Hindi Story: शेरनी की दहाड़

सुनीता के सपनों की उड़ान उस के गांव की पगडंडियों से शुरू हो कर शहर की यूनिवर्सिटी तक जा पहुंची थी. ऊंची कदकाठी, दोहरा बदन और आंखों में आत्मविश्वास की चमक. वह सिर्फ खूबसूरत और सुशील ही नहीं, बल्कि फौलादी इरादों वाली लड़की थी. जब वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर निकलती, तो उस की सख्त शख्सीयत और स्वाभिमान देखने लायक होता. सुनीता के मामा शहर के नामी वकील थे. वही उस के आदर्श थे. वह भी उन्हीं की तरह काला कोट पहन कर गरीबों को इंसाफ दिलाने का सपना देखती थी. कानून की पढ़ाई के साथसाथ वह यह भी जानती थी कि इंसाफ की पहली सीढ़ी बेखौफ और नाइंसाफी के खिलाफ खड़ा होना है.

लेकिन उस शहर की चमक के पीछे अपराध का अंधेरा भी था. जिस इलाके में सुनीता रहती थी, वहां राजा नाम के एक बदमाश का खौफ था. राजा और उस के साथी आएदिन राहगीरों को लूटते और लड़कियों के साथ बदतमीजी करते थे. राजा अकसर सुनीता को दूर से घूरता था, पर उस की आंखों की तेज चमक और कड़क स्वभाव को देख कर वह सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. उसे सुनीता के कड़क स्वभाव से डर लगता था. शांति तब भंग हुई, जब सुनीता को पता चला कि पड़ोस की मासूम दिव्या ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. कई दिनों से वह खामोश और डरी हुई थी. दिव्या को राजा ने बीच सड़क पर रोक कर उस के साथ बदतमीजी की थी.

दिव्या के मातापिता डर के मारे पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे. उन का खामोश डर और दिव्या की सिसकियां सुनीता के कानों में गूंज उठीं. उसे लगा कि अगर आज वह चुप रही तो उस की पढ़ाई लिखाई, उस की हिम्मत और वकालत का उस का सपना, सब बेकार है. उस के खून में उबाल गया. अगले दिन सूरज की तपिश के बीच सुनीता ने अपनी चमचमाती बाइक सीधे उस चौराहे पर रोकी, जहां राजा अपने चमचों के साथ बैठा था. इंजन बंद हुआ, चारों तरफ सन्नाटा छा गया. सुनीता ने धीमे से हैलमैट उतारा, उस के खुले बाल हवा में लहराए और उस की तीखी नजरों ने सीधे राजा को भेदा. ‘‘भाई, जरा यहां तो आना,’’ सुनीता की आवाज गूंजी, जिस में चेतावनी और शालीनता दोनों थे.

राजा अपनी अकड़ में साथियों के साथ बाइक के पास पहुंचा. उसे लगा, शायद कोई मदद मांग रही है, पर सुनीता की आंखों में अंगारे थेसुनीता ने बिना डरे, सीधे राजा की आंखों में ?ांकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी हरकतें हदें पार कर रही हैं राजा. अपनी ताकत निहत्थों पर आजमाना बंद करो. बेहतर होगा कि आज के बाद तुम यहां किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी देखो, वरना याद रखनाकानून की पढ़ाई बाद में काम आएगी, मेरा हाथ पहले चलेगा.’’ सुनीता की आवाज में ऐसी दहाड़ और आत्मविश्वास था कि राजा के पैर कांपने लगे. उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं नेमैं ने क्या किया?’’ सुनीता ने कड़क कर जवाब दिया, ‘‘वही, जो एक बुजदिल करता है. तुम्हें शर्म नहीं आती बहनबेटियों को छेड़ते हुए? मैं ने तुम्हेंभाईकह कर पुकारा है, इस शब्द की लाज रख लो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना.’’

वह दबंग राजा, जिस से पूरा महल्ला थरथर कांपता था, सुनीता के सामने बौना पड़ गया. उस ने हाथ जोड़ लिए और वहां से चला गया. वह डर सिर्फ पुलिस का नहीं था, वह एक स्वाभिमानी लड़की के तेज का डर था. कुछ ही दिनों में बदलाव साफ दिखने लगा. सुनीता ने केवल उसे सुधारा, बल्कि उसे उस की रुकी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए भी बढ़ावा दिया, ‘‘कुछ बन कर दिखाओ. मातापिता का मान बढ़ाओ. यह जिंदगी घरपरिवार, समाज और देश का मान बढ़ाने के लिए मिली है.’’ ‘‘सम? गया दीदी,’’ राजा ने हाथ जोड़ कर कहा. राजा के बदमाश साथी, जो कल तक लड़कियों को छेड़ते थे, भी सुनीता कोदीदीकह कर सम्मान देने लगे थे. कालोनी के लोगों ने राहत की सांस ली. वे अब सुनीता कोशेरनीकहने लगे थे. सुनीता ने साबित कर दिया कि आत्मविश्वास और हिम्मत ही एक महिला का सब से बड़ा गहना और सब से ताकतवर हथियार है.         

पप्पू यादव के दावे पर बवाल   
बिहार में पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने दावा किया है कि भारतीय जनता पार्टी सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों को मिला कर केंद्रशासित प्रदेश बनाने की साजिश रच रही है. इस योजना के तहत पहले पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू कराया जा सकता है. इस के बाद बिहार विधानसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की जाएगी. इस पूरे प्रोसैस के बाद सीमांचल क्षेत्र के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, रायगंज और दिनाजपुर जैसे कुछ जिलों को जोड़ कर एक नया केंद्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जबकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने साफ शब्दों में कहा कि ये दावे तथ्यों के बिलकुल उलट हैं और इन में रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है.   

Hindi Story: चाहत

Hindi Story: जमीन के लालच में चाहत के पति और पिता को उस के अपनों ने ही मार डाला. गोद में रह गया बेटा उदय, पर चाहत ने हिम्मत नहीं हारी और उदय को प्रौफेसर बना दिया. फिर वह अपने मायके लौटी. आगे क्या हुआ?

खे से लौट कर प्रेम शंकर ने अपने गले से गमछा हटाया और चबूतरे पर बैठ गए. बीड़ी सुलगा कर फूंक से धुआं हवा में उछाला. माथे के पसीने की बूंदों को पोंछते हुए और थकी आवाज में पुकार लगाई, ‘‘चाहत की अम्मांअभी तक मेहमान गांव से नहीं लौटे हैं क्या?’’ सवाल पूछ कर वे बेचैनी से चारों तरफ टहलने लगे. चाहत की मां राजौरी हड़बड़ाती हुई बाहर निकल आई. चाहत भी पीछे से अपने बेटे उदय को गोद में ले कर गई. ‘‘इतनी जल्दी आप गए? कुछ हुआ है क्या? कभी सोहन के बारे में नहीं पूछतेआज?’’ राजौरी की सांसें फूलने लगीं. प्रेम शंकर उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘अरे, शांत हो जा राजौरी. मैं ने बस इतना पूछ लिया कि शाम हो गई और अभी तक नहीं लौटे.’’ राजौरी की घबराहट कुछ कम हुई, फिर अपने पति के लिए पानी लाने चली गई.

राजौरी पानी का लोटा और कटोरी में थोड़ा सा गुड़ ले कर आई और प्रेम शंकर को पकड़ाया. वे उठ कर आंगन में नली के पास जा कर कुल्ला करने लगे, फिर चबूतरे पर बैठ गए. गुड़ खा कर पानी पिया. थोड़ी तरावट महसूस हुई. आज मौसम में खुश्की थी. नीम और पकड़ी के पेड़ की पत्तियां भी हिलने से मना कर रही थीं. ‘‘चाहत की मां, हम आते हैं दालान से घूम कर,’’ प्रेम शंकर की आवाज में सुस्ती थी.
‘‘कोई बात है क्या चाहत के बापू? कुछ तो है जो हम सब से छिपा रहे हैं?’’
प्रेम शंकर ने अपनी गरदन को एक ?ाटका दिया और हौले से मुसकरा कर बोले, ‘‘कुछ नहीं है. उमस के मारे दम निकल रहा है और धान रोपनी का समय हो रहा है. बहुत काम है, इसी मारे चिंता लगी हुई है.’’
प्रेम शंकर असल बात राजौरी को बता नहीं पाए. दरअसल, जब वे रास्ते में सुरेश से मिल कर रहे थे, तो एक बात पता चली थी उन्हें. मारे घबराहट के उन को पसीना आने लगा था.

इस गांव की रीत है कि जायदाद अपने बेटे को ही देनी होती है. अगर बेटा नहीं है तो भतीजे को. बेटियों को जायदाद का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा सकता है. प्रेम शंकर को एक ही बेटी है चाहत. वह छोटी थी तब प्रेम शंकर सोचते थे कि खेतखलिहान भतीजे को दे देंगे, पर बाद के दिनों में भाईभतीजे के रंगढंग ठीक नहीं लगने से उन का मन बदल गया था. चाहत की शादी राजौरी की बहन की ननद के बेटे रोहन से हुई थी, जिस के सिर से मांबाप का साया उठ गया था. हालांकि, गांव में अफवाह है कि चाहत और सोहन के बीच प्रेम था. बातों को दबाने के लिए उन दोनों की शादी करा दी गई. प्रेम शंकर ने सोहन और चाहत के नाम सारी जायदाद लिख दी. पूरे कुनबे में यह बात आग की तरह फैल गई. सब तिलमिलाहट से भर गए. सब के सब प्रेम शंकर और उन के परिवार से कट कर रहने लगे, पर प्रेम शंकर और उन के दामाद सोहन को गांव के लोग बहुत प्यार और इज्जत देते थे.

आज जो बात सुरेश ने बताई, उस के लिए प्रेम शंकर कभी सोच भी नहीं सकते थे. इतनी नीचता पर कैसे उतर सकते थे मथुरा भैया और भतीजे. ‘‘प्रेम शंकर, जरा बच कर रहना अपने भाईभतीजे से. उन लोगों ने प्लानिंग की है कि सोहन को जान से मार देंगे और उदय को भी.’’इतना सुनते ही प्रेम शंकर अचानक खांसने लगे थे. उन की छाती में कुछ अटका हुआ महसूस हो रहा था. उन की बेचैनी बढ़ गई थी. आखिर वे करें तो क्या करें? क्या प्रेम शंकर को पुलिस के पास जाना चाहिए? क्या यह बात सच हो सकती है? उन्होंने तय किया कि कल सुबह वे थाने में जा कर शिकायत दर्ज करा आएंगे. अपनी खुशियों को इस तरह दूसरों की हथेलियों में बंद नहीं होने देंगे. अजीब सा खालीपन चारों तरफ पसर गया था. परिंदे भी अपने अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे, पर प्रेम शंकर को वापस घर जाने का मन नहीं हुआ.

हलका अंधेरा गहरा आया था. प्रेम शंकर धीमे कदमों से घर की ओर कर खेत की ओर चले गए. जिंदगी किस करवट लेगी, इस सोच ने उन का मन उथलपुथल से भर दिया. एक ऐसा समय भी था, जब प्रेम शंकर सिंह और उन के परिवार की जिंदगी आराम से कट रही थी. एक तरह का आनंद था उन के घर के चारों ओर. चाहत की नौकरी शिक्षामित्र में लग गई थी और सोहन भी पास के गांव में सरकारी टीचर हो गया था. उदय के पैदा होने के बाद तो प्रेम शंकर के घर में हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता था. फिलहाल प्रेम शंकर टहलतेटहलते कुछ दूर आगे अपने खेत के आसपास निकल आए. अचानक उन्हें कुछ आवाज सुनाई दी. पीछे मुड़ कर देखा. उन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. दुश्मन के रूप में उन के भाईभतीजे हाथ में गंडासा लिए खड़े थे. अभी प्रेम शंकर संभल पाते कि उन पर हमला शुरू हो गया. उन के मुंह को अपने हाथों से दबाए उन का एक भतीजा कह रहा था, ‘‘बहुत मर्दानगी छाई है . अब सब भुला जाओगे. हमारे रहते तू सोहन को मालिक बना देगा, ले अब भुगत.’’

गंडासे से प्रेम शंकर का सिर काट कर उन्हीं के सगे भाई नेजय भवानीके नारे से जीत का जश्न मनाया.
अचानक राजौरी का दिल जोर से धड़का. कुछ अपशकुन होने का सोच कर उस की आंखों में आंसू गए. दिल रहरह कर धड़क रहा था. पैर भी लड़खड़ा रहे थे. अपने अंदर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ. मन बेचैन हुआ तो उदय को ले कर पड़ोस में चली गई. चाहत स्कूल की कौपियां जांचने बैठ गई. उस के चेहरे पर संतोष की चमक थी. तभी सोहन की आवाज सुनाई दी, ‘‘चाहत, एक लोटा पानी देना.’’ पानी और गुड़ लिए जब चाहत बाहर आई तो सोहन के हाथों को पकड़े हुए चाचा और भैया लोग को देखा. एक अनजाने डर से उस का मन कांप गया. उन के हाथों में कुल्हाड़ी और गंडासा था. चाहत दौड़ कर चाचा के पैरों से लिपट गई, ‘‘सोहन को कुछ मत करिए मथुरा चाचाजी.’’ ‘‘यहां से हट चाहत. आज प्रेम के खानदान को खत्म कर देंगे. बहुते गरमी चढ़ी है शरीर में.’’


‘‘चाचाजी, हम आप की गोद में खेले हैं. हमारा सुहाग मत उजाडि़ए. रजनीश भैया, धीरज भैया, छोड़ दीजिए सोहन को. हम सब जायदाद आप के नाम कर देंगे. इस गांव से हम सब बाहर चले जाएंगे. सोहन को कुछ मत करिए चाचाजी.’’ चाहत की दर्दभरी आवाज को अनदेखा कर धीरज ने कहा, ‘‘चल हट, ज्यादा अंगरेजी मत ?ाड़. आज हमारी आंखों में खून उतर आया है.’’ ‘‘अरी अम्मां, कहां गई रेजल्दी आओ अम्मां, वरना सोहन को ये लोग मार देंगे. अरे गांव के लोग, आओ बचाओ इन को. सब कहां चले गए हो? कोई तो इन कसाइयों सब को रोको,’’ चाहत की कातर आवाज चारों तरफ गूंजने लगी.
तभी कुल्हाड़ी और गंडासे से सोहन के पूरे शरीर पर वार होने लगे. चाहत की आंखों के सामने सोहन मर रहा था. उस की दर्दभरी आवाज से पूरा गांव रो रहा था, पर दुश्मन की आंखों पर जायदाद की पट्टी बंधी थी. राजौरी उदय को लिए घर की ओर रही थी कि तभी मुसहर टोले के परदेसी ने उदय को उन की गोद से ले लिया और रोते हुए बोला, ‘‘जल्दी घर जाओ मालकिन. प्रेम मालिक और सोहन बबुआ की जान…’’

राजौरी वहीं से चिल्लाते हुए घर की तरफ भागी आई, ‘‘चाहत के बाबू, जल्दी आओहमारा घर उजड़ गया है…’’ घर के पास कर राजौरी की आंखें फटी की फटी रह गईं. सोहन का शरीर कई टुकड़ों में इधरउधर फैला हुआ था. पास ही चाहत बेहोश पड़ी हुई थी. दुश्मन वहां से खूनी खेल खेल कर चले गए थे.
राजौरी प्रेम शंकर की खोज में खेत की तरफ गई. देखा गांव के लोग प्रेम शंकर की लाश लिए चले रहे
थे. इस सदमे से राजौरी का वहीं दम निकल गया. चाहत को गांव की औरतें पानी का छींटा दे कर होश में लाने की कोशिश कर रही थीं. होश आते ही वहसोहनसोहनचिल्लाने लगती थी और फिर बेहोश हो जाती थी. रात को पुलिस की गाडि़यां आईं. गांव के लोगों आंखों देखा सब बयान कर दिए. चाहत का भी बयान लिया गया. 3 लाशों का एकसाथ दाह संस्कार किया गया. श्मशान घाट पर धूंधूं कर चिताएं जल रही थीं. तेज हवा से लपटें कांप उठती थीं. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. सब एकदूसरे से आंखें चुरा रहे थे. पुलिस मथुरा और उस के बेटों को खोजने में लगी हुई थी.

उस रात खौफ से पूरा गांव थर्रा गया था. चाहत को जब होश आया तब उदय का खयाल आया. मुसहर टोले के विशंभर ने बताया कि परदेसी बाबा उस को गांव से बाहर ले गए हैं. सुनने में आया है कि उदय बाबू को भी मारने की प्लानिंग है. ‘‘मु? ले चलो उदय के पास. पता नहीं वह कैसे रात में रहा होगा. एक दिन भी वह मेरे बगैर नहीं रहा है,’’ रोते हुए चाहत ने कहा. ‘‘उदय बाबू ठीक हैं बहन. परदेसी बाबा से बात हुई है. कल सुबह हम उदय को ले कर आएंगे.’चाहत के पास अब उदय बचा था. हिम्मत से काम लेना होगा उसे. उस ने सोचा कि गांव में रह कर इंसाफ की गुहार नहीं लगा सकती है और उदय को भी खतरे में नहीं डाल सकती है. रात के 10 बजे जब गांव के सारे लोग सो रहे थे, तब चाहत विशंभर के साथ अपनी मौसी के गांव चली आई. सुबह विशंभर उदय को परदेसी से ले कर चाहत के पास आया. आंसुओं पर बंधा हुआ बांध अचानक से टूट गया. उदय को गोद में ले कर चाहत फूटफूट कर रोने लगी.

उस का मन किया कि उदय को अपने सीने में छिपा ले. जिसे कोई देख पाए, जिसे कोई छू पाए.
मथुरा और उस के बेटे को पुलिस खोज नहीं पा रही थी. तब कोर्ट के आदेश पर उस के घर का कुर्की जब्ती का वारंट आया. एक दिन के बाद मथुरा और उस के बेटों ने पुलिस के हवाले कर दिया. ताउम्र कैद की सजा हुई. चाहत गांव लौट कर नहीं आई. उस ने अपना घर परदेसी बाबा के नाम कर दिया. खेतखलिहान उन लोगों को बेच दिया, जिन्होंने पुलिस के सामने मथुरा और उस के बेटों के खिलाफ गवाही
दी थी. दिन गुजरने लगे, महीने बीतने लगे. दुखों का मौसम बहुत लंबा होता है. इन बीते सालों में चाहत ज्यादातर चुप ही रहती थी. आंखें सूनी रहती थीं. वह कहीं भी आनाजाना छोड़ चुकी थी. उस का सपना बेटे को ऊंचाई पर देखना था. उदय 7 साल का हो गया था. उस पर वक्त के पहले ही गंभीरता गई थी. उस का सारा समय मां के साथ और पढ़ाई में गुजरता था.


एक दिन उदय ने पूछा, ‘‘मां, मेरे पिताजी कहां हैं? सभी के पिता उन के साथ रहते हैं, मेरे पिता तो कभी मु? देखने भी नहीं आते हैं.’’ चाहत बेबसी से मुसकराई. कुरसी से उठ कर उदय को सीने से लगा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं बेटा. उन की मौत हो गई है.’’ ‘‘कैसे मौत हो गई मां?’’ उदय ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘इस बारे में मैं कभी बाद में बताऊंगी, तब जब तुम बड़े और सम?ाने लायक हो जाओगे,’’ कहते हुए चाहत ने अपनी मुट्ठियों को कस कर बांध लिया. चाहत भरसक कोशिश करती कि उदय को कोई तकलीफ हो. वह मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही थी. कभी भी उदय के सामने उदास नहीं रहती और कभी गुस्सा होती. एक दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई. उदय घर आया तो मां को एक साड़ी को हाथों से सहलाते हुए देखा. उस को देख कर मां बक्से में उस साड़ी को रखने लगी.
‘‘मां, यह क्या रख रही हो? मु? दिखाओ,’’ उदय जिज्ञासा से पूछा.

‘‘कुछ नहीं रख रही. जाओ हाथमुंह धो लो. खाना साथ खाएंगे,’’ कहते हुए चाहत ने जल्दी से उस साड़ी को बक्से में रख दिया. ‘‘बताओ मां, क्या छिपा रही हो?’’ उदय ने जिद पकड़ ली. ‘‘अभी नहीं बेटा, अभी तुम सम?ाने लायक नहीं हो. बाद में इस बारे में बताऊंगी,’’ चाहत अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर रसोईघर में चली गई. दिन बीतते रहे. उदय ने 10वीं के बोर्ड इम्तिहान में जिले में टौप किया था. पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. चाहत सुबह से ही मिलनेमिलाने में बिजी थी. सभी की जबान पर एक ही बात थी कि बिना बाप का बेटा है, इस को हर क्षेत्र में कामयाबी मिले. रात के 10 बज रहे थे. उदय की नींद खुली. मां को अपने पलंग पर देख कर वह उसे खोजने लगा. स्टोररूम का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर गया तो देखा कि मां साड़ी को गोद में ले कर बैठी हुई है. आहट सुन कर चाहत ने ?ाट से वह साड़ी बक्से में रख दी. ‘‘मां , इस साड़ी में ऐसी क्या बात हैआप जबतब इस को ले कर चूमती रहती हैं…’’


‘‘अभी नहीं बता सकती. बाद में बताऊंगी. जब मु? लगेगा कि तुम को बताना चाहिए,’’ चाहत की बातों में
इतनी मजबूती थी कि उदय कुछ नहीं पूछ सका. इस के बाद भी उदय ने कई बार अपनी मां को उस साड़ी के साथ तड़पते देखा, लेकिन फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका. उदय को ऊंची तालीम हासिल करने के लिए चाहत ने उस को दिल्ली के एक होस्टल में भेज दिया. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. उदय हरेक इम्तिहान में टौप करता गया. हर बार चाहत का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता था. अब वह फिर से मुसकराने लगी थी. गांव के गरीब बच्चों और अनपढ़ औरतों को पढ़ाना उस का मकसद हो गया था.
आखिरकार ख्वाबों को मंजिल मिल गई. चाहत की इच्छा और उदय की मेहनत रंग लाई. उदय बनारस
हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गया. एक चमकीली उम्मीद चाहत के आंचल में समा गई. वह सुनहरे भविष्य घोंसला बनाने के लिए फिर से उम्मीदों के तिनके जुटाने लगी.

उस के पैरों में पंख लग गए. अब तक का रोका हुआ बांध ढहने लगा. चाहत उदय के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ी, ‘‘आज मेरा जीवन सफल हो गया उदय. तुम्हारे नानानानी और पिता जहां भी होंगे, खुशी का जश्न मना रहे होंगे.’’ रात में वह साड़ी निकाल कर चाहत उदय के पास बैठ गई, ‘‘जो जिज्ञासा तुम्हारे अंदर बचपन से है, अब उस साड़ी और तुम्हारे पिता के बारे में बताने का समय गया है उदय.’’ चाहत ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे पिता, नाना और नानी को उन के अपनों ने ही मारा, जायदाद के लिए. आज भी मैं उस जायदाद को कोसती हूं, जिस के चलते हमारा पूरा परिवार बेमौत मारा गया.’’ बीते हुए दिनों को बताते हुए चाहत उसी दुख से गुजर रही थी, जिसे याद कर के वह सालों से रोती रही है. कहा जाता है कि दुख बांटने से दुख कम होता हैपता नहीं कितना कम हुआ. पर चाहत के चेहरे पर शांति छा गई थी.
उदय सन्नाटे में था. अचानक वह चौंक कर उठा और बोला, ‘‘मां, चलो नाना के गांव. मैं देखना चाहता हूं उस गांव को मेरे मेरे पिता की मौत हुई थी.’’


दूसरे दिन चाहत उदय को ले कर उस गांव में गई, जहां उस का सारा संसार उजड़ गया था. चाहत और उदय के साथ गाड़ी में उदय का मामा विशंभर भी बैठा था. उस की आंखें बारबार नम हो जा रही थीं.
चाहत गाड़ी से उतरी. परदेसी का बेटा उस को देखते ही खुशी से चिल्ला उठा, ‘‘हम सब की चाहत बहन गई.’’ आवाज सुन कर गांव के लोग इकट्ठा होने लगे. विशंभर के साथ उदय भी गाड़ी से उतरा.
उदय ने सब को प्रणाम किया. विशंभर ने सब को बताया कि यह चाहत का बेटा उदय है और बनारस के कालेज में पढ़ाता है. सब की जबान पर एक ही बात थी, ‘हम सब के उदय बबुआ गए हमारे गांव…’
चाहत के घाव पर जैसे कोई मरहम लग रहा था. उसी पल महसूस हुआ, जैसे हवा में एक खुशबू बिखर रही हैसोहन के देह की खुशबू. ‘‘कुरसी लाओ जरा, उदय बबुआ के बैठने के खातिर,’’ विशंभर उल्लास से बोला.


तभी परदेसी की पत्नी बनवारी हांफते हुए आई. उस के हाथों में गुड़ और पानी का लोटा देख कर चाहत को अपना वही दिन याद गया, जब सोहन को पानी देने गई थी और अपनी आंखों से दर्दनाक मौत देखी थी. धुंधली नजर से उस ने बनवारी काकी को देखा और उन के गले लग कर रोने लगी. ‘‘काकी का पैर छुओ उदय. परदेसी काका अगर नहीं होते तो आज तुम जिंदा नहीं रहते,’’ चाहत ने कहा. उदय पैर छूने के लिए ?ाका, तभी बनवारी काकी ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया. ‘‘बबुआ, तेरी माई के साथ बहुत बुरा हुआ. हम ने अपनी आंखों से सब देखा, पर कुछ कर नहीं पाई. आज भी वही हालात हैं. कुछ नहीं बदला बीते सालों में. बेटियों का हिस्सा आज भी भाईभतीजा के पास जा रहा है,’’ बनवारी काकी ने कहा. उदय कुछ देर के लिए वहीं चबूतरे पर बैठ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मु? कुरसी नहीं चाहिए और किसी तरह का स्वागतसत्कार. यह मेरे नाना का गांव है. आप सब मेरे अपने हैं.

मेरी एक छोटी सी चाहत है. आप चाहें तो इसे आशीर्वाद के रूप में मु? दे सकते हैंक्या आप लोग दीजिएगा?’’ उदय के बोलते ही पूरा गांव चिल्ला उठा, ‘मांगो बच्चा, हम सब से जो बन पड़ेगा, दे देंगे.’‘‘आज के बाद इस गांव की बेटियों को भी उन के हिस्से का हक देना होगा. जो मेरी मां के साथ हुआ, वह अब किसी बेटी के साथ हो. ‘‘आज बरसों बाद मेरी मां उसी साड़ी को पहन कर आई है, जिस साड़ी को पहने हुए अपने पति की लाश को गले लगाया था, चूमा था. देखिए, खून के छींटे अभी भी साड़ी पर लगे हुए हैं. क्या आप सब फिर ऐसी जिंदगी अपनी बेटियों के नाम लिखना चाहते हैं?’’ कहते हुए उदय की आंखों में आंसुओं का मानो समंदर उतर आया. इस माफी को किसी में ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई. चाहत को लगा कोई अनजाना उस के पीछे खड़ा मुसकरा रहा है.                                 

कात्यायनी सिंह

  

Hindi Story: बिखरी जिंदगी

Hindi Story: शादी से पहले ही सपना पेट से हो गई थी. पर उस का प्रेमी चिरंजीवी डरपोक निकला. मजबूरी में सपना ने अबौर्शन कराया. फिर उस की शादी प्रभात के साथ हुई. पर डाक्टर ने प्रभात को बता दिया कि सपना का शादी से पहले अबौर्शन हुआ था. आगे क्या हुआ?


जि का डर था वही हुआ. सपना मायके रहने गई. उस के पति ने तलाक का नोटिस भेज दिया.
मैं यानी सपना की भाभी निशा हमेशा अपने पति रंजन से कहती रही कि शादीब्याह के मामले में कुछ भी छिपाना अच्छी बात नहीं है. चाहे जैसा भी हो सपना के अतीत के बारे में बता देना उचित हेगा, उस के बाद जो होगा उन की मरजी. अगर उन्हें लगेगा कि सपना से शादी करना ठीक होगा तो करेंगे, नहीं तो कहीं और कोशिश करो.


दरअसल, नौकरी के दरमियान सपना की जानपहचान एक दक्षिण भारतीय लड़के चिरंजीवी से हुई थी. बात इतनी बढ़ी कि वह उस से पेट से हो गई. सपना ने चिरंजीवी पर शादी करने का दबाव बनाया, तो एकाएक वह नौकरी छोड़ कर अपने गांव चला गया. इस बीच सपना ने उसे कई बार फोन किया, मगर चिरंजीवी ने हर बार यही कहा कि वह शादी करने के हालात में नहीं है, लिहाजा वह बच्चा गिरा दे.
सपना एक ऐसे भंवर मे फंस गई, जहां से उसे सिवा बरबादी के कुछ नहीं दिख रहा था. उस से रोते बन रहा था, ही हंसते. कैसे अपने मांबाप को सब बताएगी? उन्हें जब पता चलेगा तब उन पर क्या बीतेगी? एक बार खुदकुशी करने का खयाल मन में आया, मगर बढ़ते कदम रुक गए. खुदकुशी करना क्या आसान होता है?


आखिरकार सपना ने फैसला लिया कि वह मम्मीपापा को बता देगी. अबौर्शन करवाना कोई गुनाह नहीं. उस का गुनाह इतना था कि उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए था. मांबाप अगर बेटियों पर भरोसा कर के उन्हें बाहर नौकरी करने की इजाजत देते हैं, तो उन्हें मर्यादा का खयाल रखना चाहिए. लड़कों का क्या जाएगा, वे तो कोई भी बहाना बना कर कन्नी काट लेंगे, ?ोलना तो लड़कियों को ही पड़ता है. मम्मीपापा ने सुना तो वे आगबबूला हो गए. सपना को खरीखोटी सुनाई. चिरंजीवी से बात करना चाहा, मगर उस का फोन स्विच औफ मिला. एक बार चेन्नई जाने को सोचा, फिर यह सेच कर चुप हो गए कि उस का पुश्तैनी घर एक गांव में था, जहां कुछ कहनेसुनने से कुछ नहीं होगा. वे हमारी बात सम?ाने वाले नहीं. उलटे सपना को ही कुसूरवार मान कर गांव से भगा देंगे. काफी सोचविचार कर सपना का अबौर्शन कराना उचित सम?.


अब सपना आजाद थी. पर उस का औफिस जाना छुड़वा दिया गया. रंजन के ऊपर सपना की शादी की जिम्मेदारी थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि रंजन पूर्वांचल की एक छोटे सी तहसील भाटी में नौकरी करते थे, जो दिल्ली से काफी दूर थी. दिल्ली के आसपास सपना की शादी करना उचित नहीं लगा. भेद खुलने का डर था. लड़का रंजन के ही औफिस में काम करता था. रंजन से उस की अच्छी जानपहचान थी. भाटी में उस का खुद का मकान था, साथ में गांव में कुछ पुश्तैनी जमीन भी थी. सपना इस शादी के हक में नहीं
थी. कहां दिल्ली, कहां एक छोटा सा कसबावह उदास हो गई. मम्मी ने भरोसा दिया कि उस का तबादला लखनऊ हो जाएगा, तब वह आराम से महानगर में रह सकेगी.


पता नहीं मम्मी के भरोसे में कितनी हकीकत थी. एकबारगी मु? लगा कि मम्मीपापा किसी तरह से सपना का घर बसना देखना चाहते थे. लेकिन सपना की पसंदनापसंद का कोई सवाल नहीं था. आज के दौर में शारीरिक संबंध बनना एक सामान्य घटना है. भागदौड़ की जिंदगी में इसे कोई इतनी गंभीरता से नहीं लेता, मगर मम्मीपापा के भीतर  इतना डर था कि उन्होंने सपना को ऐसी जगह ब्याहना मुनासिब सम?, जहां सपना जैसी लड़की के लिए एक पल रहना मुमकिन नहीं था. लड़के का नाम प्रभात था. उसे एकमुश्त जमीन खरीदने के लिए रकम की जरूरत थी, जिसे रंजन ने स्वीकार कर लिया. थोड़े से लोगों की मौजूदगी में सपना की शादी कर दी गई, पर उस का भाटी में कभी मन नहीं लगा.


सपना अकसर रंजन से यही कहा करती थी कि वह किसी तरह प्रभात का तबादला लखनऊ करवा दे, ताकि वहां कोई फ्लैट ले कर रहा जाए. इस बीच सपना पेट से हुई. पहली बार जब प्रभात उसे महिला डाक्टर के पास ले गया, तो चैकअप करने के बाद उस ने प्रभात को अपने केबिन मे बुला कर पूछा कि क्या आप की पत्नी का पहले कभी अबौर्शन हुआ था? यह सुन कर प्रभात थोड़ा हैरान हो कर बोला, ‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है. यह हमारा पहला अनुभव है.’’ डाक्टर ने दोबारा कुछ पूछना मुनासिब नहीं सम?. कुछ दवाएं लिख दीं और बीचबीच में कर दिखाने की सलाह दी. रास्तेभर प्रभात के कानों में लगातार डाक्टर साहिबा की कही बात गूंजती रही. जैसे ही वह सपना के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ, सब से पहले उस का यही सवाल था, ‘‘क्या तुम्हें पहले कभी अबौर्शन हुआ था?’’


यह सुन कर सपना कांप गई, फिर खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं…’’
‘‘डाक्टर की बात ?ाठी नहीं हो सकती…’’ प्रभात बोला.
‘‘डाक्टर बीच में कहां से गई?’’
‘‘उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा एक बार अबौर्शन हो चुका है.’’
‘‘डाक्टर कैसे पता लगा सकता है?’’
‘‘और कौन बताएगा?’’


सपना ने थोड़ा कड़ा मन करते हुए कहा, ‘‘मान लो ऐसा ही हो तो तुम कर क्या सकते हो?’’
‘‘मैं ऐसी चरित्रहीन औरत के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहूंगा,’’ प्रभात ने दो टूक कहा.
‘‘तलाक लेना क्या आसान होगा? दूसरे, मैं डाक्टर की बात को गलत साबित करती हूं. जब ऐसा कुछ हुआ ही हो तो मैं कैसे मान लूं?’’ सपना की आवाज में आत्मविश्वास की कमी थी.
उस रोज प्रभात और सपना में काफी बहस हुई. दोनों का ?ागड़ा सुन कर प्रभात की मां गईं. पूछने पर प्रभात ने कुछ नहीं छिपाया.
‘‘मु? तो पहले से ही शक था.
तुम्हीं शादी के लिए उतावले थे.
10 लाख क्या दिया खोटा सिक्का
थमा दिया,’’ मां सपना को जलीकटी सुनाने लगीं.


उस दिन के बाद प्रभात ने सपना की  तरफ देखना भी छोड़ दिया. सपना की जिंदगी खजूर पर लटके हुए इनसान की तरह हो गई. वह दिल्ली की रही, ही भाटी की. मम्मीपापा ने जो सोच कर उस की शादी का घरौंदा बनाया था, वह रेत की तरह बिखरने वाला था. एक दिन सपना ने फोन कर के रंजन को सारी बातें बता दीं. रंजन सपना की ससुराल आया. प्रभात को रंजन से इतनी नफरत हो गई थी कि जब कभी उस का औफिस में सामना होता, तो वह दुआसलाम भी नहीं करता था. रंजन को सम? में नहीं आया कि एकाएक प्रभात इतना बदल कैसे गया. उसे लगा होगी कोई औफिस की समस्या, पर अब सारा राज खुल गया था.


प्रभात की मां ने साफसाफ कह दिया कि वह सपना को अपनी बहू बना कर नहीं रखना चाहतीं. रंजन ने लाख सम?ाया, मगर प्रभात सम?ाने के लिए तैयार था, ही उस के घर वाले.
‘‘क्या यह आप लोगों का आखिरी फैसला है?’’ रंजन हताश मन से पूछा.
‘‘हां,’’ प्रभात ने जवाब दिया.
‘‘कहीं तुम ने सपना को तलाक देने का तो फैसला नहीं ले लिया है?’’ रंजन ने शक जताया.
‘‘आप ने सही सोचा है,’’ प्रभात
की इस बात पर रंजन के माथे पर बल पड़ गए.
‘‘तलाक लेना आसान नहीं है. वह तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है.’’
‘‘मैं उसे अपना बच्चा नहीं मानता,’’ प्रभात ने हेकड़ी दिखलाई.
‘‘तुम्हारे मानने या मानने से कुछ नहीं होगा. जैसे डाक्टर ने सपना के अबौर्शन की जानकारी दी, वैसे ही तकनीक के जरीए बताया जा सकता है कि यह तुम्हारा बच्चा ही है. तुम्हें उसे वे सारे हक देने होंगे, जो एक बच्चे के होते हैं,’’ रंजन बोला.


पर प्रभात पर रंजन की बात का बिलकुल भी असर नहीं पड़ा. उस रोज रंजन बिना कोई ठोस फैसला लिए वापस अपने घर गया. घर कर उस का मन किसी काम में नहीं लगा. उस के दिमाग में बारबार सपना ही घूमती रही. क्या सोचा था, क्या हो गया. उसे भरोसा था कि इतनी दूर, साथ में अच्छाखासा दहेज दे कर वह सपना के नाजायज प्यार पर परदा डाल देगा, मगर ऐसा हुआ नहीं. रंजन को अपने फैसले पर अफसोस होने लगा. इस सब की जानकारी जब मम्मीपापा को लगेगी, तब उन पर क्या बीतेगी, यह सोच कर उस का दिल बैठने लगा. अब अकसर अबौर्शन को ले कर सपना और प्रभात में ?ागड़ा होने लगा. प्रभात का सारा परिवार उस के साथ था, जबकि सपना अकेली. कितनी खिलाफत करती. तंग कर एक
दिन अपना जरूरी सामान बांध कर रंजन के पास रहने चली आई.


औफिस में मौका मिला तो रंजन ने प्रभात को सम?ाने की काफी कोशिश की, मगर वह तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार था. वह बहुत गुस्से में था. जल्दी ही यह खबर औफिस में फैल  गयी कि प्रभात और रंजन की बहन सपना में अनबन हो गई है. मामला तलाक पर गया है. रंजन को काफी शर्मिंदगी महसूस होने लगी. ऊपर से तो कोई कुछ नहीं कहता था, मगर अंदर ही अंदर कानाफूसी जारी थी. रंजन ने मम्मीपापा को सारी बात बताई. वे दोनों भी बेहद परेशान हो गए. पापा रंजन से बोले कि चाहे जैसे भी हो सपना को वापस ससुराल भेजो. ‘‘किस के बल पर? क्या गारंटी है कि वहां सपना महफूज होगी? कहीं वे सब सपना को मार डालें तब?’’ ‘‘इतना ही डर था तो फिर शादी क्यों की?’’ पापा चिल्लाए.


‘‘पापा, आप 2 तरह की बातें करते हैं. एक तरफ आप छिपाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ शादी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. इतना ही था तो कर लिए होते अपने तरीके से शादी,’’ इतना बोलने के अगले पल रंजन को पापा को कहे शब्दों पर अफसोस होने लगा. उसे पापा से ऐसे तल्ख लहजे में नहीं बात करनी चाहिए थी. उस ने पापा से माफी मांगी. इधर, सपना ने साफसाफ कह दिया कि वह उस गांव में रहने नहीं जाएगी. वहां उस का मन नहीं लगता. भले ही जिंदगी अकेले काटनी हो, काट लेगी मगर वापस उस जेलखाने में नहीं जाएगी. जेलखाना ही थी उस की ससुराल. सासससुर, ननदननदोई कहीं से भी वे लोग शहरी नहीं लगते थे. पता नहीं रंजन ने क्या देखा जो टूट पड़े इस रिश्ते के लिए.


आखिरकार रंजन ने सपना को वापस दिल्ली भेज दिया. दिल्ली कर फिर से वही सवाल खड़ा हुआ कि सपना के पेट में पल रहे बच्चे का क्या होगा? एक बार सोचा कि फिर से अबौर्शन करा कर पहले की तरह आजाद जिंदगी जिए. नौकरी तो मिल ही जाएगी. सपना के मम्मीपापा इस के खिलाफ थे. उन्हें भरोसा था कि देरसवेर प्रभात को सम? जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा. काफी जद्दोजेहद के बाद सपना ने मम्मीपापा की बात मान ली. उसे भी लगा यही ठीक रहेगा. इस बीच प्रभात ने तलाक का नोटिस भेज दिया. सपना कुछ पल के लिए बेचैन हुई, मगर अगले पल खुद में हिम्मत संजोई कि चाहे जो भी हो जाए, वह प्रभात को तलाक नहीं देगी.


पूरे 9 महीने बाद सपना ने अपने बच्चे को जन्म दिया. प्रभात ने काफी कोशिश की, मगर सपना टस से मस
हुई. 2 साल गुजरने के बाद भी सपना ने तलाक के लिए कोई पहल नहीं की, तब सुनने में आया कि प्रभात ने दूसरी शादी कर ली. यह तो और भी बड़ा अपराध था. सपना ने बच्चे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बनाया. उस ने प्रभात की पुश्तैनी जायदाद पर दावा ठोंक दिया, साथ में उस की दूसरी शादी पर भी सवाल खड़े किए. तमाम कानूनी पचड़े की वजह से प्रभात काफी दबाव में गया और उस ने सपना की बात मान कर उसके मनमुताबिक हर्जाना दे कर तलाक पा लिया. सपना का बेटा 5 साल का हुआ, तो उस ने दोबारा नौकरी करने का मन बनाया. उसे नौकरी मिल भी मिल गई. ऐसे ही एक शाम सपना औफिस से घर आने के लिए मैट्रो का स्टेशन पर इंतजार कर रही थी, तभी उसे चिरंजीवी दिखा. उस ने नफरत से नजरें दूसरी तरफ मोड़ लीं. इस के बावजूद चिरंजीवी ने उसे देख लिया. वह उस के करीब आया.


‘‘सपना, मैं चिरंजीवी,’’ इतना कह कर वह मुसकराया.
सपना ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘सपना, मु? माफ कर दो. मैं ने तुम्हें धोखा दिया.’’
‘‘अब गड़े मुरदे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ सपना की आवाज में
तल्खी थी.
‘‘पिताजी को कोरोना हो गया था. अचानक मु? गांव जाना पड़ा.’’
‘‘चलो, मान लेते हैं. मगर क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता था कि एक बार फोन कर के मेरा हाल लेते. बड़ी आसानी से कह दिया अबौर्शन करा लो. तुम्हें
मेरी हालत का अंदाजा था?’’ कहतेकहते सपना का गला रुंध गया, ‘‘तुम ने मु? कहीं का नहीं छोड़ा.’’
‘‘मु? माफ कर दो,’’ कह कर चिरंजीवी ने चुप्पी साध ली. उस के चेहरे पर बनतेबिगड़ते भावों से लगा मानो वह सपना से और भी कुछ कहना चाहता है, मगर कह नहीं पा रहा था.
फिर चिरंजीवी ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘सपना, अगर तुम्हारे पास समय हो तो क्या थोड़ी देर के लिए मेरे साथ पास के किसी रैस्टोरैंट में जा कर चाय पीना पसंद करोगी?’’
‘‘नहीं चिरंजीवी, अब हमारे रास्ते अलगअलग  हैं.’’
‘‘सिर्फ आज, उस के बाद मैं
तुम से कभी नहीं मिलूंगा,’’ चिरंजीवी दोबारा बोला.
दोनों रैस्टोरैंट में आए. चिरंजीवी
ने चाय के साथ कुछ स्नैक्स का भी और्डर दिया.


चाय की चुसकियों के बीच चिरंजीवी ने सपना के पति और बच्चे के बारे में पूछा.
यह सुन कर सपना का मन भीग गया. बड़ी मुश्किल से उस की जबान से बोल फूटे, ‘‘मेरा तलाक हो चुका है. मु? एक 5 साल का बेटा है. वही मेरे जीने का सहारा है.’’
सपना की आंखों में आंसू देख कर चिरंजीवी का दिल पसीज गया.
चाहते हुए भी सपना ने अपने अतीत के पन्ने बारीबारी से खोल कर चिरंजीवी के सामने रख दिए.
चिरंजीवी अपराधबोध से भर गया. सपना की बिखरी जिंदगी के लिए वह खुद को कुसूरवार मानने लगा. वह भरे दिल से बोला, ‘‘सपना, बीते हुए कल को वापस तो नहीं लाया जा सकता, मगर उसे नए सिरे से संवारा जरूर जा सकता है.’’


‘‘मतलब?’’ पूछते हुए सपना हैरानी से उसे देखने लगी.
‘‘क्या हम शादी कर के नई जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते?’’
‘‘यह तुम क्या कह रहे होतुम्हारे बीवीबच्चे क्या सोचेंगे…’’
‘‘मैं ने आज तक शादी नहीं की.
वैसे भी मेरी उम्र इतनी भी गई नहीं है
कि मैं शादी कर सकूं. अभी तो महज 33 साल का हूं.’’
कुछ सोच कर सपना का मन उदास हो गया, ‘‘नहीं चिरंजीवी, ऐसा नहीं हो सकता. मैं एक बेटे की मां हूं. तुम शायद ही मेरे बेटे का अपना पाओ. अगर मेरा बेटा हम दोनों की शादी की वजह से अनदेखा हुआ, तो मैं खुद का कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’
‘‘अकेले जिंदगी काटना क्या आसान होगा तुम्हारे लिए?’’ चिरंजीवी के इस सवाल ने सपना को ?ाक?ार कर रख दिया. बेशक आज मांबाप जिंदा हैं, पर कल का क्या ठिकाना. वे नहीं रहे तब किस के सहारे जिंदगी काटेगी. कोई तो होना चाहिए, जो उस के अकेलेपन का साथी हो.


देर हो रही थी. सपना ने चिरंजीवी का मोबाइल नंबर मांगा. घर कर वह बेहद बेचैन हो रही थी. कभी अपने भविष्य के बारे में सोचती, तो कभी बूढ़े हो रहे मांबाप के बारे में. बच्चे को ले कर भी वह परेशान थी. पता नहीं बड़ा हो कर वह चिरंजीवी को अपना पिता स्वीकार करेगा भी या नहीं? सम?ादार होने के बाद अपने असली पिता के पास जाने का जिद कर बैठे और उसे गुनाहगार मानने लगे तब? अगले दिन रविवार था. चिरंजीवी ने सपना के साथ घूमने का प्लान बनाया, जिसे सपना इनकार कर सकी. बेटे को मां के पास छोड़ कर वह यह कह कर गई कि औफिस के काम से जा रही है, जल्द जाएगी.


आज चिरंजीवी और सपना ने एकदूसरे को काफी वक्त दिया.
‘‘चिरंजीवी, क्या तुम मु? पर तरस खा कर शादी तो नहीं कर रहे हो?’’ सपना ने अचानक पूछा.
‘‘बिलकुल नहीं. मैं तुम से आज भी बेहद प्यार करता हूं.’’
‘‘मेरे बच्चे का क्या होगा? क्या तुम उसे बाप का नाम देगे?’’
‘‘सपना, मैं खुद अपने पिता का सौतेला बेटा हूं. क्या मेरे पिता ने मु? बेटे का  मान नहीं दिया. क्या मैं ने उन्हें पिता का दर्जा नहीं दिया. तुम ने खुद देखा होगा कि जब वे कोरोना से पीडि़त हुए थे, तो मैं उन की देखभाल के लिए अपने गांव भागाभागा चला गया था.’’
सपना को चिरंजीवी निश्छल और बेकुसूर लगा.
जब सपना को पूरी तसल्ली हो गई कि चिरंजीवी के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा नहीं है, तब घर कर उस ने अपने मम्मीपापा से उस का जिक्र किया. वे तो पहले से ही चाहते थे कि सपना का घर बस जाए. ऐसे में चिरंजीवी की पहल को मना कर सके.


सादे समारोह में शादी हो गई. जब विदाई का समय आया, तब सपना के पापा ने उसे एक कमरे में बुला कर नम आंखों से कहा, ‘‘बेटी, मु? माफ करना. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की. तुम पर दबाव बना कर ऐसी जगह तुम्हारी शादी कर दी, जहां करने के बारे में मु? सौ बार सोचना चाहिए था.
सिर्फ शादी कर देना ही मांबाप की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि शादी के लिए बेटी की रजामंदी भी लेनी चाहिए, जो मैं ने नहीं ली.’’  Hindi Story     

Hindi Story: दांव

Hindi Story: औफिस के नए मैनेजर मिस्टर आलोक बहुत ज्यादा हैंडसम थे, पर उन की पत्नी रीता एकदम साधरण सी औरत. लोगों को लगा कि मिस्टर आलोक ने दहेज के चक्कर में रीता मैडम से शादी की है, पर मामला एकदम उलट था. क्या था इस बेमेल शादी का राज?

कं पनी के नए मैनेजर के आने की खबर सुन कर सभी मुलाजिम अपनेअपने काम में जुट गए थे. असिस्टैंट मैनेजर नितिन की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. उन के ऊपर दोहरा दबाव था, एक घर का और दूसरा औफिस का. मैनेजर और असिस्टैंट मैनेजर दोनों के सरकारी मकान अगलबगल थे. इसी वजह से पारिवारिक संबंधों को निभाने की जिम्मेदारी भी नितिन पर पड़ी थी. पुराने मैनेजर मिस्टर कपिल से नितिन के परिवार जैसे संबंध थे. उन के जाने के बाद से नितिन का पड़ोस एकदम सूना हो गया था. अब महीनेभर बाद कल मिस्टर आलोक यह जिम्मेदारी संभालने वाले थे.


मिस्टर आलोक फिलहाल अकेले रहे थे. उन की पत्नी रीता के साथ आने के चलते नितिन का तनाव थोड़ा कम हो गया था. नितिन ने मिस्टर आलोक के आने से पहले ही घर और औफिस दोनों जगह का इंतजाम ठीक करवा दिया था. औपचारिक मुलाकात के लिए शाम की चाय पर उन्हें घर बुलाने की बात भी अपनी पत्नी रेखा से कह दी थी. मिस्टर आलोक दोपहर में घर पहुंच गए. औफिस वालों ने उन के घर को ठीक तरह से सजासंवार दिया था. मिस्टर आलोक इस समय बहुत कम सामान साथ ले कर आए थे. उन्होंने मातादीन के अलावा वहां पर तैनात दूसरे मुलाजिमों को वापस भेज दिया था.


औफिस से कर नितिन को मिस्टर आलोक को घर पर मुलाकात कर उन्हें चाय पर आने का न्योता भी देना था. नितिन ठीक 5 बजे घर पहुंचे. मिस्टर आलोक ने उन्हें आते हुए देख लिया. जरा देर में वे खुद ही नितिन के घर पहुंच गए. उन्होंने डोर बैल बजाई. रेखा ने दरवाजा खोला. उस के कुछ पूछने से पहले ही मिस्टर आलोक ने अपना परिचय भी दे दिया. तभी नितिन की आवाज सुनाई दी, ‘‘कौन है रेखा?’’
रेखा के मुंह से अभी आवाज तक नहीं निकल रही थी. इतनी देर में नितिन वहां गए और बोले, ‘‘सर, आप…’’
‘‘शुक्र है, तुम मु? देख कर
चौंके नहीं.’’
‘‘मैं आप से मिलने आने वाला ही
था सर.’’
‘‘उस से पहले मैं ही चला आया. कायदे से नए पड़ोसी को पुराने
पड़ोसी के घर जाना चाहिए. तुम औपचारिकता निभाने के लिए ही मेरे घर आने वाले थे.’’
‘‘नहीं सर, यह बात नहीं है. आप मेरे बौस हैं. मेरा फर्ज बनता है कि मैं पहले घर पर आप से मिलूं और आप को अपने घर आने का न्योता दूं.’’
‘‘मैं औफिस में तुम्हारा बौस हूं.
घर में हम सिर्फ पड़ोसी हैं,’’ मिस्टर आलोक बोले.
रेखा को मिस्टर आलोक का खुलापन बड़ा भला लग रहा था. लंबेचौड़े, स्मार्ट
और सुडौल देह के स्वामी मिस्टर आलोक बहुत दिख रहे थे. उन का गोरा रंग उन के कालेसफेद खिचड़ी बालों के साथ बहुत मेल खा रहा था.
‘‘बैठिए सर,’’ नितिन ने कहा.
तभी रेखा ने शांताबाई के हाथ पानी भिजवा दिया और खुद भी कर औपचारिकतावश हाथ जोड़ दिए.
‘‘यह मेरी पत्नी रेखा है और ये हमारे कंपनी के नए मैनेजर मिस्टर आलोक हैं,’’ नितिन ने उन दोनों का परिचय भी कराया.


फिर वे दोनों आपस में बातें करने लगे. रेखा किचन की तरह बढ़ गई.
‘‘आप के साथ परिवार के बाकी सदस्य आते तो बहुत अच्छा लगता सर.’’
‘‘मेरी पत्नी रीता, बेटी रोशनी और बेटा राहुल भी जल्दी जाएंगे. अभी जरा वे काम में बिजी थे. वैसे, आप के बच्चे दिखाई नहीं दे रहे…’’ मिस्टर आलोक ने पूछा.
‘‘खेलने गए हैं. वे अभी छोटे हैं सर,’’ नितिन बोले.
कुछ ही देर में शांताबाई चायनाश्ते के साथ हाजिर हो गई.
‘‘इस सब की क्या जरूरत थी? सिर्फ चाय ही काफी थी,’’ मिस्टर आलोक बोले.
तीनों साथ बैठ कर चाय पीने लगे. कुछ देर बाद मिस्टर आलोक ने उन से विदा ली.
‘‘सर स्वभाव से बहुत सरल हैं. उन में बौस जैसी अकड़ नहीं है,’’ मिस्टर आलोक के जाने के बाद नितिन बोले.
अगले दिन मिस्टर आलोक ने औफिस जौइन किया था. उन के स्वभाव से सभी खुश थे. वे बहुत जल्दी सब के साथ घुलमिल गए. अकसर वे शाम को नितिन के पास जाते और खेल से ले कर राजनीति तक की चर्चा करते.
‘‘आप का परिवार कब रहा है?’’ एक दिन नितिन ने पूछा.
‘‘हफ्तेभर के अंदर जाएंगे वे लोग,’’ मिस्टर आलोक बोले.
‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है.’’
तकरीबन एक महीने बाद रीता मैडम के बच्चों के साथ आने की तारीख तय हो गई थी और मिस्टर आलोक ने इस की खबर नितिन को दे दी थी. उन के निर्देश पर मैडम के वैलकम की तैयारी होने लगी. रेखा भी उन के मकान का इंतजाम देख रही थी.
आखिर वह दिन गया और रीता मैम अपने जवान बच्चों के साथ गईं. औफिस के सब लोग सपरिवार मैडम के स्वागत के लिए आए हुए थे.
उम्मीद के उलट रीता मैम को देख कर औफिस के सभी लोग हैरान रह गए और उन की कल्पना एक ?ाटके में बिखर गई.
कंप्यूटर औपरेटर मिनी बोली, ‘‘कहां सर और कहां रीता मैडमदोनों में जमीनआसमान का अंतर है.’’
‘‘ऐसी जोड़ी की तो मैं सपने में
भी कल्पना नहीं कर सकती थी,’’ रिया ने कहा.
रीता मैडम को देख कर सब खुसुरफुसुर कर रहे थे, लेकिन ऊपर से चेहरे पर मुसकान ओढ़े हुए थे.
रेखा ने रीता मैडम को बुके थमा कर कहा, ‘‘वैलकम मैडम.’’
रीता ने एक गहरी नजर रेखा पर डाली लेकिन बोली कुछ नहीं. वह चारों तरफ नजर घुमा कर सब को देख रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि इस समय सब उसे देख कर क्या महसूस कर रहे हैं, लेकिन उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी. वजह, वह ऐसी ही प्रतिक्रिया पहले भी कई वैलकम पार्टी में देख चुकी थी. उसे अपने बारे में कोई गलतफहमी
नहीं थी.
रीता मोटी, नाटी और सांवली थी. कहीं से भी उन दोनों का कोई मेल नहीं था. उसे बात करने का सलीका था और ही उठनेबैठने और खानेपीने का. वह एक साधारण औरत की तरह सब
से पेश रही थी, जो मिस्टर आलोक के ओहदे से कहीं भी मेल नहीं खा रहा था. उस से मिल कर सभी को निराशा हुई थी.
जब रीता किसी समारोह में जाती, तो बातें पहले धीमी होतीं, फिर उस के कानों तक पहुंच ही जातीं.
‘‘देखो, वही है…’’
‘‘हां, वही सर की पत्नी
‘‘सम? नहीं आता, सर ने इस में क्या देखा…’’
एक बार किसी औरत ने सीधे पूछ ही लिया, ‘‘रीताजी, आप पहले क्या करती थीं?’’
रीता ने बिना किसी ?ि?ाक के कहा, ‘‘जीना…’’
पूछने वाली औरत थोड़ी असहज हो गई, ‘‘मतलब कोई काम?’’
‘‘काम तो अब भी करती हूं.’’
‘‘कौन सा?’’
‘‘अपने बच्चों का भविष्य संवारने का…’’ रीता ने जवाब दिया.
लोग अकसर रीता मैडम को तौलते थे. तराजू में रखते थे एक पल में.
‘‘ पढ़ीलिखी, सलीकेदार, ही खूबसूरत…’’
रीता को यह अजीब नहीं लगता था. वह जानती थी कि समाज कीमत दिखने वाली चीजों से लगाता है. जिस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि लोग उस की मौजूदगी से असहज हैं, उसी दिन उस ने तय कर लिया था कि वह खुद को हलका साबित नहीं करेगी.
एक सामाजिक कार्यक्रम में किसी सज्जन ने आलोक से हंसते हुए कहा, ‘‘आप की पत्नी बड़ी अलग हैं.’’
आलोक कुछ कहने ही वाले थे,
तभी रीता ने खुद जवाब दे दिया, ‘‘हां, क्योंकि मैं सही समय पर जीना सीख
गई थी.’’
वहां सन्नाटा छा गया. समाज को यही खलता था कि रीता शर्मिंदा नहीं थी. अगर वह सिर ?ाका लेती तो शायदबेचारीकहलाती. अगर रोती तोदयामिल जाती. पर वह रोती थी, ?ाकती थी. वह जानती थी कि समाज के लिए उस की कीमत सिर्फ इतनी थी कि वह किस की पत्नी है, उस से ज्यादा नहीं और कम भी नहीं. उसे यह भी पता था अगर वह खूबसूरत होती तो यही समाज उसेभाग्यशालीसे ज्यादा कुछ कहता.
रीता ने कभी सफाई नहीं दी, क्योंकि सफाई वही देता है जो अपराधी हो. रीता ने सिर्फ एक बात पकड़े रखी,
उस की जगह. आज भी जब लोग उसे देखते हैं, तो सोचते हैं कि यह यहां तक कैसे पहुंची?
समाज की नजर में रीता की कीमत कभी ऊंची नहीं रही, पर उसे अब यह फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि जिस औरत ने अपनी कीमत खुद चुकाई हो, उसे समाज के लेबल की जरूरत नहीं होती.
रेखा सोच रही थी कि एक मैनेजर की पत्नी में जिन गुणों की उम्मीद की जाती है उन में से एक भी रीता में नहीं था. इस से पहले भी 2 मैनेजर उन के बगल के बंगले में रह कर जा चुके थे. उन की पत्नियां बड़ी सुघड़ और सलीकेदार थीं. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि हो हो मिस्टर आलोक ने रुपयों की खातिर लालच में पड़ कर रीता मैम जैसी औरत से शादी की हामी भरी होगी.
आज दिनभर चर्चा का विषय रीता मैडम ही थीं.
‘‘मैडम तुम्हें बड़ी तिरछी नजर से देख रही थीं. तुम ने उन की तारीफ नहीं की रेखा.’’
‘‘किस बात की तारीफ करूं नितिन? उन में रूप है और ही कोई खास गुण दिखाई दे रहा था.’’
‘‘बारीकी से देखोगी तो तुम्हें उन में भी कोई खास गुण दिखाई दे जाएगा,’’ नितिन बोले, तो रेखा हंस दी.
मिनी और रिया तो अकसर आलोक सर को देखते ही मैडम की बातें ले कर बैठ जातीं. उन दोनों को बात करने के लिए एक अच्छाखासा टौपिक मिल
गया था.
‘‘तुम्हारा क्या खयाल है कि सर की लव मैरिज है या अरेंज?’’
‘‘जरूर दहेज के लिए घर वालों की मरजी से शादी की होगी, वरना…’’
‘‘यह भी हो सकता है रिया कि उन में कोई ऐसा गुण हो जिस पर सर मोहित हो गए हों. कहते हैं प्यार अंधा होता है.’’
‘‘मु? तो उस की उम्मीद नहीं है,’’ इतना कह कर दिया फाइल ले कर सर के केबिन में चली गई.
रीता से मुलाकात करने के बाद औफिस में अभी उसे ले कर बातों का बाजार गरम था. उसे अपने बारे में
किसी भी तरह का कोई शिकवा नहीं होता था. वह जैसी थी उस से कोई शिकायत नहीं थी और अपनी उपलब्धि पर खुश भी थी.
रीता को लोगों पर हंसी आती जो हरेक का बाहरी रूप देख कर बिना जाने जज करना शुरू कर देते थे. वह जानती थी कि मर्दों को खूबसूरती लुभाती है लेकिन वक्त पड़ने पर इस से उन का कोई लेनादेना नहीं होता. वे तो बस औरत की देह के मोह जाल में फंस
जाते हैं.
मिस्टर आलोक की पसंद हर मामले में अच्छी मानी जाती थी. कारोबार हो या रिश्ते लोग उन की सम? की मिसाल देते थे, लेकिन रीता को ले कर उन से चूक हो गई थी. सब उसे भाग्यशाली कहते, पर रीता भाग्यवादी नहीं थी. उस का मानना था कि भाग्य अपनेआप नहीं बनता, उसे बनाना पड़ता है और उसे बनाने में बहुतकुछ दांव पर भी लगाना पड़ता है.
अपने भविष्य के लिए रीता ने भी बड़ा दांव खेला था और वह दांव उस के हिसाब से सीधा पड़ा था.
लोगों ने रीता को देख कर अपनीअपनी राय बना ली थी. किसी को यकीन था कि वह किसी बड़े बिजनैसमैन परिवार से होगी, तो कोई कहता कि मिस्टर आलोक ने दहेज के लालच में शादी की है.
कोई नहीं जानता था कि यह शादी अरेंज नहीं थी. यह माना जाता है कि प्यार तन से ज्यादा मन की खूबसूरती देखता है. यह आम सोच थी, पर रीता की सोच इस से मेल नहीं खाती थी
उस का अनुभव कुछ और कहता था. वह खुद से कहती, ‘‘एक मर्द पहले तन देखता है, मन और उस की खूबसूरती के बारे में बाद में सोचता है.’’
शायद यही वजह थी कि जब एक साधारण सी औरत ने तन के बल पर सबकुछ हासिल कर लिया, तो उस के मन में यह विश्वास बैठ गया कि
एक खूबसूरत औरत के लिए इस
दुनिया में कुछ भी पाना नामुमकिन
नहीं है.
?ांपड़े में रहते हुए रीता ने बहुतकुछ देखा था. मर्दों की निगाह, उन की कमजोरी, उन का डर. उसे जल्दी सम? गया था कि गरीबी और देह दोनों का सौदा चलता है, फर्क सिर्फ कीमत का होता है. उस ने आलोक को चुना थाइसलिए नहीं कि वह सब से अच्छा आदमी था, बल्कि इसलिए कि वह
सब से असुरक्षित अमीर आदमी था.
रीता एक बहुत गरीब परिवार से थी. उस के पिताजी एक फैक्टरी में मजदूरी करते थे. अब वे नहीं रहे. आलोक खानदानी रईस थे और पढ़ाई करने के लिए परिवार से दूर दिल्ली आए थे. उन्होंने अपने लिए अलग घर ले रखा था. उस के ठीक सामने रीता का ?ांपड़ा था. उस की मां बरसों पहले गुजर गई थी.
4 भाईबहनों में रीता सब से बड़ी थी, जिन की परवरिश की खातिर उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. सब दिन में स्कूल चले जाते और रीता घर पर अकेली रहती. अब उन सब की शादी हो गई और उन के घर बस गए. सब अपने परिवार में खुश थे.
आलोक अकसर अपने घर से रीता के ?ांपड़े की ओर ?ांकते रहते. एक दिन वे रीता को देख कर मुसकराए. बदले में वह भी हंस दी. इशारा मिलते ही अगले दिन आलोक दोपहर में उस के घर गए और मुसकरा कर बोले, ‘‘मेरे घर पर काम करोगी?’’
रीता ने तुरंत हां कह दी. अब तो रोज आनेजाने और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया.
एक दिन आलोक ने जैसे ही रीता का हाथ पकड़ा, तो वह सारी लाजशर्म छोड़ कर उन से लिपट गई. उस ने आलोक को कस कर पकड़ लिया.
आलोक आखिर मर्द ही तो थे. जरा सी देर में पिघल गए और उन के बीच की सारी दीवारें टूट गईं.
रीता जानती थी कि वह जो कर रही है उस में बहुत ज्यादा रिस्क है, लेकिन उस के सामने कोई दूसरा उपाय नहीं था. वह गरीबी से परेशान थी और आलोक एक अमीर परिवार के बेटे थे. अगर उस का दांव सीधा पड़ गया, तो जिंदगीभर का आराम था, पर वह गलत भी पड़ता तो उन जैसों पर उस का ज्यादा असर पड़ता.
आलोक पर रीता का नशा चढ़ चुका था. रोज ही वह काम के बहाने आलोक के घर आती और उन के सामने समर्पित हो जाती. 6 महीने तक सबकुछ ठीक चला और फिर एक दिन रीता ने तब जबरदस्त धमाका कर दिया, जब उस ने आलोक को बताया कि वह पेट से है, तो उन के पैरों की नीचे से जमीन खिसक गई.
आलोक एकदम से बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो?’’
‘‘मैं सच कह रही हूं. जितनी जल्दी हो सके मु? से शादी कर लो.’’
‘‘शादी और तुम से…’’
‘‘क्या कमी है मु? में?’’
‘‘यह पूछो कि क्या है तुम में?’’
‘‘तो फिर क्यों रोज मेरे सामने गिड़गिड़ाते थे,’’ रीता चीखी तो आलोक नरम पड़ गए.
‘‘इस बच्चे से छुटकारा पा लो. जो मांगोगी मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘यह नहीं हो सकता. बच्चा तो मेरे साथ ही मरेगा यह जान लो और मैं तुम सब को फंसा कर मरूंगी,’’ रीता ने कहा.
मजबूर हो कर आलोक को यह बात अपने घर वालों को बतानी पड़ी. वह किसी के दबाव के आगे नहीं ?ाकी. आलोक लाचार हो गए थे. घर वालों ने फैसला आलोक पर छोड़ दिया. इन्हें अपनाने के लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार थी, पर लाखों रुपयों के लालच में करोड़ का भविष्य छोड़ने को राजी थी.
मजबूर हो कर आलोक को रीता से शादी करनी पड़ी. घर वालों का दबाव अभी भी बना हुआ था. वे अभी भी हर कीमत पर रीता से छुटकारा पाना चाहते थे, पर वह कानून की दुहाई दे कर इन पर अपना दबाव बनाए हुए थी.
तनाव भरे माहौल में पहली बेटी रोशनी का जन्म हुआ. घर वाले अभी भी यही कह रहे थे कि इसे छोड़ दो, लेकिन आलोक जानते थे कि यह इतना आसान नहीं था.
शादी और बेटी के हो जाने पर भी वे नहीं पिघले. रीता भी हार मानने वालों में थी. परिवार और दुनिया दोनों ही जगह उस का जीना मुश्किल हो रहा था और वह सुनहरे भविष्य के खातिर आलोक को छोड़ने को राजी थी.
उस ने अपनी जिंदगी को ले कर बहुत बड़ा दांव खेला था.
रीता की जिद के चलते परिवार की इज्जत खराब हो रही थी. उसी की खातिर उन्होंने रीता को घर में जगह दे दी थी, पर दिल में नहीं. वह खुश थी कि उस की जद्दोजेहद कामयाब हो रही थी. जवान मर्द आखिर क्या करता?


कोई उपाय पा कर आलोक ने हार मान ली और उन दोनों के संबंध सामान्य होने लगे. फिर रीता की गोद में राहुल गया. बेटे के खातिर आलोक ने रीता को माफ कर दिया और इस तरह उसे मिस्टर आलोक के घर और जिंदगी में जगह मिल गई.


राहुल के जन्म के बाद आलोक बदले. पहली बार उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगता था?’’
‘‘हर दिन लगता था, पर डर के साथ भूख भी थी,’’ रीता ने कहा. आलोक कुछ नहीं बोले. आज लोग उसे देख कर कहते हैं कि सलीका है, सम?. रीता जानती है कि सलीका उस ने सीखा ही नहीं और सम? उस ने जरूरत से ज्यादा पाली है. वह कोई आदर्श औरत नहीं है और ही कहानी की हीरोइन. वह बस एक औरत है, जिस ने यह तय किया है कि वह हार कर नहीं जिएगी. उस का दांव गलत भी हो सकता था, पर उस ने दांव इसलिए नहीं खेला था कि वह सही साबित हो, उस ने इसलिए खेला था कि पीछे लौटने का रास्ता बंद हो जाए. और जब रास्ता बंद हो जाए तो आदमी चलना सीख ही जाता है.


यह सब किसी फिल्मी कहानी से कम था. क्याकुछ नहीं ?ोला था रीता ने अपनी जिंदगी में. भले ही घर वालों की नजर में इस का ज्यादा मोल था, पर रीता की आपबीती बयां कर रही थी कि आज जोकुछ भी उस के पास है, उस का रास्ता उस ने अपने तन से बनाया था. पति आलोक का खुला बरताव देख कर रीता अकसर सोचती, ‘इनसान का शरीर बूढ़ा होता है, पर मन नहीं. उस की खुशी के लिए वह रोजाना नए उपाय ढूंढ़ता रहता है.’ जिंदगी में रीता ने बड़ी जद्दोजेहद देखी थी. इसी ने उसे नए सिरे से सोचने का एक मौका दे दिया. उसे लगता कि दुनिया में बेकार कुछ भी नहीं है. सब की अपनी उपयोगिता है. बस, सही समय पर उस का इस्तेमाल करना आना चाहिए, लेकिन उस के साथ बहुत ज्यादा जोखिम भी जुड़ा होता है. हरेक के बस का यह ?ोलना नहीं होता, जिस ने जिंदगी में कभी भी बड़ा जोखिम नहीं उठाया था. उस के लिए यह रास्ता जायज नहीं ठहराया जा सकता था.          Hindi Story             

लेखक डा. के. रानी

Hindi Kahani: लुट गई जोगी तेरे प्यार में

Hindi Kahani: जमीला और शर्मिला पक्की सहेलियां थीं. उन की दोस्ती को देख कर घरपरिवार वाले और पड़ोसी उन्हें दो जिस्म एक जान कहते थे. दोनों सहेलियों ने गांव में ही एकसाथ पढ़ाई की थी. आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल होने, गरीबी और परदा प्रथा की वजह से उन के परिवारों ने आगे दिलचस्पी नहीं दिखाई. नतीजतन, वे दोनों घर पर ही रह कर परिवार के साथ बीड़ी बनाने का काम करने लगीं.
जमीला कब जवान हो गई, उस की सम? में नहीं आया. घर के बड़ेबूढ़े जब उसे टोकते, ‘बड़ी हो गई है तू, ठीक से दुपट्टा ओढ़ कर बाहर निकला कर. अकेले घूमने मत जाना. बहू, इसे नकाब ला कर दे. अब कोई छोटी बच्ची थोड़े ही है, बड़ी हो गई…’


वह सोचती, ‘आखिर मु? में ऐसा क्या हुआ है? जब मैं स्कूल जाती थी, तब कोई कुछ नहीं कहता था.’
शर्मिला की शादी पास के गांव में हो गई और जमीला अकेली रह गई. दिल की बात कहनेसुनने वाला कोई रहा. उस की जिंदगी कैद के पंछी की तरह रह गई. बीड़ी बनाते और घर का काम करतेकरते उस का दम घुटने लगा. समय पंख लगा कर उड़ने लगा. जवानी जमीला को जिंदगी का मजा लूटने की दावत देने लगी. वह अंदर ही अंदर कसमसाने लगी. जब वह जवान जोड़ों को देखती, तो उस की बेचैनी और बढ़ जाती. शहनाई की आवाज सुन कर वह जोश में जाती. ‘‘जमीला के अब्बू, देखनाजमीला को क्या हुआ है…’’ उस की मां ने घबरा कर आवाज दी.


‘‘आया बेगम,’’ बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठे जमीला के अब्बू जावेद मियां ने कहा. वे दौड़ेदौड़े बैठक में आए, जहां जमीला अकेली बैठी बीड़ी बनातेबनाते बेहोश हो कर गिर गई थी. ‘‘क्या हुआ बेटी, देखो मु?आंखें खोलोबेगम, पानी लाओइस के मुंह पर पानी के छींटे मारो,’’ जावेद मियां ने कहा. तब तक उन के दोस्त भी अंदर गए थे. ‘‘कैसे हो गया यह सब?’’ मौलाना ने पूछा, जो जावेद के दोस्त थे.
‘‘क्या बताऊंजमीला बैठी बीड़ी बना रही थी कि एकाएक बेहोश हो कर गिर पड़ी,’’ जमीला की मां ने बताया. मौलाना ने ?ाड़फूंक शुरू कर दी. मुंह पर पानी के छींटे मारे, प्याज सुंघाई गई और तकरीबन आधा घंटे बाद जमीला को होश गया. जमीला कुछ थकीथकी सी लग रही थी, इसलिए उसे आराम करने की सलाह दे कर जावेद मियां के दोस्त वहां से चले गए. दूसरे दिन मौलाना ने जावेद मियां के घर पर दस्तक दी. दोनों बैठ कर जमीला की बीमारी पर बातचीत करने लगे.


‘‘देखो जावेद मियां, ऐसे हालात में लड़की की शादी करने में मुश्किल आएगी,’’ मौलवी ने कहा. ‘‘बात तो सही है, पर इस का कोई उपाय तो बताओ? ‘‘जमीला के ठीक होते ही मु? जैसा भी लड़का मिलेगा, मैं उस की शादी कर दूंगा,’’ कह कर जावेद मियां चुप हो गए. ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं, फिर तुम्हें खबर करूंगा…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’ तकरीबन हफ्तेभर बाद मौलाना जावेद मियां के घर दोबारा आए. ‘‘आओ मौलाना, काफी दिन बाद आना हुआ,’’ जावेद मियां ने कहा. ‘‘मैं तुम्हारे काम में लगा था. बड़ी मुश्किल से एक शख्स मिला है. उस का कहना है कि वह लड़की को ठीक कर देगा. कुछ वक्त लगेगा, पैसा भी खर्च होगा. जब तक ?ाड़फूंक चलेगी, तब तक यह बात किसी तक पहुंचे, वरना इल्म टूट जाएगा.’’ ‘‘मौलाना, मु? हर शर्त मंजूर है. तुम आज से ही इलाज शुरू करा दो. अपनी बेटी की बेहतरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’


मौलाना के मन में खोट था. उस ने अपने एक दूर के साले असद से इस पूरे मसले पर पहले ही बात कर ली थी. मौलाना ने उस से कहा था, ‘देखो मियां, मैं ने सौदा पटा लिया है. जावेद मियां की जमीन अपनी जमीन से लगी हुई है. हमें उसे हड़पना है. अब जा कर फंसा है. पहले तो बड़ीबड़ी बातें करता था, खेत जाने का रास्ता बंद कर दिया था, इसलिए मजबूरी में मु? उस से दोस्ती करनी पड़ी. तुम ऐसी चाल चलो कि जावेद की जमीन बिक जाए और वह मु?मिल जाए.’ असद एक शातिर बदमाश था. उस की बीवी उस की हरकतों से तंग कर पिछले 10 सालों से अपने मायके में बैठी थी. गांव के भोलेभाले लोगों को गंडेतावीज बना कर देना, उन से रकम ऐंठना उस का पेशा था. असद ने जावेद मियां के घर कर अपना काम शुरू कर दिया. शुरूशुरू में तो जमीला को कुछ भी अच्छा लगा, लेकिन अकेले में पराए मर्द को पा कर वह धीरेधीरे खुश रहने लगी. जब असद को महसूस हुआ कि जमीला उस की ओर खिंच रही है, तो उस ने जावेद मियां से कहा, ‘‘जावेद साहब, कुछ जरूरी काम से मैं 1-2 दिन के लिए घर जा रहा हूं, लेकिन जल्दी ही वापस जाऊंगा.’’


जाने से पहले मौलाना और असद के बीच साजिश की लंबी बात चली. इसी के तहत वह अचानक अपने घर चला गया. इधर जावेद मियां परेशान हो उठे, क्योंकि जमीला फिर से बारबार बेहोश होने लगी थी.
वे घबरा कर मौलाना के पास गए और असद को जल्द से जल्द बुलाने की गुहार लगाई. मौलाना की खबर पा कर असद वापस आया ही था कि 8-10 मर्द और औरत उसे ढूंढ़ते हुए जावेद मियां के घर जा पहुंचे.
वे सभी गुजारिश करने लगे, ‘जोगी बाबा गांव वापस चलो, हम सब परेशान होने लगे हैं.’ इसी बीच मौलाना ने कर लोगों को सम?ाया कि आप के जोगी बाबा 2 दिन बाद आप के पास जाएंगे. रात में असद उर्फ जोगी बाबा के शरीर में भयानक हलचल होने लगी और वह जोरजोर से हंसने लगा. घर के सभी लोग जाग गए. बाहर से आए उस के चेले दुआ मांगने लगे, परेशानी से बचने के उपाय पूछने लगे. जोगी बाबा का गुस्से से भरा मिजाज देख कर सब डर गए. असद ने बताया कि जावेद के घर के पीछे किसी ने काला जादू कर दिया है, उसे निकाल कर नदी में डाल दो. पर सावधान, किसी की जान जा सकती है. 5 क्विंटल पुलाव बना कर फातिहा दिलाओ और पहले कहीं से काले जादू की पुडि़या ढूंढ़ो.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना खिलाओ. जोगी बाबा जो कहे वह करो. सब ठीक हो जाएगा.
काफी मशक्कत के बाद आखिर कपड़े में लिपटी एक पुडि़या मिल गई. उस पुडि़या में हड्डी, काजल, सिंदूर, अनाज, काली चूड़ी वगैरह मिली. शक अब यकीन में बदल गया. ‘‘जावेद मियां, बात को सम?…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘बच्ची प्यारी है या जायदाद. तुम ऐसा करो कि मेरे नाम जमीन की रजिस्ट्री कर दो. पूरा खर्चा मैं करता हूं. जब पैसा हो, तो मेरा पैसा लौटा देना और जमीन वापस ले लेना.’’ मौलाना ने अपनी चाल से जावेद को फांस लिया. अंधविश्वास में फंसे जावेद ने मौलाना की बात मान कर जमीन की रजिस्ट्री उन के नाम कर दी. इधर असद उर्फ जोगी बाबा ने ऐसी चाल चली कि जमीला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. अब वे दोनों बीमारी की आड़ लेकर जिंदगी का मजा लूटने लगे. ?ाड़फूंक के बहाने अब दोनों को कोई नहीं रोक पाता था. जमीला को जब से पराए मर्द का चसका लगा था, तब से वह खुश रहने लगी थी. उस के मांबाप इसे जोगी बाबा की ?ाड़फूंक का नतीजा मान रहे थे.

धीरेधीरे साल पूरा होने को आया. उस के मांबाप को जमीला की शादी की फिक्र होने लगी और वे
लड़के की तलाश में जुट गए. इस बात की भनक असद को लग गई. वह मौका पा कर वहां से रफूचक्कर हो गया. इसी बीच जमीला की शादी पक्की हो गई, लेकिन एक दिन वह अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ी.
लोगों के ?ाक?ोरने पर भी होश नहीं आया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया. लेडी डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, ‘‘हम ने बच्ची को देख लिया है. अब वह होश में गई है. आप उस का खयाल रखिए. भारी चीज उठाने दें, क्योंकि आप की बेटी मां बनने वाली है.’’ लेडी डाक्टर की यह बात सुन कर जावेद, उस की बेगम और रिश्तेदारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उन की जमीला ढोंगी जोगी के प्यार में लुट चुकी थी.  Hindi Kahani

लेखक  ए. खान

Hindi Story: दीवारों के उस पार

Hindi Story: 2 बच्चों की तलाकशुदा मां रोजी उत्तराखंड से काम के सिलसिले में गुरुग्राम गई. वहां उस की मुलाकात समीर से हुई, जिसे वह उत्तराखंड से ही जानती थी. समीर ने उसे लिवइन रिलेशनशिप में रहने के लिए कहा. क्या चल रहा था उस के मन मेंरोजी ने क्या जवाब दिया?

32  साल की रोजी मूल रूप से उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग की रहने वाली थी और 2 बच्चों की मां थी. उस की जिस लड़के से शादी हुई थी, वह शराब पीने का आदी था. गंदी हरकतें तो उस की रगरग में बसी थीं. रोजी ने भी हर लड़की की तरह सुनहरे सपने संजाए थे कि शादी के बाद वह अपने पति के संग घूमेगीफिरेगी और अपने सपनों को पूरा करेगी, लेकिन जिंदगी को कुछ और ही मंजूर था. रोजी का पति रोजाना शराब पी कर घर आता और जराजरा सी बातों को ले कर ?ागड़ा करता. उस की इन्हीं हरकतों से तंग कर रोजी ने अपने पति को तलाक दे दिया और हरियाणा गुरुग्राम में अपनी छोटी बहन पूजा के पास चली आई.

रोजी की छोटी बहन पूजा की शादी हो चुकी थी और वह अपने पति और बच्चों के साथ आराम से जिंदगी गुजार रही थी. 32 साल की होने के बावजूद रोजी लगती नहीं थी कि वह 2 बच्चों की मां है. उस ने अपने बदन को सलीके से संजोया था. जो भी उसे एक बाद देख ले, उस का दीवाना हो जाएरोजी के होंठ जैसे गुलाब की पंखुड़ी, उस के नुकीले उभार उस की खूबसूरती को चार चांद लगाते थे. रोजी गुरुग्राम के ही एक स्पा सैंटर में काम करने लगी और एक कमरा किराए पर रह कर रहने लगी. दोनों बच्चों को सुबह ही तैयार कर के स्कूल भेजती और फिर अपने काम से निकल जातीहालांकि, रोजी की मां अभी भी रुद्रप्रयाग में ही रहती थीं. पिता की मौत हो चुकी थी, इसलिए बीचबीच में वह अपनी मां का हालचाल जानने के लिए रुद्रप्रयाग चली जाती थी.


उम्र बढ़ने के साथसाथ रोजी की मां को कई तरह की बीमारियां भी साथ लग गई थीं. रोजी ही मां को अस्पताल में ले जाने और दवा का खर्च उठाती थी. एक दिन रोजी ने अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दिया और खुद भी तैयार हो कर अपने स्पा सैंटर पर जाने के लिए निकली. रोजी पैदलपैदल ही अपने स्पा सैंटर की ओर जा रही थी कि अचानक से उस के पास एक कार कर रुकी. कार में एक नौजवान सवार था, जो कार को ड्राइव कर रहा था. उस ने कई बार हौर्न बजाया, तो रोजी सड़क पर किनारे हो गई और आगे बढ़ने लगी, लेकिन कार उस के पीछेपीछे रही थी. एक बार को तो रोजी घबरा गई और रुक गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो एकदम से हैरान रह गई. कार ड्राइव कर रहा नौजवान कार रोक कर बाहर निकला, तो रोजी के चेहरे पर एक प्यारी सी मुसकान बिखरी. रोजी के मुंह से अचानक निकला, ‘‘समीर, तुम यहां.’’ दरअसल, समीर वही लड़का था, जो रुद्रप्रयाग में रहता था और टैक्सी चलाता था और अकसर रोजी की मां को अस्पताल ले जाने में मदद करता था.


समीर ने इशारा किया तो रोजी कार में बैठ गई. थोड़ी दूर चलने के बाद समीर ने चुप्पी तोड़ी और बोला, ‘‘रोजी, तुम तो बिना बताए यहां चली आई, जिस के बाद रुद्रप्रयाग में मेरा भी मन नहीं लगा और मैं तुम्हारी तलाश में रुद्रप्रयाग से गुरुग्राम चला आया. ‘‘कई महीनों की तलाश के बाद आखिरकार आज तुम हाथ ही लग गई. यहां कर तुमने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया, इस वजह से तुम्हें ढूंढ़ने में दिक्कत हुई…’’ ‘‘समीर तुम तो जानते हो, रुद्रप्रयाग में रहते हुए मैं कितना परेशान हो गई थी. मैं रुद्रप्रयाग की यादों को फिर से ताजा नहीं करना चाहती हूं.’’ ‘‘सौरी रोजी, मैं तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहता, लेकिन मैं भी तुम्हारे बिना अकेला हो गया था. तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो और जब अच्छा दोस्त ही पास हो तो मन कैसे लग सकता है,’’ समीर ने मायूस हो कर अपनी बात कही. थोड़ी दूर चलने के बाद रोजी ने समीर से गाड़ी रोकने के लिए कहा. कार रुकने के बाद रोजी नीचे उतरी और बोली, ‘‘मैं यहां पर नौकरी करती हूं. मेरी ड्यूटी का टाइम हो गया है. मैं ज्यादा देर तक तुम्हारे साथ नहीं रुक सकती.’’


‘‘ओहो, तो मैडमजी.यहां पर नौकरी कर रही हैं और हम रुद्रप्रयाग की सड़कों पर धक्के खा रहे हैं,’’ समीर ने मजाकिया अंदाज में कहा तो रोजी जोर से हंस दी और बोली, ‘‘आखिर तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आओगे. खैर, मैं चलती हूं, शाम को फ्री हो कर तुम से बात करती हूं.’’ स्पा सैंटर में 2-4 कस्टमरों को देखने के बाद दोपहर होने पर रोजी ने घर से बना कर लाई खाना खाया और एक कुरसी पर आराम से बैठ गई. कब वह पुरानी यादों में खो गई, पता ही नहीं चला. उसे वह दिन याद गया, जब पति से अलग होने के बाद वह रुद्रप्रयाग से देहरादून में नौकरी की तलाश में जा रही थी. रुद्रप्रयाग के बसस्टैंड पर ही रोजी की समीर से मुलाकात हुई थी. दोनों एक ही बस में सवार हुए थे. रोजी विंडो सीट पर बैठी थी तो समीर उस के बगल वाली सीट पर कर बैठ गया था. पहाड़ की घुमावदार सड़क के चलते कई बार ऐसे मौके भी आए, जब दोनों एक दूसरे से बिलकुल सट गए. कई बार तो रोजी समीर के ऊपर गिरने से भी बची.
एक मौका ऐसा भी आया, जब समीर का हाथ रोजी की जांघ पर रखा गया. इस से रोजी पूरी तरह से सिहर उठी. उस के शरीर में एक अजीब तरह की हलचल हुई.


पति से तलाक के बाद किसी मर्द का हाथ रोजी की जांघ पर रखा था. रोजी का पति अकसर उस की जांघ पर हाथ फेर कर उसे प्यार करने के लिए तैयार करता था. खैर, रोजी ने किसी तरह से अपनेआप को संभाला. देहरादून चुका था. दोनों बस से नीचे उतरे और अलगअलग रास्तों पर निकल पड़े.
स्पा सैंटर की मैनेजर आई और ताली बजाई तो रोजी पुरानी यादों से बाहर निकली. करीब 2 महीने बाद रात के 11 बज रह थे. रुद्रप्रयाग से आई एक खबर से उस की आंखों की नींद गायब हो गई. दोनों बच्चों को सुला दिया था और रोजी खुद भी सोने की कोशिश कर रही थी, लेकिन नींद आंखों से काफी दूर थी. बैड पर लेटे हुए 2 घंटे से ज्यादा का समय गुजर चुका था. आधी रात बीत गई. रोजी ने मोबाइल उठाया और कुछ देखने लगी. फोन बुक खोली और जानकारों के नंबर सर्च करने लगी. एक मोबाइल नंबर और नाम पर नजर पड़ी तो रुक गई. यह नंबर समीर का था.


काफी सोचने के बाद रोजी ने नंबर डायल किया, ‘‘हैलो समीर, पहचानारोजी बोल रही हूं…’’ ‘‘मैडमजी, नमस्कार मैं तो आप की आवाज से ही पहचान गया था. फिर मेरे पास आप का नंबर सेव है,’’ समीर ने मजाक की कोशिश की तो रोजी बीच में ही रोकते हुए बोली, ‘‘समीर, मु? तुम्हारी हैल्प चाहिए.’’ ‘‘इतनी रात को क्या हुआ.. सब ठीक तो है .’’ ‘‘हां, सब ठीक है, क्या तुम मेरे साथ रुद्रप्रयाग चल सकते हो?’’ रोजी ने समीर से सवाल किया. ‘‘कब चलना है?’’ समीर ने पूछा. ‘‘अभी मेरी मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई है. उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ सकता है. कल शाम या परसों तक वापस जाएंगे. जितने भी पैसे लगेंगे मैं दे दूंगी,’’ रोजी ने कारण बताया. ‘‘ठीक है. तुम अपनी लोकेशन सैंड मैं, मैं कुछ ही देर में पहुंचता हूं.’’ करीब आधा घंटे के बाद समीर अपनी कार ले कर रोजी के घर पहुंच गया. रोजी ने अपने दोनों बच्चों को उठाया और उन्हें भी साथ ले कर रुप्रप्रयाग के लिए निकल पड़ी. दिन निकलने वाला था और कार रुद्रप्रयाग में एंट्री कर चुकी थी. कुछ ही देर में रोजी अपनी मां के पास पहुंच गई.


समीर ने रोजी की मां को अस्पताल ले जाने से ले कर दवा के खर्च में पूरी मदद की. रोजी की मां की हालत में सुधार हुआ. 1-2 दिन रुद्रप्रयाग में रुकने के बाद रोजी बच्चों को ले कर वापस गुरुग्राम लौट आई.
गुरुग्राम लौटने पर रोजी ने जब समीर से टैक्सी का किराया देने के लिए कहा तो समीर ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘रोजी, हम अच्छे दोस्त हैं और दोस्ती में भी मैं तुम से किराया लूं, तो लानत है मु? पर.’’ इस तरह जब भी रोजी रुद्रप्रयाग जाना होता, तो वह समीर की मदद लेती. उधर, समीर भी सोचता कि वह अपने अम्मीअब्बू की सेवा तो नहीं कर पाता, रोजी की बुजुर्ग मां ही सही. वे भी तो उस की अम्मी जैसी ही हैं. एक दिन समीर ने मौका देख कर अपने दिल की बात रोजी के सामने रख दी. वह बोला, ‘‘रोजी तुम मु? बहुत अच्छी लगती हो. क्या हमारी यह दोस्ती प्यार में बदल सकती है?’’ रोजी ने कोई जवाब नहीं दिया. ‘‘अगर कुछ गलत बोल दिया हो या तुम्हारे दिल को ठेस पहुंची हो तो सौरी.’’ समीर ने फिर से अपनी बात कही.


रोजी कुछ देर के लिए चुप रही और फिर बोली, ‘‘आगे कोई रैस्टोरैंट या ढाबा दिखाई दे तो गाड़ी रोक देना,’’ जिस पर समीर ने सड़क किनारे एक ढाबे पर कार को रोक दिया. कार से उतरते ही रोजी ने समीर से सवाल किया, ‘‘चाय लोगे?’’ समीर नेहांमें जवाब दिया. एक टेबल पर दोनों आमनेसामने बैठे थे. रोजी चाय की चुसकी लेते हुए सोचविचार करने की हालत में नजर रही थी. उस के चेहरे पर एक अजीब तरह का भाव था. समीर उसे बड़े ध्यान से देख रहा था, लेकिन कुछ नहीं बोला. वह सोच रहा था कि शायद रोजी उस की बातों से नाराज हो गई. चाय खत्म हुई तो रोजी ने पैमेंट किया. दोनों कार में सवार हुए और निकल गए. ‘‘मैडमजी, सीट बैल्ट लगा लीजिए, नहीं तो यह बेचारा बिना वजह मारा जाएगा.’’ समीर ने फिर मजाकिया अंदाज में कहा. कार थोड़ा आगे बढ़ी, तो रोजी ने सवाल किया, ‘‘समीर, तुम्हारी शादी हो चुकी है?’’ ‘‘नहीं,’’ समीर ने जवाब दिया. ‘‘मेरे बारे में कितना जानते हो, यही कि मैं भी रुद्रप्रयाग की हूं और
तुम भी…’’ इस से पहले कि रोजी कुछ और बोल पाती, समीर ने बोल पड़ा, ‘‘रोजी, इतने दिन हो गए तुम्हारे साथ दोस्ती कोजानता हूं, तुम तलाकशुदा हो, 2 बच्चों की मां होअपनी मां की देखभाल के साथ अपना और अपने 2 बच्चों का पेट पाल रही हो.


‘‘मां की देखभाल के लिए अपनी जौब की भी परवाह नहीं करती हो. अपनी मां से बहुत प्यार करती हो, इस से ज्यादा मु? जानना भी नहीं है,’’ इतना बोल कर समीर चुप हो गया. कार में पूरी तरह से सन्नाटा छा गया. इस सन्नाटे को रोजी ने ही तोड़ा और बोली, ‘‘ओके.’’ इस के बाद तो समीर और रोजी में रोजाना मोबाइल पर बाते होने लगीं. समीर रोजी से उस की मां के बारे में पूछता तो उसे लगता कि कोई उस का अपना है, जिस से वह अपना दुखदर्द शेयर कर सकती है. एक दिन रोजी अपनी छोटी बहन पूजा से मिलने के लिए उस के घर पहुंची तो पूजा की सास ने नाकमुंह सिकोड़ लिया. रोजी पूजा के पास करीब आधा घंटा रुकी. इस मुलाकात में उस ने अपने और समीर के बारे में सारी जानकारी दे दी. ‘‘दीदी, आप मु? से बड़ी हैं, फिर भी एक बात कहती हूं. जो भी कदम उठाना, सोचसम? कर ही उठाना,’’ पूजा ने रोजी से कहा.
‘‘अभी तक हम अच्छे दोस्त थे, कल ही समीर ने मु? प्रपोज किया है. मां को देखने के लिए कब जाना पड़ जाए, ऐसे में समीर ही काम आता है.’’ रोजी ने जवाब दिया.


थोड़ी देर के बाद रोजी फिर से बोली, ‘‘अभी तक समीर ने कुछ ऐसावैसा भी नहीं किया है. समीर किसी तरह की डिमांड भी नहीं की है और ही उस के हावभाव से लगता है कि वह कुछ गलत काम करेगा.’’
जैसेजैसे दिन गुजरते जा रहे थे, रोजी और समीर एकदूसरे के बेहद करीब आते जा रहे थे. कभीकभी तो पूरी रात ही फोन काल, व्हाटसऐप चैटिंग और वीडियो काल में गुजर जाती थी. एक दिन समीर ने रोजी को फोन किया. ‘‘हां, बोलो.’’ रोजी ने कहा. ‘‘मैं कह रहा था, आज शाम को जल्दी घर पहुंच जाना, रात का खाना एकसाथ करेंगे. दोनों बच्चों को भी तैयार रखना. मैं ठीक साढ़े 7 बजे तुम्हें लेने के लिए जाऊंगा.’’ रोजी नेओकेबोल कर फोन काट दिया. ठीक साढ़े 7 बजे समीर अपनी टैक्सी ले कर रोजी के घर के बाहर पहुंच गया और फोन कर के रोजी को बाहर बुलाया. रोजी सजसंवर कर किसी शादीशुदा औरत से कम नहीं लग रही थी. उस ने अपने फेवरेट ब्लू कलर का सूटसलवार पहना था. होंठों पर लगी हलकी गुलाबी लिपिस्टक उस के चेहरे पर चार चांद लगा रही थी. दोनों बच्चे भी साथ गए. रोजी आगे की सीट पर बैठी, जबकि दोनों बच्चों को पीछे की सीट पर बैठा दिया.


शहर के एक रैस्टोरैंट में पहुंच कर समीर ने खाने का और्डर दिया. खाना लगने में वेटर ने समय मांगा था. इस से पहले बच्चों के लिए आइसक्रीम वगैरह मंगा ली. समीर ने बात शुरू करते हुए कहा, ‘‘रोजी मेरे दिमाग में एक बात चल रही है.’’ ‘‘हां, बोलो…’’ रोजी ने पूछा. ‘‘क्या हम एकसाथ रह सकते हैं?’’ समीर ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की. ‘‘मतलब?’’ रोजी ने पूछा. मतलब यही कि अगर हम दोनों लिवइन में रहें तो,’’ समीर ने बताया. समीर की भावनाओं को रोजी तुरंत सम? गई. एक प्यारी सी मुसकान बिखेरते हुए वह बोली, ‘‘इरादा तो ठीक है, लेकिन हम रहेंगे कहां? तुम्हारे पास भी एक ही कमरा है और मेरे पास भी एक ही कमरा है. 2 बच्चे भी हैं. कैसे एडजस्ट करेंगे?’’ ‘‘उस का इंतजाम हो जाएगा. कोई टू रूम सैट घर देख लेंगे दोनों मिल कर एडजस्ट कर लेंगे.’’ ‘‘ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त है…’’ रोजी बोली, ‘‘तुम मेरे साथ कोई शरारत नहीं करोगे.’’ ‘‘ओके मैं सम? गया. मैं वादा करता हूं, जब तक तुम इजाजत नहीं दोगी, तब तक मैं तुम्हें टच भी नहीं करूंगा.’’ समीर ने रोजी को भरोसा दिलाया. वेटर खाना ले कर चुका था. सभी ने भरपेट खाना खाया. समीर ने रैस्टोरैंट में पैमेंट किया और फिर रोजी और बच्चों को गुरुग्राम की सड़कों
पर घुमाया.


रात के तकरीबन 11 बजे समीर ने रोजी और बच्चों को उन के कमरे पर छोड़ कर अपने कमरे पर कर ले गया. आज वह बहुत खुश नजर रहा था. 3-4 दिन के बाद ही उन दोनों ने मिल कर एक टू रूम सैट घर किराए पर लिया और अपनी जिंदगी गुजारने लगे. खाना पकाने से ले कर और दूसरे घरेलू कामों में समीर रोजी की पूरी मदद करता था. रोजी अपने दोनों बच्चों के साथ एक कमरे में सोती थी, तो समीर दूसरे कमरे में. इस तरह से 6 महीने का समय गुजर गया. एक दिन समीर शाम होने से पहले ही अपने कमरे पर पहुंच गया. आज उस की तबीयत कुछ ठीक नजर नहीं रही थी. सिर में दर्द और बदन में अकड़न हो रही थी. कार को पार्क कर के वह अपने कमरे में जा कर लेट गया. शाम को रोजी जब स्पा सैंटर से वापस लौटी तो देखा समीर अपने कमरे में लेटा था. अकसर समीर रोजी के आने के बाद रात को 9 बजे के करीब लौटता था, लेकिन आज उस के जल्दी लौटने और बिस्तर पर लेटे रहने की वजह से रोजी के मन में घबराहट पैदा हुई.


रोजी ने अपना बैग रखा और कमरे में घुसते ही सवाल किया, ‘‘क्या हुआ समीर?’’ ‘‘कुछ नहीं सिर में दर्द है, बदन भी अकड़ रहा है,’’ समीर ने जवाब दिया. ‘‘चलो, खड़े हो, डाक्टर को दिखा देती हूं,’’ रोजी ने जब यह कहा तो समीर ने मना कर दिया और बोला, ‘‘हलका है आराम करने से ठीक हो जाएगा.’’ रोजी उठी और अलमारी से सिरदर्द की एक गोली निकाल कर लाई, पानी ला कर दिया और समीर को गोली खिला दी. इस के बाद बाम ले कर आई और समीर के सिरहाने बैठ कर उस के सिर पर बाम लगाने लगी. इस दौरान रोजी ने थोड़ा रुक कर समीर का सिर उठा कर अपनी गोद में रख लिया और बाम लगाने लगी.
जब रोजी समीर के माथे पर बाम लगा रही थी तो समीर की गरदन भी हिल रही थी. कब समीर का सिर रोजी की जांघ पर पहुंच गया, पता ही नहीं चला. जांघ पर समीर का सिर रखे होने से रोजी के बदन में तरंग सी उठने लगी. ?ाक कर बाम लगाए जाने से रोजी के उभार समीर के माथे से टकराए, तो रोजी के बदन में हलचल बढ़ गई.


धीरेधीरे रोजी के बदन में तरंगें तेज होने लगीं. जांघ पर समीर के सिर की रगड़ लगने के कारण वह धीमी आहें भरने लगी. उस के मुंह से अबसमीरसमीरसमीर…’ निकल रहा था. ‘‘समीर अपनी कसम तोड़ दो, मेरी फीलिंग सम? कुछ करो समीर.’’ यह सुन कर समीर उठ कर बैठ गया. उस का सिरदर्द जैसे अब दूर हो गया हो. समीर ने रोजी की आंखों में आंखें डालीं. वह मुसकरा तो नहीं रही थी, लेकिन उस का चेहरा बता रहा था कि वह मिलन के लिए बेताब है. रोजी से उस के बदन को छूने करने की इजाजत मिलने के बाद समीर ने सब से पहले अपने होंठ रोजी के होंठ पर रख दिए. वह रोजी के एकएक अंग को प्यार से सहलाने लगा, तो रोजी की सांसों में तेजी गई. वह जोश की ओर बढ़ रही थी. दोनों ने अपनेअपने बदन से कपड़े अलग किए. कमरे में रोजी की सिसकारियों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी. कमरे में दोनों के मिलन का जो तूफान पैदा हुआ, वह करीब 10 मिनट बाद जा कर शांत हुआ. रोजी ने खुद को संभाला, जल्दी से कपड़े पहने और बोली, ‘‘अब सिर का दर्द कैसा है?’’ ‘‘जिसे तुम जैसी मदमस्त जवानी का प्यार मिल जाए, उस का सिर का दर्द तो क्या, हर बीमारी दूर हो जाए.’’ समीर ने शरारत करते हुए कहा.


इस के बाद रोजी हाथमुंह धो कर रसोई में गई और 2 कप कड़क चाय बना कर लाई. दोनों चाय की चुसकियां लेते हुए काफी खुश नजर रहे थे. कुछ समय लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद रोजी और समीर ने शादी करने का फैसला किया. रोजी की मां और छोटी बहन तो इस शादी के लिए तैयार हो गईं, लेकिन समीर के परिवार वाले दोनों की शादी के लिए तैयार नहीं हुए. वे कट्टरवादी सोच के थे. उन्होंने साफ कह दिया कि एक तलाकशुदा और दूसरे धर्म की बहू उन्हें कतई स्वीकार नहीं होगी, पर परिवार के विरोध के बावजूद समीर ने रोजी का अपनाने का फैसला किया. शादी की तारीख तय हुई तो रोजी की तरफ से उस की छोटी बहन और स्पा सैंटर में काम करने वाली कुछ लड़कियां और आसपास के लोग पहुंचे, जबकि समीर की तरफ से उस के 1-2 दोस्त आए. सभी लोग कोर्ट में पहुंचे, जहां रजिस्ट्रार ने दोनों की शादी कराई. कोर्ट के बाहर एक रैस्टोरैंट में छोटी सी पार्टी रखी गई.


