एथलीट राम बाबू : मनरेगा मजदूर से मैडल तक का सफर

4 राज्यों झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरहदों से लगे हुए उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर बसा सोनभद्र का बहुअरा गांव इन दिनों सुर्खियों में है. वाराणसीशक्तिनगर हाईवे से लगा हुआ यह गांव सोनभद्रचंदौली का सरहदी गांव भी है.

कभी नक्सलियों की धमक से दहलने वाले चंदौली के नौगढ़ से लगा हुआ यह गांव नक्सलियों की आहट से सहमा हुआ करता था, लेकिन अब यह गांव दूसरी वजह से सुर्खियों में बना हुआ है.

सिर्फ एक ही नाम के चर्चे इन दिनों हरेक की जबान पर हैं. वह नाम कोई और नहीं, बल्कि एक साधारण से गरीब आदिवासी परिवार के नौजवान रामबाबू का है. इस साधारण से लड़के ने गरीबी और बेरोजगारी को पीछे छोड़ते हुए इन्हें ढाल न बना कर, बल्कि चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए इंटरनैशनल लैवल पर अपने कामयाबी के झंडे गाड़ते हुए उन लोगों  के लिए एक मिसाल पेश की है, जो चुनौतियों से घबरा कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाते हैं.

चीन के हांग शहर में हुए 19वें 35 किलोमीटर पैदल चाल इवैंट में कांसे का तमगा हासिल करने वाले 24 साल के रामबाबू ने गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई शुरू कर नवोदय विद्यालय में इंटर तक की तालीम हासिल करने के बाद इंटरनैशनल लैवल पर छाने के लिए हर उस चुनौती का सामना किया है, जो उन राह में रोड़ा बनी हुई थी.

रामबाबू के परिवार में पिता छोटेलाल उर्फ छोटू और माता मीना देवी हैं. 2 बड़ी बहनों किरन और पूजा की शादी हो चुकी है, जबकि छोटी बहन सुमन प्रयागराज में रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है.

रोजाना दौड़ने की आदत को अपनी दिनचर्या में शामिल करने के बाद रामबाबू का धावक बनने

का सफर शुरू हुआ था. सुबहशाम गांव की पगडंडियों, खाली पड़े खेतखलिहानों में दौड़ लगाने के साथसाथ वे मेहनत के कामों से जी नहीं चुराया करते थे. अपने मकसद को हासिल करने के लिए मेहनतमजदूरी से भी पैर पीछे नहीं हटाया.

इस तरह अति पिछड़े गांव से बाहर निकल कर नैशनल लैवल पर छा गए रामबाबू साल 2022 में गुजरात में हुए राष्ट्रीय पैदल चाल इवैंट में एक नए रिकौर्ड के साथसाथ गोल्ड मैडल हासिल करने में कामयाब हुए थे.

इस 35 किलोमीटर की दूरी की प्रतियोगिता को उन्होंने महज 2 घंटे, 36 मिनट और 34 सैकंड में पूरा कर अपने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए थे.

बताते चलें कि इस के पहले यह रिकौर्ड हरियाणा के मोहम्मद जुनैद के नाम था. रामबाबू ने मोहम्मद जुनैद को हरा कर ही गोल्ड मैडल जीता था.

इस के बाद 15 फरवरी, 2023 को रामबाबू ने झारखंड राज्य की राजधानी रांची में आयोजित राष्ट्रीय पैदल चाल गेम्स में अपना ही रिकौर्ड तोड़ते हुए

2 घंटे, 30 मिनट और 36 सैकंड का एक नया रिकौर्ड कायम किया था. इस के बाद 25 मार्च, 2023 को स्लोवाकिया में 2 घंटे, 29 मिनट और 56 सैकंड में यही दूरी तय करते हुए रामबाबू ने अपने नाम एक और रिकौर्ड किया था.

गुरबत में गुजरबसर कुछ समय पहले तक रामबाबू का घरपरिवार उन सभी बुनियादी सुविधाओं से महरूम था, जिन की उसे रोजाना जरूरत होती है. पीने का पानी लाने के लिए एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. आवास के नाम पर खपरैल और झोंपड़ी वाला मकान लाचार नजर आता है.

वह तो भला हो सोनभद्र के कलक्टर चंद्र विजय सिंह का, जिन्होंने राष्ट्रीय खेलों में गोल्ड मैडल हासिल करने वाले रामबाबू की कामयाबी के बाद उन के घर पहुंच कर पानी की समस्या को हल करने के लिए तत्काल हैंडपंप लगवाए जाने का निर्देश दिया था.

कलक्टर के निर्देश का असर ही कहा जाएगा कि रामबाबू के परिवार को पानी की समस्या से नजात मिल गई है. उन्होंने 10 बिस्वा जमीन भी पट्टा करने के साथसाथ आवास के लिए अलग से एक बिस्वा जमीन मुहैया कराई.

पर अफसोस यह है कि रामबाबू के परिवार को भले ही कहने के लिए कलक्टर ने आवास, खेतीकिसानी के लिए जमीन आवंटित कर दी है, लेकिन देखा जाए तो यह रामबाबू के परिवार के लिए बेकार है. वजह, जो जमीन मिली है, वह भी डूब क्षेत्र में 10 बिस्वा मिली है.

बहुअरा बंगाल में एक बिस्वा जमीन आवास के लिए मिली है. यह जमीन मार्च, 2023 में मिली थी. लेकिन लेखपाल और प्रधान ने मनमानी करते हुए बाद में दूसरी जगह नाप दी है, जहां से 11,000 पावर की टावर लाइन गुजरती है, जबकि बगल में ही ग्राम समाज की जमीन खाली पड़ी हुई है. वहां जमीन न दे कर कलक्टर के आदेश को भी एक तरह से दरकिनार करते हुए मनमानी की गई है.

दबंगों का खौफ रामबाबू का जो घर है, वह अब जर्जर हो चुका है. उन के परिवार वाले बताते हैं कि वे लोग 35 सालों से गांव में रहते आ रहे हैं. गांव के ही एक आदमी को 10 बिस्वा का पैसा आज से 25 साल पहले दिया था, इस के बावजूद वह न जमीन दे रहा है, न ही पैसा वापस कर रहा है, बल्कि दबंग लोग कच्चे घर के खपरैल को भी तोड़ देते हैं.

कई बार शिकायत करने के बाद भी अभी तक कोई सुनवाई नहीं हो पाई है, जिस से सर्दी, बरसात के थपेड़ों को सहते हुए जंगली जीवजंतुओं के डर के बीच रहने को मजबूर होना पड़ रहा है.

रामबाबू के घर तक सड़क, खड़ंजा नाली की कमी बनी हुई है. हलकी बारिश में भी पानी भरने के साथ कीचड़ में चलना दूभर हो जाता है, जबकि लिंक मार्ग से रामबाबू का घर लगा हुआ है. अगर 50 मीटर तक खड़ंजा बिछा दिया जाए, तो कीचड़ से राहत मिल जाए, लेकिन इस के लिए न तो प्रधान ने पहल की और न ही किसी और जनप्रतिनिधि ने.

वेटर और मनरेगा मजदूर

भारत में लौकडाउन के दौरान जब समूचा मजदूर तबका हलकान और परेशान हो उठा था, उस दौर में भी रामबाबू ने हिम्मत नहीं हारी थी. साल 2020 में जब वे भोपाल में प्रैक्टिस कर रहे थे, तब लौकडाउन  के दौरान वे गांव लौट आए थे. वहां मातापिता के साथ मिल कर मनरेगा के तहत मजदूरी किया करते थे. इस के पहले वे वाराणसी में एक होटल में वेटर का भी काम कर चुके हैं.

रामबाबू भारतीय सेना में हवलदार हैं. उन का अगला टारगेट पैरिस ओलिंपिक, 2024 में तमगा हासिल करना है.

फल बेचने वाले की बेटी चमकी

सोनभद्र के रामबाबू के साथ ही जौनपुर जिले के रामपुर विकास खंड क्षेत्र के अंतर्गत सुलतानपुर गांव की रहने वाली ऐश्वर्या ने भी गोल्ड मैडल हासिल कर अपने जिले का मान बढ़ाया है.

हालांकि ऐश्वर्या और उन के मातापिता मुंबई में रहते हैं, फिर भी उन के गांव में उन की कामयाबी के चर्चे हर जबान पर होते रहे हैं.

ऐश्वर्या के पिता कैलाश मिश्रा मुंबई में रह कर फल बेचने का कारोबार करते हैं. उन की बेटी ऐश्वर्या ने चीन में एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीता है. ऐश्वर्या का जन्म व पढ़ाईलिखाई मुंबई में ही हुई है. उन के परिवार वाले बताते हैं कि इस की तैयारी ऐश्वर्या पिछले 11 साल से कर रही थीं.

देश के लिए ऐश्वर्या ने यह चौथा मैडल जीता है. सब से पहले वे थाईलैंड में पहला मैडल जीती थीं. ऐश्वर्या की जीत पर प्रधानमंत्री ने भी ट्वीट कर के बधाई दी थी.

दलबदल का खेल

दलबदल और क्रौस वोटिंग भी उसी तरह से गलत है, जिस तरह ‘महाभारत’ में शकुनि और समुद्र मंथन में देवताओं ने गलत किया था. इस के लिए बेईमानी सिखाने वाला जिम्मेदार होता है. दलबदल करने के लिए उकसाने वाला दलबदल करने वालों से ज्यादा कुसूरवार होता है.

जब भगवा चोले वाले दक्षिणापंथी इस काम को करते हैं, तो वे भेड़ के भेष में भेडि़ए लगते हैं. राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से ले कर हिमाचल प्रदेश तक जो हुआ, वह दलबदल की परिभाषा में भले ही पूरी तरह से फिट न हो, पर यह भ्रष्ट आचरण का उदाहरण है.

भारतीय राजनीति में दलबदल करने वालों को ‘आया राम गया राम’ के नाम से भी जाना जाता है. पहले यह कहावत ‘आया लाल गया लाल’ के नाम से मशहूर थी, फिर यह ‘आया राम गया राम’ में बदल गई. इस का मतलब राजनीतिक दलों में आने और जाने से होता है.

मजेदार बात यह है कि गया लाल नाम का एक विधायक था, जिस के नाम पर यह कहावत पड़ी थी. 55 साल के बाद आज भी यह कहावत पूरी तरह से हकीकत को दिखाती है.

बात साल 1967 की है. उस समय हरियाणा के हसनपुर निर्वाचन क्षेत्र, जिसे अब होडल के नाम से जाना जाता है, विधानसभा के सदस्य गया लाल ने एक आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था. इस के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

इस के बाद गया लाल ने एक पखवारे में 3 बार पार्टियां बदली थीं. पहले राजनीतिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संयुक्त मोरचे में दलबदल कर के, फिर वहां से वे वापस कांग्रेस में शामिल हो गए और फिर 9 घंटे के भीतर संयुक्त मोरचे में शामिल हो गए.

जब गया लाल ने संयुक्त मोरचा छोड़ दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए, तो कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह, जिन्होंने गया लाल के कांग्रेस में दलबदल की योजना बनाई थी, चंडीगढ़ में एक  सम्मेलन में गया लाल को लाए और घोषणा की थी कि ‘गया लाल अब आया लाल’ हो गए हैं. इस से राजनीतिक दलबदल का खेल शुरू हो गया था. उस के बाद हरियाणा विधानसभा भंग हो गई और राष्ट्रपति शासन लगाया गया.

साल 1967 के बाद भी गया लाल लगातार राजनीतिक दल बदलते रहे. साल 1972 में वे अखिल भारतीय आर्य सभा के साथ हरियाणा में विधानसभा चुनाव लड़े. साल 1974 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में भारतीय लोक दल में शामिल हुए. साल 1977 में लोकदल के जनता पार्टी में विलय के बाद जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सीट जीती.

गया लाल के बेटे उदय भान भी दलबदल करते रहे. साल 1987 में आजाद उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव जीता. साल 1991 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव हार गए. साल 1996 में आजाद उम्मीदवार के रूप में हार गए. साल 2000 में चुनाव जीतने के बाद इंडियन नैशनल लोकदल में शामिल हो गए. साल 2004 में दलबदल विरोधी कानून के तहत आरोपों का सामना करना पड़ा. इस के बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए. साल 2005 में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की.

हरियाणा रहा दलबदल का जनक

राजनीति का असर समाज और घरपरिवार पर भी पड़ता है. बाद में यह कहावत बहुत मशहूर हो गई. अपने वादों और दावों से बदलने वालों को ‘आया राम, गया राम’ के नाम से पहचाना जा सका. राजनीति की नजर से देखें, तो हरियाणा इस का केंद्र रहा है.

साल 1980 में भजनलाल जनता पार्टी छोड़ कर 37 विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे और बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने. साल 1990 में उस समय भजनलाल की ही हरियाणा में सरकार थी.

भाजपा के केएल शर्मा कांग्रेस में शामिल हो गए थे. उस के बाद हरियाणा विकास पार्टी के 4 विधायक धर्मपाल सांगवान, लहरी सिंह, पीर चंद और अमर सिंह धानक भी कांग्रेस में शामिल हो गए.

साल 1996 में हरियाणा विकास पार्टी और बीजेपी गठबंधन ने सरकार बनाई. बाद में हरियाणा विकास पार्टी के 22 विधायकों के पार्टी छोड़ने की वजह से बंसीलाल को इस्तीफा देना पड़ा. हरियाणा विकास पार्टी के 22 विधायक इनेलो में शामिल हो गए थे. उस के बाद भाजपा की मदद से ओम प्रकाश चौटाला ने राज्य में सरकार बनाई थी.

साल 2009 के चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. कांग्रेस और इंडियन नैशनल लोक दल दोनों सरकार बनाने की कोशिश कर रही थीं. उस समय हरियाणा जनहित कांग्रेस के

5 विधायक सतपाल सांगवान, विनोद भयाना, राव नरेंद्र सिंह, जिले राम शर्मा और धर्म सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

दूसरे प्रदेश भी चले दलबदल की राह

‘आया राम गया राम’ की शुरुआत भले ही हरियाणा से हुई हो, पर दलबदल की जलेबी हर दल को पसंद आने लगी. इस की मिठास में सभी सराबोर हो गए. साल 1995 के बाद से उत्तर प्रदेश में यह दौर तेज हुआ. पहली बार बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं.

साल 1996 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला. पहले 6 महीने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा रहा. इस के बाद भाजपा और बसपा ने 6-6 महीने का फार्मूला तय किया, जिस के तहत पहले 6 महीने बसपा की मायावती को मुख्यमंत्री बनना था, उस के बाद भाजपा का नंबर आता.

दूसरी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने अपनी 6 महीने सरकार चलाई. जब सत्ता भाजपा को सौंपने का नंबर आया, तो मायावती ने राज्यपाल से विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी. राज्यपाल रोमेश भंडारी कोई फैसला लें, इस के पहले भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले कर सरकार गिरा दी.

अब सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया कांग्रेस के नेता जगदंबिका पाल ने. राज्यपाल ने जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया. इस के खिलाफ भाजपा हाईकोर्ट गई. तब कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बना कर बहुमत साबित करने का आदेश दिया गया. कोर्ट ने जगदंबिका पाल के मुख्यमंत्री बनाने के फैसले को रद्द कर दिया.

कल्याण सिंह और भाजपा ने बहुमत साबित करने के लिए बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को तोड़ दिया. दलबदल कानून से बचने के लिए पार्टी टूट कर नई पार्टी बनी. विधासभा अध्यक्ष ने नई पार्टी को मंजूरी दी. बसपा से टूटी बहुजन समाज दल और कांग्रेस से अलग हुई लोकतांत्रिक कांग्रेस ने भाजपा को समर्थन दिया और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. 4 साल के कार्यकाल में भाजपा ने पहले कल्याण सिंह, इस के बाद राम प्रकाश गुप्ता और आखिर में राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने.

साल 2003 में भी पहले बसपा और भाजपा का 6-6 महीने का फार्मूला बना, फिर वही कहानी दोहराई गई. इस बार भाजपा ने सरकार नहीं बनाई. लोकदल और भाजपा से अलग हुए कल्याण सिंह की पार्टी ने मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया और सरकार बनाई.

कश्मीर में साल 2016 में पीपल्स डैमोक्रेटिक पार्टी के 43 में से 33 विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे. पहले कांग्रेस विधायक पीपल्स पार्टी में चले गए थे और बाद में भाजपा में चले गए थे. साल 2018 में गोवा में कांग्रेस के 2 विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे.

मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता और कांग्रेस से सांसद व केंद्रीय मंत्री रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से अपना 18 साल पुराना नाता तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया. कांग्रेस की सरकार गिर गई. बिहार में भी ‘आया राम गया राम’ का खेल चलता रहा. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दलबदल हुआ.

