⚲

Romantic Hindi Story : बारिश की बूंद

Romantic Hindi Story. मेरी शक्लसूरत कुछ ऐसी थी कि 2-4 लड़कियों के दिल में गुदगुदी जरूर पैदा कर देती थी. कालेज की कुछ लड़कियां मुझे देखते हुए आपस में फब्तियां कसतीं, ‘देख अर्चना, कितना भोला है. हमें देख कर अपनी नजरें नीची कर के एक ओर जाने लगता है, जैसे हमारी हवा भी न लगने पाए. डरता है कि कहीं हम लोग उसे पकड़ न लें.’

‘हाय, कितना हैंडसम है. जी चाहता है कि अकेले में उस से लिपट जाऊं.’

‘ऐसा मत करना, वरना दूसरे लड़के भी तुम को ही लिपटाने लगेंगे.’

धीरेधीरे समय बीतने लगा था. मैं ने ऐसा कोई सबक नहीं पढ़ा था, जिस में हवस की आग धधकती हो. मैं जिस्म का पुजारी न था, लेकिन खूबसूरती जरूर पसंद करने लगा था.

एक दिन उस ने खूब सजधज कर चारबत्ती के पास मेरी साइकिल के अगले पहिए से अपनी साइकिल का पिछला पहिया भिड़ा दिया था. शायद वह मुझ से आगे निकलना चाहती थी.

उस ने अपनी साइकिल एक ओर खड़ी की और मेरे पास आ कर बोली, ‘माफ कीजिए, मुझ से गलती हो गई.’

यह सुन कर मेरे दिल की धड़कनें इतनी तेज हो गईं, मानो ब्लडप्रैशर बढ़ गया हो. फिर उस ने जब अपनी गोरी हथेली से मेरी कलाई को पकड़ा, तो मैं उस में खोता चला गया.

दूसरे दिन वह दोबारा मुझे चौराहे पर मिली. उस ने अपना नाम अंबाली बताया. मेरा दिल अब उस की ओर खिंचता जा रहा था.

प्यार की आग जलती है, तो दोनों ओर बराबर लग जाती है. धीरेधीरे वक्त गुजरता गया. इस बीच हमारी मुहब्बत रंग लाई.

एक दिन हम दोनों एक ही साइकिल पर शहर से दूर मस्ती में झूमते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे. आकाश में बादलों की दौड़ शुरू हो चुकी थी. मौसम सुहावना था. हर जगह हरियाली बिछी थी.

अचानक आसमान में काले बादल उमड़ने लगे, जिसे देख कर मैं परेशान होने लगा.

मुझे अपनी उतनी फिक्र नहीं थी, जितना मैं अंबाली के लिए परेशान हो उठा था, क्योंकि कभी भी तेज बारिश शुरू हो सकती थी.

मैं ने अंबाली से कहा, ‘‘आओ, अब घर लौट चलें.’’

‘‘जल्दी क्या है? बारिश हो गई, तो भीगने में ज्यादा मजा आएगा.’’

‘‘अगर बारिश हो गई, तो इस कच्ची और सुनसान सड़क पर कहीं रुकने का ठिकाना नहीं मिलेगा.’’

‘‘पास में ही एक गांव दिखाई पड़ रहा है. चलो, वहीं चल कर रुकते हैं.’’

‘‘गांव देखने में नजदीक जरूर है, लेकिन उधर जाने के लिए कोई सड़क नहीं है. पतली पगडंडी पर पैदल चलना होगा.’’

‘‘अब तो जो परेशानियां सामने आएंगी, बरदाश्त करनी ही पड़ेंगी,’’ अंबाली ने हंसते हुए कहा.

हम ने अपनी चाल तेज तो कर दी, लेकिन गांव की पतली पगडंडी पर चलना उतना आसान न था. अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि एकाएक मूसलाधार बारिश होने लगी.

कुछ दूरी पर घासफूस की एक झोंपड़ी दिखाई दी. हम लोग उस ओर दौड़ पड़े. वहां पहुंचने पर उस में एक टूटाफूटा तख्त दिखाई पड़ा, लेकिन वहां कोई नहीं था.

हम दोनों भीग चुके थे. झोंपड़ी में शरण ले कर सोचा कि कुछ आराम मिलेगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

अंबाली ठंड से बुरी तरह कांपने लगी. जब उस के दांत किटकिटाने लगे, तो वह बोली, ‘‘मैं इस ठंड को बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है.’’

‘‘तुम मुझे अपने आगोश में ले लो. अपने सीने में छिपा लो, तुम्हारे जिस्म की गरमी से कुछ राहत मिलेगी,’’ अंबाली ने कहा.

‘‘अंबाली, हमारा प्यार अपनी जगह है, जिस पर मैं धब्बा नहीं लगने दूंगा, लेकिन तुम्हारी हिफाजत तो करनी होगी,’’ कह कर मैं ने अपनी कमीज उतार दी और उसे अपने सीने से चिपका लिया.

जब अंबाली मेरी मजबूत बांहों और चौड़े सीने में जकड़ गई, तो उस के होंठ जैसे मेरे होंठों से मिलने के लिए बेताब होने लगे थे.

मैं ने उस के पीछे अपनी दोनों हथेलियों को एकदूसरे पर रगड़ कर गरम किया और उस की पीठ सहलाने लगा, ताकि उस का पूरा बदन गरमी महसूस करे. तब मुझे ऐसा लगा, जैसे गुलाब की कोमल पंखुडि़यों पर ओस गिरी हो. मेरी उंगलियां फिसलने लगी थीं.

आधे घंटे के बाद बारिश कम होने लगी थी.

अंबाली मेरी बांहों में पूरी तरह नींद के आगोश में जा चुकी थी. मैं ने उसे जगाना ठीक नहीं समझा.

एक घंटे बाद मैं ने उसे जगाया, तब तक बारिश बंद हो चुकी थी.

अंबाली ने अलग हो कर अपने कुरते की चेन चढ़ाई और मुसकराते हुए पूछा, ‘‘तुम ने मेरे साथ कोई शैतानी तो नहीं की?’’

मैं हंसा और बोला, ‘‘हां, मैं ने तुम्हारे होंठों पर पड़ी बारिश की बूंदों को चूम कर सुखा दिया था.’’

‘‘धत्त…’’ थोड़ा रुक कर वह कहने लगी, ‘‘तुम्हारा सहारा पा कर मुझे नई जिंदगी मिली. ऐसा मन हो रहा था कि जिंदगीभर इसी तरह तुम्हारे सीने से लगी रहूं.’’

‘‘हमारा प्यार अभी बड़ी नाजुक हालत में है. अगर हमारे प्यार की जरा सी भी भनक किसी के कान में पड़ गई, तो हमारी मुहब्बत खतरे में तो पड़ ही जाएगी और हमारी जिंदगी भी दूभर हो जाएगी,’’ मैं ने कहा.

‘‘जानते हो, मैं तुम्हारे आगोश में सुधबुध भूल कर सपनों की दुनिया में पहुंच गई थी. मेरी शादी धूमधाम से तुम्हारे साथ हुई और विदाई के बाद मैं तुम्हारे घर पहुंची. वहां भी खूब सजावट थी.

‘‘रात हुई. मुझे फूलों से सजे हुए कमरे में पलंग पर बैठा दिया गया. तुम अंदर आए, दरवाजा बंद किया और मेरे पास बैठे.

