Hindi Story: पीता हूं सरकार चलाने को

Hindi Story ‘तू अपना जिगरी यार है. तू रोज पीने का कोई कोई नया बहाना क्यों ढूंढ़ता रहता है?’ मैं जबतब उसे समझाता हूं, ‘ मेरे जिगरी दोस्त, पी, लेकिन बहुत मत पी. लिमिट में पी. जैसेजैसे सरकार सुरा महंगी कर रही है, तू उतनी ही और पी रहा है. सरकार और तुझ में कोई कनैक्शन है क्या? तेरी बीवी और मेरी भाभी से अब तुझ से पहले मुझे जूते पड़ने लगे हैं कि कैसा दोस्त पाल रखा है?

देख दोस्त, तेरी सेहत भी अब अलाऊ नहीं करती. जब तू सुरापान किए सरकार की तरह बारबार गिरता हुआ बड़ी मुश्किल से संभलता है , तो मुझे अपने पर बहुत दया आती है. पर एक तू है कि मानता ही नहीं. जब देखो, अपने बारे में सोचना बंद कर सरकार के बारे में ही सोचता रहता है.
अरे, जब कोई भी सरकार तेरे बारे में नहीं सोचती तो तू उस के बारे में क्यों सोचता है? बेकार का सरकारवादी कहीं का…’

मेरा वह दोस्त मेरे बारबार पीने से रोकने पर मेरा महंगाई से सिकुड़ा सीना पीटता हर बार यही कहता है, ‘देखो दोस्त, मैं उन की तरह सरकार का खासमखास सरकार फरामोश नहीं जो जहां से देखो, जब देखो, चटी सरकार को भी चाटने में लगे रहते हैं. सुरापानी उसी का, सरकार जिस की.
यह जो मैं सीना ठोंक कर पीता हूं , मैं अपने लिए कतई नहीं पीता. जितना पीता हूं सब सरकार के लिए पीता हूं. यह जो मैं पीता हूं , मैं अपने लिए  हरगिज नहीं पीता. टोटली सरकार के फायदे के लिए पीता हूं.
अच्छा बता, मैं पिऊंगा नहीं तो सरकार को रेवैन्यू कहां से जैनेरेट होगा? हर महकमा तो घाटे में है. जहां देखो, खाने वालों की फौज. ऐसे में मैं भी नहीं पिऊंगा तो सरकार का रेवैन्यू हो गया जीरो? अगर रेवैन्यू नहीं आएगा तो वह अपने अमले को कहां से पिलाएगीखिलाएगी? रोतीचीखती जनता की परवाह किए बिना उन को मौज कहां से कराएगी?

यह जो मैं इधरउधर से उधार ले कर ठेके के चक्कर पर चक्कर लगाता हूं , अगर जो मैं ये चक्कर लगाने बंद कर दूं तो बता, वे जनहित के बहाने विदेशों के दौरे कैसे करेंगे?
दोस्त, समुद्र मंथन के वक्त शिव ने सृष्टि बचाने के लिए तो बस एक बार ही गरल पिया था, पर मैं तो सरकार बचाने के लिए दिन में दसदस बार हलाहल पीता हूं. बता, मैं बड़ा कि शिव?
कोई मेरी सही से कीमत लगाए, तो मेरा त्याग शिव से बीस ही होगा दोस्त.
मैं पीने वालों का सीना पीटपीट कर कहता हूं कि सरकार की आमदनी का सब से बड़ा कोई सोर्स है तो वह केवल और केवल मैं हूं. बता दे कोई दूसरा माई का लाल जो मेरे नाली में गिरने पर, कुत्तों से अपना मुंह चटवाते हुए मुझ से ज्यादा सरकार को इनकम देता हो? बाकी सब तो बस खाने वाले हैं.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 महीने से पैंशनरों की पैंडिंग पैंशन कहां से देगी?
दोस्त, मैं पिऊंगा नहीं तो वह दिन में 10-10 बार एरियर के लिए रो रहे एरियर वालों को बकाया एरियर कहां से देगी?

दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 सालों से बीमारों के मैडिकल बिलों का भुगतान कहां से करेगी? अपनी जेब से देने से तो वह रही.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो विनाशसौरीसौरीविकास का रास्ता बंद हो जाएगा.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार को टीएडीए कहां से मिलेगा? मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार की तनख्वाह कहां से आएगी? दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो 100 ग्राम की फाइल अपने चपरासी से उठवाने वालों का बोझ कहां जाएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकारी गाड़ी में अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल छोड़ सरकारी स्कूल के बच्चों को प्लानिंग पर प्लानिंग करने वालों की गाड़ी का पैट्रोल कहां से आएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो यार बेलियों की मौजमस्ती पर क्या ताला नहीं लग जाएगा? ऐसे में हर पियक्कड़ सरकार भक्त का फर्ज बनता है कि वह अपनी सेहत की परवाह किए बिना सरकार की सेहत के हित में पिए,डट कर पिए, बढ़ते रेट की परवाह किए बिना पिए.

यहां सवाल अपनी सेहत का नहीं, सरकार की सेहत का है. सरकार की सेहत पर मेरी सारी सेहतें कुरबान. बुरे वक्त में जब सरकार के चचेरेममेरे ही उस का साथ नहीं देते, तो ऐसे में मैं सरकार का साथ नहीं दूंगा तो और कौन देगा? डियर, मैं पी कर गिर जाऊं तो गिर जाऊं, पर सरकार को किसी भी सूरत में गिरने नहीं दूंगा. इतनी ताकत तो अभी भी है मेरे पास. यह मेरा वादा है अपने आप से.
बोल, अब समझा, मैं क्यों पीता हूं? मैं पी कर अपने गिरने की परवाह किए बिना सरकार को गिरने से बचाने के लिए पीता हूं,’ उस ने कहा और मेरे सामने ही सरकार हित में एक पैग और खींचा तो मैं ने उस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘गुरु, सरकार के बारे में सोचना अच्छी बात है, पर सरकार को भी तो चाहिए कि वह तुम्हारे हित का ध्यान रखते हुए शराब और महंगी करे. अपने खर्चे के साथसाथ तो तुम्हारी जेब का भी ध्यान रखे.’

अरे दोस्त, यहां मेरे सिवा दूसरों के बारे में सोचता ही कौन है? यहां सस्ता है ही क्या? दोस्ती तो पहले ही सस्ती नहीं थी, अब तो यहां दुश्मनी तक सस्ती नहीं. कमेटी का हफ्ते में एक दिन आने वाला पानी तक पिछले साल के मुकाबले इस साल 4 गुना महंगा हो गया है. अस्पताल में टैस्ट महंगे हो गए हैं. रैस्टहाउसों के रैस्ट महंगे हो गए हैं. पर जो कल को सरकार की इनकम बंद गई तो पता है, जाने कितने भरे पेटों के खाली दिमागों में चूहे कूदने लग जाएंगे? जनता तो वे हैं नहीं जो भूखे पेट भी भजन करने में मस्त रहें.
देख दोस्त, कुलमिला कर कहूं तो मुझे पीने का शौक नहीं, मैं पीता हूं तो सरकार चलाने कोजीना तो है उसी का जिस ने यह राज जाना, है काम हर वोटर का, कुरसी के काम आना. तू क्या समझता है कि मैं ने पी रखी है?’

पिएं तेरे दुश्मनपर दोस्त, जो वैष्णव से वैष्णव जीव और कुरसी को एक बार कुछ भी पीने की लत लग जाए तो वह किसी तंत्र में भी नहीं छूटती…’ अब मुझे लग गया था कि वह सुराड़ी से कथावाचक होने लगा है, तो मैं ने झट आरती शुरू कर दी, ताकि वह अपनी सुराकथा खत्म करे.
प्रभुधन्य हो ऐसा सरकार हितैषी, जो हर कहीं पिए हुए भी गिरता सरकार खड़ी रखने में जुटा है.
हे सरकार, आप से मेरी विनम्र रिक्वैस्ट हैहो सके तो मेरे जिगरी यार को किसी खास मौके पर सम्मानित जरूर करें. देशभक्तों की खालों वाले सियारों को तो मौके और बेमौके पर आप उन के देश के लिए किए झूठे त्याग को ले कर सम्मानित करते ही रहे हैं. ऐसा करने से सुरापानी कौम में आप के प्रति और इमोशन जगेंगे और वह अपना सबकुछ बेच कर आप का साथ देने के लिए बेचैन हो उठेगी. ऐसा सरकार का हमदर्द आप को अपनों के बीच भी चिराग ले कर शायद ही मिले.       

Hindi Story: बदलाव

सबे की उस पुरानी सड़क पररामू जनरल स्टोरसिर्फ एक दुकान का नाम नहीं था, बल्कि यह लोगों की एक आदत बन चुका था. सुबह की पहली चाय से ले कर रात के आखिरी दूध तक, हर जरूरत का एक ही ठिकाना. किराना, दूध, छोटीमोटी दवा, कौस्मैटिक्स, आलूप्याज, लहसुन से कौपी, पैंसिलपैन तक सभी कुछ यहां मिलता था. तीनों भाई, बूढ़े पिता और बीच में खड़ा रामूतेज आवाज, तेज हिसाब और उस से भी तेज दिमाग. पर उस का दिल उतना बड़ा नहीं था, जितनी उस की दुकान. वह मनमाने दाम लगाता.
खराब सामान लौटाने से साफ मना कर देता. कंपनी के मुफ्त औफर दबा जाता और जब कोई कहता, ‘‘भैया,

यह तो गलत है,’’ तो रामू ठंडी मुसकान के साथ जवाब देता, ‘‘नहीं लेना तो
मत लो.’’
लोग चुप रह जाते. मजबूरी थी. कसबे में और औप्शन था भी तो नहीं.
समय धीरेधीरे करवट ले रहा था और बदलाव की बयार गांवकसबे में भी आई. स्मार्टफोन हर हाथ में गया. अब लोग गांवकसबे में इंटरनैट इस्तेमाल करने लगे थे.
स्मार्ट फोन और हर किसी का बैंक में खाता होने से क्रडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, पेटीएम का इस्तेमाल सीख रहे थे कसबे के लोग.
इंटरनैट ने गांव और शहर के
बीच की दूरी मिटा दी. लोग अब
घर बैठे सामान मंगाने लगेएमेजौन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकेट, मिंत्रा, मीशो सबकुछ सस्ता, साफ दाम और खराब हो तो बिना बहस सामान की वापसी.
पहलेपहल रामू हंसा, ‘‘मोबाइल से राशन आएगा? अरे, यह भी कोई
बात हुई…’’
लेकिन यह हंसी धीरेधीरे सूख गई. दुकान की भीड़ कम होने लगी. पुराने ग्राहक दिखना बंद हो गए. रोज का हिसाब घटने लगा.
पिता की आंखों में चिंता उतर आई. एक रात उन्होंने धीमे से कहा, ‘‘बेटा, कारोबार में पैसा नहीं, भरोसा कमाया जाता है. हम ने देर कर दी शायद.’’
रामू चुप रहा. उस ने पहली बार महसूस किया कि शायद गलती उस की भी थी.
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थीऔर फिर कसबे में एक और नाम गूंज… ‘ब्लिंकेट’… मिनटों में सब्जी, दूध, दाल, आटाघर बैठे
अब लोग घर से निकलना भी कम करने लगे. एक दिन रामू की दुकान का शटर हमेशा के लिए गिर गया.
कुछ महीनों बाद वही रामू, पीठ पर बैग लटकाए, डिलीवरी की यूनिफार्म में, दरवाजे खटखटाता दिखाई दिया, ‘‘ब्लिंकेट डिलीवरी.’’

दरवाजा खुला. सामने वही बुजुर्ग अम्मां थीं, जिन की खराब दाल उस ने कभी बदलने से मना कर दिया था.
अम्मां ने उसे पहचान लिया. एक पल को दोनों की आंखें मिलीं. रामू की आंखें ?ाक गईं.
अम्मां ने सामान लिया और धीरे से बोलीं, ‘‘बेटा, जिंदगी सिखा देती है ?’’
रामू की आवाज भर्रा गई, ‘‘हां, अम्मां, अब सम? आया है.’’
सीढि़यां उतरते हुए रामू की आंखों में नमी थी. उसे याद आया कि कैसे लोग उस से हाथ जोड़ कर कहते थे, ‘‘भैया, बदल दीजिए,’’ और वह कठोर बना रहता था.
आज वही हाथ, दरवाजे की घंटी दबाने से पहले हलका सा कांप रहे थे.
घर लौट कर रामू ने पिता के पास बैठते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, अगर फिर कभी दुकान खोली, तो सब से पहले भरोसा बेचेंगे.’’
पिता की बूढ़ी आंखों में आंसू थे. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘‘अब तू बड़ा हो गया है बेटा.’’
कभी ग्राहक रामू के सामने खड़े होते थे, आज वह ग्राहकों के दरवाजे पर खड़ा था.
यह समय का मजाक नहीं था. यह समय का आईना था, जिस में रामू पहली बार खुद को साफ देख पा रहा था

प्रज्ञा पांडे मनु

Sociopolitical: अब इस देश में जवानों का बोलना मना है

Sociopolitical: ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भारत के प्रधानमंत्री रह चुके लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. उन्होंने माना था कि देश जवानों और किसानों से चलता है. उस के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के साथसाथ ‘जय विज्ञान’ को भी जोड़ा यानी टैक्नोलौजी की भी बातें होने लगीं. लेकिन आज ‘जय जवान, जय किसान’ और ‘जय विज्ञान’ से जुड़े तीनों समूहों का हाल बेहाल है.

जवानों को दिमागी रूप से पंगु बना कर उन के वेतनमान में बढ़ोतरी तो की गई, लेकिन उन की हालत भी एक नए गुलामों की तरह ही है. वहीं किसानों और मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि उन की हालत और भी खराब होती जा रही है.

हमारे देश के वैज्ञानिकों और विज्ञान के छात्रों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र के बजाय ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.

नई आर्थिक नीति लाने वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ के सपनों को मटियामेट कर दिया.

कांग्रेस शासित नरसिंह राव व मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद किसानों की जमीनें पूंजीपतियों को दी जाने लगीं. बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर दबाव बनाया गया कि वे नई तरह की खेती करें. इस नई खेती के चलते बहुत से किसान कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी करने लगे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 1995 से ले कर अब तक तकरीबन साढ़े 3 लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, जबकि गैरसरकारी आंकड़े इस से भी ज्यादा हैं. सरकारी नीतियों ने इन किसानों को ‘जय किसान’ की जगह ‘मर किसान’ बना दिया.

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसानों की हालत सुधरी नहीं, बल्कि बदतर ही हुई और उन्हीं के शासन में जवानों के शव उठाने वाले ताबूत का घोटाला हो गया.

‘जय विज्ञान’ का नारा देने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन किया और ठेकेदारी प्रथा को लागू किया. मजदूरों को न्यूनतम वेतन से भी आधे पैसों पर काम करना पड़ रहा है और उन की मेहनत की कमाई लूट बन कर ठेकेदारों को मालामाल कर रही है. हालत यह हो गई कि सभी सरकारी दफ्तरों में फोर्थ क्लास के कर्मचारी ठेके पर रखे जाने लगे. यहां तक कि डाक्टर और मास्टर भी ठेकेदारी प्रथा के शिकार हो गए. यही हालत ‘श्रमेव जयते’ की भी है.

मोदी सरकार के आने के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि जवान ही ‘देशभक्त’ हैं और उन्हीं की बदौलत हम सुरक्षित और जिंदा हैं. आप उन पर कोई सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि इस से उन का मनोबल गिरता है. वहां कोई भ्रष्टाचार नहीं है, जाति और धर्म का भेदभाव नहीं है. नतीजतन, ड्यूटी के बाद बैंक या एटीएम की लाइन में अपनी तकलीफ जाहिर करने पर भी किसी शख्स को ड्यूटी पर तैनात जवानों के साथ जोड़ कर देशभक्ति का पाठ पढ़ाते कुछ सिरफिरे मिल जाते हैं. झूठी देशभक्ति के जज्बे दिखा कर सही सवालों को हमेशा छिपाया गया है.

ऐसा नहीं है कि तेज बहादुर यादव का वीडियो वायरल होने से पहले मंत्रियों, अफसरों, मीडिया वालों को इस तरह के गलत बरताव का पता नहीं था. इस वीडियो के आने से पहले भी जवानों की खुदकुशी, डिप्रैशन, अफसरों के बुरे बरताव, छुट्टियां नहीं मिलने व अपने साथियों पर गोली चलाने की खबरें कई बार आ चुकी हैं. यहां तक कि वीके सिंह ने भी माना है कि सेना का जनरल रहते हुए रक्षा सौदों में उन्हें घूस का औफर मिला था. डीजल बेचने या दूसरे सामान की हेराफेरी के मामले भी आ चुके हैं. दबी जबान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा की बातें भी सामने आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव ने अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल साइट का इस्तेमाल किया, लेकिन यही बात सीमा सुरक्षा बल के अफसरों को नागवार गुजरी. वे इसे अनुशासनहीनता और तय की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन मान रहे हैं.

यहां तक कि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके जनरल प्रकाश सिंह का भी कहना है, ‘‘जवान ने नियमों का उल्लंघन किया है. कमांडैंट से शिकायत करनी चाहिए थी. डीआईजी, आईजी से शिकायत की जा सकती थी.’’

पूर्व महानिदेशक जनरल प्रकाश सिंह को यह डर है कि जवान इस तरह से करने लगेंगे, तो अनुशासन छिन्नभिन्न हो जाएगा.

तेज बहादुर यादव का कहना है कि इस की सूचना उस ने अपने कमांडैंट को पहले दी थी और बारबार कहने पर भी ऐक्शन नहीं लिया गया. क्या यही सब बातें ‘अनुशासनहीनता’ में आती हैं?

सीमा सुरक्षा बल के जम्मू फ्रंटियर के आईजी डीके उपाध्याय ने यह बयान दिया है कि वीडियो वायरल करने वाला जवान आदतन अनुशासनहीन है. उस के खिलाफ नशे में धुत्त रहने, सीनियर अफसरों के साथ बदसुलूकी करने, यहां तक कि सीनियर अफसर पर बंदूक तानने की शिकायतें आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव का साल 2010 में कोर्ट मार्शल किया गया था, लेकिन उस के परिवार वालों को ध्यान में रखते हुए बरखास्त करने के बजाय 89 दिनों की कठोर सजा सुनाई गई.

इस तरह के आरोप के जवाब में तेज बहादुर यादव कहता है, ‘‘मुझे गोल्ड मैडल समेत 14 पदक मिल चुके हैं. मैं ने अपने कैरियर में कुछ गलतियां भी की हैं, लेकिन बाद में उन में सुधार भी किए हैं.’’

तेज बहादुर यादव के परिवार वालों का कहना है कि जब भी वे घर आते थे, तो खाने को ले कर शिकायत करते थे. उन की पत्नी शर्मिला यादव अफसरों को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछती हैं, ‘‘मेरे पति दिमागी तौर पर बीमार या अनुशासनहीन थे, तो उन को देश के संवेदनशील इलाके में बंदूक क्यों थमाई गई?’’

तेज बहादुर यादव की ही तरह बाड़मेर के जागसा गांव के खंगटाराम चौधरी सीमा सुरक्षा बल में थे, जिन्होंने 30 दिसंबर को वीआरएस ले ली थी.

खंगटाराम कहते हैं, ‘‘जवानों को ऐसा खाना खाने को दिया जाता है, जिसे आम आदमी नहीं खा सकता है. उस खाने को जवान मजबूरी में खाते हैं.’’

खंगटाराम के पिता एसके चौधरी का कहना है, ‘‘पहले खुशी हुई थी कि बेटा फौज में गया है, लेकिन वहां की परेशानियों को देख कर लगता है कि अच्छा हुआ कि वह यहां आ गया है और अब साथ में खेती का काम करेगा, तो कम से कम भरपेट खाना तो खाएगा.’’

तेज बहादुर यादव द्वारा लगाए गए आरोप को जब मीडिया ने लोगों से जानने के लिए बात की, तो श्रीनगर में सुरक्षा बलों के कैंपों के आसपास रहने वाले लोगों ने कहा कि बाजार से आधे रेट पर पैट्रोल, डीजल, चावल, मसाले जैसी चीजें मिल जाती हैं.

फर्नीचर के एक दुकानदार ने बताया कि फर्नीचर खरीदने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है, वे कमीशन ले कर उन लोगों को और्डर देते हैं, पैसों के लिए सामान की क्वालिटी से भी समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.

तेज बहादुर यादव का वीडियो आने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, वायु सेना और सेना के जवानों ने भी अपनीअपनी बात रखी.

रोहतक के वायु सेना के एक पूर्व जवान ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख कर मौत की गुहार लगाई है, ताकि उसे जलालत भरी जिंदगी से छुटकारा मिल सके.

इस जवान का आरोप है कि वायु सेना के अफसरों को 14 हजार रुपए नहीं देने पर उसे कई झूठे आरोप लगा कर नौकरी से निकाल दिया.

इसी तरह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, मथुरा के जवान जीत सिंह ने मिलने वाली सुविधाओं में भेदभाव का आरोप लगाया है.

सेना के जवान यज्ञ प्रताप ने वीडियो जारी कर सेना के अफसरों पर आरोप लगाया है कि अफसर सैनिकों से कपड़े धुलवाते हैं, बूट पौलिश कराते हैं, कुत्ते घुमाने और मैडमों के सामान लाने जैसे काम करवाते हैं. यह खबर जब मीडिया में आ रही थी, तो उसी समय यह खबर भी आई कि बिहार के औरंगाबाद में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर कुमार ने इंसास राइफल से अपने सहकर्मियों की हत्या कर दी.

पुलिस अधीक्षक सत्यप्रकाश ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि बलवीर कुमार ने छुट्टी पर जाने के लिए आवेदन किया था. उसे छुट्टी नहीं मिल पाई और दूसरे जवानों ने उस पर तंज कसा, तो गुस्से में आ कर उस ने गोलीबारी कर दी.

उसी दिन पुलवामा जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल  का जवान वीरू राम रैंगर ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी करने की कोशिश की थी.

सेनाध्यक्ष ने जवानों से कहा है कि वे अपनी बात सोशल मीडिया पर नहीं उठाएं. उस के लिए सेना मुख्यालय, कमान मुख्यालय व निचले स्तर के कार्यालयों में शिकायत पेटी रखने की घोषणा की और कहा कि इन पेटियों के माध्यम से उठाए गए मुद्दों को मैं खुद देखूंगा.

हम सभी जानते हैं कि जेल, थानों या दूसरे दफ्तरों में इस तरह के बौक्स पहले से ही वहा रखे हैं और उन पर भी यही लिखा होता?है कि आप की पहचान गुप्त रखी जाएगी और इस को अधिकारी ही खोलेंगे. लेकिन हम इस तरह के बौक्स के परिणाम को भी जानते हैं.

सेना के दफ्तरों में शिकायत निवारण बौक्स अभी तक क्यों नहीं था? जवानों के दर्द को गृह मंत्रालय ने बेबुनियाद बता कर खारिज कर दिया है यानी कम शब्दों में कहा जाए, तो गृह मंत्रालय और अधिकारी जवानों को झूठा बता रहे हैं.

यह हैरानी की बात है कि तेज बहादुर यादव और इरफान ने वीडियो बना कर जो सुबूत सरकार और जनता तक पहुंचाए हैं, उन को सरकार मानने से इनकार कर रही है. क्या जवानों के साथ इस तरह का बरताव नहीं होता है?

ऐसा सवाल सोशल मीडिया पर आ जाने से पूंजीवादपरस्त मीडिया घराने भी इस मामले को उठाने के लिए मजबूर हुए. सीमा सुरक्षा बल के एक जवान इरफान ने 29 अप्रैल को वाराणसी में प्रैस कौंफ्रैंस कर के बताया था कि भारतबंगलादेश सीमा पर अधिकारी तस्करी कराते हैं और जो जवान मुंह खोलने की बात करता है, उसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है.

इरफान ने बताया कि 15 जनवरी, 2016 को 50 बंगलादेशी भारत में आना चाहते थे, तो उस ने घुसपैठ कराने से इनकार कर दिया. इसी बीच एक घुसपैठिए ने सीमा सुरक्षा बल के कमांडर को फोन कर के इरफान से बात कराई. कमांडर ने इरफान को सभी घुसपैठियों को आने देने के लिए आदेश दिया.

इरफान ने इस घटना की शिकायत जब अधिकारियों से की, तो उसे चुप रहने की नसीहत दी गई. 19 जनवरी की रात जब गेट खोला गया था, तो उस का वीडियो इरफान ने बनाया था. उस की शिकायत भी अधिकारियों से की गई, लेकिन कोई असर नहीं हुआ.

इरफान ने सीमा की बाड़ को काटते और जोड़ते हुए भी कुछ घुसपैठियों को पकड़ा था. उन लोगों ने भी कमांडर के आदेश पर ऐसा करने की बात कबूली थी. इस का वीडियो भी इरफान ने मीडिया के सामने दिखाया था.

इरफान का कहना है कि सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी सीमा पार तस्करी कराते हैं. साथ ही, उस ने यह भी बताया कि लंगर में बंगलादेशी घुसपैठियों को उस ने काम करते हुए देखा था और पूछने पर उसे बताया गया कि कमांडर ने रखा है.

इरफान आगे बताता है कि जब अधिकारियों के सामने तस्करी की कलई खोली थी, तो उसे कमरे में बंद कर के पीटा गया था और सिगरेट से दागा गया था. उस के बाद इरफान सीमा सुरक्षा बल की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ गया.

इरफान ने बताया कि अधिकारी उस के पीछे पड़े हुए हैं और उसे भगोड़ा घोषित करने की धमकी दे रहे हैं. वह सीमा सुरक्षा बल में नहीं जाना चाहता. उस के बाद इरफान के साथ क्या हुआ, किसी को नहीं पता है.

तेज बहादुर यादव, खंगटाराम, जीत सिंह या इरफान का न तो यह पहला मामला है और न ही आखिरी. ऐसा होता रहा है और होता रहेगा.

जब किसान अपनी खेती की जमीन को तथाकथित तरक्की के लिए पूंजीपतियों को नहीं देना चाहते, तो इन्हीं जवानों को भेजा जाता है कि जाओ तुम ‘देशभक्त’ होने का परिचय दो. मजदूर जब अपनी मांगों को ले कर धरनाप्रदर्शन करते हैं या आदिवासी, दलित अपनी जीविका के साधन की मांग करते हैं, तो इन्हीं ‘देशभक्तों’ द्वारा उन का कत्लेआम कराया जाता है. उस समय इन जवानों को ‘देशभक्त’ का तमगा दे दिया जाता है.

जब यही ‘देशभक्त’ जवान अपनी मांगों को उठाते हैं, तो इन को भगोड़ा, अनुशासनहीन, नशेड़ी बना कर सजा मुकर्रर की जाती है. ये जवान उन्हीं मजदूरकिसान के बेटे हैं, जिन पर अफसरों के कहने पर वे लाठियां और गोलियां बरसाते हैं.

अफसरों का वर्ग अलग होता है. वे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, नौकरशाहों के घरों से आते हैं, जिस की न तो जमीन जाती है और न ही जान. इस समाज में जवान, किसान और विज्ञान से जुड़े तीनों समूहों को मिल कर लड़ना होगा, तभी वे जीत सकते हैं, नहीं तो किसी दिन किसान मारा जाएगा, जवान मारा जाएगा और विज्ञान को टोकरी में फेंक दिया जाएगा.

Social Problem: मेरे घर के सामने पीजी के लड़के अंडरवियर पहने बाहर खड़े रहते हैं

Social Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं कोटा, राजस्थान का रहने वाला हूं और मेरी उम्र 27 साल है. मेरे घर के सामने एक पीजी है, जिस में स्टूडैंट्स रहते हैं. वे सभी स्टूडैंट्स आईआईटी की तैयारी करने यहां आए हुए हैं. मैं शुरुआत से ही कोटा में रहता हूं. मेरे घर में मांबाप और 3 बहने हैं. हमारे घर में अकसर मेरी बहनों की फ्रैंड्स भी आती हैं. पिछले कई दिनों मैं अपने घर के सामने वाले पीजी में देखता हूं कि वहां के लड़के ज्यादातर समय बालकनी में खड़े हो कर मेरे घर की तरफ देखते रहते हैं, जो मुझे काफी अजीब लगता है. कई बार तो वे लड़के सिर्फ अंडरवियर पहने बाहर खड़े रहते हैं. हमारे घर में लड़कियों का होना और सामने ऐसे लड़के जानबूझ कर इस अवस्था में खड़े रहेंगे तो किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा. ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए, क्योंकि उस पीजी का मालिक भी वहां नहीं रहता, ताकि मैं शिकायत कर सकूं?

जवाब –

आप का चिंता करना जायज है, क्योंकि जिस के घर में भी मांबहनें होंगी, वह ऐसे लोगों से परेशान होगा कि जो इस तरह की हरकत करते हैं. उन्हें खुद सोचना चाहिए कि उन के घर की बहनबेटियों के सामने अगर कोई बिना कपड़ों के सिर्फ अंडरवियर पहने खड़ा रहेगा तो उन्हें कैसा लगेगा.

आप को सबसे पहले उस पीजी के मालिक को यह सब बताना चाहिए, क्योंकि उन लड़कों को बोलने का कोई फायदा नहीं है. आप को पीजी के मालिक को इस बात को ले कर शिकायत करनी चाहिए कि उन के किराएदार बिना कपड़ों को आप के घर की तरफ घूरते रहते हैं. हो सकता है कि पीजी का मालिक आप की बातों को सीरियस न ले, तो ऐसे में आप उसे पुलिस में शिकायत दर्ज करने की धमकी भी दे सकते हैं.

अगर धमकी से भी बात न बने तो जब वे लड़के बाहर खड़े हों तब आप उन की वीडियो बना लीजिए. वीडियो बनाने के बाद आप सीधा पुलिस में शिकायक दर्ज करा सकते हैं कि आप उन लड़कों की इस हरकत से परेशान आ चुके हैं. पुलिस में शिकायत करने से लड़के ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचेंगे.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Social Problem

प्यार में खुद को न मिटाएं

असम के होम ऐंड पौलिटिकल सैक्रेटरी शिलादित्य चेतिया ने 18 जून, 2024 को गुवाहाटी के एक प्राइवेट हौस्पिटल के आईसीयू में पत्नी की लाश के सामने ही अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार ली. पत्नी की मौत के कुछ मिनटों बाद ही उन्होंने अपनी जान दे दी.

उसी अस्पताल में कुछ देर पहले उन की पत्नी की मौत कैंसर से हो गई थी. 44 साल के शिलादित्य चेतिया राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित आईपीएस अधिकारी थे.

दरअसल, शिलादित्य चेतिया की पत्नी ब्रेन ट्यूमर से पीडि़त थीं और पिछले कुछ महीनों से अस्पताल में भरती थीं. शिलादित्य चेतिया पिछले 4 महीनों से छुट्टी ले कर अपनी पत्नी का इलाज करा रहे थे.

शिलादित्य की पत्नी अगमोनी बोरबरुआ की उम्र 40 साल थी. नेमकेयर अस्पताल में शाम के 4 बज कर 25 मिनट पर उन की मौत हो गई.

10 मिनट बाद ही आईपीएस अधिकारी शिलादित्य चेतिया ने भी दुनिया छोड़ दी.

पत्नी की मौत के बाद पहले वे आईसीयू केबिन में गए और मैडिकल स्टाफ से कहा कि वे अपनी पत्नी की लाश के पास प्रार्थना करना चाहते हैं, इसलिए उन्हें कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दिया जाए. इस के बाद उन्होंने अपनी सर्विस रिवौल्वर से अपनी ही जान दे दी.

इसी तरह 18 जून, 2024 को ही उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में एक शादीशुदा जोड़े ने भी साथ जीनेमरने का वादा निभाया. पत्नी की मौत के कुछ घंटे बाद ही बुजुर्ग पति ने भी दम तोड़ दिया.

दरअसल, 70 साल की पार्वती प्रजापति और 75 साल के मगन प्रजापति की शादी 50 साल पहले हुई थी. पिछले कुछ समय से पार्वती काफी बीमार चल रही थीं.

17 जून, 2024 की रात को उन की मौत हो गई.

18 जून की सुबह जब पति मगन प्रजापति चाय ले कर उन के पास पहुंचे, तो देखा कि वे बिस्तर पर मरी हुई पड़ी थीं. उन की मौत से पति मगन सदमे में आ गए.

रिवाज के मुताबिक, जब पति मगन आखिरी बार उन की मांग में सिंदूर भरने लगे तो अचानक से उन की भी हालत खराब हो गई और कुछ ही देर में उन्होंने भी दम तोड़ दिया. इस के बाद पतिपत्नी का एकसाथ अंतिम संस्कार किया गया.

इसी तरह 9 अप्रैल, 2024 को उत्तर प्रदेश के एटा से एक सच्चे प्यार का मामला सामने आया था. बीमार पति की इलाज के दौरान मौत हो गई.

यह सूचना जैसे ही पत्नी को मिली कि उस का पति इस दुनिया में नहीं रहा, तो वह रोने लगी. फिर अचानक ही उस की भी मौत हो गई. पत्नी की मौत के साथ ही 2 बच्चे अनाथ हो गए.

यह मामला कोतवाली अलीगंज का है. 50 साल के ओम नारायण उर्फ राजू की कुछ दिन पहले तबीयत खराब हो गई थी, जिन का इलाज चल रहा था. वे सही हो गए थे. पर फिर ओम नारायण की अचानक फिर से तबीयत बिगड़ गई थी. वे फर्रुखाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज के लिए ले जाए गए, जहां उन की मौत हो गई.

जब इस बात की सूचना उन की पत्नी मोहिनी को हुई, तो वह रोने लगीं. जैसे ही पति की लाश घर पर आई, तो वे और तेज रोने लगीं.

तभी अचानक मोहिनी की भी तबीयत खराब हो गई. जब तक परिवार वाले उन्हें संभाल पाते, तब तक उन की भी मौत हो गई. दोनों का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर हुआ.

इन घटनाओं के बारे में जान कर दिल को यह अहसास जरूर होता है कि आज भी प्यार जिंदा है. किसी को इस हद तक चाहना कि उस के बगैर जीने की चाह ही खत्म हो जाए और इनसान खुद ही अपना वजूद खत्म कर दे, बहुत मुश्किल है. पर ऐसी कहानियां हम अकसर फिल्मों में जरूर देखते हैं.

प्यार क्या है

प्यार क्या है? किसी को पाना या खुद को खो देना? यह एक बंधन या फिर आजादी? यह जिंदगी है या फिर जहर?

दरअसल, प्यार का मतलब है कि कोई और आप से कहीं ज्यादा खास हो चुका है. जैसे ही आप किसी से कहते हैं कि मैं तुम से प्यार करता हूं, आप अपनी आजादी खो देते हैं. आप की मरजी में अब उस की मरजी भी शामिल हो जाती है. आप के पास जो भी है, वह उस का भी हो जाता है. आप की खुशी उस की खुशी में शामिल हो जाती है. उस के गम आप अपने दिल में महसूस करने लगते हैं. जिंदगी में आप जो भी करना चाहते हैं, वह उस के साथ मिल कर करने की ख्वाहिश रखने लगते हैं. उस के बिना आप को अपना वजूद ही अधूरा लगने लगता है यानी प्यार बड़ी खूबसूरती से खुद को मिटा देने वाली हालत है.

अगर आप खुद को नहीं मिटाते, तो आप कभी प्यार को जान ही नहीं पाएंगे. आप के अंदर का कोई न कोई हिस्सा मरना ही चाहिए. आप के अंदर का वह हिस्सा जो अभी तक आप का था, वह मिट कर उस का हो जाता है. कोई और इनसान उस हिस्से की जगह ले लेता है.

दरअसल, जब हमें किसी से प्यार होता है, तो हमारे दिमाग में एक रासायनिक मिश्रण निकलता है, जो हमारी हरकतों और भावनाओं को प्रभावित करता है. डोपामाइन जैसे हार्मोन की वजह से उत्तेजना और खुशी महसूस होती है, जबकि औक्सीटोसिन जैसे हार्मोन से हमें अपने प्यार में विश्वास और भावनाएं आती हैं.

ये हार्मोन हमें अंदर से खुश रखते हैं, जिस वजह से हम अपने पार्टनर के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते हैं. हमारे दिमाग को सम?ा आ जाता है कि इस रिश्ते में हमें खुशी मिलती है और उस वजह से हम एक तरह से इस फीलिंग के आदी यानी एडिक्ट से हो जाते हैं. प्यार एक तरह का नशा ही है, जिस के बिना हमें अपना वजूद अधूरा लगने लगता है.

इस तरह का सच्चा प्यार आजकल ज्यादातर रिश्तों में नजर नहीं आता है. जराजरा सी बात पर पार्टनर पर हाथ उठा देना, ?ागड़े करना, दूर हो जाना, बात नहीं करना और यहां तक की तलाक ले लेना बहुत आम हो गया है.

वैसे भी आज के समय में नाजायज रिश्ते बनाने मुश्किल नहीं. मोबाइल और इंटरनैट के जरीए दूसरों के संपर्क में आने के बहुत से रास्ते खुले हुए हैं, तभी तो लोग शादी में रहते हुए भी किसी और के साथ रिश्ते बना लेते हैं, पार्टनर से ?ाठ बोलते हैं, उसे बेवकूफ बनाते हैं और कई दफा तो बात इतनी बढ़ जाती है कि वे एकदूसरे के ही खून के प्यासे बन जाते हैं. बहुत आसानी से पार्टनर को मौत की नींद सुला देते हैं, ताकि आजाद हो जाएं. पर यह आजादी प्यार नहीं है. प्यार तो वह बंधन है, जो किसी भी हालत में आप को पार्टनर से जोड़े रखता है.

पंहुचे हुए तांत्रिक और गृह बाधाओं का झांसा

ऐसा प्रतीत होता है मानो हम एक ऐसे ठगों के गिरोह के आसपास सांसे ले रहे हैं घिरे हुए है जो हमें कभी भी किसी भी तरह ठगने के लिए तैयार बैठा है.अब यह तो हमारा भाग्य है या फिर हमारी समझदारी जो हम ठगी से अभी तक बचे हुए हैं.

यह कि अगर हम ठगी से बचना २चाहते हैं तो हमें सतत अपनी आंख, कान‌ को खुला रखना होगा, थोड़ी सी भी लालच और लापरवाही हमें इन ठगों का शिकार बन सकती है . दरअसल, सोशल मीडिया आ जाने के बाद ऐसा प्रतीत होता था कि आम लोगों में जागरूकता पैदा होगी और ठगो की शामत आ जाएगी. मगर ऐसा नहीं हुआ है बल्कि ठगी की घटनाएं और भी ज्यादा होने लगी है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ में एक शख्स को बड़े ही अनोखे अंदाज में ठगा गया जिस पर कोई प्रयोग धर्मी निर्माता फिल्म भी बन सकता है. हुआ वह की घर में भूत प्रेत बाधा है कह कर करके एक दो नहीं पूरे 10 लाख रुपए का चूना लगा दिया गया.

विजय समय में स्याही घटना घटा घटी है जिनसे कुछ झूठ घटनाएं नीचे प्रस्तुत है –
प्रथम घटना- नोटों को दोगुना करने का लालच दे कर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक महिला ठगी का शिकार बनाया गया. आखिरकार ठगी करने वाले को पुलिस ने जेल भेज दिया.
दूसरी घटना- राजस्थान के जयपुर में सोना दोगुना करने का झांसा देकर युवती को ठगी का शिकार बनाया गया.

तीसरी घटना- झारखंड के रांची में तुम्हारे घर के नीचे सोना, चांदी, हीरे मोती हैं कहकर ठगी का शिकार बनाया गया.

ऐसी ही हमारे आसपास चेहरे और नाम बदलकर आसपास ठगी की घटनाएं घटित हो रही हैं. जिन्हें अगर हम ध्यान से देखें तो स्वयं बच सकते हैं और दूसरों को भी अगाह कर सकते हैं.

दस लाख की ठगी

छत्तीसगढ़ के अकलतरा में पुलिस द्वारा कथित तौर पर गृह बाधा दूर करने के नाम से 10 लाख रुपए की ठगी करने वाले आरोपी की गिरफ्तारी की गई है. आरोपी ने अपने साथियों के साथ मिलकर ग्रह दशा दूर करने का झांसा दे दस लाख रुपए और मोबाइल की ठगी कर ली .

मामला छत्तीसगढ़ के जिला चांपा जांजगीर के विकासखंड अकलतरा थाना क्षेत्र का है.

अकलतरा थाना क्षेत्र के एक गांव कोटमीसोनार निवासी आनंद प्रकाश मिरी 10 लाख रुपए मोबाइल की ठगी की गई थी. कुछ घरेलू समस्याओं के चलते आनंद प्रसाद मिरी परेशान थे. उन्हें कुरमा निवासी कुमार पाटले ने तंत्र मंत्र से समस्या का समाधान होने का झांसा दिया. उसने कहा – बाहर से पंहुचे हुए पंडित बुलाकर ग्रहों को शांत करवाना होगा जिससे विघ्न बाधा दूर होगी. और आखिर कुमार पाटले ने विनोद कुमार सूर्यवंशी और जगदीश प्रसाद लहरे ऊर्फ कल्लू को तांत्रिक बना कर आनंद मिरी से मिलवाया.

आनंद मिरी को फर्जी तांत्रिकों ने दस लाख रुपए अनुष्ठान में लगने की बात कही गई और अनुष्ठान के दिन दस लाख रुपए लाने का झांसा दिया गया .जब आनंद मिरी किसी तरह दस लाख लेकर पहुंचे तो फर्जी बाबाओं व कुमार पाटले ने उन्हें अनुष्ठान से पहले गंगाजल पीने को दिया. जिसको पीने से आनंद मिरी बेहोश हो गए. जिसके बाद ठग गैंग दस लाख रूपए और मोबाइल लेकर फरार हो गया.

प्रकरण में अकलतरा थाने में धोखाधड़ी व आपराधिक षड्यंत्र का अपराध दर्ज कर विनोद कुमार सूर्यवंशी उर्फ विक्रम और जगदीश लहरे ऊर्फ कल्लू को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. जबकि आरोपी अमित कुमार पाटले साकिन कुरमा फरार हो गया था. पुलिस अधीक्षक विवेक शुक्ला के निर्देश पर अकलतरा थाना प्रभारी दिनेश कुमार यादव ने आरोपी की पतासाजी कर उसे गिरफ्तार कर लिया उन्होंने हमारे संवाददाता को बताया – अब छत्तीसगढ़ शिक्षा से पिछड़ा हुआ अंचल‌ नही है मगर इस सब के बावजूद यहां ठगी की घटनाएं भूत प्रेत और बलि के घटनाक्रम प्रकाश में आते रहती हैं. दरअसल छत्तीसगढ़ में वर्तमान में भी शिक्षा और जागरूकता के प्रचार-प्रसार की महत्ती आवश्यकता है.

भिखारी बनाते धर्म के ठेकेदार, अपना भरते घरबार

अगर आप इन दिनों बिहार और झारखंड में होली (या दीपावली के बाद) आएंगे, तो कुछ औरतें और मर्द हाथ में सूप लिए गलीमहल्ले, दुकान, हाटबाजार, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, भीड़भाड़ वाली दूसरी जगहों पर घूमते दिख जाएंगे, जो छठ व्रत करने के नाम पर भीख मांग रहे होते हैं. वैसे, स्थानीय लोगों को मालूम रहता है कि ये सब भीख मांगने वाले लोग छठ व्रत बिलकुल भी नहीं करते हैं.

दरअसल, ऐसे लोग छठ व्रत के नाम पर अपनी कमाई करने के लिए भीख मांग रहे होते हैं, क्योंकि साल में 2 बार छठ व्रत होता है, एक तो दीवाली के बाद कार्तिक महीने में और दूसरा होली के बाद चैत महीने में.

हिंदू धर्म के पंडेपुजारियों और ब्राह्मणों द्वारा सदियों से ऐसी बातों को बढ़ावा दिया गया है कि जिन के पास छठ व्रत करने के लिए रुपएपैसे नहीं हैं, तो वे छठ व्रत के दिनों में भीख मांग कर जमा किए गए पैसे से छठ व्रत मना सकते हैं.

पर अब बहुत से लोग इस धार्मिक पाखंड का फायदा उठा रहे हैं और धड़ल्ले से इस व्रत के कुछ दिन पहले से पीले रंग की धोती पहन कर हाथ में सूप ले कर बाजार व गली में घूम कर भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि धर्म के नाम पर पंडेपुजारियों और पाखंडियों ने भीख मांगने की कुप्रथा क्यों शुरू की है? इस की वजह यह है कि उन की पाखंड की दुकानें बिना रुकावट के चलती रहें.

भीख देने वालों के मन में भी ये बातें भरने की कोशिश की गई हैं कि भीख देने वाले को भी पुण्य मिलता है. बहुत से लोग धर्म के डर के चलते भीख दे देते हैं.

हालांकि, इस से मन में यह सवाल जरूर पैदा होता है कि भीख लेने वाला छठ व्रत करेगा या नहीं करेगा? लेकिन इस से समाज में भीख मांगने की नई कुप्रथा जरूर शुरू होती है, इसलिए कुछ लोगों के लिए यह कमाई का सब से आसान जरीया बनता जा रहा है.

कुछ लोग इस धार्मिक ढकोसले के नाम पर अपना धंधा शुरू कर देते हैं, तभी तो वे बाजारहाट, सड़क के किनारे, रेलवे स्टेशनों पर, यहां तक कि रेल के डब्बों, ट्रैफिक में भी घुस कर सूप ले कर भीख मांगते नजर आ जाते हैं.

छठ व्रत के दिनों में कुछ दानदाता छठ का सामान भी पूरे अंधविश्वासों के साथ बांटते दिखते हैं और जिन के पास छठ करने की हैसियत नहीं होती है, वे उन से सामान ले कर छठ व्रत करते भी हैं. दूसरों की मदद से पूजा करने वालों की तादाद बहुत थोड़ी ही है, जबकि भीख मांगने वालों की तादाद बहुत ज्यादा बढ़ती जा रही है.

सभी धर्मों के लोगों को यह सीख भी फोकट में दे दी जाती है कि पूजापाठ करने के बाद जरूरतमंदों को भीख देने से पुण्य मिलता है.

यह इसलिए किया जाता है कि लगे दानपुण्य करना साथ रहते लोगों की बुरे वक्त में सहायता करना होता है, इसीलिए काफी तादाद में भीख मांगने वाले लोग मंदिर, मसजिद और गुरुद्वारों के आगे हाथपैर से सलामत और हट्टेकट्टे होने के बावजूद भिखारियों की लाइन में बैठे होते हैं. इस से दानपुण्य का बाजार बढ़ता है.

रमजान के दिनों में भी भीख मांगने वालों की तादाद में एकाएक इजाफा हो जाता है. कुछ लोग सड़क पर मक्कमदीना जाने के लिए और चादर चढ़ाने के नाम पर भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

जिन के पास खुद मक्कामदीना जाने की हैसियत और समय नहीं होता है, वे भीख मांगने वाले को कुछ सहयोग दे कर पुण्य का फायदा उठाना चाहते हैं.

भीख मांगने वाले धर्म के नाम पर बेवकूफ बनाते हैं. कई लोग साधुमहात्मा का रूप धारण कर भीख मांगते फिरते हैं. ऐसे ढोंगी बाबाओं का तो असल मकसद भीख मांगना ही होता है, लेकिन लोगों को चमत्कार करने या आशीर्वाद देने का स्वांग भी वे भरते हैं. कई बार तो वे सीधेसादे लोगों को लूट भी लेते हैं.

कुछ ढोंगी और शातिर लोग बेजबान जानवरों का इस्तेमाल कर के भी भीख मांगते फिरते हैं, जो कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है. भीख मांगने के नाम पर विकलांग जानवरों को ‘ईश्वर की कृपा’ बता कर और उन्हें सजासंवार कर गाड़ी में भजन और गाने बजा कर जगहजगह पैसे ऐंठने का धंधा फलफूल रहा है.

इतना ही नहीं, हाथी जैसे बेजबान जानवर को भी गलीगली घुमा कर और बीच सड़क पर आनेजाने वालों को रोक कर लोग भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

रोहतास जिले के रहने वाले अजय कुमार का इस धार्मिक बुराई पर कहना है, ‘‘दरअसल, हिंदू धर्म में ब्राह्मणों और पंडेपुजारियों ने एक नया हथकंडा अपनाना शुरू कर दिया है, ताकि उन का धंधा दिनोंदिन फलताफूलता रहे. उन्होंने समाज में एक गलत बात फैला दी है कि जिन की छठ व्रत करने की हैसियत न हो, वे भीख मांग कर भी व्रत कर सकते हैं.

‘‘इस का नतीजा यह हुआ कि भीख मांग कर ज्यादा से ज्यादा लोग छठ व्रत करने लगें और पंडेपुजारियों को पूजापाठ कराने में अच्छी आमदनी होने लगे.’’

सब से ज्यादा बुरा तो तब लगता है, जब लोग राह चलते राहगीरों के आगे सूप और थाली फैला कर भीख लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगते हैं. कुछ लोग ट्रैफिक में घुस कर सूप ले कर छठ व्रत के नाम पर भीख मांगने लगते हैं.

कई बार दूसरे देशों से भी लोग यहां की संस्कृति से प्रभावित हो कर घूमनेफिरने आते हैं और इस तरह के लोगों को भीख मांगते देख कर यहां के लोगों के प्रति मन में गलत सोच बना लेते हैं, इसीलिए इस प्रदेश के लोगों को गरीब या पिछड़ा मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.

लिहाजा, जरूरी है कि आम लोगों को भी इस तरह की गलत प्रथा का विरोध करना चाहिए. ऐसे लोगों को भीख देने से बचना चाहिए, ताकि अपने देश प्रदेश की पहचान तरक्की और खुशहाली के लिए बने, न कि भीख मांगने के लिए. दानपुण्य भी भीख ही है, पर दान ठसके और रोब जमा कर वसूला जाता है.

मोबाइल जेल की गिरफ्त युवाओं की दुनिया

युवाओं की दुनिया आजकल ऐसे आइडल ढूंढ़ने लगी है जो कुछ करतेधरते नहीं हैं. मोबाइल पर रील्स, चुटकुले, गौसिप, एआई जेनरेटड हाफबेक्ड मोटिवेशनल मैसेज, पौर्न या सैमिपौर्न क्लिप्स ने इन्फ्लुएंसर्स की एक नई खेप तैयार कर दी जो राजनीति के लीडरों जैसे हैं जिन में कोई सौलिड बात कहने की न कैपेसिटी है और न ही कोई उन्हें सीरियसली लेता है.

जिन के लाखों फौलोअर्स हैं, वे पैसे तो कमा रहे हैं लेकिन फिल्मस्टारों से भी ज्यादा गए गुजरे हैं क्योंकि उन्होंने मोबाइल डिवाइस पर जो भी भेजा वह आम व्यूअर्स की जिंदगी को संवारने लायक है ही नहीं. कुछ मिनट बीत जाएं, मैट्रो या बस की जर्नी पूरी हो जाए, रैस्तरां में बैठे किसी के इंतजार में 10-15 मिनट बीत जाएं, इन रील्स की बस यही कीमत रह गई है. इन्फ्लुएंसर्स से ज्यादा इर्रिस्पौंसिबल तो वे व्यूअर्स हैं जो अपने समय की कीमत नहीं समझ रहे.

मोबाइल ने आज हर तरह की इन्फौर्मेशन को आप के हाथ में लाना पौसिबल कर दिया है. यह तो उन युवाओं की गलती है जो इस इंटैलिजैंट इन्वैंशन का इस्तेमाल बेवकूफी के कृत्यों में कर रहे हैं. आजकल जिंदगी कौंप्लैक्स होती जा रही है. सरकारों और कौर्पोरेटों का दखल आम जिंदगी में बढ़ रहा है. औनलाइन फैसिलिटीज के चक्कर में हरेक की प्राइवेसी पर बुरी तरह हमले हो रहे हैं.

मोबाइल में आप क्या देखें, यह कुछ लोगों की कंपनियों के हाथ में है. रील्स या मोटिवेशनल मैसेज आप देखते नहीं हैं, ये आप को दिखाए जाते हैं. यह देखने की आप की इच्छा नहीं जो आप देख रहे हैं बल्कि यह दिखाने की उन कंपनियों की इच्छा है जो इन प्लेटफौर्मों को चला रही हैं. हर मोबाइल ऐप आप के बारे में हरेक छोटी सी बात को भी जानना चाहती है.

अगर कभी आप से कोई गलती हो जाए तो आप की पूरी जिंदगी आप की उस गलती को पकड़ने वालों के हाथों में होगी. तब आप कहीं से भी छूट न सकेंगे. आज कुछ भी छिपाना आसान नहीं है. हैकर्स आप की जानकारी जमा कर आप को कभी भी ब्लैकमेल कर सकते हैं. सब से बड़ी बात यह है कि इस औनलाइन इन्फौर्मेशन, एंटरटेनमैंट, मैसेजिंग के पीछे आप को लूटने की साजिश रची गई है.

पहले आप को काफीकुछ मुफ्त में परोस कर मोबाइल पर बने रहने की लत डाली गई, ऐप्स ने लुभावने सपने दिखाए. फिर आप से पैसे मांगे जाने लगे. कुछ पैसों से शुरू कर ये लोग आप से अब सैकड़ों रुपए सालाना लेने लगे हैं. इन प्लेटफौर्मों पर सरकारों का कड़ा कंट्रोल है.

सरकार जब चाहे जिस प्लेटफौर्म की बांह मरोड़ सकती है. इन प्लेटफौर्मों को पैसा कमाना है, उन्हें व्यूअर्स के राइट्स से कोई मतलब नहीं है. वे सरकारों की हर बात मान रहे हैं. मोबाइलों की वजह से 10 साल पहले इजिप्ट में तख्ता पलट गया था. आज दुनियाभर की सरकारें अपने मतलब के लिए मोबाइल तकनीक का मिसयूज कर रही हैं. ओटीपी के चक्करों में आप को फंसा कर आप के समय को बरबाद किया जा रहा है. मोबाइल रिवोल्यूशन की अभी तो शुरुआत है.

एआई यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस के बाद इन्फ्लुएंसर्स भी कंपनियों के नकली लोग होंगे और व्यूअर्स अपनी असली कमाई देने को मजबूर हो रहे होंगे. टैक्नोलौजी कौर्पोरेट्स की तानाशाही शुरू हो चुकी है और उन की बनाई ‘मोबाइल जेलों’ में करोड़ों लोग पहले से ही फंस चुके हैं. आप किस खेत की मूली हैं.

आजादी का अमृतकाल : दलितों पर जुल्मोसितम की हद

देश में जातिवाद का जहर किस तरह ऊंची जाति वालों की नसनस में भरा है, उस के लिए 27 दिसंबर, 2023 का एक मामला देखिए. उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक 18 साल की दलित लड़की को सिर्फ इस बात के लिए गरम कड़ाही में धकेल दिया था, क्योंकि वह अपनी इज्जत से खिलवाड़ करने वालों की खिलाफत कर रही थी.

यह घटना बागपत जिले के बिनौली थाना क्षेत्र के एक गांव की है. पीडि़ता बुधवार, 27 दिसंबर, 2023 को गांव के ही एक कोल्हू की कड़ाही पर काम कर रही थी. तभी तीनों आरोपी प्रमोद, राजू और संदीप वहां आए और उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे. इस का विरोध करने पर उन्होंने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उस लड़की के साथ गलत बरताव किया. इतना ही नहीं, उन के अंदर इतना गुस्सा भर गया कि पीडि़ता को जान से मारने के इरादे से उसे गरम कड़ाही में फेंक दिया. इस के बाद वे तीनों वहां से भाग गए.

पीड़िता के भाई की शिकायत पर उन तीनों आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला), 504 (शील भंग करने के इरादे से अपमान), 307 (हत्या का प्रयास) और अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया.

दूसरे मामले ने तो दिल ही दहला दिया. वहां तो एक दलित लड़के से शादी करने पर एक लड़की का बेरहमी से खून कर दिया गया और ऐसा करने का इलजाम लगा दिया लड़की के मांबाप पर.

दरअसल, तमिलनाडु के तंजावुर जिले में पट्टुकोट्टाई के पास पूवालुर का रहने वाला एक दलित लड़का नवीन अपने पड़ोस के नेवाविदुति गांव की 19 साल की एक लड़की ऐश्वर्या से प्यार करता था.

नवीन और ऐश्वर्या बीते 5 सालों से एकदूसरे को जानते थे और पिछले 2 सालों से तिरुपुर जिले में काम कर रहे थे. उन्होंने आवरापलयम के विनयागर मंदिर में 31 दिसंबर, 2023 को शादी भी कर ली थी.

2 जनवरी, 2024 को इस शादी से गुस्साए ऐश्वर्या के मांबाप अपने रिश्तेदारों के साथ तिरुपुर जिले के पल्लाडम पुलिस स्टेशन पहुंचे और पुलिस से इस मामले में दखल देने की मांग की. थाने में मामला दर्ज कर लिया गया और पुलिस ने ऐश्वर्या को उस के मांबाप को सौंप दिया.

7 जनवरी, 2024 को नवीन ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई, जिस में कहा गया कि ‘वह अनुसूचित जाति से आता है और ऐश्वर्या पिछड़ी जाति से. दोनों के बीच कई साल से प्रेम चल रहा था.’

नवीन की शिकायत के मुताबिक, ‘ऐश्वर्या के पिता अपने रिश्तेदारों के साथ पुलिस स्टेशन गए. आधे घंटे बाद ही पल्लाडम पुलिस स्टेशन से ऐश्वर्या को उस के पिता और रिश्तेदारों ने अपने साथ लिया और पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी एक कार में बैठ कर चले गए.’

नवीन की शिकायत पर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में कहा गया कि ‘नवीन को सूचना मिली थी कि 3 जनवरी की सुबह ऐश्वर्या की हत्या कर दी गई थी और स्थानीय लोगों से छिपा कर शव को तत्काल श्मशान में जला दिया गया था.’

पुलिस ने भी अपनी जांच में कहा कि ऐश्वर्या को उस के अभिभावकों ने नेवाविदुति गांव में इमली के पेड़ से लटका दिया था.

अगस्त, 2023. मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक दलित नौजवान की पीटपीट कर हत्या कर दी गई थी. आरोपियों ने उस नौजवान को बचाने पहुंची उस की मां को भी पीटा और उन के कपड़े भी फाड़ डाले.

दरअसल, मारे गए उस नौजवान की बहन के साथ कुछ दिनों पहले आरोपियों ने छेड़छाड़ की थी, जिस का केस दर्ज हुआ था. वे आरोपी पीडि़त परिवार पर राजीनामा करने का दबाव बना रहे थे.

यह घटना सामने आने के बाद पुलिस ने 9 नामजद और 4 दूसरे आरोपियों के खिलाफ हत्या समेत दूसरी धाराओं में केस दर्ज किया. पुलिस ने मुख्य आरोपी समेत 8 आरोपियों को गिरफ्तार भी किया.

मारे गए उस नौजवान की बहन ने कहा, ‘गांव के विक्रम सिंह, कोमल सिंह और आजाद सिंह घर पर आए थे. मां से कहने लगे कि राजीनामा कर लो. मां ने कहा कि जब पेशी होगी, तो उसी दिन राजीनामा कर लेंगे, तो उन्होंने कहा कि क्या आप को अपने बच्चों की जान प्यारी नहीं है? ऐसा बोल कर वे धमकी दे गए कि जो हमें जहां मिलेगा, उस को निबटा देंगे.

‘मेरा छोटा भाई बसस्टैंड के पास सब्जी लेने गया था. वह वहां से लौट रहा था. रास्ते में आरोपी उस के साथ मारपीट करने लगे. वह भागने लगा, तो कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया.

‘मम्मी जब बाजार की तरफ गईं तो देखा कि वे भाई के साथ मारपीट कर रहे हैं. मम्मी उस को बचाने पहुंचीं. आरोपियों ने मम्मी को भी पीटा. जब मैं वहां गई और मोबाइल फोन से पुलिस को काल करने लगी, तो उन लोगों ने मेरे साथ भी मारपीट शुरू कर दी. मैं ने हाथ जोड़े, पैर पड़ कर कहा कि मेरे भाई को छोड़ दो, पर उन्होंने नहीं छोड़ा.’

इस मुद्दे पर कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, ‘मध्य प्रदेश के सागर में एक दलित नौजवान की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. गुंडों ने उस की मां को भी नहीं बख्शा. सागर में संत रविदास मंदिर बनवाने का ढोंग रचने वाले प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश में लगातार होते दलित व आदिवासी उत्पीड़न और अन्याय पर चूं तक नहीं करते. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री केवल कैमरे के सामने वंचितों के पैर धो कर अपना गुनाह छिपाने की कोशिश करते हैं.’

मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना सही है कि प्रधानमंत्री एक तरफ तो संत रविदास का मंदिर बनवाने का ढोंग करते हैं, पर दूसरी तरफ वे उन पर होने वाले जुल्म पर चुप्पी साध लेते हैं. क्या दलितों के पैर धोने से समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा मिल जाएगा? बिलकुल नहीं, क्योंकि जब तक हर दलित को पढ़ने का हक नहीं मिलेगा, तब तक समाज में जातिवाद की खाई और गहरी होती जाएगी.

एक फिल्म से दलित समाज की हकीकत सम झते हैं, जिस का नाम है ‘गुठली लड्डू’. इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह भारतीय समाज में फैली जातिवाद की सड़ांध नाक के बाल जलाती हुई सीधा दिमाग की नसों में बजबजाने लगती है.

‘अस्पृश्यता अपराध है’ और ‘शिक्षा पर सब का समान अधिकार’ के मुद्दे पर बुनी गई यह फिल्म समाज के उस तबके की जहालत, बेबसी और गरीबी को उजागर करती है, जिसे गलीज सम झा जाता है. वह तबका जो दूसरों की गंदगी साफ करता है और जिस के घर का पानी पीना भी बड़ी जाति के लोगों के लिए हराम है.

साल 2023 में आई इस फिल्म की कहानी के 2 मासूम और मेन किरदार हैं गुठली (धनय सेठ) और लड्डू (हीत शर्मा). ये दोनों दोस्त हैं और छोटी जाति के 2 हमउम्र बच्चे भी. गुठली को पढ़ने का शौक है. या यों कहें कि जुनून है, पर चूंकि वह दलित समाज से है तो उसे स्कूल में घुसने तक नहीं दिया जाता है.

इस फिल्म की कहानी तब अचानक मोड़ लेती है, जब लड्डू अपने बापदादा का पुश्तैनी काम मतलब साफसफाई करने की हामी भर देता है और एक दिन गटर में गिरने से उस की मौत हो जाती है. यह देख कर गुठली का बापू उसी दिन से ठान लेता है कि कुछ भी हो जाए, वह अपने बेटे को स्कूल भेजेगा और इस गटर जैसी गंदी जिंदगी से बाहर निकालेगा.

गुठली के बापू की इसी जद्दोजेहद में फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है और इस हकीकत से रूबरू कराती है कि आज भी अनपढ़ दलित की जिंदगी किस नरक में कट रही है और अगर वह अपने हक की बात करता है, तो उसे लतिया दिया जाता है.

गरीब, अनपढ़ दलितों और साफसफाई करने वालों की असली जिंदगी में  झांकें तो उन की हालत भी गुठली और लड्डू से ज्यादा अच्छी नहीं है. भले ही संविधान ने सब को बराबरी का हक दिया है, पर आज भी न जाने कितने गुठली और लड्डू पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर हैं और न चाहते हुए भी छोटी जाति का होने की सजा दूसरों की गंदगी साफ कर के पाते हैं.

‘स्वच्छ भारत’ के हल्ले के बीच साल 2023 के मार्च महीने में हरियाणा के पानीपत में नगरनिगम के गटर की सफाई करते हुए 2 मुलाजिमों की मौत हो गई थी. ऐसा पूरे देश में होता है, पर हैरत की बात तो यह है कि हर साल सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए मरने वालों का आंकड़ा कम होने

के बजाय बढ़ता ही जा रहा है. सरकार खुद मानती है कि साल 2019 में पूरे देश में सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए 110 लोगों की जानें चली गई थीं.

ऊपर से बड़ी जाति वालों का उन्हें नाली का कीड़ा सम झना. उन के हाथ से पैसे तो वे ले लेंगे, पर अगर गलती से वे बड़ी जाति वाले की साइकिल छू देंगे, तो उस साइकिल को कई बार धोने का रोना रोएंगे.

जुल्म की खास वजहें

सब से बड़ी वजह तो यह है कि दलितों को सभ्य समाज का हिस्सा ही नहीं सम झा जाता है. उन्हें धर्म ने अछूत माना है और हर तथाकथित बड़ी जाति वाले के मन में यह गहरे तक पैठ चुका है कि अनुसूचित जाति के लोगों को नीचा दिखाने और उन पर अपना रोब जमाना उन का जन्मजात हक है. तभी तो कोई दलित मूंछ रख ले तो उसे लतिया दिया जाता है. कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढ़ जाए, तो उसे सबक सिखा दिया जाता है.

अनुसूचित जाति की औरतों और लड़कियों को तो सरेआम शर्मिंदा करने की खबरें आएदिन सुर्खियों में बनी रहती हैं. स्कूलकालेज में धमकाया जाता है. छात्रों को ही नहीं, बल्कि दलित समाज के टीचरों और प्रोफैसरों को भी जाति के आधार पर सताया जाता है. दलित समाज पर जोरजुल्म की घटनाओं के पीछे लोगों की छोटी सोच और इंसाफ में देरी की वजह से लोगों में कानून का डर कम हो रहा है.

कोढ़ पर खाज यह कि लाखों मामले ऐसे होते हैं, जिन में केस दर्ज नहीं किया जाता है या मामले दबा दिए जाते हैं. सागर वाले मामले में नौजवान की हत्या इसीलिए हुई थी कि उस का परिवार राजीनामा नहीं कर रहा था.

आजादी के अमृतकाल में समाज का यह घिनौना रूप उन लोगों पर तमाचा है, जो देश के हर जने की भलाई की बात तो करते हैं, पर हकीकत में उन से होता जाता कुछ नहीं.

‘फुलेरा’ के बहाने अंधविश्वास की खुलती पोल

तकरीबन 4 साल पहले आई दीपक मिश्रा के डायरैक्शन में बनी वैब सीरीज ‘पंचायत’ नौजवान तबके द्वारा काफी पसंद की गई थी, क्योंकि इस में फुलेरा गांव के बहाने भारत की देहाती जिंदगी की झलक दिखाई गई थी, जिस से जब पढ़ालिखा नयानया बना शहरी पंचायत सचिव अभिषेक त्रिपाठी (जितेंद्र कुमार) रूबरू होता है, तो हैरान हो उठता है कि गांव की राजनीति में आज भी दबंगों का रसूख चलता है और उस में भ्रष्टाचार भी जम कर होता है.

इसी वैब सीरीज के एक प्रसंग में अंधविश्वासों का भी जिक्र है. होता कुछ यों है कि एक योजना के तहत गांव में सोलर एनर्जी के 11 खंभे लगाने की मंजूरी मिली हुई है. पंचायत की मीटिंग में सभी रसूखदार अपने घरों के सामने खंभा लगाने का प्रस्ताव पास करा लेते हैं.

एक आखिरी खंभा लगने की बात आती है, तो उसे गांव के बाहर की तरफ पेड़ के पास लगाने का प्रस्ताव आता है. पर गांव वाले मानते हैं कि उस पेड़ पर भूत रहता है.

अभिषेक त्रिपाठी चूंकि एमबीए कर रहा है, इसलिए पढ़ाई की अपनी सहूलियत के लिए चाहता है कि आखिरी बचा हुआ खंभा पंचायत औफिस के बाहर लग जाए, जहां वह एक कमरे में रहता है. भूत वाली बात पर उसे यकीन नहीं होता, इसलिए वह उस की सचाई जानने के लिए निकल पड़ता है.

अभिषेक त्रिपाठी को पता चलता है कि कुछ साल पहले गांव के एक सरकारी स्कूल के मास्टर ने अपनी नशे की लत छिपाने के लिए यह झठ फैलाया था, जो इस कदर चला था कि कई गांव वालों को भूत होने का एहसास हुआ था.

कइयों को अंधेरी रात में उस भूत ने पकड़ा और दौड़ाया था. राज खुलता है, तो सभी हैरान रह जाते हैं और खंभा अभिषेक त्रिपाठी की मरजी और जरूरत के मुताबिक लग जाता है.

देश में इन दिनों भूत वाले एक नहीं, बल्कि कई ?ाठसफेद, कालेहरे, पीलेभगवा, नीले सब इफरात से चल नहीं, बल्कि दौड़ रहे हैं. नशेड़ी मास्टर तो सिर्फ भूत होने की बात कहता है, लेकिन कई लोग बताने लगते हैं कि यह भूत उन्होंने देखा है.

कच्चे चावलों की खिचड़ी बनाने का काम इतने आत्मविश्वास से जोरों पर है कि झठ और सच में फर्क कर पाने के मुश्किल काम को छोड़ लोग झठ को ही सच करार देने लगे हैं कि कौन बेकार की कवायद और रिसर्च के चक्कर में पड़े, इसलिए मास्टरजी जो कह रहे हैं, उसे ही सच मान लो और उस का इतना हल्ला मचाओ कि कोई हकीकत जानने के लिए पेड़ के पास जाने की हिम्मत ही न करे.

गलत नहीं कहा जाता कि झठ के पैर नहीं होते. दरअसल, झठ के मीडिया और सोशल मीडिया रूपी पंख होते हैं, जिन के चलते वह मिनटों में पूरा देशदुनिया घूम लेता है और सच कछुए की तरह रेंगता रहता है.

झठ में अगर धर्म, अध्यात्म और दर्शन का भी तड़का लग जाए, तो वह और अच्छा लगने लगता है. आप लाख पढ़ेलिखे हों, लेकिन आग और ऊर्जा में फर्क नहीं कर पाएंगे और जब तक सोचेंगे और उस पर अमल करेंगे, तब तक गंगा और सरयू का काफी पानी बह चुका होगा.

अब से तकरीबन 28 साल पहले साल 1995 में अफवाह उड़ी थी कि मंदिरों में गणेश दूध पी रहे हैं. बस, फिर क्या था. देखते ही देखते गणेश मंदिरों में भक्त लोग दूध का कटोरा ले कर उमड़ पड़े थे.

जिन्हें गणेश के मंदिरों में जगह नहीं मिली, उन्होंने घर में रखी मूर्तियों के मुंह में जबरन दूध ठूंस कर प्रचारित कर दिया कि उन की मूर्ति ने भी दूध पीया. जिन के घर गणेश की मूर्ति नहीं थी, उन्होंने राम, कृष्ण, शंकर और हनुमान तक को दूध पिला दिया.

उस अफरातफरी का मुकाबला वर्तमान दौर की कोई आस्था नहीं कर सकती, जिस के तहत भक्तों के मुताबिक भगवान ने समोसे, कचौड़ी, छोलेभटूरे, जलेबी और बड़ा पाव भी खाए. सार यह है कि मूर्तियों में इंद्रियां होती हैं और प्राण भी होते हैं. समयसमय पर यह बात अलगअलग तरीकों से साबित करने की कोशिश भी की जाती है.

अब मूर्तियां पलक झपकाएं, हंसें और रोएं भी तो हैरानी किस बात की. हैरानी सिर्फ इस बात पर हो सकती है कि 21 सितंबर, 1995 की आस्था असंगठित थी, उस के लिए कोई समारोह आयोजित नहीं करना पड़ा था और न ही खरबों रुपए खर्च हुए थे. बस, कुछ करोड़ रुपए लिटर दूध की बरबादी हुई थी.

तब भी विश्व हिंदू परिषद ने इसे सनातनी चमत्कार कहा था और दुनियाभर के देशों में रह रहे हिंदुओं ने मूर्तियों को दूध पिलाया था. तब भी मीडिया दिनरात यही अंधविश्वास और पाखंड दिखाता और छापता रहा था.

भारत में नागपंचमी पर नाग को दूध पिलाने का रिवाज है, जबकि यह कोरा अंधविश्वास है, क्योंकि सांप दूध पीता ही नहीं है. लोग यह मानते हैं कि इस दिन सांप को दूध पिलाने से उन की हर इच्छा पूरी होगी, पर यह सच नहीं है.

यह विश्वास या आस्था होती ही ऐसी चीज है, जिस में न होने का एहसास कोई माने नहीं रखता. कोई है और आदि से है और अंत तक रहेगा, यह फीलिंग बड़ा सुकून देती है. फिर चाहे वह पेड़ वाला भूत हो या फिर कोई मूर्ति हो, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.

सच यही है कि यह एक विचार है और रोटी, पानी, रोजगार और दीगर जरूरतों से ज्यादा देश को विचारों की जरूरत है, जिस से दुनिया देश का लोहा माने कि देखो इन्हें भूखेनंगे और फटेहाल हैं, लेकिन इन के विचार बड़े ऊंचे हैं.

इस चक्कर में देश बेचारों का बन कर रह जाए, इस की परवाह जिन को है वे वाकई बेचारे हैं और पत्थर से सिर फोड़ने की बेवकूफी कर रहे हैं. लेकिन यकीन मानें तो यही वे लोग हैं, जो एक न एक दिन अभिषेक त्रिपाठी की तरह अंधविश्वास के भूत के सच उजागर करेंगे.

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