जहरीली कच्ची शराब का कहर

पूरा उत्तर भारत प्रदूषण के अटैक से बेहाल है. दमघोंटू धुआं दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के इनसानी फेफड़ों को कमजोर कर रहा है. दिल्ली के डाक्टरों का कहना है कि जिस लैवल पर इस समय प्रदूषण है, उस में अगर कोई सांस लेता है तो वह 30 सिगरेट जितना धुआं बिना सिगरेट पिए ले रहा है.

इतने बुरे हालात के बावजूद बहुत से लोग सोशल मीडिया पर चुटकी लेना नहीं भूलते. किसी ने मैसेज डाल दिया कि अब अगर चखना और शराब का भी इंतजाम हो जाए तो मजा आ जाए. सिगरेट के मजे मुफ्त में मिल रहे हैं, तो शराब की डिमांड करने में क्या हर्ज है?

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पर शराब की यह डिमांड कइयों पर भारी पड़ जाती है. इतनी ज्यादा कि वे फिर कभी ऐसी डिमांड नहीं कर पाते हैं. हरियाणा में पानीपत का ही किस्सा ले लो. वहां के सनौली इलाके के एक गांव धनसौली में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से एक बुजुर्ग समेत 4 लोगों की मौत हो गई. वे सभी लोग तामशाबाद की एक औरत से 80 से 100 रुपए की देशी शराब खरीद कर लाए थे.

इसी तरह हरियाणा के ही बल्लभगढ़ इलाके के छायंसा गांव में चरण सिंह की भी जहरीली शराब पीने से मौत हो गई, जबकि उस के साथी जसवीर की हालत गंभीर थी.

आरोप है कि चरण सिंह ने जिस संजीव से शराब खरीदी थी, वह गैरकानूनी शराब बेचने का धंधा करता है. यह भी सुनने में आया है कि कोरोना काल में इस इलाके के यमुना नदी किनारे बसे गांवों में कच्ची शराब बेचने का धंधा जोरों पर है.

इसी साल अप्रैल महीने में पुलिस ने एक मुखबिर की सूचना पर छायंसा गांव के रहने वाले देवन उर्फ देवेंद्र को उस के घर के सामने से गिरफ्तार किया था. वह घर के बाहर ही कच्ची शराब से भरी थैलियां बेच रहा था. उस के कब्जे से कच्ची शराब से भरी 12 थैलियां बरामद की गई थीं.

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इतना ही नहीं, जब हरियाणा के सारे नेता बरोदा उपचुनाव में अपनी ताकत झोंक रहे थे तब उन्हीं दिनों सोनीपत जिले में कच्ची या जहरीली शराब पीने से कुल 31 लोगों की जान जा चुकी थी. फरीदाबाद में एक आदमी और पानीपत में भी 6 लोगों की माैत हो गई थी.

इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि हरियाणा में लौकडाउन में शराब घोटाले और जहरीली शराब पीने से तथाकथित 40 लोगों की हुई मौत के मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार को घेरा और कहा कि प्रदेश में शराब माफिया सक्रिय है और इसे सरकारी सरपरस्ती हासिल है, जबकि हरियाणा के गृह मंत्री ने सदन में दावा किया कि जहरीली शराब पीने से 40 लोगों की नहीं, बल्कि 9 लोगों की मौत हुई है.

नेताओं की यह नूराकुश्ती चलती रहेगी और लोग सस्ती के चक्कर में कच्ची और जहरीली शराब गटक कर यों ही अपनी जान देते रहेंगे और अपने परिवार को दुख के पहाड़ के नीचे दबा देंगे.

कच्ची शराब जानलेवा क्यों बन जाती है? दरअसल, माहिर डाक्टरों की मानें तो बीयर और व्हिस्की में इथेनौल होता है, लेकिन देशी और कच्ची शराब में मिथेनौल मिला दिया जाता है. इस की मात्रा कम हो ज्यादा, दोनों ही रूप में यह खतरनाक है. 500 मिलीग्राम से ज्यादा इथेनौल की मात्रा होने पर शराब जानलेवा बन जाती है.

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शराब में आमतौर पर तय मात्रा में इथेनौल का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन कच्ची और देशी शराब को  ज्यादा नशे के लिए उस में मिथेनौल मिला दिया जाता है. कई बार अंगूर या संतरा ज्यादा सड़ जाने से भी इथेनौल बढ़ जाता है.

गन्ने की खोई और लकड़ी से मिथेनौल एल्कोहल बनने की संभावनाएं ज्यादा होती है. अगर 80 मिलीग्राम मिथेनौल एल्कोहल शरीर के अंदर चला जाए तो शराब जानलेवा होती है. यह कैमिकल सीधा नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है और पीने वाले की मौत हो जाती है.

बहुत सी जगह कच्ची शराब को बनाने के लिए औक्सीटोसिन, नौसादर और यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है. जहरीली शराब मिथाइल अल्कोहल कहलाती है. कोई भी अल्कोहल शरीर के अंदर जाने पर लिवर के जरीए एल्डिहाइड में बदल जाती है, लेकिन मिथाइल अल्कोहल फौर्मेल्डाइड नामक के जहर में बदल जाता है. यह जहर सब से पहले आंखों पर असर डालता है. इस के बाद लिवर को प्रभावित करता है. अगर शराब में मिथाइल की मात्रा ज्यादा है तो लिवर काम करना बंद कर देता है और पीने वाले की मौत हो जाती है.

जब लोगों को पता होता है कि कच्ची शराब उन के लिए जानलेवा होती है तो वे क्यों पीते हैं? इस की एक ही वजह है शराब पीने के लत होना. लोग लाख कहें के वे अपना तनाव दूर करने या खुशियों का मजा लेने के लिए शराब पीते हैं, लेकिन सच तो यह है वे इस के आदी हो चुके होते हैं.

पहले वे, ज्यादातर गरीब लोग, कानूनी तौर पर बिकने वाली शराब पीते हैं, फिर जब लती हो जाते हैं तो जो शराब मिल जाए, उसी से काम चलाते हैं. अपराधी किस्म के लोग उन की इस लत का फायदा उठाते हुए और ज्यादा मुनाफे के चक्कर में गैरकानूनी तौर पर बनाई गई कच्ची शराब उन्हें परोस देते हैं, जो उन्हें मौत के मुंह तक ले जाती है.

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समाजसेवी और रोहतक कोर्ट में वकील नीरज वशिष्ठ का कहना है, “यह खेल सिर्फ कच्ची शराब का नहीं है, बल्कि नकली शराब का भी है. बहुत से शराब ठेकेदार ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में कैप्सूल मिला कर नकली शराब बना देते हैं. यह और भी ज्यादा खतरनाक है.

“सब से पहले सरकार को शराब की बिक्री बंद करनी चाहिए, क्योंकि शराब तो होती ही है जानलेवा, चाहे जहरीली हो या नकली आया फिर कोई और.

“आज कम उम्र के बच्चों से ले कर बुजुर्गों तक को शराब ने बरबाद किया है. जब देश का भविष्य ही नशेड़ी होगा तो हम सोच सकते हैं कि आने वाला समय कैसा होगा. किसी भी देश की तरक्की में नौजवानों का बहुत अहम रोल होता है, पर यहां तो सरकार ही अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रही है.

“एक तरफ सरकार कहती है कि शराब बुरी चीज है, दूसरी तरफ इस बुरी चीज को बेचने के लिए हर गलीमहल्ले में दुकान खोल रही है.”

यह देशभर का हाल है. लौकडाउन में जब शराब की दुकानें खुली थीं, तब ठेकों के बाहर लगी शराबियों की लाइनों पर बहुत मीम बनाए गए थे, लोगों ने खूब मखौल उड़ाया था, पर जरा उन परिवारों से पूछो, जिन के घर का कोई शराब के चलते इस दुनिया से ही रुखसत हो चुका है. याद रखिए, शराब जानलेवा है और रहेगी, जिस ने इस सामाजिक बुराई से पीछा छुड़ा लिया, वह बच गया.

निर्भया कांड के दोषी ने कोर्ट में कहा, “दिल्ली गैंस चैंबर फिर मुझे मौत की सजा क्यों”?

दिल्ली की आबो हवा किस तरह प्रदूषित हो रही है ये किसी से भी छिपा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने तो यहां तक कह दिया कि आप लोग जनता को मौत के मुंह में ढकेलते जा रहे हैं. अक्टूबर महीने से शुरू हुआ प्रदूषण नवंबर आखिरी तक चला. इस मामले को निपटाने के लिए जहां सभी सरकारों को एकजुट होकर समस्या का निदान करना चाहिए तो सियासतदान राजनीति करने में जुटे हुए हैं. खैर इन सब के अलावा एक मौत की सजा पाए हुए बलात्कार के आरोपी ने ऐसा बयान दिया है जिसने सभी के रोंगटे खड़े कर दिए.

निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्याकांड में मौत की सजा पाए चार दोषियों में से एक अक्षय कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में मामले को लेकर पुनर्विचार याचिका दायर करते हुए कहा कि दिल्ली गैस चैंबर है, ऐसे मैं मौत की साज देने की क्या जरूरत है. वकील ए.पी.सिंह के माध्यम से दायर समीक्षा याचिका में अक्षय ने कहा, “दिल्ली-एनसीआर में पानी और हवा को लेकर जो कुछ हो रहा है, उससे हर कोई वाकिफ है. जीवन छोटा होता जा रहा है, फिर मृत्युदंड क्यों?”

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सुप्रीम कोर्ट 9 जुलाई 2018 को ही अन्य तीन दोषियों की पुनर्विचार याचिका को रद्द कर चुका है. उस समय अक्षय ने याचिका दायर नहीं की थी. वकील सिंह ने अपने मुवक्किल की ओर से मंगलवार को शीर्ष अदालत में याचिका दायर की. याचिका में अक्षय ने निवेदन करते हुए दावा किया कि दिल्ली की हवा की गुणवत्ता बिगड़ गई है, और राजधानी शहर सचमुच गैस चैंबर बन गया है. यहां तक कि शहर में पानी भी जहर से भरा है.

गौरतलब है कि 16 दिसंबर, 2012 की रात दक्षिण दिल्ली में एक चलती बस में छह लोगों ने निर्भया (23) के साथ मिलकर दुष्कर्म किया था. सामूहिक दुष्कर्म इतना वीभत्स था कि इससे देशभर में आक्रोश पैदा हो गया था और सरकार ने दुष्कर्म संबंधी कानून और सख्त किए थे.

छह दुष्कर्म दोषियों में से एक नाबालिग था, जिसे बाल सुधार गृह में भेज दिया गया और बाद में रिहा कर दिया गया. एक दोषी ने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी. शीर्ष अदालत ने मुकेश (30), पवन गुप्ता (23) और विनय शर्मा (24) की पुनर्विचार याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृत्युदंड की समीक्षा के लिए अभियुक्तों द्वारा कोई आधार स्थापित नहीं किया गया है.

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अब तो डरना जरूरी है

देश के शहरों में बढ़ता प्रदूषण घरों के लिए बड़ी आफत बन रहा है. बाहर व घर के कामों के बोझ से पहले से ही दबी औरतों को प्रदूषण के कारण पैदा होने वाली बीमारियों व गंद दोनों से जूझना पड़ रहा है.

दिल्ली जैसे शहर में अब कपड़े सुखाना तक मुश्किल हो गया है, क्योंकि चमकती धूप दुर्लभ हो गई है और साल के कुछ दिनों तक ही रह गई है.

इस का मतलब है कि गीले कपड़े सीले रह जाते हैं और बीमारियां व बदबू पैदा करते हैं. घरों के फर्श मैले हो रहे हैं, परदों के रंग फीके पड़ रहे हैं, घरों के बाग मुरझा रहे हैं और फूल हो ही नहीं रहे.

प्रदूषण के कारण अस्पतालों और डाक्टरों के चक्कर लग रहे हैं. जीवन में से हंसी लुप्त हो रही है क्योंकि हर समय उदासी भरी उमस छाई रहती है, जो मानसिक बीमारियों को भी जन्म दे रही है.

छोटे घरों में अब और कठिनाइयां होने लगी हैं क्योंकि बाहर निकल कर साफ हवा में सांस लेना असंभव हो गया है और घर के अंदर धूप न होने की वजह से हर समय एक बदबू सी छाई रहती है.

सरकारें हमेशा की तरह आखिरी समय पर जागती हैं, जब दुश्मन दरवाजे पर आ खड़ा हो. दुनिया के बहुत शहरों ने प्रदूषण का मुकाबला किया है और इस के उदाहरण भी मौजूद हैं.

यह दुनिया में पहली बार नहीं हो रहा है पर हमारी सरकारें तो केवल आज की और अब की चिंता करती हैं. बाबूओं और नेताओं को तो अपना पैसा बनाने और जनता को चूसने की लगी रहती है. उन्हें प्रदूषण जैसी फालतू चीज से कोई मतलब नहीं है.

दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों को प्रदूषण से आजादी दिलाना कोई असंभव काम नहीं है. जरूरत सिर्फ थोड़ी समझदारी की है. जनता पहले लगे नियंत्रणों पर चाहे चूंचूं करे पर उसे जल्दी ही लाभ समझ आ जाता है.

मुंबई के मुकाबले दिल्ली में हौर्न कम बजते हैं तो इसलिए कि यहां के लोगों को समझ आ गई है कि ट्रैफिक है तो हौर्न से तो कम नहीं होगा. छोटे शहरों में हर वाहन पींपीं करता रहता है क्योंकि इस में ईंधन न के बराबर लगता है.

प्रदूषण से बचाने के लिए जो तरीके अपनाए जाएंगे उन का तुरंत फायदा तो उसी को मिलेगा जो अपना रहा है. लोगों ने चूल्हों की जगह गैस इस्तेमाल की और धुंआ कम हो गया. क्या कानून बनाना पड़ा? नहीं, सुविधा जो थी.

अब सरकार का तो इतना काम है कि प्रदूषण से बचने के लिए शहरी इलाकों में से अपने दफ्तर हटा कर वहां बाग बना दे. उस के दफ्तर तो 50-60 मील दूर जा सकते हैं. पर वह तो पेड़ों से भरे इलाकों में सरकारी कर्मचारियों के लिए दड़बेनुमा मकान बनाना चाहती है जहां न कोई पेड़ बचा रहे न नया लग पाए.

सरकार कारखानों को बंद करा रही है पर न छूट दे रही है न सहायता. यदि पैसे नहीं दे सकते तो 5-7 साल के लिए टैक्स ही हटा दे, लोग खुद फैक्ट्री खाली कर देंगे और वहां घर बना देंगे. सरकार सोचती है कि जनता को प्रदूषण की चिंता ही नहीं है.

सड़कों पर वाहन कम करने के लिए सरकार ऊंची बिल्डिंगें बनने दे. उन पर आनाकानी न करे. पर छूट एक हाथ से दे कर दूसरे से न ले. अगर ऊपर घर व नीचे दफ्तर, दुकानें होंगी तो लोग बिना वाहन के रह सकेंगे.

लोग खुद अपने घरों और बच्चों की सेहत के लिए ऐसी जगह रहना चाहेंगे जहां कम प्रदूषण हो. पर जब तक सरकारी सांप, अजगर, सांड खुले फिरते रहेंगे तो भूल जाइए कि कुछ होगा.

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