Hindi Story : ठेले वाला

Hindi Story : रमेश अपने परिवार के साथ तीर्थयात्रा पर गए थे. यात्रा के दूसरे दिन उन्हें परेशान देख कर बेटे तन्मय ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘पापा, आप इतना परेशान क्यों नजर आ रहे हैं? आप को पहली बार इतनी चिंता में देख कर मु झे घबराहट हो रही है.

‘‘चेहरे पर हमेशा मुसकान बिखेरने वाले मेरे पापा का यह तनाव भरा चेहरा कुछ अलग ही कहानी कह रहा है. कुछ तो बोलो पापा…’’

बेटे तन्मय के बारबार कहने पर रमेश बोले, ‘‘बेटा, जिंदगी में आज पहली बार मेरा पर्स गायब हुआ है. मु झे याद नहीं कि इस के पहले कभी इस 60 साल की जिंदगी में मेरा पर्स गायब हुआ हो. चिंता तो बनती है न…’’

रमेश के पर्स में तकरीबन 15,000 रुपए थे. यह जान कर परिवार के सभी सदस्य परेशान हो गए. पर्स कहां गायब हुआ होगा? जब इस पर बातचीत हुई, तो यह नतीजा निकला कि रास्ते में रमेश ने जहां अमरूद खरीदे थे, वहीं पर्स गायब हुआ होगा, पर अब तो 100 किलोमीटर आगे आ चुके थे.

बेटे तन्मय ने उस जगह पर जाने की जिद की, तो रमेश ने कहा, ‘‘बेटा, मेरे पर्स में रुपयों के अलावा आधारकार्ड, ड्राइविंग लाइसैंस और विजिटिंग कार्ड भी थे. अगर पाने वाले की नीयत अच्छी होती, तो विजिटिंग कार्ड से मोबाइल नंबर देख कर अब तक फोन आ गया होता.

‘‘फोन न आने का यह मतलब है कि पाने वाले की मंशा ठीक नहीं है, इसलिए वहां जाने से कोई फायदा नहीं होगा.’’

इस बारे में सब एकमत हो कर आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े. सोमनाथ, पोरबंदर, द्वारका, बेट द्वारका, नागेश्वर जैसी जगहों पर घूम कर लौटते समय वे उसी रास्ते पर आगे बढ़े, जिस रास्ते से आए थे.

रास्ते में रमेश के मन में अनेक तरह के विचार आजा रहे थे. कभी उन के मन में आ रहा था कि इस जन्म में किसी का कुछ भी बिगाड़ा नहीं है, तो उन के पैसे रख कर कोई उन्हें कष्ट क्यों देगा? पर इस बात से वे शांत भी थे कि हो सकता है कि पिछले जन्म में किसी का कुछ कर्ज बाकी रहा हो और अब उस से मुक्ति मिली हो.

कभी वे यह सोचते कि अमरूद वाले की दिनभर की कमाई तकरीबन 1,000 रुपए होती होगी. पर्स मिलने के बाद हो सकता है कि उस ने अमरूद बेचने ही छोड़ दिए हों.

यह सब सोचने में रमेश इतने लीन थे कि उन्हें यह पता नहीं चला कि कब वे उस जगह पर पहुंच गए, जिस जगह उन्हें लग रहा था कि शायद पर्स खोया होगा.

तभी बेटा तन्मय चिल्लाया, ‘‘पापा देखो, वह अमरूद वाला कितनी शान से अमरूद बेच रहा है. पर्स चुराने की उस के चेहरे पर कोई शिकन तक दिखाई नहीं पड़ रही है.’’

कार से उतर कर रमेश जैसे ही अमरूद वाले के सामने पहुंचे, अमरूद वाला उन्हें एकटक देख रहा था.

रमेश ने उस अमरूद वाले से पूछा, ‘‘4 दिन पहले मैं ने आप से अमरूद खरीदे थे. आप के ध्यान में होगा ही…’’

अमरूद वाले ने जवाब दिया, ‘‘बिलकुल मेरे ध्यान में है.’’

‘‘तब तो यह भी ध्यान होगा कि मेरा पर्स आप के ठेले पर छूट गया था.’’

‘‘मेरे ठेले पर आप का पर्स… यहां तो कोई पर्स नहीं छूटा था. हां, जब आप अपनी कार में बैठ रहे थे, तब आप का पर्स नीचे गिरा था और मैं ने आवाज भी लगाई थी, पर आप लोग बिना सुने यहां से चले गए.

‘‘आप का पर्स मेरे पास रखा है. यह लीजिए आप अपना पर्स,’’ कहते हुए ठेले वाले ने रमेश को पर्स सौंप दिया.

खुशी के मारे रमेश यह नहीं सम झ पा रहे थे कि वे ठेले वाले का शुक्रिया कैसे अदा करें. उन्होंने ठेले वाले से पूछा, ‘‘भाई, इस पर्स में मेरा विजिटिंग कार्ड था, जिस में मेरा मोबाइल नंबर था. मु झे अगर फोन कर दिया होता, तो तुम्हारे बारे में मेरे मन में जो तरहतरह के बुरे विचार आ रहे थे, वे तो न आते.’’

रमेश की बात सुन कर वह ठेले वाला बोला, ‘‘साहब, पर्स मेरा नहीं था, तो किस हक से मैं इसे खोलता…’’

ठेले वाले की यह बात सुन कर रमेश और उस के परिवार के सभी सदस्य इतने हैरान हुए, जिस की कल्पना नहीं की जा सकती है. सभी को यही लग रहा था कि ईमानदारी अभी भी जिंदा है.

रमेश ने उस ठेले वाले को 500 रुपए देने चाहे, तो उस ने कहा, ‘‘मैं ने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाया है.’’

जब उस ठेले वाले ने पैसे नहीं लिए, तो रमेश ने उस के ठेले पर रख दिए.

वह ठेले वाला बोला, ‘‘ठीक है साहब, ये पैसे मैं पास के सरकारी स्कूल में दे दूंगा और अगर आप एक महीने तक अपना पर्स लेने नहीं आते, तो यह पर्स भी मैं वहीं दे देता.’’

उस ठेले वाले की ईमानदारी से खुश हो कर रमेश ने वहां से कुछ ज्यादा ही अमरूद खरीदे और वहां से चल पड़े. रास्तेभर वे सोचते रहे, ‘काश, दुनिया के लोग इस ठेले वाले की तरह होते तो यह दुनिया कितनी अच्छी होती.’

लेखक – प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ‘रत्नेश’

Hindi Story : रिजैक्शन

Hindi Story : कितना खुश और जोश में था वीर अपनी सगाई में. उम्र के इस दौर में, जब जोबन उछाह भर रहा हो, यह होना भी था. कभी उस ने लड़कियों के लिए खास उत्सुकता नहीं दिखाई थी.

दरअसल, उसे जैसे इस के लिए समय ही नहीं मिला था या समय ने उसे इस लायक रख छोड़ा था कि उस की इस में कोई दिलचस्पी ही नहीं रही थी.

मां की मौत तो बचपन में ही हो गई थी. तब वीर चौथी क्लास में था. पापा ने दूसरी शादी की और उसे होस्टल में भेज दिया गया. शायद पापा के मन में यह भाव या डर रहा हो कि उन की दूसरी पत्नी पता नहीं अपने इस सौतेले बेटे के साथ कैसा बरताव करेगी. इस तरह वह अचानक ही प्यार जैसे भावों से दूर अपनी एकाकी जिंदगी काटते रह गया था.

ऐसी बात नहीं थी कि वीर बिलकुल ही अकेला था. एक तो वह शुरू से ही शांत स्वभाव का रहा था, मां की मौत के बाद वह और भी चुप रहने लगा था. रहीसही कसर उस के होस्टल के सख्त अनुशासन और कायदेकानूनों ने पूरी कर दी थी.

होस्टल में लड़कों के कई ग्रुप थे. उन से भी वीर का कोई खास लगाव नहीं था. वह बस पढ़ाई और खेल तक ही सिमटा रहा. वैसे भी पढ़ाई में वह बहुत तेज था और सभी उसे किताबी कीड़ा ही मान कर चलते रहे.

दरअसल, जब भी वीर छुट्टियों में घर आता, तो यहां भी उसे कुछ खास लगाव हो नहीं पाया. आगे चल कर उस की दूसरी मां से भाईबहन हुए, तब तो ये दूरियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं. यह अलग बात है कि अब वे उस के प्रति अपनेपन का भाव रखने लगे थे. सौतेली मां खासतौर पर उस के खानपान का खास खयाल रखती थीं, ताकि गांव में कोई कुछ आरोप न लगा दे.

यह इत्तिफाक की बात थी कि 12वीं जमात पास करने के बाद वीर इंजीनियरिंग डिप्लोमा में चुन लिया गया था. यहां भी उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की बढि़या से पढ़ाई की और एक सरकारी नौकरी में लग गया. उस के पापा ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार उस से खुश था.

लेकिन वीर में एक यही कमी रह गई थी कि वह अपने डिप्रैशन से बाहर निकल नहीं पाया था. वह हमेशा खोयाखोया सा रहता था या खुद को उदास पाता. पापा ने इस के लिए उसे डाक्टर को दिखाया भी था.

डाक्टर ने कहा था कि चिंता की कोई बात नहीं है. यह समय के साथ ठीक हो जाएगा. शादी के बाद तो वीर बिलकुल ठीक हो जाएगा, इसलिए पापा ने उस की शादी की बात चलानी शुरू कर दी थी. कई जगह देखने के बाद बक्सर में एक जगह उस का रिश्ता तय हो गया था.

जैसा कि आमतौर पर नया चलन है, वीर की सगाई भी धूमधाम से कर दी गई. एक रिसौर्ट में दोनों परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ जमा हुए और धूमधाम से सगाई की रस्म पूरी की गई थी. बिलकुल शादी जैसी धूमधाम. पहली बार वह किसी लड़की के करीब और साथसाथ बैठा था, उस से खुल कर बातें की थीं.

आज के इस जमाने में शादी का मतलब जब छोटेछोटे लड़के जानते हैं, तो वीर की तो बात ही अलग थी. फिर रूपा का तो कहना ही क्या. पहले उस ने उस के कंधे से सिर टिकाया, हाथों में हाथ लिया और बातें करने लगी. उसे भी यह सबकुछ अच्छा लग रहा था.

रूपा के सुखदुख की कहानियों में वीर दिलचस्पी लेते हुए पहली बार उसे महसूस हुआ कि सिर्फ वही दुखी नहीं है, बल्कि दूसरे लोग भी दुखी हैं और उन्हें भी किसी सहारे की जरूरत होती है. जब वह रूपा जैसी कोई लड़की हो, तो उसे सहारा देना उस का फर्ज बनता है. उस की तर्जनी में पड़ी सगाई की वह सोने की भारी अंगूठी जैसे उसे इस का अहसास भी दिलाती थी.

अकसर रूपा ही उसे फोन करती थी खासकर रात में तो यह उस का नियमित शगल था और फिर वे दोनों दुनियाजहान की बात करते थे. अपने मन को वीर ने पहली बार किसी अनजान के सामने खोला था.

रूपा को ले कर वीर के मन में अनेक भाव उपजते और एक अनकहे जोश और उछाह से वह भर उठता था. जिंदगी के रंगीन सपने उस के सामने पूरे से होने लगते थे.

आरा से बक्सर की दूरी कुछ खास नहीं है और जैसे ही वीर का डुमरांव ब्लौक में ट्रांसफर हुआ, तो यह दूरी और घट गई थी. अपने घर तो वह कभी रहा ही नहीं. जहां उस की नौकरी होती, वहीं उसे क्वार्टर भी मिल जाता था. यहां डुमरांव में रहते हुए वह एकाध बार बक्सर गया, तो उस ने रूपा को वहीं बुला कर बातें भी कर आता था.

दरअसल, यह रूपा की ही जिद थी कि वीर उस से मिले, तो उसे भी इस मेलजोल में कुछ गलत नहीं लगा था और इस के बाद तो जब भी उसे समय मिलता, अपनी मोटरसाइकिल उठा कर बक्सर चला आता था.

यहां वे किसी रैस्टोरैंट या पार्क में घंटों बैठ कर बातें करते, खातेपीते और घूमते थे और यह बात दोनों के ही परिवार में पता चल गई थी.

छोटे शहरों में ऐसी बातें छिपती भी कहां हैं. वीर के पापा और दूसरी मां ने उसे आगाह भी किया था कि शादी से पहले इस तरह मिलनाजुलना ठीक नहीं है, जिसे उस ने हंसी में उड़ा दिया था.

वीर ने इस बात की चर्चा रूपा से करते हुए पूछा था, ‘‘क्या तुम्हारे पापा भी हमारे मिलनेजुलने को गलत मानते हैं?’’

रूपा हंस कर बोली थी, ‘‘गलत, अरे वे तो इसे बहुत अच्छा मानते हैं कि इसी बहाने हम एकदूसरे को जानसम झ रहे हैं. जब भविष्य में शादी होनी ही है, तो अभी मिलनेजुलने पर रोकटोक क्यों करें.

‘‘हां, मां जरूर इसे ठीक नहीं मानती हैं, मगर पापा का कहना है कि वे दोनों एक हद में रहें, तो मिलनेजुलने में क्या बुराई है.’’

इस बीच वीर ने रूपा को कितने ही सस्तेमहंगे उपहार खरीद कर दे डाले थे. होटलरैस्टोरैंट में हजारों रुपए का बिल वह हंसतेहंसते भर जाता था कि अपनी मंगेतर के लिए इतना भी न कर सका, तो उस का नौकरी करना बेकार है.

मगर इस बीच वीर के साथ एक घटना हो गई. वीर के औफिस में कोई बड़े लैवल का खरीद घोटाला हुआ था, जिस में उस का नाम भी घसीट लिया गया था.

डिपार्टमैंटल इंक्वायरी में पटना के बड़े अफसर आए और उस से कड़ी पूछताछ की. चूंकि उस के कई जगह पर दस्तखत थे, सुबूत उसे ही कुसूरवार ठहराते थे.

साथी मुलाजिमों ने बड़े अफसरों से अलग चुगली कर रखी थी कि अपनी मंगेतर के यहां कोई अकसर जाएगा और पार्टियां करतेफिरते, महंगेमहंगे गिफ्ट भेंट में देगा, तो क्या यह तनख्वाह से मुमकिन है? उस के लिए तो कोई भी गलत रास्ता ही अख्तियार करेगा न. तनख्वाह के पैसे पर कौन फालतू के खर्च करता है?

एक साथी मुलाजिम ने तो हद कर दी, जब उस ने वीर को ‘मैंटल’ बता दिया. और इसी के साथ वह सस्पैंड कर दिया गया था.

ज्यों ही यह खबर फैली तो वाकई वीर की दिमागी हालत गड़बड़ा गई थी. उस के पापा आए और फिर उन्होंने ही उसे संभाला था. उसे साथ घर ला कर अपनी देखरेख में रखा. उस के भाईबहन भी उस का खयाल रखते और उसे खुश रखने की पूरी कोशिश करते और हंसाते थे.

पापा ने वीर को पटना में एक साइकियाट्रिस्ट को भी दिखाया और कुछ इलाज कराया. फिर वे उस के सस्पैंशन के मामले में पड़े कि क्या हो सकता है. इस के लिए वे वकीलों और बड़े अफसरों से भी मिले.

अगले 3 महीने वीर के लिए भारी पड़े थे. आखिरकार घोटाले का भेद खुला, तो उस में 2 मुलाजिमों की भागीदारी देखने को मिली.