इस दौरान रोजी के साथ स्पा सैंटर में काम करने वाली एक लड़की ने चुटकी लेते हुए दोनों से कहा, ‘‘दीदीजीजूवैसे तो आप के बीच में सबकुछ हो चुका है, लेकिन फिर भी सुहागरात मनाना
मत भूलना. असल में आप की आज से नई जिंदगी की शुरूआत हो रही है. यह शुरुआत रोमांटिक और रोमांस से भरी होनी चाहिए. बच्चों की चिंता मत करना, उन्हें मैं अपने साथ ले जाऊंगी.’’ यह बात सुन कर वहां मौजूद सभी लोग जोरजोर से हंसने लगे, वहीं रोजी नजरें नीचे कर के मंदमंद मुसकरा रही थी.
शादी के बाद समीर और रोजी अपने कमरे पर पहुंचे. शाम होने से पहले रोजी और समीर बाजार गए. थोड़ी देर के लिए रोजी से अलग हुई और कुछ जरूरी सामान खरीदने लगी, जिस के बाद दोनों वापस कमरे पर लौट आए.


समीर और रोजी ने रात को खाना खाया, जिस के बाद रोजी ने समीर से सख्त लहजे में कहा, ‘‘मैं दूसरे कमरे में जा रही हूं, मु? परेशान मत करना.’’ रोजी ने दूसरे कमरे में जा कर खुद को बंद कर लिया. समीर कुछ सम? नहीं पाया कि आखिर रोजी में अचानक से यह कैसा बदलाव गया. सोचने लगा कि शायद औरतों संबंधी परेशानी हो गई होगी और इसलिए अलग सोने का फैसला किया. उस के मन में तरहतरह के विचार कौंधने लगे. तकरीबन एक घंटे बाद रोजी ने कमरा खोला और समीर को अंदर बुलाया.
समीर हैरान रह गया. कमरे का रंगरूप बदला हुआ था. बैड पर जहां गुलाब की पंखुडि़यां पड़ी थीं, वहीं मोगरा के फूलों की कलियां भी पड़ी थीं. गुलाब और मोगरा की खुशबू से कमरा पूरी तरह से महक रहा था.
रोजी दुलहन के लिबास में बैड पर बैठी थी. उस ने परफ्यूम लगाया था. उस के बदन से रही खुशबू समीर को दीवाना बनाने वाली थी.


रोजी बोली, ‘‘क्यों हैरान हो रहे हो पतिदेवयह तुम्हारे लिए सरप्राइज है.’’ इस के बाद रोजी ने अपने दोनों हाथ समीर के गले में डाल दिए. समीर ने रोजी के माथे पर किस किया और जांघ पर हाथ फेरने लगा, तो रोजी आहें भरने लगी. उस ने समीर को रोका और बैड से नीचे उतर कर अपने कपड़े उतारे. रोजी आसमानी कलर की ब्रा और पैंटी में थी. स्टाइलिश ब्रापैंटी में रोजी को देख कर समीर मदहोश हो गया
और रोजी को बांहों में भर कर बैड पर लेटा दिया. समीर ने रोजी के बदन पर हाथ फेरा तो वह पूरी तरह से सिहर उठी. देखते ही देखते वे दोनों एकदूसरे में समा गए. यह सिलसिला पूरी रात में कई बार चला.
बच्चे समीर को अबअंकलकी जगहपापाबुलाने लगे. दोनों की जिंदगी में रोमांस की कोई कमी नहीं थी. रोजी भी अब अपने स्पा सैंटर में शादीशुदा की तरह जाती थी. शाम को जब समीर वापस लौटता, तो बच्चों के लिए कुछ कुछ ले कर आता. लेकिन एक दिन समीर के गांव से फोन आया, ‘‘बेटा, तेरी शादी की बात पक्की हो गई है. लड़की बहुत अच्छे घरपरिवार की है. अगले महीने की 15 तारीख रख दी है.’’


समीर सन्न रह गया. वह रोजी को छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता था. उस ने मना करने की कोशिश की, लेकिन मां ने साफ कह दिया, ‘‘तू उस तलाकशुदा और दूसरे मजहब की औरत के साथ रहना चाहता है तो हमारा तु? से कोई रिश्ता नहीं रहेगा. हम तेरी परवाह अब और नहीं करेंगे.’’ समीर कई दिनों तक रोजी से यह बात छिपाता रहा, लेकिन बात आखिर रोजी तक पहुंच ही गई. रोजी ने जब यह सुना तो जैसे उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने बिना कुछ सोचे समीर के गांव जा कर उस के घर वालों से बात करने का फैसला किया. गांव पहुंचते ही रोजी ने समीर के घर के सामने सब के सामने सवाल दाग दिए, ‘‘क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं तलाकशुदा हूं? इसलिए कि मेरे 2 बच्चे हैं? क्या प्यार का हक सिर्फ उन लड़कियों को है, जोकुंआरीकहलाती हैं?’’ गांववाले जमा हो गए. समीर की पिता ने गुस्से में कहा, ‘‘हम अपने खानदान की इज्जत मिट्टी में नहीं मिलने देंगे. या तो वह औरत छोड़ या इस घर से निकल जा.’’


समीर ने रोजी का हाथ थामा और बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल गया. दोनों के चेहरे पर आंसू थेएक तरफ मां का प्यार, दूसरी तरफ रोजी का साथ. एक दिन रोजी बच्चों को स्कूल छोड़ कर लौटी तो देखा कि समीर कमरे में बैठा है. उस की आंखों से आंसू टपक रहे थे, ‘‘रोजी, मु? गांव जाना होगा. मां की तबीयत बहुत खराब है. शायद वापस लौट पाऊं या नहीं, कुछ नहीं पता लेकिन एक बात जान लो, तुम मेरी जिंदगी की सब से सच्ची मुहब्बत हो.’’ रोजी ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन गला भर आया. उस ने बस समीर का हाथ पकड़ा और बोली, ‘‘अगर कभी लौटो, तो बताना मत बस, दरवाजे पर खड़े होना. मेरे बच्चे पहचान लेंगे कि उन केपापा गए हैं.’’ समीर चला गया. कई महीने बीत गए. रोजी अब भी स्पा सैंटर में काम करती है, बच्चों को स्कूल भेजती है और शाम को बालकनी में बैठ कर आसमान को देखती है, जहां कभी समीर के साथ बिताए पल तैरते हैं.


रोजी की आंखों से आंसू बहे, लेकिन इस बार वह टूटी नहीं थीमजबूत थी. उस ने खुद को संभाल
लिया था. समीर की याद उस के दिल में अब भी थी, लेकिन अब वह उस की कमजोरी नहीं, ताकत बन चुकी थी. रोजी जानती थी, हर मुहब्बत को मंजिल नहीं मिलती लेकिन कुछ रिश्ते अधूरे हो कर भी दिल में मुकम्मल हो जाते हैं. दूसरी ओर, समीर अपने गांव में मां की बीमारी, परिवार और समाज के दबाव में उल? हुआ था. उस की मां बिस्तर पर थीं और आसपड़ोस के लोग ताने दे रहे थे, ‘अपने खानदान की इज्जत मिटा दी इस ने तलाकशुदा औरत को लाने चला है. शर्म नहीं आती…’ समीर हर बात चुपचाप सुनता रहा, लेकिन उस के मन में रोजी और बच्चों का चेहरा उभरता रहता.


एक दिन रात को मां के सिरहाने बैठा, तो मां ने कमजोर आवाज में समीर से कहा, ‘‘बेटा, अगर तू खुश रहना चाहता है तो अपने दिल की सुन. मैं ने जिंदगीभर जातपांत, समाज की बातें मान कर जिंदगी जी लेकिन अब जब आंखें बंद होने को हैं तो सम? आया कि इनसान का दिल जाति से बड़ा होता है.’’
समीर की आंखों में आंसू गए. उस ने मां का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मां, मैं रोजी और उस के बच्चों से बहुत प्यार करता हूं. वही मेरा घर है वही मेरी दुनिया…’’ मां ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर देर किस बात की, अपने घर को अपना बना ले.’’ कुछ दिन बाद समीर ने पूरे परिवार को बैठा कर अपनी बात रखी, ‘‘मैं सिर्फ रोजी के साथ ही रहूंगा, चाहे वह तलाकशुदा हो, चाहे उस के बच्चे हों वह मेरी जिंदगी है. अगर आप लोग साथ होंगे तो यह मेरी सब से बड़ी ताकत होगी, नहीं तो मैं अकेला ही सही, लेकिन ?ाठ का साथ नहीं दूंगा.’’


समीर के इस फैसले और उस के चेहरे पर ?ालकते सच्चे प्यार ने उस के पिता और भाइयों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. मां तो पहले ही पिघल चुकी थीं. पिता भी गहरी सांस ली और बोले, ‘‘शायद अब समय गया है कि हम भी अपनी सोच बदलें. अगर तू खुश है, तो हमें क्या हक है तेरी खुशी के बीच खड़े होने का…’’ पूरा परिवार एकमत हो गया. सभी ने रोजी को अपनाने के लिए गुरुग्राम जाने का फैसला किया. शाम का समय था. रोजी बालकनी में बैठी बच्चों को पढ़ा रही थी. तभी नीचे गाड़ी के रुकने की आवाज आई. उस ने ?ांक कर देखा, समीर और उस के पूरे परिवार वाले थे. रोजी कुछ सम? पाती, इस से पहले समीर की मां सीढि़यां चढ़ कर आईं और रोजी के सामने खड़ी हो गईं. रोजी के दिल की धड़कनें तेज हो गईं. उस ने बच्चों को पीछे खींच लिया. उसे अंदाजा नहीं था, क्या होने वाला है. समीर की मां ने उस के पास कर उस का हाथ थाम लिया और कहा, ‘‘बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने तु? बिना जाने, बिना सम? ठुकरा दिया. आज सम? आया, तेरे जैसे दिल वाली औरत किसी जाति, किसी धर्म से बंधी नहीं होती. तू तो वह रोशनी है जिस ने हमारे बेटे की जिंदगी में सुकून भरा.’’


रोजी की आंखों से आंसू बह निकले. समीर आगे बढ़ा, दोनों बच्चों को उठा कर बोला, ‘‘चलो घर चलें. अब यही मेरा परिवार हैतुम, बच्चे और ये सब.’’ समीर के पिता ने बच्चों के सिर पर हाथ रखा और बोले, ‘‘अब से तुम हमारे पोते हो हमारा खून सही, लेकिन हमारा अपनापन जरूर होगा.’’ गांव में एक सादा समारोह हुआ, जिस में समीर और रोजी ने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए एकदूसरे को सार्वजनिक रूप से जीवनसाथी स्वीकार किया. जो गांव वाले कभी ताने मारे थे, अब तालियां बजा रहे थे. रोजी की आंखों में खुशी के आंसू थे. उस ने बच्चों को गले लगाया और आसमान की ओर देखा मानो कह रही हो, ‘शुक्र है. इस बार जिंदगी ने मेरा साथ दिया.’  Hindi Story

लेखक महेश कांत शिवा

Hindi Story: चुनौती

Hindi Story: गांव की झाडि़यों में मिली एक बच्ची को बांझ कहे जाने वाली मुनिया ने पालने और कुछ बनाने का फैसला किया. गांव वालों ने मुनिया से किनारा सा कर लिया. जब मुनिया की वह गुडि़या 8वीं जमात में थी, तब मुनिया नहीं रही. क्या गुडि़या अपनी मां के सपनों को पूरा कर पाई?


सुबह सुबह महल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि ?ाडि़यों में एक नवजात बच्ची मिली है. शायद रात में इसे किसी ने फेंका दिया था. बीचबीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. पूरे महल्ले में चर्चा का आज का मुद्दा यह लड़की ही थी.


पहली औरत दूसरी से बोली, ‘‘यह जरूर किसी किसी का पाप है. पता नहीं कौन जात है. बड़ा खराब जमाना गया है. लोग बच्चे कर के यहांवहां फेंक देते हैं.’’

दूसरी ने पहली की हां में हां मिलाई, ‘‘जात छोड़ो, पता नहीं यह किस धरम की है.’’
शादी के 10 साल बाद भी मुनिया के कोई औलाद नहीं थी. पति ने छोड़ दिया था. किसी तरह लोगों के घर का चौकाबरतन कर के वह अपना पेट पालती थी. उसे इस बच्ची पर रहम गया. उस ने ?ाटपट बच्ची को उठा कर गोद में ले लिया.

मुनिया के एक तो औलाद नहीं थी, पति ने भी बां? होने का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. इस बात से वह डिप्रैशन में चली गई थी. तलाक होने से पहले मुनिया डाक्टर के पास भी गई थी. तब डाक्टर बोली थी, ‘तेरे अंदर कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी तो तेरे मर्द में है. तू उसे ले कर किसी माहिर डाक्टर के पास जा. डाक्टर बताएगा इस का इलाज.’’

इधर, फुलिया ने मुनिया से कहा, ‘‘क्या तू इस पाप को पालेगीपता नहीं किस खानदान की है यह लड़की. किस जातिधरम की है. फेंक दे इसे कचरे में. कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है, उसे लोग घर की शोभा नहीं बनाते.’’

मुनिया का दिल मोम का था. उस ने फुलिया को जवाब दिया, ‘‘देख फुलिया, मैं जातपांत को नहीं मानती. मैं धरम में भी यकीन नहीं करती. मैं इनसानियत को मानती हूं. फिर आदमी जातपांत और धर्म का हो कर भी तो अधर्म करता है. जिस की जैसी परवरिश होती है, वह आदमी भी वैसा ही बनता है.
‘‘मैं इसे अपने घर ले जाऊंगी,

इसे खूब पढ़ाऊंगीलिखाऊंगी और अच्छे संस्कार दूंगी. फिर देखती हूं कि कैसे
यह बेराह चलती है. सारा फल अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कारों का
होता है.’’

फुलिया ने ललकारा, ‘‘सोच ले, यह तु? भारी भी पड़ सकता है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई, तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था. हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया, लेकिन तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तू ने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है. फिर यह भी तो है कि तू चौकाबरतन कर के कितना कमा लेगी

‘‘नहीं पाल पाएगी तू इस को. फेंक दे इसे वापस कूड़े में. मरती है, तो मरने दे इसे. क्यों किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है…’’

पर मुनिया बोली, ‘‘मां की ताकत का तु? एहसास नहीं है. गरीब से गरीब मां भी अपने बालबच्चों को रूखासूखा खिला कर पालपोस ही लेती है. फिर मेरे लिए भी तो यह एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पाल कर दिखाऊं.’’

फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली, ‘‘सोच ले इस से बेवकूफी भरा फैसला कुछ नहीं होगा. लोग हंसेंगे और तेरा जीना हराम कर देंगे.’’

‘‘सोच लिया है. इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इनसानियत का रिश्ता जातपांत से ऊपर होता है. समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है, फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है. जायज मांग होने पर वह समाज से लोहा भी ले सकती है.


‘‘फिर समाज के डर से किसी को ?ाडि़यों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता . इस में इस नन्ही सी गुडि़या की क्या गलती…’’

लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था. सब मुनिया को भलाबुरा कहते, उस से कतरा कर निकल जाते. मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी. उस का मकसद अब बस इतना था कि वह गुडि़या को किसी तरह से पढ़ालिखा कर कुछ बना दे.

धीरेधीरे समय बीतता गया. गुडि़या बड़ी होती गई. अब वह 8वीं क्लास में पढ़ती थी. मुनिया ने गुडि़या को अच्छे संस्कार दिए थे. गुडि़या भी मेधावी और मेहनती लड़की थी. वह मुनिया की कही बातों को हमेशा मानती थी. गुडि़या 8वीं क्लास पास कर गई थी. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो देखा कि मां की हालत बेहद खराब है. उसे अस्पताल में भरती करवाया गया, लेकिन मुनिया चल बसी.


मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुडि़या की जिंदगी ही उजड़ गई. फुलिया और महल्ले की दूसरी औरतें अब गुडि़या को ताने मारती थीं कि इस की मां तो इसे बड़ा अफसर बनाने चली थी और खुद ही इस दुनिया से चली गई. मुनिया की एक भतीजी थी शीतल, जो शहर में रहती थी और एक बैंक में क्लर्क थी. उस का तलाक उस के काले रंग की वजह से हो गया था. जिस लड़के से उस की शादी हुई थी, वह पियक्कड़ था.
मरने से पहले मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुडि़या की बाबत फोन पर सब बातें बता रखी थीं. वह कह चुकी थी कि उस के अलावा गुडि़या का इस दुनिया में कोई नहीं है. अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वह गुडि़या की देखभाल करे.


शीतल को गांव में आए हफ्ताभर हो गया था. स्कूल का टीसी बनने में समय लग रहा था. 1-2 दिन में टीसी मिल गया था. गुडि़या शीतल के साथ शहर गई थी, लेकिन शहर में आने के बाद भी गुडि़या को अपनी मां का चेहरा नहीं भूलता था. गांव की भी याद आती थी. गुडि़या किसी भी हाल में अपनी मां के सपनों को पूरा करना चाहती थी. इधर शीतल और गुडि़या को फुलिया और  महल्ले की औरतों की बातें रातों को सोने नहीं देती थीं. शीतल ने उस समय फुलिया और महल्ले की औरतों के तंज का कोई जवाब नहीं दिया था. उसे पता था कि उन को जवाब देने से बेहतर है कि सही समय का इंतजार किया जाए.


धीरेधीरे समय बीतने लगा. गुडि़या और जोरशोर से मेहनत करने लगी थी. अब वह यहां शहर में भी वही काम करती. सुबह उठ कर ?ाड़ूबरतन कर के नहाधो कर नाश्ता तैयार कर देती. शीतल दीदी के लिए भी नाश्ता तैयार कर देती. शहर में गैस का कनैक्शन था, लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. पानी भर कर बाहर से नहीं लाना पड़ता था, इसलिए गुडि़या का बहुत सा समय बच जाता था. अब वह और मन लगा कर पढ़ाई करने लगी थी.

इधर, शीतल को अपने पति से तलाक लेने के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था. गुडि़या के चले आने से उस का भी मन लगने लगा. उस ने घर में रखा हुआ नौकर भी हटा दिया था. गुडि़या आसपड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी. 9वीं क्लास में गुडि़या ने पूरे स्कूल में टौप किया था. अब शीतल को भी यकीन हो गया था कि गुडि़या एक एक दिन कुछ बड़ा जरूर करेगी.
10वीं क्लास के इम्तिहान हुए, लेकिन इस बार गुडि़या का नतीजा बहुत बेहतर नहीं था. वह अपने स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी.

गुडि़या घर कर रोने लगी. तब शीतल ने उस को सम?ाया, ‘‘इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है. तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो. तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी.’’


दिन बीतते रहे और गुडि़या दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करती रही. देखतेदेखते उस ने नीट का इम्तिहान भी पास कर लिया और एक सरकारी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद उस ने एमबीबीएस भी पास कर लिया. अब वह एक डाक्टर बन गई थी. शीतल को भी गुडि़या पर भरोसा था और गुडि़या उस के भरोसे पर खरी उतरी थी. आज शीतल ने अपनी बूआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था.


शीतल ने इनसानियत के लिए तो गुडि़या की मदद की ही थी, उस का मदद करने के पीछे एक और कारण
था. वह कारण था औरत को कमजोर सम?ाने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना. शीतल को अपने पति को भी जवाब देना था और समाज को भी दिखाना था कि बिना किसी मर्द की मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है. वह अपनी मरजी की खुद मालिक है. तकरीबन 10 साल के बाद एक दिन गुडि़या की पोस्टिंग उस के गांव में हुई थी. उस को प्रमोशन मिल गई थी.


वह अब डाक्टरों की सीनियर थी. अब वह सीएमओ थी. एक दिन गुडि़या अपने केबिन में बैठी परची पर कुछ दवाएं लिख ही रही थी कि नर्स ने अगले मरीज का नाम पुकारा. मरीज का नाम फुलिया
था. नर्स ने जोर से 2 बारफुलियाकह कर पुकारा. थोड़ी देर में गुडि़या के सामने उस के गांव की फुलिया खड़ी थी. गुडि़या को तो एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

गुडि़या ने इशारे से फुलिया को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा, ‘‘बैठिए.’’
फुलिया ने इतने दिनों के बाद

गुडि़या को देखा था. वह रोते हुए बोली, ‘‘बेटी, मु? पहचानामैं फुलिया…’’
गुडि़या की भी आंखें भीगने लगी थीं, ‘‘हां चाची, आप को कैसे नहीं पहचानूंगी. आप को मैं कभी भूल ही नहीं सकती. आप के कारण ही मैं आज यहां पर हूं.’’


‘‘बेटी, मु? माफ कर दे. मुनिया के मुंह से निकली एकएक बात सही थी. पापपुण्य कुछ नहीं होता है, बल्कि इनसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. मुनिया भले ही गरीब थी, लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी. मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो. जैसा वह चाहती थी, वैसा ही तु? बनाया. आज अगर वह जिंदा होती तो कितना खुश होती.


‘‘मेरा आशीर्वाद है बेटी तु?. मैं फिर से एक बार माफी मांगती हूं बेटी. मु? माफ कर दे. मैं गलत थी, फुलिया ही सही थी. परवरिश, इनसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है बेटी. आज मैं यह अपनी आंखों से देख रही हूं.’’


फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई आगे बोली, ‘‘ मुनिया, आशीर्वाद दे अपनी बेटी को. मैं अपनी गलती मानती हूं. जहां भी तू है री मुनिया, मु? माफ कर
दे बहन.’’ कहां तो गुडि़या फुलिया को मिलने पर उस को और महल्ले की औरतों को खरीखोटी सुनाना चाहती थी और कहां वह भी फुलिया के साथसाथ रोए जा रही थी.  Hindi Story               

Hindi Kahani : औरत

Hindi Kahani. रिमझिम शादी के 4 साल में 2 बच्चों की मां बन गई. उस का पति अंजुम शराबी था और मारपीट भी करता था. रिमझिम इस जिंदगी से तंग गई और एक दिन उस ने अंजुम को ही धुन दिया. क्या वह अपनी शादी निभा पाई? उस के बच्चों का क्या हुआ?

कि सिरे से इस कहानी को शुरू करूंऋतुएं अपना वेश बदलती रहती हैं. बादलों के बीच झांकते कई अक्सर भी अपना रूप बदलते रहते हैं और सब से ज्यादा इनसान अपना बरताव बदलता रहता है.
18 साल की उम्र में ब्याह और फिर 20-22 साल की उम्र में 2 बच्चों की मां बन जाना, अल्हड़पन और जवानी रिमझिम के हिस्से में कभी नहीं आई. पति शराबी था. संयुक्त परिवार था. सब की बातों को सुनती, सहती. तानों को सहतेसहते उस का मन सब से उचाट हो गया था.

आज भी रिमझि को याद है ब्याह के चौथे दिन ही पति का गलत बरताव. रात के 11 बज रहे थे. अंजुम अभी तक घर नहीं लौटे थे. घर के सभी सदस्यों से रिमझिम पूछ चुकी थी. सभी का यही कहना था कि जाएगा कुछ देर में. रिमझिम का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. तभी दरवाजे की घंटी बजी. वह बेतहाशा दौड़ी और दरवाजा खोला, सामने अंजुम शराब के नशे में चूर था. उसे कुछ समझ  नहीं आया. रोते हुए बोली, ‘‘आप शराब पी कर आए हैं?’’

‘‘हां, पी कर आया हूं. तेरे बाप के पैसे की नहीं पी कर आया हूं,’’ इतना कह करान्नाटेदार थप्पड़ से रिमझिम का गाल लाल हो गया. रिमझिम की डबडबाई आंखों में अपने मातापिता का स्नेहिल चेहरा धुंधलाने लगा. उसे लगा कि अगर दीवार का सहारा नहीं लिया, तो वह चकरा कर वहीं गिर जाएगी.
तभी ससुर दौड़ कर आए और रिमझिम को सास के पास बैठा कर अंजुम के पास चले गए.
सास ने कहा, ‘‘अब तुम्हें ही इसे संभालना है बहू. बहुत पीताखाता है.’’

‘‘आप लोग जान रहे थे तो इन की शादी क्यों कराई?’’ रिमझिम की बेबसी उस की आंखों से बह रही थी.
‘‘जी छोटा मत करो, कोई कोई रास्ता निकल आएगा. तुम गई हो, अब सब संभाल लोगी,’’ सास
की रुंधी हुई आवाज रिमझिम को असमय ही मैच्योर हो गई. मारपीट, गालीगलौज अब रोज की बात हो गई थी.

एक दिन अंजुम दिन में ही पी कर गया. बच्चे घर में ही थे. रिमझिम बच्चों को ले कर ऊपर के कमरे में
चली गई.कुछ देर बाद अंजुम आया और दहाड़ते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे से बगैर पूछे ऊपर आने की? बकरा लाया हूं. जाओ, उसे पकाओ. और हां, मेरे 4 दोस्त भी साथ में हैं.’’ रिमझिम बच्चों के सामने किसी तरह का बखेड़ा नहीं चाहती थी. वह चुपचाप नीचे चली गई. अंजुम भी साथ में गया और बच्चे भी.

रसोईघर में नम आंखों से रिमझिम प्याज काटने लगी कि तभी अंजुम उसे पकड़ कर बोला, ‘‘रो रही हो? बकरा बनाने को बोल दिया इसलिए?’’ रिमझिम गुस्से से अंजुम को देखने लगी. अंजुम बोला, ‘‘आंखें नीची कर बेशर्म औरत.’’ लेकिन रिमझिम अंजुम को उसी तरह देखती रही.

तभी अंजुम बालों से पकड़ कर रिमझिम को घसीटने लगा. बच्चे सहमे हुए दरवाजे से छिप कर देख रहे थे.
रिमझिम अपने ही बच्चों के सामने यह बेइज्जती सहन नहीं कर पाई. वह अचानक शेरनी की तरह झपटी और अंजुम को वहीं पटक कर घूंसे मारने लगी. वह चिल्लाती जा रही थी, ‘‘देख मेरी हिम्मतदेखना चाहता था . बहुत हो गया तुम्हारा वहशीपन, अब मैं दिखाऊंगी बगैर पीए अपना वही रूप.’’
अंजुम का नशा कपूर की तरह उड़ गया था. सास ससुर, जेठ जेठानी सभी आवाज सुन कर गए. ससुर की कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी, ‘‘यही कमीनी है. इसी के चलते घर में कलह हो रही है.’’

इतना सुनते ही रिमझिम दहाड़ उठी, ‘‘अभी तक मैं ही कलह कर रही थीहै ? आप का बेटा संस्कारी है. जब मैं पीटी जाती थी, तब तो आप लोग खामोश रहे और आज जब मैं अपने लिए आवाज उठा रही हूं, तो आप सब की निगाह में कमीनी हो गई.’’

‘‘चुप कर बेशर्म औरत, आज तक तेरे जैसी औरत कहीं नहीं देखी. बेहया कहीं की. अंजुम ठीक करता है. अगर तुम्हारे ऊपर लाठीडंडा चले, तो तुम बेहयाई पर उतर आओगी.’’ तड़प कर रिमझिम उठी और हाथ का डंडा ससुर पर फेंक मारा. सारे लोग अवाक से ताकते रह गए.

‘‘अंजुम, तुम अपना परिवार ले कर अलग हो जाओ. मुझे से अब यह सब बरदाश्त नहीं होगा,’’ ससुर धीमी आवाज में बोले.‘‘एक शर्त पर, घर मेरे नाम पर होगा,’’ रिमझिम की हठी आवाज हवा में तैर गई.
बंटवारा हो गया. अंजुम अपने परिवार के साथ इस घर में गया, पर पीना नहीं छूटा और ही छूटी मारपीट.

जेठ के बेटे की शादी थी. रिश्तेदारों की भीड़ से घर अटा पड़ा था. रात 9 बजे रिमझिम सब को खाना खिला रही थी. अंजुम आया और उस का हाथ पकड़ कर खींचने लगा. रिमझिम ने झटके से
हाथ छुड़ा लिया कि तभी हवा में लहराता हाथ उस के गालों पर पड़ा. वह गुस्से में बदहवास अंजुम पर टूट पड़ी. गुस्से से दांत किटकिटाते हुए बोली, ‘‘संभल जाओ अंजुम, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा.’’ परिवार के कुछ लोग कर रिमझिम को साथ ले गए.

4 सासों के बीच रिमझिम बैठी थी.
‘‘बहू तुम ने अच्छा नहीं किया अपने पति को मार कर. हमारे धर्म में पति पर हाथ उठाना पाप है. जिस पति की लंबी उम्र के लिए तुम तीजत्योहार करती हो उस को तुम कैसे मार सकती होतुम्हें नरक में भी जगह नहीं मिलेगी.’’

‘‘नरक की भी चाह नहीं रही अब मेरी. इस से बुरा और क्या हो सकता है किसी के लिए. 25 साल से जुल्म सहती आई हूं. अब नहीं और कभी नहीं,’’ रिमझिम की मजबूत, लेकिन कांपती आवाज सुनाई दी.
‘‘बेलगाम हो गई है रिमझिम,’’ उस की अपनी सास ने धीरे से कहा.

समय रेत की तरह फिसलता रहा. बच्चों को एक खास माहौल में रखने की जिद में रिमझिम जिद्दी से और जिद्दी होती गई. उस के दोनों बच्चे काबिल थे. अच्छी परवरिश और रिमझिम के दिए संस्कार से बड़ा बेटा डाक्टर और छोटा बीडीओ बन गया.

बच्चों के बड़े पद पर जाते ही सारे रिश्तेदारों की नजरों में रिमझिम के लिए एक खास जगह बन गई. ससुर भी अपनी बहू के कायल हो गए, पर रिमझिम के दिल में किसी के लिए कोई इज्जत नहीं बची थी. वह सब को आदरस्नेह देती थी, पर दिल के अंदर अजीब से भाव भरे हुए थे.

बड़े बेटे की शादी की तैयारी में बिजी रिमझिम खुद सबकुछ कर रही थी. उसे रिश्तेदारों का कोई सहयोग नहीं चाहिए था. बेटे को देखती और बलिहारी जाती. उस के लिए अपने बच्चों की खुशियों से ज्यादा कुछ नहीं था. सास बनने की चाह उस के चेहरे पर अनूठी मुसकान बिखेर रही थी.अंजुम में बदलाव आया था, पर अकड़ अभी भी बाकी थी. शराब कम हुई थी, पर पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी.

रिमझिम नहीं चाहती थी कि बेटे की शादी में कोई भी शराब पी कर माहौल को खराब करे. सब से ज्यादा तो डर उसे अपने पति से ही था. आज शाम बेटे की बरात जानी थी. रिमझिम का मन अजीब सी उथलपुथल से भर रहा था. उस ने मन ही मन एक फैसला लिया.दोपहर के 2 बज रहे थे. रिमझिम अपने पति के पास गई और बोली, ‘‘बारात में कोई शराब पी कर नहीं जाएगा.’’

‘‘तुम बावली हो गई हो क्या? पीनापिलाना हमारी शान है,’’ अंजुम ने कहा. ‘‘पत्नी को पीटना और बच्चों को दुत्कारना भी शायद आप के लिए शान की बात है, है ?’’ ‘‘उन सब बातों को अभी भूल जाओ रिमझिम. वैसे तुम किसकिस को रोकोगीअगर ऐसा करोगी तो शायद कोई बरात में ही नहीं जाए.’’
‘‘ जाए कोई. मुझे  फर्क नहीं पड़ता. पर शराब पीकर कोई नहीं जाएगा और यही मेरा आखिरी फैसला है. बच्चे भी सहमत हैं मुझे से,’’ रिमझिम ने अपनी बात रख दी. अंजुम अजीब उलझन में फंस गया. दोस्त और कई रिश्तेदार बगैर शराब कहीं जाते ही नहीं. दोस्तों तक बात पहुंची. उन्हें ?ाटका लगा.

एक दोस्त ने ताना कसा, ‘‘तुम मेहरारू भक्त हो गए हो क्या अंजुम? तुम उन की बात क्यों मानोगे? मालिक तो तुम हो. तुम जैसा चाहोगे भाभीजी को वैसा ही करना होगा. औरतों का घर पर राज नहीं चलना चाहिए. आओ, पी कर चलते हैं. देखते हैं कि भाभीजी क्या कर लेंगी.’’ दोस्तों की हुंकार के सामने अंजुम भी शेर बन गया और शराब का दौर शुरू हो गया.

इधर शादी का लोकगीत का गीत गाया जा रहा था. रिमझिम की आंखें खुशी से नम थीं. मां को खुश देख कर विनय का भी मन खुशी  था. आज बरसों के बाद मां के चेहरे पर सुकून था. तभी अंजुम आया और दूल्हे के गाड़ी में बैठ गया. रिमझिम तमतमा उठी. अंजुम के मुंह से उठती शराब की बदबू उस की सांसों को मानो रोक रही थी.

अचानक रिमझिम दहाड़ी, ‘‘अंजुम, आप गाड़ी से नीचे उतरिए. आप बरात में नहीं जाएंगे और जिसजिस ने भी शराब पी है, वे अपनेअपने घर चले जाएं.’’
अंजुम गाड़ी से उतरा और तमतमाते हुए बोला, ‘‘बहुत गरमी चढ़ गई है शरीर में. सब उतार दूंगादेखता हूं कि कौन मुझे बैठने नहीं देता है…’’

अंजुम गाड़ी में बैठने गया कि तभी विनय ने गाड़ी का दरवाजा बंद कर लिया और बोला, ‘‘पापा, आप लोग बरात में नहीं जाएंगे.’’ ‘‘मैं तेरा बाप हूं,’’ अंजुम चीखा. ‘‘मैं सिर्फ मां का बेटा हूं.’’‘‘रिमझिम, मान जाओ. तकरीबन सभी ने पी रखी है. अगर तुम्हारी यही जिद रही तो इक्कादुक्का लोग ही बरात में जा पाएंगे और अगर अंजुम नहींगया तो शादी की रस्में कौन निभाएगा?’’ ससुर बोले.

ससुर का कहना भी रिमझिम ने ठुकरा दिया, ‘‘मैं निभाऊंगी. जैसे अभी तक बच्चों की परवरिश करती आई हूं. और रहा सवाल इक्कादुक्का लोगों के बरात में जाने का, तो यही बेहतर है. मेरी बहू के घर कोई भी नशेड़ी या गंजेड़ी नहीं जाएगा.’’ 
रिमझिम दूल्हे की गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी. सभी हैरान हो कर एक औरत की हिमाकत और हिम्मत देखते रह गए. Hindi Kahani

लेखक – कात्यायनी सिंह             

  

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें