Editorial . 5 राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के नतीजों से यह तो साफ हो गया है कि चुनावी जीत सेना की जीत की तरह होती है और सिर्फ बयानों और जुलूसों से नहीं पाई जा सकती. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने हर तरह की ताकत झोकी ,वह सही थी या नहीं, भाजपा की मन के पक्के होने की बात को जरूर दिखाती है.
ममता बनर्जी ने अपने बचाव में काफी जद्दोजेहद की जो दूसरी पार्टियां नहीं कर पातीं, अपना बड़ा चहेता कैडर खड़ा किया था जो जमीन पर हरदम वोटरों को कंट्रोल में रखता था पर भाजपा ने इस बार चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, केंद्र के चुने ऊंची जातियों के अफसरों, केंद्रीय पुलिस, केंद्रीय नीतियों के हमदर्द जजों का ऐसा जाल बिछाया कि ममता बनर्जी को हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर दिया.
भारतीय जनता पार्टी के साथ पूजापाठी जमात का एक हिस्सा सदा से ही लगा रहा है और अब उसे दिख रहा है कि पौराणिक राज लाने में ज्यादा देर नहीं है तो उस ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ने में भलाई सम?ा. वे तो सदियों से राज करते आए हैं, सड़कछाप लोगों के हाथों में जो सत्ता आई थी उसे ज्यादा दिन क्यों सहें, जबकि उन के पास अच्छे लड़ाई कर सकने की कला सीखे लोग और उन के खुद्दार नेता हों. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस दूसरी पार्टियों से ज्यादा कसी हुई थी पर फिर भी उस की लड़ने की सीमा होती है. हर कमजोर पक्ष कुछ समय तक अपनी गिनती पर टिक सकता है पर आखिर में उसे उन के हाथों हारना ही पड़ता है जो सही गोटियां बैठाने में आगे हों.
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