दरअसल, वे दोनों जैसे ही जानते कि वीर बक्सर जाने की हड़बड़ी में है. उस से जाते समय कुछ दस्तावेजों पर दस्तखत ले लेते थे. अपने जाने की हड़बड़ी में वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता था. इस तरह उन लोगों ने लाखों रुपए की हेराफेरी कर ली थी.

मगर यह भी सच है कि विभागीय खर्चे किसी एक के दस्तखत करने से नहीं होते. उस में 3 और मुलाजिम फंसे थे और उन लोगों ने भागदौड़ कर सही बात पता कर ली थी. उन लोगों की वजह से असली कुसूरवार पकड़े गए.

मगर वीर की जिंदगी में जैसे एक और तूफान इंतजार कर रहा था. रूपा के घर में उस के सस्पैंशन वाली बात का पता चल चुका था. उस से भी बड़ी बात यह कि उस के पापा ने इस रिश्ते के लिए इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें एक बड़ा घराना मिल चुका था.

वीर ने रूपा को कई बार फोन किया. वह बक्सर आया और एक रैस्टोरैंट में रूपा को मिलने भी बुलाया. वह चुपचाप आई और एक कोने में बैठ गई.

‘‘कैसे हो तुम?’’ वीर ने पूछा.

रूपा ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ.’’

‘‘वह तो जो हुआ, सो हुआ,’’ वीर ने अपनी उंगली में पहनी सगाई की अंगूठी को घुमाते और देखते हुए नाराजगी दिखाई, ‘‘मगर, तुम ने भी नाता तोड़ लिया.’’

‘‘ऐसा न कहो. दरअसल, मेरे पापा को कुछ लोगों ने बहका दिया था कि लड़के में कुछ दिमागी परेशानी है, इसलिए वहां रिश्ता करना सही नहीं है. मगर, मैं तो एकदम से अड़ गई कि मु झे तुम्हारे साथ ही शादी करनी है.’’

थोड़ी देर तक मानमनुहार की बात चलती रही. चाय और नाश्ते का दौर चला. इस बीच रूपा अचानक बोली, ‘‘अरे हां, मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गई. हम ने तुम्हें जो सगाई की अंगूठी पहनाई थी, उस के बारे में शक है कि उस में ज्यादा मिलावट तो नहीं है, इसलिए मां ने कहा है कि तुम से वह अंगूठी एक दिन के लिए ले लूं. उस की किसी दूसरे सुनार से जांच करवाने पर तसल्ली मिल जाएगी, इसलिए तुम वह अंगूठी मुझे दे दो.’’

‘‘यह क्या बात हुई. अब जैसी भी है, यह सगाई की अंगूठी है और मैं इसे अपनी उंगली से नहीं निकाल सकता. एक यही तो अंगूठी है, जिस की वजह से मु झे अपने तनाव को कम करने में मदद मिली थी. जब भी इसे देखता, तो तुम्हारी याद आती और मेरी हिम्मत बढ़ जाती थी.’’

‘‘सचमुच इस अंगूठी से मु झे भी बहुत ताकत मिलती है. मगर, एकाध दिन की ही तो बात है…’’ रूपा अपनी उंगली में फंसी सगाई की अंगूठी से खेलते हुए बोली, ‘‘यह हमारे पहले प्यार की निशानी है, तो ही ऐसा लगेगा.

मगर हमें थोड़ा प्रैक्टिकल हो कर भी सोचना चाहिए.

‘‘कोई हमें जानबू झ कर ठगे, यह भी तो कोई अच्छी बात नहीं है न, इसलिए अभी इसे दे दो. अगली बार आना, तो इसे ले लेना. आखिर मैं इसे ले कर क्या करूंगी?’’

वीर ने सगाई वाली अंगूठी रूपा को दे दी.

अगली बार जब वीर आया, तो तय जगह पर आने के लिए उस ने रूपा को फोन किया था. वह तो नहीं आई, मगर उस के पापा वहां आ गए. वह उन के सम्मान में उठ खड़ा हुआ.

‘‘ऐसा है बाबू कि रूपा की तबीयत थोड़ी खराब है, इसलिए वह नहीं आई…’’ थोड़ी देर ठहर कर वे उसे गौर से देखते हुए बोले, ‘‘और हां, अब हमें तुम्हारे साथ रूपा की शादी करने में कुछ दिक्कत महसूस हो रही है. यह लो सगाई की वह अंगूठी, जो तुम ने रूपा को पहनाई थी.’’

यह सुनते ही वीर को धरती घूमती नजर आई. वह बोला, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं. 4 महीने पहले हमारी सगाई हुई थी. 2 महीने बाद शादी होना तय था. और आप कुछ दूसरी ही बात कर रहे हैं,’’ वह अपनी उखड़ती हुई सांसों को काबू में करते हुए बोला, ‘‘इतने दिनों में हम एकदूसरे को बहुत जाननेसम झने और प्यार करने लगे हैं. और आप कहते हैं कि यह रिश्ता टूटेगा. ऐसा कैसे हो सकता है. रूपा इसे बरदाश्त नहीं कर पाएगी.’’

‘‘वह ऐसा है बाबू कि हमें काफीकुछ प्रैक्टिकल हो कर सोचना पड़ता है. तुम्हारे पापा औसत दर्जे के किसान ठहरे. घर में सौतेली मां और भाईबहन हैं. तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती.

‘‘ऐसे में तुम्हारे छोटे से घर में रूपा का निबाह नहीं होगा. यह सब जानते हुए हम रूपा की शादी तुम्हारे साथ नहीं कर सकते. उसे भी यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’’

रूपा के पापा अपनी रौ में बोले जा रहे थे. बिना यह जानेसम झे कि वीर के दिल पर क्या बीत रही होगी, ‘‘और रही बात रूपा की, तो उसे एक और अच्छा लड़का मिल गया है. बैंगलुरु में सौफ्टवेयर इंजीनियर है. तो रूपा को भी सब से अलग बैंगलुरु में अकेले रहने का चाव पूरा होगा.

‘‘लड़के के पिता की 30 बीघा की खेती है. उस के पिता अमीर किसान हैं और वह एकलौता लड़का है. एक बड़ी बहन है, जिस की शादी हो चुकी है. ऐसे में उसे और क्या चाहिए? इसलिए उस की तो बात ही मत करो.’’

‘‘यह आप से किस ने कह दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती. ठीक है कि असमय मां के गुजर जाने के बाद मैं डिप्रैशन में आ गया था. पापा ने मु झे होस्टल में डाल दिया था. लेकिन होस्टल में रह कर पढ़ाई करना कोई गुनाह तो नहीं…’’ वीर अपनेआप को काबू में करता हुआ सा बोला, ‘‘और रही बात मेरी सौतेली मां और भाईबहनों की, तो यह आप की गलतफहमी है. वे मु झे सगी मां जैसा प्यार करती हैं. उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया.

‘‘और आप को भी थोड़ा सोचसम झ कर किसी के बारे में बोलना चाहिए. आखिर में वे सौतेली ही सही, पर मेरी मां हैं. उन्होंने मुझ में और अपने बेटों में कभी कोई फर्क नहीं किया.’’

‘‘वह सब तो ठीक है बाबू. मगर हम जानबू झ कर मक्खी नहीं निगल सकते न. मैं ने अपने शहर में ऐसे अनेक केस देखे हैं, जिस से घरपरिवार बिखर गया है, इसलिए तुम अपने पापा को बता देना.’’

‘‘मैं बताऊंगा कि आप बताएंगे…’’ वीर गुस्से में आ गया था, ‘‘आप को किसी की भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है. मेरे परिवार को जब यह पता चलेगा, तो उस पर क्या बीतेगी?’’

‘‘अब तुम से बात क्या करना…’’ रूपा के पापा जाते हुए बोले, ‘‘ठीक है, मैं ही तुम्हारे पापा को बता दूंगा.’’

वीर पर जैसे बिजली सी गिरी थी. क्या ऐसे भी रिश्ता तोड़ा जाता है? मगर सबकुछ अपनी आंखों से देखने और कानों से सुनने के बाद अब बाकी क्या रहा था.

वीर के पापा ने सारी जानकारी लेने के बाद थोड़ी भागदौड़ की, उस के ठीक होने के कागजात तक उन्हें दिखाए, मगर रूपा का परिवार टस से मस नहीं हुआ. तब उन्होंने कहा कि जब उन की बेटी के लिए दूसरे लड़के मिल सकते हैं, तो उन्हें भी अपने बेटे के लिए दूसरी लड़कियां मिल जाएंगी.

मगर वीर के दिल में तो रूपा घर कर गई थी. उस ने उस से मिलने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रहा था. यह तो तय था कि रूपा की भी इस सगाई को तोड़ने में रजामंदी थी, तभी तो उस ने बहाने से वीर की सगाई की अंगूठी वापस ले ली थी. फिर भी उस का दिल इस सच को मानने को तैयार नहीं होता था.

जब वीर पहली बार रूपा से एकांत में मिला था, तब वह उसे निहारती रह गई थी.

‘‘तुम्हारे इस सांवलेसलोने रूप पर तो लड़कियां मरमिट जाएंगी. मैं कितनी खुशकिस्मत हूं कि तुम मु झे मिले हो,’’ रूपा वीर के सीने पर अपना सिर रख कर उस की बांहों की मछलियों से खेलती हुई कह रही थी, ‘‘तुम्हारे जैसा बांका जवान तो मु झे पूरी दुनिया में नहीं मिलने वाला. अच्छीभली सरकारी नौकरी है तुम्हारी. छुट्टियों में हम आराम से एकाध साल में एकाध महीने के लिए बाहर घूमने जा सकते हैं.’’

रूपा का दूधिया रंग और मासूम चेहरा वीर के आगे घूम जाता था. लेकिन आज उसी रूपा ने वीर को अपने मन से दूध में गिरी मक्खी के समान निकाल फेंका था. मन के किसी कोने में यह बात भी उठती कि आज जब उस का रिजैक्शन हुआ, तब उसे अहसास हो रहा है कि इस रिजैक्शन से लड़कियों के दिल पर भी क्या गुजरती होगी.

वीर को अब भी यकीन नहीं होता था कि उस की सगाई टूट गई है. उस के साथी सामने तो कुछ कहते नहीं थे, पर पीठ पीछे हंसते थे. सचमुच अविश्वास की एक फांस तो लग ही गई थी कि कहीं कुछ तो गलत है ही उस में, जिस से उस की सगाई टूट गई है.

समय का चक्र नहीं रुकता और वीर के पापा भागदौड़ में लगे थे. सौतेली मां ने अपने भाइयों से कह कर उस के लिए अनेक जगह से रिश्ते की बात चला रखी थी. कुछ रिश्तों के प्रस्ताव उस के पास आ चुके थे और चुनाव अब उसे करना था, मगर रहरह कर उसे रूपा की याद आती, तो वह बेचैन हो जाता था.

फिर भी समय ने तो वीर को यह सिखा ही दिया था कि अब पिछला सब भूल कर आगे की ओर बढ़ जाना है. यही सब के फायदे में है.

Family Story : सवेरा

Family Story : उस गांव में पंडित बालकृष्ण अपने पुरखों द्वारा बनाए गए मंदिर में भगवान की पूजा में लीन रहते थे. रोजीरोटी के लिए 8 बीघा जमीन थी. बालकृष्ण बड़े ही सीधेसादे और विद्वान थे. उन की पत्नी गायत्री भी सीधीसादी, सुशील, पढ़ीलिखी और सुंदर औरत थीं. बालकृष्ण का ब्याह हुए 2 साल हो गए थे, फिर भी उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था.

बालकृष्ण के पिता दीनदयाल काफी कट्टरपंथी थे. जातपांत और ऊंचनीच मानने के चलते उन्होंने छोटी जाति के लोगों को कभी मंदिर में घुसने नहीं दिया था.

गणेश पूजा के समय गांव के हर जाति के परिवार से बिना भेदभाव के चंदा लिया गया. बालकृष्ण ने सोचा कि इस पैसे द्वारा खरीदे गए प्रसाद और दूसरी चीजों का इस्तेमाल उस पूजा में लगे लोग नहीं करेंगे, पर उन्हें यह देख कर हैरानी हुई कि उन लोगों ने पूजा खत्म होने पर चंदे के पैसों से ही हलवापूरी बनाई और खुद खाई. उसी समय जब एक छोटी जाति का लड़का प्रसाद लेने आया, तो सभी ने उसे दुत्कार कर भगा दिया.

गांव के हरिजनों के लिए शासन सरकारी जमीन पर मकान बनवा रहा था. एक हरिजन जब इस सुविधा का फायदा उठाने के लिए पटवारी साहब और ग्राम पंचायत के सचिव से मिलने गया, तो बालकृष्ण उत्सुकता से पास ही खड़े हो कर बातचीत सुनने लगे.

हरिजन से 2,000 रुपए लेते हुए उस ने सचिव को देखा, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. इस के बाद इन रुपयों को उन्होंने पटवारी, सचिव और सरपंच को आपस में बांटते देखा, तो वे भौंचक्का रह गए. 101 रुपए उन के पुजारी पिता को भी बाद में दिए गए.

उन्होंने पिताजी से पूछा भी कि हरिजनों के अशुद्ध रुपए क्यों ले लिए, तो उन्होंने उसे बड़े प्यार से समझाया, ‘‘बेटा, लक्ष्मी कभी अशुद्ध नहीं होती.’’

बालकृष्ण के लिए यह एक अबूझ पहेली थी कि जब निचली जाति के लोगों से खेतों में काम करवा कर फसल तैयार करवाने में कोई हर्ज नहीं है, तो उन के द्वारा छुए गए अनाज को खाने में क्या हर्ज है?

बालकृष्ण जब गांव के बड़े लोगों जैसे पटवारी, ग्रामसेवक, सचिव और सरपंच को निचली जाति के लोगों से रुपए लेते देखते थे, तो यह समझ नहीं पाते थे कि क्या इसी पैसे से खरीदी गई चीजें अशुद्ध नहीं होतीं?

मंदिर में होने वाले किसी भी काजप्रयोजन के समय इन लोगों को अपनेअपने घर से एक बंधाबंधाया पैसा देने का आदेश दे दिया जाता था. उस से पूरे हो रहे उस काजप्रयोजन को देखना और उस का प्रसाद लेना इन के लिए बड़ा कुसूर माना जाता था.

बालकृष्ण ने जबजब इस तरह के सवालों के जवाब चाहे, तबतब उन से कहा गया कि ऐसा शास्त्रों में लिखा है और बहुत पहले से होता आ रहा है. इन बातों से धीरेधीरे बालकृष्ण के मन में ऊंचनीच और भेदभाव को मानने वाले इस समाज से घिन होती जा रही थी.

बालकृष्ण जातपांत के जबरदस्त खिलाफ थे. पिता दीनदयाल की मौत के बाद उन्होंने अछूत लोगों को गले लगा लिया और सभी भेदभाव भुला कर मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खोल दिए. वे अछूतों को दया, क्षमा, परोपकार, अहिंसा की सीख देने लगे.

मंदिर में रोज पूजा के बाद बालकृष्ण छोटी जाति के लोगों को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने और अंधविश्वास व दूसरे गलत रिवाजों को छोड़ने की सीख देते थे. साथ ही साथ नौजवानों को रोजगार के कई उपाय बताते थे.

इस से गरीब लोगों में एक नई जागरूकता आने लगी थी. वे अब अपनी माली हालत को सुधारने के लिए सचेत होने लगे थे. इस का नतीजा यह हुआ कि उन गरीबों के खून को चूसने वालों की आंखों में बालकृष्ण चुभने लगे.

बालकृष्ण अपने खेतों में सब्जी और अनाज उगाते थे और उन्हें बेचने के लिए मंडी जाते थे. एक दिन उन के विरोधी श्रीधर और महेंद्र सिंह मंडी में ही उन्हें मिल गए. इन लोगों ने बालकृष्ण से मीठीमीठी बातचीत की और ठंडाई पीने का मनौव्वल किया.

