Hindi Story : दामाद

Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

Health : हाई ब्लड प्रैशर, 20 साल के नौजवान भी चपेट में

Health. अब से कुछ समय पहले एक बड़े अखबार के मारफत डाक्टर भुवन चंद्र तिवारी, (तब के) प्रोफैसर और एचओडी, लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ ने बताया था कि हाई ब्लड प्रैशर अब 20 साल की उम्र के नौजवानों में भी देखने में आ रहा है. जांच नहीं करने से ज्यादातर लोग इस से अनजान बने रहते हैं. इस से 30-45 साल में ही हार्ट अटैक, 40 साल में स्ट्रोक, 30 साल में किडनी फेल होने जैसी समस्याएं उभर रही हैं.

यहां नौजवानों को डराया नहीं जा रहा है, पर यह कड़वी हकीकत है कि अब नई उम्र के लोगों में भी हाई ब्लड प्रैशर की समस्या बढ़ती जा रही है. एक स्टडी के मुताबिक, यह 20 से 40 साल की उम्र के तकरीबन 8 में से एक बालिग को भी प्रभावित करता है.

ब्लड प्रैशर होता क्या है

आसान शब्दों में समझे तो ब्लड प्रैशर का मतलब है कि जब आप का दिल पूरे शरीर में खून पंप करता है, तो वह खून आप की नसों की दीवारों पर कितना दबाव डालता है.

अमूमन डाक्टर 120/80 के ब्लड प्रैशर को एकदम नौर्मल या आदर्श मानते हैं. ये 2 नंबर हैं, जैसे ऊपर वाला 120 और नीचे वाला 80. यह एक यूनिट है, जिसे मिलीमीटर औफ मर्करी कहते हैं.

ऊपर वाले 120 को सिस्टोलिक प्रैशर कहते हैं. मतलब, दिल जब धड़क कर खून को धमनियों में पंप करता है, तब नसों की दीवार पर जो सब से ज्यादा दबाव पड़ता है, वह 120 है. आसान भाषा में इसे दिल के सिकुड़ने का प्रैशर कह सकते हैं.

नीचे वाले को 80 या डायस्टोलिक प्रैशर कहते हैं. मतलब, दिल की 2 धड़कनों के बीच जब दिल आराम करता है और खून भरता है, तब नसों में जो सब से कम दबाव रहता है, वह 80 है. आसान भाषा में कहें तो दिल के आराम करने का प्रैशर.

सवाल उठता है कि 120/80 क्यों आदर्श माना जाता है? इस का जवाब यह है कि इसी लैवल पर दिल को न ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, न ही दिमाग, किडनी, आंखों की नसों पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ता है. हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक का रिस्क सब से कम रहता है. अगर किसी इनसान में इस से ज्यादा ब्लड प्रैशर लगातार बना रहता है, मान लो 140/90 (सिर्फ उदाहरण के लिए), तो वहां समस्या पैदा होने लगती है या पैदा हो सकती है.

हाई ब्लड प्रैशर के नुकसान

जिंदल अस्पताल, हिसार, हरियाणा में सीनियर कंसल्टैंट कार्डियोलौजिस्ट डाक्टर दीपक भारद्वाज ने बताया, ‘‘हाई ब्लड प्रैशर एक बहुत ही गंभीर बीमारी है. आमतौर पर इस का कोई लक्षण नहीं होता है, इसलिए इसे ‘साइलैंट किलर’ कहा जाता है. इस की दर उम्र के साथ बढ़ती है, इसलिए यह बड़ी उम्र के लोगों में ज्यादा आम है.

‘‘ज्यादातर लोगों में इस की कोई वजह नहीं मिलती, जिन में इसे इडियोपैथिक (जिस की वजह पता न हो) कहा जाता है. कुछ लोगों में इस की साफ वजह मिलती है. इसे सैकेंडरी हाइपरटैंशन कहते हैं.

‘‘कम उम्र के लोगों में सैकेंडरी हाइपरटैंशन होने का डर ज्यादा होता है. इस की खास वजह गुर्दे (किडनी) से जुड़ी बीमारी, कोर्क्टेशन औफ एओर्टा (महाधमनी में संकुचन), रीनोवास्कुलर हाइपरटैंशन (किडनी की धमनियों में ब्लौकेज) और हार्मोनल डिसऔर्डर होते हैं.’’

‘‘आजकल डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़ी गलत आदतों के चलते कम उम्र के लोगों में भी हाई ब्लड प्रैशर काफी कौमन है, इसलिए हम सब को नियमित रूप से अपना ब्लड प्रैशर कम से कम साल में एक बार चैक करना चाहिए.

‘‘हाई ब्लड प्रैशर के इलाज में सब से पहले हमें यह देखना होता है कि यह इडियोपैथिक हाइपरटैंशन है या सैकेंडरी हाइपरटैंशन. इस के लिए हार्ट, गुर्दे और ब्लड टैस्ट करने होते हैं. अगर माइल्ड हाइपरटैंशन है, तो हमें लाइफस्टाइल में बदलाव करना होता है. अगर यह कंट्रोल में न आए तो दवाएं लेनी पड़ती हैं.

‘‘हाई ब्लड प्रैशर की बहुत सारी कारगर दवाएं हैं, जिन के मिनिमल साइड इफैक्ट्स हैं. लाइफस्टाइल में बदलाव के लिए हमें नियमित कसरत करनी चाहिए, नमक की मात्रा कम रखनी चाहिए, अपने वजन को कंट्रोल में रखना चाहिए, स्मोकिंग बंद करनी चाहिए, ताजा फल और सब्जियां खानी चाहिए, जंक फूड से परहेज करना चाहिए और अच्छी गहरी नींद लेनी चाहिए.

‘‘हाई ब्लड प्रैशर का बुरा असर दिल, किडनी, आंख, दिमाग और नसों पर पड़ता है. इस से हार्ट फेल, किडनी फेल और ब्रेन स्ट्रोक भी हो सकता है.’’

अगर नौजवान हाई ब्लड प्रैशर को हलके में ले रहे हैं, तो वे बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं. मोबाइल और लैपटौप की स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना, अपनी पढ़ाई और काम की टैंशन लेना, देर रात तक जागना उन्हें हाई ब्लड प्रैशर का मरीज बना सकता है. लिहाजा, नौजवानों को अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करना चाहिए और अगर कोई समस्या पैदा हो रही है, तो डाक्टर से जरूर सलाह लें. Health

News Story : गुस्साए नौजवान और कौकरोच जनता पार्टी

News Story. विजय कई दिनों से अनामिका से नहीं मिला था. गरमी भी बहुत ज्यादा पड़ रही थी. इसी बीच अपने पड़ोस के एक बच्चे का सीईयूटी का एग्जाम दिलाने के लिए वह नोएडा भी गया था. वहां तपती दोपहरी में बच्चों के मांबाप ने कैसे दिन गुजारा था, यह देख कर विजय का दिलोदिमाग हिल गया था. वह तो अच्छा हो, विजय का एक दोस्त वहीं आसपास रहता था, वरना उस का भी लू के चलते भेजा फ्राई हो जाता.

इसी तनाव को दूर करने के लिए विजय अनामिका से मिलने उस के कमरे पर पहुंचा. पर वहां तो एक अलग ही राग अलापा जा रहा था. वहां कमरे के एक कोने में अनामिका ने कुछ डंडों पर प्लेकार्ड लगा रखे थे, जिन में कुछ फोटो और स्लोगन आदि थे. दीवार के बीच में एक कागज पर केजीपी लिखा था.

‘‘अनामिका, यह सब क्या नौटंकी है? यह केजीएफ क्या बला है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘यह मेरा नया मिशन है. केजीएफ. बोले तो कटखनी गाय पार्टी. एक ऐसा आंदोलन जो सत्ता पक्ष की ईंट से ईंट बजा देगा,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब इस की क्या जरूरत आ पड़ी है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘तुम ने खबर नहीं पढ़ी कि कैसे लड़कियों और औरतों को सताया जा रहा है. ट्विशा शर्मा की मौत का मामला भूल गए क्या. उन के पति समर्थ सिंह पेशे से वकील हैं और उन की सास गिरिबाला सिंह पूर्व जिला जज हैं. इन दोनों पर दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. दूसरी तरफ हमारे चीफ जस्टिस सूर्यकांत नई पीढ़ी को कौकरोच बता रहे हैं. सत्ता पक्ष का तो छोड़ ही दो, अब तो कानून वाले भी अपने फर्ज से भटकने लगे हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम भी सोशल मीडिया के बहकावे में आ गई. हमारी सरकार और कानून व्यवस्था एकदम सही काम कर रही है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की अधिकतम संख्या (स्वीकृत पद) को 34 से बढ़ा कर 38 कर दिया है. ‘‘इतना ही नहीं, दुनियाभर में लड़ाई का माहौल है और हमारे प्रधानमंत्री हर बड़े नेता से मिल कर दुनिया को एकजुट कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि दुनिया में शांति हो,’’ विजय ने सरकार को ले कर अपना पक्ष रखा.

‘‘हां, देख लिया हम ने उन का मैलोडी चौकलेट वाला वीडियो. भारत की जनता से कहा कि कहीं बाहर मत जाओ, अपने खर्चे कम करो, सोना मत खरीदो और खुद सरकारी खर्च पर विदेश यात्रा कर रहे हैं. ‘‘यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बना कौकरोच जनता पार्टी पेज एकदम से वायरल हो गया है. देखते ही देखते लाखों नौजवान उस से जुड़ गए हैं.

‘‘हमारी कटखनी गाय पार्टी भी ऐसा ही भौकाल मचाने के लिए बनी है. जो लोग लड़कियों और औरतों को बेचारी गऊ समझते हैं उन्हें हम बताएंगे कि सींग मारने वाली कटखनी गाय कितनी खतरनाक होती है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘अब तुम किस कौकरोच जनता पार्टी को कहां से बीच में ले आई?’’

‘‘वही पार्टी जिस ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के एक गलत बयान के बाद जन्म लिया है और उसी के दम पर लाखों नौजवान अब केंद्र सरकार से सवाल पूछ रहे हैं,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘चलो, मान लिया कि जस्टिस सूर्यकांत को इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी. पर इतना जल्दी सोशल मीडिया पर कौकरोच जनता पार्टी का पेज बनाना कोई हंसीखेल नहीं है. यह सब किस ने किया और हुआ कैसे?’’ विजय ने पूछा.

अनामिका बोली, ‘‘मैं इस बारे में जब खोजबीन कर रही थी, तो बीबीसी की एक रिपोर्ट पर मेरी नजर गई. वहां बड़ी डिटेल में सब बताया गया था.’’ ‘‘तो तुम मुझे  भी समझा दो न,’’ विजय बोला.

अनामिका ने कहा, ‘‘दरअसल, कौकरोच जनता पार्टी की वैबसाइट पर इस के संस्थापक और संयोजक की जानकारी दी गई है और उन का नाम अभिजीत दीपके है.

‘‘अभिजीत दीपके से बीबीसी न्यूज मराठी ने लंबी बातचीत की, जिस में उन्होंने बताया कि इस तरह का सोशल मीडिया कैंपेन उन्होंने किस वजह से शुरू किया.

‘‘अभिजीत दीपके ने बताया, ‘मैं ट्विटर (अब एक्स) पर सीजेई (भारत के मुख्य न्यायाधीश) का बयान देख रहा था, जहां पर वे सिस्टम की आलोचना करने और राय देने के लिए देश के नौजवानों की तुलना कौकरोच और परजीवियों से कर रहे थे.’

‘‘दीपके ने आगे बताया, ‘मैं ने इसे बेहद हास्यास्पद समझा  क्योंकि सीजेआई को देश के संविधान का संरक्षक माना जाता है. वह संविधान जो हर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आजादी देता है. अब एक ऐसा शख्स जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए कैसे युवाओं की तुलना कौकरोच और परजीवियों से कर सकता है?

‘‘‘इस ने मुझे  गुस्से और निराशा से भर दिया और ट्विटर पर मैं ने इस पर अपनी राय दी. मैं ने पूछा कि सब कौकरोच एक साथ आ जाएं, तो क्या होगा? मु?ो जेन जी और 25 साल तक के नौजवानों के कमाल के जवाब मिले और उन्होंने कहा कि हमें साथ आना चाहिए और एक प्लेटफार्म बनाना चाहिए.

‘‘‘इस ने मुझे आइडिया दिया कि हमें औनलाइन एक पैरोडी पार्टी बनानी चाहिए, जिस का नाम कौकरोच जनता पार्टी हो. अगर आप हमें कौकरोच कह रहे हैं तो ठीक है, हम कौकरोच जनता पार्टी बनाते हैं. इस पार्टी में शामिल होने के लिए मैं ने पात्रता तय कीं, जैसे आप को आलसी होना होगा, जैसा सीजेआई ने कहा, आप को बेरोजगार होना होगा और आप लगातार औनलाइन रहने वाले हों, जैसा सीजेआई ने कहा था.

‘‘‘उन्होंने (सीजेआई) जिन भी शब्दों का इस्तेमाल नौजवानों को बेइज्जत करने के लिए किया, हम ने उन्हें इस पार्टी का सदस्य बनने के लिए पात्रता रखा है. कुछ ही घंटों में इस ने चमत्कार कर दिया और हर कोई इस पर प्रतिक्रिया देने लगा और खुद को रजिस्टर्ड करने लगा.

‘‘‘इस के बाद हमें लगने लगा कि यह बड़ा होने वाला है और सिर्फ मजाक नहीं रह गया है, क्योंकि लोग निराश हो चुके थे और हम ने एक वैबसाइट बनाई, पार्टी का घोषणापत्र बनाया. इंस्टाग्राम पर हमारे 2 मिलियन फौलोअर्स (अब कई मिलियन से ज्यादा) हो चुके हैं और 2 लाख से ज्यादा लोगों ने खुद को कौकरोच जनता पार्टी के सदस्य के तौर पर रजिस्टर किया है. भारतीय राजनीति में यह समय के बाद अभूतपूर्व है.’’’

‘‘क्या कुछ चर्चित लोगों ने भी अभिजीत दीपके की इस मुहिम का समर्थन किया है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘अगर अभिजीत दीपके की मानें तो क्रिकेटर रह चुके और सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि वे इस पार्टी में शामिल होना चाहते हैं. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस का समर्थन किया. इन के अलावा कई लोगों ने हमारा समर्थन किया है और आज यह चर्चा का विषय है. साथ ही दिन ब दिन यह तादाद बढ़ती चली जा रही है,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘अच्छा, तुम्हें कौकरोच जनता पार्टी के सोशल मीडिया पर लाखों फौलोअर्स होने के पीछे की क्या कहानी नजर आती है?

‘‘इस बारे में अभिजीत कहते हैं, ‘मैं यह नहीं कहूंगा कि यह सब मैं ने हासिल किया है. ये सब लोग आपस में साथ आए हैं. हमें ये सम?ाना चाहिए कि इन्हें क्या चीज साथ ले कर आई है. अगर आज कोई डिजिटल एजेंसी या कोई राजनीतिक दल ऐसा कुछ करता तो उसे इतनी तेजी से ये कामयाबी नहीं मिलती. फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कितना पैसा खर्च किया होता. करोड़ों रुपए खर्च कर के भी किसी को ऐसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती.

‘‘‘नौजवानों के अंदर कई सालों से जो निराशा और गुस्सा पल रहा है वही इतनी बड़ी प्रतिक्रिया की वजह है. सरकार की नाकामियों की वजह से नौजवान बेरोजगार हैं. उन्हें एक मंच मिला जहां पर वे अपनी निराशा और गुस्से को निकाल सकते हैं.’’’ ‘‘लेकिन अभिजीत दीपके आखिर कौन हैं? सुना है वह आम आदमी पार्टी से जुड़ा रहा था?’’ विजय ने सवाल दागा.

‘‘इस बारे में अभिजीत दीपके खुद बताते हैं, ‘मैं महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर से हूं. ग्रैजुएशन के लिए मैं पुणे गया. इस के बाद मुझे कुछ सालों के लिए आम आदमी पार्टी के साथ काम करने का मौका मिला जहां मैं उन की कम्युनिकेशन टीम में था.

‘‘‘मैं उन के स्वास्थ्य और शिक्षा पर काम करने की वजह से उन से आकर्षित था. यह कुछ नया था जो पहली बार भारतीय राजनीति में हो रहा था. जैसे आज कौकरोच जनता पार्टी नई है, ऐसा ही मु?ो लगा कि वो कुछ नया बदलाव लाने जा रहे हैं.

‘‘‘मैं ने कुछ समय के लिए उन के साथ काम किया फिर मु?ो लगा मु?ो और पढ़ने की जरूरत है और मैं घर पर मास्टर्स की तैयारी करने लगा. मुझे बोस्टन यूनिवर्सिटी से बुलावा आया. मैं 2 साल से यहां पर हूं और अपनी ग्रैजुएशन पूरी की है.’’’ ‘‘क्या कौकरोच जनता पार्टी का कोई घोषणापत्र भी है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘इस पर अभिजीत दीपके ने बताया, ‘मुझे लगता है कि घोषणापत्र इस समय भारत के लोकतंत्र और वर्तमान राजनीतिक स्थिति के बारे में बताता है. हम लगातार देख रहे हैं कि वे जज जिन्हें निष्पक्ष रहना होता है, जिन का सरकार से कुछ लेनादेना नहीं होना चाहिए वे रिटायरमैंट के बाद सरकार से लाभ ले रहे हैं. यह बहुत खतरनाक है, क्योंकि न्यायपालिका को स्वतंत्र रहना होता है. अगर न्यायपालिका भी सरकार की राह पर चलेगी तो फिर क्या रह जाएगा? फिर लोकतंत्र को कौन बचाएगा?

‘‘‘दूसरी बात महिला के प्रतिनिधित्व को ले कर है. मैं बचपन से सुनता आया हूं कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा, लेकिन आज तक यह नहीं हुआ. अगर महिलाओं को आरक्षण देना है तो उन्हें 50 फीसदी आरक्षण दीजिए.’’’

‘‘तो क्या भारत के जेन जी नेपाल और श्रीलंका के जेन जी वाले आंदोलन की तरफ जा रहे हैं? नेपाल में तो आंदोलन के बाद सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था. क्या यहां भी ऐसा ही कुछ हो सकता है?’’

‘‘तुम्हारा सवाल बड़ा रोचक है. वैसे, ऐसे हालात पर अभिजीत दीपके कहते हैं कि भारत के जेन जी की तुलना श्रीलंका, नेपाल और बंगलादेश के जेन जी से करना ‘एक बड़ा अपमान’ होगा, क्योंकि वे (भारतीय जेन जी) हिंसा नहीं भड़का रहे हैं.

‘‘अभिजीत आगे कहते हैं, ‘भारतीय जेन जी व्यंग्य के जरीए अपनी नाखुशी जाहिर कर रहे हैं. कौकरोच का कौस्ट्यूम पहन कर वे यमुना को साफ कर रहे हैं, कूड़ा हटा रहे हैं. वे इस के जरीए सिस्टम की खिल्ली उड़ा रहे हैं. वे सड़क पर जा कर हिंसा नहीं भड़का रहे हैं और अगर कल को वे सड़कों पर जाते भी हैं तो वे लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से यह करेंगे.

‘‘‘यह जेन जी आबादी हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल से ज्यादा पढ़ीलिखी है. हमें सवाल यह करना चाहिए कि हम पर अशिक्षित लोग शासन क्यों कर रहे हैं,’’’ अनामिका ने बताया. ‘‘कौकरोच जनता पार्टी का भविष्य क्या होगा?’’ विजय ने पूछा.

‘‘इस पर अभिजीत कहते हैं कि यह सिर्फ एक शुरुआत है, कल और युवा संगठन आगे आएंगे. नौजवान तबका मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुका है. अगले कुछ सालों में आप देखेंगे कि नौजवान बदलाव की मांग करेगा क्योंकि पिछले 10-12 सालों में इन्होंने ‘हिंदूमुसलिम’ उपदेश के अलावा कुछ भी नहीं सुना है,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘इस का मतलब है कि यह नई पार्टी देश में कोई क्रांति ला सकती है?’’ विजय ने सवाल किया. ‘‘हां, बिलकुल ला सकती है,’’ अनामिका ने अपनी राय रखी.

विजय ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘पर मुझे नहीं लगता. यह एक सोशल मीडिया का नया ट्रैंड जरूर हो सकता है, पर सिर्फ इस के चलते हम यह कह दें कि जेन जी कोई करिश्मा कर देंगे, अभी दूर की कौड़ी लगता है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि देश की ज्यादातर जनता, जो वोट करती है, उसे मालूम ही नहीं है कि रोज कुआं खोदो और पानी पियो से आगे भी जिंदगी है.

‘‘ऐसे लोग राजनीतिक पार्टियों की मुफ्त की घोषणाओं को ही तरक्की मान लेते हैं. बिहार में देखा नहीं कि जैसे ही कुछ महिलाओं के खाते में पैसे आए, सारे वोट उधर ही शिफ्ट होते दिखे. स्वराज पार्टी वालों ने देश की समस्याओं के नाम पर वोट मांगे, उन का हाल तो सब ने देख लिया.

‘‘हाल ही में थलापति विजय की पार्टी को भी तमिलनाडु राज्य में ऐसी घोषणाएं करनी पड़ीं. 200 यूनिट बिजली मुफ्त देने की बात हुई न? केंद्र हो या राज्य सरकार, सब जानते हैं कि जनता तुरंत का फायदा देखती है, बाकी बातें भूल जाती है.

‘‘अभी तो कौकरोच जनता पार्टी पर विपक्ष खूब हल्ला काट रहा है, पर कोई दल नहीं चाहेगा कि भविष्य की राजनीति में उस के अलावा कोई दूसरा भारतीय जनता पार्टी का विकल्प बने. हां, कौकरोच जनता पार्टी के नाम पर लोग सत्ता पक्ष के खिलाफ देश में कोई विद्रोह कर दे, तो उन का रास्ता आसान हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हारी बात में दम है. लेकिन अगर ऐसा होता है तो भी देश का ही नुकसान है. सत्ता बदलने से समस्याएं पूरी तरह खत्म हो जाएंगी, इस बात की कोई गारंटी नहीं है,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर एक बात की गारंटी जरूर है,’’ विजय बोला. ‘‘मैं समझी नहीं. किस बात की गारंटी?’’ अनामिका ने पूछा. ‘‘अगर तू कटखनी गाय पार्टी बनाएगी तो तेरीमेरी नहीं निभेगी. लिहाजा, मैं ने एक फैसला कर लिया है,’’ विजय बोला. ‘‘कैसा फैसला?’’ यह सुन कर अनामिका के कान खड़े हो गए.

‘‘जब तू कटखनी गाय बन जाएगी, तो सब से पहले सींग मु?ो ही मारेगी. इस से अच्छा तो यह है कि मैं कुछ दिनों के लिए कन्याकुमारी हो आता हूं. वैसे, जाना तो मैं एकदम दक्षिण में अंटार्टिका चाहता था, पर जब से मोदीजी ने कहा है कि एक साल तक बाहर विदेश घूमने मत जाओ तो अब भारत के दक्षिण कन्याकुमारी जाने का प्लान बनाया है. मोदीजी की बात रह जाएगी और कटखनी गाय यानी तुम से भी बचा रहूंगा,’’ विजय बोला.

‘‘अगर तुम एक सैकंड के अंदर यहां से दफा नहीं हुए, तो मैं अभी तुम्हारी चप्पल परेड करा दूंगी. कौकरोच की तरह तड़पते दिखोगे…’’ अनामिका का इतना कहना था कि विजय घुटनों पर आ गया.

Social Issue: गरीब औरत कैसे पाए आजादी

Social Issue. सैलिब्रिटीज के बीच तलाक के मामले सुर्खियों में आते हैं और यहां दोनों पक्षों के बीच बराबरी नजर आती है. रितिक रोशन और सुजैन खान का मामला हो या आमिर खान और किरण राव का तलाक हो, इन में कहीं भी कोई विक्टिम नजर नहीं आता. दोनों ने अलग रहना तय किया और तलाक ले लिया.

कितना आसान लगता है न अलग होना? लेकिन मिडिल क्लास और गरीब तबके में ऐसा नहीं होता. यहां शादी और तलाक के मामले में औरत और मर्द के बीच कोई बराबरी ही नहीं है. शादी हो, गृहस्थी चलाना हो या तलाक का मामला हो, सिर्फ औरतें ही  झेलती हैं.

शादी औरतों की आजादी के खिलाफ एक मर्दवादी हथियार ही तो है. शादी के बंधन में कौन बंधता है? औरत ही न? मर्द तो आजाद ही रहता है. तलाक कहने में आसान लगता है,

लेकिन यह भी सिर्फ मर्दों के लिए ही आसान है. पहले के जमाने में मर्द जब चाहे अपनी पत्नी को छोड़ सकता था. उस पर कोई सामाजिक रुकावट नहीं थी. लेकिन औरतें ऐसा नहीं कर सकती थीं. पति नामर्द हो या बूढ़ा, औरत के लिए ‘परमेश्वर’ ही रहता था.

सब से बड़ी बात तो यह है कि

गरीब और मिडिल क्लास अपनी बच्चियों की कंडीशनिंग ही ऐसे करता है कि वे झेलने के गुर बचपन में ही सीख जाती हैं. ऐसे नहीं हंसना, ऊंची आवाज में नहीं बोलना, बिना इजाजत के कहीं नहीं जाना, सिर नीचे किए बड़ों की बातों को सुनते रहने, पति की सेवा करना यह सब बातें लड़कियों को बचपन से घुट्टी की तरह पिलाई जाती हैं.

ऐसी लड़की जब ससुराल जाती है तो उस के पीछे कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता. लड़की की शादी होते ही मांबाप अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं. लड़की सुनती है, सहती है, घुटती है, मरती है लेकिन कुछ नहीं कर सकती. रास्ता ही नहीं होता. औप्शन के नाम पर मायका होता है, लेकिन यह मायका मुसीबत में कहीं नहीं होता. ऐसे में लड़की के पास बस एक ही रास्ता होता है कि वह घुटघुट कर जीना सीख ले.

सच कहें तो गरीब औरतों के लिए तलाक के बाद का रास्ता आसान नहीं है. बहुत सी औरतें मजबूरी में बुरे रिश्ते में रहती हैं, क्योंकि उन्हें रिश्ते से बाहर निकलना और भी मुश्किल लगता है. हालांकि, औरतों के लिए कानून लगातार मजबूत हुए हैं, लेकिन कमजोर औरतें आज भी इन कानूनों के दायरे से कोसों दूर खड़ी हैं.

नौकरी हासिल करने से ही बदलेंगे हालात

गरीबी में पैदा होने वाली औरतों की जिंदगी कभीकभी इतनी मुश्किल हो जाती है कि हर सुबह उठना एक संघर्ष लगता है. गरीबी की जंजीरें बांधती हैं और परेशानियां चारों तरफ से घेर लेती हैं, लेकिन यह भी सच है की लाखों औरतें इन हालात से गुजरती हैं और मजबूती से खड़ी होती हैं. हर औरत में वह ताकत होती है, जिस की बदौलत वह अपनी जिंदगी बदल सकती है और इस बदलाव की पहली सीढ़ी है नौकरी.

आज वह जमाना नहीं है जब औरतें सिर्फ घर में कैद रह कर जिंदगी बिता देती थीं. आज घर से बाहर निकलने, पढ़ाई करने और छोटीबड़ी जौब हासिल करने में कोई रुकावट नहीं है. हर औरत को सब से पहले एक नौकरी हासिल करनी चाहिए, चाहे वह छोटी हो या बड़ी या शुरुआती लैवल की हो, क्योंकि आज के जमाने में औरत का सैलरी से बड़ा कोई साथी नहीं है. औरतें रुपए की ताकत से बुरे हालात से जू?ा सकती हैं और अपनी जिंदगी को नई दिशा दे सकती हैं.

जो औरतें गरीबी और परेशानियों से घिरी हैं, वे सब से पहले खुद से पूछें कि क्या मैं घर बैठ कर चमत्कार का इंतजार कर रही हूं? नहीं. चमत्कार तुम्हारे हाथों में है. एक नौकरी ढूंढ़ो, चाहे वह किसी दुकान में सहायिका का काम हो, घरेलू काम हो, या छोटीमोटी फैक्टरी में वर्कर की जौब हो. शुरुआत में जौब छोटी भी हो तो कोई बात नहीं, शुरुआत माने रखती है.

हर बड़ी कामयाबी छोटे कदमों से शुरू होती है. अगर औरतें घर से बाहर निकल कर नौकरी करेंगी तो न सिर्फ पैसे आएंगे, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. वह खुद को मजबूत महसूस करने लगेगी. कई औरतें ऐसी हैं, जिन्होंने सड़क पर चाय बेचने से शुरुआत की और आज अपना छोटामोटा बिजनैस चला रही हैं. मेहनत से ही वह दरवाजा खुलेगा जो आज बंद लग रहा है.

घर से निकलो, संघर्ष करो

घर की चारदीवारी में बैठ कर सपने देखना आसान है, लेकिन उन्हें हकीकत में बदलने के लिए बाहर निकलना पड़ता है. गरीबी और परेशानियां रोक सकती हैं लेकिन हौसला मजबूत हो तो जीत निश्चित है. घर से निकल कर नौकरी ढूंढ़ने का संघर्ष सब से पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. चाहे वह लोकल जौब सैंटर जाना हो, पड़ोसियों से पूछना हो या औनलाइन ऐप्स पर अप्लाई करना हो.

शुरुआत में रिजैक्शन मिलेंगे, थकान होगी, लेकिन हर नाकामी और मजबूत बनाएगी. जो औरतें घर से निकलना ही नहीं चाहती हैं, तो उन के हालात कैसे बदलेंगे?

सुलतानपुर के एक छोटे से गांव की सुजाता के 4 बच्चे थे. पति शराबी था वह जो कमाता सब दारू में उड़ा देता था. सुजाता की ससुराल में उस की कोई कद्र नहीं थी, क्योंकि वह पैसे से कमजोर थी.

एक दिन सुजाता अपने बच्चों को गांव में छोड़ कर नोएडा आ गई. वहां सुजाता की सहेली कशिश जौब करती थी. कशिश ने सुजाता को अपनी कंपनी में लेबर के काम में लगवा दिया.

शुरुआत में सुजाता को काफी दिक्कत हुई, लेकिन एक साल में ही वह अपनी लगन और मेहनत की बदौलत उसी कंपनी में सुपरवाइजर हो गई.

सुजाता ने फैक्टरी के नजदीक की एक कालोनी में एक फ्लोर किराए पर लिया और अपने बच्चों को भी नोएडा बुला लिया. आज उस के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं.

ऐसी तमाम औरतें हैं जो गांव से शहर आईं, संघर्ष किया और आज अपने परिवार को संभाल रही हैं. संघर्ष ही सिखाएगा कि तुम कितनी काबिल हो. समय बुरा हो तो दुनिया में कोई साथ नहीं देता, लेकिन सैलरी हमेशा साथ देती है. औरत के लिए उस की तनख्वाह ही उस का सब से बड़ा साथी है. पहली सैलरी मिलने पर जो खुशी मिलेगी वह अनमोल है.

गरीबी में फंसी औरतें अकसर दूसरों पर निर्भर रहती हैं, लेकिन सैलरी उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करती है. कई औरतें बताती हैं कि उन की पहली जौब ने उन्हें इतनी ताकत दी कि वे कभी पीछे नहीं मुड़ीं. औरत के लिए सैलरी सिर्फ पैसे नहीं गरिमा और सम्मान है.

जब रुपए होते हैं, तो बुरे हालात डराते नहीं बल्कि जूझना सिखाते हैं. गरीबी में तो छोटीछोटी परेशानियां भी पहाड़ जैसी लगती हैं. बीमारी, बच्चों की फीस, घर का खर्च यह सब मुश्किल लगता है लेकिन अगर कोई नौकरी हो तो फिर बड़ी से बड़ी मुश्किल से लड़ना भी आसान हो जाता है. आज की परेशानियां कल की सफलता की कहानी बनेंगी. मेहनत बेकार नहीं जाएगी.

नौकरी हासिल करने का यह सफर आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं. औरतें गरीब हो सकती हैं, परेशान हो सकती हैं, लेकिन कभी कमजोर नहीं होती हैं. कमजोरी केवल सोच में होती है. एक बार इस कमजोरी को चुनौती मिल जाए तो यही कमजोरी ताकत बन जाती है.

जोरजुल्म से बाहर निकलना जरूरी

सीआरपीसी की धारा 125, हिंदू मैरिज एक्ट 1955, घरेलू हिंसा एक्ट, मुसलिम वुमन प्रोटैक्शन एक्ट जैसे तमाम कानून औरतों के साथ खड़े हैं, लेकिन कितनी औरतें हैं जो इन कानूनों तक पहुंच पाती हैं? कोई औरत तलाक के बाद पति से मासिक भरणपोषण मांग सकती है. औरत को यह मुआवजा मिलना पति की कमाई और बच्चों की जिम्मेदारी पर निर्भर करता है. कोर्ट अकसर अंतरिम मेंटेनेंस भी देता है, लेकिन गरीब औरतें इन कानूनों का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं.

घरेलू हिंसा एक्ट के तहत औरत को पति के घर में रहने का अधिकार है लेकिन कई मामलों में औरतें घर से निकाल दी जाती हैं और वह दरदर भटकने को मजबूर होती है.

गरीब औरतों के लिए सब से बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अपने हकों के बारे में जानकारी ही नहीं होती. किसी औरत को कानून का रास्ता नजर भी आता है तो उस के पास कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता. केस लड़ने के लिए वकील, कोर्ट फीस, समय और हिम्मत चाहिए गरीब औरतों के पास इनमें से कुछ नहीं होता.

कोई औरत किसी तरह कोर्ट में पहुंच भी जाए, तो पति इतना काबिल ही नहीं होता की वह भरणपोषण दे सके. ऐसे में मेंटेनेंस की रकम बहुत कम मिलती है या फिर पति अपनी गरीबी का रोना रो कर कोर्ट में हाथ खड़े कर देता है.

मिडिल क्लास औरत के सामने समाज का दबाव, मायके में बोझ बनने का डर और बच्चों की चिंता ये सब बातें होती हैँ जो उसे तलाक लेने से रोकती हैं. हालांकि कई राज्य सरकारों ने तलाकशुदा, विधवा या अकेली औरतों के लिए खास योजनाएं बनाई हैं, जिन से औरतों को मजबूत होने में मदद मिलती है.

राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री एकल नारी सम्मान पैंशन योजना चलती है जिस में तलाकशुदा और विधवा औरतों को 1,000 से 3,000 तक की मासिक पैंशन दी जाती है. जिला लीगल सर्विसेज अथौरिटी से गरीब औरतों को मुफ्त वकील और कानूनी मदद मिलती है. ऐसी औरतों की मदद के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग बनाए गए हैं.

गरीब औरतों के लिए जब ससुराल और पति से रिश्ते खराब हो जाते हैं और कोई पारिवारिक या सामाजिक सपोर्ट नहीं होता तो उन के पास आखिरी रास्ता क्या बचता है?

‘‘तलाक का रास्ता कानूनी और सामाजिक चुनौतियों से भरा होता है, ऐसे में बहुत कम औरतें ही तलाक लेने की हिम्मत कर पाती हैं. हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक की याचिका दाखिल कर सकती हैं, लेकिन बिना पैसे या सपोर्ट के यह रास्ता आसान नहीं है, लेकिन इस के लिए कई सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं मदद कर सकती हैं.

अगर किसी औरत के पास वकील रखने के पैसे नहीं हैं, तो नैशनल लीगल सर्विसेज अथौरिटी या राज्य स्तर की लीगल सर्विसेज अथौरिटी के जरीए उन्हें मुफ्त कानूनी मदद मिल सकती है. यह औरतों को तलाक और मेंटेनेंस के मामलों में निचली अदालतो से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी मदद करती है.

अगर आप पैसे के लिहाज से कमजोर हैं, तो आप इंडिजेंट सूट यानी गरीबी के आधार पर मुकदमा दाखिल कर सकती हैं, जहां कोर्ट फीस माफ होती है. साथ ही, लीगल सर्विसेज अथौरिटी एक्ट, 1987 के तहत महिलाओं को मुफ्त लीगल एड का अधिकार है.

तलाक के प्रोसैस के दौरान या बाद में, कोर्ट से मेंटेनेंस की मांग की जा सकती है, जो पति की आमदनी पर आधारित होता है. अगर बच्चे हैं, तो चाइल्ड सपोर्ट भी मिल सकता है. यह अंतरिम (अस्थायी) भी हो सकता है, जो मुकदमा चलते हुए मिलता रहता है.

नैशनल कमीशन फोर वुमन की हैल्पलाइन सातों दिन और 24 घंटे उपलब्ध है और घरेलू हिंसा, तलाक, इमोशनल सपोर्ट या कानूनी सलाह के लिए मदद करती है. पीडि़त औरतें पुलिस, अस्पताल या वन स्टौप सैंटर से कनैक्ट कर सकती हैं. 1091 या 7827170170 हैल्पलाइन नंबर पर लोकल एनसीडब्लू औफिस से संपर्क किया जा सकता है.

कोई भी औरत जो अपने बच्चों के साथ हो 181 या 1098 पर फोन कर के तत्काल मदद मांग सकती हैं. यहां औरत को शैल्टर भी मिल जाता है और तमाम तरह की मदद भी. इस के अलावा कई एनजीओ औरतों को शैल्टर, ट्रेनिंग और नौकरी के मौके मुहैया करवाती हैं. सेवियर फाउंडेशन जैसे संगठन दिल्ली में तलाकशुदा औरतों को पैसे से मदद, जिंदगी बेहतर करने के प्रोग्राम और समाज से लड़ने में मदद करते हैं.

‘सेरुड्स’ जैसी संस्थाएं अलग हुई औरतों को ट्रेनिंग देती हैं. कंप्यूटर, फैशन डिजाइन और ब्यूटीशियन जैसे कोर्स मुफ्त करवाती हैं और शैल्टर भी देती हैं, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें.

यह भी सच है की तलाक के प्रोसैस में समय लगता है, कभीकभी सालोंसाल लग जाते हैं, लेकिन आपसी सहमति हो तो समय नहीं लगता. अगर पति सहमत नहीं, तो जुल्म करने या डेजर्शन जैसे ग्राउंड्स पर याचिका दाखिल की जा सकती है.

क्या ज्यादातर शादियों में गरीब औरतें झेल रही हैं और उन के लिए तलाक का रास्ता बेहद मुश्किल है? यह सवाल बहुत गहरा और दर्दनाक है. यह सिर्फ सवाल नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा है. सच तो यह है कि भारत में अमीर और गरीब औरतों के लिए

तलाक के बाद के हालात में बहुत बड़ा फर्क है. अमीर घर की औरतों को इकोनौमिकल सपोर्ट, वकील और नई जिंदगी की शुरुआत करने की सुविधा मिल जाती है, जबकि गरीब या गांवदेहात की औरतों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाते हैं.

इन तलाकशुदा औरतों को भाईबहन या पिता रखने को तैयार नहीं होते. अगर वे काम पर जाने लगे तो उन अकेली को किराए पर मकान नहीं मिलते. बच्चे हों तो उन्हें किस के पास छोड़ कर जाएं, यह परेशानी है.

इस का एक सादा सा उपाय है. अपने जैसी 4-5 तलाकशुदा, विधवा, या अकेली औरतें एकसाथ रहना शुरू कर दें. उन्हें आसानी से मकान भी मिल जाएगा और एकदूसरे के बल पर मर्दों की ताकती निगाहों का मुकाबला भी कर सकेंगी. खटपट होगी जो आम घरों की बहनों में होती है पर गर्ज की वजह से सब के हल निकल सकते हैं.

सब से बड़ी बात है कि खाली समय में सिर्फ मोबाइल से न चिपके रहें. जहां भी कुछ पढ़ने को मिले, नयापुराना अखबार, कोई किताब, कोई पत्रिका, उसे उठा लाएं और जरूर पढ़ें. पढ़ाई सब से बड़ा हथियार है अपने ही समाज से लड़ने का. Social Issue

Success Story : हमेशा अपना लक्ष्य याद रखा – नूर फातिमा

Success Story : इंगलिश में 100 में से 99, कंप्यूटर में 97, हिंदी में 96, सामाजिक विज्ञान में 95, विज्ञान में 93. पलवल कैंप के वीरांगना झलकारी बाई सरकारी उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय की नूर फातिमा के 10वीं क्लास के ये नंबर किसी का भी सीना गर्व से ऊंचा कर सकते हैं. हो भी क्यों न, अपने स्कूल में टौप करना कोई हंसीखेल नहीं है.

15 साल की नूर फातिमा के पिता का नाम मोहम्मद फरियाद और मां का नाम अजिमा खातून है. नूर की 2 बहनें हैं. एक साधारण परिवार की इस बच्ची ने किस तरह पढ़ाई की और खुद को कैसे इम्तिहान के लिए तैयार किया, ऐसी ही कुछ बातें जानने की कोशिश की गईं. पेश हैं, नूर फातिमा से हुई बातचीत के खास अंश :

सब से पहले तो आप को बधाई. आप अपने परिवार के बारे में कुछ और बताएं.

बहुतबहुत शुक्रिया. मेरे परिवार में मेरे अम्मीपापा और हम 3 बहनें हैं. हमारे घर में पढ़ाई पर बहुत जोर दिया जाता है. मेरे परिवार ने हमेशा मुझे  मेहनत करने, खुद पर भरोसा रखने और आगे बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया. उन की सपोर्ट की वजह से ही मैं यह मुकाम हासिल कर पाई हूं.

अमूमन ऐसा मान लिया जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी होती है. अगर ऐसा है तो आप ने इस गैप कैसे पाटा?

मेरे स्कूल में पढ़ाई के लिए अच्छे संसाधन उपलब्ध थे. हमारे टीचर्स बहुत अच्छा पढ़ाते हैं और हर बच्चे पर ध्यान देते हैं. मैं ने स्कूल में जो पढ़ाया जाता था, उसे नियमित रूप से फौलो किया और उसी से मुझे काफी मदद मिली.

पढ़ाई को ले कर आप का रोज का रूटीन क्या था?

मैं ने कभी यह नहीं सोचा कि मुझे  रोज इतने घंटे ही पढ़ना है. मैं बस कोशिश करती थी कि अपना रोज का छोटाछोटा टारगेट पूरा करूं. और अगर कुछ रह जाता था तो उसे अगले दिन पूरा करने की कोशिश करती थी.

जब आप को 10वीं क्लास में टौप करने का पता चला तो आप का पहला रिएक्शन क्या था?

मुझे उम्मीद थी कि मेरे अच्छे नंबर आएंगे, लेकिन जब 96 पर्सैंट आने का पता चला तो बहुत खुशी और राहत महसूस हुई. सब से पहले मैं ने यह बात अपनी अम्मी को बताई.

घर या स्कूल में किस ने सब से पहले मिठाई खिलाई?

हम ने घर पर मिठाई नहीं बांटी, बल्कि उसी दिन परिवार के साथ बाहर जा कर डिनर कर के सैलिब्रेट किया.

10वीं क्लास में आप को सब से मुश्किल सब्जैक्ट कौन सा लगा और उसे आप ने ‘आसान’ कैसे बनाया?

मुझे  मैथ्स सब से मुश्किल लगता था, इसलिए मैं ने आसान चैप्टर्स से शुरुआत की, ताकि मेरा कौन्फिडैंस बढ़े और धीरेधीरे यह सब्जैक्ट मुझे आसान लगने लगा.

क्या आप ने कहीं बाहर से भी कोचिंग ली थी? अगर हां, तो कितना खर्च आया? आप अपने डाउट्स कैसे क्लियर करती थीं?

मैं ने कोई औफलाइन कोचिंग नहीं ली. मैं ने लगभग 5,000 रुपए का एक औनलाइन बैच लिया था. डाउट्स मैं अपने टीचर्स, दोस्तों और यूट्यूब की मदद से क्लियर करती थी.

क्या आप को कभी लगा कि ‘मैं नहीं कर पाऊंगी’? अगर हां तो इस ‘नैगेटिव सोच’ को आप ने कैसे हराया?

हां, कभीकभी थकान की वजह से ऐसा लगता था. लेकिन मैं हमेशा खुद को अपने लक्ष्य की याद दिलाती थी और पौजिटिव सोचने की कोशिश करती थी.

आप अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों के लिए क्या मैसेज देना चाहेंगी?

मैं यही कहना चाहूंगी कि खुद पर भरोसा रखें और मेहनत करती रहें. अगर आप लगातार कोशिश करती रहें, तो कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं होता.

आप के परिवार खासकर मातापिता ने पढ़ाई के लिए क्या सलाह दी? आप उन का एक सपना जो पूरा करना चाहती हैं?

मेरे अम्मीपापा ने हमेशा कहा कि मेहनत से पढ़ाई करो और खुद को बेहतर बनाते रहो. उन्होंने कभी मु?ा पर ज्यादा प्रैशर नहीं डाला. अगर कभी नंबर कम भी आए, तो उन्होंने हमेशा यही कहा कि और मेहनत करो, तुम इस से भी अच्छा कर सकती हो.

उन का सपना है कि मैं एक सफल इनसान बनूं और अपने पैरों पर खड़ी होऊं, जिसे मैं पूरा करना चाहती हूं.

11वीं क्लास में आप क्या स्ट्रीम लेंगी? आप की डाक्टर, इंजीनियर या कुछ ‘लीक से हट कर’ बनने की इच्छा है?

मैं 11वीं में साइंस मैडिकल स्ट्रीम लेने वाली हूं. मेरा सपना डाक्टर बनना है और आगे चल कर यूपीएससी की तैयारी भी करना चाहती हूं.

स्कूल की टीचरों ने आप को सब से ज्यादा प्रोत्साहन कैसे दिया?

हमारे टीचर्स बहुत अच्छा पढ़ाते हैं और हमेशा हम सब छात्राओं को मोटिवेट करते हैं. वे नियमित टैस्ट लेते हैं और हमें अच्छा स्कोर करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. उन्होंने हमेशा हम पर भरोसा किया और हमारा आत्मविश्वास बढ़ाया.

स्कूल प्रिंसिपल ने आप का कैसे हौसला बढ़ाया?

हमारी प्रिंसिपल मैम पढ़ाई के साथसाथ डिसिप्लिन और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज पर भी ध्यान देती हैं. वे असैंबली में बच्चों को मोटिवेट करती हैं और हमेशा हमें हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं.

सोशल मीडिया, रील्स, खेलने की इच्छा… इन सब के बीच आप ने पढ़ाई पर कैसे फोकस रखा?

मैं ने सोशल मीडिया का बहुत सीमित इस्तेमाल किया. मैं ने अपना ज्यादा समय पढ़ाई और अपने हैल्थ का ध्यान रखने में लगाया, क्योंकि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है. बोर्ड परीक्षा के समय मैं ने पूरी तरह पढ़ाई पर फोकस किया.

Family Story : आखिर क्यों ?

Family Story. जैसे ही खाला ने अम्मी के कान भरे वे अपने बेटे की दूसरी शादी कराने पर आमादा हो गईं. इस राह में सब से बड़ा रोड़ा इन की बहू थी. मांबेटे ने एक प्लान बनाया. क्या वे दोनों कामयाब रहे?

‘‘फूफी जान… फूफी जान… अम्मी नहीं आईं क्या?’’ बुखार से तपते सुहेल ने फरजाना से पूछा. ‘‘अम्मी आ जाएंगी… मैं तो हूं न…’’ फरजाना सुहेल के माथे पर पानी से भीगा कपड़ा रखते हुए बोली.

‘‘फूफी जान, अम्मी कहां गई हैं? बताओ न? क्या मेरी अम्मी भी नीशू की अम्मी के जैसे अब कभी लौट कर नहीं आएंगी?’’ मासूम सुहेल ने धीरे से अपनी आंखें खोलते हुए फरजाना से दोबारा पूछा.

सुहेल की बात सुन कर फरजाना खामोश हो गई. आयशा उस के पड़ोस में ही रहती थी. वह उसे ‘अप्पी कहती थी. आयशा खूबसूरत ही नहीं, जहीन भी थी. सिलाईकढ़ाई हो या घर का काम, सभी में माहिर थी वह. उस की ग्रेजुएशन भी पूरी हो चुकी थी और स्वभाव ऐसा कि कुछ ही वक्त में किसी को भी अपना बना ले.

फरजाना को याद है कि आयशा के रिश्ते के लिए उस के परिवार को ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी थी. जल्द ही उस के लिए एक बेहतर रिश्ता आ गया था. लड़का समीर एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था और परिवार भी पढ़ालिखा था. और फिर धूमधाम और हंसीखुशी के साथ आयशा अप्पी का निकाह समीर से हो गया.

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आयशा के पापा को यकीन था कि उन की पढ़ीलिखी और कामकाजी बेटी को बहू के रूप में पा कर ससुराल वाले बहुत ही खुश होंगे, लेकिन फिर भी उन्होंने आयशा को भरपूर दहेज दिया था.

लेकिन निकाह के कुछ दिनों के बाद ही आयशा अप्पी को दहेज के लिए परेशान किया जाने लगा. शादी के 2 साल बीत गए थे और आयशा अप्पी की गोद में नीशू आ गया, लेकिन उस के बावजूद अभी तक आयशा अप्पी की ससुराल वालों ने उन्हें नहीं अपनाया था.

एक दिन रहमान चाचा बता रहे थे कि आयशा का रिश्ता उन्होंने पढ़ालिखा घरबार देख कर किया था कि पढ़ीलिखी और सलीकेमंद बहू पा कर वे लोग खुश होंगे, लेकिन वहां तो सबकुछ पैसा ही अहमियत रखता है. आज फिर फोन आया है कि 2 लाख रुपए उन को भेजें, लेकिन उन के पास तो अब कुछ बचा भी नहीं है.

फरजाना को यकीन था कि नीशू के आ जाने के बाद अब जल्द ही आयशा अप्पी को उस की ससुराल वाले अपना लेंगे, लेकिन कुछ दिनों के बाद ही आयशा की ससुराल से फोन आया कि सिलैंडर लीक होने की वजह से उस के कपड़ो में आग लग गई, जिस से वह गंभीर रूप से ?ालस गई और फिर अस्पताल में उस की मौत हो गई. यह सुन कर वह अंदर तक कांप गई थी.

लेकिन जब फरजाना को पता चला कि आयशा अप्पी ने मरने से पहले बयान दिया था कि उस के कपड़ों में आग लगने की वजह से ही वह जल गई थी, क्योंकि अप्पी को सम?ा दिया गया था कि अगर उस ने बता दिया कि तुम्हारे साथ हम ने ऐसा किया है और हम लोग जेल चले गए, तो उस के मासूम नीशू को कौन संभालेगा?

ममता के मोह में बेचारी आयशा अपने हत्यारों के खिलाफ मुंह भी न खोल सकी थी और उस के हत्यारे जेल जाने से बच गए थे.

यह जान कर फरजाना का खून खौल उठा था. वह सोच रही थी कि आयशा अप्पी के हत्यारों को सजा जरूर मिलनी चाहिए थी.

मासूम नीशू को उस के नानानानी घर ले आए और उन को किसी ने रोकने की कोशिश भी नहीं की थी. फिर कुछ दिनों के बाद ही समीर के घर वालों ने उस का दूसरा निकाह भी करवा दिया.

यह देख कर फरजाना समझ गई कि वे लोग आयशा अप्पी की मौत का इंतजार ही कर रहे थे कि वह मरे तो वे अपने बेटे का दूसरा निकाह कर दें.

फरजाना हैरान थी कि आज भी लोग लड़कियों को बो?ा ही सम?ाते हैं. सब को पता है कि वे लोग आयशा अप्पी के हत्यारे हैं, लेकिन उस के बावजूद लोग अपनी बेटियों का निकाह ऐसे लोगों के घर में कर देते हैं.

‘‘फूफी जान, अम्मी आ जाएंगी?’’ सुहेल की आवाज सुनते ही फरजाना खयालों से फारिग हो कर एक बार फिर हकीकत में आ गई. ‘‘हां, बिलकुल आ जाएंगी. अपने प्यारे बेटे को छोड़ कर वे कहीं जा सकती हैं भला,’’ बहुत ही प्यार से सुहेल को समझाते  हुए फरजाना बोली.

‘‘फरजाना, अब सुहेल की तबीयत कैसी है?’’ अम्मी ने कमरे में आते हुए पूछा. ‘‘दवा पिला दी है, लेकिन बुखार अभी तेज है,’’ फरजाना धीरे से बोली. ‘‘दादी, अम्मी कब आएंगी?’’ बहुत ही मासूमियत से सुहेल ने दादी से पूछा. ‘‘अरे, आ जाएंगी अम्मी, पहले तुम ठीक तो हो जाओ,’’ फरजाना ने एक बार फिर प्यार से समझाते हुए धीरे से सुहेल से कहा.

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फरजाना को मालूम था कि सुहेल के इस सवाल पर अम्मी भाभी के लिए जरूर उलटासीधा बोलना शूरू कर देंगी, जो सुहेल के कोमल मन पर गलत असर ही डालेगा.

‘‘इस लड़के ने तो नाक में दम कर के रखा हुआ है. हर वक्त अम्मीअम्मी की रट लगाए रहता है,’’ अम्मी झुन्झला  कर बोलीं.

‘‘चुप रहो अम्मा… क्यों तुम इस मासूम की जान लेने पर तुली हो. अगर इस से इतनी ही परेशानी है तो इसे रोका क्यों, इसे भी भाभी के साथ भेज देतीं,’’ फरजाना कुछ तीखे लहजे में बोली.

‘‘तू बहुत ही हमदर्द बन रही है अपनी भाभी की. ऐसा लग रहा है कि हम कुछ नहीं, सबकुछ वह करमजली ही है,’’ गुस्से से बड़बड़ाती हुई अम्मी कमरे से बाहर चली गईं.

फरजाना कुछ नहीं बोली, चुपचाप सुहेल के माथे पर पानी से पट्टी करती रही. कितनी हैरानी की बात है कि कहां वह आयशा अप्पी की ससुराल वालों के बारे सोच रही थी कि कैसे लोग हैं वे, लेकिन यहां तो उस के घर वाले भी दहेज के लोभी बन चुके हैं.

पहले कितना सुकून था घर में. चारों ओर खुशियां ही खुशियां थीं. घर पर केवल अम्मी, वह और भाईभाभी थे. भाईजान सुबह दुकान चले जाते और वह कालेज. घर पर केवल भाभी और अम्मी रह जातीं. भाभी घर का काम करती रहतीं और अम्मी सुहेल को बाहर घुमाने चली जातीं.

भाभी फरजाना के लिए भाभी कम बड़ी बहन ज्यादा थीं. वह कालेज से आ कर खाली समय में भाभी की घर के कामों में मदद करती और बाकी समय में वह भाभी से कुछ न कुछ सीखती रहती. उन्हीं की बदौलत वह सिलाईकढ़ाई से ले कर बेहतर खाना बनाना भी सीख गई थी.

लेकिन जब से फरजाना की खाला घर पर आने लगी थी, तभी से उस के घर का सुकून छिन गया था. एक दिन वह घर पर अम्मी के साथ बैठी हुई थी, तभी घर पर खाला आ गई.

‘‘रुखसाना, तुम्हें पता है कि तरीकुन के लड़के जुबेर की शादी में लड़की वालों ने बहुत ज्यादा दहेज दिया है कि उन के घर में भी नहीं आ पा रहा है और बाइक के साथसाथ कार भी मिली है. लेकिन रुखसाना, तुम तो ठग गई. बताओ, मेरे भांजे को तुम ने सस्ते में ही निबटा दिया. बहू तो एक बाइक तक नहीं ला पाई,’’ कह कर खाला चली गई, लेकिन उस ने यह सब कह कर जैसे शांत अपनी में कंकड़ मार दिया था और घर का सुकून कहीं खो गया था.

उस के बाद से फरजाना की अम्मी के मन में यह बैठ गया था कि रेहान भाईजान के निकाह में वे ठगी गई हैं और वे बिलकुल बदल गईं. वे अब भाभी को बातबात पर बेइज्जत करने लगी थीं. दिनभर भाभी की तारीफ करते न थकने वाली अम्मी अब बातबात पर भाभी के काम में कमी निकालने लगी थीं.

फरजाना को बहुत हैरानी हो रही थी कि हर रिश्ता अब पैसों से तोला जाने लगा है. यह वही खाला थी जिस ने भाईजान के बीमार हो जाने पर हजार रुपए देने से साफ इनकार कर दिया था, जबकि उस के खालू का इतना अच्छा बिजनैस चल रहा है. तब अब्बू के दोस्त लक्ष्मी अंकल ने अम्मी को भाईजान के इलाज के लिए रुपए दिए थे.

लक्ष्मी अंकल अब्बू के बहुत ही पुराने दोस्त थे. पहले अब्बू और अंकल एकसाथ मिल कर ही मेलों में दुकानें लगाते थे, जिस से उन में आपस में दोस्ती बढ़ती गई. अब्बू के इंतकाल के बाद लक्ष्मी अंकल को काफी सदमा पहुंचा था.

थोड़ी सी खेती की जमीन थी जिस से खाने भर का अनाज पैदा हो जाता था और अम्मी घर पर ही सिलाई करने लगी थीं, जिस से दूसरे खर्चे निकल जाते थे. उन के घर के हालात खराब होते ही सभी नातेरिश्तेदार न जाने कहां गायब हो गए थे.

रेहान भाईजान पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन आमदनी का कोई नजरिया न होने पर उन्होंने कपड़े की एक दुकान कर ली. पैसे कम पड़े तो अम्मी ने बचीखुची जमीन बेच दी थी. भाईजान की दुकान होते ही काम अच्छा चलने लगा, जिस से सबकुछ सही हो गया. घर के हालात सही होते ही सभी रिश्तेदारी दोबारा जुड़ने लगे थे.

कुछ दिनों के बाद ही भाईजान की शादी कर दी गई और शबनम के रूप में भाभी फरजाना के घर आ गईं. शबनम भाभी के अब्बू ने अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा दहेज दिया था. पहले तो अम्मी को दहेज के कम ज्यादा से कोई मतलब नहीं था, लेकिन जब से खाला आने लगी थी तभी से अम्मी के मन में जहर का बीज पलने लगा था.

‘‘रेहान, तुम्हारे ससुर ने तो तुम से कहा था कि वह तुम को बाइक देंगे, लेकिन अभी तक उन्होंने बाइक नहीं दी. तुम अब उन से कहो कि वे बाइक के बदले एक लाख रुपए दे दें,’’ अम्मी रेहान से बोलीं.

‘‘लेकिन अम्मी, शादी में तो अब्बू ने अपनी औकात से ज्यादा ही उस को दहेज दिया था, जिस के चलते उन्हें घर की कुछ जमीन भी बेचना पड़ी थी. अब वे कहां से लाएंगे इतने रुपए,’’ शबनम भाभी ने हैरानी से धीरे से अम्मी से कहा. ‘‘तो हम क्या करें. हम ने क्या ठेका ले रखा है कि वे कहां से रुपए देंगे,’’ अम्मी गुस्से से बोलीं.

अम्मी की बात सुन कर भाभी खामोश हो गई. उस दिन के बाद से भाईजान के दिमाग पर एक लाख रुपए या फिर बाइक की बात दिमाग में बैठ गई. अब वे आएदिन भाभी से कहने लगे थे कि वह अपने अब्बू से कह कर रुपए मंगवाए, जिस के बाद से जैसे भाभी की जिंदगी जहन्नुम बन गई.

‘‘अम्मी, क्यों भाभी को परेशान करती हो…’’ फरजाना ने अम्मी से कहा था. ‘‘तुम्हें कुछ नहीं मालूम. यह सब चलता रहता है,’’ अम्मी ने फरजाना को समझाया था. ‘‘रेहान, शबनम को रुपए लाने के लिए उस के मायके भेज दो,’’ एक दिन अम्मी ने भाईजान से कहा और दूसरे दिन भाईजान ने भाभी को घर जा कर रुपए लाने के लिए बोल दिया.

मजबूरी में भाभी अपने घर जाने लगीं. तब अम्मी ने सुहेल को गोद में यह कह कर ले लिया कि वह सुहेल को नहीं जाने देंगी… तुम पहले पैसे ले कर आओ.

सुहेल अपनी अम्मी के लिए बिलखता रहा था. आज 2 दिन हो गए थे, लेकिन भाभी अभी तक नहीं आईं. इस वजह से सुहेल को बुखार आ रहा था. तभी बाहर उसे खाला की आवाज सुनाई दी. खाला की आवाज सुन कर फरजाना एक बार फिर यादों के भंवर से बाहर आ गई. उस ने सुहेल को छू कर देखा, बुखार थोड़ा हलका हो गया था.

फरजाना कमरे से बाहर आई. उस ने देखा कि खाला अम्मी के पास बैठी हुई थी. उसे मालूम था कि आज फिर खाला अम्मी के दिमाग में कुछ जहर बोने आई होगी. ‘‘बताओ… रेहान के लिए कितना अच्छा रिश्ता है.चारपहिया गाड़ी देने की बात कर रहे थे, लेकिन अफसोस मुझे उन्हें मना करना पड़ा. अगर बहू न होती तो…’’ खाला जानबूझ  कर बात अधूरी छोड़ कर वहां से चली गई.

‘‘इस से तो छुटकरा पाना ही होगा. अब रेहान का निकाह बड़े घर में करेंगे,’’ फरजाना ने कुछ ही देर में अम्मी को भाईजान से कहते सुना. ‘‘अम्मी, क्या तुम भाभी को मार दोगी?’’ फरजाना ने अम्मी के पास जा कर डर से सिहरते हुए पूछा.

‘‘देख, अब रेहान का दूसरा निकाह तो करना ही है. वैसे भी आजकल बहुओं की जल कर बहुत मौतें हो रही हैं,’’ अम्मी ने फरजाना से कहा. ‘‘क्या तुम पैसों के लिए भाभी की हत्या करोगी?’’ डर से सिहरते हुए फरजाना अम्मी से बोली. ‘‘आजकल पैसों से सारे गुनाह धुल जाते हैं,’’ अम्मी दो टूक उस से बोलीं और वहां से चली गईं. ‘‘तभी बाहर दरवाजे की डोरबैल बजी. फरजाना ने दरवाजा खोला. सामने भाभी खड़ी थीं.

भाभी फरजाना से बोले बिना चुपचाप अंदर आ कर सुहेल के पास चली गईं. भाभी को खाली हाथ देख कर फरजाना समझ  गई कि रुपयों का इंतजाम नहीं हो सका था. उस ने एक झलक अम्मी को देखा, जिन की आंखें गुस्से से लाल हो रही थीं. तभी उन्होंने भाईजान को बुलाया और उन से धीरेधीरे कुछ बात करने लगीं.

अम्मी को बातें करते देख कर अचानक फरजाना का दिल तेज धड़कने लगा. ‘‘भाभी, आज आप सुहेल को ले कर मेरे कमरे में सो जाना. मुझे  देर तक पढ़ाई करनी है और मेरे कमरे की लाइट कम लग रही है,’’ फरजाना ने कमरे में जा कर भाभी से कहा. ‘‘ठीक है जैसे तुम कहो,’’ भाभी धीरे से फरजाना से बोलीं और सुहेल को ले कर उस के कमरे में चली गईं.

फरजाना ने देखा कि भाभी के चेहरे की रंगत उड़ गई थी. हंसताखिलखिलाता हुआ चेहरा पूरी तरह से कुम्हला चुका था. यह देख कर अनायास ही उस की आंखो में आंसू आ गए.

फरजाना ने कमरे की लाइट बंद की और वह निढाल हो कर बिस्तर पर लेट गई. आज उस का दिल किसी अनहोनी के डर से घिरा हुआ था.आज उस की आंखो से नींद कोसों दूर थी. वह सोच रही थी कि अगर खाला ने उस की अम्मी के मन में जहर का बीज नहीं बोया होता तो आज भी उस का पूरा परिवार हंसीखुशी रह रहा होता.

तभी अचानक फरजाना पर पानी जैसा कुछ पड़ा. वह चौंक गई. उस के नथुनों में अजीब सी गंध समाई. फरजाना ने देखा कि सामने अम्मी और भाईजान थे. भाईजान के हाथ में बड़ी प्लास्टिक की बोतल थी. वह कुछ समझती उस से पहले ही उस पर जलती हुई कोई चीज गिरी और फिर आग भड़क उठी.

तेज जलन की वजह से फरजाना चीखनेचिल्लाने लगी. उस की आवाज सुन कर अम्मी और भाईजान चौंक गए. तेज आग की रोशनी होते ही सामने बहू की जगह फरजाना को जलता देख कर वे दोनों घबरा गए और आग बुझाने की कोशिश करने लगे.  फरजाना की चीखपुकार सुन कर भाभी भी वहां आ गईं और वहां का नजारा देख कर वे कांप गईं.

‘‘अम्मी, जो तुम भाभी के साथ करना चाहती थीं वहीं कल मेरे साथ भी होना था, क्योंकि जो बच्चों के मांबाप करते हैं वही बच्चों को भुगतना ही पड़ता है. इस से बेहतर था कि मैं भाभी की जान बचा लूं.” ‘‘आप लोगों ने यह भी नहीं सोचा कि आप की भी बेटी और बहन है, जिस को भी अपनी सुसराल जाना है और जैसा आप किसी दूसरे की बेटी के साथ कर रहे हैं अगर आप की बेटी के साथ भी वही हुआ तो क्या गुजरेगी आप लोगों पर, कभी सोचा है? आखिर क्यों नहीं सोचते आप लोग कि बहू भी बेटी है? आखिर क्यों?’’ फरजाना तेज जलन और दर्द से तड़पते हुए बोली और फिर धीरेधीरे उस की आंखें बंद होती चली गईं. Family Story

लेखक : फारूख हुसैन

आदमी का कुत्तापन : इंसान की अनोखी कहानी

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

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Story in hindi जब से पता चला है कि प्रदेश में कुत्तों की बढ़ती तादाद से परेशान हो कर नगरपालिका और नगरनिगमों द्वारा आवारा कुत्तों की नसबंदी कर दी जाएगी, तब से शहर में 4 टांग वाले कुत्तों के साथसाथ 2 टांग वाले आवारा कुत्ते भी गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए हैं.

पिछली बार जब मैं शहर गया था, तो एक पान की दुकान पर मेरा ध्यान गया. उस दुकान में पिछली बार की तुलना में बहुत कम लोग पान खाने आ रहे थे.

मैं ने पान वाले से उत्सुकतावश पूछा, ‘‘क्यों भाई, आजकल तुम्हारी दुकान पर भीड़भाड़ कम क्यों हो गई है? आखिर चक्कर क्या है?’’

पान वाला बोला, ‘‘भाई साहब, जब से शहर में कुत्तों की नसबंदी की बात सुनी है, तब से मेरी दुकान कम चलने लगी है. लोग अब यहां आने से डरने लगे हैं. उन्हें शायद यह लगता है कि कहीं उन्हें भी पकड़ कर उन की नसबंदी न कर दी जाए.’’

हम ने भी सोचा कि हम भी जल्दी ही यहां से खिसक लें. क्या पता, हम भी गेहूं के घुन की तरह पिस जाएं यानी लपेटे में आ जाएं.

टांग और पूंछ के लिहाज से कुत्तों की भी कई किस्में होती हैं, जैसे 4 टांग वाले पूरी पूंछ वाले कुत्ते, पूंछ कटे कुत्ते और सब से खतरनाक बिना पूंछ के 2 टांग वाले कुत्ते.

कुत्तों को भारतीय सभ्यता में एक खास जगह दी गई है. कुछ इनसानों ने कुत्तों के साथ रहतेरहते उन के एक गुण को छोड़ कर बाकी बहुत सी आदतें सीख ली हैं.

पूंछ वाले कुत्तों से बिना पूंछ वाले कुत्तों ने केवल एक ही गुण नहीं सीखा है, वह गुण है वफादारी का. बाकी सभी गुण तो उन में पूरी तरह से आ गए हैं, इसलिए आम घरों में या पड़ोसियों से होने वाली लड़ाइयों में सब से पहले कुत्ते की ही जम कर गाली दी जाती है.

इस में कोई शक नहीं है कि कुत्ते की यह गाली भारत में गाली नं. 1 पर है. हो सकता है कि ‘आंटी नं. 1’, ‘बीवी नं. 1’, ‘हीरो नं. 1’ की तर्ज पर ‘गाली नं. 1’ फिल्म भी बन जाए, जिस में 4 टांग वाले पूंछदार कुत्ते को हीरो और 2 टांग वाले बिना पूंछ के कुत्ते को विलेन के रूप में दिखाया जाए.

वैसे, कुत्ते अगर आपस में गाली देते होंगे, तो उन की गाली नं. 1 आदमी को ले कर ही होती होगी.

वैसे, कुत्ता ही एकलौता ऐसा जानवर है, जिसे गाली और तारीफ दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इस बात पर पूंछ वाले कुत्ते अपनेआप पर बेहद फख्र महसूस करते हैं. वे सोचते हैं कि जिस तरह पुराने जमाने में लोग खुद की तुलना किसी महापुरुष से करते थे, उसी तरह आज के दौर में उन से करते हैं.

लेकिन आजकल बिना पूंछ वाले कुत्तों की भी बहुत पूछ है. वैसे पूंछ के न होने से उन्हें अपनी वफादारी दिखाने के लिए बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं.

बहुत पहले इनसान की भी पूंछ हुआ करती थी, लेकिन इनसानों द्वारा उस का गलत इस्तेमाल करने पर कुदरत ने उसे छीन लिया.

अब जब भी ये बिना पूंछ वाले कुत्ते अपनी उस गुम दुम को किसी खास आदमी के सामने हिलाते हैं, तो उन की हरकतों से पता चल जाता है कि वे अपनी वफादारी दिखा रहे हैं.

देखने वाले भी यही कहते हैं कि यह फलां का कुत्ता है, इस से बच कर रहना. बहुत तेज है, इस का काटा तो इंजैक्शन भी नहीं मांगता.

पूंछ वाले कुत्तों के काटने की तरह बिना पूंछ वाले कुत्ते के काटने पर रेबीज नहीं होता, बल्कि ‘फटीज’ नामक खतरनाक रोग होता है यानी इन के काटे से लोग फटीचर हो जाते हैं. ये लोग अपने मालिक के इशारे पर जिस को भी काटते हैं, वह फटीचर बन जाता है.

कुछ लोग दोनों तरह के कुत्ते पालते हैं. ये कुत्ते उन की बीवियों के काम के होते हैं, जिस से इन कुत्तों की भी चांदी रहती है.

जहां एक तरफ पूंछ वाले कुत्ते उन की बीवियों के साथ गाडि़यों में सैर करते हैं, अच्छा खाना खाते हैं और उन के साथ सोते तक हैं, वहीं दूसरी तरफ बिना पूंछ वाले कुत्ते उन का घरेलू काम काफी  अच्छी तरह से करते हैं.

पूंछ वाले कुत्तों पर तो कुछ खर्च भी होता है, पर बिना पूंछ वाले कुत्ते मुफ्त में अपनी सेवाएं देते हैं. दरअसल, अपने मालिक की आड़ में वे भी अच्छा शिकार कर लेते हैं.

ऐसे कुत्ते मालिक पर भार नहीं होते, इसलिए इन्हें कोई रोक भी नहीं पाता, खुद अफसर भी नहीं. समय आने पर ये अपनी औकात भी दिखा देते हैं. ये जितने ज्यादा हों, उतना ही अच्छा.

आजकल लोगों के स्टेटस की पहचान इसी से होती है कि उस के पास कितने पूंछ वाले और कितने बिना पूंछ वाले कुत्ते हैं.

पुराने जमाने में लोग अपनी जान और माल की हिफाजत के लिए पूंछ वाले कुत्ते ही रखा करते थे, लेकिन अब जमाना तेजी से बदल रहा है. इन कुत्तों के साथसाथ बिना पूंछ वाले कुत्ते भी रखे जाने लगे हैं. जिन के पास ऐसे कुत्ते बड़ी तादाद में होते हैं, उन की उतनी ही ज्यादा वैल्यू होती है.

भले ही बिना पूंछ वाले कुत्ते 3-4 साल तक पड़ेपड़े मुफ्त में ही रोटी तोड़ते रहें, लेकिन चुनाव आने पर अपना वजूद जरूर साबित कर देते हैं और भूंकभूंक कर अपने मालिक के पक्ष में माहौल बनाने में जुट जाते हैं.

पूंछ वाले कुत्तों की वफादारी खरीदी नहीं जा सकती, पर बिना पूंछ वाले कुत्ते मौका मिलने पर खुद को बेच देते हैं. मालिक बदलते उन्हें जरा भी देर नहीं लगती. कई बार तो वे खाते किसी और का हैं और निभाते दूसरे का हैं. ऐसों से हमें सावधान रहने की जरूरत है.

जैसे पूंछ वाले कुत्तों की तादाद बढ़ाने के लिए खास मौसम होता है, ठीक उसी तरह बिना पूंछ वाले कुत्तों का भी अपना खास मौसम ‘चुनाव’ होता है. इस में वे बड़ी लगन और मेहनत से अपनी तादाद को बढ़ाते हैं.

शायद इसी बढ़ती हुई तादाद को देख कर शहरों में कुत्तों की नसबंदी करने का प्रोग्राम बनाया जा रहा है खासतौर पर हमारे प्रदेश की राजधानी में.

दूसरे शहरों के मुकाबले पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले कुत्तों की तादाद ज्यादा होना लाजिम है. बिना पूंछ वाले कुछ कुत्ते तो राजधानी के परमानैंट बाशिंदे बन जाते हैं और बाकी आतेजाते रहते हैं.

पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले कुत्तों में हमेशा कड़ा मुकाबला रहता है. कई बार तो यह फैसला करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है कि कौन कितनी तेजी से पूंछ हिला रहा है. दोनों ही अपनीअपनी वैल्यू साबित करने में लगे रहते हैं. वे अपने मालिक को हमेशा खुश करना चाहते हैं.

मालिक जितना खुश होगा, कुत्तापन उतना ही कामयाब माना जाएगा. इन दोनों में फर्क सिर्फ गले में पड़े पट्टे के दिखाई देने और न दिखाई देने का है. पूंछ वाले कुत्ते के गले में पट्टा दिखता है, जबकि बिना पूंछ वाले कुत्ते का पट्टा नजर नहीं आता.

बिना पूंछ वाले कुत्ते तो अपने मालिक के पूंछ वाले कुत्ते के सामने भी अपनी नजर न आने वाली पूंछ हिलाने से नहीं चूकते. कई बार तो ऐसा लगता है कि ये बिना पूंछ वाले कुत्ते, पूंछ वाले कुत्तों के भी कुत्ते हैं.

खैर, कुत्ते तो कुत्ते ही होते हैं, चाहे वे पूंछ वाले हों या बिना पूंछ वाले. हमें इन से बच कर रहना चाहिए, क्योंकि काटना इन की फितरत है. एक के काटने पर कीमती इंजैक्शन लगवाने पड़ते हैं और जिंदगी की कोई गारंटी नहीं होती, जबकि दूसरे के काटने पर कैरियर तबाह हो सकता है, जमाजमाया धंधा चौपट हो सकता है.

मैं नहीं चाहता कि महंगाई के इस दौर में इन कुत्तों के द्वारा काटा जाऊं, इसलिए मैं इन्हें दूर से ही देख कर सलाम कर लेता हूं. आप को भी नेक सलाह दे रहा हूं कि आप भी इन बिना पूंछ वाले कुत्तों से दूर ही रहें, इसी में आप की भलाई है.Story in hindi

Society : समस्या – किसान है परेशान

Society . मूली की खेती कर रहे लालमन की खुशी का ठिकाना न था. उस के 3 बीघा खेत में मूली की बंपर पैदावार हुई थी. उस ने रात को नहर का पानी ला कर उखाड़ी हुई मूली साफ कर के अपने खलिहान में जमा कर ली. अगली सुबह एक बिचौलिया ट्रक ले कर आया. वह उस मूली, जो तकरीबन डेढ सौ किलोग्राम थी, की कीमत नकद दे गया.

10 रुपए  प्रति किलो कीमत पा कर लालमन खुशी से झूम उठा. बैठेबैठे ही उस को रुपया मिल गया था.

लालमन की बहन महानगर में रहती थी. वह वहां मजदूरी करती थी. उस ने लालमन को फोन कर के कहा कि महानगर में मूली 50 रुपए प्रति किलो मिल रही है. कुछ मूली उखाड़ कर रख देना. 2 दिन बाद गांव आ कर ले जाऊंगी.

यह सुनते ही लालमन की खुशी और सुकून दोनों काफूर हो गए. उस के पास मूली की रकम का न तो कोई कागज था न कोई पक्का बिल. वह किस सुबूत की बुनियाद पर बताता कि बिचौलिए ने उसे बेवकूफ बनाया है.

लालमन जैसे लाखों भोलेभाले किसान इसी तरह बिचौलियों के शिकार बन कर हर मौसम में नुकसान ?ोलते हैं. जहां एक ओर खेती का जबरदस्त बाजारीकरण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर खेती में जुड़े एक बड़े वर्ग को इस का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है.

आज उत्पादन और उपादान की संरचना में बदलाव आया है. खेती का ढांचा भी बदला है. आंकड़े बताते हैं कि आज भारत में 81 फीसदी किसान 2 हैक्टेयर से भी कम जोत पर खेती करते हैं. ऐसे ही छोटे किसान भारत की सारी खेती के  तकरीबन 55 फीसदी हिस्सेदार हैं.

किसानों को मिलने वाली माली मदद, सुविधा, योजना का फायदा इन तक कभी पहुंच ही नहीं पाता है. कारण यह कि सरकारी और गैरसरकारी कृषि केंद्रित संसथाओं के प्रमुख टारगेट बड़े किसान ही होते हैं. छोटा और सामान्य किसान इसी तरह अनेक तरह के धोखे ?ोल रहा है. बाजार भी जानबू?ा कर इन छोटे किसानों की समस्या और पुकार को नजरअंदाज कर देता है.

उत्तराखंड के एक किसान की खबर छपी थी. उस किसान ने 3 बीघा में बहुत मेहनत कर के कीवी का उत्पादन किया था। कीवी की बेल के नीचे खाली जगह पर हरी मिर्च भी उगाई थी. उसे ‘मौसम का खौफ’, ‘पहाड़ की सड़क टूट रही है’ जैसे तरहतरह के डर दिखा कर एक बिचौलिया 4 रुपए प्रति कीवी के हिसाब से 2,000 कीवी की तुड़वाई कर के हाथोंहाथ ले गया.

वह तो बाद में खुलासा हुआ कि खुदरा बाजार में उस प्रजाति का कीवी फल 20 से 25 रुपए का एक बिक रहा था. छोटा और मजबूर किसान हाथ मलता ही रह गया.

पहाड़ में एक घर से दूसरे घर की दूरी भी किलोमीटर में हो सकती है. इस कारण वह किसान किसी दूसरे कीवी किसान से संपर्क ही न कर सका कि फल की असली कीमत क्या चल रही है.

वह तो उस किसान के खेत में हरी मिर्च की पैदावार बढि़या हुई. उस ने खुदरा बाजार में 40 रुपए प्रति किलो के हिसाब से वह हरी मिर्च बेच कर कुछ कमाई कर ली, तो सीजन के 3 महीने उसे राशन पानी मिल गया वरना मुश्किल हो जाती.

पिछले कई सालों में भारत की खेतीबारी में अनेक खास बदलाव हुए हैं. इन पर नीति निर्धारकों और गैरसरकारी संगठनों किसी ने गौर नहीं किया है. लाखों की तादाद में छोटे किसान एकदम पारंपरिक खेती कर रहे हैं. वे बैलों की जोड़ी रखते हैं. बैलगाड़ी भी चलाते हैं. मौसम के हिसाब से फसल बोते हैं और खलिहान उन के पास हैं ही नहीं.

जो बहुत बड़े किसान है उन के पास सब्सिडी लेने, कर्ज लेने, बाजार को प्रभावित करने के बहुत सारे उपाय और उपकरण हैं,  मगर जो किसान एक मौसम में केवल 10 बोरी प्याज उगा रहा है, वह केवल ठगी का शिकार हो रहा है. उसे न कभी मुफ्त बीज मिला, न खाद मिली. खेतीबारी को और असरदार बनाने के लिए इस तरफ गौर करना बहुत जरूरी है. Society

लेखक : संदीप पांडे ‘शिष्य’

Story in Hindi: ज्योतिष से रोजगार, है न वाकई मजेदार

Story in Hindi. अपनी चहेती पत्रिका ‘सरस सलिल’ के पिछले सैकड़ों अंकों में आप ‘रोजगार’ स्तंभ के जरीए कई तरह के सस्ते व आसान धंधों की जानकारी हासिल कर के उन से फायदा उठा चुके होंगे. आज हम आप को सब से हट कर एक ऐसे धंधे या पेशे के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कि धर्मकर्म के नाम पर अपनी संतों की ‘पावन’ धरती पर सदियों से धड़ल्ले से चला आ रहा है. वह है, ज्योतिष का धंधा. कुछ संपादकीय नियमकायदों के तहत यह ‘रोजगार’ स्तंभ में न छप कर ‘मजाक’ स्तंभ में छापा जा रहा है. कृपया इस बात को अन्यथा न लें.

किसी भी धंधे को शुरू करने के लिए आप को एक मोटी रकम को धंधे में लगाने का जोखिम उठाना पड़ता है. सरकारी सेवा क्षेत्र में जाने से पहले तमाम तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं को ‘झेलना’ पड़ता है. चार्टर्ड अकाउंटैंट, वकील, डाक्टर, इंजीनियर वगैरह बनने के लिए बरसों तक हजारोंलाखों रुपए बहा कर मोटीमोटी किताबों से दिनरात माथापच्ची कर के आप कोई डिगरी अगर हासिल कर भी लेते हैं, तो आप 15-20 हजार रुपए महीने ही कमा पाते हैं.

इस के उलट ‘ज्योतिषाचार्य’ बनने के लिए आप को न तो ज्यादा रुपएपैसे खर्च करने की जरूरत है और न ही दिमाग की. बस, आप में बात करने की चालाकी व अंदाजा लगाने की लियाकत होनी चाहिए.

अगर आप शर्मीले मिजाज के हैं, तो हम आप को पहले ही बता देना चाहेंगे कि इस कमी की वजह से आप कभी भी इस क्षेत्र में कामयाबी हासिल नहीं कर पाएंगे. ज्योतिषी बनने से पहले शर्म छोड़ना उसी तरह बहुत जरूरी है, जिस तरह बीवी बनने के लिए मायके को छोड़ना.

ज्योतिषाचार्य बनने के लिए सब से पहले तो आप को पैंटशर्ट छोड़ कर धोतीकुरते की ‘यूनीफार्म’ अपनानी पड़ेगी. शास्त्रों में लिखा है कि शिखा रखने से आदमी की बुद्धि तेज होती है. हर पंडित इस बात को ध्यान में रख कर ही औरतों की माफिक चोटी रखता है, इसलिए आप को भी रखनी पड़ेगी. इस के लिए आप को एक बार सिर मुंड़वाने की जरूरत भी पड़ सकती है.

अपने ललाट पर तिलक भी लगाना पड़ेगा. अगर आप का ललाट काफी चौड़ा है, तो हम आप को चंदन का बड़ा व गोल तिलक लगाने की सलाह देते हैं. अगर आप का मुंह पिचका हुआ है, तो आप अपनी धर्मपत्नी से सिंदूर ले कर, उस में थोड़ा पानी मिला कर, झाड़ू की तीली की मदद से लंबा सा तिलक, जिसे ‘श्री’ कहा जाता है, लगा सकते हैं.

आजकल बहुत तरह के तिलक चल निकले हैं. जिस तिलक को लगा कर आप की इमेज ‘ऐक्स्ट्रा और्डिनरी’ जैसी लगे, आप उसी को अपना सकते हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि इस पेशे में ऊटपटांग बोलचाल व हरकतों की बेहद अहमियत है. आप अपना ‘ज्योतिष दफ्तर’ अपने घर के ही किसी कमरे में आराम से खोल सकते हैं. आप के घर के बाहर इस बारे में एक बोर्ड जरूर लगा होना चाहिए, ताकि लोगों को इस बात की जानकारी आसानी से हो सके.

जिस तरह किसी दिल के माहिर डाक्टर के क्लिनिक में दिल का बड़ा सा फोटो व कान के माहिर डाक्टर के यहां कान के फोटो लगे रहते हैं, उसी तरह आप के ‘दफ्तर’ में भी ‘हाथ’ का एक बड़ा सा फोटो लगा होना चाहिए.

पूरे कमरे में जहांतहां संस्कृत भाषा में लिखी सूक्तियां, मंत्रों व श्लोकों के स्टीकर चिपके होने चाहिए. भले ही इस से कमरे की शोभा खराब हो, पर ये आप के पहुंचे हुए ज्योतिषी होने की शख्सीयत में चार चांद लगा जाएंगे. आप के दफ्तर में 4-5 तरह के पंचांग बेतरतीबी से बिखरे होने चाहिए. यह आप के बिजी होने का सुबूत होगा.

दफ्तर में सैकड़ों साल पहले लिखी हुई धर्म व कर्मकांडों की किताबों का भी अच्छाखासा संग्रह होना जरूरी है. ज्यादातर ज्योतिषियों की संतानें इतनी भ्रष्ट व कामचोर होती हैं कि वे अपने बाप का पेशा अपना नहीं पातीं. सो, अगर आप अपने शहर की किसी कबाड़ी की दुकान खंगालें, तो तमाम कीमती किताबें आप को रद्दी के भाव भी मिल सकती हैं.

इस से आप को एक फायदा और भी होगा. वह यह कि आप के ‘ग्राहकों’ की नजर जब इन पुरानी किताबों पर पड़ेगी, तो वे यही सोचेंगे कि आप ने इन किताबों का बड़ा गहरा अध्ययन किया है, तभी तो ये ग्रंथ इस हालत में हैं.

इस से आप के शहर में आप की इमेज शास्त्रों के ज्ञाता व महापंडित जैसी बनने लगेगी. भले ही आप को संस्कृत की एबीसीडी न आती हो, पर इस से आप के नाम के साथ ‘पुराणाचार्य’, ‘वेदाचार्य’ व ‘व्याकरणाचार्य’ जैसे शब्द लगने लगेंगे.

ये तो हुई बुनियादी बातें. अब जरा प्रैक्टिकल बातों को ध्यान से समझ लें. आप अपनी बातों में संस्कृत के कुछ शब्दों को रट कर जहांतहां ‘फिट’ करने की आदत डालें. किसी आदमी के चेहरे को पढ़ कर कुछ जानने की कोशिश करें. कुछ बातें ऐसी होती हैं कि उन्हें हर किसी पर आसानी से फिट किया जा सकता है.

मसलन, आप काफी प्रतिभावान हैं, मगर यह दुख की बात है कि आप की प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. समाज में जो इज्जत आप को मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है. आप में काफी कुछ करगुजरने की क्षमता है, पर शनि की बुरी नजर की वजह से आप हर बार नाकाम हो रहे हैं. आप जिस क्षमता से काम कर रहे हैं, उस के मुताबिक आप को कामयाबी नहीं मिल रही है.

आप सभी से प्यार करने वाले जज्बाती इनसान हैं, पर इस के बदले आप को कभी किसी का प्यार नहीं मिल पा रहा है. उलटे आप अपनों द्वारा ही दुत्कारे जा रहे हैं. आप कला प्रेमी, संगीत प्रेमी व खास काबिलीयत रखने वाले हैं. आप अपने वजूद की वजह से सब से अलग जानेपहचाने जाते हैं, वगैरह.

लड़कियां कुंआरी हैं या शादीशुदा, यह उन के सुहागचिह्नों की मदद से आसानी से पहचाना जा सकता है. लड़कों के संबंध में देखिए कि उस की अनामिका उंगली में कोई सोने की अंगूठी है या गले में सोने का हार है या नहीं. जब आप के पास कोई कुंआरा लड़का आता है, तो वह यही जानना चाहेगा कि वह इम्तिहान में पास हो सकेगा या नहीं. या फिर उस के लिए कोई धंधा करना ठीक रहेगा या नौकरी.

अगर आप के पास कोई कुंआरी लड़की आती है, तो वह यकीनन अपनी शादी में आ रही अड़चनों को ले कर परेशान होगी और आप से यह जानना चाहेगी कि कौन सा ग्रह इस काम में रुकावट डाल रहा है. इस को शांत करने के लिए आप को कितना चढ़ावा देना पड़ेगा. गोया, आप ज्योतिषी न हो कर इस मृत्युलोक में सारे ग्रहों के प्रतिनिधि हो गए.

कोई शादीशुदा नौजवान यदि आए, तो वह अपनी बीवी से पीडि़त होता है. यदि कोई नवविवाहिता आए, तो वह बेचारी अपने पति के शराबी, दुर्व्यसनी व कामचोर होने की वजह से परेशान हो कर आप के पास पहुंचती है.

अगर आप के पास 25-30 साल के मियांबीवी आते हैं, तो आप सीधे ही इस नतीजे पर पहुंच जाइए कि उन को संतानसुख की प्राप्ति नहीं हो पा रही है.

इस के लिए पहले तो आप उन दोनों की कुंडली मिलाने के बहाने ‘मोटी फीस’ झटक सकते हैं. बाद में उन्हें बता सकते हैं कि क्या करने से संतान योग बनता दिख रहा है. इस के लिए ऐसा अनुष्ठान आदि का काम चुनें, जिस से कि आप को लंबा फायदा हो.

आप अपने पास पहुंचे ग्राहक की आंखों को ध्यान से देखिए, अगर वे गहरी लाल हैं और उन के नीचे गहरे काले गड्ढे भी हैं, तो वह आदमी बीमार ही नहीं, बल्कि अनिद्रा का भी शिकार होता है. ऐसे आदमी शारीरिक रूप से कम व दिमागी रूप से ज्यादा बीमार होते हैं. ऐसे लोगों के घर जा कर आप कोई जाप कर के कमाई कर सकते हैं.

पीडि़त आदमी आप को अपने घर से भोजन करा कर ही जाने देगा. ऐसे में आप अपना मनचाहा भोजन यह कह कर उस से बनवा सकते हैं कि अमुक भोजन ऊपर वाले को बहुत प्रिय है और इस का भोग लगाने से वे शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं. एक कहावत है कि सेठ, जेठ और ब्राह्मण का पेट बड़ा ही होता है. ब्राह्मणों को खुद का कमाया भोजन रास नहीं आता है और यह भोजन उन के शरीर को भी नहीं लग पाता है. ऐसे में मजबूत बदन बनाने के लिए यजमान के भोजन पर निर्भर रहना बहुत जरूरी होता है. इसलिए यजमान को उपाय बताते समय ‘ब्राह्मण भोज’ की बात जरूर बतानी चाहिए.

आप के पास रिटायर होने की उम्र में कोई आदमी पहुंचता है, तो वह निश्चित रूप से अपने बेटेबहुओं की अनदेखी का शिकार होता है. सावधान रहें, ऐसा भी हो सकता है कि वह कोई सरकारी मुलाजिम रहा हो या उस की पेंशन अटकी पड़ी हो.

शुरूशुरू में आप को थोड़ी दिक्कत जरूर आ सकती है, पर 2-4 साल बाद आप अंदाजा लगाने में इतने माहिर हो जाएंगे कि आप का अंधेरे में छोड़ा गया तीर भी निशाने पर जा लगेगा. आप की आंखों की काबिलीयत किसी ‘ऐक्सरे मशीन’ जैसी बन जाएगी. कामयाबी आप के कदम चूमेगी.

आप के द्वारा यजमानों का सही भविष्यफल बता देने से वे आप के परमभक्त बन जाएंगे. वे आप के चलतेफिरते इश्तिहार भी साबित होंगे. इस से आप के दफ्तर में यजमानों की भीड़ लग जाएगी और आप डाक्टरों, वकीलों आदि की जलन की वजह बन जाएंगे.Story in Hindi

इस धंधे का सब से बड़ा फायदा तो यह है कि यह तेजी व मंदी से बेअसर रहता है. उलटे ऐसे समय में जो लोग इस से पीडि़त होंगे, वे सभी आप की ही ‘शरण’ में आएंगे. सो, ऐसे उलट समय में भी आप का कारोबार अच्छाखासा चलता रहेगा. तो जनाब, देरी किस बात की है? आज ही अपना कोई अच्छा सा नामकरण कर लीजिए और आज के जमाने में सब से ज्यादा मुनाफा देने वाला ज्योतिष का ‘धंधा’ शुरू कर दीजिए. Story in Hindi

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