VIP Culture : हवा होते सपने

VIP Culture. सपना एयरपोर्ट के मेन गेट पर खड़ीखड़ी थक गई थी. यहां तो उस ने सुना था कि सभी काम समय पर होते हैं, मगर वह जिन नेता के इंतजार में खड़ी की गई थी, उन का कहीं अतापता नहीं था.

कोई बलदेव भाई किसी मशीन की तरह अलर्ट मोड में खड़े थे जैसे. कहीं कोई कमी न रह जाए, इस बात का बलदेव को खास खयाल था. उन्हीं ने करुणा चाची को फोन किया था कि तकरीबन आधा घंटे में एक सजीधजी लड़की चाहिए.

यह सुन कर करुणा चाची सपना के पास सुबहसुबह ही आ धमकी थीं. वे बोली थीं, ‘‘थोड़ी देर की तो बात है. बस जो मेहमान हैं, उन पर फूल की पंखुडि़यां बिखेरनी हैं, टीका लगाना है, आरती उतारनी और और माला पहनानी है. इसी के 2,000 रुपए मिल रहे हैं, तो क्या बुरा है. बस, शर्त यही है कि तुझे आधा घंटे में ही तैयार हो कर निकल लेना है.’’

‘‘ठीक है, मैं आज कालेज नहीं जाऊंगी…’’ सपना थोड़ा कशमकश में थी, ‘‘लेकिन किसी के स्वागत के लिए मैं ऐसे ही कैसे चली जाऊं? माना कि मुझे वहां जा कर कुछ खास नहीं करना है. लेकिन ऐसे हर काम के पहले मुझे ब्यूटीपार्लर जाना होता है. किसी के स्वागत में लोग मुझसे से क्या उम्मीद रखते हैं, उस का तो मुझे खयाल रखना ही होगा न?’’

‘‘उन के पास समय नहीं है. वे बड़े लोग हैं. उन्हें मना नहीं करना चाहिए…’’ करुणा चाची गिड़गिड़ाईं, ‘‘तुम वैसे ही बहुत खूबसूरत हो. कुछ भी पहन लोगी, तो खूबसूरत ही लगोगी. वैसे, तुम्हारे पास जो गुलाबी रंग का घाघराचोली है, वह पहन लेना और कुछ मेकअप कर लेना. इमिटेशन वाले आभूषण तो तुम्हारे पास ढेर सारे हैं ही. कुछ ढंग का पहन लेना.

‘‘राधिका भी तो साथ जा ही रही है.  जाओ, जल्दी तैयार हो जाओ. गाड़ी आती ही होगी. मैं ने तुम्हारी तरफ से हां कर दिया है.’’ अब आधा घंटे में कोई कैसे तैयार हो सकता है. वह तो गनीमत है कि सपना कालेज जाने के लिए नहा चुकी थी. कोई बात नहीं, वह तैयार हो लेगी. घर बैठे काम मिले, तो दिक्कत क्या है. उस के लिए तो यह अच्छा ही है.

जल्दीजल्दी तैयार हो कर सपना चौराहे के पास गाड़ी का इंतजार कर ही रही थी कि थोड़ी देर में ही गाड़ी भी आ गई थी.

सपना को एक तरह से खुशी ही हुई. आमतौर पर शादीब्याह, रिसैप्शन वगैरह में वह यही काम करती थी. किसी सजीधजी गुडि़या की तरह मेन गेट पर खड़ी रहो और लोगों पर फूल की पंखुडि़यां छितरा कर उन्हें टीका लगाओ. इसी काम के उसे 1,000 रुपए मिल जाते थे, तो उसे लगता था कि यह बहुत बड़ी नेमत है.

पड़ोस की करुणा चाची ने सपना को पहलेपहल यह काम दिलवाया था कि तू तो बड़ी खूबसूरत है और पार्टियों में तो ऐसे ही चेहरों की डिमांड रहती है. करना क्या है, बस सजधज कर खड़ी रहना है. मेहमानों को जरा मुसकरा कर देखना है, ताकि वे खुश हो जाएं. इन पार्टियों या रिसैप्शन में चायनाश्ता और रात का राजसी भोजन अलग से मिलता है. क्या पता, कोई खुश हो कर टिप भी दे दे.

करुणा चाची शहर की जानीमानी समाज सेविकाओं में गिनी जाती थीं. तकरीबन रोज ही उन का कहीं न कहीं आनाजाना लगा रहता था. अब तो वे राजनीतिक सभाओं और सम्मेलनों में भी जाती थीं. उन का शाही खर्च ऐसे ही नहीं चलता.

करुणा चाची के कहने पर सपना महंगी चीजें खरीदती थी. पहले तो वह किराए के कपड़ों से काम चलाती थी, मगर इधर उस ने कुछ अच्छे कपड़े खरीद भी लिए थे. बहुत मन था कि उस के पास अपना बढि़या घाघराचोली हो. कुछ संयोग ऐसा लगा कि उसे पिछले सीजन में लगातार काम मिले, तो उस की

अच्छी कमाई हो गई. तब उस ने पूरे 10,000 रुपए में गुलाबी रंग का सलमेसितारों से टंका घाघराचोली खरीद लिया था. अच्छे कपड़े रहने से एक फायदा यह तो है ही कि डिमांड बढ़ जाती है. फिर उस के किराए के पैसे बच जाते थे. दूसरे लौटाने की हड़बड़ी नहीं रहती. न यह डर कि कहीं फट जाए, तो दुगनाचौगुना जुर्माना भरो.

आमतौर पर इस काम में ब्यूटीपार्लर का भी खर्च शामिल रहता है. यह अलग बात है कि सपना पार्टियों से ब्यूटीपार्लर के खर्च का चार्ज अलग से लेती है.

अब वह इस पर खर्च क्यों करे. उसे सजनाधजना आता है. कुछ ब्यूटीपार्लर के टिप्स उस ने देखसुन कर सीख भी लिए हैं. सो, अपनी अलमारी में वह कुछ लिपस्टिक, पाउडर, स्नो, क्रीम वगैरह रखती भी है. ये सब इतने महंगे भी हैं कि उन के दाम सुन कर कलेजा मुंह को आता है. मगर अब जरूरी है, तो है. खरीदना तो पड़ेगा ही.

इमिटेशन के आभूषणों के अनेक सैट सपना के पास हैं. जब वह तैयार हो कर निकलती है, तो कितना कुछ सुनना भी तो पड़ता है उसे. मगर अब उस ने इसे नजरअंदाज करना सीख लिया है. इस में गलत क्या है. वह खूबसूरत है तो है. वह इस के बदले कीमत वसूल करती है, तो क्या बुरा है.

करुणा चाची ने बताया था कि आज के मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए कोई नेता दिल्ली से आने वाले हैं, जिन के स्वागत के लिए उसे एयरपोर्ट जाना होगा, तो वह खुश हो गई थी. उन नेता का नाम क्या है, वे कहां के रहने वाले हैं, इस से उसे कोई मतलब नहीं. करोड़ों में खेलने वाले इन नेताओं का नामपता जान कर करना भी क्या है.

दरअसल, उन नेता को अंदाजा नहीं था कि उन्हें मंत्रिमंडल में लिया जाएगा, इसलिए अपनी रिश्तेदार की शादी में शामिल होने के लिए वे दिल्ली चले गए थे. एक दिन पहले ही पार्टी हाईकमान से खबर मिली कि उन्हें मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होना है, तो वे भागेभागे चले आए थे हवाईजहाज से. उन के समर्थकों की तो पौबारह हो गई. जब उन का आदमी मंत्री बनेगा, तभी तो उन को मलाई और मिठाई रूपी ठेका और सप्लाई का काम मिलेगा.

आननफानन में नेता के स्वागत की तैयारी होने लगी थी और यह एयरपोर्ट से ही शुरू होना था. उस कालेकलूटे, गोभी के पकौड़े जैसे बड़े नाक, थुलथुल काया वाले नेता का स्वागत एयरपोर्ट पर कोई सुंदरी करे, तो दिन बेहतर होगा और इसी के लिए सपना का नाम आया था.

फट से करुणा चाची का संदेश सपना के पास गया था और वह तैयार हो कर लगभग भागते हुए गाड़ी से 8 बजे सुबह ही यहां आ पहुंची थी. अब वह यहां चाय मांगे, तो किस से? चाय पीने के चक्कर में लिपस्टिक बिगड़ भी तो सकती है.

आज तक सपना एयरपोर्ट नहीं आई थी. उस का भी बहुत मन करता था कि वह देखे कि हवाईजहाज कैसे उड़ता है और जमीन पर कैसे उतरता है. इसी बहाने आज उस की सालों की साध भी पूरी हो जाएगी.

एयरपोर्ट को देख कर तो सपना एकदम से दंग रह गई. राधिका भी इसी काम के लिए उसी के साथ आई थी. दरअसल, पहले तो एक लड़की ही को बुलाया गया था, मगर दल के नेता ने फरमान जारी किया कि 2 लड़कियां सम्मान करेंगी, तो ज्यादा अच्छा होगा, इसलिए आननफानन सपना को भी बुला लिया गया था.

लड़की को तैयार होने में देर तो लगेगी ही. तब और, जब किसी के स्वागत के लिए सजनासंवरना हो. और यहां एयरपोर्ट पर इतनी साफसफाई और सजावट. लकदक करती कुरसियां और सोफा सैट. ऊंची छतों पर लगे भव्य ?ाड़फानूस और दीवारों पर टंगी खूबसूरत बड़ीबड़ी पेंटिंग्स.

सुबह होने के बावजूद वहां भीड़ थी. हो भी क्यों नहीं. नई सरकार बनने की खुशी में या हड़बड़ी में वीआईपी लोगों का आनाजाना जारी था. चार्टर्ड हवाईजहाजों के बीच पब्लिक हवाईजहाज से उतरने वाले शायद वे आखिरी नेता थे.

10 बजे हवाईजहाज को उतरना था. मगर वीआईपी को लाने वाली फ्लाइट को प्राथमिकता दी जा रही थी. ऐसे में पब्लिक फ्लाइट हवा में ही मंडराती रही. उन नेता का हवाईजहाज कभी बनारस, तो कभी गया की ओर हवा में ही चक्कर काटता रहा.

साढ़े 11 बजे हवाईजहाज उतरा, तो वे नेता बेहद हड़बड़ी में थे. एयरपोर्ट के मेन गेट पर सपना से उन्होंने जल्दीजल्दी टीका लगवाया, माला पहनी. राधिका ने उन की जल्दीजल्दी आरती उतारी. नेताजी ने उतनी ही तेजी से माला उतारी और उसे नोंच कर किनारे फेंक कर बाहर की ओर भागे.

सुबह के 11 बजे से कार्यक्रम शुरू होना था और अभी यहीं साढ़े 11 बज रहे थे. मुख्यमंत्री से भी लेट पहुंचेंगे क्या वे नेता राजभवन? इस तुनकमिजाज मुख्यमंत्री का कोई भरोसा नहीं. कहीं देरी का बहाना कर मंत्रिमंडल में शामिल करने से इनकार कर दे, तो कोई क्या कर लेगा.

इन लोगों ने आज भारी अफरातफरी मचाई पटना एयरपोर्ट पर. नीचे उतरने ही नहीं दिया पब्लिक फ्लाइट को, इसलिए तो देर हो गई न. मुसाफिरों को लिए हवाईजहाज डेढ़ घंटे चक्कर काटता रहा हवा में, आसमान में. कभी मुजफ्फरपुर के आसमान में, तो कभी गया या बक्सर के आसपास.

भारी अफरातफरी के बीच मेन हाईवे को भी रोक दिया गया था. यह कोई बात नहीं. मगर किसी को आसमान में भी यों रोका जाता है क्या. गाड़ी में बैठ कर छूमंतर होते ही उन के समर्थकों की भीड़ भी दूसरी गाडि़यों में बैठ कर छूमंतर हो गई थी.

सपना और राधिका को पता नहीं था कि जिन नेता की उन्होंने आरती उतारी है, चंदन का टीका लगाया है, गुलाब की पंखुडि़यां उन पर निछावर की हैं, उन का नाम क्या है. एक खतरनाक से दिखने वाले आदमी ने सपना को बताया था कि यही हैं नेताजी. इन्हें टीका लगाओ, माला पहनाओ.

