शहर के उस हिस्से को नगरनिगम के नक्शे में शायद कोई नाम दिया गया था, लेकिन लोग उसे झुग्गी बस्ती कहते थे. नामों की भी अपनी एक हैसियत होती है. कुछ नाम सुनते ही आदमी के सामने मकान, सड़क और बिजली के खंभे आ जाते हैं और कुछ नाम सुनते ही टिन, तिरपाल, कीचड़ और नालियां.
उसी बस्ती में सोनू रहता था. 11 साल का सोनू 5वीं क्लास में पढ़ता था. उस के पिता रामदीन पास की एक दुकान पर मजदूरी करते थे और मां सुशीला आसपास के घरों में बरतन मांजती थी. परिवार में सोनू के अलावा 8 साल की गुडि़या और 5 साल का मुन्ना थे.
घर इतना छोटा था कि उस में गरीबी को भी पैर सिकोड़ कर बैठना पड़ता था. बरसात में छत टपकती, गरमी में टिन तपता और सर्दी में हवा दीवारों के छेद गिनती हुई भीतर चली आती.
लेकिन सोनू के पास एक चीज थी, उस की किताब. वह किताब को ऐसे संभाल कर रखता जैसे कोई अमीर आदमी अपनी तिजोरी की चाबी रखता है.
बस्ती से कुछ दूर एक संस्था ने बच्चों के लिए मुफ्त पाठशाला खोल रखी थी. वहां न फीस थी, न यूनिफौर्म का झंझट, न जूतेमोजे का हिसाब. जिस के पास कौपी नहीं, उसे कौपी. जिस के पास पैंसिल नहीं, उसे पैंसिल.
सोनू रोज वहां जाता था. मैडम उस के अनुशासन के लिए उसे बहुत सराहती रहती थीं. वे पूछतीं, ‘‘सोनू, बताओ, बड़े हो कर क्या बनोगे?’’ ‘‘टीचर बनूंगा.’’
‘‘क्यों?’’ वे पूछतीं. ‘‘मैडम क्योंकि ऐसा बनने के लिए किसी की जातपांत नहीं पूछी जाती, उस की जेब नहीं देखी जाती.’’
50 साल की उषा मैडम टकटकी लगा कर उस बालक की ओर हैरानी से देखती ही रह जातीं.
सोनू ने यह बात किस किताब से सीखी थी, यह उन्हें मालूम नहीं था. शायद जिंदगी सब से बड़ी किताब होती है और सब से महंगी भी.
पिछले महीने बस्ती पर बारिश ने ऐसी मार मारी थी कि गरीबों के घरों में पानी घुस आया था. जिन के घर पक्के थे, उन्होंने दरवाजे बंद कर लिए. जिन के घर प्लास्टिक और टिन के थे, वे अपने बच्चों को गोद में उठा कर पानी का रास्ता देखते रहे.
सुशीला का काम बंद हो गया था. रामदीन की दुकान भी कई दिनों तक बंद रही. घर में राशन कम था.
सोनू ने पहली बार सम झा कि भूख का भी कोई चेहरा होता है. छुटका भाई रात को पूछता, ‘‘भैया, कल हम को रोटी मिलेगी?’’
सोनू कहता, ‘‘क्यों नहीं मिलेगी… कल तो हलवा भी मिलेगा.’’
सोनू जानता था कि हलवा तो दूर, रोटी का भरोसा भी नहीं था, फिर भी छुटके के सामने उम्मीद बांधना जरूरी था.
एक दिन बहन गुडि़या ने पूछा, ‘‘भैया, तुम झूठ बोलते हो?’’ सोनू हंसा, ‘‘नहीं.’’
‘‘फिर हलवा कहां है?’’
सोनू चुप हो गया. बाहर बारिश हो रही थी. उस ने खिड़की के नाम पर टंगे बोरे को देखा और बोला, ‘‘हलवा अभी रास्ते में है.’’
यह सुन कर गुडि़या भी खिलखिला कर हंस दी.
गरीबी में बच्चों की हंसी भी बड़ी चीज होती है. लेकिन उस महीने सोनू ने एक और चीज देखी थी. पिता जब सुबह 8 बजे दुकान पर जाते और पौने 12 बजे खाना खाने घर आते, तो घर का वातावरण बदल जाता.
दुकान का तनाव, कम मजदूरी, मालिक की डांट और जिंदगी की खी झ… सब मिल कर पिता के भीतर बारूद बन जाते.
और घर आते ही उस की चिनगारी मां पर गिरती, ‘‘पागल औरत दिनभर करती क्या हो? बच्चों के लिए कुछ बचा भी है? तुम्हारी वजह से घर की हालत ऐसी है.’’
सुशीला चुप रहती. गरीब औरतों के पास कई बार जवाब होते हैं, मगर जवाब देने की कीमत बहुत महंगी होती है.
सोनू सब देखता था. वह अपनी मां की तरफ देखता और फिर सिर झुका लेता.
एक दिन उस ने देखा कि मां के हाथ कांप रहे थे.
‘‘मां, क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटा.’’
‘‘आप रोई थीं?’’ ‘‘नहीं…’’
‘‘आंखें लाल क्यों हैं?’’ मां ने उस के सिर पर हाथ रख दिया, ‘‘तू पढ़ाई कर.’’
सोनू सम झ गया.
मां ने फिर वही पुराना इलाज किया था. दुख को बेटे के सिर पर हाथ फेर कर छिपा देना.
अगले हफ्ते पाठशाला में हिंदी की कविता पढ़ाई जा रही थी. मैडम कविता सुना रही थीं और मतलब बता रही थीं, ‘‘बच्चो, कविता हमें बताती है कि मुश्किल समय में भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए…’’
तभी पीछे से सीट खिसकने की आवाज आई. सोनू उठ कर धीरेधीरे मैडम के पास आया.
‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘मैडम…’’
‘‘हां बेटा?’’ ‘‘आप मेरे साथ औफिस में चलिए.’’
‘‘क्यों?’’ ‘‘मु झे घर पर फोन करना है.’’
मैडम मुसकराईं, ‘‘आज ही तो बहुत दिन बारिश के बाद स्कूल खुले हैं. आज ही घर की याद आ गई?’’
सोनू ने सिर झुका लिया, ‘‘जी मैडम… मु झे मां का हाल पूछना है.’’ मैडम का चेहरा बदल गया, ‘‘मां को क्या हुआ?’’
‘‘पता नहीं.’’ ‘‘तो फोन क्यों?’’
सोनू ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘क्योंकि बाबा घर आए होंगे.’’ ‘‘तो?’’
‘‘जब वे घर आते हैं न… मां पर गुस्सा करते हैं.’’ मैडम चुप हो गईं.
सोनू ने कहा, ‘‘गाली भी देते हैं… ताने भी… कभीकभी बहुत जोर से बोलते हैं.’’
‘‘तुम ने मु झे पहले क्यों नहीं बताया?’’ सोनू ने मासूमियत से कहा, ‘‘घर की बात स्कूल में थोड़े ही बताते हैं मैडम.’’
मैडम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था.
बड़ेबड़े समाजशास्त्री घरेलू हिंसा पर किताबें लिखते हैं. सरकारें योजनाएं बनाती हैं. भाषण होते हैं. पोस्टर छपते हैं, लेकिन एक 11 साल का बच्चा 2 वाक्यों में उस पूरे समाज का सच कह गया था, ‘‘घर की बात स्कूल में थोड़े ही बताते हैं.’’
मैडम ने फोन मिलाया. घंटी गई. सोनू की उंगलियां कांप रही थीं.
फोन उठा, ‘‘हैलो?’’ ‘‘मां…’’
उधर कुछ क्षण चुप्पी रही. ‘‘हां, बेटा.’’
‘‘आप ठीक हो?’’ ‘‘हां…’’
‘‘बाबा आए थे?’’ फिर चुप्पी.
हां बेटा.’’ ‘‘कुछ कहा?’’
मां ने जवाब नहीं दिया. सोनू सम झ गया.
उस ने भरे गले से कहा, ‘‘मां, मैं सीधा घर आ जाऊंगा… ठीक है न प्यारी मां…’’ इतना ही कह कर सोनू ने फोन काट दिया. उस की आंखों में समंदर था.
मैडम ने उसे वापस क्लास में बुला लिया.
मैडम जानती थी कि उस के आंसू केवल मां के लिए नहीं थे. वह उस घर के लिए थे जहां रोटी कम थी और डर ज्यादा. उस बचपन के लिए डर था जिस में खिलौनों की जगह जिम्मेदारियां थीं.
और उस समाज के लिए था जहां एक बच्चा स्कूल में कविता पढ़तेपढ़ते अचानक अपनी मां की हिफाजत के लिए फोन कर के उन की आवाज सुनना चाहे.
मैडम काफी अनुभवी थीं. उन्होंने एक संस्था के संचालकों से बात की.
सुशीला को फिर काम दिलाने की कोशिश हुई. राशन का इंतजाम हुआ. बच्चों की पढ़ाई नियमित हुई, लेकिन सब से बड़ी जरूरत थी सोनू को यह सम झाना कि वह अकेला नहीं है.
एक दिन मैडम ने उस से कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें अपनी मां की चिंता करनी चाहिए, लेकिन तुम्हें अपने सुनहरे भविष्य की भी चिंता करनी चाहिए.’’
सोनू ने पूछा, ‘‘जी, वह कहां मिलता है मैडम?’’
मैडम चुप रह गईं. इस सवाल का जवाब किसी स्कूली किताब में नहीं था.
सोनू ने फिर पूछा, ‘‘क्या गरीब बच्चों का भविष्य भी होता है?’’
मैडम की आंखें भर आईं. उन्होंने कहा, ‘‘होना चाहिए.’’
सोनू की आंखों में सवाल उभरा, ‘‘तो फिर सुनहरा भविष्य हमें मिलता क्यों नहीं?’’
इस बार मैडम के पास कोई जवाब नहीं था.
अगले दिन हिंदी की क्लास में मैडम ने बच्चों से पूछा, ‘‘बताओ, सब से प्यारी आवाज कौन सी होती है?’’
सब ने अपनी रुचि से जवाब दिया, जैसे ‘कोयल’, ‘चिडि़या’, ‘छुट्टी की घंटी’, ‘शंख’, ‘बांसुरी’ आदिआदि.
मैडम ने सोनू की ओर देखा, ‘‘तुम बताओ?’’ सोनू चट से बोला, ‘‘मां की.’’
‘‘क्यों?’’ सोनू ने कहा, ‘‘क्योंकि जब घर में डर हो न मैडम, तब मां की आवाज सुन कर पता चलता है कि वे अभी हमारे साथ हैं.’’
कक्षा में सन्नाटा छा गया. मैडम ने उस की ओर देखा. सोनू फिर अपनी किताब में झुक गया.
बाहर झुग्गियों की ओर धुआं उठ रहा था. कहीं चूल्हा जल रहा था, कहीं रोटी सिंक रही थी और कहीं शायद आज भी कोई बच्चा भूख को बहला कर सो रहा था.
लेकिन उस दिन सोनू की आंखों में एक नया सपना था. वह टीचर ही बनना चाहता था, सिर्फ इसलिए नहीं कि उसे नौकरी चाहिए थी, बल्कि वह चाहता था कि उस की तरह कोई बच्चा कभी यह न पूछे, ‘‘क्या गरीब बच्चों का भी बचपन होता है?’’
सोनू चाहता था कि उस की मां जैसी औरतें डर कर चुप न रहें. वह चाहता था कि घर का मतलब केवल चारदीवारी न हो, सुरक्षा भी हो और इसीलिए उस ने अपनी किताब खोली.
कविता की पहली लाइन पढ़ी, ‘‘चांदसितारों तक जाना है…’’
सोनू की आवाज में अब डर नहीं था. वह आवाज धीरेधीरे पूरी क्लास में फैल रही थी.
शायद कविता पहली बार किसी बच्चे की किताब से निकल कर उस की जिंदगी में उतर रही थी. और शायद यही पढ़ाईलिखाई का असली मतलब था. अभाव में भी आदमी को इतना मजबूत बना देना कि वह अपने हिस्से की रोशनी पहचान सके. Emotional Story in Hindi
Inspirational Story in Hindi. कमलेश चाय पीती जा रही थीं और एकटक सामने बैठी गिरिजा देवी की ओर देखती जा रही थीं. वे सोचने लगीं कि ऐसी बात उन से कैसे पूछी जाए. किसी लड़की के चरित्र की बात पूछने पर रिश्तों में कड़वाहट भी आ सकती है और रिश्ता टूट भी सकता है.
अगर वे लड़की के बारे में नहीं पूछतीं, तो जो उन्होंने सुना है, वह गलत नहीं माना जा सकता.
यह बात अगर महल्ले में फैल गई कि उन की होने वाली बहू पेट गिरा कर आई है, तो चुल्लूभर पानी में डूब मरने वाली बात होगी. कोई उन्हें बोलने तक नहीं देगा. आखिर वे क्या करें?
चाय पी कर कमलेश ने कप ट्रे में रख दिया. गिरिजा देवी ट्रे को ले कर अंदर चली गईं. वे होने वाली समधिन के लिए रसोई में नाश्ते का इंतजाम करने लगीं.
कमलेश ने यह बात अपने बेटे उमेश को भी बताई थी, पर उमेश ने कहा था, ‘मां, मैं रजनी को अच्छी तरह से जानता हूं. वह सुशील और अच्छे संस्कारों वाली लड़की है. हमारा संबंध तोड़ने के लिए आप से किसी ने चुगली की है.’
उमेश की बात सुन कर कमलेश को तब चुप रह जाना पड़ा था.
उमेश और रजनी एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों पक्के दोस्त थे. दोनों बहुत अच्छी पेंटिंग बनाते थे. पेंटिंग की वजह से ही दोनों में दोस्ती हुई थी. फिर दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे थे. इस दौरान उमेश ने रजनी को अच्छी तरह जांचापरखा था. उस के चरित्र पर शक की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी.
यही वजह थी कि रजनी से शादी करने की बात भी अपने घर वालों से खुद उमेश ने ही चलाई थी. किसी मौडर्न मातापिता की तरह उमेश के मातापिता ने भी बिना किसी विरोध के यह रिश्ता स्वीकार कर लिया था, इसीलिए मां के मुंह से यह बात सुन कर कि रजनी पेट गिरा कर आई है, उमेश को यकीन नहीं हुआ था.
गिरिजा देवी हलवा और बिसकुट ले आई थीं. वे बोलीं, ‘‘लो समधिनजी, नाश्ता करो.’’
‘‘मुझे भूख नहीं है, आप खाओ.’’ ‘‘यह तो हलका भोजन है. बिना भूख के भी चल जाएगा.’’
कमलेश खाने लगीं. गिरिजा देवी सामने रखी कुरसी पर बैठ गईं.
‘‘इस तरह मत बैठो, आप भी तो खाओ समधिनजी,’’ कमलेश ने प्यार से कहा, तो गिरिजा देवी भी खाने लगीं.
कमलेश एक स्कूल में टीचर थीं. उन के पति का देहांत हो गया था, इसलिए उमेश की शादी में पिता की भूमिका वही निभा रही थीं. रजनी के बारे में शक भरी बातें उन की एक सहेली ने बताई थीं, इसलिए सचाई जानने के लिए वे यहां चली आई थीं.
गिरिजा देवी के पति आगरा में बैंक में नौकरी करते थे, इसलिए उन का सामना सीधा समधिन से हुआ था, पर डर रही थीं कि बात कैसे शुरू करें. कहीं बात झूठी निकली तो.
