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Bihar Politics : देहमुक्ति के लिए भी पैसा चाहिए

Bihar Politics. पटना के बांसघाट में बाबा जग्गी वासुदेव का वीआईपी श्मशान गृह बन गया है. इस के लिए 15 एकड़ जमीन 99 साल के लिए एक रुपए की दर से दे दी गई है. हालांकि, इस के व्यवस्थापक भाई विवेक बताते हैं कि सारा कुछ बिहार सरकार का ही है. बस ‘ईशा फाउंडेशन’ को यह 5 साल के लिए व्यवस्था देने के लिए दिया गया है.

हमारे साथी वरिष्ठ पत्रकार कमला पांडे भी इस की तसदीक करते हैं कि यह सारा कुछ निर्माण बिहार सरकार के बुडको यानी बिहार अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमैंट कौर्पोरेशन लिमिटेड का है.

हम भारत की हर चीज को, हर सेवा को निजी हाथों में जाते हुए देख रहे हैं. अब इनसान की अंतिम यात्रा की व्यवस्था को निजी हाथों में जाते देख रहे हैं. बिहार की राजधानी पटना में इस की शुरुआत हो गई है.

यह पटना के बांसघाट में बना है. स्मार्ट सिटी के नाम पर बुडको ने 89.40 करोड़ में गंगा के किनारे प्रसिद्ध गोलघर के सामने बांसघाट पर एक वीआईपी श्मशान घाट तैयार किया है. इसे बाबा जग्गी वासुदेव की संस्था ‘ईशा फाउंडेशन’ को चलाने के लिए दे दिया गया है.

अगर आप वहां अपने किसी मित्र या परिजन के अंतिम संस्कार के लिए जाते हैं, तो आप को न्यूनतम 3,500 रुपए खर्च करने पड़ेंगे. इस के अलावा आप अगर लकड़ी या गैस का इस्तेमाल करते हैं, तो उस का खर्च अलग है. डोम राजा को 500, पंडित को 250 और नाई को 150 रुपए देने पड़ेंगे, जबकि इस के ठीक बगल में सरकारी विद्युत शवदाह गृह का चार्ज सिर्फ 300 रुपए है.

ऐसा क्यों? यह पूछने पर ‘ईशा फाउंडेशन’ के स्थायी स्वयंसेवक अमरदीप कहते हैं, ‘‘क्योंकि यह दूसरे श्मशान स्थल जैसा नहीं है. यहां आप को किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी. आप के लिए एसी वेटिंग रूम है, जहां आप बैठ कर इंतजार कर सकते हैं. दूसरे श्मशान गृहों में जैसी अव्यवस्था है, वैसी यहां नहीं है.’’

मतलब यह कि ये वीआईपी शवदाह गृह है, इसलिए इस का चार्ज वीआईपी है. स्टाफ के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘‘यहां काफी स्टाफ हैं. लेकिन हमारे मेंटेनैंस का खर्च भी बहुत ज्यादा है, सो चार्ज तो देना ही होगा न. अगर आप गैस से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं, तो उस में एक पूरा सिलिंडर खर्च हो जाता है. बिजली का बिल भी आता है. कई तरह के खर्चे हैं.’’

मगर कुलमिला कर देखा जाए तो यह सरकारी पैसे से बना श्मशान घाट है. यह अलग बात है कि इस वीआईपी श्मशान घाट को अलग स्वरूप प्रदान कर इस का संचालन ‘ईशा फाउंडेशन’ करेगा और बिहार के लोगों से मोटी रकम वसूल करेगा. मुमकिन है कि कुछ वीआईपी वहां भीड़भाड़ से बचने जाएं भी. 4 जून, 2026 को शुरू हुए इस श्मशान घाट में अब तक 90 शवों का अंतिम संस्कार हो चुका है.

‘ईशा फाउंडेशन’ पटना में दीघा में एक और ऐसा शवदाह गृह सरकार से लेने जा रहा है. इस के अलावा सिमरिया घाट, भागलपुर और सहरसा में आने वाले दिनों में वह श्मशाम गृह का संचालन शुरू करने जा रहा है. छपरा के लिए बातचीत चल रही है. ‘ईशा फाउंडेशन’ इस से पहले तमिलनाडु में ऐसे 32 श्मशान गृहों का संचालन करता रहा है. तमिलनाडु के बाद उस का अगला ठिकाना बिहार है.

इस चर्चा के दौरान यह भी जानकारी मिली कि बिहार कैबिनेट इस संस्था को एक और लाभ देने की घोषणा करने की तैयारी कर चुकी है. इस फैसले के मुताबिक मुंगेर जिले के तारापुर में प्रसिद्ध तेलडीहा मंदिर के पास की 15 एकड़ जमीन बिहार सरकार ने ‘ईशा फाउंडेशन’ को सिर्फ एक रुपए की दर से 99 साल के लिए लीज पर दिया जाना है.

वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र के अनुसार, ‘‘यह हैरत की बात है कि इस जमीन का बिहार सरकार ने इसी साल 2.64 करोड़ खर्च कर के अधिग्रहण किया है. मतलब जिस जमीन का सरकार ने हमारे 2.64 करोड़ की राशि से खरीदा, वह ‘ईशा फाउंडेशन’ को लगभग फ्री में दे रही है. यहां ‘ईशा फाउंडेशन’ आदियोगी की प्रतिमा और योग और आध्यात्मिक केंद्र बनाएगी. तारापुर के तेलडीहा मंदिर में पर्यटन के विकास के लिए पहले ही बिहार सरकार 5.28 करोड़ से अधिक की राशि स्वीकृत कर चुकी है. जाहिर है, इस का लाभ भी ‘ईशा फाउंडेशन’ को मिलेगा.’’

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार ने अपने गृह क्षेत्र में योग केंद्र खोलने का जिम्मा इसे न दे कर तमिलनाडु के ‘ईशा फाउंडेशन’ को दिया है. इस मेहरबानी की वजह बिहार के लोगों को सम झने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए. ऐसा ही चलता रहा, तो जल्दी ही यहां के सारे कर्मकांड वीआईपीनुमा होंगे. बस इस के लिए उन्हें अपनी जेब ढीली करनी होगी.

हालांकि भाई रामस्वरूप के अनुसार, ‘‘वैसे तो जग्गी वासुदेव पर ज्यादा भरोसा नहीं. फिर भी यदि 3,500 में सारे काम हो जाते हैं, तो ठीक है. लकड़ी, पंडित, डोम, नाऊ सब, तो ये तो बहुत बड़ा उपकार रहेगा. पटना में अंतिम संस्कार में मिनिमम खर्चा 7,000 से 15,000 के बीच आता है दाह संस्कार का. वैसे यह खर्च दाहसंस्कार करने आने वाले की वेशभूषा और अन्य बौडी लैंग्वेज से भी अंदाज लगाने की परंपरा रही है.

