कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को हैं कुकिंग का शौक, कभी मां तो, कभी लालू के साथ बनाई डिश

लोकसभा चुनाव 2024 में राहुल गांधी खूब चर्चा में रहे हैं. यूपी की सबसे चर्चित लोकसभा सीटों में से एक रायबरेली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने काफी बड़े अंतर से जीत हासिल की. इस चुनाव में केरल राज्य की वायनाड लोकसभा सीट भी काफी अहम रही. कांग्रेस के राहुल गांधी ने यहां से अच्छी जीत हासिल की. राहुल गांधी चुनावों से पहले भी लोगों के बीच चर्चा में बने रहे. उन्होंने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान लोगों का दुख दर्द सुना उनके साथ बातें की और अलगअलग फूड्स को भी एंजौय भी किए. कुछ महीने पहले राहुल गांधी मां सोनियां गांधी के साथ ऑरेंज मार्मलेड बनाते नजर आएं तो कभी लालू के अवास पर मटन खाते पाए गए.

 

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पूरे देश के राज्यों में अलगअलग फूड्स खाते राहुल गांधी

  • अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान राहुल लोकल फूडस का लुत्फ दिखे. महाराष्ट्र में भाकरी उन्हे बहुत पसंद आया लेकिन तेलंगाना का खाना टेस्टी तो लगा लेकिन तीखा भी लगा.
  • राहुल गांधी पुरानी दिल्ली में खाना बहुत पसंद करते हैं. लेकिन वो मोतीमहल जैसी जगहों पर जाना पसंद करते हैं. इस रेस्टोरेंट का बटर चिकन खूब पसंद हैं. इसके अलावा वह ‘सागर’, ‘स्वागत’ और ‘सरावना भवन’ रेस्टोरेंट जाना पसंद करते हैं.
  • साउथ इंडियन और पंजाबी खाना बेहद पसंद है. उन्हें खाने में छोले-भटूरे, पराठा, तंदूरी चिकन और बटर चिकन बड़े शौक से खाते हैं. राहुल गांधी को चांदनी चौक की आलू टिक्की भी खाना खूब पसंद है. कांग्रेस नेता पानी पुरी के भी शौकीन है जिसे खाने के लिए वह चांदनी चौक जाना पसंद करते हैं.

राहुल गांधी ने लालू अवास पर बनाया था मटन

राहुल गांधी कुकिंग को लेकर एक बार तब भी चर्चा में आए थे जब उन्होंने लालू यादव के साथ उनके घर जाकर मटन बनाया और खाया. जिसका वीडियो राहुल ने सोशल मीडिया पर शेयर भी किया था. उन्होंने लालू यादव से मटन बनाने के टिप्स लिए इस मौके पर लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती,भी उन्हे मटन बनाने के टिप्स देती नजर आई. ये वीडियो पटना में लालू यादव के आवास का बताया गया. वीडियो में राहुल गांधी, लालू यादव के पूरे परिवार के साथ मटन खाते दिखे. इस दौरान सभी ने राजनीति पर भी चर्चा की.

जब मां सोनिया गांधी के साथ बनाया था संतरे का मुरब्बा

राहुल तब भी चर्चा में थे जब साल 2023 विदा हो रहा था और साल 2024 आने वाला था. राहुल गांधी ने अपनी मां सोनिया गांधी के साथ घर पर संतरे का मुरब्बा बनाकर न्यू ईयर का जश्न मनाया. कांग्रेस नेता ने अपने किचन गार्डन से ताजे फलों को तोड़ा और प्रियंका गांधी की रेसिपी से मुरब्बा तैयार किया. मां-बेटे की बातचीत में राहुल यह कहते सुने जा सकते हैं कि अगर बीजेपी वाले चाहें तो वे उनको भी मारेमेलेड दे सकते हैं. मजाकिया लहजे में सोनिया गांधी ने कहा, ‘वे लोग इसे लेकर हमपर फेंकेंगे’. इसका वीडियो भी राहुल ने अपने सोशल मीडिया पर हेंडल पर शेयर किया.

lok sabha Election 2024 : क्या पैसे के बल पर हाईजैक हो रहे हैं चुनाव

भारत के संविधान निर्माताओं और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले अमर शहीदों ने कभी सोचा ही नहीं होगा कि उन के आजाद देश में जब चुनाव होंगे, तो उन्हें पैसे के बूते कुछ लोग हाईजैक कर लेंगे.

चुनावी खर्च जिस तरह बेलगाम होते जा रहे हैं, उस पर बृजेश माथुर की सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर यह एक टिप्पणी बहुत खास है.

‘बेहतर होगा कि चुनाव आयोग इन मामलों की खुद जांच करे. पता लगाए कि अवैध बरामदगी के पीछे कौन सा उम्मीदवार या दल है और फिर उस के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो. इस तरह की सख्ती के बिना चुनावों में धनबल का दखल नहीं रुकेगा.

‘यह सही है कि चुनाव में धनबल का इस्तेमाल रोकने के लिए चुनाव आयोग की सतर्कता बढ़ी है, लेकिन यह सिर्फ धरपकड़ तक सीमित है. ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत कम है, क्योंकि चुनाव के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं लेते. अकसर असली सरगना छुटभैयों को फंसा कर बच जाते हैं.’

दरअसल, लोकतंत्र का महाकुंभ कहलाने वाले लोकसभा चुनाव में आज जिस तरह चुनाव में करोड़ों रुपए हर लोकसभा संसदीय क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं, उस से यह तो साफ हो जाता है कि आम आदमी या कोई सामान्य काबिल इनसान संसद में पहुंचने के लिए सात जन्म लेगा तो भी नहीं पहुंच पाएगा.

लोकसभा चुनाव 2024 में माना जा रहा है कि खर्च के मामले में पिछले सारे रिकौर्ड टूट जाएंगे और दुनिया का सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाने वाले भारत में चुनाव खर्च अपनी हद पर होंगे यानी भारत में दुनिया की सब से खर्चीली चुनावी व्यवस्था होगी.

चुनाव पर गंभीरता से नजर रखने वाले जानकारों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव 2024 में अनुमानित खर्च 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है. अगर बात की जाए लोकसभा चुनाव 2019 में खर्च की तो 60,000 करोड़ रुपए से दोगुने से भी ज्यादा है.

दरअसल, इस में राजनीतिक दलों और संगठनों, उम्मीदवारों, सरकार और निर्वाचन आयोग समेत चुनावों से संबंधित सभी तरह के खर्च शामिल हैं. चुनाव संबंधी खर्चों पर बीते 40 साल से नजर रख रहे एक गैरलाभकारी संगठन के अध्यक्ष एन. भास्कर राव के दावे के मुताबिक, लोकसभा चुनाव में अनुमानित खर्च 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है.

माहिरों का मानना है कि भारत में चुनावी बौंड के खुलासे से साफ हो गया है कि पार्टियों के पास खुल कर खर्च करने के लिए पैसा है. राजनीतिक दलों ने उस पैसे को खर्च करने के रास्ते तैयार कर लिए हैं.

जैसा कि हम जानते हैं देश में काले धन की बात की जाती है, भ्रष्टाचार की बात की जाती है. यह सबकुछ चुनाव के दरमियान देखा जा सकता है और चौकचौराहे पर इस पर चर्चा होने लगी है कि आखिर प्रमुख राष्ट्रीय दलों के उम्मीदवार जो करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं, वे आते कहां से हैं? मगर इस दिशा में न तो सरकार ध्यान दे रही है और न ही चुनाव आयोग या फिर सुप्रीम कोर्ट या सरकार की कोई जांच एजेंसी.

भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वह सबकुछ कर रही है, जो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. इस का आज की तारीख में अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

हो सकता है कि आने वाले समय में इस का खुलासा हो पाए कि भाजपा ने लोकसभा 2024 में कितना पैसा खर्च किया. माना जा रहा है कि चुनाव प्रचार में हो रहे खर्च के मामले में यह पार्टी देश की विपक्षी पार्टियों को बहुत पीछे छोड़ देगी.

एक एनजीओ के जरीए से इस पर निगाह रखने वाले संगठन के पदाधिकारी के मुताबिक, उन्होंने शुरुआती खर्च 1.2 लाख करोड़ रुपए से बढ़ा कर 1.35 लाख करोड़ रुपए कर दिया, जिस में चुनावी बौंड के खुलासे के बाद के आंकड़े और सभी चुनाव संबंधित खर्चों का हिसाब शामिल है.

एक और संगठन ने दावा किया कि साल 2004-05 से साल 2022-23 तक देश के 6 प्रमुख राजनीतिक दलों को कुल 19,083 करोड़ रुपए का तकरीबन 60 फीसदी योगदान अज्ञात स्रोतों से मिला, जिस में चुनावी बौंड से मिला पैसा भी शामिल था.

एक और संगठन ने बताया कि चुनाव से पहले की गतिविधियां पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रचार खर्च का अटूट हिस्सा हैं, जिन में राजनीतिक रैलियां, परिवहन, कार्यकर्ताओं की बहाली और यहां तक कि नेताओं की विवादास्पद खरीदफरोख्त भी शामिल है.

इसी तरह विदेश में बैठे चुनाव पर निगाह रखने वाले एक संगठन के मुताबिक, भारत में 96.6 करोड़ वोटरों के साथ प्रति वोटर खर्च तकरीबन 1,400 रुपए होने का अंदाजा है. यह भी कहा गया कि यह खर्च साल 2020 के अमेरिकी चुनाव के खर्च से ज्यादा है, जो 14.4 अरब डौलर या तकरीबन 1.2 लाख करोड़ रुपए था.

एक विज्ञापन एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित वाधवा के मुताबिक, लोकसभा 2024 के इस  चुनाव में डिजिटल प्रचार बहुत ज्यादा हो रहा है. राजनीतिक दल कारपोरेट ब्रांड की तरह काम कर रहे हैं और पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं.

इस तरह आज हमारे देश में जो लोकसभा चुनाव लड़ा जा रहा है, उस में राजनीतिक पार्टियां सत्ता हासिल करने के लिए तय सीमा से ज्यादा खर्च कर रही हैं.

ऐसे में अगर हम नैतिकता की बात करें, तो जब कोई पार्टी या उस के उम्मीदवार करोड़ों रुपए खर्च कर के चुनाव जीतते हैं, तो साफ है कि वे आम जनता के लिए जवाबदेह नहीं हो सकते. जिन लोगों ने उन्हें रुपएपैसे की मदद की है या गलत तरीकों से रुपया कमाया गया है, तो फिर चुने हुए प्रतिनिधि यकीनन अपने आकाओं के लिए काम करेंगे या फिर अपना फायदा पहले देखेंगे.

Loksabha Election 2024: बेहिसाब होता खर्च

भारत के संविधान निर्माताओं और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले अमर शहीदों ने कभी सोचा ही नहीं होगा कि उन के आजाद देश में जब चुनाव होंगे, तो उन्हें पैसे के बूते कुछ लोग हाईजैक कर लेंगे. चुनावी खर्च जिस तरह बेलगाम होते जा रहे हैं, उस पर बृजेश माथुर की सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर यह एक टिप्पणी बहुत खास है:

‘बेहतर होगा कि चुनाव आयोग इन मामलों की खुद जांच करे. पता लगाए कि अवैध बरामदगी के पीछे कौन सा उम्मीदवार या दल है और फिर उस के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो. इस तरह की सख्ती के बिना चुनावों में धनबल का दखल नहीं रुकेगा.

‘यह सही है कि चुनाव में धनबल का इस्तेमाल रोकने के लिए चुनाव आयोग की सतर्कता बढ़ी है, लेकिन यह सिर्फ धरपकड़ तक सीमित है. ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत कम है, क्योंकि चुनाव के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं लेते. अकसर असली सरगना छुटभैयों को फंसा कर बच जाते हैं.’

दरअसल, लोकतंत्र का महाकुंभ कहलाने वाले लोकसभा चुनाव में आज जिस तरह चुनाव में करोड़ों रुपए हर लोकसभा संसदीय क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं, उस से यह तो साफ हो जाता है कि आम आदमी या कोई सामान्य काबिल इनसान संसद में पहुंचने के लिए सात जन्म लेगा तो भी नहीं पहुंच पाएगा.

लोकसभा चुनाव 2024 में माना जा रहा है कि खर्च के मामले में पिछले सारे रिकौर्ड टूट जाएंगे और दुनिया का सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाने वाले भारत में चुनाव खर्च अपनी हद पर होंगे यानी भारत में दुनिया की सब से खर्चीली चुनावी व्यवस्था होगी.

चुनाव पर गंभीरता से नजर रखने वाले जानकारों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव 2024 में अनुमानित खर्च 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है. अगर बात की जाए लोकसभा चुनाव 2019 में खर्च की तो 60,000 करोड़ रुपए से दोगुने से भी ज्यादा है.

दरअसल, इस में राजनीतिक दलों और संगठनों, उम्मीदवारों, सरकार और निर्वाचन आयोग समेत चुनावों से संबंधित सभी तरह के खर्च शामिल हैं. चुनाव संबंधी खर्चों पर बीते 40 साल से नजर रख रहे एक गैरलाभकारी संगठन के अध्यक्ष एन. भास्कर राव के दावे के मुताबिक, लोकसभा चुनाव में अनुमानित खर्च 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है.

माहिरों का मानना है कि भारत में चुनावी बौंड के खुलासे से साफ हो गया है कि पार्टियों के पास खुल कर खर्च करने के लिए पैसा है. राजनीतिक दलों ने उस पैसे को खर्च करने के रास्ते तैयार कर लिए हैं.

जैसा कि हम जानते हैं देश में काले धन की बात की जाती है, भ्रष्टाचार की बात की जाती है. यह सबकुछ चुनाव के दरमियान देखा जा सकता है और चौकचौराहे पर इस पर चर्चा होने लगी है कि आखिर प्रमुख राष्ट्रीय दलों के उम्मीदवार जो करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं, वे आते कहां से हैं? मगर इस दिशा में न तो सरकार ध्यान दे रही है और न ही चुनाव आयोग या फिर सुप्रीम कोर्ट या सरकार की कोई जांच एजेंसी.

भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वह सबकुछ कर रही है, जो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. इस का आज की तारीख में अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

हो सकता है कि आने वाले समय में इस का खुलासा हो पाए कि भाजपा ने लोकसभा 2024 में कितना पैसा खर्च किया. माना जा रहा है कि चुनाव प्रचार में हो रहे खर्च के मामले में यह पार्टी देश की विपक्षी पार्टियों को बहुत पीछे छोड़ देगी.

एक एनजीओ के जरीए से इस पर निगाह रखने वाले संगठन के पदाधिकारी के मुताबिक, उन्होंने शुरुआती खर्च 1.2 लाख करोड़ रुपए से बढ़ा कर 1.35 लाख करोड़ रुपए कर दिया, जिस में चुनावी बौंड के खुलासे के बाद के आंकड़े और सभी चुनाव संबंधित खर्चों का हिसाब शामिल है.

एक और संगठन ने दावा किया कि साल 2004-05 से साल 2022-23 तक देश के 6 प्रमुख राजनीतिक दलों को कुल 19,083 करोड़ रुपए का तकरीबन 60 फीसदी योगदान अज्ञात स्रोतों से मिला, जिस में चुनावी बौंड से मिला पैसा भी शामिल था.

एक और संगठन ने बताया कि चुनाव से पहले की गतिविधियां पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रचार खर्च का अटूट हिस्सा हैं, जिन में राजनीतिक रैलियां, परिवहन, कार्यकर्ताओं की बहाली और यहां तक कि नेताओं की विवादास्पद खरीदफरोख्त भी शामिल है.

इसी तरह विदेश में बैठे चुनाव पर निगाह रखने वाले एक संगठन के मुताबिक, भारत में 96.6 करोड़ वोटरों के साथ प्रति वोटर खर्च तकरीबन 1,400 रुपए होने का अंदाजा है. यह भी कहा गया कि यह खर्च साल 2020 के अमेरिकी चुनाव के खर्च से ज्यादा है, जो 14.4 अरब डौलर या तकरीबन 1.2 लाख करोड़ रुपए था.

एक विज्ञापन एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित वाधवा के मुताबिक, लोकसभा 2024 के इस  चुनाव में डिजिटल प्रचार बहुत ज्यादा हो रहा है. राजनीतिक दल कारपोरेट ब्रांड की तरह काम कर रहे हैं और पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं.

इस तरह आज हमारे देश में जो लोकसभा चुनाव लड़ा जा रहा है, उस में राजनीतिक पार्टियां सत्ता हासिल करने के लिए तय सीमा से ज्यादा खर्च कर रही हैं.

ऐसे में अगर हम नैतिकता की बात करें, तो जब कोई पार्टी या उस के उम्मीदवार करोड़ों रुपए खर्च कर के चुनाव जीतते हैं, तो साफ है कि वे आम जनता के लिए जवाबदेह नहीं हो सकते. जिन लोगों ने उन्हें रुपएपैसे की मदद की है या गलत तरीकों से रुपया कमाया गया है, तो फिर चुने हुए प्रतिनिधि यकीनन अपने आकाओं के लिए काम करेंगे या फिर अपना फायदा पहले देखेंगे.

लोकसभा चुनाव : क्या औरतों के रहमोकरम पर हैं मर्द नेता?

चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, सभी पार्टियां जीतने के लिए बड़ेबड़े वादे करती हैं. 13 मार्च, 2024 को कांग्रेस ने औरतों के लिए ‘नारी न्याय गारंटी’ योजना का ऐलान किया. बताया गया कि यह पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा भी है. इस व दूसरे और वादों को राहुल गांधी ने अनाउंस किया.

‘नारी न्याय गारंटी’ योजना का वादा तो खासकर औरतों की आर्थिक व सामाजिक बैकग्राउंड को मजबूत करने को ले कर था, जिस में 5 बिंदु रखे गए :

– देश की गरीब औरतों को सालाना एक लाख रुपए की माली मदद.

– केंद्र सरकार की नई नियुक्तियों में 50 फीसदी औरतों को हक.

– आंगनबाड़ी, आशा और मिड डे मील वर्कर्स के मासिक वेतन दोगुने.

– हर पंचायत में औरतों की जागरूकता के लिए कानूनी सहायक की नियुक्ति.

– हर जिले में औरतों के लिए कम से कम एक होस्टल.

एक तरह से देखा जाए तो ये वादे अपनेआप में खासा दिलचस्प हैं, क्योंकि जिस तरह संपत्ति और तमाम हकों पर मर्दों का कब्जा है, उसे एक हद तक बैलेंस करने के लिए इस तरह के काम किए जाने जरूरी हैं.

दूसरे, यह जरूरी इसलिए भी है कि आज आम लोगों के पास परचेजिंग पावर कम हो रही है. मार्केट में वैल्थ सर्कुलेशन हो नहीं पा रहा है. पैसा कुछ खास लोगों के हाथों में ही सिमट रहा है.

ऐसे में गरीबों को डायरैक्ट कैश ट्रांसफर से देश की अर्थव्यवस्था को चलाए रखना बेहद जरूरी भी है. पर समस्या यह कि इस तरह के बड़े वादे अकसर डूबते खेमे से ही आते हैं, जिस पर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं लगाई जा सकतीं.

हालांकि इस से एक सवाल तो बनता ही है कि आजादी के 75 साल बाद भी ऐसी नौबत क्यों है कि पक्षविपक्ष द्वारा औरतों के लिए ऐसे वादे करने पड़ रहे हैं? आखिर क्यों देश की आधी आबादी यानी औरतों को लुभाने के लिए चुनावी पार्टियों को तरहतरह के वादे करने पड़ रहे हैं?

इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 मार्च, 2024 को सिलैंडर पर 100 रुपए की छूट देने का ऐलान किया. अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा की तरफ से कहा गया है कि वह जीतने के बाद

सभी बीपीएल परिवारों की छात्राओं को केजी से पीजी तक मुफ्त तालीम का फायदा देगी.

पीएम उज्ज्वला योजना में औरतों को 450 रुपए में सिलैंडर दिया जाएगा.

15 लाख ग्रामीण औरतों को लखपति योजना के  तहत कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा. एक करोड़, 30 लाख से ज्यादा औरतों को माली मदद के साथसाथ आवास का फायदा मिलेगा. बीपीएल परिवारों की लड़कियों को 21 साल तक कुल 2 लाख रुपए का फायदा दिया जाएगा.

हालांकि सवाल यह भी है कि भाजपा की घोषणाओं से कितनी उम्मीद लगाई जाए? साल 2014 से पहले भाजपा ने ‘अच्छे दिन’, ‘हर साल 2 करोड़ नौकरियां’, ‘महंगाई कम करने’, ‘काला धन वापस लाने’ और ‘हर किसी के बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपए डालने’ जैसे तमाम वादे किए थे. हालांकि, चुनाव के बाद सवाल पूछा गया, तो तब के भाजपा अध्यक्ष व वर्तमान में गृह मंत्री अमित शाह ने इसे चुनावी जुमला बता दिया था.

चुनाव में औरतों को लुभाने के लिए राष्ट्रीय पार्टियां ही कोशिश नहीं कर रही हैं, बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी वादे कर रही हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर हैंडल से 4 मार्च, 2024 को ट्वीट करते हुए कहा, ‘महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आप की दिल्ली सरकार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अब महिलाओं को सालाना 12,000 रुपए की सौगात दी है. 18 साल से अधिक उम्र की हमारी सभी बहनबेटियों, माताओं और बहनों को अब मुख्यमंत्री सम्मान योजना के तहत 1,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे.’

इसी तरह तमिलनाडु में भी द्रविड़ मुनेत्र कषगम सरकार व पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार हर महीने 1,000 रुपए डायरैक्ट ट्रांसफर कर रही हैं. तकरीबन सभी पार्टियां औरतों के लिए जरूरी घोषणाएं कर रही हैं.

यह सोचा जा सकता है कि अचानक इन पार्टियों में औरतों के प्रति ऐसा रु?ान क्यों होने लगा? इस की वजह पिछले एक दशक में औरतों के चुनावी भागीदारी में बड़ा बदलाव आना है. वे सब से बड़ा वोट बैंक बन कर उभरी हैं. इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव में बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में औरतों ने पिछले कुछ चुनावों में मर्दों से ज्यादा वोट डाले.

लोकसभा से ले कर विधानसभा चुनाव तक सभी जगह इन की वोटिंग में 10 से 15 फीसदी तक का भारी इजाफा देखने को मिला है. इसे इन आंकड़ों से सम?ाते हैं कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मर्द और औरत वोटरों के वोटिंग फीसदी में सिर्फ डेढ़ फीसदी का फर्क था, जबकि साल 2019 में वे मर्दों से आगे निकल गईं. साल 2019 के चुनाव में मर्दों का वोटिंग फीसदी जहां 67.02 था, वहीं औरतों का 67.18 फीसदी था.

इस बढ़ते ट्रैंड और औरतों को ले कर हो रही घोषणाओं से ऐसा लग रहा है कि साल 2024 के चुनाव में औरत वोटरों की तादाद पिछली बार की तुलना में ज्यादा होगी. चुनाव आयोग के मुताबिक, साल 2024 के चुनाव में कुल 96.8 करोड़ वोटर हिस्सा ले सकते हैं. इन में 49.7 करोड़ मर्द और 47.1 करोड़ औरत वोटरों के होने का अंदाजा है.

खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन की तादाद और भी बढ़ी है. आज किसी भी पार्टी की सियासत को ऊपर या नीचे करने में औरत वोटर बड़ा रोल निभा रही हैं. कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में रहने की एक बड़ी वजह औरतें ही हैं. यही वजह भी है कि केंद्र से ले कर राज्य सरकारों में सरकार चला रही पार्टियां औरतों के लिए कई खास योजनाएं व घोषणाएं कर रही हैं.

अगर इस का क्रेडिट साल 2005 में आए मनरेगा ऐक्ट व पैतृक संपत्ति पर बेटी के अधिकार और साल 2009 में मिले शिक्षा के अधिकार जैसे अधिकारों को दिया जाए, जिन्होंने औरतों को आगे बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया तो गलत न होगा, क्योंकि इन अधिकारों ने निचले से निचले तबके को छूने की कोशिश की, जिन में दोयम दर्जे में औरतें ही थीं.

एक तरह से औरतों के लिए ये नीतियां संजीवनी बूटी बन कर आईं, जिन्होंने उन्हें राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग और अपने हकों के लिए लड़ना सिखाया, उन के हाथों में थोड़ीबहुत आर्थिक ताकत देने की कोशिश की, सही माने में अपने पैरों पर खड़ा करने में योगदान दिया.

मगर इस के बावजूद अगर साल 2024 के चुनावों में औरतों के लिए स्पैशल घोषणाएं की जा रही हैं, तो यह जरूर सोचा जा सकता है कि आज भी औरतें उस लैवल पर नहीं पहुंच पाई हैं जहां उन्हें होना चाहिए था.

आज भी सारी आर्थिक और कानूनी ताकत मर्दों के हाथों में हैं. इस की पुष्टि वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी की गई नई रिपोर्ट ‘वीमेन, बिजनैस ऐंड द ला’ और उस के आंकड़े भी करते हैं.

इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि काम करने वाली जगह पर औरतों और मर्दों के बीच का फर्क पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ा है, वहीं जब हिंसा और बच्चों की देखभाल से जुड़े कानूनी मतभेदों को ध्यान में रखा जाता है, तो औरतों को मर्दों की तुलना में दोतिहाई से भी कम हक हासिल हैं.

हैरानी यह है कि दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जो इस गैरबराबरी से अछूता हो, यहां तक कि दुनिया की अमीर अर्थव्यवस्थाएं भी इस फर्क को दूर करने में कामयाब नहीं हो पाई हैं. भारत में मामला गंभीर है, क्योंकि यहां लैंगिक गैरबराबरी दुनिया के कई देशों के मुकाबले बेहद खराब हालत में है.

‘वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2023’ में भारत का नंबर 146 देशों में शर्मनाक 127वें नंबर पर है. भारत के कामकाजी और बड़े पदों पर गैरबराबरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संसद में औरतों की भागीदारी महज 14 फीसदी है, वहीं देश के कुल 119 अरबपतियों की लिस्ट में महज 9 औरतें अरबपति हैं.

आंकड़े साफ करते हैं कि मर्दों के पास औरतों के मुकाबले ज्यादा मौके हैं, वरना देश की कामकाजी औरतों की भागीदारी महज 23 फीसदी और मर्दों की 72 फीसदी न होती.

यानी, देखा जाए तो 50 फीसदी औरतें चुनावी घोषणाएं करने वाली पार्टियों के मुखिया से ले कर संसद में चुने गए मर्द नेताओं के रहमोकरम पर हैं, जो औरतों के लिए गुलामी से कम नहीं.

400 पार : दावा या महज शिगूफा

भारतीय जनता पार्टी ने अपने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोल दिया है. साल 2024 में वह पूरे भारत को जीतना चाहती है. इस के लिए उस ने लोकसभा की 400 सीटें जीतने का टारगेट रखा है.

भारत के इतिहास में 400 सांसदों की जीत केवल साल 1984 में मिली थी, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी. राजीव गांधी उस समय कांग्रेस के नेता थे. इस हमदर्दी वाले चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा की 404 सीटें मिली थीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नाम इतिहास में लिखवाने का शौक है. ऐसे में वे 2024 के लोकसभा चुनाव में राजग गठबंधन को 400 से ज्यादा सीटें हासिल करने का टारगेट ले कर चल रहे हैं.

पौराणिक कहानियों में तमाम ऐसे राजाओं की कहानियां दर्ज हैं, जो अपनी ताकत दिखाने के लिए अश्वमेध यज्ञ करते थे. इस के लिए वे अपना एक घोड़ा छोड़ते थे. घोड़ा जो भी पकड़ता था, उसे राजा से लड़ना होता था.

मजेदार बात यह है कि यह घोड़ा केवल कमजोर राज्यों की तरफ जाता था. भारत के किसी भी राजा ने दूसरे देशों पर अपना ?ांडा नहीं लहराया है. जिस तरह से मुगलों ने भारत पर हमला किया, उस तरह भारत के किसी राजा ने दूसरे देश को अपने कब्जे में नहीं किया. इस से यह पता चलता है कि अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा अपने ही आसपास के राज्य के राजाओं के लिए छोड़ा जाता था.

खोया चाल, चरित्र और चिंतन

लोकतंत्र में अश्वमेध घोड़ा तो नहीं छोड़ा जा सकता, ऐसे में इस के लिए दूसरी पार्टियों को खत्म करना जरूरी हो गया है. इस के लिए भाजपा तोड़फोड़ और दलबदल को बढ़ावा दे रही है. बिहार में जद (यू) और राजद गठबंधन को तोड़ कर नीतीश कुमार को भाजपा ने अपनी तरफ मिला लिया.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल पर डोरे डाल रही है. महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़ कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया. इस के साथ ही विरोधी नेताओं को दबाने के लिए सीबीआई और ईडी का सहारा लेना पड़ रहा है.

इस तरह के काम हमेशा कमजोर लोग करते हैं. भाजपा खुद को ताकतवर कहती है, सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी बताती है, लेकिन इस के बाद भी उसे छोटे दलों में तोड़फोड़ करनी पड़ती है.

चंडीगढ़ में मेयर का चुनाव जीतने के लिए इसी तरह का काम किया गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट तक को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी है.

चुनाव में दलबदल कोई नई बात नहीं है. हरियाणा में 1980 के दशक में ‘आयाराम गयाराम’ नाम से दलबदल मशहूर था. उत्तर प्रदेश में भाजपा, बसपा और सपा की सरकार के दौर में साल 1989 के बाद से साल 2007 तक यह खूब हुआ. इस में संस्कारवान कही जाने वाली भाजपा का बड़ा योगदान रहा है.

बिना विपक्ष कैसा लोकतंत्र

राजनीति में पालाबदल संस्कृति धर्म के रास्ते आई. पौराणिक कहानियों में कई जगहों पर यह बताया गया है कि देवता भी एकदूसरे के पक्ष में पालाबदल करते रहते थे. उन की कहानियां सुना कर नेता अपने पालाबदल को सही ठहराते हैं. वे कहते हैं कि इंसाफ के लिए बोला गया झठ कभी झठ नहीं होता.

‘रामायण’ में राम ने छिप कर राजा बाली को मारा. बाली ने अपना कुसूर पूछा, तो राम ने कहा कि अपने भाई का राज्य और पत्नी हासिल करने के अपराध का दंड है. विभीषण ने रावण के अधर्म को ढाल बना कर पाला बदल लिया. ‘महाभारत’ में कृष्ण ने दोनों पाले में रहने का फैसला करते समय कहा कि वे युद्ध नहीं करेंगे. इस के बाद भी वे परोक्ष रूप से युद्ध में हिस्सा लेते रहे.

आज भी नेता जब पाला बदलते हैं, तो कहते हैं कि उस पार्टी का लोकतंत्र खत्म हो गया था, वहां दम घुट रहा था. अब आजादी की सांस ले रहे हैं, घरवापसी हो गई है. संविधान बचाने के लिए दलबदल जरूरी था.

नेताओं के जैसे ही घर, परिवार और महल्लों में अलगअलग पाले बन जा रहे हैं. घरों में 2 ही भाई हैं, तो दोनों के बीच पाले बन गए हैं. उन के बीच खींचतान होती है. पालाबदल की यह संस्कृति धर्म से राजनीति, राजनीति से घरों तक फैल रही है. इस से घर का अमनचैन बिगड़ रहा है.

लोकतंत्र में अगर विधायकों, सांसदों को बचाने के लिए कभी हैदराबाद, कभी गोवा और कभी गुवाहाटी के रिजौर्ट में कैद रखना पड़े, तो यह कैसा लोकतंत्र और कैसी आजादी? दलबदल करने वाला नेता तो इस का जिम्मेदार है ही, जो ताकत इस के लिए मजबूर कर रही है, वह और भी ज्यादा जिम्मेदार है.

केवल 400 के पार जाने से क्या हासिल होगा? लोकतंत्र में संख्या का बल तो अहमियत रखता ही है, उस से ज्यादा अहमियत विपक्ष भी रखता है. सब सांसद हां में हां ही मिलाते रहेंगे, तो जनता की आवाज को कौन उठाएगा?

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