बालकृष्ण ने इन लोगों की बात मान ली. ठंडाई पीते समय श्रीधर और महेंद्र सिंह के होंठों पर शैतानी मुसकराहट फैल गई, क्योंकि अपने इस दुश्मन को मिटाने का अच्छा मौका उन्हें मिल गया था.

गांव वापस आते समय रास्ते में बालकृष्ण की तबीयत खराब हो गई. घर पहुंचने पर उन के अपने लोगों ने दवा की, लेकिन बालकृष्ण बच नहीं सके.

बालकृष्ण की मौत से गांव में कुहराम छा गया. गायत्री के लिए सारी दुनिया नीरस हो चुकी थी.

इधर बालकृष्ण के रिश्तेदारों ने पैसों के लालच में गायत्री के सती होने की खबर उड़ा दी. यह खबर जंगल की आग की तरह आसपास के गांवों में फैल गई. सती माता को देखने के लिए अनगिनत लोग आ रहे थे. मंदिर में अगरबत्ती, प्रसाद और रुपयों का ढेर लग गया था.

बालकृष्ण के रिश्तेदार इन सब को बटोरने में लगे हुए थे. कारोबारी लोग 10 रुपए की चीज 50 रुपए में बेच रहे थे. गांव में इतनी भीड़ इकट्ठी हो गई थी कि लोगों को पीने का पानी भी नहीं मिल पा रहा था.

गांव के स्कूल में छोटी जाति का एक मास्टर था, जिस का नाम मदनलाल था. बालकृष्ण से उस की गाढ़ी दोस्ती थी. अपने दोस्त की मौत से उस के मन को गहरा धक्का लगा था. वह भी मंदिर में गया, लेकिन कुछ लोगों ने उसे मंदिर में घुसने नहीं दिया.

तब मदनलाल को शक हो गया. उस ने कलक्टर से मदद करने की गुहार लगाई और फिर गायत्री को सती होने से रोक दिया. अंधविश्वासी लोग इस काम में बाधा खड़ी करने के चलते मदनलाल की खिंचाई कर रहे थे.

गायत्री निराशा के सागर में गोते लगा रही थीं. उन के सीधेपन का फायदा उठा कर बालकृष्ण के रिश्तेदार अपना मतलब साध रहे थे. जो लोग कल तक बालकृष्ण के खिलाफ थे, वे अब गायत्री के आसपास मंडरा रहे थे. कोई पैसों का लोभी था, तो कोई गायत्री की सुंदरता का. मदनलाल ने मौका पा कर गायत्री को दिलासा दिया और बालकृष्ण के अधूरे काम को पूरा करने की सलाह दी.

मदनलाल की मदद से गायत्री ने गांव में ‘बालकृष्ण स्मृति केंद्र’ खोला. वहां औरतोंमर्दों को पढ़ायालिखाया जाता था और कुटीर उद्योगों के बारे में भी बताया जाता था. पढ़ेलिखें लोगों को रोजगार के लिए बैंक से कर्ज दिलवाया जाता था.

गायत्री भी गांव के बड़े लोगों की आंखों में खटकने लगीं, क्योंकि अब गांव में बेगार करने वालों का टोटा पड़ने लगा था. वे लोग गायत्री को समझाने लगे कि निचली जाति के लोगों को सिर पर बैठाने से उस की हालत अपने पति जैसी ही होगी. गायत्री ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की.

एक दिन एकांत पा कर कुछ लोग मंदिर में घुस गए और गायत्री के साथ मारपीट करने लगे. बाद में उन लोगों ने गायत्री को ‘पागल’ करार दिया और मंदिर से निकाल दिया. मदनलाल ने बीचबचाव किया और कानून की मदद से गायत्री को अपना हक वापस दिलवाया.

इस से गांव के बड़े लोग मदनलाल के दुश्मन हो गए. इन लोगों ने बड़े अफसरों को घूस दे कर मदनलाल
की बदली गांव से दूर एक स्कूल में करवा दी.

मदनलाल ने ऐसी बिगड़ी हालत में गायत्री को अकेला छोड़ना मुनासिब नहीं समझा. वह कुछ दिनों की छुट्टी ले कर अपने विरोधियों को सबक सिखाने की कोशिश करने लगा.

मदनलाल ने गायत्री की बहुत मदद की, इसलिए गायत्री उस की अहसानमंद हो गई.

मदनलाल अभी अनब्याहा था. दोनों की नजदीकी धीरेधीरे प्रेम में बदल गई. इन का प्रेम साफसुथरा था, फिर भी दोनों अपने प्रेम को किसी के सामने खुलासा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.

गायत्री विधवा विवाह करने से हिचक रही थीं. मदनलाल डर रहा था कि एक ब्राह्मण विधवा के साथ एक छोटी जाति के आदमी के ब्याह से कहीं बखेड़ा न खड़ा हो.

मदनलाल से गायत्री की नजदीकी के चलते समाज के रूढि़वादी लोग बिदकने लगे थे. इन लोगों का कहना था कि ‘पराए मर्द के साथ विधवा का रहना केरबेर की तरह होता है. केला अपने पत्तों को बेर के कांटों से बचा नहीं पाता है’.

इन सारी बातों के बावजूद गायत्री और मदनलाल की नजदीकी बढ़ती ही गई. इस से वे लोग कुढ़ने लगे, जो गायत्री की सुंदरता पर मोहित थे. गायत्री के रिश्तेदार भी उस के खिलाफ आग उगल रहे थे.

आखिरकार मंदिर के अहाते में ब्राह्मण जाति की पंचायत बुलाई गई. पंचों ने मदनलाल को बहुत कोसा.

हालांकि मदनलाल ने अपनी सफाई में बहुतकुछ कहा. लेकिन कई लोगों ने गायत्री के खिलाफ झूठी गवाही दी. तब गायत्री को यकीन हो गया कि पंचायत का फैसला उस के खिलाफ ही होगा.

उन्होंने मन ही मन पक्का निश्चय किया और पंचों के सामने आ कर बोलीं, ‘‘तुम लोग मुझे जाति से बाहर क्या निकालोगे, मैं खुद तुम जैसे घटिया और पाखंडी लोगों की जाति में रहना नहीं चाहती हूं. मैं मदनलाल को अपना पति मान रही हूं.’’

गायत्री की यह हिम्मत देख कर सभी हैरान रह गए. खुद मदनलाल भी भौंचक्का था. उस ने कांपते हाथों से गायत्री की सूनी मांग में सिंदूर भर दिया.

यह देख कर पंचों के चेहरे लटक गए. उन सभी के सामने गायत्री ने मदनलाल से कहा, ‘‘आज हमारी शादीशुदा जिंदगी का पहला सवेरा है. आओ, आज से हम एक नई पहल शुरू करें.’’

लेखक – जी. शर्मा

Hindi Story : नसीब

Hindi Story : पूरे महल्ले में यही सुगबुगाहट थी कि करीम की बेटी खुशबू का निकाह है, वह भी उस की बाप की उम्र के हमीदुल्ला मास्टर के साथ.

जब खुशबू को यह बात पता चली थी कि उस की शादी एक 50 साल के बूढ़े के साथ तय हो गई है, उस दिन वह पूरी रात रोई थी, लेकिन उस के बाद वह खामोश ही रही. वह सम झ चुकी थी कि बूढ़ा शौहर ही उस का नसीब है.

इस के बाद खुशबू एक जिंदा लाश में बदल गई थी, जो केवल देख और सुन सकती थी, लेकिन बोल नहीं सकती थी.

लेकिन इस रिश्ते का विरोध उस की अम्मी ने उस के अब्बू से किया था, मगर खुशबू ने खुद ही अम्मी को चुप करा दिया था.

खुशबू के अब्बू फलों का ठेला लगाते थे, जिसे बेच कर उन्हें मुश्किल से दो वक्त का खाना मिल पाता था, जिस के चलते खुशबू भी पड़ोस की शाहीन खाला के यहां से कढ़ाई करने के लिए साड़ी वगैरह ले आती थी, जिस से उसे भी कुछ पैसे मिल जाते थे और वह अपनी जरूरतें उन्हीं से पूरी कर लेती थी.

लेकिन इधर कुछ दिनों से खुशबू के अब्बू की तबीयत ठीक नहीं थी. सही से इलाज न होने के चलते वे धीरेधीरे बिस्तर से लग गए और फिर तो भूखों मरने की नौबत आ गई.

यह सब देख कर खुशबू की अम्मी आसपास के घरों में चौकाबरतन करने लगी थीं, जिस से अब्बू की दवा और जैसेतैसे घर का खर्च चलने लगा था.

खुशबू खूबसूरत ही नहीं, जहीन भी थी. उस ने घर पर रह कर ही अपनी सहेली गुलशन की मदद से हिंदी में भी पढ़नालिखना सीख लिया था. सभी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे.

पहले तो खुशबू के अम्मीअब्बू को लगता था कि उन की बेटी को कोई न कोई रिश्तेदार अपना ही लेगा. अम्मी ने खाला के यहां उस के रिश्ते की बात चलाई थी, लेकिन उस की खाला ने अम्मी से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें ऐसी बहू चाहिए थी, जो ढेर सारा दहेज ले कर आए.

अब्बू ने भी खुशबू के रिश्ते के लिए कई जगह कोशिश की थी, लेकिन उन के हालात को देख कर सब ने इनकार कर दिया था. आसपड़ोस और उस के ददिहाल वाले रमजान में हर रोजाइफ्तारी भिजवा कर सवाब कमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

ऐसे ही एक बार ईद पर जब खुशबू के चाचा और बड़े अब्बू 5,000 रुपए फितरा व जकात निकाल कर उस के घर देने पहुंचे थे, तो अम्मी का गुस्सा फट पड़ा था और अम्मी ने जम कर चाचा और बड़े अब्बू को खरीखोटी सुनाई थी और रुपए भी उन के मुंह पर फेंक दिए थे.

अम्मी का गुस्सा देख कर खुशबू के चाचा और बड़े अब्बू चुपचाप वहां से चले गए थे.

खुशबू ने अम्मी को पहली बार इतने गुस्से में देखा था. लेकिन वह जानती थी कि अम्मी को मेहनतमजदूरी करना मंजूर है, लेकिन ऐसी मदद उन को नागवार थी.

ऐसे ही एक दिन जब अब्बू की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी, तब अम्मी ने सब रिश्तेदारों के पास जा कर 500 रुपए उधार मांगे थे, लेकिन किसी के पास से एक रुपया भी नहीं निकला था, जबकि सभी के अच्छेखासे कारोबार चल रहे थे.

तब खुशबू के अब्बू के एक दोस्त रमेश चाचा ने खुद ही घर पहुंच कर अम्मी को रुपए दिए थे और आगे किसी चीज की जरूरत पड़ने पर बेझिझक कहने के लिए बोल कर गए थे.

खुशबू की अम्मी अकसर कहा करती थीं, ‘‘खुशबू के लिए कोई ऐसा लड़का ही मिल जाए, जो मजदूरी करता हो, कम से कम वह दो वक्त की रोटी तो उसे खिला सकेगा.’’

पिछले दिनों महल्ले में ही शहरुद्दीन के एक रिश्तेदार हमीदुल्ला मास्टर आए हुए थे, जो अच्छेखासे पैसे वाले थे. उन का चूडि़यों का थोक का कारोबार था. एक दिन वे महल्ले के लोगों के साथ बैठ कर बातें कर रहे थे.

‘‘मास्टर साहब, और बताइए कि घर के हालचाल कैसे हैं?’’ मोबिन मियां ने मास्टर साहब से पूछा.

‘‘क्या बताएं मोबिन मियां, औरत के बिना घर कोई घर होता है. जब से रजिया का इंतकाल हुआ है, तब से सबकुछ बदल गया है. घर तो जैसे काटने को दौड़ता है,’’ हमीदुल्ला मास्टर मायूस हो कर बोले.

‘‘मास्टर साहब, आप करीम की लड़की खुशबू से निकाह कर लें,’’ वहां बैठे साजिद ने सलाह दी.

‘‘हां, बेचारा करीम बहुत ही गरीब है और फिर वह आएदिन बीमार ही रहता है. एक ही लड़की है, वह भी जवान हो गई है. उस के पास तो देने के लिए कुछ है भी नहीं और फिर बिना दहेज के उस की शादी होने से रही.

‘‘अगर साबिहा भाभी चौकाबरतन न करने जाएं, तो दो वक्त का खाना भी नसीब न हो,’’ मास्टर साहब कुछ बोलते, इस से पहले ही वहां बैठे नबीरुल ने अपनी बात रखी.

‘‘आप का भी घर बस जाएगा और बेचारे करीम और साबिहा के सिर का बो झ भी हट जाएगा,’’ मोबिन मियां ने भी मास्टर साहब से कहा.

‘‘आप लोगों के भी तो लड़के जवान होंगे, आप लोग करीम की बेटी को बहू बना कर क्यों नहीं ले आते?’’ मास्टर साहब धीरे से बोले.

‘‘आप अगर निकाह कर लेंगे, तो बेचारी खुशबू की जिंदगी सुधर जाएगी. बचपन तो गरीबी में कट गया, कम से कम जवानी में तो अच्छा खा और पहन लेगी,’’ नबीरुल ने मास्टर साहब की बात अनसुनी कर उन पर दबाव डालते हुए कहा.

‘‘अच्छा, ठीक है. लेकिन क्या वह लड़की निकाह के लिए राजी हो जाएगी?’’ मास्टर साहब ने सवाल किया. ‘‘अरे, मास्टर साहब, गरीब की लड़की की जबान कहां होती है. बस, आप हां करें, बाकी हम पर छोड़ दें,’’ मोबिन मियां ने कहा.

‘‘चलिए, तो फिर लड़की भी दिखा दीजिए. आए हैं तो रिश्ते की बात भी कर ली जाए,’’ मास्टर साहब बोले.
इस के बाद वे सभी करीम के घर की ओर चल दिए.

‘‘हमीदुल्ला मास्टर तुम्हारी लड़की से निकाह करना चाहते हैं. उन की बीवी का इंतकाल… और रोटीपानी के लिए भी परेशानी होती है, इसलिए वे दोबारा घर बसाना चाहते हैं,’’ करीम के घर पहुंचते ही मोबिन मियां ने कहा.

‘‘आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’ हमीदुल्ला मास्टर ने करीम से पूछा.

‘‘मु झे क्या एतराज हो सकता है. आप चाहें तो आज ही खुशबू से निकाह कर अपने साथ ले जाएं,’’ करीम धीरे से बोला.

‘‘ठीक है, आने वाली 15 तारीख को 8-10 लोगों को ला कर निकाह पढ़वा कर ले जाऊंगा तुम्हारी लड़की को. और हां, इस में जो भी खर्च आएगा, वह मैं आप को घर पहुंचते ही भिजवा दूंगा,’’ हमीदुल्ला मास्टर करीम से बोले.

‘‘मास्टर साहब, आप परेशान न हों. निकाह का सारा इंतजाम मैं करवा दूंगा,’’ मोबिन मियां ने मास्टर साहब से कहा.

‘‘और खाने का इंतजाम मैं कर दूंगा,’’ नबीरुल बोले.

जल्द ही निकाह का दिन भी आ गया. खुशबू अपने अम्मीअब्बू को देख रही थी, जिन के चेहरों पर न खुशी दिखाई दे रही थी और न गम, बस यही लग रहा था कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे थे.

खुशबू दुलहन बनी बैठी थी, लेकिन शादी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा था. सहेलियां भी उस से किसी तरह की छेड़छाड़ या फिर किसी तरह का मजाक करने की हिम्मत नहीं कर रही थीं.

