Hindi Short Story: शायद – क्या शगुन के माता-पिता उसकी भावनाएं जान पाए?

Hindi Short Story, लेखिका – शशि उप्पल

शगुन स्कूल बस से उतर कर कुछ क्षण स्टाप पर खड़ा धूल उड़ाती बस को देखता रहा. जब वह आंखों से ओझल हो गई, तब घर की ओर मुड़ा. दरवाजे की चाबी उस के बैग में ही थी. ताला खोल कर वह अपने कमरे में चला गया. दीवार घड़ी में 3 बज रहे थे.

शगुन ने अनुमान लगाया कि मां लगभग ढाई घंटे बाद आ जाएंगी और पिता 3 घंटे बाद. हाथमुंह धो कर वह रसोईघर में चला गया. मां आलूमटर की सब्जी बना कर रख गई थीं. उसे भूख तो बहुत लग रही थी, परंतु अधिक खाया नहीं गया. बचा हुआ खाना उस ने कागज में लपेट कर घर के पिछवाड़े फेंक दिया. खाना पूरा न खाने पर मां और पिता नाराज हो जाते थे.

फिर शीघ्र ही शगुन कमरे में जा कर सोने का प्रयत्न करने लगा. जब नींद नहीं आई तो वह उठ कर गृहकार्य करने लगा. हिंदी, अंगरेजी का काम तो कर लिया परंतु गणित के प्रश्न उसे कठिन लगे, ‘शाम को पिताजी से समझ लूंगा,’ उस ने सोचा और खिलौने निकाल कर खेलने बैठ गया.

शालिनी दफ्तर से आ कर सीधी बेटे के कमरे में गई. शगुन खिलौनों के बीच सो रहा था. उस ने उसे प्यार से उठा कर बिस्तर पर लिटा दिया.

समीर जब 6 बजे लौटा तो देखा कि मांबेटा दोनों ही सो रहे हैं. उस ने हौले से शालिनी को हिलाया, ‘‘इस समय सो रही हो, तबीयत तो ठीक है न ’’

शालिनी अलसाए स्वर में बोली, ‘‘आज दफ्तर में काम बहुत था.’’

‘‘पर अब तो आराम कर लिया न. अब जल्दी से उठ कर तैयार हो जाओ. सुरेश ने 2 पास भिजवाए हैं…किसी अच्छे नाटक के हैं.’’

‘‘कौन सा नाटक है ’’ शालिनी आंखें मूंदे हुए बोली, ‘‘आज कहीं जाने की इच्छा नहीं हो रही है.’’

‘‘अरे, ऐसा अवसर बारबार नहीं मिलता. सुना है, बहुत बढि़या नाटक है. अब जल्दी करो, हमें 7 बजे तक वहां पहुंचना है.’’

‘‘और शगुन को कहां छोड़ें  रोजरोज शैलेशजी को तकलीफ देना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘अरे भई, रोजरोज कहां  वैसे भी पड़ोसियों का कुछ तो लाभ होना चाहिए. मौका आने पर हम भी उन की सहायता कर देंगे,’’ समीर बोला.

जब शालिनी तैयार होने गई तो समीर शगुन के पास गया, ‘‘शगुन, उठो. यह क्या सोने का समय है ’’

शगुन में उठ कर बैठ गया. पिता को सामने पा कर उस के चेहरे पर मुसकराहट आ गई.

‘‘जल्दी से नाश्ता कर लो. मैं और तुम्हारी मां कहीं बाहर जा रहे हैं.’’

शगुन का चेहरा एकाएक बुझ गया. वह बोला, ‘‘पिताजी, मेरा गृहकार्य पूरा नहीं हुआ है. गणित के प्रश्न बहुत कठिन थे. आप…’’

‘‘आज मेरे पास बिलकुल समय नहीं है. कक्षा में क्यों नहीं ध्यान देता  ठीक है, शैलेशजी से पूछ लेना. अब जल्दी करो.’’

शगुन दूध पी कर शैलेशजी के घर चला गया. वह जानता था कि जब तक मां और पिताजी लौटेंगे, वह सो चुका होगा. सदा ऐसा ही होता था. शैलेशजी और उन की पत्नी टीवी देखते रहते थे और वह कुरसी पर बैठाबैठा ऊंघता रहता था. उन के बच्चे अलग कमरे में बैठ कर अपना काम करते रहते थे. आरंभ में उन्होंने शगुन से मित्रता करने की चेष्टा की थी परंतु जब शगुन ने ढंग से उन से बात तक न की तो उन्होंने भी उसे बुलाना बंद कर दिया था. अब भला वह बात करता भी तो कैसे  उसे यहां इस प्रकार आ कर बैठना अच्छा ही नहीं लगता था. जब वह शैलेशजी को अपने बच्चों के साथ खेलता देखता, उन्हें प्यार करते देखता तो उसे और भी गुस्सा आता.

शगुन अपनी गृहकार्य की कापी भी साथ लाया था, परंतु उस ने शैलेशजी से प्रश्न नहीं समझे और हमेशा की तरह कुरसी पर बैठाबैठा सो गया.

अगली सुबह जब वह उठा तो घर में सन्नाटा था. रविवार को उस के मातापिता आराम से ही उठते थे. वह चुपचाप जा कर बालकनी में बैठ कर कौमिक्स पढ़ने लगा. जब देर तक कोई नहीं उठा तो वह दरवाजा खटखटाने लगा.

‘‘क्यों सुबहसुबह परेशान कर रहे हो  जाओ, जा कर सो जाओ,’’ समीर झुंझलाते हुए बोला.

‘‘मां, भूख लगी है,’’ शगुन धीरे से बोला.

‘‘रसोई में से बिस्कुट ले लो. थोड़ी देर में नाश्ता बना दूंगी,’’ शालिनी ने उत्तर दिया.

शगुन चुपचाप जा कर अपने कमरे में बैठ गया. उस की कुछ भी खाने की इच्छा नहीं रह गई थी.

दोपहर के खाने के बाद समीर और शालिनी का किसी के यहां ताश खेलने का कार्यक्रम था, ‘‘वहां तुम्हारे मित्र नीरज और अंजलि भी होंगे,’’ शालिनी शगुन को तैयार करती हुई बोली.

‘‘मां, आज चिडि़याघर चलो न. आप ने पिछले सप्ताह भी वादा किया था,’’ शगुन मचलता हुआ बोला.

‘‘बेटा, आज वहां नहीं जा पाएंगे. गिरीशजी से कह रखा है. अगले रविवार अवश्य चिडि़याघर चलेंगे.’’

‘‘नहीं, आज ही,’’ शगुन हठ करने लगा, ‘‘पिछले रविवार भी आप ने वादा किया था. आप मुझ से झूठ बोलती हैं… मेरी बात भी नहीं मानतीं. मैं नहीं जाऊंगा गिरीश चाचा के यहां,’’ वह रोता हुआ बोला.

तभी समीर आ गया, ‘‘यह क्या रोना- धोना मचा रखा है. चुपचाप तैयार हो जा, चौथी कक्षा में आ गया है, पर आदतें अभी भी दूधपीते बच्चे जैसी हैं. जब देखो, रोता रहता है. इतने महंगे स्कूल में पढ़ा रहे हैं, बढि़या से बढि़या खिलौने ले कर देते हैं…’’

‘‘मैं गिरीश चाचा के घर नहीं जाऊंगा,’’ शगुन रोतेरोते बोला, ‘‘वहां नीरज, अंजलि मुझे मारते हैं. अपने साथ खेलाते भी नहीं. वे गंदे हैं. मेरे सारे खिलौने तोड़ देते हैं और अपने दिखाते तक नहीं. वे मूर्ख हैं. उन की मां भी मूर्ख हैं. वे भी मुझे ही डांटती हैं, अपने बच्चों को कुछ नहीं कहती हैं.’’

समीर ने खींच कर एक थप्पड़ शगुन के गाल पर जमाया, ‘‘बदतमीज, बड़ों के लिए ऐसा कहा जाता है. जितना लाड़प्यार दिखाते हैं उतना ही बिगड़ता जाता है. ठीक है, मत जा कहीं भी, बैठ चुपचाप घर पर. शालिनी, इसे कमरे में बंद कर के बाहर से ताला लगा दो. इसे बदतमीजी की सजा मिलनी ही चाहिए.’’

शालिनी लिपस्टिक लगा रही थी, बोली, ‘‘रहने दो न, बच्चा ही तो है. शगुन, अगले रविवार जहां कहोगे वहीं चलेंगे. अब जल्दी से पिताजी से माफी मांग लो.’’

शगुन कुछ क्षण पिता को घूरता रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मांगूंगा माफी. आप भी मूर्ख हैं, रोज मुझे मारती हैं.’’

समीर ने शगुन का कान उमेठा, ‘‘माफी मांगेगा या नहीं ’’

‘‘नहीं मांगूंगा,’’ वह चिल्लाया, ‘‘आप गंदे हैं. रोज मुझे शैलेश चाचा के घर छोड़ जाते हैं. कभी प्यार नहीं करते. चिडि़याघर भी नहीं ले जाते. नहीं मांगूंगा माफी…गंदे, थू…’’

समीर क्रोध में आपे से बाहर हो गया, ‘‘तुझे मैं ठीक करता हूं,’’ उस ने शगुन को कमरे में बंद कर के बाहर से ताला लगा दिया.

शगुन देर तक कमरे में सिसकता रहा. उस दिन से उस में एक अक्खड़पन आ गया. उस ने अपनी कोई भी इच्छा व्यक्त करनी बंद कर दी. जैसा मातापिता कहते, यंत्रवत कर लेता, पर जैसेजैसे बड़ा होता गया वह अंदर ही अंदर घुटने लगा. 10वीं कक्षा के बाद पिता के कहने से उसे विज्ञान के विषय लेने पड़े. पिता उसे डाक्टर बनाने पर तुले हुए थे. शगुन की इच्छाओं की किसे परवा थी और मां भी जो पिता कहते, उसे ही दोहरा देतीं.

एक दिन दफ्तर के लिए तैयार होती हुई शालिनी बोली, ‘‘शगुन का परीक्षाफल शायद आज घोषित होने वाला है…तुम जरा पता लगाना.’’

‘‘क्यों, क्या शगुन इतना भी नहीं कर सकता,’’ समीर नाश्ता करता हुआ बोला, ‘‘जब पढ़ाईलिखाई में रुचि ही नहीं ली तो परिणाम क्या होगा.’’

‘‘ओहो, वह तो मैं इसलिए कह रही थी ताकि कुछ जल्दी…’’ वह टिफिन बाक्स बंद करती हुई बोली.

‘‘तुम्हें जल्दी होगी जानने की…मुझे तो अभी से ही मालूम है, पर मैं फिर कहे देता हूं यदि यह मैडिकल में नहीं आया तो इस घर में इस के लिए कोई स्थान नहीं है.  जा कर करे कहीं चपरासीगीरी, मेरी बला से.’’

‘‘तुम भी हद करते हो. एक ही तो बेटा है, यदि दोचार होते तो…’’

‘‘मैं भी यही सोचता हूं. एक ही इतना सिरदर्द बना हुआ है. क्या नहीं दिया हम ने इसे  फिर भी कभी दो घड़ी पास बैठ कर बात नहीं करता. पता नहीं सारा समय कमरे में घुसा क्या करता रहता है ’’ एकाएक समीर उठ कर शगुन के कमरे में पहुंच गया.

शगुन अचानक पिता को सामने देख कर अचकचा गया. जल्दी से उस ने ब्रश तो छिपा लिया परंतु गीली पेंटिंग न छिपा सका. पेंटिंग को देखते ही समीर का पारा चढ़ गया. उस ने बिना एक नजर पेंटिंग पर डाले ही उस को फाड़ कर टुकड़ेटुकड़े कर दिया, ‘‘तो यह हो रही है मैडिकल की तैयारी. किसे बेवकूफ बना रहे हो, मुझे या स्वयं को  वहां महंगीमहंगी पुस्तकें पड़ी धूल चाट रही हैं और यह लाटसाहब बैठे चिडि़यातोते बनाने में समय गंवा रहे हैं. कुछ मालूम है, आज तुम्हारा नतीजा निकलने वाला है.’’

‘‘जी पिताजी. मनोज बता रहा था,’’ शगुन धीरे से बोला. उस की दृष्टि अब भी अपनी फटी हुई पेंटिंग पर थी.

‘‘मनोज के सिवा भी किसी को जानते हो क्या  जाने क्या करेगा आगे चल कर…’’ समीर बोलता चला जा रहा था.

शालिनी को दफ्तर के लिए देर हो रही थी. वह बोली, ‘‘शगुन, मुझे फोन अवश्य कर देना. तुम्हारा खाना रसोई में रखा है, खा लेना.’’

मातापिता के जाते ही शगुन एक बार फिर अकेला हो गया. बचपन से ही यह सिलसिला चला आ रहा था. स्कूल से आ कर खाली घर में प्रवेश करना, फिर मातापिता की प्रतीक्षा करना. उस के मित्र उन्हें पसंद नहीं आते थे. बचपन में वह जब भी किसी को घर बुलाता था तो मातापिता को यही शिकायत रहती थी कि घर गंदा कर जाते हैं. महंगे खिलौने खराब कर जाते हैं. अकेला कहीं वह आजा नहीं सकता था क्योंकि मातापिता को सदा किसी दुर्घटना का अंदेशा रहता था.

शगुन के कई मित्र स्कूटर, मोटर- साइकिल चलाने लगे थे, पर उस के पिता ने कड़ी मनाही कर रखी थी. बस जब देखो अपने घिसेपिटे संवाद दोहराते रहते थे, ‘हम तो 8 भाईबहन थे. पिताजी के पास इतने रुपए नहीं थे कि किसी को डाक्टर बना सकते. मेरी तो यह हसरत मन में ही रह गई, पर तेरे पास तो सबकुछ है,’ और मां सदा यही पूछती रहती थीं, ‘ट्यूटर चाहिए, पुस्तकें चाहिए, बोल क्या चाहिए ’

पर शगुन कभी नहीं बता पाया कि उसे क्या चाहिए. वह सोचता, ‘मातापिता जानते तो हैं कि मेरी रुचि कला में है, मैं सुंदरसुंदर चित्र बनाना चाहता हूं, रंगबिरंगे आकार कागज पर सजाना चाहता हूं. इस में इनाम जीतने पर भी डांट पड़ती है कि बेकार समय नष्ट कर रहा हूं. उन्होंने कभी मेरी कोई इच्छा पूरी नहीं की.’

तभी मनोज आ गया. शगुन उस से बोला, ‘‘यार, बहुत डर लग रहा है.’’

‘‘इस में डरने की क्या बात है. ‘फाइन आर्ट्स’ ही तो करना चाहता है न ’’

‘‘मेरे चाहने से क्या होता है,’’ शगुन कड़वाहट से बोला, ‘‘मेरे पिता को तो मानो मेरी इच्छाओं का गला घोंटने में मजा आता है.’’

मनोज उस को समझ नहीं पाता था. उसे अचरज होता था कि इतना सब होने पर भी शगुन उदास क्यों रहता है.

स्कूल पहुंचते ही दोनों ने नोटिस बोर्ड पर अपने अंक देखे. अपने 54 प्रतिशत अंक देख कर मनोज प्रसन्न हो गया, ‘‘चलो, पास हो गया, पर तू मुंह लटकाए क्यों खड़ा है, तेरे तो 65 प्रतिशत अंक हैं.’’

शगुन बिना कुछ बोले घर की ओर चल दिया. वह मातापिता पर होने वाली प्रतिक्रिया के विषय में सोच रहा था, ‘मां तो निराश हो कर रो लेंगी, परंतु पिताजी  वे तो पिछले 2 वर्षों से धमकियां दे रहे थे.’

उस ने मां को फोन किया. चुपचाप कमरे में जा कर बैठ गया. शगुन रेंगती हुई घड़ी की सूइयों को देख रहा था और सोच रहा था. जब 5 बज गए तो वह झट बिस्तर से उठा. उस ने अलमारी में से कुछ रुपए निकाले और घर से बाहर आ गया.

समीर जब दफ्तर से लौटा तो शालिनी पर बरसने लगा, ‘‘कहां है तुम्हारा लाड़ला  कितना समझाया था कि मेहनत कर ले…पर मैं तो केवल बकता हूं न.’’

शालिनी वैसे ही परेशान थी. बोली, ‘‘आज उस ने खाना भी नहीं खाया. कहां गया होगा. बिना बताए तो कहीं जाता ही नहीं है.’’

जब रात के 9 बजे तक भी शगुन नहीं लौटा तो मातापिता को चिंता होने लगी. 2-3 जगह फोन भी किए परंतु कुछ मालूम न हो सका. शगुन के कोई ऐसे खास मित्र भी नहीं थे, जहां इतनी रात तक बैठता.

11 बजे समीर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा आया. शालिनी ने सब अस्पतालों में भी फोन कर के पूछ लिया. सारी रात दोनों बेटे की प्रतीक्षा में बैठे रहे. लेकिन शगुन का कुछ पता न चला. शालिनी की तो रोरो कर आंखें दुखने लगी थीं और समीर तो मानो 10 दिन में ही 10 वर्ष बूढ़ा हो गया था.

एक दिन शगुन की अध्यापिका शालिनी से मिलने आईं तो अपने साथ एक डायरी भी ले आईं, ‘‘एक बार शगुन ने मुझे यह डायरी भेंट में दी थी. इस में उस की कविताएं हैं. बहुत ही सुंदर भाव हैं. आप यह रख लीजिए, पढ़ कर आप के मन को शांति मिलेगी.’’

शालिनी ने डायरी ले ली परंतु वह यही सोचती रही, ‘शगुन कविताएं कब लिखता था  मुझ से तो कभी कुछ नहीं कहा.’

शाम को जब समीर आया तो शालिनी अधीरता से बोली, ‘‘समीर, क्या तुम जानते हो कि शगुन न केवल सुंदर चित्र बनाता था बल्कि बहुत सुंदर कविताएं भी लिखता था. हम अपने बेटे को बिलकुल नहीं जानते थे. हम उसे केवल एक रेस का घोड़ा मान कर प्रशिक्षित करते रहे, पर इस प्रयास में हम यह भूल गए कि उस की अपनी भी कुछ इच्छाएं हैं, भावनाएं हैं. हम अपने सपने उस पर थोपते रहे और वह मासूम निरंतर उन के बोझ तले दबता रहा.’’

समीर ने शालिनी से डायरी ले ली और बोला, ‘‘आज मैं मनोज से भी मिला था.’’

‘‘वह तो तुम्हें कतई नापसंद था,’’ शालिनी ने विस्मित हो कर कहा.

‘‘बड़ा प्यारा लड़का है,’’ समीर शालिनी की बात अनसुनी करता हुआ बोला, ‘‘उस से मिल कर ऐसा लगा, मानो शगुन लौट आया हो. शालिनी, शगुन मुझे जान से भी प्यारा है. यदि वह लौट कर नहीं आया तो मैं जी नहीं पाऊंगा,’’ समीर की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी.

‘‘नहीं, समीर,’’ शालिनी दृढ़ता से बोली, ‘‘शगुन आत्महत्या नहीं कर सकता, जो इतने सुंदर चित्र बना सकता है, इतनी सुंदर कविताएं लिख सकता है, वह जीवन से मुंह नहीं मोड़ सकता.’’

‘‘हां, हम ने उसे समझने में जो भूल की, वह हमें उस की सजा देना चाहता है,’’ समीर भरे गले से बोला.

शालिनी शगुन की डायरी खोल कर एक कविता की पंक्तियां पढ़ कर सुनाने लगी,

‘खेल और खिलौने, आडंबर और अंबार हैं.

बांट लूं किसी के संग उस पल का इंतजार है.’

