Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.
बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.
इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.
बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.
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