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Raksha Bandhan : जिम्मेदारी बहन की सुरक्षा की

‘‘गुडि़या, अब तुम बड़ी हो गई हो. अब तुम्हारी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. तुम मेरी प्यारी बहन हो. तुम्हें कोई तकलीफ होगी तो मुझे दर्द होगा,’’ सुशांत ने अपनी बहन नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘भाई मैं अब बड़ी हो गई हूं. अपना खयाल रख सकती हूं. आप परेशान न हों, आप भी तो मेरे से केवल 2 साल ही बडे़ हैं,’’ नेहा ने अपना तर्क दिया.

‘‘बहन, मैं जानता हूं कि तुम बड़ी हो चुकी हो. अपना खयाल रख सकती हो. फिर भी मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा का वचन देता हूं. 2 साल ही सही पर हूं तो तुम से बड़ा न,’’ सुशांत ने बात को समझाने का प्रयास किया.

‘‘हां, मान गई भाई, तुम जीते और मैं हारी. अब चौकलेट मुझे दो और मुझे इस का स्वाद लेने दो,’’ भाई के तर्क के आगे हार मानते हुए नेहा ने कहा.

इस तरह की जिम्मेदारी भरी नोकझोंक हर घर में भाईबहन के बीच होती ही रहती है. यह नोकझोंक आज की नहीं है. हर पीढ़ी के बीच होती रही है. नई पीढ़ी की बहन को लगता है कि वह बहुत बड़ी, समझदार और जिम्मेदार हो गई है और उसे भाई की मदद की जरूरत नहीं रह गई है. इस के विपरीत भाई को यह लगता है कि उस की बहन अभी मासूम, छोटी सी गुडि़या है, जिसे समाज में अच्छेबुरे का पता नहीं है. ऐसे में वह परेशान हो सकती है.

कई बार बड़ी होती बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर भाई या परिवार के दूसरे लोग उस की आजादी में बाधक हैं. असल में यही वह सोच है जो बहन को समझनी चाहिए. भाई या परिवार का कोई सदस्य उस की आजादी में बाधक नहीं होता. वह यह जरूर चाहता है कि लड़की के दामन पर कोई दाग न लगे, जो जीवन भर उसे परेशान करता रहे.

भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी

जब हम बहन की सुरक्षा की बात करते हैं तो केवल शारीरिक सुरक्षा ही मुद्दा नहीं होता बल्कि बहन की शारीरिक सुरक्षा के साथ ही साथ उस की भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी होती है. बड़ी होती बहन के दोस्तों में केवल लड़कियां ही नहीं होतीं लड़के भी होते हैं. इन दोस्तों में कई मासूमियत का लाभ उठाने के प्रयास में रहते हैं. बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को रोका जा रहा है. ऐसे में कई बार वह ऐसी बातों को छिपा जाती है, जो उस की सुरक्षा के लिए जरूरी होती हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बहन के साथ भाई भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे. भाई और बहन के बीच उम्र का अंतर काफी कम होता है. इसलिए बहन और भाई की सोच एकजैसी होती है. कई बार बहन अपने मातापिता को कई बातें नहीं बताती पर अपने भाई को बता देती है.

मनोविज्ञानी डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘यहां पर भाई की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. वह बहन के साथ इमोशनली ऐसे व्यवहार रखे जिस से बहन हर बात उस को बताती रहे. ज्यादातर परेशानियां वहीं से शुरू होती हैं जब बच्चे अपनी बातें छिपाना शुरू करते हैं. यह केवल बहनें ही नहीं भाई भी करते हैं. जब भाई अपनी बातें बहन को बताएगा तो बहन भी उसे अपनी बातें बताने में संकोच नहीं करेगी. जरूरत इस बात की है कि बहन और भाई के बीच रिश्ता दोस्ताना भी बना रहे. अगर भाई पेरैंट्स की तरह बहन से व्यवहार करेगा तो वह बात को छिपा सकती है. दोस्त की तरह भाई संबंध रखेगा तो परेशानी नहीं आएगी. भाई को शारीरिक सुरक्षा के साथ बहन को भावनात्मक सुरक्षा भी देनी चाहिए.’’

सोच बदलने की जरूरत

लड़की और लड़के के बीच समाज एक तरह का फर्क करता है, जिस की वजह से कुछ बातें भाई के लिए उतनी बुरी नहीं समझी जातीं जितनी बहन के लिए समझी जाती हैं. इस बात को समझने के लिए देखें तो भाई की गर्लफ्रैंड को ले कर उतना हंगामा नहीं होता जितना बहन के बौयफ्रैंड को ले कर होता है.

आज जब महिला अधिकारों की बात हो रही है तो बहन भी अपने लिए भाई जैसे अधिकार चाहती है. समाज भाई की गलतियों को उस तरह से नहीं लेता जिस तरह से बहन की गलतियों को लेता है. यह समाज की एक तरह की पुरुषवादी मानसिकता है. यही वजह है कि केवल भाई ही नहीं पेरैंट्स भी बेटी को ले कर बेटे से अधिक सचेत रहते हैं. इस बात से ही लड़कियों का मतभेद होता है. वे इस सोच में भाईबहन के सामाजिक अधिकार के अंतर को ले कर विद्रोही हो जाती हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता विनीता ग्रेवाल कहती हैं, ‘‘लड़कियों के भोलेपन का लाभ उठाने वाला पुरुषवर्ग ही होता है. इस में कई बार करीबी रिश्तेदार तक शामिल होते हैं. जरूरत इस बात की है कि लड़कियों को भी यह समझाया जाए कि वे सही और गलत के फर्क को समझ सकें. हमारे समाज में सैक्स की चर्चा पूरी तरह से बेमानी मानी जाती है ़ऐसे में सैक्स को ले कर लड़कियां जागरूक नहीं होतीं, यह बात उन के लिए मुसीबत का सबब बनती है. सैक्स संबंधों को ले कर ज्यादातर लड़कियां इमोशनली ठगी जाती हैं, जिस का प्रभाव केवल उन के  जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि परिवार पर भी पड़ता है. समाज सीधे सवाल करता है कि लड़की की सुरक्षा का परिवार वालों ने खयाल नहीं रखा. इस वजह से पेरैंट्स और भाई कुछ ज्यादा ही परेशान रहते हैं. अपनी आजादी के साथ लड़कियों को इस तर्क को सामने रख कर सोचना चाहिए, जिस से विद्रोह जैसे हालात से बचा जा सकता है.’’

खुद बनें मजबूत

समय बदल रहा है. आज लड़की को लड़के जैसे अधिकार हासिल हैं. वह भी पढ़ाई, कोचिंग, शौपिंग के लिए खुद ही जाना चाहती है. कई घरों में लड़कियों के भाई नहीं हैं, केवल पेरैंट्स ही हैं. ऐसे में हर जगह बहन की सुरक्षा में भाई नहीं मौजूद रह सकता. तब लड़कियों को खुद ही मजबूत बनना पडे़गा. केवल मानसिक  रूप से ही नहीं शारीरिक रूप से भी उसे मजबूत रहना है. यही नहीं कानून ने जो अधिकार उसे दिए हैं वे भी उसे पता होने चाहिए, जिस से पुलिस और प्रशासन से अपने लिए मदद हासिल कर सके. आज सैल्फ डिफैंस के तमाम कार्यक्रम चल रहे हैं, जिन से लड़कियां अपना बचाव कर सकें. ऐसे में जरूरी है कि लड़कियां शारीरिक मेहनत करें और खुद को मजबूत बनाएं. इस के बाद वे जरूरत पड़ने पर अपना बचाव करने में सक्षम हो सकेंगी, जिस पेरैंट्स और भाई को इस बात का यकीन होता है कि लड़की अपनी सुरक्षा खुद कर सकती है तो वह चिंतामुक्त होता है.

रैड बिग्रेड संस्था लड़कियों को आत्मरक्षा के तमाम गुण सिखाती है. संस्था की संचालक ऊषा विश्वकर्मा कहती हैं, ‘‘केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि लड़कियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. इस से कमजोर बौडी वाली लड़कियां भी मजबूत से मजबूत विरोधी को मात दे कर अपना बचाव कर सकती हैं. स्कूल, पेरैंट्स, सरकार और समाज को सहयोग कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग को बढ़ावा देना चाहिए, जिस से लड़की मजबूत ही नहीं होगी, उस के अंदर का डर भी खत्म हो जाएगा.’’

ऊषा को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग देने के लिए कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. वे अपने स्तर से कई तरह की वर्कशौप कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग दे रही हैं.

बढ़ाएं आपसी समझदारी

बहन की सुरक्षा भाई की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में जरूरी है कि भाईबहन के बीच आपसी समझदारी बढे़. जब दोनों के बीच आपसी समझदारी होगी तो उसे किसी भी तरह की परेशानी का अनुभव नहीं होगा. वह यह नहीं सोचेगी कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को प्रभावित किया जा रहा है. जब उस को समझाया जाएगा कि यह सुरक्षा क्यों जरूरी है, तो वह किसी बात को छिपाएगी नहीं. जब भाईबहन एकदूसरे से कुछ छिपाएंगे नहीं तो आपस में समझदारी बढ़ेगी, जिस से खुद ही सुरक्षा का एहसास होगा. सुरक्षा का यह एहसास खुद में आत्मविश्वास पैदा करेगा. आज के दौर में समाज और हालात बहुत बदल चुके हैं. ऐसे में बच्चों के बीच आपसी समझदारी जरूरी है.

अंश वैलफेयर की अध्यक्षा श्रद्धा सक्सेना कहती हैं, ‘‘बदलते दौर में भाई और बहन दोनों को समान अवसर मिले हैं. ऐेसे में जरूरी है कि वे आपसी समझदारी दिखाएं. केवल बहन पर ही नहीं अगर भाई पर भी कोई उंगली उठती है तो बहन को भी उतनी ही तकलीफ होती है. टीनएज में होने वाले क्रश का प्रभाव केवल बहन पर ही नहीं पड़ता भाई का जीवन और कैरियर भी उस से प्रभावित होता है. ऐसे में जब भाईबहन समझदारी भरा व्यवहार करते हैं आपस में बातें शेयर करते हैं तो मुसीबतों से बचे रहते हैं, कई घरपरिवार में बहन बड़ी होती है, ऐसे में वह भाई को पूरी सुरक्षा देती है. भाई केवल बहन को ही नहीं बहन भी भाई को खुश और सुरक्षित देखना चाहती है.’’

Gift for Sisters :रक्षाबंधन के इस फेस्टिवल पर प्यारी बहन को दें यूनिक गिफ्ट 600 रुपए तक

Gift for Sisters. रक्षाबंधन भाई-बहन का प्यारा सा पवित्र त्योहार है. जिस दिन बहनें अपने भाईयो को राखी बांध कर नसे अपनी रक्षा करने का वचन लेती है. साथ ही, भाईयों के लिए एक सवाल बना रहता है कि वह अपनी बहनों को क्यां गिफ्ट करें, क्योंकि बहनों को लिए सबसे खास इस त्योहार पर उनके लिए गिफ्ट होता है. ऐसे में जरूरी है कि आप अपनी बहन यूनिक, कम रेट में अच्छा गिफ्ट दे सकें तो आज हम इस आर्टिकल में ऐसे ही कुछ स्पेशल गिफ्ट के बारें में बताएंगे जो आप 600 रुपए तक अपनी बहन को दे सके.

पर्सनल सेफ्टी अलार्म

यह एक छोटा सा अलार्म है, जो आपकी बहन की सेफ्टी के काफी काम आएगी. अगर आपकी बहन किसी खतरनाक जगह पर फंस जाएं तो आपकी बहन इस अलार्म को बजा सकती है. यह मुश्किल में आसपास के लोगों को बुलाने में काम आ सकता है. ये आपको 525 रुपय तक मिल जाएगा.

प्रेपर स्प्रे

हर महिला के पास पेपर स्प्रे जरूर होना चाहिए. इसे आत्मरक्षा स्प्रे भी कहते हैं. यह स्प्रे उन लड़कियों के काफी काम आता है, जो कि घर से बाहर रहती है. हर लड़की को अपने पर्स में पेपर स्प्रे रखना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल कर सकें. भाई अपनी बहन को पेपर स्प्रे गिफ्ट में दे सकते हैं. ये असानी से ओनलाइन मिल जाता है. जिसकी कीमत 150 रुपय से होती है.

ट्रैकिंग ऐप

अपनी बहन के फोन में मोबाइल में ट्रैकिंग ऐप्स इंस्टौल कर के भी आपको उसको एक गिफ्ट दें सकते है. अगर आपकी बहन ट्यूशन और कौलेज जाती है तो ये गिफ्ट देना एक अच्छी तरीका है.  इससे आप उनकी लोकेशन ट्रैक कर पाएंगे और इमरजेंसी में तुरंत मदद कर सकेंगे.

की-चेन

की-चेन में काफी सेफ्टी होती है. जैसे ग्लास ब्रेकर, सीट बेल्ट कटर और एक छोटा ब्लेड. इसे आसानी से बहन की चाबियों के साथ रखा जा सकता है जो इमरजेंसी में काम लाया जा सकता है.

मेकअप किट

लड़कियों को मेकअप का शौक होता है. ऐसे में अगर आप अपनी बहन के लिए रक्षाबंधन के इस त्यौहार को खास बनाना चाहते हैं तो उन्हें मेकअप कीट से जुड़ी चीजें जरूर गिफ्ट करे. आप अगर चाहें तो उनकी पसंदीदा लिपस्टिक शेड भी उन्हें गिफ्ट कर सकते हैं. आप अगर चाहें तो मेकअप से जुड़ी कुछ चीजों को एक बौक्स में सजाकर भी उन्हें गिफ्ट कर सकते हैं. इसके अलावा मार्केट में कई तरह के मेकअप किट मिलते है. आप मेकअप किट औनलाइन आर्डर भी कर सकते है.

Raksha Bandhan Special: भाई-बहन का रिश्ता बनाता है मायका, इसलिए समझें रिश्तों की अहमियत!

Raksha Bandhan Special. पता चला कि राजीव को कैंसर है. फिर देखते ही देखते 8 महीनों में उस की मृत्यु हो गई. यों अचानक अपनी गृहस्थी पर गिरे पहाड़ को अकेली शर्मिला कैसे उठा पाती? उस के दोनों भाइयों ने उसे संभालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक कि एक भाई के एक मित्र ने शर्मिला की नन्ही बच्ची सहित उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया.

शर्मिला की मां उस की डोलती नैया को संभालने का श्रेय उस के भाइयों को देते नहीं थकती हैं, ‘‘अगर मैं अकेली होती तो रोधो कर अपनी और शर्मिला की जिंदगी बिताने पर मजबूर होती, पर इस के भाइयों ने इस का जीवन संवार दिया.’’

सोचिए, यदि शर्मिला का कोई भाईबहन न होता सिर्फ मातापिता होते, फिर चाहे घर में सब सुखसुविधाएं होतीं, किंतु क्या वे हंसीसुखी अपना शेष जीवन व्यतीत कर पाते? नहीं. एक पीड़ा सालती रहती, एक कमी खलती रहती. केवल भौतिक सुविधाओं से ही जीवन संपूर्ण नहीं होता, उसे पूरा करते हैं रिश्ते.

सूनेसूने मायके का दर्द: सावित्री जैन रोज की तरह शाम को पार्क में बैठी थीं कि रमा भी सैर करने आ गईं. अपने व्हाट्सऐप पर आए एक चुटकुले को सभी को सुनाते हुए वे मजाक करने लगीं, ‘‘कब जा रही हैं सब अपनेअपने मायके?’’

सभी खिलखिलाने लगीं पर सावित्री मायूसी भरे सुर में बोलीं, ‘‘काहे का मायका? जब तक मातापिता थे, तब तक मायका भी था. कोई भाई भाभी होते तो आज भी एक ठौरठिकाना रहता मायके का.’’

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वाकई, एकलौती संतान का मायका भी तभी तक होता है जब तक मातापिता इस दुनिया में होते हैं. उन के बाद कोई दूसरा घर नहीं होता मायके के नाम पर.

भाईभाभी से झगड़ा:

‘‘सावित्रीजी, आप को इस बात का अफसोस है कि आप के पास भाईभाभी नहीं हैं और मुझे देखो मैं ने अनर्गल बातों में आ कर अपने भैयाभाभी से झगड़ा मोल ले लिया. मायका होते हुए भी मैं ने उस के दरवाजे अपने लिए स्वयं बंद कर लिए,’’ श्रेया ने भी अपना दुख बांटते हुए कहा.

ठीक ही तो है. यदि झगड़ा हो तो रिश्ते बोझ बन जाते हैं और हम उन्हें बस ढोते रह जाते हैं. उन की मिठास तो खत्म हो गई होती है. जहां दो बरतन होते हैं, वहां उन का टकराना स्वाभाविक है, परंतु इन बातों का कितना असर रिश्तों पर पड़ने देना चाहिए, इस बात का निर्णय आप स्वयं करें.

भाईबहन का साथ:

भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है. दोनों एकदूसरे को भावनात्मक संबल देते हैं, दुनिया के सामने एकदूसरे का साथ देते हैं. खुद भले ही एकदूसरे की कमियां निकाल कर चिढ़ाते रहें लेकिन किसी और के बीच में बोलते ही फौरन तरफदारी पर उतर आते हैं. कभी एकदूसरे को मझधार में नहीं छोड़ते हैं. भाईबहन के झगड़े भी प्यार के झगड़े होते हैं, अधिकार की भावना के साथ होते हैं. जिस घरपरिवार में भाईबहन होते हैं, वहां त्योहार मनते रहते हैं, फिर चाहे होली हो, रक्षाबंधन या फिर ईद.

मां के बाद भाभी:

शादी के 25 वर्षों बाद भी जब मंजू अपने मायके से लौटती हैं तो एक नई स्फूर्ति के साथ. वे कहती हैं, ‘‘मेरे दोनों भैयाभाभी मुझे पलकों पर बैठाते हैं. उन्हें देख कर मैं अपने बेटे को भी यही संस्कार देती हूं कि सारी उम्र बहन का यों ही सत्कार करना. आखिर, बेटियों का मायका भैयाभाभी से ही होता है न कि लेनदेन, उपहारों से. पैसे की कमी किसे है, पर प्यार हर कोई चाहता है.’’

दूसरी तरफ मंजू की बड़ी भाभी कुसुम कहती हैं, ‘‘शादी के बाद जब मैं विदा हुई तो मेरी मां ने मुझे यह बहुत अच्छी सीख दी थी कि शादीशुदा ननदें अपने मायके के बचपन की यादों को समेटने आती हैं. जिस घरआंगन में पलीबढ़ीं, वहां से कुछ लेने नहीं आती हैं, अपितु अपना बचपन दोहराने आती हैं. कितना अच्छा लगता है जब भाईबहन संग बैठ कर बचपन की यादों पर खिलखिलाते हैं.’’

मातापिता के अकेलेपन की चिंता:

नौकरीपेशा सीमा की बेटी विश्वविद्यालय की पढ़ाई हेतु दूसरे शहर चली गई. सीमा कई दिनों तक अकेलेपन के कारण अवसाद में घिरी रहीं. वे कहती हैं, ‘‘काश, मेरे एक बच्चा और होता तो यों अचानक मैं अकेली न हो जाती. पहले एक संतान जाती, फिर मैं अपने को धीरेधीरे स्थिति अनुसार ढाल लेती. दूसरे के जाने पर मुझे इतनी पीड़ा नहीं होती. एकसाथ मेरा घर खाली नहीं हो जाता.’’

एकलौती बेटी को शादी के बाद अपने मातापिता की चिंता रहना स्वाभाविक है. जहां भाई मातापिता के साथ रहता हो, वहां इस चिंता का लेशमात्र भी बहन को नहीं छू सकता. वैसे आज के जमाने में नौकरी के कारण कम ही लड़के अपने मातापिता के साथ रह पाते हैं. किंतु अगर भाई दूर रहता है, तो भी जरूरत पर पहुंचेगा अवश्य. बहन भी पहुंचेगी परंतु मानसिक स्तर पर थोड़ी फ्री रहेगी और अपनी गृहस्थी देखते हुए आ पाएगी.

पति या ससुराल में विवाद:

सोनम की शादी के कुछ माह बाद ही पतिपत्नी में सासससुर को ले कर झगड़े शुरू हो गए. सोनम नौकरीपेशा थी और घर की पूरी जिम्मेदारी भी संभालना उसे कठिन लग रहा था. किंतु ससुराल का वातावरण ऐसा था कि गिरीश उस की जरा भी सहायता करता तो मातापिता के ताने सुनता. इसी डर से वह सोनम की कोई मदद नहीं करता.

मायके आते ही भाई ने सोनम की हंसी के पीछे छिपी परेशानी भांप ली. बहुत सोचविचार कर उस ने गिरीश से बात करने का निर्णय किया. दोनों घर से बाहर मिले, दिल की बातें कहीं और एक सार्थक निर्णय पर पहुंच गए. जरा सी हिम्मत दिखा कर गिरीश ने मातापिता को समझा दिया कि नौकरीपेशा बहू से पुरातन समय की अपेक्षाएं रखना अन्याय है. उस की मदद करने से घर का काम भी आसानी से होता रहेगा और माहौल भी सकारात्मक रहेगा.

पुणे विश्वविद्यालय के एक कालेज की निदेशक डा. सारिका शर्मा कहती हैं, ‘‘मुझे विश्वास है कि यदि जीवन में किसी उलझन का सामना करना पड़ा तो मेरा भाई वह पहला इंसान होगा जिसे मैं अपनी परेशानी बताऊंगी. वैसे तो मायके में मांबाप भी हैं, लेकिन उन की उम्र में उन्हें परेशान करना ठीक नहीं. फिर उन की पीढ़ी आज की समस्याएं नहीं समझ सकती. भाई या भाभी आसानी से मेरी बात समझते हैं.’’

भाईभाभी से कैसे निभा कर रखें:

भाईबहन का रिश्ता अनमोल होता है. उसे निभाने का प्रयास सारी उम्र किया जाना चाहिए. भाभी के आने के बाद स्थिति थोड़ी बदल जाती है. मगर दोनों चाहें तो इस रिश्ते में कभी खटास न आए.

सारिका कितनी अच्छी सीख देती हैं, ‘‘भाईभाभी चाहे छोटे हों, उन्हें प्यार देने व इज्जत देने से ही रिश्ते की प्रगाढ़ता बनी रहती है नाकि पिछले जमाने की ननदों वाले नखरे दिखाने से. मैं साल भर अपनी भाभी की पसंद की छोटीबड़ी चीजें जमा करती हूं और मिलने पर उन्हें प्रेम से देती हूं. मायके में तनावमुक्त माहौल बनाए रखना एक बेटी की भी जिम्मेदारी है. मायके जाने पर मिलजुल कर घर के काम करने से मेहमानों का आना भाभी को अखरता नहीं और प्यार भी बना रहता है.’’

ये आसान सी बातें इस रिश्ते की प्रगाढ़ता बनाए रखेंगी:

– भैयाभाभी या अपनी मां और भाभी के बीच में न बोलिए. पतिपत्नी और सासबहू का रिश्ता घरेलू होता है और शादी के बाद बहन दूसरे घर की हो जाती है. उन्हें आपस में तालमेल बैठाने दें. हो सकता है जो बात आप को अखर रही हो, वह उन्हें इतनी न अखर रही हो.

– यदि मायके में कोई छोटामोटा झगड़ा या मनमुटाव हो गया है तब भी जब तक आप से बीचबचाव करने को न कहा जाए, आप बीच में न बोलें. आप का रिश्ता अपनी जगह है, आप उसे ही बनाए रखें.

– यदि आप को बीच में बोलना ही पड़े तो मधुरता से कहें. जब आप की राय मांगी जाए या फिर कोई रिश्ता टूटने के कगार पर हो, तो शांति व धैर्य के सथ जो गलत लगे उसे समझाएं.

– आप का अपने मायके की घरेलू बातों से बाहर रहना ही उचित है. किस ने चाय बनाई, किस ने गीले कपड़े सुखाए, ऐसी छोटीछोटी बातों में अपनी राय देने से ही अनर्गल खटपट होने की शुरुआत हो जाती है.

– जब तक आप से किसी सिलसिले में राय न मांगी जाए, न दें. उन्हें कहां खर्चना है, कहां घूमने जाना है, ऐसे निर्णय उन्हें स्वयं लेने दें.

– न अपनी मां से भाभी की और न ही भाभी से मां की चुगली सुनें. साफ कह दें कि मेरे लिए दोनों रिश्ते अनमोल हैं. मैं बीच में नहीं बोल सकती. यह आप दोनों सासबहू आपस में निबटा लें.

– आप चाहे छोटी बहन हों या बड़ी, भतीजोंभतीजियों हेतु उपहार अवश्य ले जाएं. जरूरी नहीं कि महंगे उपहार ही ले जाएं. अपनी सामर्थ्यनुसार उन के लिए कुछ उपयोगी वस्तु या कुछ ऐसा जो उन की उम्र के बच्चों को भाए, ले जाएं. Raksha Bandhan Special

Raksha Bandhan: कितने अजनबी- क्या भाईबहन के मतभेद खत्म हो पाए?

हम 4 एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एकदूसरे से इतने अजनबी कि अपनेअपने खोल में सिमटे हुए हैं.

मैं रश्मि हूं. इस घर की सब से बड़ी बेटी. मैं ने अपने जीवन के 35 वसंत देख डाले हैं. मेरे जीवन में सब कुछ सामान्य गति से ही चलता रहता यदि आज उन्होंने जीवन के इस ठहरे पानी में कंकड़ न डाला होता.

मैं सोचती हूं, क्या मिलता है लोगों को इस तरह दूसरे को परेशान करने में. मैं ने तो आज तक कभी यह जानने की जरूरत नहीं समझी कि पड़ोसी क्या कर रहे हैं. पड़ोसी तो दूर अपनी सगी भाभी क्या कर रही हैं, यह तक जानने की कोशिश नहीं की लेकिन आज मेरे मिनटमिनट का हिसाब रखा जा रहा है. मेरा कुसूर क्या है? केवल यही न कि मैं अविवाहिता हूं. क्या यह इतना बड़ा गुनाह है कि मेरे बारे में बातचीत करते हुए सब निर्मम हो जाते हैं.

अभी कल की ही बात है. मकान मालकिन की बहू, जिसे मैं सगी भाभी जैसा सम्मान देती हूं, मेरी नईनवेली भाभी से कह रही थी, ‘‘देखो जलज, जरा अपनी बड़ी ननद से सावधान रहना. जब तुम और प्रतुल कमरे में होते हो तो उस के कान उधर ही लगे रहते हैं. मुझे तो लगता है कि वह ताकझांक भी करती होगी. अरी बहन, बड़ी उम्र तक शादी नहीं होगी तो क्या होगा, मन तो करता ही होगा…’’  कह कर वह जोर से हंस दी.

मैं नहीं सुन पाई कि मेरी इकलौती भाभी, जिस ने अभी मुझे जानासमझा ही कितना है, ने क्या कहा. पर मेरे लिए तो यह डूब मरने की बात है. मैं क्या इतनी फूहड़ हूं कि अपने भाई और भाभी के कमरे में झांकती फिरूंगी, उन की बातें सुनूंगी. मुझे मर जाना चाहिए. धरती पर बोझ बन कर रहने से क्या फायदा?

मैं अवनि हूं. इस घर की सब से छोटी बेटी. मैं बिना बात सब से उलझती रहती हूं. कुछ भी सोचेसमझे बिना जो मुंह में आता है बोल देती हूं और फिर बाद में पछताती भी हूं.

मेरी हर बात से यही जाहिर होता है कि मैं इस व्यवस्था का विरोध कर रही हूं जबकि खुद ही इस व्यवस्था का एक हिस्सा हूं.

मैं 32 साल की हो चुकी हूं. मेरे साथ की लड़कियां 1-2 बच्चों की मां  बन चुकी हैं. मैं उन से मिलतीजुलती हूं पर अब उन के साथ मुझे बातों में वह मजा नहीं आता जो उन की शादी से पहले आता था.

अब उन के पास सासपुराण, पति का यशगान और बच्चों की किचकिच के अलावा कोई दूसरा विषय होता ही नहीं है. मैं चिढ़ जाती हूं. क्या तुम लोग  इतना पढ़लिख कर इसी दिमागी स्तर की रह गई हो. वे सब हंसती हुई कहती हैं, ‘‘बन्नो, जब इन चक्करों में पड़ोगी तो जानोगी कि कितनी पूर्णता लगती है इस में.’’

‘क्या सच?’ मैं सोचती हूं एक स्कूल की मास्टरी करते हुए मुझे अपना जेबखर्च मिल जाता है. खूब सजधज कर जाती हूं. अच्छी किस्म की लिपस्टिक लगाती हूं. बढि़या सिल्क की साडि़यां पहनती हूं. पैरों में ऊंची हील की सैंडिल होती हैं जिन की खटखट की आवाज पर कितनी जोड़ी आंखें देखने लगती हैं. पर मैं किसी को कंधे पर हाथ नहीं रखने देती.

क्या मुझ में पूर्णता नहीं है? मैं एक परफैक्ट महिला हूं और मैं ऐसा प्रदर्शित भी करती हूं, लेकिन जब कोई हंसताखिलखिलाता जोड़ा 2 छोटेछोटे भागते पैरों के पीछे पार्क में दौड़ता दिख जाता है तो दिल में टीस सी उठती है. काश, मैं भी…

मैं जलज हूं. इस घर के इकलौते बेटे की पत्नी. अभी मेरी शादी को मात्र 6 महीने हुए हैं. मेरे पति प्रतुल बहुत अच्छे स्वभाव के हैं. एकांत में मेरे साथ ठीक से रहते हैं. हंसतेमुसकराते हैं, प्यार भी जताते हैं और मेरी हर छोटीबड़ी इच्छा का ध्यान रखते हैं लेकिन अपनी दोनों बहनों के सामने उन की चुप्पी लग जाती है.

सारे दिन मुझे बड़ी दीदी रश्मि की सूक्ष्मदर्शी आंखों के सामने घूमना पड़ता है. मेरा ओढ़नापहनना सबकुछ उन की इच्छा के अनुसार होता है. अभी मेरी शादी को 6 महीने ही हुए हैं पर वह मुझे छांटछांट कर हलके रंग वाले कपड़े ही पहनाती हैं. जरा सी बड़ी बिंदी लगा लो तो कहेंगी, ‘‘क्या गंवारों की तरह बड़ी बिंदी और भरभर हाथ चूडि़यां पहनती हो. जरा सोबर बनो सोबर. अवनि को देखो, कितनी स्मार्ट लगती है.’’

मैं कहना चाहती हूं कि दीदी, अवनि दीदी अविवाहित हैं और मैं सुहागिन, लेकिन कह नहीं सकती क्योंकि शादी से पहले प्रतुल ने मुझ से यह वादा ले लिया था कि दोनों बड़ी बहनों को कभी कोई जवाब न देना.

मैं अपने मन की बात किस से कहूं. घुटती रहती हूं. कल रश्मि दीदी कह रही थीं, ‘‘भाभी, भतीजा होगा तो मुझे क्या खिलाओगी.’’

मैं ने भी हंसते हुए कहा था, ‘‘दीदी, आप जो खाएंगी वही खिलाऊंगी.’’

चेहरे पर थोड़ी मुसकराहट और ढेर सारी कड़वाहट भर कर अवनि दीदी बीच में ही बोल पड़ीं, ‘‘भाभी, हमें थोड़ा सल्फास खिला देना.’’

मैं अवाक् रह गई. क्या मैं इन्हें सल्फास खिलाने आई हूं.

अगर भाभी के बारे में सोच ऐसी ही थी तो फिर अपने भाई की शादी क्यों की?

मैं 3 भाइयों की इकलौती बहन हूं. मातापिता मेरे भी नहीं हैं इसलिए इन बहनों का दर्द समझती हूं. ऐसा बहुतकुछ मेरे जीवन में भी गुजरा है. जब मैं इंटर पास कर बी.ए. में आई तो महल्लापड़ोस वाली औरतें मेरी भाभियों को सलाह देने लगीं, ‘‘अरे, बोझ उतारो अपने सिर से. बहुत दिन रख लिया. अगर कुछ ऊंचनीच हो गई तो रोती फिरोगी. भाई लाड़ करते हैं इसलिए नकचढ़ी हो गई है.’’

सच में मैं नकचढ़ी थी लेकिन बड़ी भाभी मेरी मां बन गई थीं. उन्होंने कहा था, ‘‘आप लोग अपनाअपना बोझ संभालो. मेरे घर की चिंता मत करो. जब तक पढ़लिख कर जलज किसी काबिल नहीं हो जाती और कोई सुपात्र नहीं मिल जाता, हम शादी नहीं करेंगे.’’

और सचमुच भाभी ने मुझे एम.ए., बी.एड. करवाया और अच्छे रिश्ते की खोज में लग गईं. यद्यपि प्रतुल और मुझ में 10 साल का अंतर है लेकिन इस रिश्ते की अच्छाई भाभी ने यह समझी कि अपनी जलज, बिन मांबाप की है. भाईभाभियों के बीच रह कर पलीबढ़ी है. बिना मांबाप की बच्चियों का दर्द खूब समझेगी और प्रतुल को सहयोग करेगी.

मैं नहीं जानती थी कि मुझे ऐसा माहौल मिलेगा. इतनी कुंठा से ग्रस्त ननदें होंगी. अरे, अगर शादी नहीं हुई या नहीं हो रही है तो क्या करने को कुछ नहीं है. बहुतकुछ है.

एक बार मैं ने यही बात अवनि दीदी से धीरे से कही थी तो किचन के दरवाजे पर हाथ अड़ा कर लगभग मेरा रास्ता रोकते हुए वह बड़ी क्रूरता से कह गई थीं, ‘आज आप की शादी हो गई है इसलिए कह रही हैं. अगर न होती और भाईभाभी के साथ जीवन भर रहना पड़ता तो पता चलता.’ बताइए, मैं 6 महीने पुरानी विवाहिता आज विवाहित होने का ताना सुन रही हूं.

मैं प्रतुल हूं. इस घर का इकलौता बेटा और बुजुर्ग भी. मेरी उम्र 40 वर्ष है. मेरे पिता की मृत्यु को अभी 5 वर्ष हुए हैं. इन 5 सालों में मैं बहुत परिपक्व हो गया हूं. जब मेरे पिता ने अंतिम सांस ली उस समय मेरी दोनों बहनें क्रमश: 30 और 27 वर्ष की थीं. मेरी उम्र 35 वर्ष की थी. उन्होंने हम में से किसी के बारे में कुछ नहीं सोचा. पिताजी की अच्छीखासी नौकरी थी, परंतु जितना कमाया उतना गंवाया. केवल बढि़या खाया और पहना. घर में क्या है यह नहीं जाना. अम्मां उन से 5 वर्ष पहले मरी थीं. यानी 10 साल पहले भी हम भाईबहन इतने छोटे नहीं थे कि अपनाअपना घर नहीं बसा सकते थे. मेरे दोस्तों के बच्चे लंबाई में उन के बराबर हो रहे हैं और यहां अभी बाप बनने का नंबर भी नहीं आया.

नौकरी पाने के लिए भी मैं ने खूब एडि़यां घिसीं. 8 सालों तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में रहा. दोस्त और दुश्मन की पहचान उसी दौर में हुई थी. आज भी उस दौर के बारे में सोचता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

अम्मां सोतेउठते एक ही मंत्र फूंका करती थीं कि बेटा, इन बहनों की नइया तुझे ही पार लगानी है. लेकिन कैसे? वह भी नहीं जानती थीं.

मैं ने जब से होश संभाला, अम्मां और पिताजी को झगड़ते ही पाया. हर बहस का अंत अम्मां की भूख हड़ताल और पिताजी की दहाड़ पर समाप्त होता था. रोतीकलपती अम्मां थकहार कर खाने बैठ जातीं क्योंकि पिताजी पलट कर उन्हें पूछते ही नहीं थे. अम्मां को कोई गंभीर बीमारी न थी. एक दिन के बुखार में ही वह चल बसीं.

रिटायरमेंट के बाद पिताजी को गांव के पुश्तैनी मकान की याद आई. सबकुछ छोड़छाड़ कर वह गांव में जा बैठे तो झक मार कर हम सब को भी जाना पड़ा. पिछले 15 सालों में गांव और शहर के बीच तालमेल बैठातेबैठाते मैं न गांव का गबरू जवान रहा न शहर का छैलछबीला.

बहनों को पढ़ाया, खुद भी पढ़ा और नौकरी की तलाश में खूब भटका. उधर गांव में पिताजी की झकझक अब रश्मि और अवनि को झेलनी पड़ती थी. वे ऊटपटांग जवाब देतीं तो पिताजी उन्हें मारने के लिए डंडा उठा लेते. अजीब मनोस्थिति होती जब मैं छुट्टी में घर जाता था. घर जाना जरूरी भी था क्योंकि घर तो छोड़ नहीं सकता था.

पिताजी के बाद मैं दोनों बहनों को शहर ले आया. गांव का मकान, जिस का हिस्सा मात्र 2 कमरों का था, मैं अपने चचेरे भाई को सौंप आया. उस का परिवार बढ़ रहा था और वहां भी हमारे घर की तरह ‘तानाशाह’ थे.

शहर आ कर अवनि को मैं ने टाइप स्कूल में दाखिला दिलवा दिया लेकिन उस का मन उस में नहीं लगा. वह गांव के स्कूल में पढ़ाती थी इसलिए यहां भी वह पढ़ाना ही चाहती थी. मेरे साथ काम करने वाले पाठकजी की बेटी अपना स्कूल चलाती है, वहीं अवनि पढ़ाने लगी है. जितना उसे मिलता है, पिताजी की तरह अपने ऊपर खर्च करती है. बातबात में ताने देती है. बोलती है तो जहर उगलती है लेकिन मैं क्या करूं? पिताजी के बाद जो खजाना मुझे मिला वह केवल उन की 1 महीने की पेंशन थी. जिस शहर में रहने का ताना ये दोनों मुझ को देती थीं वही शहर हमारी सारी कमाई निगल रहा है.

40 बरस की आयु में आखिर परिस्थितियों से ऊब कर मैं ने शादी कर ली. जलज अच्छी लड़की है. शांत स्वभाव और धैर्य वाली. उस की बड़ीबड़ी आंखों में दुख के बादल कुछ क्षण मंडराते तो जरूर हैं लेकिन फिर छंट भी बहुत जल्दी जाते हैं. जलज ने आज तक मेरी बहनों के बारे में मुझ से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं की. क्या करूं, मेरे प्रारब्ध से जुड़ कर उसे भी सबकुछ सहन करना पड़ रहा है.

माना कि बहनें छोटी हैं लेकिन कहने वाले कब चूकते हैं, ‘‘खुद की शादी कर ली और बहनों को भूल गया. बहनें भी तड़ से कहती हैं, ‘‘तुम अपनी जिंदगी देखो, हम को कब तक संभालोगे या तुम्हारे पास इतना पैसा कहां है कि हमें बैठा कर खिला सको.’’

पिताजी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. खुद खायापिया और मौज उड़ाई. इस में मेरा कुसूर क्या है? मैं कब कहता हूं कि बहनों का ब्याह नहीं करूंगा. अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ता पर मैं सब से कहता हूं, समय तो आने दो, धैर्य तो रखो.

एक तो कहीं बात नहीं बनती और कहीं थोड़ीबहुत गुंजाइश होती भी है तो ये दोनों मना करने लगती हैं. यह लड़का अच्छा नहीं है. गांव में शादी नहीं करेंगे. वास्तव में दोनों में निरंकुशता आ गई है. मुझे कुछ समझती ही नहीं. हैसियत मेरी बुजुर्ग वाली है लेकिन ये दोनों मुझे बच्चा समझ कर डपटती रहती हैं. मेरे साथ जलज भी डांट खाती है.

अम्मां पिताजी के उलझाव ने इन दोनों के स्वभाव में अजीब सा कसैलापन ला दिया है. पापा से उलझ कर अम्मां मुंह फुला कर लेट जातीं और यह तक न देखतीं कि रश्मि और अवनि क्या कर रही हैं, कैसे बोल रही हैं.

मैं अपनी दोनों बहनों और पत्नी के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश में अपने ही खोल में सिमटता जा रहा हूं.

न जाने कब समाप्त होगा हमारा अजनबीपन.

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