Exclusive Interview: मैं तीन तलाक को पसंद नहीं करती – स्मृति मिश्रा

Exclusive Interview: मुसलिम औरतों के हक से जुड़े शाहबानो बनाम मोहम्मद अहमद खान के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘हक’ को भले ही बौक्स आफिस पर ज्यादा कामयाबी न मिली हो, मगर इस फिल्म में शाजिया बानो के किरदार में यामी गौतम और शाजिया बानो के साथ खड़े रहने वाले नौकरानी उज्मा के किरदार में स्मृति मिश्रा की अदाकारी को काफी सराहा जा रहा है.

रायबरेली से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई तक का सफर करने वाली हीरोइन स्मृति मिश्रा पिछले 13 सालों से ऐक्टिंग जगत में हैं. वे अब तक ‘सावधान इंडिया’, ‘अधूरी कहानी हमारी’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘मंफोर्डगंज की बिनिया’, ‘धर्मपत्नी’ जैसे सीरियलों और ‘अ से अनार’, ‘रेड’, ‘तुम को मेरी कसम’ जैसी फिल्मों के अलावा नैटफ्लिक्स की वैब सीरीज ‘शी2’ में ऐक्टिंग कर चुकी हैं.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की एक फिल्म ‘हक’ चर्चा में है. इस को ले कर आप क्या कहेंगी?

आप सभी जानते हैं कि यह फिल्म शाहबानो कांड पर आधारित है, जिस में मैं ने उज्मा का किरदार निभाया है. मतलब लोग मु झे उज्मा के किरदार में देख रहे हैं. सभी को पता है कि शाहबानो के संघर्ष में उज्मा चट्टान की तरह खड़ी रह कर उस का साथ देती रही. इस फिल्म मेरे सभी सीन हीरोइन यामी गौतम के साथ ही हैं, क्योंकि उज्मा तलाक के खिलाफ है.

उज्मा का मानना है कि तलाक देना गलत है. इसी वजह से मैं ने इस किरदार को करने के लिए हामी भरी, क्योंकि मैं ने महसूस किया है और लोगों से बातचीत कर के भी मु झे यही पता चला कि छोटे से छोटे तबके के लोग भी तलाक के खिलाफ हैं. वैसे भी औरत कोई चीज नहीं है कि आप ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया.

निजी जिंदगी में आप का साबका कभी उज्मा जैसी किसी औरत से पड़ा है या नहीं और तलाक को ले कर आप की अपनी सोच क्या है?

यह बहुत विवादास्पद विषय है. इस पर ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन मैं ने जोकुछ पढ़ा है, उस आधार पर मैं तीन तलाक को कभी पसंद नहीं करती. तीन बार तलाक कह कर आप ने एक औरत को छोड़ दिया. इसे जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता.

आप ने एक औरत के साथ रहते हुए एक लंबा वक्त गुजारा, आप के बच्चे हुए, पर छोटी सी बात पर बिना किसी सोचविचार के उस औरत को अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिए बिना, सिर्फ तीन बार तलाक बोला और तलाक दे दिया… मेरी सम झ में नहीं आता कि कैसे लोग इसे कानूनी सही कहते रहे हैं.

13 साल के अपने ऐक्टिंग कैरियर के अनुभव को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

इन 13 सालों में बतौर कलाकार मु झे सीखने को बहुतकुछ मिला. यह मौका किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं मिल सकता. हम हर उस किरदार को जीते हैं, जो इस दुनिया में है. हम सिर्फ ऐक्टिंग नहीं करते, हम परदे पर किसी भी किरदार को जीते हुए उसे अंदर से महसूस करते हैं.

फिल्म ‘पवई’ में क्या खास है?

फिल्म ‘पवई’ में मुंबई के इस विकासशील उपनगर पवई में रहने वाली 3 अलगअलग औरतों की कहानियों को दिखाया गया है. इस में मैं ने उषा का किरदार निभाया है. इसी फिल्म में 2 और औरतों की कहानी है. इस फिल्म में इस बात को दिखाया गया है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब हो या फिर कामकाजी हो, सभी को संघर्ष करना पड़ता है, भले ही उन के संघर्ष के तरीके अलग हों.

अपने किरदार उषा को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

उषा का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने पति के साथ बिहार से मुंबई आती है. अब उस का पति नहीं है और वह लोगों के घरों का काम करती है. वह अपनी बेटी की भी परवरिश कर रही है. उस को मुंबई के बारे में कुछ नहीं पता है. वह तो अपने पति के भरोसे यहां आई थी, पर अब पति नहीं है. उस के पति ने जो मकान खरीदा था, उसे भी उस का देवर हड़पने की कोशिश कर रहा है.

इस किरदार के लिए आप ने किस तरह का होमवर्क किया?

मेरे घर में एक कामवाली बाई है. उस की दोस्त के साथ भी ऐसा हादसा हो चुका है. उस का पति उसे गांव से शहर ले कर आया था. पर शहर आते ही कि कुछ समय के बाद उस का पति बीमार हुआ और इस संसार को अलविदा कह गया. उस के बाद उस ने जिस तरह का संघर्ष किया, वह सब उस ने मु झे बताया था, तो इस किरदार को निभाते समय मु झे वह सब याद आया और मैं ने स्क्रिप्ट की भी मदद ली.

किसी भी किरदार को निभाते समय आप अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों का कैसे उपयोग करती हैं?

जब किसी किरदार से जुड़ा कोई हादसा मेरे साथ कभी घट चुका होता है, तो मैं उसे याद कर अपने किरदार में डालने की कोशिश करती हूं. अगर वैसा हादसा मेरी जिंदगी में न घटा हो, तो आसपास के लोगों से बात कर के जानने की कोशिश करती हूं.

कलाकार होने के साथसाथ आप पत्नी, बहू और एक बेटे की मां भी हैं. आप इन सारी जिम्मेदारियों को कैसे निभाती हैं?

मैं इन सभी जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती हूं और मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी को भी शिकायत करने का मौका न दूं. पर मु झे इन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए कई बार अपनी दीदी और पति से भी सहयोग लेना पड़ता है. Exclusive Interview

Exclusive Interview: कीबोर्ड से बेसुरे भी सुर में गाने लगते हैं – डाक्टर परमानंद यादव

Exclusive Interview: डाक्टर परमानंद यादव गायन में डाक्टरेट करने के बाद साल 1994 में वाराणसी से मुंबई बौलीवुड में प्लेबैक सिंगर बनने नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत की साधना करने के लिए आए थे. अब तक डाक्टर परमानंद यादव के कई संगीत अलबम भी बाजार में आ चुके हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप ने शास्त्रीय संगीत के प्रति जीवन समर्पित करने की बात क्यों सोची?

मैं देवरिया, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं. मुझे लगता है कि संगीत मुझे विरासत में मिला है. मेरे दादाजी लोकगीत गाते थे, आल्हा गाते थे. यहां तक कि उन दिनों हमारे मझौली के जो स्थानीय राजा थे, उन के यहां भी एक बार मेरे दादाजी ने जा कर आल्हा गाया था.

दादाजी के संस्कार मेरे पिताजी श्रीकृष्ण यादव में आए. मेरे पिताजी भी गाने के साथसाथ ढोलक भी बहुत अच्छी बजाते थे. उन की आवाज बहुत अच्छी थी. मेरी मां फुलवासी यादव में भी भोजपुरी गानों का स्वर था. वे शादीब्याह के मौके पर बहुत सुर में गाती थीं.

दादाजी और मातापिता के संस्कार सुर के रूप में मेरे अंदर भी आए, जिस के चलते मैं शास्त्रीय संगीत से जुड़ गया. मैं ने रामवृक्ष तिवारी, अजीत भट्टाचार्य, आचार्य नंदन, कुमार गंधर्व सहित कई गुरुओं से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली.

कुमार गंधर्व को ‘आधुनिक कबीर’ कहा जाता है. कुमार गंधर्व ने कबीर को कई फार्म में गाया है. मैं ने बनारस यूनिवर्सिटी के संगीत कालेज से गायन में डाक्टरेट की. मैं ने डाक्टरेट गुरु चित्तरंजन ज्योतिषी के मार्गदर्शन में किया. कुमार गंधर्व के पास जीवन के कटु अनुभवों के साथ ही संगीत का रियाज भी था. वे कहते थे कि मूर्खों की तरह केवल गाना ही मत गाओ, पढ़नालिखना भी सीखो.

एक बार प्रेमचंद के बेटे अमृत राय का उन के पास टैलीग्राम आया. मैं ने टैलीग्राम ले जा कर कुमार गंधर्वजी को दिया, जिन्हें हम ‘बाबा’ कहा करते थे.

‘बाबा’ ने पूछा कि यह किस का टैलीग्राम है? मैं उस वक्त इस नाम से परिचित ही नहीं था. तब तकरीबन डांटते हुए ‘बाबा’ ने मुझ से कहा था, ‘ये प्रेमचंद के बेटे हैं. तुम कुछ पढ़नालिखना भी सीखो.’

फिर वे मुझे अपनी लाइब्रेरी के अंदर ले गए और कहा कि इस में काफी किताबें हैं. कुछ पढ़ा करो. बनारस के हो कर प्रेमचंद, कबीर, तुलसी को नहीं जानोगे, तो फिर क्या जानोगे.

‘बाबा’ ने मुझे यह जो संस्कार दिया, उस ने मेरी जिंदगी ही बदल दी. उस के बाद मेरा भंडार सदा भरा रहा.

आप स्टेज पर संगीत के कार्यक्रम कब से दे रहे हैं?

बचपन से ही. इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही मैं स्टेज पर गाने लगा था. डाक्टरेट की उपाधि हासिल करने के बाद पिछले 31 सालों में मेरे शास्त्रीय गायन, भोजपुरी लोकगीत सहित 100 से ज्यादा अलबम निकल चुके हैं.

जब आप स्टेज पर गाते हैं और जब आप स्टूडियो में कोई गाना रिकौर्ड करते हैं, तो कहां बतौर गायक आप को ज्यादा सुकून मिलता है?

गायन का असली मजा तो स्टेज पर लाइव गाने में ही है. सामने हजारों सुनने वाले बैठे आप को सुन रहे हों, स्टेज पर गायक के साथ साजिंदे बैठे होते हैं, तब जो किसी गीत को गाने का मूड बनता है, वह स्टूडियो के बंद कमरे में मुमकिन ही नहीं है. स्टूडियो में गाना रिकौर्ड करना उसी तरह से है, जिस तरह से आप कारखाने में कोई काम कर रहे हों.

आप के किस संगीत अलबम को सब से ज्यादा शोहरत मिली?

देखिए, मैं ने सस्ता और स्तरहीन काम नहीं किया. मैं ने गरिमामय ढंग से ही सभी गीत गाए. मैं ने भोजपुरी लोकगीत गाए, तो वे भी पूरी गरिमा के साथ. भोजपुरी लोकगीत व लोकसंगीत काफी समृद्ध है, पर वर्तमान समय के कुछ गायकों ने इसे टपोरी बना दिया है.

फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग न करने की कोई खास वजह?

मैं उस तरफ जाना ही नहीं चाहता था. फिल्मों में गाने के लिए तो गंवार इनसान भी कतार लगाए हुए हैं. ऐसा इनसान जिसे संगीत की एबीसीडी नहीं पता, उसे तो केवल ‘कीबोर्ड’ का सहारा है. ‘कीबोर्ड’ की बदौलत तो ‘बेसुरा’ भी ‘सुर वाला’ बन रहा है. अगर सही लोगों ने बुलाया होता, तो जरूर गाता.

आप को मुंबई में कुमार गंधर्व फाउंडेशन शुरू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

जब मैं मुंबई आया था, तो मुझे मंच नहीं मिलता था. यहां जीहुजूरी और चमचागीरी का माहौल था. मुझे यह सब करना आता नहीं. पर मुझे मदद करने वाले अच्छे लोग मिले. मंच न मिलने का दर्द मैं ने कई दूसरे अच्छे गायकों में भी देखा, तो मैं ने साल 1997 में ‘कुमार गंधर्व फाउंडेशन’ की शुरुआत की.

हम इस फाउंडेशन के तहत अच्छे गायकों की तलाश कर उन्हें मंच देने के साथ ही उन्हें सम्मानित करने का काम भी करते हैं. Exclusive Interview

Exclusive Interview: खिलाड़ी की बायोपिक करना चाहती हूं – सिमरत कौर

Exclusive Interview: साल 2017 में आई एक तेलुगु फिल्म ‘प्रेमथो मी कार्तिक परिचयम’ से अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत करने वाली सिमरत कौर पंजाबी हैं और उन की परवरिश मुंबई में हुई है.

तेलुगु में 4 फिल्में करने के बाद उन्हें साल 2023 में अनिल शर्मा के डायरैक्शन में बनी हिंदी फिल्म ‘गदर 2’ में मुसकान का किरदार निभाने का मौका मिला था.

साल 2024 में वे अनिल शर्मा की ही फिल्म ‘वनवास’ में नजर आई थीं और अब वे विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में भारती बनर्जी के किरदार में दिखाई दी हैं.

पेश हैं, सिमरत कौर से हुई लंबी बातचीत के खास अंश :

आप अपने अब तक के फिल्म सफर को ले कर क्या कहना चाहेंगी?

मेरी परवरिश मुंबई में हुई है और मैं ने कंप्यूटर से बीएससी किया है. मैं कराटे में ब्लैक बैल्ट हूं और गोल्ड मैडलिस्ट भी हूं. सच कहूं तो मैं मन से एक खिलाड़ी हूं और अचानक न चाहते हुए भी ग्लमैर वर्ल्ड यानी ऐक्टिंग जगत में आ गई हूं.

मैं अब तक 4 तेलुगु और 3 हिंदी फिल्में कर चुकी हूं. बीच में कोविड काल के चलते मेरे कैरियर की रफ्तार धीमी रही थी, पर पिछले 2 साल के अंदर मेरी 3 हिंदी फिल्में रिलीज हुई हैं और तीनों फिल्मों को दर्शकों ने अपना प्यार दिया है. ये तीनों फिल्में मैं ने बड़े कलाकारों के साथ की हैं.

आप के कराटे सीखने के पीछे मूल वजह क्या थी?

मैं ने 7 साल की उम्र से कराटे सीखना शुरू किया था. उस वक्त मुझे ज्यादा समझ नहीं थी, पर मां ने कहा तो सीखना पड़ा. 11 साल की उम्र में मैं ने नेपाल जा कर पहली बार कराटे प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. इस प्रतियोगिता में भारत से 23 बच्चे गए थे. हम वहां से ब्रौंज मैडल जीत कर आए थे. मैं भारत की एकमात्र लड़की थी, जो जीत कर आई थी, बाकी 22 बच्चे हार गए थे.

मुझे लगता है कि कराटे सीखने पर आप को अपने शरीर पर कंट्रोल करना आ जाता है. गुस्सा आने पर आप उस पर काबू कर सकते हैं. अपने जज्बात पर कंट्रोल कर सकते है. जिंदगी में अनुशासन आ जाता है. इसी के साथ कराटे से आप अपनी हिफाजत कर सकते हैं. वैसे, मैं ने तो कत्थक डांस भी सीखा है.

आप को कत्थक डांस की क्या उपयोगिता नजर आई?

कत्थक डांस सीखने से चाल में एक लचक आ जाती है, जो हर लड़की में होनी चाहिए. मैं ने अब तक जिस दौर के किरदार निभाए हैं, उस दौर की लड़कियों में यह खूबी कुदरती थी.

फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ के अपने किरदार को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

मैं ने इस फिल्म में यंग भारती का किरदार निभाया है, जबकि पल्लवी जोशी ने मां भारती का किरदार निभाया है. इस तरह का किरदार निभाना आसान नहीं था. भारती के किरदार की शुरुआत ही गर्वनर को गोली मारने से होती है. मुझे असली बंदूक पकड़ाई गई थी, जिस में ब्लैंक बुलेट थी यानी खाली बुलेट, जिस में से आवाज तो पूरी आती है, पर बुलेट निकलती नहीं है.

मैं ठहरी पंजाबी, जबकि भारती बनर्जी तो बंगाली है. तो मुझे भाषा से ले कर रहनसहन, चालढाल, पहनावे पर काम करना पड़ा. मुझे सीखना पड़ा कि बंगाल की लड़कियां किस तरह से साड़ी पहनती हैं.

इस फिल्म में आप का भारती बनर्जी का किरदार कहीं न कहीं बंगाल के एक रियल किरदार से प्रेरित है, जिस ने साल 1936 में गर्वनर को गोली मार दी थी. इस पर आप क्या कहेंगी?

माफ कीजिए, पर यह फिल्म उस लड़की की बायोपिक नहीं है. भारती का किरदार उस लड़की से थोड़ा सा प्रेरित मात्र है. फिल्म के डायरैक्टर विवेक अग्निहोत्री सर ने कहा था कि यह लड़की क्रांतिकारी है और भगत सिंह के विचारों पर यकीन करती है.

अब भगत सिंह के बारे में तो हम सभी जानते ही हैं. मैं ने तो उन पर बनी हुई फिल्में भी देखी हैं. डायरैक्टर ने मुझे बताया था कि भारती के किरदार की शुरुआत भगत सिंह की तरह होगी, जो क्रांतिकारी है, इसलिए वह गर्वनर को गोली मारने से पहले सोचेगी नहीं. मुझे बताया गया था कि भारती पहले भगत सिंह की तरह क्रांति करेगी, उस के बाद वह गांधीजी के रास्ते पर चलेगी.

क्या आप को लगता है कि फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में जोकुछ भी दिखाया है, वह सब सच है?

इतिहास तो वह है, जो घट चुका है. हर किसी ने अपनेअपने हिसाब से इतिहास में चीजें डाल दी हैं, इसलिए इतिहास में जोकुछ दर्ज है, उस के सच या झूठ होने की गारंटी देना मुश्किल है.

आज अगर मैं इंस्टाग्राम पर डाल दूं कि फलां इनसान हमारा भगवान है, तो सौ साल बाद लोग उसे भगवान मानने लगेंगे, क्योंकि उस वक्त हम तो सच बताने के लिए रहेंगे नहीं… लिहाजा, सही या गलत मैं नहीं बता सकती. किसी के लिए कुछ सही है और किसी के लिए कुछ और सही है. एक कलाकार के तौर पर मेरा फर्ज बनता है कि मैं स्क्रिप्ट के मुताबिक अपने काम को अंजाम दूं. मुझे कुछ चीजें नहीं पता थीं, जो कि अब पता चली हैं. पर वे कितनी सच हैं, उस का दावा कम से कम मैं तो नही कर सकती. मैं ही क्यों गूगल या कोई भी इनसान नहीं बता सकता, इसलिए पूरा सच आप कभी नहीं जान सकते.

भविष्य में आप किस तरह के किरदार निभाना चाहती हैं?

मैं एक खिलाड़ी का किरदार निभाना चाहती हूं, क्योंकि मैं ने कराटे चैंपियनशिप में भाग लिया है. मैं किसी बायोपिक में दमदार किरदार निभाना पसंद करूंगी. Exclusive Interview

Exclusive Interview: अब इंस्टाग्राम तो एडल्ट साइट हो गया है – संदीप भोजक

Exclusive Interview: राजस्थान के बीकानेर शहर से निकल कर मुंबई फिल्म नगरी में अपना मुकाम बनाना कोई आसान काम नहीं है, पर संदीप भोजक ने यह कामयाबी हासिल कर ली है. वे अब तक ‘दीया और बाती हम’, ‘परमावतार श्रीकृष्ण’, ‘जय संतोषी मां’, ‘शक्ति’, ‘ये हैं मोहब्बतें’, ‘कुमकुम भाग्य’, ‘कसौटी जिंदगी की 2’ जैसे कई टैलीविजन सीरियलों के अलावा ‘गांधी गोडसे : एक युद्ध’, ‘बैड बौयज’, ‘बैटल औफ सारागढ़ी’, ‘राम राज्य’ जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुके हैं.

पेश हैं, संदीप भोजक से हुई लंबी बातचीत के खास अंश :

ऐक्टर बनने की बात आप ने कब सोची?

हम तो बीकानेर के रहने वाले हैं. मेरे पिता विनोद भोजक आकाशवाणी के लिए गाना गाने के अलावा टूरिस्ट गाइड के रूप में काम करते हैं. स्कूल के दिनों से ही मुझे भी थिएटर का चसका लग गया था. पढ़ाई पूरी होने के बाद साल 2010 में मेरा ब्याह हो गया और पिताजी ने मुझे जूते की दुकान खुलवा दी.

जूते की दुकान चलाते हुए मैं थिएटर भी कर रहा था. फिर एक दिन मुझे अहसास हुआ कि कलाकार के तौर पर मुझे अपनेआप को एक मौका देना चाहिए. दुकान में सेल लगा दी. एक ही दिन में सारे जूते बिक गए, तो अपनी पत्नी और पिताजी से बात कर के मैं मुंबई रवाना हो गया. मैं ने उन से वादा किया था कि अगर 6 महीने में ऐक्टर नहीं बना, तो फिर से जूतों की दुकान खोल लूंगा.

साल 2015 में मुंबई पहुंचने के बाद 2-3 दिन थिएटर के दोस्त के साथ गुजारे, फिर मैं ने विरार इलाके में किराए के मकान में रहना शुरू कर दिया था.

मैं ने मुंबई में एकएक रुपए के लिए संघर्ष किया. 50-50 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था, तो लोकल ट्रेन में धक्के खाए. कई बार ऐसा भी हुआ, जब 100 किलोमीटर दूर जाने के लिए रुपए नहीं थे. कई बार औडिशन के लिए पहुंचते तो पता चलता कि औडिशन कहीं और है.

पर 3 महीने के अंदर ही मुझे लोकप्रिय सीरियल ‘दीया और बाती हम’ में काम करने का मौका मिला. इस ने मुझे पहचान दिलाई.

फिल्म ‘बैड बौयज’ तो मिथुन चक्रवर्ती के बेटे और प्रोड्यूसर की बेटी के लिए बनाई गई थी. ऐसे में इस फिल्म से जुड़ने में आप को कोई हिचक नहीं हुई थी?

यह सब तो फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा है. मुझे भी कई बार अफसोस होता है, पर मेरी यह फिल्म यात्रा है. अगर मेरे पिता भी फिल्म प्रोड्यूसर या डायरैक्टर होते, तो मैं ने जो 10 साल स्ट्रगल किया है, वह शायद न करना पड़ता.

कई सीनियर कलाकार हैं, जिन्हें देख कर मैं मोटिवेट होता रहता हूं, मसलन पंकज त्रिपाठी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी वगैरह, जो कामयाबी के मुकाम पर हैं.

जब ‘बैटल औफ सारागढ़ी’ जैसी फिल्में बंद हो जाती हैं, जिन के लिए आप ने अपना 2 साल से ज्यादा का समय भी दिया, तो कैसा लगता है?

सच कहूं तो मैं 3 दिन तक खूब रोया था, लेकिन मुझे सब से ज्यादा दुख डायरैक्टर राज कुमार संतोषी के लिए हो रहा था, जिन्होंने इस सबजैक्ट पर 10 साल तक काम किया था.

क्या कारपोरेट हमारे सिनेमा को बरबाद कर रहा है या हमारे प्रोड्यूसर नासमझ हैं?

हम ने शुरू में ही पढ़ा था कि कंटैंट इज किंग. इसे सभी भुला चुके हैं. कंटैंट पर कोई काम ही नहीं कर रहा. लोग प्रपोजल बना रहे हैं कि इस इस कलाकार को ले कर इतने बजट में फिल्म बना कर इतने में बेच देंगे. मतलब प्रोजैक्ट बन रहा है. जिस दिन ये प्रोजैक्ट बंद हो जाएंगे, कहानी पर काम किया जाएगा, तब सिनेमा का विकास होगा.

फिलहाल तो चंद बड़े कलाकार फिल्म के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा ले जाते हैं और बाकी कलाकारों को अपना मेहनताना पाने के लिए सालभर तक भटकना पड़़ता है. कम लागत की छोटी फिल्में तो बनना ही बंद हो गई हैं.

जब ओटीटी आया था, तो लगा था कि एक बूम आ गया है. इस से फिल्म प्रोड्यूसरों को सपोर्ट मिलेगा, लेकिन अब यह भी फुस हो गया है. अब ओटीटी ने कह दिया है कि पहले अपनी फिल्म को थिएटर में रिलीज करो, उस के बाद ही हम लेंगे.

मल्टीप्लैक्स में टिकटों की दरें इतनी ज्यादा हैं कि एक परिवार सिनेमा देखने जाए, तो उस की जेब में कम से कम 5,000 रुपए होने ही चाहिए. सरकार को टिकट के दाम पर लगाम लगाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए.

जब ‘पुष्पा 2’ जैसी फिल्में रिलीज होती हैं, तब टिकट के दाम और बढ़ा दिए जाते हैं और सिनेमाघर भी हाउसफुल हो जाते हैं. आप इसे कैसे देखते हैं?

दक्षिण के फिल्मकार अपने सिनेमा में कंटैंट पर काफी काम करते हैं. मु?ो तो लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लोग कन्फ्यूज्ड हैं कि किस तरह का सिनेमा बनाना है. यहां की जो फिल्में हिट हुई हैं, वे भी दक्षिण की फिल्मों की नकल या रीमेक ही रही हैं.

यहां अच्छे लेखकों की कमी नहीं है, मगर यहां के फिल्मकार अपने लेखकों को न सम्मान देते हैं और न ही अच्छा पैसा देते हैं. लेखक से ज्यादा पैसे तो लाइटमैन या स्पौटबौय को मिल जाते हैं.

सीरियल ‘जानेअनजाने हम मिले’ में अपने किरदार को ले कर आप क्या कहेंगे?

यह सीरियल रीत और राघव के इर्दगिर्द घूमता है, जिन्हें ‘आटासाटा’ प्रथा के तहत शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है. इस में मैं जो किरदार निभा रहा हूं, उस में काफी शेड्स हैं.

सोशल मीडिया को ले कर आप क्या सोचते हैं?

मुझे लगता है कि सोशल मीडिया सिनेमा को एक अलग ही दिशा में ले जा रहा है. इन दिनों इंस्टाग्राम पर मानो नंगापन परोसा जा रहा है. अब इंस्टाग्राम तो एडल्ट साइट हो गया है.

आप नया क्या कर रहे हैं?

मेरी 2 फिल्में जल्द ही रिलीज होंगी. इन में से एक फिल्म ‘लव स्टोरीज औफ नाइटीज’ है, जिस के डायरैक्टर अमित कंसारिया हैं. दूसरी फिल्म को ले कर सिर्फ इतना कहूंगा कि यह एक बड़े बजट की ऐतिहासिक फिल्म है.

अब आत्मसंतुष्टि के लिए ज्यादा काम कर रहा हूं: धर्मेश व्यास

1982 में गुजराती फिल्म ‘धूम्रसर’ में अभिनय कर राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता धर्मेश व्यास लगातार रंगमंच, टीवी फिल्मों में अभिनय करते आ रहे हैं. 1992 से 2010 तक वह हिंदी सीरियलों में काफी व्यस्त रहे. मगर पिछले पांच वर्षां से वह टीवी को अलविदा कहकर गुजराती भाषा की फिल्मों व रंगमंच पर व्यस्त हो गए थे. पर अब वह ‘मुबू टीवी’ चैनल के सीरियल ‘गुजरात भवन’ में अहम किरदार में नजर आ रहे हैं. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश…

आप पिछले कुछ समय से गुजराती फिल्में ही ज्यादा कर रहे हैं?

जी हां, पिछले चार वर्षों से मैंने टीवी पर काम करना बंद कर दिया था और गुजराती फिल्मों में व्यस्त हो गया था. इन दिनों गुजराती फिल्में काफी अच्छी बन रही हैं. गुजराती भाषा में मैं एकमात्र ऐसा कलाकार हूं, जो कि उस वक्त के वरिष्ठ कलाकार उपेंद्र त्रिवेदी व नरेश कनोडिया के साथ गुजराती फिल्में कर रहा था और अब नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ भी काम कर रहा है.

चार वर्ष तक टीवी से दूरी बनाए रखने की मूल वजह क्या रही?

सच यह है कि टीवी जिस तरह से नारी प्रधान हो गया है, उसमें जिस तरह के सीरियल या कार्यक्रम बन रहे हैं, उसमें हम पुरूष कलाकारों के लिए करने को कुछ होता ही नही है. हम कहीं भी महज शो पीस की तरह खड़े नजर आते हैं. इसलिए मैंने टीवी से दूरी बनाई. मैं तो थिएटर से हूं, तो मुझे ऐसे सीरियलों में अभिनय कर मजा नहीं आ रहा था. फिर एक कलाकार के तौर पर मेरी अपनी एक अलग पहचान बन चुकी है. दर्शक पहचानते हैं. पैसा भी कमा ही लिया था. ऐेसे में मैने सोचा कि अब जो भी करना है, सिर्फ श्रेष्ठ ही करना है. मुझे रूटीन जिंदगी जीना पसंद ही नही है. टीवी पर अब 12 घंटे काम होने लगा है. तो मुझे लगा कि मैं तो मर जाउंगा. इसलिए मैं वापस फिल्म और थिएटर की तरफ लौट आया. पिछले चार वर्ष के दौरान मैंने करीबन 25 गुजराती भाषा की फिल्में की. हर फिल्म में मैंने अलग तरह के किरदार निभाए.

तो अब मुबू टीवी के सीरियल गुजरात भवन से जुड़ने की क्या खास वजह रही?

इस सीरियल के निर्देषक धर्मेश मेहता मेरे काफी पुराने दोस्त हैं. हम दोनो ने थिएटर पर एक साथ ही काम करना शुरू किया था. तो जब वह मेरे पास इस सीरियल का आफर लेकर आए,तो उसने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा कि,‘धर्मेश इस सीरियल में एक किरदार है, जिसे करने में तुझे मजा आएगा.’ फिर उसने मुझे किरदार के बारे में विस्तार से बताया. मैंने किरदार के बारे में सुनते ही तुरंत हामी भर दी. उसके बाद मुझे पता चला कि यह एक नए चैनल ‘मुबू टीवी’ पर आने वाला है.

मैने कहा कि नया चैनल होगा तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि सीरियल का विषय बहुत सशक्त है. ऐसें में यदि चैनल ने प्रचार सही ढंग से किया और दर्शक ने एक बार सीरियल देखा, तो इस बात की गारंटी हे कि वह लगातार इस सीरियल को देखना चाहेगा. मैं अब जबकि इसका प्रसारण शुरू हो चुका है, तो भी दावा कर रहा हूं कि यह सीरियल बहुत जल्द सर्वाधिक लोकप्रिय सीरियल बनने वाला है.

नए चैनल मुबूके सीरियल गुजरात भवनमें अभिनय करने का आफर मिलने पर आपके मन मस्तिष्क में पहला विचार क्या आया?

आज से तीस वर्ष पहले जब मैंने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था, उस वक्त कोई सेटेलाइट चैनल नहीं था. तब दूरदर्शन था. और मैं दूरदर्शन पर कई सीरियलों में अभिनय किया. उससे पहले थिएटर व फिल्में भी की थी. जब 1992 में जी टीवी नामक पहले सेटेलाइट चैनल की शुरुआत हुई, तो मेरे पास ‘परंपरा’ नामक सीरियल का आफर आया था,तो मैने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया था. जबकि उस वक्त ‘जीटीवी’ चैनल को कोई जानता ही नहीं था. इस सीरियल को जबरदस्त लोकप्रियता मिली और मुझे भी. इसके बाद ‘तारा’, ‘बनेगी अपनी बात’, ‘हसरते’, ‘कैम्पस’ सहित कई सीरियल सफल हुए. आज जीटीवी किस मुकाम पर है, आप स्वयं जानते हैं. तब से लगातार मैंने कई सेटेलाइट चैनलों के सीरियलों में अभिनय करता रहा.

जब सोनी टीवी शुरू हुआ था,तब इसके पहले सीरियल ‘जदूगर’ में मैंने अभिनय किया था. जब ‘स्टार प्लस’ शुरू हुआ,तो ‘स्टार प्लस’ पर मेरा दूसरा सीरियल ’भाभी’ था, यह डेलीसोप था. इसे रौनीस्कू्रवाला और जरीन खान ने बनाया था. यह सभी हिट हुए थे. तो मैं काम कर चुका हूं और देख चुका हूं कि चैनल नया हो या पुराना, अच्छा सीरियल ही लोग देखना चाहते हैं. ‘गुजरात भवन’ इतना बेहतरीन सीरियल है कि इसे एक बार दर्शकों ने देखना शुरू किया, तो फिर इससे कोई दूर नहीं जाएगा, इसका फायदा चैनल के स्थापित होने को भी मिलेगा.

सीरियल गुजरात भवन को लेकर क्या कहेंगे?

यह रोजमर्रा की जिंदगी की कहानी है. यह मुंबई में रहने वाले गुजराती परिवार की कहानी हैं, जिनके दिलों में गुजरात समाया हुआ है. वह गुजरात से बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं. इसी के चलते इन लोगों ने घर के हर कमरे को गुजरात के शहरों का नाम दिया हुआ है. मसलन बेड रूम को बरोदा, किचन को अहमदाबाद, ड्राइंग रूम को गांधी नगर. क्योंकि ड्राइंग रूम में ही हर निर्णय बैठकर लिए जाते हैं. टेरेस को कछ का नाम दिया है. सीरियल में इस तरह की सामान्य बातें की जा रही हैं कि दर्शक रिलेट कर पा रहा है. इमानदारी की बात यह है कि 1992 में मैंने सीरियल ‘हसरतें’ में काम करते हुए जितना इंज्वौय किया था, उतना ही इंज्वौय अब मैं पहली बार ‘गुजरात भवन’ करते हुए कर रहा हूं.

गुजरात भवन के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

यह किरदार मेरे टेम्परामेंट के विपरीत है. पूरी टीवी इंडस्ट्ी और दर्शक जानते हैं कि मुझे मुंबई बम की तरह जानते हैं कि यह सीन में आया, तो तोड़फोड़ धमाल होनी ही है. पर निर्देशक धर्मेश मेहता ने इस सीरियल में मेरे किरदार को खूबसूरती से गढ़ा है.

थिएटर में नया क्या कर रहे हैं?

थिएटर तो मेरा पैशन है. थिएटर की ही वजह से मैंने कई हिंदी फिल्में भी छोड़ी हैं. थिएटर में पिछले तीस वर्ष से मेरे समर्पित दर्शक हैं. दर्शक मेरा नाटक देखने के लिए इंतजार करते रहते हैं. कुछ दिन पहले मैने ‘बाप कमाल डीकरो धमाल’ नाटक किया था. इसका निर्देशन भी मैंने किया. इसके शो विदेशों में भी काफी किए.

क्या अब आप निर्देशन में कदम रखना चाहेंगें?

फिलहाल टीवी और फिल्म दोनों जगह मेरे अभिनय की दुकान बहुत अच्छी चल रही है. इसलिए निर्देशन में जाने की नहीं सोच रहा हूं. क्योंकि अब पैसा कमाने की मेरी चाहत नही रही. ईश्वर की अनुकंपा से मैंने एक अच्छी जिंदगी जीने लायक धन कमा लिया है. रंगमंच, फिल्म व टीवी ने मुझे अच्छा पैसा दिया. अब तो सिर्फ यादगार काम करना है. अब मैं आत्मसंतुष्टि के लिए ज्यादा काम कर रहा हूं.

आने वाली दूसरी फिल्में?

मेरी चार गुजराती भाषा की फिल्मं जल्द प्रदर्शित होंगी. एक फिल्म ’और्डर और्डर’ आउट औफ और्डर’ है, यह पारिवारीक और कोर्ट रूम ड्रामा वाली फिल्म है. दूसरी फिल्म ‘सफर द जीरो किलोमीटर’ है, जिसमें धर्मेश इलांडे हीरो है और मैने इसमें नगेटिव किरदार निभाया है. तीसरी फिल्म ‘पास ना पास जिंदगी की रेस मां’ है. इसके अलावा एक फिल्म ‘पटेल वर्सेस पथिक’ है. इसमें दर्शन रावल हीरो हैं. इसकी 10 प्रतिशत शूटिंग लंदन में होनी बाकी है.

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