Social Story: गौसेवा के नाम पर हिंसा और चंदा वसूली

Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,

उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.

सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.

क्यों? धार्मिक पाखंड है जिम्मेदार दरअसल, गाय की इस हालत के लिए धार्मिक पाखंड सब से ज्यादा जिम्मेदार है. कपोल कल्पित कथा पुराणों में जब यह बताया गया है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवताओं को निवास है, तो फिर लोग गाय की पूजा करने के बजाय मंदिरों में भगवान को क्यों तलाशते फिर रहे हैं?
कपोल कल्पित कथाओं से बड़ेबड़े पंडालों में होने वाली धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि दान की गई इसी गाय की पूंछ पकड़ कर स्वर्ग के रास्ते में पड़ने वाली एक वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है.
इसी पाखंड की वजह से मध्य प्रदेश की एक महिला मुख्यमंत्री तो सड़क पर अपने काफिले को रोक कर गाय को रोटी खिलाती थीं. आखिर लोगों को यह बात में क्यों नहीं आती कि गाय को हरे चारे और भूसा की जरूरत रोटी से कहीं ज्यादा है? सच बात तो यह है कि गाय सिर्फ और सिर्फ एक पालतू पशु है. धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए गाय को दान करने का उपदेश देते हैं.

पापपुण्य का डर दिखा कर लोगों को बताया जाता है कि गौदान करने से आदमी सीधे स्वर्गलोक की टिकट पा? जाता है. सालभर में दान के नाम पर लाखों की संख्या में गायों को दान में दिया जाता है, मगर ये गायें पंडों के घरों में दिखाई नहीं देती हैं. जाहिर है कि दान में मिली गायों को पंडे व्यापारियों को बेच देते हैं या फिर दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देते हैं. हिंदुओ में गाय को तब तक माता माना जाता है तब तक वह दूध देती है. इस के बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता है. गाय को माता मानने वालों का दोहरा चरित्र यह भी है कि वे अपनी बूढ़ी और बेकार गोमाता को कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करते हैं.
गोभक्ति का एक पक्ष यह भी है कि गोमाता के मरने पर वे उस की लाश को नहीं उठाते हैं, यहां तक कि उसे छूते भी नहीं हैं. ऐसा करने पर उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसलिए उसे उठा कर ले जाने के लिए वे दलित बस्ती से उन लोगों को बुला कर लाते हैं, जो मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करते हैं. यह भारत की अकेली पाखंडी कौम है, जो अपनी गोमाता को सड़़कों पर भूखा मरने के लिए छोड़़ देती है और मरने पर अपनी मां को कंधा भी नहीं देती है.

सरकारी
कोशिशें दिखावे तक सीमित सरकार गौवंश की रक्षा की बात तो करती है, पर गाय को सड़क से हटाने के लिए कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं कर पाई है. मध्य प्रदेश में गायें सड़कों पर मारीमारी फिर रही हैं और सरकार विदेशों से चीता ला कर उन पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है. मध्य प्रदेश की भगवा सरकार धर्म की दुहाई दे कर गाय को माता तो मानती है, मगर आवारा घूमती गाय की बेचारगी उसे दिखाई नहीं देती. आज मध्य प्रदेश के गांवकसबों और शहरों में सड़क पर आवारा घूमती गाय सरकार के नुमाइंदों को दिखाई नहीं दे रही है. गाय और गौमांस की तस्करी की खबर पर मौब लिंचिंग पर उतारू बजरंग दल के लोगों को सड़क पर भूखीप्यासी गाय दिखाई नहीं देती. दक्षिण अफ्रीका के नामीबिया से कूनोपालपुर नैशनल पार्क में चीते लाए गए हैं, जिन के भोजन के सैकड़ों की तादाद में चीतल सहित दूसरे जंगली जानवरों को हलाल किया जा रहा है.

यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है कि यह किस तरह का पर्यावरण संरक्षण है, जिस में सैकड़ों की तादाद में जंगली जानवरों की बलि दे कर केवल चीते का संरक्षण किया जा रहा है? मौजूदा दौर में खेती में मशीनीकरण से गौवंश के बैल बेकार होने चाहिए थे, लेकिन दूध देने वाली गाय क्यों बेकार हुई? इस सवाल का जवाब किसी के पास है, ही कोई खोजना चाहता है. आज तो छोटे शहर से ले कर दिल्ली तक सरकार की हर लेयर पर कथित गौरक्षा समर्थित दल हैं, तब क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय गौनीति लाई जाती?
गौहत्या की चिंता करने वालों को यह चिंता भी करनी होगी कि गाय सड़कों पर अपमानित और मरने के
लिए नहीं आवारा फिरें, बल्कि घरों में जगह पाए. आज भी गांवदेहात में कई परिवारों की आजीविका का स्रोत गाय का दूध और उस से बने उत्पाद दहीमक्खन और घी हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं, पर वर्तमान में गाय की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. जनवरी, 2022 के आखिरी दिनों में भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक महिला भाजपाई नेता की गौशाला में 100 से ज्यादा गायों की मौत हो गई थी.

इस गौशाला में 500 गायें हैं. उस समय गौशाला के नजदीक बने कुएं में 20 गायों के शव और मैदान में 80 से ज्यादा गायों के शव और कंकाल पड़े मिले थे. उस के बाद उन भाजपाई नेता पर पुलिस ने केस दर्ज किया था और प्रशासन ने गौशाला का संचालन अपने हाथ में ले लिया था.
आज भी प्रदेश में खोली गई ज्यादातर गौशालाओं का संचालन राजनीतिक रसूख वाले लोग ही कर रहे हैं. गौशालाओं में हट्टीकट्टी गायें ही रखी जाती हैं, जिन का घी दूध पी कर गौमाता की सेवा करने का ढोंग करते हैं और लाचार, बीमार गायें सड़कों पर आवारा घूमती हैं, उस की फिक्र इन को कभी नहीं रहती.
सरकार को चुनावी फायदे की बात छोड़ कर गाय की लाचारगी की चिंता है तो किसानों को गाय पालने की अनिवार्यता का नियम लागू करना चाहिए. जो किसान गाय का पालन करे, उसे ही सरकारी सब्सिडी और दूसरे फायदे मिल सकें.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना कर उस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया जाता है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले के साहित्यकार, संपादक वरुण सखाजी चर्चा के दौरान बताते हैं कि गौहत्या का विरोध कर के उन्माद में कर मरनेमारने पर उतारू लोग भीड़तंत्र का हिस्सा तो बन जाते हैं, पर गायों की आवारगी पर बात नहीं करना चाहते. वे इसे एक तरह की छद्म धार्मिकता और जाहिलपन ही मानते हैं. वे तल्ख अंदाज में कहते हैं, ‘‘हम अपने बब्बा (पिता के पिता) को कोई गाली दे तो गाली देने वाले को मार डालेंगे, लेकिन अपने घर में उसे खुद चाहे दोनों टाइम पीटें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यह दोहरापन ठीक नहीं है.’’फसलों को चट कर रहे आवारा पशु  एक दौर था जब पशुपालन किसानों के लिए आमदनी का जरीया हुआ करता था. लोग गायभैंस, बकरी पाल कर इन के दूध, घी, मक्खन को बेच कर घरपरिवार की जरूरतों को पूरा करते थे.

बैल खेती किसानी के कामों में हलबखर चलाते थे. बैलगाड़ी में किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जाता था. नई तकनीक आने से अब खेती में कृषि उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है. इस के चलते पशुपालन में अब किसानों की दिलचस्पी कम हो गई है. अब लोग पालतू पशुओं को दूध देने तक घर में रखते हैं, पर बाद में उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं. आजकल गांवकसबों में आवारा पशुओं के चलते फसलों की हिफाजत करना एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है. साल 2023 में देश के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिस के मुताबिक 20वीं पशुधन गणना से पता चलता है कि देश में 50.21 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं. इन में राजस्थान में सब से ज्यादा 12.72 लाख और उत्तर प्रदेश में 11.84 लाख मवेशी सड़कों पर आवारा घूमते हैं. देशभर में आवारा पशुओं को पालने की सालाना लागत 11,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. मवेशियों की हत्या पर बैन और गौरक्षकों के डर से आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है और उत्तर प्रदेश में दूध देने वाले पशुओं को पालना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लौकडाउन के पहले दतिया के रेलवे स्टेशन पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता था. ये आवारा गायबैल मुसाफिरों के खानेपीने की चीजों पर पट पड़ते थे. कई बार इन आवारा जानवरों के अचानक रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाने से बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों को चोट भी लग जाती थी. होशंगाबाद जिले के पचुआ गांव में साल 2018 में चरनोई जमीन पर गांव के कुछ रसूख वाले किसानों ने कब्जा कर लिया था, जिस के चलते गांव के आवारा पशु किसानों के खेत में घुस कर फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे थे. इस बात को ले कर 2 पक्षों में हो गया था, जिस में एक आदमी की मौत हो गई थी. दूसरे पक्ष के 2 लोग हत्या के आरोप में हवालात में बंद हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलगअलग इलाकों में हुईं ये घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश में पशुओं की आवारगी लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है. किसानों की हाड़तोड़ मेहनत से उगाई गई फसल जब आवारा पशु चर लेते हैं, तो वे मनमसोस कर रह जाते हैं.

गांवकसबों में दबंगों के पाले पशु आवारा घूमते हैं और दलितपिछड़ों की जमीन पर उगी फसल चट कर
जाते हैं. दबंगों के डर से इन आवारा पशुओं को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता. चरनोई जमीन की कमी में आवारा घूमते पशु मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी अलौटमैंट राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था. सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई. इसी तरह गांवदेहात के इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल और दूसरी तरह की सरकारी इमारतों को भी चरनोई जमीन के रकबे पर बनाया जा रहा है. किसानों द्वारा भी वेयरहाउस, पैट्रोलपंप, बरातघर वगैरह भी खेती की जमीन पर बन रहे हैं. कसबों और शहरों में भी खेतीबारी वाली जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लाट बेचे जा रहे हैं. गांवों में चरनोई जमीन के अलावा जो पठारी क्षेत्र या सरकारी जमीन बची है, उस पर भी दबंगों का कब्जा है.

आज शहर और गांव की सड़कों पर बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की खास वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही है. गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान, जिन के पास खुद की जमीन नहीं है, गायभैंसों को खुला छोड़ देते हैं. चरनोई जमीन नहीं होने से गायें खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं और जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते हैं. गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गौपालन में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की सड़कों में भी गायें आवारा घूमती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की पन्नी में फेंकी गई खाने की चीजों को खाने के चक्कर में गायें प्लास्टिक की पन्नी भी खा लेती हैं और गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से छुड़ाने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथसाथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी भी जाग सकती है.

हमारे देश की कानून भी दोहरे मापदंड वाला है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आवारा पशुओं का भी खयाल रखो और अपनी फसलों को भी सहीसलामत रखो. पर यह कैसे मुमकिन है? जमीनी हकीकत
यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के इलाकों में नीलगाय, सूअर, गाय, बकरी, भैंस जैसे आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसान खेतों में रतजगा कर रहे हैं. आवारा पशुओं को किसान मार भी नहीं सकते, क्योंकि यह गैरकानूनी है. गांवदेहात में खेती करने वाले छोटे किसानों के पास जो जमीन है, उस पर किसी बड़े फार्महाउस जैसी तार की बाड़  नहीं होती है. गरीब और पिछड़े पशुपालक अपने पालतू पशुओं को खुद चराने ले जाते हैं, पर ऊंची जाति के दबंगों के पशु बेखौफ आवारा घूमते हैं. देश का कानून भी उपदेशकों की तरह केवल उपदेश देता है.       

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’        

Crime Story: ऐंजल चकमा – हेट क्राइम की भेंट चढ़ा मासूम

Crime Story: महज 10,491 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का त्रिपुरा पूर्वोत्तर भारत में बसा एक खूबसूरत राज्य है और उस से भी खूबसूरत हैं वहां के रहवासी. यहीं के उनाकोटी जिले के नंदानगर इलाके का रहने वाला एक नौजवान लड़का ऐंजल चकमा अपने सपने पूरे करने दूसरे पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की राजधानी देहरादून गया था, जहां वह पढ़ाई कर रहा था.


पर 9 दिसंबर, 2025 का दिन ऐंजल चकमा पर कहर बन कर टूटा. एक छोटी सी कहासुनी मारपीट में बदली और फिर ऐसा खूनी खेल हुआ कि ऐंजल चकमा अपनी जिंदगी से ही हाथ धो बैठा. इस वारदात को ऐंजल चकमा के छोटे भाई माइकल चकमा के कहे मुताबिक सम?ाते हैं. 9 दिसंबर की शाम के तकरीबन 6 से 7 बजे माइकल अपने भाई ऐंजल के साथ कुछ सामान लेने घर से निकला था. वे दोनों सेलाकुई में ही रहते थे. ऐंजल देहरादून की जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में एमबीए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहा था, जबकि माइकल उत्तरांचल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था.


जब वे दोनों मार्केट में पहुंचे तो बाइक और स्कूटी पर आए कुछ लड़के उन के पास आए. उन सभी लड़कों ने दोनों भाइयों पर कमैंट करना शुरू कर दिया. माइकल चकमा ने बताया, ‘‘हमें वे लोग लगातारचाइनीज’, ‘चिंकीऔरमोमोकह कर चिढ़ा रहे थे. पहले हम ने इग्नोर किया, लेकिन वे माने नहीं. जब मैं ने उन से पूछा कि क्या दिक्कत है? क्यों यह सब बोल रहे हो? तो उन्होंने पीटना शुरू कर दिया.
‘‘एक लड़के ने कड़े से मारा. मारपीट होती देख कर तुरंत ऐंजल बीचबचाव करने पहुंचा, फिर उन्होंने  छोड़ कर ऐंजल को बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया. मैं ने काफी कोशिश की उन्हें रोकने की, लेकिन हम दोनों ही घिर चुके थे. वे लगातार हम दोनों को ही मार रहे थे.’’


इस बारे में ऐंजल चकमा के मामा ने बताया, ‘‘जब शुरुआत में वे लड़के कमैंट कर रहे थे, तो माइकल ने बाइक से उतर कर उन से कहा था किहम भी इंडियन हैंहमें चाइनीज क्यों बोल रहे हो?’ लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी. ‘‘उस रात उन लड़कों ने दोनों को सिर्फ कड़ों से ही नहीं मारा, बल्कि चाकू से भी ऐंजल के पेट में वार किया गया. वे लोग ऐंजल की गरदन पर कड़े से तब तक मारते रहे, जब तक उस की पूरी गरदन फट नहीं गई. खून भी निकलता रहा, लेकिन वे उसे बस पीटते ही रहे. गरदन पर किए गए घातक वार के चलते ही ऐंजल के सिर में खून जमा हो गया था.’’


हमले के बाद ऐंजल और माइकल दोनों गंभीर हालत में ग्राफिक एरा अस्पताल पहुंचे. माइकल के सिर में हलकी चोट थी, लेकिन ऐंजल को आईसीयू में भर्ती कर दिया गया. वह अस्पताल में जिंदगी और मौत से रहा और 26 दिसंबर, 2025 की सुबह तकरीबन 4 बजे उस ने दम तोड़ दिया. इस के बाद पूरे देश में एक बहस सी गई कि ऐंजल चकमा हेट क्राइम का शिकार हुआ है, जबकि देहरादून एसएसपी अजय सिंह ने इस हत्याकांड को हेट क्राइम मानने से साफ इनकार किया. उन के मुताबिक, यह 2 गुटों के बीच अचानक हुई कहासुनी का नतीजा था.


देहरादून पुलिस की ओर से अब तक हुई जांच में सामने आया है कि ऐंजल चकमा और उस के भाई माइकल चकमा पर हमला करने वाले आरोपी भी पूर्वोत्तर में मणिपुर और पड़ोसी देश नेपाल जैसे पर्वतीय इलाके के हैं. पुलिस ने तेजी दिखाते हुए 6 में से 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया. उन में 2 नाबालिग शामिल थे, जबकि एक आरोपी को फरार बताया गया. उस पर पुलिस ने 25,000 रुपए का इनाम भी घोषित किया था.


भारत में हेट क्राइम की वजह
सितंबर, 2015 और दिसंबर, 2019 के बीच भारत में दर्ज हेट क्राइम की ज्यादातर वारदात एससी तबके पर टारगेट ले कर की गई थीं, इस के बाद मुसलिमों का नंबर रहा. कथिततौर पर नफरत के चलते जाति, धर्म से ले कर औनर किलिंग और लव जिहाद तक कुल 902 अपराध दर्ज किए गए. अगर वजह की बात करें तो हमारे देश में रूढि़वाद परिवार, धर्म और तालीम में गहराई से घुसा हुआ है. इतना ज्यादा कि ऊंची जाति के बच्चे कुछ समुदायों या जातियों को अपने से नीचा मानते हुए उन्हें नफरत से देखते हैं, जानवर से बदतर  हैं.


यही वजह है कि जब लोग राजनीति में अपनी पहचान बनाते हैं तो वोटबैंक जुटाने के चक्कर में अकसर हेट क्राइम का सहारा लेते हैं. जाति और धर्म को देश से ऊपर मनाने वाले बहुत से नेता कभीकभी अपने समर्थकों को एकजुट करने के लिए नफरती भाषा का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उन के समाज के लोग उन्हें ही वोट दें. इस के अलावा भारत का कमजोर कानूनी ढांचा भी नफरती अपराधों से निबटने में बेबस सा दिखता है और ज्यादातर मामले भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं के तहत दर्ज किए जाते हैं, जिन में मारपीट, हत्या या दंगे की बात कही गई है, जबकि हेट क्राइम की मूल जड़ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.


जब से भारत में सोशल मीडिया हावी हुआ है, बहुत से प्लेटफार्म अकसर हेट क्राइम को बढ़ाने वाली सामग्री को बढ़ावा देते हैं. सियासी माहौल गरमाया पर चूंकि यह मामला हेट क्राइम जैसा था तो इस पर सियासी उबाल आना लाजिमी था. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के कद्दावर नेता राहुल गांधी ने इस मामले में कहा कि हमें एक ऐसा मरा हुआ समाज नहीं बनना चाहिए जो देशवासियों को निशाना बनाए
जाने पर आंखें मूंद ले.

ऐसी घटनाएं उस नफरत का नतीजा हैं, जो नौजवानों के बीच परोसी जा रही हैं. इस मामले में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि यह नफरती सोच का बुरा नतीजा है. विघटनकारी सोच रोज किसी की जान ले रही है और सरकारी अभयदान हासिल ये लोग विषबेल की तरह फलफूल रहे हैं. दूसरी तरफ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने त्रिपुरा के मारे गए छात्र ऐंजल चकमा की पिता तरुण प्रसाद चकमा से फोन पर बात की और कहा कि सरकार पूरी तरह से पीडि़त परिवार के साथ खड़ी है.


लोगों का फूटा गुस्सा किसी पहाड़ी राज्य में एक पहाड़ी लड़के कोचाइनीज’, ‘चिंकीयामोमोकह कर उस पर जानलेवा वार करना हमारे देश की एकता पर एक सवालिया निशान है. हम किसी को उस के रूपरंग, चेहरेमोहरे और बोलने के अंदाज से कैसे जज कर के उस का मजाक बना सकते हैं? यही वजह है कि इस हत्याकांड के बाद उत्तराखंड से ले कर त्रिपुरा तक विरोधप्रदर्शन हुए और लोगों ने अपनी नाराजगी जाहिर की.


यही वजह थी कि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पूर्वोत्तर के लोगों की सुरक्षा और संरक्षण तय करने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि भारतीय समाज में नस्लवाद और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है.
किसी भी जाति, नस्ल या धर्म के लोगों का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए. केवल पूर्वोत्तर के लोग ही नहीं, बल्कि सभी को इस तरह की घटनाओं से दुखी होना चाहिए, क्योंकि यह किसी के साथ भी हो सकता है. पर केंद्रीय मंत्री के इतना कह देने भर से पीडि़त परिवार के जख्मों पर मरहम नहीं लग सकती और कभी कभी तो लगता है कि एक समाज के तौर पर हम वहशीपन के दौर में पहुंच गए हैं. अब यहां लोगों के कपड़े और उस कपड़े के रंग से पहचान दी जा रही है.


इतना ही नहीं, लोगों के खानपान, नाम, नैननक्श से भी यह निशानदेही की जा रही है कि कौन हमारे हक में है और कौन नहीं. देश भगवा, हरे और नीले रंग की दरारों से पटता जा रहा है और देश के बड़े से बड़े नेता के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही. अब तो लगता है कि हर सियासी नेता चाहता है कि देश उन्मादी नदी में गोते लगाए. और यही उन्मादी नदी अब धर्म के नाम पर तांडव करने लगी है. कहीं गौमाता के नाम पर मौब लिंचिंग हो रही है तो कहीं सिर तन से जुदा होगा के जहरीले नारे लग रहे हैं.


वैलेंटाइन डे पर नौजवानों को सरेआम धर्म की आड़ ले कर पीटा जा रहा है. कोई घुसपैठिया है तो कोई देश का गद्दार. फिल्म सितारे शाहरुख खान की देशभक्ति भी अब सवालों के घेरे में गई है. इस सब में हम यह भूल जाते हैं कि इस तरह के हत्याकांड एक परिवार को उम्रभर के लिए तोड़ देते हैं. ऐंजल का छोटा भाई माइकल क्या अपने भाई की इस दर्दनाक मौत को भूल पाएगा? कभी नहीं. उस के दिल परचाइनीज’, ‘चिंकीऔरमोमोजैसे शब्द परमानैंट टैटू की तरह गोद दिए गए हैं.


ऐंजल के मामा मोमेन चकमा ने बताया कि ऐंजल के पिता ने भारी कर्ज ले कर अगरतला के बाहरी इलाके नंदननगर में एक नया घर खरीदा था. इस के अलावा ऐंजल ने देहरादून से एमबीए करने के लिए एजूकेशन लोन लिया था और हम सभी जानते हैं कि देहरादून में ऐसा कोर्स करना महंगा होता है. अब सबकुछ बरबाद हो गया है. ऐंजल चकमा के पिता तरुण प्रसाद चकमा ने कहा कि वे नहीं चाहते कि जो उन के बच्चे के साथ हुआ वह किसी और के साथ हो. वे बौर्डर सिक्योरिटी फोर्स में हैं और इस वक्त मणिपुर में तैनात हैं.


जिन पर ऐंजल चकमा की जान लेने का आरोप लगा है उन में 25 साल के अविनाश नेगी, 25 साल के सुमित, 18 साल के सूरज खवास और 22 साल के यज्ञराज अवस्थी का नाम सामने आया है. बाकी 2 लड़के नाबालिग हैं. देखा जाए तो जिंदगी इन की और इन के परिवार की भी बरबाद हुई है. ये सारे 25 साल या उस से कम उम्र के हैं. वैसे, इस मामले में अनूप प्रकाश ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है, जिस में हेट क्राइम से निबटने में हुई संवैधानिक नाकामी की न्यायिक जांच की मांग की गई है. जब ऊना और खैरलांजी में शर्मसार हुआ था देश


11 जुलाई, 2016 की बात है. गांधी के गुजरात के ऊना में खुद कोगौरक्षककहलाने वाले लोगों ने सामाजिकतौर पर निचले कहे जाने वाले समुदाय के 7 सदस्यों की बेरहमी से पिटाई से पिटाई की थी, जिस के बाद देशभर में बवाल मच गया था. दरअसल, गिर सोमनाथ जिले के मोटा समाधियाला गांव में वशराम सरवैया और उन के भाइयों को तथाकथितगौरक्षकोंने अधनंगा कर के पीटा था और उन पर पर गौहत्या में लिप्त होने का आरोप लगाया था.


हमलावरों के दावे के उलट बाद में हुई जांच में पता चला कि एससी परिवार एक मरी गाय की खाल उतार रहा था, जिसे वे बेदिया गांव से लाए थे. अब महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव की बात करते हैं, जहां रहने वाली महार जाति की सुरेखा भोतमांगे और उन का परिवार नफरती हिंसा की भेंट चढ़ गया था.
दरअसल, सुरेखा भोतमांगे एक पढ़ीलिखी औरत थीं और उन्होंने अपनी मेहनत से अपने परिवार को गरीबी से उबारा और एक पक्का मकान बनवाया. उन के परिवार में उन के पति भैयालाल, 2 बेटे सुधीर रोशन और बेटी प्रियंका शामिल थे. प्रियंका 12वीं की टौपर थी.


खैरलांजी के कुनबी मराठा समुदाय को सुरेखा भोतमांगे की यह तरक्की बरदाश्त नहीं हो रही थी. लिहाजा, सुरेखा और उन के परिवार को तरहतरह से दबाने की कोशिश की गई. सुरेखा डरी नहीं और स्थानीय पुलिस हवलदार सिद्धार्थ गजभिये, जो भोतमांगे परिवार के रिश्तेदार थे, ने उन्हें समर्थन दिया और एससीएसटी कानून के तहत कार्रवाई की धमकी दी, जिस से कुनबियों में गुस्सा और बढ़ गया. नतीजतन, 29 सितंबर, 2006 की शाम को तकरीबन 70 कुनबियों ने सुरेखा के घर पर हमला कर दिया. उस समय घर पर सिर्फ सुरेखा और उन के बच्चे थे, जबकि उन के पति खेतों में काम कर रहे थे.

इन हमलावरों ने सुरेखा और उन की बेटी प्रियंका को नंगा कर पूरे गांव में घुमाया. इस के बाद उन के साथ गैंगरेप किया गया. सुरेखा के दोनों बेटों सुधीर और रोशन को भी नंगा कर के उन की बेरहमी से हत्या कर दी गई. बाद में सुरेखा और प्रियंका की भी हत्या कर उन की लाशों को सूखी नदी में फेंक दिया गया. Crime Story

    

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