Inspirational Story in Hindi : जीत

Inspirational Story in Hindi. अखबार में आई उस खबर को सपना ने 10 बार बड़ी लगन और चाव से पढ़ा. खबर का एकएक शब्द उसे जबानी याद हो गया था. वह खबर पढ़ कर खयालों में खो गई थी.

शहर की एक मशहूर कंपनी की तरफ से उस कंपीटिशन का आयोजन किया गया था. यह कंपनी औरतों और जवान लड़कियों के अंदरूनी कपड़े बनाती थी. हर साइज की ब्रा और पैंटी बनाने में वह कंपनी माहिर थी और उस का शहर में बड़ा नाम और रसूख था.

16 साल से 20 साल तक की 31 लड़कियां उस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं. विजेता को कंपनी की तरफ से एक महीने के लिए पैरिस की मुफ्त सैर और 5 लाख रुपए का नकद इनाम दिया जाने वाला था. हर खूबसूरत लड़की के लिए यह सुनहरा मौका था.

सपना शहर के जानेमाने उद्योगपति की एकलौती औलाद थी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही घमंडी और जिद्दी भी. दुनिया का हर सपना पैसे की ताकत से पूरा हो सकता है, यह उस की सोच थी. वह हर हालत में इस शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ बन कर कंपीटिशन जीतने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी.

सपना अपनी जिंदगी के 18 साल पार कर चुकी थी. कंपीटिशन के लिए केवल एक महीना बाकी था. इस एक महीने के अंदर उसे हर उस काम को अंजाम देना था, जो उस की जीत के लिए सहायक हो सके.

सपना जीजान से इस के लिए मेहनत कर रही थी. अपने दिमाग में उस ने इस बारे में कुछ योजनाएं और चालें सोची थीं. उन पर अमल कर के वह अपना रास्ता तय करना चाहती थी.

सब से पहले उस ने अपने खास आदमी लगा कर उस कंपीटिशन के लिए कौन और कितने ज्यूरी तय किए गए हैं, उन के बारे में मालूम करने का काम किया था. उसे मिली जानकारी के तहत 3 ज्यूरी बनाए गए थे. उन का फैसला अहम माना जाने वाला था.

60 साला मदनलाल पटेल भी ज्यूरी मेंबर था. वह शहर का माना हुआ बिल्डर था. अच्छी सेहत और रंगीनमिजाज उस के स्वभाव की खासीयत थी.

एक दिन मौका पा कर सपना उस से मिलने उस के दफ्तर पहुंची. उस समय शाम के 6 बज रहे थे और दफ्तर का स्टाफ जा चुका था.

मदनलाल अपने केबिन में कुछ खास फाइलें देख रहा था. सपना ने उसे मिलने का वही समय तय किया. सपना ने उसे अपनी पहचान और उस से मिलने की खास वजह साफ बताई थी.

सपना की खूबसूरती और हिम्मत देख कर मदनलाल प्रभावित हुआ था, मगर ऊपरी तौर पर बनावटी गंभीरता अपने चेहरे पर ला कर वह अपनी सधी, मगर शांत आवाज में कहने लगा, ‘‘सपना, कंपीटिशन के नियम मालूम हो जाने पर भी तुम ने मुझ से मिलने और मुझ पर अपना दबाव डालने की भूल की है. इस के लिए मेरी शिकायत पर तुम्हें कंपीटिशन से बाहर भी जाना पड़ सकता है.’’

‘‘पटेल साहब, कानून और नियम आदमी ही बनाता है और उसे तोड़ने वाला भी आदमी ही होता है. यह कानून तोड़ना आप के लिए फायदेमंद और बहुतकुछ देखने का मौका भी साबित होगा, यह मेरा दावा है.’’

‘‘मेरी समझ में यह बात नहीं बैठ रही है कि कानून तोड़ने के बाद मुझे क्या फायदा होने वाला है. अगर तुम इस बात को जरा सलीके से और साफसाफ कहोगी, तो मैं समझ सकता हूं.’’

‘‘पटेल साहब, आप को तो मालूम ही है कि कंपनी वालों ने यह कंपीटिशन अपना माल ज्यादा से ज्यादा लोगों को बेचने के लिए कराया है. कंपनी जो ब्रा और पैंटी बनाती है, वह कंपीटिशन में भाग लेने वाली लड़की के जिस्म पर कितनी जंचती है और उस का देखने वालों पर क्या असर पड़ता है, यह मैं आप को यहीं दिखा सकती हूं.’’

सपना की इस खुली दावत को नकारना मदनलाल जैसे रंगीनमिजाज आदमी के लिए बहुत मुश्किल था.

अपनी आवाज को काबू में करते हुए वह सपना की तरफ देख कर बड़ी सहज आवाज में बोला, ‘‘सपना, तुम्हारे इस खूबसूरत बदन पर कंपनी की ब्रा और पैंटी कैसी लगती है, यह मैं जरूर देखूंगा, मगर इस केबिन में नहीं.

‘‘साथ वाला केबिन मेरा आराम का कमरा है. वहां चल कर हम आराम से एकदूसरे की चाहत अच्छी तरह पूरी कर सकते हैं.’’

सपना ने हंसते हुए अपना रुख कमरे की तरफ किया. अगले ही पल में वे दोनों कमरे में थे. सपना ने बिना समय गंवाए बदन से अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए. मदनलाल उस के बदन को बडे़ चाव से देख रहा था. देखते ही देखते सपना पूरी तरह कपड़ों से बाहर थी. उस का संगमरमर जैसा बदन और उस की मादक अदाएं देख कर मदनलाल पूरी तरह से बेकाबू हुआ जा रहा था.

सपना ने अपनी बांहों का घेरा मदनलाल के बदन पर कसते हुए अपने होंठ उस के होंठों पर रखे थे. मदनलाल के बदन पर से भी देखते ही देखते एकएक कपड़ा दूर होता गया.

सपना मदनलाल के बदन के विभिन्न अंगों को अपने हाथ से सहलाती और होंठों से चूमती रही. उस की मादक हरकतों से वह पूरी तरह बहक गया था.

सपना के बदन को अपना बनाने के लिए वह मरा जा रहा था. सपना उस की बेकाबू हरकतों को देख कर मन ही मन मुसकराती रही.

देखते ही देखते वह दौर भी आया, जब मदनलाल के सब्र का पैमाना छलकने को हुआ. मगर सपना उस पर पूरी तरह हावी हो कर उस की हर हरकत को बड़ी चतुराई से नाकाम करती रही.

बेचारा मदनलाल कब निढाल हो कर लंबीलंबी सांसें भरने लगा, यह उसे भी पता नहीं लगा. आधे घंटे के बाद वह दोनों फ्रेश हो कर बाहर आए. मदनलाल उसे छोड़ने के लिए खुद उस की कार तक आया था. सपना एक बाजी जीत चुकी थी.

2 दिनों के बाद सपना दूसरे ज्यूरी मेंबर इंद्रजीत वर्मा के घर पर थी. रात के 8 बजे थे और इंद्रजीत रोज की तरह आज भी शराब में धुत्त बैठा था. बंगले में वह आज अकेला था. उस की बीवी और बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे.

सपना ने यह मौका अपने मिशन के लिए ठीक समझा था. इंद्रजीत को उस ने अपनी रसीली बातों और कामुक अदाओं से इस तरह जकड़ कर रख दिया कि बेचारा इंद्रजीत उस के जिस्म को चूमनेचाटने और मसलने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सका. अपनी सांसों पर काबू रख पाना उस के लिए बड़ा मुश्किल काम था.

तीसरा ज्यूरी मेंबर अमरनाथ गुप्ता सपना की समझ से ज्यादा चालाक और शातिर खिलाड़ी साबित हुआ था, मगर सपना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं.

अमरनाथ गुप्ता की बीवी को मरे हुए 10 साल हो गए थे और वह अपनी रातें मनपसंद क्लबों में खूबसूरत औरतों के साथ गुजार कर अपना शौक पूरा करता था.

सपना की लाख कोशिशों के बावजूद वह उस पर इस तरह हावी हुआ था कि उसे अपनी इज्जत बचाना बड़ा मुश्किल लगने लगा था.

अमरनाथ पर आजमाया हुआ हर दांव सपना ने बड़ी चतुराई से नाकाम किया था. सपना के सामने एक पल वह भी आया, जिस समय खुद उसे महसूस होने लगा कि वह अपनी बाजी हारने वाली है, तब पूरी तरह सावधान हो कर उस ने अमरनाथ को अपने बदन से अलग कर दिया था. बेचारा अमरनाथ खुद ही निढाल हो गया था.

इस तरह सपना ने अपने रूप और मायाजाल से उन तीनों ज्यूरी मेंबरों को इस कदर अपना दीवाना बनाया था कि उन तीनों की नजरों में सपना ही इस शहर की एकमात्र ‘ब्यूटी क्वीन’ थी.

सपना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’

का ताज पहनाने के लिए वे तीनों बेताब हुए जा रहे थे. अब सपना का सपना सच होने में ज्यादा देर नहीं थी.

देखते ही देखते वह दिन भी आ गया, जिस का इंतजार सपना और दूसरी लड़कियों और ज्यूरी मेंबरों को था. कंपीटिशन का विरोध करने के लिए शहर के ‘नारी संगठन’ कार्यक्रम में अड़चनें पैदा न करें, इस के लिए संयोजक ने कंपीटिशन के उद्घाटन की जिम्मेदारी शहर के पुलिस कमिश्नर के हाथों में सौंपी थी. इस वजह से वहां पुलिस का पूरा बंदोबस्त था.

शहर के एक शानदार थिएटर में यह कंपीटिशन होने वाला था. लोग बेताबी से कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. पूरा हाल लोगों से भरा पड़ा था. कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो चुकी थी. 10 खूबसूरत लड़कियां इस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं.

3 ज्यूरी मेंबर अपनी सीट पर बैठे थे. देखते ही देखते स्टेज का मखमली खूबसूरत परदा ऊपर गया. लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई. कंपीटिशन के एंकर ने स्टेज संभाल लिया.

सब से पहले 10 लड़कियों ने अपना परिचय लोगों को दिया. दूसरे राउंड में अपने तन पर आकर्षक कपड़े पहन उन्होंने अपनी जवानी और खूबसूरती का जलवा दिखाया. उन के कपड़ों से उन की जवानी और उन के खूबसूरत जिस्म का हर एक अंग जगमगाती रोशनी में लोगों की नींद उड़ा रहा था. सब की आंखों में उन जवान लड़कियों के प्रति तारीफ और वासना तैरती नजर आ रही थी. उन की मादक अदाओं पर लोग तालियां और सीटियां बजा रहे थे और उन्हें उत्साहित कर रहे थे.

आखिरी राउंड शुरू हुआ. हर लड़की कंपनी द्वारा बनाई गई ब्रा और पैंटी पहन कर अपनी मस्तानी चाल से लोगों के दिलों में हलचल मचा रही थी. उन कपड़ों में हर लड़की सैक्सी लग रही थी… लोग रहरह कर अपनी जगह खड़े हो कर उन की तारीफ कर रहे थे.

आखिर में आयोजक द्वारा निकाले गए नामों का ऐलान होने की सूचना दी गई. इस का जोरशोर से स्वागत हुआ.

अगले 5 मिनट में आयोजक द्वारा निकाले गए नाम बताए गए. सपना शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ चुनी गई थी. उस के सिर पर ताज पहनाया गया और उसे 5 लाख रुपए का चैक और पैरिस घूमने का टिकट दिया गया. लोगों ने तालियां बजा कर उस का स्वगात किया.

सपना मन ही मन मुसकराती हुई लोगों का अभिनंदन स्वीकार करती बड़ी शान से स्टेज पर खड़ी रही थी.  Inspirational Story in Hindi

— माधव ना. रानडे

 

Motivational Story : उस का गणित

Motivational Story. मनोज हर दिन जिस मिनी बस में बैठता था, उसी जगह से लक्ष्मी भी बस में बैठती थी. आमतौर पर वे एक ही बस में बैठा करते थे, मगर कभीकभार दूसरी में भी बैठ जाते थे.

उन दिनों उन के बस स्टौप से सिविल लाइंस तक का किराया 4 रुपए लगता था, मगर लक्ष्मी कंडक्टर को 3 रुपए ही थमाती थी. इस बात को ले कर उस की रोज कंडक्टर से बहस होती थी, मगर उस ने एक रुपया कम देने का जैसे नियम बना ही लिया था.

कभीकभार कोई बदतमीज कंडक्टर मिलता, तो लक्ष्मी को बस से उतार देता था. वह पैदल आ जाती थी, पर एक रुपया नहीं देती थी.

लक्ष्मी मनोज के ही महकमे के किसी दूसरे सैक्शन में चपरासी थी. एक साल पहले ही अपने पति की जगह पर उस की नौकरी लगी थी.

लक्ष्मी का पति शंकर मनोज के महकमे में ड्राइवर था. सालभर पहले वह एक हादसे में गुजर गया था.

लक्ष्मी की उम्र महज 25 साल थी, मगर उस के 3 बच्चे थे. 2 लड़के और एक लड़की.

एक दिन मनोज पूछ ही बैठा, ‘‘लक्ष्मी, तुम रोज एक रुपए के लिए कंडक्टर से झगड़ती हो. क्या करोगी इस तरह एकएक रुपया बचा कर?’’

‘‘अपनी बेटी की शादी करूंगी.’’ ‘‘एक रुपए में शादी करोगी?’’ मनोज हैरान था.

‘‘बाबूजी, यों देखने में यह एक रुपया लगता है, मगर रोजाना आनेजाने के बचते हैं 2 रुपए. महीने के हुए 60 रुपए और सालभर के 730 रुपए.  10 साल के 7 हजार, 3 सौ. 20 साल के 14 हजार, 6 सौ.

‘‘5 सौ रुपए इकट्ठे होते ही मैं किसान विकास पत्र खरीद लेती हूं. साढ़े 8 साल बाद उस के दोगुने पैसे हो जाते हैं. 20 साल बाद शादी करूंगी, तब तक 40-50 हजार रुपए तो हो ही जाएंगे.’’

मनोज उस का गणित जान कर हैरान था. उस ने तो इस तरह कभी सोचा ही नहीं था. भले ही गलत तरीके से सही, मगर पैसा तो बच ही रहा था.

लक्ष्मी को खूबसूरत कहा जा सकता था. कई मनचले बाबू और चपरासी उसे पाने को तैयार रहते, मगर वह किसी को भाव नहीं देती थी.

लक्ष्मी का पति शराब पीने का आदी था. दिनभर नशे में रहता था. यही शराब उसे ले डूबी थी. जब वह मरा, तो घर में गरीबी का आलम था और कर्ज देने वालों की लाइन.

अगर लक्ष्मी को नौकरी नहीं मिलती, तो उस के मासूम बच्चों का भूखा मर जाना तय था.

पैसे की तंगी और जिंदगी की जद्दोजेहद ने लक्ष्मी को इतनी सी उम्र में ही कम खर्चीली और समझदार बना दिया था.

एक दिन लक्ष्मी ने न जाने कहां से सुन लिया कि 10वीं जमात पास करने के बाद वह क्लर्क बन सकती है. बस, वह पड़ गई मनोज के पीछे, ‘‘बाबूजी, मुझे कैसे भी कर के 10वीं पास करनी है. आप मुझे पढ़ालिखा कर 10वीं पास करा दो.’’

वह हर रोज शाम या सुबह होते ही मनोज के घर आ जाती और उस की पत्नी या बेटाबेटी में से जो भी मिलता, उसी से पढ़ने लग जाती. कभीकभार मनोज को भी उसे झेलना पड़ता था.

मनोज के बेटाबेटी लक्ष्मी को देखते ही इधरउधर छिप जाते, मगर वह उन्हें ढूंढ़ निकालती थी. वह 8वीं जमात तक तो पहले ही पढ़ी हुई थी, पढ़नेलिखने में भी ठीकठाक थी. लिहाजा, उस ने गिरतेपड़ते 2-3 सालों में 10वीं पास कर ही ली.

कुछ साल बाद मनोज रिटायर हो गया. तब तक लक्ष्मी को लोवर डिविजनल क्लर्क के रूप में नौकरी मिल गई थी. उस ने किसी कालोनी में खुद का मकान ले लिया था. धीरेधीरे पूरे 20 साल गुजर गए.

एक दिन लक्ष्मी अचानक मनोज के घर आ धमकी. उस ने मनोज और उस की पत्नी के पैर छुए. वह उसे पहचान ही नहीं पाया था. वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. उस का शरीर भी भराभरा सा लगने लगा था.

लक्ष्मी ने चहकते हुए बताया, ‘‘बाबूजी, मैं ने अपनी बेटी की शादी कर दी है. दामादजी बैंक में बाबू हैं. बेटी बहुत खुश है.

‘‘मेरे बड़े बेटे राजू को सरकारी नौकरी मिल गई है. छोटा बेटा महेश अभी पढ़ रहा है. वह पढ़ने में बहुत तेज है. देरसवेर उसे भी नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘क्या तुम अब भी कंडक्टर को एक रुपया कम देती हो लक्ष्मी?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘नहीं बाबूजी, अब पूरे पैसे देती हूं…’’ लक्ष्मी ने हंसते हुए बताया, ‘‘अब तो कंडक्टर भी बस से नहीं उतारता, बल्कि मैडम कह कर बुलाता है.’’

थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी चली गई, मगर मनोज का मन बहुत देर तक इस हिम्मती औरत को शाबाशी देने का होता रहा. Motivational Story

Short Story in Hindi : अलाव की आंच

Short Story in Hindi. सत्यप्रकाश के नाम में ही ‘सत्य’ था. यही उस की सब से बड़ी ताकत भी थी और कमजोरी भी. सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटतेकाटते उस की चप्पलें घिस चुकी थीं. उस ने देखा था कि कैसे एक गरीब किसान अपने हक के मुआवजे के लिए बाबू के सामने गिड़गिड़ा रहा था और वहीं दूसरी ओर एक रसूखदार आदमी नोटों की गड्डी थमा कर चंद मिनटों में अपना गलत काम करवा कर मुसकराते हुए निकल गया था.

सत्यप्रकाश का खून खौल उठता था. जब उस ने एक दिन दफ्तर में हो रहे इस नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से में आवाज उठाई तो सिस्टम ने मिल कर उसी पर ‘सरकारी काम में बाधा डालने’ का आरोप मढ़ दिया. ऊंची पहुंच वालों के सामने सिस्टम नतमस्तक था और सत्य अकेला खड़ा था.

इस सिस्टम को बदलने और लोगों का दुखदर्द दूर करने के लिए सत्यप्रकाश ने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा.

उस ने तय किया कि वह नाइंसाफी के खिलाफ लड़ेगा, लेकिन यह राह कांटों भरी थी.

सत्यप्रकाश ने जब एक भ्रष्ट अफसर व स्थानीय नेता के गठजोड़ के खिलाफ मोरचा खोला तो मुश्किलें उस के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं. धमकियां, झूठे मुकदमे और अपनों का दूर होना… सब एकसाथ शुरू हुआ.

एक शाम जब सत्यप्रकाश थकाहारा चाय की दुकान पर बैठा था, इलाके के एक बुजुर्ग रामदीन चाचा उस के पास आए. रामदीन चाचा ने उस के कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में कहा, ‘‘सत्य, क्यों इस सेवा के कीचड़ में कूदे हो बेटा? आज का सिस्टम भ्रष्ट है. यहां जो नेताओं के चाटुकार हैं, घूसखोर हैं, बेईमान हैं, वे ही सुखी हैं. गलत लोगों की तरह बड़ी पहुंच बनाओ, अपना घर भरो… वरना भरत भूषण तिवारी की तरह मार दिए जाओगे.’’

सत्यप्रकाश ने चौंक कर रामदीन चाचा की तरफ देखा. रामदीन चाचा की आंखों में खौफ और तजरबा दोनों था.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘दुनिया का यही दस्तूर है सत्य, अपना उल्लू सीधा करो, सुखी रहोगे. इस मुगालते में मत रहना कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा होगा. अगर तुम मार दिए गए तो यही मोमबत्तियां उठाने वाले समाजसेवी तुम्हारे नाम पर अपनी रोटियां सेंकेंगे, अपना उल्लू सीधा करेंगे, लेकिन जीतेजी तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा. सब तमाशबीन हैं.’’

चाचा की बातें सत्यप्रकाश के सीने में तीर की तरह चुभ गईं. उस रात वह सो नहीं सका. वह खिड़की के पास खड़ा हो कर अंधेरे आसमान को निहारता रहा. उस के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘देश में यह सब क्या हो रहा है? जहां ईमानदारी एक गुनाह बन गई है और बेईमानी एक काबिलीयत? कैसे सुधार होगा इस सिस्टम का? क्या वाकई इस अंधेरे से जीतने का कोई रास्ता नहीं है?’

तभी सत्यप्रकाश को अपने भीतर से एक आवाज सुनाई दी. उसे याद आया कि निराशा के सब से घने दौर में भी इनसान को अपने अंदर की उम्मीद को मरने नहीं देना चाहिए. हालात चाहे जितनी भी उलट हों, हवाएं चाहे जितनी भी खिलाफ हों, हार मान लेना कोई औप्शन नहीं था.

सत्यप्रकाश ने मन ही मन कहा, ‘प्रवाह में ठहराव है, मंजिल नहीं, पड़ाव है… रात भले ही सारी पड़ी हो और बाहर का अलाव बुझा सा हो, लेकिन मैं अपने भीतर के अलाव को बुझने नहीं दूंगा…’

सत्यप्रकाश को समझ आ गया कि सुधार रातोंरात नहीं होगा और न ही यह लड़ाई आसान है. लेकिन अगर हर कोई डर कर अपना उल्लू सीधा करने में लग गया तो यह समाज पूरी तरह अंधकार

में डूब जाएगा. भरत भूषण तिवारी जैसे लोगों की शहादत बेकार न जाए, इस के लिए किसी न किसी को तो मशाल थामे रखनी होगी.

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सड़कों पर पड़ी तो सत्यप्रकाश की आंखों में निराशा के आंसू नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था. उस ने अपनी डायरी उठाई, चप्पल पहनी और एक बार फिर नाइंसाफी के खिलाफ गवाही देने के लिए घर से निकल पड़ा. वह अकेला था, पर अब उसे भीड़ की परवाह नहीं थी.

Story in Hindi : सांप का बच्चा

Story in Hindi. अरमान सिंह खूंख्वार डाकू था. लोग उस का नाम सुनते ही कांप उठते थे. हत्या, अपहरण और लूट जैसे कई संगीन मामलों में पुलिस को उस की तलाश थी.

अरमान सिंह का बेटा था रमेश. स्मार्ट और शरीफ. वह कालेज में पढ़ता था, लेकिन कालेज के तमाम छात्र उस से कटेकटे से रहते थे. उस के बारे में कहा जाता कि ‘सांप का बच्चा आखिर सांप ही होता है’.

रमेश को अपने पिता की खुराफाती जिंदगी बिलकुल पसंद नहीं थी. उस ने कई बार उन से कहा भी था कि वे डाका डालना छोड़ दें, लेकिन हर बार अरमान सिंह के चेहरे पर फीकी मुसकान थिरक उठती. वह कहता, ‘बेटा, मैं जुर्म की दुनिया में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे मुड़ना मुमकिन नहीं. अगर मैं पीछे मुड़ना चाहूंगा, तो पुलिस मुझे मार डालेगी. बेहतर यही होगा कि मुझे  मेरे हालात पर छोड़ दो. कभी न कभी तो मेरा अंत हो ही जाएगा.’

रमेश अपने पिता की मजबूरी जान कर चुप हो जाता था.

उस साल प्रदेश की सरकार समय से पहले गिर गई. नतीजतन, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. पहले जो गुंडे और डाकू बेखौफ हो कर घूमा करते थे, वे अब गीदड़ों की तरह मांदों में छिप कर रहने लगे. गांव के लोगों को नया बल मिला. वे बेखौफ हो कर गुंडों की खबर पुलिस को देने लगे.

एक दिन आधी रात के वक्त सन्नाटे को चीरती हुई दूर से फायरिंग की आवाज आ रही थी. इस आवाज से रमेश की नींद टूट गई. वह बेचैनी से कमरे में टहलने लगा.

अचानक उसे लगा, जैसे गोलीबारी की आवाज नजदीक आती जा रही है. उस ने खिड़की खोल कर बाहर झांका, तो उस के मुंह से चीख निकल गई. खून से लथपथ अरमान सिंह बदहवास सा भागा आ रहा था और पुलिस के दर्जनों जवान गोलियां बरसाते हुए उस का पीछा कर रहे थे.

रमेश के देखते ही देखते अरमान सिंह का जिस्म छलनी हो गया और वह अपनी आखिरी चीख के साथ वहीं ढेर हो गया. रमेश को अपने पिता की मौत का गम तो बहुत हुआ, पर दिल में कहीं न कहीं चैन का एहसास भी हुआ.

चौधरी दिलीप सिंह गांव के महाजन थे. गांव के गरीब और लाचार किसानों को कर्ज दे कर एक का 3 वसूल करना उन का धर्म था.

जब अरमान सिंह जिंदा था, तब वह चौधरी दिलीप सिंह से मासिक रंगदारी लिया करता था. कभीकभी ऐसा होता कि अगर अरमान सिंह को आने में देर हो जाती, तो चौधरी साहब खुद ही जा कर रंगदारी दे आते.

अरमान सिंह की मौत से चौधरी दिलीप सिंह भी आजादी का एहसास कर रहे थे.

घर में जो जमापूंजी थी, उसे रमेश ने श्राद्ध के समय ब्राह्मणों को दान वगैरह देने में खर्च कर दिया. कुछ दिनों बाद वह खुद भी एकएक चीज को तरसने लगा. गांव के लोग तो उस से कन्नी काटते ही रहते थे, कोई भी मदद करने को तैयार न था.

उस से किसी को भी हमदर्दी न थी, क्योंकि उन्हें यह यकीन था कि सांप का बच्चा सांप ही होता है. क्या पता कहीं दूध पिलाने वाले को ही डस ले.

फसल के कर्ज के लिए चौधरी साहब के दरबार में किसानों की भीड़ बढ़ने लगी थी. लोग वहां जाते, अपना दुखड़ा सुनाते, कर्ज लेते और चौधरी साहब का गुण गाते हुए लौट जाते.

एक दिन रमेश भी हिम्मत कर के चौधरी दिलीप सिंह के दरबार में जा पहुंचा. चौधरी साहब तब आराम फरमा रहे थे. उसे देखते ही वे बोले, ‘‘अरे बेटा, तुम… आओआओ, क्या काम है?’’

‘‘जी… आप तो जानते ही हैं कि खेती का समय है और मेरे पास फूटी कौड़ी तक नहीं है. अगर खादबीज के लिए कुछ पैसे दे देते, तो बड़ी मेहरबानी होती. फसल कटते ही मैं सूद समेत वापस कर दूंगा.’’

चौधरी साहब सोच में पड़ गए. वे रमेश को कर्ज नहीं देना चाहते थे और साथ ही उसे नाराज भी नहीं करना चाहते थे. इसलिए कुछ देर सोच कर वे बोले, ‘‘कर्ज देने में कोई हर्ज तो नहीं है बेटे… तुम कोई गैर थोड़े हो… लेकिन तुम देर से आए, मेरे पास जो पैसे थे, वे मैं किसानों में बांट चुका हूं…’’

फिर कुछ देर रुक कर वे बोले, ‘‘खैर, जब तुम मेरे पास आ गए हो, तो बेफिक्र रहो… 5-6 दिनों में मैं कोई न कोई इंतजाम कर ही दूंगा.’’

चौधरी साहब की मीठी बातों को रमेश अच्छी तरह जानता था. वह चुपचाप वहां से लौट आया.

रमेश के जाने के बाद चौधरी साहब चिंता में डूब गए कि कहीं यह सांप का बच्चा कोई गड़बड़ न कर दे.

सुबह रमेश चौधरी साहब के यहां कर्ज लेने गया था और उसी रात उन के यहां डाका पड़ गया. डाकू नकदी और काफी जेवर लूट कर ले गए. उन्होंने चौधरी साहब को खूब पीटा भी था.

डकैती होने के बाद पुलिस की कई जीपें गांव में आईं. थानेदार ने अपने कड़क पुलिसिया अंदाज में चौधरी साहब से कई सवाल पूछे. उस का आखिरी सवाल था, ‘‘क्या आप को किसी पर शक है?’’

चौधरी साहब ने कराहते हुए जवाब दिया, ‘‘हां, अरमान सिंह के बेटे रमेश पर मुझे  शक है.’’

थानेदार की बांछें खिल गईं, ‘‘आप शक की बात करते हैं जनाब, उस का तो पूरा खानदान ही डकैतों का है. यह जरूर उसी के गिरोह का काम होगा. मैं अभी जा कर उस के घर की तलाशी लेता हूं. आप बेफिक्र रहिए.’’

थानेदार ने तुरंत अपने दलबल के साथ रमेश का घर घेर लिया और तलाशी ली. फिर उसे पकड़ कर थाने लाया और रातभर खूब पीटा गया. लेकिन पक्के सुबूतों और गवाहों के न होने के चलते उसे छोड़ दिया गया.

कानून की नजरों में रमेश बेकुसूर साबित हो चुका था, लेकिन समाज की नजरों में उस पर ऐसा काला धब्बा लगा, जिसे मिटाने में शायद सदियां लग जातीं.

लोगों के दिलोदिमाग में यह बात बैठ गई कि रमेश ने भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया है. इस तरह समाज के तमाम लोग उसे डर और नफरत की नजर से देखने लगे.

इस बात को कई महीने बीत गए. एक दिन की बात है, अचानक गांव की उत्तर दिशा में आग की लपटें उठती दिखाई पड़ीं. चारों ओर से लोग एकदूसरे को मदद के लिए पुकारते हुए दौड़ पड़े.

वहां का नजारा बड़ा ही डरावना था. चौधरी दिलीप सिंह की हवेली में आग लगी हुई थी. आग की लपटें पूरी हवेली को अपनी गिरफ्त में ले चुकी थीं.

काले बादलों की तरह हर तरफ आसमान में काला धुआं छा गया था. चारों ओर चीखपुकार मची थी. लोग बालटियों में पानी भरभर कर आग पर फेंक रहे थे, पर लपटें आकाश छूती जा रही थीं.

अचानक एक औरत की जोरजोर से चिल्लाने की आवाज उभरने लगी. लोगों ने देखा कि वह औरत चिल्लाती हुई आग की तरफ भागी जा रही है.

3-4 लोगों ने झट से उसे कस कर दबोच लिया. एक बोला, ‘‘अरे, यह तो चौधराइन है… पर यह आग की तरफ क्यों भागी जा रही है?’’

‘‘मरने का इरादा तो नहीं है?’’ दूसरे ने कहा.

चौधरी साहब की बीवी रोती हुई चिल्लाए जा रही थी, ‘‘मुझे छोड़ दो. मेरी बेटी जल रही है… कोई मेरी बेटी को बचा ले… हाय, मेरी बेटी…’’

सैकड़ों लोगों की नजरें जलती हवेली की तरफ उठी थीं. उन्होंने देखा कि चौधरी साहब की 7 साल की लड़की पिंकी लपटों के बीच घिरी छटपटा रही थी, पर किसी में यह हिम्मत न थी कि वह आगे बढ़ कर उस को बचा ले. कोई भी अपनी जान आफत में नहीं डालना चाहता था.

अचानक कंबल ओढ़े हुए एक नौजवान तेजी से आग की लपटों को चीरता हुआ पिंकी के पास जा पहुंचा. उस ने पलक झपकते ही पिंकी को कंबल में लपेटा और दोबारा लपटों को चीरता हुआ बाहर आ गया.

बाहर आते ही पिंकी कूद कर अपनी बेहाल मां से जा मिली, लेकिन तब तक उस नौजवान के शरीर में आग लग चुकी थी. वह तड़प कर गिर पड़ा. देखते ही देखते उस के बदन से आग की लपटें उठने लगीं. लोगों ने झट से उस पर पानी डाला, तो आग बुझ गई.

सब ने देखा कि अधजला रमेश दर्द से तड़प रहा था. चारों ओर मची अफरातफरी अचानक शांत हो गई. लोग सन्न खड़े रमेश को देख रहे थे.

उधर रमेश की आंखों के सामने अंधेरा तैरने लगा और इधर लोगों की नफरत पछतावे में बदलती चली गई.

रमेश ने अपनी बुझती आंखों से पिंकी की तरफ देखा. वह डरी हुई मां से चिपटी थी. रमेश के चेहरे पर संतोष की एक मुसकान उभरी और इस के साथ ही उस ने आखिरी सांस ली.

किसी ने दर्दभरी आवाज में धीरे से कहा, ‘‘काश, हम पहले यह समझ पाते कि रमेश डाकू नहीं है.’’

लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे. हवेली में लगी आग की लपटें बुझने लगी थीं, लेकिन बड़ीबड़ी चिनगारियां अभी भी धधक रही थीं.

चौधरी दिलीप सिंह आंखें बंद किए बुत बने खड़े थे, मानो अपनेआप से किसी सवाल का जवाब पूछ रहे हों. Story in Hindi

Emotional Hindi Story : नई सुबह

Emotional Hindi Story. रात के 11 बजे थे. शहर की चमकती सड़कों पर नियौन लाइटें ऐसे झिलमिला रही थीं मानो अंधेरे की देह पर किसी ने रंगीन कांच टांक दिए हों. रेलवे स्टेशन के सामने बने छोटे से होटल ‘सिल्वर पाम’ की तीसरी मंजिल पर बैठा राघव खिड़की से बाहर झांक रहा था. नीचे टैक्सियों की कतार थी, ऊपर आसमान में धुंध और भीतर उस के मन में एक अजीब खालीपन.

राघव राजस्थान के छोटे कसबे से पहली बार महानगर आया था. गांव के लोगों ने कहा था कि ‘मुंबई आदमी को या तो सोना बना देती है या धुआं’.

राघव पर्यटन कंपनी में नौकरी करता था. उस का काम बाहर से आने वाले पर्यटकों को शहर घुमाना था. दिनभर वह विदेशी सैलानियों को समुद्र, गेटवे औफ इंडिया, फिल्मी सितारों के बंगले और चमचमाते बाजार दिखाता, मगर रात होते ही शहर का दूसरा चेहरा सामने आ जाता.

उस रात कंपनी के मालिक ने कहा, ‘‘कुछ विदेशी मेहमान हैं, उन्हें नाइट लाइफ भी दिखानी पड़ेगी.’’

राघव झिझका. वह संस्कारों में पला लड़का था पर नौकरी की मजबूरी लोहे की बेड़ी होती है, चलना पड़ता है. वे लोग एक बार में पहुंचे. बाहर बड़े अक्षरों में लिखा था ‘मूनलाइट क्लब’. भीतर धुएं, शराब और तेज संगीत का ऐसा घालमेल था कि आदमी अपने विचार तक सुन न सके. मंच पर लड़कियां नाच रही थीं. चमकते कपड़े, बनावटी मुसकान और आंखों में थकान का गहरा समंदर.

राघव की नजर एक लड़की पर जा कर ठहर गई. उस का चेहरा बाकी लड़कियों से अलग था. नाचते हुए भी उस में एक उदासी थी, जैसे किसी ने चिडि़या के पंखों पर ग्लिटर तो लगा दिया हो, मगर उड़ान छीन ली हो.

कार्यक्रम खत्म होने के बाद वही लड़की पीछे गलियारे में मिली. उस ने पानी मांगा. राघव ने बोतल बढ़ाई.

लड़की मुसकराई, ‘‘थैंक्स.’’

‘‘नाम क्या है आप का?’’ राघव ने पूछा. ‘‘हमारे नाम बदलते रहते हैं साहब…’’ उस लड़की ने हलकी हंसी में कहा, ‘‘यहां असली नाम कोई नहीं पूछता.’’

कुछ देर बाद उस लड़की ने खुद बताया, ‘‘मेरा नाम मीरा है.’’

मीरा उत्तर प्रदेश के छोटे शहर से आई थी. पिता बीमार, घर कर्ज में डूबा और रिश्तेदारों की सलाह कि ‘शहर जा, कुछ काम कर’. काम की तलाश उसे इस बार तक ले आई थी.

‘‘लोग समझते हैं हम बड़ी ऐश में हैं…’’ मीरा बोली, ‘‘पर सच कहूं तो यहां हर रात आत्मा थोड़ाथोड़ा टूटती है.’’

राघव खामोश रहा. उसे लगा जैसे शहर की सारी रोशनी अचानक फीकी पड़ गई हो.

अगले कुछ दिनों में राघव की मुलाकात मीरा से होती रही. वह समझ गया कि बार की चमक बाहर वालों के लिए थी, भीतर तो कई जिंदगियां किस्तों में बिक रही थीं. कोई बहन की पढ़ाई चला रही थी, कोई मां का इलाज करा रही थी, कोई पति की मार से भाग कर यहां आ गई थी.

एक रात मीरा ने पूछा, ‘‘तुम्हें कभी डर नहीं लगता इस शहर से?’’ राघव हंसा, ‘‘लगता है पर गांव में भूख थी, यहां भीड़ है. आदमी आखिर जाए कहां?’’

मीरा कुछ देर तक चुप रही, फिर बोली, ‘‘सच कहूं… यहां लोग शरीर देखने आते हैं, इनसान नहीं.’’

मीरा के शब्द राघव के भीतर की दीवार पर हथौड़े की तरह लगे.

धीरेधीरे दोनों के बीच अपनापन बढ़ने लगा. राघव ने मीरा को सलाह दी कि वह कोई दूसरा काम ढूंढ़ ले.

मीरा मुसकरा देती, ‘‘गरीब आदमी के सपने भी किराए के मकान जैसे होते हैं साहब, कभी भी खाली करवाए जा सकते हैं.’’

लेकिन एक दिन अचानक बार पर पुलिस की छापेमारी हुई. अखबारों में खबरें छपीं. मालिक गायब हो गया. लड़कियां इधरउधर भटकने लगीं.

राघव ने मीरा को ढूंढ़ा. वह स्टेशन पर बैठी थी, हाथ में छोटा बैग और आंखों में टूटा हुआ आसमान लिए.

‘‘अब कहां जाओगी?’’ राघव ने धीरे से पूछा.

मीरा ने सूनी हंसी हंस दी, ‘‘शायद वापस घर या शायद किसी और शहर. गरीब की जिंदगी तो मेले में छूटे बच्चे जैसी होती है.’’

राघव ने पहली बार उस का हाथ पकड़ा, ‘‘अगर नई जिंदगी शुरू करना चाहो तो मैं मदद करूंगा.’’

मीरा की आंखें भर आईं. बरसों बाद शायद किसी ने उसे इनसान समझ  कर बात की थी.

कुछ महीने बाद राघव ने अपने कसबे में छोटी पर्यटन एजेंसी शुरू की. वहां स्थानीय हस्तशिल्प, लोकनृत्य और गांव की संस्कृति दिखाने का काम होता था.

मीरा अब उसी एजेंसी में काम करती थी. वह विदेशी महिलाओं को राजस्थानी लोकगीत सिखाती, बच्चों को डांस सिखाती और कभीकभी मुसकरा कर कहती, ‘‘देखो, जिंदगी भी अजीब नाच है. कभी आदमी ताल पर नाचता है, कभी मजबूरी पर.’’

राघव जानता था कि कुछ घाव भरते नहीं, बस जीना सिखा देते हैं.

और शहर? वह आज भी चमक रहा था. बस फर्क इतना था कि अब राघव उस शहर की रोशनी के पीछे का अंधेरा पहचान चुका था.  Emotional Hindi Story

–पूनम पांडे

Feel-Good Story in Hindi : मुरलीजी की कचौड़ी

Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?

मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.

दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.

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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.

लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.

जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.

कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.

हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.

मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.

बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.

यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.

मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.

सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.

अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.

भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.

इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.

उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.

पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.

इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.

ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ  में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.

डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ  गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ  गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.

वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.

‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.

मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.

एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.

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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.

लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?

दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.

दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’

मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे  लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.

‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ  में नहीं आ रहा था.

‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.

‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.

‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.

इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’  Feel-Good Story in Hindi

Hindi Story:अब पछताए क्या होत- बाबागीरी में बनते ब्रैंड

Hindi Story.उस दिन कई दिनों बाद थोड़ी गुनगुनी धूप निकली हुई थी. सर्दी के मौसम में गुनगुनी धूप और वह भी शनिवार को जब आस्ट्रेलिया में सभी व्यापारिक संस्थान बंद होते हैं, सोने पर सुहागा वाली बात थी.

मैं अवकाश का आनंद लेने किलडा बीच पर चला आया था. काफी देर तक वहां प्राकृतिक दृश्यों का लुत्फ लेता रहा. कुछ ऐसे नजारे भी देखे जो विदेशों में ही देखे जा सकते थे. उस के बाद मैं लूणा पार्क चला आया था. दोपहर के बाद फलिंडर स्ट्रीट स्टेशन के निकट भारतीय रैस्टोरैंट फलोरा में खाना खाने के पश्चात सराइन आप रिमैंबरेंस चला गया और वहां काफी देर बैठा रहा.

जब घर लौटा तो आंसरिंग मशीन और मेरे मोबाइल पर भी एक मित्र के कई संदेश आए हुए थे.

मैं ने तुरंत उस का नंबर डायल किया. उस ने फोन उठाते ही गुस्से से कहा, ‘‘कहां गायब हो गया था सुबह से? मैं तो फोन करकर के थक गया. तुम तो मोबाइल भी नहीं उठा रहे थे.’’

‘‘सौरी यार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं मोबाइल घर पर ही भूल गया था.’’ उस से मैं ने कह तो दिया लेकिन वास्तव में मैं स्वयं ही जानबूझ कर मोबाइल घर छोड़ गया था. वास्तव में मैं शांति से दिन गुजारना चाहता था.

मेरे यह पूछने पर कि कैसे याद किया, उस ने अत्यंत प्रसन्नता से बताया, ‘‘ओह यार, आजकल इंडिया से अपने गुरु महाराज आस्ट्रेलिया आए हुए हैं. कल वे हमारे घर पर प्रवचन करेंगे. तुम अवश्य आना.’’

‘‘यार, मुझ से कहां आया जाएगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे क्या पैर भारी हैं?’’

‘‘तुम जानते तो हो, मेरी धार्मिक कार्यों में…’’

‘‘दिलचस्पी नहीं,’’ उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘‘वाइन की तो पूरी बोतल डकार जाता है मगर धार्मिक कार्यों के नाम पर तुम्हारे पेट में मरोड़ उठने लगती है.’’ उस ने अपनत्व की भावना से आगे कहा, ‘‘ज्यादा इधरउधर की मत हांक… और हां, आते हुए बेबी तथा उस के बच्चों को भी साथ ले आना. जीजाजी तो सिडनी गए हुए हैं.’’

लो, एक और मुसीबत गले पड़ गई. मेरे घर से मैलटन, जहां उस की बहन बेबी रहती है, कम से कम 45 किलोमीटर दूर होगा. पहले तो शायद न जाता, मगर अब तो उस की बहन और बच्चों को भी साथ ले कर जाना पड़ेगा. फोन पर मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर वह बोला, ‘‘क्या हुआ, मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है?’’

‘‘अरे, सुन रहा हूं भई, निश्ंिचत रह, मैं बेबी तथा बच्चों को साथ ले आऊंगा.’’

‘‘यार, तुम से एक और रिक्वैस्ट है,’’ उस की आवाज अत्यंत हलीमीभरी थी, ‘‘गुरु महाराज को 100 डौलर से कम दक्षिणा मत देना.’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने वाली बात है,’’ मैं ने तुरंत कह तो दिया, लेकिन मन ही मन यह अवश्य सोचा था कि यहां डौलर छापने की मशीन तो नहीं लगी हुई है. इसे क्या मालूम कि ट्रेन के किराए

के 5-6 डौलर बचाने के लिए मैं 5 किलोमीटर की दूरी पर अपने इंस्टिट्यूट तक प्रतिदिन पैदल आताजाता हूं.

खैर, मैं उस के घर चला गया, वहां उस के कई रिश्तेदार तथा परिचित आए हुए थे.

मैं ने धीरे से 50 डौलर महाराज के सिंहासन के सामने पड़ी थाली में डाल कर माथा टेक दिया, लेकिन अगले ही पल हिसाब भी लगा लिया कि भारतीय करैंसी में कितने रुपए बन गए तथा मन ही मन अपनेआप को कोसते हुए तथा मित्र को भी एक भद्दी सी गाली निकालते हुए कहा, ‘ससुरे ने अढ़ाईतीन हजार रुपए का नुकसान करवा दिया.’

गुरु महाराज प्रवचन देने लगे. उन का एकएक बोल मनमंदिर के किवाड़ खोल रहा था. चांदी जैसे उज्ज्वल वस्त्रों से सुशोभित वे किसी देवर्षि की तरह लग रहे थे. सचमुच ही ऊपर वाले ने इन महापुरुषों को कोई विशेष गुण दिया होता है. मगर गुरु महाराज की ओर देखते हुए यों प्रतीत हो रहा था मानो वे मेरे परिचित हों, लेकिन यह मेरे मन का वहम हो सकता था, क्योंकि मैं तो इंडिया में रहते हुए भी कभी किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं गया था.

महाराज को चढ़ावा भी काफी चढ़ गया था. घर वालों ने भी सोने की मोटी चेन, हाथ का कड़ा तथा डौलरों से भरा लिफाफा उन के चरणों में रख दिया था. तदोपरांत लंगर छक कर संगत चली गई थी.

महाराजजी से परिचय करवाने के लिए मेरा मित्र मुझे उन के निकट ले गया. मगर उस की बात पूरी होने से पहले ही महाराज बोल पड़े थे, ‘‘मैं जानता हूं इन्हें, डा. शुक्ला हैं. समाचारपत्रों में अकसर मैं इन के बारे में पढ़ता रहता हूं.’’ और उन्होंने मुझ से पूछा, ‘‘तू ने पहचाना नहीं मुझे? मैं रमेश हूं, मेछी?’’ और उन्होंने मुसकराते हुए मेरे मित्र से परदाफाश कर दिया, ‘‘यह तो मेरे साथ ही गांव के स्कूल में पढ़ा करता था.’’

पलभर में ही चलचित्र की रील की तरह सबकुछ मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था. तभी तो महाराज का चेहरा मुझे इतना जानापहचाना लग रहा था.

हम दोनों गांव के राजकीय स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे. वह पढ़ाई में नालायक विद्यार्थियों जैसा था, लेकिन बातचीत में इस कदर शातिर था कि आसमान को भी पैबंद लगा देता था. वह इस प्रकार की दलीलें देता कि झूठ भी सच साबित हो जाता था. हमारे अध्यापक अकसर उस से कहा करते थे कि तू इतना चालाक है कि बड़ा हो कर लीडर बनेगा. स्कूल में पढ़ते समय ही वह देसी शराब और सिगरेट भी पीता था.

मुझे अभी तक याद है कि कैसे उस ने एक बार मुझे पीटा था और मुख्य अध्यापक से भी मेरी पिटाई करवाई थी. स्कूल के निकट ही साइकिल पर तिनके वाली कुल्फी बेचने वाला आया करता था. एक टके (2 पैसे) की एक कुल्फी. मेछी (रमेश) ने मुझ से कुल्फी ले कर देने को कहा था. मैं ने मना कर दिया तो उस ने मुझे 3-4 थप्पड़ रसीद कर दिए. मैं ने उसी समय मुख्य अध्यापक से उस की शिकायत कर दी. उन्होंने झटपट उसे बुला लिया. लेकिन मेछी ने सरासर झूठ बोलते हुए पासा ही पलट दिया, ‘सर, यह बिना किसी बात के मुझे गालियां दे रहा था. मुझे क्रोध आ गया और तब मैं ने इस के 2-4 चांटे लगा दिए.’’ मुख्य अध्यापक ने उस की बात पर विश्वास करते हुए

2-3 थप्पड़ मारते हुए मुझे डांटा, ‘‘एक तो गालियां बकता है और फिर शिकायत भी करता है.’’

और तभी उन्होंने झट से मेछी को आदेश दे डाला, ‘‘लगा इस के दोचार थप्पड़ और.’’ मेछी ने फिर मेरे चांटे मार दिए. मैं स्तब्ध सा मुख्य अध्यापक के कार्यालय से जब बाहर आया तो मेछी ने पहले से भी ज्यादा अकड़ कर कहा, ‘‘अब कुल्फी ले कर देगा या तेरी और करवाऊं पिटाई.’’

….और आज वही मेछी मेरे सम्मुख सिंहासन पर विराजमान है.

गुरु महाराज से बहुत सारी बातें हुईं. उन के अमेरिका, कनाडा, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में आश्रम भी थे और उपासक भी. मेरे आकलन के अनुसार, उन के पास करोड़ों की संपत्ति तो अवश्य होगी.

घरपरिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने मुसकराते हुए कहा था, ‘साधुसंतों का परिवार तो उन के शिष्य होते हैं. यही लोग हमारा परिवार हैं तथा समाज भी.’

गुरु महाराज तो शाम की फ्लाइट से अपने भक्तों से मिलने के लिए ब्रिसबेन चले गए थे मगर मेरे मन की यादों की पिटारी खोल गए थे.

मैं बचपन से ही संगीतप्रेमी था और नाटकों में अभिनय भी किया करता था. गाना गाने के लिए स्कूल की ओर से हमेशा मुझे ही भेजा जाता था. और मैं हर बार कोई न कोई पुरस्कार प्राप्त करता था.

कहीं भी ढोल बजने लगता तो स्वयं ही मेरे पैर थिरकने लग जाते.

हमारे गांव से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव में मजार है. कुछ लोग अपने कष्ट दूर करने के बहाने वहां जाते थे. जिन लोगों में पीर की ‘हवा’ आती थी, वे वहां ‘खेलने’ (झूमने) लगते थे. वहां यह मान्यता भी थी कि लगातार 5 बार वहां जाने से मनोकामना पूरी हो जाती है.

मैं भी प्रत्येक वीरवार ऊबड़खाबड़ और कंकड़ोंभरे रास्ते पैदल चल कर वहां जाता था. मगर शायद मेरी भावना में स्वार्थीपन अधिक तथा श्रद्धा कम थी. लेकिन लगातार 5 बार जाने के बावजूद मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी. आप यह भी जानना चाहोगे कि मैं वहां क्या मांगता था. वास्तव में मैं वहां जा कर हर बार यही प्रार्थना किया करता था कि पीर मुझे भी ‘खेलने’ में लगा दे.

लेकिन मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई थी.

गांव में एक कुम्हारों यानी मुसलमानों का घर था. अब तो पूरी तरह याद नहीं कि  वे लोग कुम्हार थे या मुसलमान. वर्षों पुरानी बात है. उन के परिवार के सदस्यों में पीर की ‘हवा’ आती थी. वे लोग वीरवार वाले दिन शाम को ढोल बजाने लगते तथा कुछ समय बाद उन के परिवार का कोई सदस्य ‘खेलने’ लग जाता और अपने शरीर पर ‘छेंटे’ मारने लगता.

मैं कभीकभी उन के घर चला जाता था. वे लोग खुले आंगन में ढोल बजा कर ‘खेलते’ थे. लेकिन एक बार न जाने क्या हुआ. कुछ पता ही न चल पाया कि  कब ढोल की थाप मुझ पर हावी हो गई थी और मैं भी ढोल की थाप के साथसाथ झूमने लगा था. उन्होंने मुझे ‘छेंटा’ पकड़ा दिया और मैं ‘छेंटे’ से अपने शरीर पर वार करने लगा था तथा जैसे वे बोलते गए वैसे ही हक, हक… कहता रहा.

मगर शीघ्र ही यह खबर मेरे घर खबर पहुंच गई थी. मेरे घर वाले कुम्हारों को भलाबुरा कहते हुए मुझे घसीटते हुए ले गए थे. घर वालों ने मेरी धुनाई भी कर डाली थी और स्वयं भी बहुत परेशान हुए थे.

जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि मुझे भी असर हो गया है और मुझ में भी हवा आने लगी है.

एक दिन शाम को मैं बंजर जमीन की ओर जा रहा था. गांव की एक महिला ने मुझे रोक कर मेरे पांव छुए और गोद में उठाए हुए बालक की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘जी, कहते हैं इस पर किसी प्रेत का साया है. दिनभर रोता रहता है. आप कोई उपाय बताइएगा.’

और मैं ने भी झट से यों कह दिया जैसे मैं तंत्रविद्या में निपुण था. ‘इस के सिर के ऊपर से कलौंजी घुमा कर पक्षियों को डाल देना, शीघ्र ही ठीक हो जाएगा.’

वास्तव में उस महिला के पूछने पर तुरंत ही मुझे कुछ याद आ गया था. एक बार मेरी माताजी ने किसी साधु से मेरे बारे में पूछा था तो उस ने यह उपचार बताया था.

मुझ में हवा आने की खबर हमारे गांव से शीघ्र ही निकटवर्ती गांवों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. उस महिला की तरह और भी कई लोग अपने दुखों के समाधान के लिए मेरे पास आने लगे थे. दिमाग तो मेरा पहले से ही तेज था. मैं घरपरिवार में सुने टोटके और साथ ही अंधविश्वास से जुड़े ढंग भी बता देता था.

एक बार मैं कुबैहड़ी गांव जा रहा था. एक महिला अपने पोते को मेरे पास ला कर बोली, ‘महाराज, यह कुछ भी खातापीता नहीं है. दूध तो बिलकुल भी नहीं पीता. पहले तो पूरी बोतल पी जाता था. मुझे शक है कि मेरी बड़ी बहू ने इस के लिए टोना कर दिया है.’

मैं ने मस्तिष्क पर बल डाला तो मुझे शीघ्र ही याद आ गया कि जब मेरे छोटे भाई को भूख नहीं लगती थी तो एक हकीम ने बताया था कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डुबो कर उस दूध को पिलाना  चाहिए. मैं ने भी वही नुस्खा उसे बता दिया. और साथ में यह भी बोल दिया कि इस के गले में सुराख वाला तांबे का सिक्का काले धागे में डाल कर बांध देना.

संभवतया मेरी ख्याति और फैल जाती, अगर भेद न खुलता. दरअसल, उस औरत के बच्चे को भूख लगने लगी थी और वह खुश हो कर दूध की गड़वी तथा गुड़ का बड़ा सा ढेला मेरे घर दे गई थी, क्योंकि मेरे बतलाए उपाय से उस का पोता ठीक हो गया था.

एक वैज्ञानिक होने के नाते अब मैं स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डालने से उस दूध में खनिज पदार्थ लोहे की मात्रा बढ़ गई होगी और बच्चे की रक्ताल्पता (अनीमिया) में सुधार आ गया होगा. बाकी सब तो अंधविश्वास की बातें थीं जिन के बिना लोगों की संतुष्टि नहीं होती.

घरपरिवार में पता चलते ही मेरी खूब पिटाई हुई थी. पिताजी चीखचीख कर पूछ रहे थे, ‘तू कब से सयाना बन कर लोगों को उपाय बताने लगा है.’ उन्होंने मुझे गांव से निकाल दिया और लुधियाना पढ़ने भेज दिया. मैं बस डिगरियां ही प्राप्त करता रहा और एक वैज्ञानिक बन गया. अब तो सेवानिवृत्त भी हो चुका हूं.

….और आज गुरु महाराज से मिल कर सबकुछ याद आने लगा था, लेकिन मेरे मन में यह विचार भी बारबार कौंधता रहा कि इतनी उपाधियां प्राप्त कर के और अंतराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक बन कर मुझे क्या मिला. 34-35 वर्ष की नौकरी के उपरांत सेवानिवृत्त होने पर जितनी राशि मुझे मिली थी उतनी तो गुरु महाराज ने आस्ट्रेलिया के एक फेरे में ही बना ली होगी. फिर उन की और भी कई प्रकार की सेवाएं होती होंगी.

मुझे पछतावा होने लगा था. इस से तो अच्छा होता गांव में ही रहता. मेरी तो उन दिनों भी काफी ख्याति हो गई थी. अब तक मेरे भी कई बंगले व आश्रम बन जाते तथा करोड़ों में बैंक बैलेंस होता. मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है. अब तो मेरा मन भी बारबार यही कह रहा है, अब पछताए क्या होत. Hindi Story

Romantic Story : वे सूखे पत्ते

Romantic Story. आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं.

हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज सम?ाते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे.

हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था.

जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था.

हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’

मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था. टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे  खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता?

मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था.

क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे  बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं. मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की. फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है.

मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की  के मांबाप नहीं हैं.

बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे  कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी.

मुझे  आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’

मुझे  कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है.

हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था.

स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फिर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी. मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा.

टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’

मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’

‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे.

मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे  कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ  ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’

बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे  बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे  छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ  से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.

‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था. उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे  एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया.

‘मुझे  जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे .. उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे  इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब…

Family Story : पत्नी की पगार

Family Story. ‘‘अब आप इतना परेशान मत होइए, धीरेधीरे समय के साथसाथ सब अच्छा हो जाएगा… और जब मैं ने कह दिया कि आप के सामने कैसे भी हालात आ जाएं, मैं हमेशा हर कदम पर आप के साथ हूं, तो फिर आप क्यों इतना सोचविचार करने में उलझे हुए हैं?’’ यह कहते हुए प्रिया ने चाय का प्याला शिशिर के हाथ में थमा दिया.

प्रिया के होंठों से फूटने वाले ये शब्द थकेहारे और सच कहें तो हालात के चलते कहीं न कहीं हताशा के घेरे में आ चुके शिशिर को एक बड़ा संबल देने वाले थे.

‘‘…हां, लेकिन अगर मैं इतने पांव न पसारता, तो शायद आज इस मानसिक परेशानी का मुझे मुंह नहीं देखना पड़ता,’’ शिशिर ने धीरे से कहा.

दरअसल, शिशिर ने शहर में एक मकान लिया था. चूंकि मकान शहर की जानीमानी हाई क्लास कालोनी में था, सो उस की कीमत भी हाई क्लास ही थी.

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मकान खरीदते ही बैंक के कर्ज की एक अच्छीखासी मासिक किस्त शिशिर के पल्ले पड़ गई और यहीं से शुरू हो गया रोजाना के तनाव और मानसिक अशांति का एक सिलसिला.

शिशिर की पगार का एक बड़ा भाग लोन की किस्त खा जाती थी. बचेखुचे पैसों में तमाम दूसरे खर्चे होते थे, जो मुश्किल से ही निबट पाते थे.

शिशिर की पत्नी प्रिया एक बहुत ही समझदार औरत थी. शिशिर को परेशान देख कर वह सब्र से उसे समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन धीरेधीरे उसे लगने लगा कि कहीं न कहीं घर के खर्चों को पूरा करने में पैसे की कमी आड़े आ रही है.

एक दिन प्रिया ने शिशिर से कहा, ‘‘सुनिए, कुछ दिन अगर हम लोग अपने खर्चों को कंट्रोल कर लें, तो समय बीतने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा.’’

प्रिया की बात पूरी नहीं हुई थी कि शिशिर ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं ने आज तक कभी अपने खर्चों पर कंट्रोल नहीं किया, तो आज कैसे कर लूं… ‘‘सिर्फ और सिर्फ एक मकान की वजह से मुझे  इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. तुम क्या जानो, मुझ  पर क्या गुजर रही है. जाओ और जा कर अपना काम करो.’’

आज शिशिर के ये शब्द प्रिया को कहीं न कहीं चुभ गए थे, क्योंकि हकीकत तो यह थी कि प्रिया के कहने पर ही शिशिर ने शहर में वह मकान खरीदा था.

अब प्रिया ने मन ही मन ठान लिया कि वह शिशिर की पैसे से मदद कर के रहेगी. लेकिन उस ने अपनी योजना का जिक्र किसी से नहीं किया. आसपास के कई स्कूलों में उस ने इंटरव्यू दिए और आखिरकार एक स्कूल में 15,000 रुपए की मासिक पगार पर उस ने नौकरी जौइन कर ली. जब उस ने यह सूचना शिशिर को दी, तो शिशिर के होंठों पर उम्मीद से भरी मुसकराहट छा गई.

अगले ही दिन से प्रिया काफी बिजी रहने लगी थी. सुबह 4 बजे उठना, पूरे घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और उस के बाद स्कूल के लिए तैयार होना. दोपहर को 3 बजे तक वापस आना और फिर घर के कामकाज, रात में पढ़ाई करना और फिर 11 बजे सोना, यह उस का रोज का काम हो चला था.

शिशिर की परेशानी पर प्रिया ने अपना सुकून और आराम न्योछावर कर दिया था. उसे मशीन की तरह काम करते देख कर शिशिर कभीकभी अंदर से दुखी हो जाता और कहता, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दो, जो होगा वह देखा जाएगा.’’

लेकिन प्रिया भी बहुत जिद्दी स्वभाव की थी. उस ने ठान लिया था कि जब तक हालात ठीक नहीं हो जाते, तब तक वह शिशिर की मदद करती रहेगी.

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और एक दिन वह आया जब प्रिया ने कड़क चाय के प्याले के साथ शिशिर को एक सफेद लिफाफा थमाया. शिशिर ने लिफाफा खोल कर देखा, तो उस में 15,000 रुपए रखे हुए थे.

यह प्रिया की पहली पगार थी. आज दोनों की खुशी का कोई ठिकाना न था. सच तो यह था कि शिशिर को अपनी पगार आने से कई गुना ज्यादा खुशी और सुकून प्रिया के दिए हुए उस सफेद लिफाफे में रखे 500 के 30 नोटों को छू कर मिला था.

शिशिर ने उन पैसों को एक अलग गुल्लक में डाल दिया और उस पर लिख दिया ‘पत्नी की पगार’.

प्रिया की पहली पगार के साथ ही मानो कुछ चमत्कार सा होने लगा. शिशिर जो अब तक परेशान रहता था, धीरेधीरे सुकून की ओर बढ़ने लगा. वक्त बीतता गया और उस के साथ ही शिशिर के सिर पर से कर्ज का बोझ  भी धीरेधीरे कम होने लगा.

तकरीबन 10 साल की उतारचढ़ाव भरी जिंदगी के बाद आखिरकार शिशिर की प्रमोशन हुई और अब उस की पगार अच्छीखासी हो गई थी. कुछ ही सालों में उस ने बैंक का सारा कर्ज चुकता कर दिया. बैंक से लोन अदायगी का सर्टिफिकेट पा कर उसे ऐसा लग रहा था मानो किसी बंधन से छुटकारा मिल गया हो.

खुशी से झुमता हुआ शिशिर घर पहुंचा. आज प्रिया भी अपने स्कूल से जल्दी आ गई थी. शिशिर कुछ सोच ही रहा था कि चाय के प्याले के साथ एक सफेद लिफाफा उस की ओर बढ़ाते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि अब आप के लिए इस छोटी सी मदद का कोई मोल नहीं है, लेकिन मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती, क्योंकि मेरे लिए सब से खाद आप की खुशी और सुकून है,’’ यह कहते हुए प्रिया की आंखों में आंसू छलक आए.

शिशिर ने प्रिया को अपने पास बिठाया और आंसू पोछते हुए कहा, ‘‘शायद तुम नहीं जानतीं कि मेरे सब से मुश्किल दिनों में इसी सफेद लिफाफे ने मुझे  मेरा मानसिक सुकून लौटाया था. आज भी मैं अपनी पगार से कई गुना ज्यादा इज्जत इस सफेद लिफाफे को देता हूं, इसलिए मेरी तुम से विनती है कि भविष्य में कभी ऐसे शब्द मत बोलना.’’

प्रिया का सिर शिशिर के कंधे पर टिका था और दोनों मुसकराते हुए सामने देख रहे थे. सामने रखा गुल्लक मानो प्रिया के सफेद लिफाफे का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

इतने पुराने गुल्लक पर शिशिर के लिखे हुए शब्द आज भी उम्मीद की खुशबू बिखेरते हुए साफ चमक रहे थे और वे जादुई शब्द थे ‘पत्नी की पगार’.

लेखक :  शिशिर शुक्ला

Hindi Story : दामाद

Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

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