काम नहीं आया दलबदल विरोधी कानून

साल 1985 में केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने दलबदल रोकने के लिए ‘दलबदल विरोधी कानून’ बनाया. राजीव गांधी सरकार द्वारा भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में इस को शामिल किया गया था.

इस दलबदल विरोधी अधिनियम को संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू किया गया, जो सदन के किसी अन्य सदस्य की याचिका के आधार पर दलबदल के तहत विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए विधायिका के पीठासीन अधिकारी (विधानसभा अध्यक्ष) को अधिकार देता है. दलबदल तभी मान्य होता है, जब पार्टी के कम से कम दोतिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों. राज्यसभा के चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार से अलग किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट दिया जाए, तो विधायक की सदस्यता खुद से नहीं जाती है. यहां केवल पार्टी के चुनाव अधिकारी को वोट दिखाना होता है कि किस को वोट कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए वोट करते समय पार्टी विधायकों ने सपा नेता शिवपाल यादव को अपना वोट दिखा दिया था. इस से यह साफ हो गया कि सपा के किन विधायकों ने वोट दिया. इन की सदस्यता खुद ही नहीं जाएगी. अब समाजवादी पार्टी विधानसभा अध्यक्ष से अपील करेगी. विधानसभा अध्यक्ष पूरा मामला मुकदमे की तरह से सुनेंगे. फिर जैसा वे फैसला देंगे, वह माना जाएगा.

विधानसभा के अंदर किसी भी मामले में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका खास होती है. उस के फैसले पर आमतौर पर कोर्ट भी कोई बचाव नहीं करता है.

अंतरात्मा नहीं, लालच है यह दलबदल आज की समस्या नहीं है. यह हमेशा से रही है. दलबदल कानून बनने के बाद भी इस को रोका नहीं जा सका है. यह अंतरात्मा की आवाज पर नहीं, लालच और बेईमानी की वजह से किया जाता है. जिस तरह से ‘महाभारत’ में शकुनि ने पांडवों के खिलाफ काम किया, लाक्षागृह, पांडवों को जुए में धोखे से हराना जैसे बहुत से काम किए. पांडवों का साथ दे रहे कृष्ण ने बात तो धर्मयुद्ध की की, पर कर्ण, अश्वत्थामा जैसों को मारने के लिए अधर्म का सहारा लिया.

पौराणिक कथाओं में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जहां अपनी जीत के लिए साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लिया गया. समुद्र मंथन भी इस का एक उदाहरण है, जिस में अमृत पीने के लिए देवताओं ने दानवों को धोखा दिया.

यहां इन घटनाओं से तुलना इसलिए जरूरी है, क्योंकि दक्षिणापंथी लोग खुद को बहुत पाकसाफ कहते हैं. भारतीय जनता पार्टी खुद को ‘पार्टी विद डिफरैंस’ कहती थी. उस का दावा था कि वह ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ सामने रख कर काम करती है.

अगर दलबदल की घटनाओं को देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि भाजपा जीत के लिए दलबदल खूब कराती है. राज्यसभा चुनाव में हार के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, ‘भाजपा जीत के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है. विधायकों को तमाम तरह के लालच दे सकती है. कुछ पाने की चाह में विधायक भटक जाते हैं.’

दरअसल, यह राजनीतिक भ्रष्टाचार का हिस्सा है. यह जनता को धोखा देने के समान है. कोई विधायक एक दल से चुनाव लड़ता है. उस दल की विचारधारा और उस के वोटर से वोट ले कर जीतता है. बाद में वह दल बदल कर दूसरे दल की खिलाफ विचारधारा से हाथ मिला लेता है. इस से उस को वोट दे कर चुनाव जिताने वाली जनता खुद को ठगा सा महसूस करती है.

यह काम भगवाधारी करते हैं, तो खड़ग सिंह और बाबा भारती की कहानी याद आती है, जिस में डाकू खड़ग सिंह ने भेष बदल कर बाबा भारती को धोखा देते हुए उन का घोड़ा छीन लिया था.

क्रिकेट : आईपीएल में भोजपुरी कमैंट्री खास या बकवास

इस बार के इंडियन प्रीमियर लीग में कुछ नए नियमों के साथ टीमें मैदान उतरी थीं और वे नियम बड़े फायदे के साबित हुए. इसी तरह इस बार कई नई भाषाओं में कमैंट्री सुनने को मिली, जिन में से भोजपुरी का अंदाज सब से ज्यादा लुभाने वाला महसूस हुआ.

ठीक उसी तरह जैसे हिंदी फिल्म ‘गुलामी’ के एक गाने के कुछ बोल भले ही समझ नहीं आए थे, पर शब्बीर कुमार और लता मंगेशकर की मीठी आवाज ने उसे यादगार बना दिया था.

अमीर खुसरो की एक कविता से प्रेरणा पा कर गीतकार गुलजार के लिखे इस गीत के बोल थे :

‘जिहाल ए मिस्कीं मकुन ब रंजिश

ब हाल ए हिज्रा बेचारा दिल है,

सुनाई देती है जिस की धड़कन

हमारा दिल या तुम्हारा दिल है…’

कुछ इसी तरह का मजा इस बार की आईपीएल भोजपुरी कमैंट्री को सुन कर तब मिला, जब सौरभ उर्फ रौबिन सिंह के साथ गोरखपुर के सांसद व भोजपुरी के सुपरस्टार रविकिशन, कैमूर के शिवम सिंह, देवरिया के गुलाम अली, झारखंड के सत्य प्रकाश कृष्णा और वाराणसी के मोहम्मद सैफ कमैंट्री करते दिखे.

याद रहे कि आईपीएल में हिंदी, इंगलिश, भोजपुरी भाषा के अलावा जिन भाषाओं में कमैंट्री हो रही है, उन में मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, गुजराती और बंगाली भाषाएं शामिल हैं.

देश में तकरीबन 25 करोड़ लोग भोजपुरी भाषा सुनते, बोलते और समझते हैं. जब रविकिशन ने अपने ही अंदाज में आईपीएल में कमैंट्री की, तो माहौल ही बन गया. एक बानगी देखिए:

बारबार धुआंधार प्रहार जारी बा. अद्भुत, अद्भुतम, अद्भुताय मैच बा हो. जे ऊहां पूरन बा, ऊ चूरन मार रहल बा. एकदम चौंचक बैटिंग होत बा… ई बैट नाहीं, लाठी ह. ऊ मरलें धौनी छक्का. अइसन छक्का मरलें कि गेना गोपालगंज से होत गंगा पार, गोरखपुर के गल्ली से निकल कर आरा पहुंच गईल…’

रविकिशन के बाद भोजपुरी सुपरस्टार दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ और भोजपुरी हीरोइन आम्रपाली दुबे ने कमैंट्री का माइक संभाला.

इस दौरान दिनेशलाल यादव से पूछा गया कि अगर लगातार 3 विकेट गिरने पर ‘हैट्रिक’ कहते हैं, तो 4 विकेट गिरने पर क्या कहेंगे? इस पर दिनेशलाल यादव ने कहा कि अगर 3 विकेट गिरने पर ‘हैट्रिक’, तो 4 विकेट गिरने पर ‘चैट्रिक’ होगा. वहीं आम्रपाली दुबे से जब यही सवाल पूछा गया, तो उन्होंने पहले ‘चौट्रिक’ कहा, लेकिन फिर बाद में उन्होंने कहा कि ‘चैट्रिक’ ही कहेंगे.

भोजपुरी गायक व अभिनेता विवेक पांडेय ने इस नई शुरुआत पर कहा, ‘‘यह बहुत मजेदार है. भोजपुरी बड़ी मीठी और खांटी भाषा है. रविकिशन, मनोज तिवारी और दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ ने अपनी सुपरहिट फिल्मों से इस भाषा को जनजन तक पहुंचाया है. अब आईपीएल में भोजपुरी की कमैंट्री से यह भाषा उन लोगों तक भी पहुंचेगी, जो अब तक इस से अनजान हैं. मैं तो इस कमैंट्री का पूरा मजा ले रहा हूं.’’

ट्रोलिंग भी हुई

अगर भोजपुरी में कमैंट्री की तारीफ हुई, तो ट्रोलिंग भी खूब हुई. ‘यूपी में का बा’ वाली गायिका नेहा सिंह राठौर भोजपुरी कमैंट्री पर भड़कती नजर आईं.

नेहा सिंह राठौर बोलीं, ‘मैं ने भी जब भोजपुरी में कमैंट्री सुनी, मेरा एक घंटे तक दिमाग खराब रहा. इन की हिम्मत कैसे हुई… ये भोजपुरी को इस तरह से कैसे पेश कर सकते हैं. गर्दा उड़ा ए भाई साहब ई कैसन बालर है हो… ई तो जडि़या में मार देहलस. बैटवा में लागता कि तेल पिला के आइल बाड़े. छुआता और गेंद आरा तक उड़ जाता. ललचावा ताड़े, फिर घोलटाव ताड़े…

‘ई तो लालीपाप खिला के विकट लेले बाड़े, ए भइया हई का, ई नइका हथियार ह हो, हवाईजहाज शाट. कुछ भइल बा, गेंदा हवा में गइल बा. केहूके मुंह फोड़वा का.’

नेहा सिंह राठौर ने आगे कहा, ‘इस तरह के अजीबअजीब शब्द सुनने को मिल रहे हैं. पहले तो आप ने भोजपुरी गानों में यह सब किया, ‘लहंगा उठा दे रिमोट से’, ‘कुरती के टूटल बा पठानिया’, फिर उसी भाषा में जा कर आप आईपीएल में कमैंट्री कर रहे हो. मुझे तो बहुत दुख हुआ.

‘मैं उन लोगों से सवाल करना चाहती हूं,  जो भोजपुरी के हितैषी बनते हैं. कहां हैं वे लोग? सत्ता की चाटुकारिता से फुरसत नहीं मिल रही है आप को?

और भी तमाम लोगों ने इसे फूहड़ बताया, तो रविकिशन ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘लोग बहुत तारीफ कर रहे हैं. ज्यादातर सभी को बेहद पसंद आ रही है भोजपुरी कमैंट्री. मैं नैगेटिविटी को नहीं देखता. मैं ने न उन्हें कभी बढ़ावा दिया है और न ही ऐसे लोगों को पढ़ता या सुनता हूं.

‘कुछकुछ लोग तो होते ही नैगेटिव हैं. अब सूरज क्यों उगता है, उस से भी उन्हें परेशानी है. अब

ऐसे 3-4 लोगों के बारे में क्या ही

कहा जाए…’

 

क्रिकेट: वनडे को ले कर चिंता में सचिन

पाकिस्तान के दिग्गज स्पिन गेंदबाज रह चुके सकलैन मुश्ताक ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा था कि विराट कोहली किसी भी लिहाज से सचिन तेंदुलकर के बराबर नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने वसीम अकरम और शेन वार्न जैसे चालाक गेंदबाजों का कभी सामना नहीं किया है.अब सकलैन मुश्ताक के वही चहेते बल्लेबाज ‘मास्टरब्लास्टर’ सचिन तेंदुलकर, जो क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद इस खेल से उचित दूरी बना कर ही रखते हैं, ने वनडे क्रिकेट के भविष्य पर खुल कर अपनी राय दी.

सचिन तेंदुलकर ने वनडे मैचों के वजूद पर चिंता जताई और कहा कि 2 नई गेंदों का इस्तेमाल और फील्डिंग प्रतिबंध वनडे क्रिकेट को मुश्किल बना रहे हैं और इस तरह बल्ले और गेंद के बीच संतुलन बिगड़ रहा है. दिल्ली में ‘इंडिया टुडे कौन्क्लेव’ के एक सैशन के दौरान दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने कहा, ‘यह (वनडे) बिना किसी शक के बोरिंग हो रहा है. इस के 2 पार्ट हैं. एक मौजूदा फौर्मेट है और दूसरा वह है, जो मुझे लगता है कि इसे अपनाना चाहिए. ‘50 ओवरों के खेल में 2 नई गेंदें होती हैं.

जब आप के पास 2 नई गेंदें होती हैं, तो यह बात रिवर्स स्विंग को खत्म कर देती है. भले ही हम खेल के 40वें ओवर में हों, लेकिन यह असल में उस गेंद से 20वां ओवर होता है.’सचिन तेंदुलकर ने फील्डिंग प्रतिबंध के सिलसिले में भी बताया, ‘मैं ने कुछ स्पिनरों से बात की है. मैं घेरे में 5 फील्डरों के रहने को ले कर उन की मानसिकता को समझने की कोशिश कर रहा था. गेंदबाज कह रहे हैं कि उन्हें अपनी लैंथ और लाइन बदलने की आजादी नहीं है. बल्लेबाज के गलती करने की उम्मीद रहती है, लेकिन वे अपनी लाइन में बदलाव करते हैं, तो भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

मौजूदा फौर्मेट में उन के पास अभी सुरक्षा नहीं है. मौजूदा फौर्मेट गेंदबाजों पर भारी है. घेरे के अंदर 5 फील्डर और 2 नई गेंदों के साथ यह चुनौती से भरा है.’सचिन तेंदुलकर की यह चिंता जायज है, क्योंकि पिछले कई सालों में क्रिकेट में सिर्फ बल्लेबाज ही हावी दिखाई देते हैं. ट्वैंटी20 फौर्मेट के कामयाब हो जाने के बाद से अब वनडे भी बड़ा और उबाऊ लगने लगा है, क्योंकि वहां गेंदबाज पर सीमित दायरों में रह कर गेंदबाजी करने का प्रैशर होता है.

चूंकि दिनरात वाले मैचों में मैदान पर ओस पड़ने का भी चक्कर रहता है, तो गेंदबाजों को गेंद फेंकने, ग्रिप बनाने में दिक्कतें आती हैं और वे अपनी कला को पूरी तरह से दर्शकों को नहीं दिखा पाते हैं.इस समस्या का हल निकालने के लिए सचिन तेंदुलकर का कहना है कि आप 50 ओवर की पारी को 2 भागों में बांट दीजिए यानी जो टीम पहले बल्लेबाजी करती है, वह 25 ओवर तक बल्लेबाजी करेगी. फिर दूसरी टीम की बैटिंग आएगी और वह अपने हिस्से के 25 ओवर खेलेगी.

यहां टैस्ट क्रिकेट की तरह ही लीड लेने और पारी में पीछे रहने वाला गेम होगा. फिर पहली टीम की दूसरी पारी होगी और आखिर में टीम को लक्ष्य का पीछा करना होगा.सुनने में तो यह आइडिया रोमांचक लगता है, पर क्या क्रिकेट के नियमकानून बनाने वाले सचिन तेंदुलकर की इस सलाह पर गौर करेंगे?

खेल: डोपिंग का खेल, खिलाड़ी हुए फेल

गुजरात में 29 सितंबर, 2022 से 12 अक्तूबर, 2022 तक 36वें नैशनल गेम्स हुए थे. इन में 36 खेलों में तकरीबन 15,000 खिलाडि़यों ने हिस्सा लिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे खेल उत्सव की तरह मनाने को कहा था.

ऐसा हुआ भी, पर उसी दौरान नैशनल एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) की ओर से खिलाडि़यों की सैंपलिंग की गई थी. फिर आए कुछ चौंकाने वाले नतीजे, जिन्होंने खेल और खिलाडि़यों को शर्मसार कर दिया.

दरअसल, नैशनल डोप टैस्ट लैबोरेटरी की टैस्टिंग में 2 वेटलिफ्टर, 2 बार की कौमनवैल्थ गेम्स की गोल्ड मैडलिस्ट संजीता चानू, चंडीगढ़ की वीरजीत कौर डोप टैस्ट में फंस गई थीं. इन दोनों ने गुजरात में हुए नैशनल गेम्स में सिल्वर मैडल जीते थे.

इस के अलावा कुश्ती में 97 किलो में गोल्ड मैडल जीतने वाले हरियाणा के दीपांशु और सिल्वर मैडल जीतने वाले रवि राजपाल स्टेरौयड मिथेंडियोनौन के सेवन के लिए, 100 मीटर में कांसे का तमगा जीतने वाली महाराष्ट्र की डियांड्रा स्टेरौयड स्टेनोजोलौल के सेवन के लिए, लौन बौउल में सिंगल का सिल्वर मैडल जीतने वाले पश्चिम बंगाल के सोमेन बनर्जी डाइयूरेटिक्स, एपलेरेनौन के सेवन के लिए और फुटबाल का कांसे का मैडल जीतने वाली केरल की टीम के सदस्य विकनेश बीटा-2 एगोनिस्ट टरब्यूटालाइन के सेवन लिए पौजिटिव पाए गए थे.

मैडल जीतने वाले 7 विजेताओं के अलावा साइकिलिस्ट रुबेलप्रीत सिंह, जुडोका नवरूप कौर और वूशु खिलाड़ी हर्षित नामदेव भी डोप टैस्ट में फंसे थे. इन 10 में से 8 खिलाडि़यों पर टैंपरेरी बैन लगा दिया गया.