यहां आग देने के लिए ही 10,000 की मांग होती है, बाकी खर्चा अलग. ऐसे हालात में अगर 3,500 की रकम रखी गई है, तो ये निश्चित रूप से एक ठीक ही डिसीजन है. बशर्ते इस में सारे खर्च शामिल हों.’’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे जानकारी देते हैं कि बिहार सरकार ने पटना नगरनिगम के माध्यम से बांसघाट, गुलबी घाट, खाजेकलां आदि स्थानों पर 300 रुपए का शुल्क रखा है. हालांकि व्यावहारिक रूप से 350 का भुगतान करना होता है और यह भी बीपीएल वालों के लिए मुफ्त है. जब यहां पटना नगरनिगम के आयुक्त हिमांशु शर्मा थे, तभी पटना के भामाशाह फाउंडेशन ने यह व्यवस्था दी थी कि जो खर्च कर पाने में असमर्थ हैं, उन के शवों के अंतिम संस्कार श्मशान घाटों पर मुफ्त होगा. आमतौर पर यह खर्च 1,500 रुपए का हो सकता है. यह व्यवस्था आज भी है.

‘‘खर्च किस प्रकार के?’’ यह पूछने पर वे बताते हैं, ‘‘मुखाग्नि, ब्राह्मण, नाई, घाट छुड़ाई आदि के कुछ खर्च हैं. मूल खर्च तो लकडि़यों का है, जो 5-7 मन के करीब होता है. आम की लकड़ी 10 रुपए किलो, तो सखुआ की लकड़ी 20 रुपए किलो मिलती है. कुछ अमीर लोग चंदन की लकड़ी की मांग करते हैं, जो 70 रुपए किलो बैठती है.

आमतौर पर लोग इसे चंदन की लकड़ी कहते हैं. लेकिन यह हवन करने वाली देवदार की लकड़ी है. इसी प्रकार जो सखुआ की लकड़ी है, वह रेलवे के स्लीपर होते हैं, जो श्मशान घाट के व्यवसायी रेलवे विभाग से ठेके पर उठाते हैं.’’

बांस घाट के पास से गंगा लगभग 3 किलोमीटर दूर जा चुकी है. वहां कोई व्यवस्था नहीं है. नियम है कि मुखाग्नि देने वाले को पहले मुंडन वगैरह करा कर गंगा में स्नान करना होता है. इस के लिए उसे 3 किलोमीटर दूर गंगा स्नान के लिए कीचड़दलदल आदि से भरे तट को पार कर गंगा तक पहुंचना होता है, जो बेहद कष्टदायक है. और वहीं जग्गी वासुदेव का तथाकथित आलीशान श्मशान घाट है, जिस के लिए लोगों को बड़ी रकम खर्च करनी होगी.

पांडेजी का सवाल है कि जब भामाशाह फाउंडेशन महज 1,500 रुपए खर्च कर सारा कर्मकांड पूरा कर सकता है, तो फिर यह जग्गी वासुदेव के भारीभरकम खर्च को सेवा का नाम दे कर कराने का क्या मतलब है? तब और, जब बिहार सरकार ने उसे मुफ्त में सरकारी संपत्ति दी है, जहां उन्होंने पड़ाव भर डाला.

वे यह भी जानकारी देते हैं कि बांसघाट से गंगा के दूर खिसकने के वजह से हुई परेशानियों के वजह से लोग दीघाघाट चले जाते हैं, जहां गंगा किनारे पर है. हम ने वहां जा कर व्यवस्था देखी.

दीघाघाट पर बना श्मशान घाट ठीक गंगा किनारे है. एक फ्लाईओवर सामने सड़क के ऊपर गुजरते हुए आगे पटना के जेपी सेतु की ओर बढ़ जाता है. एक छोर फ्लाईओवर होते हुए डबलडैकर पुल पार करते सोनपुर की ओर बढ़ जाता है. वहीं नीचे श्मशान घाट हैं. सामने लकडि़यों, कपड़ों और दूसरे साजोसामान की फूस के छप्परों वाली दुकानें हैं.

यहां 2 शैड्स हैं, जिन में शव जलाए जाने की व्यवस्था है. यह अलग बात है कि वहां शव जलाए नहीं जाते. गंगा किनारे जा कर वहीं लकडि़यां सजा कर शवों को जलाने की व्यवस्था परिजन करते दिख रहे थे.

आमतौर पर एक शव के जलने में तकरीबन 3-4 घंटे लगते हैं. और यह समय उन्हें वहीं गुजारना होता है. आश्रय की कोई ठीकठाक व्यवस्था नहीं है. एक शीतल जल की मशीन है, जो खराब पड़ी थी. शौचालय वगैरह हैं, मगर उन की दशा भी ठीक नहीं थी. सो, सरकार को वहां इन सभी की समुचित व्यवस्था और रखरखाव करना चाहिए.

मुख्य सड़क से नदी किनारे आने के लिए भी कुछ पगडंडिया हैं. एक कच्चा ढलाव वाला रास्ता लोगों ने तैयार कर लिया है, जिस से गाडि़यां वहां उतर सकती हैं. खेद है कि सरकार खुद कोई जिम्मेदारी न ले कर बाबाओं को यह सब जिम्मेदारी दे कर मुनाफा कमाने का मौका दे रही है.

पटना का मशहूर गोलघर डीएम आवास के बगल में है. इसी के सामने रोड पार कर दिखता है बांसघाट में बना श्मशान घाट. बुडको ने बेहतरीन तो बनाया ही है, सामने दो सिंहद्वार हैं, मोक्षद्वार और वैकुंठ द्वार. अंदर पार्किंग की समुचित व्यवस्था है.

इसे पार कर अंदर जाने पर लगता नहीं कि आप किसी श्मशान घाट आए हैं. लंबेचौड़े पार्कनुमा परिसर में सजावटी फूलपत्तों के पौधे और वृक्ष लगे हैं. क्रम से विद्युत शवदाह, लकड़ी से जलाने वाले शवदाह और पारंपरिक रूप से शवदाह करने वाले शैड्स हैं, जहां अंतिम संस्कार होते हैं. इस के पीछे 2 विशाल कृत्रिम तालाब हैं, जिन के बीच में विशाल शिव की प्रतिमा दूर से ही दिखाई देती है.

फिलहाल इन तालाबों में पानी नहीं था. पता चला कि इन तालाबों में पाइपों के जरीए गंगा नदी का पानी लाया जाता है. कुछ गड़बड़ी के चलते अभी पानी लीक हो जा रहा है. सो तालाब सूखे हैं और उन में मरम्मत का काम चल रहा है. वैसे शौचालयों की व्यवस्था ठीकठाक तो है ही. पेयजल की भी सुविधा है.

अब वहां से जो जानकारियां आ रही हैं, ऊपरी खर्चे तो आप को करने ही हैं. और वह कितना होगा, पता नहीं. व्यवस्थापक विवेक ने जानकारी दी कि यहां बीपीएल लोगों के लिए मुफ्त शवदाह की व्यवस्था है. मगर पूछने पर कि दूसरे खर्च तो हैं ही, वे अपनी सहमति जाहिर करते हैं. यहां सभी मदों का खर्च फिक्स है, सो  झं झट नहीं है. हां, यहां खर्च तो है ही. वह तो आप की जेब की हैसियत से लगेंगे ही.

वीआईपी मुक्तिधाम है भाई, कोई खेल थोड़े ही है. यहां तो यही मान कर चला जाना है कि यहां जो आए हैं, वे ज्यादातर अमीर ही हैं. ऐसे में इस पीपीपी मोड में आ चुके अंतिम क्रिया को देखनेसम झने की जरूरत आप को नहीं, क्योंकि सरकार फैसला ले चुकी है. बाबा पर विश्वास करना ही होगा. आखिर आस्था का सवाल है. और इस के लिए अपनी जेब ढीली कर भारीभरकम खर्च करने के लिए तैयार रहना ही होगा. Bihar Politics

Editorial : गहरी पैठ -जनता की रीढ़ की हड्डी की चाबी धर्म के झुनझुने में

Editorial . 5  राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के नतीजों से यह तो साफ हो गया है कि चुनावी जीत सेना की जीत की तरह होती है और सिर्फ बयानों और जुलूसों से नहीं पाई जा सकती. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने हर तरह की ताकत झोकी ,वह सही थी या नहीं, भाजपा की मन के पक्के होने की बात को जरूर दिखाती है.

ममता बनर्जी ने अपने बचाव में काफी जद्दोजेहद की जो दूसरी पार्टियां नहीं कर पातीं, अपना बड़ा चहेता कैडर खड़ा किया था जो जमीन पर हरदम वोटरों को कंट्रोल में रखता था पर भाजपा ने इस बार चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, केंद्र के चुने ऊंची जातियों के अफसरों, केंद्रीय पुलिस, केंद्रीय नीतियों के हमदर्द जजों का ऐसा जाल बिछाया कि ममता बनर्जी को हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर दिया.

भारतीय जनता पार्टी के साथ पूजापाठी जमात का एक हिस्सा सदा से ही लगा रहा है और अब उसे दिख रहा है कि पौराणिक राज लाने में ज्यादा देर नहीं है तो उस ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ने में भलाई सम?ा. वे तो सदियों से राज करते आए हैं, सड़कछाप लोगों के हाथों में जो सत्ता आई थी उसे ज्यादा दिन क्यों सहें, जबकि उन के पास अच्छे लड़ाई कर सकने की कला सीखे लोग और उन के खुद्दार नेता हों. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस दूसरी पार्टियों से ज्यादा कसी हुई थी पर फिर भी उस की लड़ने की सीमा होती है. हर कमजोर पक्ष कुछ समय तक अपनी गिनती पर टिक सकता है पर आखिर में उसे उन के हाथों हारना ही पड़ता है जो सही गोटियां बैठाने में आगे हों.

ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में और स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कषगम की तमिलनाडु में हार ने साफ कर दिया है कि राज सिर्फ जनता की चाह पर या जरूरत के हिसाब से नहीं चलता, राज तो उस का चलता है जिस ने एक बार सत्ता हासिल कर ली तो वह उसे संभाल कर, उस के हर पहलू का इस्तेमाल कर के राज करता है.

मुट्ठीभर मुगल, मुट्ठीभर गोरे करोड़ों भारतीयों पर राज इसीलिए कर पाए कि उन्होंने सम?ा लिया था कि इस देश की जनता की रीढ़ की हड्डी की चाबी तो धर्म के ?ान?ाने में है और उस ?ान?ाने को या तो खुद बजा लो या बजाने वाले को खरीद लो, बस करोड़ों पर राज किया जा सकता है, उन से मनचाहा टैक्स वसूला जा सकता है, उन्हें गरीब रख कर कुछ की अमीरीको पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए पक्का कर सकते हैं.

1947 के बाद आजादी और 1950 के संविधान के बराबरी के वोट के हक को आसानी से पहले कांग्रेस ने और अब भारतीय जनता पार्टी ने इस तरह मोड़ा है कि बेमतलब का रह गया है. पहले भीड़ नेताओं के घरों के आगे लगती थी, अब भाजपा के नेता भी कठपुतली बन कर रह गए हैं तो मूर्तियों के आगे लग रही है. भाजपा ने वोट मशीनरी पर कब्जा कर के साबित कर दिया है कि लोकतंत्र को भी मैनेज करना मुश्किल नहीं है क्योंकि आम जनता को अपनी तकलीफ नहीं दिखती, वह तो उस का भाग्य है उसे तो जयजयकार के नारे, चमत्कार, पूजाअर्चना चाहिए जो उस के नजदीक होते हैं.

इन विधानसभा चुनावों से एक बड़ा बदलाव आया है क्योंकि विरोधी दलों के 2 मजबूत पिलर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु अब ढह गए हैं. उन के ढह जाने के साथसाथ इन जगहों की पार्टियों के  कैडर भी ढह जाएंगे जो सत्ता की चापलूसी पर जिंदा थे. भाजपा का पूजापाठी कैडर सरकार से सीधा नहीं मांगता, वह सरकार से ऐसे माहौल की मांग करता है जिस में उस का धंधापानी फलताफूलता रहे. इस तरह का परमानैंट कैडर फिलहाल भाजपा के अलावा कोई और पार्टी नहीं दे सकती.Editorial

Editorial : गहरी पैठ- बिहार बीजेपपी को चढ़ावे की चिंता

Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.

बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.

इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.

बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.

आज मंदिरों की बाढ़ आ रही है जो तराई से आने वाली बाढ़ से भी ज्यादा खतरनाक है. सम्राट चौधरी इसे और बढ़ाएंगे. 20 साल नीतीश कुमार ने इस थोड़ाबहुत कंट्रोल किया था पर भाजपा ने हेरफेर कर के उन्हें धक्का दिया है और अब मंदिरों की बात होगी.

बिहार की आम जनता आज भी सीधी और बेवकूफ है. उसे सदियों से पढ़नेलिखने नहीं दिया गया. कांग्रेसी सरकारों ने गांवगांव में स्कूल खोले पर वहां ऊंची जातियों के पढ़ाने वाले घुस गए जिन्होंने साजिश के तहत दलितों, पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया.

जो थोड़ीबहुत चमक बिहार में दिखती है वह तकनीक की बदौलत है. बिजली पैदा करना आसान है तो हर सड़क पर बत्ती लग सकती है, हर घर में लाइट है. बाकी अंधेरा है. सब से नीचे के पायदान पर रहने वाला बिहार अपने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से पैसों के मामले में आधा है और यह फर्क बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं क्योंकि अब पूजापाठ, पुलिस अत्याचार, बुलडोजर का राज आ गया है जिस में मरेगा गरीब, नीची पिछड़ी जाति का जना जिस की न आवाज है, न सुनवाई.  Editorial

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

Bihar Elections 2025: नई मतदाता सूची पर उठे सवाल

Bihar Elections 2025: बिहार के चुनावों के लिए तैयार की गई मतदाता सूची में काफी नाम जोड़े गए हैं, काफी हटाए गए हैं. पर लगता है कि अब जो सूची तैयार हुई है वह बहुत गलत नहीं है. अब तो मतदान के दिन पता चलेगा, जब लोग वोट डालने जाएंगे और उन्हें अपना नाम नहीं मिलेगा.

नीतीश कुमार और केंद्र सरकार ने काफी कोशिश की थी कि मतदाता सूचियों में ऐसे बदलाव किए जाएं कि मतदान का फैसला उलटा हो सके. सरकार को मालूम है कि बिहार के लोग अपने हकों के लिए लड़ने वाले नहीं हैं. वे ज्यादातर जमींदारों की गुलामी के आदी रहे हैं और अंगरेजों के आने से पहले भी कभी खड़े नहीं हुए, इसीलिए 1700 के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पैर कोलकाता के सैंटर से उस समय सिर्फ ट्रेड करनेके लिए फैलाने शुरू किए, उन्होंने बिहारी मजदूर और बिहारी सैनिक रखे.

1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद अंगरेजों की फौज में 70 फीसदी बिहारी राजपूत और ब्राह्मण हुआ करते थे जिन के बल पर उन्होंने धीरेधीरे पूरे भारत पर कब्जा किया. 1857 के बाद जरूर उन्होंने बिहारी ब्राह्मणों को सेना में रखना कम कर दिया था पर दूसरे गोरे व्यापारी बिहारियों को ही उन की सहने की आदत की वजह से रखते थे.

मौरीशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम में एग्रीमैंट कर के गए भारतीयों में से ज्यादातर यहीं के लोग थे, जिन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा जाता था. जब मुंबई, अहमदाबाद में मिलें लगनी शुरू हुईं तो ढेरों बिहारी गए, क्योंकि वे हुक्म मानने वाले हुआ करते थे.

नीतीश कुमार जो तकरीबन 20 वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, इसीलिए सत्ता में हैं क्योंकि एक आम बिहारी की तरह वे जो मालिक है उस के साथ हो जाते रहे हैं. लालू प्रसाद यादव ने बिहारियों को हक दिलाने की कोशिश की पर फिर ऊंची जात वालों ने ऐसे फंदे फेंके कि उन्हें अपनी जिंदगी कचहरियों और जेलों में बितानी पड़ी.

मतदाता सूची में से लाखों नाम कट जाते तो वे चूं नहीं करते और इसीलिए ज्ञानेश कुमार जैसे अफसर को चुनाव आयुक्त की तरह लगाया गया जो पूरी तरह सरकार के साथ था.

यह तो राहुल गांधी की न्याय यात्रा और वोट चोरी का इलजाम था कि जो मतदाता सूची अब तैयार हुई है उस पर मोटेतौर पर कोई हंगामा नहीं मच रहा. 14 नवंबर को फैसला चाहे जो भी आए, यह तो दिखता है कि आम बिहारी का वोट का हक पक्का रहेगा. राहुल गांधी ने पूरे देश में वोट की कीमत भी बता दी है और चुनाव आयोग अब कानून की आड़ में खड़ा हो कर कहीं भी वोटों की काटाछांटी नहीं कर सकेगा.

संविधान की खैरियत इसी में है कि लोगों का वोटों का हक जान के जैसा रहे. सरकारें इसे छीनेंगी क्योंकि वे अब नहीं चाहतीं कि डैमोक्रेसी के नाम पर उन पर बंदिशें लगें. अब जो जीतता है वह डोनाल्ड ट्रंप की तरह महामहिम बनना चाहता है जो हर सुबह नए तुगलकी फरमान जारी कर सके. अमेरिका में न सही भारत में लगता है वोट का हक अब छीनना आसान नहीं रह गया है.

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खेलों में हारजीत चलती रहती है पर जिस तरह से भारतपाकिस्तान के 3 मैच एशिया कप में लगभग बराबरी पर खत्म हुए उस से साफ है कि इस मामले में दोनों टीमें एकदूसरे के खिलाफ नहीं, एकदूसरे के साथ लाखों जुआ और सट्टा लगाने वालों के लिए खेल रही थीं. 14 सितंबर को हुए मैच में तो भारत की टीम ढंग से खेली पर 21 सितंबर को केवल डेढ़ ओवर आगे रह कर, फाइनल में केवल 3 बौल आगे रह कर दोनों टीमों ने सट्टेबाजों को करोड़ों नहीं, अरबों का फायदा दिलाया था.

भारत और पाकिस्तान अब सिर्फ क्रिकेट खेलते हैं. वह भी 22 लोगों को खिलाते हैं और बाकी तो जुआ खेलते हैं. इस जुए में कि भारत जीतेगा कि पाकिस्तान जीतेगा, इस बौल में कैच आउट होगा या चौका लगेगा, इस बैट्समैन के 10 रन बनेंगे या 50 पर जबरदस्त शर्तें लगती हैं. लाखों को किक मिलती है जो अच्छे से अच्छे खेल में नहीं मिलती.

टीवी पर मैच देखना भारतीय जनता का सब से बड़ा खेल है. मोबाइल पर रील्स देखने के बाद भारत और पाकिस्तान के युवा कुछ करते हैं तो भारतपाकिस्तान का मैच देखते हैं जो कुंभ की तरह कभीकभार ही होते हैं. एशिया कप के आयोजकों ने सम झ लिया था इसीलिए उन्होंने दोनों को 3-3 बार खिलवाया जो साफ है कि एक स्कीम के हिसाब से हुआ.

सट्टेबाजी हर जगह होती है पर यहां अब खेलों के नाम पर सिर्फ सट्टेबाजी बची है. एथलैटिक्स और कुश्ती में जहां भारतीय खिलाड़ी मैडल ले आते हैं, न दर्शक होते हैं, न मैच फिक्सिंग होती है. सट्टेबाजी का तो सवाल ही नहीं उठता.

इस सट्टेबाजी में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगे हुए थे क्योंकि भारत की टीम के जीतने पर उन्होंने उसे ‘आपरेशन सिंदूर’ से जोड़ते हुए बधाई दे दी. इंटरनैशनल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड असल में वैसे ही भारत सरकार की एक यूनिट है और सारे फैसले भारत को देख कर लिए जाते हैं क्योंकि क्रिकेट में पैसा तो भारत के दर्शक ही देते हैं. टीवी राइट्स अरबों में बिकते हैं क्योंकि विज्ञापन करने वालों को पता है कि भारतीय बदहाल युवा कामधाम छोड़ कर इन्हें जरूर देखेंगे और वहां वे अपना पानमसाला जबरदस्त तरीके से बेचते हैं.

एशिया कप हो, वर्ल्ड कप हो, टी 20 हो, वनडे हो यह तमाशा चलता रहता है क्योंकि यह एक जगह है जहां से पाकिस्तान के बहाने हिंदुस्तान के मुसलमानों को कहने का मौका मिलता है कि दिखा दिया न, तुम्हारी औकात क्या है.

फुटबाल, टैनिस, फील्ड गेम्स, तैराकी, जिमनास्टिक जैसे बीसियों खेलों में भारत व पाकिस्तान की टीमें कहीं नजर नहीं आएंगी. पहले जिस हौकी पर ब्रिटिश इंडिया के समय से कब्जा था वह खेल भी 20-25 साल पहले हाथ से निकल गया क्योंकि वहां फिक्सिंग नहीं होती, सट्टा नहीं लगता. एशिया कप में भारत और पाकिस्तान दोनों की क्रिकेट टीमें जीती हैं, दोनों के खिलाडि़यों ने न जाने कहांकहां कमाया होगा. Bihar Elections 2025

Crime News In Hindi: बिहार में सुपारी किलिंग का कहर

Crime News In Hindi: बिहार की धरती पर अपराध का एक नया और खतरनाक चेहरा उभर रहा है. हत्या अब गुस्से का नतीजा नहीं, बल्कि ठेके पर मिलने वाली ‘सेवा’ बन चुकी है. हालिया पुलिस आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 7 महीनों में 1,436 हत्याएं हुईं और इन में से हर तीसरी हत्या सुपारी दे कर कराई गई.

यह आंकड़ा सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि समाज में गहरे तक फैल चुके अपराधीकरण का सुबूत भी है. हत्या कराने वाला सोचता है कि इस में तो मेरा सिर्फ पैसा लग रहा है. हम आसानी से अपने दुश्मन की हत्या भी करवा देंगे और खुद सेफ रहेंगे.

सनसनीखेज हत्याएं

पटना में एडवोकेट जितेंद्र मेहता की हत्या उन की बेटी के प्रेमी मोहम्मद शोएब ने कराई. डेढ़ लाख रुपए में सौदा तय हुआ. पुलिस ने 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया.

गोपाल खेमका नामक कारोबारी की हत्या कारोबारी दुश्मनी के चलते सुपारी शूटरों के जरीए कराई गई.

गैंगस्टर चंदन मिश्रा को मारने के लिए हर शूटर को 4 लाख रुपए देने की डील हुई.

औरंगाबाद में एक औरत ने अपने फूफा के साथ मिल कर सुहागरात के दिन ही पति को मरवा दिया.

इन घटनाओं से साफ है कि हत्या अब पैसों का सौदा बन चुकी है, चाहे वजह प्यार हो, पैसा हो या सत्ता की लड़ाई.

सुपारी किलिंग की दरें

यह जान कर ताज्जुब होता है कि महज 2,000 रुपए एडवांस ले कर अपराधी किसी की हत्या कर देता है. ज्यादातर हत्या का रेट 2 लाख से 10 लाख रुपए के बीच तय किया जाता है.

हत्या करने वाले अपराधी, जिन्हें बिहार में ‘शूटर’ के नाम से जानते हैं, की उम्र 18 से 30 साल के बीच होती है. ज्यादातर बिना आपराधिक रिकौर्ड के होते हैं.

हत्या की अहम वजहों में जमीन विवाद, प्रेम संबंध, राजनीतिक दुश्मनी, कारोबारी रंजिश माना जाता है.

अपराध का उद्योग सुपारी किलिंग

यह अपराध अब यूनिट आधारित संगठित नैटवर्क में बदल चुका है. कौन्ट्रैक्ट फिक्सिंग में एडवांस पैसे ले कर डील पक्की की जाती है. प्रोफैशनल किलर्स या अपराधमुक्त नौजवानों को चुना जाता है. लोकेशन, समय और बचाव की रणनीति तैयार होती है. अपराध के बाद शूटरों को महफूज ठिकाने दिए जाते हैं.

पुलिस की नई पहल ‘किलर सैल’

लगातार बढ़ती घटनाओं को देखते हुए बिहार पुलिस ने ‘किलर सैल नामक एक खास यूनिट बनाई है. इस का मकसद है सुपारी गिरोहों की पहचान करना, वित्तीय स्रोतों का पता लगाना और शूटर नैटवर्क को खत्म करना.

पुलिस अफसरों का कहना है कि यह सैल ‘क्राइम नैटवर्क की रीढ़ तोड़ने’ की दिशा में काम करेगा.

जब कानून व्यवस्था भी हांफने लगे

हर तीसरी हत्या सुपारी दे कर होना केवल अपराध नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था की नाकामी और समाज के लिए बीमारी है. पुलिस के लिए शूटरों की पहचान करना मुश्किल होता है, क्योंकि ज्यादातर का कोई पुराना रिकौर्ड नहीं होता है. अपराध के बाद फरारी और सुबूत मिटाने करने की रणनीति. राजनीतिक संरक्षण और स्थानीय नैटवर्क का समर्थन भी पुलिस की राह में रोड़ा बनता है.

इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कड़े कानून बनाने की जरूरत है. फास्ट ट्रायल और कड़ी सजा. खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा. गिरोहों की शुरुआती गतिविधियां

पकड़ने के लिए हाईटैक मौनिटरिंग करने पड़ेगी. विवाद सुल झाने में कानूनी रास्तों को प्राथमिकता देनी होगी. अपराध और राजनीति के गठजोड़ को खत्म करना होगा.

राजनीतिक दल के रसूखदार नेता अपराधियों की पैरवी करने लगते हैं, जिस से अपराधियों को मदद मिल जाती है और उन का मनोबल बढ़ जाता है. बहुत से नेताओं का गठजोड़ भी इन शूटर अपराधियों से होता है.

सुपारी किलिंग सिर्फ अपराध नहीं है, बल्कि सरकार की नैतिक और सामाजिक नाकामी है. जब हत्या एक ‘सेवा’ बन जाए और जान की कीमत तय होने लगे, तो यह पूरे समाज की हार है. अब समय है कि पुलिस, कानून और समाज मिल कर इस अपराध उद्योग को जड़ से खत्म करें, वरना वह दिन दूर नहीं जब ‘जान लेना’ बिहार में ‘आम धंधा’ बन जाएगा. Crime News In Hindi

Bihar Elections: बिहार में भाजपा की मुश्किलें

Bihar Elections: हार की राजनीति हमेशा से ही उतारचढ़ाव से भरी रही है. यहां जनता का रुझान किसी एक दल के लिए परमानैंट नहीं रहता, बल्कि काम और हालात को देख कर बदलता रहता है.

मौजूदा हालात में देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी या राजग गठबंधन के लिए जनता का झुकाव उतना नहीं है, जितना कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए है.

नीतीश कुमार की सरकार ने सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतों में सुधार किया, जिस के चलते आम लोग उन्हें ‘काम करने वाला नेता’ मानते हैं. गांवगांव में सड़कें बनीं, बिजली पहुंची और शहरों में अस्पताल व स्कूल की आलीशान इमारतें खड़ी की गईं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इन इमारतों के भीतर सहूलियतों की भारी कमी है.

अस्पतालों में न तो डाक्टर मिलते हैं और न ही दवाएं. स्कूलों में टीचर तो गिनती के हैं, पर पढ़ाई का लैवल गिरा हुआ है. यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे जाना पसंद नहीं करते. ऊपर से भ्रष्टाचार ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है.

नीतीश कुमार खुद भी अब चाह कर कुछ कर पाने की हालत में नहीं दिखते. इस वजह से आने वाला चुनाव उन के लिए भारी हो सकता है.

भाजपा की हालत और राजग की बैसाखी

बिहार में भाजपा की पकड़ उतनी मजबूत नहीं है जितनी वह दूसरे राज्यों में बना चुकी है. उस के पारंपरिक वोटर सवर्ण और वैश्य समुदाय से हैं, जिन की तादाद उतनी ही है, जितनी राजद के यादव वोटरों की. ऐसे में भाजपा को जीत पक्की करने के लिए जद (यू) जैसी पार्टी की बैसाखी चाहिए.

इस प्रदेश में भाजपा लगातार दलितों और पिछड़ों के बीच जगह बनाने की कोशिश करती रही है, लेकिन सांप्रदायिक एजेंडे और ‘हिंदूमुसलिम’ के रटेरटाए नारे उसे कामयाबी दिलाने में नाकाम रहे हैं.

राजग की सभाओं में भी वह जोश और भीड़ नहीं दिखती, जो महागठबंधन की यात्राओं में देखने को मिलती है. महागठबंधन के नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जब जनता के बीच पहुंचते हैं, तो भीड़ अपनेआप उमड़ पड़ती है. ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारे के बाद महागठबंधन को एक नई मजबूती मिली है.

इस के उलट भाजपा की सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी और प्राइवेट स्कूलों को बंद किया जाता है, ‘जीविका दीदीयों’ को बुलाने के लिए प्रशासनिक दबाव बनाया जाता है और आम दर्शकों को भाड़े पर लाया जाता है. यह सब दिखाता है कि भाजपा के पास असली जनाधार की कमी है.

मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति

राजनीति में अकसर देखा जाता है कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भावनात्मक कार्ड खेला जाता है. हाल ही में बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

एक आदमी ने मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ अपशब्द कहे. यह घटना बहुत गलत थी, लेकिन भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना कर महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे असली सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश से लौटते ही एक कार्यक्रम में आधे घंटे के भाषण में तकरीबन 25 मिनट अपनी मां का जिक्र कर दिया और यह कहा कि ‘मेरी मां का अपमान देश का अपमान है’.

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब भाजपा के कई नेता संसद से ले कर सार्वजनिक मंचों तक विपक्षी नेताओं की माताओं और आम औरतों का अपमान करते रहे हैं, तब प्रधानमंत्री ने कभी इस पर चिंता क्यों नहीं जताई? राजनीति में उन का यही दोहरापन जनता अच्छी तरह समझती है.

बिहार बंद काम न आया

भाजपा ने इस मां का अपमान करने वाले मुद्दे को आधार बना कर बिहार बंद का आह्वान किया. लेकिन बंद को कामयाब बनाने के लिए औरतों और आम जनता को अपमानित किया गया. सड़कों पर बदसुलूकी हुई, जबरन दुकानें बंद कराई गईं. पैसे दे कर भीड़ बुलाने जैसे आरोप लगाए गए.

यह सब लोकतंत्र के मूल्यों और जनता की गरिमा के खिलाफ था. सवाल यह है कि अगर किसी ने गाली दी भी थी, तो उस की गिरफ्तारी हो चुकी थी, फिर भी जनता को परेशान करना किस हद तक सही कहा जा सकता है?

बिहार की राजनीति इस समय एक चौराहे पर खड़ी है. नीतीश कुमार की इमेज अब भी भाजपा की तुलना में थोड़ी अच्छी है, लेकिन भ्रष्टाचार और कामकाज की कमजोरी ने उन के कद को भी कम किया है.

दूसरी ओर भाजपा अपने सांप्रदायिक एजेंडे से आगे नहीं बढ़ पा रही है. यही वजह है कि जनता का भरोसा महागठबंधन की ओर ज्यादा झुकता दिख रहा है.

राजनीति में जनता सिर्फ नारों और भावनाओं से नहीं, बल्कि काम और सहूलियत चाहती है. अगर भाजपा और राजग इसे समझने में नाकाम रहे, तो बिहार में उन की राह और मुश्किल हो जाएगी.

सब से बड़ी बात तो यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी बिहार में अपनी पकड़ खोते नजर आ रहे हैं. स्थानीय भाजपा नेताओं का भी वोटरों पर ज्यादा भरोसा नहीं बन पा रहा है. यह राजग के लिए खतरे की घंटी हो सकती है. Bihar Elections

Bihar Politics: बिहार में रिजर्व्ड सीटें

Bihar Politics: बिहार की राजनीति हमेशा से जातपांत, सामाजिक न्याय और राजनीतिक दलों की खींचतान पर टिकी रही है. चुनाव आते ही विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजे ज्यादातर जातीय समीकरणों और वोट बैंक पर ही तय होते हैं.

खासकर रिजर्व्ड सीटें यानी दलित और आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित 40 विधानसभा सीटें चुनावी राजनीति का असली रणक्षेत्र होती हैं. इन्हीं सीटों पर जीतहार से तय होता है कि सत्ता की चाबी किस गठबंधन के हाथ में जाएगी.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों ने इस बात को साफ कर दिया था कि इन 40 सीटों की अहमियत कितनी खास है. उस चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच रिजर्व्ड सीटों पर बेहद करीबी मुकाबला हुआ था. यही वजह है कि साल 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में दोनों गठबंधन अपनी पूरी ताकत इन सीटों पर झांकने वाले हैं.

जातीय समीकरण की जड़ें

बिहार का राजनीतिक इतिहास सामाजिक न्याय और जातीय समीकरणों की राजनीति से गहराई से जुड़ा है. 70 के दशक के आखिर और 80 के दशक में जब कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने पिछड़ों को रिजर्वेशन दिलाने की पहल की.

इस के बाद लालू प्रसाद यादव की अगुआई में 90 के दशक में ‘माय समीकरण’ (मुसलिमयादव) का नारा जोरदार तरीके से उभरा. इस दौरान दलित और अति पिछड़ा वर्ग भी इस राजनीति से जुड़ने लगे. दूसरी ओर, भाजपा और जद (यू) ने सवर्ण, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई.

आज हालत यह है कि किसी भी चुनाव में यादव और मुसलिम वोटर महागठबंधन की बुनियाद बनते हैं, जबकि अति पिछड़े और सवर्ण वोट बैंक राजग के साथ रहते हैं. दलित और महादलित वोट बैंक को ले कर दोनों गठबंधनों में सब से ज्यादा खींचतान रहती है.

राजनीतिक अहमियत

बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से 40 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए रिजर्व्ड हैं. इन में 38 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व्ड हैं. इतिहास बताता है कि बिहार में सरकार बनाने की कुंजी अकसर इन सीटों से ही निकलती है.

साल 2010 का विधानसभा चुनाव : राजग ने इन सीटों पर भारी कामयाबी पाई थी.

साल 2015 का विधानसभा चुनाव : महागठबंधन (जद (यू), राजद और कांग्रेस) ने इन सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई थी.

साल 2020 का विधानसभा चुनाव : राजग और महागठबंधन के बीच बेहद करीबी मुकाबला हुआ था.

साल 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में इन 40 सीटों पर नतीजे चौंकाने वाले रहे. भाजपा को 11 सीटें मिलीं. जद (यू) को 7 सीटें मिलीं. राजग की सहयोगी वीआईपी पार्टी को 1 सीट. वहीं महागठबंधन में राजद को 9 सीटें. कांग्रेस को 2 सीटें. भाकपा (माले) को 10 सीटें. इस तरह राजग को कुल 19 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन ने 21 सीटों पर कब्जा किया.

बिहार की राजनीति का असली संतुलन पिछड़ों और महादलितों पर टिका है. महादलित में पासवान, मुसहर, मांझ, भुइयां जैसी जातियां आती हैं. नीतीश कुमार ने महादलित को अलग पहचान दे कर योजनाओं का फायदा पहुंचाया.

अति पिछड़ा वर्ग में तकरीबन 110 जातियां इस वर्ग में आती हैं. राजग ने इन्हें संगठित करने में बड़ा रोल निभाया है.

पसमांदा मुसलिम में पिछड़े और दलित मुसलमान. राजद और कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, लेकिन हाल के सालों में भाजपा ने भी इन के बीच पैठ बनाने की कोशिशें शुरू की हैं, पर इस का असर नहीं देखा जा रहा है.

दलित राजनीति की विरासत

रामविलास पासवान का नाम बिहार की दलित राजनीति में दर्ज है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जरीए उन्होंने दलित वोट खासकर पासवान जाति के वोट को अपने तरफ कर लिया.

उन के न रहने के बाद चिराग पासवान ने दलित राजनीति को ‘मौडर्न’ अंदाज देने की कोशिश की है. साल 2020 में लोजपा (रामविलास) ने राजग से अलग हो कर चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा से नजदीकियां बनाए रखीं. चिराग पासवान की पकड़ भी दलितों में पासवान जाति पर ही खास है. दूसरी दलित जातियां इन के साथ नहीं हैं.

राजग की रणनीति

एनडीए (भाजपा, जद (यू) और लोजपा) का टारगेट दलित और अति पिछड़ा वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना है. भाजपा दलित समाज में ‘गांवगांव तक पहुंच’ बनाने पर काम कर रही है. जद (यू) ‘महादलित योजना’ और ‘आरक्षण के विस्तार’ के जरीए समर्थन जुटा रही है.

चिराग पासवान का युवा और आक्रामक तेवर राजग के लिए दलित नौजवानों में आकर्षण पैदा कर सकता है खासकर पासवान जाति तो पूरी मुस्तैदी से इन के साथ है.

महागठबंधन की रणनीति

महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दल) का आधार यादव और मुसलिम वोट बैंक है. लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए इन्हें दलित और अति पिछड़े वोटों की भी जरूरत है.

तेजस्वी यादव की अगुआई में राजद दलितों को ‘समान अवसर’ और ‘नौकरीरोजगार’ का वादा कर रही है.

माकपा (माले) गांवदेहात में दलितमजदूर वर्ग को संगठित कर रही है. कांग्रेस फिर से अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में है.

बिहार विधानसभा की 40 रिजर्व्ड सीटें केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये समाजशास्त्रीय और राजनीतिक संघर्ष की धुरी हैं.

राजग और महागठबंधन दोनों को पता है कि इन सीटों पर मिली कामयाबी ही सरकार बनाने की कुंजी होगी. साल 2025 का चुनाव दलितपिछड़े समाज की आवाज से यह तय करेगा कि बिहार किस दिशा में आगे बढ़ेगा. Bihar Politics

भोजपुरी अंदाज में Rashmika Mandana ने पूछा पटना का हाल, Pushpa2 के ट्रेलर में पहुंची

इन दिनों भोजपुरी सिनमें किसी बौलीवुड (Bollywood) सिनेमा से कम पिछे नहीं है, इसकी टक्कर में टौलीवुड सिनेमा भी खड़ा है और इन में सब में तड़का अगर कोई लगा रही है तो वे एक्ट्रैस जो टौलीवुड(Tollywood) से बौलीवुड में अपनी जलवा बिखेर सभी का दिल जीत रही है और फैंस के दिलों पर राज कर रही है. जी हां, हम बात कर रहे है फिल्म ‘एनीमल’ (Animal) की एक्ट्रैस रश्मिका मंदाना(Rashmika Mandana) की. जिन्होंने रणबीर कपूर (Ranbir Kapoor) के साथ जबरदस्त एक्टिंग कर सभी को अपना फैन बना लिया और अब पुष्पा 2 (Pushpa2) के ट्रैलर पर पटना पहुंची है.

 

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बिहार के लिए 17 नवंबर बेहद ही खास दिन रहा. क्योंकि लंबे समय के बाद बिहार(Bihar) में फिल्म सिटी की मांग हो रही है और बिहार सरकार ने इसको लेकर पहले भी शुरु कर दि है. वही, राजधानी पटना(Patna) के ऐतिहासिक गांधी मैदान में ब्लॉकबस्टर साउथ मूवी पुष्पा 2 की ट्रैलर भी रिलीज किया गया. इस ट्रैलर की खास बात ये रही है कि एक्टर अल्लू अर्जुन और एक्ट्रैस रश्मिका मंदाना मौजूद थे. जहां एक्ट्रैस ने अपनी स्टंनिग अंदाज से लोगों को दिल छू लिया. उनका वैलकैम बिहारी अंदाज में किया जो कियो लोग उनके फैन हो गए.

रश्मिका मंदाना ने पटना के लोगों से भोजपुरी अंदाज में वैलकम किया और कहा कि ‘का हाल बा’    ‘सब ठीकठाक बा नू…’ इस पर लोगों ने पहले हुटिंग शुरु कर दी. कराऊड भी जमकर था. पौपुलर फिल्म और एक्ट्रैस को इस अंदाज में देखने से कौन बचना चहता है. रश्मिका ने स्टेज पर ये भी कहा कि आप लोग जरूर जरूर 5 दिसंबर को मूवी देखिएगा.

वहीं, इस दौरान अल्लू अर्जुन(Allu Arjun) ने कहा कि ‘पुष्पा झुकेगा नहीं लेकिन पटना वालों के सामने आज पुष्पा झुकेगा. इस पर पटना ही भीड़ हंस कर उनका स्वागत करने लगी. अल्लू अर्जुन आगे कहते है कि मेरी हिंदी इतनी अच्छी नहीं है, लेकिन आप लोग का मैं धन्यवाद देता हूं. वही, एक्ट्रैस के भोजपुरी अंदाज से तो सभी खुशी थे कि जाते जाते मंच से रश्मिका ने सभी को ‘आई लव यू’ कह कर अलविदा लिया.

बता दें कि पुष्पा 2 के ट्रेलर लौन्चिंग के दौरान कई अन्य प्रोडक्शन से जुड़े सदस्य भी आज राजधानी पटना में मौजूद रहे. पटना के गांधी मैदान में लाखों की संख्या में लोग फिल्म के ट्रेलर देखने पहुंचे थे. वहीं, इस दौरान सुरक्षा को लेकर भी पुख्ते इंतजाम किए गए थे.

जब फूटफूट कर रो पड़े थे ये नेता जी, वीडियो हुए वायरल

नेताओं को भाषण देते हुए तो आपने खूब सुना होगा. अपने भाषणों में अच्छा बुरा सब बोलते हुए देखे गए है, लेकिन कभी कभी नेता मंच पर पुराने किस्से या नेताओं को याद कर इमोशनल भी हो जाते है. ऐसे कई नेता जी है जिनकी वीडियो सोशल मीडिया पर रोने की खूब वायरल होती रहती है. आप भी देखें एक झलक कि आखिर क्यों और कहां रो पड़े ये नेतगण.

 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हुए थे इमोशनल, कर दी थी सबकी आंखे नम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई बार इमोशनल होते देखा गया है. उनकी कई ऐसी वीडियोज है जिनमें वे काफी इमोशनल होते दिखे है. मोदी कई बार इंटरव्यू में भी कई किस्से सुनाते हुए भावुक नजर आए है. लेकिन पहली दफा जब नरेंद्र मोदी संसद भवन के अंदर गए थे. तो पहले तो सेंट्रल हौल में जाने से पहले सीढियों पर झुके और फिर अपनी पार्टी के सदस्यों को संबोधित करते हुए रो पड़े.

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वैशाली में चिराग पासवान ने रो रो के कर लिया था बुरा हाल

चिराग पासवान वैशाली में एक बार काफी भावुक हो गए थे. वे बुरी तरह रो पड़े थे, हालांकि मंजर ही कुछ ऐसा था. राम विलास पासवान की 76वीं जयंती के मौके पर जब लोगों के आंसू छलके, तब चिराग पासवान भी फूट फूट कर रोने लगे. हालांकि वे इससे पहले भी कई बार विपक्ष के वार पर बोलते हुए भी इमोशनल हो चुके है.

मंच पर फूट फूट कर रोने लगे थे पप्पू यादव

राजेश रंजन, जिन्हें ‘पप्पू यादव’ के नाम से जाना जाता है. एक नेता है. जो अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहते है. हालांकि उन्हे हमेशा बेबाकी से बोलते हुए देखा है. लेकिन उनके साथ ऐसा भी हुआ है कि वे बी मंच पर बोलते बोलते इमोशनल हो गए. जी हां, पुरनिया में भाषण के दौरान पप्पू यादव रोने लगे थे. उन्होंने कहा था कि मेरी पार्टी खत्म की, मुझसे नफरत और अब ऐसी दुश्मनी.. ये बातें कर पप्पू यादव रो पड़े थे.

भाषण के दौरान रो पड़े थे राहुल गांधी

राहुल गांधी ने एक युवा नेता के रुप में सबके दिलों पर राज किया. आज भी राहुल गांधी को चुनावी रैलियों में देखा जाता है कभी मंच पर, कभी रोड़ पर. राहुल गांधी भी एक बार काफी इमोशनल हो गए थे. जब वे लोकसभा में मंच पर खड़े होकर भाषण दे रहे थे. वे मंच पर कुछ ऐसे गहरे शब्द कह गए. जिनसे वे भावुक हो उठे.

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