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Women Courage Story : बैसाखी

Women Courage Story. नगमा अपने नाम की तरह खूबसूरत थी. वह जब भी चौराहे के नल पर पानी भरने जाती, कल्लू और उस के गुरगे उस पर फब्तियां कसे बिना नहीं रहते थे.

कल्लू की बेहूदा हरकतों से नगमा का दिल गुस्से से भर जाता. उस का जी चाहता कि जूडोकराटे का इस्तेमाल कर के उन के होश ठिकाने लगा दे, लेकिन अपने पति आजाद का मासूम चेहरा याद आते ही उस का सारा गुस्सा काफूर हो जाता था.

6 महीने पुरानी बात थी. मुंबई में उत्तर भारतीयों पर हुए हमलों के बाद से दंगाइयों का मन सातवें आसमान पर था. वे बाहर से आए लोगों पर जोरजुल्म तो करते ही थे, औरतों और लड़कियों को भी परेशान करते थे.

इस तरह के दंगाइयों से शरीफ मराठी परिवार परेशान थे. नगमा भी मराठी थी. उस ने एक झारखंडी लड़के आजाद से शादी कर ली थी, जो दंगाइयों के हमले में अपाहिज हो गया था.

नगमा के पिता आफताब अली मुंबई में डाक्टर थे. उस की मां नादिरा बेगम लड़कियों के कालेज में प्रोफैसर थीं. दोनों के लाड़प्यार ने एकलौती बेटी को जिद्दी बना दिया था.

नगमा अपनी मोटरसाइकिल से पूरे मुंबई शहर में घूमा करती थी. उस ने जूडोकराटे की ट्रेनिंग भी ले रखी थी.

एक दिन नगमा अपने पिता के अस्पताल गई हुई थी. वह आजाद नाम के एक शख्स के बिस्तर के सामने खड़ी हो गई. 20 साला उस नौजवान के मासूम चेहरे पर दुख के भावों और कटे पैरों का दर्द महसूस कर नगमा का बदन भी सिहर उठा.

पूछताछ के बाद नगमा के पिता ने बताया कि आजाद गोरेगांव जाने के लिए बस का इंतजार कर रहा था, तभी दंगाइयों का दल वहां पहुंच गया. पहले उस के प्रदेश का नाम पूछा गया, उस के बाद उसे दौड़ादौड़ा कर पीटा गया.

दंगाइयों के कहर से आजाद के दोेनों पैरों की हड्डियां टूट गई थीं. मांस के अंदर सड़न पैदा हो गई थी. लिहाजा, उस की जिंदगी बचाने के लिए उस के दोनों पैरों को काट देना पड़ा.

आजाद की दास्तान सुन कर नगमा का मन भर आया और वह अस्पताल से चली गई.

ठीक होने के बाद आजाद गोरेगांव के अपने किराए के मकान में आ गया, जहां बिहारझारखंड से आए मजदूर रहते थे. वे सभी एक ऐक्सपोर्ट कंपनी में कपड़े सिलने का काम करते थे. आजाद भी यही काम करता था.

अपाहिज हो जाने के बाद आजाद दिनभर अपने कमरे में खोयाखोया सा पड़ा रहता. ऐसे में नगमा आ कर उस की सेवा करती. खानेपीने से ले कर दवादारू का इंतजाम करती.

धीरेधीरे दोनों के बीच इतना लगाव बढ़ गया कि एक दिन नगमा ने आजाद से कोर्ट मैरिज कर ली.

शादी कर लेने के बाद नगमा की जिंदगी में भूचाल आ गया. उस के पिता और मां ने उस का घर से निकलना बंद कर दिया.

‘जहां पूरा महाराष्ट्र उत्तर भारतीयों के खिलाफ है, वहां तुम ने एक ?ारखंडी लड़के से शादी कर ली…’ उस की मां नादिरा ने समझाते हुए कहा, ‘माना कि आजाद अपाहिज है. उसे हमदर्दी की जरूरत है. इस का मतलब यह नहीं कि तुम उस से प्यार करने लगो.’

‘आप का कहना है कि अपाहिज हमदर्दी तो पा सकता है, पर प्यार नहीं. मगर मैं ऐसा नहीं कर सकती. मैं आजाद से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. हम दो जिस्म एक जान हैं. हमें कोई जुदा नहीं कर सकता,’ नगमा ने जोश में न जाने और क्याक्या कह दिया.

नादिरा अपनी एकलौती बेटी के इस दीवानेपन से काफी परेशान हो गईं. उन्हें सम?ा में नहीं आ रहा था कि नगमा को कैसे समझाएं?

उन्होंने फिर कोशिश की, ‘तू ने जज्बात में आ कर गलत फैसला कर लिया है, बाद में पछताएगी. अभी तुझे  मेरी बातें समझ  में नहीं आएंगी. लेकिन जरा सोचो, जो खुद दूसरे का मुहताज है, वह तुम्हें क्या दे पाएगा?’

‘मुझे  कुछ नहीं सुनना है,’ नगमा ने नाराज होते हुए कहा.

‘मेरी प्यारी नगमा, बात मान जा और इब्राहिम से शादी कर ले. तेरी जिंदगी संवर जाएगी,’ मां ने कहा.

‘ऐसा कभी नहीं होगा. मेरा आजाद तो जिस्मानी तौर पर अपाहिज है, लेकिन लगता है कि आप दिमागी रूप से अपाहिज हो गई हैं.’

‘जिस दिन तू ठोकरें खा कर इस दरवाजे पर आएगी, उस दिन मैं तु?ा से पूछूंगी…’ नगमा को वहीं छोड़ कर नादिरा कमरे में चली गईं.

उस दिन के बाद से नगमा गोरेगांव में आ गई और आजाद के साथ रहने लगी. किराए के मकान में पानी की सहूलियत नहीं थी. सभी किराएदार चौराहे के नल से पानी लाते थे.

नगमा का साथ पा कर आजाद का हौसला फौलाद बन गया था. वह रोजाना सामने के मैदान में जाता और अपनी बैसाखियों की मदद से हसीन मियां के स्कूटर को चलाने की कोशिश करता. एक दिन उस की मेहनत रंग लाई और वह स्कूटर चलाना सीख गया.

अब आजाद नगमा को स्कूटर के पीछे बैठा कर खूब घुमाता. वे दोनों दोगुनी मेहनत से कपड़ों की सिलाई करते और उन्हें ऐक्सपोर्ट कंपनी को पहुंचा देते. इस तरह उन्हें सिलाई के लिए और भी और्डर मिलने लगे थे.

चौराहे के नल पर कल्लू की हरकत से तमतमाई नगमा घर आ कर अपनी मशीन से कपड़े सिलने में मसरूफ हो गई कि तभी पड़ोस की नसीमा चाची आ कर बैठ गईं.

वे बोलीं, ‘‘अरी नगमा, दिनरात यों ही अपना बदन गलाती रहेगी या चाची को एक कप चाय भी पूछेगी.

‘‘इतनी बेखबर रहेगी, तो कोई चुपके से 2-4 कपड़े ले कर भाग जाएगा, फिर ढूंढ़ती रह जाओगी.’’

‘‘चाची, अभी मैं आप को चाय नहीं पिला सकती. रही बात कपड़े चुराने की, तो चोरी करने वाले को कौन रोक सकता है?’’

‘‘जैसे तू ने कल्लू का दिल चुरा लिया है. इस बात का महल्ले में कुछ ज्यादा ही शोर है.’’

‘‘क्या बोलती हैं आप चाची, जरा फिर से बोलो तो…’’ नगमा को जैसे उन की बातों पर यकीन न हुआ.

‘‘हां नगमा, वह तुम्हें बहुत चाहता है. कल मुझ  से कह रहा था कि नगमा जैसी हसीन और खूबसूरत कोई नहीं. वह तुम्हारे हुस्न पर मरता है.’’

‘‘चाची, मरने वाले यों ही मरते रहेंगे. जब आजाद और मैं खुश, तो दुनिया जलती रहे,’’ नगमा बोली.

‘‘अरी नगमा, तू आजाद को छोड़ दे तो ही अच्छा है.’’

