⚲

Bhojpuri Stars हिंदी सिनेमा तक, क्या सरस सलिल ने बदली तसवीर?

Bhojpuri Stars. एक दौर वह भी था जब हिंदी फिल्मों की दुनिया बेहद चमकीली और शहरी हुआ करती थी. फिल्मों की कहानियां या तो विदेशों में घूमती थीं या फिर मुंबईदिल्ली के आलीशान बंगलों में. उस दौर में अगर कोई भोजपुरी या अवधी बोलने वाला किरदार आता भी था, तो उसे या तो ‘रामू काका’ बना दिया जाता था या फिर एक ऐसा विलेन जिस के पास दिमाग कम और सनक ज्यादा हो.

उस समय भोजपुरी कलाकारों के लिए हिंदी फिल्मों के दरवाजे मानो ‘लोहे के चने चबाने’ जैसे थे. टैलेंट की कोई कमी नहीं थी, लेकिन टाइप कास्टिंग का ऐसा जाल बुना गया था कि उस से बाहर निकलना नामुमकिन था. अपनी ही मिट्टी के कलाकारों को वह इज्जत नहीं मिल पा रही थी, जिस के वे हकदार थे.

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भोजपुरी सिनेमा कोई छोटामोटा फिल्म उद्योग नहीं है. इस की अपनी भाषा है. अपना दर्शक वर्ग है. अपने सुपरस्टार हैं. अपनी संगीत परंपरा है. और अपनी एक पूरी फिल्म इंडस्ट्री है. लेकिन लंबे समय तक हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा में भोजपुरी कलाकारों को ले कर एक अलग तरह की सोच देखने को मिलती थी.

यह कहना सही नहीं होगा कि हर हिंदी फिल्म निर्माता भोजपुरी कलाकारों को नापसंद करता था, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भोजपुरी पहचान के साथ आने वाले कलाकारों को अकसर एक खास तरह के किरदारों तक सीमित कर दिया जाता था.

लेकिन पुरानी कहावत है कि ‘उगते हुए सूरज को कोई रोक नहीं सकता’. और आज भोजपुरी सिनेमा ने हिंदी सिनेमा की छाती पर मूंग दल कर अपना वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिस की कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी. जी हां, आज हवा का रुख बदल चुका है. जो भोजपुरी सिनेमा कभी हिंदी सिनेमा की परछाई में जीने को मजबूर था, आज उसी के सुपरस्टार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बड़ेबड़े प्रोडक्शन हाउस के चहेतेबने हुए हैं. फिर चाहे हिंदी फिल्म ‘लापता लेडीज’ में रवि किशन का पान चबाता हुआ कड़क पुलिस वाला किरदार हो या फिर 18 सितंबर, 2026 को रिलीज हुई कुणाल खेमू के डायरैक्शन में बनी फिल्म ‘वाइब’ में दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ का किरदार हो.

इतना ही नहीं, इस के ठीक एक हफ्ते बाद यानी 25 सितंबर, 2026 को एकता कपूर और टीवीएफ की फिल्म ‘द वन : फोर्स औफ द फौरैस्ट’ में पहली बार बौलीवुड के इतिहास में पहली बार पूर्वांचल के सब से बड़े महापर्व ‘छठ’ को समर्पित एक गाना ‘छठी मैया…’ नजर आया, जिसे तमन्ना भाटिया पर फिल्माया गया.

लेकिन भोजपुरी कलाकारों को यह कामयाबी रातोंरात नहीं मिली है. इस ‘कायापलट’ के पीछे संघर्ष और हिंदी की अति लोकप्रिय पत्रिका ‘सरस सलिल’ की मुहिम का एक ऐसा समंदर है, जिसे जाने बिना इस ऐतिहासिक बदलाव को सम?ाना आसान नही है.

रवि किशन की दस्तक

इसी दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मेन स्ट्रीम सिनेमा के बंद दरवाजे पर सब से पहली और जोरदार दस्तक दी एक ऐसे कलाकार ने, जिसे आज हर कोई जानता है… रवि किशन.

रवि किशन ने सब से पहले हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ही कदम रखा था, लेकिन तब उन्हें भी शुरुआती संघर्षों का सामना करना पड़ा. पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी. बाद में वे ‘भोजपुरी सिनेमा के अमिताभ बच्चन’ बन गए.

लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए वे लगातार मेहनत करते रहे. फिर आया वह मोड़, जब हिंदी फिल्मकारों को सम?ा में आया कि रवि किशन सिर्फ लाउड एक्टिंग नहीं करते, बल्कि जब वे स्क्रीन पर आते हैं, तो जीजान लगा देते हैं.

पिछले साल आई किरण राव व आमिर खान की फिल्म ‘लापता लेडीज’ में इंस्पैक्टर श्याम मनोहर के किरदार में रवि किशन ने जो अभिनय किया, उस ने दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया.

वह किरदार यह साबित करने के लिए काफी था कि एक भोजपुरी सुपरस्टार जब अपनी पूरी रेंज दिखाता है, तो बड़ेबड़े एक्टर्स के पसीने छूट जाते हैं.

रवि किशन ‘तेरे नाम’ के अलावा ‘लक’, ‘वैलकम टू सज्जनपुर, ‘रावण’, ‘मुक्काबाज’, ‘बाटला हाउस’ और ‘लापता लेडीज’ जैसी कई हिंदी फिल्मों में नजर आए हैं.

साल 2024 के बाद उन की हिंदी और पैन इंडिया उपस्थिति और भी बढ़ी है. उन की फिल्मोग्राफी में ‘सिंघम अगेन’, ‘सन आफ सरदार 2’, ‘धमाल 4’ और सितंबर 2026 में रिलीज हुई फिल्म ‘मिर्जापुर : द मूवी’ फिल्में दर्ज हैं.