फिर भी कमलेश ने हिम्मत बांध कर कह डाला, ‘‘समधिनजी, मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं.’’
गिरिजा देवी ने हंस कर कहा, ‘‘किस बारे में?’’
कमलेश मन को मजबूत करते हुए बोलीं, ‘‘रजनी के बारे में.’’
गिरिजा देवी के चेहरे पर तुरंत हैरानी के भाव छा गए. वे बोलीं, ‘‘हां बोलो, क्या बातें करनी हैं?’’
‘‘मैं ने सुना है कि रजनी पेट गिरा कर…’’ कहतेकहते कमलेश के शब्द गले में ही अटक गए.
मगर गिरिजा देवी साफसाफ बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप ने ठीक ही सुना है.’’
कमलेश ने समझा कि गिरिजा देवी नाराज हो गईं, इसलिए वे बोलीं, ‘‘इस में बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है. हम ने तो किसी से यह सुना था. अब आंखों देखी मक्खी तो निगली नहीं जा सकती. इसीलिए आप के पास आई हूं कि यह तो पता चले कि इस बात में कितनी सचाई है.’’
‘‘मैं भी सच कह रही हूं समधिनजी कि यह बात पूरी तरह सच है,’’ गिरिजा देवी ने मजबूती से कहा.
यह सुन कर कमलेश के चेहरे पर कठोरता छा गई. उन्होंने नाश्ते की प्लेट एक ओर सरका दी और गुस्से में बोलीं, ‘‘तो फिर यह बात तुम ने सगाई से पहले हमें क्यों नहीं बताई? हमारे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?
‘‘आप ने कैसे सोच लिया कि रजनी हमारे घर की बहू हो जाएगी? बात कैसी भी हो, एक न एक दिन सभी को पता लग जाती है.’’
‘‘वह तो ठीक है समधिनजी. आप ने जो सुना है, वह सच है और केवल उसे सुन कर कोई भी सास किसी लड़की को अपने बेटे की बहू नहीं बना सकती, मगर आप ने अधूरा सच सुना है.’’
‘‘अब पूरा सच सुनने की मुझे जरूरत भी नहीं है. जब मैं ने यह बात सुनी थी, तो मैं ने इस पर यकीन नहीं किया था. लेकिन जब तुम ही इसे सच बता रही हो, तो यह रिश्ता तोड़ना पड़ रहा है,’’ कहते हुए कमलेश कुरसी से उठ कर खड़ी हो गईं.
गिरिजा देवी ने उन का हाथ पकड़ लिया और बोलीं, ‘‘आप यह रिश्ता तोड़ दें, मुझे कोई दुख नहीं है, पर क्या अब यह नहीं जानना चाहोगी कि रजनी मां कैसे बनी?’’
‘‘लाई होगी किसी का पाप, हमें इस से क्या?’’
‘‘उमेश को यह रिश्ता तोड़ने की ठोस वजह भी तो बतानी होगी.’’
‘‘हां, बताइए…’’ कमलेश फिर से बैठ गईं.
गिरिजा देवी ने कहना शुरू किया, ‘‘आज से 3 साल पहले रजनी 12वीं में पढ़ रही थी. वह अपने गांव जा रही थी. वह मेरे साथ थी. रात का समय था. बस अपनी पूरी रफ्तार से चल रही थी. अचानक रास्ते में बस को रुकती देख हम चौंक गए. कुछ बंदूकधारी लोग
बस में चढ़ आए थे. उन्होंने सब सवारियों को बंदूक का निशाना बना कर नीचे उतार लिया.
‘‘सभी से रुपए और गहने लूट लिए. औरतों से जबरन बलात्कार किया गया, जिस का शिकार हम दोनों को होना पड़ा. तकरीबन आधा घंटा उन्होंने यह खौफनाक खेल खेला.
‘‘रजनी तो इस हादसे से बेहोश हो चुकी थी. कई महीनों बाद रजनी ने महसूस किया कि उस के पेट में उन दरिंदों का पाप पल रहा है.
‘‘पर शर्म और झिझक की वजह से उस ने यह बात किसी को नहीं बताई. जब 4-5 महीने का पेट हो गया, तब एक दिन मुझे बताया. एक नर्सिंग होम में जा कर तब इस का पेट गिरवाया.’’
यह सुनतेसुनते कमलेश के चेहरे की कठोरता न जाने कहां गायब हो गई.
गिरिजा देवी बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप यह रिश्ता भले ही तोड़ दें, हमें कोई एतराज नहीं है, पर यह बात किसी और को मत बताना. इस घटना की वजह से रजनी की कई सगाई टूट चुकी हैं. उमेश और रजनी की दोस्ती की बात सुन कर हमें उम्मीद बंधी थी कि अब सगाई नहीं टूटेगी.
‘‘आप समझदार हैं, टीचर हैं, अब आप ही बताइए कि इस में रजनी का क्या कुसूर है?
‘‘गहराई से सोचें कि यह हादसा आप के साथ हुआ होता, तब आप पर क्या बीतती? आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या यह रिश्ता तोड़ कर आप रजनी के साथ इंसाफ कर रही हैं? अगर आप की सोच से यह ठीक है, तो आप यह रिश्ता तोड़ सकती हैं.’’
गिरिजा देवी की बात सुन कर कमलेश हैरान रह गईं. उन्होंने गिरिजा देवी का कंधा थपथपा कर कहा, ‘‘समधिनजी, इस बात के लिए माफी चाहती हूं कि मैं ने आप का दिल दुखाया. मैं सच से वाकिफ नहीं थी, इसलिए गुस्से में न जाने क्याक्या कह गई.
‘‘अब आप कोई चिंता नहीं करें. मैं सब संभाल लूंगी. आप शादी की तैयारियां कीजिए.’’
कमलेश की बात सुन कर गिरिजा देवी का दिल एकदम हलका हो गया. उन की निगाह दीवार पर टंगी रजनी द्वारा बनाई गई उस पेंटिंग पर चली गई, जिस में ऊपर लिखा था, ‘औरत ही औरत को मुक्ति दिला सकती है.’
Hindi Short Story. ‘‘मुझे बचा लीजिए. कुछ गुंडे मेरे पीछे पड़े हैं,’’ एक हांफती लड़की को उस नौजवान ने चौंकते हुए देखा, जो अचानक सामने से भागती हुई उस की मोटरसाइकिल से टकराई थी.
मोटरसाइकिल वाले नौजवान ने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’ ‘‘नजराना,’’ नौजवान के सवाल को भांपते हुए नजराना ने फौरन कहा.
‘‘बैठो…’’ उस नौजवान के कहने पर नजराना जल्दी से मोटरसाइकिल पर बैठ गई.
वह नौजवान नजराना को अपने घर ले आया था, क्योंकि रात के 11 बजे उसे कहीं छोड़ना मुनासिब नहीं लगा.
‘‘पानी पी लो,’’ नौजवान ने पानी का गिलास उसे थमाया और खुद उस के सामने कुरसी पर बैठ गया.
नजराना ने एक सहमी हुई नजर उस पर डाली, फिर एक सांस में पूरा गिलास खाली कर दिया. उस ने खाली गिलास कांपते हाथों में दबोच लिया और घूरघूर कर पूरे घर को देखने लगी.
खूबसूरत बरामदा था, दीवार पर बड़ीबड़ी तसवीरें लगी थीं. कमरा कुछ बुजुर्गों की तसवीरों से सजा हुआ था. बरामदे के ठीक बीच में एक बड़ा सा सोफा रखा था.
‘‘देखिए, यहां आप को डरने की कोई जरूरत नहीं है. आप मेरे घर में पूरी तरह से महफूज हैं,’’ वह नौजवान मुसकरा कर बोला और चंद सवाल करने लगा, ‘‘आप कहां रहती हैं?’’
‘‘मैं उत्तर प्रदेश के एक गांव की हूं,’’ नजराना ने खाली गिलास मेज पर रखा और धीरे से बोली.
‘‘यहां दिल्ली में कैसे?’’ यह सुन कर वह चुप रही.
‘‘कहां जाना है? आप के मांबाप का क्या नाम है? जब तक आप बताएंगी नहीं, तब तक मैं आप को वहां भला कैसे पहुंचाऊंगा?’’ उस नौजवान ने पूछा, तो जवाब में नजराना फूटफूट कर रोने लगी.
‘‘मेरा कोई नहीं है. मुझे कहीं नहीं जाना,’’ नजराना थोड़ी देर बाद कुछ सोच कर बोली.
‘‘क्यों?’’ वह नौजवान हैरान होते हुए बोला. ‘‘मैं घर से भागी हुई लड़की हूं.’’
‘‘क्या?’’ यह सुन कर उस नौजवान को जोर का झटका लगा.
‘‘हां, मैं घर से भागी हुई हूं, पर मुझे घर से भागने पर मेरे अपने ही घर वालों ने मजबूर किया था,’’ नजराना को पहली बार कोई ऐसा मिला था, जिस से वह अपने दिल का हाल बताने पर मजबूर हो गई थी.
नजराना ने बताया, ‘‘हम 4 बहिनें थीं. घर में सब से बड़ी मैं ही थी. मां की एक बेटे की आस में 4 लड़कियों ने घर में कदम रख लिया था.
‘‘अब्बा को हम से कोई लगाव नहीं था. अम्मां की गालीगलौज व मारपीट के साथ हम बड़ी हो गईं.
‘‘अम्मां का जुल्म बढ़ता गया. दहेज की खातिर मेरा रिश्ता टूट गया. तब मेरा वजूद ही कहीं खो गया था.
‘‘एक दिन अम्मां ने मुझे बहुत मारापीटा और कहा, ‘जा, कहीं जा कर डूब मर या किसी के साथ अपना मुंह काला कर के भाग जा. यहां से कम से कम मेरे सीने का बोझ तो कम होगा. न जाने कौन से जन्म का हम से बदला ले रही है. इतनी लड़कियां देने के बजाय 4 बेटे ही दे देता.’
‘‘मैं ने घर की सारी जिम्मेदारी संभाल रखी थी. मगर इस तरह रोजरोज मां की गालियां, मारपीट सह कर मेरा दिलोदिमाग खराब हो गया. खुद को खत्म करने के इरादे से मैं तनहा घर से निकल गई, लेकिन जैसा मैं ने सोचा था, ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. मैं दुनिया जितनी आसान समझती थी, वैसी थी नहीं.
‘‘रास्ते में मुझे कुछ शराबियों, जुआरियों ने पकड़ लिया. वे मुझे बेचने के इरादे से शहर ले आए, पर मैं अपनी इज्जत बड़ी मुश्किल से बचा कर भाग निकली.’’
‘‘तुम अब कहां जाओगी?’’ उस नौजवान ने नजराना की आपबीती सुनने के बाद पूछा.
‘‘किसी ने कहा है कि लड़की उस कटी पतंग की तरह होती है, जिसे हर कोई अपनी जागीर समझ कर लूटने के लिए दौड़ पड़ता है. ऐसे हालात में मैं ने देख लिया है कि जमाना कितना भी बदल जाए, मगर औरत को हर रूप में मर्द की जरूरत होती है, चाहे वह भाई हो, बाप हो या शौहर का साथ.
‘‘हर औरत का आखिरी ख्वाब एक छत होती है. न तो मेरे पास छत है और न ही किसी मर्द का साथ. बस, अब मैं इज्जत के साथ मरना चाहती हूं,’’ कहते हुए वह भावुक हो गई.
‘‘अगर आप चाहें तो… मेरा मतलब है, आप गलत बात कर रही हैं मरने की. आप मुझे अच्छी लगीं, जो आप ने अपनेपन से मुझे सब सचसच बता दिया.
‘‘आज रात आप चाहें तो…’’ वह नौजवान कुछ आगे कहना चाह रहा था, तभी अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तो दौड़ कर वह कमरे में भागा.
नौजवान के पीछे नजराना भी भागी. अंदर कमरे में एक बूढ़ी औरत बिस्तर के करीब नीचे बेसुध पड़ी थी. उस का चेहरा एकदम पीला लग रहा था.
नौजवान ने फौरन उस बूढ़ी औरत को उठा कर बिस्तर पर लिटाया और डाक्टर को बुलाने के लिए तुरंत फोन किया.
नौजवान ने बगल वाले कमरे से नजराना से पानी लाने को कहा. वह दौड़ती हुई उस कमरे में पहुंची और झटपट पानी ले कर आ गई. उस का हर दर्द हर गम जैसे छूमंतर हो गया था.
अब उसे नौजवान का दर्द अपना सा लग रहा था. बूढ़ी औरत नौजवान की अम्मी थीं. वे हाई ब्लड प्रैशर की मरीज थीं. डाक्टर ने आ कर अम्मी का चैकअप किया और दवाएं दीं.
नजराना रातभर अम्मी की सेवा में लगी रही. नौजवान भी अपनी अम्मी की देखभाल कर रहा था, मगर सुबह होते ही कमरे से निकल कर वह कुछ परेशान सा लग रहा था, फिर सिर झटक कर नहाने चला गया.
जब अम्मी की आंख खुली, तो देखा कि नजराना उन के सिरहाने बैठी उन का सिर दबा रही थी.
अम्मी बोलीं, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’ उन के सपाट लहजे से नजराना को बिलकुल हैरानी नहीं हुई थी. रात से ही उस के मन में हजारों खयाल उमड़घुमड़ रहे थे कि नौजवान की अम्मी के सवालों का वह कैसे जवाब देगी.
‘‘बेटी, तुम ने नाम नहीं बताया,’’ अम्मी के दोबारा पूछने पर वह चौंक कर अपनी सोच से बाहर आ गई और धीरे से बोली, ‘‘जी, नजराना.’’
अम्मी ने हौले से कहा, ‘‘मेरा नवेद लाखों में एक है. किसी तरह की बुराई उस में नहीं है. लेकिन दुनिया इतनी भी अच्छी नहीं है, यह तो तुम जान ही चुकी हो,’’ अम्मी नजराना का सहारे ले कर बैठ गईं.
उस नौजवान का नाम नवेद है, यह नजराना जान गई थी, मगर अम्मी के मुंह से अपने बारे में जान कर वह सन्न रह गई.
‘‘नजराना, इतनी हैरान मत हो. मैं ने सब सुन लिया है. तुम्हारी अम्मी ने ठीक नहीं किया. एक औरत हो कर एक औरत पर जुल्म करे.
‘‘बेटी, मैं मानती हूं, तुम ने जो किया था, सही था, पर जुल्म देख कर भागना जुर्म है, बहादुरी वह है, जो जुल्म को भगा दे,’’ अम्मी ने समझाया, तो नजराना सिर हिला कर रह गई.
अम्मी ने उसे बांहों में समेट लिया, तभी नवेद चायनाश्ते के साथ अंदर आया.
अम्मी के साथ नजराना को यों देख नवेद के दिल में सुकून सा उतर गया.
‘‘नवेद,’’ अम्मी ने पुकारा. ‘‘जी, अम्मी…’’ नवेद ने इतमीनान से कहा, ‘‘आप की तबीयत कैसी है?’’
‘‘मैं ठीक हूं, क्योंकि मेरी बेटी ठीक है,’’ अम्मी ने अपने दिल की बात कही.
‘‘मैं समझा नहीं,’’ नवेद ने कहा. ‘‘मेरी बेटी को इस के घर छोड़ कर आओ. नजराना की अम्मी से कहना कि मैं उन से मिलने आऊंगी. मुझे उन से एक खास बात करनी है,’’ अम्मी के कहने पर नवेद के चेहरे पर शरारती मुसकराहट फैल गई थी. Hindi Short Story
Story in Hindi. तमाम लोगों की भीड़ के बावजूद यहां हर इनसान अकेला है. हर दिन एक अकेला इनसान भीड़ में भागता है. भीड़ में होता है एक अकेला इनसान. तमाम ऊंचीऊंची बिल्डिंगें होने के बावजूद यहां भी झोंपड़पट्टियां हैं. इन झोंपड़पट्टियों से नहीं दिख पाती बिल्डिंग की छत, पर बिल्डिंग की एक खिड़की से दिख जाती हैं सारी झोंपड़पट्टियां.
ऐसी ही एक झोंपड़पट्टी में मैं रहता हूं और ऊंचीऊंची बिल्डिंगों का चौकीदार हूं. चौकीदार हूं का मतलब यह नहीं कि मैं सिर्फ चौकीदार ही हूं, क्योंकि कभीकभी हम जो होते हैं वह दिखता नहीं और जो नहीं होते वह प्रमुखता से दिख जाता है.
खैर, मुझे किसी ने चौकीदारी करने के लिए नहीं कहा था. मैं बीएससी पास हूं, स्वभाव का गुस्सैल हूं. मैं झारखंड से यहां हीरो बनने आया था. यों तो झारखंड और बिहार से लाखों की तादाद में लोग यहां मजदूरी करने आते हैं, पर मैं यहां मजदूर बनने कभी नहीं आया था, पर मुंबई एक ऐसा शहर है जो आप से क्या न करवा ले. कभीकभी महानगर में जो आप होते हैं उस से इतर आप कुछ और हो जाते हैं.
यह मेरी कहानी नहीं है, इसलिए अपनी बात को विराम दे कर मैं कहानी को वहां ले कर चलता हूं, जहां से कहानी की शुरुआत हुई थी. तो यह कहानी कुछ इस तरह शुरू हुई थी. हां, कहानी शुरू करने के पहले आप सब से यही इजाजत लेना चाहूंगा कि अगर मेरी जरूरत होने पर वहां मुझे हाजिर होना पड़ेगा. इस में आप सब को कोई एतराज नहीं होना चाहिए. तो कहानी की तरफ आगे बढ़ते हैं.
यहां चौकीदार लगते ही मेरी मुलाकात एक चौकीदार लड़की से हुई जिस का नाम प्रियंका जैसवाल था.
मैं ने अपने जीवन में पहली बार किसी लड़की को चौकीदार की ड्रैस पहने देखा था. वह नीली फुल शर्ट और ब्लैक पैंट, कमर पर काली बैल्ट और पैरों में सेफ्टी शूज पहने हुई थी. इस से पहले मैं ने लड़कियों को या तो स्कूल के कपड़े, सलवारसूट या साड़ी में ही देखा था.
यह अलग बात है कि मैं ने सिनेमा में लड़कियों को पुलिस की ड्रैस में देखा था जो बहुत ही खूबसूरत दिखती थीं, पर प्रियंका चौकीदार की ड्रैस में बिलकुल भी खूबसूरत नहीं लगती थी. एक तो उस का कद नाटा और दूसरा शरीर उस का थोड़ा भरा हुआ था. भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनों की तरह. उस के चेहरे पर मुंहासे भी थे.
मगर इस बिल्डिंग के 2 दरवाजों के हर चौकीदार प्रियंका को अपने पास ही बुला कर बैठना चाहते थे.
प्रियंका बोलने में खूब तेजतर्रार थी. हमेशा हंसने की कोशिश करती थी. पर उस की आंखों में दर्द दिखता था. वह खुश नहीं है, साफ दिखता था. उस की आंखें साफ बताती थीं कि वह बहुतकुछ सह और झेल चुकी है. उस की हर हंसी के पीछे एक दर्द भी रोता था.
प्रियंका मुझ से तकरीबन सालभर पहले से यहां काम कर रही थी. मैं चौकीदारी में नयानया लगा था. मैं खुद को चौकीदार की ड्रैस पहने बहुत शर्मिंदगी महसूस करता था. हमेशा डराडरा सा रहता था कि कोई मुझे इस तरह देखेगा तो क्या सोचेगा?
मैं ऐसे आदमी से भी शरमाता जो मुझे जानता तक न हो, जिस का दूरदूर तक मेरे इस काम से कोई मतलब नहीं था. सच तो यह था कि इस शहर में किसी को किसी के काम से कोई मतलब नहीं था. यहां तक कि मैं प्रियंका को देख कर भी शर्मिंदगी महसूस करता था कि यह मेरे बारे क्या सोचती होगी, जबकि वह मेरे बारे में कुछ नहीं सोचती थी. वह खुद चौकीदार थी.
खैर, यह मैं पहले ही बता चुका हूं कि यह कहानी मेरी नहीं है. यह कहानी प्रियंका की है, पर मैं इस कहानी में हाजिर हूं, तो बीचबीच में आता रहूंगा. बिलकुल भी मैं इस कहानी का हीरो नहीं बनूंगा. यह अलग बात है कि मैं मुंबई में फिल्मों में हीरो जरूर बनने आया था. फिलहाल बन गया हूं, चौकीदार, क्योंकि केवल खुद को नहीं, बल्कि सपने को भी जिंदा रखने के लिए पैसों की जरूरत होती है.
एक बार प्रियंका ने मुझे कहा, ‘‘आप गेट नंबर 2 पर ड्यूटी करने चले जाइए. आप को बता देने के लिए सुपरवाइजर ने मुझे कहा था.’’
वैसे तो मुझे इस बात पर बहुत गुस्सा आया कि यह गांव की गंवार लड़की हम जैसे पढ़ेलिखें लड़कों को काम पर लगा रही है. यह सुपरवाइजर हमें डायरैक्ट भी तो बोल सकता था.
तकरीबन 4 घंटे बाद प्रियंका का फिर फोन आया, ‘‘आप एक नंबर गेट पर आ जाइए.’’
मैं गेट नंबर एक पर आ गया. प्रियंका की ड्यूटी भी वही लगी थी.
मैं उस के पास रोब से खड़ा हो गया. उस ने मुझे देखते ही कहा, ‘‘दरअसल, गेट नंबर 2 पर जाने के लिए सुपरवाइजर ने तुम्हें नहीं कहा था, बल्कि गेट नंबर 2 का सिक्योरिटी गार्ड मुझे आने के लिए कह रहा था, इसलिए तुम्हें भेज दिया. क्या कुछ कह रहा था तुम्हें?’’
‘‘नहीं, जैसे मेरा जाना उसे पसंद नहीं आया. पर तुम क्यों नहीं गई?’’
‘‘कुछ नहीं, मेरे चेहरे के मुंहासे देख कर कह रहा था. पूछा, तुम्हारी शादी हो गई है? मैं ने कहा नहीं हुई. इसलिए तुम्हारे चेहरे पर मुंहासे हैं. इस का इलाजमुझे पता है.’’
मैं मुसकराया और पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी नहीं हुई अभी तक?’’ ‘‘नहीं, तुम्हारी शादी हो गई हैं?’’
‘‘अरे नहींनहीं, अभी शादी कौन करेगा.’’ ‘‘तुम्हारे चेहरे पर भी मुंहासे हैं.’’
‘‘खूब इलाज करता हूं. बारबार मुंह भी धोता हूं फिर भी हो जाते हैं. इस की वजह से कितनी जगह काम नहीं मिल पाता.’’
‘‘कौन सा काम नहीं मिल रहा है?’’ उस ने पूछा. ‘‘फिल्मों में.’’
‘‘अच्छा तो तुम कलाकार हो… फिर यहां कैसे?’’ ‘‘जैसे तुम यहां हो, वैसे मैं भी हूं.’’ ‘‘मेरी तो मजबूरी है.’’
‘‘मेरी भी मजबूरी है.’’ ‘‘इस बिल्डिंग में भी कई फिल्म कलाकार रहते हैं. मेरे पास फिल्म डायरैक्टर शुक्लाजी का नंबर भी है. वे मुझे नौकरी दे रहे थे.’’
‘‘कैसी नौकरी?’’ ‘‘उन की कोई हवेली है, वहां कोई रहता नहीं है. मुझे कह रहे थे तुम वहां रहो, उस की देखभाल करो. कह रहे थे कि महीने का 20,000 देंगे.’’
‘‘फिर तुम ने वह नौकरी क्यों नहीं की?’’ ‘‘नहीं, कौन अकेले उस वीरान हवेली में रहेगा.’’
‘‘तुम मुंबई कैसे आ गई?’’ ‘‘बहुत लंबी कहानी है.’’ ‘‘मैं वह लंबी कहानी सुनना चाहता हूं.’’
‘‘पर क्यों?’’ ‘‘ताकि तुम्हें जान सकूं.’’ ‘‘मुझे जान कर क्या करोगे? मैं तुम्हारे क्या काम आ सकती हूं?’’
‘‘इस अजनबी शहर में एकदूसरे को जानना ही बहुत बड़ी बात होगी.’’
तब तक एक कार आ कर रुकती है. प्रियंका को कहता है, ‘‘गेट खोल दीजिए भाभीजी.’’
‘‘अरे सरजी, अभी आप का कोई भैया नहीं है, तो मैं भाभी नहीं हुई हूं. दीदी बोला कीजिए,’’ गेट खोलते हुए प्रियंका ने कहा. गेट खुलते ही कार चली गई.
मैं ने फिर कहा, ‘‘तो बताओ.’’ ‘‘मैं ने एमए किया है.’’ ‘‘क्या?’’ जैसे मैं दोबारा सुनना चाहता था.
‘‘वही जो तुम ने सुना. अब सुनो… चारों तरफ कैमरे लगे हैं. मैं अंदर रूम में हूं, तुम गेट पर रहो.’’
‘‘और कहानी’’ ‘‘पहले नौकरी बचाओ.’’
इस बार मैं प्रियंका के कहे मुताबिक काम पर लग गया. इस बार मुझे तनिक भी नहीं लगा कि मैं पढ़ालिखा हूं, बल्कि यह लगा कि मैं पढ़ेलिखे लोगों के साथ हूं.
शाम को प्रियंका जाने लगी तो मैं भी जाने लगा, लेकिन उस ने कपड़े बदल लिए थे. वह सलवारसूट में थी, जैसा मैं गांव की लड़कियों को देखता था एकदम वैसी ही.
यों तो लड़कियों की उम्र पूछना जुर्म है, पर मैं ने वह जुर्म किया. मैं ने प्रियंका की उम्र पूछी, पर उस ने मुझे तुरंत जवाब दिया, ‘‘28 की हो गई हूं.’’
‘‘तुम्हारी कितनी हुई?’’ ‘‘मैं तो 25 साल का हूं अभी.’’ ‘‘तुम्हारी शादी हुई नहीं?’’ ‘‘मेरे बारे में छोड़ो, तुम अपनी बताओ. तुम ने शादी क्यों नहीं की?’’
‘‘बस जब करना चाहती थी तब हुई नहीं अब शादी नहीं करना चाहती, अकेले ठीक हूं. वैसे मैं अकेली भी नहीं हूं, मेरे पास टैडी बियर है. हमेशा उस के चेहरे पर मुसकान रहती है. चाहे मैं दुखी रहूं, उदास रहूं, गुस्से में रहूं. वह हरपल हंसता रहता है और उस की हंसी देख कर मैं भी खुश हो जाती हूं. वह मुझे खुश रखने की प्रेरणा है.’’
‘‘तो तुम ने इस मुंबई शहर में अकेले रह कर भी जीने का अच्छा तरीका सीखा है. मुझे भी यह हुनर सिखाओ न…’’ ‘‘सीख जाओगे, क्योंकि समय सब सिखा देता है, जैसे मुझे सिखाया.’’
‘‘पर मैं जानना चाहता हूं कि आखिर तुम्हारी शादी क्यों नहीं हुई और किस ने तुम्हें अकेला छोड़ दिया.’’
अब हम उस मोड़ पर आ गए जहां से हम दोनों को अलग होना था. बात अधूरी, हम दोनों कल मिलेंगे बोल कर, अपनेअपने रास्ते हो लिए.
मैं जिस चाल में रह रहा था उस में 4 लड़के रहते थे. कमरे में सामान अस्तव्यस्त रहता था, अजीब सी गंध फैली रहती थी. यह माहौल नींद के लिए तो बिलकुल भी नहीं था, पर हम सब गहरी नीद में सोते थे. हम में से किसी को भी एकदूसरे के खर्राटे का कोई असर नहीं पड़ता था.
वह रात बहुत लंबी लगी क्योंकि मैं सुबह होने का इंतजार करता रहा. कभी खूब नींद आती, कभी अचानक खुल जाती, कभी न नींद में होता, न जागा होता, बस आंखें बंद रहतीं.
अगले दिन मैं ने सोचा कि प्रियंका की सारी कहानी आज जरूर सुन लूंगा और आप सब को बता दूंगा, क्योंकि मैं जानता हूं कि आप सब भी मेरी तरह प्रियंका की कहानी जानने के लिए बेचैन होंगे.
पर जैसे ही मैं प्रियंका के पास पहुंचा, वह मुझे देख मुसकराते हुए बोली, ‘‘गुड मौर्निंग.’’ ‘‘गुड मौर्निंग… कैसी हो?’’
‘‘मैं ठीक हूं. सुनो न, तुम 2 नंबर गेट पर चले जाना. मेरी ड्यूटी आज वहीं लगी है.’’
मैं जान गया था कि वह उस बंदे के पास नहीं जाना चाहती है और सच पूछो तो मैं भी प्रियका को छोड़ कर जाना नहीं चाहता था, लेकिन मैं गया क्योंकि अब मैं भी नहीं चाहता था कि प्रियंका उस बंदे के पास जाए.’’
मैं जैसे ही उस बंदे के पास गया उस का जैसे मुंह उतर गया हो.
मैं ने उस से बात करने की कोशिश की, ‘‘आप के भी मुहांसे हैं. क्या आप की शादी नहीं हुई?’’ मेरी इस बात से वह बंदा चौक गया, ‘‘क्या बदतमीजी है…’’
‘‘नहीं मुमुझे भी मुहांसे हैं, शादी मेरी भी नहीं हुई है. मुझे पता चला कि आप को इस का इलाज पता है. वैसे, प्रियंका इस का इलाज कराना चाहती है.’’
अब वह बंदा पहले से भी ज्यादा चौंका, जैसे किसी ने बिजली का झटका दिया हो, ‘‘तुम बदमाशी कर रहे हो.’’ ‘‘नहीं बदमाशी नहीं कर रहा, अब मुझे मुंहासे वाली बात कैसे पता चलती.’’
‘‘सही कह रहे हो?’’ ‘‘हां, आज रात 10 बजे समुद्र के किनारे एकदम कोने की झाडि़यां के पास जो बड़ा सा पत्थर है वहां तुम्हें बुलाया है.’’ उस बंदे ने फिर कहा, ‘‘सही कह रहे हो न?’’
‘‘हां, अच्छा अब बताओ कि तुम्हारी शादी हो गई है?’’ ‘‘कुछ महीने पहले पत्नी बीमार हो गई थी, फिर मर गई.’’ ‘‘ठीक शाम को आना मत भूलिएगा.’’
शाम को ड्यूटी पूरी कर मैं प्रियंका के साथ निकला.
रास्ते में पूछा, ‘‘हां, तो तुम ने शादी क्यों नहीं की?’’ ‘‘मतलब तुम बिना जाने मुझे छोड़ोगे नहीं.’’ ‘‘कुछ ऐसा ही समझ . कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जानना जरूरी होता है.’’
‘‘तो सुनो, वह गांव क्या था खपरिहंवा कटहरलुहनी गांव से हट कर 4-5 घरों का एक गांव बन गया था, मगर उन घरों को भी खपरिहंवा का ही हिस्सा माना जाता है.
‘‘खपरिहंवा गांव की एक ही समस्या थी. कितनी सरकारें आईं और गईं, मगर मुझे और मेरी 2 छोटी बहनों, मां को शौच के लिए खेतों में ही जाना पड़़ता था. अमूमन पूरे गांव का यही हाल है.
‘‘पता नहीं मेरे पापा ने घर बनाते समय उस में शौचालय क्यों नहीं बनवाया? मगर सच तो यह था कि अभी तक उस घर का पलस्तर तक नहीं हो पाया था. किसी तरह कुछ पैसे जोड़ कर उन्होंने 2 कमरे और एक बरामदा बना दिया था. हैंडपंप के पास ही नहाने के लिए छोटा सा बाथरूम बनवा दिया था. उस की भी छत नहीं थी. ऊपर चद्दर डाल दी गई थी. मगर मैं अपने पापा से भी ज्यादा राजाजी पर गुस्सा निकालती थी.’’
‘‘राजाजी कौन?’’ मैं ने बीच में बात को काट कर पूछा.
‘‘राजाजी मनकापुर के सांसद थे. जब मैं स्कूल से पढ़ कर घर लौटती… गांव पहुंचतेपहुंचते गुस्से से भर जाती थी. गांव से ले कर शहर तक कच्ची सड़क गड्ढों से भरी पड़ी है. मैं समझ नहीं पाती कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क.
उस कच्ची सड़क पर मुझे साइकिल चलाने में बहुत तकलीफ होती. कई बार साइकिल से उतर कर पैदल चलने लगती है. इस दौरान मैं साइकिल से कई बार चढ़तीउतरती.
‘‘मुझे याद है मैं 9वीं क्लास में थी. स्कूल खत्म होने के बाद मैं मनकापुर शहर अपनी सहेली के जन्मदिन में उस के घर चली गई थी. लौटते वक्त देर हो गई. अंधेरा हो गया. उस दिन अंघेरे में साइकिल चलाना मेरे लिए मुसीबत बन गया. एक तो रास्ते में कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था ऊपर से गड्ढे.
‘‘मैं साइकिल से गिर पड़ी. उस दिन मेरे नाजुक अंग से खून का रिसाव हो गया. उस दिन से आज तक मैं गुस्से से भरी पड़ी हूं. रिसाव की वजह से नहीं क्योंकि मुझे बाद में समझ आ गया था कि गिरने की वजह से नहीं यह तो प्रकृति का नियम है जो हर लड़की के साथ होता है. गुस्सा तो इस बात का था कि मैं उस दिन के बाद से घर जल्दी लौट आती, किसी कार्यक्रम में नहीं जाती.’’
‘‘कैसा कार्यक्रम?’’ ‘‘मुझे जितना कविता लिखने में अच्छा लगता है, उस से कहीं ज्यादा मंच पर पढ़ना.’’
‘‘अच्छा तो तुम कविता लिखती हो वाह, फिर तो हम दोनों कलाकार हैं. खैर, फिर… ’’
प्रियंका ने अपनी कहानी जारी रखी, पर मेरा प्रतिरूप मुझे से निकल कर बाजार में कुछ जरूरी चीज खरीदने लगा था. मेरे प्रतिरूप ने एक हथौड़ा खरीदा, जिस के एक तरफ से कील ठोंकी और दूसरी तरफ से निकाली जा सकती थी.
कब हम उस मोड़ पर आ गए जहां से हम दोनों को अलग होना था. पता नहीं यह मोड़ कब आ गया. कहानी अधूरी रह गई. मुझे इस मोड़ पर भी बहुत गुस्सा आता था. पता नहीं मोड़ क्यों बनाए जाते हैं, बिछड़ने के लिए? थोड़ी देर सुस्ताने के लिए? इकट्ठा होने के लिए?
मैं बाजार में हथौड़ा लिए घूम रहा था. रात के 10 बज रहे थे. तेज लहरों, हवा और मेरी तेज सांसों की आवाज के सिवा कोई नहीं था.
सुनसान जगह पर वही चौकीदार था. उस ने मुझे देखते ही कहा, ‘‘प्रियंका कहां है?’’
मैं ने बैग से हथौड़ा निकाल कर उस के सिर पर जोर से 2 वार कर दिए. इस से पहले कि वह कुछ और सोच पाता, मैं ने तीसरी बार हथौड़ा उस के सिर पर मारा. मुझे यह काम सिर्फ 5 मिनट में खत्म करना था.
वह चौकीदार लहूलुहान हो कर गिर पड़ा. मैं उस की लाश को खींचते हुए समुद्र के बहुत अंदर तक ले कर गया. क्योंकि समुद्र बड़ीबड़ी चीजों को निगल जाता है, यह तो एक छोटी सी लाश थी. इस समुद्र ने उस को पलभर में ही कब अपने अंदर समा लिया, पता ही नहीं चला.
हो सकता है इस की लाश को कुछ छोटीमोटी मछलियां खा जाएंगी या कोई शार्क या कोई व्हेल मछली. मैं ने हथौड़े को भी समुद्र की उस गहराई में जोर से उछाल फेंका.
कुल 5 मिनट के अंदर काम खत्म कर मैं समुद्र के एकदम किनारेकिनारे चलने लगा. जैसेजैसे मेरे पैरों के निशान रेत पर पड़ते जाते, वैसेवैसे लहर उन्हें मिटाती जा रही थी.
मेरा प्रतिरूप घर आ गया. मेरा प्रतिरूप लोमड़ी की तरह चालाक, चीते की तरह तेज और सांप की तरह जहरीला है. मेरे प्रतिरूप की और भी कई सारी खासीयतें हैं, जो मुझे भी नहीं पता, क्योंकि कभीकभी मैं अपने प्रतिरूप से खुद डर जाता हूं. कभीकभी बहुत खुश होता हूं.
अगले दिन खूब खामोशी थी. मैं और प्रियंका एक ही गेट पर थे. हम लंच के समय भी एकसाथ थे. लंच के वक्त मैं ने प्रियंका से अधूरी कहानी पूरी करने को कहा, पर इस बार प्रियंका ने कहा, ‘‘तुम अपने बारे में कुछ बताओ.’’
चूंकि मैं ने कहानी के शुरुआत मैं ही कहा था, यह कहानी मेरी नहीं प्रियंका की है, पर जैसे की मैं ने कहा था अगर मेरी जरूरत हुई तो मैं वहां हाजिर होऊंगा, कुछ समय के लिए मैं प्रियंका की कहानी जानने के लिए हाजिर हो रहा हूं.
‘‘वैसे तो हम पंजाब से हैं पर पिताजी शुरू से चासनाला में रह रहे थे. पिताजी ट्रक ड्राइवर थे. किसी छोटी सी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते. वे ट्रक ले कर दूरदूर जाया करते थे. अकसर वे 2-3 दिन बाद वापस आते. मेरे लिए ढेर सारी चीजें लाते. पिताजी चाहते थे कि मैं पढ़लिख कर खूब बड़ा आदमी बनूं. उन्होंने मुझे अच्छे अंगरेजी स्कूल में डाला था.
‘‘एक बार पिताजी राजस्थान से ट्रक ले कर आ रहे थे. बौर्डर पर उस ट्रक की पूरी चैकिंग होने लगी. पिताजी आराम से ट्रक में बैठे थे. मगर तभी उन्हें आभास हुआ कि आज कुछ ज्यादा ही चैकिंग हो रही है. पिताजी के ट्रक में रखे माल से 500 ग्राम कोकीन बरामद हुई. पिताजी को पकड़ लिया गया.
‘‘वे पुलिस को बताते रहे कि उन्होंने कुछ नहीं किया, मगर पुलिस वालों ने पिताजी की एक न सुनी और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया. उस समय मैं सिर्फ 5 साल का था. मां की हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो खून नहीं.
‘‘कोर्ट के एक वकील ने मां से कहा कि अगर आप 25 लाख रुपए का इंतजाम करती हैं तो आप के पति बाइज्जत बरी हो जाएंगे.
‘‘मां के पास उस वक्त तो 2,500 भी नहीं थे. मां ने अपने सारे गहने बेच कर भी 2 साल तक केस लड़ती रहीं, मगर पिताजी को 12 साल की जेल हो गई.
‘‘मां महल्ले के एक लड़के को ले कर पिताजी से जेल में मिलने जाया करती थीं. मां कई बार उस लड़के के साथ पिताजी से मिलने गई थीं, फिर एक दिन पिताजी ने कहा, ‘तुम मुझे मिलने मत आया करो. तुम मेरा इंतजार करो. बेटे की पढ़ाई पर ध्यान दो.’
‘‘पिताजी यह जानते थे कि घर में पैसे कहां से आएंगे, मगर मां ने लोगों के घर में चौकाबरतन का काम शुरू कर दिया. मां ने मुझे फिर एक सरकारी स्कूल में डाल दिया.
‘‘तकरीबन 6 सालों बाद पिताजी लौट आए. तब मैं ने उन से पूछा था, ‘पिताजी, क्या आप सच में ट्रक में ड्रग्स ले कर आ रहे थे?’
‘‘तब उन्होंने कहा था, ‘बेटा, ट्रांसपोर्ट से जो सामान लोड होता है, बस मैं वही ले कर चलता हूं. यह ट्रांसपोर्ट मालिक की कोई बदमाशी होगी.’
‘‘फिर पिताजी चासलाना की एक प्राइवेट कोयला खदान में डंपर चलाने लगे और फिर से हम सब की जिंदगी थोड़ी पटरी पर आ गई. मगर इन 6 सालों में मैं ने, मां और पिताजी ने कितना दर्द सहा, मैं पिता के प्यार से वंचित रहा, जिसे अब भी भरा जाना मुश्किल है, शब्दों में बयां नहीं कर सकते.
‘‘बाद में पता चला कि उस ट्रांसपोर्ट के मालिक को किसी ने चाकू से 6 वार कर के मार दिया था…’’
लंच का टाइम बीत गया था. प्रियंका के टिफिन में रोटियां वैसी ही थीं. पेट खाली था पर आंखें आंसुओं से भर गई थीं. आंसुओं ने पेट भर दिया था.
‘‘आज मेरा मन बहुत हलका हो गया है. अब तक मुझे लगता था कि मैं ही अकेली हूं इस शहर में जिसे दुख के सिवा कुछ नहीं मिला. क्या सचमुच इस दुनिया का हर आदमी अकेला है?’’
सच में उस दिन प्रियंका मेरे पास ही बैठी रहना चाहती थी, पर गेट नंबर 2 पर एक आदमी की कमी की वजह से मुझे गेट नंबर 2 पर जाना पड़ा.
शाम हो चुकी थी. जैसे प्रियंका की कहानी आज सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि शहर की भीड़ में हर अकेला आदमी सुन रहा था. 1-1 अकेले आदमी से एक भीड़ बनती है. भीड़ में फिर भी होता है आदमी अकेला.
आज इस अकेलेपन का फायदा सब से ज्यादा मोबाइल को हुआ है. हर आदमी लोगों की भीड़ के बीच मोबाइल में लगा हुआ है. मोबाइल में एक अकेले आदमी को रील में रोते देख, उस की मदद को हर अकेला आदमी हो जाता हैं तैयार. भले ही एक अकेला आदमी उस के सामने रोते हुए मिल जाए, तो नहीं होती किसी को भी उस की फिक्र.
तो आप सब से भी गुजारिश है कि कुछ पल के लिए आप भी मोबाइल छोड़ प्रियंका की कहानी सुनें, इस तरह आप भी दे सकते हैं किसी एक अकेले आदमी को सहारा.
‘‘मुझे कविता लिखने में अच्छा लगता है उस से कहीं ज्यादा मंच पर पढ़ना, क्योंकि मैं मानती हूं, आप जितनी अच्छी कविता पढ़ेंगे, इस धरती की हवा उतनी शुद्ध होगी, पत्ते खूब हरे होंगे, फल बहुत मीठे होंगे, नफरत कम होगी, क्योंकि अच्छी बातें सब नकारात्मक बातों को मार देती हैं. मैं सोचती हूं आने वाले समय में लोग मुझे याद रखें या न रखें, पर मेरी कविता हमेशा याद रहेगी.
‘‘एक बार मैं लखनऊ कविता पाठ से वापस लौट रही थी. उस दिन भी मैं काफी लेट हो गई थी. अंधेरे रास्ते को किसी तरह पार कर घर पहुंची थी. घर पहुंचतेपहुंचते रात के 9 बज गए थे. खैर, बाहर जितना गड्ढों का डर था उस से कहीं ज्यादा मुझे बड़े भाई साहब का डर था. वे मुझे जल्द से जल्द ब्याह कर लेने के लिए कहते थे, पर मैं पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी.
‘‘तब भाई साहब कहते, ‘अपने पैरों पर ही तो खड़ी हो. दूसरों के पैर से कौन खड़ा रहता है.’
‘‘वे मेरे हर काम से चिढ़ते हैं. हर बार चिढ़ कर एक ही बात कहते, ‘तू ब्याह कर जा यहां से.’
‘‘वे डरते थे कि यह ब्याह नहीं कर रही है इस का मतलब जरूर किसी लड़के के साथ चक्कर में है. वे मुझे खुलेआम धमकी देते, ‘जो भी करना है कर, मगर किसी के साथ भागी तो तेरी जान ले लूंगा.’
‘‘उस दिन भी मैं लखनऊ अपने बड़े भाई को बिना बताए गई थी. दरअसल, बड़ा भाई फैजाबाद में एक शराब के ठेके पर काम करता था.
15 दिनों में एक बार घर आता था या यों समझिए कि जब मूड करे तब घर आता था. आते ही हम सब बहनों पर शासन चलाने लगता था. घर में मांपापा कुछ नहीं कहते थे.
‘‘लखनऊ भी मैं अपने पापा को बोल कर चली गई थी, मगर मां बड़े भाई साहब के लौटने पर बेटे को पूरी रिपोर्ट देती थीं. इस बात पर फिर वह हम बहनों की पिटाई कर देता था, मगर मुझ से तो वह बहस तक ही सीमित रहता था. फिर पापा ने मुझे छूट दे रखी थी, क्योंकि उन्हें अपने नालायक बेटे से ज्यादा मुझ पर नाज है. उन की सोच भाई से अच्छी है.
‘‘इसी सोच ने उन्हें बेटे से अलग रखा है. पापा यह भी मानते हैं कि बेटे के नालायक होने के पीछे वे खुद भी एक वजह हैं. जब बच्चे छोटे थे तब वे कमाने के लिए मुंबई निकल आए थे. उस वक्त मुंबई बौम्बे हुआ करता था. चपरासी की नौकरी से महज 7,000 रुपए तनख्वाह मिलती थी जिस में से वे 2,000 रख कर 5,000 घर भेज देते थे.
‘‘10 बीघा खेत था जिस से अनाज हो ही जाता था. उन दिनों जब पापा मुंबई में थे तो लोग उन की कदकाठी को देख कर फिल्मों में भी ट्राई करने के लिए कहते थे. अमिताभ बच्चन जैसी लंबाई और बाल थे. धर्मेंद्र जैसा शरीर, किशोर कुमार जैसी आवाज. किशोर कुमार के गाने बड़े ध्यान से गाते थे. रूम में रह रहे अपने पार्टनरों को गाना सुनाया करते थे.
‘‘वे दुख की वजह से गाना अच्छा गा लेते थे या सुख की वजह से वे खुद नहीं समझ पाते थे. आज उन्हें लगता है दुख, कमी, पीड़ा ही इनसान को कलाकार बना देती है.
आज उन्हें लगता है कि बेटी प्रियंका को भी दुखों ने कवि बना दिया है. वे कभीकभी पछताते हैं कि उन्होंने भी उस समय मुंबई में फिल्मों में ट्राई किया होता तो शायद जिंदगी कुछ और होती. कई बार उन का मन हुआ था कि वे भी फिल्म स्टूडियो जाएं, मगर कुछ न कुछ सोच कर रुक गए. आज उन्हें लगता है मन जो कहे वह जरूर करना चाहिए ताकि आगे अफसोस न करना पड़े. उन्हें लगता है मन की न करने से मन भारी हो जाता है. मन भार से इतना दब जाता है कि फिर उस की मौत हो जाती है. फिर सारी इच्छाए मर जाती हैं.
‘‘मेरे पिताजी शिवकुमार को कई बार लगने लगा था कि उन के शरीर से कुछ अजीब गंध आने लगी है. नहाने के बाद भी वे ऐसा ही महसूस करते, मगर शर्म से कभी अपने दोस्तों को बताते नहीं थे. उलटा दोस्तों से थोड़ा दूरदूर रहते थे.
‘‘वे अपनी पत्नी यानी मेरी मां को गांव के पीसीओ से फोन कर बताते, ‘मेरे शरीर से हमेशा गंध आती है,’ तो मां हमेशा समझाती थीं, ‘ऐसी कोई बात नहीं है.’
‘‘फिर पिताजी इत्र की शीशी खरीद कर ले आए. सब दोस्त उन के परफ्यूम लगाने पर चिढ़़ाते, ‘लगता है मुंबई में कोई पट गई है.’
‘‘इन सब बातों से पिताजी और बीमार हो गए. आखिर में गांव चले आए. गांव की हवा और पत्नी के साथ रात बिताने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उन के शरीर से कोई गंध नहीं आती.
‘‘यहां आ कर आखिर कब तक खाली बैठते, अपने काम मे लग गए. गांव का एक दोस्त जो गांजा बेचने का काम करता था उस के साथ गांजा बेचना शुरू कर दिया. साथ ही दिनभर खेतों में काम भी करते.
‘‘गांजा बेचतेबेचते पीने की भी लत लग गई. भर दोपहरी गांजा पी कर खेतों में काम करते रहते. रहीसही कसर गांजा और धूप ने पूरी कर दी. रात में सोते समय उन्हें लगने लगा कुछ अजीब सी आवाजें आ रही हैं. नींद से उठ कर बैठ जाते. कई रातों से वे सो नहीं पा रहे थे. उन की दिमागी हालत एकदम ही खराब हो गई. दवाओं का सहारा लेना पड़ गय.
‘‘डाक्टरों ने बता दिया कि सब नशा करने से हो रहा है. सब से पहले मां ने उन का गांजा छुड़वाया. कड़ी निगरानी रखने लगीं. बच्चों को भी निगरानी रखने के लिए कहा. पर घर की माली हालत पहले ही डांवांडोल थी. अब और भी बदतर होने लगी. घर की छोटीछोटी जरूरतों के लिए हाथ फैलाने पड़ गए. मां, मेरा भाई ऐसे ही खेती ठीक से देख नहीं पा रहे थे. मन किया तो कुछ कर लिया, नहीं तो सोए रहे. खेत आधे अनाज पर दे दिया गया. ऐसे में मैं ने नौकरी करने की सोची.
‘‘उस वक्त मैं 12वीं जमात ही पास थी. मैं शहर में काम की तलाश में निकली. चारों तरफ प्राइवेट स्कूल थे. सरकारी हिंदी स्कूल से पास होने की वजह से उन स्कूलों में मुझे
कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी. कुछ स्कूल के प्रिंसिपल पूछते, ‘कंप्यूटर जानती हो?’
‘‘मैं धीरे से सिर न में हिला देती. कुछ एकाध स्कूल वाले मुझे फाइल रखनेरखाने के काम के लिए कहते. मैं उस के लिए राजी होती, मगर उस में भी मुझे यह कह कर भेज दिया जाता कि आप को बाद में बताएंगे.
‘‘खैर, मुझे तो उस वक्त अंगरेजी स्कूल के प्रिंसिपल पर गुस्सा न आ कर अपने पिताजी पर खूब गुस्सा आता था कि अगर अच्छे स्कूल से पढ़ाया होता तो आज यह हालत नहीं होती.
‘‘उन्हीं दिनों शहर में कपड़ों की बड़ी कंपनी की दुकानें खुली थीं. मुझे किसी ने वहां काम करने के लिए कहा. मैं वहां काम करने के लिए राजी हुई, पर भाई का विरोध शुरू हो गया. फिर वहां भी नहीं जा पाई.
‘‘मुझे लगा कि बिना अंगरेजी सीखे कुछ नहीं हो सकता. कालेज से लौटने के बाद अंगरेजी सीखने लगी. मन ही मन खुद से अंगरेजी में बात करती. आईने के सामने अंगरेजी बोल कर बातें करती. ऐसे ही वक्त जब मैं अपनी अंगरेजी मजबूत करने में लगी थी, तो मेरे शहर में 5वीं तक एक प्राइवेट स्कूल का उद्घाटन हुआ. यह बात पता चली तो मैं स्कूल पहुंच गई. स्कूल में वहां के प्रिंसिपल से मिली. उस स्कूल में मुझे हिंदी टीचर की नौकरी मिल गई. तनख्वाह के नाम पर मुझे सिर्फ 1,200 रुपए ही मिलने शुरू हुए.
‘‘कुछ दिनों बाद ही मुझे गांव में कुछ ट्यूशन भी मिल गईं. ट्यूशन से भी मुझे 1,000 रूपए आने लगे. करीब 6 महीने काम करने के बाद मैं ने कुछ पैसे जमा कर लिए. 3,000 की पूंजी लगा कर मैं ने अपने घर के बाहर के एक कमरे में लैमनचूस, चौकलेट, बिसकुट जैसे छुटपुट सामान रख कर एक छोटी सी दुकान खोल ली और अपने पिताजी को दुकान में बैठने के लिए कहा.
‘‘धीरेधीरे दुकान भी चल पड़़ी. दुकान में सामान भी बढ़ा दिया गया. घर की जरूरी चीजें दुकान से ही ले ली जाती थीं. बस, इन्हीं सब बातों से पिता को मुझे काफी गर्व होता. मगर उन्हें भी मेरे ब्याह की चिंता रहती, क्योंकि मेरे साथ की सभी लड़कियों का ब्याह हो गया था. मगर चिंता इस बात की थी कि लड़के वालों से कहीं ज्यादा मैं नहीं चाहती कि किसी ऐरेगैरे नत्थू खैरे से शादी करूं.
‘‘दरअसल, मैं चाहती थी कि खुद अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं या फिर मेरा पति इतना सबल हो कि मेरे आने वाले कल के सारे सपने पूरे कर सके. कई बार तो मेरे आसपास की भाभियां भी कहती, ‘प्रियंका, क्या तेरा दुलहन बनने का मन नहीं करता?’
‘‘पर मैं इस बात से शरमाती नहीं थी. मैं कहती, ‘जब समय होगा दुलहन बन जाऊंगी.’
‘‘पिताजी यही सोचते कि अगर प्रियंका की कोई पसंद हो तो वह मुझे बता दे तो मैं बेटी को वहीं ब्याह दूं. ऐसा भी नहीं था कि मेरी अपनी कोई पसंद नहीं थी. मेरी अपनी पसंद थी. 12वीं के इम्तिहान के बाद मैं अपने मामा के पास लखनऊ गई थी. वहां मुझे मामा के बेटे के दोस्त देव को देखने पर पहली ही नजर में प्यार का अहसास हुआ था. कुछ दिनों के बाद हम दोनों फेसबुक के जरीए आपस में जुड़ गए. फिर मैसेंजर से हायहैलो करना शुरू कर दिया. हायहैलो से बात आगे बढ़ी तो हम दोनों ने एकदूसरे को अपनाअपना फोन नंबर दिया. हम दोनों में बातें होना शुरू हुईं. फिर मिलनाजुलना भी हुआ.
‘‘हमारा प्यार अपने परवान पर था. जीनेमरने की कसमें खाई जा रही थीं. एकदूसरे से कभी न बिछड़ने के वादे किए जा रहे थे. चेहरे पर हलकेहलके मुंहासे आ गए थे. चूंकि मनकापुर में भी उस के रिश्तेदार थे इसलिए वह गांव में भी लंबे समय तक रहता.
‘‘एक दिन मांपिताजी खेतों में गए हुए थे. घर पर कोई नहीं था. देव अचानक मेरे घर आ गया और मेरे बहुत नजदीक आ गया. मैं ने 12वीं में ही अपना कुंआरापन खो दिया.
‘‘उस दिन सिर्फ बिस्तर ही नहीं, मेरी आंखों के सामने सब कुछ लाललाल दिखने लगा था. उस ने मुझे एक गोली दी और कहा कि खा लो. मैं ने खा ली. फिर वह चला गया.
‘‘उस दिन मैं खूब रोई कि यह मैं ने क्या किया. पर यह सिलसिला चल पड़ा. उसे जब भी मौका मिलता वह मेरे साथ बस यही सब करता और मुझे छोटी गोली खिला कर चला जाता. न जाने उस ने मुझे कितनी बार गर्भनिरोधक गोलियां खिलाई थीं.
‘‘3 साल के बाद जब मैं बीए पास कर चुकी थी. देव मेकैनिकल डिप्लोमा कर एक प्राइवेट कंपनी में काम पर लग गया था. ऐसे ही एक वक्त जब घर में सब कोई ब्याह करने की जिद कर रहा था, तब मैं ने देव के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. देव ने कहा, ‘अभी मैं सरकारी नौकरी की कोशिश में हूं, जब लग जाएगी तब ब्याह करूंगा.’
‘‘उ स दिन मुझे यह बात अच्छी लगी थी. मुझे लगा था कि मेरी पसंद सही है. यही है मेरे सपनों का राजकुमार. पर सच में तो यह एक सपने का ही राजकुमार था. उस की रेलवे में नौकरी तो लग गई, पर मैं उस की नहीं हो पाई.
‘‘नौकरी लगने के बाद उस के मांबाप ने भी दहेज की डिमांड की जो मेरे पिता कभी नहीं दे पाते. सो देव ने भी मुझे मांबाप के खिलाफ ब्याह करने से मना कर दिया.
‘‘मैं भावनात्मक रूप से टूट रही थी. मैं ने देव को फोन लगाया. मैं ने उस से पूछा, ‘अगर तुम्हें दहेज ही चाहिए था तो मेरे शरीर से क्यों खेले? सिर्फ दहेज ही तुम्हारे लिए सबकुछ है? क्या तुम यह नहीं समझते कि शादी के पहले किसी लड़की से संबंध बना कर उसे छोड़ देना एक लड़की को कितना तोड़ सकता है?’
‘‘वह बोला, ‘मैं तुम्हारी भावनाओं से नहीं खेल रहा, बस मांपापा नहीं मान रहे हैं और मैं मांपापा की मंजूरी से ही शादी करना चाहता हूं.’
‘‘मैं ने देव को कई बार मनाने की कोशिश की पर वह नहीं माना. आखिर में उस ने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया.
‘‘एक दिन मैं अपनी छत पर चली गई. देव को छत से फोटो भेजी और कहा कि अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो मैं छत से कूद जाऊंगी.
‘‘पर उस का कोई जवाब नहीं आया. और मैं छत से कूद गई. मगर कमबख्त देव की तरह मुझे यमराज भी नहीं ले कर गए. जब होश आया तो मैं सरकारी हस्पताल के आईसीयू में गंभीर हालत में भरती थी.
‘‘जैसे ही मैं होश में आई भैया, मां सब मुझे कहने लगे, ‘तुम देव के खिलाफ पुलिस में बयान दो.’
‘‘पर पुलिस को मैं ने कोई बयान नहीं दिया. मैं नहीं जानती मैं ने ऐसा क्यों किया. पर मैं ने उस दिन के बाद ठान लिया कि अब ब्याह ऐसे लड़के से करूंगी जो मेरी भावनाओं को समझे, मेरे प्रेम को समझे.
‘‘मैं ने यह भी सोच लिया कि अपने घर वालों पर बोझ नहीं बनूंगी. आत्मनिर्भर बनूंगी. मैं नौकरी की तलाश में लग गई.’’
हम फिर से उसी मोड़ पर आ गए थे. मगर आज मोड़ हमें रोक नहीं पाया.
प्रियंका ने कहा, ‘‘आओ तुम्हें अपना रूम दिखाती हूं.’’
‘‘अरे वाह, फिर तो तुम्हारे हाथ की चाय भी पिऊंगा.’’ ‘‘जरूर,’’ वह बोली. मैं ने धीरे से कहा, ‘‘फिर आगे क्या हुआ?’’
‘‘मेरे भैया शहर में एक घर बना रहे थे. यह पैसा वे कहां से ला रहे थे, पता नहीं. अचानक भैया को पुलिस ने पकड़ लिया. भैया को गैरकानूनी रूप से शराब बेचने, नकली शराब बनाने के जुर्म में पकड़ लिया गया. और भी न जाने कौनकौन से जुर्म उन पर लगा दिए गए, जो उन्होंने किए भी नहीं थे. यहां तक कि शहर के घर को कुर्क कर दिया गया.
‘‘भैया को छुड़ाने के लिए घर का सारा सामान एक के बाद एक बिकना शुरू हो गया. बैंक से लोन लिया गया. 3 सालों से केस चल रहा है.
‘‘घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने के लाले पड़ गए. फिर छोटी बहन मुंबई कमाने आ गई. यहां किसी रैस्टोरैंट में लग गई. फिर मुझे बहन के चक्कर में मुंबई आना पड़ा. पर कहीं नौकरी मिल नहीं रही थी.
‘‘एक अखबार में नौकरी का इश्तिहार देख कर किसी को कुछ बताए बिना इंटरव्यू देने के लिए मैं बोरीवली निकल गई. कई लड़कियों के बाद मेरा भी नंबर आया. औपचारिक पूछताछ के बाद उन्होंने कहा, ‘मनकापुर से मुंबई बहुत दूर है. मुंबई में है कोई जानने वाला?’
‘‘मैं ने कहा, ‘सर, जानने वाला न भी होता तो भी मैं नौकरी करूंगी. जानने वाले अपनेआप हो जाएंगे.’
‘‘उन्होंने पूछा, ‘ऐसा क्यों?’
‘‘मैं ने कहा, ‘सर, मेरे पिता किसान हैं. तबीयत खराब होने की वजह से किसानी भी नही होती. छोटी सी दुकान है. थोड़ीबहुत खेती भी हो जाती है. इन सब से खानापीना, ओढ़ना हो जाता है बस. मगर मेरी शादी के लिए मांगी गई दहेज की डिमांड पूरी नहीं हो पाती. सो, मैं ने फैसला किया कि दहेज लेने वाले लड़के से ब्याह नहीं करूंगी, न ही घर वालों के ऊपर बोझ बनूंगी.’
‘‘इंटरव्यू लेने वाले को लगा जैसे किसी ने उसे बहुत जोर का चांटा रसीद कर दिया है. उस का चश्मा खुल कर गिर गया. गालों पर पांचों उंगलियों की छाप पड़ गई हो…
‘‘और अब यहां तुम्हारे साथ हूं. हम दोनों बहनें हर महीने मां को पैसे भेज देती हैं.’’
हम कमरे में पहुंच गए थे. प्रियंका के हाथ की बनी प्याली से ज्यादा माहौल गरम हो चुका था. हम दोनों एकदूसरे के चेहरे के मुंहासे देख रहे थे.
मैं और प्रियंका एकदूसरे के बहुत करीब थे. मैं ने अपने होंठों को प्रियंका के होंठों पर रख दिया था. चाय की प्याली ठंडी होने लगी थी. उस दिन प्रियंका को लगा था, उसे वह लड़का मिल गया हैं जो उस की भावनाओं को समझे, प्रेम को समझे.
चाय की प्याली जितनी ठंडी हुई थी बिस्तर को हम दोनों ने उतना ही गरम कर दिया था… धीरेधीरे हम दोनों के चेहरे से मुंहासे खत्म होने लगे थे.
एक आखिरी बात… क्योंकि मेरा प्रतिरूप बहुत गुस्सैल है. उस ने देव को ढूंढ़ने के लिए लखनऊ की ट्रेन पकड़ ली थी.
मेरे प्रतिरूप ने मुझ से कहा, ‘क्या आप को नहीं लगता देव जैसे लड़कों को सजा मिलनी चाहिए? न जाने वह ऐसी ही किसी और लड़की की जिंदगी खराब कर देगा.’
मेरे प्रतिरूप ने मुझ से कई सारे सवाल उस रात ही किए थे.
Hindi Story. विकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सबकुछ छोड़ कर भागना पड़ेगा. दुबई की चमचमाती इमारतों के बीच उस ने अपने सपनों का एक छोटा सा संसार बना लिया था. एक अच्छी नौकरी, सलीके की जिंदगी और भविष्य के सुनहरे ख्वाब… सबकुछ ठीक चल रहा था.
फिर अचानक दुनिया बदल गई. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने देखते ही देखते युद्ध का रूप ले लिया. खाड़ी देशों में डर का माहौल फैल गया. कंपनियां बंद होने लगीं, फ्लाइट्स अनिश्चित हो गईं और लोगों को अपनेअपने देश लौटने की सलाह दी जाने लगी.
विकास की कंपनी ने भी एक दिन अचानक ईमेल भेज दिया, ‘औपरेशन्स अनिश्चितकाल के लिए बंद किए जा रहे हैं.’
कुछ ही दिनों में विकास ने अपना कमरा खाली किया, जरूरी सामान समेटा और एक भीड़ भरी फ्लाइट में बैठ कर भारत लौट आया.
भारत आना आसान था, लेकिन यहां टिकना मुश्किल. शुरुआत के कुछ दिन तो अपने शहर की मिट्टी ने उसे सुकून दिया. मां के हाथ का खाना, अपने कमरे की दीवारें… सबकुछ अपनापन दे रहा था, लेकिन 2 हफ्ते बीततेबीतते हकीकत सामने आने लगी.
नौकरी पाना आसान नहीं था. 2 महीने गुजर गए. बैंक बैलेंस धीरेधीरे खत्म होने लगा. दुबई में जोकुछ जमा किया था, वह अब रोजमर्रा के खर्च में पिघल रहा था. घर में किसी से कुछ कहना उसे अच्छा नहीं लगता था. विकास अब भी सुबह तैयार हो कर ऐसे निकलता जैसे किसी बड़े औफिस में जा रहा हो. असल में वह इंटरव्यू के पीछेपीछे भटक रहा था.
ए क दिन विकास एक कंपनी से बुलावा आया. इंटरव्यू दूसरे शहर में था. जेब में पैसे बहुत कम थे, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी थी. उस ने टिकट के लिए स्लीपर क्लास चुनी, और बाकी खर्च बचाने के लिए रात का सफर किया. सुबह जब वह स्टेशन पहुंचा, तो उस के पास बस इतने पैसे बचे थे कि वापसी का टिकट लिया जा सके या दिनभर का खर्च चलाया जा सके.
विकास ने खुद से कहा, ‘‘पहले मौका पकड़ो, फिर बाकी देखेंगे.’’
स्टेशन के बाहर विकास ने आटोरिकशा नहीं लिया. मोबाइल में मैप देखा… औफिस 3 किलोमीटर दूर था. वह पैदल ही चल पड़ा.
धूप तेज होती जा रही थी, लेकिन विकास ने अपनी चाल नहीं धीमी की. हर कदम के साथ उस के अंदर एक जिद जाग रही थी, ‘मुझे हारना नहीं है.’
औफिस पहुंच कर विकास ने वाशरूम में खुद को ठीक किया. पसीना पोंछा, शर्ट सीधी की, बाल संवारे और चेहरे पर वही आत्मविश्वास ओढ़ लिया, जो अब उस की सब से बड़ी पूंजी था. रिसैप्शन पर बैठ कर वह इंतजार करने लगा.
भूख धीरेधीरे अपना असर दिखाने लगी थी, लेकिन विकास ने पानी पी कर खुद को संभाला. आसपास बैठे लोगों को देख कर वह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि कौन सच में जरूरतमंद है और कौन सिर्फ बेहतर मौके की तलाश में. फिर उसे अहसास हुआ कि शायद सब उस की ही तरह हैं, बस कोई दिखा नहीं रहा.
इंटरव्यू के दौरान विकास ने पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए. उस ने अपने अनुभव, अपनी गलतियां और अपने संघर्ष… सबकुछ खुल कर बताया.
बाहर निकलते समय विकास को नहीं पता था कि उसे नौकरी मिलेगी या नहीं, लेकिन एक अजीब सी शांति उस के अंदर थी…
वापसी का सफर अब भी बाकी था. जेब में बचे पैसों से विकास ने सिर्फ एक कप चाय ली. भूख अब तेज हो चुकी थी, लेकिन उस ने खुद को रोका.
‘घर पहुंच कर खा लूंगा,’ यह सोच कर विकास प्लेटफार्म पर बैठ गया. उस के पास समय था और सोचने के लिए बहुतकुछ.
विकास को याद आया दुबई का वह दिन, जब वह औफिस की खिड़की से बाहर देखता हुआ भविष्य की योजनाएं बना रहा था और आज… वह उसी भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा था.
ट्रेन आई. विकास स्लीपर कोच में चढ़ गया और अपनी सीट पर बैठ गया. रात गहराने लगी. हवा में हलकी ठंडक थी.
विकास ने आंखें बंद कीं और खुद से कहा, ‘‘जिंदगी ने मुझे पीछे जरूर धकेला है, लेकिन खत्म नहीं किया.’’
अगली सुबह जब विकास घर पहुंचा, तो थकान उस के शरीर में थी, लेकिन आंखों में एक नई चमक थी. मोबाइल औन किया तो एक ईमेल उस का इंतजार कर रहा था, ‘‘आप को अगले राउंड के लिए शौर्टलिस्ट किया गया है.’
विकास हलके से मुसकराया. संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था, लेकिन रास्ता बंद भी नहीं था.
विकास जानता था… जब तक इनसान कोशिश करता रहता है, तब तक जिंदगी कहीं न कहीं उस के लिए एक दरवाजा खुला रखती है. Hindi Story
Inspirational Story in Hindi. अखबार में आई उस खबर को सपना ने 10 बार बड़ी लगन और चाव से पढ़ा. खबर का एकएक शब्द उसे जबानी याद हो गया था. वह खबर पढ़ कर खयालों में खो गई थी.
शहर की एक मशहूर कंपनी की तरफ से उस कंपीटिशन का आयोजन किया गया था. यह कंपनी औरतों और जवान लड़कियों के अंदरूनी कपड़े बनाती थी. हर साइज की ब्रा और पैंटी बनाने में वह कंपनी माहिर थी और उस का शहर में बड़ा नाम और रसूख था.
16 साल से 20 साल तक की 31 लड़कियां उस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं. विजेता को कंपनी की तरफ से एक महीने के लिए पैरिस की मुफ्त सैर और 5 लाख रुपए का नकद इनाम दिया जाने वाला था. हर खूबसूरत लड़की के लिए यह सुनहरा मौका था.
सपना शहर के जानेमाने उद्योगपति की एकलौती औलाद थी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही घमंडी और जिद्दी भी. दुनिया का हर सपना पैसे की ताकत से पूरा हो सकता है, यह उस की सोच थी. वह हर हालत में इस शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ बन कर कंपीटिशन जीतने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी.
सपना अपनी जिंदगी के 18 साल पार कर चुकी थी. कंपीटिशन के लिए केवल एक महीना बाकी था. इस एक महीने के अंदर उसे हर उस काम को अंजाम देना था, जो उस की जीत के लिए सहायक हो सके.
सपना जीजान से इस के लिए मेहनत कर रही थी. अपने दिमाग में उस ने इस बारे में कुछ योजनाएं और चालें सोची थीं. उन पर अमल कर के वह अपना रास्ता तय करना चाहती थी.
सब से पहले उस ने अपने खास आदमी लगा कर उस कंपीटिशन के लिए कौन और कितने ज्यूरी तय किए गए हैं, उन के बारे में मालूम करने का काम किया था. उसे मिली जानकारी के तहत 3 ज्यूरी बनाए गए थे. उन का फैसला अहम माना जाने वाला था.
60 साला मदनलाल पटेल भी ज्यूरी मेंबर था. वह शहर का माना हुआ बिल्डर था. अच्छी सेहत और रंगीनमिजाज उस के स्वभाव की खासीयत थी.
एक दिन मौका पा कर सपना उस से मिलने उस के दफ्तर पहुंची. उस समय शाम के 6 बज रहे थे और दफ्तर का स्टाफ जा चुका था.
मदनलाल अपने केबिन में कुछ खास फाइलें देख रहा था. सपना ने उसे मिलने का वही समय तय किया. सपना ने उसे अपनी पहचान और उस से मिलने की खास वजह साफ बताई थी.
सपना की खूबसूरती और हिम्मत देख कर मदनलाल प्रभावित हुआ था, मगर ऊपरी तौर पर बनावटी गंभीरता अपने चेहरे पर ला कर वह अपनी सधी, मगर शांत आवाज में कहने लगा, ‘‘सपना, कंपीटिशन के नियम मालूम हो जाने पर भी तुम ने मुझ से मिलने और मुझ पर अपना दबाव डालने की भूल की है. इस के लिए मेरी शिकायत पर तुम्हें कंपीटिशन से बाहर भी जाना पड़ सकता है.’’
‘‘पटेल साहब, कानून और नियम आदमी ही बनाता है और उसे तोड़ने वाला भी आदमी ही होता है. यह कानून तोड़ना आप के लिए फायदेमंद और बहुतकुछ देखने का मौका भी साबित होगा, यह मेरा दावा है.’’
‘‘मेरी समझ में यह बात नहीं बैठ रही है कि कानून तोड़ने के बाद मुझे क्या फायदा होने वाला है. अगर तुम इस बात को जरा सलीके से और साफसाफ कहोगी, तो मैं समझ सकता हूं.’’
‘‘पटेल साहब, आप को तो मालूम ही है कि कंपनी वालों ने यह कंपीटिशन अपना माल ज्यादा से ज्यादा लोगों को बेचने के लिए कराया है. कंपनी जो ब्रा और पैंटी बनाती है, वह कंपीटिशन में भाग लेने वाली लड़की के जिस्म पर कितनी जंचती है और उस का देखने वालों पर क्या असर पड़ता है, यह मैं आप को यहीं दिखा सकती हूं.’’
सपना की इस खुली दावत को नकारना मदनलाल जैसे रंगीनमिजाज आदमी के लिए बहुत मुश्किल था.
अपनी आवाज को काबू में करते हुए वह सपना की तरफ देख कर बड़ी सहज आवाज में बोला, ‘‘सपना, तुम्हारे इस खूबसूरत बदन पर कंपनी की ब्रा और पैंटी कैसी लगती है, यह मैं जरूर देखूंगा, मगर इस केबिन में नहीं.
‘‘साथ वाला केबिन मेरा आराम का कमरा है. वहां चल कर हम आराम से एकदूसरे की चाहत अच्छी तरह पूरी कर सकते हैं.’’
सपना ने हंसते हुए अपना रुख कमरे की तरफ किया. अगले ही पल में वे दोनों कमरे में थे. सपना ने बिना समय गंवाए बदन से अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए. मदनलाल उस के बदन को बडे़ चाव से देख रहा था. देखते ही देखते सपना पूरी तरह कपड़ों से बाहर थी. उस का संगमरमर जैसा बदन और उस की मादक अदाएं देख कर मदनलाल पूरी तरह से बेकाबू हुआ जा रहा था.
सपना ने अपनी बांहों का घेरा मदनलाल के बदन पर कसते हुए अपने होंठ उस के होंठों पर रखे थे. मदनलाल के बदन पर से भी देखते ही देखते एकएक कपड़ा दूर होता गया.
सपना मदनलाल के बदन के विभिन्न अंगों को अपने हाथ से सहलाती और होंठों से चूमती रही. उस की मादक हरकतों से वह पूरी तरह बहक गया था.
सपना के बदन को अपना बनाने के लिए वह मरा जा रहा था. सपना उस की बेकाबू हरकतों को देख कर मन ही मन मुसकराती रही.
देखते ही देखते वह दौर भी आया, जब मदनलाल के सब्र का पैमाना छलकने को हुआ. मगर सपना उस पर पूरी तरह हावी हो कर उस की हर हरकत को बड़ी चतुराई से नाकाम करती रही.
बेचारा मदनलाल कब निढाल हो कर लंबीलंबी सांसें भरने लगा, यह उसे भी पता नहीं लगा. आधे घंटे के बाद वह दोनों फ्रेश हो कर बाहर आए. मदनलाल उसे छोड़ने के लिए खुद उस की कार तक आया था. सपना एक बाजी जीत चुकी थी.
2 दिनों के बाद सपना दूसरे ज्यूरी मेंबर इंद्रजीत वर्मा के घर पर थी. रात के 8 बजे थे और इंद्रजीत रोज की तरह आज भी शराब में धुत्त बैठा था. बंगले में वह आज अकेला था. उस की बीवी और बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे.
सपना ने यह मौका अपने मिशन के लिए ठीक समझा था. इंद्रजीत को उस ने अपनी रसीली बातों और कामुक अदाओं से इस तरह जकड़ कर रख दिया कि बेचारा इंद्रजीत उस के जिस्म को चूमनेचाटने और मसलने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सका. अपनी सांसों पर काबू रख पाना उस के लिए बड़ा मुश्किल काम था.
तीसरा ज्यूरी मेंबर अमरनाथ गुप्ता सपना की समझ से ज्यादा चालाक और शातिर खिलाड़ी साबित हुआ था, मगर सपना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं.
अमरनाथ गुप्ता की बीवी को मरे हुए 10 साल हो गए थे और वह अपनी रातें मनपसंद क्लबों में खूबसूरत औरतों के साथ गुजार कर अपना शौक पूरा करता था.
सपना की लाख कोशिशों के बावजूद वह उस पर इस तरह हावी हुआ था कि उसे अपनी इज्जत बचाना बड़ा मुश्किल लगने लगा था.
अमरनाथ पर आजमाया हुआ हर दांव सपना ने बड़ी चतुराई से नाकाम किया था. सपना के सामने एक पल वह भी आया, जिस समय खुद उसे महसूस होने लगा कि वह अपनी बाजी हारने वाली है, तब पूरी तरह सावधान हो कर उस ने अमरनाथ को अपने बदन से अलग कर दिया था. बेचारा अमरनाथ खुद ही निढाल हो गया था.
इस तरह सपना ने अपने रूप और मायाजाल से उन तीनों ज्यूरी मेंबरों को इस कदर अपना दीवाना बनाया था कि उन तीनों की नजरों में सपना ही इस शहर की एकमात्र ‘ब्यूटी क्वीन’ थी.
सपना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’
का ताज पहनाने के लिए वे तीनों बेताब हुए जा रहे थे. अब सपना का सपना सच होने में ज्यादा देर नहीं थी.
देखते ही देखते वह दिन भी आ गया, जिस का इंतजार सपना और दूसरी लड़कियों और ज्यूरी मेंबरों को था. कंपीटिशन का विरोध करने के लिए शहर के ‘नारी संगठन’ कार्यक्रम में अड़चनें पैदा न करें, इस के लिए संयोजक ने कंपीटिशन के उद्घाटन की जिम्मेदारी शहर के पुलिस कमिश्नर के हाथों में सौंपी थी. इस वजह से वहां पुलिस का पूरा बंदोबस्त था.
शहर के एक शानदार थिएटर में यह कंपीटिशन होने वाला था. लोग बेताबी से कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. पूरा हाल लोगों से भरा पड़ा था. कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो चुकी थी. 10 खूबसूरत लड़कियां इस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं.
3 ज्यूरी मेंबर अपनी सीट पर बैठे थे. देखते ही देखते स्टेज का मखमली खूबसूरत परदा ऊपर गया. लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई. कंपीटिशन के एंकर ने स्टेज संभाल लिया.
सब से पहले 10 लड़कियों ने अपना परिचय लोगों को दिया. दूसरे राउंड में अपने तन पर आकर्षक कपड़े पहन उन्होंने अपनी जवानी और खूबसूरती का जलवा दिखाया. उन के कपड़ों से उन की जवानी और उन के खूबसूरत जिस्म का हर एक अंग जगमगाती रोशनी में लोगों की नींद उड़ा रहा था. सब की आंखों में उन जवान लड़कियों के प्रति तारीफ और वासना तैरती नजर आ रही थी. उन की मादक अदाओं पर लोग तालियां और सीटियां बजा रहे थे और उन्हें उत्साहित कर रहे थे.
आखिरी राउंड शुरू हुआ. हर लड़की कंपनी द्वारा बनाई गई ब्रा और पैंटी पहन कर अपनी मस्तानी चाल से लोगों के दिलों में हलचल मचा रही थी. उन कपड़ों में हर लड़की सैक्सी लग रही थी… लोग रहरह कर अपनी जगह खड़े हो कर उन की तारीफ कर रहे थे.
आखिर में आयोजक द्वारा निकाले गए नामों का ऐलान होने की सूचना दी गई. इस का जोरशोर से स्वागत हुआ.
अगले 5 मिनट में आयोजक द्वारा निकाले गए नाम बताए गए. सपना शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ चुनी गई थी. उस के सिर पर ताज पहनाया गया और उसे 5 लाख रुपए का चैक और पैरिस घूमने का टिकट दिया गया. लोगों ने तालियां बजा कर उस का स्वगात किया.
सपना मन ही मन मुसकराती हुई लोगों का अभिनंदन स्वीकार करती बड़ी शान से स्टेज पर खड़ी रही थी. Inspirational Story in Hindi
Motivational Story. मनोज हर दिन जिस मिनी बस में बैठता था, उसी जगह से लक्ष्मी भी बस में बैठती थी. आमतौर पर वे एक ही बस में बैठा करते थे, मगर कभीकभार दूसरी में भी बैठ जाते थे.
उन दिनों उन के बस स्टौप से सिविल लाइंस तक का किराया 4 रुपए लगता था, मगर लक्ष्मी कंडक्टर को 3 रुपए ही थमाती थी. इस बात को ले कर उस की रोज कंडक्टर से बहस होती थी, मगर उस ने एक रुपया कम देने का जैसे नियम बना ही लिया था.
कभीकभार कोई बदतमीज कंडक्टर मिलता, तो लक्ष्मी को बस से उतार देता था. वह पैदल आ जाती थी, पर एक रुपया नहीं देती थी.
लक्ष्मी मनोज के ही महकमे के किसी दूसरे सैक्शन में चपरासी थी. एक साल पहले ही अपने पति की जगह पर उस की नौकरी लगी थी.
लक्ष्मी का पति शंकर मनोज के महकमे में ड्राइवर था. सालभर पहले वह एक हादसे में गुजर गया था.
लक्ष्मी की उम्र महज 25 साल थी, मगर उस के 3 बच्चे थे. 2 लड़के और एक लड़की.
एक दिन मनोज पूछ ही बैठा, ‘‘लक्ष्मी, तुम रोज एक रुपए के लिए कंडक्टर से झगड़ती हो. क्या करोगी इस तरह एकएक रुपया बचा कर?’’
‘‘अपनी बेटी की शादी करूंगी.’’ ‘‘एक रुपए में शादी करोगी?’’ मनोज हैरान था.
‘‘बाबूजी, यों देखने में यह एक रुपया लगता है, मगर रोजाना आनेजाने के बचते हैं 2 रुपए. महीने के हुए 60 रुपए और सालभर के 730 रुपए. 10 साल के 7 हजार, 3 सौ. 20 साल के 14 हजार, 6 सौ.
‘‘5 सौ रुपए इकट्ठे होते ही मैं किसान विकास पत्र खरीद लेती हूं. साढ़े 8 साल बाद उस के दोगुने पैसे हो जाते हैं. 20 साल बाद शादी करूंगी, तब तक 40-50 हजार रुपए तो हो ही जाएंगे.’’
मनोज उस का गणित जान कर हैरान था. उस ने तो इस तरह कभी सोचा ही नहीं था. भले ही गलत तरीके से सही, मगर पैसा तो बच ही रहा था.
लक्ष्मी को खूबसूरत कहा जा सकता था. कई मनचले बाबू और चपरासी उसे पाने को तैयार रहते, मगर वह किसी को भाव नहीं देती थी.
लक्ष्मी का पति शराब पीने का आदी था. दिनभर नशे में रहता था. यही शराब उसे ले डूबी थी. जब वह मरा, तो घर में गरीबी का आलम था और कर्ज देने वालों की लाइन.
अगर लक्ष्मी को नौकरी नहीं मिलती, तो उस के मासूम बच्चों का भूखा मर जाना तय था.
पैसे की तंगी और जिंदगी की जद्दोजेहद ने लक्ष्मी को इतनी सी उम्र में ही कम खर्चीली और समझदार बना दिया था.
एक दिन लक्ष्मी ने न जाने कहां से सुन लिया कि 10वीं जमात पास करने के बाद वह क्लर्क बन सकती है. बस, वह पड़ गई मनोज के पीछे, ‘‘बाबूजी, मुझे कैसे भी कर के 10वीं पास करनी है. आप मुझे पढ़ालिखा कर 10वीं पास करा दो.’’
वह हर रोज शाम या सुबह होते ही मनोज के घर आ जाती और उस की पत्नी या बेटाबेटी में से जो भी मिलता, उसी से पढ़ने लग जाती. कभीकभार मनोज को भी उसे झेलना पड़ता था.
मनोज के बेटाबेटी लक्ष्मी को देखते ही इधरउधर छिप जाते, मगर वह उन्हें ढूंढ़ निकालती थी. वह 8वीं जमात तक तो पहले ही पढ़ी हुई थी, पढ़नेलिखने में भी ठीकठाक थी. लिहाजा, उस ने गिरतेपड़ते 2-3 सालों में 10वीं पास कर ही ली.
कुछ साल बाद मनोज रिटायर हो गया. तब तक लक्ष्मी को लोवर डिविजनल क्लर्क के रूप में नौकरी मिल गई थी. उस ने किसी कालोनी में खुद का मकान ले लिया था. धीरेधीरे पूरे 20 साल गुजर गए.
एक दिन लक्ष्मी अचानक मनोज के घर आ धमकी. उस ने मनोज और उस की पत्नी के पैर छुए. वह उसे पहचान ही नहीं पाया था. वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. उस का शरीर भी भराभरा सा लगने लगा था.
लक्ष्मी ने चहकते हुए बताया, ‘‘बाबूजी, मैं ने अपनी बेटी की शादी कर दी है. दामादजी बैंक में बाबू हैं. बेटी बहुत खुश है.
‘‘मेरे बड़े बेटे राजू को सरकारी नौकरी मिल गई है. छोटा बेटा महेश अभी पढ़ रहा है. वह पढ़ने में बहुत तेज है. देरसवेर उसे भी नौकरी मिल ही जाएगी.’’
‘‘क्या तुम अब भी कंडक्टर को एक रुपया कम देती हो लक्ष्मी?’’ मनोज ने पूछा.
‘‘नहीं बाबूजी, अब पूरे पैसे देती हूं…’’ लक्ष्मी ने हंसते हुए बताया, ‘‘अब तो कंडक्टर भी बस से नहीं उतारता, बल्कि मैडम कह कर बुलाता है.’’
थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी चली गई, मगर मनोज का मन बहुत देर तक इस हिम्मती औरत को शाबाशी देने का होता रहा. Motivational Story
Short Story in Hindi. सत्यप्रकाश के नाम में ही ‘सत्य’ था. यही उस की सब से बड़ी ताकत भी थी और कमजोरी भी. सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटतेकाटते उस की चप्पलें घिस चुकी थीं. उस ने देखा था कि कैसे एक गरीब किसान अपने हक के मुआवजे के लिए बाबू के सामने गिड़गिड़ा रहा था और वहीं दूसरी ओर एक रसूखदार आदमी नोटों की गड्डी थमा कर चंद मिनटों में अपना गलत काम करवा कर मुसकराते हुए निकल गया था.
सत्यप्रकाश का खून खौल उठता था. जब उस ने एक दिन दफ्तर में हो रहे इस नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से में आवाज उठाई तो सिस्टम ने मिल कर उसी पर ‘सरकारी काम में बाधा डालने’ का आरोप मढ़ दिया. ऊंची पहुंच वालों के सामने सिस्टम नतमस्तक था और सत्य अकेला खड़ा था.
इस सिस्टम को बदलने और लोगों का दुखदर्द दूर करने के लिए सत्यप्रकाश ने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा.
उस ने तय किया कि वह नाइंसाफी के खिलाफ लड़ेगा, लेकिन यह राह कांटों भरी थी.
सत्यप्रकाश ने जब एक भ्रष्ट अफसर व स्थानीय नेता के गठजोड़ के खिलाफ मोरचा खोला तो मुश्किलें उस के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं. धमकियां, झूठे मुकदमे और अपनों का दूर होना… सब एकसाथ शुरू हुआ.
एक शाम जब सत्यप्रकाश थकाहारा चाय की दुकान पर बैठा था, इलाके के एक बुजुर्ग रामदीन चाचा उस के पास आए. रामदीन चाचा ने उस के कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में कहा, ‘‘सत्य, क्यों इस सेवा के कीचड़ में कूदे हो बेटा? आज का सिस्टम भ्रष्ट है. यहां जो नेताओं के चाटुकार हैं, घूसखोर हैं, बेईमान हैं, वे ही सुखी हैं. गलत लोगों की तरह बड़ी पहुंच बनाओ, अपना घर भरो… वरना भरत भूषण तिवारी की तरह मार दिए जाओगे.’’
सत्यप्रकाश ने चौंक कर रामदीन चाचा की तरफ देखा. रामदीन चाचा की आंखों में खौफ और तजरबा दोनों था.
उन्होंने आगे कहा, ‘‘दुनिया का यही दस्तूर है सत्य, अपना उल्लू सीधा करो, सुखी रहोगे. इस मुगालते में मत रहना कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा होगा. अगर तुम मार दिए गए तो यही मोमबत्तियां उठाने वाले समाजसेवी तुम्हारे नाम पर अपनी रोटियां सेंकेंगे, अपना उल्लू सीधा करेंगे, लेकिन जीतेजी तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा. सब तमाशबीन हैं.’’
चाचा की बातें सत्यप्रकाश के सीने में तीर की तरह चुभ गईं. उस रात वह सो नहीं सका. वह खिड़की के पास खड़ा हो कर अंधेरे आसमान को निहारता रहा. उस के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘देश में यह सब क्या हो रहा है? जहां ईमानदारी एक गुनाह बन गई है और बेईमानी एक काबिलीयत? कैसे सुधार होगा इस सिस्टम का? क्या वाकई इस अंधेरे से जीतने का कोई रास्ता नहीं है?’
तभी सत्यप्रकाश को अपने भीतर से एक आवाज सुनाई दी. उसे याद आया कि निराशा के सब से घने दौर में भी इनसान को अपने अंदर की उम्मीद को मरने नहीं देना चाहिए. हालात चाहे जितनी भी उलट हों, हवाएं चाहे जितनी भी खिलाफ हों, हार मान लेना कोई औप्शन नहीं था.
सत्यप्रकाश ने मन ही मन कहा, ‘प्रवाह में ठहराव है, मंजिल नहीं, पड़ाव है… रात भले ही सारी पड़ी हो और बाहर का अलाव बुझा सा हो, लेकिन मैं अपने भीतर के अलाव को बुझने नहीं दूंगा…’
सत्यप्रकाश को समझ आ गया कि सुधार रातोंरात नहीं होगा और न ही यह लड़ाई आसान है. लेकिन अगर हर कोई डर कर अपना उल्लू सीधा करने में लग गया तो यह समाज पूरी तरह अंधकार
में डूब जाएगा. भरत भूषण तिवारी जैसे लोगों की शहादत बेकार न जाए, इस के लिए किसी न किसी को तो मशाल थामे रखनी होगी.
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सड़कों पर पड़ी तो सत्यप्रकाश की आंखों में निराशा के आंसू नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था. उस ने अपनी डायरी उठाई, चप्पल पहनी और एक बार फिर नाइंसाफी के खिलाफ गवाही देने के लिए घर से निकल पड़ा. वह अकेला था, पर अब उसे भीड़ की परवाह नहीं थी.
Story in Hindi. अरमान सिंह खूंख्वार डाकू था. लोग उस का नाम सुनते ही कांप उठते थे. हत्या, अपहरण और लूट जैसे कई संगीन मामलों में पुलिस को उस की तलाश थी.
अरमान सिंह का बेटा था रमेश. स्मार्ट और शरीफ. वह कालेज में पढ़ता था, लेकिन कालेज के तमाम छात्र उस से कटेकटे से रहते थे. उस के बारे में कहा जाता कि ‘सांप का बच्चा आखिर सांप ही होता है’.
रमेश को अपने पिता की खुराफाती जिंदगी बिलकुल पसंद नहीं थी. उस ने कई बार उन से कहा भी था कि वे डाका डालना छोड़ दें, लेकिन हर बार अरमान सिंह के चेहरे पर फीकी मुसकान थिरक उठती. वह कहता, ‘बेटा, मैं जुर्म की दुनिया में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे मुड़ना मुमकिन नहीं. अगर मैं पीछे मुड़ना चाहूंगा, तो पुलिस मुझे मार डालेगी. बेहतर यही होगा कि मुझे मेरे हालात पर छोड़ दो. कभी न कभी तो मेरा अंत हो ही जाएगा.’
रमेश अपने पिता की मजबूरी जान कर चुप हो जाता था.
उस साल प्रदेश की सरकार समय से पहले गिर गई. नतीजतन, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. पहले जो गुंडे और डाकू बेखौफ हो कर घूमा करते थे, वे अब गीदड़ों की तरह मांदों में छिप कर रहने लगे. गांव के लोगों को नया बल मिला. वे बेखौफ हो कर गुंडों की खबर पुलिस को देने लगे.
एक दिन आधी रात के वक्त सन्नाटे को चीरती हुई दूर से फायरिंग की आवाज आ रही थी. इस आवाज से रमेश की नींद टूट गई. वह बेचैनी से कमरे में टहलने लगा.
अचानक उसे लगा, जैसे गोलीबारी की आवाज नजदीक आती जा रही है. उस ने खिड़की खोल कर बाहर झांका, तो उस के मुंह से चीख निकल गई. खून से लथपथ अरमान सिंह बदहवास सा भागा आ रहा था और पुलिस के दर्जनों जवान गोलियां बरसाते हुए उस का पीछा कर रहे थे.
रमेश के देखते ही देखते अरमान सिंह का जिस्म छलनी हो गया और वह अपनी आखिरी चीख के साथ वहीं ढेर हो गया. रमेश को अपने पिता की मौत का गम तो बहुत हुआ, पर दिल में कहीं न कहीं चैन का एहसास भी हुआ.
चौधरी दिलीप सिंह गांव के महाजन थे. गांव के गरीब और लाचार किसानों को कर्ज दे कर एक का 3 वसूल करना उन का धर्म था.
जब अरमान सिंह जिंदा था, तब वह चौधरी दिलीप सिंह से मासिक रंगदारी लिया करता था. कभीकभी ऐसा होता कि अगर अरमान सिंह को आने में देर हो जाती, तो चौधरी साहब खुद ही जा कर रंगदारी दे आते.
अरमान सिंह की मौत से चौधरी दिलीप सिंह भी आजादी का एहसास कर रहे थे.
घर में जो जमापूंजी थी, उसे रमेश ने श्राद्ध के समय ब्राह्मणों को दान वगैरह देने में खर्च कर दिया. कुछ दिनों बाद वह खुद भी एकएक चीज को तरसने लगा. गांव के लोग तो उस से कन्नी काटते ही रहते थे, कोई भी मदद करने को तैयार न था.
उस से किसी को भी हमदर्दी न थी, क्योंकि उन्हें यह यकीन था कि सांप का बच्चा सांप ही होता है. क्या पता कहीं दूध पिलाने वाले को ही डस ले.
फसल के कर्ज के लिए चौधरी साहब के दरबार में किसानों की भीड़ बढ़ने लगी थी. लोग वहां जाते, अपना दुखड़ा सुनाते, कर्ज लेते और चौधरी साहब का गुण गाते हुए लौट जाते.
एक दिन रमेश भी हिम्मत कर के चौधरी दिलीप सिंह के दरबार में जा पहुंचा. चौधरी साहब तब आराम फरमा रहे थे. उसे देखते ही वे बोले, ‘‘अरे बेटा, तुम… आओआओ, क्या काम है?’’
‘‘जी… आप तो जानते ही हैं कि खेती का समय है और मेरे पास फूटी कौड़ी तक नहीं है. अगर खादबीज के लिए कुछ पैसे दे देते, तो बड़ी मेहरबानी होती. फसल कटते ही मैं सूद समेत वापस कर दूंगा.’’
चौधरी साहब सोच में पड़ गए. वे रमेश को कर्ज नहीं देना चाहते थे और साथ ही उसे नाराज भी नहीं करना चाहते थे. इसलिए कुछ देर सोच कर वे बोले, ‘‘कर्ज देने में कोई हर्ज तो नहीं है बेटे… तुम कोई गैर थोड़े हो… लेकिन तुम देर से आए, मेरे पास जो पैसे थे, वे मैं किसानों में बांट चुका हूं…’’
फिर कुछ देर रुक कर वे बोले, ‘‘खैर, जब तुम मेरे पास आ गए हो, तो बेफिक्र रहो… 5-6 दिनों में मैं कोई न कोई इंतजाम कर ही दूंगा.’’
चौधरी साहब की मीठी बातों को रमेश अच्छी तरह जानता था. वह चुपचाप वहां से लौट आया.
रमेश के जाने के बाद चौधरी साहब चिंता में डूब गए कि कहीं यह सांप का बच्चा कोई गड़बड़ न कर दे.
सुबह रमेश चौधरी साहब के यहां कर्ज लेने गया था और उसी रात उन के यहां डाका पड़ गया. डाकू नकदी और काफी जेवर लूट कर ले गए. उन्होंने चौधरी साहब को खूब पीटा भी था.
डकैती होने के बाद पुलिस की कई जीपें गांव में आईं. थानेदार ने अपने कड़क पुलिसिया अंदाज में चौधरी साहब से कई सवाल पूछे. उस का आखिरी सवाल था, ‘‘क्या आप को किसी पर शक है?’’
चौधरी साहब ने कराहते हुए जवाब दिया, ‘‘हां, अरमान सिंह के बेटे रमेश पर मुझे शक है.’’
थानेदार की बांछें खिल गईं, ‘‘आप शक की बात करते हैं जनाब, उस का तो पूरा खानदान ही डकैतों का है. यह जरूर उसी के गिरोह का काम होगा. मैं अभी जा कर उस के घर की तलाशी लेता हूं. आप बेफिक्र रहिए.’’
थानेदार ने तुरंत अपने दलबल के साथ रमेश का घर घेर लिया और तलाशी ली. फिर उसे पकड़ कर थाने लाया और रातभर खूब पीटा गया. लेकिन पक्के सुबूतों और गवाहों के न होने के चलते उसे छोड़ दिया गया.
कानून की नजरों में रमेश बेकुसूर साबित हो चुका था, लेकिन समाज की नजरों में उस पर ऐसा काला धब्बा लगा, जिसे मिटाने में शायद सदियां लग जातीं.
लोगों के दिलोदिमाग में यह बात बैठ गई कि रमेश ने भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया है. इस तरह समाज के तमाम लोग उसे डर और नफरत की नजर से देखने लगे.
इस बात को कई महीने बीत गए. एक दिन की बात है, अचानक गांव की उत्तर दिशा में आग की लपटें उठती दिखाई पड़ीं. चारों ओर से लोग एकदूसरे को मदद के लिए पुकारते हुए दौड़ पड़े.
वहां का नजारा बड़ा ही डरावना था. चौधरी दिलीप सिंह की हवेली में आग लगी हुई थी. आग की लपटें पूरी हवेली को अपनी गिरफ्त में ले चुकी थीं.
काले बादलों की तरह हर तरफ आसमान में काला धुआं छा गया था. चारों ओर चीखपुकार मची थी. लोग बालटियों में पानी भरभर कर आग पर फेंक रहे थे, पर लपटें आकाश छूती जा रही थीं.
अचानक एक औरत की जोरजोर से चिल्लाने की आवाज उभरने लगी. लोगों ने देखा कि वह औरत चिल्लाती हुई आग की तरफ भागी जा रही है.
3-4 लोगों ने झट से उसे कस कर दबोच लिया. एक बोला, ‘‘अरे, यह तो चौधराइन है… पर यह आग की तरफ क्यों भागी जा रही है?’’
‘‘मरने का इरादा तो नहीं है?’’ दूसरे ने कहा.
चौधरी साहब की बीवी रोती हुई चिल्लाए जा रही थी, ‘‘मुझे छोड़ दो. मेरी बेटी जल रही है… कोई मेरी बेटी को बचा ले… हाय, मेरी बेटी…’’
सैकड़ों लोगों की नजरें जलती हवेली की तरफ उठी थीं. उन्होंने देखा कि चौधरी साहब की 7 साल की लड़की पिंकी लपटों के बीच घिरी छटपटा रही थी, पर किसी में यह हिम्मत न थी कि वह आगे बढ़ कर उस को बचा ले. कोई भी अपनी जान आफत में नहीं डालना चाहता था.
अचानक कंबल ओढ़े हुए एक नौजवान तेजी से आग की लपटों को चीरता हुआ पिंकी के पास जा पहुंचा. उस ने पलक झपकते ही पिंकी को कंबल में लपेटा और दोबारा लपटों को चीरता हुआ बाहर आ गया.
बाहर आते ही पिंकी कूद कर अपनी बेहाल मां से जा मिली, लेकिन तब तक उस नौजवान के शरीर में आग लग चुकी थी. वह तड़प कर गिर पड़ा. देखते ही देखते उस के बदन से आग की लपटें उठने लगीं. लोगों ने झट से उस पर पानी डाला, तो आग बुझ गई.
सब ने देखा कि अधजला रमेश दर्द से तड़प रहा था. चारों ओर मची अफरातफरी अचानक शांत हो गई. लोग सन्न खड़े रमेश को देख रहे थे.
उधर रमेश की आंखों के सामने अंधेरा तैरने लगा और इधर लोगों की नफरत पछतावे में बदलती चली गई.
रमेश ने अपनी बुझती आंखों से पिंकी की तरफ देखा. वह डरी हुई मां से चिपटी थी. रमेश के चेहरे पर संतोष की एक मुसकान उभरी और इस के साथ ही उस ने आखिरी सांस ली.
किसी ने दर्दभरी आवाज में धीरे से कहा, ‘‘काश, हम पहले यह समझ पाते कि रमेश डाकू नहीं है.’’
लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे. हवेली में लगी आग की लपटें बुझने लगी थीं, लेकिन बड़ीबड़ी चिनगारियां अभी भी धधक रही थीं.
चौधरी दिलीप सिंह आंखें बंद किए बुत बने खड़े थे, मानो अपनेआप से किसी सवाल का जवाब पूछ रहे हों. Story in Hindi
Emotional Hindi Story. रात के 11 बजे थे. शहर की चमकती सड़कों पर नियौन लाइटें ऐसे झिलमिला रही थीं मानो अंधेरे की देह पर किसी ने रंगीन कांच टांक दिए हों. रेलवे स्टेशन के सामने बने छोटे से होटल ‘सिल्वर पाम’ की तीसरी मंजिल पर बैठा राघव खिड़की से बाहर झांक रहा था. नीचे टैक्सियों की कतार थी, ऊपर आसमान में धुंध और भीतर उस के मन में एक अजीब खालीपन.
राघव राजस्थान के छोटे कसबे से पहली बार महानगर आया था. गांव के लोगों ने कहा था कि ‘मुंबई आदमी को या तो सोना बना देती है या धुआं’.
राघव पर्यटन कंपनी में नौकरी करता था. उस का काम बाहर से आने वाले पर्यटकों को शहर घुमाना था. दिनभर वह विदेशी सैलानियों को समुद्र, गेटवे औफ इंडिया, फिल्मी सितारों के बंगले और चमचमाते बाजार दिखाता, मगर रात होते ही शहर का दूसरा चेहरा सामने आ जाता.
उस रात कंपनी के मालिक ने कहा, ‘‘कुछ विदेशी मेहमान हैं, उन्हें नाइट लाइफ भी दिखानी पड़ेगी.’’
राघव झिझका. वह संस्कारों में पला लड़का था पर नौकरी की मजबूरी लोहे की बेड़ी होती है, चलना पड़ता है. वे लोग एक बार में पहुंचे. बाहर बड़े अक्षरों में लिखा था ‘मूनलाइट क्लब’. भीतर धुएं, शराब और तेज संगीत का ऐसा घालमेल था कि आदमी अपने विचार तक सुन न सके. मंच पर लड़कियां नाच रही थीं. चमकते कपड़े, बनावटी मुसकान और आंखों में थकान का गहरा समंदर.
राघव की नजर एक लड़की पर जा कर ठहर गई. उस का चेहरा बाकी लड़कियों से अलग था. नाचते हुए भी उस में एक उदासी थी, जैसे किसी ने चिडि़या के पंखों पर ग्लिटर तो लगा दिया हो, मगर उड़ान छीन ली हो.
कार्यक्रम खत्म होने के बाद वही लड़की पीछे गलियारे में मिली. उस ने पानी मांगा. राघव ने बोतल बढ़ाई.
लड़की मुसकराई, ‘‘थैंक्स.’’
‘‘नाम क्या है आप का?’’ राघव ने पूछा. ‘‘हमारे नाम बदलते रहते हैं साहब…’’ उस लड़की ने हलकी हंसी में कहा, ‘‘यहां असली नाम कोई नहीं पूछता.’’
कुछ देर बाद उस लड़की ने खुद बताया, ‘‘मेरा नाम मीरा है.’’
मीरा उत्तर प्रदेश के छोटे शहर से आई थी. पिता बीमार, घर कर्ज में डूबा और रिश्तेदारों की सलाह कि ‘शहर जा, कुछ काम कर’. काम की तलाश उसे इस बार तक ले आई थी.
‘‘लोग समझते हैं हम बड़ी ऐश में हैं…’’ मीरा बोली, ‘‘पर सच कहूं तो यहां हर रात आत्मा थोड़ाथोड़ा टूटती है.’’
राघव खामोश रहा. उसे लगा जैसे शहर की सारी रोशनी अचानक फीकी पड़ गई हो.
अगले कुछ दिनों में राघव की मुलाकात मीरा से होती रही. वह समझ गया कि बार की चमक बाहर वालों के लिए थी, भीतर तो कई जिंदगियां किस्तों में बिक रही थीं. कोई बहन की पढ़ाई चला रही थी, कोई मां का इलाज करा रही थी, कोई पति की मार से भाग कर यहां आ गई थी.
एक रात मीरा ने पूछा, ‘‘तुम्हें कभी डर नहीं लगता इस शहर से?’’ राघव हंसा, ‘‘लगता है पर गांव में भूख थी, यहां भीड़ है. आदमी आखिर जाए कहां?’’
मीरा कुछ देर तक चुप रही, फिर बोली, ‘‘सच कहूं… यहां लोग शरीर देखने आते हैं, इनसान नहीं.’’
मीरा के शब्द राघव के भीतर की दीवार पर हथौड़े की तरह लगे.
धीरेधीरे दोनों के बीच अपनापन बढ़ने लगा. राघव ने मीरा को सलाह दी कि वह कोई दूसरा काम ढूंढ़ ले.
मीरा मुसकरा देती, ‘‘गरीब आदमी के सपने भी किराए के मकान जैसे होते हैं साहब, कभी भी खाली करवाए जा सकते हैं.’’
लेकिन एक दिन अचानक बार पर पुलिस की छापेमारी हुई. अखबारों में खबरें छपीं. मालिक गायब हो गया. लड़कियां इधरउधर भटकने लगीं.
राघव ने मीरा को ढूंढ़ा. वह स्टेशन पर बैठी थी, हाथ में छोटा बैग और आंखों में टूटा हुआ आसमान लिए.
‘‘अब कहां जाओगी?’’ राघव ने धीरे से पूछा.
मीरा ने सूनी हंसी हंस दी, ‘‘शायद वापस घर या शायद किसी और शहर. गरीब की जिंदगी तो मेले में छूटे बच्चे जैसी होती है.’’
राघव ने पहली बार उस का हाथ पकड़ा, ‘‘अगर नई जिंदगी शुरू करना चाहो तो मैं मदद करूंगा.’’
मीरा की आंखें भर आईं. बरसों बाद शायद किसी ने उसे इनसान समझ कर बात की थी.
कुछ महीने बाद राघव ने अपने कसबे में छोटी पर्यटन एजेंसी शुरू की. वहां स्थानीय हस्तशिल्प, लोकनृत्य और गांव की संस्कृति दिखाने का काम होता था.
मीरा अब उसी एजेंसी में काम करती थी. वह विदेशी महिलाओं को राजस्थानी लोकगीत सिखाती, बच्चों को डांस सिखाती और कभीकभी मुसकरा कर कहती, ‘‘देखो, जिंदगी भी अजीब नाच है. कभी आदमी ताल पर नाचता है, कभी मजबूरी पर.’’
राघव जानता था कि कुछ घाव भरते नहीं, बस जीना सिखा देते हैं.
और शहर? वह आज भी चमक रहा था. बस फर्क इतना था कि अब राघव उस शहर की रोशनी के पीछे का अंधेरा पहचान चुका था. Emotional Hindi Story