मजाक: गीले और पीले पाजामे में होली

अपने पसंदीदा ‘नटखट हिंदू विश्वविद्यालय, कठोरगंज, जिला चूमतापुर, नंगा प्रदेश’ के प्रांगण में टहलते हुए मुझे एक डायरी हाथ लगी. खोल कर देखने पर मैं समझ गया कि हो न हो यह किसी शरीर विज्ञान विषय के छात्र की है, क्योंकि उस में ‘गीले और पीले पाजामे में होली’ विषय पर निबंध की तैयारी का मसौदा था. उस ने अपने निबंध में लिखा था :

होली रंगों का त्योहार है और होली पर पाजामा आगे से गीला और पीछे से पीला होना कोई अनोखी बात नहीं है. होली है तो पाजामा तो गीला और पीला होगा ही न. अनोखी और राज वाली बात तो यह है कि आखिर पाजामा कैसे गीला और पीला हुआ?

मेरी रिसर्च में पहले पाजामे के गीले होने का ब्योरा है कि पाजामा गीला होने की 3 वजहें हो सकती हैं. पहली, किसी ने जबरदस्ती होली का गीला रंग डाल दिया हो. दूसरी, पाजामा डर के मारे गीला हुआ हो कि होली है पता नहीं कौन सी सविता टाइप भाभी आ कर पाजामा खींच ले और अंदर तक रंग दे.

वैसे, होली पर बड़ी टाइप की भाभियों की बात भी निराली छटा बिखेरती है. 45-46 की उम्र के बाद तो भाभियों के हर महीने में कुछ लाल होना मुमकिन ही नहीं होता है. झुर्री पड़ी ढीली त्वचा के आपस में चिपकने, रूखे और सूखेपन से निबटने के लिए भी उन्हें चिकनेपन के अहसास के लिए मौश्चराइजिंग क्रीम के भरोसे ही रहना पड़ता है.

सो, फिर से लाललाल होने और लाललाल करने की ख्वाहिश से उन्हें होली का इंतजार रहता ही होगा और वे पकड़ ही लेती होंगी अपने किसी न किसी घर वाले से ज्यादा प्यारे लगने वाले बाहर वाले जवां देवर को.

और तीसरी वजह, रात में पड़ोस वाली भाभी और सगी या पराई साली के साथ होली के गंदे गुप्त स्वप्न देख कर दोष के चलते भी पाजामा गीला हो सकता है. अपने देश में स्वप्नदोष नौजवानों की एक गंभीर समस्या है.

अपने देश में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर एक चीज मिलती है, जिसे आप बिना रोकटोक चुपचाप उठा कर अपने घर ला कर सपत्नी उस का इस्तेमाल कर सकते हैं. ऐसी चीज जो स्वास्थ्य केंद्रों से उठा कर जितनी चाहो उतनी ला सकते हो यानी जितने पैकेट उठा सको और अपनी जेब में भर सको भर कर ले आओ. चोरी का कोई इलजाम नहीं लगेगा, न ही कोई एफआईआर दर्ज करवाई जाएगी.

केंद्रों पर लगे खुफिया कैमरों में अगर आप की तसवीर कैद भी हो गई तो भी कुछ नहीं कहा जाएगा. आप समझ ही गए होंगे उस चीज का नाम. क्या कहा नहीं समझे? तो भैया, जान लो कंडोम यानी निरोध.

बढ़ते परिवार पर कंट्रोल रखने के लिए सरकार ने अब नए खुशबूदार व लुब्रिकैंट वाले कंडोम सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर मुहैया करा दिए हैं. एक पैकेट में पूरी 5 होली के लिए सालभर जमा करो तो सैकड़ों कंडोम.

होली का मौका और ऊपर से हमारी सविता भाभी की उस्तादी कम न थी. सुरक्षित जीवन जीने का आनंद लेना तो उन्हें ही आता था. सालभर इन केंद्रों पर जबजब अपना स्वास्थ्य चैकअप करवाने जातीं तो झोली भरभर कर फ्री के कंडोम के पैकेटों को ले आतीं और अपने बक्से में रख लेतीं.

भैया का पाजामा भले ही गीला हो जाए, मगर वे झंझट बिना सुरक्षित आनंद लेने का अनुभव पाने में ज्यादा यकीन रखती थीं और अब उम्र के 45वें पड़ाव को कामयाबी से पार कर लेने के बाद तो एकदम निश्चिंत थीं.

होली थी. सो, उन्होंने अपने बक्से में रखे हुए सैकड़ों सरकारी कंडोम निकाले और महल्ले के छोटे बच्चों को थमा दिए कि बच्चों इन में भरो रंग और कर दो पूरे महल्ले के मर्दों यानी अपने अंकलों का पाजामा गीला और पीला.

बच्चे भी पहली बार इतने बड़ेबड़े गुब्बारे देख कर खुश और जोश से भरे थे. बस, एक ही दुख था कि वे रंगीन नहीं थे. हलके पीले जरूर थे. खैर, बच्चों का खूब काम चल गया. कुछ ने हवा भर कर उड़ाए व कुछ ने पक्के रंग भर कर दे मारे अंकल के चिकने कूल्हे पर.

सो, उन का सफेद पाजामा फर्र से गीला और पीला हो गया यानी होली पर बच्चों द्वारा फेंके गए पानी भरे सरकारी गुब्बारों का फटना और फाड़ना भी पाजामा गीला और पीला कर देता है जनाब और खासतौर से पाजामा पीछे से पीला तो तभी होता है जब या तो पाजामाधारी ने होली पर बने पकौड़ों का जरूरत से ज्यादा सेवन किया हो या फिर किसी लुगाई ने अपने हाथ पीले कर के होली के मौके का फायदा उठाया हो और जम कर अपनेपराए पाजामाधारी के पीछे पीले रंग से रगड़ाई की हो.

 

होली पर अपनाअपना पाजामा गीला और पीला हुआ देख महल्ले के सभी मर्द जब अपनेअपने घरों में घुसने लगे तो महल्ले की दूसरी बूढ़ी औरतों ने भी मौके का फायदा उठा कर कहा, ‘अरे ओ मर्दो, निकलो बाहर. और आओ हमार संग जरा लट्ठमार होली भी खेल लो. सालभर रोज रात को अपनीअपनी लुगाइयों के साथ बहुत बजा लिया अपनाअपना लट्ठ.

‘बहुत लालपीली कर ली अपनी लुगाई. अब आज होली पर कमजोर काहे पड़ रहे हो. ज्यादा चीनी खा कर मुंह न लटकाओ, करेले का जूस पिया करो जो हमेशा तने रहो और डटे रहो. कुछ नहीं तो बदन पर तेल लगाओ और आ जाओ सामने. हम बिना लट्ठमार पिचकारी के ही रंग दिए तोहे आज. होरी है, पाजामा कस ले और आ जा होरी खेलन.’

मौजमस्ती के त्योहार में अब डर काहे का और काहे की शर्म. वैसे भी होली पर पाजामा गीला हो या लट्ठमार होली हो, आखिर कौन डरता है. सभी मर्द हैं तो भला क्यों डरेंगे.

सभी ने जम कर लट्ठमार होली खेलनी चाही तो बेचारे बूढ़ी औरतों के सामने अपनाअपना पाजामा फटतेफटते किसी तरह सुरक्षित बचा पाए, पर उसे आगे से गीला और पीछे से पीला होने से वे नहीं बचा पाए. बस, यही बोले, ‘पाजामा आगे से गीला और पीछे से पीला है, जरा संभल के हमार भौजी, जोगीरा सारारारा… जोगीरा सारारारा…’

अपने निबंध के आखिर में उस छात्र ने लिखा कि जांचकर्ता महोदय, मैं ने अपने निबंध में मौलिकता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की. वैसे भी आप ने ही सिखाया है कि इम्तिहान में पूछे गए सवालों के जवाबों को लिखने की जरूर कोशिश करनी चाहिए. अपनी उत्तर पुस्तिका कभी खाली छोड़ कर नहीं आनी चाहिए.

जब लिखोगे ही नहीं तो फिर परिचित जांचकर्ता को ऐक्स्ट्रा नंबर देने का मौका ही कहां लगेगा, इसलिए मैं ने जोकुछ भी लिखा है, उस पर आप को नंबर देने ही चाहिए वरना मैं ने पुलिस में भरती होने का मन बना लिया है. वहां से ऐनकाउंटर कर के सामने वाले को मारने की कला सीख कर आप के सामने एक दिन जरूर आऊंगा. फिलहाल होली तो गीले और पीले पाजामे में हो ली है जनाब.

Hindi Story: कमली बदचलन नहीं – फिर एक ब्याहता कैसे फिसली

Hindi Story. कमली ने दरवाजे की दरार से ही झांक लिया था कि बाहर धरमराज खड़ा है, फिर भी दरवाजा खोलने पर वह ऐसे चौंकी, जैसे चोरी करते हुए रंगेहाथ पकड़ ली गई हो.

कमली मुंह पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘हाय, तो तुम हो… मैं इतनी देर से पूछ रही हूं, बोल भी नहीं सकते थे कि मैं हूं.’’

धरमराज ने अंदर आते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है चाची, मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

बोलतेबोलते धरमराज की नजर जब कमली पर पड़ी, तो वह ठगा सा उसे देखता रह गया.

कमली शायद उस समय नहा रही थी और यही वजह थी कि उस ने उस समय साड़ी के नीचे कुछ भी नहीं पहन रखा था.

जिस्म पर चिपके हुए गीले आंचल ने उस समय धरमराज को मदहोश कर दिया. वह फटी आंखों से कमली को देखता ही रह गया.

कमली ने बनावटी गुस्से से कहा, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हो? बड़े बेशर्म हो तुम. बैठो, मैं नहा कर आती हूं…’’

इतना कह कर कमली फिर से नहाने को मुड़ी, लेकिन धरमराज ने उस का हाथ पकड़ कर रोक लिया.

उस समय धरमराज की आंखें लाल सुर्ख हो रही थीं और सारा बदन जोश के मारे कांपा जा रहा था. उस ने आव देखा न ताव तुरंत कमली को अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘जो नहाना था, वह तुम नहा चुकी हो, इसलिए अब तुम्हें मैं नहलाऊंगा…’’

कमली सिकुड़ते हुए बोली, ‘‘बड़े बेशर्म हो जी तुम… हटो, मुझे कपड़े तो पहन लेने दो…’’

‘‘जल्दी क्या है… फिर पहन लेना कपड़े. इतनी गरमी है, थोड़ी देर ऐसे ही बदन ठंडा होने दो. फिर जो नहाना हम कराएंगे, उस में कपड़ों का क्या काम…’’ कहतेकहते धरमराज ने कमली को और जोर से भींच लिया.

कमली भी और दिखावा नहीं कर सकी और चुपचाप बांहों में समा गई. उस की छाती में नाखून धंसाते हुए वह बोली, ‘‘क्या कर रहे हो तुम? अभी कोई आ गया तो… बदनामी होते देर नहीं लगेगी…’’

‘‘आएगा कैसे… मैं ने तो दरवाजे पर पहले ही अंदर से कुंडी लगा दी है.’’

‘‘यानी तुम्हारी नीयत पहले से ही खराब थी…’’

‘‘चाची, मेरी नीयत डिगाने वाली भी तो तुम ही हो…’’

बात सच भी थी. कमली के पति मास्टर विद्याधर दुबे की एक शादी पहले ही हो चुकी थी. उन की पहली पत्नी जानकी देवी के बहुत दिनों तक जब कोई औलाद नहीं हुई, तब वे दूसरी शादी करने का पूरा मन बना चुके थे, लेकिन उन्हीं दिनों शादी के 8 साल बाद अचानक जानकी देवी पेट से हो गई, तो मास्टर साहब के मन की बात मन में ही रह गई.

मास्टर विद्याधर दुबे का बेटा मनोज अभी 10 साल का ही हुआ था कि अचानक जानकी देवी बीमार पड़ी और चल बसी. उस समय घर संभालने की समस्या सामने आ गई.

मास्टर विद्याधर दुबे कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे क्या करें, बेटे मनोज की उम्र भी अभी काफी कम थी. लेकिन अड़ोसीपड़ोसी दूसरी शादी करने की राय देने लगे, तो उन्होंने एक पल भी देर नहीं लगाई और 25 साल की कमली को दुलहन बना कर घर ले आए.

उस समय मास्टर विद्याधर दुबे की उम्र 43 पार कर चुकी थी. हिंदू धर्म ग्रंथों में कन्या के लिए दोगुनी उम्र का वर चल जाता है, लेकिन असल जिंदगी में इस की सचाई तो कोई कमली से पूछे.

दिनभर स्कूल में पढ़ाने के बाद कुछ ट्यूशन भी निबटा कर मास्टर विद्याधर दुबे थकेमांदे घर लौटते हैं, तो जवानी से उमड़ती 25 साला रूपसी पत्नी कमली को देखते ही उन की आंखें चमक उठतीं. कभीकभी तो वे कमली को देखते ही इतने बेताब हो उठते हैं कि खानेपीने तक का भी इंतजार करना उन के लिए मुश्किल हो जाता.

मास्टर विद्याधर दुबे बेचैनी से कमली को अपने पास खींच लेते और भूखे बालक की तरह मचलने लगते. कमली कितना भी मना करती रहे, लेकिन मास्टर विद्याधर दुबे मानमनुहार कर के उस के बदन से एकएक कपड़ा उतार देते और कहते, ‘‘एक बार मुझे जी भर कर देख लेने दो…’’

फिर वे कमली की देह पर उसी तरह से हाथ फेरते, जैसे कोई गाय को दुहने से पहले उस पर हाथ फिराता है.

लेकिन उन्हें उतना सब्र नहीं था, जितना होना चाहिए था. कमली की देह पर हाथ फिरातेफिराते अचानक बेचैन हो कर उस पर टूट पड़ते हैं, लेकिन पलभर बाद ही उन की मर्दानगी रूपसी कमली की जवानी की गरमी के सामने ज्यादा देर नहीं झोल पाती थी. कुछ ही देर की छेड़खानी के बाद वे पस्त हो कर एक ओर लुढ़क जाते. फिर उन्हें जाने कब गहरी नींद घेर लेती.

लेकिन प्यासी इच्छा की आग से तड़पती हुई कमली कभीकभी सारी रात करवटें बदलती रह जाती. हरदम लगता, जैसे बदन पर चींटियां रेंग रही हों.

कमली बदचलन नहीं है, लेकिन मन की तड़प ने तन की भूख मिटाने के लिए उसे रास्ता बदलने को मजबूर कर दिया.

धरमराज मास्टर विद्याधर दुबे का छात्र रह चुका था. उसी वजह से वह अकसर उन से बातें करने आ जाता था और गांव के नाते कमली को ‘चाची’ कह कर बुलाता था. लेकिन कमली ने लुभाना शुरू किया, तो धरमराज को समझाते देर नहीं लगी.

आखिरकार उस दिन मौका मिल ही गया. कमली नहा रही थी, तभी धरमराज आ पहुंचा. कमली ने जानबूझ कर गीले कपड़ों में दरवाजा खोल दिया, फिर तो जो कुछ हुआ, उस में कमली की पूरी तरह रजामंदी थी.

बहुत दिनों तक कमली और धरमराज का यह खेल चलता रहा, पर एक दिन अचानक मनोज ने उन दोनों को गंदी हरकत करते देख लिया. वह बोला, ‘‘तुम यह क्या कर रही हो नई मां? मैं अभी जा कर पिताजी से कहता हूं.’’

मनोज ने स्कूल में जब अपने पिता को सारी बात बताई, तो मास्टर विद्याधर दुबे को एकाएक भरोसा ही नहीं हुआ. फिर वे पैर पटकते हुए घर पहुंचे, तो बाहर दरवाजे पर ताला झेल रहा था.

उन्होंने धरमराज के घर जा कर पूछा, तो पता चला कि वह भी लापता है. शाम होतेहोते पूरे इलाके में यह खबर फैल गई कि मास्टर विद्याधर दुबे की दूसरी पत्नी कमली धरमराज के साथ भाग गई.

लेकिन किसी को ताज्जुब नहीं हुआ. जैसे सब पहले से ही जानते थे कि मास्टरजी ने ढलती उम्र में इतनी जवान लड़की के साथ घर बसाया है, तो एक दिन तो ऐसा होना ही था. Hindi Story

Romantic Story: मजाक – वैलेंटाइन डे

फरवरी का महीना आते ही दद्दन चचा का फेफड़ा फड़फड़ाने लगता है. उन पर वसंत का खुमार फूटती जवानी से तब हावी हो गया था, जब हलकीहलकी मूंछों ने उन के सवा सौ ग्राम वाले कुपोषित चेहरे पर अपनी पिच तैयार की थी.

किंतु दद्दन चचा के लव प्लांट पर लवेरियासिस नामक ऐसा फंगस लगा कि प्यार की पंखुड़ी कभी खिल ही नहीं

पाई. ‘पलभर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही…’ देवानंद की इन फिल्मी सूक्तियों में घोर आस्था रखने वाले दद्दन चचा को ताउम्र प्यार में नाकामी ही मिली.

साल 1995 की घटना है, जब फरवरी महीने में बोर्ड ऐग्जाम और वैलेंटाइन डे दोनों साथसाथ आए थे. दद्दन चचा मैट्रिक के बजाय मुहब्बत को ले कर ज्यादा नर्वस थे. बोर्ड ऐग्जाम के दौरान घुसपैठ कर चुके वैलेंटाइन डे वाले दिन दद्दन चचा ने काफी हिम्मत कर के अपनी सहपाठी शकुंतला को फूल दे डाला. फिर शकुंतला के भाई और पूज्य पिताजी ने फूल के बदले जो इन का पिछवाड़ा फुलाया कि बैठ कर बोर्ड के बाकी पेपर देने की हालत में नहीं रहे.

मैट्रिक और मुहब्बत दोनों में फेल दद्दन चचा को कभी महबूबा नहीं मिली और कभी वैलेंटाइन डे पर इजहार करने की हिमाकत की तो कभी लड़की के घर वालों, कभी संस्कृति बचाने वालों, तो कभी बजरंग दल वालों ने प्यार का पोस्टमार्टम और पंचनामा साथसाथ कर दिया.

समय बीतता गया. दद्दन चचा परिणय सूत्र में बंध गए, लेकिन प्रेम सूत्र को अब तक गांठ नहीं लग पाई थी. फिर एक दिन किसी ने दद्दन चचा को सोशल मीडिया की असीम ऊर्जा का बोध कराया कि कैसे फेसबुक पर होने वाले प्यार की वजह से सात समंदर पार की सुंदरी भारत आ जाती है. कैसे भिखारी का गाना रातोंरात वायरल हो जाता है. कैसे सोशल मीडिया के चलते फिल्में हिट और पिट जाती हैं.

फिर क्या था, दद्दन चचा ने आननफानन ही कर्ज ले कर फरवरी के पहले हफ्ते एक धांसू स्मार्टफोन खरीद लिया. दारू और चखना के प्रौमिस पर महल्ले के लौंडों की मदद से ‘डैशिंग डेविड’ नाम से अपना फेसबुक अकाउंट बनवा लिया.

यों तो दद्दन चचा उदार दिल वाले खर्चीले इनसान हैं, पर उस दिन न जाने क्या हुआ कि एफबी एकाउंट बनाने के बाद लड़कों को बीड़ी तक का पैसा दिए बिना दुत्कार कर भगा दिया.

प्रोफाइल पिक्चर में अपने पिचके गाल और झुर्रियों वाली त्वचा वाले थोबड़े के बजाय ब्यूटी एप पर मोडिफाइड अपना 20 साल पहले का फोटो चिपका डाला. फिर थोक के भाव में महिला फेसबुक उपभोक्ताओं को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजना शुरू कर दिया.

48 घंटे के घोर इंतजार के बाद एक दिन पड़ोसी शहर की ‘कमसिन काव्या’ ने उन की दोस्ती एक्सैप्ट कर ली. दद्दन चचा ने खुश हो कर मैसेंजर में ‘हाय’ भेज कर चैटिंग का आगाज किया. जवाब में ‘कमसिन काव्या’ की ओर से हिलता हुआ हाथ वाला इमोजी प्रकट हुआ. फिर तो दोनों ओर से संदेशों का आयातनिर्यात दिनरात बेरोकटोक होने लगा.

तथाकथित 35 साल के ‘डैशिंग डेविड’ और 22 साल की ‘कमसिन काव्या’ की औनलाइन मैत्री वाली नौका प्रेम सागर में डूबने को उतावली थी.

दद्दन चचा ने 11 फरवरी (प्रौमिस डे) पर मां की कसम खा कर अपनी अंतरात्मा से प्रौमिस किया कि चाहे सरकार गिर जाए या संस्कार, इस बार वैलेंटाइन डे पर ‘कमसिन काव्या’ को प्रपोज कर के ही मानेंगे.

13 फरवरी (हग डे) को संताबंता की भरतमिलाप वाली इमोजी भेज कर दद्दन चचा ने ‘कमसिन काव्या’ को होटल ‘मूनलाइट’ में मिलने का न्योता  दे डाला.

‘कमसिन काव्या’ भी इश्क के उड़ते हुए तीर से मानो अपने दिल को छलनी करवाने के लिए तैयार बैठी थी. झट से न्योता स्वीकार कर 14 फरवरी को सुबह 9 बजे गुलाबी सूट में होटल ‘मूनलाइट’ में मिलने को तैयार हो गई.

मारे खुशी के दद्दन चचा को सारी रात नींद नहीं आई. खुली आंखों से करवटें बदल कर किसी तरह वे उस रात की कैद से आजाद हुए.

ब्रह्म मुहूर्त में बालों को डाई किया. उस के बाद गुलाबजल मिले पानी और डव साबुन से शरीर के अंगअंग को रगड़ कर चमकाने की नाकाम कोशिश की. जींस और बुशर्ट से किसी तरह अपनी अधेड़ उम्र को ढका.

फेस टू फेस प्यार का इजहार और वैलेंटाइन डे को यादगार बनाने के लिए डेरी मिल्क और बुके ले कर सुबह 7 बजे ही दद्दन चचा होटल ‘मूनलाइट’ पहुंच गए.

2 घंटे के इंतजार के बाद होटल खुला. दद्दन चचा ने मनचाहा केबिन और टेबल पर कब्जा जमा लिया. वेटर को कुछ पैसे दे कर काव्या नाम की तख्ती के साथ मेन गेट पर खड़ा कर दिया.

आखिरकार 3 घंटे के इंतजार के बाद गुलाबी सूट में भारीभरकम शरीर वाली एक औरत के साथ तख्ती वाला वेटर दद्दन चचा के केबिन में आया.

उस औरत का चेहरा दुपट्टे से ढका हुआ था. ओवरवेट शरीर को देख कर दद्दन चचा को रौंग नंबर का आभास हुआ. वे वेटर से कुछ कहते, इस से पहले दुपट्टे के पीछे मोटेमोटे होंठों में हलकी सी हरकत हुई, ‘माई सैल्फ कमसिन काव्या… आर यू डेविड?’

दद्दन चचा ने काव्या की काया की जो छवि अपने मन में बनाई थी, पलभर में ही वह भरभरा गई. फिर खुद को दिलासा देते हुए सोचा, ‘आखिर शरीर में क्या रखा है. खूबसूरती तो चांद से चेहरे में होती है और चांद तो अभी दुपट्टे रूपी बादल के पीछे छिपा हुआ है…’

‘‘या… आई एम डेविड. प्लीज सीट…’’ और मुसकराते हुए काव्या को बैठने का इशारा किया.

कैपेचीनो नाम की कौफी और्डर कर दद्दन चचा ने दुपट्टे के पीछे छिपे चेहरे को आंखों के लैंस से ताड़ने की कई बार नाकाम कोशिश की.

‘‘क्या आप बैचलर हैं?’’ खामोशी भंग करते हुए काव्या ने पूछा.

‘‘जी, बिलकुल. सौ फीसदी खालिस,’’ दद्दन चचा ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘तो बताइए क्यों बुलाया मुझे?’’

‘‘वह… आज वैलेंटाइन डे है…’’

‘‘तो…’’ काव्या भोली बनते हुए बोली.

तब तक वेटर कैपेचीनो ले आया.

जैसे ही वेटर बाहर निकला, चचा ने कांपते हुए हाथों से काव्या को बुके थमाते हुए ‘आई लव यू’ बक दिया.

‘‘सच में…’’ काव्या बोली.

‘‘स्वर्गवासी मां की कसम खा कर कह रहा हूं… आई लव यू…’’ दद्दन चचा ने अपना लव कंफर्म किया.

‘‘तो फिर दमयंती और टिल्लू का क्या…’’ काव्या ने पूछा.

‘‘क… क… कौन दमयंती?’’ दद्दन चचा ने घिघियाते हुए पूछा.

‘‘वही जो आप के सामने खड़ी है…’’ कहते हुए काव्या ने अपने चेहरे का दुपट्टा हटा लिया. फिर तो मानो दद्दन चचा के प्राण ही सूख गए.

‘‘द… द… दमयंती… त… त… तुम यहां? तुम तो मायके गई थी, फिर…’’ दद्दन चचा के हलक में शब्द अटक गए.

गुस्से में गरम कैपेचीनो को दद्दन चचा की खोपड़ी पर उड़ेलते हुए दमयंती चाची ने बताया, ‘‘तुम्हारी हरकतों के बारे में मुझे महल्ले के लड़कों ने बता दिया था, फिर उन्होंने ही ‘कमसिन काव्या’ नाम से मेरी फेक फेसबुक प्रोफाइल बनाई थी.

‘‘अगले ही दिन तुम्हारी फ्रैंड रिक्वैस्ट आ गई. अब आगे की कहानी तुम्हारी सेहत के लिए हानिकारक है,’’ फिर होटल ‘मूनलाइट’ में चाची की सैंडल और चचा के सिर का भरतनाट्यम शुरू हो गया. वादाखिलाफी की इतनी बड़ी सजा जनता कभी भी विधायक और सांसद को नहीं देती, जितनी दारू और चखना न मिलने से आहत महल्ले के लौंडों ने दद्दन चचा को दी थी.

वैलेंटाइन डे पर हुई जम कर सुताई के चलते घायल दद्दन चचा को अगले कुछ महीनों तक चाची के बैडरूम से क्वांरटीन रहना पड़ा.

Hindi Kahani: अधेड़ को सबक


Hindi Kahani. ए अधेड़ आदमी ट्रेन में सफर कर रहा था. उस के आसपास कई औरतें बैठी हुई थीं. वह ट्रेन लोकल थी, इसलिए छोटेछोटे स्टेशनों पर भी रुक रही थी. जब भीड़ बढ़ जाती तो उस अधेड़ आदमी का हाथ गलत काम के लिए हरकत में जाता. कभी नींद के बहाने तो कभी ऐसे ही वह औरतों को छू देता था.

एक स्टेशन पर उस अधेड़ के आसपास की सीटें खाली हो गईं, लेकिन थोड़ी ही देर में लड़कियों का एक दल गया. जहां भी जगह मिली, लड़कियां बैठने लगीं. वे खिलाड़ी लग रही थीं और शायद कहीं खेलने जा रही थीं. ट्रेन आगे बढ़ रही थी और वे लड़कियां खिलखिला रही थीं.
वह अधेड़  अपने काले चश्मे के अंदर से उन्हें घूर रहा था. उस के पास एक काफी स्मार्ट लड़की बैठी थी. उस लड़की के बगल में एक पहलवान किस्म की उस की सहेली कविता बैठी थी, जो मर्दों की तरह बातें कर रही थी.

अपनी आदत के मुताबिक, अधेड़ दोबारा उस स्मार्ट लड़की से सटने लगा. उस ने अपना हाथ लड़की की जांघ पर रखा और फिरसौरीकह कर हटा लिया. इस के बाद भी वह छेड़छाड़ की लगातार कोशिश कर रहा था. अचानक कविता का ध्यान अधेड़ की हरकतों की ओर गया. वह बड़े ध्यान से उस की कारगुजारी देखने लगी. कुछ देर बाद उस ने जगह बदल ली. अब वह अधेड़ के पास बैठ गई.

एक स्टेशन पर भीड़ बढ़ी. कई ग्वाले दूध के डब्बे ले कर चढ़ आए. लोगों का ध्यान बंटा तो अधेड़ का हाथ दोबारा हरकत में गया. कभी हाथ कविता की जांघ पर पड़ता तो कभी कंधे पर. लेकिन कुछ देर बाद वह अधेड़ वहां से उठ गया और कुछ दूर सिंगल वाली सीट पर जा कर बैठ गया.

अरे, यह क्या? दर्द से उस के आंसू निकल आए थे. उस ने चश्मा उतार कर रूमाल से आंसू पोंछे. उस की हरकतें कविता देख कर मंदमंद मुसकरा रही थी. अधेड़ भी एक बेचारे की तरह कविता को देख रहा था.
बाकी किसी को कुछ पता नहीं था कि उन दोनों के बीच क्या हुआ. किसी का ध्यान भी उस ओर नहीं था, क्योंकि कोई शोरशराबा नहीं हुआ था.

अधेड़ बारबार अपनी जांघ सहला रहा था. वह खुद से सवाल कर रहा था, ‘क्या कोई देख रहा है? यह लड़की कौन है? क्या इसे पता चल गया था? अब कभी नहीं करूंगा ऐसा…’कुछ देर बाद वह अधेड़ उठा और दूर जा कर बैठ गया. अब उसे वह पहलवान टाइप की लड़की कविता नहीं दिखाई दे रही थी. वह मन ही मन उसे कोस रहा था. अब भी वह कुछ औरतों के पासही बैठा था, लेकिन उस का हाथ कहीं और नहीं, अपनी जांघ पर ही था. वह धोती के ऊपर से अपनी जांघ सहलारहा था,

जैसे बहुत दर्द हो रहा हो.कुछ देर बाद कविता अपनी सीट से उठी और उस अधेड़ की खोज में निकल पड़ी. एक सीट पर दुबका वह अधेड़ उसे दिखाई पड़ गया कविता ने मुसकरा कर मजाकभरे लहजे में उस अधेड़ से धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ अंकल?’’ अधेड़ कुछ नहीं बोला. उस ने नजरें झुका लीं. कविता भी आगे कुछ नहीं बोली और वह अपनी सीट पर लौट आईवह अब भी मंदमंद मुसकरा रही थी.

कुछ देर बाद उन लड़कियों का स्टेशन गया. ट्रेन रुकी तो वे सब जल्दीजल्दी उतरने लगीं.
कविता उतरते समय अधेड़ से बोली, ‘‘बाय अंकल. जांघ में हल्दीप्याज गरम कर के लगा लीजिएगा.’’
कविता ट्रेन से उतर गई तो अधेड़ ने राहत की सांस ली. अभी इस सवाल का जवाब बाकी है कि अधेड़ ने अपनी सीट क्यों छोड़ी और पहलवान टाइप लड़की कविता ने उस का क्यों मजाक उड़ाया?
कविता ने फुरसत के पलों में खिलखिलाते हुए अपनी सहेलियों को बताया, ‘‘आज ट्रेन में बहुत मजा
आया. एक मनचले बुढ़ऊ को जम कर मजा चखाया.’’

‘‘कब? किसी को कुछ पता नहीं चला?’’ सहेलियों में से एक ने पूछा.‘‘हां. चुपचाप मजा चखाया. वह गोल्डी को छेड़ रहा था. मेरी नजर पड़ी तो मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं उसे डांट भी सकती थी, लेकिन उस के पास बैठ कर चुपचाप उस की जांघ पर बोरा सिलने वाले इस सूए के पिछले भाग को इतनी जोर से चुभाया कि उस के आंसू निकल आए.‘‘पोल खुलने के डर से वह कुछ कह भी नहीं सका. पूरा दर्द सह गया. असली मर्द होगा तो दोबारा ऐसी हरकत नहीं करेगा.’’

लड़कियां खूब जोर से हंसीं. गोल्डी बोली मुझे भी बहुत गुस्सा रहा था, लेकिन मैं कुछ बोली नहीं, पर तुम ने उसे सबक सिखा ही दिया.’’ ‘‘हां. मैं यह सूआ लिए रहती हूं और नुकीले भाग से नहीं, पीछे के हिस्से से
ही मनचलों की चीख निकाल लेती हूं. यह मेरा कारगर हथियार है. खून नहीं निकलता, लेकिन जान निकाल लेता है. इस सूए से मेरे पिता तेंदूपत्ते से भरे बोरे सिला करते थे. काम ऐसा करो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे,’’ 

कविता ने कहा.बाकी लड़कियां उस की तारीफ कर रही थीं. सुरेखा ने कहा, ‘‘बढि़या रहा सबक सिखाने का तुम्हारा तरीका. ये अधेड़ और बूढ़े लोग भी शर्मनाक काम करते हैं. अपनी मर्यादा भूल जाते हैं.’’

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