⚲

Bihar Politics : देहमुक्ति के लिए भी पैसा चाहिए

Bihar Politics. पटना के बांसघाट में बाबा जग्गी वासुदेव का वीआईपी श्मशान गृह बन गया है. इस के लिए 15 एकड़ जमीन 99 साल के लिए एक रुपए की दर से दे दी गई है. हालांकि, इस के व्यवस्थापक भाई विवेक बताते हैं कि सारा कुछ बिहार सरकार का ही है. बस ‘ईशा फाउंडेशन’ को यह 5 साल के लिए व्यवस्था देने के लिए दिया गया है.

हमारे साथी वरिष्ठ पत्रकार कमला पांडे भी इस की तसदीक करते हैं कि यह सारा कुछ निर्माण बिहार सरकार के बुडको यानी बिहार अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमैंट कौर्पोरेशन लिमिटेड का है.

हम भारत की हर चीज को, हर सेवा को निजी हाथों में जाते हुए देख रहे हैं. अब इनसान की अंतिम यात्रा की व्यवस्था को निजी हाथों में जाते देख रहे हैं. बिहार की राजधानी पटना में इस की शुरुआत हो गई है.

यह पटना के बांसघाट में बना है. स्मार्ट सिटी के नाम पर बुडको ने 89.40 करोड़ में गंगा के किनारे प्रसिद्ध गोलघर के सामने बांसघाट पर एक वीआईपी श्मशान घाट तैयार किया है. इसे बाबा जग्गी वासुदेव की संस्था ‘ईशा फाउंडेशन’ को चलाने के लिए दे दिया गया है.

अगर आप वहां अपने किसी मित्र या परिजन के अंतिम संस्कार के लिए जाते हैं, तो आप को न्यूनतम 3,500 रुपए खर्च करने पड़ेंगे. इस के अलावा आप अगर लकड़ी या गैस का इस्तेमाल करते हैं, तो उस का खर्च अलग है. डोम राजा को 500, पंडित को 250 और नाई को 150 रुपए देने पड़ेंगे, जबकि इस के ठीक बगल में सरकारी विद्युत शवदाह गृह का चार्ज सिर्फ 300 रुपए है.

ऐसा क्यों? यह पूछने पर ‘ईशा फाउंडेशन’ के स्थायी स्वयंसेवक अमरदीप कहते हैं, ‘‘क्योंकि यह दूसरे श्मशान स्थल जैसा नहीं है. यहां आप को किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी. आप के लिए एसी वेटिंग रूम है, जहां आप बैठ कर इंतजार कर सकते हैं. दूसरे श्मशान गृहों में जैसी अव्यवस्था है, वैसी यहां नहीं है.’’

मतलब यह कि ये वीआईपी शवदाह गृह है, इसलिए इस का चार्ज वीआईपी है. स्टाफ के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘‘यहां काफी स्टाफ हैं. लेकिन हमारे मेंटेनैंस का खर्च भी बहुत ज्यादा है, सो चार्ज तो देना ही होगा न. अगर आप गैस से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं, तो उस में एक पूरा सिलिंडर खर्च हो जाता है. बिजली का बिल भी आता है. कई तरह के खर्चे हैं.’’

मगर कुलमिला कर देखा जाए तो यह सरकारी पैसे से बना श्मशान घाट है. यह अलग बात है कि इस वीआईपी श्मशान घाट को अलग स्वरूप प्रदान कर इस का संचालन ‘ईशा फाउंडेशन’ करेगा और बिहार के लोगों से मोटी रकम वसूल करेगा. मुमकिन है कि कुछ वीआईपी वहां भीड़भाड़ से बचने जाएं भी. 4 जून, 2026 को शुरू हुए इस श्मशान घाट में अब तक 90 शवों का अंतिम संस्कार हो चुका है.

‘ईशा फाउंडेशन’ पटना में दीघा में एक और ऐसा शवदाह गृह सरकार से लेने जा रहा है. इस के अलावा सिमरिया घाट, भागलपुर और सहरसा में आने वाले दिनों में वह श्मशाम गृह का संचालन शुरू करने जा रहा है. छपरा के लिए बातचीत चल रही है. ‘ईशा फाउंडेशन’ इस से पहले तमिलनाडु में ऐसे 32 श्मशान गृहों का संचालन करता रहा है. तमिलनाडु के बाद उस का अगला ठिकाना बिहार है.

इस चर्चा के दौरान यह भी जानकारी मिली कि बिहार कैबिनेट इस संस्था को एक और लाभ देने की घोषणा करने की तैयारी कर चुकी है. इस फैसले के मुताबिक मुंगेर जिले के तारापुर में प्रसिद्ध तेलडीहा मंदिर के पास की 15 एकड़ जमीन बिहार सरकार ने ‘ईशा फाउंडेशन’ को सिर्फ एक रुपए की दर से 99 साल के लिए लीज पर दिया जाना है.

वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र के अनुसार, ‘‘यह हैरत की बात है कि इस जमीन का बिहार सरकार ने इसी साल 2.64 करोड़ खर्च कर के अधिग्रहण किया है. मतलब जिस जमीन का सरकार ने हमारे 2.64 करोड़ की राशि से खरीदा, वह ‘ईशा फाउंडेशन’ को लगभग फ्री में दे रही है. यहां ‘ईशा फाउंडेशन’ आदियोगी की प्रतिमा और योग और आध्यात्मिक केंद्र बनाएगी. तारापुर के तेलडीहा मंदिर में पर्यटन के विकास के लिए पहले ही बिहार सरकार 5.28 करोड़ से अधिक की राशि स्वीकृत कर चुकी है. जाहिर है, इस का लाभ भी ‘ईशा फाउंडेशन’ को मिलेगा.’’

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार ने अपने गृह क्षेत्र में योग केंद्र खोलने का जिम्मा इसे न दे कर तमिलनाडु के ‘ईशा फाउंडेशन’ को दिया है. इस मेहरबानी की वजह बिहार के लोगों को सम झने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए. ऐसा ही चलता रहा, तो जल्दी ही यहां के सारे कर्मकांड वीआईपीनुमा होंगे. बस इस के लिए उन्हें अपनी जेब ढीली करनी होगी.

हालांकि भाई रामस्वरूप के अनुसार, ‘‘वैसे तो जग्गी वासुदेव पर ज्यादा भरोसा नहीं. फिर भी यदि 3,500 में सारे काम हो जाते हैं, तो ठीक है. लकड़ी, पंडित, डोम, नाऊ सब, तो ये तो बहुत बड़ा उपकार रहेगा. पटना में अंतिम संस्कार में मिनिमम खर्चा 7,000 से 15,000 के बीच आता है दाह संस्कार का. वैसे यह खर्च दाहसंस्कार करने आने वाले की वेशभूषा और अन्य बौडी लैंग्वेज से भी अंदाज लगाने की परंपरा रही है.

यहां आग देने के लिए ही 10,000 की मांग होती है, बाकी खर्चा अलग. ऐसे हालात में अगर 3,500 की रकम रखी गई है, तो ये निश्चित रूप से एक ठीक ही डिसीजन है. बशर्ते इस में सारे खर्च शामिल हों.’’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे जानकारी देते हैं कि बिहार सरकार ने पटना नगरनिगम के माध्यम से बांसघाट, गुलबी घाट, खाजेकलां आदि स्थानों पर 300 रुपए का शुल्क रखा है. हालांकि व्यावहारिक रूप से 350 का भुगतान करना होता है और यह भी बीपीएल वालों के लिए मुफ्त है. जब यहां पटना नगरनिगम के आयुक्त हिमांशु शर्मा थे, तभी पटना के भामाशाह फाउंडेशन ने यह व्यवस्था दी थी कि जो खर्च कर पाने में असमर्थ हैं, उन के शवों के अंतिम संस्कार श्मशान घाटों पर मुफ्त होगा. आमतौर पर यह खर्च 1,500 रुपए का हो सकता है. यह व्यवस्था आज भी है.

‘‘खर्च किस प्रकार के?’’ यह पूछने पर वे बताते हैं, ‘‘मुखाग्नि, ब्राह्मण, नाई, घाट छुड़ाई आदि के कुछ खर्च हैं. मूल खर्च तो लकडि़यों का है, जो 5-7 मन के करीब होता है. आम की लकड़ी 10 रुपए किलो, तो सखुआ की लकड़ी 20 रुपए किलो मिलती है. कुछ अमीर लोग चंदन की लकड़ी की मांग करते हैं, जो 70 रुपए किलो बैठती है.

आमतौर पर लोग इसे चंदन की लकड़ी कहते हैं. लेकिन यह हवन करने वाली देवदार की लकड़ी है. इसी प्रकार जो सखुआ की लकड़ी है, वह रेलवे के स्लीपर होते हैं, जो श्मशान घाट के व्यवसायी रेलवे विभाग से ठेके पर उठाते हैं.’’

बांस घाट के पास से गंगा लगभग 3 किलोमीटर दूर जा चुकी है. वहां कोई व्यवस्था नहीं है. नियम है कि मुखाग्नि देने वाले को पहले मुंडन वगैरह करा कर गंगा में स्नान करना होता है. इस के लिए उसे 3 किलोमीटर दूर गंगा स्नान के लिए कीचड़दलदल आदि से भरे तट को पार कर गंगा तक पहुंचना होता है, जो बेहद कष्टदायक है. और वहीं जग्गी वासुदेव का तथाकथित आलीशान श्मशान घाट है, जिस के लिए लोगों को बड़ी रकम खर्च करनी होगी.

पांडेजी का सवाल है कि जब भामाशाह फाउंडेशन महज 1,500 रुपए खर्च कर सारा कर्मकांड पूरा कर सकता है, तो फिर यह जग्गी वासुदेव के भारीभरकम खर्च को सेवा का नाम दे कर कराने का क्या मतलब है? तब और, जब बिहार सरकार ने उसे मुफ्त में सरकारी संपत्ति दी है, जहां उन्होंने पड़ाव भर डाला.

वे यह भी जानकारी देते हैं कि बांसघाट से गंगा के दूर खिसकने के वजह से हुई परेशानियों के वजह से लोग दीघाघाट चले जाते हैं, जहां गंगा किनारे पर है. हम ने वहां जा कर व्यवस्था देखी.

दीघाघाट पर बना श्मशान घाट ठीक गंगा किनारे है. एक फ्लाईओवर सामने सड़क के ऊपर गुजरते हुए आगे पटना के जेपी सेतु की ओर बढ़ जाता है. एक छोर फ्लाईओवर होते हुए डबलडैकर पुल पार करते सोनपुर की ओर बढ़ जाता है. वहीं नीचे श्मशान घाट हैं. सामने लकडि़यों, कपड़ों और दूसरे साजोसामान की फूस के छप्परों वाली दुकानें हैं.

यहां 2 शैड्स हैं, जिन में शव जलाए जाने की व्यवस्था है. यह अलग बात है कि वहां शव जलाए नहीं जाते. गंगा किनारे जा कर वहीं लकडि़यां सजा कर शवों को जलाने की व्यवस्था परिजन करते दिख रहे थे.

आमतौर पर एक शव के जलने में तकरीबन 3-4 घंटे लगते हैं. और यह समय उन्हें वहीं गुजारना होता है. आश्रय की कोई ठीकठाक व्यवस्था नहीं है. एक शीतल जल की मशीन है, जो खराब पड़ी थी. शौचालय वगैरह हैं, मगर उन की दशा भी ठीक नहीं थी. सो, सरकार को वहां इन सभी की समुचित व्यवस्था और रखरखाव करना चाहिए.

मुख्य सड़क से नदी किनारे आने के लिए भी कुछ पगडंडिया हैं. एक कच्चा ढलाव वाला रास्ता लोगों ने तैयार कर लिया है, जिस से गाडि़यां वहां उतर सकती हैं. खेद है कि सरकार खुद कोई जिम्मेदारी न ले कर बाबाओं को यह सब जिम्मेदारी दे कर मुनाफा कमाने का मौका दे रही है.

पटना का मशहूर गोलघर डीएम आवास के बगल में है. इसी के सामने रोड पार कर दिखता है बांसघाट में बना श्मशान घाट. बुडको ने बेहतरीन तो बनाया ही है, सामने दो सिंहद्वार हैं, मोक्षद्वार और वैकुंठ द्वार. अंदर पार्किंग की समुचित व्यवस्था है.

इसे पार कर अंदर जाने पर लगता नहीं कि आप किसी श्मशान घाट आए हैं. लंबेचौड़े पार्कनुमा परिसर में सजावटी फूलपत्तों के पौधे और वृक्ष लगे हैं. क्रम से विद्युत शवदाह, लकड़ी से जलाने वाले शवदाह और पारंपरिक रूप से शवदाह करने वाले शैड्स हैं, जहां अंतिम संस्कार होते हैं. इस के पीछे 2 विशाल कृत्रिम तालाब हैं, जिन के बीच में विशाल शिव की प्रतिमा दूर से ही दिखाई देती है.

फिलहाल इन तालाबों में पानी नहीं था. पता चला कि इन तालाबों में पाइपों के जरीए गंगा नदी का पानी लाया जाता है. कुछ गड़बड़ी के चलते अभी पानी लीक हो जा रहा है. सो तालाब सूखे हैं और उन में मरम्मत का काम चल रहा है. वैसे शौचालयों की व्यवस्था ठीकठाक तो है ही. पेयजल की भी सुविधा है.

अब वहां से जो जानकारियां आ रही हैं, ऊपरी खर्चे तो आप को करने ही हैं. और वह कितना होगा, पता नहीं. व्यवस्थापक विवेक ने जानकारी दी कि यहां बीपीएल लोगों के लिए मुफ्त शवदाह की व्यवस्था है. मगर पूछने पर कि दूसरे खर्च तो हैं ही, वे अपनी सहमति जाहिर करते हैं. यहां सभी मदों का खर्च फिक्स है, सो  झं झट नहीं है. हां, यहां खर्च तो है ही. वह तो आप की जेब की हैसियत से लगेंगे ही.

वीआईपी मुक्तिधाम है भाई, कोई खेल थोड़े ही है. यहां तो यही मान कर चला जाना है कि यहां जो आए हैं, वे ज्यादातर अमीर ही हैं. ऐसे में इस पीपीपी मोड में आ चुके अंतिम क्रिया को देखनेसम झने की जरूरत आप को नहीं, क्योंकि सरकार फैसला ले चुकी है. बाबा पर विश्वास करना ही होगा. आखिर आस्था का सवाल है. और इस के लिए अपनी जेब ढीली कर भारीभरकम खर्च करने के लिए तैयार रहना ही होगा. Bihar Politics

Bihar Politics : क्या इंसाफ भी जाति देख कर मिलता है

Bihar Politics. किसी भी लोकतंत्र में सरकार की संवेदनशीलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समाज कितना बड़ा वोट बैंक है. सरकार का काम हर नागरिक के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है. संविधान ने किसी नागरिक के वोट की कीमत अलगअलग नहीं तय की है.

बिहार सरकार की ओर से भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा के बाद बिहार की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है.

भरत तिवारी की मौत निश्चित रूप से दुखद और गंभीर घटना है और अगर किसी की मौत पुलिस कार्रवाई में हुई है तो उस के परिवार को इंसाफ, इज्जत और माली मदद मिलनी ही चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकार एक पीडि़त परिवार के दर्द को सम?ा सकती है तो दूसरे पीडि़त परिवारों के दर्द को क्यों नहीं उसी गंभीरता से महसूस करती?

लोगों के बीच यह चर्चा है कि बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार और ब्राह्मण समाज के वोटों के बिखराव ने सरकार को भरत तिवारी के परिवार के प्रति तत्काल संवेदनशील होने के लिए मजबूर किया. यह राजनीतिक चर्चा सही है

या गलत, इस का फैसला जनता करेगी, लेकिन इस चर्चा ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार में पीडि़त परिवारों के लिए इंसाफ और मुआवजे का पैमाना भी जाति और चुनावी गणित से तय होने लगा है.

अगर भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और नौकरी देना सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है तो अरवल के अनिल कुशवाहा के परिवार का क्या? अनिल कुशवाहा को ताड़ी पीने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उन की मौत पुलिस हिरासत में संदिग्ध हालात में हुई. परिजनों ने पुलिस द्वारा सताने और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए.

ए  क नागरिक को किसी अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है, कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन हिरासत में उस की जान चली जाए तो उस की जिम्मेदारी भी राज्य की बनती है. अनिल कुशवाहा के परिवार को इंसाफ और मुआवजा क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या उन के परिवार का दर्द इसलिए कम है, क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं हैं?

भोजपुर जिले के बिहिया ब्लौक की ओसाई पंचायत के गंज गांव के सनोज राम का मामला इस से भी ज्यादा गंभीर है. सनोज राम को शराब पीने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उस के बाद से वह गायब हैं. परिवार लगातार अपने बेटे की तलाश कर रहा है.

इस मामले में कोर्ट ने संबंधित पुलिस वालों पर कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं और उन के साथ क्या हुआ, इसे ले कर गंभीर आशंका बनी हुई है.

एक गरीब परिवार का जवान बेटा पुलिस के हाथों गिरफ्तार होता है और फिर उस का कोई पता नहीं चलता. परिवार सालों से जवाब का इंतजार करता है. सवाल यह है कि सनोज राम के परिवार की पीड़ा को कौन सम?ोगा. उन के घर में भी मां होगी, पिता होंगे, पत्नी होगी, बच्चे होंगे. उन की आंखों में भी इंसाफ की उम्मीद होगी. तो फिर उन के परिवार को इंसाफ और माली मदद देने की जिम्मेदारी सरकार की क्यों नहीं है?

बिहारशरीफ में श्रवण पासवान और पिंटू पासवान की हत्या का मामला भी इसी सवाल को सामने लाता है. 2 नौजवानों की हत्या ने कानून व्यवस्था और भीड़ की सोच पर गंभीर सवाल खड़े किए. आरोप पुजारियों और दूसरे लोगों के रोल को ले कर भी सामने आए. अगर किसी की हत्या केवल इसलिए कर दी जाती है कि उस पर चोरी का शक है तो ये कानून के शासन के लिए बेहद खतरनाक हालात हैं.

किसी भी नागरिक को दोषी साबित करने का अधिकार भीड़ को नहीं है. लेकिन जब ऐसे मामलों में गरीब और दलित परिवार इंसाफ के लिए दरदर भटकते हैं तो समाज के मन में यह सवाल उठता है कि क्या उन की जिंदगी की कीमत सत्ता की नजर में उतनी नहीं है जितनी किसी समाज के असरदार शख्स की.

प टना के बंटी यादव की हत्या का मामला भी कई सवालों से घिरा हुआ है. बंटी यादव के परिवार और उन के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने सैक्स स्कैंडल का विरोध किया था और इसी वजह से उन्हें निशाना बनाया गया. दूसरी ओर पुलिस ने हत्या के पीछे दूसरे कारणों की बात कही है.

इ स मामले में आखिरी सच जांच से ही सामने आएगा, लेकिन एक बात साफ है कि एक नौजवान की हत्या हुई और उस के परिवार को इंसाफ की जरूरत है. अगर पुलिस के रोल पर सवाल उठते हैं तो जांच होनी चाहिए और दोषी चाहे कोई भी हो, उस के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. सवाल फिर वही है कि बंटी यादव के परिवार की पीड़ा सरकार के लिए कितनी खास है?

रोहतास की बेटी स्नेहा कुशवाहा बनारस में रह कर पढ़ाई कर रही थी. उस के परिवार ने अपनी बेटी को पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए घर से दूर भेजा था. लेकिन उस की हत्या ने परिवार को तोड़ कर रख दिया. एक बेटी की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होती. वह उस पूरे समाज की चिंता बन जाती है जहां मातापिता अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए दूसरे शहरों में भेजते हैं.

स्नेहा के परिवार को भी न्याय चाहिए. उन्हें भी यह जानने का अधिकार है कि उन की बेटी के साथ क्या हुआ और उस के लिए जिम्मेदार कौन है. सवाल यह है कि क्या उन की जाति सरकार की संवेदना के रास्ते में बाधा बनेगी?

अ  भी हाल ही में रोहतास जिले के दिनारा ब्लौक के जोगियां मिल्की गांव के चंद्रेश्वर नोनिया की हत्या कर दी गई. एक और परिवार उजड़ गया. एक और घर का चिराग बु?ा गया. एक और मां की गोद सूनी हो गई. एक और परिवार इंसाफ के इंतजार में खड़ा है. लेकिन इन तमाम घटनाओं को एकसाथ देखने पर एक बड़ा सवाल सामने आता है कि क्या बिहार में हर मौत का राजनीतिक वजन बराबर है?

भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और नौकरी मिलती है तो उस का स्वागत होना चाहिए. किसी भी पीडि़त परिवार को मदद मिलना गलत नहीं है. लेकिन यही मदद अगर केवल चुनावी दबाव, जातीय समीकरण या राजनीतिक नुकसान के डर के कारण मिलती दिखाई दे तो सवाल उठेंगे ही. सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए. सरकार को यह साफ करना चाहिए कि पुलिस हिरासत में मौत, पुलिस हिरासत से किसी के गायब होने, भीड़ की हिंसा में हत्या, जातीय हिंसा में हत्या या किसी दूसरे गंभीर अपराध के पीडि़त परिवारों के लिए उस की नीति क्या है.

किसी भी लोकतंत्र में सरकार की संवेदनशीलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समाज कितना बड़ा वोट बैंक है. सरकार का काम हर नागरिक के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है. संविधान ने किसी नागरिक के वोट की कीमत अलगअलग नहीं तय की है. मतदान केंद्र पर ब्राह्मण का वोट भी एक है, कुशवाहा का वोट भी एक है, पासवान का वोट भी एक है, यादव का वोट भी एक है, नोनिया का वोट भी एक है और किसी गरीब मजदूर का वोट भी उतना ही खास है. फिर सरकार की संवेदना में फर्क क्यों दिखाई दे?

क्या भाजपा ब्राह्मण समाज के वोट को सब से खास मानती है और बाकी समाजों के वोट को फौर ग्रांटेड लेती है? क्या गरीब, दलित, पिछड़े और अति पिछड़े समाज के वोट को ऐसा वोट मान लिया गया है जिसे चाहे जितना नजरअंदाज किया जाए, वह कहीं नहीं जाएगा? क्या किसी समाज के वोट को पक्का और किसी दूसरे समाज के वोट को बिकाऊ या मजबूर सम?ाना लोकतांत्रिक राजनीति है?

यह सवाल केवल भाजपा से नहीं बल्कि बिहार की पूरी राजनीतिक व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए. कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आए, उसे यह साबित करना होगा कि सरकार किसी जाति की नहीं बल्कि नागरिकों की होती है. चुनाव के समय हर वोट की कीमत बराबर बताई जाती है, लेकिन चुनाव के बाद अगर मुआवजा, नौकरी, सुरक्षा और न्याय में जातीय या राजनीतिक असर दिखाई देने लगे तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है.

मुआवजा इंसाफ का औप्शन नहीं है. नौकरी इंसाफ का औप्शन नहीं है. पैसा किसी परिवार के इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए को वापस नहीं ला सकता. किसी मां की गोद नहीं भर सकता. किसी बच्चे को उस का पिता वापस नहीं दे सकता. इसलिए सरकार को केवल मुआवजे की घोषणा कर के अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं माननी चाहिए. असली जिम्मेदारी है निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान, कानून के मुताबिक कार्रवाई और पीडि़त परिवार को इंसाफ दिलाना.

भ रत तिवारी के परिवार को इंसाफ मिले, यह जरूरी है. लेकिन उसी इंसाफ की मांग अनिल कुशवाहा के परिवार को भी है. सनोज राम के परिवार को भी है. श्रवण पासवान और पिंटू पासवान के परिवार को भी है. बंटी यादव के परिवार को भी है. स्नेहा कुशवाहा के परिवार को भी है. चंद्रेश्वर नोनिया के परिवार को भी है.

इन परिवारों के दर्द को जाति की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए. किसी की मौत ब्राह्मण की मौत, कुशवाहा की मौत, पासवान की मौत, यादव की मौत या नोनिया की मौत नहीं है. सब से पहले वह एक इनसान की मौत है.

राज्य का पहला धर्म नागरिक की जिंदगी की हिफाजत करना है और अगर राज्य की व्यवस्था में ही किसी नागरिक की जान चली जाती है तो राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है.

बिहार सरकार को चाहिए कि वह सभी ऐसे मामलों की समीक्षा करे जिन में पुलिस हिरासत में मौत हुई है, पुलिस हिरासत से लोग गायब हुए हैं, भीड़ द्वारा हत्या की गई है या किसी परिवार ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं. एक समान नीति बनाई जाए. जिस तरह भरत तिवारी के परिवार के लिए माली मदद और नौकरी की घोषणा की गई है, उसी तरह दूसरे पीडि़त परिवारों के मामलों में भी ऐसी ही व्यवस्था बनाई जाए. इस से यह संदेश जाएगा कि सरकार किसी जाति के दबाव में नहीं, बल्कि इंसाफ के सिद्धांत पर काम करती है.

आज सब से बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में इंसाफ की भी कोई जाति है? अगर जवाब नहीं है तो फिर किसी परिवार के दर्द को चुनावी गणित से नहीं तोला जाना चाहिए. अगर भरत तिवारी का परिवार सरकार की संवेदना का हकदार है तो अनिल कुशवाहा का परिवार भी उसी संवेदना का हकदार है. अगर एक परिवार को मुआवजा और नौकरी मिल सकती है तो दूसरे परिवारों के लिए भी ऐसी समान नीति होनी चाहिए.

किसी ब्राह्मण की जिंदगी की कीमत ज्यादा नहीं हो सकती और किसी कुशवाहा, पासवान, यादव, नोनिया या दलित की जिंदगी की कीमत कम नहीं हो सकती. लोकतंत्र में किसी नागरिक की कीमत उस की पूरी जिंदगी है.

सरकार को यह साबित करना होगा कि बिहार में इंसाफ वोट देख कर नहीं मिलता. इंसाफ जाति देख कर नहीं मिलता. इंसाफ राजनीतिक असर देख कर नहीं मिलता. इंसाफ मिलना हर नागरिक का हक है और यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है. Bihar Politics

Bihar : प्रशांत किशोर की जीत

Bihar. जन सुराज पार्टी के अध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शानदार जीत हासिल की. उन्हें 64,151 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 44,827 और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 14,273 वोट मिले थे. इस तरह 19,234 वोटों के अंतर से प्रशांत किशोर जीत गए.

सीनियर पत्रकार पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘महज 8-9 महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 98,151 वोट मिले थे और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 46,308 वोट. तब जन सुराज के उम्मीदवार केसी सिंह को सिर्फ 7,690 वोट आए थे. मगर अब माहौल बदल चुका है.

पिछले चुनाव से मुकाबला करें तो भाजपा ने इस चुनाव में लगभग 54,000 वोट गंवाए और राजद ने 30,000 यानी भाजपा का नुकसान बड़ा है. बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक जन सुराज की तरफ शिफ्ट हुए हैं. यही भाजपा के लिए खतरे की घंटी है.’’

सच तो यह है कि दिल्ली के जंतरमंतर से ले कर बांकीपुर तक जो जेनजी आंदोलन हुआ है, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी ही है. अब तक भाजपा का विरोध दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक किया करते थे. मगर अब उन का विरोध सवर्ण और शहरी मध्यमवर्गीय लोग कर रहे हैं, जो उन के कोर वोटर हैं.

पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘अंधभक्ति से बिदकने के कई कारण गिने जा सकते हैं. सब से बड़ी बात बिहार में देखें तो सब से बड़ी वजह सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना है, जिस से एक बड़ा वर्ग नाराज है.

‘‘पार्टी का पहला मुख्यमंत्री उन्हें ऐसा नहीं चाहिए था, जिस पर अपराध के दाग हों. जिस की बातचीत में वह दबंगई हो और जिसे राजद के दौर में उन्होंने भोगा है. उन्हें बारबार पार्टी विद डिफरैंस की घुट्टी पिलाई गई थी.

‘‘दूसरी वजह, जमीनी कार्यकर्ताओं के नाम पर डमी लोगों को आगे बढ़ाना और नीरज कुमार सिन्हा जैसे उम्मीदवार को थोपना. इसे बांकीपुर की जनता अपना अपमान सम झ रही थी.

‘‘कायस्थ भाजपा के साथ बताए जाते हैं, मगर कायस्थों में भी इस फैसले को ले कर कम गुस्सा नहीं था. नीट आंदोलन का मसला तो सब पर हावी था ही. मध्यम वर्ग को लगने लगा था कि सरकार उन के बच्चों की पढ़ाई और कैरियर को ले कर गंभीर नहीं है.

‘‘इस में आप यूजीसी के मसले को जोड़ दें, भरत तिवारी प्रकरण को जोड़ दें, नीट छात्रा की संदिग्ध हत्या के मामले को जोड़ दें, राम मंदिर चंदा चोरी को जोड़ दें. ये तमाम ऐसे मामले हैं, जिन के कारण भाजपा का कोर वोटर ठगा महसूस कर रहा है. उस के अंदर गुस्सा है.’’

जाहिर सी बात है कि इस गुस्से को इस बार प्रशांत किशोर ने बखूबी भुनाया और वे आगे भी भुनाएंगे. अगर ऐसा ही माहौल बना रहा तो जल्द ही प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज बिहार की राजनीति में खाली हो रहे जद (यू) और राजद के स्पेस को भरने में जुट जाएगी.

कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जिस का सब से आसानी से जन सुराज से सम झौता हो सकता है. अगर प्रशांत किशोर कुछ बुनियादी वैचारिक मसले पर साथ देने को तैयार हों तो वामदल भी उन के साथ आ सकते हैं.

मगर ध्यान से देखें तो यह जीत इतनी आसान नहीं थी. जहां भाजपा और जद (यू) के सैकड़ों विधायकों के अलावा अनेक केंद्रीय मंत्री और बड़े नेता इस उपचुनाव के पीछे लगे हों, इस जीत को अप्रत्याशित तो नहीं कहा जा सकता.

बांकीपुर भाजपा का सब से सुरक्षित और पारंपरिक गढ़ के रूप में मशहूर रहा है. लेकिन जब प्रशांत किशोर ने इस क्षेत्र से परचा भरा, तो यहां की लड़ाई दिलचस्प बन गई. भाजपा ने इसे इज्जत का सवाल बना कर अपनी सारी ताकत यहां  झोंक दी. आखिर वह ऐसा करने को मजबूर थे. नीतिन नवीन और सम्राट चौधरी की इज्जत भी दांव पर थी, क्योंकि उन के कार्यकाल में एक विधानसभा सीट का उपचुनाव हो रहा था.

सवाल यह है कि पटना जिले के बांकीपुर विधान सभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर जीत गए, तो हारा कौन? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव?

भाजपा के अहं के चलते उस ने हार का स्वाद चखा. सत्ता पक्ष को सम झना होगा कि अब भारतीय मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी है. अब पहले की तरह परिवार तंत्र चल नहीं सकता. मतदाता नेताओं को कसौटी पर कसने लगे हैं.

बिहार में भी परिवारतंत्र को ठेस लगी है और अनेक नेता सत्ता से बेदखल हुए हैं. ऐसे में इस फार्मूले को बहुत भरोसे का नहीं माना जा सकता. अब अंधभक्ति वाले दिन गुजरे दिनों की बात होने लगी है. ठीक है कि जनता नेतापुत्रों का सम्मान करती है, मगर वह उसे राजा या सर्वेसर्वा मानने को तैयार नहीं. वह काम भी देख रही होती है. अब मतदाताओं को उम्मीदवारों की नीयत भांपते देर नहीं लगती है, जिस से नेतापुत्रों की नियति भी बदल जाती है.

सीनियर पत्रकार अनूप नारायण सिंह कहते हैं, ‘‘जिन को लगता था कि किसी को भी मैदान में उतार देंगे तो चुनाव जीत जाएंगे, यह भ्रम टूटा है. भाई लोकतंत्र है, यह बात सम िझए. जनता किसी की नहीं है. जो आप को कुरसी पर बैठ सकता है, वह आप को कुरसी से उतार भी सकता है. शुरुआत बांकीपुर से हुई है. खत्म कहां से होगा, यह नहीं कहा जा सकता.’’

प्रशांत किशोर की यह जीत न सिर्फ भाजपा के लिए, बल्कि राजद के लिए भी खतरे की घंटी है. विपक्ष की भूमिका में अब प्रशांत किशोर तेजस्वी यादव से कहीं ज्यादा तेजतर्रार साबित होंगे. जीत का सेहरा जनता ने उन के सिर पर इसी उम्मीद के साथ रखा है. अब देखना यही है कि प्रशांत किशोर इसे कितना संभाल पाते हैं. Bihar

Bihar :  प्रशांत किशोर का नया दांव

Bihar. ‘बांकीपुर’ कभी पटना का पुराना नाम हुआ करता था. इसी नाम से पटना का शहरी विधानसभा क्षेत्र भी है. इस विधानसभा क्षेत्र से नितिन नवीन भारी मतों से विजयी हुए थे. उन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद यह सीट खाली हुई थी. उस के उपचुनाव के लिए 2 जून को अधिसूचना जारी कर दी गई.

इस उपचुनाव को भाजपा के लिए काफी आसान माना जा रहा था. बिखरे विपक्ष के बीच लग भी रहा था. पहले के हालात भी ऐसा ही कुछ बता रहे थे. पर प्रशांत किशोर ने इस सीट पर खुद खड़े होने की घोषणा ने इस उपचुनाव के लिए हलचल मचा दी. ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में हुए करारी हार के कलंक से उसे छुटकारा मिल सकता है.

बिहार विधानसभा के 243 सीटों के पिछले चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. लेकिन उस में पीके ने कहीं से भी अपनी उम्मीदवारी नहीं दी थी. कहा यह गया कि वे अपने उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार करेंगे. लेकिन बांकीपुर सीट भाजपा के पास 1995 से ही परंपरागत सीट के रूप में रही है, जहां से भाजपा प्रत्याशी जीतते रहे हैं. पिछले चुनाव में भी नितिन नवीन ने भारी मतों से जीत हासिल की थी. ऐसे में यहां का चुनाव उस के पक्ष में ही ?ाका दिख रहा था. लेकिन पीके की घोषणा से अब यहां कांटे की टक्कर होने की उम्मीद है.

इस के पीछे बिहार की राजनीति की कुछ वजहें भी हैं, तो हालात भी हैं. हाल ही में कुछ नए संकट सामने आए, जिस से वर्तमान भाजपा को अपने ही लोगों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.

पहला मामला तो रिशुश्री मामले के भ्रष्टाचार को ले कर हुई किरकिरी है. पटना में कोचिंग विवाद से भी कुछ लोगों ने दूरी बना ली है. भरत तिवारी मामले के चलते राजग में ही विवाद उठ खड़े हुए हैं.

भाजपा और जद(यू) के सवर्ण मतदाताओं की बेरुखी दिख रही है. चिराग पासवान ने भी अपनी चाल चल दी है. ऐसे में पीके ने भरत तिवारी मामले में पहल कर उन सभी की हमदर्दी अपनी ओर करने की कोशिश की है.

इस के अलावा स्टेट हाईवे पर टोल टैक्स और पंचायतों में कर, निजीकरण में तेजी, आर्थिक संकट मामलों के चलते राज्य सरकार बैकफुट पर है. ऊपर से ईथेनौल मामला, परीक्षाएं न करवा पाने के हालात के चलते लोगों में केंद्र के प्रति नाराजगी है.

पिछले 3 सालों तक बिहार के अनेक इलाकों में पीके ने पदयात्रा कर जनता की हमदर्दी पाई है. इस के अलावा उन का महल्ले लैवल पर किए गए चुनाव प्रचार से भी उन की अलग पहचान है.

हालांकि सच तो यही है कि देश में ही नहीं, बिहार के भी शहरी क्षेत्रों में मतदान का फीसदी कम रहता है. बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में भी पिछले चुनाव में 40 फीसदी वोट पड़े थे. लेकिन यहां एक खास फैक्टर विपक्ष के बिखराव का भी है.

यहां पीके की सोच यह है कि वे विपक्ष को एकजुट कर आगे बढ़ जाएं. पहले का इतिहास तो खैर यही रहा है कि जबजब विपक्षी पार्टियों ने एकता दिखाई है, सत्ता पक्ष को मुंह की खानी पड़ी है. कांग्रेस उन्हें साथ देने को तैयार है. मुख्य बात यह है कि क्या वामदल और राजद उन्हें तवज्जुह देंगे?

इस के बावजूद प्रशांत किशोर मजबूत दिख रहे हैं, तो उस की काफी वजहें हैं. राजद ने पूर्णिया में पप्पू यादव का साथ नहीं दिया था, फिर भी वे वहां से जीते थे. और ऐसे चौंकाने वाले नतीजे बांकीपुर में भी आ जाएं, तो हैरानी की बात नहीं.

ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि वर्तमान मुख्यमंत्री पद को ले कर भाजपा के अनेक मंत्री नाराज हैं. जद(यू) की बेरुखी और नाखुशी भी किसी से छिपी नहीं है. ऐसे में नितिन नवीन के पुराने सहयोगी नील रतन घोष को भाजपा का टिकट मिलने की जोरों की चर्चा है. इस से बंगाली मतदाता शायद जोश में हों. परंपरागत कायस्थ और बनिया वोट तो हैं ही साथ.

अमित शाह की रणनीति की काट ढूंढ़ने में प्रशांत किशोर कितने सफल होते हैं, यह देखने की बात होगी. अमित शाह किसी सूरत में नहीं चाहेंगे कि भाजपा का गढ़ ढह जाए या उन के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पार्टी हार जाए. चूंकि एक खास सीट पर दोनों तरफ से जोर आजमाइश जबरदस्त होने की उम्मीद तो है ही.

पीके जो खुद एक कामयाब रणनीतिकार हैं, अमित शाह की सोच से आगे की रणनीति तैयार कर रहे होंगे. चूंकि पीके के उम्मीदवारी की घोषणा होते ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से मुलाकात की है, जो जद(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं.

इस दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह भी मौजूद थे. आधिकारिक तौर पर इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया गया, पर राजनीतिक हलकों में इस के अलगअलग माने निकाले जा रहे हैं, इसलिए इसे कांटे की टक्कर बताया जा रहा है. Bihar

Controversy : एक बंगला मिले न्यारा

Controversy. पिछले दिनों बिहार प्रदेश की राजनीति में बंगले को ले कर रोचक नोकझोंक हुई. पहले तो बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी राबड़ी देवी को पुराने बंगला छोड़ नए बंगले में जाने का हुक्मनामा जारी हुआ, फिर वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उपमुख्यमंत्री आवास को भी अपने मुख्यमंत्री आवास में समेटने की तैयारी शुरू कर दी. लेकिन अदालत के आदेशों का सम्मान करते हुए उन्होंने इस से हाथ खींच लेना ही मुनासिब समझा.

दरअसल, बिहार का एक सरकारी आवास 5, देशरत्न मार्ग पर बना हुआ है. अब तक यह आवास राज्य के उपमुख्यमंत्री के लिए रिजर्व हुआ करता था. मगर जब सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री बने तो उन्हें कई तरह के विवादों के बाद इस आवास को छोड़ना पड़ा और अब यह आवास किसी उपमुख्यमंत्री को नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के बेटे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को अलौट किया गया है.

इस बंगले की खासीयत ही किसी को आकर्षित करने के लिए काफी है. इस संबंध में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रह चुके सुशील मोदी की एक टिप्पणी से समझ  सकते हैं. उन्हें जब 2019 में यह आवास अलौट किया गया था, तब उन्होंने कहा था, ‘‘इस बंगले के आगे तो राजभवन और मुख्यमंत्री आवास भी फीका है.’’

आप समझ सकते हैं कि क्यों सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इस बंगले को खाली नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस बंगले को सीएम हाउस का एक्सटैंशन घोषित कर दिया था.

अब जरा इस बंगले की खासीयत को समझे. 5 कमरे वाले इस दोमंजिला आवास में 44 एसी लगे हैं. कुछ एसी तो बाथरूम तक में लगे हैं. ब्रिज कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन ने यहां 59 लाख के फर्नीचर लगाए हैं. इस बंगले में बढि़या चमड़ा मढ़े 35 महंगे सोफे लगे हैं. एक्सक्लूसिव डिजाइन वाले 108 पंखे हैं. 34 दीवारों पर वुडन पैनल लगे हैं. 464 फैंसी एलईडी लाइट लगी हैं, जिन्हें विदेश से मंगवाया गया है. कमरों की वुडन फ्लोरिंग की गई है.

दिलचस्प है कि यह सब जानकारी सुशील मोदी ने 2019 में खुद मीडिया को दी थी, जब अदालती लड़ाई के बाद तेजस्वी यादव को यह बंगला छोड़ना पड़ा था और बंगला उन्हें अलौट किया गया था. उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि इस बंगले के रिनोवेशन में पुल निर्माण निगम ने करोड़ों की राशि खर्च की थी, जबकि ‘बंगला’ भवन निर्माण विभाग के अधीन है.

वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र के अनुसार, ‘‘अब समझिए कि हमारे प्रतिनिधि, जो खुद को लोक सेवक भी कहते हैं, के बंगले कैसे होते हैं. उपमुख्यमंत्री का 5, देशरत्न मार्ग स्थित बंगला तो बस एक उदाहरण है. और हां, यह भी समझ  लीजिए कि इसी बिहार में 41 फीसदी परिवारों के पास पक्का मकान भी नहीं है. इन में 14 फीसदी झोपडि़यों में रहते हैं और 63,000 से ज्यादा परिवार बेघर हैं.’’

अब दूसरा विवाद बिहार विधानपरिषद की नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी के बंगले की. दरअसल, नियमों में यह प्रावधान है कि प्रतिपक्ष के नेता को भी मंत्री स्तरीय सुविधाएं मिलती हैं.

इसी के तहत यह 10, सर्कुलर रोड पर बना बंगला उन्हें साल 2006 में मिला था, जो उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मिला था. तब से वह सपरिवार वहीं रह रही थीं. अब उन्हें इसे छोड़ने के लिए उन पर दबाव दिया जा रहा है.

अब विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता के रूप में उन्हें 39, हार्डिंग रोड स्थित बंगला अलौट किया गया है. अब तक उन्हें पूर्व बंगला खाली करने और नए बंगले में जाने के लिए 5 बार  नोटिस मिल चुके हैं. फिलहाल 10, सर्कुलर रोड  पर बना बंगला डेयरी मत्स्य एवं पशु संसाधन मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित किया गया है, जो बंगला खाली होने की बाट जोह रहे हैं.

पहले अपने पत्र के जवाब में राबड़ी देवी ने यह मांग की थी कि उन के पति लालू यादव, जो बिहार के मुख्यमंत्री भी थे, के स्वास्थ्य को देखते हुए वहां एक विशेष चिकित्सकीय कमरा बनवाया जाए.

अपने एक अन्य पत्र में उन्होंने लिखा है कि जब उन्हें 2006 में उक्त बंगला आवंटित किया गया था, वह सूची उपलब्ध कराई जाए, जिस में इस बंगले में संबंधित सरकारी  सामान का ब्योरा है. उन्हें डर है कि कल को बंगला खाली करने के बाद उन पर चोरी कर सरकारी सामान ले जाने का आरोप न लग जाए.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव का कहना है, ‘‘बिहार सरकार धार्मिक उन्माद को अब जातीय युद्ध में बदलना चाहती है. इस के लिए यादव को टारगेट किया जा रहा है. विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी के आवास को बेवजह मुद्दा बनाया जा रहा है. राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव दोनों पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में भी बड़े और भव्य बंगले के अधिकारी हैं.’’

वीरेंद्र यादव अपनी बातों को कुछ यों समझते हैं, ‘‘जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार दोनों पूर्व मुख्यमंत्री हैं. दोनों के नाम से बंगला आवंटित है, जबकि दोनों सांसद भी हैं.

‘‘सरकार को यह बताना चाहिए कि इन दोनों को किस हैसियत से पटना में बंगला आवंटित है? यदि दोनों को पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में बंगला आवंटित है, तो लालू यादव को पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में बंगला क्यों नहीं मिलना चाहिए?

‘‘अगर सरकार राबड़ी देवी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में नया बंगला आवंटित करती है, तो भी लालू प्रसाद यादव पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत वाले बंगले के अधिकारी हैं ही. मंत्री संतोष सुमन और उन की पत्नी व विधायक दीपा कुमारी को अलगअलग बंगला आवंटित है, तो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को अलगअलग 2 बंगले क्यों आवंटित नहीं हो सकते हैं?

‘‘इस के अलावा उपेंद्र कुशवाहा, संजय झा  और देवेश चंद्र ठाकुर के नाम भी पटना में सरकारी बंगला आवंटित हैं, जबकि तीनों सांसद हैं. सरकार को यह बताना चाहिए कि पटना में 5 सांसदों को किस नियम के तहत बंगले आवंटित किए गए हैं? या कि पांचों अवैध कब्जा कर के सरकारी आवास में रह रहे हैं?’’

ये सब आरोप राजद के राष्ट्रीय महासचिव अब्दुल बारी सिद्दीकी और प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल ने एक प्रैस कौन्फ्रैंस में लगाए थे. फिलहाल यह मुद्दा तूल न पकड़े, इसलिए राबड़ी देवी ने बंगला खाली कर दूसरी जगह जाने का मन बना लिया है. लेकिन सरकारी बंगले में रहने का अपना सुख है. भले ही वह नेता प्रतिपक्ष हों, इस से सत्ता से जुड़े रहने का अहसास तो बना ही रहता है. और इसे सस्ते में कोई क्यों छोड़े? वैसे, राबड़ी देवी बंगला छोड़ चुकी हैं. Controversy

VIP Culture : हवा होते सपने

VIP Culture. सपना एयरपोर्ट के मेन गेट पर खड़ीखड़ी थक गई थी. यहां तो उस ने सुना था कि सभी काम समय पर होते हैं, मगर वह जिन नेता के इंतजार में खड़ी की गई थी, उन का कहीं अतापता नहीं था.

कोई बलदेव भाई किसी मशीन की तरह अलर्ट मोड में खड़े थे जैसे. कहीं कोई कमी न रह जाए, इस बात का बलदेव को खास खयाल था. उन्हीं ने करुणा चाची को फोन किया था कि तकरीबन आधा घंटे में एक सजीधजी लड़की चाहिए.

यह सुन कर करुणा चाची सपना के पास सुबहसुबह ही आ धमकी थीं. वे बोली थीं, ‘‘थोड़ी देर की तो बात है. बस जो मेहमान हैं, उन पर फूल की पंखुडि़यां बिखेरनी हैं, टीका लगाना है, आरती उतारनी और और माला पहनानी है. इसी के 2,000 रुपए मिल रहे हैं, तो क्या बुरा है. बस, शर्त यही है कि तुझे आधा घंटे में ही तैयार हो कर निकल लेना है.’’

‘‘ठीक है, मैं आज कालेज नहीं जाऊंगी…’’ सपना थोड़ा कशमकश में थी, ‘‘लेकिन किसी के स्वागत के लिए मैं ऐसे ही कैसे चली जाऊं? माना कि मुझे वहां जा कर कुछ खास नहीं करना है. लेकिन ऐसे हर काम के पहले मुझे ब्यूटीपार्लर जाना होता है. किसी के स्वागत में लोग मुझसे से क्या उम्मीद रखते हैं, उस का तो मुझे खयाल रखना ही होगा न?’’

‘‘उन के पास समय नहीं है. वे बड़े लोग हैं. उन्हें मना नहीं करना चाहिए…’’ करुणा चाची गिड़गिड़ाईं, ‘‘तुम वैसे ही बहुत खूबसूरत हो. कुछ भी पहन लोगी, तो खूबसूरत ही लगोगी. वैसे, तुम्हारे पास जो गुलाबी रंग का घाघराचोली है, वह पहन लेना और कुछ मेकअप कर लेना. इमिटेशन वाले आभूषण तो तुम्हारे पास ढेर सारे हैं ही. कुछ ढंग का पहन लेना.

‘‘राधिका भी तो साथ जा ही रही है.  जाओ, जल्दी तैयार हो जाओ. गाड़ी आती ही होगी. मैं ने तुम्हारी तरफ से हां कर दिया है.’’ अब आधा घंटे में कोई कैसे तैयार हो सकता है. वह तो गनीमत है कि सपना कालेज जाने के लिए नहा चुकी थी. कोई बात नहीं, वह तैयार हो लेगी. घर बैठे काम मिले, तो दिक्कत क्या है. उस के लिए तो यह अच्छा ही है.

जल्दीजल्दी तैयार हो कर सपना चौराहे के पास गाड़ी का इंतजार कर ही रही थी कि थोड़ी देर में ही गाड़ी भी आ गई थी.

सपना को एक तरह से खुशी ही हुई. आमतौर पर शादीब्याह, रिसैप्शन वगैरह में वह यही काम करती थी. किसी सजीधजी गुडि़या की तरह मेन गेट पर खड़ी रहो और लोगों पर फूल की पंखुडि़यां छितरा कर उन्हें टीका लगाओ. इसी काम के उसे 1,000 रुपए मिल जाते थे, तो उसे लगता था कि यह बहुत बड़ी नेमत है.

पड़ोस की करुणा चाची ने सपना को पहलेपहल यह काम दिलवाया था कि तू तो बड़ी खूबसूरत है और पार्टियों में तो ऐसे ही चेहरों की डिमांड रहती है. करना क्या है, बस सजधज कर खड़ी रहना है. मेहमानों को जरा मुसकरा कर देखना है, ताकि वे खुश हो जाएं. इन पार्टियों या रिसैप्शन में चायनाश्ता और रात का राजसी भोजन अलग से मिलता है. क्या पता, कोई खुश हो कर टिप भी दे दे.

करुणा चाची शहर की जानीमानी समाज सेविकाओं में गिनी जाती थीं. तकरीबन रोज ही उन का कहीं न कहीं आनाजाना लगा रहता था. अब तो वे राजनीतिक सभाओं और सम्मेलनों में भी जाती थीं. उन का शाही खर्च ऐसे ही नहीं चलता.

करुणा चाची के कहने पर सपना महंगी चीजें खरीदती थी. पहले तो वह किराए के कपड़ों से काम चलाती थी, मगर इधर उस ने कुछ अच्छे कपड़े खरीद भी लिए थे. बहुत मन था कि उस के पास अपना बढि़या घाघराचोली हो. कुछ संयोग ऐसा लगा कि उसे पिछले सीजन में लगातार काम मिले, तो उस की

अच्छी कमाई हो गई. तब उस ने पूरे 10,000 रुपए में गुलाबी रंग का सलमेसितारों से टंका घाघराचोली खरीद लिया था. अच्छे कपड़े रहने से एक फायदा यह तो है ही कि डिमांड बढ़ जाती है. फिर उस के किराए के पैसे बच जाते थे. दूसरे लौटाने की हड़बड़ी नहीं रहती. न यह डर कि कहीं फट जाए, तो दुगनाचौगुना जुर्माना भरो.

आमतौर पर इस काम में ब्यूटीपार्लर का भी खर्च शामिल रहता है. यह अलग बात है कि सपना पार्टियों से ब्यूटीपार्लर के खर्च का चार्ज अलग से लेती है.

अब वह इस पर खर्च क्यों करे. उसे सजनाधजना आता है. कुछ ब्यूटीपार्लर के टिप्स उस ने देखसुन कर सीख भी लिए हैं. सो, अपनी अलमारी में वह कुछ लिपस्टिक, पाउडर, स्नो, क्रीम वगैरह रखती भी है. ये सब इतने महंगे भी हैं कि उन के दाम सुन कर कलेजा मुंह को आता है. मगर अब जरूरी है, तो है. खरीदना तो पड़ेगा ही.

इमिटेशन के आभूषणों के अनेक सैट सपना के पास हैं. जब वह तैयार हो कर निकलती है, तो कितना कुछ सुनना भी तो पड़ता है उसे. मगर अब उस ने इसे नजरअंदाज करना सीख लिया है. इस में गलत क्या है. वह खूबसूरत है तो है. वह इस के बदले कीमत वसूल करती है, तो क्या बुरा है.

करुणा चाची ने बताया था कि आज के मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए कोई नेता दिल्ली से आने वाले हैं, जिन के स्वागत के लिए उसे एयरपोर्ट जाना होगा, तो वह खुश हो गई थी. उन नेता का नाम क्या है, वे कहां के रहने वाले हैं, इस से उसे कोई मतलब नहीं. करोड़ों में खेलने वाले इन नेताओं का नामपता जान कर करना भी क्या है.

दरअसल, उन नेता को अंदाजा नहीं था कि उन्हें मंत्रिमंडल में लिया जाएगा, इसलिए अपनी रिश्तेदार की शादी में शामिल होने के लिए वे दिल्ली चले गए थे. एक दिन पहले ही पार्टी हाईकमान से खबर मिली कि उन्हें मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होना है, तो वे भागेभागे चले आए थे हवाईजहाज से. उन के समर्थकों की तो पौबारह हो गई. जब उन का आदमी मंत्री बनेगा, तभी तो उन को मलाई और मिठाई रूपी ठेका और सप्लाई का काम मिलेगा.

आननफानन में नेता के स्वागत की तैयारी होने लगी थी और यह एयरपोर्ट से ही शुरू होना था. उस कालेकलूटे, गोभी के पकौड़े जैसे बड़े नाक, थुलथुल काया वाले नेता का स्वागत एयरपोर्ट पर कोई सुंदरी करे, तो दिन बेहतर होगा और इसी के लिए सपना का नाम आया था.

फट से करुणा चाची का संदेश सपना के पास गया था और वह तैयार हो कर लगभग भागते हुए गाड़ी से 8 बजे सुबह ही यहां आ पहुंची थी. अब वह यहां चाय मांगे, तो किस से? चाय पीने के चक्कर में लिपस्टिक बिगड़ भी तो सकती है.

आज तक सपना एयरपोर्ट नहीं आई थी. उस का भी बहुत मन करता था कि वह देखे कि हवाईजहाज कैसे उड़ता है और जमीन पर कैसे उतरता है. इसी बहाने आज उस की सालों की साध भी पूरी हो जाएगी.

एयरपोर्ट को देख कर तो सपना एकदम से दंग रह गई. राधिका भी इसी काम के लिए उसी के साथ आई थी. दरअसल, पहले तो एक लड़की ही को बुलाया गया था, मगर दल के नेता ने फरमान जारी किया कि 2 लड़कियां सम्मान करेंगी, तो ज्यादा अच्छा होगा, इसलिए आननफानन सपना को भी बुला लिया गया था.

लड़की को तैयार होने में देर तो लगेगी ही. तब और, जब किसी के स्वागत के लिए सजनासंवरना हो. और यहां एयरपोर्ट पर इतनी साफसफाई और सजावट. लकदक करती कुरसियां और सोफा सैट. ऊंची छतों पर लगे भव्य ?ाड़फानूस और दीवारों पर टंगी खूबसूरत बड़ीबड़ी पेंटिंग्स.

सुबह होने के बावजूद वहां भीड़ थी. हो भी क्यों नहीं. नई सरकार बनने की खुशी में या हड़बड़ी में वीआईपी लोगों का आनाजाना जारी था. चार्टर्ड हवाईजहाजों के बीच पब्लिक हवाईजहाज से उतरने वाले शायद वे आखिरी नेता थे.

10 बजे हवाईजहाज को उतरना था. मगर वीआईपी को लाने वाली फ्लाइट को प्राथमिकता दी जा रही थी. ऐसे में पब्लिक फ्लाइट हवा में ही मंडराती रही. उन नेता का हवाईजहाज कभी बनारस, तो कभी गया की ओर हवा में ही चक्कर काटता रहा.

साढ़े 11 बजे हवाईजहाज उतरा, तो वे नेता बेहद हड़बड़ी में थे. एयरपोर्ट के मेन गेट पर सपना से उन्होंने जल्दीजल्दी टीका लगवाया, माला पहनी. राधिका ने उन की जल्दीजल्दी आरती उतारी. नेताजी ने उतनी ही तेजी से माला उतारी और उसे नोंच कर किनारे फेंक कर बाहर की ओर भागे.

सुबह के 11 बजे से कार्यक्रम शुरू होना था और अभी यहीं साढ़े 11 बज रहे थे. मुख्यमंत्री से भी लेट पहुंचेंगे क्या वे नेता राजभवन? इस तुनकमिजाज मुख्यमंत्री का कोई भरोसा नहीं. कहीं देरी का बहाना कर मंत्रिमंडल में शामिल करने से इनकार कर दे, तो कोई क्या कर लेगा.

इन लोगों ने आज भारी अफरातफरी मचाई पटना एयरपोर्ट पर. नीचे उतरने ही नहीं दिया पब्लिक फ्लाइट को, इसलिए तो देर हो गई न. मुसाफिरों को लिए हवाईजहाज डेढ़ घंटे चक्कर काटता रहा हवा में, आसमान में. कभी मुजफ्फरपुर के आसमान में, तो कभी गया या बक्सर के आसपास.

भारी अफरातफरी के बीच मेन हाईवे को भी रोक दिया गया था. यह कोई बात नहीं. मगर किसी को आसमान में भी यों रोका जाता है क्या. गाड़ी में बैठ कर छूमंतर होते ही उन के समर्थकों की भीड़ भी दूसरी गाडि़यों में बैठ कर छूमंतर हो गई थी.

सपना और राधिका को पता नहीं था कि जिन नेता की उन्होंने आरती उतारी है, चंदन का टीका लगाया है, गुलाब की पंखुडि़यां उन पर निछावर की हैं, उन का नाम क्या है. एक खतरनाक से दिखने वाले आदमी ने सपना को बताया था कि यही हैं नेताजी. इन्हें टीका लगाओ, माला पहनाओ.

सपना और राधिका ने वह कर दिया था. ताबड़तोड़ तसवीरें भी ली गई थीं. पर हड़बड़ी में उन्होंने घर से अपना पर्स भी नहीं लिया था, जिस से उन के हाथ खाली थे. अब घर वापसी के लिए शेयर आटोरिकशा के लिए भी तो कुछ पैसे चाहिए न.

अचानक उन दोनों को वह आदमी बलदेव दिखा. वह अपनी बुलेट में किक मार रहा था कि राधिका ने उसे जा पकड़ा और पैसे मांगे. ‘‘तुम्हारे पैसे बाद में मिल जाएंगे…’’ बलदेव बोला, ‘‘अभी जल्दी है. मुझे राजभवन जाना है. अभी मुझे जाने दो.’’

‘‘अरे, हमारा मेहनताना बाद में देना,’’ मुंहफट राधिका तुरंत बोली, ‘‘हमें इतनी जल्दी सुबहसुबह आप लोगों ने बुला लिया. हम अपना पर्स भी नहीं ले पाई हैं. सुबह से मुंह में एक दाना नहीं डाला, चाय का एक कप भी नहीं. पर कोई बात नहीं. लेकिन हमें घर जाने का किराया तो दे जाओ. हम 10 किलोमीटर दूर पैदल तो अपने घर नहीं जा सकती हैं न.’’

बलदेव ने तुरंत अपनी जेब को टटोला और 50 रुपए का एक नोट निकाल कर उन की ओर उछाल दिया. बुलेट की ‘फटफट’ आवाज के बीच वे दोनों एकदूसरे का मुंह देख रही थीं. इज्जत करने वालों की इसी तरह बेइज्जती होती है शायद.

पैसे वाले और पैसा बनाते जाएंगे और उन जैसे लोग इसी तरह चंद रुपयों के लिए रौंदे जाते रहेंगे. सामंतवाद और पूंजीवाद का यही बिगड़ा रूप है. काम खत्म होने के बाद भी मेहनताने की गारंटी नहीं. चाय का एक प्याला तक उन्हें इस एयरपोर्ट पर पीने को नहीं मिला. फिर भी उन्हें इस पूंजीवादी सामंतवाद की इसी तरह आरती उतारनी होगी, टीका लगाना होगा, फूलों की पंखुडि़यां निछावर करते हुए माला पहनाते समय मुसकराना होगा. बदले में वे देंगे नफरत भरा बरताव और वे मुंह से उफ तक नहीं कर पाएंगी. VIP Culture

Editorial : गहरी पैठ -जनता की रीढ़ की हड्डी की चाबी धर्म के झुनझुने में

Editorial . 5  राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के नतीजों से यह तो साफ हो गया है कि चुनावी जीत सेना की जीत की तरह होती है और सिर्फ बयानों और जुलूसों से नहीं पाई जा सकती. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने हर तरह की ताकत झोकी ,वह सही थी या नहीं, भाजपा की मन के पक्के होने की बात को जरूर दिखाती है.

ममता बनर्जी ने अपने बचाव में काफी जद्दोजेहद की जो दूसरी पार्टियां नहीं कर पातीं, अपना बड़ा चहेता कैडर खड़ा किया था जो जमीन पर हरदम वोटरों को कंट्रोल में रखता था पर भाजपा ने इस बार चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, केंद्र के चुने ऊंची जातियों के अफसरों, केंद्रीय पुलिस, केंद्रीय नीतियों के हमदर्द जजों का ऐसा जाल बिछाया कि ममता बनर्जी को हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर दिया.

भारतीय जनता पार्टी के साथ पूजापाठी जमात का एक हिस्सा सदा से ही लगा रहा है और अब उसे दिख रहा है कि पौराणिक राज लाने में ज्यादा देर नहीं है तो उस ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ने में भलाई सम?ा. वे तो सदियों से राज करते आए हैं, सड़कछाप लोगों के हाथों में जो सत्ता आई थी उसे ज्यादा दिन क्यों सहें, जबकि उन के पास अच्छे लड़ाई कर सकने की कला सीखे लोग और उन के खुद्दार नेता हों. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस दूसरी पार्टियों से ज्यादा कसी हुई थी पर फिर भी उस की लड़ने की सीमा होती है. हर कमजोर पक्ष कुछ समय तक अपनी गिनती पर टिक सकता है पर आखिर में उसे उन के हाथों हारना ही पड़ता है जो सही गोटियां बैठाने में आगे हों.

ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में और स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कषगम की तमिलनाडु में हार ने साफ कर दिया है कि राज सिर्फ जनता की चाह पर या जरूरत के हिसाब से नहीं चलता, राज तो उस का चलता है जिस ने एक बार सत्ता हासिल कर ली तो वह उसे संभाल कर, उस के हर पहलू का इस्तेमाल कर के राज करता है.

मुट्ठीभर मुगल, मुट्ठीभर गोरे करोड़ों भारतीयों पर राज इसीलिए कर पाए कि उन्होंने सम?ा लिया था कि इस देश की जनता की रीढ़ की हड्डी की चाबी तो धर्म के ?ान?ाने में है और उस ?ान?ाने को या तो खुद बजा लो या बजाने वाले को खरीद लो, बस करोड़ों पर राज किया जा सकता है, उन से मनचाहा टैक्स वसूला जा सकता है, उन्हें गरीब रख कर कुछ की अमीरीको पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए पक्का कर सकते हैं.

1947 के बाद आजादी और 1950 के संविधान के बराबरी के वोट के हक को आसानी से पहले कांग्रेस ने और अब भारतीय जनता पार्टी ने इस तरह मोड़ा है कि बेमतलब का रह गया है. पहले भीड़ नेताओं के घरों के आगे लगती थी, अब भाजपा के नेता भी कठपुतली बन कर रह गए हैं तो मूर्तियों के आगे लग रही है. भाजपा ने वोट मशीनरी पर कब्जा कर के साबित कर दिया है कि लोकतंत्र को भी मैनेज करना मुश्किल नहीं है क्योंकि आम जनता को अपनी तकलीफ नहीं दिखती, वह तो उस का भाग्य है उसे तो जयजयकार के नारे, चमत्कार, पूजाअर्चना चाहिए जो उस के नजदीक होते हैं.

इन विधानसभा चुनावों से एक बड़ा बदलाव आया है क्योंकि विरोधी दलों के 2 मजबूत पिलर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु अब ढह गए हैं. उन के ढह जाने के साथसाथ इन जगहों की पार्टियों के  कैडर भी ढह जाएंगे जो सत्ता की चापलूसी पर जिंदा थे. भाजपा का पूजापाठी कैडर सरकार से सीधा नहीं मांगता, वह सरकार से ऐसे माहौल की मांग करता है जिस में उस का धंधापानी फलताफूलता रहे. इस तरह का परमानैंट कैडर फिलहाल भाजपा के अलावा कोई और पार्टी नहीं दे सकती.Editorial

Editorial : गहरी पैठ- बिहार बीजेपपी को चढ़ावे की चिंता

Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.

बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.

इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.

बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.

आज मंदिरों की बाढ़ आ रही है जो तराई से आने वाली बाढ़ से भी ज्यादा खतरनाक है. सम्राट चौधरी इसे और बढ़ाएंगे. 20 साल नीतीश कुमार ने इस थोड़ाबहुत कंट्रोल किया था पर भाजपा ने हेरफेर कर के उन्हें धक्का दिया है और अब मंदिरों की बात होगी.

बिहार की आम जनता आज भी सीधी और बेवकूफ है. उसे सदियों से पढ़नेलिखने नहीं दिया गया. कांग्रेसी सरकारों ने गांवगांव में स्कूल खोले पर वहां ऊंची जातियों के पढ़ाने वाले घुस गए जिन्होंने साजिश के तहत दलितों, पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया.

जो थोड़ीबहुत चमक बिहार में दिखती है वह तकनीक की बदौलत है. बिजली पैदा करना आसान है तो हर सड़क पर बत्ती लग सकती है, हर घर में लाइट है. बाकी अंधेरा है. सब से नीचे के पायदान पर रहने वाला बिहार अपने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से पैसों के मामले में आधा है और यह फर्क बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं क्योंकि अब पूजापाठ, पुलिस अत्याचार, बुलडोजर का राज आ गया है जिस में मरेगा गरीब, नीची पिछड़ी जाति का जना जिस की न आवाज है, न सुनवाई.  Editorial

Social Story: गौसेवा के नाम पर हिंसा और चंदा वसूली

Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,

उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में आ कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.

सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.

क्यों? धार्मिक पाखंड है जिम्मेदार दरअसल, गाय की इस हालत के लिए धार्मिक पाखंड सब से ज्यादा जिम्मेदार है. कपोल कल्पित कथा पुराणों में जब यह बताया गया है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवताओं को निवास है, तो फिर लोग गाय की पूजा करने के बजाय मंदिरों में भगवान को क्यों तलाशते फिर रहे हैं?
कपोल कल्पित कथाओं से बड़ेबड़े पंडालों में होने वाली धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि दान की गई इसी गाय की पूंछ पकड़ कर स्वर्ग के रास्ते में पड़ने वाली एक वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है.
इसी पाखंड की वजह से मध्य प्रदेश की एक महिला मुख्यमंत्री तो सड़क पर अपने काफिले को रोक कर गाय को रोटी खिलाती थीं. आखिर लोगों को यह बात में क्यों नहीं आती कि गाय को हरे चारे और भूसा की जरूरत रोटी से कहीं ज्यादा है? सच बात तो यह है कि गाय सिर्फ और सिर्फ एक पालतू पशु है. धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए गाय को दान करने का उपदेश देते हैं.

पापपुण्य का डर दिखा कर लोगों को बताया जाता है कि गौदान करने से आदमी सीधे स्वर्गलोक की टिकट पा? जाता है. सालभर में दान के नाम पर लाखों की संख्या में गायों को दान में दिया जाता है, मगर ये गायें पंडों के घरों में दिखाई नहीं देती हैं. जाहिर है कि दान में मिली गायों को पंडे व्यापारियों को बेच देते हैं या फिर दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देते हैं. हिंदुओ में गाय को तब तक माता माना जाता है तब तक वह दूध देती है. इस के बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता है. गाय को माता मानने वालों का दोहरा चरित्र यह भी है कि वे अपनी बूढ़ी और बेकार गोमाता को कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करते हैं.
गोभक्ति का एक पक्ष यह भी है कि गोमाता के मरने पर वे उस की लाश को नहीं उठाते हैं, यहां तक कि उसे छूते भी नहीं हैं. ऐसा करने पर उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसलिए उसे उठा कर ले जाने के लिए वे दलित बस्ती से उन लोगों को बुला कर लाते हैं, जो मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करते हैं. यह भारत की अकेली पाखंडी कौम है, जो अपनी गोमाता को सड़़कों पर भूखा मरने के लिए छोड़़ देती है और मरने पर अपनी मां को कंधा भी नहीं देती है.

सरकारी
कोशिशें दिखावे तक सीमित सरकार गौवंश की रक्षा की बात तो करती है, पर गाय को सड़क से हटाने के लिए कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं कर पाई है. मध्य प्रदेश में गायें सड़कों पर मारीमारी फिर रही हैं और सरकार विदेशों से चीता ला कर उन पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है. मध्य प्रदेश की भगवा सरकार धर्म की दुहाई दे कर गाय को माता तो मानती है, मगर आवारा घूमती गाय की बेचारगी उसे दिखाई नहीं देती. आज मध्य प्रदेश के गांवकसबों और शहरों में सड़क पर आवारा घूमती गाय सरकार के नुमाइंदों को दिखाई नहीं दे रही है. गाय और गौमांस की तस्करी की खबर पर मौब लिंचिंग पर उतारू बजरंग दल के लोगों को सड़क पर भूखीप्यासी गाय दिखाई नहीं देती. दक्षिण अफ्रीका के नामीबिया से कूनोपालपुर नैशनल पार्क में चीते लाए गए हैं, जिन के भोजन के सैकड़ों की तादाद में चीतल सहित दूसरे जंगली जानवरों को हलाल किया जा रहा है.

यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है कि यह किस तरह का पर्यावरण संरक्षण है, जिस में सैकड़ों की तादाद में जंगली जानवरों की बलि दे कर केवल चीते का संरक्षण किया जा रहा है? मौजूदा दौर में खेती में मशीनीकरण से गौवंश के बैल बेकार होने चाहिए थे, लेकिन दूध देने वाली गाय क्यों बेकार हुई? इस सवाल का जवाब न किसी के पास है, न ही कोई खोजना चाहता है. आज तो छोटे शहर से ले कर दिल्ली तक सरकार की हर लेयर पर कथित गौरक्षा समर्थित दल हैं, तब क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय गौनीति लाई जाती?
गौहत्या की चिंता करने वालों को यह चिंता भी करनी होगी कि गाय सड़कों पर अपमानित और मरने के
लिए नहीं आवारा फिरें, बल्कि घरों में जगह पाए. आज भी गांवदेहात में कई परिवारों की आजीविका का स्रोत गाय का दूध और उस से बने उत्पाद दहीमक्खन और घी हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं, पर वर्तमान में गाय की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. जनवरी, 2022 के आखिरी दिनों में भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक महिला भाजपाई नेता की गौशाला में 100 से ज्यादा गायों की मौत हो गई थी.

इस गौशाला में 500 गायें हैं. उस समय गौशाला के नजदीक बने कुएं में 20 गायों के शव और मैदान में 80 से ज्यादा गायों के शव और कंकाल पड़े मिले थे. उस के बाद उन भाजपाई नेता पर पुलिस ने केस दर्ज किया था और प्रशासन ने गौशाला का संचालन अपने हाथ में ले लिया था.
आज भी प्रदेश में खोली गई ज्यादातर गौशालाओं का संचालन राजनीतिक रसूख वाले लोग ही कर रहे हैं. गौशालाओं में हट्टीकट्टी गायें ही रखी जाती हैं, जिन का घी दूध पी कर गौमाता की सेवा करने का ढोंग करते हैं और लाचार, बीमार गायें सड़कों पर आवारा घूमती हैं, उस की फिक्र इन को कभी नहीं रहती.
सरकार को चुनावी फायदे की बात छोड़ कर गाय की लाचारगी की चिंता है तो किसानों को गाय पालने की अनिवार्यता का नियम लागू करना चाहिए. जो किसान गाय का पालन करे, उसे ही सरकारी सब्सिडी और दूसरे फायदे मिल सकें.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना कर उस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया जाता है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले के साहित्यकार, संपादक वरुण सखाजी चर्चा के दौरान बताते हैं कि गौहत्या का विरोध कर के उन्माद में आ कर मरनेमारने पर उतारू लोग भीड़तंत्र का हिस्सा तो बन जाते हैं, पर गायों की आवारगी पर बात नहीं करना चाहते. वे इसे एक तरह की छद्म धार्मिकता और जाहिलपन ही मानते हैं. वे तल्ख अंदाज में कहते हैं, ‘‘हम अपने बब्बा (पिता के पिता) को कोई गाली दे तो गाली देने वाले को मार डालेंगे, लेकिन अपने घर में उसे खुद चाहे दोनों टाइम पीटें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यह दोहरापन ठीक नहीं है.’’फसलों को चट कर रहे आवारा पशु  एक दौर था जब पशुपालन किसानों के लिए आमदनी का जरीया हुआ करता था. लोग गायभैंस, बकरी पाल कर इन के दूध, घी, मक्खन को बेच कर घरपरिवार की जरूरतों को पूरा करते थे.

बैल खेती किसानी के कामों में हलबखर चलाते थे. बैलगाड़ी में किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जाता था. नई तकनीक आने से अब खेती में कृषि उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है. इस के चलते पशुपालन में अब किसानों की दिलचस्पी कम हो गई है. अब लोग पालतू पशुओं को दूध देने तक घर में रखते हैं, पर बाद में उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं. आजकल गांवकसबों में आवारा पशुओं के चलते फसलों की हिफाजत करना एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है. साल 2023 में देश के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिस के मुताबिक 20वीं पशुधन गणना से पता चलता है कि देश में 50.21 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं. इन में राजस्थान में सब से ज्यादा 12.72 लाख और उत्तर प्रदेश में 11.84 लाख मवेशी सड़कों पर आवारा घूमते हैं. देशभर में आवारा पशुओं को पालने की सालाना लागत 11,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. मवेशियों की हत्या पर बैन और गौरक्षकों के डर से आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है और उत्तर प्रदेश में दूध न देने वाले पशुओं को पालना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लौकडाउन के पहले दतिया के रेलवे स्टेशन पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता था. ये आवारा गायबैल मुसाफिरों के खानेपीने की चीजों पर पट पड़ते थे. कई बार इन आवारा जानवरों के अचानक रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाने से बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों को चोट भी लग जाती थी. होशंगाबाद जिले के पचुआ गांव में साल 2018 में चरनोई जमीन पर गांव के कुछ रसूख वाले किसानों ने कब्जा कर लिया था, जिस के चलते गांव के आवारा पशु किसानों के खेत में घुस कर फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे थे. इस बात को ले कर 2 पक्षों में हो गया था, जिस में एक आदमी की मौत हो गई थी. दूसरे पक्ष के 2 लोग हत्या के आरोप में हवालात में बंद हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलगअलग इलाकों में हुईं ये घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश में पशुओं की आवारगी लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है. किसानों की हाड़तोड़ मेहनत से उगाई गई फसल जब आवारा पशु चर लेते हैं, तो वे मनमसोस कर रह जाते हैं.

गांवकसबों में दबंगों के पाले पशु आवारा घूमते हैं और दलितपिछड़ों की जमीन पर उगी फसल चट कर
जाते हैं. दबंगों के डर से इन आवारा पशुओं को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता. चरनोई जमीन की कमी में आवारा घूमते पशु मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी अलौटमैंट राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था. सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई. इसी तरह गांवदेहात के इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल और दूसरी तरह की सरकारी इमारतों को भी चरनोई जमीन के रकबे पर बनाया जा रहा है. किसानों द्वारा भी वेयरहाउस, पैट्रोलपंप, बरातघर वगैरह भी खेती की जमीन पर बन रहे हैं. कसबों और शहरों में भी खेतीबारी वाली जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लाट बेचे जा रहे हैं. गांवों में चरनोई जमीन के अलावा जो पठारी क्षेत्र या सरकारी जमीन बची है, उस पर भी दबंगों का कब्जा है.

आज शहर और गांव की सड़कों पर बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की खास वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही है. गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान, जिन के पास खुद की जमीन नहीं है, गायभैंसों को खुला छोड़ देते हैं. चरनोई जमीन नहीं होने से गायें खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं और जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते हैं. गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गौपालन में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की सड़कों में भी गायें आवारा घूमती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की पन्नी में फेंकी गई खाने की चीजों को खाने के चक्कर में गायें प्लास्टिक की पन्नी भी खा लेती हैं और गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से छुड़ाने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथसाथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी भी जाग सकती है.

हमारे देश की कानून भी दोहरे मापदंड वाला है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आवारा पशुओं का भी खयाल रखो और अपनी फसलों को भी सहीसलामत रखो. पर यह कैसे मुमकिन है? जमीनी हकीकत
यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के इलाकों में नीलगाय, सूअर, गाय, बकरी, भैंस जैसे आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसान खेतों में रतजगा कर रहे हैं. आवारा पशुओं को किसान मार भी नहीं सकते, क्योंकि यह गैरकानूनी है. गांवदेहात में खेती करने वाले छोटे किसानों के पास जो जमीन है, उस पर किसी बड़े फार्महाउस जैसी तार की बाड़  नहीं होती है. गरीब और पिछड़े पशुपालक अपने पालतू पशुओं को खुद चराने ले जाते हैं, पर ऊंची जाति के दबंगों के पशु बेखौफ आवारा घूमते हैं. देश का कानून भी उपदेशकों की तरह केवल उपदेश देता है.       

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’        

Bihar Politics: नीतीश कुमार बरखास्त-मंडल को कमंडल ने कुचला

Bihar Politics: नीतीश कुमार, जो पिछले 2 दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे, अब वे राज्यसभा में हैं. यह नीतीश कुमार का डिमोशन है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ है. नीतीश कुमार कभी सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म की राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां, गठबंधन और उम्र के साथसाथ उन की इमेज बदलती गई. अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में जा रही है, जहां नीतीश युग खात्मे की ओर है.

बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश युग के साथसाथ बिहार में सैकुलरिज्म और सामाजिक न्याय की राजनीति का युग भी खत्म हो जाएगा? इस के साथ ही बिहार के पिछड़ों, दलितों, मुसलिमों की चाबी पूजापाठी ऊंची ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों के हाथों में अंगरेजों के जमाने की तरह आ जाएगी.
नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से राजनीति में आए थे. वे राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और वीपी सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की वैचारिक विरासत को आगे ले जाने वाले नेता रहे हैं.

साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, जिस से ओबीसी को
27 फीसदी रिजर्वेशन का रास्ता साफ हुआ था. नीतीश कुमार सामाजिक न्याय की इस विचारधारा का हिस्सा थे और बिहार में ओबीसी रिजर्वेशन के सब से बड़े समर्थक थे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने कुर्मीकोइरी वोट बैंक को ध्यान में रख कर जौर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई. साल 1996 में समता पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया. भाजपा से नीतीश कुमार का यह शुरुआती गठबंधन सिर्फ राजनीतिक हितों के लिए था. नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया था. साल 1998 से साल 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार रेल, भूतल परिवहन और कृषि मंत्री रहे. इस दौर तक सांप्रदायिक ताकतों के साथ राजनीतिक गठबंधन के बावजूद नीतीश कुमार की इमेज सैकुलर और समाजवादी नेता की ही रही.

साल 2005 में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के लिए 50 फीसदी पंचायती राज आरक्षण लागू किया. अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग श्रेणी ईबीसी बनाई और इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं. ईबीसी को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया. साल 2023 में जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे, तब उन्होंने बिहार में पहली बार जाति पर आधारित सर्वे कराया. यह जातिगत सर्वे ओबीसी और ईबीसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ. नीतीश कुमार का यह कदम मंडल राजनीति का विस्तार ही था. कभी सैकुलरिज्म के प्रणेता थे नीतीश कुमार  आज भाजपा की गोद में बैठे हैं, लेकिन एक समय था जब वे सैकुलरिज्म को अपना मूल सिद्धांत मानते थे और अपने इस सिद्धांत के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. साल 2013 का उदाहरण सामने है, जब भाजपा ने गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन एक झटके में तोड़ दिया था और इसे सिद्धांतों की लड़ाई बताया था.

भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद जद (यू) के राष्ट्रीय परिषद में दिए अपने भाषण में नीतीश कुमार ने साफ कहा था, ‘‘हम सैकुलरिज्म पर समझौता नहीं कर सकते. भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, जाति, भाषा और कल्चर के लोग साथ रहते हैं. ऐसे देश का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है, जिस के पास सैकुलर क्रेडेंशियल्स हों, समावेशी नजरिया हो और जो समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चल सके.’’
बिहार विधानसभा में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मोदी की राजनीति संविधान के मूल्यों पर हमला है. देश का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सैकुलर होना चाहिए और उसे समावेशी विकास की दृष्टि रखनी चाहिए. यह देश संविधान के तहत बना है. ‘‘सवाल यह है कि संवैधानिक दृष्टि जीतेगी या हम यह देश विभाजन और धु्रवीकरण की विचारधारा को समर्पण कर देंगे? मैं वादा करता हूं हम विभाजन की राजनीति के हाथों इस देश को बरबाद नहीं करने देंगे.’’

सैकुलरिज्म के प्रति इस ईमानदार वक्तव्य के बाद कांग्रेस के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार को ‘सैकुलर लीडर’ करार दिया था, जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें धन्यवाद भी दिया था. यह नीतीश कुमार को सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में स्थापित करने वाला दौर था. भाजपा के साथ 17 साल की रिलेशनशिप से साल 2013 के ब्रेकअप के बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ ‘महागठबंधन’ बनाया. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ सैकुलर ताकतों का प्रतीक बना. नीतीश कुमार ने तब इस सैकुलर मोरचे को ‘संविधान बचाओ’ की लड़ाई बताया. इस चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान उन्होंने भाजपा को ‘बड़ा झूठा पार्टी’ जैसे शब्दों से नवाजा और कहा कि उन का सैकुलरिज्म सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए है. नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें समाजवादी आंदोलन से जुड़ी हैं.

उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की परंपरा को कायम रखा. साल 2017 में जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद छोड़ कर फिर भाजपा से हाथ मिलाया, तब बिहार विधानसभा में उन्होंने कहा था, ‘‘सैकुलरिज्म एक महान विचार है. यह सिर्फ भ्रष्टाचार छिपाने का शब्द नहीं है.’’ राजनीति में सत्ता की मजबूरी अलग बात है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नीतीश कुमार का वह चेहरा हमेशा दर्ज रहेगा, जब वे सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में खड़े थे. आज सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद नीतीश कुमार के पुराने भाषण और फैसले याद दिलाते हैं कि राजनीति में सिद्धांत कभीकभी सत्ता से पहले आते हैं. बिहार की जनता नीतीश कुमार को आसानी से भुला नहीं पाएगी. नीतीश कुमार के पाला पलटने में पिछड़ी जातियों में धर्मकर्म की बढ़ती पैठ भी है. पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा सोचता है कि वह भी पूजा कर के ही ऊंची जातियों जैसी ऐश कर सकता है. ऐसी ही सोच अमेरिका तक में है, जहां ईसाई कट्टर गुलामी को चर्चों के दरवाजों से लाने की कोशिश में हैं.

सिद्धांत बनाम सत्ता की जंग नीतीश कुमार की यात्रा समाजवादी विचारधारा से शुरू हुई और सांप्रदायिक सत्ता की गोद में खत्म होने के कगार पर है. नीतीश कुमार का यह राजनीतिक सफर मंडल से शुरू हो कर कमंडल पर खत्म होता नजर आ रहा है. बिहार में अब भाजपा की दक्षिणपंथी राजनीति हावी हो रही है जहां सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म का नैरेटिव कमजोर पड़ गया है. बिहार की राजनीति में साल 2020 से ही भाजपा का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ. साल 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जद (यू) से ज्यादा सीटें जीतीं. जद (यू) 43 सीटों पर जीती थी, तो भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना भाजपा की मजबूरी थी. बिहार में भाजपा के पास अपना कोई नेता नहीं था. उस ने धीरेधीरे नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक पर कब्जा करना शुरू किया और साल 2026 आतेआते भाजपा ने नीतीश को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया.

2025 के विधानसभा चुनाव में राजग जीता और भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन गई, फिर भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया, लेकिन यह सिर्फ ट्रांजिशन पीरियड था. असली खेल तो अब शुरू होने वाला था. नीतीश कुमार ने 5 मार्च, 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया. यह फैसला अचानक आया और जद (यू) के कई कार्यकर्ताओं ने इस का विरोध भी किया. इस से बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया. समाजवादी पार्टी ने पोस्टर जारी किया, जिस में लिखा था कि ‘पहले इस्तेमाल करो, फिर बरबाद करो’. राजद के तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा नीतीश और जद (यू) को खत्म करने की साजिश रच रही है. भाजपा ने नीतीश कुमार की उम्र और सेहत की दुबली कंडीशन का फायदा उठाया. भाजपा हिंदुत्व कार्ड खेल कर ईबीसी और दलित वोट बैंक को काफी हद तक हड़पने में कामयाब रही. भाजपा ने नीतीश कुमार को धीरेधीरे कमजोर किया. वैसे यह भाजपा की पुरानी रणनीति का हिस्सा है. सहयोगी को जरूरत तक इस्तेमाल करो और खुद को मजबूत बनाओ.

अब बिहार में भाजपा की राजनीति शुरू हो चुकी है और जद (यू) का भविष्य संकट में है. बिहार में अब स्कूलकालेजों की जगह मंदिरों की मरम्मत की जा रही है. नीतीश कुमार खुद सीतामढ़ी में जानकी मंदिर बनवा रहे हैं. सामाजिक न्याय की लड़ाई क्यों जरूरी सदियों पुरानी जाति पर आधारित गैरबराबरी को चुनौती देने के लिए ही सामाजिक न्याय की लड़ाई शुरू हुई थी. यह ओबीसी की जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने का मिशन था. सामाजिक न्याय का मतलब केवल आरक्षण या वोट बैंक की राजनीति नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, बराबरी, आजादी और भाईचारे को साकार करने की कोशिश है. ओबीसी वह वर्ग है जो वर्णव्यस्था में शूद्र माना गया और सदियों तक सामाजिक तौर पर अनदेखा और मजदूर बना रहा. यही वजह है कि ओबीसी की आबादी सब से ज्यादा होने के बावजूद संसाधनों में भागीदारी सब से कम रही. इसी भागीदारी को बढ़ाने के लिए ओबीसी के कई नेता उभरे. इन्हीं नेताओं की बदौलत बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत हुई.

कर्पूरी ठाकुर और बाबू जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की सोच को जमीन पर उतारा और नीतीश कुमार ने इस मिशन को आगे बढ़ाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में गैरबराबरी को खत्म कर दिया था. संविधान का आर्टिकल 15 और 16 कहता है कि राज्य नागरिकों के बीच जाति, धर्म या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा, लेकिन संविधान लागू होने के दशकों बाद तक सामाजिक लैवल पर यह बराबरी कायम नहीं हो पाई. शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आज भी ऊंची जातियों का दबदबा बरकरार है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी हाशिए पर है. यही वजह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई जरूरी हो जाती है. ओबीसी जातियों की पहचान और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए साल 1979 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग बना था. मंडल आयोग ने साल 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में ओबीसी को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर 27 फीसदी रिजर्वेशन की सिफारिश की गई थी. साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल की शिफारिश को लागू किया जिस से देशव्यापी आंदोलन हुए.

ऊंची जाति को ओबीसी के लिए 27 फीसदी रिजर्वेशन मंजूर नहीं था. पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुए, लेकिन ऊंची जातियों के विरोध के बावजूद ओबीसी रिजर्वेशन लागू हुआ और यहीं से भारत की राजनीति पूरी तरह बदल गई. मंडल से भी पहले 70 के दशक में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में 26 फीसदी ओबीसी रिजर्वेशन लागू किया था. 1990 के बाद लालू प्रसाद यादव ने ‘माय’ यानी मुसलिमयादव गठबंधन से सामाजिक न्याय को सत्ता में उतारा. नीतीश कुमार ने ईबीसी और महादलितों को जोड़कर सामाजिक न्याय की राजनीति को विस्तार दिया. साल 2023 के बिहार जाति सर्वे ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को नया डाटा दिया. इस सर्वे मे ईबीसी 36 फीसदी, ओबीसी 27 फीसदी, एससी 19 फीसदी, एसटी एक फीसदी और सामान्य वर्ग तकरीबन 15 फीसदी थे. इस ऐतिहासिक सर्वे में सब से खास बात यह निकल कर आई कि तकरीबन 63 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है. इस से सामाजिक न्याय की अहमियत पता चलती है. सामाजिक न्याय सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जरूरत भी है.

भारत की सामाजिक सच्चाई यही है कि मंडल लागू होने के 33 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक समानता पूरी तरह हासिल नहीं हुई है. रिजर्वेशन की बदौलत पिछड़ा समाज मुख्यधारा की ओर बढ़ा, लेकिन इस बीच सरकारी नौकरियां सिमटती चली गईं. निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन नहीं होने का खमियाजा पिछड़े ही भुगत रहे हैं. सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक विकास अधूरा रह जाता है. बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी और बेरोजगारी सब से ज्यादा है, पिछड़ों का मजबूत होना ही प्रगति का आधार है, इसलिए सामाजिक न्याय की लड़ाई बिहार की उन्नति के लिए जरूरी है. पिछड़ा वर्ग तरक्की करेगा तब ही बिहार में सदियों से फैली गरीबी दूर होगी. क्या सामाजिक न्याय हिंदुत्व की भेंट चढ़ा साल 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजे राजद और महागठबंधन की राजनीति का जैसे अंत साबित हुए हैं. सामाजिक न्याय और दलित चेतना की राजनीति हिंदुत्ववादी राजनीति की भेंट चढ़ गई. यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे राजनीतिक गठबंधनों, प्रोपेगेंडा और नए राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है.

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के राजद ने मंडल कमीशन के जरीए ओबीसी को सत्ता में ला कर ‘सामाजिक न्याय’ की लहर चलाई, जिस से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और राजनीति में जगह मिली. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के काल को ‘जंगलराज’ की श्रेणी में रखा गया. उच्च जातीय मीडिया का नैरेटिव कामयाब हुआ और साल 2005 में नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन बना कर मुख्यमंत्री बन गए. भाजपा के समर्थन वाली इस सरकार को सुशासन का नाम दिया गया, हालांकि नीतीश कुमार ने ईसीबी, महादलित और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक न्याय को ही मजबूती दी और साल 2023 में जाति जनगणना कर आरक्षण का दायरा बढ़ाया. यह हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ था, फिर भी उन्होंने ऐसा जोखिम भरा कदम उठाया और इसीलिए नीतीश कुमार को साइडलाइन किया जाना भाजपा के लिए बेहद जरूरी हो गया. साल 2025 चुनाव में राजद का ‘सामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्व’ का नारा फेल हो गया और राजग ने जीत हासिल की. चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम पर हर महिला को 10,000 रुपए दिए गए, जिस से पूरा खेल पलट गया. इस चुनाव में महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से ज्यादा रहा और महिला वोटों की इस बढ़ोतरी का पूरा फायदा सीधे राजग के पक्ष में गया.

चुनाव आयोग ने भी भाजपा के एजेंट की भूमिका बड़ी ईमानदारी और कर्मठता से निभाई. एसआईआर के नाम पर तकरीबन 30 लाख वोटों का सत्यानाश हुआ, जिस का फायदा भाजपा को मिला. लालच और साजिश ने सामाजिक न्याय के नारे को पीछे धकेल दिया. जद (यू) ने कुर्मी और कोइरी यानी ईबीसी को थामे रखा तो भाजपा ने ऊपरी जातियों और गैरयादव ओबीसी के साथ शहरी वोटों पर पकड़ बनाए रखी. हालांकि बिहार में भाजपा हिंदुत्व का कार्ड खेलने से परहेज करती रही. राम मंदिर के बजाय डबल इंजन के नैरेटिव पर फोकस रखा. बूथ लैवल मैनेजमैंट को मजबूत रखा और भाजपा के संगठन ने जमीनी लैवल पर काम किया. जिस पिछड़ी जाति के लोगों ने दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, चेन्नई, पंजाब में ही नहीं, बल्कि खाड़ी के देशों में भी चकाचौंध चमक लाने में हड्डी गलाई, वह अपनी जमीन बिहार में लालू और नीतीश की वजह से फिर औंधे मुंह गिर रही है. तेजस्वी यादव का ‘माय’ यानी मुसलिमयादव बेस तो मजबूत रहा, लेकिन वे ईबीसी, महिलाओं और नई पीढ़ी को नहीं जोड़ पाए.

परिवारवाद, पुराना रिकौर्ड और ‘केवल विरोध’ की राजनीति की वजह से भी तेजस्वी यादव बुरी तरह हारे. साल 2020 में राजद सब से बड़ी पार्टी थी, लेकिन साल 2025 में तीसरे नंबर पर सिमट गई.
बिहार में जाति हिंदुत्व पर भारी है, लेकिन अब सामाजिक न्याय की मांग ओबीसी के दिमाग से छिटक कर दूर चली गई है. भाजपा का पूजापाठी नैरेटिव सोशल मीडिया के जरीए नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है. गोदी मीडिया के शोर में प्रोपेगेंडा हावी है. नीतीश फैक्टर और मजबूत मंडल राजनीति के चलते ही बिहार में भाजपा का हिंदुत्व उस के जीते गए दूसरे राज्यों जितना कामयाब नहीं है. राजग की जीत में हिंदुत्व से ज्यादा दूसरे फैक्टर कारगर साबित हुए, लेकिन लंबे समय में भाजपा का दबदबा बढ़ने से सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई है. हिंदुत्व ने जाति को धार्मिक एकता से ओवरराइड कर दिया है. गठबंधन के पीछे
भाजपा का असली खेल साल 2014 से भाजपा ने बिहार में संघ के जरीए गांवदेहात के लैवल पर ऊंची जातियों और ओबीसी के खातेपीते घरों के कार्यकर्ताओं को मजबूत किया, जबकि जद (यू) नीतीश की व्यक्तिगत इमेज पर निर्भर रही.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में राजग की जीत के बाद भाजपा ने जद (यू) के विधायकों पर दबाव बढ़ाया. भाजपा ने जद (यू) के कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, जिस से जद (यू) का वोट बैंक सिकुड़ गया. साल 2010 में भाजपा को सिर्फ 10 फीसदी वोट शेयर मिला था, वहीं साल 2025 में 20 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया. भाजपा की रणनीति हर राज्य में अलगअलग है, लेकिन हर जगह सिद्धांत एक ही है, सहयोगियों को कमजोर करना. साल 2019 में भाजपा ने ‘आपरेशन कमल’ के जरीए जेडीएस के 17 विधायकों को तोड़ लिया. साल 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा ने 28 विधायकों को तोड़ा. सहयोगियों को निगलने की साजिश ही भाजपा की कामयाबी का राज है. इस साजिश में भाजपा हर बार कामयाब रहती है. भाजपा की इस साजिश के पीछे संघ बड़ी भूमिका अदा करता है.

इस मामले में संघ के कार्यकर्ता ईमानदारी से काम करते हैं. महाराष्ट्र में शिव सेना और राकांपा को तोड़ कर तबाह कर दिया. भाजपा की यह रणनीति भारतीय लोकतंत्र को खाई की ओर ले जा रही है. वैसे भी भाजपा का फोकस सत्ता पर कब्जा करना है न कि साझेदारी निभाने पर. विपक्ष को मजबूत गठबंधन बनाने होंगे वरना भाजपा रूपी इस अजगर का लोकतंत्र को निगलना जारी रहेगा. भाजपा के चलते बिहार की उपजाऊ जमीन पर गरीबी की कीकर उगती रहेगी  और नालंदा वाला बिहार देश का सब से गरीब राज्य बना रहेगा. नीतीश कुमार की वजह से बिहारी शब्द गाली बन जाएगा, ऐसे जने के लिए जो पलटूराम हो और जिसे राज्य और जनता की फिक्र न हो. सामाजिक न्याय की लड़ाई अंबेडकर से मंडल तक की कवायद थी.

नीतीश कुमार ने इस लड़ाई को मूर्त रूप देने की कोशिश जरूर की, लेकिन आखिरकार वे संघ के चंगुल में फंस कर फेल हो गए. अपने राजनीतिक सपनों के चलते नीतीश कुमार ने बिहार को ऐसे मझधार में ला कर छोड़ दिया है, जहां एक ओर सामाजिक न्याय पिचका हुआ है, तो दूसरी ओर हिंदुत्व की तिलकधारी सोच है जो बराबरी के मिशन को पूरा निगल चुकी है. बिहार में भाजपा की लगातार बढ़ती हुई ताकत बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जरूर है, लेकिन यह अंत नहीं है. असली चुनौती अब सामाजिक न्याय की जरूरत की पहचान की है. यह भी सच है कि जब तक धर्म और जाति पर आधारित गैरबराबरी रहेगी, तब तक सामाजिक न्याय की यह लड़ाई जारी रहेगी, क्योंकि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सब से कमजोर को भी बराबरी का हक न मिले.            

शकील प्रेम

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें