Exclusive Interview: मैं तीन तलाक को पसंद नहीं करती – स्मृति मिश्रा

Exclusive Interview: मुसलिम औरतों के हक से जुड़े शाहबानो बनाम मोहम्मद अहमद खान के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘हक’ को भले ही बौक्स आफिस पर ज्यादा कामयाबी न मिली हो, मगर इस फिल्म में शाजिया बानो के किरदार में यामी गौतम और शाजिया बानो के साथ खड़े रहने वाले नौकरानी उज्मा के किरदार में स्मृति मिश्रा की अदाकारी को काफी सराहा जा रहा है.

रायबरेली से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई तक का सफर करने वाली हीरोइन स्मृति मिश्रा पिछले 13 सालों से ऐक्टिंग जगत में हैं. वे अब तक ‘सावधान इंडिया’, ‘अधूरी कहानी हमारी’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘मंफोर्डगंज की बिनिया’, ‘धर्मपत्नी’ जैसे सीरियलों और ‘अ से अनार’, ‘रेड’, ‘तुम को मेरी कसम’ जैसी फिल्मों के अलावा नैटफ्लिक्स की वैब सीरीज ‘शी2’ में ऐक्टिंग कर चुकी हैं.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की एक फिल्म ‘हक’ चर्चा में है. इस को ले कर आप क्या कहेंगी?

आप सभी जानते हैं कि यह फिल्म शाहबानो कांड पर आधारित है, जिस में मैं ने उज्मा का किरदार निभाया है. मतलब लोग मु झे उज्मा के किरदार में देख रहे हैं. सभी को पता है कि शाहबानो के संघर्ष में उज्मा चट्टान की तरह खड़ी रह कर उस का साथ देती रही. इस फिल्म मेरे सभी सीन हीरोइन यामी गौतम के साथ ही हैं, क्योंकि उज्मा तलाक के खिलाफ है.

उज्मा का मानना है कि तलाक देना गलत है. इसी वजह से मैं ने इस किरदार को करने के लिए हामी भरी, क्योंकि मैं ने महसूस किया है और लोगों से बातचीत कर के भी मु झे यही पता चला कि छोटे से छोटे तबके के लोग भी तलाक के खिलाफ हैं. वैसे भी औरत कोई चीज नहीं है कि आप ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया.

निजी जिंदगी में आप का साबका कभी उज्मा जैसी किसी औरत से पड़ा है या नहीं और तलाक को ले कर आप की अपनी सोच क्या है?

यह बहुत विवादास्पद विषय है. इस पर ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन मैं ने जोकुछ पढ़ा है, उस आधार पर मैं तीन तलाक को कभी पसंद नहीं करती. तीन बार तलाक कह कर आप ने एक औरत को छोड़ दिया. इसे जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता.

आप ने एक औरत के साथ रहते हुए एक लंबा वक्त गुजारा, आप के बच्चे हुए, पर छोटी सी बात पर बिना किसी सोचविचार के उस औरत को अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिए बिना, सिर्फ तीन बार तलाक बोला और तलाक दे दिया… मेरी सम झ में नहीं आता कि कैसे लोग इसे कानूनी सही कहते रहे हैं.

13 साल के अपने ऐक्टिंग कैरियर के अनुभव को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

इन 13 सालों में बतौर कलाकार मु झे सीखने को बहुतकुछ मिला. यह मौका किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं मिल सकता. हम हर उस किरदार को जीते हैं, जो इस दुनिया में है. हम सिर्फ ऐक्टिंग नहीं करते, हम परदे पर किसी भी किरदार को जीते हुए उसे अंदर से महसूस करते हैं.

फिल्म ‘पवई’ में क्या खास है?

फिल्म ‘पवई’ में मुंबई के इस विकासशील उपनगर पवई में रहने वाली 3 अलगअलग औरतों की कहानियों को दिखाया गया है. इस में मैं ने उषा का किरदार निभाया है. इसी फिल्म में 2 और औरतों की कहानी है. इस फिल्म में इस बात को दिखाया गया है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब हो या फिर कामकाजी हो, सभी को संघर्ष करना पड़ता है, भले ही उन के संघर्ष के तरीके अलग हों.

अपने किरदार उषा को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

उषा का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने पति के साथ बिहार से मुंबई आती है. अब उस का पति नहीं है और वह लोगों के घरों का काम करती है. वह अपनी बेटी की भी परवरिश कर रही है. उस को मुंबई के बारे में कुछ नहीं पता है. वह तो अपने पति के भरोसे यहां आई थी, पर अब पति नहीं है. उस के पति ने जो मकान खरीदा था, उसे भी उस का देवर हड़पने की कोशिश कर रहा है.

इस किरदार के लिए आप ने किस तरह का होमवर्क किया?

मेरे घर में एक कामवाली बाई है. उस की दोस्त के साथ भी ऐसा हादसा हो चुका है. उस का पति उसे गांव से शहर ले कर आया था. पर शहर आते ही कि कुछ समय के बाद उस का पति बीमार हुआ और इस संसार को अलविदा कह गया. उस के बाद उस ने जिस तरह का संघर्ष किया, वह सब उस ने मु झे बताया था, तो इस किरदार को निभाते समय मु झे वह सब याद आया और मैं ने स्क्रिप्ट की भी मदद ली.

किसी भी किरदार को निभाते समय आप अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों का कैसे उपयोग करती हैं?

जब किसी किरदार से जुड़ा कोई हादसा मेरे साथ कभी घट चुका होता है, तो मैं उसे याद कर अपने किरदार में डालने की कोशिश करती हूं. अगर वैसा हादसा मेरी जिंदगी में न घटा हो, तो आसपास के लोगों से बात कर के जानने की कोशिश करती हूं.

कलाकार होने के साथसाथ आप पत्नी, बहू और एक बेटे की मां भी हैं. आप इन सारी जिम्मेदारियों को कैसे निभाती हैं?

मैं इन सभी जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती हूं और मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी को भी शिकायत करने का मौका न दूं. पर मु झे इन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए कई बार अपनी दीदी और पति से भी सहयोग लेना पड़ता है. Exclusive Interview

Sexual Health: माहवारी – अपने कोडवर्ड में बताएं हमदर्द को

Sexual Health: तकरीबन 12 साल की उम्र से ले कर अधेड़ उम्र तक महिलाओं को माहवारी से सामना करना पड़ता है. ऐसे में देशदुनिया में महावारी बताने के कई दिलचस्प ‘कोडवर्ड’ बना दिए गए हैं.

जापान के झंडे को ‘निशोकी’ कहते हैं, जिस का मतलब है ‘सूरज का झंडा’. इसे आमतौर पर ‘हिनोमारू’ भी कहा जाता है यानी ‘सूरज का घेरा’. यह झंडा सफेद बैकग्राउंड पर एक लाल गोले (सूरज का प्रतीक) के साथ बनाया गया है.

पर जब इंगलिश में कहा जाता है कि ‘जापान इज अटैकिंग’ तो यह कोई असल में जापान द्वारा किया गया हमला नहीं है, बल्कि उन लड़कियों या औरतों का कोडवर्ड होता है, जिन्हें माहवारी आई होती है.

यहां पर भी जापान के झंडे को ही सिंबल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, सफेद रंग पर लाल रंग का चढ़ना. मतलब अगर कोई लड़की बोल रही है कि ‘जापान इज अटैकिंग’, तो सुनने वाली समझ जाए कि उसे माहवारी आई है.

किसी लड़की को माहवारी आने का मतलब है कि वह मां बनने की काबिलीयत रखती है और अमूमन 12 साल की उम्र में हर लड़की को पहली माहवारी आ जानी चाहिए. कभीकभार यह उम्र 1-2 साल ऊपरनीचे हो सकती है.

माहवारी है क्या

माहवारी किसी महिला को कुदरत का सब से अनमोल तोहफा है. इसे ‘मासिक धर्म’ या ‘महीना आना’ भी कहते हैं. माहवारी में महिला के शरीर से गंदा खून और ऊतक बाहर निकलते हैं, जिस से महिला का शरीर गर्भधारण करने के लिए तैयार हो जाता है. ऐसा अमूमन महीने में 4-5 दिन होता है और यह चक्र 11-12 साल की उम्र से ले कर अधेड़ उम्र तक जारी रहता है.

पर भारत जैसे देश में माहवारी को हौआ बना कर रखा गया है. धर्म की जंजीरों में कुदरत की इस नायाब चीज को जकड़ कर रख दिया गया है.

एक सर्वे में सामने आया है कि आज भी 81 फीसदी लड़कियों को पता ही नहीं होता है कि उन्हें जब पहली बार माहवारी आए, तो उसे कैसे हैंडल करना है. उन की मां तक उन्हें इस की जानकारी देने में झिझकती है, क्योंकि उसे खुद अपने समय में अधकचरा ज्ञान दिया गया था. वह खुद इन दिनों में ‘अपवित्र’ हो जाती थी, तो बेटी को किस मुंह से बताए कि वह जिंदगी के ऐसे पड़ाव पर आ गई है, जहां से मां बनने का सुख भोगा जा सकता है.

पर जानकारी तो देनी ही होगी. यह लड़की को किसी सहेली से मिले या बड़ी बहन से या फिर महल्ले की किसी दीदी या फिर आंटी से, उसे अपने आंखकान खुले रखने होंगे.

सब से पहले तो लड़की को अपने शरीर में होने वाले बदलावों को समझना चाहिए. इन हालात में लड़की को अचानक शरीर में मरोड़ सी उठने लगती है. नाजुक अंगों पर बाल आने शुरू हो जाते हैं. आवाज में बदलाव महसूस होता है. चेहरे पर मुंहासे की शुरुआत होने लगती है. छाती में दर्द होता है. लंबाई बढ़ती है.

माहवारी के कोडवर्ड

अगर लड़की को माहवारी की जानकारी मिल भी जाती है, तो इन खास दिनों में उसे कुछ सावधानियां भी बरतनी चाहिए. उस में माहवारी में पैड लगाने और साथ रखने की जागरूकता होनी चाहिए, पर कभीकभार उन्हें जब इस के बारे में आपस में बात करनी होती है, तो बहुत सी लड़कियां कुछ खास शब्दों में बात करती हैं, ताकि सिर्फ उन्हें ही समझ आए, जैसे ‘जापान इज अटैकिंग’.

भारत में लड़कियां माहवारी को ‘पीरियड्स’, ‘मूड स्विंग्स’, ‘एमसी’, ‘महीना’, ‘खास दिन’ कह देती हैं. पर बहुत से देशों में माहवारी को अलगअलग कोडवर्ड में जाहिर किया जाता है, जैसे ‘नियाग्रा इज ब्लीडिंग’, ‘शार्क वीक’, ‘आंटी फ्लो’, ‘इट्स माई टाइम औफ द मंथ’, ‘इट्स माई मून टाइम’, ‘माई रैड वैडिंग’, ‘ब्लडी मैरी’, ‘कोड रैड’ वगैरह. Sexual Health

Women’s Safety: बेटियों को दहेज में सोनेचांदी की जगह दें रिवौल्वर और तलवार

Women’s Safety: हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है जिस ने सभी को झकझोर कर रख दिया. बताया जा रहा है कि दहेज के कारण एक पति ने अपनी ही पत्नी को आग के हवाले कर दिया. हालांकि, इस पूरे मामले को लेकर अलगअलग तरह की बातें सामने आ रही हैं. कुछ लोगों का कहना है कि महिला का किसी और से संबंध था और जब पति को इस की जानकारी मिली तो उस महिला ने मानसिक दबाव में आ कर खुद को आग लगा ली. वहीं दूसरी तरफ, परिजनों का आरोप है कि दहेज की मांग पूरी न होने पर पति ने बेरहमी से पत्नी को जिंदा जला दिया.

इसी घटना के बाद बागपत के गौरीपुर मितली गांव में ठाकुर समाज की एक महापंचायत बुलाई गई, जहां बेटियों की सुरक्षा और उन पर बढ़ते अपराधों को ले कर गहरी चिंता व्यक्त की गई. पंचायत में यह फैसला लिया गया कि समाज को अपनी पुरानी परंपरा को दोबारा जीवित करते हुए दहेज में सोनाचांदी देने की बजाय बेटियों को सेल्फ डिफेंस के लिए रिवौल्वर, तलवार और कटार जैसे हथियार देने चाहिए, ताकि वे खुद को सुरक्षित रख सकें.

आज हमारा समाज इस कदर बेरहम हो गया है कि किसी भी उम्र की लड़की खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती. आएदिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो रूह को झकझोर देती हैं. कभी किसी मासूम के साथ बलात्कार, तो कभी किसी लड़की की बेरहमी से हत्या. हर बार ऐसी खबरें सुन कर मन में यही सवाल उठता है कि आखिर ऐसे अपराधियों को इस से हासिल क्या होता है? चंद पलों की अपनी हवस के लिए वे न सिर्फ अपनी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे बरबाद कर लेते हैं, बल्कि उस लड़की और उस के परिवार की पूरी दुनिया को हमेशा के लिए उजाड़ देते हैं. पर रिवौल्वर और तलवार भी इस का इलाज नहीं है. Women’s Safety

Social Issue: औरतों पर जोरजुल्म नेता सब से आगे

Social Issue, विधायकों और सांसदों पर बलात्कार के आरोप

151 वर्तमान सांसदविधायक ऐसे हैं, जिन्होंने औरतों के ऊपर जोरजुल्म से जुड़े मामले घोषित किए हैं, जिस में स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (आईपीसी-354) विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री का अपहरण करना, या उत्प्रेरित करना (आईपीसी-366) संबंधी मामले दर्ज हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में 14 विधायकों और 2 सांसदों पर रेप के आरोप हैं. भाजपा और कांग्रेस के 5-5 विधायकोंसांसदों पर ये आरोप हैं.

इस में भाजपा के 3 विधायक और 2 सांसद हैं. वहीं, कांग्रेस के 5 विधायकों पर इस तरह के आरोप हैं. आम आदमी पार्टी, भारत आदिवासी पार्टी, बीजू जनता दल, तेलुगु देशम पार्टी के 1-1 विधायक शामिल हैं.

महिला मुख्यमंत्री होने के बाद भी देश का पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जो औरतों पर होने वाले जोरजुल्म में नंबर एक पर बना हुआ है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में 25, आंध्र प्रदेश में 21 और ओडिशा में 17 विधायकोंसांसदों पर महिला अपराध से संबंधित मामले दर्ज हैं, जबकि भाजपा के 55, कांग्रेस के 44, आम आदमी पार्टी के 13 विधायकसांसदों इस तरह के आरोप हैं.

मौजूदा दौर में जनप्रतिनिधियों पर इस तरह के आपराधिक आरोप लगने के चलते भारत में चुनाव सुधार की मांग भी बढ़ती जा रही है. एडीआर रिपोर्ट राजनीतिक दलों के लिए अपने उम्मीदवारों की गहन जांच करने और सार्वजनिक पद चाहने वालों के आपराधिक रिकौर्ड के बारे में मतदाताओं को जागरूक करती है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास बहाल करने के लिए भारतीय राजनीति में ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत है.

भारत के नागरिकों, समाजिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं को यह तय करना है कि आपराधिक बैकग्राउंड के शख्स को सार्वजनिक पद पर न बिठाएं, ताकि देश की अखंडता और राजनीति में सुचिता बरकरार रहे.

संविधान की प्रस्तावना में यह साफ लिखा है कि भारतीय संविधान जनता से शक्ति प्राप्त करता है. जनता दागी छवि वाले नेताओं को न चुन कर भारतीय राजनीति में सुधार ला सकती है. मगर अफसोस की बात यह है कि इन पदों पर चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर लोगों पर गंभीर किस्म के आपराधिक मामले दर्ज रहते हैं.

शादीशुदा औरतों पर जोरजुल्म करने के मामले केवल गरीब या मिडिल क्लास परिवारों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हाईप्रोफाइल सोसाइटी में भी औरतें महफूज नहीं हैं. मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक के परिवार की एक बहू काम्या भी इस जोरजुल्म की शिकार हुई हैं.

कांग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल के छोटे भाई देवेंद्र सिंह बघेल से काम्या दुबे की शादी 8 फरवरी, 2018 को धूमधाम से हुई थी. शादी के बाद से ही काम्या, देवेंद्र और उन की मां पीथमपुर में रहने लगे थे.

काम्या यही सम?ाती थीं कि उन के पति ‘बघेल फिलिंग्स’ नाम के पैट्रोलपंप पर जाते हैं. पर शादी के कुछ ही दिनों बाद घर में काम करने वाले एक नौकर ने काम्या को बताया कि उन के पति घर से कारोबार संभालने की बजाय शराब पीने के लिए जाते हैं.

काम्या के सपने जल्द ही बिखरने लगे थे. उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा था कि इस तरह एक इज्जतदार परिवार के? लोग उन्हें धोखा दे कर उन पर जोरजुल्म करेंगे.

पर जब काम्या के सब्र का बांध टूटा, तो 13 मई, 2025 को वे महिला पुलिस थाना पहुंचीं, जहां पर एसीपी निधि सक्सेना और थाना प्रभारी अंजना दुबे को अपने साथ हुए जोरजुल्म की जानकारी देते हुए लिखित में शिकायत दर्ज कराई.

भोपाल महिला थाना पुलिस ने इस मामले में कांग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल, उन की पत्नी शिल्पा सिंह बघेल, भाई देवेंद्र सिंह बघेल, मां चंद्रकुमारी और बहन शीतल सिंह बघेल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 85, 351(2), 3(5) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

नेता प्रतिपक्ष पर भी गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार पर भी अपनी पत्नी पर जोरजुल्म करने के अलावा अपनी लिवइन पार्टनर सोनिया भारद्वाज की हत्या का गंभीर आरोप लग चुका है.

इस मामले में मार्च, 2025 में उन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पैशल लीव पिटीशन दायर की गई है. यह पिटीशन और किसी ने नहीं, बल्कि उमंग सिंघार की पहली पत्नी प्रतिमा मुदगल ने दायर की है.

मामला 16 मई, 2021 का है. उमंग सिंघार के भोपाल वाले बंगले के बैडरूम में सोनिया भारद्वाज की लाश मिली थी. पुलिस ने तब आईपीसी की धारा 306 के तहत आत्महत्या का केस दर्ज किया था. उस समय उमंग सिंघार के एक आईपीएस रिश्तेदार के दबाव में पुलिस ने महिला की मौत के मामले को सुसाइड में बदल दिया था.

उमंग सिंघार की पत्नी प्रतिमा मुदगल ने इस मामले में एक याचिका दायर की है, जिस में उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. याचिका में प्रतिमा मुदगल ने कहा है कि मृतक सोनिया के बेटे ने डीजीपी को एक खत लिखा था, जिस में बेटे ने कहा था कि उस की मां की जान ली गई है, पर उमंग सिंघार और पुलिस ने मिल कर मामले को दूसरा रूप दे दिया है.

पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद केस ट्रायल के लिए पहुंच गया. इसी बीच एफआईआर रद्द करने के लिए हाईकोर्ट जबलपुर में अपील की गई. कोर्ट ने सुनवाई के बाद 5 जनवरी, 2022 को एफआईआर रद्द करने के आदेश दिए. याचिकाकर्ता पहली पत्नी ने इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है.

उमंग सिंघार की पत्नी प्रतिमा मुदगल ने अब खुल कर इस का विरोध कर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई है. 142 पन्ने की याचिका में प्रतिमा मुद्गल ने साल 2022 में जबलपुर हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिस के तहत उमंग सिंघार को क्लीनचिट दी गई थी.

उमंग सिंघार ने 16 अप्रैल, 2022 को भोपाल में प्रतिमा मुद्गल से शादी की थी. प्रतिमा ने आरोप लगाते हुए कहा है कि शादी के 2 महीने बाद उमंग सिंघार का बरताव बदल गया था. वे उन्हें मानसिक रूप से सताने लगे थे. उमंग सिंघार ने उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी भी दी थी. इस पूरे मामले की शिकायत उन्होंने धार थाने में की थी.

बहू को सुसाइड करने पर मजबूर किया

कानून की शपथ लेने वाले मंत्री भी जातबिरादरी की खाई को पाटने की बजाय उसे और गहरा करने पर आमादा हैं. इस का सुबूत मध्य प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री पर लगे आरोप दे रहे हैं.

मार्च, 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के तब के मंत्री रामपाल सिंह की बहू ने खुदकुशी कर अपनी जान दे दी थी, क्योंकि मंत्री और उन का परिवार उसे अपनी बहू मानने को राजी नहीं था.

राजपूत जाति के मंत्री के दूसरे बेटे गिरजेश प्रताप सिंह ने 20 जून, 2017 को आर्य समाज मंदिर में उदयपुरा की प्रीति रघुवंशी से लवमैरिज की थी, जो मंत्री को नागवार गुजरी थी.

रामपाल सिंह अपने बेटे के इस ब्याह को सामाजिक तौर पर मंजूरी देने को तैयार नहीं थे और उस की दूसरी शादी कराने पर तुले हुए थे.

जब गिरिजेश की पत्नी प्रीति को पता चला कि उस के ससुर ने पति की दूसरी सगाई इंदौर में करा दी है, तो प्रीति रघुवंशी ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. मामला मीडिया में आने के बाद भी मंत्री रामपाल लगातार प्रीति को अपनी बहू मानने से इनकार करते रहे, लेकिन उन का बेटा गिरिजेश प्रीति के अस्थि विसर्जन में शामिल हुआ था.

हालांकि, इस घटना के बाद रामपाल सिंह को रघुवंशी समाज के विरोध का सामना करना पड़ा था और उन का राजनीतिक कैरियर भी खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है.

सताने में नेता कम नहीं हैं

हमारे देश में औरतों पर होने वाले जोरजुल्म का मुद्दा एक गंभीर चिंता की बात बना हुआ है. देश में रोजाना औरतों पर जोरजुल्म की वारदातें हो रही हैं, पर सरकार इन्हें रोकने में नाकाम ही रही है. औरतों सताने में जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि भी पीछे नहीं हैं.

एडीआर यानी एसोसिएशन औफ डैमोक्रेटिक रिफौर्म्स की ओर से जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि औरतों को सताने में जनप्रतिनिधियों की लंबी लिस्ट है.

इस लिस्ट में हिमाचल प्रदेश के भी एक जनप्रतिनिधि का नाम शामिल है. हिमाचल प्रदेश से 4 लोकसभा और 3 राज्यसभा सांसद आते हैं, जबकि 68 विधायक हिमाचल विधानसभा के सदस्य हैं. इन में से एक विधायक का नाम एडीआर की रिपोर्ट में शामिल है.

हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की चिंतपूर्णी सीट से कांग्रेस विधायक सुदर्शन बबलू पर भी महिला अपराध से जुड़ा मामला दर्ज है.

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, उन पर महिला अपराध से जुड़ी आईपीसी की धारा 509 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द, इशारा या कृत्य) के तहत एक मामला दर्ज है.

वैसे, हिमाचल प्रदेश के अलावा मणिपुर, दादर नगर हवेली और दमन और दीव ही 2 ऐसे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं, जहां 1-1 जनप्रतिनिधि के खिलाफ महिला अपराध से जुड़े मामले चल रहे हैं.

इस के बाद गोवा, असम में 2-2, पंजाब, ?ारखंड में 3-3, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु में 4-4, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, केरल में 5-5 जनप्रतिनिधि इस लिस्ट में शामिल हैं.

इस के अलावा राजस्थान में 6, कर्नाटक में 7, बिहार में 9, महाराष्ट्र और दिल्ली में 13-13, ओडिशा में 17, आंध्र प्रदेश में 21 और पश्चिम बंगाल में सब से ज्यादा 25 सांसद और विधायक इस लिस्ट में शामिल हैं. Social Issue

Social Update: औरतों की अपनी भी जिंदगी है

Social Update, लेखक – डा. इम्तियाज अहमद गाजी

शादीशुदा औरतों के अपने पति को छोड़ कर अपने से कम उम्र के दूसरे लड़कों के साथ भाग जाने की खबरें लगातार आ रही हैं. लगातार हो रही इन घटनाओं में यह साफतौर पर दिखाई दे रहा है कि औरतें लोकलाज को परे रख कर अपनी निजी जिंदगी को बेहतर तरीके से जीने को अब प्राथमिकता देने लगी हैं.

एक के बाद एक हो रही घटनाओं से दूसरी औरतों को भी प्रेरणा मिल रही है. ये घटनाएं मर्दों को सावधान करने वाली हैं, साथ ही उन्हें अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अगाह करने वाली भी हैं. अगर मर्दों ने इन वजहों की तह में जा कर अपनेआप को दुरुस्त नहीं किया तो इस तरह की घटनाएं किसी के भी साथ हो सकती हैं. कोई भी पति अपनी पत्नी से हाथ धो सकता है.

ऐसी घटनाओं से पति को अपनी पत्नी के बिछुड़ जाने का सिर्फ दर्द ही नहीं होता, इस के साथसाथ समाज में मुंह दिखाना भी बेहद मुश्किल हो जाता है.

पिछले दिनों सब को चौंका देने वाली घटना उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुई. एक औरत ने अपनी बेटी की शादी एक लड़के से तय कर दी. शादी की तारीख तय होने के बाद लड़का अकसर ही अपनी ससुराल आनेजाने लगा और फोन पर भी बातें करने लगा.

इस दौरान उस लड़के की त्यादातर बातें अपनी होने वाली सास से होने लगीं. बातोंबातें में अपनापन इतना ज्यादा बढ़ा कि दोनों में प्यार हो गया. चंद रोज ही शादी को बचे थे. इसके बावजूद वह औरत आपने होने वाले दामाद के साथ भाग गई.

दूसरी घटना भी उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में हुई. यहां एक 50 साल की औरत को अपने रिश्ते के 30 साल के पोते से प्यार हो गया. प्यार इतना ज्यादा परवान चढ़ा कि दोनों ने शादी रचा ली.

उत्तर प्रदेश के ही बदायूं जिले में बेटाबेटी की शादी तय करने के दौरान होने वाले समधी और समधन में प्यार हो गया. इस घटना में 4 बच्चों की मां अपने होने वाले समधी के साथ घर से भाग गई.

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में एक बूआ अपने भतीजे से प्यार करने लगी. घर वालों का विरोध और गुस्सा देख कर वह अपने भतीजे के साथ घर से भाग गई. दूसरे शहर में जा कर उस ने भतीजे से शादी रचा ली.

इसी तरह एक औरत ने अपने पति को छोड़ कर अपने से कम उम्र के चाचा के साथ शादी रचा ली. एक औरत के घर उस के बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूटर आता था. वह औरत लोकलाज को किनारे रख कर ट्यूटर से प्यार करने लगी और अब वह उसी से शादी करने को अड़ी है. उस का पति अरब देश में नौकरी करता है.

इस तरह की तमाम दूसरी घटनाएं लगातार सामने आ रही है. इन सारी ही घटनाओं में तकरीबन सभी औरतों की उम्र 50 साल या इस से ज्यादा है. इस तरह के कुछ मामले प्रकाश में आते हैं, बहुत सारे प्रकाश में नहीं आ पाते. इन की जड़ों में जा कर देखा जाए तो एक तरह से ये औरतों के जागरूक होने के मामले दिखाई दे रहे हैं.

आमतौर पर होता यह है कि ऐसी औरतें अनदेखी की शिकार होती हैं. इन की जिंदगी बेटाबेटी और नातेरिश्तेदारों की देखभाल में ही गुजर रही होती है. इन पर परिवार की जिम्मेदारियां इतनी ज्यादा डाल दी जा रही हैं कि उन की अपनी जिंदगी बदरंग हो जाती है.

ऐसे मामलों में औरतें घुटघुट कर जीने को मजबूर हो रही हैं. उन की अपनी जिंदगी कोई माने नहीं रख
रही है, जबकि हर इनसान की तरह उम्रदराज घरेलू औरतों को भी प्यार, सैक्स और हमदर्दी की बेहद जरूरत होती है. इन के बिना उन की अपनी जिंदगी बेमतलब सी दिखाई देती है.

इन्हें अपने परिवार से यह संदेश मिलने लगता है कि तुम्हारी अपनी जिंदगी कुछ भी नहीं. तुम्हें अपने पति, बच्चों और दूसरे परिवार वालों को ही खुश करने और उन्हें कामयाब बनाने के लिए काम करना और जीना है, जबकि हर किसी की अपनी निजी जिंदगी भी होती है.

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर किसी औरत को उस के पति का प्यार नहीं मिलता, उस के सैक्स की भरपाई नहीं होती, घर के लोग उस की खुशी और दुख पर ध्यान नहीं देते हैं, तब वह औरत एक तरह से दिमागीतौर पर बीमार हो जाती है. फिर उसे ऐसे लोग बहुत अच्छे लगने लगते हैं, जो उस की निजी जिंदगी की खुशी और दुख का ध्यान रखते हैं, उस की बातें करते हैं.

ऐसी औरतों की जिंदगी में जब कोई ऐसा मर्द आ जाता है, तब वे उस से प्यार करने लगती हैं. ऐसे हालात में उन के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि सामने वाला उम्र में उन से छोटा है या उन का सगासंबंधी है.

ऐसे हालात में पति को अपनी पत्नी की निजी जिंदगी पर खूब ध्यान देने की जरूरत है. उस के साथ प्यार भरा बरताव करें और उस की सैक्स की भूख को भी समझें, वरना उन के साथ भी ऐसी ही घटना घट सकती है. Social Update

नारी दुर्दशा का कारण धर्मशास्त्र और पाखंड

नारी को आज भी दोयम दर्जे का ही नागरिक समझा जाता है.सदियों से इनके ऊपर कई माध्यमों से जुल्म ढाने की परंपरा निरन्तर जारी है. इसमें धर्मशास्त्रों और पण्डे पुजारियों का भी अहम योगदान रहा है.

नारी के ऊपर शोषण और जुल्म में स्वयं नारी लोग ही मददगार की भूमिका में हैं.समाज में रिवाज और धर्म का पाठ पढ़ाकर नारियों को जुल्म के रसातल में डुबो दिया है. धर्म का कानून बनाने वाले मनु ने लिखा है,  ”स्त्री शूद्रों न धीयताम” यानी स्त्री और शूद्र को शिक्षा नहीं देनी चाहिए. अंधभक्त महिलाएं इन्हें ही अपना भगवान का हुक्म मानती हैं.

प्राचीन संत शंकराचार्य ने लिखा है, ”नारी नरकस्य द्ववारम”, यानी नारी नरक का दरवाजा है. लेकिन शायद उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि इसी नरक के दरवाजे से तुम भी पैदा हुवे है. तुलसीदास ने जिसे उनकी पत्नी ने दुत्कार दिया था, लिखा है, ”अधम ते अधम, अधम अति नारी’, भ्राता पिता पुत्र उर गारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी.”

“होहिं विकल सक मनहिं न रोकी,जिमि रवि मणि द्रव रविही विलोकि”

अथार्त चाहे भाई हो ,चाहे पिता हो,चाहे पुत्र हो नारी को अच्छा लगने पर वह अपने को रोक नहीं पाती जैसे रविमणि, रवि को देखकर द्रवित हो जाती है, वैसी ही स्थिति नारी की हो जाती है. वह संसर्ग हेतु ब्याकुल हो जाती है.

“राखिअ नारि जदप उर माही।जुबती शास्त्र नृपति बस नाही”

अथार्त स्त्री को चाहे ह्रदय में ही क्यों न रख लो तो भी स्त्री शास्त्र,और राजा किसी के वश में नहीं रहती है. नारी को पीड़ा दिलवाने में तुलसीदास की इस  चौपाई ने आग में घी का काम किया है, ”ढोल गंवार शुद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी।”

धर्मग्रन्थों में नारियों और दलितों के ऊपर शोषण जुल्म के प्रपंचो से पूरा भरा हुआ है.इस साजिश और छल प्रपंच को आज तक दलित और महिलाएं समझ नही पाईं हैं. उनके ही समझाई में आज भी बहुत बड़ी आबादी चलने को विवश है. स्वर्ग नरक पुनर्जन्म भाग्य भगवान की पौराणिकवादी संस्कृति में फंसकर अगला जन्म सुधारने के चक्कर में नारियां स्वयं को पुरुष की दासी समझते हुवे अन्याय कष्ट सहकर भी झूठे गौरव का अनुभव करती है. माता पिता भी बेटियों को पराया धन समझकर कन्यादान करके उन्हें अन्यायपूर्ण जीवन जीने को विवश करते हैं. दहेज,कन्यादान,सतीप्रथा,देवदासी प्रथा, पर्दाप्रथा, योनिशुचिता प्रथा, वैधब्य जीवन आदि नारी विरोधी प्रथाएँ धर्म की देन हैं.

इन प्रथाओं को  ग्रन्थों ने खूब महिमामण्डित किया है.  बेवकूफ अंधविश्वासी पिताओं की सनक पर बेटियों की कुर्बानी को स्वयंबर का नाम दिया गया. जुए के दांव पर नारियां लगाई गईं. बच्चे   पाने के लिए जबरन ऋषियों को सौंपी गईं.

नारियों की सहने से ज्यादा दुर्दशा से द्रवित होकर सर्वप्रथम ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने औरतों की पढ़ाई और सामाजिक आजादी के लिए काम किया.

1955-56 में नए हिन्दू कानूनों से भारतीय नारियों का बहुत बड़ा उपकार किया. जिन लोगों ने नारियों की भलाई के लिए काम किया आज की औरतें उनका नाम तक नहीं जानतीं. जिन शास्त्रों और पौराणिकवादी व्यवस्था ने इन पर जुल्म ढाए उनकी ही पूजा अर्चना आज तक महिलायें करती हैं.

पढ़ी लिखी औरतें भी व्रत, उपवास और गोबर तक की पूजा करती आ रही हैं और आज भी बदस्तूर जारी है.

गीता प्रेस की पुस्तक है,  ”गृहस्थ में कैसे रहें”  जिसके लेखक रामसुखदास हैं. इस पुस्तक में प्रश्न उतर के माध्यम से बताया गया है कि हिन्दू महिलाओं को कैसे जीवन जीना चाहिए. उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत कर रहें हैं.

प्रश्न: पति मार पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए ?

उत्तर: पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ. पीहर वालों को पता लगने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं. क्योंकि उन्होंने मार पीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी.

प्रश्न: अगर पीहर वाले भी उसको अपने घर न लें जाएं तो वह क्या करें ?

उत्तर: फिर तो उसे पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए. इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है? उसको पति की मार धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिए. सहने से पाप कट जाएंगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाए. यदि वह पति की मार पीट न सह सके तो पति से कहकर उसको अलग हो जाना चाहिए और अलग रह कर अपनी जीविका सम्बन्धी काम करते हुवे एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिए.

इस पुस्तक में सैकड़ों इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर है जिसमें हिंदू परिवारों को दिशा निर्देश दिए गए हैं.

यह पुस्तक सती का समर्थन करती है और महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने की वकालत करती है. हिन्दू वादी संगठनों द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर आवाज उठाई जाती है. अगर यह देश हिंदू राष्ट्र बनता है तो क्या नारियों के ऊपर इसी तरह के कानून लागू किये जायेंगे? पड़ोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश में कट्टरवादी मुस्लिम संगठन भी इसी तरह की सोच रखते हैं. मुस्लिम धर्म में भी तीन तलाक, हलाला और पर्दा प्रथा जैसी दकियानूसी बातें हैं और उसका समर्थन इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग करते हैं.इन कुप्रथाओं पर जब सवाल उठाये जाते हैं तो इस्लाम धर्म को मानने वाले धार्मिक कट्टरपंथी संगठन मौत का फतवा जारी करते हैं. क्या हिंदू राष्ट्र में ऐसा ही होगा?

आज औरतों पर शोषण और जुल्म ढाने का हथियार के रूप में इन धार्मिक पुस्तकों का उपयोग किया जाता है.इसे बढ़ावा देने और प्रचार प्रसार करने में साधू,  महात्मा, पंडे,  पुजारी, मुल्ला लोग लाखों की संख्या में एजेंटों के रूप में कार्य कर रहे हैं.

देश के कोने कोने से महिलाओं के साथ अपने पति द्वारा जुआ में हारने जैसी कुकृत्य, अत्याचार ,अनाचार और बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आते रहती है जिन पर सहज रूप से विश्वास भी नहीं होता.

इस तरह की एक घटना जौनपुर जिला के जफराबाद थाना क्षेत्र के शाहगंज की  है. एक जुआरी शराबी पति ने सारे रुपये हारने के बाद अपने पत्नी को ही जुए में दांव पर लगा दिया. वह जुए में अपनी पत्नी को हार गया. इसके बाद उसके जुआरी दोस्तों ने उसके पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया.

दूसरी घटना कानपुर की है. जुआ खेलने के एक शौकीन पति ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया. दांव हारने पर उसके चार दोस्तों ने उसके पत्नी पर हक जमाते हुए सामूहिक दुष्कर्म करना चाहा लेकिन बीबी किसी तरह किचन में घुस गई और उसने पुलिस को फोन कर दिया. तत्काल में पुलिस आ जाने की वजह से तारतार हो रही इज्जत बच गई.

महाभारत में द्रौपदी को जुए में हारने की घटना सर्वविदित है. आज भी दीवाली जैसे त्यौहार में संस्कृति और परम्परा के नाम पर जुआ खेलने का रिवाज सभ्य समाज तक में भी बरकरार है. सड़ी गली परम्परा को आज भी हम अपने कंधों पर ढो रहे है.

औरतों के ऊपर शोषण और जुल्म का समर्थन औरतों द्वारा ही किया जाता है. एजेंट के रूप में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है.

हर गाँव मे धार्मिक गुरुओं  द्वारा शिव चर्चा,  माता की चौकी, जागरण, हवन और प्रवचनों की बाढ़ सी आ गयी है जिसमें महिलाओं की हीउपस्थिति अधिक होती है. शुद्ध घी अपने परिवारवालों को नहीं खिला कर अंधभक्ति में जलाया जा रहा है.

अपने बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करके धार्मिक कर्मकांडों पर अपनी मेहनत की कमाई महिलाएं खर्च कर रही हैं. पूजा पाठ, व्रत उपवास में महिलाएं रोबोटों की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं. हवनों, यज्ञों में महिलाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है. शहरों से लेकर गांवों तक धार्मिक प्रवचनों और कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है .

गांव गांव में मंदिर और मस्जिद बन रहे हैं. ज्ञान का केंद्र पुस्तकालय जो पहले ग्रामीण क्षेत्रों में थे मृतप्राय हो गए हैं. आपसी बातचीत भी खत्म होने की कागार पर है.

गांवो में सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों की हालत बहुत चिंतनीय है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है. ज्ञान का केंद्र जब नेस्तनाबूद होगा तो समाज मे अंधविसश्वास और धार्मिक पाखण्डों का मायाजाल बढ़ेगा ही. धार्मिक पाखण्डों को बढ़ावा देने में केंद्र की सरकार और चारण गाने वाले मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका में है.

गहरी पैठ: औरतों की बदलती सामाजिक स्थिति

औरतों के बारे में हमदर्दी रखने वाले कानूनों और लगातार अदालतों का औरतों की शिकायतों पर आदमियों को जेल में भेज देने से जहां आदमियों के लिए औरतों को खिलवाड़ की चीज सम?ाने पर खतरा पैदा कर दिया है, वहीं औरतों का अपनी जवानी और बदन का इस्तेमाल अपने सुखों को पाने का रास्ता भी बंद कर दिया है. पिछले 10-20 सालों में जिस तरह से औरतों ने सामाजिक बेइज्जती से डरे बिना शिकायतें करना शुरू किया है उस से सैकड़ों लोग देशभर में जेलों में बंद हैं और छूटते हैं तो तब जब शिकायती औरतें अपना रवैया बदलती हैं.

एक तरह से तो यह सामाजिक बदलाव अच्छा है और आदमी औरतों को कमजोर नहीं सम?ा सकते पर दूसरी ओर औरतों के हाथ से अपने बदन का इस्तेमाल कर के अपना काम निकलवाने का मौका मारा गया है. चाहे यह मौका औरतों की अपनी कमजोरियों को पूरा करने में काम आता था पर फिर भी राजनीति, दफ्तरों, छोटीबड़ी नौकरियों में जहां औरतों के पास बदन के अलावा कोई और हुनर नहीं होता वहां कुछ दे देता था. इन कानूनों की वजह से अब औरतों को अपने बदन और अपनी अदाओं से नहीं, अपने काम और गुणों से आदमियों से डील करने की आदत डालनी पड़ेगी.

जिन लड़कियों को किशोरपन में आदत डाल दी जाती थी कि एक मुसकान से वे कुछ पा सकती हैं उन्हें अब सारी मेहनत अपने हुनर को ठीक करने पर लगानी होगी. आदमियों को भी एहसास हो गया है कि औरत कोई कबूतरी नहीं कि कुछ दाने फेंक कर उसे पिंजरे में बंद किया जा सकता है. जिन औरतों में योग्यता होगी, हुनर होगा, सिर्फ बदन का इस्तेमाल कर बच्चे पैदा करना आता होगा, वे पीछे रह जाएंगी. मांबाप को अब अपनी सुंदर बेटियों पर नहीं अपनी हुनरमंद लड़कियों पर सिर ऊंचा करना होगा और लड़की सांवली है या नाटी है या सुंदर नहीं है, अब बेमतलब का हो गया है.

यह बदलाव उन धर्मग्रंथों के बावजूद हो रहा है जिन में बारबार औरतों को पाप की खान बताया गया है और बेटी के जन्म होते ही घर वालों के मुंह लटक जाते थे. अब बेटियां घरों की शान बनने लगी हैं, क्योंकि वे लड़कों से ज्यादा मेहनत कर रही हैं. उन्हें मालूम है कि सिर्फ अच्छे बदन और सुंदर चेहरे के बल पर वे अपनी जिंदगी नहीं गुजार सकतीं. आदमी अब कानूनों की वजह से भयभीत हैं और कभी भी कौन सी लड़की जो आज छूट दे रही है, कल बिफर जाए, पता नहीं.

अभी दिल्ली में एक बौडी बिल्डर को जेल भेज दिया गया क्योंकि 38 साल की एक बच्चे की विवाहित मां ने आरोप लगा दिया कि उस के साथ न सिर्फ शादी का वादा कर के सैक्स किया गया, उस की वीडियो क्लिप बना कर उसे ब्लैकमेल किया गया और इस वजह से वह न पति की रह गई है, न प्रेमी ने उसे अपनाया. प्रेमी बौडी बिल्डर जो शायद सोच रहा होगा कि औरत भी उस के शरीर को चाहती है अब जेलों में रहेगा और वकीलों पर अपनी जमापूंजी खर्च करेगा. आधीअधूरी शिकायत के बावजूद प्रेमी की अदालत ने नहीं सुनी.

आदमियों के लिए तो यह चेतावनी है ही पर औरतों के लिए भी सबक है कि आज के युग में चाहे वे अच्छी प्रेमिका बनना चाहें या अच्छी बीवी, उन्हें बहुत तरीके के हुनर आने चाहिए. अपनी पढ़ाई पूरी करनी होगी, शादी हो गई तो सबकुछ मिल गया जैसी बातें नहीं चलेंगी. गांवकसबों में भी यह सम?ा फैल गईर् है और लड़कियों ने अब पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है और वे लड़कों से ज्यादा आगे निकल रही हैं.

औरतों के बदन की खरीदारी जितनी जल्दी खत्म हो, उतना अच्छा है क्योंकि पाखंड और अंधविश्वास तभी दूर होंगे जब औरतें अपने को भगवान की पाप की गिनती में नहीं गिनेंगी.

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