सपना और राधिका ने वह कर दिया था. ताबड़तोड़ तसवीरें भी ली गई थीं. पर हड़बड़ी में उन्होंने घर से अपना पर्स भी नहीं लिया था, जिस से उन के हाथ खाली थे. अब घर वापसी के लिए शेयर आटोरिकशा के लिए भी तो कुछ पैसे चाहिए न.

अचानक उन दोनों को वह आदमी बलदेव दिखा. वह अपनी बुलेट में किक मार रहा था कि राधिका ने उसे जा पकड़ा और पैसे मांगे. ‘‘तुम्हारे पैसे बाद में मिल जाएंगे…’’ बलदेव बोला, ‘‘अभी जल्दी है. मुझे राजभवन जाना है. अभी मुझे जाने दो.’’

‘‘अरे, हमारा मेहनताना बाद में देना,’’ मुंहफट राधिका तुरंत बोली, ‘‘हमें इतनी जल्दी सुबहसुबह आप लोगों ने बुला लिया. हम अपना पर्स भी नहीं ले पाई हैं. सुबह से मुंह में एक दाना नहीं डाला, चाय का एक कप भी नहीं. पर कोई बात नहीं. लेकिन हमें घर जाने का किराया तो दे जाओ. हम 10 किलोमीटर दूर पैदल तो अपने घर नहीं जा सकती हैं न.’’

बलदेव ने तुरंत अपनी जेब को टटोला और 50 रुपए का एक नोट निकाल कर उन की ओर उछाल दिया. बुलेट की ‘फटफट’ आवाज के बीच वे दोनों एकदूसरे का मुंह देख रही थीं. इज्जत करने वालों की इसी तरह बेइज्जती होती है शायद.

पैसे वाले और पैसा बनाते जाएंगे और उन जैसे लोग इसी तरह चंद रुपयों के लिए रौंदे जाते रहेंगे. सामंतवाद और पूंजीवाद का यही बिगड़ा रूप है. काम खत्म होने के बाद भी मेहनताने की गारंटी नहीं. चाय का एक प्याला तक उन्हें इस एयरपोर्ट पर पीने को नहीं मिला. फिर भी उन्हें इस पूंजीवादी सामंतवाद की इसी तरह आरती उतारनी होगी, टीका लगाना होगा, फूलों की पंखुडि़यां निछावर करते हुए माला पहनाते समय मुसकराना होगा. बदले में वे देंगे नफरत भरा बरताव और वे मुंह से उफ तक नहीं कर पाएंगी. VIP Culture

Editorial : गहरी पैठ -जनता की रीढ़ की हड्डी की चाबी धर्म के झुनझुने में

Editorial . 5  राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के नतीजों से यह तो साफ हो गया है कि चुनावी जीत सेना की जीत की तरह होती है और सिर्फ बयानों और जुलूसों से नहीं पाई जा सकती. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने हर तरह की ताकत झोकी ,वह सही थी या नहीं, भाजपा की मन के पक्के होने की बात को जरूर दिखाती है.

ममता बनर्जी ने अपने बचाव में काफी जद्दोजेहद की जो दूसरी पार्टियां नहीं कर पातीं, अपना बड़ा चहेता कैडर खड़ा किया था जो जमीन पर हरदम वोटरों को कंट्रोल में रखता था पर भाजपा ने इस बार चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, केंद्र के चुने ऊंची जातियों के अफसरों, केंद्रीय पुलिस, केंद्रीय नीतियों के हमदर्द जजों का ऐसा जाल बिछाया कि ममता बनर्जी को हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर दिया.

भारतीय जनता पार्टी के साथ पूजापाठी जमात का एक हिस्सा सदा से ही लगा रहा है और अब उसे दिख रहा है कि पौराणिक राज लाने में ज्यादा देर नहीं है तो उस ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ने में भलाई सम?ा. वे तो सदियों से राज करते आए हैं, सड़कछाप लोगों के हाथों में जो सत्ता आई थी उसे ज्यादा दिन क्यों सहें, जबकि उन के पास अच्छे लड़ाई कर सकने की कला सीखे लोग और उन के खुद्दार नेता हों. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस दूसरी पार्टियों से ज्यादा कसी हुई थी पर फिर भी उस की लड़ने की सीमा होती है. हर कमजोर पक्ष कुछ समय तक अपनी गिनती पर टिक सकता है पर आखिर में उसे उन के हाथों हारना ही पड़ता है जो सही गोटियां बैठाने में आगे हों.

ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में और स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कषगम की तमिलनाडु में हार ने साफ कर दिया है कि राज सिर्फ जनता की चाह पर या जरूरत के हिसाब से नहीं चलता, राज तो उस का चलता है जिस ने एक बार सत्ता हासिल कर ली तो वह उसे संभाल कर, उस के हर पहलू का इस्तेमाल कर के राज करता है.

मुट्ठीभर मुगल, मुट्ठीभर गोरे करोड़ों भारतीयों पर राज इसीलिए कर पाए कि उन्होंने सम?ा लिया था कि इस देश की जनता की रीढ़ की हड्डी की चाबी तो धर्म के ?ान?ाने में है और उस ?ान?ाने को या तो खुद बजा लो या बजाने वाले को खरीद लो, बस करोड़ों पर राज किया जा सकता है, उन से मनचाहा टैक्स वसूला जा सकता है, उन्हें गरीब रख कर कुछ की अमीरीको पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए पक्का कर सकते हैं.

1947 के बाद आजादी और 1950 के संविधान के बराबरी के वोट के हक को आसानी से पहले कांग्रेस ने और अब भारतीय जनता पार्टी ने इस तरह मोड़ा है कि बेमतलब का रह गया है. पहले भीड़ नेताओं के घरों के आगे लगती थी, अब भाजपा के नेता भी कठपुतली बन कर रह गए हैं तो मूर्तियों के आगे लग रही है. भाजपा ने वोट मशीनरी पर कब्जा कर के साबित कर दिया है कि लोकतंत्र को भी मैनेज करना मुश्किल नहीं है क्योंकि आम जनता को अपनी तकलीफ नहीं दिखती, वह तो उस का भाग्य है उसे तो जयजयकार के नारे, चमत्कार, पूजाअर्चना चाहिए जो उस के नजदीक होते हैं.

इन विधानसभा चुनावों से एक बड़ा बदलाव आया है क्योंकि विरोधी दलों के 2 मजबूत पिलर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु अब ढह गए हैं. उन के ढह जाने के साथसाथ इन जगहों की पार्टियों के  कैडर भी ढह जाएंगे जो सत्ता की चापलूसी पर जिंदा थे. भाजपा का पूजापाठी कैडर सरकार से सीधा नहीं मांगता, वह सरकार से ऐसे माहौल की मांग करता है जिस में उस का धंधापानी फलताफूलता रहे. इस तरह का परमानैंट कैडर फिलहाल भाजपा के अलावा कोई और पार्टी नहीं दे सकती.Editorial

Editorial : गहरी पैठ- बिहार बीजेपपी को चढ़ावे की चिंता

Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.

बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.

इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.

बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.

आज मंदिरों की बाढ़ आ रही है जो तराई से आने वाली बाढ़ से भी ज्यादा खतरनाक है. सम्राट चौधरी इसे और बढ़ाएंगे. 20 साल नीतीश कुमार ने इस थोड़ाबहुत कंट्रोल किया था पर भाजपा ने हेरफेर कर के उन्हें धक्का दिया है और अब मंदिरों की बात होगी.

बिहार की आम जनता आज भी सीधी और बेवकूफ है. उसे सदियों से पढ़नेलिखने नहीं दिया गया. कांग्रेसी सरकारों ने गांवगांव में स्कूल खोले पर वहां ऊंची जातियों के पढ़ाने वाले घुस गए जिन्होंने साजिश के तहत दलितों, पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया.

जो थोड़ीबहुत चमक बिहार में दिखती है वह तकनीक की बदौलत है. बिजली पैदा करना आसान है तो हर सड़क पर बत्ती लग सकती है, हर घर में लाइट है. बाकी अंधेरा है. सब से नीचे के पायदान पर रहने वाला बिहार अपने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से पैसों के मामले में आधा है और यह फर्क बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं क्योंकि अब पूजापाठ, पुलिस अत्याचार, बुलडोजर का राज आ गया है जिस में मरेगा गरीब, नीची पिछड़ी जाति का जना जिस की न आवाज है, न सुनवाई.  Editorial

Social Story: गौसेवा के नाम पर हिंसा और चंदा वसूली

Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,

उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.

सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.

क्यों? धार्मिक पाखंड है जिम्मेदार दरअसल, गाय की इस हालत के लिए धार्मिक पाखंड सब से ज्यादा जिम्मेदार है. कपोल कल्पित कथा पुराणों में जब यह बताया गया है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवताओं को निवास है, तो फिर लोग गाय की पूजा करने के बजाय मंदिरों में भगवान को क्यों तलाशते फिर रहे हैं?
कपोल कल्पित कथाओं से बड़ेबड़े पंडालों में होने वाली धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि दान की गई इसी गाय की पूंछ पकड़ कर स्वर्ग के रास्ते में पड़ने वाली एक वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है.
इसी पाखंड की वजह से मध्य प्रदेश की एक महिला मुख्यमंत्री तो सड़क पर अपने काफिले को रोक कर गाय को रोटी खिलाती थीं. आखिर लोगों को यह बात में क्यों नहीं आती कि गाय को हरे चारे और भूसा की जरूरत रोटी से कहीं ज्यादा है? सच बात तो यह है कि गाय सिर्फ और सिर्फ एक पालतू पशु है. धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए गाय को दान करने का उपदेश देते हैं.

पापपुण्य का डर दिखा कर लोगों को बताया जाता है कि गौदान करने से आदमी सीधे स्वर्गलोक की टिकट पा? जाता है. सालभर में दान के नाम पर लाखों की संख्या में गायों को दान में दिया जाता है, मगर ये गायें पंडों के घरों में दिखाई नहीं देती हैं. जाहिर है कि दान में मिली गायों को पंडे व्यापारियों को बेच देते हैं या फिर दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देते हैं. हिंदुओ में गाय को तब तक माता माना जाता है तब तक वह दूध देती है. इस के बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता है. गाय को माता मानने वालों का दोहरा चरित्र यह भी है कि वे अपनी बूढ़ी और बेकार गोमाता को कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करते हैं.
गोभक्ति का एक पक्ष यह भी है कि गोमाता के मरने पर वे उस की लाश को नहीं उठाते हैं, यहां तक कि उसे छूते भी नहीं हैं. ऐसा करने पर उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसलिए उसे उठा कर ले जाने के लिए वे दलित बस्ती से उन लोगों को बुला कर लाते हैं, जो मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करते हैं. यह भारत की अकेली पाखंडी कौम है, जो अपनी गोमाता को सड़़कों पर भूखा मरने के लिए छोड़़ देती है और मरने पर अपनी मां को कंधा भी नहीं देती है.

सरकारी
कोशिशें दिखावे तक सीमित सरकार गौवंश की रक्षा की बात तो करती है, पर गाय को सड़क से हटाने के लिए कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं कर पाई है. मध्य प्रदेश में गायें सड़कों पर मारीमारी फिर रही हैं और सरकार विदेशों से चीता ला कर उन पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है. मध्य प्रदेश की भगवा सरकार धर्म की दुहाई दे कर गाय को माता तो मानती है, मगर आवारा घूमती गाय की बेचारगी उसे दिखाई नहीं देती. आज मध्य प्रदेश के गांवकसबों और शहरों में सड़क पर आवारा घूमती गाय सरकार के नुमाइंदों को दिखाई नहीं दे रही है. गाय और गौमांस की तस्करी की खबर पर मौब लिंचिंग पर उतारू बजरंग दल के लोगों को सड़क पर भूखीप्यासी गाय दिखाई नहीं देती. दक्षिण अफ्रीका के नामीबिया से कूनोपालपुर नैशनल पार्क में चीते लाए गए हैं, जिन के भोजन के सैकड़ों की तादाद में चीतल सहित दूसरे जंगली जानवरों को हलाल किया जा रहा है.

यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है कि यह किस तरह का पर्यावरण संरक्षण है, जिस में सैकड़ों की तादाद में जंगली जानवरों की बलि दे कर केवल चीते का संरक्षण किया जा रहा है? मौजूदा दौर में खेती में मशीनीकरण से गौवंश के बैल बेकार होने चाहिए थे, लेकिन दूध देने वाली गाय क्यों बेकार हुई? इस सवाल का जवाब किसी के पास है, ही कोई खोजना चाहता है. आज तो छोटे शहर से ले कर दिल्ली तक सरकार की हर लेयर पर कथित गौरक्षा समर्थित दल हैं, तब क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय गौनीति लाई जाती?
गौहत्या की चिंता करने वालों को यह चिंता भी करनी होगी कि गाय सड़कों पर अपमानित और मरने के
लिए नहीं आवारा फिरें, बल्कि घरों में जगह पाए. आज भी गांवदेहात में कई परिवारों की आजीविका का स्रोत गाय का दूध और उस से बने उत्पाद दहीमक्खन और घी हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं, पर वर्तमान में गाय की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. जनवरी, 2022 के आखिरी दिनों में भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक महिला भाजपाई नेता की गौशाला में 100 से ज्यादा गायों की मौत हो गई थी.

इस गौशाला में 500 गायें हैं. उस समय गौशाला के नजदीक बने कुएं में 20 गायों के शव और मैदान में 80 से ज्यादा गायों के शव और कंकाल पड़े मिले थे. उस के बाद उन भाजपाई नेता पर पुलिस ने केस दर्ज किया था और प्रशासन ने गौशाला का संचालन अपने हाथ में ले लिया था.
आज भी प्रदेश में खोली गई ज्यादातर गौशालाओं का संचालन राजनीतिक रसूख वाले लोग ही कर रहे हैं. गौशालाओं में हट्टीकट्टी गायें ही रखी जाती हैं, जिन का घी दूध पी कर गौमाता की सेवा करने का ढोंग करते हैं और लाचार, बीमार गायें सड़कों पर आवारा घूमती हैं, उस की फिक्र इन को कभी नहीं रहती.
सरकार को चुनावी फायदे की बात छोड़ कर गाय की लाचारगी की चिंता है तो किसानों को गाय पालने की अनिवार्यता का नियम लागू करना चाहिए. जो किसान गाय का पालन करे, उसे ही सरकारी सब्सिडी और दूसरे फायदे मिल सकें.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना कर उस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया जाता है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले के साहित्यकार, संपादक वरुण सखाजी चर्चा के दौरान बताते हैं कि गौहत्या का विरोध कर के उन्माद में कर मरनेमारने पर उतारू लोग भीड़तंत्र का हिस्सा तो बन जाते हैं, पर गायों की आवारगी पर बात नहीं करना चाहते. वे इसे एक तरह की छद्म धार्मिकता और जाहिलपन ही मानते हैं. वे तल्ख अंदाज में कहते हैं, ‘‘हम अपने बब्बा (पिता के पिता) को कोई गाली दे तो गाली देने वाले को मार डालेंगे, लेकिन अपने घर में उसे खुद चाहे दोनों टाइम पीटें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यह दोहरापन ठीक नहीं है.’’फसलों को चट कर रहे आवारा पशु  एक दौर था जब पशुपालन किसानों के लिए आमदनी का जरीया हुआ करता था. लोग गायभैंस, बकरी पाल कर इन के दूध, घी, मक्खन को बेच कर घरपरिवार की जरूरतों को पूरा करते थे.

बैल खेती किसानी के कामों में हलबखर चलाते थे. बैलगाड़ी में किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जाता था. नई तकनीक आने से अब खेती में कृषि उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है. इस के चलते पशुपालन में अब किसानों की दिलचस्पी कम हो गई है. अब लोग पालतू पशुओं को दूध देने तक घर में रखते हैं, पर बाद में उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं. आजकल गांवकसबों में आवारा पशुओं के चलते फसलों की हिफाजत करना एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है. साल 2023 में देश के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिस के मुताबिक 20वीं पशुधन गणना से पता चलता है कि देश में 50.21 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं. इन में राजस्थान में सब से ज्यादा 12.72 लाख और उत्तर प्रदेश में 11.84 लाख मवेशी सड़कों पर आवारा घूमते हैं. देशभर में आवारा पशुओं को पालने की सालाना लागत 11,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. मवेशियों की हत्या पर बैन और गौरक्षकों के डर से आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है और उत्तर प्रदेश में दूध देने वाले पशुओं को पालना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लौकडाउन के पहले दतिया के रेलवे स्टेशन पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता था. ये आवारा गायबैल मुसाफिरों के खानेपीने की चीजों पर पट पड़ते थे. कई बार इन आवारा जानवरों के अचानक रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाने से बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों को चोट भी लग जाती थी. होशंगाबाद जिले के पचुआ गांव में साल 2018 में चरनोई जमीन पर गांव के कुछ रसूख वाले किसानों ने कब्जा कर लिया था, जिस के चलते गांव के आवारा पशु किसानों के खेत में घुस कर फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे थे. इस बात को ले कर 2 पक्षों में हो गया था, जिस में एक आदमी की मौत हो गई थी. दूसरे पक्ष के 2 लोग हत्या के आरोप में हवालात में बंद हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलगअलग इलाकों में हुईं ये घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश में पशुओं की आवारगी लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है. किसानों की हाड़तोड़ मेहनत से उगाई गई फसल जब आवारा पशु चर लेते हैं, तो वे मनमसोस कर रह जाते हैं.

गांवकसबों में दबंगों के पाले पशु आवारा घूमते हैं और दलितपिछड़ों की जमीन पर उगी फसल चट कर
जाते हैं. दबंगों के डर से इन आवारा पशुओं को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता. चरनोई जमीन की कमी में आवारा घूमते पशु मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी अलौटमैंट राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था. सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई. इसी तरह गांवदेहात के इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल और दूसरी तरह की सरकारी इमारतों को भी चरनोई जमीन के रकबे पर बनाया जा रहा है. किसानों द्वारा भी वेयरहाउस, पैट्रोलपंप, बरातघर वगैरह भी खेती की जमीन पर बन रहे हैं. कसबों और शहरों में भी खेतीबारी वाली जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लाट बेचे जा रहे हैं. गांवों में चरनोई जमीन के अलावा जो पठारी क्षेत्र या सरकारी जमीन बची है, उस पर भी दबंगों का कब्जा है.

आज शहर और गांव की सड़कों पर बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की खास वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही है. गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान, जिन के पास खुद की जमीन नहीं है, गायभैंसों को खुला छोड़ देते हैं. चरनोई जमीन नहीं होने से गायें खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं और जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते हैं. गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गौपालन में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की सड़कों में भी गायें आवारा घूमती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की पन्नी में फेंकी गई खाने की चीजों को खाने के चक्कर में गायें प्लास्टिक की पन्नी भी खा लेती हैं और गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से छुड़ाने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथसाथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी भी जाग सकती है.

हमारे देश की कानून भी दोहरे मापदंड वाला है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आवारा पशुओं का भी खयाल रखो और अपनी फसलों को भी सहीसलामत रखो. पर यह कैसे मुमकिन है? जमीनी हकीकत
यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के इलाकों में नीलगाय, सूअर, गाय, बकरी, भैंस जैसे आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसान खेतों में रतजगा कर रहे हैं. आवारा पशुओं को किसान मार भी नहीं सकते, क्योंकि यह गैरकानूनी है. गांवदेहात में खेती करने वाले छोटे किसानों के पास जो जमीन है, उस पर किसी बड़े फार्महाउस जैसी तार की बाड़  नहीं होती है. गरीब और पिछड़े पशुपालक अपने पालतू पशुओं को खुद चराने ले जाते हैं, पर ऊंची जाति के दबंगों के पशु बेखौफ आवारा घूमते हैं. देश का कानून भी उपदेशकों की तरह केवल उपदेश देता है.       

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’        

Bihar Politics: नीतीश कुमार बरखास्त-मंडल को कमंडल ने कुचला

Bihar Politics: नीतीश कुमार, जो पिछले 2 दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे, अब वे राज्यसभा में हैं. यह नीतीश कुमार का डिमोशन है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ है. नीतीश कुमार कभी सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म की राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां, गठबंधन और उम्र के साथसाथ उन की इमेज बदलती गई. अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में जा रही है, जहां नीतीश युग खात्मे की ओर है.

बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश युग के साथसाथ बिहार में सैकुलरिज्म और सामाजिक न्याय की राजनीति का युग भी खत्म हो जाएगा? इस के साथ ही बिहार के पिछड़ों, दलितों, मुसलिमों की चाबी पूजापाठी ऊंची ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों के हाथों में अंगरेजों के जमाने की तरह जाएगी.
नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से राजनीति में आए थे. वे राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और वीपी सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की वैचारिक विरासत को आगे ले जाने वाले नेता रहे हैं.

साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, जिस से ओबीसी को
27 फीसदी रिजर्वेशन का रास्ता साफ हुआ था. नीतीश कुमार सामाजिक न्याय की इस विचारधारा का हिस्सा थे और बिहार में ओबीसी रिजर्वेशन के सब से बड़े समर्थक थे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने कुर्मीकोइरी वोट बैंक को ध्यान में रख कर जौर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई. साल 1996 में समता पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया. भाजपा से नीतीश कुमार का यह शुरुआती गठबंधन सिर्फ राजनीतिक हितों के लिए था. नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया था. साल 1998 से साल 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार रेल, भूतल परिवहन और कृषि मंत्री रहे. इस दौर तक सांप्रदायिक ताकतों के साथ राजनीतिक गठबंधन के बावजूद नीतीश कुमार की इमेज सैकुलर और समाजवादी नेता की ही रही.

साल 2005 में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के लिए 50 फीसदी पंचायती राज आरक्षण लागू किया. अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग श्रेणी ईबीसी बनाई और इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं. ईबीसी को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया. साल 2023 में जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे, तब उन्होंने बिहार में पहली बार जाति पर आधारित सर्वे कराया. यह जातिगत सर्वे ओबीसी और ईबीसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ. नीतीश कुमार का यह कदम मंडल राजनीति का विस्तार ही था. कभी सैकुलरिज्म के प्रणेता थे नीतीश कुमार  आज भाजपा की गोद में बैठे हैं, लेकिन एक समय था जब वे सैकुलरिज्म को अपना मूल सिद्धांत मानते थे और अपने इस सिद्धांत के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. साल 2013 का उदाहरण सामने है, जब भाजपा ने गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन एक झटके में तोड़ दिया था और इसे सिद्धांतों की लड़ाई बताया था.

भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद जद (यू) के राष्ट्रीय परिषद में दिए अपने भाषण में नीतीश कुमार ने साफ कहा था, ‘‘हम सैकुलरिज्म पर समझौता नहीं कर सकते. भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, जाति, भाषा और कल्चर के लोग साथ रहते हैं. ऐसे देश का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है, जिस के पास सैकुलर क्रेडेंशियल्स हों, समावेशी नजरिया हो और जो समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चल सके.’’
बिहार विधानसभा में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मोदी की राजनीति संविधान के मूल्यों पर हमला है. देश का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सैकुलर होना चाहिए और उसे समावेशी विकास की दृष्टि रखनी चाहिए. यह देश संविधान के तहत बना है. ‘‘सवाल यह है कि संवैधानिक दृष्टि जीतेगी या हम यह देश विभाजन और धु्रवीकरण की विचारधारा को समर्पण कर देंगे? मैं वादा करता हूं हम विभाजन की राजनीति के हाथों इस देश को बरबाद नहीं करने देंगे.’’

सैकुलरिज्म के प्रति इस ईमानदार वक्तव्य के बाद कांग्रेस के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार कोसैकुलर लीडरकरार दिया था, जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें धन्यवाद भी दिया था. यह नीतीश कुमार को सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में स्थापित करने वाला दौर था. भाजपा के साथ 17 साल की रिलेशनशिप से साल 2013 के ब्रेकअप के बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथमहागठबंधनबनाया. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ सैकुलर ताकतों का प्रतीक बना. नीतीश कुमार ने तब इस सैकुलर मोरचे कोसंविधान बचाओकी लड़ाई बताया. इस चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान उन्होंने भाजपा कोबड़ा झूठा पार्टीजैसे शब्दों से नवाजा और कहा कि उन का सैकुलरिज्म सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए है. नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें समाजवादी आंदोलन से जुड़ी हैं.

उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की परंपरा को कायम रखा. साल 2017 में जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद छोड़ कर फिर भाजपा से हाथ मिलाया, तब बिहार विधानसभा में उन्होंने कहा था, ‘‘सैकुलरिज्म एक महान विचार है. यह सिर्फ भ्रष्टाचार छिपाने का शब्द नहीं है.’’ राजनीति में सत्ता की मजबूरी अलग बात है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नीतीश कुमार का वह चेहरा हमेशा दर्ज रहेगा, जब वे सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में खड़े थे. आज सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद नीतीश कुमार के पुराने भाषण और फैसले याद दिलाते हैं कि राजनीति में सिद्धांत कभीकभी सत्ता से पहले आते हैं. बिहार की जनता नीतीश कुमार को आसानी से भुला नहीं पाएगी. नीतीश कुमार के पाला पलटने में पिछड़ी जातियों में धर्मकर्म की बढ़ती पैठ भी है. पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा सोचता है कि वह भी पूजा कर के ही ऊंची जातियों जैसी ऐश कर सकता है. ऐसी ही सोच अमेरिका तक में है, जहां ईसाई कट्टर गुलामी को चर्चों के दरवाजों से लाने की कोशिश में हैं.

सिद्धांत बनाम सत्ता की जंग नीतीश कुमार की यात्रा समाजवादी विचारधारा से शुरू हुई और सांप्रदायिक सत्ता की गोद में खत्म होने के कगार पर है. नीतीश कुमार का यह राजनीतिक सफर मंडल से शुरू हो कर कमंडल पर खत्म होता नजर रहा है. बिहार में अब भाजपा की दक्षिणपंथी राजनीति हावी हो रही है जहां सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म का नैरेटिव कमजोर पड़ गया है. बिहार की राजनीति में साल 2020 से ही भाजपा का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ. साल 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जद (यू) से ज्यादा सीटें जीतीं. जद (यू) 43 सीटों पर जीती थी, तो भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना भाजपा की मजबूरी थी. बिहार में भाजपा के पास अपना कोई नेता नहीं था. उस ने धीरेधीरे नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक पर कब्जा करना शुरू किया और साल 2026 आतेआते भाजपा ने नीतीश को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया.

2025 के विधानसभा चुनाव में राजग जीता और भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन गई, फिर भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया, लेकिन यह सिर्फ ट्रांजिशन पीरियड था. असली खेल तो अब शुरू होने वाला था. नीतीश कुमार ने 5 मार्च, 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया. यह फैसला अचानक आया और जद (यू) के कई कार्यकर्ताओं ने इस का विरोध भी किया. इस से बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया. समाजवादी पार्टी ने पोस्टर जारी किया, जिस में लिखा था किपहले इस्तेमाल करो, फिर बरबाद करो’. राजद के तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा नीतीश और जद (यू) को खत्म करने की साजिश रच रही है. भाजपा ने नीतीश कुमार की उम्र और सेहत की दुबली कंडीशन का फायदा उठाया. भाजपा हिंदुत्व कार्ड खेल कर ईबीसी और दलित वोट बैंक को काफी हद तक हड़पने में कामयाब रही. भाजपा ने नीतीश कुमार को धीरेधीरे कमजोर किया. वैसे यह भाजपा की पुरानी रणनीति का हिस्सा है. सहयोगी को जरूरत तक इस्तेमाल करो और खुद को मजबूत बनाओ.

अब बिहार में भाजपा की राजनीति शुरू हो चुकी है और जद (यू) का भविष्य संकट में है. बिहार में अब स्कूलकालेजों की जगह मंदिरों की मरम्मत की जा रही है. नीतीश कुमार खुद सीतामढ़ी में जानकी मंदिर बनवा रहे हैं. सामाजिक न्याय की लड़ाई क्यों जरूरी सदियों पुरानी जाति पर आधारित गैरबराबरी को चुनौती देने के लिए ही सामाजिक न्याय की लड़ाई शुरू हुई थी. यह ओबीसी की जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने का मिशन था. सामाजिक न्याय का मतलब केवल आरक्षण या वोट बैंक की राजनीति नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, बराबरी, आजादी और भाईचारे को साकार करने की कोशिश है. ओबीसी वह वर्ग है जो वर्णव्यस्था में शूद्र माना गया और सदियों तक सामाजिक तौर पर अनदेखा और मजदूर बना रहा. यही वजह है कि ओबीसी की आबादी सब से ज्यादा होने के बावजूद संसाधनों में भागीदारी सब से कम रही. इसी भागीदारी को बढ़ाने के लिए ओबीसी के कई नेता उभरे. इन्हीं नेताओं की बदौलत बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत हुई.

कर्पूरी ठाकुर और बाबू जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की सोच को जमीन पर उतारा और नीतीश कुमार ने इस मिशन को आगे बढ़ाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में गैरबराबरी को खत्म कर दिया था. संविधान का आर्टिकल 15 और 16 कहता है कि राज्य नागरिकों के बीच जाति, धर्म या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा, लेकिन संविधान लागू होने के दशकों बाद तक सामाजिक लैवल पर यह बराबरी कायम नहीं हो पाई. शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आज भी ऊंची जातियों का दबदबा बरकरार है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी हाशिए पर है. यही वजह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई जरूरी हो जाती है. ओबीसी जातियों की पहचान और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए साल 1979 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग बना था. मंडल आयोग ने साल 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में ओबीसी को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर 27 फीसदी रिजर्वेशन की सिफारिश की गई थी. साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल की शिफारिश को लागू किया जिस से देशव्यापी आंदोलन हुए.

ऊंची जाति को ओबीसी के लिए 27 फीसदी रिजर्वेशन मंजूर नहीं था. पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुए, लेकिन ऊंची जातियों के विरोध के बावजूद ओबीसी रिजर्वेशन लागू हुआ और यहीं से भारत की राजनीति पूरी तरह बदल गई. मंडल से भी पहले 70 के दशक में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में 26 फीसदी ओबीसी रिजर्वेशन लागू किया था. 1990 के बाद लालू प्रसाद यादव नेमाययानी मुसलिमयादव गठबंधन से सामाजिक न्याय को सत्ता में उतारा. नीतीश कुमार ने ईबीसी और महादलितों को जोड़कर सामाजिक न्याय की राजनीति को विस्तार दिया. साल 2023 के बिहार जाति सर्वे ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को नया डाटा दिया. इस सर्वे मे ईबीसी 36 फीसदी, ओबीसी 27 फीसदी, एससी 19 फीसदी, एसटी एक फीसदी और सामान्य वर्ग तकरीबन 15 फीसदी थे. इस ऐतिहासिक सर्वे में सब से खास बात यह निकल कर आई कि तकरीबन 63 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है. इस से सामाजिक न्याय की अहमियत पता चलती है. सामाजिक न्याय सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जरूरत भी है.

भारत की सामाजिक सच्चाई यही है कि मंडल लागू होने के 33 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक समानता पूरी तरह हासिल नहीं हुई है. रिजर्वेशन की बदौलत पिछड़ा समाज मुख्यधारा की ओर बढ़ा, लेकिन इस बीच सरकारी नौकरियां सिमटती चली गईं. निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन नहीं होने का खमियाजा पिछड़े ही भुगत रहे हैं. सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक विकास अधूरा रह जाता है. बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी और बेरोजगारी सब से ज्यादा है, पिछड़ों का मजबूत होना ही प्रगति का आधार है, इसलिए सामाजिक न्याय की लड़ाई बिहार की उन्नति के लिए जरूरी है. पिछड़ा वर्ग तरक्की करेगा तब ही बिहार में सदियों से फैली गरीबी दूर होगी. क्या सामाजिक न्याय हिंदुत्व की भेंट चढ़ा साल 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजे राजद और महागठबंधन की राजनीति का जैसे अंत साबित हुए हैं. सामाजिक न्याय और दलित चेतना की राजनीति हिंदुत्ववादी राजनीति की भेंट चढ़ गई. यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे राजनीतिक गठबंधनों, प्रोपेगेंडा और नए राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है.

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के राजद ने मंडल कमीशन के जरीए ओबीसी को सत्ता में ला करसामाजिक न्यायकी लहर चलाई, जिस से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और राजनीति में जगह मिली. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के काल कोजंगलराजकी श्रेणी में रखा गया. उच्च जातीय मीडिया का नैरेटिव कामयाब हुआ और साल 2005 में नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन बना कर मुख्यमंत्री बन गए. भाजपा के समर्थन वाली इस सरकार को सुशासन का नाम दिया गया, हालांकि नीतीश कुमार ने ईसीबी, महादलित और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक न्याय को ही मजबूती दी और साल 2023 में जाति जनगणना कर आरक्षण का दायरा बढ़ाया. यह हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ था, फिर भी उन्होंने ऐसा जोखिम भरा कदम उठाया और इसीलिए नीतीश कुमार को साइडलाइन किया जाना भाजपा के लिए बेहद जरूरी हो गया. साल 2025 चुनाव में राजद कासामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्वका नारा फेल हो गया और राजग ने जीत हासिल की. चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम पर हर महिला को 10,000 रुपए दिए गए, जिस से पूरा खेल पलट गया. इस चुनाव में महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से ज्यादा रहा और महिला वोटों की इस बढ़ोतरी का पूरा फायदा सीधे राजग के पक्ष में गया.

चुनाव आयोग ने भी भाजपा के एजेंट की भूमिका बड़ी ईमानदारी और कर्मठता से निभाई. एसआईआर के नाम पर तकरीबन 30 लाख वोटों का सत्यानाश हुआ, जिस का फायदा भाजपा को मिला. लालच और साजिश ने सामाजिक न्याय के नारे को पीछे धकेल दिया. जद (यू) ने कुर्मी और कोइरी यानी ईबीसी को थामे रखा तो भाजपा ने ऊपरी जातियों और गैरयादव ओबीसी के साथ शहरी वोटों पर पकड़ बनाए रखी. हालांकि बिहार में भाजपा हिंदुत्व का कार्ड खेलने से परहेज करती रही. राम मंदिर के बजाय डबल इंजन के नैरेटिव पर फोकस रखा. बूथ लैवल मैनेजमैंट को मजबूत रखा और भाजपा के संगठन ने जमीनी लैवल पर काम किया. जिस पिछड़ी जाति के लोगों ने दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, चेन्नई, पंजाब में ही नहीं, बल्कि खाड़ी के देशों में भी चकाचौंध चमक लाने में हड्डी गलाई, वह अपनी जमीन बिहार में लालू और नीतीश की वजह से फिर औंधे मुंह गिर रही है. तेजस्वी यादव कामाययानी मुसलिमयादव बेस तो मजबूत रहा, लेकिन वे ईबीसी, महिलाओं और नई पीढ़ी को नहीं जोड़ पाए.

परिवारवाद, पुराना रिकौर्ड औरकेवल विरोधकी राजनीति की वजह से भी तेजस्वी यादव बुरी तरह हारे. साल 2020 में राजद सब से बड़ी पार्टी थी, लेकिन साल 2025 में तीसरे नंबर पर सिमट गई.
बिहार में जाति हिंदुत्व पर भारी है, लेकिन अब सामाजिक न्याय की मांग ओबीसी के दिमाग से छिटक कर दूर चली गई है. भाजपा का पूजापाठी नैरेटिव सोशल मीडिया के जरीए नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है. गोदी मीडिया के शोर में प्रोपेगेंडा हावी है. नीतीश फैक्टर और मजबूत मंडल राजनीति के चलते ही बिहार में भाजपा का हिंदुत्व उस के जीते गए दूसरे राज्यों जितना कामयाब नहीं है. राजग की जीत में हिंदुत्व से ज्यादा दूसरे फैक्टर कारगर साबित हुए, लेकिन लंबे समय में भाजपा का दबदबा बढ़ने से सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई है. हिंदुत्व ने जाति को धार्मिक एकता से ओवरराइड कर दिया है. गठबंधन के पीछे
भाजपा का असली खेल साल 2014 से भाजपा ने बिहार में संघ के जरीए गांवदेहात के लैवल पर ऊंची जातियों और ओबीसी के खातेपीते घरों के कार्यकर्ताओं को मजबूत किया, जबकि जद (यू) नीतीश की व्यक्तिगत इमेज पर निर्भर रही.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में राजग की जीत के बाद भाजपा ने जद (यू) के विधायकों पर दबाव बढ़ाया. भाजपा ने जद (यू) के कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, जिस से जद (यू) का वोट बैंक सिकुड़ गया. साल 2010 में भाजपा को सिर्फ 10 फीसदी वोट शेयर मिला था, वहीं साल 2025 में 20 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया. भाजपा की रणनीति हर राज्य में अलगअलग है, लेकिन हर जगह सिद्धांत एक ही है, सहयोगियों को कमजोर करना. साल 2019 में भाजपा नेआपरेशन कमलके जरीए जेडीएस के 17 विधायकों को तोड़ लिया. साल 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा ने 28 विधायकों को तोड़ा. सहयोगियों को निगलने की साजिश ही भाजपा की कामयाबी का राज है. इस साजिश में भाजपा हर बार कामयाब रहती है. भाजपा की इस साजिश के पीछे संघ बड़ी भूमिका अदा करता है.

इस मामले में संघ के कार्यकर्ता ईमानदारी से काम करते हैं. महाराष्ट्र में शिव सेना और राकांपा को तोड़ कर तबाह कर दिया. भाजपा की यह रणनीति भारतीय लोकतंत्र को खाई की ओर ले जा रही है. वैसे भी भाजपा का फोकस सत्ता पर कब्जा करना है कि साझेदारी निभाने पर. विपक्ष को मजबूत गठबंधन बनाने होंगे वरना भाजपा रूपी इस अजगर का लोकतंत्र को निगलना जारी रहेगा. भाजपा के चलते बिहार की उपजाऊ जमीन पर गरीबी की कीकर उगती रहेगी  और नालंदा वाला बिहार देश का सब से गरीब राज्य बना रहेगा. नीतीश कुमार की वजह से बिहारी शब्द गाली बन जाएगा, ऐसे जने के लिए जो पलटूराम हो और जिसे राज्य और जनता की फिक्र हो. सामाजिक न्याय की लड़ाई अंबेडकर से मंडल तक की कवायद थी.

नीतीश कुमार ने इस लड़ाई को मूर्त रूप देने की कोशिश जरूर की, लेकिन आखिरकार वे संघ के चंगुल में फंस कर फेल हो गए. अपने राजनीतिक सपनों के चलते नीतीश कुमार ने बिहार को ऐसे मझधार में ला कर छोड़ दिया है, जहां एक ओर सामाजिक न्याय पिचका हुआ है, तो दूसरी ओर हिंदुत्व की तिलकधारी सोच है जो बराबरी के मिशन को पूरा निगल चुकी है. बिहार में भाजपा की लगातार बढ़ती हुई ताकत बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जरूर है, लेकिन यह अंत नहीं है. असली चुनौती अब सामाजिक न्याय की जरूरत की पहचान की है. यह भी सच है कि जब तक धर्म और जाति पर आधारित गैरबराबरी रहेगी, तब तक सामाजिक न्याय की यह लड़ाई जारी रहेगी, क्योंकि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सब से कमजोर को भी बराबरी का हक मिले.            

शकील प्रेम

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

Bihar Elections 2025: नई मतदाता सूची पर उठे सवाल

Bihar Elections 2025: बिहार के चुनावों के लिए तैयार की गई मतदाता सूची में काफी नाम जोड़े गए हैं, काफी हटाए गए हैं. पर लगता है कि अब जो सूची तैयार हुई है वह बहुत गलत नहीं है. अब तो मतदान के दिन पता चलेगा, जब लोग वोट डालने जाएंगे और उन्हें अपना नाम नहीं मिलेगा.

नीतीश कुमार और केंद्र सरकार ने काफी कोशिश की थी कि मतदाता सूचियों में ऐसे बदलाव किए जाएं कि मतदान का फैसला उलटा हो सके. सरकार को मालूम है कि बिहार के लोग अपने हकों के लिए लड़ने वाले नहीं हैं. वे ज्यादातर जमींदारों की गुलामी के आदी रहे हैं और अंगरेजों के आने से पहले भी कभी खड़े नहीं हुए, इसीलिए 1700 के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पैर कोलकाता के सैंटर से उस समय सिर्फ ट्रेड करनेके लिए फैलाने शुरू किए, उन्होंने बिहारी मजदूर और बिहारी सैनिक रखे.

1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद अंगरेजों की फौज में 70 फीसदी बिहारी राजपूत और ब्राह्मण हुआ करते थे जिन के बल पर उन्होंने धीरेधीरे पूरे भारत पर कब्जा किया. 1857 के बाद जरूर उन्होंने बिहारी ब्राह्मणों को सेना में रखना कम कर दिया था पर दूसरे गोरे व्यापारी बिहारियों को ही उन की सहने की आदत की वजह से रखते थे.

मौरीशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम में एग्रीमैंट कर के गए भारतीयों में से ज्यादातर यहीं के लोग थे, जिन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा जाता था. जब मुंबई, अहमदाबाद में मिलें लगनी शुरू हुईं तो ढेरों बिहारी गए, क्योंकि वे हुक्म मानने वाले हुआ करते थे.

नीतीश कुमार जो तकरीबन 20 वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, इसीलिए सत्ता में हैं क्योंकि एक आम बिहारी की तरह वे जो मालिक है उस के साथ हो जाते रहे हैं. लालू प्रसाद यादव ने बिहारियों को हक दिलाने की कोशिश की पर फिर ऊंची जात वालों ने ऐसे फंदे फेंके कि उन्हें अपनी जिंदगी कचहरियों और जेलों में बितानी पड़ी.

मतदाता सूची में से लाखों नाम कट जाते तो वे चूं नहीं करते और इसीलिए ज्ञानेश कुमार जैसे अफसर को चुनाव आयुक्त की तरह लगाया गया जो पूरी तरह सरकार के साथ था.

यह तो राहुल गांधी की न्याय यात्रा और वोट चोरी का इलजाम था कि जो मतदाता सूची अब तैयार हुई है उस पर मोटेतौर पर कोई हंगामा नहीं मच रहा. 14 नवंबर को फैसला चाहे जो भी आए, यह तो दिखता है कि आम बिहारी का वोट का हक पक्का रहेगा. राहुल गांधी ने पूरे देश में वोट की कीमत भी बता दी है और चुनाव आयोग अब कानून की आड़ में खड़ा हो कर कहीं भी वोटों की काटाछांटी नहीं कर सकेगा.

संविधान की खैरियत इसी में है कि लोगों का वोटों का हक जान के जैसा रहे. सरकारें इसे छीनेंगी क्योंकि वे अब नहीं चाहतीं कि डैमोक्रेसी के नाम पर उन पर बंदिशें लगें. अब जो जीतता है वह डोनाल्ड ट्रंप की तरह महामहिम बनना चाहता है जो हर सुबह नए तुगलकी फरमान जारी कर सके. अमेरिका में न सही भारत में लगता है वोट का हक अब छीनना आसान नहीं रह गया है.

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खेलों में हारजीत चलती रहती है पर जिस तरह से भारतपाकिस्तान के 3 मैच एशिया कप में लगभग बराबरी पर खत्म हुए उस से साफ है कि इस मामले में दोनों टीमें एकदूसरे के खिलाफ नहीं, एकदूसरे के साथ लाखों जुआ और सट्टा लगाने वालों के लिए खेल रही थीं. 14 सितंबर को हुए मैच में तो भारत की टीम ढंग से खेली पर 21 सितंबर को केवल डेढ़ ओवर आगे रह कर, फाइनल में केवल 3 बौल आगे रह कर दोनों टीमों ने सट्टेबाजों को करोड़ों नहीं, अरबों का फायदा दिलाया था.

भारत और पाकिस्तान अब सिर्फ क्रिकेट खेलते हैं. वह भी 22 लोगों को खिलाते हैं और बाकी तो जुआ खेलते हैं. इस जुए में कि भारत जीतेगा कि पाकिस्तान जीतेगा, इस बौल में कैच आउट होगा या चौका लगेगा, इस बैट्समैन के 10 रन बनेंगे या 50 पर जबरदस्त शर्तें लगती हैं. लाखों को किक मिलती है जो अच्छे से अच्छे खेल में नहीं मिलती.

टीवी पर मैच देखना भारतीय जनता का सब से बड़ा खेल है. मोबाइल पर रील्स देखने के बाद भारत और पाकिस्तान के युवा कुछ करते हैं तो भारतपाकिस्तान का मैच देखते हैं जो कुंभ की तरह कभीकभार ही होते हैं. एशिया कप के आयोजकों ने सम झ लिया था इसीलिए उन्होंने दोनों को 3-3 बार खिलवाया जो साफ है कि एक स्कीम के हिसाब से हुआ.

सट्टेबाजी हर जगह होती है पर यहां अब खेलों के नाम पर सिर्फ सट्टेबाजी बची है. एथलैटिक्स और कुश्ती में जहां भारतीय खिलाड़ी मैडल ले आते हैं, न दर्शक होते हैं, न मैच फिक्सिंग होती है. सट्टेबाजी का तो सवाल ही नहीं उठता.

इस सट्टेबाजी में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगे हुए थे क्योंकि भारत की टीम के जीतने पर उन्होंने उसे ‘आपरेशन सिंदूर’ से जोड़ते हुए बधाई दे दी. इंटरनैशनल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड असल में वैसे ही भारत सरकार की एक यूनिट है और सारे फैसले भारत को देख कर लिए जाते हैं क्योंकि क्रिकेट में पैसा तो भारत के दर्शक ही देते हैं. टीवी राइट्स अरबों में बिकते हैं क्योंकि विज्ञापन करने वालों को पता है कि भारतीय बदहाल युवा कामधाम छोड़ कर इन्हें जरूर देखेंगे और वहां वे अपना पानमसाला जबरदस्त तरीके से बेचते हैं.

एशिया कप हो, वर्ल्ड कप हो, टी 20 हो, वनडे हो यह तमाशा चलता रहता है क्योंकि यह एक जगह है जहां से पाकिस्तान के बहाने हिंदुस्तान के मुसलमानों को कहने का मौका मिलता है कि दिखा दिया न, तुम्हारी औकात क्या है.

फुटबाल, टैनिस, फील्ड गेम्स, तैराकी, जिमनास्टिक जैसे बीसियों खेलों में भारत व पाकिस्तान की टीमें कहीं नजर नहीं आएंगी. पहले जिस हौकी पर ब्रिटिश इंडिया के समय से कब्जा था वह खेल भी 20-25 साल पहले हाथ से निकल गया क्योंकि वहां फिक्सिंग नहीं होती, सट्टा नहीं लगता. एशिया कप में भारत और पाकिस्तान दोनों की क्रिकेट टीमें जीती हैं, दोनों के खिलाडि़यों ने न जाने कहांकहां कमाया होगा. Bihar Elections 2025

Bihar Elections 2025: एससी, एसटी, मुसलिम को नेता नहीं मसीहा चाहिए – पर कैसा?

Bihar Elections 2025, लेखक – शकील प्रेम

बिहार के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों एससी, एसटी और मुसलिम वोटों को जमा करने के लिए हाथपैर मार रही हैं. पर ये समाज जानते हैं कि वे सताए हुए हैं, उन से जम कर भेदभाव होता है, उन्हें कदमकदम पर बेइज्जत किया जाता है, उन के पढ़ने, साथ बैठ कर खाने के हक, रोटीबेटी के संबंध बनाने में हजारों रुकावटें हैं, फिर भी तकरीबन बहुमत में होते हुए भी वे बेबस हैं, बेचारे हैं, गरीब हैं, गंदे घरों में मैला पानी पीते हैं. सिर्फ वोटों के समय उन की पूछ होती है.

एससी व मुसलिम समाज में नेताओं और बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है. नेता तो थोक के भाव में हैं. खुद को मसीहा कहने वाले भी हैं और साहित्य का भी अंबार लगा है, फिर भी यह समाज दलित, गरीब, कमजोर और लाचार बना हुआ है. क्यों?

एससी, एसटी और मुसलिम वर्ग का अगर कोई किसी बड़ी पोस्ट पर पहुंच भी जाए तो उसे या तो मोहरा बन कर रहना होगा वरना उसे बुरी तरह बेइज्जत कर के अलगथलग कर दिया जाएगा.

क्या है असली वजह

दलित समाज, जिसे संवैधानिक तौर पर शैड्यूल कास्ट यानी एससी (अनुसूचित जाति) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, की आबादी तकरीबन 17 फीसदी है. एससी वर्ग को राष्ट्रीय स्तर पर 15 फीसदी संवैधानिक आरक्षण मिला हुआ है. तकरीबन पूरा एससी समाज ही आरक्षण के दायरे में है और यह आरक्षण राजनीति, पढ़ाईलिखाई और सरकारी नौकरियों के लिए दिया गया है. सरकारी शिक्षण संस्थानों जैसे आईआईटी, आईआईएम में एससी वर्ग के लिए 15 फीसदी सीटें आरक्षित हैं.

इस के अलावा स्कौलरशिप, फीस छूट और छात्रावास की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. नौकरियों की बात करें तो केंद्रीय और राज्य सरकार की नौकरियों में 15 फीसदी पद आरक्षित हैं. आर्टिकल 16(4ए) के तहत इन्हें प्रमोशन में भी आरक्षण मिलता है और यह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भी लागू है.

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित होती हैं. इस आरक्षण के तहत तकरीबन 84 लोकसभा सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं. इन सीटों पर उम्मीदवार एससी वर्ग का होता है, लेकिन वोट सभी मतदाता दे सकते हैं. कुछ और जनरल सीटों पर भी एससी, एसटी, मुसलिम वर्ग के लोग जीत कर आ जाते हैं.

पंचायत स्तर के चुनाव हों या नगरनिगम के चुनाव यहां भी एससी वर्ग के लिए सीटें आरक्षित होती हैं.

ग्रामीण और शहरी विकास योजनाओं में भी आरक्षण के तहत एससी वर्ग को प्राथमिकता दी जाती है.

शिक्षा, राजनीति और नौकरियों में आरक्षण की बदौलत एससी वर्ग के माली और सामाजिक हालात में सुधार हुआ है, लेकिन जातिगत भेदभाव, गरीबी और उत्पीड़न के चलते एससी वर्ग अभी भी हाशिए पर ही है.

पढ़ाईलिखाई, नौकरी और राजनीति में आरक्षण के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में 80 फीसदी से ज्यादा दलित व मुसलिम रहते हैं, जहां वे आज भी भूमिहीन और मजदूर हैं. सन 1991 के उदारीकरण के बाद देश के कुछ दलितों के हालात बेहतर हुए हैं, लेकिन ज्यादातर अभी भी गरीबी रेखा से नीचे ही हैं.

गरीबी सूचकांक 2021 के अनुसार एससी वर्ग में एकतिहाई लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे हैं, वहीं 2023 में हुए बिहार सर्वे में एससी परिवारों में से 43 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं.

कुलमिला कर एससी वर्ग में गरीबी राष्ट्रीय औसत (21 फीसदी) से दोगुनी है. अगर ओबीसी को भी उन के साथ जोड़ लिया जाए, जिन के साथ पुराणों में ब्राह्मणों ने व्यवस्था वहीं कर रखी है जो अब एससीएसटी के साथ होती है, तो गरीब 75-80 फीसदी हो जाएंगे. वर्ण व्यवस्था में उन्हें शूद्र कहा गया है.

राष्ट्रीय साक्षरता दर 80.9 फीसदी है, लेकिन एससी में यह सिर्फ 70 फीसदी के आसपास ही है. एससी लड़कियों में साक्षरता दर मात्र 24.4 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 42.8 फीसदी है. आज भी पैसे की कमी और भेदभाव के चलते प्राइमरी लैवल पर ही 50 फीसदी दलित और मुसलिम बच्चे स्कूल छोड़
देते हैं.

एससी वर्ग के लिए गहरे सवाल

सवाल यह है कि तमाम तरह के संवैधानिक हकों और सरकारी सुविधाओं, अवसरों और प्राथमिकताओं के बावजूद एससी वर्ग मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है, तो कमी किस की है? इस में कोई दो राय नहीं है कि एससी वर्ग के लिए ऊंचे समाज की सोच में सुधार नहीं हुआ है. हर स्तर पर नाइंसाफी, बेईमानी और भेदभाव जारी है, जिस के चलते आज भी इस वर्ग में गरीबी बनी हुई है. लेकिन इस के लिए दूसरों को दोष कब तक दिया जाएगा?

दुनिया के इतिहास में हर जगह कमजोरों को दबाया गया है और आज भी पूरी दुनिया में कमजोरों के साथ अनेक तरह के भेदभाव होते हैं. कहीं कोई मसीहा नहीं आता, बल्कि कमजोरों को खुद से अपनी कमजोरियों को सम झना और उन से जू झ कर निकलना होता है.

मसीहा सिर्फ धर्म के किस्सों में आते हैं. यूरोप के यहूदियों ने सन 150 से ले कर सन 1945 तक हजारों साल तक यूरोप में दमन और उत्पीड़न को झेला, लेकिन उन्होंने दूसरों पर दोष मढ़ने की बजाय खुद की तरक्की के रास्ते तलाशे और आज वे इजरायल में दुनिया की सब से ताकतवर कौम बन कर उभरे हैं.

एससीएसटी के साथ इतिहास में हिंदू राजाओं और बाद में दूसरों के हाथों भी बहुत नाइंसाफी हुई है, जिस की वजह से वे संसाधनों से वंचित रहे, लेकिन सन 1950 में संविधान ने उन्हें मौका दिया. बराबरी का दर्जा दिया, जिस की वजह से इस समाज में मुट्ठीभर नेता पैदा हुए. कुछ बड़े अफसर भी बने. कहींकहीं उद्योगपति भी उभरे, फिर भी ज्यादातर समाज वहीं का वहीं रहा.

आजादी के बाद से देश की संसद में एससी वर्ग के कम से कम 84 सांसद बैठे होते हैं. दलितों की आबादी के अनुपात के हिसाब से संसद में बराबर की नुमाइंदगी होते हुए भी कैसा रोना? राजनीतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद एससी वर्ग कमजोर क्यों है? इस सवाल पर इस वर्ग को सोचविचार जरूर करना चाहिए.

पढ़ाईलिखाई पाने के मौके में इस पूरी आबादी को रिजर्वेशन मिला है. उन के दरवाजे हर सरकारी स्कूल के लिए खुले हैं. इस के बावजूद यह समाज सब से ज्यादा अंगूठाछाप क्यों है? इस समाज के पढ़ेलिखे लोग क्या कर रहे हैं? क्या पढ़ेलिखे और अमीर लोगों की अपने समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? जो आगे बढ़ चुके हैं, वे दूसरों के लिए सीढि़यां क्यों नहीं बना रहे हैं और उन्हें गहरे गड्ढे से निकाल क्यों नहीं रहे हैं? वे क्यों नहीं भेदभाव की खाई पाट पा रहे हैं?

विचार जरूरी है

विचारों से दुनिया बदलती है. विचारों की ताकत से हालात बदले जा सकते हैं, लेकिन एससी वर्ग ने विचारों को अहमियत ही नहीं दी. विचारों का मतलब तक जानने की कोशिश नहीं की. वे व्यक्तिपूजा में लग गए. उन्हें लगा कि ऊंची जातियों की तरह वे भी किसी बुत को पूज कर अपना भाग्य सुधार लेंगे.

विचारों से ही तरक्की होती है, लेकिन तरक्की के विचार जिस समाज में पैदा ही न हों, उस समाज में कितने ही मसीहा जन्म लें, तरक्की नहीं हो सकती.

एससी समाज में डाक्टर भीमराव अंबेडकर पैदा हुए, जिन के नाम पर हजारों संगठन बने. इन संगठनों से निकल कर हजारों नेता पैदा हुए जिन्होंने डाक्टर अंबेडकर की पूजा करवानी शुरू कर दी, लेकिन इन नेताओं ने समाज को स्कूली पढ़ाईलिखाई भी पाने का फायदा नहीं सम झाया. पढ़ाईलिखाई से अच्छी समझ पैदा होती है. सम झ सही हो तो समाज यकीनन तरक्की करता है.

इस वर्ग के कुछ लोग पढ़ेलिखे जरूर, लेकिन वे समाज से कट गए. जो नेता बने उन्होंने अपने फायदे की खातिर समाज का फायदा उठाया और जमीन से इतने ऊपर उठ गए कि समाज से ही गायब हो गए. बाकी का समाज किसी मसीहा के इंतजार में वहीं का वहीं पड़ा है. उलटे वह जुल्म करने वाले ऊंचों की चाटुकारिता ज्यादा जोर से कर रहा है.

कैसा मसीहा चाहिए

मसीहा कोई एक इनसान नहीं होता, बल्कि मसीहा हर वह इनसान होता है जो हालात को बदल देता है. अगर कोई अनपढ़ है, लेकिन उस ने अपने बच्चों को केवल पढ़ायालिखाया ही नहीं, बल्कि सम झदार और होशियार भी बना दिया है, तो वह अपने बच्चों के लिए मसीहा ही है. अगर कोई गरीब है और अपनी मेहनत से संसाधन जुटा लेता है तो वह अपने परिवार के लिए मसीहा ही है. अगर कोई पढ़ालिखा इनसान अपने समाज के बच्चों को पढ़ाता है, हुनरमंद बनाता है तो वह उस समाज के लिए मसीहा ही है.

जिस इनसान को अपने समाज के दर्द से मतलब नहीं, वह पढ़ालिखा होते हुए भी गंवार ही होता है. और जो अनपढ़ होते हुए भी अपने समाज की चिंता करे वही सम झदार कहलाता है. एससी वर्ग में कितने तथाकथित मसीहा आए और गए, लेकिन समाज वहीं का वहीं रहा.

यहूदियों में कोई मसीहा नहीं पैदा हुआ फिर भी वे आज सब से ताकतवर कौम बन कर उभरे हैं. इस की वजह यह है कि यहूदियों ने किसी मसीहा का इंतजार नहीं किया, बल्कि हर यहूदी अपनेआप में मसीहा बना. यहूदियों ने पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झा और बुरे हालात में भी इस से सम झौता नहीं किया.

ब्राह्मण समाज आज सब से अमीर है. क्या ऐसा करने में उस के किसी मसीहा का नाम मालूम है? किसी नेता का क्या योगदान रहा है उन के आज हर जगह सत्ता में रहने का? पारसियों के बीच कितने मसीहा पैदा हुए?

पारसियों को कभी किसी मसीहा की जरूरत ही नहीं पड़ी. हर पारसी अपनेआप में मसीहा है, क्योंकि वह पढ़ालिखा है. जो गरीब है, कमजोर है, उसे ही मसीहा की जरूरत होती है. लेकिन ऐसा कोई मसीहा जो आप के हालात बदल दे, कभी आता ही नहीं.

पढ़ाई से बदलेंगे हालात

डाक्टर भीमराव अंबेडकर बहुत महान थे, इस बात से आज के अनपढ़ एससी को क्या फायदा मिल सकता है? लेकिन डाक्टर अंबेडकर ने किन विकट हालात से जू झ कर पढ़ाईलिखाई हासिल की इस बात को सम झने से एससी वर्ग के हालात बदल सकते हैं. डाक्टर अंबेडकर ने तब मेहनत की जब एससी वर्ग का कोई संघ या पार्टी नहीं थी, कोई रिजर्वेशन भी नहीं था.

पढ़ाईलिखाई अपनेआप में एक बहुत बड़ी ताकत है. जिस समाज ने इस की अहमियत को सम झा वह समाज कभी भी कमजोर नहीं रहा. एससी वर्ग की बदहाली की वजह पढ़ाईलिखाई से उस की दूरी है.

सामाजिक भेदभाव एक समस्या है, रुकावट नहीं. यह बहाना कब तक ढोया जाएगा?

एससी समाज के पढ़ेलिखे लोगों को अपनी जिम्मेदारियां तय करनी होंगी. उन्हें समाज के लिए मसीहा बनना होगा. समाज का एक टीचर चाहे तो अपने समाज से हजारों टीचर पैदा कर सकता है. एक पढ़ालिखा इनसान हजारों अफसर पैदा कर सकता है, लेकिन एससी वर्ग के पढ़ेलिखे लोग कहां सोए हुए हैं?

ऐजूकेशन ही कामयाबी की कुंजी है. एससी वर्ग के प्रति समाज की सोच कैसी भी हो, यह आप को पढ़नेलिखने से नहीं रोक सकती. तमाम विरोधाभासों के बावजूद एससी वर्ग के लिए हायर ऐजूकेशन तक के रास्ते खुले हुए हैं, फिर बहानेबाजी क्यों?

संस्थागत भेदभाव का शिकार हुए रोहित वेमुला हायर ऐजूकेशन में सताए जाने का उदाहरण हैं, तो जज, वैज्ञानिक और तमाम आईएएसआईपीएस के भी उदाहरण हैं, जो दलित समाज से निकले हैं.

याद रखिए कि जो जितना कमजोर होता है, उस के लिए जद्दोजेहद उतनी ही बड़ी होता है. अगर वंचित समाज को अपनी कमजोरियों से बाहर निकलना है, तो उसे अपनी जद्दोजेहद तेज करनी होगी.

पढ़ाईलिखाई का मतलब सिर्फ स्कूलकालेज में पढ़ना नहीं है, बल्कि इस का मतलब है दूसरों की कही या लिखी बात जिंदगीभर पढ़ते रहना, लगातार लिखते रहना है. अपने मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए हर समय जूझना है. एससी, एसटी और मुसलिम धर्म के चक्करों में डाल दिए गए हैं और वे उन्हीं बातों के लिए दूसरों के सिर फोड़ रहे हैं, जिन से उन्हें जंजीरें पहनाई जाती हैं.

अपनी पहचान बनाने के लिए कोई देखादेखी खास रंग का गमछापट्टा पहन रहा है, कोई टोपी लगा रहा है. उन के नेता यही सम झा रहे हैं और खुद अपनी रोटी, मकान, गाड़ी और रुतबे का इंतजाम कर रहे हैं.

मसीहा कोई हाड़मांस का जना नहीं हो सकता. आज तक कभी कोई ऐसा जना नहीं हुआ, जिस ने देश और समाज को बदल डाला हो. गांधी, अंबेडकर, नेहरू मसीहा नहीं थे. तिलक, गोखले, गोलवलकर भी ऊंचों के मसीहा नहीं थे. ऊंचों ने पिछले 50 साल में साइंस का फायदा उठा कर बिना मसीहा के पढ़ कर, समझ कर फायदा उठाया है.

आज बिहार में नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत कुमार एससी, एसटी और मुसलिम वर्ग को जीत कर भी कुछ नहीं दे पाएंगे, क्योंकि इन वर्गों को पानी का गिलास भर कर खुद ही पीना होगा.

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि बुरी दशा से निकलने के लिए समाज बदलो, सरकार का ढांचा बदलो और उस के लिए वर्ग संघर्ष करो. मार्क्सवादी नजरिया मसीहा की जरूरत को सिरे से नकारता है.

कार्ल मार्क्स के मुताबिक, सामाजिक बदलाव किसी एक जने की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रोडक्शन के साधनों, उन की मिल्कियत में बदलाव और वर्ग संघर्ष जैसी जमीनी व धन के रखने के तरीकों से होता है.

किसी राहुल गांधी, तेजस्वी यादव या प्रशांत किशोर के कहने या किसी मां के मंदिर के बनाने से जो गरीब है, कुचला है, वंचित है, बीमार है, भूखा है, अपनी हालत सुधार नहीं सकता, उसे तो पढ़ कर, सम झ कर संघर्ष कर के बढ़ना होगा. समाज की तरक्की के लिए, ‘मसीहा’ की नहीं, बल्कि एक बड़े वर्ग में जागरूकता और क्रांतिकारी सामूहिक कार्रवाई की जरूरत होती है, जो कांवड़ यात्रा में नाचने या बैनर लगाने से नहीं आती.

बिहार चुनाव में वोट देते समय खयाल रहे कि कौन पढ़ने का मौका देगा और कौन हकों और मौकों पर डाका डालने के लिए बैठा है. एससी, एसटी और मुसलिम के लिए मसीहा किताबें हैं, पत्रिकाएं हैं, वे टीवी चैनल हैं जो न तो बिकाऊ हैं और न ही मदारी का खेल खिला रहे हैं. आगे बढ़ना है तो ऐसे अखबार खरीदें जो आप को बेचे नहीं, बल्कि बनाएं.

पश्चिम के एक विचारक हेनरी वार्ड बीचर ने कहा, ‘‘एक अच्छा अखबार या पत्रिका लोगों के लिए अनगिनत लाखों सोने से भी बड़ा खजाना है. आप इस खजाने को लुटने न दें.’’

अमेरिका के शुरुआती सालों में तब के राष्ट्रपति थौमस जैफरसन ने कहा था, ‘‘अगर मु झे यह तय करना होता कि हमें बिना अखबारों, पत्रिकाओं और किताबों के सरकार चाहिए या बिना सरकार के अखबार, पत्रिकाएं, किताबें तो मैं बाद वालों को चुनने में एक पल का भी संकोच नहीं करता.’’

क्या दलित अखबार, पत्रिकाएं पढ़ रहे हैं? आप रील देखने में लगे हैं, पौराणिक कथाओं को दोहराने वाले अखबारों और चैनलों को देखने में लगे हैं या अपनी सम झ का दायरा बढ़ाने वाली बात जानने, सुनने, पढ़ने में, इस का फैसला आप को करना है.

एससी, एसटी और मुसलिम का मसीहा नवंबर में वोटिंग मशीन से नहीं निकलने वाला, बल्कि उस के बारे में तो अंगरेजी लेखक चार्ल्स डिकेंस 150 साल पहले कह गया है कि अखबारों और किताबों को पढ़ने की आदत से एक कौशल का विकास होता है. अखबार, पत्रिकाएं और किताबें पढ़ने की आदत आप को भाषा, लेखन और ताजा जलते मुद्दों पर पूरी गहराई से सही सम झ देती है, जो सरकार को सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करने के लिए जरूरी है और व्यावसायिक तरक्की में मददगार है.

याद रहे कि मसीहा सफेद चोगा पहने गलीगली नहीं घूमते, बल्कि वे आपके दिमाग में, मन में, दिल में पैदा होते हैं.

नहीं निकले काबिल नेता

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति में दलित समाज से कई नेता उभरे लेकिन वे दलितों के फायदे के लिए कोई क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए. आजादी के बाद दलित समाज से जो भी नेता हुए वे आगे चल कर अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर रह गए. ज्यादातर दलित नेताओं ने दलितों के उत्थान के नाम पर दलित वोटों को बेचने का ही काम किया.

यही हाल मुसलिमों का भी रहा. मुसलिम समाज के बीच से नेता तो कई उभरे लेकिन वे किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के दलाल की भूमिका में ही रहे. मुसलिम नेताओं से मुसलिम समाज को कोई फायदा नहीं हुआ. मुसलिमों के फायदे की राजनीति करने की आड़ में इन मुसलिम नेताओं ने अपना और अपनी पार्टी का ही भला किया.

यही वजह है कि आज की राजनीति में दलितों और मुसलिमों का कोई सर्वमान्य नेता नजर नहीं आता. आज की राजनीति में दलितों के बड़े नेताओं में मायावती, चंद्रशेखर रावण, रामदास अठावले, चिराग पासवान, जीतनराम मां झी जैसे लोग ही नजर आते हैं, जिन के लिए विचारधारा की कोई कीमत नहीं रह गई है.

मायावती सिर्फ जाटवों की नेता बन कर रह गई हैं. चिराग पासवान दुसाध जाति के नेता हैं. चंद्रशेखर रावण भी दलितों की कुछ जातियों के नेता हैं और जीतनराम मां झी मुसहर समाज के नेता हैं. इस से ज्यादा इन नेताओं की कोई पहचान नहीं रह गई है.

मेनस्ट्रीम मीडिया के बंद दरवाजे

मीडिया में नुमाइंदगी नहीं होने के चलते दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की असली समस्याएं कभी हाईलाइट ही नहीं हो पातीं. गरीबी, बेरोजगारी का दंश झेलते इन तीनों समाजों का जम कर शोषण होता है, अत्याचार होते हैं, लेकिन इन की यह त्रासदी कभी भी मेनस्ट्रीम मीडिया तक नहीं पहुंच पाती.

मुख्यधारा की मीडिया में दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की भागीदारी बिलकुल जीरो है. ये तीनों वर्ग न्यूजरूम, कवरेज, एंकरिंग और नेतृत्व वाले पदों से कोसों दूर खड़े हैं.

औक्सफैम इंडिया और न्यूजलौन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया में केवल ऊंची जातियों का ऐसा दबदबा है कि ये तकरीबन 86-90 फीसदी पदों पर काबिज हैं. इन तीनों वर्गों का लेखन, रिपोर्टिंग, एंकरिंग में भागीदारी जीरो है. एक भी दलित, मुसलिम या आदिवासी मेन स्ट्रीम के किसी भी मीडिया ग्रुप का हैड नहीं है.

यही वजह है कि इन तबकों से जुड़े मुद्दों को ले कर अंगरेजी अखबारों में 5 फीसदी से कम लेख छपते हैं, तो हिंदी अखबारों में महज 10 फीसदी ही छपते हैं.

मीडिया के 121 प्रमुख पदों में से 106 पदों पर ऊंची जाति के लोग बैठे हैं और यहां एससी, एसटी, ओबीसी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.

एनडीटीवी, आजतक, जी न्यूज आदि में एससी, एसटी एंकर एक भी नहीं है. 972 प्रमुख पत्रिकाओं में से केवल 10 पत्रिकाओं की कवर स्टोरी ही दलित और आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित होती हैं.

यह एससी, एसटी और मुसलिम की अपनी जिम्मेदारी है कि वे इन चैनलों, अखबारों, पत्रिकाओं का त्याग करें और अपने मतलब के मीडिया को सपोर्ट करें.

यह देखने की बात है कि अंगरेजी की किताबें बेचने वाली दुकानें तो खुली हुई हैं, पर हिंदी में जहां एससी, एसटी और मुसलिम के मतलब की किताबें हो सकती हैं, बंद हो चुकी हैं, क्योंकि अत्याचारों का रोना रोने वाले ये वर्ग अपने मुद्दों के बारे में भी जानने की कोशिश नहीं कर रहे.

बिना नायक की वंचित आबादी

भारत में दलितों की आबादी तकरीबन 24 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 17 फीसदी है. आदिवासी समाज कुल आबादी का 9 फीसदी हैं यानी तकरीबन 11 करोड़. वहीं मुसलिमों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी यानी 20 करोड़ के आसपास है.

दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की हालत तकरीबन एकजैसी ही है. अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को सच मानें तो ज्यादातर मुसलिमों के हालात दलितों से भी बदतर हैं. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की कुल आबादी को जोड़ दिया जाए तो देश की आबादी में इन तीनों समाजों का अनुपात तकरीबन 40 फीसदी हो जाता है. इस में ईसाई, सिख, बौद्ध और दूसरे अल्पसंख्यक समाजों को भी जोड़ लिया जाए तो यह फीसद 50 के पार पहुंच जाएगा लेकिन विडंबना यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में देश की यह आधी आबादी पूरी तरह सत्ता विहीन नजर आती है.

40 फीसदी आबादी होने के बावजूद मुसलिम, दलित और आदिवासी तो पूरी तरह हाशिए पर हैं. नेता नहीं, मीडिया नहीं, उद्योगपति नहीं, लेखक नहीं और कोई नायक नहीं.

बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय की बातें करने वाले नेताओं का लंबा इतिहास रहा है. बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, बाबू जगदेव प्रसाद और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई.

आज की राजनीति की बात करें तो सामाजिक न्याय की बातें तो नीतीश कुमार भी करते हैं, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन के बाद नीतीश कुमार के लिए सामाजिक न्याय पीछे छूट गया है. 2023 के बिहार जाति सर्वे के अनुसार बिहार की कुल आबादी में दलितों की आबादी 20 फीसदी है और पासवान जाति की कुल आबादी बिहार की कुल आबादी का 5.3 फीसदी है. इस तरह अकेले पासवान समाज ही दलितों का तकरीबन 27 फीसदी हैं और बिहार में पासवान वोटों का बड़ा हिस्सा चिराग पासवान को जाता है.

लोजपा के राजग में होने के चलते इस का फायदा सीधे भाजपा को मिलता है. यही वजह है कि पासवान जाति से इतर की तमाम दलित जातियों पर हर नेता की नजर है और वे दलितों को आकर्षित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते, पर उन के साथ हो रही सामाजिक या सरकारी बेईमानी, बेइज्जती, लूट के बारे में सब चुप हैं. यह कोई नेता नहीं करेगा. यह तो इन एससी, एसटी और मुसलिम वर्गों को अपने बलबूते पर, अपनी जागरूकता से कराना होगा. पर क्या पितापुत्र पासवानों ने एससी के इस वर्ग को हाथ पकड़ कर ऊपर खींचने के लिए कुछ किया? वे तो सत्ता में मजे लेने में लगे रहे. Bihar Elections 2025

Bihar Elections: बिहार में भाजपा की मुश्किलें

Bihar Elections: हार की राजनीति हमेशा से ही उतारचढ़ाव से भरी रही है. यहां जनता का रुझान किसी एक दल के लिए परमानैंट नहीं रहता, बल्कि काम और हालात को देख कर बदलता रहता है.

मौजूदा हालात में देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी या राजग गठबंधन के लिए जनता का झुकाव उतना नहीं है, जितना कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए है.

नीतीश कुमार की सरकार ने सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतों में सुधार किया, जिस के चलते आम लोग उन्हें ‘काम करने वाला नेता’ मानते हैं. गांवगांव में सड़कें बनीं, बिजली पहुंची और शहरों में अस्पताल व स्कूल की आलीशान इमारतें खड़ी की गईं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इन इमारतों के भीतर सहूलियतों की भारी कमी है.

अस्पतालों में न तो डाक्टर मिलते हैं और न ही दवाएं. स्कूलों में टीचर तो गिनती के हैं, पर पढ़ाई का लैवल गिरा हुआ है. यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे जाना पसंद नहीं करते. ऊपर से भ्रष्टाचार ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है.

नीतीश कुमार खुद भी अब चाह कर कुछ कर पाने की हालत में नहीं दिखते. इस वजह से आने वाला चुनाव उन के लिए भारी हो सकता है.

भाजपा की हालत और राजग की बैसाखी

बिहार में भाजपा की पकड़ उतनी मजबूत नहीं है जितनी वह दूसरे राज्यों में बना चुकी है. उस के पारंपरिक वोटर सवर्ण और वैश्य समुदाय से हैं, जिन की तादाद उतनी ही है, जितनी राजद के यादव वोटरों की. ऐसे में भाजपा को जीत पक्की करने के लिए जद (यू) जैसी पार्टी की बैसाखी चाहिए.

इस प्रदेश में भाजपा लगातार दलितों और पिछड़ों के बीच जगह बनाने की कोशिश करती रही है, लेकिन सांप्रदायिक एजेंडे और ‘हिंदूमुसलिम’ के रटेरटाए नारे उसे कामयाबी दिलाने में नाकाम रहे हैं.

राजग की सभाओं में भी वह जोश और भीड़ नहीं दिखती, जो महागठबंधन की यात्राओं में देखने को मिलती है. महागठबंधन के नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जब जनता के बीच पहुंचते हैं, तो भीड़ अपनेआप उमड़ पड़ती है. ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारे के बाद महागठबंधन को एक नई मजबूती मिली है.

इस के उलट भाजपा की सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी और प्राइवेट स्कूलों को बंद किया जाता है, ‘जीविका दीदीयों’ को बुलाने के लिए प्रशासनिक दबाव बनाया जाता है और आम दर्शकों को भाड़े पर लाया जाता है. यह सब दिखाता है कि भाजपा के पास असली जनाधार की कमी है.

मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति

राजनीति में अकसर देखा जाता है कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भावनात्मक कार्ड खेला जाता है. हाल ही में बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

एक आदमी ने मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ अपशब्द कहे. यह घटना बहुत गलत थी, लेकिन भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना कर महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे असली सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश से लौटते ही एक कार्यक्रम में आधे घंटे के भाषण में तकरीबन 25 मिनट अपनी मां का जिक्र कर दिया और यह कहा कि ‘मेरी मां का अपमान देश का अपमान है’.

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब भाजपा के कई नेता संसद से ले कर सार्वजनिक मंचों तक विपक्षी नेताओं की माताओं और आम औरतों का अपमान करते रहे हैं, तब प्रधानमंत्री ने कभी इस पर चिंता क्यों नहीं जताई? राजनीति में उन का यही दोहरापन जनता अच्छी तरह समझती है.

बिहार बंद काम न आया

भाजपा ने इस मां का अपमान करने वाले मुद्दे को आधार बना कर बिहार बंद का आह्वान किया. लेकिन बंद को कामयाब बनाने के लिए औरतों और आम जनता को अपमानित किया गया. सड़कों पर बदसुलूकी हुई, जबरन दुकानें बंद कराई गईं. पैसे दे कर भीड़ बुलाने जैसे आरोप लगाए गए.

यह सब लोकतंत्र के मूल्यों और जनता की गरिमा के खिलाफ था. सवाल यह है कि अगर किसी ने गाली दी भी थी, तो उस की गिरफ्तारी हो चुकी थी, फिर भी जनता को परेशान करना किस हद तक सही कहा जा सकता है?

बिहार की राजनीति इस समय एक चौराहे पर खड़ी है. नीतीश कुमार की इमेज अब भी भाजपा की तुलना में थोड़ी अच्छी है, लेकिन भ्रष्टाचार और कामकाज की कमजोरी ने उन के कद को भी कम किया है.

दूसरी ओर भाजपा अपने सांप्रदायिक एजेंडे से आगे नहीं बढ़ पा रही है. यही वजह है कि जनता का भरोसा महागठबंधन की ओर ज्यादा झुकता दिख रहा है.

राजनीति में जनता सिर्फ नारों और भावनाओं से नहीं, बल्कि काम और सहूलियत चाहती है. अगर भाजपा और राजग इसे समझने में नाकाम रहे, तो बिहार में उन की राह और मुश्किल हो जाएगी.

सब से बड़ी बात तो यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी बिहार में अपनी पकड़ खोते नजर आ रहे हैं. स्थानीय भाजपा नेताओं का भी वोटरों पर ज्यादा भरोसा नहीं बन पा रहा है. यह राजग के लिए खतरे की घंटी हो सकती है. Bihar Elections

Bihar Politics: बिहार में रिजर्व्ड सीटें

Bihar Politics: बिहार की राजनीति हमेशा से जातपांत, सामाजिक न्याय और राजनीतिक दलों की खींचतान पर टिकी रही है. चुनाव आते ही विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजे ज्यादातर जातीय समीकरणों और वोट बैंक पर ही तय होते हैं.

खासकर रिजर्व्ड सीटें यानी दलित और आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित 40 विधानसभा सीटें चुनावी राजनीति का असली रणक्षेत्र होती हैं. इन्हीं सीटों पर जीतहार से तय होता है कि सत्ता की चाबी किस गठबंधन के हाथ में जाएगी.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों ने इस बात को साफ कर दिया था कि इन 40 सीटों की अहमियत कितनी खास है. उस चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच रिजर्व्ड सीटों पर बेहद करीबी मुकाबला हुआ था. यही वजह है कि साल 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में दोनों गठबंधन अपनी पूरी ताकत इन सीटों पर झांकने वाले हैं.

जातीय समीकरण की जड़ें

बिहार का राजनीतिक इतिहास सामाजिक न्याय और जातीय समीकरणों की राजनीति से गहराई से जुड़ा है. 70 के दशक के आखिर और 80 के दशक में जब कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने पिछड़ों को रिजर्वेशन दिलाने की पहल की.

इस के बाद लालू प्रसाद यादव की अगुआई में 90 के दशक में ‘माय समीकरण’ (मुसलिमयादव) का नारा जोरदार तरीके से उभरा. इस दौरान दलित और अति पिछड़ा वर्ग भी इस राजनीति से जुड़ने लगे. दूसरी ओर, भाजपा और जद (यू) ने सवर्ण, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई.

आज हालत यह है कि किसी भी चुनाव में यादव और मुसलिम वोटर महागठबंधन की बुनियाद बनते हैं, जबकि अति पिछड़े और सवर्ण वोट बैंक राजग के साथ रहते हैं. दलित और महादलित वोट बैंक को ले कर दोनों गठबंधनों में सब से ज्यादा खींचतान रहती है.

राजनीतिक अहमियत

बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से 40 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए रिजर्व्ड हैं. इन में 38 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व्ड हैं. इतिहास बताता है कि बिहार में सरकार बनाने की कुंजी अकसर इन सीटों से ही निकलती है.

साल 2010 का विधानसभा चुनाव : राजग ने इन सीटों पर भारी कामयाबी पाई थी.

साल 2015 का विधानसभा चुनाव : महागठबंधन (जद (यू), राजद और कांग्रेस) ने इन सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई थी.

साल 2020 का विधानसभा चुनाव : राजग और महागठबंधन के बीच बेहद करीबी मुकाबला हुआ था.

साल 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में इन 40 सीटों पर नतीजे चौंकाने वाले रहे. भाजपा को 11 सीटें मिलीं. जद (यू) को 7 सीटें मिलीं. राजग की सहयोगी वीआईपी पार्टी को 1 सीट. वहीं महागठबंधन में राजद को 9 सीटें. कांग्रेस को 2 सीटें. भाकपा (माले) को 10 सीटें. इस तरह राजग को कुल 19 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन ने 21 सीटों पर कब्जा किया.

बिहार की राजनीति का असली संतुलन पिछड़ों और महादलितों पर टिका है. महादलित में पासवान, मुसहर, मांझ, भुइयां जैसी जातियां आती हैं. नीतीश कुमार ने महादलित को अलग पहचान दे कर योजनाओं का फायदा पहुंचाया.

अति पिछड़ा वर्ग में तकरीबन 110 जातियां इस वर्ग में आती हैं. राजग ने इन्हें संगठित करने में बड़ा रोल निभाया है.

पसमांदा मुसलिम में पिछड़े और दलित मुसलमान. राजद और कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, लेकिन हाल के सालों में भाजपा ने भी इन के बीच पैठ बनाने की कोशिशें शुरू की हैं, पर इस का असर नहीं देखा जा रहा है.

दलित राजनीति की विरासत

रामविलास पासवान का नाम बिहार की दलित राजनीति में दर्ज है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जरीए उन्होंने दलित वोट खासकर पासवान जाति के वोट को अपने तरफ कर लिया.

उन के न रहने के बाद चिराग पासवान ने दलित राजनीति को ‘मौडर्न’ अंदाज देने की कोशिश की है. साल 2020 में लोजपा (रामविलास) ने राजग से अलग हो कर चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा से नजदीकियां बनाए रखीं. चिराग पासवान की पकड़ भी दलितों में पासवान जाति पर ही खास है. दूसरी दलित जातियां इन के साथ नहीं हैं.

राजग की रणनीति

एनडीए (भाजपा, जद (यू) और लोजपा) का टारगेट दलित और अति पिछड़ा वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना है. भाजपा दलित समाज में ‘गांवगांव तक पहुंच’ बनाने पर काम कर रही है. जद (यू) ‘महादलित योजना’ और ‘आरक्षण के विस्तार’ के जरीए समर्थन जुटा रही है.

चिराग पासवान का युवा और आक्रामक तेवर राजग के लिए दलित नौजवानों में आकर्षण पैदा कर सकता है खासकर पासवान जाति तो पूरी मुस्तैदी से इन के साथ है.

महागठबंधन की रणनीति

महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दल) का आधार यादव और मुसलिम वोट बैंक है. लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए इन्हें दलित और अति पिछड़े वोटों की भी जरूरत है.

तेजस्वी यादव की अगुआई में राजद दलितों को ‘समान अवसर’ और ‘नौकरीरोजगार’ का वादा कर रही है.

माकपा (माले) गांवदेहात में दलितमजदूर वर्ग को संगठित कर रही है. कांग्रेस फिर से अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में है.

बिहार विधानसभा की 40 रिजर्व्ड सीटें केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये समाजशास्त्रीय और राजनीतिक संघर्ष की धुरी हैं.

राजग और महागठबंधन दोनों को पता है कि इन सीटों पर मिली कामयाबी ही सरकार बनाने की कुंजी होगी. साल 2025 का चुनाव दलितपिछड़े समाज की आवाज से यह तय करेगा कि बिहार किस दिशा में आगे बढ़ेगा. Bihar Politics

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