Social Issue Story : गांव की ओर – रमुआ ने गांव में क्या देखा

Social Issue Story. डाक्टर की सलाह पर रमुआ हवापानी बदलने के लिए अपने गांव जा रहा था. न जाने कितने साल हो गए थे उसे गांव गए हुए. मांबाप के मरने के बाद से वह एक बार भी गांव नहीं गया था.

रमुआ तकरीबन 10-12 साल पहले गांव से शहर आया था. गांव में उस की थोड़ीबहुत खेती थी. खेती के साथसाथ वह गांव में मजदूरी भी करता था.

गांव के कुछ लोग शहर में मजदूरी करते थे. जब रमुआ उन को गांव से वापस शहर जाते देखता था तो उस का मन भी मचल उठता था. लेकिन मांबाप उसे शहर नहीं जाने देते थे.

जब मजदूर शहर से गांव लौटतेतो अपनी बीवी के लिए चूडि़यां, बिंदी वगैरह लाते थे. यह देख कर रमुआ की बीवी सोचती कि काश, उस का पति भी शहर जाता. वह रमुआ को शहर जाने के लिए उकसाती थी.

एक दिन जिद कर के रमुआ रोजगार के लिए शहर चला गया. हफ्तेभर बाद उस ने बीवीबच्चों को भी वहां बुला लिया.

रमुआ को अपने गांव वालों की मदद से कैमिकल बनाने वाली किसी फैक्टरी में दिहाड़ी पर काम मिल गया था. रहने के लिए उस ने अपने साथियों के साथ शहर के बाहर एक नाले के किनारे झोंपड़ी बना ली थी.

रमुआ को जब पहली बार तनख्वाह मिली तो वह हैरान रह गया. इतना पैसा उस ने आज तक नहीं कमाया था.

रमुआ सोचने लगा कि वह अपने बच्चों को खूब पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी दिलाएगा.

शुरू के कुछ महीने तो अच्छे बीते, लेकिन बाद में यही पैसे कम पड़ने लगे. शहर में महंगाई ज्यादा थी और खर्चे भी गांव से ज्यादा थे.

धीरेधीरे रमुआ को भी अपने साथियों की तरह शराब पीने की लत लग गई. कभीकभी उसे काम नहीं मिलता था. फैक्टरी में हड़ताल भी अकसर होती रहती थी.

समय के साथसाथ रमुआ के बच्चे बड़े होते गए. साथ ही, नाले से लगा पूरा इलाका भी झोंपडि़यों का एक जंगल सा बन गया.

अब हफ्ता वसूलने वाले गिरोह पैदा हो गए थे. रमुआ को भी नगरपालिका व गुंडों को हफ्ता देना पड़ता था. इस चक्कर में जो आमदनी पहले बहुत ज्यादा दिखती थी, अब उस में घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो गया था. बीवी तो पहले ही लोगों के घरों में बरतन मांजने का काम कर रही थी, अब बच्चों को भी काम पर लगा दिया गया था. इस इलाके में यह नई बात नहीं थी. सब परिवारों में यही हो रहा था.

रमुआ की बीवी का किसी गैर मर्द से चक्कर चल रहा था. इस बात को ले कर वह आएदिन अपनी बीवी से लड़ता रहता था. वह उसे शराब पीने के लिए कोसती थी.

धीरेधीरे रमुआ का बेटा व बेटी भी दूसरे बच्चों की तरह बुरी आदतों के शिकार हो गए. बेटा भी अब छिप कर शराब पीने लगा था. बीड़ी तो वह खुलेआम ही पीता था.

पहले जब रमुआ अपने बेटे को डांटता और पीटता था तो वह चुपचाप सुन लेता था, लेकिन अब वह भी जवाब देने लगा था, ‘तुम खुद पीते हो तो मुझे डांटते क्यों हो?’

रमुआ ताज्जुब से सिर पकड़ कर बैठ जाता था. सोचता कि आजकल के बच्चों को क्या हो गया है. उस ने तो बचपन में क्या पूरी जिंदगी में अपने बाप को ऐसे जवाब देना तो दूर आंख मिला कर बात भी नहीं की थी.

दूसरी ओर रमुआ की बड़ी बेटी, जो अपनी मां के साथ काम पर जाती थी, ने भी बस्ती की दूसरी लड़कियों के रंगढंग अपना लिए थे. वह काली थी तो क्या हुआ, पर जवान थी. लोगों की तीखी नजरें व फिकरे उस की जवानी में उबाल लाते थे. उस ने बस्ती के कुछ आवारा लड़कों को दिल दे दिया था.

प्यार के 2 रास्ते होते हैं. एक रास्ता शादी का होता?है और दूसरा बरबादी का.

रमुआ की बेटी इतनी खुशनसीब नहीं थी कि प्यार के पहले रास्ते पर चलती. कई लड़कों से उस के जिस्मानी रिश्ते बने और वह भी बिना शादी के ही पेट से हो गई.

हालांकि बस्ती में रहने वाली दाई ने दूसरी लड़कियों की तरह उसे भी इस मुसीबत से छुटकारा दिला दिया था, पर रमुआ के लिए यह बात फांस बन गई.

तभी फैक्टरी में हड़ताल हो गई. इस बार हड़ताल काफी लंबी चली. लगता था जैसे दोनों तरफ के लोग अखाड़े में उतर आए हों.

जल्दी ही भूखे रहने की नौबत आ गई. शहर की महंगाई में अकेली कमाई से पेट नहीं भरता. इस वजह से घर में क्लेश बढ़ गया.

अब बीवी अकेली कमाती थी, इसलिए दबती नहीं थी. रमुआ मन मार कर रह जाता था. मौका मिलते ही वह घर का सामान बेच कर शराब पी लेता था.

एक दिन रमुआ की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई. ज्यादा शराब पीने व फैक्टरी में जो कैमिकल बनता था, उस की वजह से रमुआ के फेफड़े खराब हो गए. डाक्टर ने उसे कुछ दिन जगह बदलने की सलाह दी.

पहले तो रमुआ ने डाक्टर की सलाह नहीं मानी. लेकिन जब वह ठीक नहीं हुआ तो गांव जाने की तैयारी करने लगा.

एक दिन रमुआ के घर पुलिस आई और उस के बेटे कालू के बारे में पूछने लगी. रमुआ को हैरानी हुई कि आखिर उस के बेटे ने ऐसा क्या कर दिया.

काफी पूछने पर पुलिस ने बताया कि कालू ने चोरी की है.

रमुआ घबरा कर बोला, ‘साहब, वह तो कई दिनों से घर आया ही नहीं, पता नहीं कहां गया है?’

‘क्या तुम्हें अपने बच्चे के बारे में पता नहीं, कैसे बाप हो तुम?’ पुलिस ने धमकाया.

रमुआ सिर झुका कर चुपचाप सुनता रहा. उस के दिमाग में हलचल मच गई. वह सोचने लगा कि आखिर इस शहर ने उसे क्या दिया? फिर उसे लगा कि इस शहर ने उसे काम तो दिया है नहीं तो गांव में कभी अकाल, तो कभी बाढ़ की मार सहनी पड़ती थी.

काफी सोचविचार के बाद रमुआ ने गांव लौटने की ठानी. गांव जाने के लिए पहले तो रमुआ की बीवी व बच्चों ने मना किया, पर बाद में वे राजी हो गए.

गांव पहुंचते ही रमुआ के दोस्तों व रिश्तेदारों ने उसे घेर लिया.

शाम को रमुआ अपने दोस्तों के साथ गांव घूमने गया तो उस ने देखा कि गांव के बाहर खुदाई का काम चल रहा है.

‘‘अरे रहमान, यहां क्या हो रहा है?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा. ‘‘गांव में कच्ची नहर बन रही है. इस में पानी आएगा और हम साल की 2 फसलें ले सकेंगे.

‘‘और हां, इस की खुदाई भी हम गांव वाले ही कर रहे हैं. पंचायत इस के बदले में हमें 10 किलो अनाज व 30 रुपए दिहाड़ी देती है,’’ रहमान ने बताया.

‘‘अच्छा, तभी तो मैं ने गांव में कोई हुक्का पीते या बातें करते हुए नहीं देखा,’’ रमुआ ने कहा. ‘‘हां, अब बच्चे भी स्कूल जाते हैं और आदमी व औरतें नहर व दूसरे कामों पर जाते हैं,’’ रहमान ने बताया.

‘‘दूसरे कौन से काम…?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘प्रधानमंत्री गांव सड़क योजना, सरकारी दवाखाना, स्कूल व पंचायत के भवन बनाने जैसे काम,’’ रहमान ने जोश में आ कर बताया.

‘‘क्या गांव में इतने सारे काम हो रहे हैं?’’ रमुआ आंखें फाड़ कर बोला. ‘‘और नहीं तो क्या,’’ रहमान ने जवाब दिया.

लौटते समय अंधेरा हो गया था. रहमान ने चलते हुए कहा, ‘‘यार, तुम्हें तो अंधेरे में परेशानी होती होगी. तुम तो शहर में बिजली के आदी हो गए होगे?’’

अब रमुआ क्या जवाब देता. उस की झोंपड़ी में 25 वाट का बल्ब था. वह भी कभीकभी ही रोशनी देता था. गली में खंभा तो था, पर बल्ब नहीं था.

आज खाना रमुआ के दोस्त बनवारी के यहां था. रमुआ व उस के परिवार को लगा कि उन्हें इतना लजीज खाना खाए कितने साल हो गए.

सुबह उठ कर रमुआ अपने खेत की ओर गया. इतने सालों में जमीन में खरपतवार हो गए थे. खेत की मिट्टी को हाथ लगाते ही रमुआ रोने लगा.

उसे दीनू काका आते दिखाई दिए तो उस ने पूछा, ‘‘इतनी सुबहसुबह कहां जा रहे हो काका?’’