‘‘बरात आ गई,’’ गाडि़यों की आवाज सुन कर खुशबू की एक सहेली नजमा बोली और बाकी सभी सहेलियां बरात देखने के लिए उस के कमरे से बाहर चली गईं.

खुशबू ने एक बार फिर एक नजर आईने पर डाल कर खुद को देखा. वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. लेकिन क्या फायदा ऐसी खूबसूरती का, जो उसे एक अच्छा शौहर न दिला सके.

बाहर 2 गाडि़यां करीम के दरवाजे पर आ कर रुकीं और गाड़ी से शेरवानी पहने हमीदुल्ला मास्टर और 4-5 लोग बाहर आए. उन के साथ मौलाना साहब भी थे, जिन्हें शायद मास्टर साहब निकाह पढ़वाने के लिए लाए थे.

बरात आने की खबर मिलते ही आसपड़ोस की औरतें और बच्चे अपनेअपने घरों से बाहर आ गए. सब को यही उत्सुकता थी कि क्या खुशबू इस निकाह से राजी है भी या नहीं?

‘‘आइए मास्टर साहब, आप लोग उधर चलिए,’’ मोबिन मियां ने सलाम कर मास्टर साहब से एक ओर इशारा करते हुए चलने की गुजारिश की.

‘‘अरे, रुकिए तो मोबिन मियां, अभी दूल्हे मियां और उन के दोस्तों को तो आने दीजिए,’’ मास्टर साहब हंसते हुए बोले.

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं,’’ मोबिन मियां ने हैरानी से मास्टर साहब से पूछा.

मास्टर साहब कुछ बोलते, इस से पहले ही एक और कार वहां आ कर रुकी. कार फूलों से सजी हुई थी और उस में से सेहरा पहने हुए एक नौजवान गाड़ी से बाहर आया और उस के साथ 4 दोस्त और बाहर निकले.

‘‘दूल्हे मियां आ गए. चलिए, मोबिन मियां, अब कहां चलना है?’’ मास्टर साहब हंसते हुए बोले.

‘‘यह सब क्या है?’’ मोबिन मियां ने पूछना चाहा. वहां खड़े बाकी लोग भी हैरान थे कि यह क्या माजरा है.

‘‘यह मेरा बेटा समीर है और मैं अपनी शादी की नहीं, बल्कि अपने बेटे की शादी की बात कर रहा था. आप लोगों को क्या लगा कि इस बुढ़ापे में मैं अपनी शादी करता? मु झे बहू चाहिए थी, जो मेरे परिवार को सही से चला सके. दहेज का न मु झे लालच है और न ही मेरे बेटे को,’’ मास्टर साहब बोले.

उधर नौजवान दूल्हे को देख कर चारों ओर हलचल मच गई थी कि खुशबू का दूल्हा कोई बूढ़ा नहीं, बल्कि एक बांका जवान है.

आसपड़ोस के लोग तो खुश हुए, पर बहुत से दुखी नजर आ रहे थे कि इस गरीब की बेटी की तो किस्मत ही खुल गई, क्योंकि लड़का बड़ा ही हैंडसम था.

जब यह बात खुशबू को पता चली, तो खुशी से उस की आंखों में आंसू आ गए. उस ने देखा कि उस की अम्मी और अब्बू के चेहरे भी खुशी से खिल उठे थे.

Funny Story : भैयाजी का चुनावी कन्फैशन

Funny Story : मेरे मोबाइल फोन पर उन के मैसेज बारबार रहे थे कि मेरा वोट मेरी आवाज है. मैं अपनी आवाज को किसी के पास बिकने दूं. पर दूसरी ओर भैयाजी बराबर कह रहे थे कि रे लल्लू, मेरा वोट केवल और केवल उन की आवाज है. वे मेरी आवाज खरीदने के बाद ही संसद में अपनी आवाज उठाने लायक हो पाएंगे. मैं ने उन के मैसेज को इग्नोर कर इस बार भी मान लिया कि मेरा वोट उन की ही आवाज है.

वैसे दोस्तो, मेरे पास बेचने को अब मेरी आवाज बोले तो मेरा वोट ही बचा है. बाकी तो मेरा सबकुछ बिक चुका है, देश की संपत्तियों की तरह. सो, चुनाव के दिनों में उसे बेच कर कुछ दिन मैं भी हलकीफुलकी मस्ती कर लेता हूं.

अब के फिर चुनाव केड्राई डेको भी मुझे तर रखने वाले भैयाजी को वोट डालने के बाद मैं उन के घर गया उन का धन्यवाद करने. धन्य हों ऐसे भैयाजी, जोड्राई डेको भी अपने वोटरों को ड्राई नहीं रहने देते. उन को तर रखने का इंतजाम वे पहले ही कर देते हैं.

ऐसे भैयाजी जनता को बहुत सत्कर्मों के बाद मिलते हैं. हम ने पिछले जन्म में पता नहीं ऐसे क्या सत्कर्म किए थे, जो इस जन्म में हमें ऐसे ही खानदानी भैयाजी मिले.

भैयाजी केड्राई डेका कर्ज उतारने मैं उन के घर गया, तो वे अंधेरे कमरे में बैठे थे. राजमुजरा या राजमुद्रा में, वे ही जानें. पहले तो मैं ने सोचा कि चुनाव की थकान निकाल रहे होंगे. चुनाव के दिनों में तो जो नेता लोहे का भी हो तो वह भी थकान से चूरचूर हो जाए.

अपने भैयाजी तो ठहरे हाड़मांस के. इतने दिनों तक जागे, नींद आई. सोएसोए भी जागते रहते, जागतेजागते ही सोए रहते. जितना नेता चुनाव के दिनों में दिनरात एक करते हैं, इतना जो कोई साधारण से साधारण जीव स्वर्ग पाने के लिए करे तो उसे मोक्ष प्राप्त करने से कोई रोक पाए.

मैं ने उन के कमरे की दीवारों से आंखकान लगाए, तो भीतर अपने भैयाजी की आवाज सुनाई दी, भैयाजी दिखाई दिए. उन के चारों ओर मच्छर गुनगुना रहे थे. उन्होंने अपने आगे संविधान रखा था और खुद संविधान के आगे घुटने टेके क्षमायाचना की मुद्रा में.

तब पहली बार पता चला कि नेता भी किसी के आगे घुटने टेकते हैं, वरना मैं तो सोचता था कि नेता सभी को अपने आगे घुटने टिकवाते हैं.

भैयाजी हाथ जोड़े संविधान के आगे घुटने टेके कह रहे थे, ‘हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने अपने मौसेरे भाइयों को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख होती, तो मैं अपने मौसेरे भाइयों को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

चुनाव के दिनों में जो मैं ने दिवंगत नेताओं को भलाबुरा कहा, मैं तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए उन से माफी मांगता हूं. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख होती, तो मैं अपने दिवंगत नेताओं को जो मैं ने इस चुनाव में कहा, कभी कहता. इस अपराध के लिए वे मुझे माफ करें.

हे संविधान, चुनाव के दिनों में जो मैं ने जनता को लुभाने, रिझाने पटाने के लिए उन को झूठे आश्वासन दिए, तुम्हें साक्षी मान कर उस के लिए मैं दिल की गहराइयों से जनता से माफी मांगता हूं. ये मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. जो रोटी के बदले मुझे कुरसी की भूख होती, तो मैं भोलीभाली जनता को जो मैं ने इस चुनाव में झाठी गारंटियां दीं, कभी देता. इस अपराध के लिए झूठे आश्वासन हेतु मुझे माफ करें.

हे संविधान, झू बोलना हर पार्टी के, हर किस्म के नेता के अधिकार क्षेत्र में आता है. जनता से झू बोलना उस का मौलिक अधिकार है. जनता को छलना, दलना उस का पहला फर्ज है. पर चुनाव के दिनों में स्वयंमेव हर नेता को झू बोलने का विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता है.

इस महापर्व में नेता के हजार झू भी माफी लायक होते हैं. दरअसल, इन दिनों उसे खुद पता नहीं होता कि वह जो बोल रहा है, क्या बोल रहा है. चुनाव के दिनों में जो मन में आए, बोलना उस का धर्म होता है, क्योंकि इन दिनों वह केवल और केवल अपने प्रचारी धर्म का पालन कर रहा होता है. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के मेरा झू मुझे माफ करे.

हे संविधान, तुम मुझे समाज में जातिगत, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रदूषण को फैलाने के दोष से दोषमुक्त करना.

मैं मानता हूं कि प्रदूषणों में सब से खतरनाक प्रदूषण जातिगत प्रदूषण होता है. पर क्या करूं, इन प्रदूषणों को समाज में फैलाने पर ही कोई अच्छा नेता बन पाता है.

समाज में जातिगत, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाए बिना स्वस्थ राजनीति हो ही नहीं सकती. यह मेरी नहीं, कुरसी की मांग थी. इस अपराध के लिए जाति, धर्म मुझे माफ करे.

हे संविधानहे संविधान…’  

Family Story : नरगिस

लेखक – मनोज शर्मा, Family Story : घर की दहलीज पर चांदनी हाथ बांधे खड़ी थी. सामने आतेजाते लोगों में अपनी शाम ढूंढ़ रही थी. कोई दूर से देख लेता तो एक पल के लिए दिल मचल जाता, पर उसे वापस लौटते देखते ही सारी उम्मीदें टूट जातीं.

लौकडाउन से पहले ही आखिरी बार कोई आया था शायद…वह बंगाली, जिस के पास पूरे पैसे तक नहीं थे, फिर अगली बार रुपए देने का वादा कर के सिर्फ 50 का नोट ही थमा गया था.

उस रोज ही नहीं, बल्कि उस से पहले से ही लगने लगा था कि अब इस धंधे में भी चांदनी जैसी अधेड़ औरतों के लिए कुछ नहीं रखा, पर उम्र के इस पड़ाव पर कहां जाएं? उम्र का एकतिहाई हिस्सा तो यहीं निकल गया. सारी जवानी, सारे सपने इसी धंधे में खाक हो चुके हैं. अब तो यही नरक उस का घर है.

कभी जब चांदनी कुछ खूबसूरत थी, सबकुछ जन्नत लगता था. हर कोई उस की गदराई जवानी पर मचल जाता था. पैसे की चाह में सब की रात रंगीन करना कितना अच्छा लगता था.

पर, अब तो जिंदगी जहन्नुम बन चुकी है. लौकडाउन में पहले कुछ दिन बीते, फिर हफ्ते और अब तो महीने. यहां कई दिनों से फांके हैं. कैसे जी रही है, चांदनी खुद ही जानती है. सरकार कुछ नहीं करती इस के लिए. न अनाज का दाना है अब और न ही फूटी कौड़ी. कोई फटकता तक नहीं है अब.

जब चांदनी नईनई आई थी, तब बात ही अलग थी. 12 साल पहले, पर ठीक से याद नहीं. वे भी क्या दिन थे, जब दर्जनों ड्रैस और हर ड्रैस एक से बढ़ कर एक फूलों से सजी. कभी गुलाबी, कभी सुनहरी और कभी लाल. कभी रेशमी साड़ी या मखमली लाल चमकीला गाउन.

रोजरोज भोजन में 3 किस्म की तरकारी, ताजा मांस, बासमती पुलाव, पूरीनान. क्या स्वाद था, क्या खुश थी. घर पर पैसा पहुंचता था, तो वहां भी चांदनी की तूती बोलती थी. नएनए कपड़े, साजोसामान के क्या कहने थे. बस राजकुमारी सी फीलिंग रहती थी.

हर ग्राहक की पहली पसंद उन दिनों चांदनी ही थी और दाम भी मनचाहा. जितना मांगो उतना ही. और कई बार तो डबल भी. हर शिफ्ट में लोग उस का ही साथ मांगते थे. सोने तक नहीं देते थे रातभर. और वह बूढ़ा तो सबकुछ नोच डालता था और फिर निढाल हो कर पड़ जाता था. वे कालेज के लड़के तो शनिवार की शाम ही आते थे, पर मौका पाते ही चिपट जाते थे. हां, पर एक बात तो थी, अगर शरीर चाटते थे तो पैसा भी मिलता था और फिर कुछ घंटों में ही हजारों रुपए.

आज देह भी काम की नहीं रही और एक धेला तक साथ में नहीं. शक्ल ही बदल गई, जैसे कोई पहचानता ही न हो. बूढ़ा बंगाली या गुटका खाता वह ट्रक ड्राइवर या 2-4 और उसी किस्म के लोग, बस वही दोचार दिनों में. सब मुफ्तखोर हैं. मुफ्त में सब चाहते हैं. अब यहां कुछ भी नहीं बचा. यह तो जिंदगी का उसूल है कि जब तक किसी से कोई गर्ज हो, फायदा हो, तभी तक उस से वास्ता रखते हैं, वरना किसी की क्या जरूरत.

अब तो कालेज के छोकरे चांदनी की सूरत देखते ही फूहड़ता से हंसने लगते हैं, पास आना तो दूर रहा. 100-50 में भी शायद अब कोई इस शरीर को सूंघे. आंखें यह सब सोचते हुए धरती में गढ़ गईं. चांदनी रेलिंग पर हथेली टिकाए सुनसान सड़क को देखती रहती है.

कितना बड़ा घर था, पर अब समय के साथसाथ इसे छोटा और अलहदा छोड़ दिया गया है. कभी यह बीच में होता था. जब सारी आंखें चांदनी को हरपल खोजती थीं, पर अब इसे काट कर या मरम्मत कर एक ओर कर दिया है, ताकि चांदनी जवान और पैसे वाले ग्राहकों के सामने न आ सके, शायद ही कभीकभार कोई आंखें इस ओर घूरती हैं.

और फिर गलती से यहां कोई पहुंच भी जाता है तो आधे पैसे तो दलाल ले जाता है. वह मुच्छड़ वरदी वाला या वह टकला वकील और छोटेमोटे व्यवसायी या दूरदराज से आए नौकरीपेशा लोग ही यहां आते हैं. इस शरीर की इतनी कम कीमत, यह सोच कर ही मन सहम जाता है.

टैलीविजन का स्विच औन करते हुए चांदनी खिड़की से बाहर सुनसान सड़क पर देखती है. 2-1 पियक्कड़ इस ओर घूर रहे हैं. जाने कभी आए हों यहां किसी रोज. अब तो याद भी नहीं.

आज चांदनी का उदास चेहरा और अलसाई सी आंखें उन्हें खींचने में पूरी तरह नाकाम हैं. शायद भूखा पेट किसी की हवस को पूरा करने में अब नाकाम है और शरीर का गोश्त भी ढल चुका है.

चांदनी ने चैनल बदलतेबदलते किसी न्यूज चैनल पर टीवी पर कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखा. मर्तबान से मुट्ठीभर चने निकाल कर धीरेधीरे चबाने लगी. कुछ ही देर में टैलीविजन बंद कर के वह पलंग पर लेट गई. उस की खुली आंखें छत पर घूमतेरेंगते पंखे की ओर कुछ देर देखती रहीं और फिर वह गहरी नींद में खो गई.

सुबह कमरे के बाहर से चौधरी के चीखने की सी आवाज सुनाई पड़ी. रात की चुप्पी कहीं खो गई और सुबह का शोर चल पड़ा.

जाने क्यों लगा, सींखचों से कोई कमरे में झांक रहा है. आवाज बढ़ने लगी और गहराती गई.

‘‘3 महीने हो गए भाड़ा दिए हुए…’’ चौधरी के स्वर कानों में पड़ने लगे, ‘‘तुम्हारे बाप का घर है? मुझे शाम तक भाड़ा चाहिए, कैसे भी दो.’’

