Short Story in Hindi : ब्रा का हुक

Short Story in Hindi. आज दोपहर बाद से रविंद्र के पेट और सीने में तेज दर्द होने लगा. दर्द इतना तेज था कि उन्हें लग रहा था कि अब जान ही निकल जाएगी. घर वाले परेशान हो गए. रविंद्र की पत्नी ने रसोईं में से ला कर कोई चूर्ण फांकने को दिया. गरम पानी बोतल में भर कर सेंकने को दिया, पर कोई आराम नहीं मिला.

फिर घर के लोग घबरा कर आननफानन में रविंद्र को शहर के एक नामीगिरामी डाक्टर के यहां ले गए. डाक्टर के यहां मरीजों की भीड़ लगी थी. अभी 47 मरीजों को देखने के बाद उन का नंबर आने वाला था. वे दर्द से मछली की तरह तड़प रहे थे.

डाक्टर की फीस 1,000 रुपए थी. लेकिन उन के यहां यह सुविधा थी कि दोगुना फीस जमा करने पर सभी मरीजों को छोड़ कर देख लेते थे.

रविंद्र के घर वालों ने दोगुना फीस 2,000 रुपए जमा कर दिए, पर इस में भी 5 मरीज पहले से नंबर लगा चुके थे.

बहरहाल, 5 मरीजों के बाद डाक्टर ने रविंद्र को देखा. इंजैक्शन लगाने, खून जांच करने और एक्सरे कराने के लिए परचा लिख दिया. खून जांच व एक्सरे की सुविधा वहीं पर उसी डाक्टर के यहां उपलब्ध थी. तुरंत एक्सरे का रुपया जमा किया गया. एक्सरे हुआ. खून निकाल कर वहीं के लैब में जांच के लिए भेजा गया.

डाक्टर ने एक्सरे और ब्लड रिपोर्ट को देखा और मरीज को ढेर सारी दवाएं लिख दीं.

डाक्टर ने कहा, ‘‘तुम्हारी यह बीमारी बहुत पुरानी है. अभी तक इसे नजरअंदाज करते रहे, इसलिए अब यह बहुत गंभीर हो गई है. एक महीने की दवा दे रहे हैं. जब तक यह दवा खाते रहोगे तब तक जिंदा रहोगे. दवा बगैर नागा किए खाते रहो.’’

इस के बाद डाक्टर दूसरे मरीज को देखने लगे. रविंद्र ने एक महीने की दवा 12,000 रुपए में वहीं से खरीदी.

घर आने के बाद रविंद्र ने दवा खाना शुरू कर दिया. डाक्टर की फीस, एक्सरे, खून जांच और दवा आदि के साथ जानेआने का कुल भाड़ा वे जोड़ रहे थे कि शाम को उन का दोस्त संतोष आ गया.

संतोष ने सब सुन कर कहा, ‘‘चलो, यहीं पर मेरे एक परिचित डाक्टर हैं, उन्हें दिखा लें. देखें, वे क्या कहते हैं.’’

रविंद्र तैयार नहीं हुए. वे बोले, ‘‘अब इतनी महंगी दवा लाए हैं, एक महीना खा लें तब कहीं चलेंगे. हो सकता है कि इसी से आराम हो जाए. अभी तक तो दर्द वैसा ही है.’’

संतोष ने कहा, ‘‘तुम हिम्मत कर के चलो. वे मेरे परिचित डाक्टर हैं. उतने बड़े तो नहीं हैं, फिर भी जानकार हैं. मेरे रहने पर तुम से एक रुपया फीस भी नहीं लेंगे.’’

संतोष के बारबार जोर देने पर रविंद्र उस डाक्टर के यहां दिखाने पहुंच गए.

डाक्टर ने एक्सरे को अपने एक्सरे रीडर स्क्रिन पर लगाया और देखते ही बोले, ‘‘यह एक्सरे किसी औरत का है. इन का एक्सरे दिखाओ.’’

सब ने कहा कि यही एक्सरे डाक्टर के यहां से मिला है.

डाक्टर ने फिर कहा, ‘‘नहीं, यह किसी औरत का ही एक्सरे है.’’

फिर डाक्टर ने अपनी उंगली से एक्सरे की फिल्म में दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो, यहां पर यह महिला के ब्रा का हुक दिखाई दे रहा है. निश्चित रूप से यह किसी महिला की छाती का एक्सरे है.’’

अब मरीज व मरीज के साथ के सभी लोग हैरान रह गए. फिर डाक्टर ने अपने यहां दूसरा एक्सरे करवाया. उस दूसरे एक्सरे को देख कर डाक्टर ने कहा, ‘‘आप को कुछ नहीं हुआ है. केवल सीने में गैस फंसी हुई है. मैं एक दवा लिख दे रहा हूं. इसे एक हफ्ते तक खा लो आराम हो जाएगा. दोबारा आने की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

रविंद्र ने पहले वाले डाक्टर की ढेर सारी दवाओं को दिखाते हुए पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, अब इन दवाओं का क्या करूं?’’

डाक्टर ने कहा, ‘‘फेंक दो. इन्हें खाओगे तो जरूर मर जाओगे.’’  Short Story in Hindi

-केदारनाथ ‘सविता’

Story in Hindi : दिल हथेली पर

Story in Hindi. अमित और मेनका चुपचाप बैठे हुए कुछ सोच रहे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए. तभी कालबेल बजी. मेनका ने दरवाजा खोला. सामने नरेन को देख चेहरे पर मुसकराहट लाते हुए वह बोली, ‘‘अरे जीजाजी आप… आइए.’’

‘‘नमस्कार. मैं इधर से जा रहा था तो सोचा कि आज आप लोगों से मिलता चलूं,’’ नरेन ने कमरे में आते हुए कहा. अमित ने कहा, ‘‘आओ नरेन, कैसे हो? अल्पना कैसी है?’’

नरेन ने उन दोनों के चेहरे पर फैली चिंता की लकीरों को पढ़ते हुए कहा, ‘‘हम दोनों तो ठीक हैं, पर मैं देख रहा हूं कि आप किसी उलझन में हैं.’’ ‘‘ठीक कहते हो तुम…’’ अमित बोला, ‘‘तुम तो जानते ही हो नरेन कि मेनका मां बनने वाली है. दिल्ली से बहन कुसुम को आना था, पर आज ही उस का फोन आया कि उस को पीलिया हो गया है. वह आ नहीं सकेगी. सोच रहे हैं कि किसी नर्स का इंतजाम कर लें.’’

‘‘नर्स क्यों? हमें भूल गए हो क्या? आप जब कहेंगे अल्पना अपनी दीदी की सेवा में आ जाएगी,’’ नरेन ने कहा. ‘‘यह ठीक रहेगा,’’ मेनका बोली.

अमित को अपनी शादी की एक घटना याद हो आई. 4 साल पहले किसी शादी में एक खूबसूरत लड़की उस से हंसहंस कर बहुत मजाक कर रही थी. वह सभी लड़कियों में सब से ज्यादा खूबसूरत थी. अमित की नजर भी बारबार उस लड़की पर चली जाती थी. पता चला कि वह अल्पना है, मेनका की मौसेरी बहन.

अब अमित ने अल्पना के आने के बारे में सुना तो वह बहुत खुश हुआ. मेनका को ठीक समय पर बच्चा हुआ. नर्सिंग होम में उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

4 दिन बाद मेनका को नर्सिंग होम से छुट्टी मिल गई. शाम को नरेन घर आया तो परेशान व चिंतित सा था. उसे देखते ही अमित ने पूछा, ‘‘क्या बात है नरेन, कुछ परेशान से लग रहे हो?’’

‘‘हां, मुझे मुंबई जाना पड़ेगा.’’ ‘‘क्यों?’’

‘‘बौस ने हैड औफिस के कई सारे जरूरी काम बता दिए हैं.’’ ‘‘वहां कितने दिन लग जाएंगे?’’

‘‘10 दिन. आज ही सीट रिजर्व करा कर आ रहा हूं. 2 दिन बाद जाना है. अब अल्पना यहीं अपनी दीदी की सेवा में रहेगी,’’ नरेन ने कहा. मेनका बोल उठी, ‘‘अल्पना मेरी पूरी सेवा कर रही है. यह देखने में जितनी खूबसूरत है, इस के काम तो इस से भी ज्यादा खूबसूरत हैं.’’

‘‘बस दीदी, बस. इतनी तारीफ न करो कि खुशी के मारे मेरे हाथपैर ही फूल जाएं और मैं कुछ भी काम न कर सकूं,’’ कह कर अल्पना हंस दी. 2 दिन बाद नरेन मुंबई चला गया.

अगले दिन शाम को अमित दफ्तर से घर लौटा तो अल्पना सोफे पर बैठी कुछ सोच रही थी. मेनका दूसरे कमरे में थी. अमित ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो अल्पना?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ अल्पना ने कहा. ‘‘मैं जानता हूं.’’

‘‘क्या?’’ ‘‘नरेन के मुंबई जाने से तुम्हारा मन नहीं लग रहा?है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. वे जिस कंपनी में काम करते हैं, वहां बाहर जाना होता रहता है.’’ ‘‘जैसे साली आधी घरवाली होती है वैसे ही जीजा भी आधा घरवाला होता है. मैं हूं न. मुझ से काम नहीं चलेगा क्या?’’ अमित ने अल्पना की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘अगर जीजाओं से काम चल जाता तो सालियां शादी ही क्यों करतीं?’’ कहते हुए अल्पना हंस दी. 5-6 दिन इसी तरह हंसीमजाक में बीत गए. एक रात अमित बिस्तर पर बैठा हुआ अपने मोबाइल फोन पर टाइमपास कर रहा था. जब आंखें थकने लगीं तो वह बिस्तर पर लेट गया.

तभी अमित ने आंगन में अल्पना को बाथरूम की तरफ जाते देखा. वह मन ही मन बहुत खुश हुआ. जब अल्पना लौटी तो अमित ने धीरे से पुकारा.

अल्पना ने कमरे में आते ही पूछा, ‘‘अभी तक आप सोए नहीं जीजाजी?’’ ‘‘नींद ही नहीं आ रही है. मेनका सो गई है क्या?’’

‘‘और क्या वे भी आप की तरह करवटें बदलेंगी?’’ ‘‘मुझे नींद क्यों नहीं आ रही है?’’

‘‘मन में होगा कुछ.’’ ‘‘बता दूं मन की बात?’’

‘‘बताओ या रहने दो, पर अभी आप को एक महीना और करवटें बदलनी पड़ेंगी.’’ ‘‘बैठो न जरा,’’ कहते हुए अमित ने अल्पना की कलाई पकड़ ली.

‘‘छोडि़ए, दीदी जाग रही हैं.’’ अमित ने घबरा कर एकदम कलाई छोड़ दी.

‘‘डर गए न? डरपोक कहीं के,’’ मुसकराते हुए अल्पना चली गई. सुबह दफ्तर जाने से पहले अमित मेनका के पास बैठा हुआ कुछ बातें कर रहा था. मुन्ना बराबर में सो रहा था.

तभी अल्पना कमरे में आई और अमित की ओर देखते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप तो बहुत बेशर्म हैं.’’ यह सुनते ही अमित के चेहरे का रंग उड़ गया. दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह दबी आवाज में बोला, ‘‘क्यों?’’

‘‘आप ने अभी तक मुन्ने के आने की खुशी में दावत तो क्या, मुंह भी मीठा नहीं कराया.’’ अमित ने राहत की सांस ली. वह बोला, ‘‘सौरी, आज आप की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी.’’

शाम को अमित दफ्तर से लौटा तो उस के हाथ में मिठाई का डब्बा था. वह सीधा रसोई में पहुंचा. अल्पना सब्जी बनाने की तैयारी कर रही थी. अमित ने डब्बा खोल कर अल्पना के सामने करते हुए कहा, ‘‘लो साली साहिबा, मुंह मीठा करो और अपनी शिकायत दूर करो.’’

मिठाई का एक टुकड़ा उठा कर खाते हुए अल्पना ने कहा, ‘‘मिठाई अच्छी है, लेकिन इस मिठाई से यह न समझ लेना कि साली की दावत हो गई है.’’ ‘‘नहीं अल्पना, बिलकुल नहीं. दावत चाहे जैसी और कभी भी ले सकती हो. कहो तो आज ही चलें किसी होटल में. एक कमरा भी बुक करा लूंगा. दावत तो सारी रात चलेगी न.’’

‘‘दावत देना चाहते हो या वसूलना चाहते हो?’’ कह कर अल्पना हंस पड़ी. अमित से कोई जवाब न बन पड़ा. वह चुपचाप देखता रह गया.

एक सुबह अमित देर तक सो रहा था. कमरे में घुसते ही अल्पना ने कहा, ‘‘उठिए साहब, 8 बज गए हैं. आज छुट्टी है क्या?’’ ‘‘रात 2 बजे तक तो मुझे नींद ही नहीं आई.’’

‘‘दीदी को याद करते रहे थे क्या?’’ ‘‘मेनका को नहीं तुम्हें. अल्पना, रातभर मैं तुम्हारे साथ सपने में पता नहीं कहांकहां घूमता रहा.’’

‘‘उठो… ये बातें फिर कभी कर लेना. फिर कहोगे दफ्तर जाने में देर हो रही है.’’ ‘‘अच्छा यह बताओ कि नरेन की वापसी कब तक है?’’

‘‘कह रहे थे कि काम बढ़ गया है. शायद 4-5 दिन और लग जाएं. अभी कुछ पक्का नहीं है. वे कह रहे थे कि हवाईजहाज से दिल्ली तक पहुंच जाऊंगा, उस के बाद ट्रेन से यहां तक आ जाऊंगा.’’ ‘‘अल्पना, तुम मुझे बहुत तड़पा रही हो. मेरे गले लग कर किसी रात को यह तड़प दूर कर दो न.’’

‘‘बसबस जीजाजी, रात की बातें रात को कर लेना. अब उठो और दफ्तर जाने की तैयारी करो. मैं नाश्ता तैयार कर रही हूं,’’ अल्पना ने कहा और रसोई की ओर चली गई. एक शाम दफ्तर से लौटते समय अमित ने नींद की गोलियां खरीद लीं. आज की रात वह किसी बहाने से मेनका को 2 गोलियां खिला देगा. अल्पना को भी पता नहीं चलने देगा. जब मेनका गहरी नींद में सो जाएगी तो वह अल्पना को अपनी बना लेगा.

अमित खुश हो कर घर पहुंचा तो देखा कि अल्पना मेनका के पास बैठी हुई थी. ‘‘अभी नरेन का फोन आया है. वह ट्रेन से आ रहा है. ट्रेन एक घंटे बाद स्टेशन पर पहुंच जाएगी. उस का मोबाइल फोन दिल्ली स्टेशन पर कहीं गिर गया. उस ने किसी और के मोबाइल फोन से यह बताया है. तुम उसे लाने स्टेशन चले जाना. वह मेन गेट के बाहर मिलेगा,’’ मेनका ने कहा.

अमित को जरा भी अच्छा नहीं लगा कि नरेन आ रहा है. आज की रात तो वह अल्पना को अपनी बनाने जा रहा था. उसे लगा कि नरेन नहीं बल्कि उस के रास्ते का पत्थर आ रहा है. अमित ने अल्पना की ओर देखते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं नरेन को लेने स्टेशन चला जाऊंगा. वैसे, तुम्हारे मन में लड्डू फूट रहे होंगे कि इतने दिनों बाद साजन घर लौट रहे हैं.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है,’’ अल्पना बोली. ‘‘पर, नरेन को कल फोन तो करना चाहिए था.’’

‘‘कह रहे थे कि अचानक पहुंच कर सरप्राइज देंगे,’’ अल्पना ने कहा. अमित उदास मन से स्टेशन पहुंचा. नरेन को देख वह जबरदस्ती मुसकराया और मोटरसाइकिल पर बिठा कर चल दिया.

रास्ते में नरेन मुंबई की बातें बता रहा था, पर अमित केवल ‘हांहूं’ कर रहा था. उस का मूड खराब हो चुका था. भीड़ भरे बाजार में एक शराबी बीच सड़क पर नाच रहा था. वह अमित की मोटरसाइकिल से टकराताटकराता बचा. अमित ने मोटरसाइकिल रोक दी और शराबी के साथ झगड़ने लगा.

शराबी ने अमित पर हाथ उठाना चाहा तो नरेन ने उसे एक थप्पड़ मार दिया. शराबी ने जेब से चाकू निकाला और नरेन पर वार किया. नरेन बच तो गया, पर चाकू से उस का हाथ थोड़ा जख्मी हो गया. यह देख कर वह शराबी वहां से भाग निकला.

पास ही के एक नर्सिंग होम से मरहमपट्टी करा कर लौटते हुए अमित ने नरेन से कहा, ‘‘मेरी वजह से तुम्हें यह चोट लग गई है.’’ नरेन बोला, ‘‘कोई बात नहीं भाई साहब. मैं आप को अपना बड़ा भाई मानता हूं. मैं तो उन लोगों में से हूं जो किसी को अपना बना कर जान दे देते हैं. उन की पीठ में छुरा नहीं घोंपते.

‘‘शरीर के घाव तो भर जाते हैं भाई साहब, पर दिल के घाव हमेशा रिसते रहते हैं.’’ नरेन की यह बात सुन कर अमित सन्न रह गया. वह तो हवस की गहरी खाई में गिरने के लिए आंखें मूंदे चला जा रहा था. नरेन का हक छीनने जा रहा था. उस से धोखा करने जा रहा था. उस का मन पछतावे से भर उठा.

दोनों घर पहुंचे तो नरेन के हाथ में पट्टी देख कर मेनका व अल्पना दोनों घबरा गईं. अमित ने पूरी घटना बता दी. कुछ देर बाद अमित रसोई में चला गया. अल्पना खाना बना रही थी.

नरेन मेनका के पास बैठा बात कर रहा था. अमित को देखते ही अल्पना ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप तो बातोंबातों में फिसल ही गए. क्या सारे मर्द आप की तरह होते हैं?’’

‘‘क्या मतलब…?’’ ‘‘लगता है दिल हथेली पर लिए घूमते हो कि कोई मिले तो उसे दे दिया जाए. आप को तो दफ्तर में कोई भी बेवकूफ बना सकती है. हो सकता है कि कोई बना भी रही हो.

‘‘आप ने तो मेरे हंसीमजाक को कुछ और ही समझ लिया. इस रिश्ते में तो मजाक चलता है, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि… अब आप यह बताइए कि मैं आप को जीजाजी कहूं या मजनूं?’’ ‘‘अल्पना, तुम मेनका से कुछ मत कहना,’’ अमित ने कहा.

‘‘मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी पर आप तो बहुत डरपोक हैं,’’ कह कर अल्पना मुसकरा उठी. अमित चुपचाप रसोईघर से बाहर निकल गया. Story in Hindi

Inspirational Story in Hindi : हकीकत

Inspirational Story in Hindi. कमलेश चाय पीती जा रही थीं और एकटक सामने बैठी गिरिजा देवी की ओर देखती जा रही थीं. वे सोचने लगीं कि ऐसी बात उन से कैसे पूछी जाए. किसी लड़की के चरित्र की बात पूछने पर रिश्तों में कड़वाहट भी आ सकती है और रिश्ता टूट भी सकता है.

अगर वे लड़की के बारे में नहीं पूछतीं, तो जो उन्होंने सुना है, वह गलत नहीं माना जा सकता.

यह बात अगर महल्ले में फैल गई कि उन की होने वाली बहू पेट गिरा कर आई है, तो चुल्लूभर पानी में डूब मरने वाली बात होगी. कोई उन्हें बोलने तक नहीं देगा. आखिर वे क्या करें?

चाय पी कर कमलेश ने कप ट्रे में रख दिया. गिरिजा देवी ट्रे को ले कर अंदर चली गईं. वे होने वाली समधिन के लिए रसोई में नाश्ते का इंतजाम करने लगीं.

कमलेश ने यह बात अपने बेटे उमेश को भी बताई थी, पर उमेश ने कहा था, ‘मां, मैं रजनी को अच्छी तरह से जानता हूं. वह सुशील और अच्छे संस्कारों वाली लड़की है. हमारा संबंध तोड़ने के लिए आप से किसी ने चुगली की है.’

उमेश की बात सुन कर कमलेश को तब चुप रह जाना पड़ा था.

उमेश और रजनी एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों पक्के दोस्त थे. दोनों बहुत अच्छी पेंटिंग बनाते थे. पेंटिंग की वजह से ही दोनों में दोस्ती हुई थी. फिर दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे थे. इस दौरान उमेश ने रजनी को अच्छी तरह जांचापरखा था. उस के चरित्र पर शक की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी.

यही वजह थी कि रजनी से शादी करने की बात भी अपने घर वालों से खुद उमेश ने ही चलाई थी. किसी मौडर्न मातापिता की तरह उमेश के मातापिता ने भी बिना किसी विरोध के यह रिश्ता स्वीकार कर लिया था, इसीलिए मां के मुंह से यह बात सुन कर कि रजनी पेट गिरा कर आई है, उमेश को यकीन नहीं हुआ था.

गिरिजा देवी हलवा और बिसकुट ले आई थीं. वे बोलीं, ‘‘लो समधिनजी, नाश्ता करो.’’

‘‘मुझे भूख नहीं है, आप खाओ.’’ ‘‘यह तो हलका भोजन है. बिना भूख के भी चल जाएगा.’’

कमलेश खाने लगीं. गिरिजा देवी सामने रखी कुरसी पर बैठ गईं.

‘‘इस तरह मत बैठो, आप भी तो खाओ समधिनजी,’’ कमलेश ने प्यार से कहा, तो गिरिजा देवी भी खाने लगीं.

कमलेश एक स्कूल में टीचर थीं. उन के पति का देहांत हो गया था, इसलिए उमेश की शादी में पिता की भूमिका वही निभा रही थीं. रजनी के बारे में शक भरी बातें उन की एक सहेली ने बताई थीं, इसलिए सचाई जानने के लिए वे यहां चली आई थीं.

गिरिजा देवी के पति आगरा में बैंक में नौकरी करते थे, इसलिए उन का सामना सीधा समधिन से हुआ था, पर डर रही थीं कि बात कैसे शुरू करें. कहीं बात झूठी निकली तो.

फिर भी कमलेश ने हिम्मत बांध कर कह डाला, ‘‘समधिनजी, मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं.’’

गिरिजा देवी ने हंस कर कहा, ‘‘किस बारे में?’’

कमलेश मन को मजबूत करते हुए बोलीं, ‘‘रजनी के बारे में.’’

गिरिजा देवी के चेहरे पर तुरंत हैरानी के भाव छा गए. वे बोलीं, ‘‘हां बोलो, क्या बातें करनी हैं?’’

‘‘मैं ने सुना है कि रजनी पेट गिरा कर…’’ कहतेकहते कमलेश के शब्द गले में ही अटक गए.

मगर गिरिजा देवी साफसाफ बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप ने ठीक ही सुना है.’’

कमलेश ने समझा कि गिरिजा देवी नाराज हो गईं, इसलिए वे बोलीं, ‘‘इस में बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है. हम ने तो किसी से यह सुना था. अब आंखों देखी मक्खी तो निगली नहीं जा सकती. इसीलिए आप के पास आई हूं कि यह तो पता चले कि इस बात में कितनी सचाई है.’’

‘‘मैं भी सच कह रही हूं समधिनजी कि यह बात पूरी तरह सच है,’’ गिरिजा देवी ने मजबूती से कहा.

यह सुन कर कमलेश के चेहरे पर कठोरता छा गई. उन्होंने नाश्ते की प्लेट एक ओर सरका दी और गुस्से में बोलीं, ‘‘तो फिर यह बात तुम ने सगाई से पहले हमें क्यों नहीं बताई? हमारे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?

‘‘आप ने कैसे सोच लिया कि रजनी हमारे घर की बहू हो जाएगी? बात कैसी भी हो, एक न एक दिन सभी को पता लग जाती है.’’

‘‘वह तो ठीक है समधिनजी. आप ने जो सुना है, वह सच है और केवल उसे सुन कर कोई भी सास किसी लड़की को अपने बेटे की बहू नहीं बना सकती, मगर आप ने अधूरा सच सुना है.’’

‘‘अब पूरा सच सुनने की मुझे जरूरत भी नहीं है. जब मैं ने यह बात सुनी थी, तो मैं ने इस पर यकीन नहीं किया था. लेकिन जब तुम ही इसे सच बता रही हो, तो यह रिश्ता तोड़ना पड़ रहा है,’’ कहते हुए कमलेश कुरसी से उठ कर खड़ी हो गईं.

गिरिजा देवी ने उन का हाथ पकड़ लिया और बोलीं, ‘‘आप यह रिश्ता तोड़ दें, मुझे कोई दुख नहीं है, पर क्या अब यह नहीं जानना चाहोगी कि रजनी मां कैसे बनी?’’

‘‘लाई होगी किसी का पाप, हमें इस से क्या?’’

‘‘उमेश को यह रिश्ता तोड़ने की ठोस वजह भी तो बतानी होगी.’’

‘‘हां, बताइए…’’ कमलेश फिर से बैठ गईं.

गिरिजा देवी ने कहना शुरू किया, ‘‘आज से 3 साल पहले रजनी 12वीं में पढ़ रही थी. वह अपने गांव जा रही थी. वह मेरे साथ थी. रात का समय था. बस अपनी पूरी रफ्तार से चल रही थी. अचानक रास्ते में बस को रुकती देख हम चौंक गए. कुछ बंदूकधारी लोग

बस में चढ़ आए थे. उन्होंने सब सवारियों को बंदूक का निशाना बना कर नीचे उतार लिया.

‘‘सभी से रुपए और गहने लूट लिए. औरतों से जबरन बलात्कार किया गया, जिस का शिकार हम दोनों को होना पड़ा. तकरीबन आधा घंटा उन्होंने यह खौफनाक खेल खेला.

‘‘रजनी तो इस हादसे से बेहोश हो चुकी थी. कई महीनों बाद रजनी ने महसूस किया कि उस के पेट में उन दरिंदों का पाप पल रहा है.

‘‘पर शर्म और झिझक की वजह से उस ने यह बात किसी को नहीं बताई. जब 4-5 महीने का पेट हो गया, तब एक दिन मुझे बताया. एक नर्सिंग होम में जा कर तब इस का पेट गिरवाया.’’

यह सुनतेसुनते कमलेश के चेहरे की कठोरता न जाने कहां गायब हो गई.

गिरिजा देवी बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप यह रिश्ता भले ही तोड़ दें, हमें कोई एतराज नहीं है, पर यह बात किसी और को मत बताना. इस घटना की वजह से रजनी की कई सगाई टूट चुकी हैं. उमेश और रजनी की दोस्ती की बात सुन कर हमें उम्मीद बंधी थी कि अब सगाई नहीं टूटेगी.

‘‘आप समझदार हैं, टीचर हैं, अब आप ही बताइए कि इस में रजनी का क्या कुसूर है?

‘‘गहराई से सोचें कि यह हादसा आप के साथ हुआ होता, तब आप पर क्या बीतती? आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या यह रिश्ता तोड़ कर आप रजनी के साथ इंसाफ कर रही हैं? अगर आप की सोच से यह ठीक है, तो आप यह रिश्ता तोड़ सकती हैं.’’

गिरिजा देवी की बात सुन कर कमलेश हैरान रह गईं. उन्होंने गिरिजा देवी का कंधा थपथपा कर कहा, ‘‘समधिनजी, इस बात के लिए माफी चाहती हूं कि मैं ने आप का दिल दुखाया. मैं सच से वाकिफ नहीं थी, इसलिए गुस्से में न जाने क्याक्या कह गई.

‘‘अब आप कोई चिंता नहीं करें. मैं सब संभाल लूंगी. आप शादी की तैयारियां कीजिए.’’

कमलेश की बात सुन कर गिरिजा देवी का दिल एकदम हलका हो गया. उन की निगाह दीवार पर टंगी रजनी द्वारा बनाई गई उस पेंटिंग पर चली गई, जिस में ऊपर लिखा था, ‘औरत ही औरत को मुक्ति दिला सकती है.’

Emotional Story in Hindi : लड़का

Emotional Story in Hindi-

‘‘कैसा लगा लड़का तुम्हें?’’ नंदराम ने अपनी बीवी प्रभावती से पूछा.

‘‘और तो सब ठीक है, पर…’’ प्रभावती हिचक गईं.

‘‘तो अपनी संगीता ही कहां की…’’ यह कहते हुए नंदराम भी हिचके. प्रभावती कुछ सोचती हुई सी चुप ही रहीं.

नंदराम प्रभावती के साथ सुबह पैसेंजर रेलगाड़ी से ही गए थे और लड़का देख कर शाम तक वापस इसलिए आ जाना चाहते थे कि वे लड़की को घर पर अकेली नहीं छोड़ना चाहते थे.

एक बार वे दोनों गलती कर चुके थे. बात तब की है, जब उन्होंने मकान के बाहर की बैठक इंटर कालेज में नए आए अंगरेजी के टीचर कीर्ति बाबू को किराए पर दे दी थी. संगीता प्राइवेट बीए कर रही थी. अंगरेजी पूछने वह उस एमए पास टीचर कीर्ति से बैठक में जाने लगी थी.

एक दिन प्रभावती ने संगीता और उस टीचर के बीच बैठक के एकांत में कुछ ऐसावैसा देख लिया था.

नंदराम को सावधान करती हुई वे बोली थीं, ‘मास्टर कीर्ति की आदतें अच्छी नहीं हैं. लालच छोड़ो और उसे किराए की बैठक से निकाल बाहर करो.’

प्रभावती की बात को नंदराम समझ गए. लिहाजा, दूसरे दिन ही उन्होंने उस टीचर को निकाल बाहर किया.

बुरा यह हुआ कि नंदराम के पुश्तैनी दुश्मन जयकिशन बाबू, जिन का घर गली में ठीक नंदराम के घर के सामने था, ने अपना बाहर का कमरा उस टीचर को किराए पर दे दिया.

किराए पर देते हुए जयकिशन बाबू ने टीचर कीर्ति बाबू से कहा, ‘हमारा होनहार लड़का हाईस्कूल में है. कसबे के सभी लड़कों की तरह वह भी अंगरेजी में कमजोर है. उसे अपनी तरह फर्राटेदार अंगरेजी सिखा दें.’’

एक दिन प्रभावती ने पति नंदराम को बताया, ‘कीर्ति बाबू पड़ोसी के चबूतरे पर लगे हैंडपंप से जब पानी भरते हैं, तो संगीता ऊपर छत पर चढ़ कर मुंडेर से उन्हें देखने के लिए झांकती है.’

यह सुनते ही नंदराम परेशान हो गए. नातेरिश्तेदारों के यहां उस के रिश्ते के लिए दौड़ लगाने लगे. जल्दीजल्दी में जो भी लड़का जहां भी मिले, वे संगीता को ब्याह कर कसबे से बाहर कर बदनामी से बचने की कोशिश में जुट गए.

वे मन ही मन सोचा करते, ‘आदमी किसी से नहीं हारता, पर अपनी औलाद से हार जाता है.’

एक दिन संगीता को प्रभावती के सामने नंदराम ने समझाने और जिंदगी की ऊंचनीच बताने की कोशिश की, तो संगीता समझ गई कि पापा यह सब उस से क्यों कह रहे हैं.

पिता से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर बाद में वह मां से बोली, ‘किसी से तो करेंगे हमारी शादी. कीर्ति बाबू क्या बुरे हैं? नौकरी से लगे हैं, देखनेसुनने में भी अच्छे हैं. फर्राटेदार अंगरेजी बोलते हैं.

‘बड़े घर के लड़के हैं. पिता की खासी जमीनजायदाद है. घर पर मोटरसाइकिल है. खुद के पास मोबाइल फोन रहता है. वे होनहार हैं. जल्दी अच्छी जगह पहुंच जाएंगे.’

‘पर वे तो पहले से ही शादीशुदा हैं. सुना है, बीवी बहुत पढ़ीलिखी और किसी अच्छी नौकरी से लगी है. कीर्ति बाबू से ज्यादा कमाती है, पर कीर्ति बाबू के साथ रह कर वह अपनी नौकरी नहीं कर सकती थी और वह नौकरी छोड़ने को राजी नहीं है.

‘कीर्ति बाबू को ससुराल में घरजंवाई बन कर रहना पसंद नहीं, इसलिए नौकरी पर यहां चले आए. लाख अच्छे हों वे, पर हैं तो शादीशुदा…’ प्रभावती बोलीं.

‘क्या फर्क पड़ता है इस से?’ संगीता ने मुंहफट हो कर कहा, ‘बीवी बहुत नकचढ़ी है. अपनी नौकरी और बाप के पैसे का घमंड है उसे. सीधेसच्चे कीर्ति बाबू उस से ब्याह कर के बुरे फंस गए हैं. आजकल शहरों में ऐसे तमाम लोग हैं, जो नौकरी की जगह अलग औरत रखते हैं और शहर में दूसरी औरत…’

‘पागल हुई है क्या? दिमाग खराब है तेरा?’ मां ने फटकारा, ‘ऐसी ऊलजलूल बातें कहीं सोची जाती हैं? कल को बीवी के बच्चे होंगे, तब तू क्या करेगी? बीवी दबंग हुई, तो जूतमपैजार करेगी तुझ से. पुलिस में जा धमकेगी. इतनी बात तू नहीं समझ पा रही?’

अब जब लौट कर वे दोनों स्टेशन पर उतरे, तो नंदराम ने बीवी से फिर बात छेड़ी, ‘‘संगीता जरूर पूछेगी. क्या कहोगी?’’

‘‘कुछ भी कहें, पर संगीता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होगी,’’ प्रभावती बोलीं, ‘‘लड़का ज्यादा पढ़ालिखा नहीं है. शहर में बरतनों की दुकान करता है.’’

‘‘पर कमाता ठीकठाक है. संगीता को सारे सुख मिलेंगे,’’ नंदराम बोले.

प्रभावती बोलीं, ‘‘ऐसे लड़के को वह कभी भी पसंद नहीं करेगी.’’

‘‘जिस लड़के को देखा था, वह 2 भाई थे. बड़े भाई को बदमाशों ने पैसे के लालच में अपहरण कर लिया था. यह लड़का पुलिस में रिपोर्ट कर आया. बदमाशों ने पैसे की मांग रखी. पुलिस भी बदमाशों से मिली हुई थी. इस लड़के के मन में लालच आ गया. पैसा नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बड़े भाई की हत्या कर दी. अब पूरी दुकान और मकान का खुद मालिक है.’’

‘‘जो भाई अपने सगे भाई को दगा दे सकता है, वह तुम्हारी संगीता को दगा नहीं देगा, इस बात का क्या भरोसा है?’’ प्रभावती ने शक जाहिर किया.

‘‘तो क्या हम उसे कीर्ति बाबू को सौंप दें?’’ नंदराम बुरी तरह झल्लाए, ‘‘उस की पहले से बीवी है. कल को मार कर भगा देगी वह, फिर खिलाना बेटी को अपने घर बैठा कर जिंदगीभर.’’

‘‘और भी 2-4 लड़के सुने हैं हम लोगों ने. उन्हें क्यों न देखा जाए?’’ प्रभावती ने कहा.

‘‘और तब तक अपनी संगीता के पैर डगमगा गए तो? वह कीर्ति बाबू के साथ ज्यादा उलझ गई तो? कुछ ऊंचनीच हो गई, तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. कसबे को तो देख ही रही हो. बात फैलते देर नहीं लगेगी,’’ कुछ सोच कर वे बोले, ‘‘हम तो कहते हैं, लंगड़ा है तो क्या हुआ, बरतनों की चलती दुकान है. खासा कमा लेता है. अब सारी जायदाद का अकेला मालिक है.

‘‘शक्लोसूरत और पहननाओढ़ना क्या मतलब रखता है आजकल? संगीता को इस शादी के लिए तैयार करना ही चाहिए.’’

हालांकि वे खुद समझ रहे थे, संगीता कैसे भी राजी नहीं होगी इस संबंध के लिए. कहीं कुछ उलटासीधा कर बैठी, तो लड़की से भी हाथ धो बैठेंगे.

वही हुआ. प्रभावती ने संगीता को हंसते हुए सबकुछ सामान्य ढंग से बताया. देखे हुए लड़के की तमाम खूबियां गिनाईं, पर कमियों को भी छिपाया नहीं. आखिर रिश्ते का सवाल था. लड़की बरात आने पर बिदक गई, तो कसबे में बड़ी बदनामी होगी. 2-3 बरातें ऐसे अनमेल संबंधों के चलते लड़कियां दरवाजे से लौटा चुकी हैं. संगीता ने भी ऐसा किया, तो क्या होगा?

संगीता सहेली के घर जाने के बहाने कसबे के कालेज में चली गई और कीर्ति बाबू को जा कर सबकुछ बता दिया.

यह सुन कर कीर्ति बाबू मुसकराए और बोले, ‘‘जिंदगी में चलतेचलते तमाम सवाल हमें ऐसे ही घेर कर खड़े हो जाते हैं संगीता… और अकसर हम परेशानी में पड़ जाते हैं, हम यह तय नहीं कर पाते कि क्या करें, क्या न करें.’’

‘‘लेकिन, हमें जवाब तो तलाशने पड़ेंगे सर… आप बताइए कि हम क्या करें?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘यह तुम्हारी जिंदगी है. इस का फैसला तुम्हें करना चाहिए. जिस फैसले पर पहुंचो, उस पर तुम्हें मजबूत रहना चाहिए. तुम क्या सोच रही हो?’’ वे संगीता की आंखों में ताक रहे थे.

संगीता ने सिर झुका लिया और बोली, ‘‘मैं तो आप के अलावा किसी के बारे में कुछ नहीं सोच पा रही.’’

‘‘लेकिन मेरे बारे में तुम्हें सब पता है. तुम मुझे अच्छी लगती हो, इस में शक नहीं. लेकिन हर चीज जो हमें अच्छी लगे, जरूरी नहीं है, वह हासिल भी हो जाए. हासिल करने की हिम्मत भी मुझ में नहीं है… मेरी बीवी झगड़ालू है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह मेरी और तुम्हारी जिंदगी नरक बना देगी, इस का एहसास मुझे है.’’

‘‘तब? तब क्या मैं आप को पाने के सपने न देखूं?’’ संगीता ने सवाल पूछा.

कीर्ति बाबू काफी देर तक चुप रहे, फिर बोले, ‘‘मांबाप से कहो कि तुम्हारे लिए कोई और अच्छा लड़का देखें, जो तुम्हारे लायक हो… तुम उस के साथ खुश रह सको,’’ मन मार कर कीर्ति बाबू ने संगीता को सलाह दी.

‘‘गांव में आप को ले कर मेरी बदनामी शुरू हो गई है. बात कल को बढ़ जाएगी,’’ संगीता बोली, ‘‘लड़का मिलना आसान तो नहीं है. समय लग सकता है और मैं आप से मिले बिना रह नहीं सकती… ऐसे में क्या होगा?’’

‘‘पिताजी से कहो, तुम्हें पढ़ने के लिए शहर भेज दें,’’ कीर्ति बाबू बोले, ‘‘वहां मन लगा कर पढ़ो. कंप्यूटर सीखो. हुनर बढ़ाओ और जब रिश्ता ठीक सा मिल जाए, ब्याह कर लेना.

‘‘मैं भी नहीं चाहता कि यह नौकरी तुम्हारी वजह से खो बैठूं. नौकरी न रही, तो बीवी मुझ पर और दबाव डालेगी कि उस के साथ रहूं, जो मैं नहीं चाहता.’’

उम्मीद नहीं थी कि कीर्ति बाबू उसे इस तरह टरका देंगे. वह उन्हें साहसी मान रही थी. उन के साथ बिना शादी के ही रहने को तैयार हो रही थी, पर अब तो हालात ही बदल गए थे.

संगीता ने घर आ कर मां से कहा, ‘‘जहां आप लोग लड़का देख आए हैं, उसी से रिश्ता तय कर दीजिए…’’

नंदराम ने सुना, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, पर वे बहुत खुश हो गए और शहर चले गए.  Emotional Story in Hindi

Self-Confidence Story : माला का विश्वास

Self-Confidence Story: ‘‘अरे, इस लड़की को कितना समझाएं कि लड़कियों को अपने अंदर पहनने वाले कपड़ों को छिपा कर सुखाना चाहिए, ताकि किसी मर्द की नजर इन पर न पड़ जाए, पर यह लड़की है कि अपनी समीज हमेशा खुले में ही डाल देती है,’’ माला की मां शांता बड़बड़ाए जा रही थीं और इसी गुस्से में भर कर उन्होंने अपनी बेटी माला को आवाज दी और खरीखोटी सुनाने लगीं.

मां की डांट से माला सहम गई और तार पर सूख रही अपनी समीज को उठा कर कुरते के नीचे कर दिया.

18 साल की माला का शरीर भरा हुआ था, पर इस उम्र में भी वह घर पर सिली हुई सूती कपड़े की समीज ही पहना करती थी, क्योंकि उस की पुराने खयालों की मां का मानना था कि शादी से पहले लड़कियों को समीज ही पहननी चाहिए.

माला की मां दुकान पर जा कर ब्रा खरीदने को बेशर्मी मानती थीं और खुद भी अपने लिए घर पर सिले कपड़े ही पहना करती थीं.

पिछले दिनों ही जब माला को अपने सीने के उभार कुछ ज्यादा उठे हुए से लगने लगे थे, तो उस ने घर की सिलाई मशीन से ही अपनी समीज को खूब टाइट सिल दिया, ताकि वह उस के बदन पर चिपक कर फिट हो, जिस से उस का सीना ज्यादा उभरा न लगे.

उत्तर प्रदेश के बड़े शहर गोरखपुर से तकरीबन 80 किलोमीटर की दूरी पर कप्तानगंज नाम का यह छोटा कसबा था. इसी कसबे में शांता अपने पति और 18 साल की बेटी माला के साथ रहती थीं. शांता बेहद दकियानूसी और पुरानी विचारधारा की थीं और अपनी एकलौती बेटी पर हमेशा सख्ती करती थीं.

शांता के पति ट्रक ड्राइवर थे और अकसर बाहर ही रहते थे. महीने में एक बार घर आते और तब वे अपनी बेटी माला से खूब सारी बातें करते.

माला के पापा उस की मां के मुकाबले थोड़े खुले विचारों के थे, लेकिन माला की मां को तो जैसे अपने विचारों को छोटा रखने में ही अच्छा लगता था, तभी तो पिछले हफ्ते जब माला का 18वां जन्मदिन था तो माला ने अपनी मां से दबे स्वर में कहा कि उस के साथ की सभी लड़कियां अपने जन्मदिन पर केक काटती हैं और होटल में अपनी सभी सहेलियों को पार्टी देती हैं. दिनभर बाहर घूमतीफिरती हैं, तो माला की बात सुन कर उस की मां ने कितना डांटा था उसे… और ऐसी घूमने वाली लड़कियों को आवारा कहते हुए इन लड़कियों से दूर रहने की सलाह दे डाली थी.

मा ला का मन होता कि टीवी चला कर नए फिल्मी गानों पर डांस करे, पर अपनी मां के चलते वह ऐसा नहीं कर पाती थी, क्योंकि माला की मां का कहना था कि नए फिल्मी गानों में फूहड़ता और नंगापन दिखाया जाता है, इसलिए वे नए गानों के बजाय पुराने जमाने के गाने ही सुनने पर जोर देती थीं और अकसर तो टीवी बंद कर के माला को अपनी पढ़ाई पर धयान देने को कहती थीं.

नए जमाने की लड़की माला. उस का भी एक मन था जो कहता था कि घूमोफिरो, बाहर खाओपियो और मौजमस्ती करो. उस का भी एक बौयफ्रैंड हो, जिस से वह अपने मन की बात कह सके और उस की बाइक पर बैठ कर अपने बालों को हवा में लहराए, पर मां की सख्ती के चलते माला की दोस्ती का दायरा सीमित हो कर रह गया था.

माला और उस की सहेली रिया एक दिन घर के बाहर टहलते हुए आपस में बातें कर रही थीं.

‘‘तेरा यह पर्स बहुत सुंदर लग रहा है,’’ माला ने रिया से कहा, तो रिया ने इठलाते हुए बताया कि यह उस के बौयफ्रैंड ने उसे गिफ्ट किया है. यह सुनते ही माला का मुंह उतर गया.

‘‘कोई मुझे गिफ्ट क्यों नहीं देता?’’ माला ने हताशा भरे स्वर में कहा.

‘‘क्योंकि तेरा कोई बौयफ्रैंड नहीं है. बौयफ्रैंड बना ले यार, मन को थोड़ा अच्छा लगेगा और गिफ्ट भी मिलेंगे,’’ रिया ने राय दी.

बातोंबातों में माला ने रिया से राय मांगी कि उस का कोई बौयफ्रैंड क्यों नहीं है, तो रिया ने अपनी नजर को माला के सीने पर चिपकाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अपनी ड्रैसिंग सैंस पर ध्यान देना चाहिए और थोड़ा स्टाइलिश दिखना होगा, तभी कोई लड़का तेरी तरफ ध्यान देगा.

‘‘बुरा मत मानना पर तुम्हारे इस चपटे और लटके हुए सीने को देख कर कोई लड़का तुम्हारी तरफ ध्यान नहीं देगा. लड़कियों का सीना तो तना हुआ और उठा हुआ ही सैक्सी लगता है,’’ रिया ने आंखों के इशारे से अपना सीना दिखाते हुए कहा, तो माला ने देखा कि रिया के उभार तो वाकई में सुगठित, सुडौल और तने हुए लग रहे थे, जिस से रिया की खूबसूरती कई गुना ज्यादा लग रही थी और रिया काफी फिट भी दिख रही थी.

दूसरी तरफ माला ने महसूस किया कि उस के समीज पहनने के चलते उस के उभार तो लटक से गए हैं, जिस के चलते वह उम्र से काफी बड़ी दिख रही थी और सैक्सी भी नहीं लग रही थी.

‘‘अरे, पर ये तो छिपा कर रखने वाली चीज हैं. मां कहती हैं कि इन्हें तान कर नही घूमना चाहिए. क्या यह अपने बदन का शो औफ करना नही होगा?’’ माला ने कहा तो रिया ने उसे बताया, ‘‘इस में कुछ गलत नहीं है. मर्द भी तो जिम में अपनी बौडी और मसल्स बनाते हैं और फिर उन्हें दिखाते फिरते हैं. जब उस में कुछ गलत नहीं है तो हम लड़कियां भी तो अपनी बौडी को क्यों छिपा कर रखें? हम अपनी देह को क्यों न यूज करें और क्यों न फायदा उठाएं?’’

ये सारी बातें माला की समझ  में अच्छी तरह आ गई थीं और उसे लगने लगा था कि वाकई में उसे अपने ऊपर ध्यान देना होगा.

अगले दिन ही माला ने मां से बताया कि वह रिया को ले कर गोरखपुर जा रही है, पढ़ाई के लिए कुछ जरूरी किताबें लानी हैं, तो मां ने मना तो नहीं किया, पर जल्दी घर वापस आने का निर्देश जरूर दिया.

रिया और माला गोरखपुर के जैनिथ नाम के मौल में गईं, जहां रिया ने अपने लिए जींस और टौप जैसे मौडर्न कपड़े खरीदे, पर माला अब भी शरमा रही थी. कुछ देर बाद उस की नजर हैंगर पर लटकी हुई एक लाल रंग की ब्रा पर पड़ी.

माला ने इधरउधर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है और फिर नजरें झुकाए हुए ब्रा उठाई और ट्रायल रूम में जा कर ब्रा को शरमाते हुए पहन कर देखा. ब्रा के हुक बंद करते हुए माला ने अपनेआप को आईने में निहारा. कितनी सुंदर हो गई थी वह. उस के उभार कसावट से भर गए थे.

माला ने खुद को आगे से देखा, फिर अपनी पीठ घुमा कर देखी. उस की सुंदरता में चार चांद लग गए थे.

माला ने बिना देर किए ही ब्रा खरीदने का फैसला कर लिया और साथ ही अपने लिए एक ट्रैक सूट भी खरीद लिया.

वापसी में रिया और माला ने कुछ जरूरी किताबें भी खरीद लीं और शाम से पहले घर वापस आ गईं.

माला जब घर पहुंची, तो उस की मां की आंखें तनी हुई थीं, पर माला सिर्फ मां को देख कर मुसकरा दी और सीधा अपने कमरे मे चली गई और जल्दी से ब्रा का पैकेट अपने बिस्तर के नीचे छिपा दिया.

अगली सुबह माला ने नहाने के बाद बाथरूम में ब्रा पहनी और बाकी कपड़े पहन कर कालेज जाने लगी लगी. उस के चेहरे पर नया सा आत्मविश्वास था, क्योंकि अंदर ही अंदर उसे महसूस हो रहा था कि वह बहुत सुंदर दिख रही है.

कालेज में भी आज माला की निगाहें पहले की तरह झुकी हुई नहीं थीं, बल्कि वह सभी नजरों से नजरें मिला कर चल रही थी. एक तेज हवा के झोंके ने माला की जुल्फों को उड़ा दिया और उस का दुपट्टा सीने से ढलक गया.

माला ने दुपट्टे को संभालने की कोई जरूरत नहीं समझी, बल्कि वह शान के साथ आगे बढ़ती रही. आज वह अपनी सुंदरता को छिपा नहीं रही थी और न ही दुपट्टा गिरने पर उसे शर्म आ रही थी.

क्लास में माला के साथ पढ़ने वाले लड़के रवि ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, तो तो माला रोमांचित हुए बिना न रह सकी. उसे आज इस तरह लोगों का घूरना बुरा नहीं, बल्कि अच्छा लग रहा था.

क्लास में आज माला का फोकस पढ़ाई पर भी था. क्लास खत्म कर के वह वापस घर आई, तो आईने के सामने खड़े हो कर खुद को देखने लगी.

मां ने माला को टोक दिया, ‘‘क्या बात है आजकल बहुत सजनेसंवरने लगी हो?’’

माला पहली बार घबराई नहीं, बल्कि हलकी सी मुसकराहट के साथ उस ने कहा, ‘‘अपने लिए थोड़ा अच्छा महसूस करने और शरीर को फिट रखने में कोई बुराई तो नहीं है न मां…’’

माला की बात सुन कर शांता चुप तो हो गईं, पर तुरंत ही उन की नजर माला के सुडौल और तने हुए उभारों पर गई, ‘‘अंदर क्या पहन रखा है तुम ने… यह ब्रा कहां से लाई तुम?’’

इन सवालों के बदले में माला ने शांत जवाब दिया, ‘‘यह ब्रा मैं खरीद कर लाई हूं. यह महज एक कपड़ा ही तो है, इसे ले कर इतना हंगामा क्यों है? मां, ये पुराने जमाने के खयालात ठीक नहीं लगते अब.’’

माला की बात सुन कर शांता चुप हो गईं, पर उन के दिमाग में कुछ चल रहा था.

अगले दिन माला ने लोकल अखबार में एक विज्ञापन देखा, जिस में नजीराबाद महल्ले में बनी एक मोटरसाइकिल एजेंसी के लिए कंप्यूटर की जानकारी रखने वाली एक रिसैप्शनिस्ट की जरूरत थी.

माला को अपने जेबखर्च के लिए पैसों की जरूरत तो रहती ही थी और फिर इस जौब की टाइमिंग भी उसे सूट कर रही थी, पर वह अच्छी तरह जानती थी कि पुराने विचारों वाली मां उसे कभी भी नौकरी नहीं करने देंगी, तो माला ने तुरंत ही अपने पापा को फोन मिलाया और उन से पार्टटाइम जौब करने के लिए परमिशन मांगी.

पापा ने इस शर्त पर हां कर दी कि जौब करने के चलते उस की पढ़ाई में कोई परेशानी न हो.

पापा का राजीनामा मिलते ही माला खुश हो गई थी और इंटरव्यू की तैयारी करने लगी थी.

अगले दिन शाम को इंटरव्यू था. माला अच्छी तरह से तैयार हो कर पहुंची थी. इस समय माला ने अपने कंधे के साइड में दुपट्टे को डाला हुआ था और पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू के सवालों का सामना किया.

‘‘आप ने बताया कि आप पढ़ाई करती हैं, तो इस के साथसाथ आप इस जौब को ईमानदारी और लगन से कैसे कर पाएंगी?’’ तीखा सा सवाल पूछा गया था माला से, पर माला ने पूरे आत्मविश्वास से कहा, ‘‘जब कोई इनसान किसी काम को करने की ठान लेता है तो रास्ते खुद ही बन जाते हैं सर.’’

माला का जवाब इंटरव्यू लेने वालों को पसंद आया और उसे 6,000 रुपए प्रतिमाह की जौब पर रख लिया गया.

माला इसलिए भी खुश थी कि जौब की टाइमिंग शाम को 3 बजे से रात के 8 बजे तक ही थी, इसलिए वह कालेज के साथसाथ अपनी पढ़ाई भी आराम से कर सकती थी.

पर जब माला ने जौब की बात अपनी मां को बताई तो वे भुनभुनाने लगीं, ‘‘अब यही बचा था कि घर की लड़की रात को घर लौटेगी और अंगरेजी स्टाइल के कपड़े पहनेगी,’’ पर मां की बात का माला पर कोई असर नही हुआ और उस ने अगले दिन से ही जौब पर जाना शुरू कर दिया.

माला ने अगले दिन जब पहली बार दफ्तर में कदम रखा तो उस के अंदर एक नया सा आत्मविश्वास था. नजीराबाद की उस बाइक एजेंसी के बाहर खड़े हो कर उस ने एक गहरी सांस ली, जैसे किसी नई दुनिया में दाखिल होने जा रही हो.

एजेंसी के अंदर ग्राहकों की बातचीत और कंप्यूटर की टिकटिक मिल कर एक अलग ही माहौल बना रहे थे, माला ने रिसैप्शन की कुरसी संभाली और कंप्यूटर औन किया. शुरुआत में थोड़ी झिझक थी, पर जैसेजैसे समय बीतता गया, वह सहज होती गई. ग्राहकों से बात करते समय उस की आवाज में अब पहले जैसी हिचक नहीं थी, बल्कि एक संतुलित आत्मविश्वास था.

शाम के तकरीबन साढ़े 6 बजे, दुकान में एक परिचित चेहरा दाखिल हुआ… रवि.

‘‘अरे… तुम यहां?’’ रवि ने हलकी मुसकान के साथ पूछा.

माला ने भी मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘हां, अब यहीं काम करती हूं.’’

रवि ने चारों ओर नजर घुमाई और फिर उस की तरफ देख कर बोला, ‘‘तुम पहले से अलग लग रही हो… मतलब, ज्यादा आत्मविश्वासी और अधिक सुंदर भी.’’

यह सुन कर माला के चेहरे पर हलकी सी लाली आ गई, लेकिन इस बार उस ने नजरें नहीं झुकाईं, ‘‘शायद… अब मैं खुद को थोड़ा समझने लगी हूं,’’ उस ने धीमे से कहा.

उस दिन के बाद रवि कभीकभी एजेंसी पर आने लगा, कभी कोई बाइक का पार्ट खरीदने या नई लौंच हुई बाइक को देखने के बहाने, तो कभी बस यों ही दोनों के बीच बातचीत बढ़ने लगी. पढ़ाई, शहर, सपने और जिंदगी…

उधर घर में माला की मां शांता अपनी बेटी के बदले हुए रंगढंग सबकुछ चुपचाप देख रही थीं, पर कुछ कह और कर नहीं पा रही थीं.

एक रात, जब माला खाना खा कर अपने कमरे में जा रही थी, शांता ने उसे रोक लिया, ‘‘माला, यह सब जो तुम कर रही हो… क्या यह सही रास्ता है?’’ उन की आवाज में गुस्सा कम, चिंता ज्यादा थी.

माला कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘मां, मैं गलत कुछ नहीं कर रही, बस अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रही हूं.’’

‘‘लेकिन दुनिया इतनी सीधी नहीं है,’’ शांता ने कहा.

माला ने इस बार उन की आंखों में देख कर जवाब दिया,’’ तो फिर मुझे ही मजबूत बनना पड़ेगा न मां.’’

उस रात शांता देर तक जागती रहीं. उन्हें अपनी बेटी पहली बार बड़ी लग रही थी. सिर्फ उम्र में नहीं, सोच में भी.

और माला वह अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी थी. अब वह खुद को सिर्फ एक लड़की के रूप में नहीं, बल्कि एक इनसान के रूप में देख रही थी, जिस के अपने फैसले हैं, अपने सपने हैं.

अब रवि का कालेज में मिलना, फिर एजेंसी पर आना जैसे रोज की आदत बन गया था.

एक दिन रवि ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी वजह से मुझे  अलगअलग बाइक की इतनी जानकारी हो गई है कि घर वाले भी हैरान हैं.’’

माला भी हलके से मुसकराई, ‘‘तो फिर तुम्हें कमीशन मिलना चाहिए मुझे  से.’’

दोनों हंस पड़े. धीरेधीरे उन की बातें लंबी होने लगीं. मोबाइल नंबर ले लिया गया और फिर लंबी बातें और बातें अब सिर्फ ‘कैसी हो’ तक सीमित नहीं थीं. वे अपनेअपने सपनों की बात करने लगे.

‘‘मैं चाहता हूं कि आगे चल कर अपना खुद का काम शुरू करूं,’’ रवि ने एक दिन कहा.

माला ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘और मैं… मैं बस इतना चाहती हूं कि अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं, ताकि किसी पर बोझ  न रहूं.’’

रवि ने उस की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘तुम पहले से ही बहुत मजबूत हो माला.’’

रवि की यह बात माला के दिल को छू गई. उसे पहली बार लगा कि कोई उसे समझ  रहा है. दिन बीतते गए और महीने का आखिर आ गया.

आज माला को उस की पहली सैलरी मिली थी. पूरे 6,000 रुपए. उस ने पैसे हाथ में लिए तो उस की आंखों में हलकी सी चमक आ गई. ये सिर्फ पैसे नहीं थे, बल्कि यह उस की मेहनत, उस का आत्मविश्वास और उस की पहचान थी.

घर पहुंचते ही माला ने बिना कुछ कहे वे पैसे अपनी मां के हाथ में रख दिए.

‘‘यह क्या है?’’ शांता ने चौंक कर पूछा.

माला ने ठोस स्वर में कहा, ‘‘मेरी पहली कमाई आप के लिए.’’

कुछ पल के लिए घर में सन्नाटा छा गया. शांता देवी उन पैसों को देखती रहीं, फिर अपनी बेटी को… उन के चेहरे पर जो सख्ती हमेशा रहती थी, वह धीरेधीरे पिघलने लगी, आंखों में नमी उतर आई, ‘‘तू तू ने यह सब हमारे लिए किया?’’ उन की आवाज भर्रा गई.

माला ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘आप के लिए ही तो कर रही हूं मां, ताकि आप को कभी किसी चीज की कमी न हो.’’

शांता ने बिना कुछ कहे माला को अपने सीने से लगा लिया. पहली बार था जब उन की पकड़ में गुस्से की जगह अपनापन था.

उस दिन के बाद शांता का रवैया बदलने लगा. वे अब भी अपनी सोच में पूरी तरह नहीं बदली थीं, लेकिन अब वे माला को रोकती भी नहीं थीं. उन्हें समझ  आ गया था कि उन की बेटी अब छोटी नहीं रही, अब वह  अपना भलाबुरा खुद सोच सकती है और अपने कपड़े भी खुद चुन सकती है. और सब से बड़ी बात वह गलत रास्ते पर नहीं, बल्कि अपने चुने गए सही रास्ते पर चल रही है.

उधर माला भी अब पहले से ज्यादा सुकून में थी. घर में समझदारी बढ़ रही थी और बाहर रवि के साथ उस की दोस्ती एक खूबसूरत मोड़ ले रही थी… धीरेधीरे, बिना किसी जल्दबाजी के.

फिलहाल वे दोनों एकदूसरे से शादी के बारे में नही सोच रहे थे, पर दोनों दोस्त रहते हुए एक अच्छा कैरियर तो जरूर बना लेना चाहते थे.

माला अब समीज नहीं पहनती थी, बल्कि उस की अलमारी में एक से एक डिजाइनर ब्रा का कलैक्शन था और अपनी इन ब्रा को वह कपड़ों के नीचे छिपा कर नहीं सुखाती थी.Self-Confidence Story

Mobile Phone and Family : मां और मोबाइल

Mobile Phone and Family. ‘‘मेरा मोबाइल कहां है? कितनी बार कहा है कि मेरी चीजें इधरउधर मत किया करो पर तुम सुनती कहां हो,’’ आफिस जाने की हड़बड़ी में मानस अपनी पत्नी रोमा पर बरस पड़े थे.

‘‘आप की और आप के बेटे राहुल के कार्यालय और स्कूल जाने की तैयारी में सुबह से मैं चकरघिन्नी की तरह नाच रही हूं, मेरे पास कहां समय है किसी को फोन करने का जो मैं आप का मोबाइल लूंगी,’’ रोमा खीझपूर्ण स्वर में बोली थी.

‘‘तो कहां गया मोबाइल? पता नहीं यह घर है या भूलभुलैया. कभी कोई सामान यथास्थान नहीं मिलता.’’

‘‘क्यों शोर मचा रहे हो, पापा? मोबाइल तो दादी मां के पास है. मैं ने उन्हें मोबाइल के साथ छत पर जाते देखा था,’’ राहुल ने मानो बड़े राज की बात बताई थी.

‘‘तो जा, ले कर आ…नहीं तो हम दोनों को दफ्तर व स्कूल पहुंचने में देर हो जाएगी…’’

पर मानस का वाक्य पूरा हो पाता उस से पहले ही राहुल की दादी यानी वैदेहीजी सीढि़यों से नीचे आती हुई नजर आई थीं.

‘‘अरे, तनु, मेरे ऐसे भाग्य कहां. हर घर में तो श्रवण कुमार जन्म लेता नहीं,’’ वे अपने ही वार्त्तालाप में डूबी हुई थीं.

‘‘मां, मुझे देर हो रही है,’’ मानस अधीर स्वर में बोले थे.

‘‘पता है, इसीलिए नीचे आ रही हूं. तान्या से बात करनी है तो कर ले.’’

‘‘मैं बाद में बात कर लूंगा. अभी तो मुझे मेरा मोबाइल दे दो.’’

‘‘मुझे तो जब भी किसी को फोन करना होता है तो तुम जल्दी में रहते हो. कितनी बार कहा है कि मुझे भी एक मोबाइल ला दो, पर मेरी सुनता ही कौन है. एक वह श्रवण कुमार था जिस ने मातापिता को कंधे पर बिठा कर सारे तीर्थों की सैर कराई थी और एक मेरा बेटा है,’’ वैदेहीजी देर तक रोंआसे स्वर में प्रलाप करती रही थीं पर मानस मोबाइल ले कर कब का जा चुका था.

‘‘मोबाइल को ले कर क्यों दुखी होती हैं मांजी. लैंडलाइन फोन तो घर में है न. मेरा मोबाइल भी है घर में. मैं भी तो उसी पर बातें करती हूं,’’ रोमा ने मांजी को समझाना चाहा था.

‘‘तुम कुछ भी करो बहू, पर मैं इस तरह मन मार कर नहीं रह सकती. मैं किसी पर आश्रित नहीं हूं. पैंशन मिलती है मुझे,’’ वैदेही ने अपना क्रोध रोमा पर उतारा था पर कुछ ही देर में सब भूल कर घर को सजासंवार कर रोमा को स्नानगृह में गया देख कर उन्होंने पुन: अपनी बेटी तान्या का नंबर मिलाया था.

‘‘हैलो…तान्या, मैं ने तुम से जैसा करने को कहा था तुम ने किया या नहीं?’’ वे छूटते ही बोली थीं.

‘‘वैदेही बहन, मैं आप की बेटी तान्या नहीं उस की सास अलका बोल रही हूं.’’

‘‘ओह, अच्छा,’’ वे एकाएक हड़बड़ा गई थीं.

‘‘तान्या कहां है?’’ किसी प्रकार उन के मुख से निकला था.

‘‘नहा रही है. कोई संदेश हो तो दे दीजिए. मैं उसे बता दूंगी.’’

‘‘कोई खास बात नहीं है, मैं कुछ देर बाद दोबारा फोन कर लूंगी,’’ वैदेही ने हड़बड़ा कर फोन रख दिया था. पर दूसरी ओर से आती खनकदार हंसी ने उन्हें सहमा दिया था.

‘कहीं छोकरी ने बता तो नहीं दिया सबकुछ? तान्या दुनियादारी में बिलकुल कच्ची है. ऊपर से यह फोन. स्थिर फोन में यही तो बुराई है. घरपरिवार को तो क्या सारे महल्ले को पता चल जाता है कि कहां कैसी खिचड़ी पक रही है. मोबाइल फोन की बात ही कुछ और है…किसी भी कोने में बैठ कर बातें कर लो.’ उन की विचारधारा अविरल जलधारा की भांति बह रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी थी.

‘‘हैलो मां, मैं तान्या. मां ने बताया कि जब मैं स्नानघर में थी तो आप का फोन आया था. कोई खास बात थी क्या?’’

‘‘खास बात तो कितने दिनों से कर रही हूं पर तुम्हें समझ में आए तब न. अरे, जरा अक्ल से काम लो और निकाल बाहर करो बुढि़या को. जब देखो तब तुम्हारे यहां पड़ी रहती है. कब तक उस की गुलामी करती रहोगी?’’

‘‘धीरे बोलो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो बुरा मानेंगी.’’

‘‘फोन पर हम दोनों के बीच हुई बात को कैसे सुनेगी वह?’’

‘‘छोड़ो यह सब, शनिवाररविवार को आप से मिलने आऊंगी तब विस्तार से बात करेंगे. जो जैसा चल रहा है चलने दो. क्यों अपना खून जलाती हो.’’

‘‘मैं तो तेरे भले के लिए ही कहती हूं पर तुम लोगों को बुरा लगता है तो आगे से नहीं कहूंगी,’’ वैदेही रोंआसे स्वर में बोली थीं.

‘‘मां, क्यों मन छोटा करती हो. हम सब आप का बड़ा सम्मान करते हैं. यथाशक्ति आप की सलाह मानने का प्रयत्न करते हैं पर यदि आप की सलाह हमारा अहित करे तो परेशानी हो जाती है.’’

‘‘लो और सुनो, अब तुम्हें मेरी बातों से परेशानी भी होने लगी. ठीक है, आज से कुछ नहीं कहूंगी,’’ वैदेही ने क्रोध में फोन पटक दिया था और मुंह फुला कर बैठ गई थीं.

‘‘क्या हुआ, मांजी, सब ठीक तो है?’’ उन्हें दुखी देख कर रोमा ने प्रश्न किया.

‘‘क्यों? तुम्हें कैसे लगा कि सब ठीक नहीं है?’’ वैदेही ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछ लिया.

‘‘आप का मूड देख कर.’’

‘‘मैं सब समझती हूं. छिप कर मेरी बातें सुनते हो तुम लोग. इसीलिए तो मोबाइल लेना चाहती हूं मैं.’’

‘‘मैं ने आज तक कभी किसी का फोन वार्त्तालाप नहीं सुना. आप को दुखी देख कर पूछ लिया था. आगे से ध्यान रखूंगी,’’ रोमा तीखे स्वर में बोली और अपने काम में व्यस्त हो गई.

वैदेही बेचैनी से तान्या के आने की प्रतीक्षा करती रही कि कब तान्या आए और कब वे उस से बात कर के अपना मन हलका करें पर जब सांझ ढलने लगी और तान्या नहीं आई तो उन का धीरज जवाब देने लगा. मानस सुबह से अपने मोबाइल से इस तरह चिपका था कि उन्हें तान्या से बात करने का अवसर ही नहीं मिल रहा था.

‘‘मुझे अपनी सहेली नीता के यहां जाना है, मांजी. मैं सुबह से तान्या दीदी की प्रतीक्षा में बैठी हूं पर लगता है कि आज वे नहीं आएंगी. आप कहें तो मैं थोड़ी देर के लिए नीता के घर हो आऊं. उस का बेटा बीमार है,’’ रोमा ने आ कर वैदेही से अनुनय की तो वे मना न कर सकीं.

रोमा को घर से निकले 10 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि तान्या ने कौलबेल बजाई.

‘‘लो, अब समय मिला है तुम्हें मां से मिलने आने का? सुबह से दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी हूं. आंखें भी पथरा गईं.’’

‘‘इस में टकटकी लगा कर बैठने की क्या बात थी, मां?’’ मानस बोल पड़ा, ‘‘आप मुझ से कहतीं मैं तान्या दीदी से फोन कर के पूछ लेता कि वे कब तक आएंगी.’’

‘‘लो और सुनो, सुबह से पता नहीं किसकिस से बात कर रहा है तेरा भाई. सारे काम फोन कान से चिपकाए हुए कर रहा है. बस, सामने बैठी मां से बात करने का समय नहीं है इस के पास.’’

‘‘क्या कह रही हो मां. मैं तो सदासर्वदा आप की सेवा में मौजूद रहता हूं. फिर राहुल है, रोमा है जितनी इच्छा हो उतनी बात करो,’’ मानस हंसा.

‘‘2 बेटों, 2 बेटियों का भरापूरा परिवार है मेरा पर मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यहां आए 2 सप्ताह हो गए मुझे, तान्या को आज आने का समय मिला है.’’

‘‘मेरा बस चले तो दिनरात आप के पास बैठी रहूं. पर आजकल बैंक में काम बहुत बढ़ गया है. मार्च का महीना है न. ऊपर से घर मेहमानों से भरा पड़ा है. 3-4 नौकरों के होने पर भी अपने किए बिना कुछ नहीं होता,’’ तान्या ने सफाई दी थी.

‘‘इसीलिए कहती हूं अपने सासससुर से पीछा छुड़ाओ. सारे संबंधी उन से ही मिलने तो आते हैं.’’

‘‘क्या कह रही हो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो गजब हो जाएगा. बहुत बुरा मानेंगी.’’

‘‘पता नहीं तुम्हें कैसे शीशे में उतार लिया है उन्होंने. और 2 बेटे भी तो हैं, वहां क्यों नहीं जा कर रहतीं?’’

‘‘जौय और जोषिता को मांजी ने बचपन से पाल कर बड़ा किया है. अब तो स्थिति यह है कि बच्चे उन के बिना रह ही नहीं पाते. दोचार दिन के लिए भी कहीं जाती हैं तो बच्चे बीमार पड़ जाते हैं.’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को कठपुतली बना कर रखा है उन्होंने. जैसा चाहते हैं वैसा नचाते हैं दोनों. सारा वेतन रखवा लेते हैं. दुनिया भर का काम करवाते हैं. यह दिन देखने के लिए ही इतना पढ़ायालिखाया था तुम्हें?’’

‘‘किसी ने जबरदस्ती मेरा वेतन कभी नहीं छीना है मां. उन के हाथ में वेतन रखने से वे लोग भी प्रसन्न हो जाते हैं और मेरे सासससुर भी वह पैसा अपनी जेब में नहीं रख लेते बल्कि उन्हें हमारे पर ही खर्च कर देते हैं. जो बचता है उसे निवेश कर देते हैं. ’’

‘‘पर अपना पैसा उन के हाथ में दे कर उन की दया पर जीवित रहना कहां की समझदारी है?’’

‘‘मां, आप क्यों तान्या दीदी के घर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं,’’ इतनी देर से चुप बैठा मानस बोला था.

‘‘अरे, वाह, अपनी बेटी के हितों की रक्षा मैं नहीं करूंगी तो कौन करेगा. पर मेरी बेटी तो समझ कर भी अनजान बनी हुई है.’’

‘‘मां, मैं आप के सुझावों का बहुत आदर करती हूं पर साथ ही घर की सुखशांति का विचार भी करना पड़ता है.’’

‘‘वही तो मैं कह रहा हूं. अपनी समस्याएं क्या कम हैं, जो आप तान्या दीदी की समस्याएं सुलझाने लगीं? और मां, आप ने तो दीदी के आते ही अपने सुझावों की बमबारी शुरू कर दी. न चाय, न पानी…कुछ तो सोचा होता,’’ मानस ने मां को याद दिलाया.

‘‘रोमा अभी तक लौटी नहीं जबकि उसे पता था कि तान्या आने वाली है. फोन करो कि जल्दी से घर आ जाए.’’

‘‘फोन करने की जरूरत नहीं है. वह स्वयं ही आ जाएगी. उस की मां आई हुई हैं, उन से मिलने गई है.’’

‘‘मां आई हुई हैं? मुझ से तो कह कर गई है कि नीता का बेटा बीमार है. उसे देखने जा रही है.’’

‘‘उसे भी देखने गई है. कई दिनों से सोच रही थी पर जा नहीं पा रही थी. नीता के घर के पास रोमा के दूर के रिश्ते के मामाजी रहते हैं. वे बीमार हैं और रोमा की मम्मी उन्हें देखने आई हुई हैं.’’

‘‘ठीक है, सब समझ में आ गया. मां से मिलने जा रही हूं यह भी तो कह कर जा सकती थी, झूठ बोल कर जाने की क्या आवश्यकता थी. रोमा अपना फोन तो ले कर गई है?’’

‘‘हां, ले गई है.’’

‘‘ला, अपना फोन दे तो मैं उस से बात करूंगी.’’

‘‘क्या बात करेंगी आप? वह अपनेआप आ जाएगी,’’ मानस ने तर्क दिया.

‘‘फोन कर दूंगी तो जल्दी आ जाएगी. तान्या आई है तो खाना खा कर ही जाएगी न…’’

‘‘आप चिंता न करें मां, मैं खाना नहीं खाऊंगी. आप को जो खाना है मैं बना देती हूं,’’ तान्या ने उन्हें बीच में ही टोक दिया.

‘‘फोन तो दे मानस, रोमा से बात करनी है,’’ वैदेही जिद पर अड़ी थीं.

‘‘एक शर्त पर मोबाइल दूंगा कि आप रोमा से कुछ नहीं कहेंगी. बेचारी कभीकभार घर से बाहर निकलती है. दिनभर घर के काम में जुटी रहती है.’’

‘‘ठीक है, रोमा को कुछ नहीं कहूंगी, उस की मां से बात करूंगी. कहूंगी आ कर मिल जाएं. बहुत लंबे समय से मिले नहीं हम दोनों.’’

मां को फोन थमा कर मानस और तान्या रसोईघर में जा घुसे थे.

‘‘हैलो रोमा, तुम नीता के बीमार बेटे से मिलने की बात कह कर गई थीं. सौदामिनी बहन के आने की बात तो साफ गोल कर गईं तुम,’’ वैदेही बोलीं.

‘‘नहीं मांजी, ऐसा कुछ नहीं था. मुझे लगा, आप नाराज होंगी,’’ रोमा सकपका गई.

‘‘लो भला, मांबेटी के मिलने से भला मैं क्यों नाराज होने लगी? सौदामिनी बहन को फोन दो जरा. उन से बात किए हुए तो महीनों बीत गए,’’ वैदेहीजी का अप्रत्याशित रूप से मीठा स्वर सुन कर रोमा का धैर्य जवाब देने लगा था. उस ने तुरंत फोन अपनी मां सौदामिनी को थमा दिया था.

‘‘नमस्ते, सौदामिनी बहन. आप तो हमें भूल ही गईं,’’ उन्होंने उलाहना दिया.

‘‘आप को भला कैसे भूल सकती हूं दीदी, पर दुनिया भर के पचड़ों से समय ही नहीं मिलता.’’

‘‘तो यहां तक आ कर क्या हम से मिले बिना चली जाओगी? मेरा तो सब से मिलने को मन तरसता रहता है. इसीलिए बच्चों से कहती हूं एक मोबाइल ला दो, कम से कम सब से बात कर के मन हलका कर लूंगी.’’

रसोईघर में भोजन का प्रबंध करते मानस और तान्या हंस पड़े थे, ‘‘मां फिर मोबाइल पुराण ले कर बैठ गईं, लगता है उन्हें मोबाइल ला कर देना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं ने भी कई बार सोचा पर डरती हूं अपना मोबाइल मिलते ही वे हम भाईबहनों का तो क्या, अपने खानेपीने का होश भी खो बैठेंगी.’’

‘‘मुझे दूसरा ही डर है. फोन पर ऊलजलूल बात कर के कहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दें.’’

‘‘जो भी करें, उन की मर्जी है. पर लगता है कि अपने अकेलेपन से जूझने का इन्होंने नया ढंग ढूंढ़ निकाला है.’’

‘‘चलो, तान्या दीदी, आज ही मां के लिए मोबाइल खरीद लाते हैं. इन का इस तरह फोन के लिए बारबार आग्रह करना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘चाय तैयार है. चाय पी कर चलते हैं, भोजन लौट कर करेंगे,’’ तान्या ने स्वीकृति दी थी.

‘‘मैं रोमा और जीजाजी दोनों को फोन कर के सूचित कर देता हूं कि हम कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो तुम दोनों?’’ वैदेही ने अपना दूरभाष वार्त्तालाप समाप्त करते हुए पूछा.

‘‘हम दोनों नहीं, हम तीनों. चाय पियो और तैयार हो जाओ, आवश्यक कार्य है,’’ मानस ने उन का कौतूहल शांत करने का प्रयत्न किया.

वे उन्हें मोबाइल की दुकान पर ले गए तो उन की प्रसन्नता की सीमा न रही. मानो कोई मुंह में लड्डू ठूंस दे और उस का स्वाद पूछे.

वैदेहीजी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे लंबे समय से अपने मनपसंद खिलौने के लिए मचलते बच्चे को उस का मनपसंद खिलौना मिल गया हो.

उन्होंने अपनी पसंद का अच्छा सा मोबाइल खरीदा जिस से अच्छे छायाचित्र खींचे जा सकते थे. घर के पते आदि का सुबूत देने के बाद उन के फोन का नंबर मिला तो उन का चेहरा खिल उठा.

‘‘आप को अपना फोन प्रयोग में लाने के लिए 24 घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी,’’ सेल्समैन ने बताया तो वे बिफर उठीं.

‘‘यह कौन सी दुकान पर ले आए हो तुम लोग मुझे? इन्हें तो फोन चालू करने में ही 24 घंटे लगते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है, मां जहां आप ने इतने दिनों तक प्रतीक्षा की है एक दिन और सही,’’ तान्या ने समझाना चाहा.

‘‘तुम नहीं समझोगी. मेरे लिए तो एक क्षण भी एक युग की भांति हो गया है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

घर पहुंचते ही फोन को डब्बे से निकाल कर उस के ऊपर मोमबत्ती जलाई गई. फिर बुला कर सब में मिठाई बांटी, मानो मोबाइल का जन्म उन्हीं के हाथों हुआ था और उस के चालू होने की प्रतीक्षा की जाने लगी.

यह कार्यक्रम चल ही रहा था कि रोमा, सौदामिनी और अपने मामा आलोक बाबू के साथ आ पहुंची.

वैदेही का नया फोन आना ही सब से बड़ा समाचार था. उन्होंने डब्बे से निकाल कर सब को अपना नया मोबाइल फोन दिखाया.

‘‘कितना सुंदर फोन है,’’ राहुल तो देखते ही पुलक उठा.

‘‘दादी मां, मुझे भी दिया करोगी न अपना मोबाइल?’’

‘‘कभीकभी, वह भी मेरी अनुमति ले कर. छोटे बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है न सौदामिनी बहन.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ सौदामिनी ने सिर हिला दिया था.

‘‘सच कहूं, तो आज कलेजा ठंडा हो गया. यों तो राहुल को छोड़ कर सब के पास अपनेअपने मोबाइल हैं. पर अपनी चीज अपनी ही होती है. आयु हो गई है तो क्या हुआ, मैं ने तो साफ कह दिया कि मुझे तो अपना मोबाइल फोन चाहिए ही. मैं क्या किसी पर आश्रित हूं? मुझे पैंशन मिलती है,’’ वे देर तक सौदामिनी से फोन के बारे में बातें करती रही थीं.

कुछ देर बाद सौदामिनी और आलोक बाबू ने जाने की अनुमति मांगी थी.

‘‘आप ने फोन किया तो लगा कि यहां तक आ कर आप से मिले बिना जाना ठीक नहीं होगा,’’ सौदामिनी बोलीं.

‘‘यही तो लाभ है मोबाइल फोन का. अपनों को अपनों से जोड़े रखता है,’’ वैदेही ने उत्तर दिया.

‘‘चिंता मत करना. अब मेरे पास अपना फोन है. मैं हालचाल लेती रहूंगी.’’

‘‘मैं भी आप को फोन करती रहूंगी. आप का नंबर ले लिया है मैं ने,’’ सौदामिनी ने आश्वासन दिया था.

हाथ में अपना मोबाइल फोन आते ही वैदेही का तो मानो कायाकल्प ही हो गया. उन का मोबाइल अब केवल वार्त्तालाप का साधन नहीं है. उन के परिचितों, संबंधियों और दोस्तों के जवान बेटेबेटियों का सारा विवरण उन के मोबाइल में कैद है. वे चलताफिरता मैरिज ब्यूरो बन गई हैं. पहचान का दायरा इतना विस्तृत हो गया है कि किसी का भी कच्चा चिट्ठा निकलवाना हो तो लोग उन की ही शरण में आते हैं.

‘‘इस बुढ़ापे में भी अपने पांवों पर खड़ी हूं मैं. साथ में पैंशन भी मिलती है,’’ वे शान से कहती हैं. और एक राज की बात. उन के पास अब एक नहीं 5 मोबाइल फोन हैं जो पहले दूरभाष पर उन के लंबे वार्त्तालाप का उपहास करते थे अब उसी गुण के कारण उन का सम्मान करने लगे हैं. Mobile Phone and Family

Healthcare System Crisis: सरकारी अस्पताल की हवा से सिट्टीपिट्टी गुम

Healthcare System Crisis. पहले सरकार से हर रोज कोई न कोई शिकायत रहती थी. अब केवल खुद से रहने लगी है. आज तक न तो सरकार से मुझे अपनी शिकायतों का हल मिला, न ही खुद से.

सरकार द्वारा जनता की शिकायतों के हल के लिए खुले हर ‘शिकायत निवारण कक्ष’ के बाहर जब तक टांगों में दम रहा, मैं घंटों खड़ा रहा. बहुत बार तो ‘शिकायत निवारण कक्ष’ के मुंह पर

जंग लगे ताले ही लटके मिले और जो कभीकभार कोई ‘शिकायत निवारण कक्ष’ खुला भी मिला तो वहां पहले से ही शिकायत करने वालों की इतनी लंबी लाइन थी कि शिकायत लिखवाने में ही हफ्तों लग जाएं. ऐसी शिकायत का हल दोबारा जन्म लेने के बाद भी मिल जाए, तो भी तालियां.

जब मैं ने महसूस किया कि मेरी अपने से शिकायतें कुछ ज्यादा ही बढ़ रही हैं तो पड़ोस के एक गुणी ने मुझे सलाह दी, ‘‘देखो बंधु, मैं एक बार फिर चेतावनी दे रहा हूं कि जब तक तुम्हारा समय पूरा नहीं हो जाता, ऊपर मत चल पड़ना. अगर ऐसा किया तो वहां शरणार्थी शिविर में रहना पड़ेगा और तुम शरणार्थी शिविरों की बदहाल जिंदगी के बारे तो जानते ही हो. फिर मत कहना कि… इसलिए जब तक समय पूरा नहीं हो जाता, जैसेतैसे दम साधे जीने की कोशिश करते रहो दोस्त. यही तुम्हारे लिए बेहतर है.

‘‘तो क्यों न अब ऐसा करो कि अपना बचा समय काटने के लिए खुद को सरकारी अस्पताल में चैक करा आओ. ऐसे में थोड़ा बदलाव भी हो जाएगा और अस्पताल की भागदौड़ में 2-4 पुराने दोस्त भी मिल जाएंगे. घर में वैसे भी तुम अकेले पड़ेपड़े सड़ते रहते हो.’’

उस गुणी की सलाह मुझे नेक लगी और मैं सरकारी अस्पताल को कूच कर गया.

अस्पताल गया तो पता चला कि अपने प्राइवेट क्लिनिक से बड़े दिनों बाद डाक्टर साहब वहां आए थे. हो सकता है, उन के हाथों ही मेरी मौत लिखी थी.

मेरे ऊपर जाने सौरी खुद को चैक करवाने की बारी आई तो मैं डाक्टर के पास हो लिया.

वे मुझे बड़े ही बुझे मन से चैक करते हुए पूछने लगे, ‘‘क्या बात है? सरकारी अस्पताल ही क्यों आए हो? घर में चैन से नहीं मर सकते थे क्या?

‘‘आजकल अजीब सा फैशन हो गया है जनता में. हर कोई घर में मरने के बदले अस्पताल में आ कर मरना चाहता है. पता नहीं, अस्पताल आ कर मरने में ऐसा क्या खास है कि… चलो, उस तरफ को लेट जाओ.’’

dमैं ने उन के कहे ओर लेटते हुए कहा, ‘‘असल में सर क्या है न कि लोगों में किसी ने यह अफवाह फैला दी है कि जो सरकारी अस्पताल में मरता है वह सीधा बैकुंठ को जाता है.’’

वे चौंके, ‘‘सच?’’

‘‘जी हुजूर, वरना सारी उम्र अपने घर में तिलतिल कर मरने के बाद आप के अस्पताल में मरने कौन बेवकूफ आता.’’

‘‘यहां आने के लिए क्या महसूस किया तुम ने?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘डाक्टर साहब, मन की बात कहूं तो अब सांस लेने का भी मन नहीं कर रहा है. खून की कमी तो मुझ में है ही, उस के बाद भी सिस्टम के खटमलों ने मुझे इतना चूसा कि…’’ मैं ने लंबी सांस लेने की नाजायज कोशिश की.

‘‘सिस्टम में खटमल? पर सरकार तो कहती है कि सिस्टम अब खटमल फ्री हो गया है. जरा और जोर लगा कर जीने की हिम्मत करो,’’ डाक्टर बोले.

‘‘नहीं सर, सच पूछो तो अभी आप के सरकारी अस्पताल के बिस्तर भी खटमल फ्री नहीं हुए हैं. पिछली दफा जब खून की कमी होने पर खून चढ़वाने आया था तो यहां से डिस्चार्ज होते वक्त 2 ग्राम खून कम हो गया था. सिस्टम की बात तो आप छोडि़ए.’’

‘‘काफी निचुड़े हुए लगते हो?’’ डाक्टर साहब ने हंसते हुए मुझे दूसरी ओर को पलटा, ‘‘तो इस के सिवा और क्याक्या महसूस करते हो तुम?’’

‘‘खैर, भूख तो बहुत पहले कभी लगती थी डाक्टर साहब. जब कुछ खाने को नहीं मिला तो अब उस ने भी लगना बंद कर दिया है. शुरूशुरू में जब चक्कर आते थे तो मैं तो नहीं, पर मेरी आत्मा बहुत परेशान होती थी. पर जब लगातार चक्कर पर चक्कर आने लगे तो उस ने मेरे चक्करों के बारे में सोचना ही छोड़ दिया.

‘‘शुरूशुरू में टांगों में कंपन हुई तो मैं बहुत घबराया. अब तो रोज ही टांगों में कंपन रहती है तो मैं ने इसे ऊपर वाले का उपहार मान लिया.’’

‘‘बड़ी हिम्मत वाले हो यार तुम. जीना है तो और हिम्मत वाले बनो,’’ डाक्टर साहब ने पीठ के बदले मेरा पेट थपथपाने के बाद पूछा, ‘‘तो अब…?’’

‘‘कुछ दिनों से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. जब दिक्कत कुछ ज्यादा ही हो गई तो… पर मैं वह बंदा हूं साहब, जो बिना किसी की परवाह किए शुद्ध जल के बिना जी सकता है. शुद्ध अन्न के बिना जी सकता है, शुद्ध मन के बिना भी जी सकता है. लेकिन हवा के बिना जब जीना मुश्किल लगा तो…’’

‘‘पर यार…’’

‘‘क्या सर…’’ मैं ने इतना ही कहा था कि तभी सायरन बजा तो मुझे छोड़ कर भागते डाक्टर साहब से मैं ने पूछा, ‘‘यह सायरन कैसा है सर? कोई बड़ी मुसीबत आ गई है क्या?’’

‘‘बचना है तो भाग, अस्पताल की हवा खत्म हो गई है.’’

‘‘अब सर…?’’

‘‘जो मरीज ठीक होना चाहें उन्हें मेरी सलाह है कि वे कुछ दिन अस्पताल से बाहर भी रहा करें,’’ कहते हुए उन्होंने अस्पताल से नौ दो ग्यारह होने के लिए कमर कसी.

‘‘मतलब?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘‘नो मोर बकवास. जान बचानी है तो भाग पेशेंट भाग,’’ कह कर डाक्टर साहब नजर नहीं आए.

Hindi Story : रेत, धुआं और उम्मीद

Hindi Story. विकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सबकुछ छोड़ कर भागना पड़ेगा. दुबई की चमचमाती इमारतों के बीच उस ने अपने सपनों का एक छोटा सा संसार बना लिया था. एक अच्छी नौकरी, सलीके की जिंदगी और भविष्य के सुनहरे ख्वाब… सबकुछ ठीक चल रहा था.

फिर अचानक दुनिया बदल गई. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने देखते ही देखते युद्ध का रूप ले लिया. खाड़ी देशों में डर का माहौल फैल गया. कंपनियां बंद होने लगीं, फ्लाइट्स अनिश्चित हो गईं और लोगों को अपनेअपने देश लौटने की सलाह दी जाने लगी.

विकास की कंपनी ने भी एक दिन अचानक ईमेल भेज दिया, ‘औपरेशन्स अनिश्चितकाल के लिए बंद किए जा रहे हैं.’

कुछ ही दिनों में विकास ने अपना कमरा खाली किया, जरूरी सामान समेटा और एक भीड़ भरी फ्लाइट में बैठ कर भारत लौट आया.

भारत आना आसान था, लेकिन यहां टिकना मुश्किल. शुरुआत के कुछ दिन तो अपने शहर की मिट्टी ने उसे सुकून दिया. मां के हाथ का खाना, अपने कमरे की दीवारें… सबकुछ अपनापन दे रहा था, लेकिन 2 हफ्ते बीततेबीतते हकीकत सामने आने लगी.

नौकरी पाना आसान नहीं था. 2 महीने गुजर गए. बैंक बैलेंस धीरेधीरे खत्म होने लगा. दुबई में जोकुछ जमा किया था, वह अब रोजमर्रा के खर्च में पिघल रहा था. घर में किसी से कुछ कहना उसे अच्छा नहीं लगता था. विकास अब भी सुबह तैयार हो कर ऐसे निकलता जैसे किसी बड़े औफिस में जा रहा हो. असल में वह इंटरव्यू के पीछेपीछे भटक रहा था.

ए क दिन विकास एक कंपनी से बुलावा आया. इंटरव्यू दूसरे शहर में था. जेब में पैसे बहुत कम थे, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी थी. उस ने टिकट के लिए स्लीपर क्लास चुनी, और बाकी खर्च बचाने के लिए रात का सफर किया. सुबह जब वह स्टेशन पहुंचा, तो उस के पास बस इतने पैसे बचे थे कि वापसी का टिकट लिया जा सके या दिनभर का खर्च चलाया जा सके.

विकास ने खुद से कहा, ‘‘पहले मौका पकड़ो, फिर बाकी देखेंगे.’’

स्टेशन के बाहर विकास ने आटोरिकशा नहीं लिया. मोबाइल में मैप देखा… औफिस 3 किलोमीटर दूर था. वह पैदल ही चल पड़ा.

धूप तेज होती जा रही थी, लेकिन विकास ने अपनी चाल नहीं धीमी की. हर कदम के साथ उस के अंदर एक जिद जाग रही थी, ‘मुझे  हारना नहीं है.’

औफिस पहुंच कर विकास ने वाशरूम में खुद को ठीक किया. पसीना पोंछा, शर्ट सीधी की, बाल संवारे और चेहरे पर वही आत्मविश्वास ओढ़ लिया, जो अब उस की सब से बड़ी पूंजी था. रिसैप्शन पर बैठ कर वह इंतजार करने लगा.

भूख धीरेधीरे अपना असर दिखाने लगी थी, लेकिन विकास ने पानी पी कर खुद को संभाला. आसपास बैठे लोगों को देख कर वह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि कौन सच में जरूरतमंद है और कौन सिर्फ बेहतर मौके की तलाश में. फिर उसे अहसास हुआ कि शायद सब उस की ही तरह हैं, बस कोई दिखा नहीं रहा.

इंटरव्यू के दौरान विकास ने पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए. उस ने अपने अनुभव, अपनी गलतियां और अपने संघर्ष… सबकुछ खुल कर बताया.

बाहर निकलते समय विकास को नहीं पता था कि उसे नौकरी मिलेगी या नहीं, लेकिन एक अजीब सी शांति उस के अंदर थी…

वापसी का सफर अब भी बाकी था. जेब में बचे पैसों से विकास ने सिर्फ एक कप चाय ली. भूख अब तेज हो चुकी थी, लेकिन उस ने खुद को रोका.

‘घर पहुंच कर खा लूंगा,’ यह सोच कर विकास प्लेटफार्म पर बैठ गया. उस के पास समय था और सोचने के लिए बहुतकुछ.

विकास को याद आया दुबई का वह दिन, जब वह औफिस की खिड़की से बाहर देखता हुआ भविष्य की योजनाएं बना रहा था और आज… वह उसी भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा था.

ट्रेन आई. विकास स्लीपर कोच में चढ़ गया और अपनी सीट पर बैठ गया. रात गहराने लगी. हवा में हलकी ठंडक थी.

विकास ने आंखें बंद कीं और खुद से कहा, ‘‘जिंदगी ने मुझे पीछे जरूर धकेला है, लेकिन खत्म नहीं किया.’’

अगली सुबह जब विकास घर पहुंचा, तो थकान उस के शरीर में थी, लेकिन आंखों में एक नई चमक थी. मोबाइल औन किया तो एक ईमेल उस का इंतजार कर रहा था, ‘‘आप को अगले राउंड के लिए शौर्टलिस्ट किया गया है.’

विकास हलके से मुसकराया. संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था, लेकिन रास्ता बंद भी नहीं था.

विकास जानता था… जब तक इनसान कोशिश करता रहता है, तब तक जिंदगी कहीं न कहीं उस के लिए एक दरवाजा खुला रखती है. Hindi Story

–प्रज्ञा पांडेय मनु

Manoranjak Kahanhi : नाता

Manoranjak Kahanhi. छमिया ने गीले कपड़े निचोड़ कर छत पर बंधे तार पर डालने के लिए नजर उठाई, तो भरेभरे बदन के सांवले श्यामू को अपनी ओर ताकते पाया.

हालांकि छमिया के देखने पर श्यामू थोड़ा असहज जरूर हुआ और उस ने अपने बालों को इस तरह झटका दिया, जैसे उस की नजर अभी छमिया पर है और वह उस से नजरें हटा भी रहा है, मगर सच बात की चुगली उस की झेंपी नजरें कर रही थीं.

छमिया की जिन झील जैसी आंखों में डूबने को मन उतावला था, उन की एक हिलोर ही श्यामू को मेमना बना गई थी. भरेपूरे बदन पर जवानी का वसंत खिलाए छमिया ने तो उस से कुछ कहा भी नहीं था, पर श्यामू चाहने पर भी उसे दोबारा देखने की हिम्मत न जुटा सका.

वह तो कहो, अकेलेपन से ऊबी छमिया ने ही बात संभाल ली और कहा, ‘‘तुम तो लड़कियों की तरह शरमाते हो. अरे, मुझे  ही देख रहे थे न? कोई बात नहीं. अब मुंह क्यों छिपाते हो?’’

गांव में इतनी खुली हंसी हंस कर ऐसी बात कहने वाली औरत के बारे में श्यामू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. वह तो शहर से इम्तिहान दे कर आया था और गांव में बोरियत से बचने के लिए शाम को छत पर बैठ गया था. पास के मिले घर की छत पर आई छमिया पर उस की नजर पड़ गई और पहली नजर में ही उस के मन की हालत जाने क्याक्या होने लगी.

छमिया की बात ने श्यामू को कुछ भरोसा दिया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘म…म… मैं ने सोचा कि तुम बुरा मान गई हो.’’

‘‘यह लो, सालभर बाद तो तुम नजर आए और मैं बुरा मान कर बैठ जाऊं. फिर बुरा किस बात का? हम लोग तो देवरभाभी ठहरे, जिन में हंसीमजाक होता ही रहता है. तुम्हारा नाम जरूर श्यामू है, पर तुम में कृष्ण वाले कोई गुण नहीं हैं. हां, राधा की तरह शरमाते जरूर हो,’’ छमिया श्यामू को निगाहों में तौलते हुए मुसकरा कर बोली.

‘‘कृष्ण बनूंगा तो किसी गोपी की भी जरूरत पड़ेगी न,’’ किसी तरह हिम्मत बांध कर श्यामू कह गया.

‘‘क्या इतने बड़े इलाहाबाद में तुम्हें कोई गोपी ही नहीं मिली?’’ छमिया की आंखें मुसकरा रही थीं और देह में मस्ती दिख रही थी.

‘‘अगर मिली होती, तो तुम्हें क्यों ताकता?’’ छमिया के खुलेपन ने श्यामू को ढीठ बना दिया था.

‘‘तो कब आ रहे हो माखनदही चुराने?’’ यह कहते हुए छमिया की आंखों में न्योता था.

पासपड़ोस के लोग ज्यादा दिनों बाद गांव आते हैं, तो घरघर में उन का मेहमान जैसा स्वागत होता है. वैसे तो श्यामू भले ही न जाता, पर अब तो जाना उस के मन की मजबूरी बन गया.

‘‘दहीमाखन के बजाय चाय ही मिल जाए, तब आ जाऊं,’’ कह कर श्यामू मुसकरा उठा. उस के चेहरे पर हसरत बरस रही थी.

‘‘तो अभी आ जाओ, लेकिन दरवाजे से आना, ताकि तुम्हारी चाची कुछ और न सोचने लगें. अभी वे दरवाजे पर अन्ना दीदी को बैठा कर गई हैं. जैसे मैं अकेली रहूंगी, तो भाग जाऊंगी,’’ छमिया हंसी, तो श्यामू रीझ  कर रह गया.

छमिया का पति सुशील 7 साल से बाहर कमाई कर रहा था. यही देख कर तो छमिया की मां ने कहा था, ‘बेटी राज करेगी, लड़का बड़ा कमाऊ है.’

मां की बात तो ठीक थी. सुशील ठेके पर काम ले कर अच्छी कमाई कर के घर बनवाने के अलावा 2 एकड़ खेत भी खरीद चुका था. दरवाजे पर 2 भैंसें भी बंधी थीं. जब वह गांव आता, तो छमिया के लिए बढि़या कपड़े और छोटामोटा जेवर भी लाता. घर में खानेपीने की कमी नहीं थी. पर पेट के अलावा भी तनमन में कोई भूख जगती है. इस बात को सुशील भले न जानता हो, पर छमिया उस से अनजान नहीं है.

जाड़े की रातें, सावनभादों की झाड़ी, गरमी की लंबी दोपहरें क्या तनमन को बेचैन नहीं करती हैं? पर यह क्या छमिया के कहने की बातें हैं? अंधे के आगे रोने से क्या फायदा?

एक बार तो छमिया ने सुशील से कहा भी था, ‘अब बाहर कमाने की जरूरत नहीं है. यहां खानेखर्चने भर को खेत हैं ही. उन्हीं में पसीना बहाएंगे, तो धरती माता दुखी नहीं रहने देंगी. तुम्हारे बिना अकेला घर काट खाता है.’

‘क्यों, घर में अम्मां और दीदी नहीं रहतीं? चौपाल पर बापू तो रहते ही हैं,’ कहते हुए सुशील हंसा था.

‘तुम हंसते हो. इन सब की नजरें कोतवाल की नजरें हैं. औरत का खयाल रखने वाली नजर तो अपने आदमी की ही होती है,’ छमिया ने गंभीर हो कर कहा था. यह सुन कर सुशील ने उस के गले में अपनी बांहें डाल दी थीं.

सुशील बोला था, ‘घर बैठ कर मैं तुम्हें देखूं और तुम मुझे देखो, तो हो चुकी कमाई. जवानी में कमाया हुआ ही जिंदगीभर काम आता है.’

छमिया का मन हुआ कि कह दे अगर जवानी ही रीती बीत गई, तो कमाई में क्या आग लगाई जाएगी. मगर कह न सकी. उस के मन में आया कि कह दे कि जब और कोई देखने लगेगा, तब तुम्हारी आंखें खुलेंगी.

आज सजीली कदकाठी के श्यामू को देख कर छमिया का मन खुशी से झूमने लगा. वैसे वह बात ही क्यों करती. बातें भी तो इच्छाओं की खिड़कियां होती हैं.

10 मिनट बाद श्यामू ने दरवाजे पर बैठी अन्ना दीदी के पैर छुए और ‘चाचीचाची’ कहता हुआ सीधे आंगन में चला गया. चाची यानी छमिया की सास के बारे में उसे पता था कि वे हैं नहीं, पर बहाने के लिए ही सही, कुछ तो कहना ही था.

छमिया रसोई में पकौड़े तल रही थी. चाय तैयार हो चुकी थी.

श्यामू को अपनी ओर आता देख कर छमिया ने अपने कमरे की ओर इशारा कर दिया.

छमिया का सजाधजा कमरा उस की सुरुचि की गवाही दे रहा था. श्यामू को खुशी हुई. वह कोने में रखी कुरसी पर बैठ गया.

जब छमिया चायनाश्ता ले कर आई, तो वह बोली, ‘‘यह लो, अजनबियों की तरह किनारे बैठ गए. सीधे पलंग पर आ जाओ. यहां तो देवरभाभी ही हैं… है न? इतनी दूरी ठीक नहीं होती है. न आओ, तो मैं बांह पकड़ कर उठाऊं.’’

श्यामू को लगा, अगर उस ने देर की, तो छमिया बांह पकड़ ही लेगी. वह उठ कर पलंग पर बैठ गया.

श्यामू ने पकौड़ों की तारीफ की, तो छमिया बोली, ‘‘मुझे बनाओ मत. अच्छे होते, तो 2 पकौड़ों में ही हाथ न जोड़ जाते.’’

‘‘तुम्हें बनाने की मेरी कूवत कहां है? पर जिस ने बनाया है, फुरसत में बनाया है. फिर तुम्हारे पकौड़े क्यों न अच्छे होंगे?’’ श्यामू ने उस की आंखों में झांक कर कहा.

‘‘सच कहना. तुम्हारे भैया ने तो कभी यह नहीं कहा,’’ लाज की गुलाबी लाली छमिया के गोरे मुंह में घुल कर बिखर गई.

‘‘भैया यही जानते तो बाहर क्यों पड़े होते? हीरे की कदर तो जौहरी ही जानता है,’’ श्यामू ने हंस कर कहा.

बात छमिया के मन में उतर गई. श्यामू इतना प्यारा उसे पहले कभी नहीं लगा था. उस का मन तन को भी पिघला रहा था. पर छमिया बहू थी, जिस पर अपनी नहीं, समाज की बेडि़यां हैं. दरवाजे पर बैठी 40 साल की विधवा ननद की नजरें, सास की नजरें, ससुर की मर्यादा उस के मन की लहरों पर भारी पड़ रही थीं. वह पकौड़े खाना भूल गई थी.

श्यामू ने कहा, ‘‘मेरी बात बुरी लगी हो, तो माफ करना. तुम तो पकौड़े खाना तक भूल गई हो. अब मैं भी नहीं खाऊंगा.’’

श्यामू उठने को हुआ, तो अनजाने ही छमिया ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा लिया. अब श्यामू से न रहा गया. उस ने छमिया के मुंह में पकौड़ा ठूंसते हुए कहा, ‘‘तुम न खाओगी, तो मैं भी नहीं बैठूंगा.’’

छमिया को मुंह खोलना पड़ा. एक पल में बेतकल्लुफी बढ़ गई और वह श्यामू की ओर ऐसे अपनेपन से देखने लगी, जिस का अनुभव श्यामू ने सारी जिंदगी नहीं किया था. उसे लगा कि ऊपर से सुखी छमिया भाभी के मन में जाने कितनी सावनभादों की घटाएं हैं, जो बरसने को बेचैन हैं.

श्यामू को जाना अच्छा नहीं लग रहा था, पर छमिया की मर्यादा की खातिर उठने लगा, तो कमरे के दरवाजे तक आई छमिया ने कहा, ‘‘रात 11 बजे आना. मेरे कमरे की कुंडी खुली रहेगी. और हां, छत पर पैर न रखना. मुंडेरमुंडेर ही आना, नहीं तो दारोगा साहब यानी तुम्हारी दीदी कुत्ते की नींद सोती हैं, तूफान मचा देंगी,’’ उस ने श्यामू का हाथ पकड़ लिया.

श्यामू ने अपनी बांहें उस के गले में डाल कर आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘और अगर दीदी अपने बाहरी कमरे का दरवाजा खोल कर आंगन में इधरउधर झांकीं तो?’’

‘‘इतना डरते हो? आंगन की तरफ से कुंडी बंद कर लूंगी. वे बाहर भले ही चली जाएं, अंदर आने का रास्ता ही न रहेगा,’’ छमिया ने श्यामू का शक दूर करते हुए उसे विदा किया.

कई दिन बीत जाने पर अन्ना दीदी को लगा कि छमिया आजकल बहुत खिली सी रहती है. खानेपीने की चीजें अच्छी बनती हैं. उन की कुटिल बुद्धि ने सोचा कि हो न हो, दाल में कुछ काला है. उन्हें लगा कि श्यामू के आने के बाद से ही यह बदलाव हुआ है. वह पता लगाएंगी. यों भी उन्हें नींद कम ही आती थी, पर उस रात तो वे सोई नहीं.

रात के 11 बजे अन्ना दीदी को लगा जैसे कोई छत से नीचे उतरा है. वे बोलीं, ‘‘बहू, यह आवाज किस की थी?’’

‘‘बिल्ली कूदी है. दूधमट्ठा खा कर इस पर जवानी चढ़ी है न. दिनभर काम में मरोखपो, बाद में ये नींद में खलल करें,’’ छमिया ने जवाब दिया.

अन्ना दीदी ने चुप रहना ही ठीक समझा. वे ननद हैं, पर मायके पर बहू जैसा उन का हक कैसे होगा. यह बेटे की बहू है, तभी झल्लाती है. होगी बिल्ली, उन्हें क्या? वे तो चोरचकार के मारे बोली थीं.

वे अनमनी हो कर लेट गईं. तब तक उन के कानों में श्यामू की हंसी गूंजी.

वह धीरे से बोला, ‘‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे.’’

‘‘कोतवाली सहतेसहते प्राण घुट गए हैं,’’ छमिया की आंखों में आंसू थे.

अब अन्ना दीदी से रहा न गया. उन्होंने कुछ सुना, कुछ न सुना. पर उन के मन का शक बढ़ गया. मरदानी हंसी के होने का शक बढ़ गया. अजीब बात है, दरवाजा उन के कमरे से ही है. कोई है, तो आया कहां से? पूछने पर बहू गुर्राती है.

वे दरवाजा खोल कर खुद नजर डाल लेंगी, इसी सोच से आंगन की ओर का दरवाजा खोला, पर वह खुल न सका. खुलता भी कैसे? छमिया ने उस में कुंडी जो लगा दी थी.

दीदी के दरवाजा भड़भड़ाने पर छमिया बोली, ‘‘दिनभर हाड़ जला कर काम करो, रात में बारबार दरवाजा मुझ से न खोला जाएगा.’’

‘‘तुम ने दरवाजा बंद ही क्यों किया?’’ दीदी ने अपना सब से बड़ा दांव चल दिया.

‘‘अब मैं अपने घर में दरवाजा भी बंद नहीं कर सकती. तुम्हारे कमरे में आ कर आवारा कुत्ते बंद रह जाते हैं. सवेरे उन की गंदगी क्या मेरा बाप साफ करेगा?’’ बात इतने ताव में कही गई थी कि अन्ना दीदी सन्न रह गई थीं.

अब उन के पास यही चारा था कि भाई से कह कर जी हलका करें, ताकि उन पर समय रहते चेताने का दोष न लगे. घर में एक मोबाइल फोन है, वह इन्हीं रानी के पास रहता है. पड़ोस के मोबाइल वालों के मोबाइल पर हर बात कही नहीं जा सकती है.

फिर भी उन्होंने भाई को फोन किया और वह आया भी. दीदी ने उस से अपने कमरे में ही कहासुना भी.

जब त्योरी चढ़ाए सुशील कमरे में घुसा, तो छमिया टपटप आंसू बहा रही थी. वह बोला, ‘‘रोओ नहीं, साफसाफ बताओ?’’

‘‘मेरी मानोगे? मैं तो यहां पराई हाड़ हूं. और तो सब तुम्हारे अपने ही हैं. उन की सुनो. मुझे  मेरे मायके छोड़ दो या जहर की गोलियां ला दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी,’’ छमिया ने सुशील के गले में बांहें डाल कर कहा. उस की हिचकियां बंध गई थीं.

सुशील सोच में पड़ गया. हो सकता है, दीदी को धोखा हुआ हो, पर इसे दरवाजा तो अंदर से बंद न रखना चाहिए था. वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम ने आंगन का दरवाजा अंदर से बंद क्यों किया था?’’

‘‘अब मेरा मुंह मत खुलवाओ,’’ छमिया आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘क्यों, क्या बात है?’’ यह कहते हुए सुशील सकते में आ गया.

‘‘यह जांघ खोलो तो अपनी लाज जाती है, वह खोलो तो…’’ आगे की बात उस ने अधूरी सी छोड़ दी.

‘‘साफसाफ कहो, पहेली न बुझाओ,’’ सुशील सुनने को बेचैन था.

‘‘इन के कमरे में जाने कौनकौन आता है और क्याक्या होता है. यह देखने से अच्छा है, मैं इधर का दरवाजा ही बंद कर लेती हूं. सुनोगे, तो हैरान रह जाओगे. इन का क्या बिगड़ेगा? तुम जेल में होगे या फिर मैं इन्हीं की तरह विधवा हो जाऊंगी. ये तो यही चाहती हैं.

‘‘अब या तो मुझे मायके छोड़ दो या अपने साथ लिए चलो. जिस इज्जत के लिए तुम रातदिन एक किए हो, उस का उछलना मैं न देख सकूंगी,’’ सुशील के गले में बांहें डाल कर सिसकसिसक कर छमिया ने कहा.

सुशील ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘मायके जाने का नाम न लो. यहां तुम्हारे जिम्मे घर की मर्यादा है. मैं खुद अब यहीं रहूंगा, कमाई बहुत हो गई. हराम का खाखा कर झूठमूठ का लांछन लगाने वालों की असलियत मैं भी देखूंगा.’’

दरवाजे की ओट से सबकुछ सुनती अन्ना दीदी के तो होश उड़ गए. वे सोच नहीं पा रही थीं, किस जगह जमीन फटे और वे समा जाएं.

इस ठगिनी के इस ढंग से समझने के बाद क्या सुशील उन की बात सुनेगा या मानेगा? वे खुद अपनी ससुराल के झोपड़े में रहेंगी, लेकिन यह लांछन न सहेंगी. औरत के सामने बकरा बने आदमी से बहस करना बेकार है.

और छमिया सोच रही थी, ‘पहले ही यह अक्ल आ जाती, तो यह नौबत ही क्यों आती. खैर, मैं आगे से श्यामू को मना कर दूंगी. श्यामू कोई मेरा मर्द तो है नहीं, जिस से कोई नाता हो.’ Manoranjak Kahanhi

–मदनमोहन पांडेय

Funny Hindi Story : असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं

Funny Hindi Story. यह अलग ही तरह का शख्स था. पता नहीं कहां कौन सी साधारण बात इसे खास लगने लगे, किस बात से मोहित हो जाए, कुछ कह नहीं सकते थे. जिन बातों से एक आम आदमी को ऊब होती थी, इस आदमी को उस में मजा आता था. एक अजीब सा आनंद आता था उसे. इस की अभिरुचि बिलकुल अलग ही तरह की थी. वैसे यह मेरा दोस्त है, फिर भी मैं कई बार सोचने को मजबूर हो जाता हूं कि आखिर यह आदमी किस मिट्टी का बना है. मिट्टी सी चीज में अकसर यह सोना देखता है और अकसर सोने पर इस की नजर ही नहीं जाती.

मैं इस के साथ मुंबई घूमने गया था. हम टैक्सी में दक्षिण मुंबई के इलाके में घूम रहे थे. हमारी टैक्सी बारबार सड़क पर लगे जाम के कारण रुक रही थी. जब टैक्सी ऐसे ही एक बार रुकी तो इस का ध्यान सड़क के किनारे बनी एक 25 मंजिली बिल्ंिडग की 15वीं मंजिल पर चला गया, जहां एक कमरा खुला दिख रहा था. मानसून का समय था. आसमान में बादल छाए थे. कमरे की लाइट जल रही थी, पंखा घूमता दिख रहा था. वह बोल उठा, ‘यार, इस को कहते हैं ऐश. देखो, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वो महाशय आराम फरमा रहे हैं, वह भी पंखे की हवा में.’

मैं ने सोचा इस में क्या ऐश की बात है? मैं ने कहा, ‘यार, वह आदमी जो उस कमरे में दिख रहा है, वह क्या कुछ काम नहीं करता होगा? आज कोई कारण होगा कि घर पर है.’

अब वह बोला, ‘यार, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वह ऐश कर रहा है. यह तो एक बिल्डिंग के एक माले के एक फ्लैट की बात है, यहां तो हर फ्लैट में लोग मजे कर रहे हैं.’

मैं ने झल्ला कर कहा, ‘हां, हर फ्लैट नहीं, हर फ्लैट के हर कमरे में कहो और अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हुए हैं.’

यह तो एक घटना मुंबई की रही. एक दिन शाम को घूमते हुए शहर के रेलवे स्टेशन पर मिल गया. मैं शाने भोपाल ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. यह तफरीह करने आया था. चूंकि ट्रेन के लिए समय था, सो हम एक बैंच पर बैठ गए. स्टेशन पर आजा रही ट्रेनों को यह टकटकी लगा कर देखता. बोगी में बैठे लोगों को देखता. यदि किसी एसी बोेगी में कोई यात्री दिख जाता आपस में बतियाते या खाना खाते, लेटे पत्रिका पढ़ते तो यह कहता, ‘यार, देखो इन के क्या ऐश हैं. मस्त एसी में यात्रा कर रहे हैं, खापी रहे हैं, गपशप कर रहे हैं और अपन यहां कुरसी पर बैठे हैं?’

मैं ने कहा, ‘यार, इस में क्या खास बात हो गई? अपन लोग भी जाते हैं तो इसी तरह मौज करते हैं यदि तुम्हारे पैमाने से बात तोली जाए.’ मैं ने आगे कहा, ‘वैसे मैं तो रेलयात्रा को एक बोरिंग चीज मानता हूं.’ अब मेरा मित्र बोल पड़ा, ‘अरे यार, तुम नहीं समझोगे क्या आनंद है यात्रा का. मस्ती में पड़े रहो, सोते ही रहो और यदि घर से परांठेसब्जी लाए हो तो उस का भी मजा अलग ही है. काश, अपन भी ऐसे ही इस समय ट्रेन की ऐसी ही किसी बोगी में बैठे होते तो मजा आ जाता.’

मैं ने कहा, ‘तो चल मेरे साथ? असल जिंदगी जीना, मैं तो खैर बोर होऊंगा तो होते रहूंगा.’ लेकिन इस बात पर यह मौन हो गया.

इसे कौन से साधारण दृश्य अपील कर जाएं, कहना मुश्किल था. एक बार मैं और यह कार से शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पौट को जा रहे थे. एक जगह ट्रैफिक कुछ धीमा हो गया था. इस की नजर सड़क के किनारे खड़े ट्रकों व उस के साइड में बैठे ड्राइवरक्लीनरों पर चली गई.

वे अपनी गाडिं़यां खड़ी कर खाना पका रहे थे. ईंटों के बने अस्थायी चूल्हे पर खाना पक रहा था. एक व्यक्ति रोटियां सेंक रहा था, एक सब्जी बना रहा था. बाकी बैठे गपशप कर रहे थे. बस, इतना दृश्य इस के लिए असली जिंदगी वाला इस का जुमला फेंकने और उसे लंबा सेंकने के लिए काफी था.

यह बोल उठा, ‘देखो यार, जिंदगी इस को कहते हैं मस्त, कहीं भी रुक गए, पकायाखाया, फिर सो गए और जब नींद खुली तो फिर चल दिए और अपन, बस चले जा रहे हैं. अभी किसी होटल में ऊटपटांग खाएंगे. ये अपने हाथ का ही बना खाते हैं, इस में  किसी मिलावट व अशुद्धता की गुंजाइश ही नहीं है. ऐसी गरम रोटियां होटल में कहीं मिलती हैं क्या?

मैं ने चिढ़ कर कहा, ‘ऐसा करते हैं अगली बार तुम भी रसोई का सामान ले कर चलना. अपन भी ऐसे ही सड़क के किनारे रुक कर असली जिंदगी का मजा लेंगे. और तुरंत ही मजा लेना है तो चल आगे, किसी शहरकसबे के बाजार से अपना तवा, बेलन और किराने का जरूरी सामान खरीद लेते हैं, इस पर वह मौन हो गया.

मैं एक बार इस के साथ हवाईजहाज से बेंगलुरु से देहरादून गया. फ्लाइट के 2 स्टौप बीच में थे. एयर होस्टैस और दूसरे हौस्पिटैलिटी स्टाफ के काम को यह देखतासुनता रहा. बाद में बोला, ‘यार, असली मजे तो इन्हीं के हैं? 2 घंटे में इधर, तो 2 घंटे में उधर. सुबह उठ कर ड्यूटी पर आए तो दिल्ली में थे, नाश्ता किया था मुंबई में. लंच लिया बेंगलुरु में और डिनर लेने फिर दिल्ली आ गए. करना क्या है, बस, मुसकराहटों को फेंकते चलना है. एक बार हर उड़ान में सैफ्टी निर्देशों का प्रदर्शन करना है, बस, फिर जा कर बैठ जाना है. प्लेन के लैंड करते समय फिर आ जाना है और यात्रियों के जाते समय बायबाय, बायबाय करना है. इसे कहते हैं जिंदगी.’

मैं ने कहा, ‘यार, तुझे हर दूसरे आदमी की जिंदगी अच्छी लगती है, अपनी नहीं.’ मैं ने आगे कहा कि इन की जिंदगी में रिस्क कितना है? अपन तो कभीकभी प्लेन में बैठते हैं तो हर बार सब से पहला खयाल सहीसलामती से गंतव्य पहुंच जाने का ही आता है. अब इस बात पर यह बंदा मौन हो गया, कुछ नहीं बोला. बस, इतना ही दोहरा दिया कि असली ऐश तो ये करते हैं.

एक और दिन की बात है. यह अपने खेल अनुभव के बारे में बता कर दूसरों की जिंदगी में फिर से तमगे पर तमगे लगा रहा था. वनडे क्रिकेट मैच देख आया था नागपुर में, बोला, ‘यार, जिंदगी हो तो खिलाड़ी जैसी. कोई काम नहीं, बस, खेलो, खेलो और जम कर शोहरत व दौलत दोनों हाथों से बटोर लो. जनता भी क्या पगलाती है खिलाडि़यों को देख कर, इतनी भीड़, इतनी भीड़, कि बस, मत पूछो.’

मैं ने कहा, ‘बस कर यार, अभी पिछले सप्ताह प्रसिद्ध गायक सोनू निगम का कार्यक्रम हुआ था, उस में भी तेरा यह कहना था कि अरे बाप रे, क्या भीड़ है. लोग पागलों की तरह दाद दे रहे हैं, झूम रहे हैं. जिंदगी तो ऐसे कलाकारों की होती है’ मैं ने आगे कहा, ‘इस स्तर पर वे क्या ऐसे ही पहुंच गए हैं. न जाने कितने पापड़ बेले हैं, कितना संघर्ष किया है. असली कलाकार तो मैं तुझे मानता हूं जो असली जिंदगी को कहांकहां से निकाल ढूंढ़ता है.’

वह बोला, ‘यार, यह सब ठीक है. पापड़आपड़ तो सब बेलते हैं, लेकिन समय भी कुछ होता है. ये समय के धनी लोग हैं और अपन समय के कंगाल? घिसट कर जी रहे हैं.’ मैं ने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी असली जिंदगी जीने की अगली उपमा किस के बारे में होगी, उस का इंतजार कर रहा हूं. तुम्हारा यह चेन स्मोकर की तरह का नशा हो गया है कि हर दूसरे दिन किसी दूसरे की जिंदगी में तुम्हें नूर दिखता है और अपनी जिंदगी कू्रर.’

वह कुछ नहीं बोला. अब उस के मौन हो जाने की बारी थी. उस का मौन देख कर मैं ने भी अब मौन रहना उचित समझा, वरना मैं ने कुछ कहा तो पता नहीं यह फिर किस से तुलना कर के अपने को और मुझे भी नीचा फील करवा दे.

मेरे इस दोस्त का नाम तकी रजा है. महीनेभर बाद पिछले शनिवार को मैं इस से मिलने घर गया था. मैं आजकल इस के ‘असली जिंदगी इन की है’ जुमले से थोड़ा डरने लगा हूं. मुझे लग रहा था कि कहीं यह मेरे पहुंचते ही ‘असली जिंदगी तो इन की है’ कह कर स्वागत न कर दे. मैं इस के घर का गेट खोल कर अंदर दाखिल हुआ. यह लौन में ही बैठा हुआ था.

मेरी ओर इस की नजर गई. लेकिन तकी, जो ऊपर को टकटकी लगाए कुछ देख रहा था, ने तुरंत नजर ऊपर कर ली. मैं उस के सामने पड़ी कुरसी पर जा कर बैठ गया. उस के घुटनों को छू कर मैं ने कहा कि क्या बात है, सब ठीक तो है? वह मेरे यह बोलते ही बोला, ‘क्या ठीक है यार, ऊपर देख? कैसे एक तोता मस्त अमरूद का स्वाद ले रहा है?’

मैं ने ऊपर की तरफ देखा, वाकई एक सुरमी हरे रंग का लेकिन लाल रंग की चोंच, जोकि तोते की होती ही है, वाला तोता अमरूद कुतरकुतर कर खा रहा था और बारीकबारीक अमरूद के कुछ टुकड़े नीचे गिर रहे थे. थोड़ी देर बाद वह फुर्र से टांयटांय करते उड़ गया. फिर एक दूसरा तोता आ गया. उस के पीछे 2-3 तोते और आ गए. वे सब एकएक अमरूद पर बैठ गए.

एक अमरूद पर तो 2 तोते भी बैठ कर उसे 2 छोरों से कुतरने लगे. कौमी एकता का दृश्य था. तकी बोला, ‘यार, असली जिंदगी तो इन की है. जमीन पर आने की जरूरत ही नहीं, हवा में रहते ही नाश्ता, खाना, टौयलेट सब कर लिया.’ और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि तकी ने जैसे ही यह बोला कि एक तोता, जो उस के सिर के ठीक ऊपर वाली डाल पर था, ने अपना वेस्ट मैटेरियल सीधे तकी के सिर पर ही गिरा दिया.

‘यह भी कोई तरीका है,’ कह कर तकी अंदर की ओर भागा. जब वह वापस आया तो मैं ने कहा, ‘हां यार, वाकई असली जिंदगी ये ही जी रहे हैं.’ तकी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा.

मैं ने इस के ‘असली जिंदगी ये जी रहे हैं’ वाले आगामी बेभाव पड़ने वाले डायलौग से बचने के लिए बात को आम भारतीय की तरह महंगाई को कोसने के शाश्वत विषय की ओर मोड़ दिया.

तकी बोला, ‘हां यार, यह महंगाई तो जान ले रही है.’ लेकिन थोड़ी ही देर में असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं’ का साजोसामान ले जाती कुछ बैलगाडि़यां सामने से निकल रही थीं. ये गड़रियालुहार थे जोकि खानाबदोश जिंदगी जीते हैं. बैलगाडि़यों पर पलंग, बच्चे और सब सामान लदा दिख रहा था. अब तकी टकटकी लगा कर इन्हें ही देख रहा था. उस की आंखों ने बहुतकुछ देख लिया जो कि उसे बाद में शब्दों में प्रकट कर मेरी ओर शूट करना था. अंतिम बैलगाड़ी जब तक 25 मीटर के लगभग दूर नहीं पहुंच गई, यह उसे टकटकी लगा कर देखता ही रहा. अब वह बोला, ‘यार, जिंदगी तो इन की है?’

मैं ने कहा, ‘खानाबदोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है?’

वह बोला, ‘यार, तुम नहीं समझोगे, इसी में जिंदगी का मजा है. एक जगह से दूसरी जगह को ये लोग हमेशा घूमते रहते हैं. कहीं भी रुक लिए और कहीं भी बनाखा लिया, और कहीं भी रात गुजार ली. भविष्य की कोई चिंता नहीं, मस्तमौला, घुमक्कड़ जिंदगी, सब को कहां मिलती है.’

मैं ने सोचा कि इस को भी यह अच्छा कह रहा है. अब तो यहां से रवानगी डालना ही ठीक होगा, वरना ‘असली जिंदगी तो इन की है’ का कोई न कोई नया संस्करण कहीं न कहीं से इस के लिए प्रकट हो जाएगा, जिसे वह मेरे पर शूट करेगा जो कि मुझे आजकल हकीकत की गोली से भी तेज लगने लगा है.

यह भीखूब रही. मेरी शादी के तुरंत बाद की घटना है. पत्नी विदा हो कर ससुराल आ गईर् थी. बहू से मिलने वालों का आनाजाना लगा हुआ था.

उन दिनों हमारे ताऊजी सेवानिवृत्त हो कर उसी शहर में रहते थे. उन के क्रोधी स्वभाव से हम सभी परिचित थे. मेरी पत्नी को जल्द ही ताऊजी के बारेमें इतने किस्से सुनने को मिले कि उस के दिल में एक डर सा समा गया.

शाम का वक्त था. तभी ताऊजी का आगमन हुआ. उन को देखते ही पत्नी घर के अंदर भागी. ताऊजी बहू का नाम पुकारते हुए उस के पीछे जाने लगे तो वह अपने कमरे के अंदर भागी. ताऊजी को दरवाजे की तरफ आता देख उस के होश उड़ गए. कमरे में एक ही दरवाजा था. भागने का कोई उपाय न देख वह पलंग के नीचे छिप गई. ताऊजी कमरे के अंदर झांक कर वापस लौटे. फिर सब को बतलाने लगे कि बहू को अंदर जाते देखा, फिर गायब कहां हो गई.

ताऊजी के जाने के बाद ही पत्नी पलंग के नीचे से बाहर आई. तब तक उस के कपड़ों तथा मेकअप का बुरा हाल हो चुका था. वह शर्म से लाल हो रही थी, जबकि हम सब का हंसते हंसते बुरा हाल था.  विनोद प्रसादशर्माजी कुछ महीनों पहले ही रिटायर हुए. अब उन के पास न तो कोई विशेष काम था और न ही सरकारी नौकर या गाड़ी. वे कोशिश करते घर के कामों में खुद को व्यस्त रखने की, दोस्तों के यहां जाना और उन्हें बुलाना बढ़ गया.

एक दिन हम 5-6 दोस्त शर्माजी के घर गपें मारने के लिए इकट्ठा हुए. थोड़ी देर बाद मिसेज शर्मा बोलीं, ‘‘मैं चाय बना कर ले आती हूं.’’ शर्माजी बोले, ‘‘अरे, रुको, चाय तो आज मैं ही बनाऊंगा.’’ और वे चले चाय बनाने. पत्नी साथ जाने लगीं तो उन्हें यह कह कर रोक दिया कि ‘‘आप यहीं बैठो.’’ पत्नी बुदबुदाई, ‘‘कभी तो चाय बनाई नहीं.’’

थोड़ी देर बाद शर्माजी बिलकुल बैरा स्टाइल में चाय की ट्रे ले कर आ गए. सब ने चाय ले ली. पहली चुस्की लेते ही सब की नाक में हींग की महक तैर गई. सब एकदूसरे का मुंह देखने लगे तो वे बोले, ‘‘है न बढि़या मसाला चाय?’’

सब कहने लगे, ‘‘आप भी लीजिए.’’

शर्माजी ने जैसे ही चाय की चुस्की ली, उन का मुंह देख कर हम सब खिलखिला कर हंस दिए. असल में उन्होने चाय में जीरावन मसाला डाल दिया था जो चाय मसाले के साथ ही रखा था. Funny Hindi Story

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