यह सुन कर नगमा का खून खौल उठा, लेकिन अपने मन को शांत करते हुए उस ने जवाब दिया, ‘‘आप उस कल्लू की बात कर रही हो, जिसे पुलिस तलाश रही है. वह लूट, हत्या, डकैती और बम धमाके जैसे संगीन जुर्मों का आरोपी है. एक बार जेल चला जाएगा, तो कभी बाहर नहीं निकलेगा.

‘‘कल्लू जैसे लोग ही महाराष्ट्र को कंगाल बनाने में लगे हैं. बकबक करना बंद करो और यहां से जाओ, वरना धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दूंगी.’’

‘‘कल की छोकरी, तू मुझे आंखें दिखाती है. कल्लू को मालूम पड़ेगा, तो वह तेरा मांस नोच कर खा जाएगा. बाप के घर से भागी छोकरी की इतनी मजाल. तेरे टुकड़े न करा दिए, तो मेरा नाम भी नसीमा नहीं,’’ इतना कह कर नसीमा चाची वहां से चली गईं.

नसीमा एक बदनाम औरत थी. उस का अपराधियों से संबंध था. उस ने भरी जवानी में अपने शौहर रहमान को मरवा डाला था. सुबूत की कमी से वह बच गई थी. महल्ले की औरतें उस से बातें करने में कतराती थीं.

आजाद के न आने से नगमा काफी परेशान थी. अचानक बाहर स्कूटर के रुकने की आवाज सुनाई दी. वह दौड़ती हुई बाहर निकल पड़ी. लहूलुहान आजाद को देखते ही उस का कलेजा मुंह को आ गया. वह उसे सहारा दे कर अंदर लाई.

‘‘तुम्हारी ऐसी बुरी हालत किस ने की? कहीं कल्लू और उस के गुंडे तो नहीं थे?’’ उस ने बेचैन होते हुए पूछा.

‘‘नहीं नगमा, वे लोग नहीं थे. मैं स्कूटर से गिर गया था. इसी से थोड़ी खरोंच आ गई है,’’ आजाद ने कहा.

‘‘तुम्हारे कपड़े फटे हैं. स्कूटर पर भी निशान पड़े हुए हैं. तुम्हारे सिर से खून निकल रहा है. यह सब कैसे हो गया? आजाद, सचसच बताओ,’’ नगमा तड़पती हुई चीख पड़ी.

‘‘अरे भई, तुम मरहमपट्टी करने की जगह बहस क्यों कर रही हो?’’

‘‘ओह, तुम्हारी यह हालत देख कर मैं होश खो बैठी थी. अच्छा, मैं रिकशा बुलाती हूं… हम अस्पताल चलेंगे.’’

‘‘अरे, मामूली चोट है. यों ही ठीक हो जाएगी,’’ आजाद ने उसे समझाया.

‘‘नहींनहीं, तुम अस्पताल चलो.’’

एक हफ्ते बाद आजाद ठीक हो गया.

एक दिन अचानक चौराहे पर बम धमाके की आवाज आई. लोगों की चीखपुकार मच गई.

आजाद घर में नहीं था. नगमा अपने घर से बाहर निकली. कल्लू और उस के साथी हाथ में लाठीडंडे लिए उस की तरफ ही बढ़ रहे थे. वह उन से बचने का उपाय सोच रही थी कि सभी उस के पास आ गए.

कल्लू ने उस के बालों को पकड़ा और चीखते हुए बोला, ‘‘आज चौराहे पर तेरी ऐसी हालत करूंगा कि दुनिया देखेगी. ले चलो इसे.’’

कल्लू ने चौराहे के बीचोंबीच ला कर नगमा को पटक दिया. हिम्मत बटोर कर वह खड़ी हुई. वहां कोई मददगार नहीं था. सभी अपनेअपने घरों में छिपे हुए थे.

अपनी बेइज्जती का एहसास होते ही नगमा किसी गुस्साई नागिन की तरह खौफनाक हो उठी. अपने सामने दुश्मनों को खड़ा देख कर उस की मुट्ठियां भिंच गईं, भौंहें तन गईं.

नगमा ने अचानक हवा में छलांग लगाई और कल्लू के जबड़े पर जोरदार ठोकर मारी. दर्द से बिलबिलाया कल्लू नीचे गिर पड़ा.

अपने उस्ताद को पिटते देख कल्लू के गुरगे नगमा की ओर दौड़े. उन का वार काटते हुए उस ने जोरदार लात जमाई.

नगमा की कलाबाजी को देख कर वे दंग रह गए.

नगमा ने एक के बाद एक उन के दांवों को जब नाकाम करना शुरू किया, तो वे उस के आगे टिक नहीं पाए. इसी बीच किसी ने पुलिस को फोन कर दिया.

आजाद जैसे ही घर पहुंचा, महल्ले के सन्नाटे को देख कर उस की रूह कांप उठी. वह बेतहाशा घर के अंदर घुसा. उस ने कई बार नगमा को आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

आजाद पागलों की तरह नगमा को ढूंढ़ता हुआ बाहर निकल पड़ा. वह जैसे ही थोड़ी दूर गया, रास्ते में उसे तुफैल चाचा मिल गए.

उन को सुनाते हुए वह बोल पड़ा, ‘‘बुजदिलों के बीच रहने से अच्छा है गुंडों से लड़ कर शहीद होना. आप को मालूम है कि गुंडे नगमा को उठा कर ले गए हैं और यहां के लोग तमाशबीन बने देखते रहे.’’

‘‘अरे आजाद, तू नगमा की बात कर रहा है. वह तो शेरनी है, शेरनी. उस ने अकेले ही इस महल्ले की लाज रख ली है. हमें उस पर फख्र है,’’ तुफैल चाचा ने गर्मजोशी के साथ आजाद से कहा.

‘‘आखिर नगमा ने ऐसा क्या कर दिया है चाचा?’’ बच्चे की तरह उतावला होते हुए आजाद ने पूछा.

‘‘उस ने कल्लू और उस के गुंडों का कचूमर निकाल दिया है. सभी थाने में पड़े कराह रहे हैं.’’

‘‘नगमा ठीक तो है न चाचा? किसी ने उस के बारे में नहीं बताया?’’

‘‘बरखुरदार, तुम चिंता मत करो, नगमा सहीसलामत है. सुना है कि थाने में एसपी तक आ गए हैं.’’

‘‘ऐसा क्यों चाचा? क्या नगमा पर मारपीट करने का मुकदमा चलेगा?’’

‘‘नहीं रे पगले, कल्लू कई संगीन मामलों का अपराधी है. वह पुलिस की पकड़ से बाहर था. नगमा ने उसे पकड़वा कर हिम्मत का काम किया है. सरकार उसे इनाम देगी.’’

जब आजाद थाने पहुंचा, उस वक्त नगमा अपनी अम्मी से गले मिल कर रो रही थी. पास में खड़े उस के पिता एसपी से बातें कर रहे थे.

उन दोनों ने देखा कि आजाद भी आ गया है, तो वे उस की ओर लपके.

बैसाखी के सहारे खड़े आजाद से हाथ मिलाने के बाद एसपी ने कहा, ‘‘हमें नगमा की जांबाजी पर नाज है. उस से महल्ले और समाज की लड़कियों को सबक लेना चाहिए.’’

थोड़ी देर में नगमा और नादिरा भी वहां पहुंच गईं.

‘‘कैसी हो नगमा?’’ आजाद ने पूछा. ‘‘बिलकुल ठीक हूं… मेरी अम्मी से मिलो.’’

‘‘आप महान हैं, जो नगमा जैसी लड़की को अपनी कोख से जन्म दिया,’’ आजाद ने नादिरा को नमस्ते करते हुए कहा.

‘‘आप दोनों की सलामती ही मेरी सब से बड़ी दौलत है. बहरहाल, अब हम सब घर चलें.’’

‘‘मैं अपनी बैसाखी को छोड़ कर कैसे जा सकता हूं?’’ ‘‘बैसाखी तो आप के कंधे से टिकी है,’’ नादिरा ने कहा.

‘‘आप समझे नहीं. मेरी बैसाखी तो नगमा है. उस के बगैर तो चलने की मैं सोच भी नहीं सकता,’’ आजाद ने भरी आंखों से नगमा की ओर देखा.

अचानक नगमा उस के सीने से लग कर रो पड़ी.    Women Courage Story

-जनक देव जनक

Story in Hindi : मुंहासे

Story in Hindi. तमाम लोगों की भीड़ के बावजूद यहां हर इनसान अकेला है. हर दिन एक अकेला इनसान भीड़ में भागता है. भीड़ में होता है एक अकेला इनसान. तमाम ऊंचीऊंची बिल्डिंगें होने के बावजूद यहां भी झोंपड़पट्टियां हैं. इन झोंपड़पट्टियों से नहीं दिख पाती बिल्डिंग की छत, पर बिल्डिंग की एक खिड़की से दिख जाती हैं सारी झोंपड़पट्टियां.

ऐसी ही एक झोंपड़पट्टी में मैं रहता हूं और ऊंचीऊंची बिल्डिंगों का चौकीदार हूं. चौकीदार हूं का मतलब यह नहीं कि मैं सिर्फ चौकीदार ही हूं, क्योंकि कभीकभी हम जो होते हैं वह दिखता नहीं और जो नहीं होते वह प्रमुखता से दिख जाता है.

खैर, मुझे  किसी ने चौकीदारी करने के लिए नहीं कहा था. मैं बीएससी पास हूं, स्वभाव का गुस्सैल हूं. मैं झारखंड से यहां हीरो बनने आया था. यों तो झारखंड और बिहार से लाखों की तादाद में लोग यहां मजदूरी करने आते हैं, पर मैं यहां मजदूर बनने कभी नहीं आया था, पर मुंबई एक ऐसा शहर है जो आप से क्या न करवा ले. कभीकभी महानगर में जो आप होते हैं उस से इतर आप कुछ और हो जाते हैं.

यह मेरी कहानी नहीं है, इसलिए अपनी बात को विराम दे कर मैं कहानी को वहां ले कर चलता हूं, जहां से कहानी की शुरुआत हुई थी. तो यह कहानी कुछ इस तरह शुरू हुई थी. हां, कहानी शुरू करने के पहले आप सब से यही इजाजत लेना चाहूंगा कि अगर मेरी जरूरत होने पर वहां मुझे  हाजिर होना पड़ेगा. इस में आप सब को कोई एतराज नहीं होना चाहिए. तो कहानी की तरफ आगे बढ़ते हैं.

यहां चौकीदार लगते ही मेरी मुलाकात एक चौकीदार लड़की से हुई जिस का नाम प्रियंका जैसवाल था.

मैं ने अपने जीवन में पहली बार किसी लड़की को चौकीदार की ड्रैस पहने देखा था. वह नीली फुल शर्ट और ब्लैक पैंट, कमर पर काली बैल्ट और पैरों में सेफ्टी शूज पहने हुई थी. इस से पहले मैं ने लड़कियों को या तो स्कूल के कपड़े, सलवारसूट या साड़ी में ही देखा था.

यह अलग बात है कि मैं ने सिनेमा में लड़कियों को पुलिस की ड्रैस में देखा था जो बहुत ही खूबसूरत दिखती थीं, पर प्रियंका चौकीदार की ड्रैस में बिलकुल भी खूबसूरत नहीं लगती थी. एक तो उस का कद नाटा और दूसरा शरीर उस का थोड़ा भरा हुआ था. भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनों की तरह. उस के चेहरे पर मुंहासे भी थे.

मगर इस बिल्डिंग के 2 दरवाजों के हर चौकीदार प्रियंका को अपने पास ही बुला कर बैठना चाहते थे.

प्रियंका बोलने में खूब तेजतर्रार थी. हमेशा हंसने की कोशिश करती थी. पर उस की आंखों में दर्द दिखता था. वह खुश नहीं है, साफ दिखता था. उस की आंखें साफ बताती थीं कि वह बहुतकुछ सह और झेल चुकी है. उस की हर हंसी के पीछे एक दर्द भी रोता था.

प्रियंका मुझ से तकरीबन सालभर पहले से यहां काम कर रही थी. मैं चौकीदारी में नयानया लगा था. मैं खुद को चौकीदार की ड्रैस पहने बहुत शर्मिंदगी महसूस करता था. हमेशा डराडरा सा रहता था कि कोई मुझे  इस तरह देखेगा तो क्या सोचेगा?

मैं ऐसे आदमी से भी शरमाता जो मुझे  जानता तक न हो, जिस का दूरदूर तक मेरे इस काम से कोई मतलब नहीं था. सच तो यह था कि इस शहर में किसी को किसी के काम से कोई मतलब नहीं था. यहां तक कि मैं प्रियंका को देख कर भी शर्मिंदगी महसूस करता था कि यह मेरे बारे क्या सोचती होगी, जबकि वह मेरे बारे में कुछ नहीं सोचती थी. वह खुद चौकीदार थी.

खैर, यह मैं पहले ही बता चुका हूं कि यह कहानी मेरी नहीं है. यह कहानी प्रियंका की है, पर मैं इस कहानी में हाजिर हूं, तो बीचबीच में आता रहूंगा. बिलकुल भी मैं इस कहानी का हीरो नहीं बनूंगा. यह अलग बात है कि मैं मुंबई में फिल्मों में हीरो जरूर बनने आया था. फिलहाल बन गया हूं, चौकीदार, क्योंकि केवल खुद को नहीं, बल्कि सपने को भी जिंदा रखने के लिए पैसों की जरूरत होती है.

एक बार प्रियंका ने मुझे  कहा, ‘‘आप गेट नंबर 2 पर ड्यूटी करने चले जाइए. आप को बता देने के लिए सुपरवाइजर ने मुझे  कहा था.’’

वैसे तो मुझे  इस बात पर बहुत गुस्सा आया कि यह गांव की गंवार लड़की हम जैसे पढ़ेलिखें लड़कों को काम पर लगा रही है. यह सुपरवाइजर हमें डायरैक्ट भी तो बोल सकता था.

तकरीबन 4 घंटे बाद प्रियंका का फिर फोन आया, ‘‘आप एक नंबर गेट पर आ जाइए.’’

मैं गेट नंबर एक पर आ गया. प्रियंका की ड्यूटी भी वही लगी थी.

मैं उस के पास रोब से खड़ा हो गया. उस ने मुझे  देखते ही कहा, ‘‘दरअसल, गेट नंबर 2 पर जाने के लिए सुपरवाइजर ने तुम्हें नहीं कहा था, बल्कि गेट नंबर 2 का सिक्योरिटी गार्ड मुझे आने के लिए कह रहा था, इसलिए तुम्हें भेज दिया. क्या कुछ कह रहा था तुम्हें?’’

‘‘नहीं, जैसे मेरा जाना उसे पसंद नहीं आया. पर तुम क्यों नहीं गई?’’

‘‘कुछ नहीं, मेरे चेहरे के मुंहासे देख कर कह रहा था. पूछा, तुम्हारी शादी हो गई है? मैं ने कहा नहीं हुई. इसलिए तुम्हारे चेहरे पर मुंहासे हैं. इस का इलाजमुझे  पता है.’’

मैं मुसकराया और पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी नहीं हुई अभी तक?’’ ‘‘नहीं, तुम्हारी शादी हो गई हैं?’’

‘‘अरे नहींनहीं, अभी शादी कौन करेगा.’’ ‘‘तुम्हारे चेहरे पर भी मुंहासे हैं.’’

‘‘खूब इलाज करता हूं. बारबार मुंह भी धोता हूं फिर भी हो जाते हैं. इस की वजह से कितनी जगह काम नहीं मिल पाता.’’

‘‘कौन सा काम नहीं मिल रहा है?’’ उस ने पूछा. ‘‘फिल्मों में.’’

‘‘अच्छा तो तुम कलाकार हो… फिर यहां कैसे?’’ ‘‘जैसे तुम यहां हो, वैसे मैं भी हूं.’’ ‘‘मेरी तो मजबूरी है.’’

‘‘मेरी भी मजबूरी है.’’ ‘‘इस बिल्डिंग में भी कई फिल्म कलाकार रहते हैं. मेरे पास फिल्म डायरैक्टर शुक्लाजी का नंबर भी है. वे मुझे  नौकरी दे रहे थे.’’

‘‘कैसी नौकरी?’’ ‘‘उन की कोई हवेली है, वहां कोई रहता नहीं है. मुझे  कह रहे थे तुम वहां रहो, उस की देखभाल करो. कह रहे थे कि महीने का 20,000 देंगे.’’

‘‘फिर तुम ने वह नौकरी क्यों नहीं की?’’ ‘‘नहीं, कौन अकेले उस वीरान हवेली में रहेगा.’’

‘‘तुम मुंबई कैसे आ गई?’’ ‘‘बहुत लंबी कहानी है.’’ ‘‘मैं वह लंबी कहानी सुनना चाहता हूं.’’

‘‘पर क्यों?’’ ‘‘ताकि तुम्हें जान सकूं.’’ ‘‘मुझे  जान कर क्या करोगे? मैं तुम्हारे क्या काम आ सकती हूं?’’

‘‘इस अजनबी शहर में एकदूसरे को जानना ही बहुत बड़ी बात होगी.’’

तब तक एक कार आ कर रुकती है. प्रियंका को कहता है, ‘‘गेट खोल दीजिए भाभीजी.’’

‘‘अरे सरजी, अभी आप का कोई भैया नहीं है, तो मैं भाभी नहीं हुई हूं. दीदी बोला कीजिए,’’ गेट खोलते हुए प्रियंका ने कहा. गेट खुलते ही कार चली गई.

मैं ने फिर कहा, ‘‘तो बताओ.’’ ‘‘मैं ने एमए किया है.’’ ‘‘क्या?’’ जैसे मैं दोबारा सुनना चाहता था.

‘‘वही जो तुम ने सुना. अब सुनो… चारों तरफ कैमरे लगे हैं. मैं अंदर रूम में हूं, तुम गेट पर रहो.’’

‘‘और कहानी’’ ‘‘पहले नौकरी बचाओ.’’

इस बार मैं प्रियंका के कहे मुताबिक काम पर लग गया. इस बार मुझे तनिक भी नहीं लगा कि मैं पढ़ालिखा हूं, बल्कि यह लगा कि मैं पढ़ेलिखे लोगों के साथ हूं.

शाम को प्रियंका जाने लगी तो मैं भी जाने लगा, लेकिन उस ने कपड़े बदल लिए थे. वह सलवारसूट में थी, जैसा मैं गांव की लड़कियों को देखता था एकदम वैसी ही.

यों तो लड़कियों की उम्र पूछना जुर्म है, पर मैं ने वह जुर्म किया. मैं ने प्रियंका की उम्र पूछी, पर उस ने मुझे तुरंत जवाब दिया, ‘‘28 की हो गई हूं.’’

‘‘तुम्हारी कितनी हुई?’’ ‘‘मैं तो 25 साल का हूं अभी.’’ ‘‘तुम्हारी शादी हुई नहीं?’’ ‘‘मेरे बारे में छोड़ो, तुम अपनी बताओ. तुम ने शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘बस जब करना चाहती थी तब हुई नहीं अब शादी नहीं करना चाहती, अकेले ठीक हूं. वैसे मैं अकेली भी नहीं हूं, मेरे पास टैडी बियर है. हमेशा उस के चेहरे पर मुसकान रहती है. चाहे मैं दुखी रहूं, उदास रहूं, गुस्से में रहूं. वह हरपल हंसता रहता है और उस की हंसी देख कर मैं भी खुश हो जाती हूं. वह मुझे  खुश रखने की प्रेरणा है.’’

‘‘तो तुम ने इस मुंबई शहर में अकेले रह कर भी जीने का अच्छा तरीका सीखा है. मुझे  भी यह हुनर सिखाओ न…’’ ‘‘सीख जाओगे, क्योंकि समय सब सिखा देता है, जैसे मुझे  सिखाया.’’

‘‘पर मैं जानना चाहता हूं कि आखिर तुम्हारी शादी क्यों नहीं हुई और किस ने तुम्हें अकेला छोड़ दिया.’’

अब हम उस मोड़ पर आ गए जहां से हम दोनों को अलग होना था. बात अधूरी, हम दोनों कल मिलेंगे बोल कर, अपनेअपने रास्ते हो लिए.

मैं जिस चाल में रह रहा था उस में 4 लड़के रहते थे. कमरे में सामान अस्तव्यस्त रहता था, अजीब सी गंध फैली रहती थी. यह माहौल नींद के लिए तो बिलकुल भी नहीं था, पर हम सब गहरी नीद में सोते थे. हम में से किसी को भी एकदूसरे के खर्राटे का कोई असर नहीं पड़ता था.

वह रात बहुत लंबी लगी क्योंकि मैं सुबह होने का इंतजार करता रहा. कभी खूब नींद आती, कभी अचानक खुल जाती, कभी न नींद में होता, न जागा होता, बस आंखें बंद रहतीं.

अगले दिन मैं ने सोचा कि प्रियंका की सारी कहानी आज जरूर सुन लूंगा और आप सब को बता दूंगा, क्योंकि मैं जानता हूं कि आप सब भी मेरी तरह प्रियंका की कहानी जानने के लिए बेचैन होंगे.

पर जैसे ही मैं प्रियंका के पास पहुंचा, वह मुझे  देख मुसकराते हुए बोली, ‘‘गुड मौर्निंग.’’ ‘‘गुड मौर्निंग… कैसी हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं. सुनो न, तुम 2 नंबर गेट पर चले जाना. मेरी ड्यूटी आज वहीं लगी है.’’

मैं जान गया था कि वह उस बंदे के पास नहीं जाना चाहती है और सच पूछो तो मैं भी प्रियका को छोड़ कर जाना नहीं चाहता था, लेकिन मैं गया क्योंकि अब मैं भी नहीं चाहता था कि प्रियंका उस बंदे के पास जाए.’’

मैं जैसे ही उस बंदे के पास गया उस का जैसे मुंह उतर गया हो.

मैं ने उस से बात करने की कोशिश की, ‘‘आप के भी मुहांसे हैं. क्या आप की शादी नहीं हुई?’’ मेरी इस बात से वह बंदा चौक गया, ‘‘क्या बदतमीजी है…’’

‘‘नहीं मुमुझे भी मुहांसे हैं, शादी मेरी भी नहीं हुई है. मुझे पता चला कि आप को इस का इलाज पता है. वैसे, प्रियंका इस का इलाज कराना चाहती है.’’

अब वह बंदा पहले से भी ज्यादा चौंका, जैसे किसी ने बिजली का झटका दिया हो, ‘‘तुम बदमाशी कर रहे हो.’’ ‘‘नहीं बदमाशी नहीं कर रहा, अब मुझे  मुंहासे वाली बात कैसे पता चलती.’’

‘‘सही कह रहे हो?’’ ‘‘हां, आज रात 10 बजे समुद्र के किनारे एकदम कोने की झाडि़यां के पास जो बड़ा सा पत्थर है वहां तुम्हें बुलाया है.’’ उस बंदे ने फिर कहा, ‘‘सही कह रहे हो न?’’

‘‘हां, अच्छा अब बताओ कि तुम्हारी शादी हो गई है?’’ ‘‘कुछ महीने पहले पत्नी बीमार हो गई थी, फिर मर गई.’’ ‘‘ठीक शाम को आना मत भूलिएगा.’’

शाम को ड्यूटी पूरी कर मैं प्रियंका के साथ निकला.

रास्ते में पूछा, ‘‘हां, तो तुम ने शादी क्यों नहीं की?’’ ‘‘मतलब तुम बिना जाने मुझे छोड़ोगे नहीं.’’ ‘‘कुछ ऐसा ही समझ . कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जानना जरूरी होता है.’’

‘‘तो सुनो, वह गांव क्या था खपरिहंवा कटहरलुहनी गांव से हट कर 4-5 घरों का एक गांव बन गया था, मगर उन घरों को भी खपरिहंवा का ही हिस्सा माना जाता है.

‘‘खपरिहंवा गांव की एक ही समस्या थी. कितनी सरकारें आईं और गईं, मगर मुझे  और मेरी 2 छोटी बहनों, मां को शौच के लिए खेतों में ही जाना पड़़ता था. अमूमन पूरे गांव का यही हाल है.

‘‘पता नहीं मेरे पापा ने घर बनाते समय उस में शौचालय क्यों नहीं बनवाया? मगर सच तो यह था कि अभी तक उस घर का पलस्तर तक नहीं हो पाया था. किसी तरह कुछ पैसे जोड़ कर उन्होंने 2 कमरे और एक बरामदा बना दिया था. हैंडपंप के पास ही नहाने के लिए छोटा सा बाथरूम बनवा दिया था. उस की भी छत नहीं थी. ऊपर चद्दर डाल दी गई थी. मगर मैं अपने पापा से भी ज्यादा राजाजी पर गुस्सा निकालती थी.’’

‘‘राजाजी कौन?’’ मैं ने बीच में बात को काट कर पूछा.

‘‘राजाजी मनकापुर के सांसद थे. जब मैं स्कूल से पढ़ कर घर लौटती… गांव पहुंचतेपहुंचते गुस्से से भर जाती थी. गांव से ले कर शहर तक कच्ची सड़क गड्ढों से भरी पड़ी है. मैं समझ  नहीं पाती कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क.

उस कच्ची सड़क पर मुझे  साइकिल चलाने में बहुत तकलीफ होती. कई बार साइकिल से उतर कर पैदल चलने लगती है. इस दौरान मैं साइकिल से कई बार चढ़तीउतरती.

‘‘मुझे  याद है मैं 9वीं क्लास में थी. स्कूल खत्म होने के बाद मैं मनकापुर शहर अपनी सहेली के जन्मदिन में उस के घर चली गई थी. लौटते वक्त देर हो गई. अंधेरा हो गया. उस दिन अंघेरे में साइकिल चलाना मेरे लिए मुसीबत बन गया. एक तो रास्ते में कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था ऊपर से गड्ढे.

‘‘मैं साइकिल से गिर पड़ी. उस दिन मेरे नाजुक अंग से खून का रिसाव हो गया. उस दिन से आज तक मैं गुस्से से भरी पड़ी हूं. रिसाव की वजह से नहीं क्योंकि मुझे  बाद में समझ आ गया था कि गिरने की वजह से नहीं यह तो प्रकृति का नियम है जो हर लड़की के साथ होता है. गुस्सा तो इस बात का था कि मैं उस दिन के बाद से घर जल्दी लौट आती, किसी कार्यक्रम में नहीं जाती.’’

‘‘कैसा कार्यक्रम?’’ ‘‘मुझे जितना कविता लिखने में अच्छा लगता है, उस से कहीं ज्यादा मंच पर पढ़ना.’’

‘‘अच्छा तो तुम कविता लिखती हो वाह, फिर तो हम दोनों कलाकार हैं. खैर, फिर… ’’

प्रियंका ने अपनी कहानी जारी रखी, पर मेरा प्रतिरूप मुझे  से निकल कर बाजार में कुछ जरूरी चीज खरीदने लगा था. मेरे प्रतिरूप ने एक हथौड़ा खरीदा, जिस के एक तरफ से कील ठोंकी और दूसरी तरफ से निकाली जा सकती थी.

कब हम उस मोड़ पर आ गए जहां से हम दोनों को अलग होना था. पता नहीं यह मोड़ कब आ गया. कहानी अधूरी रह गई. मुझे  इस मोड़ पर भी बहुत गुस्सा आता था. पता नहीं मोड़ क्यों बनाए जाते हैं, बिछड़ने के लिए? थोड़ी देर सुस्ताने के लिए? इकट्ठा होने के लिए?

मैं बाजार में हथौड़ा लिए घूम रहा था. रात के 10 बज रहे थे. तेज लहरों, हवा और मेरी तेज सांसों की आवाज के सिवा कोई नहीं था.

सुनसान जगह पर वही चौकीदार था. उस ने मुझे  देखते ही कहा, ‘‘प्रियंका कहां है?’’

मैं ने बैग से हथौड़ा निकाल कर उस के सिर पर जोर से 2 वार कर दिए. इस से पहले कि वह कुछ और सोच पाता, मैं ने तीसरी बार हथौड़ा उस के सिर पर मारा. मुझे  यह काम सिर्फ 5 मिनट में खत्म करना था.

वह चौकीदार लहूलुहान हो कर गिर पड़ा. मैं उस की लाश को खींचते हुए समुद्र के बहुत अंदर तक ले कर गया. क्योंकि समुद्र बड़ीबड़ी चीजों को निगल जाता है, यह तो एक छोटी सी लाश थी. इस समुद्र ने उस को पलभर में ही कब अपने अंदर समा लिया, पता ही नहीं चला.

हो सकता है इस की लाश को कुछ छोटीमोटी मछलियां खा जाएंगी या कोई शार्क या कोई व्हेल मछली. मैं ने हथौड़े को भी समुद्र की उस गहराई में जोर से उछाल फेंका.

कुल 5 मिनट के अंदर काम खत्म कर मैं समुद्र के एकदम किनारेकिनारे चलने लगा. जैसेजैसे मेरे पैरों के निशान रेत पर पड़ते जाते, वैसेवैसे लहर उन्हें मिटाती जा रही थी.

मेरा प्रतिरूप घर आ गया. मेरा प्रतिरूप लोमड़ी की तरह चालाक, चीते की तरह तेज और सांप की तरह जहरीला है. मेरे प्रतिरूप की और भी कई सारी खासीयतें हैं, जो मुझे  भी नहीं पता, क्योंकि कभीकभी मैं अपने प्रतिरूप से खुद डर जाता हूं. कभीकभी बहुत खुश होता हूं.

अगले दिन खूब खामोशी थी. मैं और प्रियंका एक ही गेट पर थे. हम लंच के समय भी एकसाथ थे. लंच के वक्त मैं ने प्रियंका से अधूरी कहानी पूरी करने को कहा, पर इस बार प्रियंका ने कहा, ‘‘तुम अपने बारे में कुछ बताओ.’’

चूंकि मैं ने कहानी के शुरुआत मैं ही कहा था, यह कहानी मेरी नहीं प्रियंका की है, पर जैसे की मैं ने कहा था अगर मेरी जरूरत हुई तो मैं वहां हाजिर होऊंगा, कुछ समय के लिए मैं प्रियंका की कहानी जानने के लिए हाजिर हो रहा हूं.

‘‘वैसे तो हम पंजाब से हैं पर पिताजी शुरू से चासनाला में रह रहे थे. पिताजी ट्रक ड्राइवर थे. किसी छोटी सी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते. वे ट्रक ले कर दूरदूर जाया करते थे. अकसर वे 2-3 दिन बाद वापस आते. मेरे लिए ढेर सारी चीजें लाते. पिताजी चाहते थे कि मैं पढ़लिख कर खूब बड़ा आदमी बनूं. उन्होंने मुझे  अच्छे अंगरेजी स्कूल में डाला था.

‘‘एक बार पिताजी राजस्थान से ट्रक ले कर आ रहे थे. बौर्डर पर उस ट्रक की पूरी चैकिंग होने लगी. पिताजी आराम से ट्रक में बैठे थे. मगर तभी उन्हें आभास हुआ कि आज कुछ ज्यादा ही चैकिंग हो रही है. पिताजी के ट्रक में रखे माल से 500 ग्राम कोकीन बरामद हुई. पिताजी को पकड़ लिया गया.

‘‘वे पुलिस को बताते रहे कि उन्होंने कुछ नहीं किया, मगर पुलिस वालों ने पिताजी की एक न सुनी और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया. उस समय मैं सिर्फ 5 साल का था. मां की हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो खून नहीं.

‘‘कोर्ट के एक वकील ने मां से कहा कि अगर आप 25 लाख रुपए का इंतजाम करती हैं तो आप के पति बाइज्जत बरी हो जाएंगे.

‘‘मां के पास उस वक्त तो 2,500 भी नहीं थे. मां ने अपने सारे गहने बेच कर भी 2 साल तक केस लड़ती रहीं, मगर पिताजी को 12 साल की जेल हो गई.

‘‘मां महल्ले के एक लड़के को ले कर पिताजी से जेल में मिलने जाया करती थीं. मां कई बार उस लड़के के साथ पिताजी से मिलने गई थीं, फिर एक दिन पिताजी ने कहा, ‘तुम मुझे  मिलने मत आया करो. तुम मेरा इंतजार करो. बेटे की पढ़ाई पर ध्यान दो.’

‘‘पिताजी यह जानते थे कि घर में पैसे कहां से आएंगे, मगर मां ने लोगों के घर में चौकाबरतन का काम शुरू कर दिया. मां ने मुझे फिर एक सरकारी स्कूल में डाल दिया.

‘‘तकरीबन 6 सालों बाद पिताजी लौट आए. तब मैं ने उन से पूछा था, ‘पिताजी, क्या आप सच में ट्रक में ड्रग्स ले कर आ रहे थे?’

‘‘तब उन्होंने कहा था, ‘बेटा, ट्रांसपोर्ट से जो सामान लोड होता है, बस मैं वही ले कर चलता हूं. यह ट्रांसपोर्ट मालिक की कोई बदमाशी होगी.’

‘‘फिर पिताजी चासलाना की एक प्राइवेट कोयला खदान में डंपर चलाने लगे और फिर से हम सब की जिंदगी थोड़ी पटरी पर आ गई. मगर इन 6 सालों में मैं ने, मां और पिताजी ने कितना दर्द सहा, मैं पिता के प्यार से वंचित रहा, जिसे अब भी भरा जाना मुश्किल है, शब्दों में बयां नहीं कर सकते.

‘‘बाद में पता चला कि उस ट्रांसपोर्ट के मालिक को किसी ने चाकू से 6 वार कर के मार दिया था…’’

लंच का टाइम बीत गया था. प्रियंका के टिफिन में रोटियां वैसी ही थीं. पेट खाली था पर आंखें आंसुओं से भर गई थीं. आंसुओं ने पेट भर दिया था.

‘‘आज मेरा मन बहुत हलका हो गया है. अब तक मुझे  लगता था कि मैं ही अकेली हूं इस शहर में जिसे दुख के सिवा कुछ नहीं मिला. क्या सचमुच इस दुनिया का हर आदमी अकेला है?’’

सच में उस दिन प्रियंका मेरे पास ही बैठी रहना चाहती थी, पर गेट नंबर 2 पर एक आदमी की कमी की वजह से मुझे  गेट नंबर 2 पर जाना पड़ा.

शाम हो चुकी थी. जैसे प्रियंका की कहानी आज सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि शहर की भीड़ में हर अकेला आदमी सुन रहा था. 1-1 अकेले आदमी से एक भीड़ बनती है. भीड़ में फिर भी होता है आदमी अकेला.

आज इस अकेलेपन का फायदा सब से ज्यादा मोबाइल को हुआ है. हर आदमी लोगों की भीड़ के बीच मोबाइल में लगा हुआ है. मोबाइल में एक अकेले आदमी को रील में रोते देख, उस की मदद को हर अकेला आदमी हो जाता हैं तैयार. भले ही एक अकेला आदमी उस के सामने रोते हुए मिल जाए, तो नहीं होती किसी को भी उस की फिक्र.

तो आप सब से भी गुजारिश है कि कुछ पल के लिए आप भी मोबाइल छोड़ प्रियंका की कहानी सुनें, इस तरह आप भी दे सकते हैं किसी एक अकेले आदमी को सहारा.

‘‘मुझे  कविता लिखने में अच्छा लगता है उस से कहीं ज्यादा मंच पर पढ़ना, क्योंकि मैं मानती हूं, आप जितनी अच्छी कविता पढ़ेंगे, इस धरती की हवा उतनी शुद्ध होगी, पत्ते खूब हरे होंगे, फल बहुत मीठे होंगे, नफरत कम होगी, क्योंकि अच्छी बातें सब नकारात्मक बातों को मार देती हैं. मैं सोचती हूं आने वाले समय में लोग मुझे  याद रखें या न रखें, पर मेरी कविता हमेशा याद रहेगी.

‘‘एक बार मैं लखनऊ कविता पाठ से वापस लौट रही थी. उस दिन भी मैं काफी लेट हो गई थी. अंधेरे रास्ते को किसी तरह पार कर घर पहुंची थी. घर पहुंचतेपहुंचते रात के 9 बज गए थे. खैर, बाहर जितना गड्ढों का डर था उस से कहीं ज्यादा मुझे  बड़े भाई साहब का डर था. वे मुझे जल्द से जल्द ब्याह कर लेने के लिए कहते थे, पर मैं पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी.

‘‘तब भाई साहब कहते, ‘अपने पैरों पर ही तो खड़ी हो. दूसरों के पैर से कौन खड़ा रहता है.’

‘‘वे मेरे हर काम से चिढ़ते हैं. हर बार चिढ़ कर एक ही बात कहते, ‘तू ब्याह कर जा यहां से.’

‘‘वे डरते थे कि यह ब्याह नहीं कर रही है इस का मतलब जरूर किसी लड़के के साथ चक्कर में है. वे मुझे  खुलेआम धमकी देते, ‘जो भी करना है कर, मगर किसी के साथ भागी तो तेरी जान ले लूंगा.’

‘‘उस दिन भी मैं लखनऊ अपने बड़े भाई को बिना बताए गई थी. दरअसल, बड़ा भाई फैजाबाद में एक शराब के ठेके पर काम करता था.

15 दिनों में एक बार घर आता था या यों समझिए कि जब मूड करे तब घर आता था. आते ही हम सब बहनों पर शासन चलाने लगता था. घर में मांपापा कुछ नहीं कहते थे.

‘‘लखनऊ भी मैं अपने पापा को बोल कर चली गई थी, मगर मां बड़े भाई साहब के लौटने पर बेटे को पूरी रिपोर्ट देती थीं. इस बात पर फिर वह हम बहनों की पिटाई कर देता था, मगर मुझ  से तो वह बहस तक ही सीमित रहता था. फिर पापा ने मुझे छूट दे रखी थी, क्योंकि उन्हें अपने नालायक बेटे से ज्यादा मुझ  पर नाज है. उन की सोच भाई से अच्छी है.

‘‘इसी सोच ने उन्हें बेटे से अलग रखा है. पापा यह भी मानते हैं कि बेटे के नालायक होने के पीछे वे खुद भी एक वजह हैं. जब बच्चे छोटे थे तब वे कमाने के लिए मुंबई निकल आए थे. उस वक्त मुंबई बौम्बे हुआ करता था. चपरासी की नौकरी से महज 7,000 रुपए तनख्वाह मिलती थी जिस में से वे 2,000 रख कर 5,000 घर भेज देते थे.

‘‘10 बीघा खेत था जिस से अनाज हो ही जाता था. उन दिनों जब पापा मुंबई में थे तो लोग उन की कदकाठी को देख कर फिल्मों में भी ट्राई करने के लिए कहते थे. अमिताभ बच्चन जैसी लंबाई और बाल थे. धर्मेंद्र जैसा शरीर, किशोर कुमार जैसी आवाज. किशोर कुमार के गाने बड़े ध्यान से गाते थे. रूम में रह रहे अपने पार्टनरों को गाना सुनाया करते थे.

‘‘वे दुख की वजह से गाना अच्छा गा लेते थे या सुख की वजह से वे खुद नहीं समझ  पाते थे. आज उन्हें लगता है दुख, कमी, पीड़ा ही इनसान को कलाकार बना देती है.

आज उन्हें लगता है कि बेटी प्रियंका को भी दुखों ने कवि बना दिया है. वे कभीकभी पछताते हैं कि उन्होंने भी उस समय मुंबई में फिल्मों में ट्राई किया होता तो शायद जिंदगी कुछ और होती. कई बार उन का मन हुआ था कि वे भी फिल्म स्टूडियो जाएं, मगर कुछ न कुछ सोच कर रुक गए. आज उन्हें लगता है मन जो कहे वह जरूर करना चाहिए ताकि आगे अफसोस न करना पड़े. उन्हें लगता है मन की न करने से मन भारी हो जाता है. मन भार से इतना दब जाता है कि फिर उस की मौत हो जाती है. फिर सारी इच्छाए मर जाती हैं.

‘‘मेरे पिताजी शिवकुमार को कई बार लगने लगा था कि उन के शरीर से कुछ अजीब गंध आने लगी है. नहाने के बाद भी वे ऐसा ही महसूस करते, मगर शर्म से कभी अपने दोस्तों को बताते नहीं थे. उलटा दोस्तों से थोड़ा दूरदूर रहते थे.

‘‘वे अपनी पत्नी यानी मेरी मां को गांव के पीसीओ से फोन कर बताते, ‘मेरे शरीर से हमेशा गंध आती है,’ तो मां हमेशा समझाती थीं, ‘ऐसी कोई बात नहीं है.’

‘‘फिर पिताजी इत्र की शीशी खरीद कर ले आए. सब दोस्त उन के परफ्यूम लगाने पर चिढ़़ाते, ‘लगता है मुंबई में कोई पट गई है.’

‘‘इन सब बातों से पिताजी और बीमार हो गए. आखिर में गांव चले आए. गांव की हवा और पत्नी के साथ रात बिताने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उन के शरीर से कोई गंध नहीं आती.

‘‘यहां आ कर आखिर कब तक खाली बैठते, अपने काम मे लग गए. गांव का एक दोस्त जो गांजा बेचने का काम करता था उस के साथ गांजा बेचना शुरू कर दिया. साथ ही दिनभर खेतों में काम भी करते.

‘‘गांजा बेचतेबेचते पीने की भी लत लग गई. भर दोपहरी गांजा पी कर खेतों में काम करते रहते. रहीसही कसर गांजा और धूप ने पूरी कर दी. रात में सोते समय उन्हें लगने लगा कुछ अजीब सी आवाजें आ रही हैं. नींद से उठ कर बैठ जाते. कई रातों से वे सो नहीं पा रहे थे. उन की दिमागी हालत एकदम ही खराब हो गई. दवाओं का सहारा लेना पड़ गय.

‘‘डाक्टरों ने बता दिया कि सब नशा करने से हो रहा है. सब से पहले मां ने उन का गांजा छुड़वाया. कड़ी निगरानी रखने लगीं. बच्चों को भी निगरानी रखने के लिए कहा. पर घर की माली हालत पहले ही डांवांडोल थी. अब और भी बदतर होने लगी. घर की छोटीछोटी जरूरतों के लिए हाथ फैलाने पड़ गए. मां, मेरा भाई ऐसे ही खेती ठीक से देख नहीं पा रहे थे. मन किया तो कुछ कर लिया, नहीं तो सोए रहे. खेत आधे अनाज पर दे दिया गया. ऐसे में मैं ने नौकरी करने की सोची.

‘‘उस वक्त मैं 12वीं जमात ही पास थी. मैं शहर में काम की तलाश में निकली. चारों तरफ प्राइवेट स्कूल थे. सरकारी हिंदी स्कूल से पास होने की वजह से उन स्कूलों में मुझे

कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी. कुछ स्कूल के प्रिंसिपल पूछते, ‘कंप्यूटर जानती हो?’

‘‘मैं धीरे से सिर न में हिला देती. कुछ एकाध स्कूल वाले मुझे  फाइल रखनेरखाने के काम के लिए कहते. मैं उस के लिए राजी होती, मगर उस में भी मुझे  यह कह कर भेज दिया जाता कि आप को बाद में बताएंगे.

‘‘खैर, मुझे  तो उस वक्त अंगरेजी स्कूल के प्रिंसिपल पर गुस्सा न आ कर अपने पिताजी पर खूब गुस्सा आता था कि अगर अच्छे स्कूल से पढ़ाया होता तो आज यह हालत नहीं होती.

‘‘उन्हीं दिनों शहर में कपड़ों की बड़ी कंपनी की दुकानें खुली थीं. मुझे  किसी ने वहां काम करने के लिए कहा. मैं वहां काम करने के लिए राजी हुई, पर भाई का विरोध शुरू हो गया. फिर वहां भी नहीं जा पाई.

‘‘मुझे  लगा कि बिना अंगरेजी सीखे कुछ नहीं हो सकता. कालेज से लौटने के बाद अंगरेजी सीखने लगी. मन ही मन खुद से अंगरेजी में बात करती. आईने के सामने अंगरेजी बोल कर बातें करती. ऐसे ही वक्त जब मैं अपनी अंगरेजी मजबूत करने में लगी थी, तो मेरे शहर में 5वीं तक एक प्राइवेट स्कूल का उद्घाटन हुआ. यह बात पता चली तो मैं स्कूल पहुंच गई. स्कूल में वहां के प्रिंसिपल से मिली. उस स्कूल में मुझे  हिंदी टीचर की नौकरी मिल गई. तनख्वाह के नाम पर मुझे  सिर्फ 1,200 रुपए ही मिलने शुरू हुए.

‘‘कुछ दिनों बाद ही मुझे  गांव में कुछ ट्यूशन भी मिल गईं. ट्यूशन से भी मुझे  1,000 रूपए आने लगे. करीब 6 महीने काम करने के बाद मैं ने कुछ पैसे जमा कर लिए. 3,000 की पूंजी लगा कर मैं ने अपने घर के बाहर के एक कमरे में लैमनचूस, चौकलेट, बिसकुट जैसे छुटपुट सामान रख कर एक छोटी सी दुकान खोल ली और अपने पिताजी को दुकान में बैठने के लिए कहा.

‘‘धीरेधीरे दुकान भी चल पड़़ी. दुकान में सामान भी बढ़ा दिया गया. घर की जरूरी चीजें दुकान से ही ले ली जाती थीं. बस, इन्हीं सब बातों से पिता को मुझे  काफी गर्व होता. मगर उन्हें भी मेरे ब्याह की चिंता रहती, क्योंकि मेरे साथ की सभी लड़कियों का ब्याह हो गया था. मगर चिंता इस बात की थी कि लड़के वालों से कहीं ज्यादा मैं नहीं चाहती कि किसी ऐरेगैरे नत्थू खैरे से शादी करूं.

‘‘दरअसल, मैं चाहती थी कि खुद अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं या फिर मेरा पति इतना सबल हो कि मेरे आने वाले कल के सारे सपने पूरे कर सके. कई बार तो मेरे आसपास की भाभियां भी कहती, ‘प्रियंका, क्या तेरा दुलहन बनने का मन नहीं करता?’

‘‘पर मैं इस बात से शरमाती नहीं थी. मैं कहती, ‘जब समय होगा दुलहन बन जाऊंगी.’

‘‘पिताजी यही सोचते कि अगर प्रियंका की कोई पसंद हो तो वह मुझे  बता दे तो मैं बेटी को वहीं ब्याह दूं. ऐसा भी नहीं था कि मेरी अपनी कोई पसंद नहीं थी. मेरी अपनी पसंद थी. 12वीं के इम्तिहान के बाद मैं अपने मामा के पास लखनऊ गई थी. वहां मुझे  मामा के बेटे के दोस्त देव को देखने पर पहली ही नजर में प्यार का अहसास हुआ था. कुछ दिनों के बाद हम दोनों फेसबुक के जरीए आपस में जुड़ गए. फिर मैसेंजर से हायहैलो करना शुरू कर दिया. हायहैलो से बात आगे बढ़ी तो हम दोनों ने एकदूसरे को अपनाअपना फोन नंबर दिया. हम दोनों में बातें होना शुरू हुईं. फिर मिलनाजुलना भी हुआ.

‘‘हमारा प्यार अपने परवान पर था. जीनेमरने की कसमें खाई जा रही थीं. एकदूसरे से कभी न बिछड़ने के वादे किए जा रहे थे. चेहरे पर हलकेहलके मुंहासे आ गए थे. चूंकि मनकापुर में भी उस के रिश्तेदार थे इसलिए वह गांव में भी लंबे समय तक रहता.

‘‘एक दिन मांपिताजी खेतों में गए हुए थे. घर पर कोई नहीं था. देव अचानक मेरे घर आ गया और मेरे बहुत नजदीक आ गया. मैं ने 12वीं में ही अपना कुंआरापन खो दिया.

‘‘उस दिन सिर्फ बिस्तर ही नहीं, मेरी आंखों के सामने सब कुछ लाललाल दिखने लगा था. उस ने मुझे  एक गोली दी और कहा कि खा लो. मैं ने खा ली. फिर वह चला गया.

‘‘उस दिन मैं खूब रोई कि यह मैं ने क्या किया. पर यह सिलसिला चल पड़ा. उसे जब भी मौका मिलता वह मेरे साथ बस यही सब करता और मुझे  छोटी गोली खिला कर चला जाता. न जाने उस ने मुझे  कितनी बार गर्भनिरोधक गोलियां खिलाई थीं.

‘‘3 साल के बाद जब मैं बीए पास कर चुकी थी. देव मेकैनिकल डिप्लोमा कर एक प्राइवेट कंपनी में काम पर लग गया था. ऐसे ही एक वक्त जब घर में सब कोई ब्याह करने की जिद कर रहा था, तब मैं ने देव के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. देव ने कहा, ‘अभी मैं सरकारी नौकरी की कोशिश में हूं, जब लग जाएगी तब ब्याह करूंगा.’

‘‘उ  स दिन मुझे  यह बात अच्छी लगी थी. मुझे  लगा था कि मेरी पसंद सही है. यही है मेरे सपनों का राजकुमार. पर सच में तो यह एक सपने का ही राजकुमार था. उस की रेलवे में नौकरी तो लग गई, पर मैं उस की नहीं हो पाई.

‘‘नौकरी लगने के बाद उस के मांबाप ने भी दहेज की डिमांड की जो मेरे पिता कभी नहीं दे पाते. सो देव ने भी मुझे  मांबाप के खिलाफ ब्याह करने से मना कर दिया.

‘‘मैं भावनात्मक रूप से टूट रही थी. मैं ने देव को फोन लगाया. मैं ने उस से पूछा, ‘अगर तुम्हें दहेज ही चाहिए था तो मेरे शरीर से क्यों खेले? सिर्फ दहेज ही तुम्हारे लिए सबकुछ है? क्या तुम यह नहीं समझते कि शादी के पहले किसी लड़की से संबंध बना कर उसे छोड़ देना एक लड़की को कितना तोड़ सकता है?’

‘‘वह बोला, ‘मैं तुम्हारी भावनाओं से नहीं खेल रहा, बस मांपापा नहीं मान रहे हैं और मैं मांपापा की मंजूरी से ही शादी करना चाहता हूं.’

‘‘मैं ने देव को कई बार मनाने की कोशिश की पर वह नहीं माना. आखिर में उस ने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया.

‘‘एक दिन मैं अपनी छत पर चली गई. देव को छत से फोटो भेजी और कहा कि अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो मैं छत से कूद जाऊंगी.

‘‘पर उस का कोई जवाब नहीं आया. और मैं छत से कूद गई. मगर कमबख्त देव की तरह मुझे  यमराज भी नहीं ले कर गए. जब होश आया तो मैं सरकारी हस्पताल के आईसीयू में गंभीर हालत में भरती थी.

‘‘जैसे ही मैं होश में आई भैया, मां सब मुझे  कहने लगे, ‘तुम देव के खिलाफ पुलिस में बयान दो.’

‘‘पर पुलिस को मैं ने कोई बयान नहीं दिया. मैं नहीं जानती मैं ने ऐसा क्यों किया. पर मैं ने उस दिन के बाद ठान लिया कि अब ब्याह ऐसे लड़के से करूंगी जो मेरी भावनाओं को समझे, मेरे प्रेम को समझे.

‘‘मैं ने यह भी सोच लिया कि अपने घर वालों पर बोझ  नहीं बनूंगी. आत्मनिर्भर बनूंगी. मैं नौकरी की तलाश में लग गई.’’

हम फिर से उसी मोड़ पर आ गए थे. मगर आज मोड़ हमें रोक नहीं पाया.

प्रियंका ने कहा, ‘‘आओ तुम्हें अपना रूम दिखाती हूं.’’

‘‘अरे वाह, फिर तो तुम्हारे हाथ की चाय भी पिऊंगा.’’ ‘‘जरूर,’’ वह बोली. मैं ने धीरे से कहा, ‘‘फिर आगे क्या हुआ?’’

‘‘मेरे भैया शहर में एक घर बना रहे थे. यह पैसा वे कहां से ला रहे थे, पता नहीं. अचानक भैया को पुलिस ने पकड़ लिया. भैया को गैरकानूनी रूप से शराब बेचने, नकली शराब बनाने के जुर्म में पकड़ लिया गया. और भी न जाने कौनकौन से जुर्म उन पर लगा दिए गए, जो उन्होंने किए भी नहीं थे. यहां तक कि शहर के घर को कुर्क कर दिया गया.

‘‘भैया को छुड़ाने के लिए घर का सारा सामान एक के बाद एक बिकना शुरू हो गया. बैंक से लोन लिया गया. 3 सालों से केस चल रहा है.

‘‘घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने के लाले पड़ गए. फिर छोटी बहन मुंबई कमाने आ गई. यहां किसी रैस्टोरैंट में लग गई. फिर मुझे  बहन के चक्कर में मुंबई आना पड़ा. पर कहीं नौकरी मिल नहीं रही थी.

‘‘एक अखबार में नौकरी का इश्तिहार देख कर किसी को कुछ बताए बिना इंटरव्यू देने के लिए मैं बोरीवली निकल गई. कई लड़कियों के बाद मेरा भी नंबर आया. औपचारिक पूछताछ के बाद उन्होंने कहा, ‘मनकापुर से मुंबई बहुत दूर है. मुंबई में है कोई जानने वाला?’

‘‘मैं ने कहा, ‘सर, जानने वाला न भी होता तो भी मैं नौकरी करूंगी. जानने वाले अपनेआप हो जाएंगे.’

‘‘उन्होंने पूछा, ‘ऐसा क्यों?’

‘‘मैं ने कहा, ‘सर, मेरे पिता किसान हैं. तबीयत खराब होने की वजह से किसानी भी नही होती. छोटी सी दुकान है. थोड़ीबहुत खेती भी हो जाती है. इन सब से खानापीना, ओढ़ना हो जाता है बस. मगर मेरी शादी के लिए मांगी गई दहेज की डिमांड पूरी नहीं हो पाती. सो, मैं ने फैसला किया कि दहेज लेने वाले लड़के से ब्याह नहीं करूंगी, न ही घर वालों के ऊपर बोझ बनूंगी.’

‘‘इंटरव्यू लेने वाले को लगा जैसे किसी ने उसे बहुत जोर का चांटा रसीद कर दिया है. उस का चश्मा खुल कर गिर गया. गालों पर पांचों उंगलियों की छाप पड़ गई हो…

‘‘और अब यहां तुम्हारे साथ हूं. हम दोनों बहनें हर महीने मां को पैसे भेज देती हैं.’’

हम कमरे में पहुंच गए थे. प्रियंका के हाथ की बनी प्याली से ज्यादा माहौल गरम हो चुका था. हम दोनों एकदूसरे के चेहरे के मुंहासे देख रहे थे.

मैं और प्रियंका एकदूसरे के बहुत करीब थे. मैं ने अपने होंठों को प्रियंका के होंठों पर रख दिया था. चाय की प्याली ठंडी होने लगी थी. उस दिन प्रियंका को लगा था, उसे वह लड़का मिल गया हैं जो उस की भावनाओं को समझे, प्रेम को समझे.

चाय की प्याली जितनी ठंडी हुई थी बिस्तर को हम दोनों ने उतना ही गरम कर दिया था… धीरेधीरे हम दोनों के चेहरे से मुंहासे खत्म होने लगे थे.

एक आखिरी बात… क्योंकि मेरा प्रतिरूप बहुत गुस्सैल है. उस ने देव को ढूंढ़ने के लिए लखनऊ की ट्रेन पकड़ ली थी.

मेरे प्रतिरूप ने मुझ से कहा, ‘क्या आप को नहीं लगता देव जैसे लड़कों को सजा मिलनी चाहिए? न जाने वह ऐसी ही किसी और लड़की की जिंदगी खराब कर देगा.’

मेरे प्रतिरूप ने मुझ से कई सारे सवाल उस रात ही किए थे.

-विक्रम सिंह

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