विकनेश और सोमेन बनर्जी पर टैंपरेरी बैन नहीं लगा. उन के नमूने में वाडा की स्पैसीफाइड सूची में शामिल स्टीमुलैंट और बीटा-2 एगोनिस्ट पाए गए थे.

इन सब खिलाडि़यों में सब से ज्यादा चौंकाने वाला नाम दीपा करमाकर था, जिन पर 21 महीने का बैन लगाया गया. दीपा करमाकर को बैन की गई दवा हाइजेनामाइन लेने का दोषी पाया गया.

इंटरनैशनल टैस्टिंग एजेंसी ने अपने बयान में कहा कि दीपा करमाकर के नमूने 11 अक्तूबर, 2022 को लिए गए थे और उन पर यह बैन 10 जुलाई, 2023 तक जारी रहेगा.

दीपा करमाकर भारत की ऐसी पहली जिम्नास्ट थीं, जिन्होंने साल 2016 में रियो ओलिंपिक गेम्स में चौथा स्थान हासिल किया था. इस से पहले उन्होंने साल 2014 के ग्लास्गो कौमनवैल्थ गेम्स में कांसे का तमगा जीता था. ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट थीं.

दीपा करमाकर ने एशियन जिम्नास्टिक चैंपियनशिप में भी कांसे का तमगा जीता था और साल 2015 की वर्ल्ड आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक चैंपियनशिप में 5वां स्थान हासिल किया था.

क्या बला है डोपिंग

ऐसा माना जाता है कि साल 1968 में मैक्सिको में हुए ओलिंपिक गेम्स में पहली बार डोप टैस्ट हुए थे, लेकिन इंटरनैशनल एथलैटिक्स फैडरेशन पहली ऐसी संस्था थी, जिस ने साल 1928 में डोपिंग को ले कर नियम बनाए थे.

इसी तरह साल 1966 में इंटरनैशनल ओलिंपिक काउंसिल ने डोपिंग को ले कर एक मैडिकल काउंसिल बनाई थी, जिस का काम डोप टैस्ट करना था.

डोपिंग में आने वाली दवाओं को 5 अलगअलग कैटेगरी में बांटा गया है, जैसे स्टेरौयड, पैप्टाइड हार्मोन, नार्कोटिक्स, डाइयूरेटिक्स और ब्लड डोपिंग.

स्टेरौयड हमारे शरीर में पहले से ही मौजूद होता है, जैसे टैस्टेस्टेरौन. खिलाड़ी अपने शरीर में मांसपेशियां बढ़ाने के लिए स्टेरौयड के इंजैक्शन लेते हैं, जो शरीर में मांसपेशियां बढ़ा देता है.

पैप्टाइड हार्मोन भी शरीर में मौजूद होते हैं. इंसुलिन नाम का हार्मोन डायबिटीज के मरीजों के लिए जरूरी हार्मोन है, लेकिन किसी सेहतमंद इनसान को इंसुलिन दिया जाए तो इस से शरीर से फैट घटने लगता है और मसल्स बनती हैं.

ब्लड डोपिंग में खिलाड़ी कम उम्र के लोगों का ब्लड खुद को चढ़ाते हैं. वजह, कम उम्र के लोगों के ब्लड में रैड ब्लड सैल्स ज्यादा होते हैं, जो ज्यादा औक्सिजन खींच कर ताकत देते हैं.

खेल के दौरान दर्द का अहसास होने पर अकसर खिलाड़ी नार्कोटिक्स जैसी दर्दनाशक दवाएं लेते

हैं, जो उन्हें तुरंत राहत देती हैं.

डाइयूरेटिक्स शरीर से पानी को बाहर निकाल देता है. इसे जल्दी से जल्दी वजन कम करने वाले खिलाड़ी इस्तेमाल करते हैं, ताकि ज्यादा वजन के चलते वे गेम से ही न बाहर हो जाएं.

ऐसे होता है डोप टैस्ट

खेलों में बैन की गई दवाओं के चलन को रोकने के लिए 10 नवंबर, 1999 को स्विट्जरलैंड के लुसेन शहर में वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी (वाडा) बनाई गई थी. इस के बाद हर देश में नैशनल एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) बनाई जाने लगी थीं. इस में दोषी पाए जाने वाले खिलाडि़यों को 2 साल की सजा से ले कर जिंदगीभर के लिए बैन तक सजा दी जा सकती है.

ताकत बढ़ाने वाली दवाओं के इस्तेमाल को पकड़ने के लिए डोप टैस्ट किया जाता है. किसी भी खिलाड़ी का किसी भी वक्त डोप टैस्ट लिया जा सकता है. ऐसे टैस्ट नाडा या वाडा या फिर दोनों की ओर से किए जा सकते हैं. इस के लिए खिलाडि़यों के पेशाब के सैंपल लिए जाते हैं. नमूना एक बार ही लिया जाता है.

पहले चरण को ‘ए’ और दूसरे चरण को ‘बी’ कहते हैं. ‘ए’ पौजीटिव पाए जाने पर खिलाड़ी को बैन कर दिया जाता है. अगर खिलाड़ी चाहे तो एंटी डोपिंग पैनल से ‘बी’ टैस्ट सैंपल के लिए अपील कर सकता है. अगर खिलाड़ी ‘बी’ टैस्ट सैंपल में भी पौजिटिव आ जाए, तो उस पर बैन लगा दिया जाता है.

वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी हर साल खिलाडि़यों के लिए नए डोपिंग कोड बनाती है. इस डोपिंग कोड के मुताबिक, 500 से 600 तरह की दवाएं पूरी तरह से बैन हैं.

खिलाड़ी वाडा की वैबसाइट पर जा कर बैन की गई दवाओं वगैरह की लिस्ट देख सकते हैं. खिलाड़ी एंटी डोपिंग टीम से भी बैन की गई दवाओं की जानकारी ले सकते हैं.

अगर दवा खिलाड़ी के लिए बेहद जरूरी है, तो पहले उसे संबंधित स्पोर्ट्स डिपार्टमैंट या वाडा को इस की जानकारी देनी होगी, उस के बाद ही खिलाड़ी उस दवा का सेवन कर सकते हैं.

खेल का मैदान: कहीं जीता दिल, कहीं किया शर्मसार

शनिवार, 12 जून, 2021 को फुटबाल के ‘यूरो कप’ में अपने पहले मुकाबले में कमजोर फिनलैंड ने डैनमार्क को 1-0 से हरा दिया. पर इस फुटबाल मैच की जो सब से अहम घटना थी, वह डैनमार्क के शानदार खिलाड़ी क्रिश्चियन ऐरिक्सन से जुड़ी थी. दरअसल, मैच के हाफ टाइम से ठीक पहले वे मैदान में अचानक गिर कर बेहोश हो गए थे.

क्रिश्चियन ऐरिक्सन डैनमार्क के आक्रामक मिडफील्डर के तौर पर मशहूर हैं और उन्हें मैदान पर ऐसे पड़ा देख कर उन की टीम के सदस्य रोने लगे थे. डैनमार्क के फैन भी गमगीन थे.

यह हादसा देख कर अचानक खयाल आया कि 29 साल का इतना ज्यादा फिट इनसान देखतेदेखते कैसे उन हालात में जा सकता है कि उस के बचने की उम्मीद अचानक धुंधली पड़ती जाए? पर वहां मौजूद डाक्टरों की टीम ने कमाल का काम किया.

इसी बीच डैनमार्क के खिलाडि़यों ने घेरा बना कर जमीन पर पड़े ऐरिक्सन का मानो सुरक्षा कवच बना लिया था, हालांकि उन के चेहरे क्रिश्चियन ऐरिक्सन की विपरीत दिशा में थे.

डाक्टरों ने तो मानो अपना पूरा जोर लगा दिया था. उन्होंने क्रिश्चियन ऐरिक्सन की जोरजोर से छाती दबाई… और भी कई जरूरी तरीके अपनाए, पर डैनमार्क टीम के खिलाडि़यों के आंसू बता रहे थे कि हालात बेहद चिंताजनक हैं. लेकिन सब से अच्छी बात तो यह थी कि दर्शकों और मैदान पर जमा दूसरे लोगों ने घटनास्थल के पास कोई मजमा नहीं लगाया.

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वहां से थोड़ी दूर एक महिला भी मैदान पर थीं, जिन्हें डैनमार्क के कुछ खिलाड़ी दिलासा दे रहे थे. वे शायद क्रिश्चियन ऐरिक्सन की पत्नी थीं और रोए जा रही थीं. यह एक ऐसा सीन था, जिसे खेल के मैदान पर कोई नहीं  देखना चाहेगा.

उधर डाक्टरों की टीम अपने काम में जुटी हुई थी. चिकित्सा का पूरा ताम झाम डाक्टर ले आए थे, पर जब उन्हें लगा कि अब क्रिश्चियन ऐरिक्सन को अस्पताल ले जाना पड़ेगा, तो उन्होंने वही किया. तब तक क्रिश्चियन ऐरिक्सन बेहोश थे और मैडिकल इमर्जेंसी के चलते मैच को निलंबित कर दिया गया था.

काफी देर के बाद टूर्नामैंट के आयोजक यूईएफए ने जानकारी दी कि क्रिश्चियन ऐरिक्सन को होश आ गया है और उन की हालत फिलहाल ‘स्थिर’ है. यह खबर सुखद थी.

दोनों टीमों से बात कर के कुछ देर बाद मैच फिर से शुरू हुआ. पर तब तक शायद डैनमार्क के खिलाडि़यों की लय बिगड़ चुकी थी, जिस के चलते यह मैच फिनलैंड ने 1-0 से अपने नाम कर लिया.

मैच खत्म होने के बाद डैनमार्क की टीम के हैड कोच कैस्पर हेजुलमैन ने कहा, ‘‘यह टीम के लिए बेहद मुश्किल शाम थी, जब हम सभी को इस बात का अहसास हुआ कि जिंदगी में सब से अहम चीज रिश्ते हैं. हम ऐरिक्सन और उन के परिवार के साथ हैं.’’

यूईएफए के अध्यक्ष एलैक्जैंडर चैफरीन ने कहा, ‘‘इस तरह के वाकिए आप को एक बार फिर जिंदगी के बारे में सोचने का मौका देते हैं. इस तरह के वाकिए बताते हैं कि फुटबाल खेल के परिवार में कितनी एकता है. मैं ने सुना दोनों टीमों के फैंस ऐरिक्सन का नाम ले रहे थे. ऐरिक्सन बेहतरीन खिलाड़ी हैं और बेहतरीन फुटबाल खेलते हैं.

‘‘पर, मैं साथ में उन डाक्टरों की टीम की तारीफ भी करूंगा, जिस ने बिना देरी किए ऐरिक्सन को बचाने के लिए हर मुमकिन तरीका अपनाया और एक बेहतरीन खिलाड़ी को नई जिंदगी दी.’’

पर एक और टीम खेल क्रिकेट में हुई एक घटना ने क्रिकेट प्रेमियों को शर्मिंदा कर दिया. हुआ यों कि क्रिकेट की ढाका प्रीमियर लीग में शुक्रवार, 11 जून, 2021 को खेले गए एक ट्वैंटी20 मैच के दौरान बंगलादेशी खिलाड़ी शाकिब अल हसन अंपायर से भिड़ पड़े थे और गुस्से में स्टंप्स पर भी लात मारते हुए दिखाई दिए थे.

इस घटना के गवाह एक वीडियो  में दिखा कि शाकिब अल हसन ने  दूसरी टीम के बल्लेबाज मुशफिकुर रहीम के खिलाफ अपनी गेंदबाजी पर एलबीडब्ल्यू की अपील की और जब अंपायर ने नौटआउट करार दिया, तो उन्होंने पहले स्टंप्स पर लात मारी और फिर अंपायर से भी भिड़ गए.

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लेकिन बाद में शाकिब हल हसन को ही यह सब करना भारी पड़ गया. उन के खराब बरताव के लिए उन्हें ढाका प्रीमियर लीग में 4 मैचों के लिए बैन कर दिया गया और 4 लाख रुपए से ज्यादा का जुर्माना भी लगाया गया.

हालांकि, शाकिब अल हसन ने अपने इस बरताव के लिए माफी मांगते हुए सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘प्रिय फैंस और फौलोवर, मैं अपना आपा खोने और इस तरह से सभी से मैच को बरबाद करने के लिए माफी मांगता हूं, खासतौर पर उन लोगों से जो घर पर बैठ कर यह मुकाबला देख रहे थे.

‘मेरे जैसे एक अनुभवी खिलाड़ी को इस तरह का बरताव नहीं करना चाहिए, लेकिन कभीकभी दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से ऐसा हो जाता है. मैं टीमों से, मैनेजमैंट से, टूर्नामैंट के औफिशिल्स से और टूर्नामैंट के आयोजकों से इस भूल के लिए माफी मांगता हूं. उम्मीद है कि भविष्य में मैं इस तरह का बरताव फिर कभी नहीं करूंगा. धन्यवाद और सभी को प्यार.’

माना कि खेल के मैदान पर हारजीत के तनाव में खिलाड़ी आपा खो देते हैं, पर शाकिब अल हसन का गुस्सा होना और वह भी इस हद तक कि पहले विकेट पर लात दे मारी और फिर अंपायर पर ही चढ़ गए, कहीं से जायज नहीं था. उन का बाद में माफी मांगना यह साबित करता है कि उन की हरकत स्कूली क्रिकेट के किसी खिलाड़ी की तरह बचकानी थी, जो विकेट न मिलने पर ऐसा बरताव करे.

फुटबाल और क्रिकेट जैसे टीम खेल में अपने साथियों के साथसाथ विरोधी टीम के खिलाडि़यों और मैदान पर मौजूद अंपायर या रैफरी के साथ अच्छा बरताव करना बहुत जरूरी होता है.

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आपा खोया नहीं कि लेने के देने पड़ जाते हैं. अगर क्रिश्चियन ऐरिक्सन वाले मामले में डाक्टरों की टीम भी अपना आपा खो देती तो शायद वह एक उम्दा खिलाड़ी की जान नहीं बचा पाती, जो खेल जगत के लिए कभी न भर पाने वाला नुकसान होता.

दक्षिण अफ्रीका के खेल वैज्ञानिक श्यामल वल्लभजी कर रहे हैं प्रीति जिंटा की तारीफ, पढ़ें खबर

दक्षिण अफ्रीका के खेल वैज्ञानिक, सेलिब्रिटी कोच और ‘ब्रीथ बिलीव बैलेंस’ पुस्तक के लेखक श्यामल वल्लभजी (Shayamal Vallabhjee) इंडियन प्रीति जिंटा (Preity Zinta) की तारीफ करते हुए नहीं थक रहे हैं. मजेदार बात यह है कि वह प्रीति जिंटा (Preity Zinta) की तारीफ उस वक्त कर रहे हैं जबकि आईपीएल के क्रिकेट मैचों की शुरुआत हो चुकी है. वह यह भी मानते है कि इनके पास प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवन की योजना है तथा उनका सर्वश्रेष्ठ आना अभी बाकी है.

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जी हां! दक्षिण अफ्रीका के खेल वैज्ञानिक वल्लभजी (Shayamal Vallabhjee) ने कहते हैं “मुझे  प्रीति  जिंटा की कार्यशैली बहुत अच्छी लगी. मैंने उनकी टीम और उनकी ताकत जानने में उनके शोध की गहराई की प्रशंसा की है. मेरे लिए किंग्स इलेवन के साथ काम करना एक शानदार अनुभव था.

सहवाग, हॉज, गेल, अश्विन, वेंकटेश प्रसाद और अन्य से सीखना अविश्वसनीय था. उन्होंने मुझे खेल मनोविज्ञान में नए विचारों और दृष्टिकोण का परीक्षण करने का अवसर दिया.  मुझे लगता है कि एक मंच के रूप में आईपीएल में प्रदर्शन के मामले में वृद्धि की उल्लेखनीय क्षमता है. क्योंकि हमने अभी तक कुछ विज्ञानों की सतह को खरोंचने की शुरुआत नहीं की है. जो शिखर प्रदर्शन की ओर ले जाते हैं – नींद विश्लेषण, द्रव निगरानी, बायोमैकेनिक्स, उपकरण संशोधन, मनोविज्ञान जैसे विज्ञान, मांसपेशी शरीर क्रिया विज्ञान और अधिक.”

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डैरेन सैमी बोले मुझ से माफी मांगो

क्रिकेट बंद है, पर क्रिकेटर पूरी हलचल में हैं खासकर सोशल मीडिया पर. कोई विदेशी खिलाड़ी अपनी फैमिली के साथ ‘टिक-टौक’ पर हिंदी गानों पर ठुमके लगा कर वाहवाही लूट रहा है, तो कोई देशी खिलाड़ी अपनी प्रेमिका के बेबी बंप से सुर्खियां बटोर रहा है. घर में खाली बैठे हैं, तो एकदूसरे को कोई भी चैलेंज दे कर बहुत से क्रिकेट खिलाड़ी टाइमपास कर रहे हैं.

इस में कोई बुराई नहीं है, पर चूंकि दुनिया में कोरोना के साथसाथ और भी बहुतकुछ ऐसा हो रहा है, जिस ने दुनिया का तापमान बढ़ा दिया है, तो उस का असर अब क्रिकेटरों पर भी देखने को मिल रहा है.

अमेरिका में एक अश्वेत नागरिक जौर्ज फ्लायड की जिस निर्मम तरीके से पुलिस के हाथों मौत हुई थी, उस के बाद तो मानो दुनियाभर के अश्वेत लोगों के दिलों में वह दबी चिनगारी भड़क गई थी, जो काले रंग के चलते उन्हें गोरे लोगों से कमतर होने का एहसास कराती है.

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इस के बाद तो एक धमाका सा हुआ हुआ और पूरी दुनिया इस नस्लभेद की लड़ाई में अश्वेत लोगों के साथ खड़ी नजर आई. नतीजतन, कहीं पुलिस ने उन से सार्वजिक तौर पर  माफी मांगी, तो कहीं लोगों का गुस्सा इस कदर फूटा कि बड़ेबड़े नेता अपने बख्तरबंद बंकरों में जा छिपे.

इसी बीच क्रिकेट जगत से ऐसी खबर आई, जो हैरान कर देने वाली थी. वैस्टइंडीज क्रिकेट टीम के एक खिलाड़ी और कप्तान रह चुके डेरेन सैमी ने एक सनसनीखेज खुलासा किया कि साल 2014 के इंडियन प्रीमियर लीग में जब वे सनराइजर्स हैदराबाद टीम की तरफ से खेलते थे, तब ड्रैसिंग रूम में कुछ लोग उन्हें उस शब्द से पुकारते थे, जो अपमानजनक था.

डेरेन सैमी के इन आरोपों के बीच भारतीय क्रिकेटर ईशांत शर्मा का 14 मई, 2104 का एक पोस्ट वायरल है , जिस में उन्होंने डेरेन सैमी के लिए उन की त्वचा के रंग से जुड़ा एक शब्द लिखा था.

इस सिलसिले में डेरेन सैमी कहा कि उन्हें जिस शब्द से संबोधित किया गया था, तब उन्हें इस का मतलब नहीं पता था, लेकिन जब से पता चला है तो वे बड़े निराश हैं. दरअसल, डेरेन सैमी ने कहा कि तब उन्हें ‘कालू’ कह कर बुलाया जाता था, लेकिन अब उन्हें इस शब्द का मतलब पता चल गया है. यह शब्द नस्लीय भेदभाव का प्रतीक है और अपमानजनक है.

इस मसले पर डेरेन सैमी इस हद तक दुखी और गुस्साए लग रहे हैं कि उन्होंने लिखा, ‘जो भी मुझे उस नाम से बुलाता था, उसे खुद ही यह पता है. मुझ से संपर्क करो, बात करो. मैं उन सभी लोगों को मैसेज भेजूंगा. आप सब को खुद के बारे में पता है. मैं यह स्वीकार करता हूं कि उस समय मुझे इस शब्द का मतलब नहीं पता था.’

डेरेन सैमी यहीं पर नहीं रुके, बल्कि उन्होंने कहा कि वे सब खिलाड़ी उन से माफी मांगे, नहीं तो वे उन सब के नाम उजागर कर देंगे.

यह पहली बार नहीं हुआ है, जब क्रिकेट में खिलाड़ियों के बीच नस्लीय टिप्पणी की गई है. भारत के लिए क्रिकेट खेल चुके तेज गेंदबाज इरफान पठान ने भी हालिया कहा कि अलग धर्म या आस्था के चलते आप को किसी सोसाइटी में घर नहीं मिलता है तो यह भी एक तरह का नस्लवाद है.

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इसी तरह वैस्टइंडीज के ही धाकड़ बल्लेबाज क्रिस गेल ने इस नस्लीय भेदभाव पर अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा, ‘किसी और की तरह अश्वेत की जिंदगी के भी माने हैं… सभी नस्लवादी लोग, अश्वेत लोगों को बेवकूफ समझना बंद करो. यहां तक हमारे ही कुछ अश्वेत लोग भी दूसरों को ऐसा करने का मौका देते हैं. खुद को नीचा समझने का यह सिलसिला रोको. मैं ने दुनियाभर में यात्राएं की हैं और नस्लीय टिप्पणियों का अनुभव किया है, क्योंकि मैं अश्वेत हूं. मेरा भरोसा कीजिए, यह लिस्ट लंबी है.’

क्रिस गेल साफ कहते हैं कि नस्लवाद सिर्फ फुटबाल में ही नहीं है, बल्कि क्रिकेट में भी है.

वैस्टइंडीज के ही एक और खिलाड़ी ड्वेन ब्रावो ने आज के हालात और नस्लवाद पर कहा, ‘हम चाहते हैं कि हमारे भाई और बहन यह जानें कि हम ताकतवर और खूबसूरत हैं. आप दुनिया के कुछ महान लोगों पर गौर कीजिए, चाहे वे नेल्सन मंडेला हों, मोहम्मद अली या माइकल जोर्डन. हमारे पास ऐसा नेतृत्व रहा है जिन्होंने हमारे लिए मार्ग प्रशस्त किया.’

ड्वेन ब्रावो की बात में दम है कि उन जैसे लोग ताकतवर ही नहीं बहुत खूबसूरत भी हैं, तभी तो जब क्रिकेट के मैदान पर क्रिस गेल अपने बल्ले से छक्के पर छक्के जमाते हैं, तो हर रंग का उन का फैन दीवाना हो कर खूब तालियां बजाता है, उन का एक आटोग्राफ पाने को तरस जाता है.

क्रिकेट : बिना मैच खेले कैसे गंवाया भारत ने नंबर-1 का ताज

कोरोना वायरस महामारी की मार खेलों पर भी पड़ा है और चाहे क्रिकेट हो या फुटबौल, हौकी हो या बेसबौल या फिर कोई अन्य खेल, पूरी तरह बंद हैं. इस बीच खबर है कि आईसीसी क्रिकेट रैंकिंग के एक ताजा सर्वे में भारत बिना मैच खेले ही शीर्ष स्थान गंवा चुका है. यह ताज आस्ट्रेलिया ने भारत से छिन लिया है और वह शीर्ष स्थान पर पहुंच चुका है. भारत तीसरे स्थान पर खिसक गया है जबकि न्यूजीलैंड को दूसरा स्थान मिला है.

भारत 1 मई को आईसीसी टेस्ट क्रिकेट रैंकिंग में आस्ट्रेलिया से शीर्ष स्थान गंवा चुका है और अब तीसरे स्थान पर आ गया है. रैंकिंग में गिरावट इसलिए आई है क्योंकि 12 टेस्ट मैचों में भारत की जीत और 2016-2017 में सिर्फ 1 हार वार्षिक अद्यतन से समाप्त हो गई थी.

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नवीनतम अपडेट ने मई 2019 के बाद से खेले गए मैचों को 100% और पिछले 2 वर्षों के मैचों को 50% पर रेट किया है.

आईसीसी ने एक बयान जारी कर कहा,”भारत मोटे तौर पर सीढ़ी में गिरा क्योंकि 12 टेस्ट जीत और 2016-17 में सिर्फ 1 टेस्ट हार का रिकौर्ड हटा दिया गया था.”

कहां है विराट की टीम

कप्तान विराट कोहली की टीम उस अवधि के दौरान आस्ट्रेलिया और इंगलैंड के खिलाफ सभी 5 श्रृंखलाएं जीती थीं. दूसरी ओर आस्ट्रेलिया उसी अवधि में भारत के साथसाथ दक्षिण अफ्रीका से हार गया था.

नवीनतम अपडेट मई 2019 के बाद से खेले गए सभी मैचों को 100% और पिछले 2 सालों के 50% पर रेट करते हैं.

ऑस्ट्रेलिया न केवल टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंच गया, बल्कि पहली बार टी- 20 आईसीसी सूची में नंबर- 1 पर कब्जा कर लिया, जबकि इंगलैंड ने वार्षिक अद्यतन के बाद पुरुषों की वनडे रैंकिंग का नेतृत्व करना जारी रखा, जो 2016-17 के परिणामों को समाप्त करता है.

आस्ट्रेलिया के अब 116 अंक हैं और उस के बाद न्यूजीलैंड (115) और भारत (114) हैं.

केवल 2 अंकों के साथ उन्हें अलग करने के बाद यह शीर्ष 3 टीमों में से दूसरा निकटतम है, क्योंकि 2003 में टेस्ट रैंकिंग शुरू की गई थी.

दक्षिण अफ्रीका को 8 अंकों की सब से बड़ी रेटिंग में गिरावट का सामना करना पड़ा है, जो उन्हें श्रीलंका से छठे स्थान पर गिराता है.

उन्होंने इस अवधि में 3 सीरीज़ जीतीं, जबकि फरवरी 2019 के बाद श्रीलंका, भारत और इंगलैंड के खिलाफ खेलते हुए 9 में से 8 टेस्ट हारे.

वनडे टीम रैंकिंग में विश्व चैंपियन इंगलैंड (127) ने भारत पर अपनी बढ़त 6 से 8 अंक तक बढ़ा दी है.

भारत से 3 अंक पीछे न्यूजीलैंड तीसरे स्थान पर है. शीर्ष 10 रैंकिंग अपरिवर्तित बनी हुई हैं.

इस के विपरीत अद्यतन T20 टीम रैंकिंग में बहुत सारे बदलाव देखने को मिलते हैं. रैंकिंग पेश किए जाने के बाद पहली बार ऑस्ट्रेलिया (278) अंक के साथ शीर्ष पर है.

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पाकिस्तान जोकि जनवरी 2018 में शीर्ष स्थान पर पहुंचने के लिए न्यूजीलैंड से आगे निकल गया था और फिर वहां 27 महीने बिताए थे, अब 260 अंकों के साथ चौथे स्थान पर है.

इंगलैंड 268 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर आ गया है, जबकि भारत 1 तीसरे स्थान पर है यानी सिर्फ 2 अंक पीछे.

अफगानिस्तान 7वें से 10वें स्थान पर है.

यह भी जानिए

  • आस्ट्रेलिया ने टेस्ट रैंकिंग में एक शीर्ष स्थान हासिल किया और साथ ही पहली बार टी 20 सूची में नंबर 1 स्थान हासिल किया.
  • इंगलैंड ने वार्षिक अद्यतन के बाद पुरुषों की एकदिवसीय रैंकिंग में अपनी बढ़त जारी रखी जो 2016-2017 के परिणामों को समाप्त कर दिया.
  • टेस्ट रैंकिंग में आस्ट्रेलिया 116 अंकों के साथ न्यूजीलैंड 115 अंकों के साथ भारत और 114 अंकों के साथ शीर्ष पर है.
  • केवल 2 अंकों के अंतर के साथ यह दूसरा निकटतम है कि शीर्ष टीमों को 2003 में टेस्ट रैंकिंग जारी की गई थी.
  • शीर्ष 3 टीमें जनवरी 2016 में निकटतम थीं जब भारत आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका से 1 अंक से आगे चल रहा था
  • टेस्ट रैंकिंग में दक्षिण अफ्रीका को 8 अंकों की सब से बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा है और श्रीलंका के नीचे 6ठे स्थान पर छोड़ने का नेतृत्व किया.
  • दक्षिण अफ्रीका ने चयनित अवधि में 3 सीरीज़ जीती हैं और फरवरी 2019 के बाद से भारत, श्रीलंका और इंगलैंड के खिलाफ खेलते हुए 9 में से 8 टेस्ट हारे हैं.

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वनडे टीम रैंकिंग

  • वनडे टीम रैंकिंग में शीर्ष 10 रैंकिंग अपरिवर्तित रहे.
  • इंगलैंड ने वनडे टीम रैंकिंग में भारत पर अपनी बढ़त 6 से 8 अंक तक बढ़ा दी है.
  • न्यूजीलैंड अभी भी तीसरे स्थान पर है और भारत से 3 अंक पीछे है.

T20 टीम रैंकिंग

  • 278 अंक के साथ आस्ट्रेलिया पहली बार सूची में शीर्ष पर है.
  • पाकिस्तान जो जनवरी 2018 में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया था और न्यूजीलैंड से आगे निकल गया था, अब 260 अंकों के साथ चौथे स्थान पर आ गया है.
  • 268 अंकों के साथ इंगलैंड दूसरे स्थान पर आ गया है जबकि भारत 1 स्थान ऊपर तीसरे स्थान पर है, जो सिर्फ 2 अंक पीछे है.
  • अफगानिस्तान 7 वीं से 10वीं रैंकिंग में गिर गया है.

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पूजा ढांडा : कुश्ती की नई दबंग

1 जनवरी, 1994 को हरियाणा के हिसार जिले के एक गांव बुढ़ाना में जनमी पूजा ढांडा के पांव उन के एथलीट पिता अजमेर सिंह ने पालने में ही पहचान कर इस कहावत को गलत साबित कर दिया था कि सिर्फ पूत के पांव ही पालने में पहचाने जा सकते हैं.

बाद में इस बात को पूजा ढांडा ने भी सच साबित किया. उन्होंने पहले मिट्टी के अखाड़े में और बाद में मैट पर भी अपनी पहलवानी का ऐसा जलवा दिखाया कि दुनिया वाहवाह करने लगी. वे साल 2019 में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में हुए कुश्ती के ग्रांप्री इंटरनैशनल टूर्नामैंट में 57 किलोग्राम भारवर्ग में सिल्वर मैडल विजेता थीं. उन्होंने साल 2018 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में सिल्वर मैडल जीता था. इतना ही नहीं, उन्होंने साल 2018 में ही बुडापेस्ट में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रौंज मैडल हासिल किया था.

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अपनी इस कामयाबी का राज खोलते हुए पूजा ढांडा बताती हैं, ‘‘मुझे लड़कों के साथ कुश्ती की प्रैक्टिस करना अच्छा लगता है, क्योंकि उन में ज्यादा ताकत, दमखम और रफ्तार होती है, जिस से मुझे अपना खेल सुधारने में मदद मिलती है.’’

परिवार ने बढ़ाया हौसला

पूजा ढांडा बताती हैं, ‘‘मुझे शुरू से ही खेलों से लगाव रहा है. बचपन में मैं अपने पिता के साथ सुबह दौड़ने जाती थी. जब मैं कुश्ती खेलने लगी तो गांव में बहुत से लोगों ने मुझे ताने मारे थे. पिता को भी लगता था कि अगर मुझे ज्यादा गंभीर चोट लग गई, तो मेरी शादी करने में दिक्कतें आ सकती हैं.

‘‘सब से बड़ी समस्या तो यह है कि आज भी लड़कियों के लिए गांवदेहात में हालात ज्यादा सुधरे नहीं हैं. उन्हें अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी नहीं मिली है. उन्हें अगर परिवार का सहयोग मिल भी जाता है, तो समाज कई तरह के रोड़े अटका देता है, पर इन सब बातों से उठ कर ही कोई लड़की देशदुनिया में नाम कमा सकती है.

‘‘मुझे इस मुकाम तक लाने में मेरी मां कमलेश का बहुत बड़ा योगदान है. उन्होंने मुझे कभी अपने सपने पूरे करने से नहीं रोका. उन्होंने मेरी डाइट का खयाल रखा और दूसरी सभी चीजों का भी ध्यान रखा. खेलने के लिए जब कभी मुझे गांव या शहर से बाहर जाना होता था, तो उन्होंने कभी मना नहीं किया.’’

कोच बहुत जरूरी

पूजा ढांडा का मानना है कि किसी खिलाड़ी को बनाने में कोच का बड़ा योगदान होता है. अगर बड़े लैवल पर किसी महिला पहलवान को कोई पुरुष कोच मिल जाता है, तो इस में घबराने की बात नहीं होती है. बस, कोच के साथ तालमेल जरूर बिठाना पड़ता है.

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पूजा ढांडा बताती हैं, ‘‘सब से पहली चीज है अपने कोच पर भरोसा करना. बड़े लैवल पर महिला पहलवानों को कोचिंग देने वाले पुरुष कोच बड़े अनुभवी होते हैं. उन का फोकस हमारे खेल को सुधारने पर रहता है.’’

यही वजह है कि आज जब भी पूजा ढांडा कुश्ती के मैट पर उतरती हैं, तो फौलाद में बदल जाती हैं और सामने वाली पहलवान को धूल चटा देती हैं. वे नई पीढ़ी को खासकर लड़कियों को संदेश देते हुए कहती हैं, ‘‘कभी भी हिम्मत न हारें. लड़कियों को फिट और हिम्मती बनाने में खेलों का बड़ा अहम योगदान है. इस से आत्मविश्वास बढ़ता है और नाम भी बनता है.’’

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