‘मिर्जापुर : द मूवी’ में उन का शामिल होना खासतौर पर उल्लेखनीय है, क्योंकि यह एक लोकप्रिय ओटीटी फ्रैंचाइजी का बड़े परदे पर विस्तार मात्र नही है, बल्कि कहानी भी रवि किशन के किरदार के मुताबिक ही लिखी गई.

रवि किशन को सिर्फ भोजपुरी कलाकार कह कर देखना अब काफी नहीं है. वे हिंदी सिनेमा, ओटीटी और क्षेत्रीय सिनेमा तीनों जगह काम करने वाले कलाकार हैं.

मनोज तिवारी ‘मृदुल’ का कारनामा

90 के दशक के आखिरी और 2000 के शुरुआती सालों में जब भोजपुरी सिनेमा दम तोड़ रहा था, तब एक आवाज गूंजी… मनोज तिवारी ‘मृदुल’ की.

मनोज तिवारी ने पहले अपने गानों और लोकगीतों से पूर्वांचल के घरघर में अपनी जगह बनाई. उन के कैसेट्स और सीडी की बिक्री ने रिकौर्ड तोड़ दिए. लेकिन असली धमाका होना अभी बाकी था. साल 2004 में एक फिल्म आई ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’. इस फिल्म में मनोज तिवारी मुख्य भूमिका में थे.

इस फिल्म के रिलीज होते ही एक नए इतिहास का सूत्रपात हो गया. महज कुछ लाख रुपयों में बनी इस फिल्म ने करोड़ों की कमाई की. सिनेमाघरों के बाहर लाठियां चली थीं. टिकटें ब्लैक मे बिकी थीं.

पहली बार मनोज तिवारी ने भोजपुरी सिनेमा को ऐसी कामयाबी दिलाई थी, जिस की कल्पना तब तक बौलीवुड की मेनस्ट्रीम सिनेमा की बड़ी फिल्मों ने भी नहीं की थी, जिस की उसे सख्त जरूरत थी.

मनोज तिवारी ने साबित कर दिखाया था कि भोजपुरी भाषी दर्शक सिर्फ फिल्में देखता नहीं है, बल्कि अपनी फिल्मों के लिए जान छिड़कता है.

इस के बाद मनोज तिवारी ने ‘दरोगा बाबू आई लव यू’ ‘गंगा’ और ‘बंधन टूटे न’ जैसी बैक टू बैक हिट्स दे कर भोजपुरी सिनेमा को एक कौर्पोरेट पहचान दिलाई. उन्होंने बौलीवुड के ‘बिग बौस’ जैसे बड़े मंचों पर जा कर भोजपुरी अस्मिता का ?ांडा गाड़ा.

यह मनोज तिवारी की ही बिछाई हुई पिच थी, जिस पर आगे चल कर बाकी कलाकारों ने ‘चौकेछक्के’ लगाने शुरू किए और अब बौलीवुड इन का दीवाना हो गया है.

आवाज का धनी पवन सिंह

हिंदी फिल्मों में भोजपुरी कलाकारों के लिए संगीत एक बड़ा प्रवेशद्वार बना है. मनोज तिवारी ‘मृदुल’ के बाद पवन सिंह ने भी अपनी आवाज व संगीत की ताकत के बल पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी हासिल की. साल 2024 हिंदी फिल्म ‘स्त्री 2’ की कामयाबी में पवन सिंह की आवाज में गाया हुआ गीत ‘आई नहीं…’ का योगदान रहा. इसी तरह फिल्म ‘विक्की विद्या का वह वाला वीडियो’ के गीत ‘चुम्मा…’ में भी पवन सिंह की ही आवाज गूंजी.

कहने का मतलब यह है कि भोजपुरी कलाकार अब केवल भोजपुरी फिल्मों तक सीमित नहीं हैं. उन की भाषा और संगीत की लोकप्रियता हिंदी मेन स्ट्रीम सिनेमा के लिए कामयाबी की गारंटी मानी जाने लगी है. पहले भोजपुरी कलाकार हिंदी सिनेमा में जगह तलाशते थे, अब हिंदी सिनेमा भी भोजपुरी कलाकारों की लोकप्रियता और प्रतिभा का इस्तेमाल कर रहा है.

‘निरहुआ’ को न भूलें

भोजपुरी सुपरस्टार दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ के लिए भी यह बदलाव खास है. सब से पहले दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ ‘प्राइम वीडियो’ की वैब सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ में ‘बाबू साहब’ के किरदार में नजर आए. फिर हिंदी फिल्म ‘वाइब’ में बंसी के किरदार में नजर आए. और अब वैब सीरीज ‘दुपहिया सीजन 2’ में वे कोचिंग सैंटर चलाने वाले प्रथमेश के किरदार में नजर आ रहे हैं.

मतलब यह कि दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ हिंदी सिनेमा का हिस्सा तो बन रहे हैं, पर वे जल्दबाजी में अपना नुकसान ही कर रहे हैं. ‘वाइब’ हो या ‘दुपहिया सीजन 2’ हो या ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ हो, उन का किरदार जबरन ठूंसा हुआ नजर आता है. कम से कम उन्हें किरदार व फिल्में चुनने में सावधानी बरतनी चाहिए.

सरस सलिल का रोल

लेकिन हमारे लेख का सब से दिलचस्प हिस्सा तो अब शुरू होता है. हिंदी की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली लोकप्रिय पाक्षिक पत्रिका ‘सरस सलिल’ ने सब से पहले हाशिए पर पड़ी भोजपुरी भाषा और भोजुपरी सिनेमा को मुख्यधारा में लाने के मकसद से साल 2020 में ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ की शुरुआतकी. पिछले 7 साल से लगातार हर साल ‘सरस सलिल’ पत्रिका भोजपुरी सिनेमा से जुड़े कलाकारों को अवार्ड दे कर उन्हें राष्ट्रीय मंच देती आ रही है.

‘सरस सलिल’ पत्रिका अब तक दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अंजना सिंह, देव सिंह, संजय पांडेय सहित कई कलाकारों को यह सम्मान दे चुकी है.