‘‘हम दोनों ने वह पूरी रात बातें करते हुए और प्यार करने में गुजार दी,’’ इतना कह कर वह खामोश हो गई.

‘‘फिर क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हवा का एक बवंडर आया और मेरा सपना टूट गया. मैं ने महसूस किया कि मैं तुम्हारी बांहों में हूं. मेरा जिस्म तुम्हारे सीने में समाया था,’’ इतना कहतेकहते वह मुझ से चिपक गई.

‘‘अंबाली, बारिश बंद हो चुकी है. अंधेरा घिरने लगा है. अब हमें अपने घर पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी. तुम्हारे घर वाले चिंता कर रहे होंगे. कहीं हमारा राज न खुल जाए.’’

‘‘तुम ठीक कहते हो. हमें चलना ही होगा.’’

कुछ दिन कई वजहों से हम दोनों नहीं मिल सके. लेकिन एक शाम अंबाली मेरे पास सहमी हुई आई. मैं ने उस के चेहरे को देखते हुए पूछा, ‘‘आज तुम बहुत उदास हो?’’

‘‘आज मेरा मन बहुत भारी है. मैं तुम्हारे बिना कैसे जी सकूंगी, कहीं मैं खुदकुशी न कर बैठूं, क्योंकि उस के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता,’’ कह कर अंबाली रो पड़ी.

‘‘ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘मेरे घर वालों को हमारे प्यार के बारे में मालूम हो गया. अब मेरी शादी तय हो चुकी है. लड़का पढ़ालिखा रईस घराने का है. अगले महीने की तारीख भी तय कर ली गई. अब मुझे बाहर निकलने की इजाजत भी नहीं मिलेगी,’’ अंबाली रोते हुए बोली.

‘‘तुम्हारे घर वाले जो कर रहे हैं, वह तुम्हारे भविष्य के लिए ठीक होगा. मेरातुम्हारा कोई मुकाबला नहीं. उन के अरमानों पर जुल्म मत करना. हमारा प्यार आज तक पवित्र है, जिस में कोई दाग नहीं लगा. समझ लो कि हम दोनों ने कोई सपना देखा था.’’

‘‘यह कैसे होगा?’’

‘‘अपनेआप को एडजस्ट करना ही पड़ेगा.’’

‘‘मेरे लिए कई रिश्ते आए, पर मैं ने किसी को पसंद नहीं किया. उस के बाद मैं तुम्हें अपना दिल दे बैठी, अब तुम मुझे भूल जाने के लिए कहते हो. मैं तुम्हें बेहद प्यार करती हूं, मेरा प्यार मत छीनो. मैं तुम्हें भुला नहीं पाऊंगी. क्या तुम मुझे तड़पते देखते रहोगे? मैं तुम्हें हर कीमत पर हासिल करना चाहूंगी.’’

कुछ दिन हम लोग अपना दुखी मन ले कर समय बिताते रहे. किसी काम को करने की इच्छा नहीं होती थी. अंबाली की मां से उस की हालत देखी नहीं गई. वह एकलौती लाड़ली थी. उन्होंने अपने पति को बहुत समझाया.

अंबाली के पिता ने एक दिन हमारे यहां संदेशा भेजा, ‘आप लोग किसी दूसरे किराए के मकान में दूर चले जाइए, ताकि दोनों लड़केलड़की का भविष्य खराब न हो.’

हमें दूसरे मकान में शिफ्ट होना पड़ा. 3 महीने तक हम एकदूसरे से नहीं मिले. चौथे महीने अंबाली के पिता मेरे पिता से मिलने आए और साथ में मिठाई भी लाए थे.

बाद में उन्होंने कहा, ‘‘रिश्ता वहीं होगा, जहां अंबाली चाहेगी, इसलिए 2 साल में उस की पढ़ाई पूरी हो जाने पर विचार होगा. आप लोग दूर चले आए. हम दोनों की इज्जत नीलाम होने से बच गई, वरना ये आजकल के लड़केलड़की मांबाप की नाक कटा देते हैं.’’

मेरे पिता ने उन की बातों को सुना और हंस कर टाल दिया.

ए  क साल बीत जाने पर मेरा चुनाव एक सरकारी पद पर हो गया और मेरी बहाली दूसरे शहर में हो गई. मेरी शादी के कई रिश्ते आने लगे और मैं बहाने बना कर टालता रहा.

आखिर में मेरे पिता ने झुंझला कर कहा, ‘‘अब हम लोग खुद लड़की देखेंगे, क्योंकि तुम्हें कोई लड़की पसंद नहीं आती. अगर तुम ने हमारी पसंद को ठुकरा दिया, तो हम लोग तुम्हें अकेला छोड़ कर चले जाएंगे.’’

मुझे उन के सामने झुकना पड़ा और कहा, ‘‘आप लोग जैसा ठीक समझें, वैसा करें. मुझे कोई एतराज नहीं होगा.’’

शादी की जोरशोर से तैयारियां होने लगीं, लेकिन मुझे कोई खास दिलचस्पी न थी.

बरात धूमधाम से एक बड़े होटल में घुसी, जहां बताया गया कि लड़की के पिता बीमार होने के चलते द्वारचार पर नहीं पहुंच सके. उन के भाई बरात का स्वागत करेंगे.

लड़की को लाल घाघराचोली में सजा कर स्टेज तक लाया गया, पर उस के चेहरे से आंचल नहीं हटाया गया था.

लड़की ने मेरे गले में जयमाल डाली और मैं ने उस के गले में. तब लोग शोर करने लगे, ‘अब तो लड़की का घूंघट खोल दिया जाए, ताकि लोग उस की खूबसूरती देख सकें.’

लड़की का घूंघट हटाया गया, जिसे देख कर मैं हैरान रह गया. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो उसे जबरदस्ती बांधा गया था.

मैं ने एक उंगली से उस की ठुड्डी को ऊपर किया. उस की नजरें मुझ से टकराईं, तो वह बेहोश होतेहोते बची.

सुहागरात में अंबाली ने मेरे आगोश में समा कर अपनी खुशी का इजहार किया. उस का प्यार जिंदा रह गया. मैं ने उस के गुलाबी गाल पर अपने होंठ रख कर प्यार से कहा, ‘‘अंबाली, तुम्हारे गालों पर अभी तक बारिश की बूंदें मोतियों जैसी चमक रही हैं. थोड़ा मुझे अपने होंठों से चूम लेने दो.’’

यह सुन कर अंबाली खिलखिला कर हंस पड़ी, जैसे वह कली से फूल बन गई हो. Romantic Hindi Story

Love Story in Hindi : पुनर्मिलन

Love Story in Hindi. बरसों बाद उस दिन आसमान साफ था. हलकी धूप खेतों पर बिखरी हुई थी. दूर तक सरसों के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे. गांव के बाहर वही पुराना बरगद खड़ा था, जिस की जड़ों ने आधी जमीन को अपनी बांहों में ले रखा था.

बरगद के नीचे पत्थर की एक पुरानी बैंच थी. सुधीर धीरेधीरे चल कर वहीं आ कर बैठ गया. सिर के बाल अब लगभग सफेद हो चुके थे. आंखों पर चश्मा था और चाल में उम्र की थकान साफ दिखती थी.

सुधीर ने अपनी जेब से एक पुरानी डायरी निकाली. पन्ने पीले पड़ चुके थे. बीच में दबा हुआ गुलमोहर का सूखा फूल अब भी वैसा ही था.

सुधीर उसे देर तक देखता रहा. हवा के झोंके से बरगद की पत्तियां सरसराईं. उसी समय पीछे से कदमों की आहट आई… ‘‘सुधीर.’’ आवाज धीमी थी, पर पहचान में आने में एक पल भी नहीं लगा.

सुधीर ने मुड़कर देखा. सीमा खड़ी थी. 30 साल बाद. हलकी सी सूती साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी, बालों में कुछ चांदी की लटें मगर चेहरा अब भी वैसा ही शांत था जैसा कभी कालेज के दिनों में हुआ करता था.

दोनों कुछ देर तक बस एकदूसरे को देखते रहे. सीमा ने हलकी मुसकान के साथ पूछा, ‘‘तुम अभी भी यहां आते हो?’’

सुधीर ने बैंच की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘कभीकभी जब यादें बहुत परेशान करने लगती हैं.’’

सीमा भी धीरे से आ कर पास बैठ गई. बरगद की पत्तियों के बीच से धूप छन कर जमीन पर गिर रही थी. दूर खेतों में काम करते किसानों की हलकी आवाजें आ रही थीं. हवा में मिट्टी और सरसों के फूलों की मिलीजुली खुशबू थी.

सीमा ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पास अब भी वही डायरी है?’’  सुधीर मुसकराया, ‘‘कुछ चीजें छोड़ना आसान नहीं होता.’’ फिर थोड़ी देर चुप्पी रही.

सीमा ने धीरे से कहा, ‘‘तुम जानते हो न हम क्यों अलग हुए थे?’’ सुधीर ने गहरी सांस ली, ‘‘जानता हूं पर समझ नहीं पाया कभी.’’

उस ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘हम दोनों ने तो बस एकदूसरे को चाहा था, लेकिन लोगों को हमारी जातियां ज्यादा दिखाई देती थीं,’’ कहते हुए सीमा की आंखें दूर खेतों की तरफ चली गईं.

‘‘उस दिन पिताजी ने कहा था कि घर की इज्जत और समाज के डर में से एक चुनना होगा,’’ सीमा आगे बोली. ‘‘और तुम ने?’’ सुधीर ने पूछा.

सीमा ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘मैं ने घर चुना क्योंकि उस समय लगा कि अगर मैं नहीं मानी तो सब टूट जाएगा.’’

सुधीर हलका सा मुसकराया, मगर उस मुसकान में दर्द था, ‘‘और अगर तुम मान गईं तो हम टूट गए.’’

कुछ देर दोनों चुप रहे. हवा थोड़ी तेज हो गई थी. सीमा ने धीरे से पूछा, ‘‘तुम ने शादी क्यों नहीं की?’’

सुधीर ने कहा, ‘‘कभी कोशिश की थी मगर दिल मान नहीं पाया… और तुम?’’ उस ने पूछा.

सीमा ने कहा, ‘‘शादी हुई थी पर कुछ साल पहले वे नहीं रहे.’’

कुछ देर बाद सीमा ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘सुधीर कभीकभी सोचती हूं, अगर उस समय समाज इतना कठोर न होता तो शायद हमारी जिंदगी कुछ और होती.’’

सुधीर ने डायरी से वही सूखा गुलमोहर का फूल निकाला, ‘‘याद है? कालेज के आखिरी दिन तुम ने दिया था…’’ सीमा की आंखों में नमी उतर आई, ‘‘तब लगा था कि बस कुछ महीनों की बात है सब मान जाएंगे.’’

सुधीर ने आसमान की तरफ देखा. सूरज ढलने लगा था. खेतों पर सुनहरी रोशनी फैल गई थी. वह धीरे से बोला, ‘‘समाज धीरे बदलता है सीमा पर अब लगता है कि शायद समय ने हमें एक और मौका दिया है.’’

सीमा ने उस की तरफ देखा. उस की आंखों में अब झिझक कम और अपनापन ज्यादा था.

‘‘अगर मैं कहूं…’’ सुधीर बोला, ‘‘कि इस बार हम समाज से नहीं डरेंगे तो?’’

सीमा कुछ क्षण चुप रही. बरगद की पत्तियां हवा में हिल रही थीं. फिर सीमा ने धीरे से कहा, ‘‘30 साल पहले हम मजबूर थे अब हम सिर्फ इनसान हैं.’’

सुधीर ने मुसकान के साथ हाथ बढ़ाया. सीमा ने बिना झिझक उस का हाथ थाम लिया.

डूबते सूरज की रोशनी में बरगद की छाया लंबी होती जा रही थी. 2 रास्ते जो कभी अलग हो गए थे, आज फिर से एक जगह आ कर मिल गए थे.

सुधीर ने मुसकरा कर कहा, ‘‘लगता है हमारी कहानी को पूरा होने में इतना समय लगना ही था.’’

सीमा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘हां शायद हमारा पुनर्मिलन लिखा ही था.’’

हवा में सरसों के फूलों की खुशबू घुली गईं. बरगद के नीचे 2 लोग खड़े थे, 30 साल की दूरी के बाद, फिर   साथ.                    Love Story in Hindi

— राजनंदिनी रावत

Love Story : नए रिश्ते की उजली शुरुआत

Love Story.  अंजलि उम्र में आशीष से 5 साल बड़ी थी, पर फिर भी वह उसे बहुत पसंद करता था. एक दिन आटोरिकशा में 2 गुंडों ने अंजलि को परेशान किया, तो आशीष वहां जा कर उन से भिड़ गया. आगे क्या हुआ?

शहर की सुबह धीरेधीरे जाग रही थी. सड़कों पर भागती गाडि़यां, चाय की दुकानों से उठती भाप, स्कूल और कालेज जाते विद्यार्थियों की चहलपहल… हर तरफ रोजमर्रा की जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ रही थी.

अंजलि आईने के सामने खड़ी अपने बाल संवार रही थी. लगभग 27 साल की अंजलि शहर के एक नामी कालेज में लैक्कचरर थी. उस के चेहरे पर सादगी और आत्मविश्वास दोनों साथसाथ दिखाई देते थे. उस की मां ने रसोई से आवाज लगाई, ‘‘अंजलि बेटा, नाश्ता कर के जाना.’’

‘‘मम्मी, देर हो रही है. कालेज पहुंच कर कैंटीन में कुछ खा लूंगी.’’ ‘‘तुम रोज यही कहती हो.’’

अंजलि मुसकरा दी. बैग उठाया और जल्दीजल्दी घर से निकल गई.

उसी महल्ले की दूसरी गली में आशीष भी अपने कमरे में तैयार हो रहा था. उस की उम्र मुश्किल से 22 साल थी. बैंक में नईनई नौकरी लगी थी.

आशीष की मां ने उस के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘क्या तू ठीक है? कल फिर देर रात तक काम करता रहा था.’’

‘‘अरे मम्मी, मैं बिल्कुल ठीक हूं,’’ आशीष मुसकराया, लेकिन उस की मुसकान के पीछे हमेशा की तरह एक चेहरा छिपा हुआ था, अंजलि का चेहरा. जिस लड़की ने उसे 9वीं से 12वीं तक मैथ्स पढ़ाया था, वही अब उस की दुनिया बन चुकी थी.

आशीष को आज भी याद था कि जब पहली बार अंजलि ने उस के टैस्ट में 100 में 100 नंबर आने पर उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, ‘‘शाबाश, मुझे  पता था, तुम कर लोगे.’’

बस शायद उसी दिन से अंजलि आशीष के दिल में उतर गई थी, लेकिन अंजलि उसे हमेशा छोटे भाई की तरह ही देखती थी.

करीब साढ़े 10 बजे अंजलि सड़क किनारे खड़े एक आटोरिकशा में जा कर बैठ गई.

‘‘भैया, जल्दी सिविल लाइन कालेज चलिए.’’

आटोरिकशा आगे बढ़ गया. कुछ दूर पहुंचते ही अचानक 2 लड़के तेजी से आए और आटोरिकशा में घुस कर अंजलि के बगल में बैठ गए. उन के चेहरे पर अपराध की कठोरता साफ दिखाई दे रही थी. एक ने जेब से चाकू निकाला. धूप की किरण चाकू पर पड़ी तो उस की चमक देख कर अंजलि का दिल कांप उठा.

‘‘चुपचाप बैठी रह,’’ एक गुंडे ने धीमी लेकिन खतरनाक आवाज में कहा.

आटोरिकशा चलाने वाला डर गया. ‘‘भाई साहब मुझे  जाने दो.’’ वह कांपते हुए बोला.

दूसरे गुंडे ने उस की गरदन पकड़ ली, ‘‘सीधे गाड़ी चला.’’

अंजलि का गला सूख गया. उस की सांसें तेज हो गईं. अगले ही पल उस ने पूरी ताकत से चीख मारी, ‘‘बचाओ बचाओ.’’

अंजलि की आवाज सड़क पर गूंज उठी. उसी समय सामने से बाइक पर आशीष जा रहा था. जैसे ही उस के कानों में यह आवाज़ पड़ी, उस ने पलट कर देखा. आटोरिकशा के अंदर सहमी हुई अंजलि दिखाई दी.

आशीष की आंखों में खून उतर आया. उस ने बिना सोचेसमझे  बाइक आटोरिकशा के सामने तिरछी खड़ी कर दी. आटोरिकशा रुक गया.

आशीष गुस्से से चिल्लाया, ‘‘कौन हो तुम लोग?’’ एक गुंडा हंसा, ‘‘तू कौन होता है बीच में आने वाला?’’

‘‘जिस लड़की के साथ तुम बदतमीजी कर रहे हो, वह मेरी…’’ कहते हुए आशीष रुक गया. उस ने गुस्से से दांत भींच लिए. ‘‘उतर नीचे,’’ आशीष चिल्लाया.

दोनों गुंडे आटोरिकशा से उतर आए. एक ने चाकू घुमाते हुए कहा, ‘‘ज्यादा हीरो बन रहा है…’’

अगले ही पल आशीष ने उस के मुंह पर जोरदार मुक्का मार दिया. सड़क पर हड़कंप मच गया. दोनों गुंडे उस पर टूट पड़े. अंजलि डर के मारे आटोरिकशा से उतर कर एक तरफ खड़ी कांप रही थी.

‘‘कोई बचाइए,’’ कहते हुए अंजलि रो पड़ी.

लेकिन लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे. आशीष अकेला दोनों से भिड़ा हुआ था. एक गुंडे ने पीछे से उसे पकड़ लिया. दूसरे ने चाकू उठाया. ‘‘आशीष, संभलो,’’ अंजलि चीखी.

लेकिन देर हो चुकी थी. चाकू सीधे आशीष के कंधे में धंस गया.

‘‘आह,’’ आशीष की दर्दभरी चीख निकल गई. खून उस की सफेद शर्ट को लाल करने लगा, लेकिन वह रुका नहीं. उस ने घायल कंधे के बावजूद दोनों को इतनी बुरी तरह पीटा कि वे डर कर भाग निकले.

आशीष लड़खड़ा कर सड़क पर बैठ गया.

‘‘आप ठीक हैं न?’’ इतना कह कर आशीष लगभग बेहोश हो गया.

तभी आशीष का दोस्त कुलदीप वहां पहुंच गया. उस ने तुरंत लोगों की मदद से आशीष को उठाया और पास के नर्सिंग होम ले गया.

डाक्टर ने जांच करते हुए कहा, ‘‘घाव काफी गहरा है. तुरंत टांके लगाने पड़ेंगे.’’

आशीष दर्द से कराह रहा था, लेकिन उस की आंखों में सिर्फ चिंता थी.

‘‘वे ठीक हैं न?’’ कुलदीप ने उस का हाथ दबाया, ‘‘हां, वे ठीक हैं.’’

इधर अंजलि घर लौट आई थी. उस के हाथ अब भी कांप रहे थे. उस ने कालेज में फोन कर के छुट्टी ले ली, लेकिन धीरेधीरे उस के मन में एक दूसरा विचार जन्म लेने लगा. उसे याद आया, कुछ महीने पहले आशीष ने उस से कहा था, ‘‘मैं आप से प्यार करता हूं.’’

वह हंस पड़ी थी, ‘‘पागल हो गए हो क्या… मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं.’’ ‘‘उम्र से क्या फर्क पड़ता है?’’

‘‘बहुत फर्क पड़ता है… और तुम मेरे छात्र रहे हो.’’

उस दिन के बाद आशीष चुप रहने लगा था. अब अंजलि के मन में शक उठ खड़ा हुआ, ‘कहीं ये सब उसी का प्लान तो नहीं था?’

डर और शक मिल कर इनसान से सहीगलत का फर्क छीन लेते हैं और यही अंजलि के साथ हुआ. शाम तक आशीष को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. कंधे पर मोटी पट्टी बंधी थी. चेहरा दर्द से पीला पड़ा हुआ था. लेकिन वह सीधे अंजलि के घर पहुंचा. दरवाजा खुला. अंजलि सामने थी.

आशीष ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘अब आप ठीक हैं न?’’

अचानक ‘चटाक’… जोरदार थप्पड़ उस के चेहरे पर पड़ा. आशीष लड़खड़ा गया. उस की आंखें फटी रह गईं.

‘‘मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी,’’ अंजलि गुस्से से कांप रही थी, ‘‘मुझे  पाने के लिए तुम ने गुंडों का सहारा लिया? इतना गिर जाओगे तुम?’’

आशीष जैसे पत्थर का हो गया, ‘‘आप क्या कह रही हैं?’’ ‘‘ड्रामा मत करो.’’

‘‘मैं सच…’’ आशीष बोला. ‘‘बस, निकल जाओ यहां से.’’

आशीष की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘मैं ने आप की जान बचाई.’’ ‘‘और एहसान जताने आ गए?’’

आशीष का गला भर आया. कुछ पल वह चुप खड़ा रहा, फिर धीरे से बोला, ‘‘काश आप एक बार मेरी आंखों में देख कर सच पहचान पातीं.’’

और आशीष चला गया. घर पहुंचते ही उस ने खुद को कमरे में बंद कर लिया. उस की मां रोते हुए दरवाजा पीटती रहीं, ‘‘बेटा, दरवाजा खोल.’’

लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया. रात को कुलदीप आया और उस ने पूरी घटना सब को बताई.

‘‘चाचाजी, अगर आशीष समय पर नहीं पहुंचता तो पता नहीं क्या हो जाता.’’

आशीष के पिता की आंखें भर आईं. उन्होंने तुरंत अंजलि को फोन लगाया और बोले, ‘‘बेटा, तुम अभी बहुत बड़ी गलतफहमी में हो.’’

लेकिन अंजलि अभी भी गुस्से में थी, ‘‘अंकल, आशीष ने फिल्मी ड्रामा किया है.’’

आशीष के पिता की आवाज भारी हो गई, ‘‘तुम ने उस के कंधे का घाव देखा है? 5 टांके लगे हैं उसे वह लड़का तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकता है, लेकिन ऐसी हरकत नहीं कर सकता.’’ फोन कट गया.

रात के 2 बजे जब घर वालों ने दरवाजा तोड़ा, तो अंदर का सीन देख कर सब रो पड़े. आशीष फर्श पर बैठा था. उस की आंखें सूज चुकी थीं. वह बच्चे की तरह फूटफूट कर रो रहा था.

‘‘मैं ने क्या गलत किया था.’’  आशीष की मम्मी ने उसे गले लगा लिया.

उधर अंजलि भी पूरी रात नहीं सो पाई. हर बार आंख बंद करते ही वही सीन सामने आ जाता. खून से लथपथ आशीष उस की कांपती आवाज और फिर उस का मासूम चेहरा. धीरेधीरे उस का भरम टूटने लगा.

‘‘अगर वह सच में बेकुसूर हुआ तो,’’ उस की आंखों से आंसू बह निकले. ‘‘मैं ने क्या कर दिया.’’ सुबह होते ही वह भागती हुई आशीष के घर पहुंची. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. आशीष खिड़की के पास चुपचाप बैठा था. अंजलि अंदर गई. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. अचानक वह आशीष के सामने घुटनों पर बैठ गई.

‘‘आशीष,’’ उस की आवाज कांप रही थी, ‘‘मुझे  माफ कर दो मैं ने तुम्हें समझे  बिना बहुत बड़ा इलजाम लगा दिया.’’

आशीष चुप रहा. उस की आंखों से आंसू बहते रहे. अंजलि रो पड़ी, ‘‘तुम ने मेरी जान बचाई और मैं ने तुम्हारा दिल तोड़ दिया.’’

कुछ क्षण कमरे में सिर्फ सिसकियां गूंजती रहीं, फिर पहली बार आशीष ने उस की ओर देखा. उस की आवाज टूटी हुई थी, ‘‘चोट कंधे पर लगी थी, लेकिन दर्द यहां हुआ.’’ उस ने अपने सीने पर हाथ रख लिया.

अंजलि फूट पड़ी. आशीष के पापा ने अंजलि और आशीष के सिर पर अपने हाथ रख कर दोनों को गले लगा लिया, फिर अंजलि को कहा, ‘‘बेटी, कब आ रही हो इस घर में बहू बन कर?’’

अंजलि शरमा कर आशीष की मम्मी के गले लग गई. उसी समय अंजलि के मम्मीपापा भी आशीष के घर आ गए.  अंजलि और आशीष ने झुक कर दोनों के चरण छुए.

उस दिन सिर्फ 2 दिलों का मिलन नहीं हुआ था, बल्कि 2 परिवार हमेशा के लिए एक खूबसूरत रिश्ते में बंध गए थे. आंगन में जलता छोटा सा दीपक मानो इस नए रिश्ते की उजली शुरुआत का साक्षी बन कर मुसकरा रहा था.

— दीपक गिरकर

Heart Touching Story : सफर में छूटा प्यार

Heart Touching Story. शाम धीरेधीरे अपने आंचल को फैलाती जा रही थी. आसमान में धूप की हलकी पड़ती किरणें जैसे किसी बिछड़ते रिश्ते की आखिरी चमक बन कर ठहर गई थीं.

रेलवे स्टेशन पर हलचल थी, आवाजें थीं, चाय वालों की पुकार थी, कुलियों की भागदौड़ थी, लेकिन इस शोर के बीच भी अर्जुन के भीतर एक ऐसा सन्नाटा था, जिसे कोई सुन नहीं सकता था.

प्लेटफार्म नंबर 3 पर खड़ी ट्रेन जैसे केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि यादों को भी अपने साथ ले जाने के लिए तैयार थी. अर्जुन हाथ में टिकट लिए खड़ा था, लेकिन उस की उंगलियां हलकेहलके कांप रही थीं.

वह बारबार भीड़ में झांकता, जैसे किसी खोई हुई चीज को ढूंढ़ रहा हो. उस की आंखों में एक बेचैनी थी… वह बेचैनी जो केवल उस इनसान के आने से खत्म हो सकती थी, जिस के बिना उस की दुनिया अधूरी थी. और फिर वह दिखी. नैना.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

हलके गुलाबी सूट में, खुले बालों के बीच उस का चेहरा वैसा ही था… मासूम, शांत, लेकिन आज उस में एक गहरा दर्द भी छिपा हुआ था. वह धीरेधीरे उस की ओर बढ़ रही थी, जैसे हर कदम उसे अर्जुन से नहीं, बल्कि खुद से दूर कर रहा हो.

दोनों आमनेसामने थे, लेकिन शब्द कहीं खो गए थे. उन के बीच केवल खामोशी थी और वह खामोशी ही सब से ज्यादा बोल रही थी.

‘‘तुम आ गई…’’ अर्जुन ने जैसे अपने ही भीतर से आवाज निकालते हुए कहा.

नैना ने हलका सा सिर हिलाया, ‘‘नहीं आती तो शायद जिंदगीभर खुद को माफ नहीं कर पाती,’’ उस की आवाज में एक कंपन था, जो सीधे अर्जुन के दिल तक उतर गया.

कुछ पल दोनों चुप रहे, फिर नैना ने धीरे से पूछा, ‘‘सच में जा रहे हो?’’  यह सवाल नहीं था, एक शिकायत थी. एक उम्मीद थी कि शायद वह कह दे, ‘‘नहीं.’’

अर्जुन ने उस की आंखों में देखा. वह जानता था कि यह जवाब उस के अपने दिल को भी तोड़ देगा, लेकिन सच से भागना अब मुमकिन नहीं था.

‘‘हां, जाना पड़ेगा.’’ नैना की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘इतनी आसानी से?’’ ‘‘आसानी से?’’ अर्जुन की आवाज अचानक भारी हो गई, ‘‘अगर यह आसान होता, तो मैं यहां खड़ा नहीं होता नैना. मैं तो कब का चला गया होता.’’

नैना ने नजरें झुका लीं, ‘‘तो फिर क्यों जा रहे हो? क्यों नहीं रुक जाते?’’

यह सवाल सीधा था, लेकिन उस का जवाब बहुत पेचीदा. अर्जुन ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि कभीकभी जिंदगी में हम जो चाहते हैं, वह नहीं कर पाते. हमें वह करना पड़ता है, जो जरूरी होता है.’’

‘‘और हमारा प्यार?’’ नैना ने तुरंत पूछा. अर्जुन कुछ पल चुप रहा, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘प्यार कभी जरूरी नहीं होता नैना, प्यार बस होता है.’’

यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘अगर प्यार बस होता है तो फिर उसे छोड़ कर कैसे जा सकते हो?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा. उस की आंखों में दर्द था, लेकिन साथ ही एक मजबूरी भी.

‘‘मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रहा, मैं बस इस शहर को छोड़ कर जा रहा हूं.’’ ‘‘और मैं?’’ नैना की आवाज टूट गई, ‘‘मैं भी तो इसी शहर में हूं.’’

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था. उस ने बस इतना कहा, ‘‘तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी यहां,’’ उस ने अपने दिल पर हाथ रखा. नैना हलकी सी मुसकराई… एक दर्दभरी मुसकान. ‘‘दिल में रह कर क्या होगा अर्जुन? जिंदगी को तो साथ जिया जाता है.’’

यह बात अर्जुन के दिल में तीर की तरह चुभ गई. उसे याद आया… वह पहली मुलाकात. कालेज का वह पहला दिन जब नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी थी और वह अनजाने में उसी टेबल पर जा कर बैठ गया था.

‘‘यह सीट खाली है?’’ अर्जुन ने पूछा था. नैना ने बिना ऊपर देखे कहा था, ‘‘अब नहीं है.’’

और उस एक जवाब ने उस की जिंदगी बदल दी थी. धीरेधीरे बातें शुरू हुईं, दोस्ती हुई और फिर वही दोस्ती कब प्यार में बदल गई, यह दोनों को पता ही नहीं चला. वे साथ चलते थे, साथ हंसते थे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ते थे और फिर एकदूसरे को मनाते भी थे.

नैना अकसर कहती, ‘‘अगर कभी तुम मुझ से दूर गए न, तो मैं एक पल भी जी नहीं पाऊंगी.’’ और अर्जुन हंस कर कहता, ‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगा. मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’

लेकिन आज वही अर्जुन जा रहा था. वादा टूट रहा था और उस के साथ एक सपना भी. ट्रेन की सीटी ने उन्हें वर्तमान में लौटा दिया. समय जैसे हाथ से फिसल रहा था.

अर्जुन ने बैग उठाया. उस के कदम भारी हो गए थे पर जाना जरूरी था. वह एक अति पिछड़े घर का गरीब लड़का और नैना साधारण आमदनी वाले ब्राह्मण परिवार की लड़की. दोनों को जल्दी एहसास हो गया था कि यह मिलन न जाने कितने दिन का है.

अर्जुन ने हाथपैर मारे तो कई हजार किलोमीटर दूर एक जगह नौकरी किसी ने दिलाई. शहर में तो उसे सही नजर से भी कम ही लोग देखते थे.

नैना ने अचानक उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मत जाओ.’’

उस एक वाक्य में इतनी ताकत थी कि अर्जुन का दिल एक पल के लिए सच में रुक गया. उस ने नैना की ओर देखा. उस की आंखों में विनती थी, डर था और सब से ज्यादा… प्यार था.

‘‘अगर तुम कहो तो मैं नहीं जाऊंगा,’’ अर्जुन ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा.

नैना चौंक गई. यह वही पल था जब वह चाहती थी कि वह रुक जाए, लेकिन वह यह भी जानती थी कि उस के रुकने की कीमत बहुत बड़ी होगी.

नैना ने धीरेधीरे अपना हाथ छोड़ दिया, ‘‘नहीं जाओ,’’ उस की आवाज कांप रही थी, ‘‘मैं तुम्हें रोक कर तुम्हारे सपनों को नहीं तोड़ सकती.’’

अर्जुन की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘और हमारे सपने?’’ उस ने पूछा. नैना ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘कुछ सपने पूरे होने के लिए नहीं होते. कुछ सपने बस महसूस करने के लिए होते हैं.’’

अर्जुन अब और कुछ नहीं कह पाया. वह ट्रेन में चढ़ गया. खिड़की के पास खड़ा हो कर वह नैना को देख रहा था. नैना वहीं खड़ी थी, जैसे समय ने उसे जकड़ लिया हो.

ट्रेन धीरेधीरे चलने लगी. नैना दौड़ी. उस ने हाथ बढ़ाया, ‘‘अर्जुन…’’ उस की आवाज इस बार बाहर आ गई.

अर्जुन ने भी हाथ बढ़ाया, लेकिन उन के बीच की दूरी हर पल बढ़ती जा रही थी. कुछ ही क्षणों में हाथ हवा में रह गए.

और फिर ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ गई. नैना वहीं रुक गई. उस की सांसें तेज थीं, आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे. वह धीरेधीरे उसी बैंच पर बैठ गई, जहां वे कभी साथ बैठा करते थे. उस ने अपनी आंखें बंद कीं और अर्जुन की आवाज उस के कानों में गूंजने लगी, ‘‘मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’

उस ने धीमे से खुद से कहा, ‘‘झूठ,’’ लेकिन उसी पल उस के होंठों पर एक हलकी मुसकान भी आ गई, क्योंकि वह जानती थी, वह झूठ नहीं था. बस अधूरा सच था.

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

Sarita

उस रात स्टेशन की भीड़ खत्म हो गई. रोशनी धीमी पड़ गई, लेकिन नैना वहीं बैठी रही. उस के भीतर एक सफर शुरू हो चुका था. एक ऐसा सफर जिस में कोई मंजिल नहीं थी, सिर्फ यादें थीं.

और उन यादों में एक प्यार था, जो सफर में छूट गया था, लेकिन दिल से कभी नहीं उतरा.

कहते हैं, समय हर घाव भर देता है, लेकिन कुछ घाव ऐसे होते हैं, जिन्हें समय केवल ढकता है, मिटाता नहीं.

अर्जुन और नैना की जिंदगी में भी समय बीतता रहा… दिन महीनों में, महीने सालों में बदलते गए, लेकिन जो उस एक शाम प्लेटफार्म नंबर 3 पर छूट गया था, वह वहीं का वहीं ठहरा रहा.

नैना अब शहर के एक छोटे से स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी. उस के चेहरे पर एक शांत मुसकान रहती थी, लेकिन उस की आंखों में एक गहराई थी… एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई बच्चा, कोई साथी, कोई रिश्तेदार भर नहीं पाता था.

वह बच्चों को कहानियां सुनाती थी… राजकुमार और राजकुमारी की, अधूरी प्रेम कहानियों की, बिछड़ते लोगों की. और हर कहानी के आखिर में उस की आवाज थोड़ी धीमी हो जाती.

एक दिन एक बच्चे ने पूछ लिया, ‘‘मैम, क्या सच में प्यार कभी अधूरा रह जाता है?’’

नैना कुछ पल के लिए चुप रह गई, फिर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, कभीकभी प्यार पूरा हो कर भी अधूरा रह जाता है.’’

बच्चे समझ नहीं पाए, लेकिन उस की आंखों की नमी ने उस जवाब को और गहरा बना दिया. स्कूल से लौटते समय वह अकसर उसी रास्ते से गुजरती, जहां कभी वह और अर्जुन साथ चला करते थे. हर मोड़, हर पेड़, हर चाय की दुकान… सब उसे उस की याद दिलाते.

वह चाहती तो उन रास्तों को बदल सकती थी, लेकिन उस ने नहीं बदला, क्योंकि वह जानती थी, यादों से भागने से वे खत्म नहीं होतीं, वे और गहरी हो जाती हैं.

उधर अर्जुन, वह अब एक बड़े शहर में एक बड़ी कंपनी में काम कर रहा था. उस के पास सबकुछ था… अच्छी नौकरी, एक घर, नाम, पहचान लेकिन रात को जब वह अपने कमरे में अकेला होता, तो उस की सारी उपलब्धियां उस के सामने छोटी पड़ जातीं.

उस के कमरे की एक दीवार पर एक छोटी सी तसवीर लगी थी, नैना की. वह फोटो कालेज के दिनों की थी… जब नैना हंस रही थी, बेफिक्र, खुश और अर्जुन उस तसवीर को घंटों देखता रहता.

‘‘तुम अभी भी वैसे ही हंसती हो क्या?’’ वह अकसर खुद से पूछता.

लेकिन जवाब में केवल खामोशी मिलती. कई बार उस ने कोशिश की आगे बढ़ने की, किसी और को अपनी जिंदगी में लाने की, लेकिन हर बार उसे लगता, जैसे वह किसी और के साथ नहीं, बल्कि अपने ही दिल के साथ धोखा कर रहा हो.

उस ने खुद को काम में डुबो दिया. दिनरात, बस काम, लेकिन जब भी वह थक कर रुकता, तो उस की यादें फिर उसे उसी प्लेटफार्म पर ले जातीं, जहां उस ने अपना सबकुछ छोड़ दिया था. उस ने नैना के पास लौटने का सपना देखना छोड़ दिया था, क्योंकि कई साल बीत गए थे उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में.

एक दिन, अचानक उसे उसी शहर में एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में जाना पड़ा. वही शहर जहां उस की मुहब्बत अब भी सांस ले रही थी.

ट्रेन से उतरते ही उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. हर चीज जानीपहचानी थी, लेकिन अब उस में एक अजनबीपन भी था. उस ने खुद को रोकने की कोशिश की, ‘‘नहीं, वहां नहीं जाना चाहिए.’’

लेकिन दिल दिल कहां मानता है? उस के कदम खुद ब खुद उसी दिशा में बढ़ने लगे. प्लेटफार्म नंबर 3. वह जगह, जहां से उस की जिंदगी 2 हिस्सों में बंट गई थी, पहले और बाद में.

वह धीरेधीरे उस बैंच की ओर बढ़ा, वही बैंच जहां नैना आखिरी बार बैठी थी. उस ने हाथ बढ़ा कर उस बैंच को छुआ, जैसे वह उस पल को फिर से महसूस करना चाहता हो.

‘‘तुम अभी भी यहां आते हो?’’ अचानक पीछे से आई आवाज ने जैसे उस की धड़कनें रोक दीं.

वह आवाज, जिसे वह हजारों आवाजों में भी पहचान सकता था. अर्जुन ने धीरेधीरे पीछे मुड़ कर देखा… नैना. समय जैसे थम गया. वह वहीं खड़ी थी, सालों बाद भी वैसी ही. बस, उस की आंखों में अब और गहराई थी और शायद थोड़ा और दर्द भी.

‘‘नैना,’’ अर्जुन के होंठों से बस इतना ही निकल पाया. दोनों कुछ पल तक बस एकदूसरे को देखते रहे, जैसे सालों की दूरी उन की आंखों के रास्ते पिघल रही हो.

‘‘तुम बदल गए हो,’’ नैना ने धीमे से कहा. अर्जुन हलका सा मुसकराया, ‘‘तुम नहीं बदली.’’

‘‘बदली हूं,’’ नैना ने धीरे से कहा, ‘‘पहले थोड़ा कम रोती थी.’’ दोनों हलका सा हंसे, लेकिन उस हंसी में भी दर्द था. कुछ देर दोनों चुप रहे. फिर अर्जुन ने हिम्मत जुटाई, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘ठीक हूं.’’ नैना ने वही पुराना जवाब दिया. अर्जुन ने सिर हिलाया, ‘‘झूठ बोल रही हो.’’

नैना ने उस की आंखों में देखा, ‘‘तुम भी.’’ दोनों फिर मुसकरा दिए. एक ऐसी मुसकान, जो केवल वही समझ  सकते थे.

अर्जुन ने धीरे से पूछा, ‘‘शादी?’’ नैना ने उस की बात पूरी होने से पहले ही सिर हिला दिया, ‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ अर्जुन की आवाज में हलकी सी उम्मीद थी.

नैना ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि मैं ने किसी और को उस जगह बैठाने की कोशिश ही नहीं की, वह जगह अब भी तुम्हारी है.’’

अर्जुन की आंखें भर आईं, ‘‘मैं ने भी नहीं,’’ उस ने धीरे से कहा. नैना ने उस की ओर देखा, ‘‘क्यों?’’

अर्जुन ने हलकी सी मुसकान दी, ‘‘क्योंकि मुझे  कभी लगा ही नहीं कि तुम गई हो.’’

यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले. वह कुछ पल तक कुछ नहीं बोल पाई, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर हम इतने साल अलग क्यों रहे?’’

यह सवाल बहुत गहरा था. अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, ‘‘शायद क्योंकि हमें समझना था कि प्यार केवल साथ रहने का नाम नहीं है. प्यार किसी के बिना भी उसे महसूस करने का नाम है.’’

नैना ने सिर झुका लिया. ‘‘मैं ने हर दिन तुम्हें महसूस किया है. अब मेरे मांबाप नहीं रहे. मैं हूं और तुम्हारे बोल.’’

उस ने धीमे से कहा, ‘‘हर सुबह, हर शाम, हर रात.’’ अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया, ‘‘मैं ने भी.’’

दोनों के बीच की दूरी अब बहुत कम रह गई थी, लेकिन उन के दिलों की दूरी तो कभी थी ही नहीं. ट्रेन की सीटी फिर गूंजी. दोनों ने एकसाथ उस ओर देखा.

नैना ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘फिर से सफर?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा और कहा, ‘‘हां, लेकिन इस बार मैं अकेला नहीं जाऊंगा.’’

नैना चौंकी, ‘‘मतलब?’’ अर्जुन ने धीरे से उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘इस बार मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा, अगर तुम चलो तो.’’

नैना की सांसें तेज हो गईं, ‘‘इतने साल, इतने फासले, क्या सबकुछ फिर से शुरू हो सकता है?’’

अर्जुन ने उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘प्यार कभी खत्म नहीं हुआ.’’

‘‘तो फिर उसे फिर से शुरू करने की जरूरत ही क्या है?’’ नैना रो पड़ी. उस ने अर्जुन को कस कर पकड़ लिया, जैसे वह उसे फिर कभी खोना नहीं चाहती.

‘‘मैं थक गई हूं,’’ उस ने सिसकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बिना जीतेजीते.’’ अर्जुन ने उस के सिर पर हाथ रखा, ‘‘अब और नहीं. अब हम साथ चलेंगे.’’

ट्रेन खड़ी थी, लेकिन इस बार कोई जल्दी नहीं थी. इस बार कोई छूट नहीं रहा था.

नैना ने धीरे से कहा, ‘‘शायद कुछ सफर ऐसे होते हैं, जो अधूरे रह कर ही पूरे हो जाते हैं.’’

अर्जुन ने मुसकरा कर कहा, ‘‘और कुछ प्यार जो छूट कर भी कभी छूटते नहीं.’’

दोनों साथ खड़े थे, हाथों में हाथ लिए. इस बार, सफर शुरू हुआ था, लेकिन कोई पीछे नहीं छूटा था. छूटा था तो वह लिजलिजा सामाजिक ढांचा जिस ने 2 धड़कते दिलों को मिलने नहीं दिया था.

-डा. गोपालदास नायक

Romantic Story : हमेशा रंग लाती है कुरबानी

Romantic Story. इंटरनैट का दौर अभी शुरू ही हुआ था. चैटिंग के जरीए मेरी मुलाकात गडि़या के एंड्रूज कालेज की एक लड़की शुभा से हुई. उसी समय मेरी नौकरी साउदर्न एवेन्यू के एक मारुति शोरूम में सेल्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर लग चुकी थी. जिंदगी नईनई खुशियों से भर रही थी. एक तरफ कैरियर की शुरुआत, दूसरी तरफ शुभा जैसी दोस्त का साथ.

समय के साथ हमारी दोस्ती गहरी होती गई. तभी एक दिन शुभा ने बताया कि उस की सहेली नैना को मेरी मदद की जरूरत है. बिना ज्यादा सोचे मैं ने उस की मदद कर दी. शायद वहीं से मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया.

कुछ समय बाद नैना मुझ से मिलने गरियाहाट आई. एक कौफी शौप में हमारी पहली मुलाकात हुई. उस ने ‘थैंक यू’ कहा, लेकिन उस की आंखों में जो भाव थे, वे शब्दों से कहीं ज्यादा गहरे थे.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

बातचीत के दौरान नैना ने अपने संघर्षों के बारे में बताया.पिता के न रहने के बाद मां के साथ मामा के घर रहना, मां की सरकारी नौकरी से घर चलना और खुद के बड़े सपने.

नैना की सादगी, उस की आंखों का दर्द और उस के भीतर का जुनून, सबकुछ मुझे  छू गया. धीरेधीरे हमारी बातचीत बढ़ी और कब यह रिश्ता दोस्ती से आगे बढ़ गया, पता ही नहीं चला.

वक्त बीता, कालेज खत्म हुआ और नैना ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर में दाखिला लिया. मैं ने उसे अपनी मां से भी मिलवाया. लेकिन शायद यहीं से मेरी जिंदगी की सब से बड़ी भूल शुरू हुई. मैं अपने परिवार और अपने प्यार के बीच बैलेंस नहीं बना पाया.

नैना मीडिया में कैरियर बनाना चाहती थी. एक दिन मैं ने उसे एक बड़े मीडिया हाउस की वैकेंसी के बारे में बताया. उस ने आवेदन किया और उस की नौकरी लग गई. 6 महीने में उसे प्रमोशन भी मिला.

लेकिन इसी बीच नैना के घर में शादी की बात चलने लगी. एक दिन उस ने मुझ से कहा, ‘‘हमें अब शादी कर लेनी चाहिए.’’ मैं उसे समझाता रहा कि मैं घर वालों को मना लूंगा. मैं चाहता था कि हम सब साथ रहें, लेकिन हालात मेरे बस में नहीं थे.

एक दिन नैना ने कहा कि हम भाग कर शादी कर लें. मैं फिर भी परिवार को साथ रखने की जिद में अड़ा रहा. तभी मेरे दोस्त संजीव, जो जमशेदपुर में काम करता था, अचानक आया. उस ने कहा, ‘‘तुम दोनों यहां आ जाओ, नई जिंदगी शुरू करो.’’

इस बार हम ने फैसला कर लिया. हम ने शाम 5 बजे बसअड्डे पर मिलने का तय किया. मैं पहुंच गया लेकिन नैना नहीं आई. मैं ने फोन किया. कोई और उठा रहा था. उस ने कहा, ‘‘एक बस हादसा हुआ है आप तुरंत म्युनिसिपल अस्पताल पहुंचिए.’’ अस्पताल पहुंचा तो देखा कि नैना अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी. उस दिन के बाद मैं उस से कभी नहीं मिल पाया.

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

सरिता

 

समय बीतता गया. जिंदगी आगे बढ़ी. मुझे  सन्मार्ग हिंदी अखबार में नौकरी मिली, फिर आईएचएम कोलकाता में हिंदी अफसर बनने का मौका मिला. बाद में अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया और गूगल से जेआरएफ फंड भी मिला.

मेरा नाम इंडिया बुक औफ रिकौर्ड्स और वर्ल्ड रिकौर्ड्स यूनिवर्सिटी में दर्ज हुआ.

लेकिन यह सारी कामयाबियां अधूरी हैं, क्योंकि यह सब मैं उसे कभी बता नहीं पाया. अगर उसे पता होता तो शायद वह सब से ज्यादा खुश होती.

आज कई साल बीत चुके हैं. दाढ़ी में सफेदी आ गई है, लेकिन उस की यादें आज भी ताजा हैं. उस की मासूमियत, उस का भोलापन, उस की नाराजगी कुछ रिश्ते अधूरे रह कर भी जिंदगी भर पूरे लगते हैं. Romantic Story

लेखक : सप्तर्षि विश्वास

Hindi Story : दामाद

Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

Intercaste Love: मैं एक दलित लड़की से प्यार कर बैठा हूं

Intercaste Love: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 24 साल का लड़का हूं और झारखंड का रहने वाला हूं. हाल ही में मेरी मुलाकात एक बहुत ही सुंदर लड़की से हुई जिस ने मेरी ही कोचिंग जौइन की है. हम दोनों सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं. मैं पहली ही नजर में उस लड़की को अपना दिल दे बैठा हूं. वह लड़की पढ़ने में भी काफी होशियार है और उस के पीछे हमारे कोचिंग के सभी लड़के पागल हैं. मैं उस से बहुत प्यार करने लगा हूं और एक दिन मैं ने सोचा कि जो भी हो मैं उसे प्रोपोज कर ही दूंगा. जैसे ही मैं ने उस लड़की को प्रोपोज किया, तो उस लड़की ने सीधा मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा कि मैं दलित समाज की लड़की हूं. मुझे समझ नहीं आया कि उस ने ऐसा क्यों कहा. मैं जातपांत को नहीं मानता, फिर भी उस ने ऐसा क्यों कहा मुझे समझ नहीं आया. अब मेरी हिम्मत नहीं हो रही है उस से कुछ भी पूछने की, तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

आप की बातों से साफ पता चल रहा है कि आप को जिस लड़की से प्यार हुआ है वह काफी स्ट्रेट फौर्वर्ड लड़की है और कुछ छिपाना नहीं चाहती. वह लड़की अपने बारे में पहले से ही सब क्लियर कर देना चाहती है, क्योंकि अकसर ऐसा होता है कि कुछ लोग प्यार तो कर बैठते हैं, लेकिन जब बात शादी की आती है, तो जातपांत का बहाना कर शादी से मुकर जाते हैं.

भले ही आप जातपांत को नहीं मानते हों, पर एक बार अपने घर वालों से बात कीजिए कि क्या वे एक दलित लड़की को अपने घर की बहू बनाने को तैयार होंगे. आज के समय में भी कई लोग ऐसे हैं जो जातपांत जैसी सोच रखते हैं. इसी वजह से शायद उस लड़की ने आप को पहले ही सब बता दिया.

अगर आप और आप के घर वालों को इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता है, तो आप को उस लड़की के पास जाना चाहिए और कहना चाहिए कि उस की जाति कोई भी हो, आप उसे बहुत प्यार करते हैं और हमेशा करते रहेंगे. आप दोनों की शादी में जातपांत जैसी समस्याएं नहीं आएंगी. ऐसा विश्वास दिलाने से हो सकता है कि वह लड़की आप के प्यार को स्वीकार कर ले. Intercaste Love

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें