कामवालियों पर मालिक की ललचाई नजरें

आज के समय में ज्यादातर शहरी पतिपत्नी कामकाजी होते हैं. ऐसे में घरों में काम करने वाली बाई का रोल अहम हो जाता है. अगर एक दिन भी वह नहीं आती है, तो पूरा घर अस्तव्यस्त हो जाता है. एक ताजा सर्वे के मुताबिक, मुंबई शहर में कामकाजी लोगों के घर उन की कामवाली बाई के भरोसे ही चलते हैं और अगर एक दिन भी वह छुट्टी ले लेती है, तो घर में मानो तूफान आ जाता है. सवाल यह है कि जो इनसान हमारे घर के लिए इतना अहम है, क्या हमारे समाज में उसे वह इज्जत मिल पाती है, जिस का वह हकदार है?

आमतौर पर घरों में काम करने वाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया अच्छा नहीं रहता, क्योंकि अगर घर में से कुछ इधरउधर हो गया, तो इस का सब से पहला शक बाई पर ही जाता है. इस के अलावा घर के मर्दों की भी कामुक निगाहें उन्हें ताड़ती रहती हैं और अगर बाई कम उम्र की है, तो उस की मुसीबतें और ज्यादा बढ़ जाती हैं.

सीमा 34 साल की है. 4 साल पहले उस का पति एक हादसे में मारा गया था. उस की एक 14 साल की बेटी और 10 साल का बेटा है.

एक घर का जिक्र करते हुए सीमा बताती है, ‘‘जिस घर में मैं काम करती थी, उन की बेटी मुझ से एक साल बड़ी थी. एक दिन आंटी बाहर गई थीं. घर में सिर्फ अंकलजी, उन की बीमार मां और बेटी थी. मैं रसोइघर में जा कर बरतन धोने लगी. अंकलजी ने अपनी बेटी को किसी काम से बाहर भेज दिया.

‘‘मैं बरतन धो रही थी और वे अंकल कब मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए, मुझे पता ही नहीं चला. जैसे ही मैं बरतन धो कर मुड़ी, तो उन का मुंह मेरे सिर से टकरा गया. मैं घबरा गई और चिल्लाते हुए घर से बाहर आ गई.

‘‘इस के बाद 2 दिन तक मैं उन के यहां काम करने नहीं गई. तीसरे दिन वे अंकल खुद मेरे घर आए और हाथ जोड़ कर बोले, ‘मुझे माफ कर दो. मुझ से गलती हो गई. मेरे घर में किसी को मत बताना और काम भी मत छोड़ना. आज के बाद मैं कभी तुम्हारे सामने नहीं आऊंगा.’

‘‘आप बताइए, उन की बेटी मुझ से बड़ी है और वे मेरे ऊपर गंदी नजर डाल रहे थे. क्या हमारी कोई इज्जत नहीं है?’’ कहते हुए वह रो पड़ी.

नीता 28 साल की है. पति ने उसे छोड़ दिया है. वह बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, वहां मालकिन ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. जब मैं काम करती थी, तो मालिक मेरे पीछेपीछे ही घूमता रहता था. मुझे गंदी निगाहों से घूरता रहता था.

‘‘फिर एक दिन हिम्मत कर के मैं ने उस से कहा, ‘बाबूजी, यह पीछेपीछे घूमने का क्या मतलब है, जो कहना है खुल कर कहो? मैडमजी को भी बुला लो. मैं गांव की रहने वाली हूं. मेरी इज्जत जाएगी तो ठीक है, पर आप की भी बचनी नहीं है.’

‘‘मेरे इतना कहते ही वह सकपका गया और उस दिन से उस ने मेरे सामने आना ही बंद कर दिया.’’

इसी तरह 35 साल की कांता बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, उन साहब के घर में पत्नी, 2 बेटे और बहुएं थीं. उन के यहां सीढि़यों पर प्याज के छिलके पड़े रहते थे. हर रोज मैं जब भी झाड़ू लगाती, मालिक रोज सीढि़यों पर बैठ कर प्याज छीलना शुरू कर देता और फिर सीढि़यों से ही मुझे आवाज लगाता, ‘कांता, यहां कचरा रह गया है.’

‘‘जब मैं झाड़ती तो मेरे ऊपर के हिस्से को ऐसे देखता, मानो मुझे खा जाएगा. एक महीने तक देखने के बाद मैं ने उस घर का काम ही छोड़ दिया.’’

30 साल की शबनम बताती है, ‘‘पिछले साल मैं जिस घर में काम करती थी, वहां दोनों पतिपत्नी काम पर जाते थे. उन का एक छोटा बेटा था. मैं पूरे दिन उन के घर पर रह कर बेटे को संभालती थी.

‘‘एक दिन मैडम दफ्तर गई थीं और साहब घर पर थे. मैं काम कर रही थी, तभी साहब आए और बोले, ‘शबनम, 2 कप चाय बना लो.’

‘‘मैं जब चाय बना कर उन के पास ले गई, तो वे सोफे पर बैठने का इशारा कर के बोले, ‘आ जाओ, 2 मिनट बैठ कर चाय पी लो, फिर काम कर लेना.’

‘‘मैं उन के गंदे इरादे को भांप गई और न जाने कहां से मुझ में इतनी ताकत आ गई कि मैं ने उन के गाल पर एक चांटा जड़ दिया और अपने घर आ गई. उस दिन के बाद से मैं उन के घर काम पर नहीं गई.’’

इन उदाहरणों से कामवाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया दिखता है. ऐसे घरों में इन्हें एक औरत के रूप में तो इज्जत मिलती ही नहीं है, साथ ही जिस घर को संवारने में ये अपना पूरा समय देती हैं, वहीं मर्द इन्हें गंदी नजरों से देखते हैं.

क्या करें ऐसे समय में

 ऐसे हालात में आमतौर पर ज्यादातर कामवाली बाई चुप रह जाती हैं या काम छोड़ देती हैं. इस के पीछे उन की सोच यही होती है कि चाहे घर का मर्द कितना ही गलत क्यों न हो, कुसूरवार कामवाली बाई को ही ठहराया जाता है. वे अगर  मुंह खोलेंगी तो और भी लोग उन से काम कराना बंद कर देंगे, इस से उन की रोजीरोटी के लाले पड़ जाएंगे.

कई मामलों में तो कामवाली बाई को पैसे दे कर उस का मुंह भी बंद कर दिया जाता है. पर ऐसा करना मर्दों की गंदी सोच को बढ़ावा देना है, इसलिए अगर ऐसा होता है, तो चुप रहने के बजाय अपनी आवाज उठानी चाहिए.

आजकल तकनीक का जमाना है. अगर मुमकिन हो सके, तो ऐसी छिछोरी बातों को रेकौर्ड करें या वीडियो क्लिप बना लें, ताकि बात खुलने पर सुबूत के तौर पर उसे पेश किया जा सके.

क्या करें पत्नियां

 ऐसे मनचलों की पत्नियां भले ही अपने पति की हरकत को जगजाहिर न करें, पर वे खुद इस से अच्छी तरह परिचित होती हैं.

अच्छी बात यह रहेगी कि बाई के साथ अकेलेपन का माहौल न बनने दें. वे खुद बाई से काम कराएं. अगर पति मनचला है, तो ज्यादा उम्र की बाई को घर पर रखें.

कई बार कामवालियां भी मनचली होती हैं. उन्हें घर की मालकिन के बजाय घर के मालिक से ज्यादा वास्ता रहता है. ऐसे में उन्हें उन की सीमाएं पार न करने की हिदायत दें.

इन्फ्लुएंसर्स करते पौयजनस फूड का प्रचार लोग होते बीमार

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ. वायरल वीडियो में दिखाया गया कि एक बच्चा जिस की उम्र लगभग 11-12 साल है, कुछ खा रहा है और खाते समय उस के मुंह से धुआं निकल रहा है. सामने ही एक स्टौल है जिस पर स्मोक्ड बिस्कुट लिखा हुआ है. बच्चा वहीं से बिस्कुट ले कर खा रहा है. असल में वह स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है.

दरअसल, स्मोक्ड बिस्कुट कोई अलग बिस्कुट नहीं है. नौर्मल बिस्कुट को ही लिक्विड नाइट्रोजन के साथ परोस दिया जाता है और इसे ही स्मोक्ड बिस्कुट कहा जाता है. असल में बच्चा वही स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है और बिस्कुट खाते ही बच्चे की तबीयत अचानक खराब हो जाती है. आननफानन बच्चे को हौस्पिटल ले जाया जाता है. जहां इलाज के बाद उसे घर भेज दिया जाता है. यह वीडियो कर्नाटक के दावणगेरे से आया है.

गुरुग्राम मामले में क्या हुआ

लेकिन यह कोई पहला केस नहीं है जहां कैमिकल का इस्तेमाल ठेलों, दुकानों, रैस्टोरैंटों में मिलने वाले फूड में किया जा रहा हो. इस से पहले भी खाने में कस्टमर को कैमिकल यूज्ड फूड दिया गया. अभी कुछ महीने पहले ही गुरुग्राम में एक केस आया था. जहां एक रैस्टोरैंट में डिनर करने गई फैमिली को माउथफ्रैशनर के नाम पर ड्राई आइस सर्व कर दी गई. ड्राई आइस खाते ही फैमिली के 5 लोग नेहा सबरवाल, मनिका गोयनका, प्रितिका रुस्तगी, दीपक अरोड़ा और हिमानी के मुंह से खून आने लगा. उन्हें उलटियां होने लगीं. वे दर्द से तड़पने लगे. जल्दबाजी में उन्हें हौस्पिटल ले जाया गया. जहां इलाज के बाद उन्हें घर भेज दिया गया.

जब डाक्टर से ड्राई आइस के बारे में बात की गई तो डाक्टर ने आशुतोष शुक्ला को बताया, ‘जब इन 5 लोगों ने ड्राई आइस के टुकड़े खाए तो ठंड के कारण उन के मुंह में अल्सर हो गया और उस से खून आना शुरू हो गया. इसी वजह से उन की हालत खराब हुई.’

इन दोनों घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्वाद के चक्कर में सेहत के साथ खिलवाड़ करना कितना महंगा साबित हो सकता है.

क्या है ड्राई आइस

बात करें अगर ड्राई आइस की तो ड्राई आइस जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसे सूखी बर्फ कहते हैं. जिस का टैंपरेचर 80 डिग्री तक होता है. यह सौलिड कार्बन डाइऔक्साइड से बना होता है. इसे आप आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि नौर्मल बर्फ को जब आप मुंह में रखते हैं तो वह पिघलने लगती है. जब नौर्मल बर्फ पिघलती है तो पानी में बदलने लगती है. वहीं ड्राई आइस पिघलती है तो वह सीधी कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है. यह अकसर मैडिकल स्टोर, किराने के सामान को स्टोर करने के लिए किया जाता है. इस का इस्तेमाल फोटोशूट और थिएटर के दौरान भी किया जाता है.

ड्राई आइस इतनी खतरनाक है कि पेट में जाते ही वहां छेद बना देती है, जो काफी जानलेवा साबित हो सकता है. जब यह कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है तो मुंह के आसपास के टिश्यूज और सेल्स को नुकसान पहुंचाती है.

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक है, इस का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है.  2017 में दिल्ली में एक व्यक्ति ने गलती से ऐसी ड्रिंक पी ली थी जिस में लिक्विड नाइट्रोजन था. व्यक्ति को ड्रिंक से निकल रहे धुएं को हटाने के बाद उसे पीना था लेकिन उस ने धुएं हटने का इंतजार नहीं किया और उसे ऐसे ही पी लिया. इस के बाद उस व्यक्ति के पेट में दर्द हुआ और बाद में सर्जरी में पता चला कि उस के पेट में एक बड़ा छेद हो चुका है.

लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस दोनों पदार्थों के नाम से ही सम?ा आता है कि लिक्विड नाइट्रोजन तरल होता है और ड्राई आइस ठोस. ड्राई आइस का तापमान -78.5 डिग्री सैल्सियस तक होता है. वहीं लिक्विड नाइट्रोजन इस से भी ज्यादा ठंडी होती है और इस का तापमान -196 डिग्री सैल्सियस तक हो सकता है. दोनों पदार्थों का इस्तेमाल खानेपीने की चीजों में स्मोक इफैक्ट देने के काम में किया जाता है.

कितने खतनाक हैं ये

2018 में अमेरिकी सरकार के फूड एंड ड्रग विभाग ने खानपान में लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस के इस्तेमाल को ले कर एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ड्राई आइस या लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल सावधानी से न किया जाए तो अत्यधिक कम तापमान की वजह से यह घातक हो सकता है. इन्हें सीधेतौर पर खाना नहीं चाहिए. इस से स्किन और हमारे इंटरनल और्गन को नुकसान पहुंच सकता है.

लेकिन फिर भी दिनबदिन रासायनिक पदार्थों का खानपान में इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है और इन को बढ़ावा देने वाला और कोई नहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों का ग्रुप है, जो खुद को फूड व्लौगर कहते हैं. ज्यादा व्यूज बटोरने के लिए ये दुकानदारों को उकसाते भी हैं कि अलग और बेढंगी चीजें बनाएं, उस के लिए ऊटपटांग फ्यूजन किए जाते हैं. दुकानदार भी ज्यादा वायरल होने के चक्कर में कुछ भी चीजें खाने में इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोगों का ध्यान अनोखेपन पर जाए.

एक्सपैरिमैंटल फूड

सोशल मीडिया पर ये इन्फ्लुएंसर्स आएदिन ऐसे फूड स्टौल और रैस्टोरैंट को कवर करते हैं जो फ्यूजन के नाम पर कुछ भी बना रहे हैं, जैसे फेंटा मैगी, दही मैगी, चौकलेट पकोड़ा, पेस्टी मैगी, कौफी आइसक्रीम, गुलाबजामुन के पकौड़े, चुकंदर से बनी चाय, चौकलेट मोमोस, चौकलेट डोसा और न जाने क्याक्या. ये शरीर में जा कर कैसा प्रभाव छोड़ रहे हैं, इस पर कोई बात नहीं करता. इन क्या दिक्कतें हो रही हैं. इस पर कोई बात नहीं करता.

बहुत जगह दुकानदार वायरल होने के चक्कर में भरभर कर बटर, तेल, घी डाल कर दिखाता है. कोई आम इंसान जो नौर्मल या कहें घर का सिंपल खाना खाने वाला हो, इसे खा ले तो उस का सिर चकरा जाए, पैसे अलग उस के कुएं में जाएं.

मूक क्यों खाद्य विभाग

क्या फूड सेफ्टी एंड स्टेटैंडर्ड अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसएआई) को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्यों यह विभाग इस पर चुप है? जिस तरह सोशल मीडिया पर खाने से संबंधित ऊटपटांग चीजें वायरल होती रहती हैं, घटिया चीजें परोसी जाती हैं, क्या यह फूड सिक्योरिटी औफिसर की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ध्यान दे कि मैगी के साथ कोल्डड्रिंक का छौंका हैल्थ के लिए नुकसानदेह तो नहीं?

दरअसल, ये फूड औफिसर भी चीजों को चलता करने के मूड में रहते हैं या दुकानदारों से लेदे कर मामला रफादफा करते हैं. उन्हें नागरिकों की हैल्थ की परवा नहीं होती. सड़क के किनारे एक व्यक्ति ठेला खोल कर गरीबों को सस्ते में स्वाद वाला खाना तो दे रहा है पर साथ में बीमारियां भी दे रहा है. आम लोग कुछ कहते नहीं क्योंकि हर नुक्कड़, चौराहे पर यही कचरा परोसा जा रहा है.

फूड व्लौगर का साथ

फूड एक्सपैरिमैंट करने वाले दुकानदारों को फूड इन्फ्लुएंसर्स ने आसमान पर बैठा लिया है. जहां कहीं भी देखो, ये व्लौगर अपना कैमरा उठा कर चालू हो जाते हैं. न तो इन्होंने खाने की क्वालिटी चैक करने का कोर्स कर रखा है, न ही ये फूड की वैराइटीज के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं. अब इन को क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट किस एज ग्रुप के लिए है. इन्हें क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट को कितनी देर बाद खाना चाहिए? इन्हें क्या पता कि इसे खाने के बाद ठंडा पानी पीना चाहिए या नहीं?

सच बात तो यह है कि इन्फ्लुएंसर को एक्सपैरिमैंटल फूड की सिर्फ वीडियो नहीं बनानी चाहिए बल्कि उस के फायदे और नुकसान भी बताने चाहिए. तभी वह एक अच्छा जानकारी देने वाला मार्गदर्शक कहलाएगा.

अपने ही “मासूम” की बलि….

अगर आज ऐसा होता है तो इसका मतलब यह है कि आज भी हम सैकड़ो साल पीछे की जिंदगी जी रहे हैं. जहां अपने अंधविश्वास में आकर बलि चढ़ा दी जाती थी, अपने बच्चों को या किसी मासूम को. बलि चढ़ाना तो अंधविश्वास की पराकाष्ठा ही है.

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में शख्स ने अपने चार वर्षीय बेटे की बेरहमी से गला रेंतकर हत्या कर दी. घटना की वजह अंधविश्वास बताया गया है. शख्स की मानसिक स्थिति कुछ दिनों से ठीक नहीं थी. एक रात उसने परिवारजनों से कहा – “सुनो सुनो! मै किसी की बलि दे दूंगा.”

उसकी बात पर किसी ने तवज्जो नहीं दिया लगा कि यह मानसिक सन्निपात में कुछ का कुछ बोल रहा है.
एक रात उसने चाकू से एक मुर्गे को काटा फिर अपने मासूम बेटे का गला काट दिया. यह उद्वेलित करने वाला मामला शंकरगढ़ थानाक्षेत्र का है. हमारे संवाददाता को पुलिस ने बताया -शंकरगढ़ थानाक्षेत्र अंतर्गत ग्राम महुआडीह निवासी कमलेश नगेशिया (26 वर्ष) दो दिनों से पागलों की तरह हरकत कर रहा था. उसने परिवारजनों के बीच कहा – उसके कानों में अजीब सी आवाज सुनाई दे रही है, उसे किसी की बलि चढ़ाने के लिए कोई बोल रहा है.

एक दिन वह कमलेश चाकू लेकर घूम रहा था एवं उसने परिवारजनों से कहा कि आज वह किसी की बलि लेगा. उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए परिवारजनों ने उसे नजरअंदाज कर दिया था . मगर रात को खाना खाने के बाद कमलेश नगेशिया की पत्नी अपने दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सोने चली गई. कमलेश के भाईयों के परिवार बगल के घर में रहते हैं, वे भी रात को सोने चले गए.

देर रात कमलेश ने घर के आंगन में एक मुर्गे का गला काट दिया. फिर कमरे में जाकर वह अपने बड़े बेटे अविनाश (4) को उठाकर आंगन में ले आया. उसने बेरहमी से अपने बेटे अविनाश का चाकू से गला काट दिया. अविनाश की मौके पर ही मौत हो गई. सुबह करीब चार बजे जब कमलेश की पत्नी की नींद खुली तो अविनाश बगल में नहीं मिला. उसने कमलेश से बेटे अविनाश के बारे में पूछा तो उसने पत्नी को बताया कि उसने अविनाश की बलि चढ़ा दी है.

घटना की जानकारी मिलने पर घर में कोहराम मच गया. सूचना पर शंकरगढ़ थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी के नेतृत्व में पुलिस टीम मौके पर पहुंची. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया . बच्चे के शव को पंचनामा पश्चात् पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया . थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी ने बताया – परिजनों से पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया गया है. आरोपी दो दिनों से ही अजीब हरकत कर रहा था. पहले वह ठीक था. एक शाम परिवारजनों के सामने उसने किसी की बलि चढ़ाने की बात कही थी, लेकिन परिवारजनों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया. मामले में पुलिस ने धारा 302, 201 का अपराध दर्ज किया है. मामले की जांच की जा रही है.

इस घटनाक्रम में परिजनों ने समझदारी से काम लिया होता और इसकी शिकायत पहले ही पुलिस में की होती या फिर उस व्यक्ति को मानसिक चिकित्सालय भेज दिया गया होता तो मासूम बच्चे की जिंदगी बच सकती थी. मासूम की बाली के इस मामले में सबसे अधिक दोषी मां का वह चेहरा भी है जो दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सो रही होती है और पति एक बच्चे को उठाकर ले जाता है.

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक गांव देहात में इस तरह की घटनाएं घटित हो जाती है, इसका दोषी जहां परिवार होता है वही आसपास के रहवासी भी दोषी हैं मगर पुलिस सिर्फ एक हत्यारे पर कार्रवाई करके मामले को बंद कर देती है.

कुल मिलाकर के ऐसे घटनाक्रम सिर्फ एक खबर के रूप में समाज के सामने आते है और फिर समाज सुधारक भूल जाते है कुल मिला करके आगे पाठ पीछे सपाट की स्थिति .यह एक बड़ी ही सोचनीय स्थिति है. इस दिशा में अब सरकार के पीछे-पीछे दौड़ने या यह सोचने से की सरकार कुछ करेगी यह अपेक्षा छोड़ कर हमें स्वयं आगे आना होगा ताकि फिर आगे कोई ऐसी घटना घटित ना हो.

फूटती जवानी के डर और खुदकुशी की कसमसाहट

इसे जागरूकता की कमी कहें या फिर अनपढ़ता, लड़के हों या लड़कियां, एक उम्र आने पर उन के शरीर में कुछ बदलाव होते हैं और अगर ऐसे समय में सम?ादारी और सब्र का परिचय नहीं दिया जाए, तो जिंदगी में कुछ अनहोनी भी हो सकती है. ऐसे ही एक वाकिए में एक लड़की जब अपनी माहवारी के दर्द को सहन नहीं कर पाई और न ही अपनी मां को कुछ बता पाई, तो उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन कर लिया.

यह घटना बताती है कि जवानी के आगाज का समय कितना ध्यान बरतने वाला होता है. ऐसे समय में कोई भी नौजवान भटक सकता है और मौत को गले लगा सकता है या फिर कोई ऐसी अनहोनी भी कर सकता है, जिस का खमियाजा उसे जिंदगीभर भुगतना पड़ सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि उस के बाद परिवार वाले अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

आज हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ मामलों के साथ आप को और समाज को अलर्ट मोड पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बानगी :

* 14 साल की उम्र आतेआते जब सुधीर की मूंछें निकलने लगीं, तो वह चिंतित हो गया. उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उस के चेहरे पर ठीक नाक के नीचे मूंछें उगें और वह परेशान हो गया.

* 12 साल की उम्र में जब सोनाली को पहली दफा माहवारी हुई, तो वह घबरा गई. वह बड़ी परेशान हो रही थी. ऐसे में एक सहेली ने जब उसे इस के बारे में अच्छी तरह से बताया, तो उस के बाद ही वह सामान्य हो पाई.

* राजेश की जिंदगी में जैसे ही जवानी ने दस्तक दी, तो उसे ऐसेवैसे सपने आने लगे. वह सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है. बाद में एक वीडियो देख कर उसे सबकुछ सम?ा में आता चला गया.

* दरअसल, जिंदगी का यही सच है और सभी के साथ ऐसा समय या पल आते ही हैं. ऐसे में अगर कोई सब्र और सम?ादारी से काम न ले, तो वह मुसीबत में भी पड़ सकता है. लिहाजा, ऐसे

समय में आप को कतई शर्म नहीं करनी चाहिए और घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस दिशा में जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सोशल मीडिया का जमाना है. आप दुनिया की हर एक बात को सम?ा सकते हैं और अपनी जिंदगी को सुंदर और सुखद बना सकते हैं. बस, आप को कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो आप को नुकसान पहुंचा सकता हो.

डरी हुई लड़की की कहानी दरअसल, मुंबई से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. वहां के मालवणी इलाके में रहने वाली

14 साल की लड़की रजनी (बदला हुआ नाम) ने अपनी पहली माहवारी के दौरान दर्दनाक अनुभव के बाद कथिततौर पर खुदकुशी कर ली थी. जब तक परिवार वालों ने यह देखा और सम?ा, तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. उस की लाश घर में लटकी हुई मिली थी.

यह हैरानपरेशान करने वाला मामला मलाड (पश्चिम) के मालवणी इलाके में हुआ था, जहां रहने वाली 14 साल की एक लड़की रजनी की लाश रात में अपने घर के अंदर लोहे के एक एंगल से लटकी हुई पाई गई थी.

पुलिस के मुताबिक, वह नाबालिग लड़की अपने परिवार के साथ गावदेवी मंदिर के पास लक्ष्मी चाल में रहती थी. कथिततौर पर वह किशोरी माहवारी के बारे में गलत जानकारी होने के चलते तनाव में रहती थी. ऐसा लगता है कि उसे सही समय पर सटीक जानकारी नहीं मिल पाई होगी, तभी तो माना जा रहा है कि उस ने यह कठोर कदम उठा लिया होगा.

पुलिस के मुताबिक, देर शाम को जब घर में कोई नहीं था, तो उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. जब परिवार वालों और पड़ोसियों को इस कांड के बारे में पता चला, तो वे उसे कांदिवली के सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ बता दिया.

मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अफसर ने कहा, ‘‘शुरुआती पूछताछ के दौरान लड़की के रिश्तेदारों ने बताया कि लड़की को हाल ही में पहली बार माहवारी आने के बाद दर्दनाक अनुभव हुआ था. इसे ले कर वह काफी परेशान थी और मानसिक तनाव में थी, इसलिए हो सकता है कि उस ने इस वजह से अपनी जान दे दी हो.’’

कुलमिला कर कह सकते हैं कि अगर उस लड़की को सही समय पर सही सलाह मिल जाती तो पक्का है कि वह खुदकुशी करने जैसा कड़ा कदम कभी नहीं उठाती. मांबाप को भी चाहिए कि ऐसे समय में वे बच्चों को सही सलाह दें या फिर उन्हें किसी माहिर डाक्टर के पास ले जाएं.

सोशल मीडिया पर एंटी ट्रांसजैंडर कंटैंट से मचा बवाल, किस की जिम्मेदारी

मीडिया में एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी के राइट्स की वकालत करने वाली ग्रुप ‘ग्लाड’ ने अपनी रिपोर्ट में फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स सहित मेटा के टौप सोशल प्लेटफौर्मों पर एंटी ट्रांसकंटैंट के बारे में बताया. यह रिपोर्ट जून 2023 से ले कर मार्च 2024 के बीच की है.

रिपोर्ट में बताया गया कि इन प्लेटफौर्म्स पर ट्रांस विरोधी चीजें डाली जाती हैं और मेटा पौलिसी के बावजूद प्लेटफौर्म इस पर कोई कार्यवाही नहीं करता. इस में एंटी ट्रांस स्लर, प्रोपगंडा, डीह्यूउमनाइजिंग स्टीरियोटाइप, लेबलिंग ट्रांस, सेक्सुअल प्रीडेटर्स जैसा कंटैंट देखने को मिला है. विज्ञापन वाली सरकार गूगल और मेटा में सोशल मीडिया विज्ञापनों में बढ़ोतरी देखी गई है.

गूगल विज्ञापन पारदर्शिता केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी, 2024 से 19 मार्च, 2024 के बीच पौलिटिकल विज्ञापनों पर कुल 101.28 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. जिस में से अकेले भाजपा ने सोशल मीडिया कैम्पेन के लिए 31 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. इस के अलावा मेटा एड लाइब्रेरी के अनुसार भाजपा ने पिछले 90 दिनों में 1198 ऐड के लिए 7 करोड़ के लगभग पैसा खर्च किए हैं. कोचिंग का धंधा जेईई की तैयारी के लिए फेमस कोचिंग इंस्टिट्यूट फिटजी अपने विज्ञापन के चलते विवाद में घिर गया है.

यह विवाद सोशल मीडिया पर खूब गरमाया है. दरअसल फिटजी ने एक विज्ञापन बनाया जिस में उस ने एक स्टूडैंट को पौइंट करते दिखाया कि अगर वह फिटजी से ही अपनी पढ़ाई जारी रखती बजाय किसी और इंस्टिट्यूट जाने के तो ज्यादा स्कोर करती. इस विज्ञापन के बाद सोशल मीडिया ने फिटजी को आड़े हाथों ले लिया. एलन मस्क पर मुकदमा सोशल मीडिया प्लेटफौर्म एक्स, जो पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था, के पूर्व सीईओ पराग अग्रवाल और एक्स के कई एक्स औफिशियल्स ने एलन मस्क के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया है.

मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा दावा किया गया है कि यह मुकदमा नौकरी से निकाले जाने के बाद हर्जाने के तौर पर दिए जाने वाले वेतन को ले कर है. पराग अग्रवाल के अलावा एलन मस्क के खिलाफ मुकदमा करने वाले 4 टौप एक्स औफिशियल भी हैं. मुकदमा लगभग 12.8 करोड़ के भुगतान को ले कर है. इन्फ्लुएंसर्स की रेज बैटिंग हाल के वर्षों में, इंटरनैट वर्ल्ड से ‘रेज बैटिंग’ शब्द ज्यादा सुनाई देने लगा है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए यह जल्दी फेमस होने का मीडियम बन गया है. रेज बैटिंग तब होती है जब कोई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स जानबू?ा कर यूजर्स का ध्यान पाने के लिए ऐसे पोस्ट डालता है जिस से उसे नैगेटिव रैस्पौंस मिलें. यह काम इन्फ्लुएंसर्स खूब करते हैं वे क्रिंज वीडियो बनाते हैं.

यह टिकटौक, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफौर्म्स में देखा जा रहा है. सोशल मीडिया लती टीनएजर्स 26 सितंबर से 23 अक्तूबर, 2023 तक किए गए प्यू रिसर्च के सर्वे के अनुसार लगभग तीनचौथाई टीनएजर्स तब ज्यादा खुश रहते हैं जब वे अपने फोन के बिना रहते हैं. इस दौरान वे खुद को शांत और खुश महसूस करते हैं. रिसर्च में यह भी पता चला है कि टीनएजर्स यह जानते हुए भी कि वे अपनी स्क्रीन टाइम के साथ कोम्प्रोमाइज करने को तैयार नहीं है.

मंहगी होती ‘लोकतंत्र’ की राह

चुनावी खर्च जिस तरह बेलगाम होते जा रहे हैं उस पर यह एक टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है –
” बेहतर होगा की चुनाव आयोग इन मामलों की स्वयं जांच करे. पता लगाए कि अवैध बरामदगी के पीछे कौन-सा प्रत्याशी या दल है और फिर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो.इस तरह की सख्ती के बिना चुनावों में धनबल का दखल नहीं रूकेगा.

यह सही है कि चुनाव में धनबल का प्रयोग रोकने के लिए चुनाव आयोग की सतर्कता बढ़ी है, लेकिन यह सिर्फ धर-पकड़ तक सीमित है.ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत कम है, क्योंकि चुनाव के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं लेते। अक्सर असली सरगना छुट भैय्यों को फंसा कर बच जाते हैं.

-बृजेश माथुर
सोशल मीडिया पर दरअसल , लोकतंत्र महा कुंभ कहलाने वाला लोकसभा चुनाव में आज जिस तरह चुनाव में करोड़ों रुपए प्रत्येक लोकसभा संसदीय क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं उससे साफ हो जाता है कि आम आदमी या कोई सामान्य योग्य व्यक्ति संसद में पहुंचने के लिए सात जन्म लेगा तो भी नहीं पहुंच पाएगा.
लोकसभा चुनाव 2024 में माना जा रहा है कि खर्च के मामले में पिछले सारे रेकार्ड ध्वस्त हो जाएंगे और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाने वाले भारत राष्ट्र में चुनाव खर्च अपनी पर पराकाष्ठा में होंगे अर्थात भारत दुनिया की सबसे खर्चीली चुनावी व्यवस्था होगी.

चुनाव पर गंभीरता से नजर रखने वाले जानकारों के अनुसार इस बार लोकसभा चुनाव 2024 में अनुमानित खर्च के 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है.अगर बात की जाए लोकसभा चुनाव 2019 में खर्च की तो 60,000 करोड़ रुपये से दोगुने से भी अधिक है.

दरअसल, चुनाव को विहंगम दृष्टि से देखा जाए तो राजनीतिक दलों और संगठनों, उम्मीदवारों, सरकार और निर्वाचन आयोग सहित चुनावों से संबंधित प्रत्यक्ष या परोक्ष सभी खर्च शामिल हैं. चुनाव संबंधी खर्चों पर बीते चार दशक से नजर रख रहे गैर-लाभकारी संगठन के अध्यक्ष एन भास्कर राव के दावे के अनुसार लोकसभा चुनाव में अनुमानित खर्च के 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता की अत्यंत कमी का खुलासा हुआ है.चुनावी बांड के खुलासे से साफ हो गया है कि पार्टियों के पास खुलकर खर्च करने के लिए धन है. राजनीतिक दलों ने उस धन को खर्च करने के रास्ते तैयार कर लिए है.

जैसा कि हम जानते हैं देश में काले धन की बात की जाती है, भ्रष्टाचार की बात की जाती है. यह सब कुछ चुनाव के दरमियान देखा जा सकता है और चौक चौराहे पर इस पर चर्चा होने लगी है कि आखिर प्रमुख राष्ट्रीय दलों के प्रत्याशी करोड़ों रुपए जो खर्च कर रहे हैं वह आता कहां से है मगर इस दिशा में न तो सरकार ध्यान दे रही है और न ही चुनाव आयोग या फिर उच्चतम न्यायालय या सरकार की कोई जांच एजेंसी.

जहां तक बात है भारतीय जनता पार्टी की इस चुनाव में सत्ता प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी वह सब कुछ कर रही है जो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. इसका आज की तारीख में आकलन नहीं लगाया जा सकता. हो सकता है आने वाले समय में इसका खुलासा हो पाए की भाजपा ने लोकसभा 2024 में कितना खर्च किया. माना जा रहा है चुनाव प्रचार में हो रहे खर्च के मामले में यह पार्टी देश के विपक्षी पार्टियों को बहुत पीछे छोड़ देगी.

एनजीओ के माध्यम से इस पर निगाह रखने वाले संगठन के पदाधिकारी के मुताबिक, उन्होंने प्रारंभिक व्यय अनुमान को 1.2 लाख करोड़ रुपए से संशोधित कर 1.35 लाख करोड़ रुपए कर दिया, जिसमें चुनावी बांड के खुलासे के बाद के आंकड़े और सभी चुनाव-संबंधित खचों का – हिसाब शामिल है. ‘एक अन्य संगठन ने हाल में भारत में राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता की अत्यंत कमी की ओर इशारा किया था. उन्होंने दावा किया – 2004-05 से 2022-23 तक, देश के छह प्रमुख राजनीतिक दलों को कुल 19,083 करोड़ रुपए का लगभग 60 फीसद योगदान अज्ञात स्रोतों से मिला, जिसमें चुनावी बाण्ड से प्राप्त धन भी शामिल था.

एक अन्य महत्वपूर्ण संगठन ने- ‘चुनाव पूर्व गतिविधियां पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रचार खर्च
का अभिन्न अंग हैं, जिनमें राजनीतिक रैलियां, परिवहन, कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और यहां तक कि नेताओं की विवादास्पद खरीद-फरोख्त भी शामिल है.’ उन्होंने कहा – चुनावों के प्रबंधन के लिए निर्वाचन आयोग का बजट कुल व्यय अनुमान का 10-15 फीसद होने की उम्मीद है.

इसी तरह विदेश में बैठे एक चुनाव पर निगाह रखने वाले सम्मानित संगठन के अनुसार-” भारत में 96.6 करोड़ मतदाताओं के साथ प्रति मतदाता खर्च लगभग 1,400 रुपए होने का अनुमान है. उसने कहा कि यह खर्च 2020 के अमेरिकी चुनाव के खर्च से ज्यादा है, जो 14.4 अरब डालर या लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपए था. एक विज्ञापन एजंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित वाधवा के मुताबिक -लोकसभा 2024 के इस चुनाव में डिजिटल प्रचार बहुत बहुत ज्यादा हो रहा है. उन्होंने कहा – राजनीतिक दल कारपोरेट ब्रांड की तरह काम कर रहे हैं और पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं.”

इस तरह लोकसभा चुनाव जो आज हमारे देश में लड़ा जा रहा है उसमें राजनीतिक पार्टियों सत्ता प्राप्त करने के लिए सीमा से अधिक खर्च कर रही हैं यह सभी मान रहे हैं ऐसे में अगर हम नैतिकता की बात करें तो जब कोई पार्टी या प्रत्याशी करोड़ों रुपए खर्च करके चुनाव जीतते है तो स्पष्ट है कि वह आम जनता के लिए उत्तरदाई नहीं हो सकते जिन लोगों ने उन्हें रुपए पैसे की मदद की है या गलत तरीकों से रुपया कमाया गया है तो फिर चुने हुए प्रतिनिधि निश्चित रूप से अपने आकाओं के लिए काम करेंगे या फिर अपना स्वास्थ्य साधन करेंगे.

फूटती जवानी के डर और खुदकुशी की कसमसाहट

इसे जागरूकता की कमी कहें या फिर अनपढ़ता, लड़के हों या लड़कियां एक उम्र आने पर उन के शरीर में कुछ बदलाव होते हैं और अगर ऐसे समय में समझदारी और सब्र का परिचय नहीं दिया जाए, तो जिंदगी में कुछ अनहोनी भी हो सकती है. ऐसे ही एक वाकिए में एक लड़की जब अपनी माहवारी के दर्द को सहन नहीं कर पाई और न ही अपनी मां को कुछ बता पाई, तो उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन कर लिया.

यह घटना बताती है कि जवानी के आगाज का समय कितना ध्यान बरतने वाला होता है. ऐसे समय में कोई भी नौजवान भटक सकता है और मौत को गले लगा सकता है या फिर कोई ऐसी अनहोनी भी कर सकता है, जिस का खमियाजा उसे जिंदगीभर भुगतना पड़ सकता है. सब से बड़ी बात यह है कि उस के बाद परिवार वाले अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

आज हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ मामलों के साथ आप को और समाज को अलर्ट मोड पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बानगी :

-14 साल की उम्र आतेआते जब सुधीर की मूंछ निकलने लगी, तो वह चिंतित हो गया. उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उस के चेहरे पर ठीक नाक के नीचे मूंछ उगे और वह परेशान हो गया.

-12 साल की उम्र में जब सोनाली को पहली दफा माहवारी हुई, तो वह घबरा गई. वह बड़ी परेशान हो रही थी. ऐसे में एक सहेली ने जब उसे इस के बारे में अच्छी तरह से बताया, तो उस के ही बाद वह सामान्य हो पाई.

-राजेश की जिंदगी में जैसे ही जवानी ने दस्तक दी, तो उसे ऐसेवैसे सपने आने लगे. वह सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है. बाद में एक वीडियो देख कर उसे सबकुछ समझ में आता चला गया.

दरअसल, जिंदगी का यही सच है और सभी के साथ ऐसा समय या पल आते ही हैं. ऐसे में अगर कोई सब्र और समझदारी से काम न ले, तो वह मुसीबत में भी पड़ सकता है. लिहाजा, ऐसे समय में आप को कतई शर्म नहीं करनी चाहिए और घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस दिशा में जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सोशल मीडिया का जमाना है. आप दुनिया की हर एक बात को समझ सकते हैं और अपनी जिंदगी को सुंदर और सुखद बना सकते हैं. बस, आप को कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो आप को नुकसान पहुंचा सकता हो.

डरी हुई लड़की की कहानी

दरअसल, मुंबई से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. मुंबई के मालवणी इलाके में रहने वाली 14 साल की लड़की रजनी (बदला हुआ नाम) ने अपनी पहली माहवारी के दौरान दर्दनाक अनुभव के बाद कथिततौर पर खुदकुशी कर ली थी. जब तक परिवार वालों ने यह देखा और समझा, तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. उस की लाश घर में लटकी हुई मिली थी.

यह हैरानपरेशान करने वाला मामला मलाड (पश्चिम) के मालवणी इलाके में हुआ था, जहां रहने वाली 14 साल की एक लड़की रजनी की लाश रात में अपने घर के अंदर लोहे के एक एंगल से लटकी हुई पाई गई थी.

पुलिस के मुताबिक, वह नाबालिग लड़की अपने परिवार के साथ गावदेवी मंदिर के पास लक्ष्मी चाल में रहती थी. कथिततौर पर वह किशोरी माहवारी के बारे में गलत जानकारी होने के चलते तनाव में रहती थी. ऐसा लगता है कि उसे सही समय पर सटीक जानकारी नहीं मिल पाई होगी, तभी तो माना जा रहा है कि उस ने यह कठोर कदम उठा लिया होगा.

पुलिस के मुताबिक, देर शाम में जब घर में कोई नहीं था, तो उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. जब परिवार वालों और पड़ोसियों को इस कांड के बारे में पता चला, तो वे उसे कांदिवली के सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डाक्टरों ने लड़की को मरा हुआ बता दिया.

मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अफसर ने कहा, “शुरुआती पूछताछ के दौरान लड़की के रिश्तेदारों ने बताया कि लड़की को हाल ही में पहली बार माहवारी आने के बाद दर्दनाक अनुभव हुआ था. इसे ले कर वह काफी परेशान थी और मानसिक तनाव में थी, इसलिए हो सकता है कि उस ने इस वजह से अपनी जान दे दी हो.”

कुलमिला कह सकते हैं कि अगर उस लड़की को सही समय पर सही सलाह मिल जाती, तो पक्का है कि वह खुदकुशी करने जैसा कड़ा कदम कभी नहीं उठाती. मांबाप को भी चाहिए कि ऐसे समय में वे बच्चों को सही सलाह दें या फिर उन्हें किसी माहिर डाक्टर के पास ले जाएं.

करोड़ों की सैलरी के सपने

यह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की वजह से है या कंपनियों के मुनाफों की लिमिट के आने या सब से बड़ी बात, दुनियाभर में अमीरों व गरीबों के बीच बढ़ती खाई बढ़ने पर शोर की वजह से, इस साल भारत में स्टार्टअप्स करोड़ प्लस नौकरियां देने में हिचकिचाने लगे हैं. पहले हर साल 100-200 युवाओं को कैंपस रिक्रूटमैंट में ही बहुत मोटी सैलरी दे दी जाती थी और यही मेधावी युवा आगे चल कर एमएनसी कंपनियों के सीईओ बन जाते थे.

अब कंपनियों के मोटे मुनाफे कम होने लगे हैं. जो स्टार्टअप चमचमा रहे थे, अब अपने ही बो  झ से चरमरा रहे हैं. हर कोई वैल्यूएशन बढ़ाचढ़ा कर, बेच कर कुछ सौ करोड़ रुपए जेब में डाल कर चलने की फिराक में है और इस दौरान भारी नुकसान को कम करने के लिए तेजी से छंटनी की जा रही है. स्टार्टअप ही नहीं, इन्फोसिस जैसी कंपनियों को भी अपनी एंपलौई स्ट्रैंग्थ कम करनी पड़ रही है.

यह कोई बड़े राज की बात नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है. असल में पिछले 5-7 सालों में स्टार्टअप्स ने जो हल्ला मचा कर जीवन को सुगम बनाने के ऐप्स बनाए थे और छोटछोटे धंधों को टैक्नोलौजी के सहारे एक छत के नीचे लाने की कोशिश की थी, उस के साइड इफैक्ट्स दिखने लगे हैं.

लोग अब सिर्फ कंप्यूटर से बात करने के लिए कतराने की सोच पर पहुंच रहे हैं. एक के बाद दूसरा बटन दबाते रहिए. यह जेल की तरह लगने लगा था जिस में कंप्यूटर- चाहे मोबाइल हो, लैपटौप हो या डैस्कटौप, एक जेल सा बन गया था जिस में दुनिया से कट कर रहना पड़ रहा था. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस इस रूखेपन को कम कर रहा है और ग्राहक की आवाज की टोन को पहचान कर उसी लहजे में जटिल समस्याओं को सुल  झाने के प्रोग्राम बनाए जा रहे हैं ताकि ग्राहक बिदकें न. पर यह न भूलें कि असल जिंदगी तो ब्रिक, मोर्टार और हाड़मांस से चलती है. ऐप ने दफ्तरों से भिड़ने के कंपल्शन को कम किया है लेकिन इस के बदले उस ने ह्यूमन टच छीन लिया है.

एआई की आवाज कितनी ही मधुर क्यों न हो, कितनी ही ह्यूमन लगे, पता चल ही जाता है कि यह मशीनी है. ऐसे में ग्राहक उचट जाता है कि वह अपनी खास समस्या को हल करने के लिए कहे या न कहे.

जो मोटी सैलरीज मिल रही थीं वे उन स्टार्टअप्स से मिल रही थीं जो सिर्फ हवाहवाई बातें करने में आगे आ रहे थे. ब्रिक और मोर्टार सेवाएं तो आदमियों की सहायता से ही मिल रही थीं. उबर और ओला चलाने वाले तो ड्राइवर ही हैं जो कंप्यूटर एलगोरिदम की तोड़ निकालने में लगे थे या जिन की कमर कंप्यूटर एलगोरिदम तोड़ रहा था.

आज छोटा सा स्टार्टअप भी अरबों की वैल्यूएशन का काम कर रहा था इसलिए कि वह ह्यूमन एफर्ट को किसी बेचारे से छीन रहा था. अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्विगी, बिग बास्केट ने लाखों छोटे व्यापार बंद करा दिए और अपने कंप्यूटर कंट्रोल्ड वर्कर्स को लूट कर ग्राहकों को सेवाएं देनी शुरू कीं. अब ग्राहक उकताने लगे हैं. दुनियाभर में कंजम्पशन बढ़ने लगा मगर उत्पादन नहीं. अमीरों के सुख की चीजें भरभर कर बनने लगीं क्योंकि स्टार्टअप चलाने वाले उस कैटेगरी में आते हैं जो ऊपरी एक फीसदी हैं. वे आम आदमी की तकलीफें नहीं सम  झते- जो यूक्रेन में लड़ रहा है, सऊदी डैजर्ट में पसीना बहा कर शहर बसा रहा है, घरों तक पानी, बिजली, सीवर पहुंचा रहा है, पक्के मकान बना रहा है. कोई स्टार्टअप या कंस्ट्रक्शन कंपनी बिना ह्यूमन टच के ये सब नहीं कर सकती, न शायद कभी कर पाएगी. कंप्यूटर स्लेव कभी नहीं बनेगा, यह एहसास होने लगा है और शायद स्टार्टअप और टैक्नो इंडस्ट्रीज अब ठंडी पड़ने लगी हैं.

करोड़ों की सैलरी के सपने टूट रहे हैं. उत्तर प्रदेश में 6,000 कौंस्टेबलों की भरती के लिए 50,00,000 उम्मीदवारों का जमा हो जाना साबित करता है कि सैलरी लैवल तो अब भी 20-30 हजार रुपए ही है, वह भी सरकारी नौकरी में, और उसी के लिए मारामारी हो रही है. पेपर लीक भी एक धंधा बना हुआ है, सरकारें परेशान हैं. कुछ को करोड़ों के पैकेज बेरोजगारों के मुंह से निवाले छीन कर दिए जा रहे थे पर अब इन में कुछ कमी होने लगी है.

गुणों को पहचानें, पर्सनैलिटी निखारें

अपनी पर्सनैलिटी पर भरोसा करें. अपने रंगरूप, कद, पढ़ाई, बैकग्राउंड को भूल कर हमेशा यह सोचिए कि आप में कुछ ऐसे गुण हैं जो आप की लाइफ को लिवएबल, हैप्पी, प्रौसपरस बना सकते हैं. अपनी कमियों को छिपाइए नहीं पर उन से घबरा कर कछुए की तरह खोल में न छिपिए. हर युवा कुछ गुण रखता है. हरेक में कुछ करने की, कुछ बनने की तमन्ना होती है. सोशल नौर्म्स कुछ ऐसे हैं जो कुछ यंग को एहसास दिलाते हैं कि उन की कोई कीमत नहीं है. इस गलतफहमी को खुद दूर करें. आप को लूटने वाले इस गलतफहमी का सहारा ले कर ही जेब पर डाका डालते हैं. वे सपने दिखाते हैं, ठोस प्लान या प्रोग्राम नहीं बनाते.

यह सोच कर चलें कि रास्ते पर पड़े पत्थरों को लांघ कर या रास्ता बना कर चलना संभव है. हम में से हरेक ऐसा करता है. हम पानी के गड्ढों से भरी सड़क पर सूखी जगह देख कर चलते हैं पर बाढ़ आ जाने के बाद जूते, पैर या पैंट के गीली हो जाने के बावजूद रास्ता पार करना नहीं छोड़ते क्योंकि इस पानी के दूसरी तरफ कोई है जो बचा कर रखेगा, कुछ राहत मिलेगी, कुछ सुकून मिलेगा.

पढ़ाई हो, हौबी हो, खेल का मैदान हो, रंगमंच हो, पहले ही न घबराइए. उतरिए तो सही. हो सकता है सोने का अंडा हाथ लग जाए, वरना अनुभव तो मिलेगा ही न, जो आगे काम आएगा. लेकिन इस के लिए भीड़ की मानसिकता का शिकार न बनें.

शातिर, बेईमान लोग भीड़ का इस्तेमाल करते हैं. कमजोरों को बहकाने के लिए जब इतने सारे लोग एक तरफ जा रहे हैं तो कुछ अच्छा होगा वहां, इस को जम कर भुनाया जाता है. आप ने जो भी सीखा, जो भी जाना, उस का इस्तेमाल कर के अपना फैसला लें कि आप भीड़ का हिस्सा बन कर अपनी सफलता की चाबी भीड़ के सब से आगे वाले के हाथ में देना चाहते हैं या अपने हाथ में रखना चाहते हैं.

हर व्यक्ति सफल हो सकता है. आप कितने सफल हो सकते हैं, इस का आकलन पहले न करें. पहले तो यही उम्मीद करें कि हर सपना, प्लान सक्सैसफुल ही कंप्लीट होगा. उस पर आप के ऐक्टिव होने की देर है बस, हाथ में कुछ लगेगा ही, कम या ज्यादा. हां, इस के लिए तैयारी करनी पड़ती है. नदी पार करने के लिए नाव बनानी पड़ती है. जब दूसरे पार कर सकते हैं तो आप भी बच सकते हैं, दूसरों से बेहतर भी हो सकते हैं.

तैयारी करने में जरूरी है कि अपने सपनों पर फोकस करें. उन को साकार करने के तरीके ढूंढ़ें. लोगों से पूछें पर फैसला हमेशा अपनी जानकारी के सहारे लें. आप के पास जानकारी जुटाने के हजारों तरीके हैं. आज इंटरनैट तो है ही, साथ ही, विस्तृत जानकारी वाली किताबों की दुकानें व लाब्रेरियां भी हैं. इंटरनैट तो आप को हताश भी कर सकता है पर किताबें, आमतौर पर एक नए निर्माण का मैसेज देती हैं. आगे चलिए तो सही, कुछ मिलेगा. हर वक्त बैठे रह कर मोबाइल से खेलना आप का ऐम (लक्ष्य) न हो, यह खयाल रखें. बल्कि, एक तमन्ना हो कुछ करने की और उसे पूरा करें.

छप्परफाड़ कमाई करने वाली सीए रचना रानाडे

सीए रचना रानाडे ने कभी नहीं सोचा था कि वे फाइनैंस जगत में इतनी फेमस हो  जाएंगी. फाइनैंस सीखने  वाली नई पीढ़ी इन दिनों  रचना से हो कर ही  गुजर रही है. 26 जून, 1986 को पुणे, महाराष्ट्र, भारत में जन्म लेने वाली 37 साल की रचना रानाडे आज फाइनैंस इंफ्लुएंसर की दुनिया में जानामाना नाम हैं. यूट्यूब क्रिएटर के तौर पर शेयर बाजार, वित्त, व्यवसाय और मार्केटिंग पर शिक्षा देने वाली रचना को फाइनैंस मैनेजमैंट में इंट्रैस्ट रखने वाले अच्छे से जानते हैं और उन्हें फौलो भी करते हैं. रचना रानाडे चार्टर्ड अकाउंटैंट हैं जो अपने दर्शकों के लिए मुश्किल समझे जाने वाली फाइनैंशियल लिट्रैसी को आसान बनाती हैं. उन्होंने अपने पहले अटेम्पट में सीए का एग्जाम पास किया और टीचिंग को अपना कैरियर बनाया.

उस के बाद रचना ने पुणे में लाइव बैच में 10,000 से अधिक और औनलाइन 100,000 से अधिक छात्रों को पढ़ाया और  फेमस हुईं.  यूट्यूब से कमाई 2019 में उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल ‘सीए रचना फड़के रानाडे’ के नाम से लौंच किया और स्टौक मार्केट टौपिक्स पर ध्यान केंद्रित किया. उन्होंने 3 साल से भी कम समय में अपने यूट्यूब चैनल पर 4.78 मिलियन यानी 47 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हासिल कर लिए हैं. वहीं इंस्टाग्राम पर उन के 11 लाख से अधिक फौलोअर्स हैं. वे अपनी वीडियोज में मराठी, हिंदी और इंग्लिश भाषा का इस्तेमाल करती हैं.

उन की पौपुलैरिटी देशविदेश में फैली हुई है. उन्होंने दुबई में एक बिलियन शिखर सम्मेलन और अबूधाबी व मस्कट में आईसीएआई सहित प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में भी शिरकत की और अपनी बात रखी. उन के पाठ्यक्रम स्टौक मार्केट बेसिक्स, मनी मैनेजमैंट, फंडामैंटल एंड टैक्निकल एनालिसिस और फ्यूचर्स एंड औप्शंस के लगभग सारे कोर्सों को कवर करते हैं.

35 साल की रानाडे का कहना है, ‘‘सीए के स्टूडैंट्स को 10 साल तक पढ़ाने के बाद मैं कुछ नया करना चाहती थी. फिर मु  झे स्टौक मार्केट का खयाल आया, जो मेरा दूसरा प्यार है.’’ इसी सोच के साथ उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो डालना शुरू किया, जिस से वे आज लाखों रुपए कमा रही हैं. पिछले साल उन्होंने पेडअप मैंबरशिप के विकल्प की भी शुरुआत की है.

उन का माध्यम मुख्य रूप से इंग्लिश है लेकिन बीचबीच में वे हिंदी और मराठी का भी इस्तेमाल करती हैं और खूब पैसा कमा रही हैं. भरोसा अपने रिस्क पर मध्यवर्गीय परिवार से आने वाली रानाडे ने कभी नहीं सोचा था कि पढ़ाने का उन का पेशा एक दिन उन्हें बुलंदी पर पहुंचा देगा. यूट्यूब यूजर के स्टैटिस्टिक्स और एनालिटिक्स पर नजर रखने वाले सोशल ब्लैंड के मुताबिक, रानाडे की सालाना कमाई पिछले साल 3.3 करोड़ रुपए थी.

यूट्यूब के सीईओ सुसान वोजसिकी ने 26 जनवरी को अपने ब्लौग में लिखा था, ‘‘भारतीय क्रिएटर रचना रानाडे अपने चैनल का इस्तेमाल लोगों की वित्तीय साक्षरता में मदद के लिए करती हैं. उन्होंने पिछले साल मैंबरशिप की शुरुआत की. यूट्यूब उन की कमाई का मुख्य स्रोत बन गया है. वे 1,00,000 डौलर से ज्यादा कमा रही हैं.’’ रानाडे ने ‘बेसिक्स औफ स्टौक मार्केट’ पर अपना वीडियो यूट्यूब पर 2019 में अपलोड किया था. यह वीडियो वायरल हो गया जिसे अब तक 27 मिलियन व्यूज मिल चुके हैं.

इस लैक्चर में 3 वीडियोज हैं जो स्टौक मार्केट में इंट्रेस्ट रखने वालों के लिए बनाई गई हैं. रचना इन में बहुत ही सिंपल तरीके से स्टौक मार्केट के बेसिक्स समझाती हैं जो काफी इंट्रैसटिंग लगते हैं.  फाइनैंस लिटरैसी की वकालत हालांकि रचना सेबी (एसईबीआई) रजिस्टर फाइनैंस इन्फ्लुएंसर नहीं हैं, फिर भी उन के फौलोअर्स की संख्या बताती है कि आम लोगों द्वारा उन पर कितना विश्वास किया जा रहा है. उन के कोर्सेज के पैकेज 3 हजार से ले कर 50 हजार रुपए तक में उन की वैबसाइट पर मौजूद हैं.

प्रांजल कामरा के बाद फाइनैंस एक्सपर्ट के तौर पर रचना को ही फौलो किया जाता है. ‘अर्न 1 करोड़ इन 1 ईयर’, ‘हाउ टू पिक स्टौक इन 1 मिनट’ और ‘हाऊ टू प्लान योर ड्रीम हाउस’ जैसे वीडियोज लोगों को अट्रैक्ट करने के लिए काफी हैं. आप को जान कर हैरानी होगी कि रचना एक पेशेवर गायिका भी हैं और उन के पास संगीत विशारद की डिग्री भी है, जो संगीत में स्नातक की डिग्री के बराबर है. उन्होंने अपने

यूट्यूब चैनल पर कई सिंगिंग कवर भी अपलोड किए हैं. रचना महिलाओं की फाइनैंस लिट्रैसी के बारे में भी बात करती हैं. एक रैपिड फायर इंटरव्यू में वे एक सवाल, ‘एक आदत जो महिलाओं के पैसे बचा सकती हैं और उन्हें अमीर बना सकती हैं?’ के जवाब में कहती हैं. ‘‘कुछ भी खरीदने से पहले अपनेआप से पूछें कि क्या आप को इस की जरूरत है.’ वे आगे कहती हैं, ‘आप को उस प्रोडक्ट की कीमत और उस के इस्तेमाल के बारे में सोचना चाहिए. मान लीजिए, आप कोई हैडफोन खरीदती हैं महंगा सा और उस का इस्तेमाल दिन में 2 बार ही करती हैं तो वह आप के लिए फुजूलखर्ची है.’

रचना ट्रेडिंग के तरीके बताती हैं और इन्वैस्टमैंट के भी. किसी भी और फाइनैंस इंफ्लुएंसर की तरह लोग इन्हें भी फौलो करते हैं. अकसर आंख बंद कर के और बिना कुछ सीखेसम  झे लोग इन की सलाह पर अपना हार्ड अर्न पैसा लगा देते हैं और लालच के चलते उसे गंवा भी बैठते हैं, सो, सावधान रहने की भी जरूरत है.

 

बेबस दलित औरतें, वर्णवादी व्यवस्था की शिकार 

राजनीति और अफसरशाही में दलित औरतों को आगे देख कर यह मत सोचिए कि जातीय भेदभाव केवल गरीब और अनपढ़ लोगों के शब्दकोश में ही है, चमकदमक की दुनिया में भी जातीय भेदभाव कम नहीं है. दलित औरतें हर लैवल पर भेदभाव और शोषण की शिकार हैं. इस के बाद भी वे जिस वर्णवादी व्यवस्था की शिकार हैं उस में ही रहना भी चाहती हैं.

ज्यादातर को लगता है कि वे अपने को छिपाने के लिए वे काम करें जो ऊंची जातियों के लोग करते हैं. इस में पूजापाठ को एक जरीया मनाने वाला सब से बड़ा तबका है. यही वजह है कि बड़ी तेजी से निचले तबके में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो वर्ण व्यवस्था की तो खिलाफत करते हैं, पर पूजापाठ और हिंदू पहचान के साथ बने रहना चाहते हैं.

शादी के पहले मीना का सपना था कि अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों की तरह वह भी खूब पढ़ेगी और समाज के लिए कुछ करेगी. उस की टीचर भी यही कहती थी कि मीना बहुत होशियार है. पर 8वीं जमात तक पढ़ाई करने के बाद ही उस के घर वालों ने उस की शादी करने का फैसला कर दिया.

दलित लड़कियों को दबंग लड़के कब पकड़ कर जबरदस्ती न कर डालें, इसलिए शादी करना जरूरी होता था. हमारा धर्म ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जिन में गरीब दलित लड़कियों को ऋषियोंमुनियों ने भी जम कर भोगा है.

मीना के घर वालों के मुताबिक, उस की उम्र शादी लायक हो गई थी. मीना की शादी हो गई. शादी के बाद वह ससुराल आ गई. वहां उस का कुछ समय तो ठीक बीता, पर उस के बाद उस पर दबाव पड़ने लगा कि वह भी घर की दूसरी औरतों की तरह खेतों में काम करने जाए.

मीना खेत में काम नहीं करना चाहती थी. घर में इस बात को ले कर झगड़े शुरू हो गए. मीना ने पति को समझाया तो वह काम करने शहर आ गया. कुछ दिनों बाद मीना भी पति के पास रहने शहर चली आई.

पति के मुकाबले मीना ज्यादा समझदार थी और देखने में खूबसूरत भी थी. शहर में रहने से उस की खूबसूरती और बढ़ गई थी. मीना अपने घर के पास एक अस्पताल में सफाई का काम करने लगी. दिन में मीना 2 से 4 औफिसों में झाड़ूपोंछा लगाने लगी. इस में वह महीने के तकरीबन 5,000 रुपए पाने लगी. उस के पास अपना पैसा आया तो खुद पर यकीन बढ़ गया.

थोड़े समय बाद मीना के चरित्र को ले कर पति के मन में शक बैठने लगा. मीना को इस तरह काम करता देख सास हैरान रह गई. उसे गांव में मीना का खेत में काम करने देना भले ही पसंद था, पर शहर में लोगों के बीच काम करने से मीना के बहक जाने का खतरा था.

मां की शह पा कर मीना के पति ने उस के बाहर जाने का विरोध शुरू किया.

जब मीना नहीं मानी तो पति ने अपना कामधंधा छोड़ दिया और गांव लौटने को तैयार हो गया. पति के पास गांव में कोई काम नहीं था. वह दूसरों के खेतों में काम करता था.

मीना गांव में खेतों में काम करने लगी. ऐसे में उस के साथ वही सब होने लगा जो दूसरी औरतों के साथ होता था.

पर मीना शहर से वापस आ कर  थोड़ी बदल गई थी. ऐसे में उस की पूछ ज्यादा थी. मीना घरबाहर दोनों जगह शोषण की शिकार होने लगी.

मीना की कहानी अकेली नहीं है. ऐसी तमाम दलित लड़कियां हैं जो अपने सपनों को पूरा नहीं कर पातीं और घरबाहर दोनों ही जगहों पर शोषण की शिकार होती हैं.

गरीबी का असर

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘दलित तबके की 80 फीसदी लड़कियां 5वीं या 8वीं जमात से आगे नहीं पढ़ पाती हैं. उन की शादी हो जाती है. शादी के बाद ससुराल वाले उन की पढ़ाई को जारी नहीं रख पाते हैं.

‘‘ज्यादातर लड़कियों के पति कोई कामधंधा नहीं करते हैं. वे जब दूर शहरों में नौकरी करने चले जाते हैं तो उन की पत्नियों पर तमाम तरह के आरोप लगने लगते हैं. ज्यादातर के पति नशा करते हैं. ऐसे में मारपीट और झगड़े बढ़ते जाते हैं. पढ़ीलिखी लड़की भी ऐसे माहौल में खुद को लाचार पाती है.’’

कई जगहों से लोग गरीबी का फायदा उठा कर दलित लड़कियों को शहर ले जाते हैं. वहां उन्हें गलत धंधों में भी लगा देते हैं. रैड लाइट एरिया में लाई जाने वाली लड़कियों में बढ़ी तादाद ऐसी दलित लड़कियों की ही होती है, जो पैसों की तंगी या गरीबी की वजह से वहां पहुंच जाती हैं.

दलित लड़कियों के शोषण की अलगअलग कहानियां हैं. समाज में जिस तरह से दलितों के खराब हालात हैं उन से भी खराब हालात दलित औरतों के हैं. हर दिन 3 दलित औरतों से औसतन बलात्कार की वारदात होती है.

बदल नहीं रही सोच

ज्यादातर दलित औरतें गांव में रहती हैं. वे खेतों में मजदूरी करती हैं. ऐसे में एक तबका उन के शोषण को अपना हक समझता है. धर्मग्रंथ की कई कहानियों में ऐसी घटनाओं का जिक्र है जिस की वजह से अभी भी ऊंची जातियों की सोच नहीं बदल रही है.

पुराने रिवाजों को देखें तो ज्यादातर मामलों को देख कर लगता है कि केवल हिंदी राज्यों में ही दलितों की हालत खराब है, पर असल में ऐसा नहीं है.

केरल के इतिहास में सौ साल पहले ऐसी व्यवस्था थी कि छोटी जातियों की औरतों को कपड़े पहनते समय छाती न ढकने का आदेश था. ऐसा न करने वाली औरतों को टैक्स देना पड़ता था.

इस का मकसद केवल जातिवाद को बनाए रखना था. दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा में जाने वाली लड़कियों में ज्यादातर निचली जाति की ही होती थीं.

आज भी कई जगहों से ऐसी खबरें आती हैं जहां ऊंची जातियों की तरह दलित लड़कियों की शादी में धूमधड़ाका करना गलत समझा जाता है और इस से जातीय टकराव होने लगता है.

परदा प्रथा अभी भी दलित औरतों में सब से ज्यादा है. ऐसी घटनाएं केवल गांव या कम पढ़ेलिखे लोगों के बीच ही नहीं हैं, बल्कि पढ़ेलिखे तबके में भी यह होता है. वहां भी गैरबराबरी का माहौल बना हुआ है.

तमाम सरकारी स्कूलों में मिड डे मील के समय ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जहां पर दलित रसोइए के हाथ का बना खाना खाने में कई लोगों को एतराज होने लगा है. वोट लेने के लिए भले ही नेता तमाम दलितों के साथ खाना खाने का दिखावा करते हों.

बदल जाता है बरताव

लखनऊ के एक कौंवैंट स्कूल में पढ़ने वाली लड़की दिशा बताती है, ‘‘जब तक लोगों को मेरी जाति का पता नहीं चलता तब तक ठीक रहता है, पर जैसे ही जाति का पता चलता है सबकुछ बदल जाता है. साथ पढ़ने और काम करने वाले लोगों का बरताव ही बदल जाता है.

‘‘मुझे 9वीं जमात में पता चला कि मैं दलित हूं. उस समय कालेज में एक फार्म भरना था. उस के बाद स्कूल के दोस्तों को भी पता चल गया. अब वे मुझ से दूर होने लगे हैं.’’

दिशा ने एमबीए तक की पढ़ाई की, इस के बाद वह नौकरी में आई. उस ने कई मल्टीनैशनल कंपनियों में काम किया और वहां उस के नीचे काम करने वालों की बड़ी तादाद थी.

कंपनियों के लोगों को जैसे ही यह पता चलता था कि वह दलित है, उन का बरताव बदल जाता था. दिशा बताती है कि उस ने कहीं किसी भी तरह के रिजर्वेशन का फायदा नहीं लिया. उस जैसी कई लड़कियां हैं जो प्राइवेट सैक्टर में बिना किसी काबिलीयत के काम कर रही हैं. वे अपनी जाति को नहीं बताती हैं. असल में वे भी सोचती हैं कि जाति बताने से लोग अपना बरताव बदल लेते हैं. इस वजह से वे अपनी जाति छिपाने की कोशिश करती हैं.

दीपक नामक लड़के का कहना है, ‘‘मैं नीची जाति का हूं. पढ़ालिखा और अच्छी नौकरी करता हूं. मैं ने ऊंची जाति की लड़की से शादी की है. लड़की के घर वालों ने शादी का विरोध तो नहीं किया, पर वे हमारे साथ संबंध नहीं रखते हैं. उन लोगों ने अपनी लड़की के साथ भी संबंध तोड़ लिए हैं.

‘‘हमारी शादी को 8 साल हो चुके हैं, पर अभी भी वे हमारे घर नहीं आते हैं. मेरी पत्नी जब मायके जाती है तो केवल उस की मम्मी और बहन ही बात करती हैं. उस के पापा कभी उस से बात नहीं करते. मेरी पत्नी भी एक रात से ज्यादा अपनी मां के घर में नहीं रुकती है. एक तरह से उस का अपना घर अब उस के लिए बेगाना ही हो चुका है.’’

खराब सेहत

दलित औरतें अपनी सेहत का खुद ध्यान नहीं रख पाती हैं. स्वास्थ्य सेवाओं को ले कर काम कर रही सोनिया सिंह बताती हैं, ‘‘हम लोगों ने माहवारी के दौरान कपड़े के इस्तेमाल पर बातचीत की तो पाया कि सब से खराब हालत दलित औरतों की ही है. किसी भी गांव में 1-2 से ज्यादा दलित औरतें नहीं मिलतीं जो यह कहती हों कि वे माहवारी में पैड का इस्तेमाल करती हैं.’’

परिवार नियोजन में नसबंदी के टारगेट को पूरा करने के लिए सब से ज्यादा दलित औरतों का ही आपरेशन कराया जाता है. गांव की गरीब औरतों को छोड़ भी दें तो अच्छी पढ़ीलिखी औरतों में भी जाति का पता चलते

ही भेदभाव दिखने लगता है. शहरी जीवन में इस भेदभाव से बचने के लिए दलित औरतें अपनी पहचान बदलने लगी हैं.

रिजर्वेशन और भेदभाव

रिजर्वेशन का फायदा पा कर कुछ दलित परिवारों के पास पैसा और साधन  हैं. इस के बाद भी समाज में भेदभाव में कमी नहीं आई है.

मौका मिलते ही ऊंची जातियों के लोग यह कहने में नहीं चूकते हैं कि आरक्षण के चलते ही ये आगे हैं और रिजर्वेशन के चलते ही समाज की यह हालत है.

पुलिस और दूसरी ऐसी संस्थाओं में काम करने वाली औरतों का कहना है कि हमारे साथ भी जातीय भेदभाव होता है. खराब से खराब गंदगी वाले काम करने के लिए हम से कहने में किसी को कोई हिचक नहीं होती है, पर ऊंची जातियों की औरतों को वही काम कहने में लोगों को हिचक होने लगती है. काम के गलत होने से हमारी जाति का कोई मतलब नहीं होता है, पर काम के गलत होते ही हमारी जाति और रिजर्वेशन को ले कर टिप्पणी होने लगती है.

सोशल मीडिया के बाद यह बात और भी तेजी से उभर कर सामने आ रही है. जहां पर ऐसे तमाम मैसेज इधर से उधर होते हैं जो जातीय भेदभाव को बढ़ाने वाले होते हैं. इन में एक ही संदेश दिया जाता है कि रिजर्वेशन के चलते ही देश के हालात खराब हैं और इस के चलते ही दलित नौकरियों में हैं. तमाम दलित गैरसरकारी नौकरियों में हैं और वहां पर वे अच्छा काम कर रहे हैं. उन की तारीफ कभी नहीं होती.

शादी के पहले मीना का सपना था कि अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों की तरह वह भी खूब पढ़ेगी और समाज के लिए कुछ करेगी. उस की टीचर भी यही कहती थी कि मीना बहुत होशियार है.

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