‘‘पास के कसबे के बैंक में जा रहा हूं. खेत में बीज बोने व हल खरीदने के लिए कर्ज ले रहा हूं,’’ दीनू काका ने जवाब दिया.

‘‘क्या सरकार हम जैसे छोटे लोगों को भी कर्ज देती है?’’ रमुआ ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘हां, वह भी कम ब्याज पर,’’ दीनू काका ने कहा और चल पड़े.

रमुआ की बीवी को पड़ोसी फरजाना पंचायतघर की ओर ले गई. उस ने गांव की औरतों व शहर की एक लड़की को वहां बैठे देखा तो पूछा, ‘‘अरे दीदी, यहां क्या हो रहा है?’’

‘‘यह लड़की गांव की औरतों को सिलाईकढ़ाई का काम सिखाती है और शहर से काम ला कर देती है,’’ फरजाना ने कहा.

रात को रमुआ व उस की बीवी ने गांव में आए इस बदलाव को देख कर एक फैसला किया.

सुबह रमुआ को अपना घर ठीक करते हुए देख वहां सब लोग जमा हो गए. जुम्मन ने हैरत से पूछा, ‘‘क्यों रमुआ, यहां ज्यादा दिन रहने का इरादा है क्या?’’

‘‘अब मैं कभी शहर नहीं जाऊंगा. सब के बीच यहीं काम करूंगा. शहर में गंदगी व बीमारी के सिवा कुछ नहीं रखा है. अब मैं ने सोचसमझ कर फैसला किया है कि मुझे यहीं पर रहना है,’’ रमुआ ने गांव वालों से कहा.

रमुआ की बीवी फैसला सुनाते हुए बोली, ‘‘बस, अब हम यह गांव छोड़ कर कभी नहीं जाएंगे.’’

कुछ अरसे बाद रमुआ की बेटी की शादी भी गांव में हो गई. उस का बेटा मजदूरी के साथसाथ खेती भी करने लगा. सभी लोग खुश थे.

अब रमुआ न शराब पीता था, न ही उस की बीवी उस से झगड़ती थी.

रमुआ को देख कर बाकी गांव वाले भी शहर से वापस आ गए. अब लोग शहर जाने की बात पर एकदूसरे को चुटकुले सुनाते और हंसते हैं. Social Issue Story

Story : बसंती

Story. गांव का एकलौता पुरोहित भोला इस बात से पूरी तरह वाकिफ था कि मरने से पहले बसंती की मां बेटी के पास कुछ चांदी के सिक्के व जेवरात छोड़ गई है, जिसे किसी बहाने से हासिल कर के वह कुछ दिनों के लिए अपनी बदहाली तो दूर कर ही सकता है.

थोड़ी देर में ही पूजा का काम खत्म कर उस ने एक गहरी नजर से बीमार सुमन की ओर देखा. फिर बसंती की ओर मुखातिब हो कर बोला, तेरी बेटी को कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है. अब इसे बचाना बड़ा मुश्किल है. अच्छा होगा कि तू इस मनहूस बच्ची का मोह छोड़ कर फिर से गोद भरने की कोशिश करे.

पुरोहित से ऐसा जवाब सुन कर बसंती दुखी आवाज में बोली, बाबा, अगर मेरी एकलौती बेटी मर गई, तो फिर मैं अपनी सूनी गोद ले कर यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे काट पाऊंगी? बसंती की इस कमजोरी से पुरोहित को अपने अंधविश्वास का तीर सही निशाने पर लगने का एहसास हुआ. उस ने सहज ही यह जान लिया कि अब देरसवेर वह उस की झोली  में जरूर आ गिरेगी.

पुरोहित भोला मन ही मन मुसकराते हुए मीठी आवाज में बोला, तेरी मां अपने मन में धनदौलत का मोह लिए ही मर गई, इसलिए उस की आत्मा प्रेतलोक में बेचैन भटक रही है. अब वही बेचैन आत्मा प्रेतलोक से लौट कर इस घर में आ बैठी है, जिस के असर से तेरी गोद और सुमन की जिंदगी दोनों खतरे में है.

तो फिर इस प्रेतात्मा से पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताइए बाबा? बसंती ने सहमते हुए पूछा. तुम फौरन अपनी मां के सारे जेवरात और चांदी के सिक्के अपने हाथ से छू कर किसी ब्राह्मण को दान कर दो. उसी दान की बदौलत सुमन को एक नई जिंदगी मिलेगी और तुम्हें मां बनने का सुनहरा मौका.

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पुरोहित की कही बात पर गंवार बसंती ने पूरी तरह यकीन कर लिया. फिर भी वह अपनी लाचारी जाहिर करते हुए बोली, “लेकिन बाबा, मैं तो बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर पहले से ही अपने सारे जेवर बेच चुकी हूं, अब इस हाल में मां के जेवर भी दान में दे दूंगी, तो फिर वक्त पड़ने पर किस के आगे हाथ पसारने जाऊंगी? कौन सहारा देगा मुझे ’’

बसंती की मजबूरी को सुन कर पुरोहित को अपना खेल बिगड़ता नजर आया. लेकिन तुरंत ही लोभ का दूसरा पासा फेंकते हुए वह बोला, ‘‘क्या तेरे मन में बेटा पाने की तनिक भी लालसा नहीं है?’’ ‘‘लालसा तो कब से लगी है…’’ बसंती झेंपते  हुई बोली, ‘‘सिर्फ एक बेटे की कमी से मेरी पूरी जिंदगी बोझ जैसी बन गई है. एक बेटा पाने के लिए मैं कब से तरस रही हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, कल सुबह तुम अपनी मां के सारे जेवर मुझे दान में दे देना. फिर देखना, मैं तेरे अंधेरे घर में कितनी जल्दी उजाला कर देता हूं,’’ इतना कहते हुए भोला की नजर बसंती की देह से फिसलती हुई वहां जा कर ठहर गई, जहां लोहे की पुरानी संदूकची पड़ी हुई थी.

अब बसंती को पुरोहित की नीयत समझने में जरा भी देर नहीं हुई, पर घर में अकेली और देह से कमजोर बसंती मन मसोस कर रह गई. ‘‘अब क्या सोचने लगी?’’ भोला ने उसे टोका, ‘‘क्या मेरा सुझाव ठीक नहीं लगा?’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ बसंती ने ऊंची आवाज में नफरत से कहा, ‘‘अपनी गोद दोबारा भरने के लिए मां के कीमती जेवर किसी और के हाथ में देने की हिम्मत मुझ में नहीं है.’’

बसंती के इस रूखे बरताव ने पुरोहित के लहलहाते अरमानों पर ओले बरसा दिए. फिर भी पुरोहित ने हार नहीं मानी और धीमी आवाज में बोला, ‘‘जब बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर तुम ने अपने जेवर बेच दिए, तो दोबारा मां बनने की उम्मीद में तुम अपनी मां के पुराने गहने पुरोहित को दान में नहीं दे सकतीं? जानती नहीं, पुरोहित को दिया हुआ दान लोकपरलोक दोनों को सुधारता है?’’

पुरोहित ने एक बार फिर उस संदूकची की ओर देखा, तो बसंती का रोमरोम एक अनजाने खौफ से सिहर उठा. अभी वह खामोश खड़ी थी कि पुरोहित की पत्नी कमला पति को तलाशती हुई वहां आ पहुंची और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्योंजी, यजमानी के इस काम से जो आमदनी होती है, उसे आप शराब और गांजा पीने में उड़ा देते हैं, फिर यह धंधा सिर पर ढोने से क्या फायदा, जब घर में बीवीबच्चे रोटी के लिए तरस रहे हों?’’

‘‘ठीक है, आज का ‘सीधा’ बसंती बहू से ले लो और घर जा कर भोजन बनाओ,’’ पुरोहित ने पत्नी को टालने की नीयत से कहा और जल्दी से पोथीपतरा समेट कर दूसरे यजमान के घर कथा बांचने चला गया.

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भोला के जाते ही ‘सीधा’ लेने के लिए ठहरी कमला बसंती को उदास देख कर संजीदगी से पूछ बैठी, ‘‘इस पूजापाठ के पीछे तेरी क्या मुराद है बहू?’’ ‘‘मासूम बेटी की सलामती, जो अब मुमकिन नहीं लगती.’’ ‘‘ऐसा क्यों?’’ कमला उतावली हो कर पूछ बैठी, ‘‘क्या इस पूजापाठ पर तुझे बिलकुल भरोसा नहीं?’’ ‘‘भरोसा तो है चाची, लेकिन आज के पुरोहित पूजापाठ की ओट में अपने यजमान को उलटा पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए हैं. धर्मकर्म के नाम पर अब ये ढोंगी अपने यजमान का धन और धर्म दोनों लूट लेना चाहते हैं.’’

‘‘यह तुम क्या बकने लगी बहू?’’ कमला हैरत से बोली, ‘‘मैं ने क्या पूछा और तू जवाब क्या देने लगी?’’ ‘‘सच कहती हूं चाची…’’ बसंती का गला भर आया, ‘‘बेटी की लंबी बीमारी ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया है और इसी आफत में पुरोहितजी दोबारा गोद भरने का लालच दे कर मेरा सबकुछ ठग लेना चाहते हैं.’’ बसंती की पीड़ा सुन कर कमला का दिमाग झनझना उठा. उस के हाल पर तरस खा कर वह बोली, ‘‘ठीक है बहू, इस समय मैं खाना बनाने जा रही हूं. लेकिन शाम को इस बारे में तुम से फिर बात करूंगी.’’

शाम को कमला बसंती से मिल कर उस की आपबीती से पूरी तरह वाकिफ हो चुकी थी. दूसरे दिन सुबह पुरोहित जैसे ही कथा बांचने के लिए बसंती के घर पहुंचा, तो उस के पीछेपीछे कमला भी आ गई. पत्नी को इस तरह आया देख पुरोहित अपनी लाल आंखों से उसे घूरते हुए रूखे स्वर में बोला, ‘‘आज सुबह से ही तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? क्या चाहती हो तुम?’’ ‘‘बस यही कि अब आप यह यजमानी का पेशा छोड़ दीजिए,’’ कमला ने कहा. ‘‘वह क्यों?’’ भोला ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि अब यह पेशा शरीफ ब्राह्मणों का सुकर्म नहीं, बल्कि खातेपीते ब्राह्मणों का कुकर्म बन गया है. अब यह पेशा पुरोहित और यजमान के पाक रिश्ते के बीच एक ऐसी दरार पैदा करता जा रहा है, जो आने वाले दिनों में दोनों की शराफत पर एक सवालिया निशान लगा सकता है,’’ कमला ने पति की ओर देख कर संजीदगी से कहा.

पुरोहित ने जोर से चीख कर कमला को एक जबरदस्त धक्का दिया, जिस से वह सामने की दीवार से जा टकराई और उस का सिर लहूलुहान हो गया. चोट बड़ी गंभीर लगी थी. कमला फूटफूट कर रो पड़ी, लेकिन भोला पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह गुस्से में अपनी पत्नी को और भी भलाबुरा कहने लगा.

पति की घुड़की से बेअसर कमला बरसती आंखों से उसे देखती हुई बोली, ‘‘आज मुझे भी पता चल गया है कि पुरोहित कितना नीच और घटिया इनसान होता है, जो अपने यजमान की मजबूरी पर तरस खाने के बजाय उस की दौलत व इज्जत लूटने को तैयार हो जाता है.

‘‘अब मेरे लिए विधवा की जिंदगी जी लेना आसान है, मगर किसी ढोंगी, लोभी, पाखंडी, ठग और धर्मकर्म का पेशा करने वाले पुरोहित की सुहागन बन कर जी लेना आसान नहीं. ऐसा कभी नहीं होगा.’’ इतना कह कर कमला जैसे ही वहां से चलने को हुई कि अचानक पुरोहित के भीतर का इनसान जाग उठा और कमला के सिर पर हाथ रखते हुए वह भरे गले से बोला, ‘‘तेरी कसम, यह पूजापाठ, हवन, जाप, लोकपरलोक, पुरोहित और यजमान सब बनावटी बातें हैं.”

‘‘अब इस गलत काम को मैं कभी नहीं दोहराऊंगा. ऐसे दकियानूसी विचारों में कोरे अंधविश्वास व दिमागी वहम के सिवा कुछ और नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे माफ कर दो.’’  फिर कमला बिना पति की ओर देखे बसंती की बीमार बेटी सुमन को गोद में उठा कर तेज कदमों से डाक्टर के पास चल पड़ी. Story

Hindi Story: ममता की छांव

Hindi Story: मां  को गांव जाने वाली बस में बैठा तो दिया था, पर विजय का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. मां जब बस से उतर कर गांव में अपने घर जाएंगीओहउस ने गलत किया है मां के साथ. उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. उस के माथे पर पसीने की बूंदें छलक गईं. 2 महीने पहले विजय मां को गांव से ले कर आया था अपने साथ. मां तो तब भी नहीं आना चाहती थीं, ‘‘अरे, नहीं बेटामेरा तो यह छोटा सा घर ही अच्छा है. यहां तेरे बचपन की यादें हैं. वह देख चबूतरा, तू इस पर बैठ कर कर पढ़ता था.

‘‘और वह साइकिल अब टूट गई रखरखाव में. तू तो इसे छोड़ता तक नहीं था. साइकिल पर बैठ कर ही खाना खाता और कई बार इस की सीट से सिर टिका कर सो भी जाता था.’’ मां पूरे जोश से घर में रखी
1-1 चीज दिखाती जा रही थीं. विजय का मन बिलकुल नहीं था इस सब कबाड़े को देखने का, पर मां का जोश तो देखते ही बनता था.

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‘‘मां, आप मेरे साथ चलो शहर,’’ विजय ने कहा.
‘‘नहीं, मैं तो यहीं अच्छी हूं,’’ मां ने साफ मना कर दिया था.
पर विजय तो कर मां को लेने आया था. उसे तो उन्हें ले कर जाना ही था. तरुणा ने साफसाफ बोला था, ‘‘किसी भी हालत में मां को गांव से ले कर आना है. खाली हाथ नहीं आना.’’
विजय बड़ी कशमकश में था. उसे पुराने दिन याद गए. जब वह शहर में पढ़ने के लिए गया था. पर उस के शहर पढ़ने जाने के ठीक 10 दिन बाद ही पिताजी गुजर गए थे. जब उस ने यह सुना तो धक रह गया कि अब उस की पढ़ाई का क्या होगा? पिताजी ही तो एकलौते कमाने वाले थे.
पिताजी की तेरहवीं के बाद जब सारे मेहमान चले गए तब विजय ने मां से पूछा था, ‘‘मां, मैं क्या करूं? शहर जाऊं या पढ़ाई छोड़ दूं?’’
मां ने भरी नजरों से विजय की ओर देखा, ‘‘तू शहर जा और पढ़ाई कर. अपने पिताजी के सपनों को पूरा कर बेटा.’’

‘‘पर मां, बहुत खर्चा होता है. आप कैसे…’’ विजय बोला था. ‘‘मैं कर लूंगी. कुछ कुछ तो कर ही लूंगी. खर्चा भेजती रहूंगी. तू पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर,’’ मां ने पूरी दबंगता के साथ कहा था. विजय के चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था. विजय शहर गया और अपनी पढ़ाई करने लगा. मां से वह जितने पैसे मांगता, वे उतने पैसे उसे भिजवा देतीं. विजय ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर मां के पास पैसे कहां से रहे हैं, जो उसे वे भेज देती हैं. एक बार विजय ने पूछा भी, पर मां ने कहा, ‘‘तू तो पढ़ाई करपैसा कहां से रहा है, इस की चिंता छोड़ दे.’’
‘‘जी मां, मेरी जब नौकरी लग जाएगी तो 1-1 पैसा वापस कर दूंगा मां,’’ कहते हुए विजय की आवाज भर्रा गई. उस के सामने अपनी मां की तसवीर उभर आई.

ऐसा नहीं था कि मां बूढ़ी थीं, पर उन के संघर्षों ने उन्हें बूढ़ा बना दिया था और सारा संघर्ष विजय के लिए ही तो था. 5 एकड़ की खेती की जमीन और एक मकान इतनी ही पुश्तैनी जायदाद थी. मां खेतों में काम करती थीं और सब्जी वगैरह पैदा करती थीं, पर जब विजय की पैसों की मांग बढ़ी तो मां ने जमीन को ठेके पर दे दिया और एकमुश्त रकम उसे भेज दी. इस से मां के सामने खुद के लिए दो वक्त की रोटी का सवाल खड़ा हो गया, तो उन्होंने बाहर मजदूरी शुरू कर दी. दूसरों के खेतों में जातीं और दिनभर काम करतीं, जो पैसा मिलता उस में से कुछ अपने लिए बचा कर बाकी विजय को भेज देतीं. ‘‘मां, मैं जानता हूं. आप बहुत कष्ट ?ोल रही हैं. मेरी नौकरी लगने दो, फिर आप को महारानी बना कर रखूंगाकुछ दिनों की बात और है,’’ विजय ऐसा सच में ही बोलता था.

जब विजय की नौकरी लगी तो उस ने सब से पहले मां को ही फोन किया था, ‘‘मां, मेरी नौकरी लग गई है.’’
यह खुशखबरी सुन कर मां को लगा था कि अब उन के बुरे दिन खत्म हो गए हैं. विजय का मन गांव जा कर मां से मिलने का था, पर वह नहीं जा पाया. इसी बीच विजय की तरुणा से मुलाकात हुई और उन दोनों ने शादी करने का फैसला लिया. तब भी वह मां का आशीर्वाद लेना चाहता था, पर उस ने केवल फोन पर
ही मां को बताया था, ‘‘मां, मैं शादी कर रहा हूं.’’ यह सुन कर मां चौंक गई थीं, ‘‘शादी…’’
‘‘हां मां, तरुणा मेरे साहब की बेटी हैबहुत अच्छी हैआप को भी पसंद आएगी…’’
‘‘पर मां के होते हुए तू कैसे अपनी ही शादी की बात करेगाअभी मैं जिंदा हूं.’’
‘‘अरे मां, अब समय बदल चुका है. अब तो ऐसे ही शादीब्याह होते हैं.’’
‘‘मां से बगैर पूछेवाह…’’
‘‘पूछ ही तो रहा हूं…’’ विजय को अपनी गलती का अहसास हुआ.
‘‘पूछ कहां रहा है, तू तो बता रहा है,’’ मां ने कहा.

विजय  कि मां को बुरा लगा है, पर लगने दो, शादी तो उसे ही करनी है और उसे ही अपनी पत्नी के साथ जिंदगीभर रहना हैमां के समय की बात और थी, अब तो सब बदल चुका है. विजय ने शादी कर ली थी. मां को नहीं बुलाया था. पर शादी के बाद वह तरुणा को ले कर गांव गया था. उस के ससुर ने ही बोला था कि घर में कुलदेवता की पूजन करना जरूरी है. विजय कार से गांव पहुंचा. मां गुस्सा तो थीं, पर उन्होने अपना गुस्सा जाहिर नहीं होने दिया. तरुणा का वैसे ही स्वागत किया, जैसे नईनवेली दुलहन का किया जाता है. कुलदेवता की पूजा कराई और गांव की औरतों को बुला कर बधाई गीत भी गाए गए. पर जब गांव वालों ने विजय को ताने मारे कि उस ने अपनी मां के बिना ही शादी कर ली, तो उसे गांव में रहना भारी हो गया. वे दोनों अगले दिन ही गांव से चले गए.

फिर विजय गांव नहीं जा पाया था. उस का ट्रांसफर अब पास के ही शहर में हो गया था. अब उसे यहां लंबे समय रहना था. तरुणा ने ही सु?ाव दिया था कि जब हम को यहां रहना ही है, तो हम अपना घर बना ही लेते हैं. पर विजय की नौकरी तो नई है, तो उस के पास इतने पेसे कहां हें कि वह मकान बना सके.
‘‘क्यों हम गांव का घर और जमीन बेच दें…’’ विजय के ही मन में खयाल आया. तरुणा कुछ नहीं बोली.
‘‘पर मां नहीं बेचने देंगीं,’’ जवाब भी विजय ने ही दिया था.
‘‘देखिए, मां की जायदाद पर तो बेटे का ही हक होता है तो आप जमीन और मकान ले लें,’’ तरुणा ने कहा.
‘‘हां, है तो सही. पर अभी मां जिंदा हैं. वे नहीं रहेंगी, तब ही मेरा हक होगा …’’
‘‘तो हम अपना हिस्सा तो ले ही सकते हो…’’
‘‘अभी मां कुछ नहीं देंगी. शादी के समय से ही वे नाराज हैं.’’
‘‘तो एक काम क्यों नहीं करते…’’ फिर उन दोनों में खुसुरफुसुर होती रही. विजय अगले ही दिन गांव की ओर निकल पड़ा.

मां ने जब विजय को देखा तो वे हैरत में पड़ गईं. मां के चेहरे पर गुस्सा अभी भी दिखाई दे रहा था, ‘‘कैसे याद गई मेरी?’’
‘‘अरे, कुछ नहीं मां. बहुत दिनों से आप से मिला नहीं था, तो सोचा मिल आऊं…’’ कहते हुए विजय ने अपनी नजरों को ?ाका लिया था. दरअसल, विजय मां को लेने आया था, पर उन्हें ले जाने के पीछे एक योजना थी, जिस के चलते वह मां से नजरें नहीं मिला पा रहा था. मां विजय को हक भरी नजरों से देख रही थीं, ‘‘घर पर सब ठीक है …’’ वे उसे घूर कर देख रही थीं.
‘‘हांसब ठीक है…’’ विजय धीरे से बोला.
‘‘बहू कैसी है?’’
‘‘एकदम बढि़या है.’’
विजय मां के हर सवाल पर परेशान हो रहा था. कुछ देर तक शांति बनी रही.
‘‘मैं आप को लेने आया हूं.’’
‘‘क्यों?’’ मां का शक गहराता जा रहा था.
‘‘ऐसे ही, आप कहती थीं कि मु? यहां अकेले नहीं रहना.’’
‘‘मैं ने कब कहा?’’

विजय कुछ देर चुप रहा. उसे मां से इतने सवालों की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह सकपका गया था.
‘‘आप की बहू आप को याद कर रही थी. उस ने ही बोला था कि मां को कुछ दिनों के लिए यहां ले आओ.’’
मां कुछ नहीं बोलीं, पर उन के चेहरे से लग रहा था कि वे अभी भी नहीं आना चाहती हैं. पर दूसरे दिन मां तैयार हो गई थीं चलने को, ‘‘कब निकलना है?’’
‘‘दोपहर को,’’ विजय ने कहा.
‘‘ठीक है,’’ मां बोलीं.
‘‘मां, आप जमीन के और मकान के कागजात निकाल लेना.’’
‘‘क्यों?’’ मां को थोड़ा शक हुआ.
‘‘कुछ नहींऐसे सूने घर में किसी ने चुरा लिए तो…’’ विजय कहते हुए अचकचा रहा था.
‘‘अरे, कहां सूना घरमैं पड़ोसी को बोलूंगी. वह सोएगा यहां रात को.’’
‘‘फिर भीकागजात बारबार नहीं बनते मांउन्हें संभाल कर रखना चाहिए.’’
‘‘अच्छे से ही रखे हैं. तू फिक्र कर.’’

विजय कुछ नहीं बोला. दोपहर को मां तैयार हो कर बैठ गई थीं. ‘‘ये ले जमीन और मकान के कागज चाहिए रख लेमेरे बाद तो सारा कुछ तेरा ही है.’’ विजय की आंखों में चमक गई थी. मां उसे बड़े ध्यान से देख रहीं थीं, पर थीं चुप‘‘देख बेटा, जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक यह सारा कुछ मेरा ही है. मैं तेरे साथ कुछ ही दिनों के लिए चल रही हूं, बाकी तो अपनी बाकी जिंदगी यहीं काटनी है,’’ मां की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें गिरीं. विजय चुप रहा.
इधर, तरुणा मां के आने की राह देख रही थी. उस ने मां के लिए अलग कमरा तैयार कर दिया था. और कोई समय होता तो उसे अपनी सास का आना बुरा लगता, पर इस बार तो उस ने योजना बना कर ही उन्हें बुलाया था, तो उन के लिए खास तैयारी कर रही थी. वह जानती थी कि कम से कम 2 महीने तक तो उन को यहां रखना ही है, वे रहना चाहें तो भी.

मां को सामने पा देख कर तरुणा उन के पैरों  गई थी. उस ने दरवाजे पर ही मां की आरती उतारी और उन का हाथ पकड़ कर उन के कमरे तक ले गई.
मां हैरान सी थींवे अपनी बहू से दूसरी बार ही मिल रही थींशादी के बाद वे कुल देवता के पूजन के लिए आए थे, तब बहू का रुख तो अकड़ भरा ही लग रहा थाइसी वजह से ही उन्होंने कभी विजय को साथ में रखने के लिए नहीं बोला थापर आज तरुणा का रुख एकदम बदला हुआ था.
विजय का काम तो एक महीने में ही पूरा हो गया था. उस ने मां को बगैर बताए गांव की अपनी जमीन का सौदा कर लिया था और मकान का भी. अच्छे मोटे दाम उसे मिल गए थे. उस ने कुछ बहाने से मां के हाथ का अंगूठा लगवा लिया था.

अब की बार मां ने कोई शक जाहिर नहीं किया था. वे बेटे और बहू की सेवा से संतुष्ट थीं. जमीन और मकान की रजिस्ट्री होते ही विजय ने मां को गांव वापस लौटने का बोल दिया था.
अब तक मां का मन यहां पूरी तरह लग चुका था, पर अचानक जब विजय ने उन्हें गांव चले जाने को कहा, तो उन्हें बुरा लगा. बहू का रुख भी बदल गया था. उन की  में कुछ नहीं आया था कि अचानक बेटे और बहू का बरताव बदल कैसे गया. अनमने मन से मां ने गांव जाने की बात मान ली थी,
‘‘
तू चल छोड़ने.’’

‘‘मैं नहीं जा पाऊंगा. यहां बहुत काम है.’’
‘‘फिर मैं अकेले कैसे जाऊंगी? मैं तो कुछ जानती ही नहीं हूं…’’ मां के चेहरे पर निराशा छा गई थी.
‘‘मैं आप को बस में बैठा दूंगा.
बस तो सीधे गांव ही जाती है. मैं कंडक्टर को भी बोल दूंगा. वह ध्यान से आप को गांव में उतार देगा,’’ कहते हुए विजय ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था.
मां कुछ नहीं बोलीं. आज मां को गांव जाने वाली बस में बैठा दिया गया था.
पहली बार विजय के मन में दुख जागा. गांव में मां कहां रहेंगीवह घर तो उस ने बेच दिया है
अपनी आंखों से निकले आंसुओं को विजय ने जमीन पर नहीं गिरने दिया. वह केवल बस को जाते हुए देख रहा था

कुशलेंद्र श्रीवास्तव

Hindi Kahani: अमीर

रो की तरह डमरू ने चबूतरे की सफाई की. उसी समय उस पर कुछ सजीधजी औरतों ने दया दिखाई. प्रसाद के 2 लड्डू दे दिए उस को. डमरू आगे बढ़ गया. 10 मिनट चल कर ट्रक के करीब आया. आधे दाम पर 3 दर्जन केले खरीद लिए. अब उसे इस जंगल के दूसरी तरफ चादर बिछा कर केले बेचने थे.
दरअसल, इस कसबे की एक तरफ छोटा सा जंगल है. बंदर आते हैं. लोग केले खिला देते हैं. इस तरह डमरू की आमदनी हो जाती है.

अकेले रहने वाले डमरू के पास बचत के 2,120 रुपए रखे हैं. हर दिन 50 रुपए के केले खरीद कर 130 रुपए में बेच देता है. डमरू को रोज मुनाफा होता है. 65 साल की अकेली जिंदगी. उसे रुपए की इसीलिए कमी नहीं रहती है. अब दोपहर से शाम हो रही थी. वैसे दिन ढलना एक रोज घटने वाली घटना है. उसी तरह तय समय पर डमरू का 1-1 लड्डू कुछ समय पर निकाल कर खाना. खाने का उसे कोई शौक नहीं रहा है, इसलिए कुछ भी पकाना नहीं है और उस का बहुत सारा समय बच जाता है वरना जब पत्नी थी, तब सुबह उठ कर रोटी बनाने में ही उस का बहुत सारा समय बरबाद हो जाता था.

डमरू लड्डू पर बाजार से खरीदा गया काला नमक छिड़कता है और काम तमाम. मीठा और नमकीन दोनों का मजा एकसाथ. जैसे कभीकभार पानी में शक्कर बुरक कर भी पी जाता है. लड्डू खत्म तो अखबार के उस कतरे को कूड़ेदान में डाल कर वह अपनी जगह पर कर बैठ गया. इधर गरमी भी अपना रंग दिखाते जा रही थी, बदन जैसे ?ालस ही जाए. ऐसे में कुछ लोग अपने घरों से निकलने में कतरा रहे थे. दोपहरी का यह समय तमाम जगहों पर आराम का होता है, लेकिन डमरू अपनी टूटी चप्पल घसीट कर घर जाए और फिर बचे हुए केले बेचने आए, यह नामुमकिन है, इसीलिए रोज इतनी तेज धूप में भी इसी नीले के किनारे आसमान के नीचे बैठा रहता है, गरमी के कम होने तक. कोई भूलाभटका ग्राहक भी जाता था.

एक बार तो कुछ मजदूर आए और एक दर्जन केले खरीद कर ले गए. वाह, ऐसे में डमरू खुश हो गया.
लेकिन डमरू का ज्यादा समय ऊंघने में ही बीतता था. जमीन में पड़ा हुआ उस का वजूद कितना कमजोर लगता था. दुबलापतला बूढ़ा आदमी, जिस के बालों की बसावट जरा भी घनी नहीं थी. खोपड़ी ही दिखाई देती थी. मुंह खोल कर बीचबीच में ऊंघता हुआ डमरू सचमुच किसी ढोल सा लग रहा था जिसे किसी ने हथेली नहीं, बल्कि टहनी मार कर, ?ाक?ार कर, बारबार बजा कर जिंदा कर दिया हो. नाली के किनारे पर दूर नीम के पेड़ के पीछे जमा सूखे पत्तों और इस बुजुर्ग में कितनी तो समानता है, मगर इस की किसी को परवाह नहीं. अचानक डमरू को कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी. सिर पर पोटली रखे कुछ औरतें रही थीं. वे सब डमरू के करीब गईं. वे 4 औरतें थीं. बेहद गरीब लग रही थीं. डमरू की फटी चादर के पास बैठ गईं.

एक औरत बोली, ‘‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हम को केले खाने को दे दो.’’ डमरू ने उन को गौर से देखा. उसे 4 साल पहले मरी अपनी पत्नी याद गई. लाली नाम था. मटकती रहती थी. डमरू को जाने क्या सू?. वह बोला, ‘‘गीत सुनाओ. तब फोकट में केला मिलेगा.’’ ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह कर वे औरतें एक फिल्मी गीत गाने लगीं. 2-3 लाइनें गा कर उन सब को जोश गया. एक के बाद एक टूटेफूटे 10 गीत सुना दिए डमरू को. डमरू ने केले गिने. पूरे 12 थे. उस ने खुशीखुशी उन औरतों को दे दिए. खुश हो कर वे औरतें केले ले कर चली गईं. डमरू ने भी चादर समेटी और मजे से गुनगुनाता हुआ अपने ठिकाने की तरफ चल दिया. आज वह किसी अमीरजादे सा महसूस कर रहा था

Hindi Story: पहली मुलाकात

Hindi Story:  मैं ने उसे बचपन में देखा था. तभी से उस की तसवीर मेरे जेहन में छप गई थी. फिर लगा कि इस खूबसूरत लड़की से दोबारा मुलाकात होगी भी या नहीं. इस बीच मेरी शादी पक्की हो गई, पर मैं उसे भूल नहीं पाया था

कु मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो जिंदगी को एक कसक दे जाती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी को एक मिठास, जिंदगी को एक खूबसूरत, सुखद, सुनहरे रंग से रंग देती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी के लिए एक सुखद अहसास बन कर रह जाती हैं. कुछ मुलाकातें कभी नहीं भूलने के लिए होती हैं, जैसे उस की और मेरी मुलाकात जिंदगी में एक अजीब सी हलचल, एक चमक तो लाई थी, जिसे हम चाह कर भी यादों से नहीं दूर कर सके, फिर भी किसी से कह नहीं सकते थे, ऐसे भी हालात बन कर रह गए थे. अचानक हमारी मुलाकात फिर से दोबारा होगी, यह सोचा भी नहीं था हम ने. हो सकता है, उस केमन में मिलन दोबारा हो’, ऐसा कुछ रहा हो.

चिलचिलाती, आग उगलती जेठ महीने की दोपहरी हमारे किशोरावस्था से ले कर जवानी की ओर जाते रास्ते के समय हुआ करती थी. गांव में तब बिजली नहीं हुआ करती थी. तब बूढ़े बरगद की छाया में ठंडापन रहा करता था. बड़ेबुजुर्ग कोई चौपड़, कोई ताश खेलते हुए दोपहर वहीं बिताया करते थे.
उस बूढ़े बरगद के बगल में ही हमारा आम का बगीचा था, जो अभी भी है. जेठ महीने की तपिश आग उगलती है यह तो आप सभी जानते हैं. जवानी बड़ी अलबेली होती है, आप यह भी जानते हैं, क्योंकि इस मंजर से सभी गुजरते हैं. किशोरावस्था से जवानी की ओर बढ़ते कदम कब लड़खड़ा जाएं, कोई नहीं जानता. इस उम्र में जो संभल गया, वह पूरे जीवन संभल कर सुखमय जीवन बिताता है और जो लड़खड़ा गया, गिर गया, वह फिर संभल नहीं पाता, अपनी पूरी जिंदगी नरक जैसी बना डालता है.

हमारे ऊपर उन बुजुर्गों का साया था, जिसे मातापिता, दादीदादा कहते हैं. गांव के बड़ेबुजुर्गों का उपदेश भी हम उस बूढ़े बरगद के नीचे ध्यान से सुना करते थे. हम हमेशा पिता से डर कर कभी रास्ते से भटके नहीं थे. तब साइकिल या पैदल चल कर नातेरिश्तेदारों के यहां लोग आयाजाया करते थे. आम, जो आगे पकना शुरू करते थे, वे आधे जेठ से अपने रंग बदलने शुरू कर दिया करते थे. हम अपने हमजोली के साथ सुबहशाम बगीचे में, दोपहर बुजुर्गों के संरक्षण में बूढ़े बरगद के नीचे ही रहते थे. हम एक अनुशासन में रहते थे. वैसे भी स्कूल में जेठ के महीने में एक महीने की छुट्टी रहती थी. स्कूल में मास्टर पिता से भी ज्यादा खयाल रखते थे, खासकर पढ़ने वाले बालकबालिकाओं को, जो उन को सम्मान देते थे, उन का तो वे बहुत ही ध्यान रखते थे.

एक दिन एक अधेड़ महिला, एक पुरुष के साथ आईं, साथ में उन के साथ एक किशोरी थी, जो जवानी की दहलीज पर पांव रखने ही वाली थी, ठीक हमारी ही तरह. वह हम से वही सालछह महीने छोटी रही होगी.
हमारे बगीचे में कर वे लोग सुस्ताने लगे थे. आकर्षण स्वाभाविक था, खासकर उस ओर जिस ओर एक सुंदरता का खजाना लिए, सुंदरता की मूर्ति सी, अल्हड़ रूपवती कन्या सामने हो. मैं भी कुछ कम नहीं था. गबरू जवान, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज की ओर बस दो कदम में ही पहुंचने वाला था. शायद कनखियों से निहार रही होती वह बाला भी आकर्षित थी. मानमर्यादा में बंधी, बालिका शर्मीली लगी, जिस के ?ाले बड़े दांतों से थोड़ी सी मुसकराहट से बिजली सी कौंध जाती थी.

उस के दांत मोती की तरह सफेद ऐसे लगते थे जैसे किसी कुशल कारीगर ने उसे उस के मुंह में तराश कर फिट कर दिए हों. उस के होंठों की लालिमा पके हुए कुंदरू की तरह लाल थी. वह शर्मीले स्वभाव की लगती थी. जब वह किसी बात पर शरमाती, तो उस के लाललाल गाल इतने लाल, सुरमई हो जाते थे, जैसे रति के गालों में उस के प्रेमी पति कामदेव ने केसर मल दिया हो. उस के गालों की सुंदरता ऐसी थी, जैसे फगुआ खेलते समय लाल गुलाब उस के गालों में मल दिया गया हो. उस की उठी हुई नाक से मेरी आंखें हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं भी मर्यादा में रह कर ही उसे देख कर हैरान था कि क्यों उसे देख कर मन ही नहीं भरता है. सहसा उस ने तिरछी नजरों से मु? देखा, हालांकि वह बड़ी चतुराई से सब की नजरें बचा कर मेरी ओर देख रही थी, फिर भी मेरी और उस की आंखें चार हो गई थीं.

अरे वाह, क्या गजब की आंखों में सागर सी गहराई थी. मेरे गोलखा आम की सी फांकें थीं उस की आंखें, गजब का आकर्षण. ऐसा तीर उस की कजरारी, बड़ीबड़ी आंखों से निकला, जो सीधे मेरे दिल के अंदर एक अमिट घाव करता चला गया था. उस के बालों में बंधी चोटी उस के उठे हुए कूल्हों को बारबार सहलाती सी लग रही थी. कोई साज, कोई सिंगार फिर भी गजब का आकर्षण, कुदरती खूबसूरती जो सीधे मेरे दिल में उतरती चली गई थी. उस के अभी हाल के ही उठे लगते कठोर उभार किसी को भी भटका सकते थे. मेरा मन उस से बात करने का होता था. उस के पिता मेरे पिताजी से बात कर रहे थे, पर मैं उस बातचीत को सुनने की कोशिश में नहीं था. मैं तो किसी बहाने, किसी तरह से उस से बात करने के लिए उतावला था.

तभी उस की मां ने मु? से कहा, ‘‘दादू, आम तो तुम्हारे फले हैं, पकते तो अभी नहीं होंगे.’’ मैं ने ?ाटपट कहा, ‘‘आइए, जरा देखते हैं. हमारे दारानगर में शायद पके मीठेमीठे आम मिल जाएं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते जाइएगा आप, अचार रखने के लिए.’’ उस की मां ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, हम लोग रामपुर से निमंत्रण कर के आए हैं, थके हुए हैं कौन लाद कर ले जाएगा. हम वैसे भी 3 दिन से ढंग से सो तक नहीं पाए हैं.’’ मैं ने ?ाट से कहा, ‘‘मांजी, आप चलिए . आज हमारे घर में रह कर फिर कल चले जाना. अभी वैसे भी 10 किलोमीटर बाद सड़क मिलेगी आप को.’’ उस की मां ने ?ाटपट मेरे गालों पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे मेरी अम्मां फेरा करती थीं. मु? बहुत अच्छा लगा, अपनेपन सा महसूस हुआ.

उस की मां ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘फिर कभी आऊंगी तो जरूर चलूंगी, सालों से तुम्हारी अम्मां से नहीं मिली हूं, जब तुम छोटे से थे, तब से. बहुत दिन हुए घर से निकले हुए, इस के दादादादी परेशान होंगे.
4 दिन बाद फिर मेरे मायके में शादी है, वहां भी जाना जरूरी है. गरमी में ही शादीब्याह में घूम लेते हैं वरना सालभर घर से कहां निकलना होता है.’’ मु? आभास हो रहा था कि ये लोग मेरे अम्माबापू के करीबी हैं. मैं सोच ही रहा था कि उस के पिता ने कहा, ‘‘चली जाओ, बिटिया को भी दिखा दो. इसे तो पके आम बहुत पसंद हैं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते चलेंगे. देखो बेटा, अपने बाप की तरह से नहीं बांध देना, अब बो? लादने का माद्दा नहीं रहा.’’ मैं सोच रहा था शायद उस का नाम लेंगे जिस से नाम जानने का मौका मिलेगा, जो नहीं मिला था. तो क्या हुआ, मेरे मन की मुराद पूरी हो गई थी.


मैं उन को लिवा कर अपने दारानगर नाम वाले आम के पेड़ के पास गया. वहां कुछ अधपके, तोता के काटने से गिरे आम पड़े थे. उसे उस की मां ने आम उठा कर दिया था. उस ने हंसते हुए पूछा था, ‘‘मम्मी, इस आम को दारानगर क्यों कहते हैं?’’ मैं ने हंसते हुए उस को बताया था, क्योंकि उस के बोलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों में शहद घुला हो. कितनी मीठी, प्यारी जबान है इस की. काश, इस का साथ जीवनभर के लिए हो सकता. यह सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘असल में मेरे दादाजी दारानगर नाम की जगह पर गए थे, जहां से इस आम का फल ले कर आए थे. यहां लगा कर, इस का नाम याद के लिए दारानगर रख दिया था, इसलिए इस का नाम दारानगर पूरा गांव जानता है.’’ वह आम खाते समय बहुत ही अच्छी, सुंदर लग रही थी. मेरा मन करता था कि उस से दोस्ती करूं. कुछ बोलूं, बतियाऊं. मैं अपने संकोची स्वभाव, संस्कारवश कुछ भी नहीं कह पाया था.

मैं ने उन के लिए अच्छेअच्छे आम तोड़ दिए थे. दिल तो कहता था कि समय यहीं ठहर जाए, बस यों ही वह मेरे करीब रहे. समय से मैं क्या सभी हारे हैं, समय ही हमारे बचपन को छीन कर भाग लिया था, अब हम क्याक्या सोचने वाली उम्र में कर, कितनी ऊंचाई पर उड़ने की सोच रहे हैं. अगर अम्मांबापू, दादादादी, गांव के बड़ेबुजुर्ग नहीं होते, तो हम किस दिशा में होते, पता नहीं. तभी उस की अम्मां कर मेरे सिर पर हाथ रख कर बालों को सहलाने लगी थीं. मैं चुपचाप खड़ा था. कहना तो बहुत चाहता था, पर कह नहीं पा रहा था. तभी उस की अम्मां ने प्यार से कहा, ‘‘बेटा, अच्छे से पढ़ाईलिखाई करना, अब हम चलेंगे, नहीं तो घर पहुंचने में रात हो जाएगी.’’ बिना कुछ कहे किसी मशीन सा मैं उन के पीछेपीछे चल दिया था. मैं ने देखा, मेरे बापू उस के बापू के साथ घुलमिल कर बातें कर रहे थे.

उन के पास पहुंच कर उस चंचल, चंद्रमुखी ने अपने बापू से कहा था, ‘‘बापू, अम्मां कहती हैं अब चलेंदेर करेंगे तो रात हो जाएगी.’’ कितनी प्यारी, कोयल सी मीठी बातें जो मेरे दिल में सीधे उतरती चली गई थीं. मैं चुपचाप खड़ा रहा. ऐसा लगता था, काश वह कुछ देर रुक जाती. mवे लोग मेरे बापू के पैर छू कर फिर चल दिए थे. मैं ने बिना पिता की आज्ञा के उन के पैर नहीं छुए थे, जबकि मन श्रद्धा से भरा हुआ था. वे तीनों जा रहे थे. मैं एक अचल मूर्ति बन कर खड़ा उन को जाते देख रहा था. बापू थोड़ी देर में वहां से घर की ओर चले गए थे, यह कहते हुए, ‘‘कुछ देर रुक कर चले आना, रात नहीं करना.’’ मैं उन को देखते हुए वहीं खड़ा था. बहुत दूर जाने के बाद उस लड़की ने मुड़ कर देखा था. उस के चेहरे के भाव क्या थे, दूर हो जाने की वजह से सम? पाना मुश्किल था. हां, उस का मुड़ कर देखना यह तो कह ही रहा था कि उसे भी कुछकुछ हुआ था.

उन के जाने के बाद ऐसा कोई दिन, ऐसी कोई रात नहीं होती थी, जो वह याद नहीं आती थी.
3 साल में मेरी पढ़ाई पूरी हो गई थी. सरकारी नौकरी बापू ने मु? नहीं करने दी. उन का कहना था कि एक लड़का है, हम महीने में मजदूरों को बहुत मजदूरी देते हैं. कहीं नहीं जाना यहीं हमारे पास, हमारे साथ रहना है. मेरी शादी बापू ने पक्की कर दी थी. अम्मांबापू आपस में बतियाते थे. मेरी हिम्मत कहां कि पूछ सकता. हां, खुशी मु? भी थी, फिर भी एक कांटा, एक टीस दिल में चुभ रही थी कि काश, वह मेरी पत्नी होती. समय आया, शादी हुई, फेरे हुए. मैं ने उसे देखा उस ने मु? देखा. हां, कन्यादान देने वाले अंकल ऐसे लग रहे थे, जैसे इन को कहीं देखा था. सुहागरात थी, सेज सजी थी, पर अब की तरह नहीं, वही साधारण नए गद्दारजाई में. वह वहां पहले से मौजूद थी. मैं अंदर गया, कच्चे मकान में लकड़ी के दरवाजे थे, लकड़ी का हटका बंद कर दिया था मैं ने.

दिल धकधक कर रहा था. मैं ने हिम्मत जुटाई, उस के विरोध के बावजूद मैं ने घूंघट हटाया.
मैं अपने सामने उसे देखते ही बल्लियों उछलने लगा था. यह तो शायद वही थी. उस ने धीरे से मुसकरा
कर धीमी, मीठी सी आवाज में कहा, ‘‘क्या हुआ?’’ मैं जैसे सोते से जाग गया, मन की मुराद पा गया था. मैं ने कहा, ‘‘तुम…’’ उस ने कहा, ‘‘हां, मैंआप नहीं चाहते थे क्या? मेरे अम्मांबापू ने शायद आप को उसी दिन पसंद कर लिया था. उन की बात भी हो गई थी. मैं ने भी तो शादी के समय चुपके से देखा, तो…’’
‘‘तो क्या, जरा बताओमैं तो उसी दिन से सोचता था कि तुम ही मेरी पत्नी बनो,’’ मैं ने अपनी बांहों में उसे समेटते हुए कहा था. वह शरमा गई थी. उस ने एक अटल विश्वास के साथ अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया था. हम ठीक उसी समय से दो जिस्म एक जान हो गए थे.

हमारे सम? में गया था कि अम्मांबापू जो भी करते हैं, बहुत अच्छा करते हैं. मातापिता सदा अपने बच्चों की खुशी, बच्चों की भलाई करते हैं. अपने बच्चों के लिए ही पूरी जिंदगी लगा देते हैं. वह पहली मुलाकात, जिंदगीभर का साथ बन जाएगी मु? तो उम्मीद नहीं थी. अम्मांबापू ने जो सौगात दी थी, वह शब्दों में नहीं लिखी जा सकती, शब्दों में नहीं कही जा सकती. वह पहली मुलाकात हमारे जीतेजागते, चलतेफिरते, बोलतेडांटते जैसे कोई वरदान थी.             

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

Hindi Kahani: लुट गई जोगी तेरे प्यार में

Hindi Kahani: जमीला और शर्मिला पक्की सहेलियां थीं. उन की दोस्ती को देख कर घरपरिवार वाले और पड़ोसी उन्हें दो जिस्म एक जान कहते थे. दोनों सहेलियों ने गांव में ही एकसाथ पढ़ाई की थी. आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल होने, गरीबी और परदा प्रथा की वजह से उन के परिवारों ने आगे दिलचस्पी नहीं दिखाई. नतीजतन, वे दोनों घर पर ही रह कर परिवार के साथ बीड़ी बनाने का काम करने लगीं.
जमीला कब जवान हो गई, उस की सम? में नहीं आया. घर के बड़ेबूढ़े जब उसे टोकते, ‘बड़ी हो गई है तू, ठीक से दुपट्टा ओढ़ कर बाहर निकला कर. अकेले घूमने मत जाना. बहू, इसे नकाब ला कर दे. अब कोई छोटी बच्ची थोड़े ही है, बड़ी हो गई…’


वह सोचती, ‘आखिर मु? में ऐसा क्या हुआ है? जब मैं स्कूल जाती थी, तब कोई कुछ नहीं कहता था.’
शर्मिला की शादी पास के गांव में हो गई और जमीला अकेली रह गई. दिल की बात कहनेसुनने वाला कोई रहा. उस की जिंदगी कैद के पंछी की तरह रह गई. बीड़ी बनाते और घर का काम करतेकरते उस का दम घुटने लगा. समय पंख लगा कर उड़ने लगा. जवानी जमीला को जिंदगी का मजा लूटने की दावत देने लगी. वह अंदर ही अंदर कसमसाने लगी. जब वह जवान जोड़ों को देखती, तो उस की बेचैनी और बढ़ जाती. शहनाई की आवाज सुन कर वह जोश में जाती. ‘‘जमीला के अब्बू, देखनाजमीला को क्या हुआ है…’’ उस की मां ने घबरा कर आवाज दी.


‘‘आया बेगम,’’ बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठे जमीला के अब्बू जावेद मियां ने कहा. वे दौड़ेदौड़े बैठक में आए, जहां जमीला अकेली बैठी बीड़ी बनातेबनाते बेहोश हो कर गिर गई थी. ‘‘क्या हुआ बेटी, देखो मु?आंखें खोलोबेगम, पानी लाओइस के मुंह पर पानी के छींटे मारो,’’ जावेद मियां ने कहा. तब तक उन के दोस्त भी अंदर गए थे. ‘‘कैसे हो गया यह सब?’’ मौलाना ने पूछा, जो जावेद के दोस्त थे.
‘‘क्या बताऊंजमीला बैठी बीड़ी बना रही थी कि एकाएक बेहोश हो कर गिर पड़ी,’’ जमीला की मां ने बताया. मौलाना ने ?ाड़फूंक शुरू कर दी. मुंह पर पानी के छींटे मारे, प्याज सुंघाई गई और तकरीबन आधा घंटे बाद जमीला को होश गया. जमीला कुछ थकीथकी सी लग रही थी, इसलिए उसे आराम करने की सलाह दे कर जावेद मियां के दोस्त वहां से चले गए. दूसरे दिन मौलाना ने जावेद मियां के घर पर दस्तक दी. दोनों बैठ कर जमीला की बीमारी पर बातचीत करने लगे.


‘‘देखो जावेद मियां, ऐसे हालात में लड़की की शादी करने में मुश्किल आएगी,’’ मौलवी ने कहा. ‘‘बात तो सही है, पर इस का कोई उपाय तो बताओ? ‘‘जमीला के ठीक होते ही मु? जैसा भी लड़का मिलेगा, मैं उस की शादी कर दूंगा,’’ कह कर जावेद मियां चुप हो गए. ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं, फिर तुम्हें खबर करूंगा…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’ तकरीबन हफ्तेभर बाद मौलाना जावेद मियां के घर दोबारा आए. ‘‘आओ मौलाना, काफी दिन बाद आना हुआ,’’ जावेद मियां ने कहा. ‘‘मैं तुम्हारे काम में लगा था. बड़ी मुश्किल से एक शख्स मिला है. उस का कहना है कि वह लड़की को ठीक कर देगा. कुछ वक्त लगेगा, पैसा भी खर्च होगा. जब तक ?ाड़फूंक चलेगी, तब तक यह बात किसी तक पहुंचे, वरना इल्म टूट जाएगा.’’ ‘‘मौलाना, मु? हर शर्त मंजूर है. तुम आज से ही इलाज शुरू करा दो. अपनी बेटी की बेहतरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’


मौलाना के मन में खोट था. उस ने अपने एक दूर के साले असद से इस पूरे मसले पर पहले ही बात कर ली थी. मौलाना ने उस से कहा था, ‘देखो मियां, मैं ने सौदा पटा लिया है. जावेद मियां की जमीन अपनी जमीन से लगी हुई है. हमें उसे हड़पना है. अब जा कर फंसा है. पहले तो बड़ीबड़ी बातें करता था, खेत जाने का रास्ता बंद कर दिया था, इसलिए मजबूरी में मु? उस से दोस्ती करनी पड़ी. तुम ऐसी चाल चलो कि जावेद की जमीन बिक जाए और वह मु?मिल जाए.’ असद एक शातिर बदमाश था. उस की बीवी उस की हरकतों से तंग कर पिछले 10 सालों से अपने मायके में बैठी थी. गांव के भोलेभाले लोगों को गंडेतावीज बना कर देना, उन से रकम ऐंठना उस का पेशा था. असद ने जावेद मियां के घर कर अपना काम शुरू कर दिया. शुरूशुरू में तो जमीला को कुछ भी अच्छा लगा, लेकिन अकेले में पराए मर्द को पा कर वह धीरेधीरे खुश रहने लगी. जब असद को महसूस हुआ कि जमीला उस की ओर खिंच रही है, तो उस ने जावेद मियां से कहा, ‘‘जावेद साहब, कुछ जरूरी काम से मैं 1-2 दिन के लिए घर जा रहा हूं, लेकिन जल्दी ही वापस जाऊंगा.’’


जाने से पहले मौलाना और असद के बीच साजिश की लंबी बात चली. इसी के तहत वह अचानक अपने घर चला गया. इधर जावेद मियां परेशान हो उठे, क्योंकि जमीला फिर से बारबार बेहोश होने लगी थी.
वे घबरा कर मौलाना के पास गए और असद को जल्द से जल्द बुलाने की गुहार लगाई. मौलाना की खबर पा कर असद वापस आया ही था कि 8-10 मर्द और औरत उसे ढूंढ़ते हुए जावेद मियां के घर जा पहुंचे.
वे सभी गुजारिश करने लगे, ‘जोगी बाबा गांव वापस चलो, हम सब परेशान होने लगे हैं.’ इसी बीच मौलाना ने कर लोगों को सम?ाया कि आप के जोगी बाबा 2 दिन बाद आप के पास जाएंगे. रात में असद उर्फ जोगी बाबा के शरीर में भयानक हलचल होने लगी और वह जोरजोर से हंसने लगा. घर के सभी लोग जाग गए. बाहर से आए उस के चेले दुआ मांगने लगे, परेशानी से बचने के उपाय पूछने लगे. जोगी बाबा का गुस्से से भरा मिजाज देख कर सब डर गए. असद ने बताया कि जावेद के घर के पीछे किसी ने काला जादू कर दिया है, उसे निकाल कर नदी में डाल दो. पर सावधान, किसी की जान जा सकती है. 5 क्विंटल पुलाव बना कर फातिहा दिलाओ और पहले कहीं से काले जादू की पुडि़या ढूंढ़ो.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना खिलाओ. जोगी बाबा जो कहे वह करो. सब ठीक हो जाएगा.
काफी मशक्कत के बाद आखिर कपड़े में लिपटी एक पुडि़या मिल गई. उस पुडि़या में हड्डी, काजल, सिंदूर, अनाज, काली चूड़ी वगैरह मिली. शक अब यकीन में बदल गया. ‘‘जावेद मियां, बात को सम?…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘बच्ची प्यारी है या जायदाद. तुम ऐसा करो कि मेरे नाम जमीन की रजिस्ट्री कर दो. पूरा खर्चा मैं करता हूं. जब पैसा हो, तो मेरा पैसा लौटा देना और जमीन वापस ले लेना.’’ मौलाना ने अपनी चाल से जावेद को फांस लिया. अंधविश्वास में फंसे जावेद ने मौलाना की बात मान कर जमीन की रजिस्ट्री उन के नाम कर दी. इधर असद उर्फ जोगी बाबा ने ऐसी चाल चली कि जमीला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. अब वे दोनों बीमारी की आड़ लेकर जिंदगी का मजा लूटने लगे. ?ाड़फूंक के बहाने अब दोनों को कोई नहीं रोक पाता था. जमीला को जब से पराए मर्द का चसका लगा था, तब से वह खुश रहने लगी थी. उस के मांबाप इसे जोगी बाबा की ?ाड़फूंक का नतीजा मान रहे थे.

धीरेधीरे साल पूरा होने को आया. उस के मांबाप को जमीला की शादी की फिक्र होने लगी और वे
लड़के की तलाश में जुट गए. इस बात की भनक असद को लग गई. वह मौका पा कर वहां से रफूचक्कर हो गया. इसी बीच जमीला की शादी पक्की हो गई, लेकिन एक दिन वह अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ी.
लोगों के ?ाक?ोरने पर भी होश नहीं आया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया. लेडी डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, ‘‘हम ने बच्ची को देख लिया है. अब वह होश में गई है. आप उस का खयाल रखिए. भारी चीज उठाने दें, क्योंकि आप की बेटी मां बनने वाली है.’’ लेडी डाक्टर की यह बात सुन कर जावेद, उस की बेगम और रिश्तेदारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उन की जमीला ढोंगी जोगी के प्यार में लुट चुकी थी.  Hindi Kahani

लेखक  ए. खान

Hindi Story: चुनौती

Hindi Story: गांव की झाडि़यों में मिली एक बच्ची को बांझ कहे जाने वाली मुनिया ने पालने और कुछ बनाने का फैसला किया. गांव वालों ने मुनिया से किनारा सा कर लिया. जब मुनिया की वह गुडि़या 8वीं जमात में थी, तब मुनिया नहीं रही. क्या गुडि़या अपनी मां के सपनों को पूरा कर पाई?


सुबह सुबह महल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि ?ाडि़यों में एक नवजात बच्ची मिली है. शायद रात में इसे किसी ने फेंका दिया था. बीचबीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. पूरे महल्ले में चर्चा का आज का मुद्दा यह लड़की ही थी.


पहली औरत दूसरी से बोली, ‘‘यह जरूर किसी किसी का पाप है. पता नहीं कौन जात है. बड़ा खराब जमाना गया है. लोग बच्चे कर के यहांवहां फेंक देते हैं.’’

दूसरी ने पहली की हां में हां मिलाई, ‘‘जात छोड़ो, पता नहीं यह किस धरम की है.’’
शादी के 10 साल बाद भी मुनिया के कोई औलाद नहीं थी. पति ने छोड़ दिया था. किसी तरह लोगों के घर का चौकाबरतन कर के वह अपना पेट पालती थी. उसे इस बच्ची पर रहम गया. उस ने ?ाटपट बच्ची को उठा कर गोद में ले लिया.

मुनिया के एक तो औलाद नहीं थी, पति ने भी बां? होने का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. इस बात से वह डिप्रैशन में चली गई थी. तलाक होने से पहले मुनिया डाक्टर के पास भी गई थी. तब डाक्टर बोली थी, ‘तेरे अंदर कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी तो तेरे मर्द में है. तू उसे ले कर किसी माहिर डाक्टर के पास जा. डाक्टर बताएगा इस का इलाज.’’

इधर, फुलिया ने मुनिया से कहा, ‘‘क्या तू इस पाप को पालेगीपता नहीं किस खानदान की है यह लड़की. किस जातिधरम की है. फेंक दे इसे कचरे में. कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है, उसे लोग घर की शोभा नहीं बनाते.’’

मुनिया का दिल मोम का था. उस ने फुलिया को जवाब दिया, ‘‘देख फुलिया, मैं जातपांत को नहीं मानती. मैं धरम में भी यकीन नहीं करती. मैं इनसानियत को मानती हूं. फिर आदमी जातपांत और धर्म का हो कर भी तो अधर्म करता है. जिस की जैसी परवरिश होती है, वह आदमी भी वैसा ही बनता है.
‘‘मैं इसे अपने घर ले जाऊंगी,

इसे खूब पढ़ाऊंगीलिखाऊंगी और अच्छे संस्कार दूंगी. फिर देखती हूं कि कैसे
यह बेराह चलती है. सारा फल अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कारों का
होता है.’’

फुलिया ने ललकारा, ‘‘सोच ले, यह तु? भारी भी पड़ सकता है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई, तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था. हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया, लेकिन तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तू ने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है. फिर यह भी तो है कि तू चौकाबरतन कर के कितना कमा लेगी

‘‘नहीं पाल पाएगी तू इस को. फेंक दे इसे वापस कूड़े में. मरती है, तो मरने दे इसे. क्यों किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है…’’

पर मुनिया बोली, ‘‘मां की ताकत का तु? एहसास नहीं है. गरीब से गरीब मां भी अपने बालबच्चों को रूखासूखा खिला कर पालपोस ही लेती है. फिर मेरे लिए भी तो यह एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पाल कर दिखाऊं.’’

फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली, ‘‘सोच ले इस से बेवकूफी भरा फैसला कुछ नहीं होगा. लोग हंसेंगे और तेरा जीना हराम कर देंगे.’’

‘‘सोच लिया है. इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इनसानियत का रिश्ता जातपांत से ऊपर होता है. समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है, फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है. जायज मांग होने पर वह समाज से लोहा भी ले सकती है.


‘‘फिर समाज के डर से किसी को ?ाडि़यों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता . इस में इस नन्ही सी गुडि़या की क्या गलती…’’

लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था. सब मुनिया को भलाबुरा कहते, उस से कतरा कर निकल जाते. मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी. उस का मकसद अब बस इतना था कि वह गुडि़या को किसी तरह से पढ़ालिखा कर कुछ बना दे.

धीरेधीरे समय बीतता गया. गुडि़या बड़ी होती गई. अब वह 8वीं क्लास में पढ़ती थी. मुनिया ने गुडि़या को अच्छे संस्कार दिए थे. गुडि़या भी मेधावी और मेहनती लड़की थी. वह मुनिया की कही बातों को हमेशा मानती थी. गुडि़या 8वीं क्लास पास कर गई थी. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो देखा कि मां की हालत बेहद खराब है. उसे अस्पताल में भरती करवाया गया, लेकिन मुनिया चल बसी.


मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुडि़या की जिंदगी ही उजड़ गई. फुलिया और महल्ले की दूसरी औरतें अब गुडि़या को ताने मारती थीं कि इस की मां तो इसे बड़ा अफसर बनाने चली थी और खुद ही इस दुनिया से चली गई. मुनिया की एक भतीजी थी शीतल, जो शहर में रहती थी और एक बैंक में क्लर्क थी. उस का तलाक उस के काले रंग की वजह से हो गया था. जिस लड़के से उस की शादी हुई थी, वह पियक्कड़ था.
मरने से पहले मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुडि़या की बाबत फोन पर सब बातें बता रखी थीं. वह कह चुकी थी कि उस के अलावा गुडि़या का इस दुनिया में कोई नहीं है. अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वह गुडि़या की देखभाल करे.


शीतल को गांव में आए हफ्ताभर हो गया था. स्कूल का टीसी बनने में समय लग रहा था. 1-2 दिन में टीसी मिल गया था. गुडि़या शीतल के साथ शहर गई थी, लेकिन शहर में आने के बाद भी गुडि़या को अपनी मां का चेहरा नहीं भूलता था. गांव की भी याद आती थी. गुडि़या किसी भी हाल में अपनी मां के सपनों को पूरा करना चाहती थी. इधर शीतल और गुडि़या को फुलिया और  महल्ले की औरतों की बातें रातों को सोने नहीं देती थीं. शीतल ने उस समय फुलिया और महल्ले की औरतों के तंज का कोई जवाब नहीं दिया था. उसे पता था कि उन को जवाब देने से बेहतर है कि सही समय का इंतजार किया जाए.


धीरेधीरे समय बीतने लगा. गुडि़या और जोरशोर से मेहनत करने लगी थी. अब वह यहां शहर में भी वही काम करती. सुबह उठ कर ?ाड़ूबरतन कर के नहाधो कर नाश्ता तैयार कर देती. शीतल दीदी के लिए भी नाश्ता तैयार कर देती. शहर में गैस का कनैक्शन था, लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. पानी भर कर बाहर से नहीं लाना पड़ता था, इसलिए गुडि़या का बहुत सा समय बच जाता था. अब वह और मन लगा कर पढ़ाई करने लगी थी.

इधर, शीतल को अपने पति से तलाक लेने के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था. गुडि़या के चले आने से उस का भी मन लगने लगा. उस ने घर में रखा हुआ नौकर भी हटा दिया था. गुडि़या आसपड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी. 9वीं क्लास में गुडि़या ने पूरे स्कूल में टौप किया था. अब शीतल को भी यकीन हो गया था कि गुडि़या एक एक दिन कुछ बड़ा जरूर करेगी.
10वीं क्लास के इम्तिहान हुए, लेकिन इस बार गुडि़या का नतीजा बहुत बेहतर नहीं था. वह अपने स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी.

गुडि़या घर कर रोने लगी. तब शीतल ने उस को सम?ाया, ‘‘इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है. तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो. तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी.’’


दिन बीतते रहे और गुडि़या दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करती रही. देखतेदेखते उस ने नीट का इम्तिहान भी पास कर लिया और एक सरकारी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद उस ने एमबीबीएस भी पास कर लिया. अब वह एक डाक्टर बन गई थी. शीतल को भी गुडि़या पर भरोसा था और गुडि़या उस के भरोसे पर खरी उतरी थी. आज शीतल ने अपनी बूआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था.


शीतल ने इनसानियत के लिए तो गुडि़या की मदद की ही थी, उस का मदद करने के पीछे एक और कारण
था. वह कारण था औरत को कमजोर सम?ाने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना. शीतल को अपने पति को भी जवाब देना था और समाज को भी दिखाना था कि बिना किसी मर्द की मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है. वह अपनी मरजी की खुद मालिक है. तकरीबन 10 साल के बाद एक दिन गुडि़या की पोस्टिंग उस के गांव में हुई थी. उस को प्रमोशन मिल गई थी.


वह अब डाक्टरों की सीनियर थी. अब वह सीएमओ थी. एक दिन गुडि़या अपने केबिन में बैठी परची पर कुछ दवाएं लिख ही रही थी कि नर्स ने अगले मरीज का नाम पुकारा. मरीज का नाम फुलिया
था. नर्स ने जोर से 2 बारफुलियाकह कर पुकारा. थोड़ी देर में गुडि़या के सामने उस के गांव की फुलिया खड़ी थी. गुडि़या को तो एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

गुडि़या ने इशारे से फुलिया को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा, ‘‘बैठिए.’’
फुलिया ने इतने दिनों के बाद

गुडि़या को देखा था. वह रोते हुए बोली, ‘‘बेटी, मु? पहचानामैं फुलिया…’’
गुडि़या की भी आंखें भीगने लगी थीं, ‘‘हां चाची, आप को कैसे नहीं पहचानूंगी. आप को मैं कभी भूल ही नहीं सकती. आप के कारण ही मैं आज यहां पर हूं.’’


‘‘बेटी, मु? माफ कर दे. मुनिया के मुंह से निकली एकएक बात सही थी. पापपुण्य कुछ नहीं होता है, बल्कि इनसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. मुनिया भले ही गरीब थी, लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी. मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो. जैसा वह चाहती थी, वैसा ही तु? बनाया. आज अगर वह जिंदा होती तो कितना खुश होती.


‘‘मेरा आशीर्वाद है बेटी तु?. मैं फिर से एक बार माफी मांगती हूं बेटी. मु? माफ कर दे. मैं गलत थी, फुलिया ही सही थी. परवरिश, इनसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है बेटी. आज मैं यह अपनी आंखों से देख रही हूं.’’


फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई आगे बोली, ‘‘ मुनिया, आशीर्वाद दे अपनी बेटी को. मैं अपनी गलती मानती हूं. जहां भी तू है री मुनिया, मु? माफ कर
दे बहन.’’ कहां तो गुडि़या फुलिया को मिलने पर उस को और महल्ले की औरतों को खरीखोटी सुनाना चाहती थी और कहां वह भी फुलिया के साथसाथ रोए जा रही थी.  Hindi Story               

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