उस समय दोनों यही सोच रहे थे कि यदि शगुन की कोई बहन या भाई होता तो वह शायद स्वयं को इतना अकेला कभी भी महसूस न करता और तब शायद. Hindi Short Story

Father’s Day Special – बेटी के लिए : पिता की इच्छा का संसार

शिवचरण अग्रवाल बाजार से लौटते ही कुरसी पर पसर गए. मलीन चेहरा, शिथिल शरीर देख पत्नी माया ने घबरा कर माथा छुआ, ‘‘क्या हुआ… क्या तबीयत खराब लग रही है. भलेचंगे बाजार गए थे…अचानक से यों…’’

कुछ देर मौन रख वह बोले, ‘‘लौटते हुए अजय की दुकान पर उस का हालचाल पूछने चला गया था. वहां उस ने जो बताया उसे सुन कर मन खट्टा हो गया.’’

‘‘ऐसा क्या बता दिया अजय ने जो आप की यह हालत हो गई?’’ माया ने पंखा झलते हुए पूछा.

‘‘वह बता रहा था कि कुछ दिन पहले उस की दुकान पर समधीजी का एक रिश्तेदार आया था…उसे यह पता नहीं था कि अजय मेरा भांजा है. बातोंबातों में मेरा जिक्र आ गया तो वह कहने लगा, ‘अरे, उन्हें तो मैं जानता हूं…बड़े चालाक और घटिया किस्म के इनसान हैं… दरअसल, मेरे एक दूर के जीजाजी के घर उन की लड़की ब्याही है…जीजाजी बता रहे थे कि शादी में जो तय हुआ था उसे तो दबा ही लिया, साथ ही बाद में लड़की के गहनेकपडे़ भी दाब लेने की पूरी कोशिश की…क्या जमाना आ गया है लड़की वाले भी चालू हो गए…’ रिश्तेदारी का मामला था सो अजय कुछ नहीं बोला मगर वह बेहद दुखी था…उसे तो पता ही है कि मैं ने मीनू की शादी में कैसे दिल खोल कर खर्च किया है, जो कुछ तय था उस से बढ़चढ़ कर ही दिया, फिर भी मीनू के ससुर मेरे बारे में ऐसी बातें उड़ाते फिरते हैं… लानत है….’’

तभी उन की छोटी बेटी मधु कालिज से वापस आ गई. उन की उतरी सूरत देख उस का मूड खराब न हो अत: दोनों ने खुद को संयत कर किसी दूसरे काम में उलझा लिया.

आज का मामला कोई नया नहीं था. साल भर ही हुआ था मीनू की शादी को मगर आएदिन कुछ न कुछ फेरबदल के साथ ऐसे मामले दोहराए जाते पर शिवचरण चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे…इन हालात के लिए वह स्वयं को ही दोषी मानते थे.

आज शिवचरण की आंखों के सामने बारबार वह दृश्य घूम रहा था जब कपूर साहब ने उन से अपने बड़े बेटे के लिए मीनू का हाथ मांगा था.

रजत कपूर उन के नजदीकी दोस्त एवं पड़ोसी दीनदयाल गुप्ता के बिजनेस पार्टनर थे. बेहद सरल, सहृदय और जिंदादिल. दीनदयाल के घर शिवचरण की उन से आएदिन मुलाकातें होती रहीं. जैसे वह थे वैसा ही उन का परिवार था. 2 बेटों में बड़ा बेटा कंप्यूटर इंजीनियर था और छोटा एम.बी.ए. पूरा कर अपने पिता का बिजनेस में हाथ बंटा रहा था. एक ऐसा हंसताखेलता परिवार था जिस में अपनी लड़की दे कर कोई भी पिता अपनी जिंदगी को सफल मानता. ऐसे परिवार से खुद रिश्ता आया था मीनू के लिए.

कपूर साहब भी अपने बड़े बेटे के लिए देखेभाले परिवार की लड़की चाह रहे थे और उन की नजर मीनू पर जा पड़ी. उन्होंने बड़ी विनम्रता से निवेदन किया था, ‘शिवचरण भाईसाहब, बेटी जैसे अब तक आप के घर रह रही है वैसे ही आगे हमारे घर रहेगी. बस, तन के कपड़ों में विदा कर दीजिए, मेरे घर में बेटी नहीं है, उसे ही बेटी समझ कर दुलार करूंगा.’

इतना अपनापन से भरा निवेदन सुन कर शिवचरण गद्गद हो उठे थे. कितनी धुकधुक रहती है पिता के मन में जब वह अपनी प्यारी बेटी को पराए हाथों में सौंपता है. मन आशंकाओं से भरा रहता है. रातदिन यही चिंता लगी रहती है कि पता नहीं बेटी सुखी रहेगी या नहीं, मानसम्मान मिलेगा या नहीं…मगर इस आग्रह में सबकुछ कितना पारदर्शी… शीशे की तरह साफ था.

शिवचरण ने जब इस बात पर अपनी पत्नी के साथ बैठ कर विचार किया तो धीरेधीरे कुछ प्रश्न मुखरित हो उठे. मसलन, ‘परिवार और लड़का तो वाकई लाखों में एक है मगर… हम वैश्य और वह पंजाबी…घर वालों को कैसे राजी करेंगे…’

यह सचमुच एक गंभीर समस्या थी. शिवचरण का भरापूरा कुटुंब था जिस में इस रिश्ते का जिक्र करने का मतलब था सांप की पूंछ पर पैर रखना. वैसे तो सभी तथाकथित पढे़लिखे समकालीन भद्रजन थे मगर जब किसी के शादीब्याह की बात आती तो एकएक पुरातन रीतिरिवाज खोजखोज कर निकाले जाते. मसलन, जाति, गोत्र, जन्मपत्री, मांगलिक-अमांगलिक…और यहां तो बात विजातीय रिश्ते की थी.

बेटी के सुखद भविष्य के लिए शिवचरण ने तो एक बार सब को दरकिनार करने की सोच भी ली थी मगर माया नहीं मानी.

‘शादीब्याह के मसले पर घरपरिवार को साथ ले कर चलना ही पड़ता है. अगर अभी नजरअंदाज कर दिया तो सारी उम्र ताने सुनते रहेंगे…तुम्हें कोई कुछ न बोले मगर मैं तो घर की बड़ी बहू हूं. तुम्हारी अम्मां मुझे नहीं बख्शेंगी.’

और अम्मां से पूछने पर जो कुछ सुनने को मिला वह अप्रत्याशित नहीं था.

‘क्या हमारी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का नहीं मिला जो दूसरी बिरादरी का देखने चल दिया.’

‘नहीं, अम्मां, खुद ही रिश्ता आया था. बेहद भले लोग हैं. कोई दानदहेज भी नहीं लेंगे.’

‘तो क्या पैसे बचाने को ब्याह रहा है वहां? तेरे पास न हों तो मुझ से ले लेना…अरे, बेटी के ब्याह पर तो खर्च होता ही है…और मीनू घर की बड़ी लड़की है, अगर उसे वहां ब्याह दिया तो सब यही समझेंगे कि लड़की तेज होगी, खुद से पसंद कर ब्याह कर बैठी. फिर छोटी को कहीं ब्याहना भी मुश्किल हो जाएगा.’

अम्मां ने तिवारीजी को भी बुलवा लिया. लंबा तिलक लगाए वह आए तो अम्मां ने खुद ही उन के पांव नहीं छुए, सब से छुआए. 4 कचौड़ी, 6 पूरी और 2 रसगुल्लों का नाश्ता करने के बाद समस्या पर विचार कर के वह बोले, ‘यजमान, यह आप की मरजी है कि आप विवाह कहां करें पर आप ने जाति के बाहर विवाह किया तो मैं आप के घर में पैर नहीं रखूंगा. आखिर सनातन प्रथा है यह जाति की. आप जैसे नए लोग तोड़ते हैं तभी तो तलाक होते हैं. न कुंडली मिली, न अपनी जाति का, न घर के रीतिरिवाज का पता. आप सोच भी कैसे सकते हैं.’

अम्मां और तिवारीजी के आगे शिवचरण के सभी तर्क विफल हो गए और उन्हें इस रिश्ते को भारी मन से मना करना पड़ा. दीनदयाल ने यह बात विफल होती देख वहां अपनी भतीजी की बात चला दी और आज वह कपूर साहब के घर बेहद सुखी थी.

जब शिवचरण मीनू के लिए सजातीय वर खोजने निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि दूल्हामंडी में से एक अदद दूल्हा खरीदना कितना कठिन कार्य था. जो लड़का अच्छा लगता उस के दाम आसमान को छूते और जिस का दाम कम था वह मीनू के लायक नहीं था. कपूर साहब के रिश्ते पर चर्चा के समय जिन सगेसंबंधियों ने मीनू के लिए सुयोग्य वर खोज लाने और हर तरह का सहयोग देने की बात की थी इस

समय वे सभी पल्ला झाड़ कहीं गायब हो गए थे.

भागदौड़ कर के अंत में एक जगह बात पक्की हुई. रिश्ता तय होते समय लड़के के मातापिता का रवैया ऐसा था जैसे लड़की पसंद कर उन्होंने लड़की वालों पर एहसान किया है. उस समय शिवचरण को कपूर साहब का नम्र निवेदन बहुत याद आ रहा था. उस दिन जो उन के कंधे झुके तो आज तक सीधे नहीं हुए थे.

अतीत की यादों में खोए शिवचरण को तब झटका लगा जब पत्नी ने आ कर कहा कि दीनदयाल भाई साहब आए थे और आप के लिए एक निमंत्रण कार्ड दे गए हैं.

उस दिन दीनदयाल के घर एक पारिवारिक समारोह में शिवचरण की मुलाकात उन के बड़े भाई से हो गई जो अब कपूर साहब के समधी थे. उन की बात चलने पर वह गद्गद हो कर बोले, ‘‘बस, क्या कहें, हमारी बिटिया को तो बहुत अच्छा घरवर मिल गया. ऐसे सज्जन लोग कहां मिलते हैं आजकल…उसे हाथों पर उठा कर रखते हैं…बेटी ससुराल में खुश हो, एक बाप को और क्या चाहिए भला…’’ शिवचरण के चेहरे पर एक दर्द भरी मुसकान तैर आई.

घर आ कर मन और अधिक अपराधबोध से ग्रसित हो गया. वह खुद पर बेहद नाराज थे. बारबार स्वयं को कोस रहे थे कि क्यों मैं उस समय जातिवाद की ओछी मानसिकता से उबर नहीं पाया…क्यों सगेसंबंधियों और बिरादरी की कहावत से डर गया…अपनी बेटी का भला देखना मेरी अपनी जिम्मेदारी थी, बिरादरी की नहीं. दीनदयाल भी तो हमारी जाति के ही हैं. उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ा वहां रिश्ता करने से…उन का मानसम्मान उसी तरह बरकरार है…सच तो यह है कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में किसी के पास इतना समय नहीं कि रुक कर किसी दूसरे के बारे में सोचे…‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी बातें पुरानी हो चुकी हैं. जो इन्हें छोड़ आगे नहीं बढ़ते, आगे चल कर वे मेरी ही तरह रोते हैं.

शिवचरण अखबार पढ़ रहे थे तभी दीनदयाल उन से मिलने आए तो बातोंबातों में वह अपनी व्यथा कह बैठे, ‘‘क्या बताऊं भाईजी, कपूर साहब जैसा समधी खोने का दर्द अभी तक दिल में है…एक विचार आया है मन में…अगर उन के छोटे बेटे के लिए मधु का रिश्ता ले कर जाऊं तो…जब वह आए थे तो मैं ने इनकार कर दिया था, न जाने अब मेरे जाने पर कैसा बरताव करेंगे, यही सोच कर दिल घबरा रहा है.’’

‘‘नहीं, भाई साहब, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूं, दिल में किसी के लिए मैल नहीं रखते…वह तो खुशीखुशी आप का रिश्ता स्वीकारते मगर आप ने यह फैसला लेने में जरा सी देर कर दी. अभी 2 दिन पहले ही उन के छोटे बेटे का रिश्ता तय हुआ है.’’

एक बार फिर शिवचरण खुद को पराजित महसूस कर रहे थे.

वह अपनी गलती का प्रायश्चित्त करना चाह रहे थे मगर उन्हें मौका न मिला. सच ही है, कुछ भूलें ऐसी होती हैं जिन को भुगतना ही पड़ता है.

‘‘फोन की घंटी बज रही थी. शिवचरण ने फोन उठाया, ‘‘हैलो.’’

‘‘नमस्ते, मामाजी,’’ दूसरी ओर से अजय की आवाज आई, ‘‘वह जो आप ने मधु के लिए वैवाहिक विज्ञापन देने को कहा था, उसी का मैटर कनफर्म करने को फोन किया है…पढ़ता हूं…कोई सुधार करना हो तो बताइए :

‘‘अग्रवाल, उच्च शिक्षित, 23, 5 फुट 4 इंच, गृहकार्य दक्ष, संस्कारी कन्या हेतु सजातीय वर चाहिए.’’

‘‘बाकी सब ठीक है, अजय. बस, ‘अग्रवाल’ लिखना जरूरी नहीं और ‘सजातीय’ शब्द की जगह लिखो, ‘जातिधर्म बंधन नहीं.’’’

‘‘मगर मामाजी, क्या आप ने सगेसंबंधियों से इस बारे में…’’

‘‘सगेसंबंधी जाएं भाड़ में….’’ शिवचरण फोन पर चीख पडे़.

‘‘और मामीजी…’’

‘‘तेरी मामी जाए चूल्हे में…अब मैं वही करूंगा जो मेरी बेटी के लिए सही होगा.’’

शिवचरण ने फोन रख दिया…फोन रख कर उन्हें लगा जैसे आज वह खुल कर सांस ले पा रहे हैं और अपने चारों तरफ लिपटे धूल भरे मकड़जाल को उन्होंने उतार फेंक

Father’s Day Special- सहारा : उमाकांत के मन से बेटी के लिए शक

अपनी सहेली के विवाह समारोह में भाग लेने के बाद दीप्ति आलोकजी के साथ रात को 11 बजे वापस लौटी. जिस घर में वह पेइंग गेस्ट की तरह रहती थी उस के गेट के सामने अपने मातापिता को खड़े देख वह जोर से चौंक पड़ी क्योंकि वे दोनों बिना किसी पूर्व सूचना के कानपुर से दिल्ली आए थे.

‘‘मम्मी, पापा, आप दोनों ने आने की खबर क्यों नहीं दी?’’ कार से उतर कर बहुत खुश नजर आ रही दीप्ति अपनी मां गायत्री के गले लग गई.

‘‘हम ने सोचा इस बार अचानक पहुंच कर देखा जाए कि यहां तुम अकेली किस हाल में रह रही हो,’’ अपने पिता उमाकांत की आवाज में नाराजगी और रूखेपन के भावों को पढ़ दीप्ति मन ही मन बेचैन हो उठी.

‘‘मैं बहुत मजे में हूं, पापा,’’ उन की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए दीप्ति उमाकांत के भी गले लग गई.

आलोकजी इन दोनों से पहली बार मिल रहे थे. उन्होंने कार से बाहर आ कर अपना परिचय खुद ही दिया.

‘‘रात के 11 बजे कहां से आ रहे हैं आप दोनों?’’ उन से इस सवाल को पूछते हुए उमाकांत ने अपने होंठों पर नकली मुसकराहट सजा ली.

‘‘दीप्ति की पक्की सहेली अंजु की आज शादी थी. वह इस के औफिस में काम करती है. यह परेशान थी कि शादी से घर अकेली कैसे लौटेगी. मैं ने इस की परेशानी देख कर साथ चलने की जिम्मेदारी ले ली. अकेले लौटने का डर मन से दूर होते ही शादी में शामिल होने की इस की खुशी बढ़ गई. मुझे अच्छा लगा,’’ आलोकजी ने सहज भाव से मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अकेली लड़की के लिए रात को इतनी ज्यादा देर तक घर से बाहर रहना ठीक नहीं होता है, बेटी,’’ दीप्ति को सलाह देते हुए उमाकांत की आवाज में कुछ सख्ती के भाव उभरे.

दीप्ति के कुछ बोलने से पहले आलोकजी ने कहा, ‘‘उमाकांतजी, देर रात के समय दीप्ति को मैं कहीं अकेले आनेजाने नहीं देता हूं. इस मामले में आप दोनों को फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘मांबाप को जवान बेटी की चिंता होती ही है. आजकल किसी पर भी भरोसा करना ठीक नहीं है जनाब. अब मुझे इजाजत दीजिए. गुड नाइट,’’ कुछ रूखे से अंदाज में अपने मन की चिंता व्यक्त करने के बाद उमाकांत मुड़े और गेट की तरफ चलने को तैयार हो गए.

‘‘उमाकांतजी, कल इतवार को आप डिनर हमारे घर कर रहे हैं. मैं ‘न’ बिलकुल नहीं सुनूंगा,’’ आलोकजी ने दोस्ताना अंदाज में उन के कंधे पर हाथ रख कर उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘ओके,’’ बिना मुसकराए उन्होंने आलोकजी का निमंत्रण स्वीकार किया.

दीप्ति ने असहज भाव से मुसकराते हुए उन से विदा ली, ‘‘गुड नाइट, सर. मैं सुबह ठीक 9 बजे पहुंच जाऊंगी.’’

‘‘थैंक यू ऐंड गुड नाइट,’’ आलोकजी ने उस से हाथ मिलाने के बाद गायत्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते किया और कार में बैठ गए.

उन्हें अपने घर पहुंचने में 5 मिनट लगे. अपनी पत्नी उषा की नजरों से वे अपने मन की बेचैनी छिपा नहीं पाए थे.

उषा की सवालिया नजरों के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘दीप्ति के मातापिता कानपुर से आए हैं. उन्हें दीप्ति का मेरे साथ इतनी देर से वापस लौटना अच्छा नहीं लगा. मुझे लग रहा है कि वे दोनों इस कारण तरहतरह के सवाल पूछ कर उसे जरूर परेशान करेंगे.’’

‘‘उन्हें अपनी बेटी पर विश्वास करना चाहिए,’’ उषा ने अपनी राय जाहिर की.

‘‘उस के पिता मुझे तेज गुस्से वाले इंसान लगे हैं. मुझे उन का विश्वास जीतने के लिए कुछ और देर उन के साथ रुकना चाहिए था.’’

‘‘हम कल उन्हें घर बुला लेते हैं.’’

‘‘मैं ने दोनों को कल रात डिनर के लिए बुला लिया है.’’

‘‘गुड.’’

‘‘तुम सुबह अनिता और राकेश को भी कल डिनर यहीं करने के लिए फोन कर देना.’’

‘‘ओके.’’

कुछ देर बाद अमेरिका में रह रहे अपने बेटे अमित और बहू वंदना से बात कर के उन का मूड कुछ सही हुआ. वे दोनों अगले महीने घर आ रहे हैं, यह खबर सुन वे खुशी से झूम उठे थे.

कमरदर्द से परेशान उषा नींद की गोली लेने के बाद जल्दी सो गई थी. आलोकजी दीप्ति की फिक्र करते हुए कुछ देर तक करवटें बदलते रहे थे.

सुबह 9 बजे से कुछ मिनट पहले दीप्ति अपनी मां गायत्री के साथ उन के घर पहुंच गई. आलोकजी को इस कारण उस के साथ अकेले में बातें करने का मौका नहीं मिला.

वैसे उन्हें मांबेटी सहज नजर नहीं आ रही थीं. इस बात से उन्होंने अंदाजा लगाया कि बीती रात दीप्ति के साथ उस के मातापिता ने उसे डांटनेसमझाने का काम जरूर किया होगा.

उन तीनों को फिजियोथेरैपिस्ट के यहां से वापस लौटने में डेढ़ घंटा लगा. तब तक आलोकजी ने सब के लिए नाश्ता तैयार कर दिया था. लेकिन गायत्री ने सिर्फ चाय पी और अपने पति के पास जल्दी वापस लौटने के लिए दीप्ति से बारबार आग्रह करने लगी. वह अपनी मां के साथ जाने को उठ कर खड़ी तो जरूर हो गई पर उस के हावभाव साफ बता रहे थे कि उसे गायत्री का यों शोर मचाना अच्छा नहीं लगा था.

पिछली रात वह 2 बजे सो सकी थी. उस के मातापिता ने कल उसे डांटते हुए कहा था :

‘अपनी दौलत और मीठे व्यवहार के बल पर यह आलोक तुम्हें गुमराह कर रहा है. बड़ी उम्र के ऐसे चालाक पुरुषों के जवान लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाने के किस्से किस ने नहीं सुने हैं.

‘तुम्हें इस इंसान से फौरन सारे संबंध तोड़ने होंगे, नहीं तो हम बोरियाबिस्तर बंधवा कर तुम्हें वापस कानपुर ले जाएंगे,’ उमाकांत ने उसे साफसाफ धमकी दे दी थी.

दीप्ति ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर वे दोनों कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे. तब धीरेधीरे उस का गुस्सा भी बढ़ता गया था.

‘बिना सुबूत और बिना मुझ से कुछ पूछे आप दोनों मुझे कैसे चरित्रहीन समझ सकते हैं?’ दीप्ति जब अचानक गुस्से से फट पड़ी तब कहीं जा कर उस के मातापिता ने अपना सुर बदला था.

‘चल, मान लिया कि तू भी ठीक है और यह आलोकजी भी अच्छे इंसान हैं, पर दुनिया वालों की जबान तो कोई नहीं पकड़ सकता है, बेटी. हमारा समाज ऐसे बेमेल रिश्तों को न समझता है, न स्वीकार करता है. तुझे अपनी बेकार की बदनामी से बचना चाहिए,’ उसे यों समझाते हुए जब गायत्री एकाएक रो पड़ीं तो दीप्ति ने उन दोनों को किसी तरह की सफाई देना बंद कर दिया था.

‘कल आप दोनों आलोक सर और उन की पत्नी से मिल कर उन्हें समझने की कोशिश तो करो. अगर बाद में भी आप दोनों के दिलों में उन के प्रति भरोसा नहीं बना तो आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगी,’ यह आखिरी बात कह कर दीप्ति ने उन्हें गेस्ट रूम में सोने भेज दिया था.

सुबह जागने के बाद दीप्ति की अपने मातापिता से ज्यादा बातें नहीं हुईं. बस, दोनों पार्टियों के बीच तनाव भरी खामोशी लंबी खिंची थी.

वे तीनों रात को 8 बजे के करीब आलोकजी के घर पहुंचे. उन्होंने अपनी पत्नी के साथसाथ उन का परिचय रितु और शिखा नाम की 2 लड़कियों से भी कराया.

‘‘ये दोनों पहली मंजिल पर रहने वाली हमारी किराएदार हैं. आज इन के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना ही आप दोनों को खाने को मिलेगा,’’ उषा ने रितु और शिखा के हाथ प्यार से थाम कर उन की तारीफ की.

‘‘रितु को नई जौब मिल गई है. वह अगले महीने मुंबई जा रही है. तब दीप्ति ने यहीं मेरे साथ शिफ्ट होने का प्लान बनाया है,’’ यह सूचना दे कर शिखा ने दीप्ति को गले से लगा लिया था.

इस खबर को सुनने के बाद उमाकांत की आंखों में पैदा हुई चिढ़ और नाराजगी के भावों को आलोकजी ने साफ पढ़ा. उमाकांत के मन की टैंशन कम करने के लिए उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘‘यह शिखा सोते हुए खर्राटे लेती है. शायद दीप्ति इस के साथ रूम शेयर न करना चाहे.’’

‘‘आलोक सर, मेरा सीक्रेट आप सब को क्यों बता रहे हैं?’’ शिखा ने नाराज होने का अभिनय करते हुए जब किसी छोटे बच्चे की तरह जमीन पर पांव पटके तो उमाकांत को छोड़ सभी जोर से हंस पड़े थे.

उमाकांत ने शुष्क स्वर में शिखा को बताया, ‘‘तुम्हें नई रूममेट ढूंढ़नी पड़ेगी क्योंकि दीप्ति तो बहुत जल्दी वापस कानपुर जा रही है.’’

‘‘अरे, कानपुर जाने का फैसला तुम ने कब किया, दीप्ति?’’ शिखा ने हैरान हो कर दीप्ति से सवाल किया.

‘‘पापा के इस फैसले की मुझे भी कोई जानकारी नहीं है,’’ दीप्ति ने थके से स्वर में उसे बताया और उषाजी का हाथ पकड़ कर रसोई की तरफ चल पड़ी.

‘‘अंकल, आप दीप्ति को कानपुर क्यों ले जा रहे हैं? क्या वहां उसे यहां जैसी अच्छी जौब मिलेगी?’’ उमाकांत के बगल में सोफे पर बैठती हुई शिखा ने सवाल पूछा.

‘‘वह?घर से दूर रहती है, इसलिए उस का कहीं रिश्ता पक्का करने में हमें दिक्कत आ रही है. वह जौब करेगी या नहीं, यह फैसला अब उस की भावी ससुराल वाले करेंगे,’’ उमाकांत अभी भी नाराज नजर आ रहे थे.

‘‘यह क्या बात हुई, अंकल? दीप्ति को तो बड़ी जल्दी प्रोमोशन मिलने वाला है. शादी करने के लिए उस की इतनी अच्छी जौब छुड़ाना गलत होगा,’’ शिखा को उन की बात पसंद नहीं आई थी.

‘‘अंकल, दीप्ति ने बहुत मेहनत कर के खुद को काबिल बनाया है. वह शादी होने के बाद जौब करे या न करे, यह फैसला उसी का होना चाहिए. आप को उस का रिश्ता उस घर में पक्का करना ही नहीं चाहिए जो जबरदस्ती उसे घर बिठाने की बात करें,’’ उमाकांत के सामने बैठती हुई रितु ने जोशीले अंदाज में अपनी राय व्यक्त की.

बहुत जल्दी ही उमाकांत ने खुद को इन दोनों लड़कियों के साथ बहस में उलझा हुआ पाया. दुनिया की ऊंचनीच समझाते हुए वे लड़कियों के लिए कैरियर से ज्यादा शादी को महत्त्वपूर्ण बता रहे थे.

उन्हें रितु और शिखा से यों बहस करने में मजा आ रहा है, यह इस बात से जाहिर था कि घंटे भर का वक्त गुजर जाने का उन्हें बिलकुल पता नहीं चला.

उन दोनों के साथ बातों में उलझे रहने का एक कारण यह भी था कि उन का मन एक तरफ चुपचाप बैठे आलोकजी से बात करने का बिलकुल नहीं कर रहा था.

गायत्री बहुत देर पहले रसोई में चली गई थी. वहां अपनी बेटी दीप्ति को उषा का कुशलता से काम में हाथ बटाते देख उन्हें यह समझ आ गया कि वह अकसर ऐसा करती रहती थी. दीप्ति को अच्छी तरह मालूम था कि वहां कौन सी चीज कहां रखी हुई थी.

उन्हें अपनी बेटी का उषा के साथ हंसनाबोलना अच्छा नहीं लग रहा था. दीप्ति, रितु और शिखा को इन लोगों ने अपने मीठे व्यवहार और दौलत की चमकदमक से फंसा लिया है, यह विचार बारबार उन के मन में उठ कर उन की चिंता बढ़ाए जा रहा था. किसी अनहोनी की आशंका से उन का मन बारबार कांप उठता था.

जब उषाजी ने उन के साथ हंसनेबोलने की कोशिश शुरू की तो और ज्यादा चिढ़ कर गायत्री ड्राइंगरूम में वापस लौट आईं. वे अपने पति की बगल में बैठी ही थीं कि किसी के द्वारा बाहर से बजाई गई घंटी की आवाज घर में गूंज उठी.

कुछ देर बाद आलोकजी एक युवती के साथ वापस लौटे और उमाकांत व गायत्री से उस का परिचय कराया, ‘‘यह मेरी बेटी अनिता है. आप दोनों से मिलाने के लिए मैं ने इसे खास तौर पर बुलाया है.’’

‘‘क्या अकेली आई हो?’’ अनिता के माथे पर लगे सिंदूर को देख कर गायत्री ने उस के नमस्ते का जवाब देने के बाद सवाल पूछा.

‘‘नहीं, राकेश साथ आए हैं. वे कार पार्क कर रहे हैं. दीप्ति तो बिलकुल आप की शक्लसूरत पर गई है, आंटी. इस उम्र में भी आप बड़ी अच्छी लग रही हैं,’’ अनिता के मुंह से अपनी तारीफ सुन गायत्री तो खुश हुईं पर उमाकांत को उस का अपनी पत्नी के साथ यों खुल जाना पसंद नहीं आया था.

‘‘उमाकांतजी, आप मेरे साथ पास की मार्किट तक चलिए. खाने के बाद मुंह मीठा करने के लिए रसमलाई ले आएं. दीप्ति ने बताया था कि आप को रसमलाई बहुत पसंद है,’’ बड़े अपनेपन से आलोकजी ने उमाकांत का हाथ पकड़ा और दरवाजे की तरफ चल पड़े.

उमाकांत को मजबूरन उन के साथ चलना पड़ा. वैसे सचाई तो यह थी कि उन का मन इस घर में बिलकुल नहीं लग रहा था.

घर से बाहर आते ही आलोकजी ने उन का परिचय अंदर प्रवेश कर रहे अपने दामाद से कराया, ‘‘ये मेरे दामाद राकेशजी हैं. शहर के नामी चार्टर्ड अकाउंटैंटों में इन की गिनती होती है. राकेशजी, ये दीप्ति के पिता उमाकांतजी हैं.’’

राकेश का परिचय जान कर उमाकांत को तेज झटका लगा था. उस ने अपने ससुर और उमाकांत दोनों के पैर छुए थे. उम्र में अपने से 8-10 साल छोटे राकेश से अपने पांव छुआना उन को बहुत अजीब लगा. उन्होंने बुदबुदा कर राकेश को आशीर्वाद सा दिया और बहुत बेचैनी महसूस करते हुए आगे बढ़ गए.

घर से कुछ दूर आ कर आलोकजी ने पहले एक गहरी सांस छोड़ी और फिर अशांत लहजे में उमाकांत को बताना शुरू किया, ‘‘अपने दिल पर लगे सब से गहरे जख्म को मैं आप को दिखाने जा रहा हूं. चार्टर्ड अकाउंटैंट बनने का सपना देखने वाली मेरी बेटी अनिता राकेश की फर्म में जौब करने गई थी. उन के बीच दिन पर दिन बढ़ते जा रहे दोस्ताना संबंध तब हमारे लिए भी गहरी चिंता का कारण बने थे, उमाकांतजी.

‘‘जब मेरी बेटी ने अपने से उम्र में 17 साल बड़े विधुर राकेश से शादी करने का फैसला हमें सुनाया तो हमारे पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. जिस आक्रोश, डर और चिंता को आप दोनों पतिपत्नी दीप्ति और मेरे बीच बने अच्छे संबंध को देख कर आज महसूस कर रहे हैं, उन्हें उषा और मैं भली प्रकार समझ सकते हैं क्योंकि हम इस राह पर से गुजर चुके हैं.

‘‘जिस पीड़ा को अनिता का बाप होने के कारण मैं झेल चुका हूं, वैसी पीड़ा आप को कभी नहीं भोगनी पड़ेगी, ऐसा वचन मैं आप को इस वक्त दे रहा हूं, उमाकांतजी. आप की बेटी का कैसा भी अहित मेरे हाथों कभी नहीं होगा.

‘‘इस महानगर में अनगिनत युवा पढ़ने और जौब करने आए हुए हैं. उन सब को अपने घर व घर वालों की बहुत याद आना स्वाभाविक ही है. घर से दूर अकेली रह रही लड़कियों के लिए बड़ी उम्र वाले किसी प्रभावशाली पुरुष के बहुत निकट हो जाने को समझना भी आसान है क्योंकि वह लड़की अपने पिता के साथ को परदेस में बहुत ‘मिस’ करती हैं.

‘‘जिन दिनों राकेश ने मेरी बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसाया, उन दिनों उषा और मैं भी अपने बेटेबहू के पास रहने अमेरिका गए हुए थे. राकेश आज मेरा दामाद जरूर है लेकिन मेरे मन के एक हिस्से ने उसे भावनात्मक दृष्टि से अपरिपक्व अनिता को गुमराह करने के लिए आज भी पूरी तरह से माफ नहीं किया है.

‘‘मेरी पत्नी कमरदर्द के कारण अपाहिज सी हो गई है. बेटाबहू विदेश में हैं. हम दोनों को दीप्ति, रितु व शिखा का बहुत सहारा है. सुखदुख में ये बहुत काम आती हैं हमारे.

‘‘बदले में हम इन्हें घर के जैसा सुरक्षित व प्यार भरा परिवेश देने का प्रयास दिल से करते हैं. हम सब ने एकदूसरे को परिवार के सदस्यों की तरह से अपना लिया है. सगे रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा बड़ा सहारा बन गए हैं हम एकदूसरे के.

‘‘दीप्ति मुझ से बहुत प्रभावित है… मुझे अपना मार्गदर्शक मानती है…वह मेरे बहुत करीब है पर इस निकटता का मैं गलत फायदा कभी नहीं उठाऊंगा. दीप्ति की जिंदगी में आप मुझे अपनी जगह समझिए, उमाकांतजी.’’

आलोकजी का बोलतेबोलते गला भर आया था. उमाकांत ने रुक कर उन के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और बहुत भावुक हो कर बोले, ‘‘आलोकजी, मैं ने आप को बहुत गलत समझा है. अपनी नजरों में गिर कर मैं इस वक्त खुद को बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं…मुझे माफ कर दीजिए, प्लीज.’’

वे दोनों एकदूसरे के गले लग गए. उन की आंखों से बह रहे आंसुओं ने सारी गलतफहमी दूर करते हुए आपसी विश्वास की जड़ों को सींच मजबूत कर दिया था.

Father’s Day Special- घर ससुर: क्यों दामाद के घर रहने पर मजबूर हुए पिताजी?

मेहुल ने तल्ख शब्दों में पूछा था, ‘‘मैं आप से फिर पूछ रहा हूं पिताजी कि आप घर आ रहे हैं या नहीं. आखिर कब तक दामाद के घर पड़े रहेंगे? अपनी नहीं तो मेरी इज्जत का तो कुछ खयाल कीजिए. भला आज तक किसी ने ‘घर ससुर’ बनने की बात सुनी है. मुझे तो लगता है कि आप का दिमाग ही चल गया है जो ऐसी बातें करते हैं.’’

‘‘नहीं सुनी तो अब सुन लो, और कितनी बार कहूं कि मैं ने  घर ससुर बनने का फैसला काफी सोचसमझ कर लिया है. मुझे अपने दामाद का घर ही अच्छा लग रहा है. कम से कम यहां एक प्याली चाय के लिए 10 बार कुत्ते की तरह भौंकना नहीं पड़ता. सीमा और किशोर मेरी हर बात का पूरा खयाल रखते हैं.

‘‘और सुनो, मेहुल, जब वे लोग भी मुझे बोझ समझने लगेंगे तो दिल्ली का ‘आशीर्वाद सीनियर सिटीजन्स होम’ तो है

ही   मुझ   जैसे उपेक्षित और बोझ बन चुके बूढ़ों के लिए. इसलिए तुम लोग अब मेरी चिंता मत करो,’’ मेघा के ससुर रुद्रप्रताप सिंह बोले.

जवाब में मेहुल कुछ और विषवमन करता हुआ बोला, ‘‘तो फिर बने रहिए घर ससुर और दामाद के हाथों अपनी इज्जत की धज्जियां उड़वाते रहिए.’’

मेघा को अपने ससुर के कहे शब्द स्पष्ट सुनाई पडे़, ‘‘हांहां, अपना आत्मसम्मान खो कर बेइज्जत बाप बने रहने से कहीं बेहतर है कि मैं इज्जतदार ‘घर ससुर’ ही बना रहूं,’’ और इसी के साथ उन्होंने फोन पटक कर अपनी नाराजगी जाहिर की तो मेहुल ने भी गुस्से में स्पीकर का स्विच बंद कर दिया.

मेघा को अपनेआप पर ग्लानि हो आई. सोचने लगी कि उस के मायके में जब लोगों को पता चलेगा कि उस की और मेहुल की लापरवाही के चलते उस के ससुर को बेटी के घर जाना पड़ा तो मायके के लोग उन के बारे में क्या सोचेंगे. उस की भाभियां क्या मां को ताना मारने का ऐसा सुनहरा अवसर हाथ से जाने देंगी. नहींनहीं, किसी भी तरह रिश्तेदारों को यह खबर होने से पहले उसे अपने ससुर को मना कर वापस लाना ही पडे़गा.

इस बारे में पहले मेहुल से बात करनी होगी. यह सोच कर मेघा ने मेहुल से कहा, ‘‘देखो, जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ. आखिर वह तुम्हारे पिताजी हैं और उन्होंने तुम को दो बातें कह भी दीं तो क्या हुआ, तुम्हें चुप रहना था. थोड़ा सा सह लेते और उन से नरमी से पेश आते तो यों बात का बतंगड़ नहीं बनता.’’

‘‘हांहां, अब तो तुम भली बनने का नाटक करोगी ही लेकिन तब एक वृद्ध व्यक्ति को समय पर खाना और चायनाश्ता देने में तुम्हारी नानी मरती थी. उस पर रातदिन बाबूजी की शिकायत करकर के तुम्हीं ने मेरा जीना हराम कर रखा था. अब भी तुम्हें बाबूजी के जाने का दुख नहीं है बल्कि उन के साथ पेंशन के 10 हजार रुपए जाने का गम सता रहा है.’’

इस तरह मेहुल ने सारा दोष मेघा के सिर मढ़ दिया तो वह तिलमिला उठी और व्यंग्यात्मक लहजे में बोली, ‘‘तो तुम भी कौन सा बाबूजी की याद में तड़प रहे हो. अपने दिल पर हाथ रख कर कहो कि तुम्हें बाबूजी के रुपयों की कोई जरूरत नहीं है.’’

मेहुल को जब मेघा ने उलटा आईना दिखाया तो वह खामोश हो गया. फिर कुछ नरमी से बोला, ‘‘खैर, जो हो गया सो हो गया. अब इस पर बहस कर के क्या फायदा. सोचो कि उन्हें कैसे बुलाया जाए. क्योंकि जितना मैं उन्हें जानता हूं वह अब खुद आने वाले नहीं हैं. अभी तो वह सीमा के घर हैं पर जहां कहीं उन के आत्म- सम्मान को जरा सी ठेस पहुंची तो वह ‘आशीर्वाद सीनियर सिटीजन्स होम’ जाने में एक पल की भी देर नहीं लगाएंगे. उस के बाद वहां से वह शायद ही वापस आएं.’’

‘‘तुम कहो तो मैं बात कर के देखती हूं,’’ मेघा बोली, ‘‘अब गलती हम ने की है तो उसे सुधारने की कोशिश भी हमें ही करनी पडे़गी. पिताजी हैं.’’

‘‘नहीं, रहने दो,’’ मेहुल बोला, ‘‘बाबूजी को गए महीना भर तो हो ही गया है. अब हफ्ते भर बाद ही बच्चों की क्रिसमस की छुट्टियां होने वाली हैं. हम सब जा कर बाबूजी को मना कर आदर के साथ ले आएंगे.’’

यह सब सुन कर हुर्रे कहते हुए रानी और फनी परदे के पीछे से निकल आए जो मम्मीपापा की ऊंची आवाज सुन कर वहां आ गए थे.

‘‘मां, सच में दादाजी हमारे पास वापस आ जाएंगे?’’ दोनों बच्चे खुशी से उछलते हुए एक स्वर में बोले.

‘‘हां, बेटे, वह जरूर आएंगे. हम सब मिल कर उन्हें लेने जाएंगे,’’ मेघा भीगे स्वर में बोली तो मेहुल के चेहरे पर भी स्नेहसिक्त मुसकान आ गई.

बच्चों की छुट्टियां शुरू होने पर वे अपनी कार से बाबूजी को लेने निकल पडे़. मेहुल ने घर छोड़ने से पहले फोन पर सीमा से यह पूछ लिया था कि बाबूजी घर पर हैं कि नहीं और उन का कहीं जाने का कार्यक्रम तो नहीं है.’’

सच है बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो साथ रहने वाले अपनों के महत्त्व को समझ नहीं पाते पर किसी कारण से जब वही अपने दूर चले जाते हैं तब उन की कमी शिद्दत से महसूस करते हैं. यही हाल मेहुल और मेघा का था. जब तक बाबूजी साथ रहते थे उन्हें हर समय ऐसा लगता था कि बाबूजी बेवजह उन के कामों में टोकाटाकी करते हैं. बच्चों से गैरजरूरी बातें कर के उन का समय बरबाद करते हैं. बाबूजी ने सब पर ही एक तरह से अंकुश लगा रखा था. ऐसा लगता था मानो उन की आजादी खत्म हो गई थी.

बाबूजी कहते थे कि जीवन में कुछ बनने के लिए अपने बच्चों में अनुशासन का बीजारोपण करने के लिए खुद को अनुशासित रह कर आचरण करना पड़ता है तभी बच्चे भी हमें अपना आदर्श मान कर हम से कुछ सीख पाते हैं. तब मेघा और मेहुल को उन की ये बातें कोरी बकवास लगा करती थीं किंतु आज उन्हें बाबूजी की कही एकएक बात में सचाई का आभास हो रहा है.

बाबूजी से हर महीने उन की पेंशन को लेना तो उन्हें याद रहा या यों कहें कि अपना अधिकार तो उन्हें याद रहा पर फर्ज निभाने से वे चूक गए. अपनी सहेलियों के साथ गप लड़ाते हुए मेघा अकसर भूल जाती कि बाबूजी चाय के लिए इंतजार कर रहे हैं. वह शुगर के मरीज हैं पर उन के ही दिए पैसों से शुगर फ्री खरीदने में उन्हें पैसों की बरबादी लगती थी.

मेहुल ने भी कभी यह न सोचा कि वृद्ध पिता को उस से भी कुछ उम्मीदें हो सकती हैं. दो घड़ी मेहुल से बात करने को वह तरस जाते पर उस को इस की कोई परवा न थी. बाबूजी ने तो मेहुल के बड़ा होते ही उसे अपना मित्र बना लिया था पर वही कभी उन का दोस्त नहीं बन पाया.

अचानक गाड़ी घर्रघर्र कर हिचकोले खा कर रुक गई. यह तो अच्छा हुआ कि पास ही में एक मोटर गैराज  था. धक्के दे कर गाड़ी को वहां तक ले जाया गया. मैकेनिक ने जांच करने के बाद बताया कि ब्रेक पाइप फट गया है और उसे ठीक होने में कम से कम एक दिन तो लगेगा ही. चूंकि यह एक इत्तेफाक था कि हादसा मेघा के मायके वाले शहर में हुआ था. इसलिए कोई उपाय न देख उन्होंने गाड़ी ठीक होने तक मेघा के मायके में रुकने का फैसला लिया.

एक टैक्सी कर मेहुल अपने परिवार को ले कर ससुराल की ओर चल दिया. उन्हें अचानक आया देख कर सभी बहुत खुश हुए. मेघा के परिवार में मम्मीपापा के अलावा उस के 2 बडे़ भाई और भाभियां थीं. बडे़ भैया के 2 जुड़वां बेटे जय और लय तथा छोटे भैया की एक बेटी स्वीटी थीं. बच्चों में उम्र का ज्यादा फासला नहीं था इसलिए जल्दी ही वे एकदूसरे से घुलमिल गए और हुड़दंग मचाने लगे.

मांबाबूजी के साथ थोड़ी देर बातें करने के बाद मेघा मेहुल को वहीं छोड़ कर रसोई की ओर चल पड़ी जहां उस की  दोनों भाभियां रात के खाने की तैयारी में जुटी थीं.

मेघा ने भाभियों का हाथ बंटाना चाहा पर उन्होंने उस का मन रखने के लिए चावल बीनने की थाली पकड़ा दी और वहीं रसोई के बाहर पड़ी कुरसी पर बैठा लिया. मेघा ने देखा कि उस की भाभियों ने बातोंबातों में कितने सारे पकवान बना लिए. वे जब 2 तरह की सब्जियां बना रही थीं तब मेघा ने पूछ लिया कि भाभी यह कम तेलमसाले की सब्जी किस के लिए बना रही हो तो बड़ी भाभी ने कहा कि मम्मीपापा बहुत सी खाने की चीजों से परहेज करते हैं. उन की उम्र देखते हुए उन के लिए थोड़ा अलग से बनाना पड़ता है.

‘‘पर मांबाबूजी को तो कोई बीमारी नहीं है. फिर उन के लिए आप लोग इतना झंझट क्यों कर रही हैं?’’ मेघा ने पूछा.

जवाब छोटी भाभी ने दिया, ‘‘तो क्या हुआ, बुजुर्ग लोग हैं, परहेज करते हैं तभी तो उन का स्वास्थ्य अच्छा है. फिर उन के लिए कुछ करने में कष्ट कैसा? यह तो हमारा फर्ज है. वैसे भी तुम जितना अपने ससुर के लिए करती हो उस हिसाब से हम तो कुछ भी नहीं करतीं.’’

‘‘मैं ने क्या किया और आप को कैसे पता चला?’’ मेघा कुछ असमंजस भरे स्वर में बोली.

‘‘अब रहने भी दो, दीदी,’’ बड़ी भाभी हंसती हुई बोलीं, ‘‘ज्यादा बनो मत. कल ही तो तुम्हारे ससुरजी का फोन आया था. उन्होंने ही तुम्हारे और मेहुल के बारे में हमें सबकुछ बताया.’’

मेघा के मन में जाने कैसेकैसे कुविचार और संदेह सिर उठाने लगे कि बाबूजी ने जरूर उन की शिकायत की होगी और इसीलिए भाभियां उसे यों ताने मार रही हैं पर मन का संशय प्रकट न कर मेघा बोली, ‘‘क्या बताया बाबूजी ने, क्या वह हम से नाराज हैं?’’

‘‘भला क्यों नाराज होंगे? वह तो तुम्हारी और मेहुल की बहुत तारीफ कर रहे थे. कह रहे थे कि बहू तो ऐसी है कि किसी चीज के लिए मेरे मुंह खोलने से पहले ही वह समझ जाती है कि मुझे क्या चाहिए.’’

पता नहीं भाभी और क्याक्या कहती रहीं, मेघा को और कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था. उस की अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगी कि अपनी नासमझी की वजह से उस ने कभी बाबूजी की परवा नहीं की. अपनी सुविधानुसार इस बात का खयाल किए बगैर कि वह खाना बाबूजी के स्वास्थ्य के लिए उचित है या नहीं, वह कुछ भी उन के सामने रख देती थी.

शुरुआत में 1-2 बार बाबूजी ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की थी पर उस ने कोई ध्यान न दिया. नतीजतन, उन की तबीयत आएदिन खराब हो जाती थी. एक उस की भाभियां हैं जो उस के स्वस्थ मातापिता का कितना ध्यान रखती हैं और एक वह है.

दूसरी ओर बाबूजी हैं कि इतना होने पर भी मायके में उस की किसी से शिकायत न कर तारीफ ही की. पश्चात्ताप की आग में जलती हुई उस की भावनाएं आंसुओं के रूप में आंखों से छलकने लगीं. वह मन ही मन प्रतिज्ञा करने लगी कि अब आगे से वह कभी भी बाबूजी को किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगी.

उधर मेहुल भी मेघा के भाइयों का अपने मातापिता के साथ व्यवहार देख कर ग्लानि से भरा जा रहा था. मेघा के दोनों भाई अपना खुद का कारोबार संभालते थे. दोनों ने ही घर आ कर उस दिन की बिक्री से प्राप्त रुपयों से अपने पिताजी को अवगत कराया. हालांकि उन्होंने किसी से भी रुपयों का ब्योरा देने के लिए नहीं कहा था. कुछ देर पास बैठ पितापुत्र ने एकदूसरे का हालचाल पूछा. फिर वे लोग मेहुल के साथ व्यस्त हो गए.

मेहुल मन ही मन सोच रहा था कि वह तो अपने पिता का इकलौता पुत्र है. इसलिए उसे तो उन की हर बात की ओर ध्यान देने की जरूरत है. मां के गुजर जाने के बाद वह अपनी बात कहते भी तो किस से. वह क्यों नहीं अब तक अपने पिता के मन की पीड़ा को समझ पाया. अब से वह बाबूजी के पेंशन के रुपयों को हाथ भी नहीं लगाएगा बल्कि उन की जरूरतों को अपने कमाए रुपए से पूरी करेगा.

अगले दिन गाड़ी ठीक हो कर घर आ गई पर मेघा के घर वालों ने जिद कर के उन्हें 2 दिन और रोक लिया. इस दौरान मेहुल ने मेघा के भाइयों का अपने मातापिता के  साथ बातचीत और व्यवहार को देख कर पहली बार जाना कि बुजुर्गों के अनुभव से कैसे लाभ उठाया जा सकता है. बच्चे कैसे दादा- दादी की वजह से अपने पारिवारिक इतिहास को जानते हैं तथा अपनी संस्कृति और रिश्तों की जड़ों से जुड़ते हैं. हमारे बुजुर्ग ही तो इन सारी चीजों की मूल जड़ होते हैं, हम तो बस, शाखा मात्र होते हैं. यदि मूल जड़ को ही काट कर फेंक दिया जाए तो गृहस्थी का वृक्ष कैसे फलफूल सकता है.

जब से मेघा और मेहुल बच्चों सहित बाबूजी को लेने निकले तो उन दोनों के सामने अपना ध्येय बिलकुल साफ हो चुका था. उन्हें विश्वास था कि उन की नादानी को माफ कर बाबूजी अवश्य उन के साथ वापस अपने घर आ जाएंगे. भला उन जैसा स्वाभिमानी व्यक्ति कभी ‘घर ससुर’ बन कर थोड़े ही रह सकता है. यह सब तो उन्हें सबक सिखाने के लिए बाबूजी ने कहा होगा. इस विश्वास के साथ वे खुशी मन से अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले.

Father’s Day Special: मुझे पापा कहने का हक है

एक के बाद एक कर अभ्यर्थी आते और जाते रहे. हालांकि चयन कमेटी में उन के अलावा 4 व्यक्ति और भी बैठे थे जो अपनेअपने तरीके से प्रश्न पूछ रहे थे. डा. राजीव बीचबीच में कुछ पूछ लेते वरना तो वह सुन ही रहे थे. अंतिम निर्णय डा. राजीव को ही लेना था.

आखिरी प्रत्याशी के रूप में आसमानी रंग की साड़ी पहने बीना को देख कर डा. राजीव एकदम चौंक पड़े. वही आवाज, वही रंगरूप, कहीं कोई परिवर्तन नहीं. अनायास ही उन के मुंह से निकल गया, ‘‘मधु, तुम?’’

‘‘कौन मधु सर? मैं तो बीना हूं,’’ हलकी सी मुसकराहट के साथ युवती ने उत्तर दिया.

‘‘सौरी,’’ डा. राजीव के मुंह से निकला.

चयन कमेटी के लोगों ने बीना से कई सवाल किए. बीना ने सभी प्रश्नों का शालीनता के साथ उत्तर दिया. सुबह से अब तक के घटनाक्रम ने एकदम नया मोड़ ले लिया. अभी भी डा. राजीव के मन में द्वंद्व था. सलेक्शन तो बीना का ही होना था सो हो गया. वाइस चेयरमैन यही चाहते थे. एक दुविधा से वह उबर गए, दूसरी अभी शेष थी. डा. राजीव खुद को संयत कर बोले, ‘‘बधाई हो बीना, तुम्हारा चयन हो गया है. बी.सी. साहब को खुशखबरी मैं दूं या तुम दोगी?’’

‘‘मुझे ही देने दें सर,’’ और सब को धन्यवाद दे कर बीना बाहर निकल गई. एकएक कर चयन कमेटी के लोग भी चले गए. सब से अंत में डा. राजीव बाहर आए. देखा तो बीना अभी किसी के इंतजार में खड़ी है.

‘‘किसी की प्रतीक्षा है?’’

‘‘आप का ही इंतजार कर रही थी सर.’’

‘‘मेरा क्यों?’’

‘‘आप से कोई वेटिंगरूम में मिलना चाहता है.’’

‘कौन होगा? कोई मुझ से क्यों मिलना चाहता है?’ सोचा उन्होंने, फिर बीना के पीछेपीछे चल दिए. बीना वेटिंगरूम के बाहर ही रुक गई. सामने मधु बैठी थी. अब चौंकने की बारी

डा. राजीव की थी.

‘‘मधु, तुम और यहां?’’

‘‘आप को धन्यवाद जो देना था सर.’’

‘‘लेकिन तुम्हें कैसे मालूम था कि साक्षात्कार मुझ को ही लेना है?’’

‘‘मुझे पता था.’’

‘‘अच्छा, और क्याक्या पता किया?’’

‘‘यही कि आप इलाहाबाद में हैं.’’

‘‘खैर, यह सब छोड़ो, पहले यह बताओ कि तुम इतने दिन कहां रहीं? मैं ने तुम्हें ढूंढ़ने की कितनी कोशिश की. 2 बार आगरा भी गया लेकिन तुम्हारा पता मालूम न होने के कारण कोई जानकारी न हो सकी. घरपरिवार में सब कैसे हैं?’’

‘‘इतनी उत्सुकता ठीक नहीं सर, सारे सवाल एकसाथ अभी पूछ लेंगे. शाम को 4 बजे चाय पर घर आइए. शेष बातें वहीं होंगी,’’ कहते हुए मधु ने एक कागज पर अपना पता लिख कर दे दिया और हाथ जोड़ कर वेटिंगरूम से बाहर निकल आई.

डा. राजीव भ्रमित से, असहाय से मधु और बीना को जाते हुए देखते रहे. कितना कुछ उन के भीतर भरा पड़ा था. मधु के सामने संचित कोष सा उडे़लना चाहते थे लेकिन इस के लिए उन्हें अभी 4 घंटे और इंतजार करना है. कैसे कटेंगे ये 4 घंटे? फिर उन्हें हाथ में पकड़े कागज का ध्यान आया. सेक्टर-सी, कोठी नंबर-18 और वे सेक्टर बी में रहते हैं. दोनों सेक्टर आमनेसामने हैं, लेकिन मधु इस से पहले कभी दिखाई क्यों नहीं दी?

सोचतेसोचते डा. राजीव अपने घर तक आ गए.

आदमी अपनी जिंदगी में कितनी बार जन्म लेता है और कितनी बार उसे मरना पड़ता है, कभी बेमौत, कभी बेवक्त और कभी विवशताजन्य परिस्थितियों के कारण. अपने ही अथक प्रयासों से अथवा आत्मविश्वास के सहारे कितनी बार वह डगमगाने से बचे हैं और तब उन्हें कितनी आत्मिक शांति मिली है. उन्होंने जिंदगी में कभी कोई ऐसा समझौता नहीं किया जिस का बोझ आत्मा सह न पाती. बेदाग, सीधीसपाट, सम्मानजनक स्थिति को जीते हुए अपने विभाग में कार्यरत 25 साल निकल गए.

25 साल…सोचतेसोचते डा. राजीव अचानक चौंक उठे. 25 साल पूरे एक व्यक्तित्व के विकास के लिए कम तो नहीं होते. जाने कितना कुछ बदल जाता है. आदमी कहां से कहां पहुंच जाता है. पर वे जरा भी नहीं बदले. समय के साथसाथ उन के व्यक्तित्व में और भी निखार आया है. विद्वता की चमक चेहरे पर बनी  रहती है. बेदाग चरित्र जो उन का है.

मधु को याद करते ही डा. राजीव 25 साल पीछे लौट गए. इस महाविद्यालय में आने से  पहले वह आगरा के एक डिगरी कालिज में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए थे. वह उन की पहली नियुक्ति थी. पहली बार कक्षा में मधु को देखने के बाद बस, देखते रह गए थे. उन के मन को क्या हुआ, वे स्वयं नहीं समझ पाए. गुलाब सा खिला मासूम सौंदर्य, उस पर भी जब नाम मधु सुना तो मन अनजाने, अनचाहे किसी डोर से बंधने सा लगा. तब डा. राजीव ने इसे महज प्रमाद समझा और झटका दे कर इस विचार को निकाल फेंकना चाहा लेकिन वह अपनी इस कोशिश में नाकामयाब रहे. कक्षा में मधु को देख कर दर्शनमात्र से जैसे उन्हें ऊर्जा मिलती. मधु अभी कक्षा में न होती तो उन्हें एक प्रकार की बेचैनी घेर लेती. उस दिन वे सिरदर्द का बहाना बना कर कक्षा छोड़ देते. वे नहीं जानते थे कि जो अनुभव वह कर रहे हैं क्या मधु भी वही अनुभव करती है? वह मधु के बारे में और बहुतकुछ जानना चाहते थे पर किस से जानें? क्या प्राध्यापक हो कर अपनी छात्रा से कुछ पूछना अच्छा लगेगा. दिमाग कहता नहीं और वे वक्त का इंतजार करने लगे.

अब डा. राजीव मधु पर विशेष ध्यान देते. 1-2 बार अपने नोट्स भी उसे दिए. कुछ किताबें लाइब्रेरी से अपने नाम से निकलवाईं. मधु ने साल के अंत में महज धन्यवाद कह दोनों हाथ जोड़ कर किताबें लौटा दीं. डा. राजीव हाथ मलते रह गए. नया सेशन शुरू हुआ. मधु ने फिर दाखिला लिया. अच्छे अंक ला कर परीक्षा पास की थी. अब डा. राजीव मधु पर और भी ध्यान देने लगे.

इस बार एक विशेष बात डा. राजीव नोट कर रहे थे कि सामने आते ही मधु के गाल लाज से आरक्त हो उठते, आंखें झुक जातीं. इस का अर्थ वह क्या लगाएं, समझ ही नहीं पा रहे थे. क्या मधु भी उन्हीं की तरह सोचती है? रहरह कर यह सवाल उन के मन में उठता.

उस दिन कक्षा के बाद स्टाफरूम के पीछे के लौन में अकेले बैठे डा. राजीव दिसंबर की कुनकुनी धूप सेंक रहे थे. कई दिन से तबीयत भी कुछ ढीली चल रही थी. वह रूमाल से बारबार अपनी आंख, नाक पोंछ रहे थे.

‘‘सर, लगता है आप की तबीयत ठीक नहीं है. मैं यह किताब आप को लौटाने आई थी,’’ अचानक मधु की आवाज सुन कर वह चौंक उठे. बस, यंत्रचालित से हाथ आगे बढ़ गए. जैसे ही उन्होंने किताब ले कर सामने मेज पर रखी कि सर्द हवा के झोंके से किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे और उन के बीच से एक ताजा गुलाब का फूल नीचे आ गिरा. एकएक कर उस गुलाब की पंखुडि़यां कुरसी के नीचे बिखर गईं.

मधु जल्दी से नीचे झुकी, तभी डा. राजीव के हाथ भी झुके. दोनों की उंगलियां परस्पर टकरा गईं. फूल की कुछ पंखुडि़यां मधु के हाथ आईं, कुछ डा. राजीव के.

डा. राजीव ने एक भरपूर नजर मधु पर डाली. मधु चुपचाप दुपट्टे के कोने को अपनी उंगली में लपेटती वहां से चली गई.

आज पूरा एक गुलाब उन की मुट्ठी में कैद था. जिस स्पर्श को वे पाना चाहते थे आज वह स्वयं उन के मानस को सहला गया था. उन के विचारों को जैसे पंख लग गए.

डा. राजीव ने खुद इस बात को नोट किया कि मधु कक्षा में उन का व्याख्यान ध्यान से नहीं सुनती, केवल गौर से उन का चेहरा देखती रहती है. उन्हें अपने चेहरे पर हमेशा 2 मासूम प्यारी सी आंखें टकटकी लगाए देखती नजर आतीं. वह जब मधु की ओर देखते तो मधु नजरें झुका लेती मानो चोरी करते वह पकड़ी गई हो.

‘‘क्लास में मन पढ़ाई में लगाया करो.’’

‘‘जी, कोशिश करूंगी.’’

परीक्षा की तारीख निकट आ रही थी. प्रिप्रेशन लीव हो चुकी थी. मधु का कालिज आना बंद हो चुका था. उस दिन 5 मार्च था. मधु पुस्तकालय की पुस्तकें लौटाने आई थी. मधु को स्टाफरूम की तरफ आता देख कर वह वहां से निकल कर एकांत में टहलने लगे. किताबें जमा कर मधु उन की तरफ आई और एक लिफाफा डा. राजीव की ओर बढ़ा कर वापस लौट गई.

डा. राजीव हाथ में लिफाफा थामे लौटती हुई मधु को देखते रहे. कहना तो जाने क्याक्या चाहते थे पर कहने के अवसर पर वाणी अवरुद्ध हो जाती थी. वह केवल एक भक्त और एक पुजारी की तरह दर्शन कर रह जाते. अपने प्यार को याद के सहारे सींच रहे थे.

मधु के जाने के बाद हाथ में थामे लिफाफे का ध्यान आया. खोल कर देखा तो अचंभित रह गए. उन्हें तो खुद ही याद नहीं था कि आज उन का जन्मदिन है. याद भी तब रहता जब कभी मनाया जाता. पर मधु को कैसे मालूम हुआ? तभी उन्हें याद आया कि कालिज मैगजीन में उन का सचित्र परिचय छपा था. वहीं से मधु ने लिया होगा. कार्ड पर एक खिला गुलाब था और गुलाब की एक पंखुड़ी पर एक सूखी पंखुड़ी चिपकी हुई थी.

डा. राजीव ने गौर से देखा, यह तो उसी गुलाब की पंखुड़ी थी जो उस दिन किताब से गिरी थी. उन्होंने उलटपलट कर कार्ड देखा. मधु का पता कहीं भी नहीं लिखा था.

पढ़ाई का अगला सत्र शुरू हो कि उन की नियुक्ति इलाहाबाद विश्व-विद्यालय में हो गई. आगरा छोड़ते समय उन के मन में चाह थी कि एक बार मधु से मिल लेते, लेकिन मधु का पताठिकाना उन्हें मालूम न था.

प्यार का अंकुर विरह की व्यथा में तपने लगा. डा. राजीव को जब भी एकांत मिलता मधु का चेहरा सामने आ जाता. वे जहां कहीं भी खिले गुलाब को देखते, अपने होश खो बैठते. मधु और गुलाब, गुलाब और मधु एकदूसरे में जैसे विलीन हो जाते.

5 मार्च को फिर वैसा ही कार्ड मिला. वही एक सूखी पंखुड़ी, क्या अर्थ है, इस पंखुड़ी का? क्या मधु प्रतीक रूप में कहना चाहती है कि मैं भी ऐसे ही सूख रही हूं अथवा प्रतीक्षा का एक वर्ष पूरा हुआ. कई बार मन हुआ कि दौड़ कर पहुंच जाएं. एक बार मन के हाथों हार कर राजीव आगरा पहुंचे भी पर उन की यह यात्रा निरर्थक रही. मधु ने पढ़ना छोड़ दिया था. क्यों? यह कोई नहीं जानता.

लगातार 6 सालों तक गुलाब के फूल व सूखी पंखुड़ी वाले कार्ड हर 5 मार्च को मिलते रहे. अंतिम कार्ड में महज चंद शब्द लिखे थे, ‘गुलाब का फूल पूरा हो गया होगा. महज इतनी ही पंखुडि़यां तब समेट पाई थी इसलिए पूजा का अधिकार भी इतने ही दिन रहा.’

इस के बाद कोई भी कार्ड नहीं आया. कार्ड पर मधु के नाम व आगरा की मुहर के अलावा डा. राजीव को और कुछ हाथ न लगा. उन्होंने सारी पंखुडि़यां जमा कर के गिनीं तो पूरी 14 थीं. 7 उन के पास 7 मधु के पास. क्या गुलाब के फूल में 14 पंखुडि़यां ही होती हैं?

अचानक एक दिन यों ही डा. राजीव ने एक ताजा गुलाब की पंखुडि़यों को तोड़ कर गिना तो सचमुच 14 ही निकलीं. उन के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. वह 7 कार्ड और 14 गुलाब की पंखुडि़यां

डा. राजीव के तीर्थस्थल बन गए. जब भी अपनी अलमारी खोलते एक मासूम सी गंध का झोंका उन्हें सहला जाता.

जीवन की यात्रा चलती रही. भावनाओं के अंकुर कर्तव्य के मार्ग में वहीं रुक गए, लेकिन उस के बाद वह अपना जन्मदिन न भूल सके. 5 मार्च को जब भी डाक आती डा. राजीव बड़ी उत्सुकता से एकएक चिट्ठी खोल कर देखते लेकिन जिस का वह इंतजार कर रहे थे वही नहीं मिल रही थी.

मुट्ठी में दबी ताजा गुलाब की पंखुडि़यों को सूंघते हुए अनमने से राजीव अपने निवास पर आ गए. आज पूरा अतीत उन्हें अपने में समेट लेना चाहता था. उन गुलाब की पंखुडि़यों के सहारे 30 साल गुजार दिए पर वह गृहस्थी का सुख न पा सके.

चौंक कर डा. राजीव ने घड़ी पर नजर डाली. 4 बजने में 5 मिनट शेष थे. यानी पूरे 4 घंटे अतीत की वादियों में घूमते रहे. बिस्तर से उठ कर बाथरूम में गए. मुंह धोया और डे्र्रसिंग टेबल के सामने खड़े हो कर बालों में कंघी घुमाई, कपड़े बदले और निकल पड़े. आज गाड़ी नहीं निकाली और निकाल कर भी क्या करते. कौन दूर जाना था उन्हें.

निश्चित स्थान पर पहुंच कर कालबेल बजाई. फौरन दरवाजा खुल गया. मधु ने उन्हें एक बड़े से सुसज्जित ड्राइंगरूम में बैठाया और बोली, ‘‘अब आप अपनी शंकाओं का समाधान कर सकते हैं सर. मैं ही अपने बारे में बता देती हूं. आप शायद भूल रहे हैं कि 25 साल पहले आप के एक साथी थे

डा. सुशांत, जिन का विवाह के एक महीने बाद ही सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था. आप यहां नएनए आए थे. परिचय भी कोई खास नहीं था. बीना उन्हीं की बेटी है और यह कोठी भी उन्हीं की है.’’

‘‘इतने पास रह कर भी कभी मिलने की कोशिश तुम ने नहीं की?’’

‘‘क्या कोशिश करती सर? आगरा और इलाहाबाद के बीच घूमती रही. जिसे भुलाना चाहा उसे भुला न सकी और जिस के साथ जिंदगी का सफर तय करना चाहा उस ने एक कदम साथ चल कर हमेशाहमेशा को अकेला छोड़ दिया.’’ दुखी हो उठी मधु. स्वयं को संभाला, हंसने का प्रयास करते हुए पूछा, ‘‘अपनी ही सुनाती रही, आप के बारे में नहीं पूछा, आप का घरपरिवार कैसा है, सर?’’

‘‘घरपरिवार बसा ही नहीं तो होगा कहां से?’’

‘‘मेरे कारण पूरा जीवन आप ने अकेले ही काट दिया,’’ हैरान रह गई मधु.

‘‘तुम से कहने का साहस नहीं हुआ और तुम्हारे अलावा किसी और को चाह न सका. क्या तुम मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘अब इस उम्र में आप क्या मनवाएंगे?’’

‘‘जो बात तब न कह सका, अब कहना चाहता हूं. पहले ही काफी देर हो चुकी है मधु, क्या यह सफर एक खूबसूरत मोड़ ले कर आगे नहीं बढ़ सकता?’’

हाथ में चाय की ट्रे लिए बीना ने ड्राइंगरूम में घुसते हुए कहा, ‘‘बढ़ सकता है अंकल. मैं आप के और मां के सफर को आगे बढ़ाऊंगी,’’ हाथ में पकड़ी चाय की ट्रे को सेंटर टेबल पर रख वह मां के पास आ कर बैठ गई और उन का हाथ अपने हाथ में ले लिया.

‘‘अंकल, मैं ने मां को कितनी ही बार आप का फोटो देखते देखा है. मैं जानती हूं कि मां आप को बहुत प्यार करती हैं. मैं भी पापा के प्यार को तरस रही हूं. जानती ही नहीं कि पापा कैसे होते हैं? बस, उन की तसवीर देखी है. दादी और दादाजी पुत्र शोक में जल्दी ही चल बसे. मैं भी ससुराल चली गई और मां अब बिलकुल अकेली रह गई हैं. आखिर मां को भी तो अपना दुखसुख बांटने वाला कोई चाहिए. आप और मां एक हो कर भी अलगअलग हैं. अब अलग नहीं रहेंगे.’’

‘‘तू जानती है, क्या कह रही है?’’ आंखें झर रही थीं मधु की.

‘‘सच बताना मां, तुम्हें इन आंसुओं की कसम, जो मैं चाहती हूं वह आप नहीं चाहतीं? अंकल, क्या आप को पापा कहने का हक है मुझे?’’ बीना ने दोनों से एक ही लफ्ज में अपना सवाल पूछ दिया.

डा. राजीव ने बीना को अपने कंधे से लगा कर उस का माथा चूम लिया, ‘‘सारी दुनिया की खुशियां आज अचानक मेरी झोली में आ गईं. पहली बार पापा बना हूं. पहली बार बेटी मिली है. मैं मना कर ही नहीं सकता,’’ डा. राजीव कहतेकहते भावविभोर हो उठे.

Father’s Day Special: जिंदगी जीने का हक- भाग 1

प्रणव तो प्रिया को पसंद था ही लेकिन उस से भी ज्यादा उसे अपनी ससुराल पसंद आई थी. हालांकि संयुक्त परिवार था पर परिवार के नाम पर एक विधुर ससुर और 2 हमउम्र जेठानियां थीं. बड़ी जेठानी जूही तो उस की ममेरी बहन थी और उसी की शादी में प्रणव के साथ उस की नोकझोक हुई थी. प्रणव ने चलते हुए कहा था, ‘‘2-3 साल सब्र से इंतजार करना.’’

‘‘किस का? आप का?’’

‘‘जी नहीं, जूही भाभी का. घर की बड़ी तो वही हैं, सो वही शादी का प्रस्ताव ले कर आएंगी,’’ प्रणव मुसकराया, ‘‘अगर उन्होंने ठीक समझा तो.’’

‘‘यह बात तो है,’’ प्रिया ने गंभीरता से कहा, ‘‘जूही दीदी, मुझे बहुत प्यार करती हैं और मेरे लिए तो सबकुछ ही ठीक चाहेंगी.’’

प्रणव ने कहना तो चाहा कि प्यार तो वह अब हम से भी बहुत करेंगी और हमारे लिए किसे ठीक समझती हैं यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन चुप रहा. क्या मालूम बचपन से बगैर औरत के घर में रहने की आदत है, भाभी के साथ तालमेल बैठेगा भी या नहीं.

अभिनव के लिए लड़की देखने से पहले ही केशव ने कहा था, ‘‘इतने बरस तक यह मकान एक रैन बसेरा था लेकिन अभिनव की शादी के बाद यह घर बनेगा और इस में हम सब को सलीके से रहना होगा, ढंग के कपड़े पहन कर. मैं भी लुंगीबनियान में नहीं घूमूंगा और अभिनव, प्रभव, प्रणव, तुम सब भी चड्डी के बजाय स्लीपिंग सूट या कुरतेपाजामे खरीदो.’’

‘‘जी, पापा,’’ सब ने कह तो दिया था लेकिन मन ही मन डर भी रहे थे कि पापा का एक भरेपूरे घर का सपना वह पूरा कर सकेंगे कि नहीं.

केशव मात्र 30 वर्ष के थे जब उन की पत्नी क्रमश: 6 से 2 वर्ष की आयु के 3 बेटों को छोड़ कर चल बसी थी. सब के बहुत कहने के बावजूद उन्होंने दूसरी शादी के लिए दृढ़ता से मना कर दिया था.

वह चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. उन्होंने घर में ही आफिस खोल लिया ताकि हरदम बच्चों के साथ रहें और नौकरों पर नजर रख सकें. बच्चों को कभी उन्होंने अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. आवश्यक काम वह उन के सोने के बाद देर रात को निबटाया करते थे. उन की मेहनत और तपस्या रंग लाई. बच्चे भी बड़े सुशील और मेधावी निकले और उन की प्रैक्टिस भी बढ़ती रही. सब से अच्छा यह हुआ कि तीनों बच्चों ने पापा की तरह सीए बनने का फैसला किया. अभिनव के फाइनल परीक्षा पास करते ही केशव ने ‘केशव नारायण एंड संस’ के नाम से शहर के व्यावसायिक क्षेत्र में आफिस खोल लिया. अभिनव के लिए रिश्ते आने लगे थे. केशव की एक ही शर्त थी कि उन्हें नौकरीपेशा नहीं पढ़ीलिखी मगर घर संभालने वाली बहू चाहिए और वह भी संयुक्त परिवार की लड़की, जिसे देवरों और ससुर से घबराहट न हो.

जूही के आते ही मानो घर में बहार आ गई. सभी बहुत खुश और संतुष्ट नजर आते थे लेकिन केशव अब प्रभव की शादी के लिए बहुत जल्दी मचा रहे थे. प्रभव ने कहा भी कि उसे इत्मीनान से परीक्षा दे लेने दें और वैसे भी जल्दी क्या है, घर में भाभी तो आ ही गई हैं.

‘‘तभी तो जल्दी है, जूही सारा दिन घर में अकेली रहती है. लड़की हमें तलाश करनी है और तैयारी भी हमें ही करनी है. तुम इत्मीनान से अपनी परीक्षा की तैयारी करते रहो. शादी परीक्षा के बाद करेंगे. पास तो तुम हो ही जाओगे.’’

अपने पास होने में तो प्रभव को कोई शक था ही नहीं सो वह बगैर हीलहुज्जत किए सपना से शादी के लिए तैयार हो गया. लेकिन हनीमून से लौटते ही यह सुन कर वह सकते में आ गया कि पापा प्रणव की शादी की बात कर रहे हैं.

‘‘अभी इसे फाइनल की पढ़ाई इत्मीनान से करने दीजिए, पापा. शादीब्याह की चर्चा से इस का ध्यान मत बटाइए,’’ प्रभव ने कहा, ‘‘भाभी की कंपनी के लिए सपना आ ही गई है तो इस की शादी की क्या जल्दी है?’’

‘‘यही तो जल्दी है कि अब इस की कोई कंपनी नहीं रही घर में,’’ केशव ने कहा.

‘‘क्या बात कर रहे हैं पापा?’’ प्रभव हंसा, ‘‘जब देखिए तब मैरी के लिटिल लैंब की तरह भाभी से चिपका रहता है और अब तो सपना भी आ गई है बैंड वैगन में शामिल होने को.’’

सपना हंसने लगी.

‘‘लेकिन देवरजी, भाभी के पीछे क्यों लगे रहते हैं यह तो पूछिए उन से.’’

‘‘जूही मुझे बता चुकी है सपना, प्रणव को इस की ममेरी बहन प्रिया पसंद है, सो मैं ने इस से कह दिया है कि अपने ननिहाल जा कर बात करे,’’ कह कर केशव चले गए.

‘‘जब बापबेटा राजी तो तुम क्या करोगे प्रभव पाजी?’’ अभिनव हंसा, ‘‘काम तो इस ने पापा के साथ ही करना है. पहली बार में पास न भी हुआ तो चलेगा लेकिन जूही, तुम्हारे मामाजी तैयार हो जाएंगे अधकचरी पढ़ाई वाले लड़के को लड़की देने को?’’

‘‘आप ने स्वयं तो कहा है कि देवरजी को काम तो पापा के साथ ही करना है सो यही बात मामाजी को समझा देंगे. प्रिया का दिल पढ़ाई में तो लगता नहीं है सो करनी तो उस की शादी ही है इसलिए जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है मामाजी के लिए.’’

जल्दी ही प्रिया और प्रणव की शादी भी हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि केशव जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए और कुछ लोगों की यह शंका जाहिर करने पर कि बच्चों के तो अपनेअपने घरसंसार बस गए, केशव के लिए अब किस के पास समय होगा और वह अकेले पड़ जाएंगे, अभिनव बोला, ‘‘ऐसा हम कभी होने नहीं देंगे और होने का सवाल भी नहीं उठता क्योंकि रोज सुबह नाश्ता कर के सब इकट्ठे ही आफिस के लिए निकलते हैं और रात को इकट्ठे आ कर खाना खाते हैं, उस के बाद पापा तो टहलने जाते हैं और हम लोग टीवी देखते हैं, कभीकभी पापा भी हमारे साथ बैठ जाते हैं. रविवार को सब देर से सो कर उठते हैं, इकट्ठे नाश्ता करते हैं…’’

Father’s Day Special- मौहूम सा परदा: भाग 1

डा. जाकिर अली लखनऊ से दिल्ली की फ्लाइट में उड़ान भर रहे थे. इस शहर से जुड़ी उन की पुरानी यादें हवाई जहाज की रफ्तार से भी तेजी से उन के दिमाग में घूम रही थीं.

वे 8-10 दिनों बाद गांव से दिल्ली लौटे तो खुद के कमरे की खिड़कियों की पत्थर की नक्काशीदार जालियों पर लोहे के फ्रेम में बारीक तारों की एक और जाली लगी देख कर असमंजस में पड़ गए. उन्हें कुछ समझ में नहीं आया.

उन्होंने बड़े बेटे शाहिद से जानना चाहा, तो वह बोला, ‘‘जी अब्बू, खिड़की की पुरानी जाली के बड़ेबड़े सूराखों से धूल, मच्छर, कीड़े वगैरा आते थे, इसलिए इस कमरे के अंदर की तरफ से यह जाली लगवा दी. कुल 3 हजार रुपए लगे और अब्बू, खिड़की की जाली के पत्थर पर पुराना शानदार नक्काशी का काम तो बाहर से आने वालों को पहले की तरह ही नजर आता है. और…और…इस के बाद कुछ तो नवाबी खानदान की घुट्टी में मिली तहजीब से पिता के प्रति सम्मान और कुछ कोई ठोस वजह वाले शब्द नहीं मिलने से वह हकलाते हुए चुप हो गया.

तभी उस के कमरे से उस की बीबी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘और  लोगों की नजरों पर एक मोहूम सा परदा भी पड़ा रहेगा.’’ इस के बाद उस की बेशरम हंसी की आवाज आई तो डा. जाकिर अली बौखला गए. उन की मौजूदगी में उन की पुत्रवधू का इस तरह गुफ्तगू करना और ठहाका लगा कर हंसना उन के खानदानी आचरण में नहीं था. उन्होंने सवालिया नजरों से शाहिद को देखा तो वह शर्मिंदगी से नजर झुकाए पीछे मुड़ा और अपने कमरे में चला गया.

मोहूम से परदे का जुमला डा. जाकिर के दिल में नश्तर की तरह चुभ गया था. सो, शाहिद के चले जाने के बाद वे काफी देर गुमसुम खड़े रहे. फिर बोझिल कदमों से धीरेधीरे चल कर अपने कमरे में जा कर आरामकुरसी पर गिर से पडे़. डा. जाकिर अली की आंखों के सामने यह जुमला सिनेमा की रील की तरह चालू हो गया…

डा. जाकिर अली नवाबी खानदान से संबंध रखते थे. महानगर से 50 किलोमीटर दूर गांव में उन की 5 मंजिली पुश्तैनी हवेली, आम के कई बाग और काफी सारी खेती की जमीन थी. उर्दू उन के खून में थी. सो, गांव के मदरसे से शुरू हुई शिक्षा राज्य की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से उर्दू और फारसी में एमए, पीएचडी कर के पूरी हुई. फिर उसी यूनिवर्सिटी में वे उर्दू के लेक्चरर बने और हैड औफ द डिपार्टमैंट के पद से रिटायर हुए.

यह कोई 30-35 साल पहले की बात है जब डा. जाकिर ने यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया. जब भी किसी शायर का कलाम पढ़ाते तो क्लास का माहौल ऐसा उर्दूमय और शायराना बना देते थे कि दूसरी क्लासों के लड़के उन की क्लास में आ कर बैठ जाया करते थे. ऐसे ही एक दिन वे किसी सूफी शायर की कोई कविता पढ़ा रहे थे और उस की तुलना भारतीय विशिष्ट अद्वैत से करने के लिए वे एक संस्कृत का श्लोक उद्धृत करना चाह रहे थे लेकिन नफीस उर्दू जबान पर संस्कृत का श्लोक बारबार फिसल जाता था. तभी उधर से संस्कृत विभाग की लेक्चरर डा. मंजरी निकलीं. डा. मंजरी ने उन्हें नमस्कार किया और बतलाया कि संस्कृत के कठिन शब्दों को 2 टुकड़ों में बांट कर बोलें तो वे बिलकुल सरल हो जाएंगे. डा. जाकिर अली की मुश्किल हल हो गई.

डा. मंजरी डा. जाकिर की हमउम्र थीं. उस दिन से संस्कृत के कठिन शब्दों की गांठ खोलने का जो सिलसिला शुरू हुआ उस के चलते वे न जाने कब एकदूसरे के सामने अपने मन की गांठें खोलने लगे और धीरेधीरे एकदूसरे के मन में इतने गहरे उतर गए कि अब अगर एक दिन भी आपस में नहीं मिलते थे तो दोनों ही बेचैन हो जाते. दूसरे दिन मिलने पर दोनों की आंखें गवाही देती थीं कि रातभर नींद का इंतजार करते दुख गई हैं.

ऐसे ही एक रतजगे के बाद दोनों मिले तो डा. जाकिर ने डा. मंजरी का हाथ अपने हाथ में थाम कर बेताबी से कहा, देखो, मंजरीजी, अब इस तरह गुजारा नहीं होगा. मैं क्या कहना चाह रहा हूं आप समझ रही हैं न.’ मंजरी ने जवाब दिया था, ‘जाकिर साहब, पिताजी तो खुले विचारों के हैं, इसलिए उन्हें तो करीबकरीब मना लिया है मगर मां को मनाने में थोड़ा वक्त लगेगा, थोड़ा इंतजार करिए, सब्र का फल मीठा होता है.’

तब वह जमाना था जब देश की गंगाजमुनी संस्कृति में राजनीति विष सी  बन कर नहीं घुली थी. वोटों की खातिर सत्ता के दलालों ने 2 संस्कृतियों को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का सांप्रदायिक लिबास नहीं पहनाया था. लवजिहाद या घरवापसी के नारे नहीं गूंजे थे. संस्कृत विभाग के प्रोफैसर

डा. रामकिंकर खुद डा. जाकिर के बड़े बन कर उन की तरफ से पैगाम ले कर मंजरी के घर गए थे और पहली बार उन की मां की गालियां खा कर चुपचाप लौट आए. मगर दूसरे दिन ही फिर पहुंच गए. फिर लगातार समझाइश के बाद आखिर उन्होंने खुद डा. जाकिर का बड़ा भाई बन कर  जिम्मेदारी ली कि विवाह के बाद न  तो मंजरी का नाम बदला जाएगा, न धर्म. फिर 2-4 पढ़ेलिखे और समाज के प्रतिष्ठित व प्रगतिवादी लोगों की मध्यस्थता से उन्होंने अपनी मुंहबोली भांजी डा. मंजरी का विवाह डा. जाकिर से करा दिया था.

डा. मंजरी विवाह के बाद भी मंजरी ही रहीं. शादी के 3 सालों बाद जब पहली संतान हुई तो मंजरी ने ही जाकिर अली से कहा, ‘जाकिर साहब, औलाद की पहचान बाप के नाम से होती है, आप बच्चे का नाम अपने खानदानी रिवायत के मुताबिक ही रखें.’ और बच्चे का नाम शाहिद तय हुआ था. इस के 3 सालों बाद जब दूसरा पुत्र हुआ तो उस का नाम साजिद रखा गया.

डा. जाकिर अली की शादी को 10 साल बीत गए थे. सबकुछ बेहद खुशगवार था. तभी उस साल चेचक महामारी बन कर फैली और पता नहीं कैसे डा. मंजरी उस की चपेट में आ गईं. बहुत दवा, कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका.

डा. जाकिर अली की तो दुनिया ही उजड़ गई. वे एकदम टूट गए थे. अब न तो उन्हें पढ़ाने में वह दिलचस्पी रही थी न क्लास लेने में. घरगृहस्थी की परेशानी थी, सो अलग. पता नहीं मंजरी ने पिछले 10 सालों में उन्हें और उन के घर को कैसे संभाला था कि आज उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि उन्हें बनियान कितने नंबर की आती है.

रिश्तेदारी और परिवार में कोई ऐसी महिला थी नहीं, जिसे वे घर ला कर बच्चों की परवरिश व घर की जिम्मेदारी दे कर निश्ंिचत हो जाते. घर जैसेतैसे पुराने बावर्ची और माली की मदद से चलता रहा. एक साल बीत गया तो उन्होंने शाहिद और साजिद को होस्टल में भेजने का निर्णय किया. यह पता चलने पर बूढ़े बावर्ची ने रोते हुए साजिद को कलेजे से लगा कर फरियाद की, ‘नवाब साहब, नमक खाया है इस घर का और आप के पिता ने हमें चाकर नहीं समझा. आज उन्हीं की याद दिला कर आप से कहता हूं कि बच्चों को हमारी नजरों से दूर नहीं करें.’

हार कर उन्होंने एक पढ़ीलिखी आया की जरूरत का इश्तिहार दे दिया. इंटरव्यू के लिए राबिया बानो उन के घर आईं तो डा. जाकिर को लगा कि शायद वे यों ही आई होंगी. राबिया यूनिवर्सिटी में म्यूजिक डिपार्टमैंट में ट्यूटर थीं और गजलों के संगीत की धुन बनाने के लिए उर्दू गजलों में अरबी या फारसी के कुछ कठिन शब्दों का सीधीसादी भाषा में अर्थ समझने के लिए अकसर उन से मिलती रहती थीं. उन के बारे में बताया गया था कि उन के शौहर मेकैनिकल इंजीनियर थे. कंपनी के कौंट्रेक्ट पर दुबई गए थे. वहां किसी विदेशी महिला की मुहब्बत के जाल में फंस गए और उस से निकाह कर के टैलीफोन पर 3 बार तलाक बोल कर राबिया बानो को तलाक दे दिया.

थोड़ी देर इधरउधर की बातें होती रहीं. मगर जब दूसरी महिला उम्मीदवार आने लगी तो राबिया खुद उन से बोलीं, ‘डाक्टर साहब, आप ने 2 बच्चों की परवरिश करने लायक एक पढ़ीलिखी आया की जरूरत का इश्तिहार दिया है न?’

‘जी हां, क्या आप की नजरों में कोई है, या आप किसी की सिफारिश कर रही हैं,’ डा. जाकिर ने अधीरता से पूछा तो राबिया ने बड़ी दृढ़ता से जवाब दिया, ‘न तो मेरी नजर में कोई है, न मैं किसी की सिफारिश कर रही हूं. डाक्टर साहब, मैं खुद हाजिर हुई हूं.’

जवाब सुन कर वे ऐसे चौंके थे जैसे कोई करंट का जोरदार झटका लगा हो. मगर बोले, ‘आप यह क्या कह रही हैं राबियाजी, आप, आप.’ आगे कोई उपयुक्त शब्द नहीं मिलने के कारण वे खुद को बेहद असहज महसूस करते हुए चुप हो गए.

उन की स्थिति को समझते हुए राबिया ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया, ‘डाक्टर साहब, मैं पूरे होशोहवास में आप के सामने यह प्रस्ताव रख रही हूं. पिछले 4 सालों से मैं अकेली इस समाज के भेड़ की खाल ओढ़े भेडि़यों से अपने को महफूज रखने की जंग लड़तेजूझते पस्त हो गई हूं. तलाकशुदा अकेली औरत को हर कोई मिठाई का टुकड़ा समझ कर निगल जाना चाहता है. पहले वर्किंग वुमेन होस्टल में रहती थी. वहां की वार्डन महोदया देखने में तो हमजैसी अकेली औरतों की बड़ी हमदर्द थीं, मगर वास्तव में वे भड़वागीरी करती थीं.

वहां से निकल कर यूनिवर्सिटी के गर्ल्स होस्टल में रहने लगी तो कुछ दिनों बाद ही वहां के वार्डन महोदय को उर्दू सीखने का शौक चर्राया और वे इस बहाने देर रात गए मेरे कमरे में जमने लगे. फिर उर्दू की सस्ती किताबों में बाजारू लेखकों के द्विअर्थी इशारों को समझने के बहाने घटिया हरकतें करने लगे. तो एक दिन मैं ने उन्हें सख्ती से डांट दिया. बस, 2 सप्ताह में ही उन्होंने मुझे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि मेरे रहने पर गर्ल्स स्टूडैंट्स को एतराज है. अब जिस सोसाइटी के फ्लैट में रह रही हूं वहां के सैके्रटरी साहब, वैसे तो छोटी बहन कहते हैं, मगर बातबात में गले लगाने और देररात को, खासतौर पर उन की नर्स पत्नी की नाइट ड्यूटी होने पर, मेरी खैरियत के बहाने मेरे घर का दरवाजा थपथपाने के पीछे छिपे उन के मकसद, उन की नीयत को मैं समझ रही हूं.

‘आप भले ही इसे मेरी बेहयाई कहें या फिलहाल मुझे किसी लालच से प्रेरित समझें, मगर मैं आप के पास यह ख्वाहिश ले कर आई हूं कि मुझे आया नहीं, इन बच्चों की मां बन कर इन की परवरिश करने का मौका दें. मैं वादा करती हूं कि आप की दौलत और जमीनजायदाद से मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा. सिर्फ आप की और इन बच्चों की खिदमत में जिंदगी गुजार दूंगी. बस, आप से सिर्फ यह गुजारिश करूंगी कि अगर मुझ से कभी कोई खता हो जाए तो इसी घर के किसी कोने में नौकरानी बन कर पड़े रहने की इजाजत दे दीजिएगा. उस सूरत में मुझे तलाक की सजा मत दीजिएगा’, कहतेकहते राबिया की आवाज रुंध गई और आंखों से आंसू टपकने लगे.

उन की बात सुन कर डा. जाकिर बेहद उलझन में पड़ गए थे. वे राबिया को पिछले 4 सालों से जानते थे. उन के बारे में कभी कोई इधरउधर की बात नहीं सुनी थी. मगर ऐसा कैसे मुमकिन होगा, सोचते हुए बेहद असमंजस में वे इधरउधर टहलने लगे. तो बूढ़े बावर्ची चाय ले कर पेश हुए और बोले, ‘नवाब साहब, छोटे मुंह बड़ी बात कहने की गुस्ताखी कर रहा हूं. मेरी आप से अपील है कि इन की बातों पर गौर फरमाएं. हमें इन की बातों में सचाई नजर आती है, मालिक.’

बूढ़े बावर्ची की समझाइश में कुछ ऐसा असर था कि एक सप्ताह बाद ही एक साधारण से समारोह में राबिया बानो, बेगम जाकिर अली बन गईं.

इस के 2 सप्ताह बाद ही जब राबिया ने यूनिवर्सिटी की सेवा से अपना त्यागपत्र देने की घोषणा की तो डा. जाकिर ने ही कहा था, ‘राबिया, अभी तुम ट्यूटर हो, जल्द ही तुम्हारा प्रमोशन होने वाला है. और जहां तक मैं समझता हूं, तुम्हें संगीत से लगाव महज प्रोफैशनल नहीं है, वरना किसी गजल को बिलकुल अक्षरश: सही समझ कर उस की धुन तैयार हो, यह जनून प्रोफैशनल में नहीं, डिवोशनल में ही हो सकता है जो संगीत को एक इबादत का दरजा देता हो. तुम्हें यूनिवर्सिटी की नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए.’

उन की लंबी तकरीर सुन कर राबिया बेगम ने सिर्फ इतना कहा था, ‘जनाब, बच्चों की सही परवरिश और घरगृहस्थी की देखभाल भी एक इबादत है. संगीत की इबादत के लिए यूनिवर्सिटी की नौकरी की नहीं, रियाज की जरूरत होती है. मैं वक्त निकाल कर रियाज करती रहूंगी’ और उन्होंने इस्तीफा भेज दिया था.

बीते दिन फिर से लौटने लगे. राबिया की प्यारभरी देखभाल से बच्चे बेहद खुश रहते. डा. जाकिर बारबार राबिया बेगम से संगीत का रियाज जारी रखने की अपील करते. राबिया बेगम को इतने बड़े घर की देखभाल और बच्चों की परवरिश से बहुत कम समय मिलता था. फिर भी जब भी समय मिलता, वे रियाज करतीं. उन की आवाज में वह कशिश थी कि जब वे कोई गजल गाती थीं तो किसी खास भावुक पंक्ति की रवानगी पर वे इस कद्र भावुक हो जाती थीं कि शब्द आंसू बन कर उन की आंखों से बहने लगते थे और जाकिर साहब खुद की शायराना भावुकता से उन के आंसुओं को गजल के खयाल मान कर अपने होंठों से चूम लेते थे.

ऐसे ही 20-22 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला. जाकिर साहब रिटायर हो गए. बच्चे अच्छे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई पूरी कर के अच्छी नौकरियों में लग गए. जाकिर साहब अब पूरी तरह किताबों में डूबे रहते. शाम को वे राबिया बेगम से कोई गजल सुनाने के बहाने रियाज के लिए प्रेरित करते थे. उस दिन राबिया बेगम फैज साहब की गजल के अशआर लय में गा रही थीं.

‘गरचे मिल बैठे जो हम तुम, वो मुलाकात के बाद,अपना एहसासे जियां जानिए कितना होगा. हम सुखन होंगे जो हम तुम तो हर इक बात के बीच, अनकही बात का मोहूम सा परदा होगा.’ अशआर के आखिरी मिसरे को गाते हुए राबिया इतनी भावुक हो गईं कि शब्द उन की आंखों से बहने लगे तो हमेशा की तरह जाकिर अली अपनी कुरसी से उठे और उन्होंने राबिया बेगम का चेहरा अपने हाथों में थाम कर उन के आसुओं को होंठों में समा लिया.

संयोग से उसी समय शाहिद की बेगम खरीदारी कर के लौटी थी. कई सारे बैग्स के बोझ को हाथों में बदलने के लिए वह उन के कमरे की इस आदमकद खिड़की के बाहर रुकी थी. तभी उस ने इस भावनात्मक दृश्य को देखा और अपने पति से शिकायत लगाई, ‘इस उम्र में यह आशनाई-तौबातौबा. अगर कोई बाहर का आदमी देख लेता तो, आप इन आदमकद खिड़कियों पर परदा लगवाने के लिए तो कहिए.’

दरअसल बात यह थी कि इस हवेलीनुमा मकान के आखिरी कोने पर बने इस आदमकद खिड़कियों वाले कमरे पर शाहिद की बीवी की मुद्दत से नजर थी. कमरे के बाहर फलदार पेड़ों की कतार, और फूलों की क्यारियां थीं. शरद की मादक चांदनी रातों में और वसंत के मौसम में कमरे से बाहर निकले बिना इस खिड़की के सामने बैठ कर ही फूलों व आमों के बौर की खुशबू के साथ उस शायराना माहौल को महसूस किया जा सकता था. शाहिद की बीवी की तालीम बीए तक थी. शायरी और उर्दू की तहजीब तो उसे नहीं थी, हां, उस का मिजाज आशिकाना जरूर था. वह पहले भी कई मौकों पर यह इच्छा जाहिर कर चुकी थी कि अब्बू और अम्मी अगर गांव में जा कर रहें तो बेहतर होगा. वरना आधी से ज्यादा हवेली में अम्मी ने जो लड़कियों के लिए स्कूल खुलवा दिया है, स्कूल वाले धीरेधीरे पूरी हवेली पर ही काबिज जो जाएंगे. जमीनजायदाद की फसल वगैरा भी अभी कारिंदों की ईमानदारी पर ही मिल रही है. तब जमीनजायदाद की भी बेहतर देखभाल हो सकेगी.

इस के अलावा, वह, एक बार डा. जाकिर द्वारा आम के बागों का ठेका उस के एक रिश्तेदार को देने से इनकार कर देने की वजह राबिया बेगम को मानती थी, इसलिए उन से मन ही मन बेहद नाराज थी. सो, वह किसी भी तरह उन्हें इस घर से अलग कर देना चाहती थी.

इस वाकए के 2 दिनों बाद जाकिर अली अपने कमरे में बैठे किसी पत्रिका के लिए एक शायर के बारे में लेख लिख रहे थे कि राबिया बेगम उन के पास आ कर बोलीं, ‘‘आप को जनाब रामकिंकर साहब याद हैं न? अरे वही रामकिंकर साहब, जो संस्कृत के प्रोफैसर थे और बाद में किसी फैलोशिप के तहत लंदन चले गए थे. फिर वहीं बस गए.’’

‘‘अरे, आप ऐसे कैसे कह रही हैं, हम ऐसे एहसानफरामोश तो नहीं कि रामकिंकर साहब को भूल जाएं. हां, बताइए क्या हुआ रामकिंकर साहब को?’’ जाकिर अली ने कलम रोक कर उत्सुकता से पूछा.

‘‘अरे, उन्हें कुछ नहीं हुआ, कुछ दिनों पहले उन का फोन आया था. हमें लंदन आने का न्योता दिया है. कह रहे थे कि उन की ही एक संस्था भारतीय शास्त्रीय संगीत का कोई बड़ा कार्यक्रम करवा रही है, सो शास्त्रीय संगीत संबंधित कुछ साजों की संगत देने वालों की उन्हें काफी जरूरत है. वे तो कह रहे थे कि अब भी मेरे इल्म और हमारे फन की वहां बेहतर कदर हो सकेगी. क्या कहते हैं आप?’’ राबिया बेगम ने उन से मानो कुछ आश्वासन पाने की मुद्रा में प्रश्न किया.

Father’s Day Special- दूसरा पिता: क्या कल्पना को पिता का प्यार मिला?

वह यादों के भंवर में डूबती चली जा रही थी. ‘नहीं, न वह देवदास की पारो है, न चंद्रमुखी. वह तो सिर्फ पद्मा है.’ कितने प्यार से वे उसे पद्म कहते थे. पहली रात उन्होंने पद्म शब्द का मतलब पूछा था. वह झेंपती हुई बोली थी, ‘कमल’.

‘सचमुच, कमल जैसी ही कोमल और वैसे ही रूपरंग की हो,’ उन्होंने कहा था. पर फिर पता नहीं क्या हुआ, कमल से वह पंकज रह गई, पंकजा. क्यों हुआ ऐसा उस के साथ? दूसरी औरत जब पराए मर्द पर डोरे डालती है तो वह यह सब क्यों नहीं सोचा करती कि पहली औरत का क्या होगा? उस के बच्चों का क्या होगा? ऐसी औरतें परपीड़ा में क्यों सुख तलाशती हैं?

हजरतगंज के मेफेयर टाकीज में ‘देवदास’ फिल्म लगी थी. बेटी ने जिद कर के उसे भेजा था, ‘क्या मां, आप हर वक्त घर में पड़ी कुछ न कुछ सोचती रहती हैं, घर से बाहर सिर्फ स्कूल की नौकरी पर जाती हैं, बाकी हर वक्त घर में. ऐसे कैसे चलेगा? इस तरह कसेकसे और टूटेटूटे मन से कहीं जिया जा सकता है?’ लेकिन वह तो जैसे जीना ही भूल गई थी, ‘काहे री कमलिनी, क्यों कुम्हलानी, तेरी नाल सरोवर पानी.’ औरत का सरोवर तो आदमी होता है. आदमी गया, कमल सूखा. औरत पुरुषरूपी पानी के साथ बढ़ती जाती है, ऊपर और ऊपर. और जैसे ही पानी घटा, पीछे हटा, वैसे ही बेसहारा हो कर सूखने लगती है, कमलिनी. यही तो हुआ पद्मा के साथ भी. प्रभाकर एक दिन उसे इस तरह बेसहारा छोड़ कर चले जाएंगे, यह तो उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. पर ऐसा हुआ.

उस दिन प्रभाकर ने एकदम कह दिया, ‘पद्म, मैं अब और तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता. अगर झगड़ाझंझट करोगी तो ज्यादा घाटे में रहोगी, हार हमेशा औरत की होती है. मुझ से जीतोगी नहीं. इसलिए जो कह रहा हूं, राजीखुशी मान लो. मैं अब मधु के साथ रहना चाहता हूं.’ पति का फैसला सुन कर वह ठगी सी रह गई थी. यह वही मधु थी, जो अकसर उस के घर आयाजाया करती थी. लेकिन उसे क्या पता था, एक दिन वही उस के पति को मोह लेगी. वह भौचक देर तक प्रभाकर की तरफ ताकती रही थी, जैसे उन के कहे वाक्यों पर विश्वास न कर पा रही हो. किसी तरह उस के कंठ से फूटा था, ‘और हमारी बेटी, हमारी कल्पना का क्या होगा?’

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‘मेरी नहीं, वह तुम्हारी बेटी है, तुम जानो,’ प्रभाकर जैसे रस्सी तुड़ा कर छूट जाना चाहते थे, ‘स्कूल में नौकरी करती हो, पाल लोगी अपनी बेटी को. इसलिए मुझे उस की बहुत फिक्र नहीं है.’

पद्मा हाथ मलती रह गईर् थी. प्रभाकर उसे छोड़ कर चले गए थे. अगर चाहती तो झगड़ाझंझट करती, घर वालों, रिश्तेदारों को बीच में डालती, पर वह जानती थी, सिवा लोगों की झूठी सहानुभूति के उस के हाथ कुछ नहीं लगेगा. समझदार होने पर कल्पना ने एक दिन कहा था, ‘मां, आप ने गलती की, इस तरह अपने अधिकार को चुपचाप छोड़ देना कहां की बुद्धिमत्ता है?’

‘बेटी, अधिकार देने वाला कौन होता है?’ उस ने पूछा था, ‘पति ही न, पुरुष ही न? जब वही अधिकार देने से मुकर जाए, तब कैसा अधिकार?’ पद्मा ने बहुत मुश्किल से कल्पना को पढ़ायालिखाया. मैडिकल की तैयारी के लिए लखनऊ में महंगी कोचिंग जौइन कराई. जब वह चुन ली गई और लखनऊ के ही मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया तो पद्मा बहुत खुश हुई. उस का मन हुआ, उन्नाव जा कर प्रभाकर को यह सब बताए, मधु को जलाए, क्योंकि उस के बच्चे तो अभी तक किसी लायक नहीं हुए थे. वह प्रभाकर से कहना चाहती थी कि वह हारी नहीं. उन्नाव जाने की तैयारी भी की, पर कल्पना ने मना कर दिया, ‘इस से क्या लाभ होगा, मां? जब अब तक आप ने संतोष किया, तो अब तो मैं जल्दी ही बहुतकुछ करने लायक हो जाऊंगी. जाने दीजिए, हम ऐसे ही ठीक हैं.’

पद्मा अकेली हजरतगंज के फुटपाथ पर सोचती चली जा रही थी. जया वहीं से डौलीगंज के लिए तिपहिए पर बैठ कर चली गई थी. उसे मुख्य डाकघर से तिपहिया पकड़ना था. जया और वह एक ही स्कूल में पढ़ाती थीं. पद्मा अकेली फिल्म देखने नहीं जाना चाहती थी. लड़की की जिद बताई तो जया हंस दी, ‘चलो, मैं चलती हूं तुम्हारे साथ. अपने जमाने की प्रसिद्ध फिल्म है.’

पति के छिनते ही पद्मा की जैसे दुनिया ही छिन गई थी. कछुए की तरह अपने भीतर सिमट कर रह गई थी, अपने घर में, अपने कमरे में. कल्पना अकसर कहा करती, ‘मां, आप का जी नहीं घबराता इस तरह गुमसुम रहतेरहते?’

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वह हंसने का निष्फल प्रयास करती, ‘कहां हूं गुमसुम, खुश तो हूं.’ पर कहां थी, वह खुश? खाली हाथ, रीता जीवन, एक सतत प्यास लिए सूखा रेगिस्तान मन, उड़ती हुई रेत और सुनसान दिशाएं. औरत, पुरुष के बिना अधूरी क्यों रह जाती है? अपने जीवन से हट कर पद्मा देखी हुई फिल्म के बारे में सोचने लगी…उसे लगा, वह खुद देवदास के किरदार में है, ‘अब तो सिर्फ यही अच्छा लगता है कि कुछ भी अच्छा न लगे,’ ‘यह प्यास बुझती क्यों नहीं’, ‘क्यों पारो की याद सताती है?’, ‘कौन कमबख्त पीता है होश में रहने के लिए? मैं तो पीता हूं जीने के लिए कि कुछ सांसें ले सकूं’, ‘मैं नहीं कर सकता. क्या सभी लोग सभीकुछ करते हैं?’ फिल्म के ऐसे कितने ही वाक्य थे, जो उस के दिलोदिमाग में ज्यों के त्यों खुद से गए थे. क्या हर दुख झेलने वाला व्यक्ति देवदास है? क्या देवदास आज की भी कड़वी सचाई नहीं है?

‘चंद्रमुखी, तुम्हारा यह बाहर का कमरा तो बिलकुल बदल गया.’ क्या जवाब दिया चंद्रमुखी ने, ‘बाहर का ही नहीं, अंदर का भी सब बदल गया है.’

क्या सचमुच वह भी बाहरभीतर से बदल नहीं गई पूरी तरह? चंद्रमुखी ने वेश्या का पेशा छोड़ दिया है. देवदास कहता है, ‘छोड़ तो दिया है, पर औरतों का मन बहुत कमजोर होता है, चंद्रमुखी.’ पद्मा सोचती है, ‘क्या सचमुच औरतों का मन बहुत कमजोर होता है? क्या आदमी का मोह, आदमी की चाह, उसे कभी भी डिगा सकती है? वह कभी भी उस के मोहपाश में बंध कर अपना आगापीछा भुला सकती है?’

अचानक पद्मा हड़बड़ा गई क्योंकि आगे चलता एक व्यक्ति अचानक चकरा कर उस के पास ही फुटपाथ पर गिर पड़ा था. वह कुछ समझ नहीं पाई. बगल के पान वाले की दुकान से पद्मा ने पानी लिया और उस के चेहरे पर छींटे मारे. लोगों की भीड़ जुट गई, ‘कौन है? कहां का है? क्या हुआ?’ जैसे तमाम सवाल थे, जिन के उत्तर उस के पास नहीं थे. लोगों की सहायता से पद्मा ने उस व्यक्ति को एक तिपहिए पर लदवाया, खुद साथ बैठी और मैडिकल कालेज के आपात विभाग पहुंची.

पद्मा ने तिपहिया चालक की सहायता से उस व्यक्ति को उतारा और आपात विभाग में ले जा कर एक बिस्तर पर लिटा दिया. कल्पना को तलाश करवाया तो वह दौड़ी आई, ‘‘क्या हुआ, मां, कौन है यह?’’ पद्मा क्या जवाब देती, हौले से सारी घटना बता दी.

‘‘तुम भी गजब करती हो, मां. ऐसे ही कोई आदमी गिर पड़ा और तुम ले कर यहां चली आईं. मरने देतीं वहीं.’’ उस ने बेटी को अजीब सी नजरों से देखा कि यह क्या कह रही है? मरने देती? सहायता न करती? यह भी कोई बात हुई? अनजान आदमी है तो क्या हुआ, है तो आदमी ही.

‘‘दूसरे लोग उठाते और किसी अस्पताल ले जाते. या फिर पुलिस उठाती. आप क्यों लफड़े में पड़ीं, मरमरा गया तो जवाब कौन देगा?’’ भुनभुनाती कल्पना डाक्टरों के पास दौड़ी.

डाक्टरों ने कल्पना के कारण उस की अच्छी देखभाल की. 2 घंटे बाद उसे होश आया. दाएं हिस्से में जुंबिश खत्म हो गई थी, लकवे का असर था. जब उसे ठीक से होश आ गया तो पद्मा को खुशी हुई, एक अच्छा काम करने का आत्मसंतोष. उस ने उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘कहीं नहीं और शायद सब कहीं,’’ वह अजीब तरह से मुसकराया. ‘‘हम लोग आप के घर वालों को खबर करना चाहते थे, पर आप की जेब से कोई अतापता नहीं मिला. सिर्फ रुपए थे पर्स में, ये रहे, गिन लीजिए,’’ पद्मा ने पर्स उस की तरफ बढ़ाया.

कल्पना भी निकट आ कर बैठ गई थी. ‘‘मैडम, जो लोग सड़क पर गिरे आदमी को अस्पताल पहुंचाते हैं, वे उस का पर्स नहीं मारते,’’ वह उसी तरह मुसकराता रहा, ‘‘समझ नहीं पा रहा, आप को धन्यवाद दूं या खुद को कोसूं.’’

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‘‘क्यों भला?’’ कल्पना ने पूछा, ‘‘आप के बीवीबच्चे आप की कुशलता सुन कर कितने प्रसन्न होंगे, यह एहसास है आप को?’’ ‘‘कोई नहीं है अब हमारा,’’ वह आदमी उदास हो गया, ‘‘2 साल हुए, हत्यारों ने घर में घुस कर मेरी बेटी और पत्नी के साथ बलात्कार किया था. लड़के ने बदमाशों का मुकाबला किया तो उन लोगों ने तीनों की हत्या कर दी.’’

‘‘यह सुन कर वे दोनों सन्न रह गईं. काफी देर तक खामोशी छाई रही, फिर पद्मा ने पूछा, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘कहां बताऊं? शायद कहीं नहीं. जिस घर में रहता था, वहां हर वक्त लगता है जैसे मेरी बेटी, पत्नी और बेटा लहूलुहान लाशों के रूप में पड़े हैं. इसलिए उस घर से हर वक्त भागा रहता हूं.’’ ‘‘यहां लखनऊ में आप कैसे आए थे?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘इलाहाबाद में किताबों का प्रकाशक हूं. स्कूल, कालेजों की पुस्तकें प्रकाशित करता हूं-पाठ्यपुस्तकों से ले कर कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि तक,’’ वह बोला, ‘‘यहां इसी सिलसिले में आया था. हजरतगंज के एक होटल में ठहरा हूं. एक सिनेमाहौल में पुरानी फिल्म ‘देवदास’ लगी है, उसे देखने गया था कि रास्ते में गश खा कर गिर पड़ा.’’

डाक्टरों से बात कर के कल्पना उस व्यक्ति को मां के साथ घर लिवा लाई, ‘‘चलिए, आप यहीं रहिए कुछ दिन,’’ उस ने कहा, ‘‘हम आप का सामान होटल से ले आते हैं. कमरे की चाबी दीजिए और होटल की कोई रसीद हो, तो वह…’’

‘‘रसीद तो कमरे में ही है, चाबी यह रही,’’ उस ने जेब से निकाल कर चाबी दी. कल्पना ने मां को बताया, ‘‘इन्हें कोई ठंडी चीज मत देना. गरम चाय या कौफी देना.’’

फिर एक पड़ोसी को साथ ले कर कल्पना चली गई. पद्मा कौफी बना लाई. उस व्यक्ति ने किसी तरह बैठने का प्रयास किया, ‘‘बिलकुल इतनी ही उम्र थी मेरी बेटी की,’’ उस का गला भर्रा गया, आंखों में नमी तिर आई.

‘‘भूल जाइए वह सब, जो हुआ,’’ पद्मा बोली, ‘‘आप अकेले नहीं हैं इस धरती पर जिन्हें दुख झेलना पड़ा, ऐसे तमाम लोग हैं.’’ वह कुछ बोला नहीं, भरीभरी आंखों से पद्मा की तरफ देखता रहा और कौफी के घूंट भरता रहा.

‘‘सच पूछिए तो अब जीने की इच्छा ही नहीं रह गई,’’ वह बोला, ‘‘कोई मतलब नहीं रह गया जीने का. बिना मकसद जिंदगी जीना शायद सब से मुश्किल काम है.’’ ‘‘शायद आप ठीक कहते हैं,’’ पद्मा के मुंह से निकल गया, ‘‘मैं ने भी ऐसा ही कुछ अनुभव किया जब कल्पना के पिता ने अचानक एक दिन मुझे छोड़ दिया.’’

‘‘आप जैसी नेक औरत को भी कोई आदमी छोड़ सकता है क्या?’’ उसे विश्वास नहीं हुआ. ‘‘मधु नामक एक लड़की पड़ोस में रहती थी. हमारे घर आतीजाती थी. वे उसी के मोह में फंस गए. कल्पना तब छोटी थी. वे चले गए मुझे छोड़ कर,’’ पता नहीं वह यह सब उस से क्यों कह बैठी.

3-4 दिनों में वह व्यक्ति चलनेफिरने लगा था. एक सुबह पद्मा ने पूछा, ‘‘अभी तक आप ने अपना नाम नहीं बताया?’’

जवाब कल्पना ने दिया, ‘‘कमलकांत,’’ और होटल की रसीद मां की तरफ बढ़ाई, ‘‘रसीद पर इन का यही नाम लिखा है,’’ वह मुसकरा रही थी.

थोड़ी देर बाद जब वह सूटकेस में अपने कपड़े रखने लगा तो पद्मा ने पूछा, ‘‘कहां जाएंगे अब?’’ ‘‘क्या बताऊं?’’ कमलकांत बोला, ‘‘इलाहाबाद ही जाऊंगा. वहां मेरा कुछ काम तो है ही, लोग परेशान हो रहे होंगे.’’

कल्पना ने उस के हाथ से सूटकेस ले लिया, ‘‘आप अभी कहीं नहीं जाएंगे. इतने ठीक नहीं हुए हैं कि कहीं भी जा सकें. दोबारा अटैक हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. यहीं रहिए कुछ दिन और, अपने दफ्तर में फोन कर दीजिए.’’ पद्मा कुछ बोली नहीं. कहना तो वह भी यही सब चाहती थी, पर अच्छा लगा, बेटी ने ही कह दिया. शायद वह समझ गई, पर क्या समझ गई होगी? देर तक चुप बैठी पद्मा सोचती रही. कहां पढ़ा था उस ने यह वाक्य- ‘प्यार जानने, समझने की चीज नहीं होती, उसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है.’

‘क्या कमलकांत उसे अच्छे लगने लगे हैं?’ पद्मा ने अपनेआप से पूछा. एक क्षण को वह सकुचाई. फिर झेंप सी महसूस की, ‘नहीं, अब इस उम्र में फिर से कोई नई शुरुआत करना बहुत मुश्किल है. न मन में उत्साह रहा, न इच्छा. प्रभाकर के साथ जुड़ कर देख लिया. क्या मिला उसे? क्या दोबारा वही सब दोहराए? आदमी का क्या भरोसा? क्यों सोच रही है वह यह सब इस आदमी को ले कर? क्या लगता है यह उस का? कोई भी तो नहीं…क्या सचमुच कोई भी नहीं?’ अचानक उस के भीतर से किसी ने पूछा. और वह अपनेआप को भी कोई सचसच जवाब नहीं दे पाई थी. व्यक्ति दूसरे से झूठ बोल सकता है, अपनेआप से कैसे झूठ बोले?

कल्पना कालेज जाती हुई बोली, ‘‘मां, आप अभी एक सप्ताह की और छुट्टी ले लीजिए, इन की देखरेख कीजिए.’’ पद्मा बुत बनी बैठी रही, न हां बोली, न इनकार किया.

उस के जाने के बाद पद्मा ने छुट्टी की अर्जी लिखी और पड़ोस के लड़के को किसी तरह स्कूल जाने को राजी किया. उस के हाथों अर्जी भिजवाई. शाम को जया आई, ‘‘क्या हुआ, पद्मा?’’ एक अजनबी को घर में देख कर वह भी चकराई.

जवाब देने में वह लड़खड़ा गई, ‘‘क्या बताऊं?’’ जया उसे एकांत में ले गई, ‘‘ये महाशय?’’

सवाल सुन कर पद्मा का चेहरा अपनेआप ही लाल पड़ गया, पलकें झुक गईं. जया मुसकरा दी, ‘‘तो यह बात है… कल्पना के नए पिता?’’

पद्मा अचकचा गई, ‘‘नहीं रे, पर… शायद…’’ बाद में देर तक पद्मा और जया बातें करती रहीं. अंत में जया ने पूछा, ‘‘कल्पना मान जाएगी?’’

‘‘कह नहीं सकती. मेरी हिम्मत नहीं है, जवान बेटी से यह सब कहने की. अगर तू मदद कर सके तो बता.’’ ‘‘कल्पना से कल बात करूंगी,’’ जया बोली, ‘‘और प्रभाकर ने टांग अड़ाई तो…?’’

‘‘इतने सालों से उन्होंने हमारी खबर नहीं ली. मैं नहीं समझती उन्हें कोई एतराज होगा.’’ ‘‘सवाल एतराज का नहीं, कानून का है. आदमी अपना अधिकार कभी भी जता सकता है. तुम स्कूल में अध्यापिका हो, बदनामी होगी.’’

‘‘तब से यही सब सोच रही हूं,’’ पद्मा बोली, ‘‘इसीलिए डरती भी हूं. कुछ तय नहीं कर पा रही कि कदम सही होगा या गलत. एक मन कहता है, कदम उठा लूं, जो होगा, देखा जाएगा. दूसरा मन कहता है, मत उठा. लोग क्या कहेंगे. दुनिया क्या कहेगी. समाज में क्या मुंह दिखाऊंगी. यह उम्र बेटी के ब्याह की है और मैं खुद…’’ पद्मा संकोच में चुप रह गई. ‘‘ठीक है, पहले कल्पना का मन जानने दे, तब तुम से बात करती हूं और कमलकांत से भी कहती हूं,’’ जया चली गई.

पद्मा पास की दुकान से घर की जरूरत की चीजें ले कर आई तो देखा, कमलकांत के पास कल्पना बैठी गपशप कर रही है और दोनों बेहद खुश हैं. ‘‘मां, जया मौसी रास्ते में मिली थीं.’’

सुन कर पद्मा घबरा गई. हड़बड़ाई हुई सामान के साथ सीधे घर में भीतर चली गई कि बेटी का सामना कैसे करे? ?

अचानक कल्पना पीछे से आ कर उस से लिपट गई, ‘‘मां, आप से कितनी बार कहा है, हर वक्त यों मन को कसेकसे मत रहा करिए. कभीकभी मन को ढीला भी छोड़ा जाता है पतंग की डोर की तरह, जिस से पतंग आकाश में और ऊंची उठती जाए.’’ वह कुछ बोली नहीं. सिर झुकाए चुप बैठी रही. कल्पना हंसी, ‘‘मैं बहुत खुश हूं. अच्छा लग रहा है कि आप अपने खोल से बाहर आएंगी, जीवन को फिर से जिएंगी, एक रिश्ते के खत्म हो जाने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती…

‘‘मुझे ये दूसरे पिता बहुत पसंद हैं. सचमुच बहुत भले और सज्जन व्यक्ति हैं. हादसे के शिकार हैं, इसलिए थोड़े अस्तव्यस्त हैं. मुझे विश्वास है, हमारा प्यार मिलेगा तो ये भी फिर से खिल उठेंगे.’’ पता नहीं पद्मा को क्या हुआ, उस ने बेटी को बांहों में भर कर कई बार चूम लिया. उस की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी और कल्पना मां का यह नया रूप देख कर चकित थी.

Father’s Day Special- कीमत संस्कारों की: भाग 1

‘‘सौरी डैड, मुझे पता है कि आप ने मुझे एक घंटा पहले बुलाया था, पर उस समय मुझे अपनी महिला मित्र को फोन करना था. चूंकि उस के पास यही समय ऐसा होता है कि मैं उस से बात कर सकता हूं इसलिए मैं आप के बुलावे को टाल गया था. अब बताइए कि आप किस काम के लिए मुझे बुला रहे थे.’’

‘‘कोई खास नहीं,’’ दीनप्रभु ने कहा, ‘‘दवा लेने के लिए मुझे पानी चाहिए था. तुम आए नहीं तो मैं ने दवा की गोली बगैर पानी के ही निगल ली.’’

‘‘डैड, आप ने यह बड़ा ही अच्छा काम किया. वैसे भी इनसान को दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. मैं कल से पानी का पूरा जार ही आप के पास रख दिया करूंगा.’’

हैरीसन के जाने के बाद दीनप्रभु सोचने लगे कि इनसान के जीवन की वास्तविक परिभाषा क्या है? और वह किस के लिए बनाया गया है. क्या वह बनाने वाले के हाथ का एक ऐसा खिलौना है जिस को बनाबना कर वह बिगाड़ता और तोड़ता रहता है और अपना मनोरंजन करता है.

इनसान केवल अपने लिए जीता है तो उस को ऐसा कौन सा सुख मिल जाता है, जिस की व्याख्या नहीं की जा सकती और यदि दूसरों के लिए जीता है तो उस के इस समर्पित जीवन की अवहेलना क्यों कर दी जाती है. यह कितना कठोर सच है

कि इनसान अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करता है. वह दूसरों को रास्ता दिखाता है मगर जब वह खुद ही अंधकार का शिकार होने लगता है तो उसे एहसास होता है कि प्रवचनों में सुनी बातें सरासर झूठ हैं.

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हैरीसन घर से जा चुका था. कमरे में एक भरपूर सन्नाटा पसरा पड़ा था. दीनप्रभु के लिए यह स्थिति अब कोई नई बात नहीं थी. ऐसा वह पिछले कई सालों से अपने परिवार में देखते आ रहे थे मगर दुख केवल इसी बात का कि जो कुछ देखने की कल्पना कर के वह विदेश में आ बसे थे उस के स्थान पर वह कुछ और ही देखने को मजबूर हो गए. भरेपूरे परिवार में पत्नी और बच्चों के रहते हुए भी वह अकेला जीवन जी रहे थे.

अपने मातापिता, बहनभाइयों के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया. सब को रास्ता दिखा कर उन के घरों को आबाद किया और जब आज उन की खुद की बारी आई तो उन की डगमगाती जीवन नैया की पतवार को संभालने वाला कोई नजर नहीं आता था. सोचतेसोचते दीनप्रभु को अपने अतीत के दिन याद आने लगे.

भारत में वह दिल्ली के सदर बाजार के निवासी थे. पिताजी स्कृल में प्रधानाचार्य थे. वह अपने 7 भाईबहनों में सब से बड़े थे. परिवार की आर्थिक स्थिति संभालने का जरिया नौकरी के अलावा सदर बाजार की वह दुकान थी जिस पर लोहा, सीमेंट आदि सामान बेचा जाता था. इस दुकान को उन के पिता, वह और उन के दूसरे भाई बारीबारी से बैठ कर चलाया करते थे.

संयुक्त परिवार था तो सबकुछ सामान्य और ठीक चल रहा था मगर जब भाइयों की पत्नियां घर में आईं और बंटवारा हुआ तो सब से पहले दुकान के हिस्से हुए, फिर घर बांटा गया और फिर बाद में सब अपनेअपने किनारे होने लगे.

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इस बंटवारे का प्रभाव ऐसा पड़ा कि बंटी हुई दुकान में भी घाटा होने लगा. एकएक कर दुकानें बंद हो गईं. परिवार में टूटन और बिखराव के साथ अभावों के दिन दिखाई देने लगे तो दीनप्रभु के मातापिता ने भी अपनी आंखें सदा के लिए बंद कर लीं. अभी उन के मातापिता के मरने का दुख समाप्त भी नहीं हुआ था कि एक दिन उन की पत्नी अचानक दिल के दौरे से निसंतान ही चल बसीं. दीनप्रभु अकेले रह गए. किसी प्रकार स्वयं को समझाया और जीवन के संघर्षों के लिए खुद को तैयार किया.

दीनप्रभु के सामने अब अपनी दोनों सब से छोटी बहनों की पढ़ाई और फिर उन की शादियों का उत्तरदायित्व आ गया. उन्हें यह भी पता था कि उन के भाई इस लायक नहीं कि वे कुछ भी आर्थिक सहायता कर सकें. इन्हीं दिनों दीनप्रभु को स्कूल की तरफ से अमेरिका आने का अवसर मिला तो वह यहां चले आए.

अमेरिका में रहते हुए ही दीनप्रभु ने यह सोच लिया कि अगर वह कुछ दिन और इस देश में रह गए तो इतना धन कमा लेंगे जिस से बहनों की न केवल शादी कर सकेंगे बल्कि अपने परिवार की गरीबी भी दूर करने में सफल हो जाएंगे.

अमेरिका में बसने का केवल एक ही सरल उपाय था कि वह यहीं की किसी स्त्री से विवाह करें और फिर यह शार्र्टकट रास्ता उन्हें सब से आसान और बेहतर लगा. अपनी सोच को अंजाम देने के लिए दीनप्रभु अमेरिकन लड़कियों के वैवाहिक विज्ञापन देखने  लगे. इत्तफाक से उन की बात एक लड़की के साथ बन गई. वह थी तो  तलाकशुदा पर उम्र में दीनप्रभु के बराबर ही थी. इस शादी का एक कारण यह भी था कि लड़की के परिवार वालों की इच्छा थी कि वह अपनी बेटी का विवाह किसी भारतीय युवक से करना चाहते थे, क्योंकि उन की धारणा थी कि पारिवारिक जीवन के लिए भारतीय संस्कृति और संस्कारों में पला हुआ युवक अधिक विश्वासी और अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार होता है.

एक दिन दीनप्रभु का विवाह हो गया और तब उन की दूसरी पत्नी लौली उन के जीवन में आ गई. विवाह के बाद शुरू के दिन तो दोनों को एकदूसरे को समझने में ही गुजर गए. यद्यपि लौली उन की पत्नी थी मगर हरेक बात में सदा ही उन से आगे रहा करती, क्योेंकि वह अमेरिकी जीवन की अभ्यस्त हो चुकी थी. दीनप्रभु वहां कुछ सालों से रह जरूर रहे थे पर वहां के माहौल से वह इतने अनुभवी नहीं थे कि अपनेआप को वहां की जीवनशैली का अभ्यस्त बना लेते. उन की दशा यह थी कि जब भी कोई फोन आता था तो केवल अंगरेजी की समस्या के चलते वे उसे उठाते हुए भी डरते थे. शायद उन की पत्नी लौली इस कमजोरी को समझती थी, इसी कारण वह हर बात में उन से आगे रहा करती थी.

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दीनप्रभु शुरू से ही सदाचारी थे. इसलिए अपनी विदेशी पत्नी के साथ निभा भी गए लेकिन विवाह के बाद उन्हें यह जान कर दुख हुआ था कि उन की पत्नी के परिवार के लोग अपने को सनातन धर्म का अनुयायी बताते थे पर उन का सारा चलन ईसाइयत की पृष्ठभूमि लिए हुए था. अपने सभी काम वे लोग अमेरिकियों की तरह ही करते थे. उन के लिए दीवाली, होली, क्रिसमस और ईस्टर में कोई भी फर्क नहीं दिखाई देता था. लौली के परिवार वाले तो इस कदर विदेशी रहनसहन में रच गए थे कि यदि कभीकभार कोई एक भी शनिवार बगैर पार्टी के निकल जाता था तो उन्हें ऐसा लगता था कि जैसे जीवन का कोई बहुत ही विशेष काम वह करने से भूल गए हैं.

Father’s Day Special- कीमत संस्कारों की: भाग 2

दीनप्रभु अभावों के जीवन के भुक्तभोगी थे इसलिए वह हाथ लगे इस अवसर को खोना नहीं चाहते थे और सबकुछ जानते और देखते हुए भी वह अपने परिवार के साथ तालमेल बनाए रहे. अमेरिका में आ कर उन्होेंने आगे और पढ़ाई की. फिर बाकायदा विदेश में पढ़ाने का लाइसेंस लिया और फिर वह बच्चों के स्कूल में अध्यापक नियुक्त हो गए.

परिश्रम से दीनप्रभु ने कभी मुंह नहीं मोड़ा. अपनी नौकरी से उन्होंने थोड़ा बहुत पैसा जमा किया और फिर एक दिन उस पैसे से एक छोटा सा ‘फ्रैंचाइज’ रेस्टोरेंट खोल लिया. फिर उन की मेहनत और लगन रंग लाई. रेस्टोरेंट चल निकला और वह थोड़े समय में ही सुखसंपदा से भर गए. पैसा आया तो दीनप्रभु ने दूसरे धंधे भी खोल लिए और फिर एक दिन उन्होंने प्रयास कर के अमेरिकी नागरिकता भी ले ली. फिर तो उन्होंने एकएक कर अपने भाईबहनों के परिवार को भी अमेरिका बुला लिया. अपने परिवार के लोगों को अमेरिका बुलाने से पहले दीनप्रभु ने सोचा था कि जब कभी विदेश में रहते हुए उन्हें अकेलापन महसूस होगा तो वे 2-1 दिन के लिए अपने भाइयों के घर चले जाया करेंगे.

अब तक दीनप्रभु 3 रेस्टोरेंट और 2 गैस स्टेशन के मालिक बन चुके थे. रेस्टोरेंट को वह और उन की पत्नी संभालते थे और दोनों गैस स्टेशनों का भार उन्होंने अपने दोनों बच्चों पर डाल रखा था. खानपान में उन के यहां पहले ही कोई रीतिरिवाज नहीं था और न ही अब है लेकिन फिर भी दीनप्रभु किसी न किसी तरह अपने भारतीय संस्कारों को बचाए रखने की कोशिश कर रहे थे. जबकि उन की पत्नी बड़े मजे से हर तरह का अमेरिकी शाकाहारी व मांसाहारी भोजन खाती थी. पार्टियों में वह धड़ल्ले से शराब पीती और दूसरे युवकों के साथ डांस भी कर लेती थी.

दीनप्रभु जब भी ऐसा देखते तो यही सोच कर तसल्ली कर लेते कि इनसान को दोनोें हाथों में लड्डू कभी भी नहीं मिला करते हैं. यदि उन को विदेशी जीवन की अभ्यस्त पत्नी मिली है तो उस के साथ उन्हें वह सुख और सम्पन्नता भी प्राप्त हुई है कि जिस के बारे में वह प्राय: ही सोचा करते थे.

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विवाह के 25 साल  पलक झपकते गुजर गए. इस बीच संतान के नाम पर उन के यहां एक लड़का और एक लड़की भी आ चुके थे. उन्हें याद है कि जब लौली ने पहली संतान को जन्म दिया था तो उन्होंने कितने उल्लास के साथ उस का नाम हरिशंकर रखा था मगर लौली ने बाद में उस का नाम हरिशंकर से हैरीसन करवा दिया. ऐसा ही दूसरी संतान लड़की के साथ भी हुआ. उन्होंने लड़की का भारतीय नाम पल्लवी रखा था मगर लौली ने पल्लवी को पौलीन बना दिया. लौली का कहना था कि अमेरिकन को हिंदी नाम लेने में कठिनाई आती है. उस समय लौली ने यह भी बताया था कि उस ने भी अपना लीला नाम बदल कर लौली किया था.

लौली की सोच है कि जब जीवन विदेशी संस्कृति में रह कर ही गुजारना है तो वह कहां तक अपने देश की सामाजिक मान्यताओं को बचा कर रख सकती है और दीनप्रभु अपनी पत्नी की इस सोच से सहमत नहीं थे. उन का मानना था कि ठीक है विदेश में रहते हुए खानपान और रहनसहन के हिसाब से हर प्रवासी को समझौता करना पड़ता है लेकिन इन दोनों बातों में अपने देश की उस संस्कृति और संस्कारों की बलि नहीं चढ़ती है कि जिस में एक छोटा भाई अपनी बड़ी बहन को ‘दीदी’, बड़े भाई को ‘भैया’ और अपने से बड़ों को ‘आप’ कह कर बुलाता है. यहां विदेश में ऐसा कोई भी रिवाज या सम्मान नाम की वस्तु नहीं है. यहां चाहे कोई दूसरों से छोटा हो या बड़ा, हर कोई एकदूसरे का नाम ले कर ही बात करता है और जब ऐसा है तो फिर एकदूसरे के सम्मान की तो बात ही नहीं रह सकती है.

एक दिन पौलीन अपने किसी अमेरिकन मित्र को ले कर घर आई और अपने कमरे को बंद कर के उस के साथ घंटों बैठी बातें करती रही तो भारतीय संस्कारों में भीगे दीनप्रभु का मन भीग गया. वह यह सब अपनी आंखों से नहीं देख सके. बेचैनी बढ़ी तो उन्होंने पौलीन से आखिर पूछ ही लिया.

‘कौन है यह लड़का?’

‘डैड, यह मेरा बौय फ्रेंड है,’ पौलीन ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया.

दीनप्रभु जैसे सकते में आ गए. वह कुछ पलों तक गंभीर बने रहे फिर बोले, ‘तुम इस से शादी करोगी?’

उन की इस बात पर पौलीन अपने माथे पर ढेर सारे बल डालती हुई बोली, ‘आई एम नाट श्योर.’ (मैं ठीक से नहीं कह सकती.)

पल्लवी ने कहा तो दीनप्रभु और भी अधिक आश्चर्य में पड़ गए. उन्हें यह सोचते देर नहीं लगी कि उन की लड़की का इस लड़के से यह कैसा रिश्ता है जिसे मित्रता भी नहीं कह सकते हैं और विवाह से पहले होने वाले 2 प्रेमियों के प्रेम की संज्ञा भी उसे नहीं दी जा सकती है. पौलीन अकसर इस लड़के के साथ घूमतीफिरती है. जहां चाहती है, बेधड़क उस के साथ चली जाती है. कई बार रात में भी घर नहीं आती है, उस के बावजूद वह यह नहीं जानती कि इस लड़के से विवाह भी करेगी या नहीं.

काफी देर तक गंभीर बने रहने के बाद दीनप्रभु ने पौलीन से कहा, ‘क्या तुम बता सकती हो कि बौय फ्रेंड और पति में क्या अंतर होता है?’

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‘कोई विशेष नहीं डैड. दोनों ही एकजैसे होते हैं. अंतर है तो केवल इतना कि बौय फ्रेंड की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है जबकि पति की बाकायदा अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति एक ऐसा उत्तरदायित्व होता है जिसे उसे पूरा करना ही होता है.’

अतीत की यादें दिमाग में तभी साकार रूप लेती हैं जब कुछ मिलतीजुलती घटनाएं सामने घटित हों. विवाह के बारे में बेटी का नजरिया जान कर उन्हें अपनी बहनों की शादी की याद आ गई. दीनप्रभु ने अपनी मर्जी से कभी अपनी दोनों छोटी बहनों के लिए वर चुने थे और दोनों में से किसी ने भी चूं तक न की थी. मगर आज घर में उन की स्थिति यह है कि अपनी ही बेटी के जीवनसाथी के चुनाव के बारे में जबान तक नहीं खोल सकते हैं.

दीनप्रभु को शिद्दत के साथ एहसास हुआ कि नए समाज का जो यह नया धरातल है उस पर उस के जैसा सदाचारी, सरल स्वभाव का इनसान एक पल को भी खड़ा नहीं हो सकता है. जिंदगी के सुव्यवस्थित आयाम यदि बाहरी दबाव के कारण बदलने लगें तो इनसान एक बार को सहन कर लेता है लेकिन जब अपने ही लोग खुद के बनाए हुए रहनसहन के दायरों को तोड़ने लगें तो जीवन में एक झटका तो लगता ही है साथ ही इनसान अपनी विवशता के लिए हाथ भी मलने को मजबूर हो जाता है.

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दीनप्रभु जानते थे कि अपने द्वारा बनाए उस माहौल में रहने को वह मजबूर हैं जिस की एक भी बात उन को रास नहीं आती. वह यह भी समझते थे कि यदि उन्होंने कोई भी कड़ा कदम उठाने की चेष्टा की तो जो घर बनाया है उसे बरबादियों का ढांचा बनते देर भी नहीं लगेगी. जिस देश और समाज में वह रह रहे हैं उस की मान्यताओं को स्वीकार तो उन्हें करना ही पड़ेगा. जिस देश का चलन यह कहे कि ‘ये मेरा अपना जीवन है, आप कुछ भी नहीं कह सकते हैं’ और ‘अब मैं 21 वर्ष का बालिग हो चुका हूं,’ वहां पर बच्चों को जन्म देने वाले मातापिता का नाम केवल इस कारण चलता है क्योंकि बच्चे को जन्म देने वाले कोई न कोई मातापिता ही तो होते हैं.

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