Editorial. दिल्ली के जंतरमंतर पर कुछ दिन पहले आरक्षण हटाओ के लिए धरना प्रदर्शन हुआ. खासी भीड़ थी और जो मौजूद थे उन में से ज्यादा ने कलेवे बांधे हुए थे, तिलक लगाए हुए थे, कुछ के बालों में चोटी भी थी. वे मनुस्मृति का गुणगान कर रहे थे और संविधान की आरक्षण की नीति की आलोचना कर रहे थे.

ये कहां के आरक्षण की बात कर रहे थे? क्या शादियों में जातियों को जो आरक्षण मिला है, उस की बात कर रहे थे? क्या मंदिरों में पुजारियों के पुजारी बनने का जो आरक्षण मिला है, उस की बात कर रहे थे? क्या सरकारी स्कूलों में दाखिले में किसी आरक्षण की बात कर रहे थे?

नहीं. ये बात कर रह थे सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की. ये प्राइवेट नौकरियों में भी किसी आरक्षण की बात नहीं कर रहे थे. ये सरकारी नौकरी चाहते हैं क्योंकि सरकारी नौकरी का मतलब पैसा और उस से ज्यादा रुतबा. सरकारी नौकरी के लिए इस जमात के लोग पौराणिक कहानियों में भी खूब आते हैं कि फलां ऋषि या फलां मुनि राजा के पास गया और उस ने राजा से धन, गाय, औरतें मांगीं और मिल गईं और वह आशीर्वाद देता लौट गया.

आज उन्हीं की संतानें फिर से वही हक मांग रही हैं. मुसलमानों के 1,000 साल के राज में इन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिलीं. इन में से कुछ के पुरखों ने जरूर दरबारों में छोटीमोटी नौकरियां कीं पर जो उन का हाकिम, जो मुसलिम था, रुतबा नहीं मिला जबकि वे पौराणिक कथाकहानियां चाहते थे जो शायद कभी असल में था ही नहीं.

मुसलमानों से पहले भी जो इतिहास मिलता है उस के हिसाब से इन ऊंची जाति के आरक्षण विरोध करने वालों को कोई जगह कभी नहीं मिली, मौर्य काल में नहीं मिली. शकों के राज में नहीं मिली, हूणों के राज में नहीं मिली.

अंगरेजों के राज में गोरे साहबों के जूते चमकाने पर मिली क्योंकि गोरे साहबों ने इन्हें पढ़ालिखा दिया. उस समय इन लोगों के पुरखों ने बाकियों को तो सही ढंग से बोलना भी नहीं सिखाया था. कहने को सारा ज्ञान इन के पुरखों के दिमाग में था पर उन्होंने अपनी बिरादरियों के अलावा किसी के साथ कभी शेयर नहीं किया.

जब अंगरेज आए तो उन्हें सम झदार चाहिए थे जो लिखापढ़ा सम झ सके. उन्होंने इन्हीं के पुरखों को 1707 के बाद गोरी फौजों में शामिल करना शुरू किया और उस से इस जमात का रुतबा बढ़ा. इन के पास बंदूकें, राइफलें भी आ गईं. इन का समाज पर दबदबा बढ़ गया. कांग्रेस पर कब्जा कर लिया. कांग्रेसी नेताओं ने धर्मकर्म को खूब बढ़ावा दिया और जाति का जहर खूब फैलाया. जो बात पहले सिर्फ मुंह से जबानी एक से दूसरे तक जाती थी अब छप कर बांटी जानी लगी, पर नुकसान हुआ सदियों से समाज में व सरकारों के हाथों सताए लोगों का. पर उन में से कुछ ने इस साजिश को सम झ लिया, पढ़ लिया.

इसी की वजह से आरक्षण जन्मा. महज 3-4 फीसदी नौकरियां के लिए यह बड़ा जमावड़ा इकट्ठा हुआ क्योंकि थोड़ी सी नौकरियों के बल पर सैकड़ों नहीं करोड़ों और छोटे काम धंधे पनप जाते हैं जो सेवा करने के लिए नहीं सेवा करवाने के लिए तैयार होते हैं. आरक्षण उस दरवाजे का रोड़ा है जो जन्म से बड़ों को इन पैसे और रुतबे वाली नौकरियों के आम जनता से शेयर करने को फोर्स करता है.

आरक्षण खत्म नहीं हो सकता. ये लोग जानते हैं पर जमा यह जताने के लिए हुए कि जिन के पास सत्ता है वे सम झें कि ये ही असल में उन की रीढ़ की हड्डी, स्टील फ्रेम हैं. यह धरना प्रदर्शन सिर्फ बताने के लिए था कि इन की मौजूदगी को वोटों के चक्कर में भुला न दिया जाए. यह बताने केलिए था कि ये लोग भाषा पर अपनी पकड़ से  झूठ को आखिरी सच साबित करने की कला अपनाते हैं और सच को जमीन में गहरे गाड़़ना भी जानते हैं.

सरकार, पौलिटिकल पार्टियां, बिजनैसमैन, आम आदमी यह न सम झे कि ये लोग अपना वजूद भूल चुके हैं और आम जनता में घुलमिल गए हैं. यह रैली बताने के लिए थी कि  यह जमात खास है, अभी भी अलग है, अभी भी पूजी जाती है, अभी भी समाज का कंट्रोल इन्हीं के पास है, कौकरोचों से निबटना जानती है. इन्हें कोई हलके में न ले.  Editorial

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