लेकिन भोजपुरी सिनेमा में बदलाव का श्रेय सिर्फ ‘सरस सलिल’ को देना भी सही नहीं होगा… भोजपुरी कलाकारों के हालात बदलने के पीछे कई कारण हैं… पहला, भोजपुरी कलाकारों का अपना विशाल दर्शक वर्ग. और इस बात को सब से पहले दक्षिण के अभिनेता अल्लू अर्जुन ने पहचान कर अपनी फिल्म ‘पुष्पा 2’ का एक प्रमोशनल इवैंट पटना के गांधी मैदान में रखा.

दूसरी वजह, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने भोजपुरी संगीत और कलाकारों को देश की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाया. तीसरी वजह, ओटीटी प्लेटफार्म ने विविधता पूर्ण कलाकारों को चयनित करना शुरू किया.

चौथी वजह, हिंदी दर्शकों की देहाती व श्रेत्रीय कहानियों के प्रति बढ़ता रु?ान. 5वीं वजह यह कि भोजपुरी कलाकारों ने खुद अपनी पहचान को केवल भोजपुरी उद्योग तक सीमित नहीं रखा.

इस का सब से बड़ा उदाहरण रवि किशन हैं. पवन सिंह संगीत के रास्ते हिंदी फिल्मों तक पहुंचे. दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ अब हिंदी फिल्म और ओटीटी प्लेटफार्म की जरूरत बनते जा रहे हैं.

साल 2026 में भोजपुरी हीरोइन आम्रपाली दुबे ने माना कि भोजपुरी इंडस्ट्री अपनी पुरानी छवि बदलने की कोशिश में है.

आखिर में अहम सवाल… अगर कल हिंदी की किसी बड़ी फिल्म में भोजपुरी का कोई नया कलाकार मुख्य लीड में दिखाई दे, तो क्या हम उसे सिर्फ ‘भोजपुरी कलाकार’ कहेंगे या भारतीय अभिनेता?

जब राष्ट्रपति ने बनवाई पहली भोजपुरी फिल्म

भोजपुरी सिनेमा के नए युग को सम?ाने के लिए अतीत की परतें उधेड़ना भी जरूरी है. बात साल 1962 की है, जब भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की सदाबहार अभिनेता नाजिर हुसैन (जिन्हें कई लोग ‘नादिर शाह’ के नाम से भी याद करते हैं) से मुलाकात हुई थी.

डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने नाजिर हुसैन से कहा था कि उन्हें अपनी मातृभाषा भोजपुरी में भी फिल्में बनानी चाहिए ताकि मिट्टी की खुशबू परदे पर बिखर सके. राष्ट्रपति की इस बात ने नाजिर हुसैन के दिल में घर कर लिया और फिर साल 1963 में इतिहास रचा गया. भोजपुरी सिनेमा की पहली आधिकारिक फिल्म रिलीज हुई, जिस का नाम था ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’. कुमकुम, असीम कुमार और नाजिर हुसैन जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर ऐसी कामयाबी हासिल की थी कि बड़ीबड़ी हिंदी फिल्में इस के सामने पानी मांगने लगीं.

इस फिल्म के लिए संगीतकार चित्रगुप्त ने लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज अपने गीतों में इस्तेमाल की और इस फिल्म को अमर बना दिया. शुरुआती दौर में भोजपुरी सिनेमा ने ‘लागी नाही छूटे राम’ और ‘बिदेशिया’ जैसी कल्ट फिल्में दीं. लेकिन 70 और 80 के दशक के आतेआते, सिनेमाघरों और डिस्ट्रीब्यूशन की कमी में यह इंडस्ट्री थोड़ी सुस्त पड़ गई. ऐसा लगने लगा मानो भोजपुरी सिनेमा अंधेरे कुएं में खो गया हो.

इस के लिए काफी हद तक भोजपुरी सिनेमा से जुड़े फिल्मकार व कलाकार ही दोषी थे. वे ऐसी फिल्में बना रहे थे, जिन्हें पूरे परिवार के साथ बैठ कर नहीं देखा जा सकता था. Bhojpuri Stars

Bhojpuri Singer : भोजपुरी श्रोताओं के दिल की आवाज बन रहे भावुक के गीत

Bhojpuri Singer. भोजपुरी सिनेमा में जब अश्लीलता और फूहड़ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, ऐसे समय में मनोज भावुक के गीत यह साबित कर रहे हैं कि भोजपुरी गीत-संगीत की असली पहचान अभी भी जीवित है. उनके गीत मनोरंजन के साथ-साथ संवेदना, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को भी अभिव्यक्ति देते हैं. यही कारण है कि उनके गीत सीधे श्रोताओं के दिल तक पहुंचते हैं.

इन गीतों से मिली एक अलग पहचान

हाल ही में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘गरीब बेटी के अमीर ससुराल’ में मनोज भावुक ने 2 महत्वपूर्ण गीत लिखे हैं. इनमें एक फिल्म का शीर्षक गीत है और दूसरा एक बेहद मधुर रोमांटिक गीत. विशेष बात यह है कि यह प्रेमगीत पारंपरिक प्रेमी-प्रेमिका के रिश्ते पर नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच मौजूद विश्वास, समर्पण और आत्मीय प्रेम को अभिव्यक्त करता है. गीत की पंक्तियां हैं :

‘जइसे नयना के संगे रहे निंदिया,
जइसे निंदिया के संगे सपनवा रहे,
ओइसही हमरा दिलवा के धड़कन में हो,
सांस बनके हमेशा सजनवा रहे…’

आगे गीत में प्रेम की गहराई और आत्मिक जुड़ाव को स्वर मिलता है :

‘रूह में उतरल बाड़ू तू अब, कइसे छूटी हाथ हो…’

और फिर प्रेम की सुंदरतम व्याख्या सामने आती है :

‘दिलवे के सुंदरता सजना हो सबके,
नेह के डोर में बांधे,
रंगवा आ रूपवा, सीरत आ सूरत,
सब फींका एकरा आगे.
जइसे राम-सिया जी के जोड़ी रहे,
जइसे राधा-किसन के लगनवा रहे,
ओइसही हमरा दिलवा के धड़कन में हो,
सांस बनके हमेशा सजनवा रहे…’

यह गीत दर्शकों और संगीत प्रेमियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.

फिल्म का शीर्षक गीत भी अपनी मार्मिकता के कारण विशेष चर्चा में है. यह गीत उस गरीब बेटी की व्यथा को सामने लाता है, जो अमीर ससुराल में अपमान और उपेक्षा सहने के बाद मायके लौटने को विवश हो जाती है. गीत की पंक्तियां हैं :

‘रोजे-रोजे ताना, रोजे-रोजे ओरहन हो,
केहू नाहीं पढ़ेला ए दुखिया के मन हो,
जइसे सोनवा के पिंजरा में चिरई के हाल, ओइसे गरीब बेटी के अमीर ससुराल…’

गीत का भावपूर्ण अंतरा श्रोताओं को भीतर तक उद्वेलित कर देता है :

‘बेटी के रस्ता ह नइहर से ससुरा,
हम चलनी ससुरा से नइहर के राहे,
रीती बा बदलल कि फूटल बा भगिया,
कि आइल समइया बा हमरा के थाहे,
किस्मत बा कइले हमार पगली के हाल,
हाय रे… गरीब बेटी के अमीर ससुराल…’

ऋचा दीक्षित और ओम झा ने बनाया खास

फिल्म में इन गीतों को लोकप्रिय अभिनेत्री ऋचा दीक्षित पर फिल्माया गया है. चर्चित संगीतकार ओम झा ने अपने मधुर संगीत से गीतों को और प्रभावशाली बनाया है. फिल्म के निर्माता संदीप सिंह और रामा प्रसाद हैं, जबकि निर्देशन अजय कुमार झा ने किया है.

मनोज भावुक को मिले सम्मान

मनोज भावुक को वर्ष 2025 में रिलीज हुई फिल्म ‘आपन कहाये वाला के बा’ के गीतों के लिए व्यापक प्रशंसा मिली थी. वहीं फिल्म ‘दुलहिनिया नाच नचावे’ के गीतों के लिए उन्हें बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया था.

इसके अलावा साल 2025 के लिए उन्हें बेस्ट गीतकार के लिए पटना में हुए सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है.

गीत-सृजन के साथ-साथ मनोज भावुक कई चर्चित पुस्तकों के लेखक भी हैं. भोजपुरी सिनेमा पर लिखी उनकी पुस्तक ‘भोजपुरी सिनेमा के संसार’ को विशेष सराहना प्राप्त हुई है. उन्हें फिल्मफेयर, फेमिना, दिल्ली प्रेस, भारतीय भाषा परिषद सम्मान, भोजपुरी भाषा शिखर सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है.

गीतों के लिंक :

Bhojpuri Cinema: मैं दिखावे में यकीन नहीं करती-रिंकू भारती गोस्वामी

Bhojpuri Cinema:भोजपुरी सिनेमा में अपने दमदार किरदारों के जरीए राज करने वाली रिंकू भारती गोस्वामी का जादू इन दिनों 28 करोड़ भोजपुरिया दर्शकों के दिलों पर छाया हुआ है. वे भोजपुरी फिल्मों में अकसर किसी न किसी दमदार रोल से दर्शकों का मनोरंजन करती दिखाई देती हैं. वे फिल्मों में सैकंड लीड समेत बतौर सपोर्टिंग एक्ट्रेस चाची, बहन और भाभी के रोल में छाई हुई हैं.

रिंकू भारती गोस्वामी का भोजपुरी फिल्मों में भाभी का रोल इस तरह पसंद किया जाने लगा है कि अब फिल्म इंडस्ट्री समेत भोजपुरिया दर्शक भी उन्हें ‘रिंकू भाभी’ के नाम से ही पुकारने लगे हैं.
रिंकू भारती गोस्वामी एक्टिंग के लिए तो सुर्खियां बटोरती ही हैं, साथ ही अपने बेबाक और बिंदास अंदाज के लिए भी जानी जाती हैं. वे हर मुद्दे पर खुल कर अपनी राय रखती हैं.
‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो के दौरान रिंकू भारती गोस्वामी से हुई एक मुलाकात में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री और अपने एक्टिंग कैरियर पर बेबाक बातें साझा कीं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :
आप का सिवान जैसे छोटे शहर से सिनेमा की दुनिया का सफर कैसा रहा है?
यह सफर आसान तो बिलकुल नहीं था. छोटे शहर से आने पर सब से पहले लोगों की सोच से लड़ना पड़ता है. लेकिन मैं ने हमेशा अपने सपनों पर भरोसा रखा. मुश्किलें आईं, लेकिन वे ही मुझे मजबूत
बनाती गईं.
आप ने टीवी से शुरुआत की और फिर भोजपुरी सिनेमा में पहचान बनाई. इस सफर को आप कैसे देखती हैं?
मेरे लिए यह एक सीखने का प्रोसैस रहा है. टीवी ने मुझे कैमरे के सामने खड़ा होना सिखाया और भोजपुरी सिनेमा ने मुझे असली पहचान दी. हर पड़ाव ने मुझे निखारा है.
लोग आप को ‘रिंकू भाभी’ कह कर बुलाते हैं. इस पहचान को आप कैसे लेती हैं?
यह मेरे लिए बहुत बड़ा प्यार है. जब लोग आप को आप के किरदार के नाम से पहचानने लगें, तो समझ लीजिए आप ने कुछ सही किया है. ‘रिंकू भाभी’ मेरे दिल के बहुत करीब है. इतने सालों तक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के
बाद आप को बैस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवार्ड मिला. इस खुशी को कैसे सैलिब्रेट किया?
यह अवार्ड जीतना मेरे लिए बहुत खास बात है. मैं ने इसे अपने परिवार और टीम के साथ सैलिब्रेट किया. यह सिर्फ मेरी नहीं, हम सब की मेहनत का फल है. आप को भोजपुरी फिल्मों में अकसर भाभी, चाची, बहन जैसे सैकंड लीड किरदारों में देखा जाता है.
क्या आप की कभी लीड रोल की चाह नहीं होती?
हर कलाकार के मन में लीड रोल का सपना होता है, तो जाहिर है कि मेरा सपना भी है, लेकिन मेरे लिए किरदार की अहमियत ज्यादा है.
आप अपने बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं. क्या इस से कभी विवाद भी हुए हैं?
हां, कई बार विवाद हुए हैं. लेकिन मैं वही बोलती हूं जो मुझे सही लगता है. मैं किसी तरह के दिखावे में यकीन नहीं करती, इसलिए लोग मुझे असली मानते हैं.
अगर आप को एक फिल्म में लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो कैसा किरदार निभाना चाहेंगी?
मैं एक ऐसी महिला का किरदार निभाना  चाहूंगी जो समाज के खिलाफ जा कर अपनी पहचान बनाती है. उस में स्ट्रगल भी हो, इमोशन भी और एक मजबूत संदेश भी.
फिल्म सैट पर कोई ऐसा मजेदार या यादगार किस्सा जो आज भी आप को हंसा देता हो?
एक बार शूटिंग के दौरान मेरा इमोशनल सीन था और पीछे से किसी ने मजाक कर दिया, पूरा सीन हंसी में बदल गया. मुझे वह दिन आज भी याद आता है.
अगर आप को अपनी अब तक की यात्रा को एक लाइन में बयान करना हो, तो क्या कहेंगी?
संघर्ष से सफलता तक, और अभी सफर जारी है.                    

बृहस्पति कुमार पांडेय

Bhojpuri Celebrity Interview: किरदार बनावटी-न हो अनूप अरोरा

Bhojpuri Celebrity Interview: भोजपुरी सिनेमा के शानदार और संजीदा एक्टरों में शुमार अनूप अरोरा ने अपनी एक्टिंग से एक अलग पहचान बनाई है. उन्होंने अब तक सैकड़ों फिल्मों में अलगअलग किस्म के किरदार निभा कर यह साबित किया है कि वे केवल एक एक्टर नहीं हैं, बल्कि एक्टिंग के प्रति समर्पित कलाकार हैं.  अदाकारी के प्रति उन का जुनून और अनुशासन ही उन्हें भीड़ से अलग बनाता है. 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान उन से बातचीत हुई. पेश हैं, उस के खास अंश :

इतने
लंबे समय तक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में टिके रहना, आप इसे कैसे देखते हैं?
यह एक लगातार चलने वाला सफर है. यहां हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, वरना लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं.

भोजपुरी सिनेमा की मौजूदा दशा और दिशा को आप कैसे देखते हैं?
आज हमारे पास प्लेटफार्म और पहुंच दोनों हैं, लेकिन कंटैंट की सोच कमजोर हो रही है. हमें अच्छे कंटैंट से जुड़ना होगा. भोजपुरी में कम बजट में भी दमदार फिल्में बन सकती हैं. भोजपुरी सिनेमा के कुछ ऐसे चेहरे हैं, जो दर्शकों के दिल और दिमाग में बसते हैं. उन्हीं चुनिंदा लोगों में आप का नाम शामिल है.

आप इस उपलब्धि को कैसे देखते हैं?
मेरे लिए यह किसी अवार्ड से कम नहीं है. दर्शकों के दिल और दिमाग में जगह बनाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है और खुशी भी. मैं ने हमेशा कोशिश की है कि जो भी किरदार करूं, उस में सच्चाई हो, बनावटीपन न हो. कलाकार वही होता है जिसे लोग स्वीकार करें.

अगर आप को किसी फिल्म में पूरी तरह लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो आप किस तरह की कहानी और किरदार को चुनेंगे?
हर कलाकार के अंदर कहीं न कहीं एक सपना होता है कि वह ऐसा किरदार निभाए जो दर्शकों के दिल में लंबे समय तक जिंदा रहे. अगर लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो मैं ऐसी कहानी करना चाहूंगा, जो समाज से जुड़ी हो, जिस में मनोरंजन के साथसाथ एक मजबूत संदेश भी हो. किरदार की बात करूं तो मैं एक आम इनसान की असाधारण कहानी निभाना चाहूंगा, जो हालात से लड़ कर अपनी पहचान बनाता है. ऐसा रोल जिस में इमोशन, एक्शन और ग्रे शेड्स तीनों हों.                             

कौमेडियन को अलग पहचान मिले – रोहित सिंह ‘मटरू’
भोजपुरी फिल्मों में जब भी परदे पर हंसी की फुहार छूटती है, तो अकसर उस के पीछे किसी कौमेडियन की मेहनत छिपी होती है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि कौमेडियन को अकसर उतना सम्मान नहीं मिलता जितना किसी हीरो या विलेन को मिलता है.
भोजपुरी फिल्मों के चर्चित हास्य कलाकार रोहित सिंह ‘मटरू’ इस सच्चाई को खुल कर स्वीकार करते हैं. अपनी देशी शैली, सहज संवाद और सटीक कौमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वाले ‘मटरू’ से पटना में हुई मुलाकात में हुई लंबी बातचीत में उन्होंने न सिर्फ अपने संघर्षों की कहानी सुनाई, बल्कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की कई अनकही बातों पर भी बेबाक राय रखी. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप की पहचान आज एक कौमेडियन के रूप में बन रही है. लेकिन इस की शुरुआत कैसे हुई?
सच कहूं तो मैं ने कभी प्लान कर के कौमेडियन बनने का फैसला नहीं किया था. बचपन से ही मेरी आदत थी कि माहौल गंभीर हो जाए तो मैं कोई मजाक कर देता था. परिवार वाले कहते थे कि तुम जहां जाते हो, वहां हंसी का माहौल बन जाता है. धीरेधीरे लगा कि अगर यही काम लोगों को खुशी देता है, तो इसे ही अपना रास्ता क्यों न बनाया जाए. बस, वही आदत आज मेरा पेशा बन गई. अकसर कहा जाता है कि

भोजपुरी फिल्मों में कौमेडियन को सिर्फ हलके मनोरंजन के लिए रखा जाता है. आप क्या सोचते हैं?
यह बात काफी हद तक सच है. कई फिल्में ऐसी होती हैं जहां कौमेडियन को सिर्फ 2-3 सीन दे कर कहा जाता है कि बस लोगों को हंसा देना. लेकिन कौमेडी करना इतना आसान नहीं है. एक कौमेडियन पूरी फिल्म का मूड बदल सकता है. अगर कहानी में सही तरीके से कौमेडी जोड़ी जाए, तो फिल्म और भी मजबूत हो सकती है.

आप की कौमिक टाइमिंग की काफी तारीफ होती है. इस का राज क्या है?
कौमेडी में सब से जरूरी चीज टाइमिंग है. अगर संवाद एक सैकंड पहले या बाद में बोल दिया, तो पूरा मजाक खराब हो सकता है. मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि सीन को महसूस करूं. जब कलाकार सीन को जीता है, तब ही असली कौमेडी निकलती है.
आप को सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स जैसे मंच पर सम्मान मिलता है तो आप को कैसा लगता है?
अवार्ड मिलना हर कलाकार का सपना होता है. अगर ऐसा सम्मान मिलता है तो निश्चित रूप से खुशी होती है. लेकिन सच कहूं तो जब कोई दर्शक मिल कर कहता है कि आप की वजह से हम हंसे, तो वह मेरे लिए किसी भी ट्रौफी से बड़ा पुरस्कार होता है.

आने वाले समय में आप का सपना क्या है?
मैं चाहता हूं कि भोजपुरी फिल्मों में कौमेडी को अलग पहचान मिले. हमारे यहां इतने अच्छे कौमेडियन हैं, लेकिन उन्हें सही मौके नहीं मिलते. अगर उन्हें अच्छे किरदार और मजबूत कहानी मिले, तो भोजपुरी कौमेडी पूरे देश में लोकप्रिय हो सकती है. आज की जिंदगी में तनाव बहुत बढ़ गया है. अगर मेरी कौमेडी से किसी के चेहरे पर दो मिनट की मुसकान आ जाती है, तो लगता है कि मेरा मकसद कामयाब हो गया है.                        

पटना में 7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स सम्पन्न, बेस्ट एक्टर देव सिंह, बेस्ट एक्ट्रेस अंजना सिंह

पटना। बिहार की राजधानी पटना का ऐतिहासिक बापू सभागार रविवार की शाम भोजपुरी सिनेमा की चमक-दमक, संगीत और सितारों की मौजूदगी से जगमगा उठा। अवसर था 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह का, जो पूरे भव्यता और गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। शाम छह बजे शुरू हुआ यह समारोह देर रात तक चलता रहा और भोजपुरी फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकारों, गायकों, निर्देशकों, तकनीशियनों तथा सिने प्रेमियों की बड़ी उपस्थिति ने इसे एक यादगार सांस्कृतिक उत्सव बना दिया।
इस समारोह में लगभग 80 विभिन्न श्रेणियों में भोजपुरी सिनेमा के कलाकारों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े प्रतिभाशाली लोगों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में भोजपुरी फिल्म जगत की कई चर्चित हस्तियों ने शिरकत की, जिससे सभागार में उत्साह और उल्लास का माहौल बना रहा।

विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
अवॉर्ड समारोह में कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्व मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथियों में बिहार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार, कृषि मंत्री श्री राम कृपाल यादव, मंत्री श्री संजय सिंह, दिल्ली प्रेस के संपादक परेश नाथ, दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ तथा इम्पा (IMPAA) के अध्यक्ष अभय सिन्हा प्रमुख रूप से शामिल रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ सभी अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद मंच से भोजपुरी सिनेमा की उपलब्धियों और उसके भविष्य पर चर्चा की गई।
बिहार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि भोजपुरी सिनेमा आज केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और लोक जीवन की झलक भी प्रस्तुत करता है। उन्होंने कलाकारों से समाज को सकारात्मक संदेश देने वाली फिल्मों के निर्माण की अपील की।
कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने कहा कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और ऐसे आयोजनों से कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय सिनेमा भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवित रखता है। मंत्री संजय सिंह ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि भोजपुरी सिनेमा में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और इस प्रकार के मंच कलाकारों को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बांधा समां
अवॉर्ड समारोह केवल सम्मान देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक भव्य स्टार नाइट के रूप में भी सामने आया। मंच पर भोजपुरी संगीत और नृत्य की शानदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
लोकप्रिय गायकों और कलाकारों ने अपने हिट गीतों पर प्रस्तुति देकर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। सभागार में मौजूद दर्शकों ने हर प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक भोजपुरी लोक संस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियां भी दी गईं, जिनमें लोकगीत और लोकनृत्य शामिल रहे। इन प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को सांस्कृतिक रंगों से भर दिया।

डिजिटल युग के अनुरूप अवॉर्ड्स का नया स्वरूप
कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ नें बताया कि इस वर्ष अवॉर्ड समारोह को डिजिटल युग के अनुरूप नया स्वरूप दिया गया। इस बार अवॉर्ड्स को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया जिसमें थिएटर में रिलीज होने वाली फिल्में, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज कंटेंट और यूट्यूब और टीवी प्लेटफॉर्म रिलीज फिल्मों की कैटेगरी बनाई गई थी. इन तीनों वर्गों के अंतर्गत विभिन्न श्रेणियों में कलाकारों, निर्देशकों, गायकों, तकनीशियनों और अन्य रचनात्मक प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि आज के समय में डिजिटल माध्यमों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है और ऐसे में इस मंच पर डिजिटल कंटेंट से जुड़े कलाकारों को भी पहचान देना आवश्यक है।

कलाकारों को मिला सम्मान
समारोह में भोजपुरी फिल्म उद्योग के कई चर्चित कलाकारों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अवॉर्ड पाने वाले कलाकारों में कई लोकप्रिय अभिनेता, अभिनेत्री, गायक और तकनीशियन शामिल रहे। जिसमें बेस्ट एक्टर का अवार्ड अरविंद अकेला कल्लू को उनकी मूवी मुझे मेरी बीवी से बचाओ के लिए दिया गया , इसी फिल्म के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड रक्षा गुप्ता को मिला, इंटरनेशनल स्टेज स्टार अवॉर्ड निशा उपाध्याय, बेस्ट सिंगर एल्बम फीमेल अनुपमा यादव, बेस्ट सिंगर एल्बम ज्यूरी पुरस्कार मिला मोनू अलबेला को, बेस्टर एक्टर बनीं अंजना सिंह और बेस्ट एक्ट्रेस बने देव सिंह, बेस्ट लिरिसिस्ट के पुरस्कार से सम्मानित किए गए मनोज भावुक, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पुरस्कार अनूप अरोड़ा को दिया गया,  सिनेमाहॉल कैटेगरी में बेस्ट फिल्म अवार्ड संजय पांडे को दिया गया, बेस्ट एक्ट्रेस क्रिटिक का अवार्ड संजना पांडेय के नाम रहा,  इन कलाकारों ने भोजपुरी सिनेमा में अपने अभिनय, गायन और रचनात्मक कार्यों से दर्शकों का दिल जीता है।

भोजपुरी सिनेमा की उपलब्धियों का जश्न
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने भोजपुरी फिल्म उद्योग की उपलब्धियों और उसके विकास की यात्रा पर भी प्रकाश डाला। पिछले कुछ वर्षों में भोजपुरी सिनेमा ने तेजी से प्रगति की है। फिल्मों की तकनीकी गुणवत्ता में सुधार हुआ है और कहानी तथा प्रस्तुति के स्तर पर भी नए प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। भोजपुरी फिल्में अब केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में बसे भोजपुरी भाषी लोगों के बीच भी काफी लोकप्रिय हो रही हैं। इससे इस उद्योग का बाजार लगातार बढ़ रहा है।

सरस सलिल अवॉर्ड्स की यात्रा
आयोजकों ने बताया कि सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स की शुरुआत वर्ष 2020 में की गई थी। इसके बाद अयोध्या, बस्ती और लखनऊ में इसके सफल आयोजन किए जा चुके हैं। हर वर्ष इस समारोह की लोकप्रियता और भव्यता बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित छठे संस्करण में 50 से अधिक श्रेणियों में कलाकारों को सम्मानित किया गया था। पटना में आयोजित सातवें संस्करण ने इस अवॉर्ड समारोह को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।
दर्शकों और मीडिया की रही बड़ी भागीदारी
अवॉर्ड समारोह में बड़ी संख्या में सिने प्रेमियों और दर्शकों ने भाग लिया। सभागार खचाखच भरा हुआ था और कार्यक्रम के दौरान हर प्रस्तुति पर दर्शकों की उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया देखने को मिली। इसके साथ ही कई मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम को कवर करने के लिए उपस्थित रहे। मीडिया की व्यापक उपस्थिति ने इस समारोह को और अधिक चर्चा में ला दिया।

कलाकारों के लिए प्रेरणा का मंच
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, कलाकारों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया। दिल्ली प्रेस से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि इस अवॉर्ड समारोह का उद्देश्य भोजपुरी सिनेमा के कलाकारों और तकनीशियनों को सम्मानित करना तथा क्षेत्रीय सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में इस समारोह को और भी बड़े स्तर पर आयोजित किया जाएगा ताकि भोजपुरी सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी पहचान मिल सके।

भोजपुरी सिनेमा के लिए ऐतिहासिक आयोजन
पटना में आयोजित 7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह भोजपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक आयोजन साबित हुआ। यह केवल एक अवॉर्ड कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भोजपुरी सिनेमा की उपलब्धियों, उसकी लोकप्रियता और उसके उज्ज्वल भविष्य का उत्सव भी था। इस भव्य आयोजन ने यह साबित कर दिया कि भोजपुरी सिनेमा आज एक मजबूत और तेजी से आगे बढ़ता हुआ फिल्म उद्योग है, जो आने वाले समय में भारतीय सिनेमा के बड़े मंच पर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

Press Confrence: 7th Bhojpuri Cine Awards- पटना में सजेगा भोजपुरी सिनेमा का महोत्सव

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह का 15 मार्च, 2026 को पटना के बापू सभागार में डिजिटल युग के साथ नए स्वरूप में होगा आयोजन

बस्ती: भोजपुरी सिनेमा के प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का आयोजन 15 मार्च को सायं 6 बजे से बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में किया जाएगा। यह समारोह भोजपुरी फिल्म उद्योग के लिए एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सिनेमा जगत की नामचीन हस्तियां शिरकत करेंगी।
इस संबंध में मिश्रौलिया स्थित बृहस्पति पाण्डेय के आवास पर आयोजित प्रेस वार्ता में जानकारी देते हुए दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा कि यह अवॉर्ड शो अब बिहार की राजधानी पटना में हो रहा है, जो एक नए अध्याय की शुरुआत है. इस बार इसे और भव्य और बड़े स्तर पर किया जाएगा और दर्शकों के लिए यह मनोरंजन का शानदार अनुभव रहेगा।

सरस सलिल (दिल्ली प्रेस समूह) से जुड़े भानु प्रकाश राणा ने बताया कि इस अवॉर्ड शो में नामांकित फिल्मों और कलाकारों को जूरी द्वारा चयनित कर विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लाइव म्यूजिकल परफॉर्मेंस और स्टार नाइट मुख्य आकर्षण रहेंगे।
डिजिटल युग के साथ बदला अवॉर्ड शो का स्वरूप
इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका परिवर्तित फॉर्मेट है। बदलते समय और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस बार अवॉर्ड शो को तीन प्रमुख वर्गों में बांटा गया है—सिनेमा (थिएटर रिलीज फिल्में), ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब/टीवी कंटेंट के आधार पर बेस्ट अवॉर्ड्स दिए जाएंगे।

आयोजन समिति से जुड़े बृहस्पति कुमार पांडेय ने बताया कि भोजपुरी कंटेंट अब केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी और डिजिटल माध्यमों के जरिए विश्वभर में देखा जा रहा है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले कलाकारों और तकनीशियनों को समान मंच देना समय की आवश्यकता है।
2020 से शुरू हुआ सम्मान का यह सिलसिला

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो की शुरुआत वर्ष 2020 में बस्ती जिले से हुई थी जिसका उद्देश्य था भोजपुरी सिनेमा को एक व्यवस्थित और प्रतिष्ठित मंच प्रदान करना। लोकप्रिय पत्रिका सरस सलिल द्वारा शुरू की गई इस पहल ने कुछ ही वर्षों में भोजपुरी फिल्म उद्योग में अपनी विशेष पहचान बना ली।
इसके बाद अयोध्या में 3 बार, बस्ती में 2 बार, इसका आयोजन हुआ था। लगातार इस आयोजन की भव्यता और सहभागिता में वृद्धि होती गई।

लखनऊ में हुआ था छठा भव्य आयोजन
पिछले वर्ष ‘छठा सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स’ शो का आयोजन लखनऊ के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुआ था। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यवस्थित समारोह माना गया।
उस समारोह में 50 से अधिक श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए। बेस्ट फिल्म, बेस्ट अभिनेता, बेस्ट अभिनेत्री, बेस्ट निर्देशक, बेस्ट सिंगर, बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर और लाइफटाइम अचीवमेंट जैसी प्रमुख श्रेणियों में कलाकारों को सम्मानित किया गया।

अब तक हुए अवॉर्ड समारोह में यह अवॉर्ड दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, प्रदीप पांडे ‘चिंटू’, अंजना सिंह, आम्रपाली दुबे, ऋचा दीक्षित, संजय पांडेय, देव सिंह, अवधेश मिश्रा, रक्षा गुप्ता, मनोज टाइगर, प्रियंका सिंह, सीपी भट्ट, संजय कुमार श्रीवास्तव,विजय खरे, केके गोस्वामी, शुभम तिवारी, माही खान, मनोज भावुक, प्रसून यादव, कविता यादव, अनुपमा यादव, अंतरा सिंह ‘प्रियंका’, समर सिंह, सहित कई नामचीन एक्टरों को मिल चुका है।

पिछले वर्ष लखनऊ में हुए अवॉर्ड शो में लोकप्रिय अभिनेता अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अभिनेत्री अंजना सिंह, निर्देशक रजनीश मिश्रा सहित कई चर्चित हस्तियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान मिला। समारोह में बड़ी संख्या में दर्शकों और मीडिया की उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

इस बार पटना में और भी भव्य तैयारी
अभिनेता और गायक विवेक पांडेय ने पटना में आयोजित हो रहे सातवें संस्करण को और भी भव्य और आकर्षक बनाने की तैयारी की गई है। रेड कार्पेट एंट्री, सेलिब्रिटी इंटरैक्शन, लाइव डांस परफॉर्मेंस और विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए इसे यादगार बनाने की योजना है।

भोजपुरी सिनेमा के चर्चित सितारे, निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक और तकनीकी विशेषज्ञ इस समारोह में भाग लेंगे। आयोजकों का कहना है कि यह मंच केवल सितारों को सम्मानित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कलाकारों को भी बराबर की पहचान देता है।
क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाई आयोजकों ने बताया कि सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का मुख्य उद्देश्य भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रतिभाशाली कलाकारों और तकनीशियनों को प्रोत्साहित करना तथा क्षेत्रीय सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है।

भोजपुरी सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में कंटेंट, तकनीक और प्रस्तुति के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ इसकी पहुंच देश-विदेश तक बढ़ी है। ऐसे में यह अवॉर्ड समारोह उद्योग को एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की दिशा में प्रेरित करता है।

सिने प्रेमियों से अपील
आयोजन समिति ने पटना और आसपास के जिलों के सिने प्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस भव्य समारोह की शोभा बढ़ाने की अपील की है। जब बापू सभागार में रोशनी, कैमरा और तालियों की गूंज होगी, तब यह केवल कलाकारों का सम्मान नहीं बल्कि पूरी भोजपुरी संस्कृति का उत्सव होगा।

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो एक बार फिर यह साबित करने जा रहा है कि भोजपुरी सिनेमा अब क्षेत्रीय दायरे से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

दिल्ली प्रेस पिछले 86 वर्षों से भारत का एक अग्रणी प्रकाशन समूह रहा है और इसकी 9 भाषाओं में प्रकाशित होने वाली 30 पत्रिकाओं के जरिए देश-भर के पाठकों तक सीधी पहुंच है। हमारे यहां देश की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली हिंदी पत्रिकाओं ‘सरिता’, ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’, ‘सरस सलिल’, ‘मुक्ता’, मनोहर कहानियां’, ‘सत्यकथा’ का निरंतर सफल प्रकाशन किया जा रहा है, जिन्हें करोड़ों पाठक बड़े चाव से पढ़ते हैं।

दिल्ली प्रेस समूह की ‘सरस सलिल’ पत्रिका वर्ष 1993 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और आमजन को जानकारी देने के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी कर रही है।

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें