LPG News: गैस एजेंसी कर्मी बनकर बाइक सवार चोर दो सिलेंडर उठा ले गये

LPG News: ग्रेटर नोएडा में दो चोरों ने कमाल कर दिया. दो स्मार्ट बाइक सवार गैस एजेंसी के यूनिफॉर्म में सजे-धजे सीधे एक घर की रसोई में घुस गए. “मैडम, सिलेंडर चेक करना है,” कहकर दो भरे-पूरे एलपीजी सिलेंडर कंधे पर लादा और बाइक पर सवार होकर गायब हो गए. इन सिलेंडर लुटेरों को पुलिस अभी तक तलाश रही है यानी चोरों ने न सिर्फ सिलेंडर चुराए बल्कि सरकार की कानून-व्यवस्था की भी धज्जियां उड़ा दीं.

सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों सिलेंडर बांट दिए. सिलेंडर पर सब्सिडी से महिलाओं को सशक्त बनाने का दावा किया लेकिन अब चोर भी उसी सिलेंडर को अपना उज्ज्वल भविष्य बनाने के लिए बड़ी आसानी से घर से उठा रहे हैं और पुलिस उन्हें ढूंढ भी नहीं पा रही. सरकार की माने तो पूरा देश डिजिटल इंडिया बन चुका है, आधार से हर चीज लिंक है लेकिन रसोई में घुसकर सिलेंडर चोरी करने वाले को पकड़ने में पुलिस को क्लू चाहिए. आखिरकार, चोरों ने जो किया, वो तो सरकार की नीति का ही परिणाम है ना? सस्ता गैस सबको चाहिए लेकिन सुरक्षा का इंतजाम? वो तो आम आदमी के जिम्मे है न? बेरोजगारी इतनी की चोरियाँ बढ़ रही हैं और महंगाई इतनी की सिलेंडर चोरी हो रहे हैं.

सरकार कहती है अपराध दर घटा है, विकास हो रहा है लेकिन हकीकत ये है कि अब चोर भी प्रोफेशनल हो गए हैं. पहले तो वे रात में चोरी करते थे, अब दिन-दहाड़े रसोई में घुसकर सामान उठा ले जाते हैं. ये चोरी नहीं सरकार की अच्छे दिन का नतीजा है.

औरतें जो रोज़ चूल्हे पर खड़ी होकर खाना बनाती हैं उनके लिए ये सिलेंडर जीवन-रेखा हैं लेकिन सरकार के लिए तो बस आंकड़े हैं “हमने इतने सिलेंडर सब्सिडी दिए” और चोर उन्हें बिना सब्सिडी के फ्री में उठा ले गए. क्या सबका साथ, सबका विकास यही है?

Hindi Story: शेरनी की दहाड़

सुनीता के सपनों की उड़ान उस के गांव की पगडंडियों से शुरू हो कर शहर की यूनिवर्सिटी तक जा पहुंची थी. ऊंची कदकाठी, दोहरा बदन और आंखों में आत्मविश्वास की चमक. वह सिर्फ खूबसूरत और सुशील ही नहीं, बल्कि फौलादी इरादों वाली लड़की थी. जब वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर निकलती, तो उस की सख्त शख्सीयत और स्वाभिमान देखने लायक होता. सुनीता के मामा शहर के नामी वकील थे. वही उस के आदर्श थे. वह भी उन्हीं की तरह काला कोट पहन कर गरीबों को इंसाफ दिलाने का सपना देखती थी. कानून की पढ़ाई के साथसाथ वह यह भी जानती थी कि इंसाफ की पहली सीढ़ी बेखौफ और नाइंसाफी के खिलाफ खड़ा होना है.

लेकिन उस शहर की चमक के पीछे अपराध का अंधेरा भी था. जिस इलाके में सुनीता रहती थी, वहां राजा नाम के एक बदमाश का खौफ था. राजा और उस के साथी आएदिन राहगीरों को लूटते और लड़कियों के साथ बदतमीजी करते थे. राजा अकसर सुनीता को दूर से घूरता था, पर उस की आंखों की तेज चमक और कड़क स्वभाव को देख कर वह सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. उसे सुनीता के कड़क स्वभाव से डर लगता था. शांति तब भंग हुई, जब सुनीता को पता चला कि पड़ोस की मासूम दिव्या ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. कई दिनों से वह खामोश और डरी हुई थी. दिव्या को राजा ने बीच सड़क पर रोक कर उस के साथ बदतमीजी की थी.

दिव्या के मातापिता डर के मारे पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे. उन का खामोश डर और दिव्या की सिसकियां सुनीता के कानों में गूंज उठीं. उसे लगा कि अगर आज वह चुप रही तो उस की पढ़ाई लिखाई, उस की हिम्मत और वकालत का उस का सपना, सब बेकार है. उस के खून में उबाल गया. अगले दिन सूरज की तपिश के बीच सुनीता ने अपनी चमचमाती बाइक सीधे उस चौराहे पर रोकी, जहां राजा अपने चमचों के साथ बैठा था. इंजन बंद हुआ, चारों तरफ सन्नाटा छा गया. सुनीता ने धीमे से हैलमैट उतारा, उस के खुले बाल हवा में लहराए और उस की तीखी नजरों ने सीधे राजा को भेदा. ‘‘भाई, जरा यहां तो आना,’’ सुनीता की आवाज गूंजी, जिस में चेतावनी और शालीनता दोनों थे.

राजा अपनी अकड़ में साथियों के साथ बाइक के पास पहुंचा. उसे लगा, शायद कोई मदद मांग रही है, पर सुनीता की आंखों में अंगारे थेसुनीता ने बिना डरे, सीधे राजा की आंखों में ?ांकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी हरकतें हदें पार कर रही हैं राजा. अपनी ताकत निहत्थों पर आजमाना बंद करो. बेहतर होगा कि आज के बाद तुम यहां किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी देखो, वरना याद रखनाकानून की पढ़ाई बाद में काम आएगी, मेरा हाथ पहले चलेगा.’’ सुनीता की आवाज में ऐसी दहाड़ और आत्मविश्वास था कि राजा के पैर कांपने लगे. उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं नेमैं ने क्या किया?’’ सुनीता ने कड़क कर जवाब दिया, ‘‘वही, जो एक बुजदिल करता है. तुम्हें शर्म नहीं आती बहनबेटियों को छेड़ते हुए? मैं ने तुम्हेंभाईकह कर पुकारा है, इस शब्द की लाज रख लो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना.’’

वह दबंग राजा, जिस से पूरा महल्ला थरथर कांपता था, सुनीता के सामने बौना पड़ गया. उस ने हाथ जोड़ लिए और वहां से चला गया. वह डर सिर्फ पुलिस का नहीं था, वह एक स्वाभिमानी लड़की के तेज का डर था. कुछ ही दिनों में बदलाव साफ दिखने लगा. सुनीता ने केवल उसे सुधारा, बल्कि उसे उस की रुकी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए भी बढ़ावा दिया, ‘‘कुछ बन कर दिखाओ. मातापिता का मान बढ़ाओ. यह जिंदगी घरपरिवार, समाज और देश का मान बढ़ाने के लिए मिली है.’’ ‘‘सम? गया दीदी,’’ राजा ने हाथ जोड़ कर कहा. राजा के बदमाश साथी, जो कल तक लड़कियों को छेड़ते थे, भी सुनीता कोदीदीकह कर सम्मान देने लगे थे. कालोनी के लोगों ने राहत की सांस ली. वे अब सुनीता कोशेरनीकहने लगे थे. सुनीता ने साबित कर दिया कि आत्मविश्वास और हिम्मत ही एक महिला का सब से बड़ा गहना और सब से ताकतवर हथियार है.         

पप्पू यादव के दावे पर बवाल   
बिहार में पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने दावा किया है कि भारतीय जनता पार्टी सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों को मिला कर केंद्रशासित प्रदेश बनाने की साजिश रच रही है. इस योजना के तहत पहले पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू कराया जा सकता है. इस के बाद बिहार विधानसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की जाएगी. इस पूरे प्रोसैस के बाद सीमांचल क्षेत्र के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, रायगंज और दिनाजपुर जैसे कुछ जिलों को जोड़ कर एक नया केंद्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जबकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने साफ शब्दों में कहा कि ये दावे तथ्यों के बिलकुल उलट हैं और इन में रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है.   

Crime Story: सीमा पार इश्क के लिए 3 करोड़ की साइबर ठग

Crime Story:  कहते हैं कि इश्क सरहदें नहीं देखता. दूरी, देश, भाषा सब पीछे छूट जाते हैं. मोबाइल की स्क्रीन पर उभरता एक नाम धीरेधीरे आदत बन जाता है. दिन की शुरुआत उसी संदेश से होती है और रात उसी आवाज के साथ खत्म. भरोसा बनता है, सपने जुड़ते हैं और भविष्य की तसवीरें भी खिंचने लगती हैं. लेकिन जब यही रिश्ता पैसे के लेनदेन से जुड़ जाए, तो कहानी केवल प्यार की नहीं रहती. वह कानून, जांच और अदालत तक पहुंच जाती है.

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के डबलीराठान गांव का हरदीप सिंह इस समय ऐसी ही एक कहानी का केंद्र है. साइबर थाना पुलिस के मुताबिक उसे एक साइबर ठगी मामले में गिरफ्तार किया गया है, जिस में तकरीबन 3 करोड़, 26 लाख रुपए डिजिटल तरीके से ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि यह राशि क्रिप्टोकरैंसी के जरीए भेजी गई. मामला फिलहाल कोर्ट में कल रहा है.
हरदीप सिंह एक साधारण किसान परिवार से जुड़ा नौजवान था. उस के पिता खेती करते थे. घर की आमदनी लिमिटेड थी. उस ने गांव के स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई की. आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सका. बेहतर रोजगार की तलाश में उसने कंप्यूटर का काम सीखा. इंटरनैट और सोशल मीडिया उस के लिए नई उम्मीदों की दुनिया थे.

तकरीबन 2 साल पहले सोशल मीडिया के जरीए उस का मेलजोल पाकिस्तान की एक लड़की राबिया से हुआ. शुरुआत सामान्य बातचीत से हुई. फिर नियमित चैटिंग शुरू हुई. धीरेधीरे बातचीत निजी होती गई.
पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह भावनात्मक रूप से जुड़ गया था. बातचीत में भविष्य और शादी तक की चर्चा होने की बात सामने आई है. जांच अफसरों के मुताबिक कुछ समय बाद पैसे से जुड़ी मदद की मांग शुरू हुई. शुरुआत छोटी रकम से हुई. कभी जरूरत का हवाला, कभी उपहार की बात. आरोपी ने कथिततौर पर कुछ भुगतान किया. लेकिन मांगों का दायरा बढ़ता गया. भावनात्मक दबाव और पैसे के बीच वह उल?ाता गया.

पुलिस के मुताबिक इसी दौर में आरोपी ने गैरकानूनी तरीके से पैसा कमाने की दिशा में कदम बढ़ाया. पूछताछ में उस ने बताया कि उसे साइबर ठगी के जरीए कमाई का सु?ाव मिला था. इस दावे की जांच जारी है. डिजिटल चैट, काल रिकौर्ड और बैंक ट्रांजैक्शन की जांच की जा रही है. जांच में सामने आया कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सस्ते सामान बेचने के नाम पर लोगों को आकर्षित किया गया. इश्तिहार में कीमत बाजार से कम बताई जाती थी. ग्राहकों से पहले भुगतान लिया जाता था. कई मामलों में भुगतान के बाद सामान नहीं भेजा गया. बाद में पीडि़तों ने शिकायत दर्ज कराई.

धीरेधीरे यह गतिविधि संगठित रूप लेने लगी. पुलिस के मुताबिक ठगी की रकम अलगअलग खातों में जमा की जाती थी. आरोपी ने अपने गांव के कुछ लोगों को यह कह कर भरोसे में लिया कि उस का बैंक खाता अस्थायी रूप से बंद है और कुछ समय के लिए उन के खाते की जरूरत है. गांवदेहात के समाज में सामाजिक भरोसा मजबूत होता है. कुछ लोगों ने सहमति दे दी. जांच में सामने आया कि ठगी की रकम उन्हीं खातों में जमा की जाती थी. बाद में रकम निकाल कर डिजिटल वालेट में डाली जाती और फिर क्त्रिप्टोकरैंसी में बदली जाती थी.

पुलिस का दावा है कि तकरीबन 3 करोड़, 26 लाख रुपए यूएसडीटी के जरीए ट्रांसफर किए गए. यह रकम डिजिटल चैनलों से सीमा पार पहुंची होने की बात जांच में सामने आई. क्रिप्टोकरैंसी के इस्तेमाल ने मामले को और मुश्किल बना दिया. पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम में लेनदेन का रास्ता साफ रहता है. लेकिन डिजिटल टोकन के जरीए राशि कई वालेट में ट्रांसफर की जा सकती है. साइबर माहिरों के मुताबिक ऐसे मामलों में जिस के पास पैसा गया है, उस की पहचान करना चुनौती से भरा होता है. मामला तब उजागर हुआ जब हनुमानगढ़ के रहने वाले एक आदमी ने साइबर ठगी की शिकायत दर्ज कराई. उस ने सोशल मीडिया पर सामान खरीदने के लिए भुगतान किया था, लेकिन सामान नहीं मिला.

बैंक लेनदेन की जांच करते हुए पुलिस आरोपी तक पहुंची. मोबाइल फोन और सिम कार्ड की जांच में कई गलत ट्रांजैक्शन सामने आए. पुलिस के मुताबिक, आरोपी से 26 बैंक पासबुक, 8 चैकबुक, 18 एटीएम कार्ड, 8 सिम कार्ड और 3 मोबाइल फोन बरामद किए गए. पाकिस्तान से जुड़े कुछ दस्तावेज भी मिलने की बात कही गई. जांच में यह भी सामने आया कि इन खातों से जुड़े 14 राज्यों में 36 साइबर ठगी शिकायतें दर्ज हैं. संबंधित राज्यों की एजेंसियों के साथ तालमेल किया जा रहा है. जिला पुलिस सुपरिंटैंडैंट के मुताबिक पूछताछ में आरोपी ने पाकिस्तान जा कर शादी करने की इच्छा जताई थी. उस ने वीजा के लिए अर्जी भी दी थी, लेकिन रजामंदी नहीं मिली. सीमापार मेलजोल और पैसे के लेनदेन की पूरी कड़ी की जांच जारी है.

राबिया के रोल की फिलहाल जांच चल रही है. डिजिटल सुबूतों की बुनियाद पर उस के जुड़े होने की तसदीक की जा रही है. आखिरी नतीजा अदालत में पेश सबूतों पर ही साफ होगा. यह मामला केवल 3 करोड़, 26 लाख रुपए के डिजिटल ट्रांसफर का नहीं है. यह उस बदलती डिजिटल संस्कृति का उदाहरण भी है, जिस में गांव का नौजवान भी वर्ल्ड नैटवर्क से जुड़ा है. इंटरनेट ने मौके दिए हैं, लेकिन जोखिम भी बढ़ाए हैं. सोशल मीडिया पर बनी पहचान असली भी हो सकती है और फर्जी भी. साइबर माहिर बताते हैं कि मौडर्न ठगी का बड़ा हिस्सा तकनीकी हैकिंग से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तरीकों से होता है. पहले विश्वास जीता जाता है. इनसान को भावना के लैवल पर जोड़ा जाता है. फिर पैसे की मांग जोड़ी जाती है.

इसे सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता है. इस सब में इनसान खुद अपने पैसे सौंप देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह किसी अपने की मदद कर रहा है. नैशनल लैवल पर साइबर अपराध के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. औनलाइन शौपिंग धोखाधड़ी, इन्वैस्टमैंट ठगी और सोशल मीडिया से जुड़ी धोखाधड़ी बढ़ रही है. डिजिटल भुगतान की सुविधा जितनी आसान हुई है, अपराध का तरीका भी उतना ही तेज हुआ है. गांवदेहात के इलाकों में इंटरनैट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन डिजिटल जागरूकता अभी भी कम है. गांव के लोगों के लिए बैंक खाता भरोसे का सिंबल है. कोई परिचित मदद मांगे तो शक कम होता है. यही भरोसा कई बार अपराध की कड़ी बन जाता है.

कानूनी नजरिए से ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराएं लागू हो सकती हैं. आर्थिक अपराध केवल पैसों का नुकसान नहीं करता, बल्कि सामाजिक इज्जत और भविष्य पर भी बुरा असर डालता है. यह घटना समाज के लिए चेतावनी है. इंटरनैट पर बने रिश्तों में पैसे के लेनदेन से पहले पूरी सावधानी जरूरी है. बैंक खाता, एटीएम कार्ड, पिन या ओटीपी सा? करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है. साइबर ठगी में तुरंत 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए. एक साधारण गांवदेहात का नौजवान, एक औनलाइन रिश्ता और 3 करोड़, 26 लाख रुपए का डिजिटल ट्रांसफर. यह कहानी अब अदालत के फैसले का इंतजार कर रही है. आखिरी फैसला कोर्ट करेगा. लेकिन यह घटना एक बड़ा मैसेज छोड़ती है. डिजिटल जमाने में भावनाएं तेज हैं, लेकिन कानून उस से भी तेज है. सीमा पार इश्क अगर पैसे के लेनदेन से जुड़ जाए, तो उस का अंजाम केवल निजी नहीं, कानूनी भी हो सकता है. इश्क अपनी जगह है. इंटरनैट अपनी जगह. लेकिन जिम्मेदारी और कानून दोनों से ऊपर हैं.   

राकेश खुडिया

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

Social Story: 6 मुसहरों की  मौत ब्लास्ट  में

Social Story: ज किसी औद्योगिक हादसे की खबर टैलीविजन या डिजिटल प्लेटफार्म परब्रेकिंग न्यूजबन कर उभरती है, तब कुछ पल के लिए पूरा देश सिहर उठता है. मीडिया के कैमरे धुएं, आग और एंबुलैंसों की तसवीरें दिखाते हैं. एंकर मारे गए लोगों की तादाद गिनाते हैं. फिर धीरेधीरे खबर ठंडी पड़ जाती है.


छत्तीसगढ़ के भिलाई क्षेत्र के आयरन प्लांट रियल इस्पात फैक्टरी में हुए भीषण ब्लास्ट की खबर भी इसी तरह आई और चली गई. पर इस खबर के भीतर जो सच छिपा है, वह सिर्फ एक औद्योगिक हादसा नहीं, बल्कि बिहार, खासकर गया जिले के सब से वंचित समुदायों की जिंदगी और मौत की कहानी है.


जैसे ही खबर फ्लैश हुई, स्वाभाविक जिज्ञासा के साथ एक गहरा डर भी मन में उभरा कि मारे गए मजदूर आखिर हैं कहां के? सालों से एक पैटर्न बन चुका है कि देश के अलगअलग हिस्सों में होने वाले औद्योगिक हादसों, खदान हादसों, फैक्टरियों में ब्लास्ट और फर्नेस में ?ालसने वाली खबरों के पीछे ज्यादातर चेहरे बिहार के होते हैं खासकर वे जिले, जहां से पलायन जिंदगी की कड़वी हकीकत बन चुका है, जैसे गया, औरंगाबाद, नवादा, जमुई, खगडि़या, सहरसा वगैरह.


मुसहरों पर टूटा कहर पहले दिन खबर में मजदूरों की पहचान नहीं थी, लेकिन अगले ही दिन अखबार में छपी तसवीरों और नामों ने डर को सच में बदल दिया. मारे गए सभी 6 मजदूर गया जिले के थे. जो जिंदा थे, वे भी मौत और जिंदगी के बीच ?ाल रहे थे. इस हादसे में मारे गए सभी 6 मजदूर मुसहर जाति से थे. बिहार की सब से गरीब और सब से हाशिए पर धकेली गई जाति. 4 घायलों में से 2 मुसहर थे और 2 मुसलिम.


यह आंकड़ा अपनेआप में बहुतकुछ कह जाता है. यह बताता है कि देश की औद्योगिक प्रगति का बो? किन कंधों पर लादा जा रहा है. जिन लोगों के पास जमीन है, स्थायी घर, सामाजिक सिक्योरिटी, वही लोग सब से खतरनाक कामों में ?ांक दिए जाते हैं. बिहार के 90 फीसदी से ज्यादा मुसहर भूमिहीन हैं. उन के पास खेत नहीं हैं, मकान नहीं हैं और अकसर सरकारी जमीन पर ?ांपड़ी बना कर रहना ही उन की मजबूरी होती है और जब सरकार इन्हें गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर बुलडोजर चलाती है, तब उन के पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.


हाल के सालों में बिहार में बुलडोजर की राजनीति ने जिस तरह से गरीबों और दलितों को निशाना बनाया है, उस ने मुसहर समुदाय को और ज्यादा असुरक्षित बना दिया है. जिन के पास पहले से कुछ नहीं था, उन से वह भी छीन लिया गया. नतीजा यह हुआ कि गांव में रहने की आखिरी जमीन भी खिसक गई. ऐसे में परिवार के मर्द ही नहीं, बल्कि किशोर और कभीकभी बच्चे भी काम की तलाश में बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं.


गया, जिसे अब सरकारी कागजों में गयाजी कहा जाने लगा है, वहां ऐसे हालात कोई नई बात नहीं हैं. अपने निजी अनुभव से कहा जा सकता है कि यहां मजदूरी के लिए पलायन बचपन से ही शुरू हो जाता है. इस हादसे में मारे गए लोगों में से कम से कम 3 लोग 18 से 20 साल से ज्यादा के नहीं लगते. यह सवाल बेहद गंभीर है. अगर ये मजदूर नाबालिग थे या 18 साल के आसपास थे, तो यह सिर्फ श्रम शोषण नहीं, बल्कि सीधे सीधे मानव तस्करी का मामला बनता है.

बच्चों को काम के नाम पर दूसरे राज्यों में ले जाना, उन्हें खतरनाक उद्योगों में ?ांक देना और उन की हिफाजत के कोई इंतजाम करना, यह सब कानून प्रवर्तन एजेंसियों की आंखों के सामने हो रहा है.
यह कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है. रेलवे स्टेशनों से रोज सैकड़ों मजदूर ट्रेनों में भर कर जाते हैं. ठेकेदार खुलेआम दलाली करते हैं. फिर भी श्रम विभाग की नींद टूटती है, ही पुलिस की.


बिहार और खासकर गया जिले से मजदूरों को देश के हर कोने में ले जाया जाता है, जैसे छत्तीसगढ़, ?ारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब. जहां कहीं खदान है, फैक्टरी है, फर्नेस है, वहां बिहार का मजदूर मिलेगा और अकसर वहां के हालात बदतर होती हैं. सिक्योरिटी उपकरणों की कमी, लंबी शिफ्ट, न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान, रहने के लिए बदहाल ?ांपडि़यां, यह सब आम बात है.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में हुए इस हादसे से जुड़ी खबर बताती है कि घटना के समय मजदूरों ने सेफ्टी सूट तक नहीं पहना था. फर्नेस के आसपास काम कर रहे मजदूरों के लिए यह सीधा मौत को न्योता देने जैसा है. घेरे में प्रशासन इस पूरे मामले में राज्य के रोल पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. बिहार सरकार ने हाल ही में श्रम संसाधन विभाग का नाम बदल करश्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभागकर दिया है.

नाम से यह संकेत मिलता है कि सरकार प्रवासी मजदूरों को ले कर संवेदनशील है, लेकिन सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से हकीकत बदल जाती है? अगर विभाग सच में प्रवासी मजदूरों के कल्याण को ले कर गंभीर है, तो उस कल्याण को कागजों से बाहर निकालना होगा. सब से पहला कदम यह होना चाहिए कि उन रेलवे स्टेशनों पर विभाग के स्थायी बूथ खोले जाएं, जहां से बड़ी तादाद में मजदूर पलायन करते हैं.

गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा जैसे स्टेशनों पर अगर श्रम विभाग की मौजूदगी होती, तो मजदूरों का रजिस्ट्रेशन हो सकता था. यह पता चल सकता था कि कौन कहां जा रहा है, किस ठेकेदार के साथ जा रहा है और किस तरह के काम में लगाया जा रहा है. इस से सिर्फ मानव तस्करी पर रोक लगाई जा सकती थी, बल्कि हादसे के हालात में जिम्मेदारी तय करना भी आसान होता.


दूसरा, विभाग को सिर्फ स्रोत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, क्योंकि प्रवासी मजदूरों का कल्याण तभी मुमकिन है, जब राज्य गंतव्य स्थलों तक भी पहुंचे. छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बिहार के मजदूर भारी तादाद में काम करते हैं. वहां महकमों के अफसरों की तैनाती, श्रम शिविरों का निरीक्षण और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल बेहद जरूरी है.

अभी हालात ये हैं कि बिहार का मजदूर दूसरे राज्य में मरता है, तो उस का शव बिहार लौटता है और उस के साथ लौटता है कुछ मुआवजे का चैक और बहुत सारा सन्नाटा. मुसहर समुदाय ऐतिहासिक रूप से सामाजिक अनदेखी का शिकार रहा है. पढ़ाईलिखाई, जमीन और संसाधनों से दूर रखे गए इस समुदाय के लिए औद्योगिक मजदूरी ही एकमात्र रास्ता बचता है.

लेकिन जब यही मजदूरी मौत में बदल जाती है, तब यह सवाल उठता है कि क्या विकास की कीमत हमेशा वही लोग चुकाएंगे, जिन की आवाज सब से कमजोर है? सुरक्षा की खुली पोल औद्योगिक सुरक्षा मानकों की बात करें तो यह हादसा देश की औद्योगिक व्यवस्था की पोल खोलता है. आयरन प्लांट जैसे खतरनाक उद्योगों में सिक्योरिटी स्टैंडर्ड का पालन कोई औप्शन नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए.

लेकिन अकसर ठेकेदारी प्रथा के चलते मजदूरों की जान सब से सस्ती सम? जाती है. परमानैंट मुलाजिमों के लिए सिक्योरिटी उपकरण, ट्रेनिंग और बीमा का इंतजाम होता है, जबकि ठेका मजदूरों को बिना किसी सिक्योरिटी के काम पर लगा दिया जाता है. जब हादसा होता है, तो जिम्मेदारी तय करने के बजाय जांच समितियां बना दी जाती हैं और कुछ दिनों बाद सबकुछ भुला दिया जाता है.


मीडिया का रोल भी यहां सवालों के घेरे में आता है. हादसे के पहले दिन तक मजदूरों की पहचान सामने नहीं आई थी. यह भी एक तरह की अनदेखी है. जब तक यह नहीं बताया जाता कि मरने वाले कौन थे, कहां से थे, किस सामाजिक बैकग्राउंड से थे, तब तक यह हादसा सिर्फ एक संख्या बन कर रह जाता है,
6 की मौत, 11 घायल.


पर जैसे ही पता चलता है कि ये सभी गया के मुसहर थे, तब इस खबर का सामाजिक मतलब बदल जाता है. तब यह सवाल उठता है कि क्यों हर बार यही समुदाय सब से ज्यादा मरता है?
जिम्मेदारी लेनी होगी इस पूरी व्यवस्था में केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बनती है. प्रवासी मजदूरों के लिए बने कानून, जैसे अंतर्राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी लैवल पर उन का पालन नहीं होता.


इन कानूनों को सख्ती से लागू किया जाता, तो ठेकेदारों की मनमानी पर रोक लग सकती थी. मजदूरों का रजिस्ट्रेशन, न्यूनतम मजदूरी, हैल्थ बीमा और दुर्घटना बीमा तय किया जा सकता था. लेकिन जब राज्य खुद गरीबों को गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर उन के घर गिरा देता है, तब उन से यह उम्मीद करना कि वे सिक्योर रहेंगे और इज्जत से काम पाएंगे, एक तरह का मजाक लगता है.

बिना जमीन, बिना घर और पढ़ाईलिखाई से दूर मुसहर के लिए औप्शन बेहद सीमित हैं. गांव में रोजगार नहीं, शहर में सिक्योरिटी नहीं. ऐसे में वह फर्नेस के सामने खड़ा होता है, पिघले लोहे के बीच काम करता है और किसी दिन उसी में ?ालस कर मर जाता है. यह हादसा हमें एक बार फिर चेतावनी देता है कि अगर प्रवासी मजदूरों को ले कर नीतिगत और ठोस बदलाव नहीं किए गए, तो यही ट्रैंड जारी रहेगा.

बिहार के मजदूर स्लैब के नीचे दब कर, खदानों में फंस कर और फर्नेस के पिघले लोहे में पिघल कर मरते रहेंगे और हम हर बार कुछ दिनों तक शोक जता कर फिर अगली खबर की ओर बढ़ जाएंगे. यह सरकार की नाकामी है, आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक तीनों लैवलों पर. जब तक यह नहीं मान लिया जाएगा कि प्रवासी मजदूरों की मौतें विकास की जरूरी कीमत नहीं, बल्कि नीतियों की नाकामी हैं, तब तक कुछ नहीं बदलेगा.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में मारे गए गया के मुसहर मजदूर सिर्फ 6 लोग नहीं थे, बल्कि वे उस भारत का चेहरा थे, जो चमकते उद्योगों के पीछे अंधेरे में काम करता है. अगर हम सच में एक अच्छे समाज की बात करते हैं, तो हमें यह पक्का करना होगा कि विकास की आग में सब से गरीब और वंचित जलें वरना इतिहास हमें इसी सवाल के साथ याद रखेगा कि जब मजदूर पिघलते लोहे में ?ालस रहे थे, तब राज्य और समाज क्या कर रहे थे?                  

Social Story: गहरी पैठ

Social Story: भीड़ का इस्तेमाल हर जबरदस्ती के खिलाफ करना नकेवल कानूनी है, यह आसान भी है. भीड़ चाहे सही काम की मांग कर रही हो या गलत की, यह अपनी बात सुनाने का एक तरीका है. 1973-74 में जयप्रकाश नारायण नेकुरसी खाली करो कि जनता आती हैका नारा दे कर 1971 की चुनावी और बंगलादेशी लड़ाई की जीत के बावजूद भीड़ के बल पर इंदिरा गांधी का सिंहासन हिला दिया था.


आज भीड़ को कुचलने की पूरी तैयारी हो गई है. वे लोग जिन्होंने भीड़ के बल पर बाबरी मसजिद गिराई थी, जिस ने भीड़ के बल पर भागलपुर में दंगे कराए थे, जिन्होंने गुजरात में 2002 के दंगे कराए थे, आज भीड़ को कुचल रहे हैं. राजनीतिक मामलों को तो छोडि़ए, अब दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ मोरचा निकालने वालों की भीड़ को कानून के हाथों बुरी तरह कुचला जा रहा है. आजकल भीड़ को कंट्रोल करने का आसान तरीका बन गया है अगर भीड़ सरकार के खिलाफ कुछ मांग कर रही हो. 1-2 लोगों से पाकिस्तानी नारे लगवा दो. फिर क्या पुलिस सब को बंद ही नहीं कर देगी, वर्षों जेलों में बंद रखेगी. सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी ?ांडी दे दी है कि पुलिस भीड़ को, ‘देश के खिलाफकाम करने वाली भीड़ को, बुलवाने वालों को बरसों बिना सजा दिए बंद कर सकती है.


यह आम जनता के हक को मारना है. आज वैसे ही आम जनता को अपने मोबाइल से फुरसत नहीं
कि वह दूसरों के फायदे के लिए किसी भीड़ में जाए. आजकल तो भीड़ भाड़े की होती है या भक्ति की. दोनों से चूंकि भीड़ जमा करने वाले को जम कर फायदा होने की उम्मीद होती है, लोग मोबाइल जेब में रखने लगे हैं. पर नारों का खतरा इन में भी है. 2-4 लोगों को फालतू के नारे लगाने के लिए तैयार किया जा सकता है जो चुपके से गायब हो जाएं. यह भीड़ तोड़ने का हथकंडा अब काम का है. सरकार आज भीड़ से नहीं डर रही. किसानों ने हरियाणा की सीमा पर भीड़ जमा कर 3 साल पहले खेती कानून वापस करा लिए थे, पर उस भीड़ पर तरहतरह के सच्चे?ाठे आरोप लगा कर उसे जबरदस्त बदनाम किया गया था. आज
किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत दूसरे लोग घरों में दुबके हैं, क्योंकि लोग भीड़ में शामिल हो कर जेलों में नहीं सड़ना चाहते.


गांवों में जहां अखबार है, रेडियो स्टेशन, टीवी, लोगों को अपनी बात कहने का अब मौका ही नहीं मिलता, क्योंकि भीड़ जमा करना मुश्किल हो गया है. यह सरकार को हर मामले में मनमानी करने का मौका दे रहा है. जनता की बात सिर्फ ट्रोलिंग तब सीमित है और भीड़ की शक्ल नहीं लेती. ट्रोलर्स को कंट्रोल करने के लिए भी सरकार पूरी तरह जुट गई हैअब गांवों के लिए सब से बुरे दिन गए हैं. सरकारें उन्हें जैसे मरजी हांक सकती हैं.



हले प्राइवेट दलाल लोगों की तस्करी और चोरी करते थे ताकि उन्हें किसी और देश या राज्य में गुलामी करवाने के लिए ले जाया जाए, अब यह काम भारत सरकार ने करना शुरू कर दिया है. शुरू में जब कांग्रेस सरकार के जमाने में लोगों ने दलालों के हत्थे चढ़ कर विदेश जाना शुरू किया था तो सरकार ने इस की देखभाल के लिए एक विभाग बनाया था जिस की इजाजत के बिना किसी को हवाईजहाज या पानी के  जहाज पर नहीं चढ़ने दिया जाता था.


अब दलाली का यह काम सरकार खुद कर रही है. 200 साल पहले से भारत से एग्रीमैंट करा के गरीब मजदूरों को अंगरेज और दूसरे यूरोपीय दलाल भारत के लोगों को अफ्रीका, फिजी, मौरीशस, सूरीनाम ले जाते रहे हैं. यहां काम गुलामी का ही होता था पर वह गुलामी भारत में जाति की गुलामी से ज्यादा बेहतर थी. जो थोड़े से लोग कभीकभार जुगत भिड़ा कर वापस अपने गांव भी जाते थे, वे बढ़ाचढ़ा कर कसीदे पढ़ते थे.


यही काम आजादी के बाद हुआ जब तेल उगलने वाले देशों को पैसा मिलने लगा. उन के यहां आबादी तो थी नहीं. उन्होंने भरभर कर भारत से लोगों को बुलाना शुरू किया. काम गुलामी जैसा ही था पर भारत के गांवों में ईंट के भट्ठों या छोटी फैक्टरियों में जो गुलामी होती है, उस से कहीं कम मुश्किल था और पैसा ज्यादा मिलता था. आज भारत अगर फलताफूलता नजर रहा है तो इस की वजह राम मंदिर से निकलने वाला आशीर्वाद नहीं है, इन मजदूरों की मेहनत का पैसा है जो ये भारत में अपने घर वालों को भेजते हैं. अब घर वाले भी भारत से गए लोगों को नोट छापने की मशीन सम?ाते हैं और चाहे घर का आदमी अपनी हड्डियां गलाए, वे खुश ही रहते हैं.


सरकार तो बहुत खुश है. उसे बैठेबिठाए लगभग 14,00,000 करोड़ (14 लाख करोड़) की भारी रकम मिल रही है, इसीलिए जब इजरायल और गाजा की लड़ाई शुरू हुई और गाजा के मजदूरों ने इजरायल में जाना बंद कर दिया तो भारत सरकार ने बिना फिक्र किए कि यह लड़ाई का इलाका है. कई हजार मजदूरों को इजरायल भेजने की दलाली का काम अपने हाथों में ले लिया. सरकार की एक कंपनी नैशनल स्किल डवलपमैंट कौर्पोरेशन ने दलाली शुरू की और रामजी के प्रदेश से हिंदू मजदूर भक्तों को यहूदियों के देश में बढ़ईगीरी, नलसाजी, लुहारी, मजदूरी के काम के लिए भेजना शुरू कर दिया. अब चूंकि  मंदिरों की हिंदी बैल्ट में गरीबी बेतहाशा है लोगों ने अपनी जमीन, जायदाद, जेवर बेच कर नौजवानों और भगोड़ों को भी भेजने के लिए लाइनों में खड़ा कर दिया. दलाल पैसे नहीं देते थे, लेते थे. प्राइवेट दलाल घर वालों को पैसे दे कर गुलामी के लिए खरीदते हैं पर ये तो सरकारी दलाल हैं, ये लेते हैं.


अब कुछ लोग इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं कि इस दलाली में गुलामों से भेदभाव किया जा रहा है, जो बात कोर्ट की एप्लीकेशन में नहीं है वह यह है कि दलाल कंपनी के अफसरों ने घूस भी ली होगी. जहां घूस का मौका हो, वहां सरकार हाथ नहीं डालती. अब सरकार अपना निकम्मापन दिखाने के लिए ढोल बजा रही है कि देखो हम ने विधर्मी के यहां गुलामी के लिए मजदूर भेजे. चढ़ावे की बात वैसे ही छिपा दी जाती है जैसी सभी मंदिरों में छिपाई जाती है.    Social Story                      

Hindi Story: आर्या धोखेबाज दुलहन

Hindi Story: हाथों में मिठाई का डब्बा और शादी का कार्ड थामे विनय को सामने देखना चौंकाने वाला था. ‘‘तुम यहां…’’ मेघना ने हैरान हो कर विनय से पूछा. ‘‘मैं आप से अपनी खुशी बांटने आया हूं मैम,’’ विनय ने कहा. विनय सचमुच खुश था या नहीं, यह तो पता नहीं, मगर पहली मुलाकात की बजाय शांत दिख रहा था. उसे देखा तो 2 साल पहले की मुलाकात मेघना की आंखों में घूम गई.


अक्तूबर, 2023 की बात थी, जब मेघना मीडिया महोत्सव में भाग लेने मुंबई पहुंची थी. मुंबई के बारे में जितना सुना था, वैसा बिलकुल नहीं पाया. कोई भागमभाग नहीं थी और लोग बहुत अच्छे लगे. कोई तो वजह रही होगी, जो इस शहर ने आजादी के पहले ही खुद को मौडर्न कर लिया था. कार्यक्रम मराठा संघ में था और दिन का तीनचौथाई बिता लेने के बाद आराम करने के मकसद से मेघना होटल वापस आना चाहती थी. कैब बुक की तो खुशी का ठिकाना रहा. कैब चालक का नाम विनय था. उस की रेटिंग अच्छी थी.


कैब का किराया कोलकाता से ज्यादा पर हैदराबाद से आधा था. शायद इसी खुशी ने चेहरे पर मुसकान चिपका दी, तो कैब ड्राइवर ने टोका, ‘‘हैलो मैम.’’
‘‘हाय,’’ मेघना ने जवाब दिया.
‘‘कुछ खास है क्यामैं सुबह से कई लोगों को स्टेशन से मराठा संघ ला चुका हूं?’’
‘‘हां, 3 दिनों का मीडिया महोत्सव है,’’ मेघना ने बताया.
‘‘अच्छाऔर इस में क्या होता
है मैम?’’
‘‘सहित्य और मीडिया की एकदूसरे पर निर्भरता और समाज के लिए इन की उपयोगिता पर चर्चा होती है.’’
‘‘अच्छाहमें क्या पता मैमहम तो रोज की रोटीदाल की जद्दोजेहद में जीते हैं. वैसे, आप क्या करती हैं?’’
‘‘मैं कहानीकार हूं.’’
इस से ज्यादा वह सम?ाता नहीं, सो बात खत्म करने के मकसद से मेघना ने कह दिया, मगर यहीं उसे राह मिल गई थी, ‘‘अरे वाह, आप कहानियां लिखती हैं. आप को देख कर कुछ ऐसा ही लग रहा था…’’ उस की बात पर मेघना को हंसी गई, तो मौका पा कर पूछ बैठा, ‘‘क्या आप मेरे मन की बात भी लिख सकती हैं?’’


‘‘बिलकुलबताओ क्या है तुम्हारी कहानी?’’
मेघना ने अपने अनुभव से जो सीखा वही बयां करती आई थी. उसे लगा कि वह भी प्यार की कोई आधीअधूरी दास्तान छेड़ेगा और वह हमेशा की तरह उसे पाठकों तक पहुंचाएगी, मगर उस ने जो कहा वह पूरे 2 साल तक उस के मन में घूमता रहा और अब जबकि उस की कहानी अपने अंजाम तक पहुंची है, तो मेघना ने लिखा
सब से पहले उस ने कैब राजीव गांधी सी लिंक पर चढ़ा दी. रास्ता
लंबा हुआ, तो विनय मन को खोलता चला गया.
‘‘हम 2 भाई हैं. बचपन में ही मातापिता को खो दिया था. छोटे भाई को मौसी साथ ले गईं और पढ़ाने लगीं. मैं ने छोटेछोटे होटलों में बहुत दिनों तक काम किया. खानासोना मुफ्त था, तो तनख्वाह बचा कर भाई को भेजने लगा. फिर कुछ अच्छे लोग मिले तो बेहतर होटल में नौकरी लग गई.
‘‘वहीं मेरी आनंद मेहरोत्रा सर से पहचान हुई. बेचारे बड़े भले आदमी हैं. मु? अपने होटल में हाउसकीपिंग मैनेजर बना दिया. तनख्वाह भी दोगुनी कर दी, तो मैं ने गोवा में एक कमरे का फ्लैट खरीद लिया.


‘‘होटल समुद्र के किनारे होने से हाई क्लास टूरिस्ट ज्यादा आते तो टिप भी अच्छीखासी मिल जाती. तनख्वाह पूरी की पूरी बचने लगी. जेबखर्च ऊपरी कमाई से पूरा हो जाता था.
‘‘सबकुछ बहुत अच्छा जा रहा था कि एक दिन उन के होटल के बैंकवैट हाल में मेरी नजर जिस गोरी पर जा अटकी वह भी जाने क्यों मु? ही देखे जा रही थी. वह आनंदजी के दूर के रिश्ते के बहन की बेटी थी. जिस तरह से उस ने मु? देखा, एक अनाम सा रिश्ता कायम कर लिया था. इस बात की खबर लगते ही आनंदजी ने मेरी खूब तारीफें कर हमारा रिश्ता तय करा दिया.’’
‘‘यह तो बढि़या हुआ. वे सचमुच भले इनसान हैं.’’
‘‘यही सोच कर मैं आंखें मूंदे आगे बढ़ता चला गया, मगर.’’
‘‘मगर क्या?’’ अब मेघना का कौतुहल जाग गया.


‘‘मैं ने शादी के लिए उलटी गिनती शुरू कर दी थी मगर उसे कोई जल्दी नहीं थी. वह स्कूल में पढ़ाती थी तो बच्चों के एग्जाम, रिजल्ट, पीटीएम निबटा कर जब गरमियों की छुट्टियां हुईं तब जा कर मैं घोड़ी चढ़ा.’’
‘‘अंत भला तो सब भला.’’
‘‘नहीनहीं. असली कहानी यहीं से तो शुरु हुई.’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘आप बड़ी हैं. मेरा मां समान हैं, इसलिए बोल देता हूं. शादी के बाद वह हनीमून के लिए राजी ही नहीं हो रही थी, जबकि मैं ने हनीमून के लिए अलग से पैसे जमा कर रखे थे. मैं नहीं चाहता था कि कल को उस के मन में कोई मलाल रह जाए, उस का कोई अरमान अधूरा
रह जाए.
‘‘इस शादी से मैं जितना खुश था वह उतनी ही ठंडी थी. कभी मां की बीमारी, कभी व्रत, कभी पूजापाठ, कभी मेहमानों की आवभगत, तो कभी थकान इसी तरह किसी किसी बहाने से मु? से दूरदूर रहती थी.’’
‘‘शादी उस की मरजी से हुई थी ? मतलब कोई अफेयर वगैरह?’’
‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं था.’’
‘‘फिर बेरुखी क्यों?’’


‘‘यहीक्यों?’ एक दिन मेरे सिर पर भी सवार हो गया. आजकल करते
40 दिन निकल गए तो मैं ने उसे भींच कर सीने से लगा लिया, पर वह फिर से मु? टालने लगी, तब मेरे अंदर का मर्द जाग गया. पहले तो प्यार से डाक्टर के पास चलने के लिए कहा, तो उस ने माहवारी का बहाना बनाया, मगर इस नाम पर पहले ही 7 दिनों तक इंतजार किया था.
‘‘आखिर में गुस्से में मैं ने वह कर डाला जो उस ने सोचा ही नहीं था…’’ यह कहते हुए विनय की नजरें ?ाकी तो मेघना ने भी कुछ पूछा, तो वह खुद कहता चला गया, ‘‘पैड खींचते ही पोल खुल गईवह औरत थी ही नहीं और मर्दमेरे साथ धोखा हुआ.


‘‘पुलिस में शिकायत की बात की तो वह पैरों पर गिर कर मिन्नत करने लगी. उसे अपनी मां की बीमारी बढ़ने की चिंता थी. वह खुद ही उन के साथ रहने चली गई, तो मैं ने पुलिस की मदद ली
‘‘आप पढ़ीलिखी हैं. आप ही बताएं कि मैं ने कहां गलती की और मेरे साथ इतनी बड़ी नाइंसाफी क्यों हुई?’’
‘‘इस बारे में पुलिस क्या कहती है?’’


‘‘वह तो आपसी सहमति से मामला सुलटाने को कहती है.’’ ‘‘मिस्टर आनंद को पकड़ो, क्या पता तनख्वाह बढ़ाने और शादी कराने में उन की ही मिलीभगत हो…’’
‘‘वे तो यह कह कर बच निकले कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो?’’
‘‘मैं क्या चाहूंगापरिवार के लिए तरसता रहा तो शादी की.. शादी में हुए खर्चों की किस्त भर रहा हूं और दुलहन भी मेरी नहीं हुई.’’
‘‘क्या लड़की तुम्हारे साथ रहने को तैयार है?’’
‘‘हां…’’ विनय ने कहा.
‘‘तो रख लो…’’ मेघना ने कहा.
‘‘धोखे का क्या? उस ने मु? से खुद कुछ नहीं बताया शादी के पहले, ही बाद में…’’
‘‘कैसे बताती? तुम स्वीकार कर लेते?’’
‘‘तो अब एक धोखेबाज को क्यों स्वीकार करूं?’’
‘‘अगर तुम्हें प्यार है तो निभाओ.’’


‘‘मैम, प्यार तो है और उसे भी है यह जानता हूं, पर ऐसे साथी से सुख की कोई गुंजाइश नहीं.’’
‘‘प्यार के लिए ज्यादा दुखी हो तुम. साथी की जरूरत सभी को होती है. तुम्हें सच पता नहीं था. माना उस के नजदीकी रिश्तेदारों को भी पता नहीं था, मगर वह तो जानती थी, तभी उसे ब्याह की जल्दी नहीं थी. फिर भी शादी करने में और तुम से हकीकत छिपाने में उस का कुसूर तो है और लालच भीहो सकता है कि वह तुम जैसा साथी खोना नहीं चाहती हो. उस की चुप्पी को खोने का डर जानो रुपएपैसों के नुकसान का मत सोचोचोरी हो जाते, लुट जाते तो तुम क्या कर लेते? पैसे तो खर्चने के लिए होते हैं
‘‘मेरी सलाह है कि उसे वापस घर लाओ. कुछ समय साथ में गुजारो.


दूल्हे को दुलहन मिली है यह क्या
कम है. स्नेह का सुख भी कितनों को मिलता है…’’
‘‘मगर शादी का सुख? वंश का सुख?’’
‘‘शारीरिक सुख हासिल करने के परिवार बढ़ाने के कई आर्टिफिशियल तरीके भी हैं.’’
‘‘आप से बात कर मन हलका
हुआ. आप का शुक्रिया किन शब्दों में अदा करूं…’’
‘‘मु? मेरे होटल तक छोड़ कर…’’ मेघना बोली.
और विनय हंस पड़ा था. आज इतने समय बाद उस का ऐसे अचानक सामने आना बिलकुल हैरान करने वाला था. उस ने ही बताया, ‘‘मैम, जब मैं आप से मिला था गहरे डिप्रैशन में था. आप की बातों ने नई दिशा दी तो उसे लेने उस के घर गया, मगर वह मेरे सामने आई ही नहीं. कई बार गया.
‘‘उसे मनाने की कोशिश की तो उस ने रोते हुए कहा कि उसे पहली ही बार में मु? से प्यार हुआ. वह पूरा सच सामने रखना चाहती थी, पर अपनी मां की खुशी के लिए शादी कर ली और अब धोखेबाज दुलहन के रूप में वह मेरा सामना करने के लिए मजबूर है


‘‘मैं यह सब सुन कर रो पड़ा. मैं
उसे किसी हाल में खोना नहीं चाहता था. उसे ले कर किसी काउंसलर के पास जाना चाहता था. मगर वह किसी तरह
भी तैयार हुई तो मैं ने भी सम?ाता कर लिया.
‘‘मैं ने आनंद सर से भी बीचबचाव की बात की. कहा भी कि हमारा प्यार हम दोनो के लिए काफि है मगर उसे मेरा घर बसाने की जिद है. मेरी दूसरी शादी कराने पर आमदा है. उस ने अपनी अनाथ सहेली से मेरा ब्याह तय कर दिया है. मेरी ओर से दिए गए सारे जेवर से मेरी दूसरी दुल्हन को तैयार करेगी और इस के बदले में उसे हमारे बच्चों की बड़ी मां बनना स्वीकार है. आप को यही खुशखबरी देनी थी तो पता लेने मराठा संघ पहुंचा. मेरे सिर पर कोई बड़ा तो है नहीं. आप का आशीर्वाद ले कर मैं नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहता हूं.’’


विनय की बातों से उस की धोखेबाज दुलहन के बारे में मेघना ने जितना कुछ सुना, उस के प्रति इज्जत से मन भर आया. सचमुच बदलते समय ने सब बदल डाला है सिवा मुहब्बत के. एक मुहब्बत ही तो है, जो आज भी लोग एकदूसरे की खुशी के लिए क्या कुछ कर गुजरते हैं. कभी एक छत के नीचे तो कभी दूर रह कर जिंदगी में रंग भरते हैं वरना मतलबपरस्त दुनिया में कौन सा रिश्ता सच्चा रह गया है. Hindi Story

Hindi Story: बाथरूम

Hindi Story: सरपंच सोहन ठाकुर को पराई औरतों को ताड़ने की गंदी आदत थी. वे एक दलित औरत बलुई को अपनी छत से नहाते हुए देखते और उसे पाने की तरकीब लगाने लगे. क्या सोहन ठाकुर बलुई को पा सके?

सो  हन ठाकुर की उम्र 48 साल की हो गई थी, पर उन के अंदर अब भी जवानों के जैसा जोश बरकरार था. वे जम कर खाते और दंड पेलते थे. उन का अच्छाखासा शरीर था. सोहन ठाकुर को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि उन का 20 साल का एक बेटा भी है. सोहन ठाकुर की एक खूबसूरत पत्नी भी थी, जिसे वे प्यार से रूपमती कहा करते थे. गांव का सरपंच होने के नाते उन की खूब इज्जत भी थी. गांव में सोहन ठाकुर का दोमंजिला मकान बना हुआ था, जिस के अंदर रूपमती के लिए एक खूबसूरत सी रसोई भी बड़े मन से बनवाई गई थी.

पंचायत में भी सोहन ठाकुर की बात को मान दिया जाता था. जब भी पंचायत लगती तो सोहन ठाकुर कोई भी फैसला देने से पहले एक अलग अंदाज में अपनी मूंछ पर ताव देते और फिर फैसला सुनाते और फैसला सुनाते समय उन के चेहरे पर गजब की चमक आती थी. 48 साल की उम्र होने के बाद और गांव में इतना रसूख होने के बाद भी सोहन ठाकुर का एक और पहलू था, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. वह पहलू यह था कि उन की आंखें किसी भी औरत का नंगा जिस्म देखने को हमेशा आतुर रहती थीं. गांव में खेतों के बीच काम करते समय मजदूर औरतों की छाती पर सोहन ठाकुर की नजरें बरबस ही जम जाती थीं.

सुबह के तकरीबन 10 बजे सोहन ठाकुर गांव के तालाब की तरफ टहलने चले जाते और वहां पर कोई कोई औरत कपड़े धोते दिख जाती, तो उस के खुले अंगों पर किसी गिद्ध की तरह उन की नजरें टिक जाती थीं. सोहन ठाकुर के मकान के पीछे 2-3 घर दलित जाति के लोगों के थे. इन्हीं घरों में बलुई रहती थी. बलुई की उम्र 40 साल के आसपास होगी. बलुई का शरीर लंबा और मांसल पर गठा हुआ था. सांवले रंग की बलुई ब्लाउज के नीचे कुछ नहीं पहनती थी, फिर भी उस की छाती तनी ही रहती थी.

बलुई अपनी पतली कमर पर साड़ी को काफी नीचे बांधती थी, इसलिए उस की गहरी नाभि साफ दिखाई देती थी. अकसर ही सोहन ठाकुर की नजरें बलुई के जिस्म का भरपूर मुआयना करती थीं. सोहन ठाकुर एक बार अपनी छत पर खड़े हो कर चारों तरफ देख रहे थे कि तभी उन के कानों में नल चलने और पानी गिरने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश वे छत के कोने में गए और नीचे ?ांकने लगे. सोहन ठाकुर की आंखें खुशी और हैरत से फैल गईं. उन्होंने देखा कि नीचे बलुई अपने घर के कोने में लगे नल पर नहा रही थी. वजह, गांव के गरीब और दलित घरों में बंद बाथरूम नहीं होते, इसलिए औरतें खुले में ही नहाने को मजबूर होती हैं.

सोहन ठाकुर वैसे भी बहुत दिन से बलुई को घूरा करता थे, पर बलुई के तेज स्वभाव के चलते उन्होंने कभी बलुई को छूने की कोशिश नहीं की थी, पर वे बलुई के मांसल और गठीले शरीर के दीवाने तो थे ही, इसलिए रात में अपनी पत्नी रूपमती के साथ सैक्स करते, तब भी उन के खयालों में बलुई ही रहती थी.
बलुई आज सोहन ठाकुर के सामने बिना कपड़ों के नहा रही थी. वे ?ाट से थोड़ा सा पीछे हो गए, पर अपनी नजरें बलुई के जिस्म पर ही गड़ाए रखी थीं. बलुई अपने सांवले जिस्म को बारबार साबुन लगा कर मसल रही है, तो सोहन ठाकुर के समूचे जिस्म में हवस दौड़ गई और जब बलुई ने अपने हाथ उठा कर अपनी पीठ को रगड़ा, तब तो बलुई की जवानी खिल कर सामने ही गई.

सोहन ठाकुर जम कर बलुई के रूप के दर्शन कर रहे थे. जब बलुई नहा चुकी और कपड़े पहनने लगी, तो सोहन ठाकुर धीरे से पीछे हट गए और नीचे गए. उस दिन से रोज ही सोहन ठाकुर ने धीरेधीरे यह अंदाजा लगा लिया था कि बलुई दिन में दोपहर के तकरीबन 2 बजे नहाती है. शायद इस समय तक वह
खेतों और घर का सारा काम निबटा भी लेती होगी. अब सोहन ठाकुर बलुई को नहाते हुए घूरने का मौका तलाशते रहते कि बलुई कब नहाए और कब वे उसे घूर कर अपनी आंखों को मजा देते रहें. पर एक दिन नहाते समय अचानक बलुई की नजर ऊपर खड़े सोहन ठाकुर पर पड़ ही गई. उस दिन तो बलुई ने ?ाट से अपने हाथों से कैंची बनाई और अपने खुले सीने को ढक लिया और कमरे में भाग गई, पर संकोच के चलते कुछ कह सकी.

पर एक दिन बाद जब फिर से बलुई नहा रही थी, तो सोहन ठाकुर छिप कर उस के रूप के मजे ले रहे थे. तभी बलुई ने सोहन ठाकुर को देख लिया, पर इस बार बलुई डरी नहीं और सकुचाई भी नहीं. उस ने पहले तो कपड़ों से सीने को ढका और फिर तेज आवाज में सोहन ठाकुर से कहा, ‘‘अरे, ठाकुर साहब,
हमें छिप कर क्या देखते होअगर रस चखना है, तो कभी बाहर कर मिलो…’’ बलुई की आवाज सुन कर सोहन ठाकुर फौरन नीचे भाग गए कि कहीं ऐसा हो कि यह बात उन का बेटा और रूपमती जान जाएं. वे तुरंत अपने कमरे में जा कर लेट कर सोने का बहाना करने लगे, पर बलुई की कहीं गई बात उन के कानों में अब भी गूंज रही थी और मन ही मन में वे रोमांचित भी हो रहे थे.

बलुई जाति से दलित जरूर थी, पर अपने पति किसना के साथ अच्छी तरह से जिंदगी काट रही थी. उसे बस यह दुख था कि शादी के 10 साल बाद भी उन दोनों के कोई औलाद नहीं थी. हालांकि, अब तो उस ने औलाद के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था और अपने काम पर ही पूरा ध्यान रखे हुए थी. किसना गांव के बाहर कसबे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पानपुडि़या और चिप्स, पानी की बोतल, कोल्डड्रिंक का खोखा लगाता था और आतेजाते लोग उस के कस्टमर होते थे. गुजारे लायक कमाई तो हो जाती थी, पर बलुई के अंदर आगे बढ़ने की और कुछ ज्यादा पैसे कमाने की मंशा भी थी, जिस से कि वह अपने पति के लिए सड़क के किनारे एक पक्की दुकान बनवा सके.

गांव में नई उम्र के लड़केलड़कियां मोबाइल चलाते, तो बलुई को भी शौक चढ़ता था कि वह भी मोबाइल पर अपनी वीडियो बनाए. बलुई को तो सुनने में यह भी आया था कि नाचगाने की रील बना कर पैसा भी कमाया जा सकता है. बलुई भी तो नाच सकती है और दूसरे लोगों से बेहतर नाच सकती है, पर इन सब चीजों के लिए उसे अच्छा मोबाइल चाहिए और मोबाइल लेने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल तो बलुई और उस के मरद के पास नहीं था.

उस दिन शाम ढले बलुई जब पास के बाजार से वापस रही थी, तब रास्ते में उसे सोहन ठाकुर मिल गए. वे बलुई को सामने देख कर थोड़ा डर गए, पर बलुई उन्हें देख कर मुसकरा दी, तो सोहन ठाकुर का साहस बंध गया और वे उस के तराशे बदन को ऊपर से नीचे देखने लगे. ‘‘देखने के भी पैसे लगेंगे ठाकुर साहब,’’ बलुई ने इठलाते हुए कहा तो सोहन ठाकुर को ग्रीन सिगनल मिल गया. उन्होंने ?ाट से 100 का नोट निकाल कर बलुई की तरफ बढ़ाया, तो बलुई ने लेने से मना कर दिया और बोली, ‘‘इतने में तो हमारे पैर ही देख पाओगे ठाकुर साहब…’’

सोहन ठाकुर सम? गए थे कि बलुई ज्यादा पैसे चाहती है और पैसों के बदले उस के हुस्न का मजा भी लिया जा सकता है, इसलिए उन्होंने 500 रुपए निकाले और बलुई को दे दिए, पर बलुई इतने में भी नहीं मानी, तो उन्होंने उसे 1,000 रुपए देने का वादा किया. सोहन ठाकुर की बात मान कर बलुई एक गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गई और सोहन उस से दूरी बना कर पीछे चल दिए. गन्ने के खेत में जा कर सोहन ठाकुर ने बलुई के जिस्म से जरूरी कपड़े हटाए और उस खूबसूरत औरत के जिस्म को जम कर भोगा.

बलुई ने देखा कि सोहन ठाकुर उस के जिस्म को किसी कुत्ते की तरह चाट रहे थे. वह सोच रही थी, ‘हम को नीच जात का कह कर हमारे हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं और इस समय अपनी जीभ भी हमारे अंदर डालने से इन्हें परहेज नहीं…’ सोहन ठाकुर और बलुई का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर आगे आने वाले दिनों में भी जारी रहा. बलुई पैसों के बदले खुद को ठाकुर को सौंप देती और ठाकुर को बलुई जैसी नमकीन औरत के जिस्म का मजा मिल जाता, पर बलुई इतनी बेवकूफ नहीं थी और है वह चरित्रहीन थी.

उस ने अपने पति से धोखा किया था, पर वह तो सोहन ठाकुर को अपना जिस्म सौंप कर कुछ पैसे इकट्ठे कर लेना चाहती थी, जिस से वह अपने नहाने के लिए एक छत वाली जगह बनवा सके, ताकि सोहन ठाकुर उसे और घूर सकें. एक दिन खेत में जब सोहन ठाकुर बलुई के जिस्म में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी बलुई ने उन से एक एंड्राइड मोबाइल की मांग कर डाली. ठाकुर पहले तो हिचके, क्योंकि मोबाइल थोड़ा महंगा आता है, पर बलुई ने अपने अंगों को सिकोड़ लिया और संबंध मनाने से मना कर दिया, तो सोहन ठाकुर ने मोबाइल देने के लिए मजबूरन हां कर दी और बाद में उन को बलुई के लिए एक मोबाइल खरीदना ही पड़ा.

मोबाइल पा कर बलुई बहुत खुश हो गई थी और हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की की मदद से उस ने फेसबुक और रील्स बनाना भी सीख लिया था. इस बीच गांव में पंचायत के चुनाव की तारीख निकट आने लगी थी और सोहन ठाकुर एक बार फिर से सरपंच बनने की जुगत में लग गए थे और घरघर जा कर हाथ जोड़ कर उन्हें ही सरपंच चुनने की विनती करने लगे थे. सरपंच के बेटे मोहित सिंह को अपने पिता के कामकाज से कोई मतलब नहीं था. वह तो अपने दोस्तों की मंडली में नशे की लत में पड़ चुका था. दोस्तों को ले कर सुबह से शाम तक इधरउधर घूमता, गांजे का दम भरता और औरतों पर बुरी निगाह रखता.
उस दिन बलुई अपने घर से निकल कर खेत में काम करने जा रही थी कि तभी मोहित सिंह ने बलुई का रास्ता रोक लिया. उस की आंखों में नशा था और चेहरे से हवस टपक रही थी.

बलुई तो मोहित सिंह से उम्र में काफी बड़ी थी, पर जब इनसान के सिर पर हवस चढ़ कर बोल रही हो, तो उसे कुछ नहीं दिखता. मोहित सिंह ने बलुई को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और खेत में ले जा कर उस का रेप कर दिया. बलुई ने चीखना चाहा, पर मोहित सिंह ने अपना गमछा उस के मुंह में ठूंस दिया और अपनी मनमानी कर ली. बलुई को अपने साथ यह जबरन गलत काम बिलकुल नहीं भाया. वह सिसकती रही और घर कर नल के पानी से नहाने लगी.

बलुई के मन में तूफान चल रहा था कि अगर वह आज नाइंसाफी सह गई, तो आगे आने वाले समय में जाने कितनी बार ये ऊंची जाति वाले उस के साथ रेप करेंगे. हो सकता है कि कई लोग मिल कर एकसाथ उस के साथ गलत काम करें. ऐसा बलुई इसलिए भी सोच रही थी कि उस ने अपने बचपन में इस तरह के कई कांड होते हुए देखेसुने थे. अच्छा यही होगा कि वह अपने साथ हुए इस गलत काम के प्रति आवाज उठाए. लिहाजा, बलुई ने अपनी शिकायत को पंचायत में उठाने की बात सोची और अपने पति किसना से अपने साथ हुई वारदात को बताया.

किसना दुखी हुआ और गुस्से से भर गया, पर वह जानता था कि सरपंच के लड़के पर ऐसा आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा और उस ने यह बात बलुई को सम?ाई पर बदले की भावना से भरी हुई बलुई नहीं मानी और पंचायत में जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई. सरपंच सोहन ठाकुर अपने लड़के की यह करतूत सुन कर गुस्सा होने की बजाय मन ही मन खुश हो गए. मेरे बेटे ने भी बलुई का मजा ले लिया. वाह, हमारी पसंद तो काफी मिलतीजुलती है और इस का मतलब है कि मेरा बेटा भी जवान हो गया है,’ सोहन ठाकुर ने सोचा.

सरपंच के अलावा पंचायत के दूसरे सदस्यों ने बलुई के साथ हुए गलत काम पर अफसोस जताया और बलुई को भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा और इस के लिए इस हफ्ते की 8 तारीख को दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए पंचायत को बुलाए जाने का तय हुआ. सोहन ठाकुर के सामने दिक्कत यह थी कि अगर वे फैसला बलुई के पक्ष में देते हैं, तो बेटे को सजा सुनानी पड़ेगी और अगर बेटे के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो हो सकता है कि गांव वाले आने वाले चुनाव में उन्हें वोट दें और वे हार भी सकते हैं.

तय दिन और समय पर पंचायत लगी और पहले बलुई ने अपनी शिकायत रखी जिस में बलुई ने अपने साथ हुए रेप की बात बताई और इंसाफ मांगा. इस के बाद मोहित सिंह को बोलने का मौका दिया गया. मोहित अपने कांड से साफ मुकर गया. उलटा उस ने कहा कि बलुई उस पर ?ाठा आरोप लगा रही है. दोनों लोगों की बात पर फैसला देना था और यह फैसला सरपंच सोहन ठाकुर ने यह कह कर सुना दिया, ‘‘बलुई अपने साथ हुए रेप का कोई सुबूत नहीं ला सकी है. अगर वह अपने निजी अंगों को सब के सामने दिखा सके तभी तो हम जानेंगे कि रेप हुआ या नहीं.

‘‘लिहाजा, सुबूतों की कमी में मोहित ठाकुर को बरी किया जाता है और बलुई को सख्त हिदायत दी जाती है कि बिना सुबूत किसी शरीफ आदमी पर ऐसे आरोप लगाए.’’ बलुई का मन किया कि सोहन ठाकुर के मुंह पर जा कर थूक दे, पर उस ने अपनेआप को संभाला और बेइज्जती का घूंट पी लिया. रात में जब किसना ने उसे दिलासा देने के लिए अपने गले लगाया, तो बलुई की रुलाई फूट पड़ी थी, पर इन बहते आंसुओ में बदले लेने की भावना अब भी बलवती हो रही थी. सरपंच सोहन ठाकुर को अपने फैसले पर पछतावा तो हो रहा था, पर पुत्र मोह के चलते उन्हें ऐसा फैसला करना पड़ा, जिस ने बलुई को उन से नाराज कर दिया था.

बलुई सरपंच सोहन ठाकुर को सामने देख कर अपना रास्ता बदल लेती या तो उन्हें नफरतभरी निगाह से घूरती रहती थी. सोहन ठाकुर बस बलुई को देखते रह जाते थे. तकरीबन 2 महीने हो चले थे और सोहन ठाकुर को बलुई के जिस्म का मजा नहीं मिला था. अपने मन को शांत करने के लिए बलुई के नहाने के समय पर सोहन ठाकुर छत पर चले गए और हर बार की तरह इस बार भी बलुई को नहाते हुए देखने लगे.
बलुई तो पहले से ही सतर्क थी. आज वह अपने पेटीकोट को अपने सीने के ऊपर बांधे हुए थी. बलुई की कनखियों ने देखा कि सोहन ठाकुर छत पर गए हैं. उस ने ?ाट से अपने पैरों के पास रखे मोबाइल को उठाया और सैल्फी मोड पर किया और इस तरह से अपना वीडियो बनाने लगी, जिस से बलुई का चेहरा भी एक और पीछे से ठाकुर की ?ांकती हुई वीडियो भी जाए.

बलुई ने यह काम बहुत सफाई से किया, ताकि सोहन को शक भी हो और मोबाइल में सुबूत के तौर पर यह वीडयो भी कैद हो जाए और कुछ देर में ही बलुई ने कई छोटेछोटे वीडियो के क्लिप बना लिए थे.
बलुई के सामने मोहित सिंह और उस के दोस्त अकसर पड़ ही जाते थे. आज भी जब बलुई खेत से मजदूरी कर के रही थी तो मोहित सिंह और उस के दोस्त उसे छेड़ने लगे. ‘‘यार मोहित, जवान औरतों से ज्यादा तो बड़ी उम्र की औरतों में मजा है,’’ एक दोस्त ने फिकरा कसा, तो मोहित सिंह भी भद्दी सी हंसी हंसने लगा. बलुई को तो इसी मौके का इंतजार था,

‘‘तुम ने तो बेकार में जबरदस्ती की, मांग लेते तो भी मैं मना थोड़े ही करती, बल्कि गोश्त और दारू का इंतजाम कर के आप लोगों का मन भी बहला देती,’’ बलुई ने दांव खेला, तो मोहित सिंह उस के ?ांसे में गया और तुरंत ही उस ने जेब से 1,000 रुपए निकाले और बलुई को दिए, फिर कहा कि आज शाम को वह दारू ले आए और गोश्त पका कर रखे. वे लोग आज फिर से बलुई के हुस्न का स्वाद चखेंगे.
बलुई ने पूरा जाल बिछा दिया था. उस ने पंचायत चुनाव में सोहन ठाकुर के विरोधी नेता को अपनी सारी कहानी कह सुनाई थी और उस से मदद मांगी थी. वह नेता भी बलुई की मदद के लिए तैयार था, बस अब सुबूत जुटाने की तैयारी थी.

शाम को पुराने स्कूल के एक कमरे में बलुई ने दारू मंगवा ली और गोश्त पकाने लगी थी. मोहित सिंह और उस के 2 दोस्त भी गए और गोश्त पकने का इंतजार करने लगे थे. मोहित सिंह ने पहले से ही दारू पीनी शुरू कर दी थी. थोड़ी देर बाद जब गोश्त पक गया, तब बलुई ने प्लेट में खाना लगाया और सब लोग साथ में खाने लगे. खाना खाने के बाद मोहित सिंह की आंखों में हवस के डोरे तैर आए थे. उस ने बलुई के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा. बलुई ने विरोध नहीं किया तो उस की हिम्मत बढ़ गई
और उस ने बलुई के जरूरी कपड़े ऊपर कर दिए. बलुई सम? गई कि यही सही समय है और उस ने इतने में उस ने विरोधी पार्टी के नेता को मदद के लिए फोन लगा दिया और वह फोन पर चिल्ला कर मदद मांगने लगी थी.

वह नेता तुरंत ही पुलिस ले कर गया और मौके पर ही नशे में चूर मोहित सिंह और उस के दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘दारोगा साहब, सिर्फ यही कुसूरवार नहीं है, बल्कि इस का बाप भी मु? गरीब को रोज नहाते हुए देखता है,’’ बलुई ने कहा तो दारोगा के साथसाथ मोहित सिंह को भी अजीब लगा कि उस के पिता भी बलुई पर बुरी नजर रखते हैं. बलुई ने अपने मोबाइल का वीडियो पुलिस को दे दिया, जो उस ने अपने मोबाइल से शूट किया था, जिस में साफ दिख रहा था कि बलुई को सोहन ठाकुर अपनी छत से घूर रहे हैं.

सोहन ठाकुर को पुलिस ने खरीखोटी सुनाई और चेतावनी दे कर छोड़ दिया, जबकि उन के लड़के को रेप करने की कोशिश मे गिरफ्तार कर लिया गया. पंचायत चुनाव में सरपंच सोहन ठाकुर की जबरदस्त हार हुई. पूरे गांव में इन दोनों की कारिस्तानी की बात फैल गई थी और सब लोग सोहन ठाकुर और उन के लड़के मोहित सिंह के नाम पर थूथू कर रहे थे. सोहन ठाकुर की पत्नी रूपमती को जब यह बात पता चली, तो वे सीधे बलुई के घर पहुंचीं और अपने पति और बेटे की तरफ से माफी मांगी और पूरे 50,000 रुपए बलुई को दिए.

बलुई ने पैसे लेने से मना किया, तो रूपमती ने कहा, ‘‘ये पैसे मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूं, ताकि तुम अपने नहाने की जगह एक बाथरूम बनवा सको और तुम्हें खुले आसमान के नीचे नहाना पड़े. जब तुम बाथरूम में नहाओगी, तो तुम्हें कोई भी नहीं घूर सकेगा.’’ रूपमती यह कह कर चुप हो गई थीं, जबकि बलुई सोच रही थी कि सोहन ठाकुर जैसे नीच को कितनी अच्छी पत्नी मिली है.

बलुई अब मोबाइल और भी कुशलता से चलाती है और उस ने और किसना ने खूब मेहनत कर के अब और भी पैसे भी जोड़ लिए हैं, पर अभी भी इतने पैसे नहीं इकट्ठा हो पाए हैं कि वे लोग सड़क के किनारे पक्की दुकान बनवा सकें, पर पैसे कमाने की उन की कोशिश जारी है. विरोधी पार्टी का नेता अब गांव का सरपंच है और उस ने पंचायत के 5 सदस्यों में बलुई को भी शामिल किया है. बलुई अब गांव वालों की समस्याएं सुनती है और अपना फैसला भी सुनाती है. बलुई और सरपंच की कोशिश से अब हर घर में नहाने की जगह एक बंद छत वाला बाथरूम बन गया है. गांव की कोई औरत अब खुले में नहीं नहाती है.  Hindi Story.

Hindi Kahani: आंखों से एक्सरे 

Hindi Kahani: जवानी की दहलीज पर खड़े दिवाकर की एक अजीब आदत थी कि जहां भी कोई लड़की दिख जाती, उस की आंखें उसी पर टिक जातीं. राह चलती, बाजार जाती, मंदिर या कालेज जाती, कोई भी लड़की दिवाकर की पारखी निगाहों से बच नहीं पाती. वह हर लड़की को ऊपर से नीचे तक ऐसे ताड़ता, जैसे उस की आंखों में सचमुच एक्सरे मशीन लगी हो.


एक दिन बाजार जाते समय की बात है. इसी हरकत को देख कर दिवाकर के एक दोस्त सोमेश ने पूछ ही लिया, ‘‘यार, इस तरह लड़कियों को घूरने से तुम्हें क्या मिलता है?’’ दिवाकर तुरंत उछल पड़ा और बोला,‘‘नयनसुख, पार्टनर नयनसुख. देखना तो मेरा शौक है , कोई गुस्ताखी थोड़े ही कर रहा हूं.’’ सोमेश ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘लेकिन यह गलत बात है. किसी को यों घूरना भी एक तरह की बदतमीजी है, पता है ?’’


दिवाकर ने हंसते हुए हाथ ?ाटका, ‘‘अरे यार, मैं कौन सा लड़की छेड़ रहा हूं या भद्दे कमैंट्स पास कर रहा हूं? बस, खामोशी से आंखें ही तो सेंकता हूं. मेरी आंखें एक्सरे हैं, जो देखना होता है, देख लेती हैं. हाहाहा.’’ दिवाकर की बेशर्मी देख कर सोमेश ने सब्र रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अंदाजा है कि तुम्हारी इसटकटकीसे लड़कियां कितना अनकंफर्टेबल महसूस करती हैं?’’ दिवाकर ने जैसे कुछ सुना ही हो और बोला, ‘‘अरे यार, अब तू मत शुरू हो जा किसी सत्संगी बाबा की तरह प्रवचन ले कर. इस उम्र में यह सब करूं तो क्या बुढ़ापे में करूंगा?’’


सोमेश ने बात बढ़ाना बेकार समझ पर दोस्ती के नाते सम?ाता हुआ साथ चलता गया. इसी दौरान वे दोनों कालेज की ओर जाने वाली सड़क पर पहुंच गए. अचानक दिवाकर की नजर सड़क किनारे खड़ी एक लड़की पर गई. वह उस की छोटी बहन दिव्या थी, जो बुरी तरह परेशान हो कर स्कूटी स्टार्ट करने की कोशिश कर रही थी. दिवाकर फौरन दौड़ पड़ा और बोला, ‘‘क्या हुआ दिव्या?’’ दिवाकर को देख कर दिव्या ने राहत की सांस ली और बोली, ‘‘अच्छा हुआ भैया कि आप गए. मेरी स्कूटी बंद हो गई है. आज कालेज में मेरा इंटरनल टैस्ट है, अगर इसे घर रख कर जाती हूं, तो पेपर छूट जाएगा. अच्छा हुआ कि आप मिल गए.’’


दिवाकर एकदम से बोला, ‘‘तुम टैंशन मत लो.’’फिर सोमेश को स्कूटी थमाते हुए दिवाकर बोला, ‘‘यार, इसे गैराज पहुंचा देना. मैं दिव्या को कालेज छोड़ कर आता हूं.’’ कालेज 7 किलोमीटर की दूरी पर था. मोड़ पर शहर जाने वाली बस कर रुकी, जिस में वे दोनों चढ़ गए. बस खचाखच भरी थी. समय की मजबूरी में उन्हें उसी बस में चढ़ना पड़ा. बस चल पड़ी. कुछ ही देर में दिवाकर ने देखा कि कई लड़के दिव्या को घूर रहे थे, बिलकुल उसी ढिठाई से, जैसा वह किया करता था.


कुछ लड़के अपने दोस्तों के साथ कानाफूसी कर रहे थे. कोई टेढ़ी मुसकान फेंक रहा था, तो कोई दिव्या को ऊपरनीचे ताड़ रहा था. दिव्या बारबार दुपट्टा ठीक कर रही थी. वह कभी नजरें ?ाका कर फर्श की ओर देखने लगती, कभी पीछे हटने की नाकाम कोशिश करती. दिवाकर यह सब देख रहा था. पहली बार उसे लगा कि बस में कईदिवाकरबैठे हुए हैं और उस की बहन का जिस्म उन की आंखों से एक्सरे की तरह भेद रहा है. उस का खून खौल रहा था, पर भीड़ भरी बस में वह उतना ही बेबस था, जितनी दिव्या.


उस पल दिवाकर को कुछ एहसास हुआ, वही एहसास जिसे सोमेश उस की सम? में सालों से डालने की कोशिश कर रहा था. हर लड़की, जिसे वह नयनसुख की चीज सम? कर ताड़ता था, शायद यही शर्मिंदगी महसूस करती होगी. दिवाकर ने बस में खड़ेखड़े पहली बार आंखें ?ाका लीं और शायद पहली बार उसे सम? आया किनयनसुखकह कर की गई उस की हर हरकत, किसी की जिंदगी में कितना बड़ादुखबन सकती है. Hindi Kahani  

लेखक –   विनोद कुमार विक्की

Hindi Story: दुकान चाय की धंधा जहर का

Hindi Story: चा की दुकान, जो आम आदमी के लिए थकान मिटाने, गपशप करने और जिंदगी की हलचल से कुछ पल सुकून पाने की जगह होती है, जब उसी दुकान की आड़ में जहर का कारोबार चलने लगे, तो यह केवल एक अपराध नहीं रह जाता. पिछले 5 साल में चाय की दुकान की आड़ ले कर नशे का ऐसा नैटवर्क खड़ा किया गया कि 20 करोड़ रुपए की जायदाद खड़ी हो गई.


बिहार के मनेर क्षेत्र में रहने वाला एक शख्स, जो बाहर से एक साधारण दुकानदार दिखता था, असल में नशा तस्करी के जाल का अहम किरदार निकला. पुलिस की कार्रवाई में उस के साथ उस की बहन समेत 6 सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई. जांच में जो बातें सामने आईं, वे चौंकाने वाली थीं. घर से 35 लाख रुपए की चरस, 25 लाख रुपए की स्मैक, 12 लाख, 20,000 रुपए नकद, हथियार, वाहन और कीमती सामान बरामद हुआ.


इस पूरे नैटवर्क की बनावट पर नजर डालें, तो यह साफ होता है कि अपराध अब अकेले शख्स का नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित तंत्र है, जिस में परिवार तक शामिल हो जाता है. आरोपी की बहन का रोल इस धंधे में काफी अहम बताया जा रहा है. ड्रग्स की सप्लाई नेपाल से कराई जाती थी, ताकि पुलिस की निगाहों से बचा जा सके. नेपाल भेजे गए लोग ड्रग्स ले कर लौटते थे और फिर बिहार के अलगअलग इलाकों जैसे आरा, सारण, गया वगैरह में इस की सप्लाई होती थी.


यह भी सामने आया कि आरोपी पहले भी ड्रग्स के साथ पकड़ा जा चुका था. 2 साल पहले भी उस के पास से भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद हुई थीं, लेकिन इस के बावजूद वह फिर उसी धंधे से जुड़ गया.
नशे का यह कारोबार नौजवानों को ध्यान में रख कर फैलाया जा रहा था. चाय की दुकान, जहां नौजवान अकसर इकट्ठा होते हैं, उसे ही सप्लाई का अड्डा बनाया गया. बताया जाता है कि आरोपी ने इसी काले धंधे से करोड़ों की जमीन, मकान और वाहन खड़े कर लिए थे.


साल 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू हुई थी. इस का मकसद साफ था, अपराध रोकना, घरेलू हिंसा कम करना और समाज को सुधारना. शुरुआती महीनों में शराबबंदी ने असर भी दिखाया था, लेकिन धीरेधीरे तस्करों ने नई राह निकाल ली. नतीजतन, देशीविदेशी शराब की जगह अब ड्रग्स और नशे के दूसरे साधनों ने बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है.


शराबबंदी के बाद ड्रग्स का नैटवर्क कई गुना बढ़ गया है. पहले जो नशा केवल शहरों तक सीमित था, अब गांवगांव तक पहुंच गया है. गरीब तबका महुआ, स्प्रिट, खैनी, गुटका तक सीमित रहा, तो मिडिल क्लास गांजा, देशी शराब और अमीर तबका ब्राउन शुगर, चरस, प्रीमियम शराब तक अपनी पैठ बना चुका है.
पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर नशे के हब बन चुके हैं, वहीं गया, नालंदा, सीतामढ़ी, मधुबनी, भभुआ, रोहतास जैसे जिले भी पीछे नहीं हैं.


16 साल के आकाश ने बताया, ‘‘मैं ने पहली बार ब्राउन शुगर स्कूल के दोस्तों के साथ ली थी. शुरू में लगा कि मजा आएगा. 500 रुपए में दोस्तों के साथ  लाते थे. धीरेधीरे आदत बढ़ी. अब दिनभर बेचैनी रहती है. मिले तो शरीर में खुजली मचना और दर्द बनना शुरू हो जाता है.’’ आकाश के पिता मजदूरी करते हैं. इस ने घर के गहने और मोबाइल तक बेच दिए थे. कुछ समय पहले ही आकाश को नशा मुक्ति केंद्र ले जाया गया था, लेकिन एक एक महीने बाद फिर वह वापस उसी ढर्रे पर लौट आया.

इन पर सब से ज्यादा असर12 से किशोरों से ले कर 25 साल के नौजवान सब से ज्यादा ब्राउन शुगर का सेवन कर रहे हैं. ब्राउन शुगर भी लोग 4-5 के समूह में सेवन करते हैं. यह नशा शहर से चल कर गांव तक पहुंच गया है.औरंगाबाद जिले के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया, ‘‘हमारे स्कूल के तकरीबन 50 बच्चे ब्राउन शुगर का सेवन करते हैं. हम लोग सम? कर थक गए हैं, पर इन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता है. कई बच्चों ने तो स्कूल आना भी छोड़ दिया है.’’


नशा मुक्ति केंद्र, पटना के डाक्टर अजय कुमार बताते हैं, ‘‘ब्राउन शुगर और ड्रग्स का असर इतना खतरनाक है कि 3-4 महीने में ही नौजवान इस की गिरफ्त में जाते हैं. 70 फीसदी से ज्यादा मरीज इलाज के बाद भी दोबारा नशे की ओर लौट जाते हैं.’’ शराबबंदी के बाद गांवदेहात में देशी शराब बनाने का प्रचलन काफी बढ़ गया है. जहरीली शराब पीने की वजह से साल 2016 से अभी तक सरकारी रिकौर्ड के मुताबिक 190 मौतें हुई हैं. साल 2022 में सारण मशरक में सब से बड़ी घटना हुई थी, जिस में 73 लोगों की मौत हो गई थी.


जहरीली शराब की वजह से जब मौतें होने लगती हैं, तो प्रशासन और सरकार इसे छिपाने के लिए दूसरी वजह से मौत को दिखाने लगते हैं. सरकार द्वारा शराबबंदी को कामयाब बनाने के लिए बहुत कोशिश की गई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. शराब हर जगह मिल रही है. गैरकानूनी तौर पर शराब बेचने वाले होम डिलीवरी की सहूलियत भी दे रहे हैं. अपराध और नशे का रिश्ता पुलिस रिकौर्ड बताते हैं कि शराबबंदी के बाद चोरी, डकैती और हत्या जैसे अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. नशे की लत पूरी करने के लिए नौजवान चोरी और अपराध का रास्ता अपना रहे हैं.


सरकार ने 50 से ज्यादा नशा मुक्ति केंद्र चलाए हैं. विशेष अभियान में हजारों गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन तस्करों का नैटवर्क इतना मजबूत है कि पकड़ में आते ही नए लोग उन की जगह ले लेते हैं.
नशा अब केवल निजी आदत नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुका है. सरकार, समाज और परिवार को मिल कर काम करना होगा, वरना आने वाली पीढ़ी नशे के अंधेरे में खो जाएगी. Hindi Story

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