ही एकसाथ पढ़ाई की थी. आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल होने, गरीबी और परदा प्रथा की वजह से उन के परिवारों ने आगे दिलचस्पी नहीं दिखाई. नतीजतन, वे दोनों घर पर ही रह कर परिवार के साथ बीड़ी बनाने का काम करने लगीं.
जमीला कब जवान हो गई, उस की सम? में नहीं आया. घर के बड़ेबूढ़े जब उसे टोकते, ‘बड़ी हो गई है तू, ठीक से दुपट्टा ओढ़ कर बाहर निकला कर. अकेले घूमने मत जाना. बहू, इसे नकाब ला कर दे. अब कोई छोटी बच्ची थोड़े ही है, बड़ी हो गई…’


वह सोचती, ‘आखिर मु? में ऐसा क्या हुआ है? जब मैं स्कूल जाती थी, तब कोई कुछ नहीं कहता था.’
शर्मिला की शादी पास के गांव में हो गई और जमीला अकेली रह गई. दिल की बात कहनेसुनने वाला कोई रहा. उस की जिंदगी कैद के पंछी की तरह रह गई. बीड़ी बनाते और घर का काम करतेकरते उस का दम घुटने लगा. समय पंख लगा कर उड़ने लगा. जवानी जमीला को जिंदगी का मजा लूटने की दावत देने लगी. वह अंदर ही अंदर कसमसाने लगी. जब वह जवान जोड़ों को देखती, तो उस की बेचैनी और बढ़ जाती. शहनाई की आवाज सुन कर वह जोश में जाती. ‘‘जमीला के अब्बू, देखनाजमीला को क्या हुआ है…’’ उस की मां ने घबरा कर आवाज दी.


‘‘आया बेगम,’’ बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठे जमीला के अब्बू जावेद मियां ने कहा. वे दौड़ेदौड़े बैठक में आए, जहां जमीला अकेली बैठी बीड़ी बनातेबनाते बेहोश हो कर गिर गई थी. ‘‘क्या हुआ बेटी, देखो मु?आंखें खोलोबेगम, पानी लाओइस के मुंह पर पानी के छींटे मारो,’’ जावेद मियां ने कहा. तब तक उन के दोस्त भी अंदर गए थे. ‘‘कैसे हो गया यह सब?’’ मौलाना ने पूछा, जो जावेद के दोस्त थे.
‘‘क्या बताऊंजमीला बैठी बीड़ी बना रही थी कि एकाएक बेहोश हो कर गिर पड़ी,’’ जमीला की मां ने बताया. मौलाना ने ?ाड़फूंक शुरू कर दी. मुंह पर पानी के छींटे मारे, प्याज सुंघाई गई और तकरीबन आधा घंटे बाद जमीला को होश गया. जमीला कुछ थकीथकी सी लग रही थी, इसलिए उसे आराम करने की सलाह दे कर जावेद मियां के दोस्त वहां से चले गए. दूसरे दिन मौलाना ने जावेद मियां के घर पर दस्तक दी. दोनों बैठ कर जमीला की बीमारी पर बातचीत करने लगे.


‘‘देखो जावेद मियां, ऐसे हालात में लड़की की शादी करने में मुश्किल आएगी,’’ मौलवी ने कहा. ‘‘बात तो सही है, पर इस का कोई उपाय तो बताओ? ‘‘जमीला के ठीक होते ही मु? जैसा भी लड़का मिलेगा, मैं उस की शादी कर दूंगा,’’ कह कर जावेद मियां चुप हो गए. ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं, फिर तुम्हें खबर करूंगा…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’ तकरीबन हफ्तेभर बाद मौलाना जावेद मियां के घर दोबारा आए. ‘‘आओ मौलाना, काफी दिन बाद आना हुआ,’’ जावेद मियां ने कहा. ‘‘मैं तुम्हारे काम में लगा था. बड़ी मुश्किल से एक शख्स मिला है. उस का कहना है कि वह लड़की को ठीक कर देगा. कुछ वक्त लगेगा, पैसा भी खर्च होगा. जब तक ?ाड़फूंक चलेगी, तब तक यह बात किसी तक पहुंचे, वरना इल्म टूट जाएगा.’’ ‘‘मौलाना, मु? हर शर्त मंजूर है. तुम आज से ही इलाज शुरू करा दो. अपनी बेटी की बेहतरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’


मौलाना के मन में खोट था. उस ने अपने एक दूर के साले असद से इस पूरे मसले पर पहले ही बात कर ली थी. मौलाना ने उस से कहा था, ‘देखो मियां, मैं ने सौदा पटा लिया है. जावेद मियां की जमीन अपनी जमीन से लगी हुई है. हमें उसे हड़पना है. अब जा कर फंसा है. पहले तो बड़ीबड़ी बातें करता था, खेत जाने का रास्ता बंद कर दिया था, इसलिए मजबूरी में मु? उस से दोस्ती करनी पड़ी. तुम ऐसी चाल चलो कि जावेद की जमीन बिक जाए और वह मु?मिल जाए.’ असद एक शातिर बदमाश था. उस की बीवी उस की हरकतों से तंग कर पिछले 10 सालों से अपने मायके में बैठी थी. गांव के भोलेभाले लोगों को गंडेतावीज बना कर देना, उन से रकम ऐंठना उस का पेशा था. असद ने जावेद मियां के घर कर अपना काम शुरू कर दिया. शुरूशुरू में तो जमीला को कुछ भी अच्छा लगा, लेकिन अकेले में पराए मर्द को पा कर वह धीरेधीरे खुश रहने लगी. जब असद को महसूस हुआ कि जमीला उस की ओर खिंच रही है, तो उस ने जावेद मियां से कहा, ‘‘जावेद साहब, कुछ जरूरी काम से मैं 1-2 दिन के लिए घर जा रहा हूं, लेकिन जल्दी ही वापस जाऊंगा.’’


जाने से पहले मौलाना और असद के बीच साजिश की लंबी बात चली. इसी के तहत वह अचानक अपने घर चला गया. इधर जावेद मियां परेशान हो उठे, क्योंकि जमीला फिर से बारबार बेहोश होने लगी थी.
वे घबरा कर मौलाना के पास गए और असद को जल्द से जल्द बुलाने की गुहार लगाई. मौलाना की खबर पा कर असद वापस आया ही था कि 8-10 मर्द और औरत उसे ढूंढ़ते हुए जावेद मियां के घर जा पहुंचे.
वे सभी गुजारिश करने लगे, ‘जोगी बाबा गांव वापस चलो, हम सब परेशान होने लगे हैं.’ इसी बीच मौलाना ने कर लोगों को सम?ाया कि आप के जोगी बाबा 2 दिन बाद आप के पास जाएंगे. रात में असद उर्फ जोगी बाबा के शरीर में भयानक हलचल होने लगी और वह जोरजोर से हंसने लगा. घर के सभी लोग जाग गए. बाहर से आए उस के चेले दुआ मांगने लगे, परेशानी से बचने के उपाय पूछने लगे. जोगी बाबा का गुस्से से भरा मिजाज देख कर सब डर गए. असद ने बताया कि जावेद के घर के पीछे किसी ने काला जादू कर दिया है, उसे निकाल कर नदी में डाल दो. पर सावधान, किसी की जान जा सकती है. 5 क्विंटल पुलाव बना कर फातिहा दिलाओ और पहले कहीं से काले जादू की पुडि़या ढूंढ़ो.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना खिलाओ. जोगी बाबा जो कहे वह करो. सब ठीक हो जाएगा.
काफी मशक्कत के बाद आखिर कपड़े में लिपटी एक पुडि़या मिल गई. उस पुडि़या में हड्डी, काजल, सिंदूर, अनाज, काली चूड़ी वगैरह मिली. शक अब यकीन में बदल गया. ‘‘जावेद मियां, बात को सम?…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘बच्ची प्यारी है या जायदाद. तुम ऐसा करो कि मेरे नाम जमीन की रजिस्ट्री कर दो. पूरा खर्चा मैं करता हूं. जब पैसा हो, तो मेरा पैसा लौटा देना और जमीन वापस ले लेना.’’ मौलाना ने अपनी चाल से जावेद को फांस लिया. अंधविश्वास में फंसे जावेद ने मौलाना की बात मान कर जमीन की रजिस्ट्री उन के नाम कर दी. इधर असद उर्फ जोगी बाबा ने ऐसी चाल चली कि जमीला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. अब वे दोनों बीमारी की आड़ लेकर जिंदगी का मजा लूटने लगे. ?ाड़फूंक के बहाने अब दोनों को कोई नहीं रोक पाता था. जमीला को जब से पराए मर्द का चसका लगा था, तब से वह खुश रहने लगी थी. उस के मांबाप इसे जोगी बाबा की ?ाड़फूंक का नतीजा मान रहे थे.

धीरेधीरे साल पूरा होने को आया. उस के मांबाप को जमीला की शादी की फिक्र होने लगी और वे
लड़के की तलाश में जुट गए. इस बात की भनक असद को लग गई. वह मौका पा कर वहां से रफूचक्कर हो गया. इसी बीच जमीला की शादी पक्की हो गई, लेकिन एक दिन वह अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ी.
लोगों के ?ाक?ोरने पर भी होश नहीं आया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया. लेडी डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, ‘‘हम ने बच्ची को देख लिया है. अब वह होश में गई है. आप उस का खयाल रखिए. भारी चीज उठाने दें, क्योंकि आप की बेटी मां बनने वाली है.’’ लेडी डाक्टर की यह बात सुन कर जावेद, उस की बेगम और रिश्तेदारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उन की जमीला ढोंगी जोगी के प्यार में लुट चुकी थी.  Hindi Kahani

लेखक  ए. खान

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