Hindi Kahani: संकट मोचन

Hindi Kahani: ‘हां सब की इच्छा पूरी होती है.’ आजकल भगवानों में कारोबारी होड़ लगी हुई है. सब ने एक ऐसा स्लोगन ढूंढ़ निकाला है, जो आम आदमी को अपनी तरफ खींचता है. कहते हैं कि यहां सब की इच्छा पूरी होती हैऔर इस में कोई शक भी नहीं कि ज्यादातर लोगों की इच्छाएं पूरी होती हैं. 90 से 95 फीसदी तक, पर वे कैसे पूरी होती हैं? क्या यह किसी बाबा या भगवान का चमत्कार है या जो चंदा हम उस द्वार पर चढ़ाते हैं या फिर कोई मनोविज्ञान?

पहले तो हमें यह देखना होगा कि हम मांग क्या रहे हैं? मान लीजिए कि एक गरीब आदमी के पास एक टूटी हुई साइकिल है, जो रोजाना वर्कशौप में ही खड़ी रहती है. वह भगवान से एक साइकिल मांगता है और कहता है कि पुरानी ही देदे भगवान, बस रोजाना वर्कशौप ठीक कराने जाना पड़े. एक इनसान के पास एक ठीक सी साइकिल है, पर थोड़ी पुरानी हो गई है, वह भगवान से एक नई साइकिल की इच्छा रखता है.
एक इनसान, जिस के पास साइकिल है और 10-12 हजार रुपए हैं, वह एक पुराने स्कूटर या पुरानी मोटरसाइकिल की इच्छा रखता है और जिस के पास पुराना दोपहिया है, वह एक नए दोपहिया के लिए प्रार्थना करता है.

ठीकठाक दोपहिए वाला एक पुरानी कार की इच्छा रखता है और पुरानी कार वाला एक नई कार की. और इसी तरह एक छोटी कार वाला एक बड़ी कार की. कोई लड़का या लड़की अच्छे कालेज में दाखिले की, फिर अच्छी नौकरी की. कोई बहनबेटी की शादी की. खतरनाक बीमारी हो गई है, तो उस के ठीक होने की. सड़क पर सोता होगा तो ?ाग्गी की और ?ाग्गी में सोता होगा तो एक किराए के कमरे की, किराए के 3 कमरे हों तो  अपना हो जाए चाहे एक ही हो. और अगर एक कमरा है तो 2 कमरे, 2 हों तो 3 कमरेऔर इन में से ज्यादातर लोगों की तमन्ना पूरी हो जाती है. किसी गरीब आदमी की ?ाग्गी की छत बहुत ठीक होने के चलते उस में बारिश में पानी टपकता है या सर्दीगरमी में ठंड और गरमी लगती होगी, तो वह भगवान से यही कहता होगा कि कुछ पैसे जाएं, तो मैं छत ठीक करवा लूं.

क्यों और कैसे यह इच्छा पूरी होती है, क्योंकि वह भक्त अपनी इच्छा पूरी करने के काफी करीब है, वह उस को पाने वाला ही है, कोशिश तो वह कर ही रहा है और वह अपनी इच्छा पूरी करने में सक्षम है और उस की इच्छा बहुत बड़ी भी नहीं है. टूटी हुई साइकिल वाले के लिए पुरानी ठीक साइकिल, पुरानी ठीक साइकिल वाले के लिए नई साइकिल और नई साइकिल वाले के लिए पुराना स्कूटर, पुराने स्कूटर वाले के लिए नया स्कूटर और नए स्कूटर वाले के लिए पुरानी कार और पुरानी कार वाले के लिए नई कार और छोटी कार वाले के लिए बड़ी कार की इच्छा पूरी होने की बहुत ज्यादा उम्मीद रहती है. सड़क पर सोने वाले के लिए ?ाग्गी, ?ाग्गी वाले के लिए किराए के कमरे की इच्छा पूरी होने की बहुत ज्यादा उम्मीद रहती है. ये सब लोग अपने मकसद के बहुत करीब हैं.

बहनबेटी का ब्याह भी हो ही जाएगा, चाहे जो भी लड़का मिलेगा. बेटेबेटी का भी कालेज में दाखिला होगा और कहीं कहीं नौकरी भी लग ही जाएगी. शुरू में कम और बाद में ज्यादा तनख्वाह की नौकरी लग जाएगी. आज के हालात और इच्छा में आर्थिक अंतर जितना कम होगा, उतनी ही इच्छा पूरी होने की उम्मीद ज्यादा और जल्दी रहेगी. जितना अंतर ज्यादा होगा, उतना समय ज्यादा लगेगा और उम्मीद कम हो जाएगी या फिर उस इच्छा को पूरा करने के लिए गलत रास्ता अपनाना होगा. अगर टूटी हुई साइकिल का मालिक एक नई मोटरसाइकिल की इच्छा करने लगे तो उस की उम्मीद कम हो जाएगी और इच्छा पूरी हुई तो बहुत ज्यादा समय लगेगा. अगर एक किराए के कमरे में रहने वाला कोठी की तमन्ना करने लगे तो
उस की उम्मीद बहुत कम हो जाएगी और हो सकता है कि एक पीढ़ी भी पार कर जाए.

एक आदमी जिस के पास साइकिल है और 10-12 हजार रुपए हैं, तो सम?ों कि आप की इच्छाएं कैसे पूरी हो रही हैं. गांव के लोगों की इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, क्योंकि उन की इच्छाएं होती ही नहीं हैं. इच्छाएं क्यों नहीं होतीं, क्योंकि उन की जेब में पैसे ही नहीं हैं. वे किसी भी इच्छा को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए वे भगवान के द्वार अपनी अर्जी नहीं लगाते हैं. मु? ऐसे फोन आते हैं कि आप लक्ष्मी, हनुमान, गणेश किसी एक का लौकेट खरीद लें, जो ओरिजनल है (बाजार में डुप्लीकेट भी हैं), आप की सब इच्छाएं पूरी हो जाएंगी और आप के घर लक्ष्मी बरसेगी. कीमत मात्र 3,000 रुपए. मैं ने उस से कहा कि मु? 100 लौकेट दे दें, लेकिन मैं अभी पैसे नहीं दूंगा. मैं  उन को भारत के किसी गरीब गांव में जा कर बांट दूंगा और एक साल बाद जा कर देखूंगा कि कितने लोगों के घर लक्ष्मी बरसी है.

अगर उन में से 50 फीसदी लोग भी अमीर (पेटभर पौष्टिक भोजन, बच्चों को पढ़ाईलिखाई, कपड़े, बड़ों को स्कूटर) हो गए होंगे, तो मैं आप को 6,000 के हिसाब से 3 लाख के बदले 6 लाख दूंगा. इस के बाद से उस का फोन आना बंद हो गया यानी कोई चमत्कार, बाबा या भगवान कुछ नहीं कर रहा. आप ही कर रहे हैं.
एक स्लोगन है किभगवान उन की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैंतो फिर भगवान क्या करता है? यानी मु? ही कुछ करना है और मैं कर भी रहा हूं, तभी तो मेरी समस्याएं दूर हो रही हैं.
भगवान, अल्लाह, गौड से मेरा मतलब सर्वशक्तिमान यानी सुपर पावर से है.   Hindi Kahani

Hindi Story: गली के कुत्ते

Hindi Story: रा के तकरीबन साढ़े 10 बज रहे थे. शहर की सड़कों पर हलकीहलकी ठंड उतर आई थी. सड़क किनारे बंद होती दुकानें. झिलमिलाती स्ट्रीट लाइट्स. बीचबीच में भागते आटोरिकशा और मोटरसाइकिलें. यह वही शहर था, जो कभी पूरी तरह सोता नहीं था. बस, कुछ घंटों के लिए आंखें मूंद लेता था.
आर्या औफिस से लौटते हुए बस से उतर कर पैदल घर की ओर बढ़ रही थी. बस स्टौप से घर तक का रास्ता मुश्किल से 10 मिनट का था. पर इन 10 मिनट में वह रोज जाने कितनी दुआएं पढ़ लेती थी.
आर्या के कानों में ईयरफोन नहीं थे. मोबाइल भी हाथ में नहीं था, क्योंकि उस ने बहुत पहले सीख लिया था कि रात की सड़कें सजग रहने वालों का इम्तिहान लेती हैं.

उस गली में कदम रखते ही आर्या ने हलकी सी सीटी बजाई. सीटी की आवाज सुनते ही गली के कोने से
3-4 कुत्ते निकल आए. ये कोई नए कुत्ते नहीं थे. ये वही थे जिन्हें वह महीनों से जानती थी. औफिस से लौटते वक्त वह अकसर उन के लिए बिसकुट ले आती थी. वीकैंड पर उन्हें रोटी खिलाए बिना उस के दिन की शुरुआत नहीं होती थी. जब भी महल्ले के डौग लवर्स उन कुत्तों को टीका लगवाने का इंतजाम करते, आर्या भी बढ़चढ़ कर उन की मदद करती. कुत्तों के इलाज और देखभाल में अकसर वह सब से आगे रहती. बरसात में उन के लिए टिन की शैड बनवाने का विचार भी उसी का था. उस छोटे से इंतजाम ने सर्दी और बारिश में गली के कुत्तों को बड़ी राहत दी थी. यही वजह थी कि वे आर्या की आहट पहचानते थे. उसे अपना मानते थे.

आर्या भी जानती थी कि ये कुत्ते भरोसेमंद हैं, क्योंकि ये अपनी हद जानते हैं. हवस की आग में ये पागल हो कर इधरउधर नहीं भटकते और सब से जरूरी बात यह कि ये गली को अपना घर मानते थे. इन दिनों कुत्तों को ले कर शहर में खूब विवाद चल रहा था. अखबारों में सुर्खियां थीं. टीवी डिबेट में शोर था. कोई कहता था सड़क के कुत्ते खतरनाक हैं. कोई उन्हें हटाने की मांग कर रहा था. पर आर्या जानती थी कि असल खतरा दांतों से नहीं, नीयत से होता है. गली के एक बुजुर्ग अकसर कहते थे, ‘‘बेटा, जिस कुत्ते को रोज खाना मिलता है और इलाज होता है, वह गली का पहरेदार बन जाता है.’’ उन की यह बात आर्या के दिल में उतर गई थी.

जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ी, पीछे से बाइक का इंजन दहाड़ा. 2 लड़के थे. सिर पर हैलमैट नहीं. चेहरे पर बेहूदा आत्मविश्वास. एक ने कहा, ‘‘ओए देख, नाइट शिफ्ट वाली रही है.’’ दूसरा हंसा, ‘‘चल, मजे लेते हैं.’’ आर्या का दिल जोर से धड़कने लगा. उस ने कदम तेज कर दिए. पीछे से फिर आवाज आई, ‘‘डर क्यों रही हो जानेमन, हम तो आशिक हैं तुम्हारे. इन कुत्तों से कितना दिल लगाओगी, थोड़ा हम से भी लगा लो. कसम से मजा बहुत आएगा.’’ आर्या के मन में एक वाक्य कौंध गया, ‘गली का कुत्ते गली के इन वहशी लड़कों से कहीं बेहतर होते हैं. वे कम से कम इज्जत की हद जानते हैं.’ उस ने फिर से सीटी बजाई. इस बार आवाज तेज थी. कुत्ते तुरंत उस के चारों ओर गए. एक आगे. 2 पीछे. एक बगल में. बाइक जैसे ही पास आई, कुत्तों ने एक साथ भौंकना शुरू कर दिया. तेज, आक्रामक, चेतावनी भरी लहजे में.
एक लड़का घबरा गया, ‘‘अबे चल, ये काट लेंगे.’’ दूसरा भी बोला, ‘‘छोड़ यार, आज नहीं.’’

बाइक लड़खड़ाई और वापस मुड़ गई. गालियां देते हुए वे दोनों अंधेरे में गायब हो गए. आर्या वहीं खड़ी रह गई. उस के हाथ कांप रहे थे. पर इस बार डर से ज्यादा गुस्सा था. उस ने ?ाक कर कुत्तों के सिर पर हाथ फेरा. वह पूंछ हिलाने लगे. जैसे कह रहे हों, ‘तुम निश्चिंत रहो, यह हमारी गली है और हम तुम्हारे साथ हैं.’
घर पहुंचते ही मां ने पूछा, ‘‘आज फिर देर हो गई.’’ आर्या बोली, ‘‘हां मां, कुछ छिछोरे कुत्ते पीछे लग गए थे.’’ मां ने पूछा, ‘‘सब ठीक तो है ?’’ आर्या ने कहा, ‘‘हां मां, गली के कुत्ते साथ थे.’’ मां हलकी मुस्कुराईं, ‘‘अच्छा है. आजकल इनसानों से ज्यादा वही भरोसेमंद हैं.’’ अगले दिन औफिस में आर्या ने जब यह सारी घटना सुनाई. किसी ने कहा, ‘‘समाज के लिए असली खतरा ये 2 टांगों वाले कुत्ते ही हैं, जो
दुनिया को अपनी हवस के चश्मे से देखते हैं.’’

किसी ने कहा, ‘‘नगरनिगम को इन कुत्तों पर भी नकेल कसने की योजना लानी चाहिए. सड़क पर घुमते वहशी जानवर सोसाइटी के लिए बड़ा खतरा हैं.’’ आर्या शांत स्वर में बोली, ‘‘सच में, खतरनाक वे कुत्ते नहीं हैं जिन्हें रोटी नहीं मिलती, बल्कि खतरनाक वह ठरक है जिसे संस्कार मिलता है, सही इलाज.’’
उस दिन से कुत्तों के लिए आर्या के मन में इज्जत बढ़ गई थी. गली के कुत्तों के लिए अब और लोग आगे आने लगे थे. सही देखभाल मिलने पर कुत्तों का बरताव और संतुलित हो गया. धीरेधीरे गली बदलने लगी. मनचले गायब हो गए. रातें थोड़ी सुरक्षित हो गईं. आर्या अब निडर हो कर घर लौटती है. वह जानती है. इस गली में कुत्ते सिर्फ जानवर नहीं हैं. वे पहरेदार हैं. दोस्त हैं और कई बार इनसानों से ज्यादा इनसान हैं.
इस सड़क पर आज भी 2 तरह के कुत्ते हैं. एक वे जो भूख में भौंकते हैं और दूसरे वे जो हवस में नोंचने को दौड़ते हैं. पहले वाले गली की शान हैं, दूसरे समाज का कलंक.                   

Hindi Story: सही फैसला

मिन्नी कम उम्र की एक शहीद की विधवा थी और बच्ची की मां भी. इधर मेहुल भी पत्नी की मौत के बाद अपने बच्चों को अकेले पाल रहा था. फिर होली आई और गलती से मेहुल ने मिन्नी को रंग लगा दिया. आगे क्या हुआ? मिन्नी का पूरा नाम मीनाक्षी था. मेहुल जबजब दिव्या के घर जाता था, मिन्नी दिखाई पड़ जाती थी. उस को शुरूशुरू में मिन्नी को ले कर उत्सुकता थी, लेकिन दिव्या भाभी से मिन्नी की दुखी जिंदगी के बारे में जो कहानी सुनी थी, उस से उस को सारी बातें पता चली थीं. मिन्नी दिव्या के बड़े ताऊ की एकलौती बेटी थी. मांबाप बहुत पहले ही मर गए थे, लिहाजा उस का लालनपालन दिव्या के घर में ही हुआ था. उस के पिता 2 भाई थे. बहुत सारी जमीन थी. घर में मनों अनाज होता था. रुपएपैसे की कोई कमी नहीं थी.
मांबाप के मरने के बाद मिन्नी की पढ़ाईलिखाई उस के चाचाजी ने एक पिता की तरह से ही की थी. उन्होंने मिन्नी को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

मिन्नी पढ़नेलिखने में भी होशियार थी. हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती थी. बचपन बीतने के बाद और पढ़ाईलिखाई करने के बाद चाचाजी ने उस की शादी कर दी. शादी के तुरंत बाद ही मिन्नी के पति की मौत हो गई थी. सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए सचिन शहीद हो गया था. पति की मौत के बाद मिन्नी गांव के स्कूल में पढ़ाने लगी थी. वह अपने पैरों पर खड़ी औरत थी. आज के समय की औरत. चुनौतियों से लोहा लेने वाली. पढ़ीलिखी स्वाभिमानी औरत. जबजब मेहुल की नजर मिन्नी पर पड़ती तो वह बस देखता ही रह जाता. मेहुल पास में ही रहता था और दिव्या के घर में उस का आनाजाना था. मिन्नी का गोरा चेहरा, पतली लंबी नाक, भरा हुआ बदन. कोई चाहता भी तो मिन्नी को देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था, फिर तो मेहुल आदमी था. वह 77 साल का था. उस की पत्नी हेमा जिस की उम्र जब महज 25 साल थी. दूसरे बच्चे को जन्म देते समय चल बसी थी. इस का दुख मेहुल को हमेशा दिल में सालता रहता था.

लेकिन? इधर मिन्नी के में जैसी आवाज ही नहीं थी. सचिन की मौत से उस को सदमा सा लगा था. वह हंसना जैसे भूल गई थी. गोद में एक बच्ची थी. उस का दुख और उस के भविष्य के बारे में सोचती तो दिल में जैसे नश्तर से चुभते थे. मिन्नी की शादी भी 24 साल की उम्र में हो गई थी. शादी के महज सालभर बाद ही सचिन की मौत हो गई थी. मिन्नी की कहानी वह दिव्या भाभी के मुंह से सुन चुका था. बेचारी मिन्नी ने इतनी कम उम्र में विधवा होने का दर्द ?ोला था. एक कली जो ठीक से फूल भी नहीं बन सकी थी, मुर?ाई हुई सी रहने लगी थी. ऐसा जबतब बतियाते हुए दिव्या भाभी की रुलाई फूट पड़ती थी. इस बार दिव्या के पति संतोष उसे लिवाने नहीं आए थे. दुकान के काम से सूरत चले गए थे. होली सिर पर थी. मेहुल का अब इस दुनिया में 2 बच्चों के सिवा कोई नहीं था. घर पर दोनों भाभियों और मां के भरोसे उस ने बच्चों को छोड़ रखा था और दिव्या भाभी को लिवाने बनारस चला आया था.

दिव्या भाभी बतातीं कि दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है. जब मिन्नी के पति की मौत हो गई तो ससुराल वालों ने मिन्नी को बहुत बुराभला कहा. यहां तक कि मनहूस तक कह दिया. उस को घर से निकाल दिया. दिव्या भाभी के मांबाप  और भाई सब लोग समझते रहे. इस में मिन्नी की क्या गलती है भला. लेकिन वे मिन्नी को घर से निकाल कर ही माने. मायके में चाचा चाची और भाई तो हालांकि कुछ कहते, लेकिन भाभियों को वह फूटी आंख नहीं सुहाती थी. यही वजह थी कि मिन्नी घर में सब से किनारे के कमरे में रहती थी. वह मुफ्त में खाना नहीं खाती थी, बदले में घर बरतन कर देती थी, कपड़े धो देती थी, ताकि उस को कोई मुफ्तखोर कहे. लेकिन इतना करने के बाद भी कोई किसी का मुंह थोड़े ही पकड़ सकता है. जिस के जो मन में आता, वही कह देता. मेहुल यह सब सुन कर दुखी हो जाता था. अगले दिन होली थी. मेहुल मन बना कर आया था कि वह इस बार दिव्या के साथ जम कर होली खेलेगा. बैठक में पकवान बन रहे थे. मेहुल बाहर गया तो चौपाल पर महफिल सजी थी. मेहुल भी बैठ गया. खूब भांग पी.

दोपहर हो गई. मेहुल को भूख लग गई थी. वह वापस घर गया तो देखा कि दिव्या अपनी भाभियों के साथ होली खेल रही थीइसी बीच मेहुल ने दिव्या से कहा, ‘‘भाभी कुछ नमकीन ले कर आओ.’’ दिव्या ने नहीं सुना, लेकिन मिन्नी बाहर ही बैठी थी. वह प्लेट में नमकीन लाने चली गई. इधर मेहुल कमरे में जा कर हथेली पर रंग मलने लगा. सामने ही रंगों से भरा हुआ ड्रम रखा था, जिस में घोला हुआ रंग पड़ा था.
इसी बीच मिन्नी कमरे में नमकीन देने मेहुल के पास चली गई. मेहुल को लगा शायद भाभी नमकीन ले कर आई है. मेहुल ने हथेली पर मला हुआ रंग मिन्नी के गालों पर मल दिया. धोखा दिव्या और मिन्नी के कपड़ों से हुआ था. दोनों ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. तब तक दिव्या भी कमरे में गई थी. वह हंसते हुए बोली, ‘‘क्यों देवरजी, खा गए धोखा.’’ मेहुल बोला, ‘‘भाभी, आप दोनों ने एकजैसे कपड़े पहन रखे थे, इसलिए धोखा हो गया.’’

मिन्नी के चेहरे पर मिलेजुले भाव थे. एक तरफ खुश थी कि कई सालों के बाद किसी ने उस पर रंग डाला था और दुखी सामाजिक मर्यादा को ले कर थी कि भला समाज और लोग क्या कहेंगे. दिव्या ने छेड़ा, ‘‘अच्छा बच्चू, भाभी को छोड़ कर भाभी की बहन से होली खेली जा रही है.’’ ‘‘अभी आप की शिकायत दूर किए देता हूंरुकिए,’’ और हाथ में बचा हुआ गुलाल उस ने दिव्या के गालों पर मल दिया. मिन्नी ने भी ड्रम में पड़ा हुआ रंग मेहुल पर पिचकारी से दे मारा. इस तरह भाभी और मिन्नी के साथ वह बहुत देर तक रंग और गुलाल से होली खेलता रहा. शाम के समय लोग अबीर खेल रहे थे. बैठक में सब लोग बैठे हुए थे. मिन्नी ठंडाई ले कर आई. अचानक मेहुल के मुंह से निकला, ‘‘दिव्या भाभी, मैं एक बात कहना चाहता हूं. हेमा के मरने के बाद से मेरी जिंदगी तहसनहस हो गई है. मैं बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रहा हूं. घरबाहर दोनों जगह आखिर मैं कैसे संभालूंगा

जब तक मां हैं, चल रहा हैउस के बाद सोचता हूं, तो कलेजा मुंह को आने लगता है. मैं चाहता हूं कि मिन्नी से शादी कर लूं.’’ दिव्या के पिताजी को हैरानी हुई. वे बोले, ‘‘बेटा, मिन्नी हमारी बेटी है. लेकिन तुम्हें मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहता. बेटा, मिन्नी विधवा है. उस को एक बेटी है, फिर भी तुम उस से शादी करना चाहते हो…’’ दिव्या बोली, ‘‘पिताजी, कई बार मेरे मन में भी यह खयालआया था, लेकिन देवरजी से कहते डरती थी. पता नहीं वे क्या सोचेंगे. लेकिन आज मैं ने होली खेलते हुए देख लिया कि मेहुल का मन कितना पवित्र है. ‘‘दरअसल, मैं ने और मिन्नी ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. मेहुलजी को धोखा हो गया.  मिन्नी पर रंग डाल दिया था. तब से अपनी गलती का पछतावा करना चाह रहे हैं. ऐसा भला आदमी कहां मिलेगा. इन की भलमनसाहत है कि  मिन्नी से माफी मांगने लगे थे.
‘‘जब से यह घटना हुई है, ये आंख नहीं मिला पा रहे हैं.  खैर इन का रिश्ता बनता है, लेकिन अब ये मिन्नी से शादी करना चाहते हैं.’’

मेहुल बोला, ‘‘हां पिताजी, मिन्नी विधवा हो गई तो इस में भला उस की क्या गलती है. लोगों को उस को भला ताने देना का हक किस ने दे दिया है. यह तो गर्व की बात है कि वह एक शहीद की विधवा है, जिस ने देश के लिए अपनी जान की कुरबानी दी है, लेकिन लोग शहीद की विधवा से कैसा बरताव कर रहे हैं, देख लीजिए. ‘‘क्या किसी विधवा को समाज में जीने का हक नहीं है? क्या किसी विधवा को खुश रहने का हक नहीं है? अगर नहीं है तो मैं परवाह नहीं करता ऐसे समाज की, जिस की जड़ें खोखली हों. ‘‘इस के अलावा 3-3 बच्चों की जिम्मेदारियों के बारे में भी सोचिए. उन की परवरिश करने का भी तो सवाल है. आखिर ये बच्चे कैसे पलेंगे, इस के बारे में भी सोचिए जरा. इन तीनों बच्चों की जिंदगी में खुशियां लौट आएंगी.’’

‘‘ठीक है बेटा, जब तुम ने और दिव्या ने फैसला कर ही लिया है, तो इस से बड़ी खुशी की बात भला और क्या होगी. होली के बाद किसी दिन लगन रखवाता हूं,’’ मिन्नी के पिताजी बोले. आज मिन्नी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह बहुत खुश थी. आज से कोई उस को मनहूस नहीं कहेगा. उस का भी कोई चाहने वाला होगा. उस का भी अब कोई अपना घर होगा. मिन्नी की मांग भरने वाली थी. उस की वीरान जिंदगी में बहार आने वाली थी. एक शहीद पिता की बच्ची को एक नए पिता मिल गए थे. आज आसमान में इंद्रधनुष निकला था. सात रंगों का चमकीला इंद्रधनुष.                  

Hindi Story: ‘शेयर’ का इस्तेमाल

Hindi Story: संदीप को पुलिस महकमे में सबइंस्पैक्टर बने अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था. नए जोश, नए सपने और एक सच्चा पुलिस वाला बनने के वादे के साथ वह काम में जुटा हुआ था.
एक सुबह पुलिस हैडक्वार्टर से एक कांस्टेबल संदीप के दफ्तर में आया. वह सलाम ठोंकते हुए जोर से बोला, ‘‘जय हिंद सर,’’ और फिर जेब से एक सफेद लिफाफा निकाल कर संदीप की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘बड़े साहब ने आप के लिए भेजा है.’’

संदीप ने कौतूहल से लिफाफा खोला. भीतर ?ांक कर देखा कि 500 रुपए के 20 नोट सलीके से रखे थे. एक पल को वह कुछ सम? ही नहीं पाया. उस ने कांस्टेबल से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’ कांस्टेबल ने कंधे उचकाए, जैसे उसे खुद कुछ पता हो और चुपचाप जाने की इजाजत मांगने लगा. शक बढ़ चुका था. संदीप ने उसे रोकते हुए बड़े साहब को फोन लगाया.

‘‘जय हिंद सर,’’  कहते हुए ने संदीप सारी बात बताई और पूछा, ‘‘सर, ये पैसे?’’
साहब की आवाज आई, ‘‘हां
हांरख लो. यह तुम्हारा शेयर है इस महीने का.’’
अब सारी तसवीर साफ हो चुकी थी. यहशेयरदरअसलघूसके जमा होने वाले पैसे का हिस्सा था, जो महकमे में बड़ी नियमितता से बंटा करता था.
संदीप स्वाभिमानी नौजवान था. उसे रिश्वत, घूस, दहेजसब से चिढ़ थी. उस ने पुलिस की नौकरी इसीलिए चुनी थी, ताकि समाज और देश के लिए कुछ कर सके. फोन पर उस ने कहा, ‘‘सर, मु? इस की जरूरत नहीं है. मैं इसे वापस भेज रहा हूं.’’
उधर से जवाब आया, ‘‘अरे, क्यों ड्रामा कर रहे हो? सब लेते हैं. तुम्हारा हक है यह.’’
संदीप ने हिम्मत जुटा कर कहा, ‘‘सर, मेरे आत्मसम्मान के खिलाफ
है यह.’’

अब आवाज का लहजा सख्त हो चुका था, ‘‘मतलब हम सब बेईमान हैं? ठीक है, भेज दो वापस.’’
कुछ पल की चुप्पी के बाद संदीप सम? गया कि अगर वह सिस्टम में बना रहना चाहता है, तो विरोध करना आसान नहीं होगा. कुछ सोच कर उस ने धीरे से कहा, ‘‘सौरी, सर. ठीक है, मैं रख लेता हूं.’’
‘‘गुड,’’ इतना कह कर फोन कट गया.
हाथ में लिफाफा थामे बैठे संदीप के भीतर मानो तूफान उठ रहा था. नई नौकरी, बढ़ती जिम्मेदारियां और स्वाभिमान, तीनों एकदूसरे से लड़ रहे थे. वह सम? चुका था कि यह लिफाफा अब हर महीने आया करेगा. सवाल यह था, इस का क्या करे?

उसी शाम संदीप ने बाहर ?ांक कर देखा, सामने के सरकारी स्कूल से कुछ बच्चे फटे हुए बस्तों और घिसी हुई चप्पलों के साथ घर लौट रहे थे. उन की आंखों में पढ़ाई का जोश तो था, पर साधन कम थे. बस, यहीं उसे जवाब मिल गया. अगले ही दिन संदीप ने उन्हीं पैसों से कौपी, किताबें, पैनपैंसिल और कुछ स्कूल बैग खरीदे. फिर स्कूल के प्रिंसिपल से मिल कर बताया कि वह इन सामग्री को जरूरतमंद बच्चों में बांटना चाहता है. प्रिंसिपल ने मुसकरा कर सहमति दे दी.

कार्यक्रम रविवार को रखा गया.
संदीप ने जानबू? कर बड़े साहब को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया. साहब बड़े गर्व के साथ आए, यह सोच कर कि शायद महकमे की इमेज सुधारने का यह अच्छा मौका है. जब बच्चों में सामग्री बांटी जाने लगी, तो छोटेछोटे हाथ मुसकान के साथ आगे बढ़ते गए. बड़े साहब के चेहरे पर भी संतोष की ?ालक थी. बच्चे उन्हें धन्यवाद दे रहे थे, फोटो खिंच रहे थे और बड़े साहब गर्व से सीना फुलाए खड़े थे. उन्हें यह नहीं पता था कि सामग्री उन्हीं के भेजेशेयरसे खरीदी गई है.


संदीप एक तरफ खड़ा यह सब देख रहा था. उसे ग्लानि थी, पछतावा. बस मन में यह संतोष था कि कम से कम गलत पैसे का इस्तेमाल सही जगह हो रहा है. कार्यक्रम खत्म हुआ. लौटते समय बड़े साहब ने संदीप के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘अच्छा काम किया है. संदीप. समाजसेवा ऐसे ही होती है.’’संदीप मुसकराया, ‘‘थैंक यू, सर,’’ पर उस के मन में एक विचार धीरे से उभरा, ‘अगर सारी रिश्वतें इसी तरह समाज में लौट जाएं, तो शायद देश का आधा दर्द कम हो जाए.’


लेकिन हकीकत यह थी कि यह अपवाद था, नियम नहीं. उस रात संदीप देर तक सोचता रहा कि, क्या उस ने सही किया? शायद हां, क्योंकि उस ने स्वाभिमान और सिस्टम के बीच एक सेतु बना लिया था. रिश्वत स्वीकार नहीं की, पर उसे समाज के लिए समर्पित कर दिया. उसे लगा, ‘अगर मैं इसे ठुकरा दूंगा तो कोई कोई दूसरा लेगा ही और साहब दूसरे पदाधिकारियों की नाराजगी भी ?ोलनी पड़ेगी, सो अलग.
कम से कम इस से किसी जरूरतमंद का भला तो हो रहा है, क्योंकि ईमानदारी सिर्फ घूस लेने में नहीं, सही जगह देने में भी होती है.’


यह समाधान पूरी तरह सही नहीं था, पर गलत भी नहीं था. समय बीतने लगा. हर महीने वही लिफाफा आता रहा. संदीप भी हर बार उस से कुछ कुछ सामाजिक काम करता. कभी बच्चों के जूते, कभी दीवाली पर मिठाइयां, कभी गरीब मरीजों की दवाएं. धीरेधीरे लोग उसेसमाजसेवी अफसरकहने लगे, पर असल वजह कोई नहीं जानता था.


एक दिन वही बड़े साहब निरीक्षण पर आए. उन्होंने देखा कि थाने में व्यवस्था अच्छी है, जनता का सम्मान हो रहा है, शिकायतें सुनी जा रही हैं. जाते समय हलकी मुसकान के साथ वे बोले, ‘‘तुम्हारे अंदर ईमानदारी भी है और संवेदनशीलता भी. सिस्टम में रह कर ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं.’’ संदीप ने शांत भाव से कहा, ‘‘सर, सिस्टम में रहते हुए भी इनसान रहना जरूरी है.’’ संदीप की बातें सुन कर साहब गंभीरता से मुसकराने लगे. शायद वे सम? चुके थे कि संदीप ने स्वाभिमान के साथ सिस्टम और समाज में बने रहने का रास्ता निकाल लिया है.       

Hindi Story: नौजवान इंजीनियर और मौत का गड्ढा

Hindi Story: रविवार की सुबह थी. विजय घर पर अकेला था. उस के मातापिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे. आज विजय ने ठान लिया था कि घर के पीछे के आंगन में वह गड्ढा खोद कर ही दम लेगा. दरअसल, उसे एक पूरा का पूरा पेड़ शिफ्ट करना था. चूंकि पेड़ बड़ा था, तो उस ने अंदाजे से 8 फुट गहरा गड्ढा खोद डाला था.


आप सोच रहे होंगे कि पेड़ को कैसे शिफ्ट करते हैं? अमूमन तो पौधा ही लगाया जाता है, पर पूरा का पूरा पेड़ कैसे जड़ समेत मिट्टी में बोया जाता है? इस तकनीक में किसी पेड़ को उस की वर्तमान जगह से उठाने के लिए खास तरह के उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है या पेशेवरों को बुलाया जाता है. शाखाओं या जड़ों (रूट बौल) को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए पेड़ को सावधानी से संभालें. पेड़ को एक मजबूत गाड़ी पर रखें, यह पक्का करते हुए कि पेड़ पूरी यात्रा के दौरान हिलेडुले , उसे किसी तरह का नुकसान हो.


विजय यह एक्सपैरिमैंट कर रहा था. वह गड्ढा खोदने में इतना मशगूल था कि मिट्टी को गीला करने के लिए जो नल उस ने चलाया था, उस में लगा पाइप धीरेधीरे उस गड्ढे को भर रहा था. चूंकि विजय शारीरिक काम कर रहा था, तो उसे गरमी लग रही थी. धूप भी खिली थी. इसी बीच कब वहां अनामिका आई, उसे पता ही नहीं चला. विजय को मिट्टी में सना देख कर अनामिका को एक खुराफात सू?. उसे पता नहीं था कि गड्ढा कितना गहरा है. उसे लगा कि आज मड बाथ लिया जाए. वैसे भी घर पर कोई नहीं है.


अनामिका चुपके से विजय के पीछे गई उसे धक्का दे कर गड्ढे में धकेल दिया. अचानक हुए इस हमले से विजय हैरान रह गया. पर चूंकि अभी गड्ढा सिर्फ 5 फुट तक भरा था, तो उसे ज्यादा महसूस नहीं हुआ.
विजय ने अनामिका को देखा, तो हंस कर बोला, ‘‘इस गड्ढे में मैं अकेला क्या करूंगातुम भी जाओ.’’
अनामिका भी गड्ढे में कूद गई. वे दोनों अब वहां मस्ती करने लगे. अनामिका का मिट्टी से सराबोर बदन विजय को ललचा रहा था. उस ने अनामिका को बांहों में भर लिया और चूमने लगा.


अनामिका भी उस का साथ देने लगी. इसी बीच गड्ढे में पानी अभी भी भर रहा था. जब अनामिका की गरदन से पानी ऊपर हुआ, तो वह थोड़ा सतर्क हो गई और बोली, ‘‘चलो, अब हम बाहर निकलते हैं.’’
पर जैसे ही विजय ने उचक कर बाहर निकलने की कोशिश की, वह फिसल गया. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की, पर नाकाम रहा. अनामिका ने कहा, ‘‘लगता है, ऐसे बाहर नहीं निकला जाएगा. तुम मु? उठाओ. पहले मैं बाहर निकलती हूं.’’


विजय ने ऐसा ही किया. अनामिका तो बाहर चली गई, पर वह जैसे ही विजय को खींचने लगी, तो मिट्टी लगी होने की वजह से दोनों के हाथ बारबार फिसल रहे थे. इस बीच पानी और ज्यादा बढ़ गया था. अनामिका को चिंता हुई. विजय भी थोड़ा घबरा गया था. उस ने कहा, ‘‘दीवार की साइड पर एक सीढ़ी है, जल्दी लाओ.’’ अनामिका ने ऐसा ही किया. जल्दी से गड्ढे में सीढ़ी लगाई और बड़ी मुश्किल से विजय बाहर निकला. विजय की सांसें फूल रही थीं. वह बोला, ‘‘आज तो बालबाल बचे. अगर सीढ़ी होती तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता.’’


फिर वे दोनों बाथरूम में गए और एकसाथ नहाए. विजय ने अनामिका को अपनी बहन के कपड़े दे दिए.
अनामिका अभी भी किसी गहरी सोच में थी. विजय ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘ग्रेटर नोएडा वाला कांड तो तुम ने सुना ही होगा?’’ अनामिका ने अपने बाल सुखाते हुए कहा. ‘‘यार, बस सरसरी तौर पर पढ़ा था. क्या हुआ था?’’ विजय ने पूछा. ‘‘27 साल के एक सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की 16 जनवरी, 2026 की आधी रात के बाद उस समय मौत हो गई थी, जब घने कोहरे में उस की कार फिसल कर एक नाले के पास बन रहे शौपिंग कौंप्लैक्स के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गई थी.


‘‘युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि उन का बेटामेरी मदद करोमेरी मदद करो…’ चीख रहा था. लोग वीडियो बना रहे थे, पर कोई उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहा था. मैं ने उन्हें डांटा, फिर भी कोई कोशिश नहीं की गई. मेरे बेटे की मौत बेवजह हुई. ‘‘लोग राजकुमार मेहता का दर्द कभी नहीं सम? पाएंगे, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने बेटे युवराज को कार में डूबते हुए देखा. राजकुमार मेहता का कहना था कि हादसे वाली जगह पर 80 कर्मचारी मौजूद थे, पर कोई भी पानी में नहीं उतरा.’’


‘‘यह तो दर्दनाक मौत थी. प्रशासन और सरकार ने क्या किया?’’ विजय ने अफसोस जताते हुए पूछा.
‘‘पुलिस ने युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता की शिकायत पर 2 रियल एस्टेट डेवलपर्स एमजेड विजटाउन प्लानर्स और लोटस ग्रीन्स के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिस में उस ने लोकल अफसरों पर लापरवाही का आरोप लगाया और जवाबदेही की मांग की. विजटाउन प्लानर्स के बड़े अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया.’’


‘‘यह तो बहुत बड़ा सियासी मुद्दा भी बन गया. क्या विपक्ष ने सरकार को नहीं घेरा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘बिलकुल घेरा. देखने पर यह एक साधारण सी मौत लगती है और सरकार इसे बिल्डरों की लापरवाही मान रही है या इसे भ्रष्टाचार के एंगल से खंगाल रही है, पर इस मामले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं समाज में जड़ें फैलाती लालच की वह लत भी है, जो भारतीय शासन की जवाबदेही निगल गई है.


‘‘दूसरी ओर राजकुमार मेहता ने कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी से एक बार मिलना चाहेंगे. इस से उन्हें मन की शांति मिलेगी. वैसे, सरकार की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया है कि उन्हें सही दिशा में उचित सहयोग मिलेगा. ‘‘इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी योगी सरकार को घेरा. उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के लिए सीधेतौर पर सरकार जिम्मेदार है.


‘‘उन्होंने आगे कहा कि हादसे वाली जगह पर पहुंचने के बाद भी सरकार और उस के तमाम महकमे इंजीनियर युवराज को बचा नहीं पाए. पानी ठंडा होने की वजह से कोई उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया. अखिलेश यादव ने मीडिया को भी नसीहत दी कि मौत के बाद किसी की इमेज खराब करने वाले वीडियो चलाए जाएं. ‘‘ज्यादा दबाव पड़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी लोकेश एम. को उन के पद से हटा दिया. हादसे की जांच के लिए 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया. मेरठ जोन के एडीजी एसआईटी के अध्यक्ष बनाए गए.


‘‘इधर, पुलिस कमिश्नर (कानून व्यवस्था) डाक्टर राजीव नारायणी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है. सूचना मिलते ही दमकल टीम सभी उपकरणों के साथ मौके पर पहुंची और बचाव का काम शुरू किया गया. एसडीआरएफ की मदद से अंतिम बचाव अभियान चलाया गया. उस समय विजिबिलिटी जीरो थी, लेकिन युवराज को बचाया नहीं जा सका.’’ ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बिल्डरों के खिलाफ किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘धारा 105 (अनजाने में हत्या), धारा 106 (1) (किसी व्यक्ति की लापरवाही या असावधानी के कारण हुई मृत्यु) और धारा 125 (मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) एफआईआर दर्ज की गई है,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘यार, यह सुन कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. बड़ा ही दिल दहलाने वाला कांड है,’’ विजय बोला. ‘‘इस पूरे मामले को राजकुमार मेहता ने कुछ इस तरह बताया था… ‘शुक्रवार की आधी रात को 12 बज कर,


20 मिनट पर मेरे पास युवराज का फोन आया. वह घर आने ही वाला था, इसलिए सम? नहीं आया कि वह मु? क्यों फोन कर रहा है. ‘‘‘मैं ने फोन उठाया. दूसरी तरफ से एक डरी हुई आवाज सुनाई दी. उस ने कहा किपापापापामैं नाले में गिर गया हूं, मैं मरना नहीं चाहताप्लीज, मु? बचा लीजिए’.
‘‘‘यह सुन कर मैं उन्हीं कपड़ों में बाहर भागा. सोसाइटी से निकलने से पहले मैं ने एक मैसेज टाइप किया और उसे सोसाइटी के ग्रुप में पोस्ट कर दिया, ताकि मदद मिल सके.


‘‘‘मेरे बेटे ने जिस नाले का जिक्र किया था, वह हमारी सोसाइटी से 200 मीटर दूर था. मैं दौड़ कर उस नाले के पास गया. वहां, मैं घने कोहरे और अंधेरे में 30 मिनट तक अपने बेटे को ढूंढ़ता रहा, आवाज लगाने की कोशिश करता रहा, ताकि कोई जवाब मिले. फिर मु? लगा कि मैं गलत जगह ढूंढ़ रहा हूं.
‘‘‘रात के साढ़े 12 के आसपास वहां वीडियो बना रहे लोगों से मैं ने कहा कि प्लीज, मेरे बेटे को बचा लीजिए. इस के बाद मैं सड़क के किनारे पहुंचा, जहां एक इमारत का निर्माण अधूरा था.
यहां बेसमैंट के लिए एक गड्ढा खोदा गया था.


‘‘‘वहां पहुंच कर मैं चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन कर मेरा बेटा भी चीख उठा… ‘बचाओबचाओमेरी मदद करो…’ की आवाज सुन कर मैं सम? गई कि मेरा बेटा यहां गिर गया है. ‘‘‘मैं थोड़ा आगे बढ़ा और कोहरे में से देखा कि कार पानी में थी और मेरा बेटा उस की छत पर लेटा हुआ था. वह सड़क से तकरीबन 50 से 60 फुट दूर था. वह धीरेधीरे डूब रहा था. किनारे पर खड़े लोगों को यह बताने के लिए कि वह जिंदा है, अपने मोबाइल फोन की लाइट बारबार जलाबु? रहा था.


‘‘‘मैं ने डायल 112 पर फोन किया. मैं उसे अपनी आंखों के सामने डूबते हुए देख रहा था. वहां और भी लोग थे, लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था. कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, मैं ने उन से कहा कि प्लीज, वीडियो बनाना बंद करें, मेरे बेटे की मदद करें.’’’ इतना बता कर अनामिका चुप हो गई. थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछा, ‘‘बचाव अभियान कब शुरू हुआ?’’ ‘‘खबरों के मुताबिक, रात के तकरीबन पौने 1 बजे पुलिस और फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी डायल 112 के साथ मौके पर पहुंची. तब तक घना कोहरा छा चुका था. सब से पहले, पुलिस और फायर ब्रिगेड ने रस्सी फेंक कर बचाव का काम शुरू किया.


‘‘पर वह रस्सी युवराज तक नहीं पहुंच रही थी. कुछ पुलिस अफसर कह रहे थे कि पानी बहुत ठंडा है और उस में उतरना मुश्किल है. कुछ का कहना था कि हादसे वाली जगह के नीचे लोहे की छड़ें हो सकती हैं.
‘‘इस के बाद क्रेन बुलाई गई, लेकिन क्रेन भी युवराज तक नहीं पहुंच पाई. वह सिर्फ 30-40 फुट तक ही जा पा रही थी. वहां मौजूद कोई भी आदमी पानी में उतरने की कोशिश नहीं कर रहा था. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि गड्ढा शायद 15 से 20 फुट गहरा था, इसलिए अगर गोताखोर वहां होते तो उन के बेटे की जान बच सकती थी.


‘‘एसडीआरएफ की टीम रात के तकरीबन सवा 1 बजे पहुंची. उन लोगों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इसी बीच युवराज की कार पूरी तरह पानी में डूब गई. कार के ऊपर लेटे हुए युवराज भी पानी में समा गए. सब लोग बस यह सब देखते रह गए. ‘‘सर्चलाइट, क्रेन और सीढ़ी की मदद से टीम पानी में उतरी. 2 घंटे की मशक्कत के बाद युवराज की लाश तकरीबन सवा 4 बजे बरामद की गई. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने कहा कि इस घटनास्थल को ले कर पहले भी शिकायतें की गई थीं, पर सब लोग सोते रहे. उन्होंने अपने बेटे की मौत के लिए नोएडा प्रशासन को दोषी ठहराया.’’


‘‘वे बिलकुल ठीक कह रहे हैं. सरकारें घर उजाड़ने के लिए बुलडोजर तो चला रही हैं, पर इस तरह के मौत के गड्ढे भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है. बिल्डरों पर गाज गिराने से कुछ नहीं होगा. कौन सा बिल्डर चाहेगा कि उस का प्रोजैक्ट समय पर पूरा हो. पर प्रशासन के नियमकानून इतने पेचीदा बना दिए जाते हैं कि लोग कानून के शिकंजे में फंस कर रह जाते हैं. ‘‘यह हादसा तो एक इंजीनियर के साथ हुआ है और इस कांड के वीडियो भी बन गए, तभी प्रशासन इतना जल्दी कार्रवाई करता दिख रहा है. दूरदराज के इलाकों में जाने कितने युवराज अपनी जिंदगी से खेल रहे हैं, किसे इस बात की चिंता है.’’


‘‘विजय, सवाल यह नहीं है कि कौन गुनाहगार है और उसे सजा मिलेगी या नहीं, पर मुद्दा यह भी है कि क्या एक जवान लड़के की ऐसी मौत देखने के बाद उस के पिता कभी सब्र का घूंट पी सकेंगे…’’ अनामिका बोली. ‘‘कभी नहीं. इस तरह की मौत देश की तरक्की की भी पोल खोलती है, क्योंकि तरक्की का मतलब यह नहीं है कि ऊंचीऊंची इमारतें बना देना, जबकि असली तरक्की का मतलब है लोगों के मन से असुरक्षा का भाव खत्म होना.


‘‘दिल्ली के इतना पास एक पढ़ालिखा नौजवान सिर्फ इसलिए मर गया कि वह रात के अंधेरे में पानी से लबालब ऐसे गड्ढे में जा गिरा, जो वहां होना ही नहीं चाहिए था. यह देश के रहनुमाओं पर एक तरह की लानत है कि वे अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम हो रहे हैं,’’ विजय ने अपने दिल की भड़ास निकाली. अनामिका चुप थी. वह बाहर आंगन में खोदे गए गड्ढे को देख रही थी, जिस में अब भी गंदला पानी जमा था.  Hindi Story
   

Hindi Story: चुनौती

Hindi Story: गांव की झाडि़यों में मिली एक बच्ची को बांझ कहे जाने वाली मुनिया ने पालने और कुछ बनाने का फैसला किया. गांव वालों ने मुनिया से किनारा सा कर लिया. जब मुनिया की वह गुडि़या 8वीं जमात में थी, तब मुनिया नहीं रही. क्या गुडि़या अपनी मां के सपनों को पूरा कर पाई?


सुबह सुबह महल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि ?ाडि़यों में एक नवजात बच्ची मिली है. शायद रात में इसे किसी ने फेंका दिया था. बीचबीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. पूरे महल्ले में चर्चा का आज का मुद्दा यह लड़की ही थी.


पहली औरत दूसरी से बोली, ‘‘यह जरूर किसी किसी का पाप है. पता नहीं कौन जात है. बड़ा खराब जमाना गया है. लोग बच्चे कर के यहांवहां फेंक देते हैं.’’

दूसरी ने पहली की हां में हां मिलाई, ‘‘जात छोड़ो, पता नहीं यह किस धरम की है.’’
शादी के 10 साल बाद भी मुनिया के कोई औलाद नहीं थी. पति ने छोड़ दिया था. किसी तरह लोगों के घर का चौकाबरतन कर के वह अपना पेट पालती थी. उसे इस बच्ची पर रहम गया. उस ने ?ाटपट बच्ची को उठा कर गोद में ले लिया.

मुनिया के एक तो औलाद नहीं थी, पति ने भी बां? होने का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. इस बात से वह डिप्रैशन में चली गई थी. तलाक होने से पहले मुनिया डाक्टर के पास भी गई थी. तब डाक्टर बोली थी, ‘तेरे अंदर कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी तो तेरे मर्द में है. तू उसे ले कर किसी माहिर डाक्टर के पास जा. डाक्टर बताएगा इस का इलाज.’’

इधर, फुलिया ने मुनिया से कहा, ‘‘क्या तू इस पाप को पालेगीपता नहीं किस खानदान की है यह लड़की. किस जातिधरम की है. फेंक दे इसे कचरे में. कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है, उसे लोग घर की शोभा नहीं बनाते.’’

मुनिया का दिल मोम का था. उस ने फुलिया को जवाब दिया, ‘‘देख फुलिया, मैं जातपांत को नहीं मानती. मैं धरम में भी यकीन नहीं करती. मैं इनसानियत को मानती हूं. फिर आदमी जातपांत और धर्म का हो कर भी तो अधर्म करता है. जिस की जैसी परवरिश होती है, वह आदमी भी वैसा ही बनता है.
‘‘मैं इसे अपने घर ले जाऊंगी,

इसे खूब पढ़ाऊंगीलिखाऊंगी और अच्छे संस्कार दूंगी. फिर देखती हूं कि कैसे
यह बेराह चलती है. सारा फल अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कारों का
होता है.’’

फुलिया ने ललकारा, ‘‘सोच ले, यह तु? भारी भी पड़ सकता है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई, तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था. हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया, लेकिन तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तू ने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है. फिर यह भी तो है कि तू चौकाबरतन कर के कितना कमा लेगी

‘‘नहीं पाल पाएगी तू इस को. फेंक दे इसे वापस कूड़े में. मरती है, तो मरने दे इसे. क्यों किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है…’’

पर मुनिया बोली, ‘‘मां की ताकत का तु? एहसास नहीं है. गरीब से गरीब मां भी अपने बालबच्चों को रूखासूखा खिला कर पालपोस ही लेती है. फिर मेरे लिए भी तो यह एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पाल कर दिखाऊं.’’

फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली, ‘‘सोच ले इस से बेवकूफी भरा फैसला कुछ नहीं होगा. लोग हंसेंगे और तेरा जीना हराम कर देंगे.’’

‘‘सोच लिया है. इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इनसानियत का रिश्ता जातपांत से ऊपर होता है. समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है, फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है. जायज मांग होने पर वह समाज से लोहा भी ले सकती है.


‘‘फिर समाज के डर से किसी को ?ाडि़यों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता . इस में इस नन्ही सी गुडि़या की क्या गलती…’’

लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था. सब मुनिया को भलाबुरा कहते, उस से कतरा कर निकल जाते. मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी. उस का मकसद अब बस इतना था कि वह गुडि़या को किसी तरह से पढ़ालिखा कर कुछ बना दे.

धीरेधीरे समय बीतता गया. गुडि़या बड़ी होती गई. अब वह 8वीं क्लास में पढ़ती थी. मुनिया ने गुडि़या को अच्छे संस्कार दिए थे. गुडि़या भी मेधावी और मेहनती लड़की थी. वह मुनिया की कही बातों को हमेशा मानती थी. गुडि़या 8वीं क्लास पास कर गई थी. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो देखा कि मां की हालत बेहद खराब है. उसे अस्पताल में भरती करवाया गया, लेकिन मुनिया चल बसी.


मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुडि़या की जिंदगी ही उजड़ गई. फुलिया और महल्ले की दूसरी औरतें अब गुडि़या को ताने मारती थीं कि इस की मां तो इसे बड़ा अफसर बनाने चली थी और खुद ही इस दुनिया से चली गई. मुनिया की एक भतीजी थी शीतल, जो शहर में रहती थी और एक बैंक में क्लर्क थी. उस का तलाक उस के काले रंग की वजह से हो गया था. जिस लड़के से उस की शादी हुई थी, वह पियक्कड़ था.
मरने से पहले मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुडि़या की बाबत फोन पर सब बातें बता रखी थीं. वह कह चुकी थी कि उस के अलावा गुडि़या का इस दुनिया में कोई नहीं है. अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वह गुडि़या की देखभाल करे.


शीतल को गांव में आए हफ्ताभर हो गया था. स्कूल का टीसी बनने में समय लग रहा था. 1-2 दिन में टीसी मिल गया था. गुडि़या शीतल के साथ शहर गई थी, लेकिन शहर में आने के बाद भी गुडि़या को अपनी मां का चेहरा नहीं भूलता था. गांव की भी याद आती थी. गुडि़या किसी भी हाल में अपनी मां के सपनों को पूरा करना चाहती थी. इधर शीतल और गुडि़या को फुलिया और  महल्ले की औरतों की बातें रातों को सोने नहीं देती थीं. शीतल ने उस समय फुलिया और महल्ले की औरतों के तंज का कोई जवाब नहीं दिया था. उसे पता था कि उन को जवाब देने से बेहतर है कि सही समय का इंतजार किया जाए.


धीरेधीरे समय बीतने लगा. गुडि़या और जोरशोर से मेहनत करने लगी थी. अब वह यहां शहर में भी वही काम करती. सुबह उठ कर ?ाड़ूबरतन कर के नहाधो कर नाश्ता तैयार कर देती. शीतल दीदी के लिए भी नाश्ता तैयार कर देती. शहर में गैस का कनैक्शन था, लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. पानी भर कर बाहर से नहीं लाना पड़ता था, इसलिए गुडि़या का बहुत सा समय बच जाता था. अब वह और मन लगा कर पढ़ाई करने लगी थी.

इधर, शीतल को अपने पति से तलाक लेने के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था. गुडि़या के चले आने से उस का भी मन लगने लगा. उस ने घर में रखा हुआ नौकर भी हटा दिया था. गुडि़या आसपड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी. 9वीं क्लास में गुडि़या ने पूरे स्कूल में टौप किया था. अब शीतल को भी यकीन हो गया था कि गुडि़या एक एक दिन कुछ बड़ा जरूर करेगी.
10वीं क्लास के इम्तिहान हुए, लेकिन इस बार गुडि़या का नतीजा बहुत बेहतर नहीं था. वह अपने स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी.

गुडि़या घर कर रोने लगी. तब शीतल ने उस को सम?ाया, ‘‘इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है. तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो. तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी.’’


दिन बीतते रहे और गुडि़या दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करती रही. देखतेदेखते उस ने नीट का इम्तिहान भी पास कर लिया और एक सरकारी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद उस ने एमबीबीएस भी पास कर लिया. अब वह एक डाक्टर बन गई थी. शीतल को भी गुडि़या पर भरोसा था और गुडि़या उस के भरोसे पर खरी उतरी थी. आज शीतल ने अपनी बूआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था.


शीतल ने इनसानियत के लिए तो गुडि़या की मदद की ही थी, उस का मदद करने के पीछे एक और कारण
था. वह कारण था औरत को कमजोर सम?ाने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना. शीतल को अपने पति को भी जवाब देना था और समाज को भी दिखाना था कि बिना किसी मर्द की मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है. वह अपनी मरजी की खुद मालिक है. तकरीबन 10 साल के बाद एक दिन गुडि़या की पोस्टिंग उस के गांव में हुई थी. उस को प्रमोशन मिल गई थी.


वह अब डाक्टरों की सीनियर थी. अब वह सीएमओ थी. एक दिन गुडि़या अपने केबिन में बैठी परची पर कुछ दवाएं लिख ही रही थी कि नर्स ने अगले मरीज का नाम पुकारा. मरीज का नाम फुलिया
था. नर्स ने जोर से 2 बारफुलियाकह कर पुकारा. थोड़ी देर में गुडि़या के सामने उस के गांव की फुलिया खड़ी थी. गुडि़या को तो एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

गुडि़या ने इशारे से फुलिया को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा, ‘‘बैठिए.’’
फुलिया ने इतने दिनों के बाद

गुडि़या को देखा था. वह रोते हुए बोली, ‘‘बेटी, मु? पहचानामैं फुलिया…’’
गुडि़या की भी आंखें भीगने लगी थीं, ‘‘हां चाची, आप को कैसे नहीं पहचानूंगी. आप को मैं कभी भूल ही नहीं सकती. आप के कारण ही मैं आज यहां पर हूं.’’


‘‘बेटी, मु? माफ कर दे. मुनिया के मुंह से निकली एकएक बात सही थी. पापपुण्य कुछ नहीं होता है, बल्कि इनसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. मुनिया भले ही गरीब थी, लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी. मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो. जैसा वह चाहती थी, वैसा ही तु? बनाया. आज अगर वह जिंदा होती तो कितना खुश होती.


‘‘मेरा आशीर्वाद है बेटी तु?. मैं फिर से एक बार माफी मांगती हूं बेटी. मु? माफ कर दे. मैं गलत थी, फुलिया ही सही थी. परवरिश, इनसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है बेटी. आज मैं यह अपनी आंखों से देख रही हूं.’’


फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई आगे बोली, ‘‘ मुनिया, आशीर्वाद दे अपनी बेटी को. मैं अपनी गलती मानती हूं. जहां भी तू है री मुनिया, मु? माफ कर
दे बहन.’’ कहां तो गुडि़या फुलिया को मिलने पर उस को और महल्ले की औरतों को खरीखोटी सुनाना चाहती थी और कहां वह भी फुलिया के साथसाथ रोए जा रही थी.  Hindi Story               

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