वही पुरानी तसवीर, जो 10-12 बजे के आसपास 2-3 महीनों में अकसर उभरती है.

चांदनी ने सींखचों से झांक कर देखा चौधरी का रौद्र रूप. लंबातगड़ा गंजा आदमी, सफेद कमीज पर तहमद बांधे मूंछों पर ताव देता गुस्से में चीख रहा था. वह बारीबारी से हर बंद कमरे की ओर देख कर दांत पीसता और आंखें तरेरता.

उस के सामने कुरसी रख दी गई, पर वह खड़ा ही खड़ा सब को आतंकित करता रहा.

‘‘अरे चौधरी साहब, बैठ भी जाइए अब,’’ अमीना बानो ने कुरसी पर बैठने के लिए दोबारा इशारा किया.

एक बनावटी हंसी लिए अमीना कितने ही दिनों से चौधरी को फुसला रही है, ‘‘अच्छा बताइए, आप चाय लेंगे या कुछ और?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, केवल भाड़ा चाहिए.’’

8-9 साल की लड़की के कंधे को मसलते हुए अमीना ने चौधरी के लिए चाय बनवा कर लाने को बोला.

‘‘नहींनहीं, मैं यहां चाय पीने नहीं आया हूं. अपना भाड़ा लेने आया हूं.’’

छोटी लड़की झगड़ा देखते हुए तीसरे कमरे में घुस जाती है.

उसी कमरे के बाहर झड़ते पलस्तर की ओर देखते हुए चौधरी ने कहा, ‘‘घर को कबाड़खाना बना कर रख दिया है अमीना तुम लोगों ने… न साफसफाई, न लिपाईपुताई. देखो, हर तरफ बस कूड़ाकरकट और जर्जर होती दीवारें. सोचा था कि इस बार इस घर की मरम्मत करा दूंगा, पर यहां तो भाड़ा तक नहीं मिलता कभी टाइम से.

‘‘मैं 10 तारीख को फिर आऊंगा. मुझे भाड़ा चाहिए जैसे भी दो. घर से पैसा मंगवाओ या कहीं और से, मुझे
नहीं मालूम.’’

‘‘अरे चौधरी साहब, इन दिनों कोई नहीं आता यहां,’’ दूसरी कुरसी करीब सरका कर चौधरी को समझाने की कोशिश करते हुए अमीना ने कहा.

‘‘आप का भाड़ा क्यों नहीं देंगे… हाथ जोड़ कर देंगे. बहुत जल्दी सब ठीक हो जाएगा, टैंशन न लो आप. आप के चलते ही तो हम सब हैं यहां, वरना इस धरती पर हमारा कोई वजूद कहां.’’

सामने एक कमरे से एक जवान होती लड़की उठी. दरवाजा खोल कर अमीना के पास आई और ऊंघने लगी, ‘‘अम्मां क्या हुआ? कौन है ये बाबू? क्या कह रहे हैं?’’

इतना कह कर चौधरी की तरफ देख कर वह जबान पर जीभ फिरा कर हंसने लगी. उस लड़की की शक्लोसूरत पर अजीब सी मासूमियत है, पर उस की छाती पूरी भरी है, जिस पर इस अल्हड़ लड़की को खास गुमान है. उस के बदन पर एक टाइट मैक्सी है.

चेहरे पर गिरी जुल्फें उसे और खूबसूरत बना रही हैं. चौधरी की नजरें अमीना से हट कर उस ओर चली गईं और रहरह कर उस के गदराए बदन पर टिक जाती हैं.

अमीना की तरफ देखते हुए चौधरी बोला, ‘‘कौन है यह? नई आई है क्या? पहले तो इसे कभी नहीं देखा?’’

लड़की अपनी उंगलियों से बालों की लटों के गोले बनाती रही.

‘‘हां, यह कुछ दिन पहले ही यहां आई है. मुस्तफाबाद की जान है. अभी 17 की होगी, शायद दिसंबर में.’’

‘‘क्या नाम है तेरा?’’ लड़की को देखते हुए चौधरी बोला.

लड़की चुप रही, पर मुसकराती रही.

अमीना ने लड़की की कमर सहलाते हुए कहा, ‘‘बेटी, नाम बताओ अपना. ये चौधरी साहब हैं अपने. यह पूरा घर इन्हीं का है.’’

चौधरी किसी रसूखदार आदमी की तरह अपने गालों पर उंगली फिराने लगा.

लड़की गौर से देखती रही, कभी अमीना को तो कभी चौधरी को.

‘‘नरगिस है यह. नमस्ते तो करो साहब को.’’

लड़की हंसते हुए दोनों हथेलियां जोड़ कर सीने तक ले आई, पर चौधरी की आंखें अभी भी नरगिस के सीने पर थीं.

‘‘ओह नरगिस, कितना अच्छा नाम है,’’ एक भौंड़ी मुसकराहट लिए चौधरी बोला.

नरगिस अपनी तारीफ सुन कर चहकने लगी और अमीना की एक बांह पर लहर गई.

घड़ी में समय देखते हुए चौधरी कुछ सोचते हुए कुरसी से उठा. पहले इधरउधर देखा, पर जल्दी ही लौटने की बात कहता हुआ देहरी की ओर बढ़ने लगा.

अमीना ने कहा, ‘‘चाय की एक प्याली तो ले ही लेते?’’

मुंह पर मास्क लगाते हुए चौधरी ने नरगिस को भी मास्क लगाने की सलाह दी, ‘‘फिर आऊंगा. सब अपना खयाल रखना.’’

नरगिस के सीने पर नजर रखता और जबान पर होंठ फिराता हुआ चौधरी चला गया.

एकएक कर के कमरों की सांकलें खुलने लगीं. भूखेअलसाए चेहरे, जो अभी तक कमरों में बंद थे, बाहर दालान में इकट्ठा हो गए मानो किसी खास बात पर जिरह करनी हो.

‘‘कौन था? चौधरी?’’ एक अधेड़ उम्र की धंधे वाली ने अमीना से पूछा.

‘‘हां, चौधरी ही लग रहा था,’’ दूसरी ने बेमन से कहा.

‘‘और क्या हुआ तेरे सेठ का? कल भी नहीं आया क्या?’’ रोशनी की तरफ देखते हुए एक ने पूछा.

‘‘नहीं. लौकडाउन है न. फोन पर ही मजा लेता रहा, पर मैं ने भी पेटीएम से 500 रुपए झाड़ ही लिए.’’

‘‘अरे, यहां तो कोई ऐसा भी नहीं,’’ एक बोली और फिर वे एकदूसरे को देखते हुए बतियाने लगीं.

‘‘जैसे भी हो, अपनेअपने ग्राहकों को बुलाओ, नहीं तो चौधरी यहां से निकाल देगा,’’ अमीना ने नेता भाव से सब को इकट्ठा कर के कहा.

‘‘3 महीने हो गए हैं, एक धेला तक नहीं दे पाए उन को. वह महारानी कहां है? उसे यह सब दिखता नहीं क्या?’’ चांदनी के कमरे की तरफ देख कर अमीना ने आवाज दी, ‘‘चांदनी, ओ चांदनी.’’

चांदनी जैसे सपने से जाग गई हो.

एक बार तो दिल ने चाहा कि सांकल खोल कर सब की जबान पर लगाम लगा दे कि एक वक्त था, जब सारे उस की आमदनी पर जीते थे, पर आज मुश्किल घड़ी में ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं और यह चौधरी जब मूड करता था आ जाता था मुंह मारने, पर देखो तो आज कैसे सुर बदल गए हैं इस मरदूद के.

बाहर दालान में कुछ देर की बहस हुई. सब एकदूसरे को देखती रहीं, पर नतीजा कुछ नहीं निकला. सब को लगा कि अब नए सिरे से शुरुआत करनी होगी.

सुरैया पास ही खड़ी थी. चांदनी की रोंआसी सूरत देख और करीब आ गई. उस की ठुड्डी को सहलाते हुए बोली, ‘‘चांदनी दीदी, सब ठीक हो जाएगा.’’

सब अपनेअपने कमरे में लौट गईं. सुरैया न केवल शक्लोसूरत से खूबसूरत थी, बल्कि अच्छा गाती भी थी.

लौकडाउन से पहले सब से ज्यादा ग्राहक इसी के होते थे. कुछ तो केवल गायकी के फन को तराशने आते थे और 2-1 ने तो गाने के लिए बुलावा भी भेजा. जिस्म तो यहां सभी बेचती हैं, पर उस के सुर की बात ही अलग है. अगर वह यहां न आती और गायकी पर फोकस रखती तो जरूर ही नाम कमाती.

वह खाकी वरदी वाला रोज नई उम्मीद की किरण दे कर मुफ्त में सुरैया को नोच जाता है. बेचारी पढ़ीलिखी है. 10वीं तक स्कूल गई है, पर यहां आ कर सब एकसमान हो जाते हैं. आई तो यहां बाप के साथ कुछ बनने, पर इस खाकी वरदी वाले ने झूंठा झांसा दे कर इस धंधे में उतार दिया. अब खुद तो आता है 2-4 और भी आ जाते हैं. सुरैया न सही, मेरे जैसी अधेड़ ही मिल जाए.

सुरैया चांदनी का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई.

‘‘क्या हुआ? रो क्यों रही हो?’’ सुरैया ने चांदनी के बालों में उंगलियां फिराते हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं बस ऐसे ही. परसों देर रात तक तुम्हारे कमरे से आवाजें आ रही थीं,’’ चांदनी ने सुरैया से पूछा.

‘‘कब? अच्छा, परसों? वही वरदी वाला आया था. 3 और भी थे. मुंह पर मास्क बांधे थे. मैं ने जब पूछा कि दारोगा साहब कुछ बात बनी, मेरे गाने की तो वह हंसने लगा और मेरे सीने को छूने लगा. मैं ने उस से कुछ पैसे मांगे तो गाली देने लगा, पर एक धेला तक नहीं दिया…

‘‘उस का मुंह सूखे पान से भरा था. बीड़ी की राख फेंकते हुए बोला, ‘रानी, हो जाएगा सब. देखती नहीं कि अभी सब बंद है.’

‘‘और पीछे से उस ने आगोश में भर लिया. मैं ने कहा कि अच्छा दारोगा साहब थोड़े पैसे ही दे दो?’’

यह सुन कर उस का सारा नशा जाता रहा और गालीगलौज करने लगा.

‘‘चांदनी दीदी, आप ही बताओ कि अब कैसे चलेगा? सब मुफ्त में मजा चाहते हैं. कुत्ते कहीं के.’’

सुरैया बोलती रही, चांदनी सब ध्यान से सुनती रही.

‘‘पर, अब चारा भी क्या है. जब पेट की प्यास बुझाने को पैसा नहीं तो कोई क्या देह को दिखाए. वह रातभर के लिए अपने कमरे पर ले जाना चाहता था. बोलता था, ‘मेरी रानी, ऐश करवा दूंगा, चल तो बस एक बार.’

‘‘जब मैं ने मना किया तो मुझे घसीटने लगा. अमीना मैम ने समझाबुझा कर उसे चलता किया.’’

‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं मुझे?’’ चांदनी बोली.

‘‘चांदनी दीदी, अब क्या किसी को तंग करूं. तुम्हें मैं अपना मानती हूं, फिर यह सब देख कर तुम और ज्यादा दुखी होगी.’’

सुरैया की रोती आंखें चांदनी को देखती रहीं, कुछ देर तक वे दोनों चुप रहीं.

‘‘सुरैया एक काम करोगी मेरे लिए?’’

‘‘हांहां, कहो न?’’

‘‘नरगिस… जो अभी नई लड़की आई है न…’’

‘‘हां…’’

‘‘उसे यहां से कहीं दूर भेज दो, जहां वह जिस्मबाजारी न कर सके.’’

‘‘अभी तो वह बच्ची है. मैं उस में अपनी सूरत देखती हूं. इस जुम्मेरात जब अमीना बाई 1-2 घंटे के लिए बाहर जाए, तब किसी भी तरह उसे वापस भिजवा दो. तुम्हारा एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी या तुम 500-600 रुपए का इंतजाम कर दो, मैं ही उसे घर छोड़ आऊंगी सुरैया.’’

‘‘अरे दीदी, अभी सब बंद है. तुम कैसे जाओगी? और उस लड़की को भी तो समझाना होगा. वह तो अभी नासमझ है. देह ही निखरी है अभी, दिमाग से तो नादान ही है?’’

‘‘मैं जानती हूं, पर मौका पाते ही उसे भी समझा दिया जाएगा. वह चौधरी ही कहीं 1-2 दिन में… उस की नजर ही गंदी है. अब तो उस का वह छोकरा भी…’’

‘‘नहींनहीं दीदी, ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘सुनो, एक बात बताऊं. यहां पास ही कालेज है. उस में पढ़ने वाला एक शरीफ लड़का है. उस से फोन पर बात करती हूं. वह कोई पढ़ाई कर रहा है धंधे वाली औरतों की जिंदगी पर. शायद, वह कुछ मदद कर दे.

‘‘जैसे भी हो, हम सब तो यहां बरबाद हो गईं अब और किसी नई को यहां न खराब होने दें.’’

‘‘ठीक है दीदी. आज दोपहर जब सब सोए होंगे, तब बात करते हैं. अच्छा, मैं भी अब चलती हूं. तुम से बतिया कर सच में सुकून पाती हूं. बहुत उम्मीद है तुम से.’’

‘‘अरे दीदी, ये बिसकुट तो खाती जाओ.’’

‘‘नहींनहीं, बस.’’

कमरे में लौट कर मानो चांदनी सब भूल गई. काम हो जाए. हमारा तो अब कोई नहीं हो सकता, पर उस की तो पूरी जिंदगी बन जाएगी. वह लड़का जरूर कुछ करेगा.

आज ही उस लड़के का फोन भी आना है. मेरी जिंदगी पर कुछ लिख रहा है वह. हां, रिसर्च कर रहा है. ये लोग काफी पढ़ेलिखे हैं, जरूर हमारी कुछ न कुछ मदद करेंगे.

चांदनी का दिल कहता है कि वह लड़का नरगिस के लिए कुछ करेगा. क्या नाम था उस का…?

जो भी हो, इस जहन्नुम भरी जिंदगी से इस लड़की को भेजना ही पहला काम होगा. सरकार और ग्राहकों के भरोसे भी कब तक बैठे रह सकते हैं. कोई किसी का नहीं इस नरक में.

अभी लौट गई तो कोई अपना भी लेगा. नहीं तो यह भी दूसरी धंधे वालियों जैसी हो जाएगी. जरूर कुछ होगा. अच्छा होगा, यकीनन.

3 महीने बाद…

‘‘ओह, कितना अच्छा लग रहा है आज 3 महीने बाद. नरगिस कैसी होगी? सुरैया, बात हुई कोई?’’

‘‘हां दीदी, कल रात हुई थी,’’ सुरैया चहकते हुए बोली.

चांदनी जैसे खुशी से झूम गई.

‘‘यह नया सूट कब लाई सुरैया? पहले तो कभी न देखा इस में.’’

‘‘दीदी, यह सूट उस पढ़ने वाले साहब ने दिया है. बहुत अच्छे हैं ये पढ़ने वाले लोग. हमारे जज्बात समझते हैं. कभी छुआ तक नहीं, पर हरमुमकिन मदद देते हैं. आप की बहुत तारीफ करता है वह.’’

‘‘कौन सा…?’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने नरगिस को यहां से उस के घर तक भिजवाया था. और न केवल भिजवाया था, बल्कि उस के घर वालों को अच्छे से समझाया भी था.’’

‘‘अच्छा…’’

‘‘हां, दीदी…’’

‘‘एक बात कहूं?’’

‘‘कहो न…’’

‘‘वे प्रोफैसर बन जाएंगे, कालेज में जल्दी ही.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘हां, वे बोलते हैं कि मेरे साथ घर बसाएंगे.’’

‘‘अरे वाह सुरैया, तेरा सपना अब पूरा हो जाएगा.’’

‘‘दीदी आप बहुत अच्छी हो, सब तुम्हारी बदौलत ही मुमकिन हुआ है. तुम सच में महान हो.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मैं इस लायक कहां.’’

‘‘दीदी, अगर उन की किताब छप गई न, तो वे तुम्हें भी तुम्हारे घर पर भिजवा देगा.’’

‘‘अरे नहीं सुरैया, मेरा तो यही है सब स्वर्ग या नरक.’’

इस के बाद वे दोनों चहकते हुए घंटों तक बतियाती रहीं.

Short Story : मोम की गुड़िया

Short Story : जिंदगी में सबकुछ तयशुदा नहीं होता. कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है, जिस की आप ने ख्वाब में भी उम्मीद नहीं की होती है. हालांकि अब मैं उस बुरे ख्वाब से जाग गई हूं. राशिद ने मेरी तकदीर को बदलना चाहा था. मु झे मोम की गुडि़या समझ कर अपने सांचे में ढालना चाहा था.

यों तो राशिद मेरी जिंदगी में दबे पैर चला आया था. वह मेरी बड़ी खाला का बेटा था. पहली बार वह तरहतरह के सांचे में ढली मोमबत्तियां ले कर आया था और एक दिन मु झ से कहा था, ‘‘इनसान को मोम की तरह होना चाहिए. वक्त जब जिस सांचे में ढालना चाहे, इनसान को उसी आकार में ढल जाना चाहिए.’’

राशिद का मोमबत्ती बनाने का बहुत पुराना कारोबार था. हमारे शहर में भी राशिद की बनाई मोमबत्तियों की काफी मांग बढ़ गई थी. अब वह दिल्ली से कुछ नए सांचे ले कर आया, तो हमारे ही घर पर रुका.

राशिद ने मेरे सामने मोम पिघला कर सांचे से मोमबत्तियां बनाईं. तब मु झे भी अपना वजूद मोम की तरह पिघला महसूस हुआ. मैं सोचने लगी, ‘काश, मु झे भी कोई पसंदीदा सांचा मिल जाता, जिस में मैं मनमुताबिक ढल जाती.’

एक दिन तपती दोपहर में राशिद ने मेरे दोनों बाजुओं को अपने हाथों से ऐसे जकड़ लिया मानो मैं मोम हूं और वह जैसे चाहेगा, मुझे सांचे में ढाल देगा.

राशिद बड़ी मासूमियत भरे अंदाज में फुसफुसाया, ‘‘मैं तुम से बेहद मुहब्बत करता हूं.’’

वह मेरे जवाब के इंतजार में था और मैं सोच में पड़ गई. उस ने फिर फुसफुसाना शुरू किया, ‘‘जेबा, तुम्हारे बगैर सुबह सूनी, दोपहर वीरान और शाम उदास नजर आती है.’’

मैं इतना सुनते ही न जाने क्यों बेतहाशा हंसने लगी और हंसतेहंसते मेरी आंखें भर आईं. राशिद हैरान सा मेरी ओर देखने लगा.

मैं ने अपनी बांहें छुड़ा कर राशिद से कहा, ‘‘मर्द की फितरत अजीब होती है. जब तक वह किसी चीज को पा नहीं लेता, उस पर जान छिड़कता है. मगर उसे पा लेने के बाद वह उसे भूल जाता है. मर्द हमेशा उस पहाड़ की चोटी पर चढ़ना चाहता है, जिसे अभी तक किसी ने छुआ न हो, मगर चोटी पर चढ़ने के बाद वह आगे बढ़ जाता है दूसरी अजेय पहाड़ की चोटी को जीतने के लिए.’’

राशिद न तो स्कूली तालीम ज्यादा ले पाया था और न ही जिंदगी की पाठशाला में होनहार था, जबकि मैं जिंदगी की पाठशाला में काफीकुछ सीख चुकी थी.

मर्द के सामने पूरी तरह खुल जाना औरत की बेवकूफी होती है. उसे हमेशा राज का परदा सा बनाए रखना चाहिए. ऐसी औरत मर्द को ज्यादा अपनी तरफ खींचती है. यह बात जिंदगी की पाठशाला में मैं सीख चुकी थी.

2 साल पहले मैं 12वीं जमात पास करने के बाद घर बैठ गई थी. मेरा आगे पढ़ने का मन ही नहीं हुआ. दुनिया बेरौनक सी लगती थी. कहीं किसी काम में मन नहीं लगता था. जी चाहता था कि दुनिया से छिप कर किसी अंधेरी कोठरी में बैठ जाऊं, जहां मु झे कोई देख न पाए.

फिर पता नहीं क्यों मेरे दिल ने एक करवट सी ली. मैं ने एक दिन अम्मी से आगे पढ़ने की बात की. वे खुश हो गईं. औरत ही औरत के दर्द को पहचान पाती है. वे चाहती थीं कि मैं पढ़ने में मन लगाऊं और खुश रहूं. मैं भी अब खुशीखुशी स्कूल से कालेज में पहुंची. बीएससी में जीव विज्ञान मेरा पसंदीदा विषय रहा. इनसान के भीतर देखने की चाह ने इस विषय में मेरी और दिलचस्पी पैदा कर दी थी. अब विषय के साथसाथ और भी बहुतकुछ बदल गया था.

जमात बढ़ने के साथसाथ स्टूडैंट में भी काफीकुछ बढ़ोतरी हो जाती है. दिमाग के जाले साफ हो जाते हैं. पुराने दोस्त काफी पीछे रह जाते हैं. नया माहौल, नए दोस्त हवा में नई खुशबू सी घोल देते हैं.

एक दिन मैं बायोलौजी का प्रैक्टिकल कर के घर पहुंची, तो घर में कुछ ज्यादा ही चहलपहल नजर आई. बड़ी खाला, खालू और राशिद घर पर दिखाई दिए. खाला, खालू को सलाम कर मैं अंदर अपने कमरे में चली गई.

रात का खाना खाने के वक्त मैं ने एक बात नोट की कि राशिद मु झे एक अलग तरह की मुसकान से देख रहा था.

खाना खाने के बाद मौका मिलने पर राशिद मेरे पास आया और बोला, ‘‘जेबा, अब वक्त आ गया है तुम्हें मेरे सांचे में ढलना होगा. तुम्हें तो मालूम है कि मेरे पास कितने सांचे हैं. मैं जब जिस सांचे में चाहूं, मोम पिघला कर नई शक्ल दे देता हूं.’’

मैं राशिद की सोच से काफी आगे बढ़ चुकी थी. उसे जवाब देना मैं ने मुनासिब नहीं सम झा.

सुबह कालेज जाते वक्त अम्मी मेरे पास आईं. कुछ देर तक वे मु झे देखती रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ‘‘जेबा, बाजी तेरा रिश्ता मांगने आई हैं. तेरे अब्बा तो खामोश हैं, तू ही कि बता क्या जवाब दूं?’’

मैं ने अम्मी की तरफ देखा. वे अजीब से हालात में थीं. एक तरफ उन की बहन थी, तो वहीं दूसरी तरफ बेटी.

मैं ने अब अपनी जबान खोलना वक्त का तकाजा सम झा. मैं ने कहा, ‘‘अम्मी, अब वक्त काफी आगे बढ़ चुका है और ये लोग पुराने वक्त पर ही ठहरे हुए हैं. आप खुद बताइए कि क्या राशिद मेरे लायक है? वैसे भी मु झे आगे पढ़ना है, काफी आगे जाना है. मेरे अपने सपने हैं, जो मु झे पूरे करने हैं.

‘‘मैं पिंजरे में बंद मजबूर बेसहारा पक्षी की तरह नहीं हूं, जिस का कोई भी मोलभाव कर ले. मैं खुले आसमान में उड़ने वाला वह पक्षी हूं, जो अपनी मंजिल खुद तय करता है.’’

मेरे इनकार के बाद मुझ पर मेरे ही घर में राशिद ने तेजाब का एक भरा हुआ मग फेंका था. वह तो मैं समय पर पलट गई थी और सारा तेजाब मेरी पीठ और हाथ पर ही गिर सका था.

घर में कुहराम मच गया था. अब्बा घर पर नहीं थे. अम्मी ही फौरन मुझे अस्पताल ले गई थीं. एक महीने के इलाज के बाद मैं बेहतर हो सकी थी. मैं अपने विचारों में, इरादों में पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई थी.

राशिद को तो उस के किए की सजा मिली ही, मगर मैं ने भी अपनी जीने की इच्छा को जिंदा रखा और आज एक कामयाब टीचर के तौर पर अपने पैरों पर खड़ी हूं.

Hindi Kahani: औलाद की खातिर- कजरी को किसने दिया यह सुख

Hindi Kahani: पहली मुलाकात में ही प्रदेश के जेल मंत्री जयप्रकाश यादव बाबा सुखानंद के पांचसितारा होटल जैसे आलीशान आश्रम में जब कजरी से मिले, तो उन की लार टपकने लगी.

मंत्रीजी बाबा सुखानंद से बोल पड़े, ‘‘वाह बाबाजी, वाह, आज आप ने मेरे लिए क्या बुलबुल परोसी है. बिलकुल संगमरमर जैसी चमक रही है. यह तो रस भरी मदमस्त जवानी की मालकिन है.’’

बाबाजी ठहाका लगा कर बोले, ‘‘मंत्रीजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे आश्रम के बगल में एक पुराना मंदिर है. यहां हर साल मेला लगता है. इस मेले के बंदोबस्त के लिए शहर के तमाम आला अफसर मेरी इस कुटिया में पहले आ कर मु  झ से बातचीत कर के काम को आगे बढ़ाते हैं. तमाम फोर्स लगाने के बाद ही मेला शुरू होता है.

‘‘मेरे ऊपर पिछले चुनाव में हमला हो चुका है, लेकिन मैं उस हमले में बालबाल बच गया था. इस बार विपक्षी पार्टी के लोग अगर मेरे ऊपर हमला करते हैं, तो मेरे गुरगे उन को वहीं ढेर कर देंगे, क्योंकि इस बार हम ने भी पूरी तैयारी कर ली है. आप ठहरे जेल मंत्री, तो जेलर आप की मुट्ठी में है…

‘‘अब आप जाइए, कजरी आप का इंतजार कर रही है… रात के 11 भी बज चुके हैं.’’

‘‘ठीक है स्वामीजी, मुझे भी सुबह जल्दी जाना है,’’ कहते हुए मंत्रीजी वहां से कजरी के कमरे में चले गए.

कजरी को बांहों में भरते हुए जेल मंत्री बोले, ‘‘तुम तो बहुत लाजवाब चीज हो. मैं अकसर इस आश्रम में आ कर इस कमरे में शराब और शबाब का मजा लेता रहा हूं, लेकिन अब तक तुम जैसी कोई नहीं मिली…’’

कजरी भी मटकते हुए बोली, ‘‘क्या करूं मंत्रीजी, मेरा पति ही नकारा है. दिनभर सेठ के यहां काम करतेकरते थक जाता है और रातभर मैं जल बिन मछली की तरह करवटें बदल कर प्यासी ही तड़पती रहती हूं.

‘‘शादी के 4 साल बाद भी मुझे कोई बच्चा नहीं हुआ. लेकिन हां, मेरा पति कभीकभार ही हलकीफुलकी मर्दानगी दिखा पाता है.’’

‘‘कोई बात नहीं कजरी… तुम्हारे पास मोबाइल फोन है न? नहीं है, तो मैं दुकान से मंगवा देता हूं,’’ मंत्रीजी ने कहा.

‘‘हां, है न मेरे पास मोबाइल फोन. आजकल मोबाइल का जमाना है. जब बाबाजी को जरूरत पड़ती है, तो वे मु  झे मोबाइल से फोन कर के बुला लेते हैं,’’ कजरी ने कहा.

‘‘बाबा को मैं भी सवेरे फोन पर बोल देती हूं कि आज पति की नाइट ड्यूटी है. जरूरत पड़े तो याद कीजिएगा.

‘‘शाम को घूमने के बहाने मैं अपनी सहेली रमिया के साथ यहां आ जाती हूं. इस आश्रम में शाम को बहुत लोग आते हैं.’’

‘‘यह रमिया कौन है?’’ मंत्रीजी ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘वह इस समय दूसरे कमरे में बाबाजी के साथ मौजमस्ती कर रही होगी. वह यहां पर साफसफाई का काम करती है,’’ कजरी अपने कपड़े उतारते हुए बोली.

कजरी की पीठ पर हाथ फेरते हुए मंत्रीजी बोले, ‘‘कजरी, तुम कहां की रहने वाली हो?’’

‘‘मेरा घर तो जौनपुर में है. यहां इलाहाबाद में मेरा पति एक सेठ के यहां काम करता है. शादी होने के एक साल बाद ही मेरा पति मुझे यहां ले आया था. घर पर बूढ़े सासससुर, जेठजेठानी और उन के 3 बच्चे हैं.

‘‘रमिया से गहरी दोस्ती होने पर उस ने मुझे यहां पर लाना शुरू किया. मंदिर में मन्नत मांगने के बहाने रात में हम दोनों साथ आ जाती हैं और काम निबटा कर साथ ही घर चली जाती हैं.’’

मंत्रीजी बोले, ‘‘ठीक है, जल्दी करो. मुझे देर हो रही है. सुबह दौरे पर भी जाना है. तुझे देख कर तो मेरा मन उतावला हो रहा है,’’ यह कह कर वे कजरी की कमर में हाथ डालते हुए उस को पलंग की तरफ ले जाने लगे.

कुछ देर बाद तूफान थम चुका था. कजरी और रमिया दोनों घर आ गईं. रमिया भी बाबा सुखानंद को दूसरे कमरे में जा कर भरपूर सुख दे कर लौटी थी.

रास्ते में दोनों ने मैडिकल स्टोर से दर्द दूर करने की दवा खरीदी और अपनीअपनी दवा खाने के बाद सोईं, तो फिर सुबह ही उन की आंख खुली.

सुबह कजरी का चेहरा खिलाखिला सा लग रहा था. अब मौका मिलते ही किसी अफसर या मंत्री से कोई खास काम करवाना रहता, तो बाबा सुखानंद कजरी को उस के आगे परोस देते. इस के लिए बाबा मनोवैज्ञानिक तरीका ही अपनाते थे.

कुछ दिन बाद कजरी के पैर भारी हो गए, तो वह बहुत खुश हुई.

सुबहसुबह उलटी करते देख कजरी का पति मनोज बोला, ‘‘क्या बात है? उलटी क्यों कर रही हो?’’

कजरी बोली, ‘‘यह तो खुशी की बात है. तुम बाप बनने वाले हो.’’ यह सुन कर मनोज बहुत खुश हुआ.

कजरी बोली, ‘‘यह बाबा सुखानंद के आशीर्वाद का नतीजा है.’’ Hindi Kahani:

Hindi Story: बाबा नामदेव का सरप्राइज – क्या मिल पाया गजर सिंह को औलाद का सुख

Hindi Story: डीएसपी गजर सिंह ने अपनी नौकरी के दौरान नकली बाबाओं और अंधविश्वास के खिलाफ गदर मचा रखा था. उस की पोस्टिंग जिस भी शहर में होती, उस इलाके के आसपास के बाबातांत्रिक सभी की जानकारी वह हासिल कर लेता था और फिर उन के आश्रमों में रेड डाल कर उन की काली करतूतों का भंडाफोड़ करता था.

‘‘आखिर क्या बात है? तुम क्यों बाबा लोगों के इतने खिलाफ रहते हो? वे बेचारे तो सीधेसादे तो होते हैं,’’ एक दिन डीएसपी गजर सिंह की पत्नी मालती ने उस से पूछा.

‘‘ये बाबा लोग सीधेसादे नहीं होते, बल्कि लोगों को धोखा देने के अलावा कुछ भी नहीं करते हैं. हाथ की

सफाई दिखा कर लोगों को अपनी ओर खींचते हैं और इन का शिकार मैं खुद भी हुआ हूं, इसलिए इन को सबक सिखाना मेरा पहला टारगेट है,’’ गजर सिंह ने बताया.

मालती और गजर सिंह की शादी के कई साल बाद भी उन के कोई औलाद नहीं हुई थी, जिस का इलाज भी दोनों ने कराया था.

गजर सिंह की बाबाओं से चिढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि एक समय में जब वह बाबाओं पर भरोसा करता था, तो एक दिन अपनी समस्या ले कर सब से पहले एक बाबा के पास गया था, पर उस बाबा ने पूरे 2 साल तक गजर सिंह को झांसे में रखा. उस से खूब पैसे भी ऐंठे, पर उसे औलाद नहीं हुई थी.

फिर किसी दोस्त की सलाह पर गजर सिंह ने खुद को एक डाक्टर को दिखाया था. कई तरह की जांचों के बाद उसे पता चला कि वह औलाद नहीं पैदा कर सकता, क्योंकि उस का स्पर्म काउंट बहुत कम है.

वैसे, गजर सिंह बिस्तर पर संबंध बनाने में पूरी तरह से परफैक्ट था और किसी भी औरत को संतुष्ट कर सकता था, फिर भी वह अभी तक बेऔलाद था और दवाओं से भी उसे कोई फायदा नहीं हुआ था.

हाल में ही गजर सिंह की पोस्टिंग अजमेर में हुई थी और यहां का चार्ज संभालते ही उस ने अपनी आदत के मुताबिक बाबाओं का रिकौर्ड मांगा और उन के आश्रमों की जानकारी भी ली.

अजमेर से जयपुर जाने वाले हाईवे पर एक छोटा सा कसबा किशनगढ़ पड़ता है, जो अपने मार्बल के काम के लिए बहुत मशहूर है.

इसी किशनगढ़ कसबे से तकरीबन 10 किलोमीटर अंदर जाने पर बाबा नामदेव का आश्रम था, जो सफेद रंग के मार्बल से बना हुआ था.

जब गजर सिंह ने और जानकारी जुटाई, तो उसे पता चला कि बाबा नामदेव एक तरफ तो लोगों में चमत्कार दिखा कर अंधश्रद्धा पैदा करता है और दूसरी तरफ उस के कई कारखाने हैं, जिन में वह तमाम तरह के प्रोडक्ट बनाता है और उन्हें बाजार में बेचता है. ये सारे काम वह एक ट्रस्ट के तहत करता है, ताकि किसी भी तरह के आरोपों के दायरे से बाहर ही रहे.

गजर सिंह ने महसूस किया कि बाबा नामदेव के आश्रम में बेऔलाद औरतों का जमावड़ा लगा रहता था, जो आश्रम में आ कर कुछ खास तरह की थैरेपी लेती थीं और औलाद पाने का सुख हासिल करती थीं.

धर्म के नाम पर डरने वाली मालती अपने बांझपन को उन बाबाओं का शाप मानती थी, जिन का भंडाफोड़ गजर सिंह ने किया था, इसीलिए वह अपने पति से छिपछिपा कर बाबाओं से कर्मकांड कराती थी और उन्हें दानदक्षिणा भी देती थी.

अजमेर आ कर जब मालती के कानों तक बाबा नामदेव की मशहूरी के चर्चे पहुंचे और मालती ने यह जाना कि उन की शरण में जाने से बहुत सारी औरतों को औलाद मिल जाती है, तो उस ने गजर सिंह से वहां जाने की इच्छा जाहिर की.

‘‘भई, मुझे तो बाबा नामदेव से मिलने जाना ही है, पर एक भक्त के रूप में नहीं, बल्कि एक जागरूक इनसान के रूप में. मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं, पर मैं अपना यह स्पाई कैमरा भी साथ ले चलना चाहता हूं, ताकि आश्रम की गतिविधियां चुपके से रिकौर्ड कर सकूं.’’

मालती खुशीखुशी राजी हो गई और अगले दिन ही गजर सिंह और मालती किशनगढ़ के पास बने हुए आश्रम में पहुंच गए. गेट के अंदर घुसते ही उन पर एक आटोमैटिक मशीन से खुशबूदार डियो का छिड़काव हो गया.

सीधे गैलरी से अंदर जाने पर 2 खूबसूरत लड़कियां एक बड़े से रजिस्टर में वहां आने वाले भक्तों की कुछ डिटेल्स लिखवा रही थीं. उसी में एक कौलम यह भी था कि भक्त आश्रम में किस वजह से आए हैं? मालती ने उन्हें बताया कि वह औलाद पाने के लिए यहां आई है.

‘‘क्या आप बताना चाहेंगी कि वह औलाद आप को बेटी चाहिए या बेटा?’’ लिखने वाली लड़की ने पूछा.

मालती ने बिना देर किए ‘बेटा’ बोल दिया. उस लड़की ने रजिस्टर के एक कौलम में ‘बेटा’ लिख दिया. गजर सिंह का कैमरा यह सबकुछ रिकौर्ड कर रहा था.

आगे बढ़ने पर एक बड़े से हाल के बीचोंबीच बाबा नामदेव की एक बहुत बड़ी सी तसवीर लगी हुई थी, जिस से लगातार राख झड़ रही थी. भक्त लोग उसे भभूत कह कर अपने माथे से लगा रहे थे. कुछ तो उसे अपनी जबान पर भी रख रहे थे. मालती ने भी खुश हो कर बाबा की तसवीर से गिरती हुई भभूत उठा ली.

कुछ देर तक वे दोनों बाबा नामदेव के मायालोक में घूमते रहे, फिर अचानक दीवारों पर लगे हुए विशाल स्पीकर से आवाज आई कि बाबा नामदेव अभी ‘चाणक्य हाल’ में सब को दर्शन देंगे.

भक्तगण ‘चाणक्य हाल’ की तरफ दौड़ पड़े. मालती और गजर सिंह भी उसी हाल में पहुंच गए. हाल की खूबसूरती और भव्यता देखते ही बनती थी.

बाबा के इंतजार में सभी भक्त हाथ जोड़े बैठे थे. एक लंबे इंतजार के बाद बाब नामदेव मंच पर प्रकट हुए और भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में हाथ उठाया, फिर कुछ देर तक प्रवचन देने के बाद बाबा ने एक चमत्कार दिखाया. वहां मौजूद सैकड़ों लोगों ने बाबा के सिंहासन को 5 फुट तक हवा में ऊंचा उठते देखा.

जैसे ही सिंहासन ऊपर उठा, तो भक्त लोग जयजयकार करने लगे. मालती भी उन में से एक थी, जबकि गजर सिंह और उस का कैमरा सबकुछ बड़ी बारीकी से नोट कर रहे थे.

मालती तो पूरे रास्ते बाबा नामदेव के गुण ही गाती आई थी, जबकि उस की हर बात पर गजर सिंह मुसकरा देता था.

घर पहुंच कर रात में बिस्तर पर आते समय मालती ने गजर सिंह से कहा कि वह बाबा नामदेव के ट्रस्ट में कुछ दान देना चाहती है.

‘‘अरे, तुम भी कमाल करती हो. ये सब बाबा नहीं, बल्कि मदारी हैं, मदारी,’’ गजर सिंह ने हंसते हुए कहा. फिर उस ने अपने स्पाई कैम को लैपटौप से जोड़ा और मालती को दिखा कर बोला, ‘‘ये मदारी लोग अपने हाथ की सफाई दिखा कर भोलेभाले लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. जैसे जब वे लोग रजिस्टर में जानकारी दर्ज करते समय औलाद के बारे में पूछते हैं कि पीडि़त लोग बेटा चाहते हैं या बेटी, तो हमारे देश में सौ फीसदी लोग बेटा मांगने के लिए ही आश्रम में जाते होंगे.

‘‘अब इसे ऐसे समझ कि जिन के बेटा हो गया तो वे तो 10 और पीडि़तों को भेजेंगे, पर बेटी होने पर अफसोस करने वाले लोग आश्रम में जा कर विरोध दर्ज कराएंगे, तो उस रजिस्टर पर लिखे ‘बेटा’ शब्द को पहले से ही ‘बेटी’ कर दिया गया होगा और भक्त से कहा जाएगा कि देखिए, आप ने बेटी ही तो मांगी थी, बस वह भक्त कुछ नहीं बोल पाएगा…’’ गजर सिंह किसी माहिर जासूस की तरह यह सब बोलता जा रहा था.

आगे गजर सिंह ने तसवीर से राख या भभूत के गिरने की वजह एक रासायनिक क्रिया का होना बताया, जैसे किसी चित्र पर तरल एल्युमिनियम में मरकरी औक्साइड नामक कैमिकल मिला कर लगा दिया जाए तो एक तरह का नया कैमिकल बनता है, जो राख जैसा दिखता है, जिसे लोग भभूत समझ लेते हैं.

‘‘पर बाबा नामदेव के सिंहासन का हवा में उड़ना तो एक चमत्कार ही था न?’’ मालती ने पूछा.

‘‘जैसे किसी अस्पताल में मरीज के बिस्तर के सिरहाने को उठाने के लिए कुछ छोटे यंत्रों इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह से परदे के पीछे लीवर घुमा कर बाबा के सिंहासन को उठा देना कोई बड़ी बात नहीं,’’ गजर सिंह ने कहा तो मालती के चेहरे पर अनेक अबूझे सवाल तैरने लगे थे, जिसे देख कर गजर सिंह फिर मुसकरा दिया.

अगले दिन गजर सिंह बाबा नामदेव के खिलाफ कुछ और सुबूत जमा कर लेना चाहता था, इसलिए वह आश्रम जाने की तैयारी करने लगा.

गजर सिंह आश्रम पहुंचा. बाबा के आश्रम में रोज की तरह आज भी चहलपहल थी. कुछ लोगों से बात करने के बाद गजर सिंह को पता चला कि कुछ लोग यहां पर कुछ दिनों के लिए ही रह कर बाबा के साथ का लाभ उठाते हैं, जबकि बहुत से लोग इसी आश्रम में हमेशा के लिए ही रहने आ गए हैं और अपनी कमाई हुई सारी दौलत उन्होंने आश्रम और बाबा नामदेव के चरणों में ही रख दी है.

गजर सिंह हर चीज को बड़ी बारीकी से देख रहा था, तभी उस की नजर एक ऐसी लड़की पर पड़ी, जो पौधों को पानी दे रही थी. उस के बाल खुले हुए थे और वे बारबार आगे की ओर गिर रहे थे, जिन्हें वह लड़की बारबार संभाल लेती थी.

तकरीबन 25 साल की उस लड़की के गोरे रंग, तीखी सी नाक और काले बालों ने सीधा गजर सिंह की हवस पर चोट की थी.

अचानक उस लड़की की नजर गजर सिंह से टकराई और उस ने एक मनमोहक मुसकराहट बिखेर दी.

‘‘क्या आप यहां पहली बार आए हैं?’’ बातचीत की पहल उस लड़की ने की.

‘‘जी नहीं, मैं यहां दूसरी बार आया हूं,’’ गजर सिंह ने कहा.

‘‘मेरा नाम कला है और मैं पिछले कई साल से यहीं आश्रम में ही रहती हूं, और आप…?’’

‘‘गजर सिंह…’’ उस लड़की की खूबसूरती में खो सा गया था गजर सिंह.

कला बातचीत करने में कुछ ज्यादा ही उतावली दिख रही थी. गजर सिंह और वह साथसाथ चलने लगे. गजर सिंह ने सोचा कि कला से ही बाबा नामदेव के बारे में कुछ और जानकारी मिल सकती है.

कला से बातें करतेकरते गजर सिंह आश्रम के दूसरे छोर पर आ गया था. कला बहुत तेजी से बातों के विषय बदलती थी. कभी वह प्यार पर बात करती, तो कभी हवस पर. कभी वह मर्दऔरत के रिश्ते पर बात करती, तो कभी लैस्बियन पर. वह बातोंबातों में गजर सिंह के हाथों को भी छू लेती थी. बदले में गजर सिंह ने भी कला के हाथों को मसल दिया था.

एक दिन कला बिना कुछ कहे गजर सिंह को वहीं पास में बनी एक कौटेज में ले गई, जहां पर दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ता बन गया. गजर सिंह जैसा मर्द भी कला के साथ सैक्स करने में खुद को थका हुआ महसूस करने लगा था.

गजर सिंह पर कला के रूप का जादू ऐसा छाया कि उस ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि बाबा नामदेव के आश्रम में रहने वाली एक लड़की ने उस के साथ जिस्मानी संबंध क्यों बनाए थे.

एक दिन गजर सिंह ने कला से मन की बात पूछ ही ली, ‘‘आखिर ऐसा क्या दिख गया मुझे में, जो तुम इतना मेहरबान हो गई?’’

‘‘आप डीएसपी हो इस शहर के. हम आश्रम वालों की मजबूरी होती है आप जैसे बड़े लोगों से संबंध बना कर रखने की, ताकि आश्रम किसी विवाद में न फंसे,’’ कला ने एक मादक अंगड़ाई लेते हुए कहा.

कला के मोहजाल में उलझ कर गजर सिंह अंधविश्वास का खुलासा करने और बाबाओं का भंडाफोड़ करने जैसी बातें भूल चुका था. वह अब मालती को भी आश्रम में ले जाने लगा था.

तकरीबन 6 महीने तक यही सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन गजर सिंह को कला ने अपने पेट से होने की सूचना दी.

यह बात सुन कर गजर सिंह को झटका सा लगा, क्योंकि यह बात वह अच्छी तरह जानता था कि कम स्पर्म काउंट के चलते वह किसी औरत को मां नहीं बना सकता था और इसीलिए

कभी भी उस ने संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल भी नहीं किया था, पर आज यह कला तो कुछ और ही कहानी बता रही है.

बहुत मुमकिन है कि कला किसी और का बच्चा पहले से ही लिए घूम रही हो और अब अपनी बला टालने के लिए उसे बलि का बकरा बना रही हो, पर गजर सिंह बाप न बनने की अपनी कमजोरी कला को बता भी तो नहीं सकता था.

‘‘यह मेरा बच्चा नहीं है कला…’’

‘‘तो तुम यह कहना चाहते हो कि मेरे कई लोगों से संबंध हैं….’’ कहते हुए कला ने गजर सिंह और खुद की एक सैक्स क्लिप उसे दिखा दी और ब्लैकमेल करने के अंदाज में कहने लगी, ‘‘जानते हो, अगर यह क्लिप इंटरनैट पर चली गई, तो तुम्हारी वरदी उतरने में एक दिन भी नहीं लगेगा और फिर कभी बहाल भी नहीं हो पाओगे.’’

‘‘नहीं… पर… मुझे तो बच्चे,’’ इस से आगे कुछ कह न पाया था गजर सिंह. माना कि बच्चा उस का नहीं था, पर कला अपना किया हुआ उसी के सिर फोड़ना चाहती थी.

यह बात सम?ाते और मानसिक परेशानी से गुजरते हुए गजर सिंह के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न वह कला के बच्चे को जन्म लेने के बाद गोद ले ले और अपनी पत्नी को सौंप दे और उसे यह बताया जाए कि यह बच्चा एक दोस्त की एक पत्नी का है, जो इसे जन्म देते समय मर गई है?

गजर सिंह ने ऐसा ही किया. 3 महीने और गुजरे और कला ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया.

उस बच्ची को गोद में ले कर गजर सिंह घर पहुंचा, तो उस ने खुशीखुशी मालती को वह बच्ची देते हुए कहा, ‘‘लो, आज से तुम ही इस की मां हो, मेरे दोस्त की विधवा इसे जन्म देते ही मर गई है, इसलिए मैं इसे घर ले आया हूं.’’

गजर सिंह की बात सुन कर मालती के चेहरे पर एक फीकी सी हंसी दौड़ गई.

‘‘दरअसल, एक तोहफा तो मैं भी आप को देना चाहती हूं…’’ शरमाते हुए मालती ने कहा और गजर सिंह को बताया कि वह भी एक बच्चे की मां बनने वाली है.

यह बात सुन कर गजर सिंह के पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई.

‘‘यह सब बाबा नामदेव की दवाओं और उन के आशीर्वाद का ही फल है, हो गए न सरप्राइज…’’ मालती ने कहा.

मालती की बात सुन कर गजर सिंह दंग रह गया था, क्योंकि वह सच में सरप्राइज हो गया था.

मालती अपने बच्चे को बाबा नामदेव की मेहरबानी मान रही थी, जबकि सच तो यह था कि बाबा नामदेव ने कला और मालती दोनों के जिस्म से खेल कर उन दोनों को 1-1 सरप्राइज दे ही दिया था. Hindi Story

Family Story in Hindi: सौतेला बरताव – चंपा क्यों बनी देहधंधे वाली

Family Story in Hindi: चंपा को देह धंधा करने के आरोप में जेल हो गई. वह रंगे हाथ पकड़ी गई थी. वह जेल की सलाखों में उदास बैठी हुई थी. चंपा के साथ एक अधेड़ औरत भी बैठी हुई थी. थोड़ी देर पहले पुलिस उसे भी इस बैरक में डाल गई थी. चंपा जिस होटल में देह धंधा करती थी, उसी होटल में पुलिस ने छापा मारा था और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया था. आदमी तो भाग गया था, मगर पुलिस वाला उसे दबोचते हुए बोला था, ‘चल थाने.’ ‘नहीं पुलिस बाबू, मुझे माफ कर दो…’ वह हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘अब नहीं करूंगी यह धंधा.’ ‘वह आदमी कौन था?’ पुलिस वाला उसी अकड़ से बोला था. ‘मुझे नहीं मालूम कि वह कौन था?’ वह फिर हाथ जोड़ते हुए बोली थी. ‘झूठ बोलती है. चल थाने, सारा सच उगलवा लूंगा.’ ‘मुझे छोड़ दीजिए.’‘हां, छोड़ देंगे. लेकिन तू ने उस ग्राहक से कितने पैसे लिए हैं?’ ‘कुछ भी नहीं दे कर गया.’‘झठ कब से बोलने लगी? चल थाने?’ ‘छोड़ दीजिए, कहा न कि अब कभी नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘करेगी… जरूर करेगी. अगर करना ही है, तो लाइसैंस ले कर कोठे पर बैठ. फिर हम तुझ से कुछ नहीं कहेंगे…’ हवलदार थोड़ा नरम पड़ते हुए बोला था, ‘तुझे छोड़ सकता हूं, मगर अंटी में जितने पैसे हैं, निकाल कर मुझे दे दे.’

‘साहब, आज तो मेरी अंटी में कुछ भी नहीं है,’ वह बोली थी.

‘ठीक है, तब तो एक ही उपाय है… जेल,’ फिर वह पुलिस वाला उसे पकड़ कर थाने ले गया था.

चंपा दीवार के सहारे चुपचाप बैठी हुई थी. वह अधेड़ औरत न जाने कब से उसे घूर रही थी. आखिरकार वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘ऐ लड़की, तू कौन है?’’

तब चंपा ने अपना चेहरा ऊपर कर उस अधेड़ औरत की तरफ देखा, मगर जवाब कुछ नहीं दिया.

वह अधेड़ औरत जरा नाराजगी से बोली, ‘‘सुना नहीं? बहरी है क्या?’’

‘‘हां, पूछो?’’ चंपा ने कहा.

‘‘क्या अपराध किया है तू ने?’’

‘‘मैं ने वही अपराध किया है, जो तकरीबन हर औरत करती है?’’

‘‘क्या मतलब है तेरा? गोलमोल बात क्यों कर रही है, सीधेसीधे कह न,’’ वह अधेड़ औरत गुस्से से बोली.

‘‘मुझे देह धंधा करने के आरोप में पकड़ा गया है.’’

‘‘शक तो मुझे पहले से ही था. अरे, जिस पुलिस वाले ने तुझे पकड़ा है, उस के मुंह पर नोट फेंक देती.’’

‘‘अगर मेरे पास पैसे होते, तो उस के मुंह पर मैं तभी फेंक देती.’’

‘‘तुम ने यह धंधा क्यों अपनाया?’’

‘‘क्या करोगी जान कर?’’

‘‘मत बता, मगर मैं सब जानती हूं.’’

‘‘क्या जानती हैं आप?’’

‘‘औरत मजबूरी में ही यह धंधा अपनाती है.’’

‘‘नहीं, गलत है. मैं मजबूरी में वेश्या नहीं बनी, बल्कि बनाई गई हूं.’’

‘‘कैसे? अपनी कहानी सुना.’’

‘‘हां सुना दूंगी, मगर आप इस उम्र में जेल में क्यों आई हो?’’

‘‘मेरी बात छोड़, मेरा तो जेल ही घर है,’’ उस अधेड़ औरत ने कहा.

‘‘आप आदतन अपराधी हैं?’’

‘‘यही समझ ले…’’ उस अधेड़ औरत ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘फिर भी सुनना चाहती है तो सुन. मैं अफीम की तस्करी करती थी. अब सुना तू अपनी कहानी.’’

चंपा की कहानी कुछ इस तरह थी:

चंपा के पिता मजदूर थे. उन का नाम मांगीलाल था. उन्होंने रुक्मिणी नाम की औरत से शादी की थी.

शादी के 2 साल गुजर गए थे. एक दिन पिता मांगीलाल को पता चला कि रुक्मिणी मां बनने वाली है. उन की खुशियों का ठिकाना न रहा.

रुक्मिणी को बांहों में भरते हुए वे बोले थे, ‘पहला बच्चा लड़का होना चाहिए…’

‘यह मेरे हाथ में है क्या?’ रुक्मिणी उन्हें झिड़कते हुए बोली थी.

9 महीने बाद जब चंपा पैदा हुई, तो 4 दिन बाद उस की मां मर गई. पिता के ऊपर सारी जवाबदारी आ पड़ी. रिश्तेदार कहने लगे कि पैदा होते ही यह लड़की मां को खा गई. तब मौसी ने उसे पाला.

मां के मरने पर पिता टूट गए थे. वे उदासउदास से रहने लगे थे. तब अपना गम भुलाने के लिए वे शराब पीने लगे थे. रिश्तेदारों और उन के बड़े भाई ने खूब कहा कि दोबारा शादी कर लो, मगर वे तैयार नहीं हुए थे.

धीरेधीरे चंपा मौसी की गोद में बड़ी होती गई. जब वह 5 साल की हो गई, तब उसे स्कूल में भरती करा दिया गया. पिता को दोबारा शादी के प्रस्ताव आने लगे. चारों तरफ से दबाव भी बनने लगा.

एक दिन पिता के बड़े भाई भवानीराम और उन की पत्नी तुलसाबाई आ धमके. आते ही भवानीराम बोले, ‘ऐसे कैसे काम चलेगा मांगीलाल?’

‘क्या कह रहे हैं भैया?’ मांगीलाल ने पूछा.

‘सारी जिंदगी यों ही बैठे रहोगे?’ भवानीराम ने दबाव डालते हुए कहा.

‘आप कहना क्या चाहते हो भैया?’

‘अरे देवरजी…’ तुलसाबाई मोरचा संभालते हुए बोली, ‘देवरानी को गुजरे 6-7 साल हो गए हैं. अब उस की याद में कब तक बैठे रहोगे? चंपा भी अब बड़ी हो रही है.’

‘भाभी, मेरा मन नहीं है शादी करने का,’ मांगीलाल ने साफ इनकार कर दिया था.

‘मैं पूछती हूं कि आखिर मन क्यों नहीं है?’ दबाव डालते हुए तुलसाबाई बोली, ‘यों देवरानी की याद करने से वह वापस तो नहीं आ जाएगी. फिर शादी कर लोगे, तो देवरानी के गम को भूल जाओगे.’

‘नहीं भाभी, मैं ने कहा न कि मुझे शादी नहीं करनी है.’

‘क्यों नहीं करनी है? हम तेरी शादी के लिए आए हैं. और हां, तेरी हां सुने बगैर हम जाएंगे नहीं,’ भैया भवानीराम ने हक से कहा, ‘हम ने तेरे लिए लड़की भी देख ली है. लड़की इतनी अच्छी है कि तू रुक्मिणी को भूल जाएगा.’

‘नहीं भैया, मैं चंपा के लिए सौतेली मां नहीं लाऊंगा,’ एक बार फिर इनकार करते हुए मांगीलाल बोला.

‘कैसी बेवकूफों जैसी बातें कर रहा है. जिन की औरत भरी जवानी में ही चली जाती है, तब वे दोबारा शादी नहीं करते हैं क्या?’

‘अरे देवरजी, यह क्यों भूल रहे हो कि चंपा को मां मिलेगी. कब तक मौसी उस की देखरेख करती रहेगी? इस बात को दिमाग से निकाल फेंको कि हर मां सौतेली होती है. जिस के साथ हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं, वह ऐसी नहीं है. चंपा को वह अपनी औलाद जैसा ही प्यार देगी?’

‘भाभी, आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो?’

‘बिना औरत के आदमी का घर नहीं बसता है और हम तेरा घर बसाना चाहते हैं. लड़की हम ने देख ली है. एक बात कान खोल कर सुन ले, हम तेरी शादी करने के लिए आए हैं. इनकार तो तुम करोगे नहीं. बस, तैयार हो जाओ,’ कह कर भवानीराम ने बिना कुछ सुने फैसला सुना दिया.

मांगीलाल को भी हार माननी पड़ी. भैयाभाभी ने जो लड़की पसंद की थी, उस का नाम कलावती था. मान न मान मैं तेरा मेहमान की तरह कलावती के साथ उस की शादी कर दी गई.

जब तक कलावती की पहली औलाद न हुई, तब तक उस ने चंपा को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उस की सौतेली मां है. मगर बच्चा होने के बाद वह चंपा को बातबात पर डांटने लगी. उस का स्कूल छुड़वा दिया गया. वह उस से घर का सारा काम लेने लगी.

पिता भी नई मां पर ज्यादा ध्यान देने लगे. इस तरह नई मां ने पिता को अपने कब्जे में कर लिया. धीरेधीरे चंपा बड़ी होने लगी. लड़के उसे छेड़ने लगे.

कलावती भी उसे देख कर कहने लगी, ‘लंबी और जवान हो गई है. कब तक हमारे मुफ्त के टुकड़े तोड़ती रहेगी. कोई कामधंधा कर. कामधंधा नहीं मिले, तो किसी कोठे पर जा कर बैठ जा. तेरी जवानी तुझे कमाई देगी.’

चंपा के पिता जब शादी की बात चलाते, तब सौतेली मां कहती, ‘कहां शादी के चक्कर में पड़ते हो. चंपा अब बड़ी हो गई है. साथ ही, जवान भी. रूप भी ऐसा निखरा है कि अगर इसे किसी कोठे पर बिठा दो, तो खूब कमाई देगी.’

तब पिता विरोध करते हुए कहते, ‘जबान से ऐसी गंदी बात मत निकालना. क्या वह तुम्हारी बेटी नहीं है?’

‘‘मेरी पेटजाई नहीं है वह. आखिर है तो सौतेली ही,’ कलावती उसी तरह जवाब देती.

पिता को गुस्सा आता, मगर वह उन्हें भी खरीखोटी सुना कर उन की जबान बंद कर देती थी. इस गम में पिता ज्यादा शराब पीने लगे. रातदिन की चकचक से तंग आ कर चंपा ने कोई काम करने की ठान ली. मगर सौतेली मां तो उस से देह धंधा करवाना चाहती थी.

आखिर में चंपा ने भी अपनी सौतेली मां की बात मान ली. जिस होटल में वह धंधा करती थी, वहीं सौतेली मां ग्राहक भेजने लगी. ग्राहक से सारे पैसे सौतेली मां झटक लेती थी.

चंपा ने उस अधेड़ औरत के सामने अपना दर्द उगल दिया.

थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘तेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है. आखिर सौतेली मां ने अपना सौतेलापन दिखा ही दिया.’’

चंपा कुछ नहीं बोली.

‘‘अब क्या इरादा है? तेरी सौतेली मां तुझे छुड़ाने आएगी?’’ उस अधेड़ औरत ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो अब जेल में ही रहना चाहती हूं. उस सौतेली मां की सूरत भी नहीं देखना चाहती हूं.’’

‘‘तू भले ही मत देख, मगर तेरी सौतेली मां तुझ से पैसा कमाएगी, इसलिए तुझे छुड़ाने जरूर आएगी,’’ अपना अनुभव बताते हुए वह अधेड़ औरत बोली.

‘‘मगर, अब मैं घर छोड़ कर भाग जाऊंगी?’’

‘‘भाग कर जाएगी कहां? यह दुनिया बहुत बड़ी है. यह मर्द जात तुझे अकेली देख कर नोच लेगी. मैं कहूं, तो तू किसी अच्छे लड़के से शादी कर ले.’’

‘‘कौन करेगा मुझ से शादी? बस्ती के सारे बिगड़े लड़के मुझ से शादी नहीं मेरा जिस्म चाहते हैं. वैसे भी मैं बदनाम हो गई हूं. अब कौन करेगा शादी?’’

‘‘हां, ठीक कहती हो…’’ कह कर वह अधेड़ औरत खामोश हो गई. कुछ पल सोच कर वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘हम औरतों के साथ यही परेशानी है. देख न मुझे भी मेरी जवानी का फायदा उठा कर तस्करी का काम दिया, ताकि औरत देख कर कोई शक नहीं करे. मगर जब पैसे मिलने लगे, तब धंधा मुझे रास आ गया. इस का नतीजा देख रही हो, आज मैं जेल में हूं.’’

फिर दोनों के बीच काफी देर तक सन्नाटा पसरा रहा. तभी एक पुलिस वाले ने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘बाहर निकल. तेरी मां ने जमानत दे दी है.’’

चंपा ने देखा कि उस की मां कलावती खड़ी थी. वह गुस्से में बोली, ‘‘तू चुपचाप धंधा करती रही और मुझे बदनाम कर दिया. सारी बस्ती वाले मुझ पर थूक रहे हैं. आखिर मैं तेरी सौतेली मां हूं न, बदनाम तो होना ही है. वैसे भी सौतेली मां तो बदनाम ही रहती है.

‘‘चल, निकल बाहर. अब कभी धंधा किया न, तो तेरी खाल खींच लूंगी. मां हूं तेरी, भले ही सौतेली सही. मैं ने जमानत दे दी है.’’

चंपा कुछ नहीं बोली. वह अपनी सौतेली मां के साथ हो ली. वह जानती थी कि यह केवल लोकलाज का दिखावा है. अब यह कैसी साहूकार बन रही है. उलटा चोर कोतवाल को डांट कर. Family Story in Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें